घूंघट में सपना चौधरी का पल्लू डांस, देखें वीडियो

हरियाणवी डांसर सपना चौधरी जब भी स्‍टेज पर आती हैं, तो धूम मचा देती हैं. उनकी अदा फैंस को इतना पसंद आती है कि चाहे हरियाणा हो या बिहार, हर जगह सपना के शो हाउसफुल ही रहते हैं. यूं तो सपना चौधरी, हरियाणा की प्रसिद्ध डांसर हैं, लेकिन जब से सपना भोजपुरी फिल्‍मों में नजर आई हैं, उनकी फैन फौलोइंग बिहार में भी काफी बढ़ गई है.

 

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आपको बता दें, दिवाली के मौके पर वायरल हुआ यह विडियो काफी पसंद किया जा रहा है. हालांकि यह विडियो उस समय का है जब सपना बिहार के माधेपुरा में शो करने गईं थी. उस समय भी इस विडियो ने दिन भर में कई लाइक और शेयर हासिल किए थे. उनका शो देखने आए दर्शक झूम उठे थे. अब दिवाली के मौके पर एक बार फिर से सपना का एक पल्लू डांस वाला विडियो जमकर वायरल हो रहा है. इस डांस को करते हुए बौलीवुड स्टार हो चुकीं सपना एक बार फिर से देसी अदाओं से अपने फैंस का शिकार कर रही हैं.

सपना का सोशल मीडिया एकाउंट बता रहा है कि इस बार सपना ने बड़ी धूम-धाम से त्योहार मनाया है, हो भी क्यों न इस बार की दिवाली उन्हें बौलीवुड स्टार का तमगा जो देने आई है. बिग बौस के घर में नजर आ चुकी सपना चौधरी हिंदी से लेकर भोजपुरी फिल्‍मों में छायी हुई हैं. कई फिल्‍मों में उनके डांसिंग नंबर देखने को मिल रहे हैं.

बता दें कि हाल ही में सपना ने अपनी आगामी बौलीवुड फिल्म ‘दोस्ती के साइड इफेक्ट्स’ का पोस्टर रिलीज किया था. इस पोस्टर में सपना का अलग ही अंदाज नजर आ रहा है. यलो टौप में सपना बेहद खूबसूरत लग रही हैं वहीं उनके गाल का डिंपल सपना की खूबसूरती में चार चांद लगाने का काम कर रहा है. यह फिल्म 14 दिसंबर को रिलीज की जाएगी. इस पोस्टर की टैग लाइन भी बहुत कूल है जिसमें लिखा है, ‘पक्की यारी कभी न हारी’.

जैकलीन फर्नांडिस बनेंगी साइक्लिस्ट

जैकलीन इन दिनों 2016 की कन्नड़ हिट फिल्म ‘किरिक पार्टी’ के रीमेक में काम कर रही हैं. इस फिल्म में जैकलीन के साथ कार्तिक आर्यन भी नजर आएंगे. अब खबर है कि वह भारतीय साइक्लिस्ट देबोराह हेरोल्ड के जीवन पर बन रही फिल्म में काम करेंगी.

इसके अलावा जैकलीन ने पौला हौकिंस के नावल ‘द गर्ल औन द ट्रेन’ के हिंदी अडाप्शन में भी काम करने के लिए हामी भर दी है.

प्रियंका चोपड़ा और श्रद्धा कपूर के बाद अब जैकलीन फर्नांडिस भी बायौपिक में नजर आने वाली हैं. खबर है कि वह भारतीय साइक्लिस्ट देबोराह हेरोल्ड के जीवन पर बन रही फिल्म में काम करेंगी. जैकलीन को इस फिल्म की स्क्रिप्ट बेहद पसंद आई है और उन्होंने फिल्म में काम करने के लिए मौखिक सहमति भी दे दी है. देबोराह की कहानी बहुत ही प्रेरणादायक है और इस रोल के लिए जैकलीन को कड़ी ट्रेनिंग लेनी पड़ेगी. इस फिल्म की शूटिंग अगले साल शुरू होने की उम्मीद है.

23 वर्षीय भारतीय साइक्लिस्ट देबोराह का जन्म अंडमान और निकोबार द्वीप समूह पर हुआ था. साल 2004 में आई सुनामी के दौरान वह पोर्ट ब्लेयर में ही मौजूद थीं और पेड़ के नीचे फंसे हुए उन्होंने एक हफ्ते का वक्त गुजारा था. 2013 से वह नई दिल्ली में रहने लगीं और इंदिरा गांधी स्पोर्ट्स कौम्प्लेक्स में ट्रेनिंग लेती हैं. देबोराह ने कई प्रतियोगिताएं जीती हैं और इन दिनों 2020 में होने वाले टोक्यो ओलम्पिक की तैयारी कर रही हैं.

2 लड़कियों की आशिकी

18 मार्च, 2017 को पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना मिली कि गांव अनोड़ा में कुछ लोगों ने 2 लड़कियों को घेर रखा है, उन की जान को खतरा है. कंट्रोल रूम ने यह सूचना थाना राया पुलिस को दे दी, क्योंकि गांव अनोड़ा उसी के अंतर्गत आता था. सूचना मिलते ही थाना राया के थानाप्रभारी इंसपेक्टर अनिल कुमार पुलिस बल के साथ गांव अनोड़ा पहुंच गए. गांव पहुंच कर उन्हें पता चला कि वह फोन रामखिलाड़ी के घर से किया गया था.

पूछताछ में अनिल कुमार के सामने जो घटना आई, वह हैरान करने वाली थी. फोन जिन 2 लड़कियों ने किया था, वे आपस में शादी करना चाहती थीं, जो लोगों को स्वीकार नहीं था. लोग दोनों को अलग करना चाहते थे, जबकि लड़कियां एकदूसरे से अलग नहीं होना चाहती थीं. जब लोग जबरदस्ती करने लगे तो उन्होंने कंट्रोल रूम के 100 नंबर पर फोन कर दिया था.

मामला कोई बहुत गंभीर नहीं था, फिर भी कुछ लोगों को उत्तेजित देख कर अनिल कुमार दोनों लड़कियों को साथ ले कर थाने आ गए. उन के पीछेपीछे दोनों लड़कियों के घर वाले ही नहीं, कुछ रिश्तेदार और गांव के भी तमाम लोग आ गए थे.

पुलिस जिन दोनों लड़कियों को थाने ले आई थी, उन में से एक का नाम सोनिया था. उस की उम्र 23 साल थी. वह मथुरा जिले के थाना राया के गांव अनोड़ा के रहने वाले रामखिलाड़ी की बेटी थी. उस के साथ आई लड़की का नाम रीना था, जो 21 साल की थी. वह गांव रूमगेला के रहने वाले लक्ष्मण की बेटी थी.

थाने में की गई पूछताछ में सोनिया और रीना के प्रेम से ले कर बात विवाह तक पहुंचने की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

उत्तर प्रदेश के जिला मथुरा के थाना राया का एक गांव है अनोड़ा. रामखिलाड़ी इसी गांव के रहने वाले थे. उन के परिवार में पत्नी भारती के अलावा 4 बेटियां और एक बेटा था.

रामखिलाड़ी कपड़ों पर प्रैस कर के गुजरबसर करते थे. सोनिया उन की सब से छोटी बेटी थी. उन्होंने 3 बेटियों की शादी कर दी थी. अब वह सोनिया की शादी के बारे में सोचने लगे थे.

लेकिन सोनिया कुछ अलग तरह की लड़की थी, जिसे ले कर रामखिलाड़ी ही नहीं, उन की पत्नी भारती भी चिंतित रहती थी. इस की वजह यह थी कि सोनिया बचपन से ही लड़कियों की तरह नहीं, लड़कों की तरह रहती आई थी. वह कपड़े तो लड़कों जैसे पहनती ही थी, उस की सोच, बातचीत का लहजा भी लड़कों जैसा था. वह रहती भी लड़कों के साथ ही थी.

सोनिया की चालढाल, रहनसहन और उस की बातें सुन कर रामखिलाड़ी और भारती चिंतित रहते थे. जब तक वह बच्ची थी, बात बचपने में टाल दी जाती रही, लेकिन जब वह सयानी हुई तो मांबाप उसे समझाने ही नहीं लगे, बल्कि हिदायतें भी देने लगे. लेकिन सोनिया पर उन के समझाने या हिदायतों का कोई असर नहीं पड़ा.

सोनिया ने 12वीं तक पढ़ाई की और अपने पैरों पर खड़ी होने के लिए सिलाई सीख कर लोगों के कपड़े तो सीने ही लगी, साथ ही सिलाई सिखाने का इंस्टीट्यूट भी खोल लिया. उस के यहां सिलाई सीखने गांव की ही नहीं, अगलबगल के गांवों की भी लड़कियां आती थीं.

सोनिया जहां अपने में मस्त रहती थी, वहीं मांबाप को उस के ब्याह की चिंता थी. क्योंकि उन्हें शायद पता नहीं था कि वह जिस बेटी के ब्याह के लिए परेशान हैं, उस में लड़कियों वाले गुण हैं ही नहीं. उन्होंने सोनिया के मन में क्या है, इस बात की परवाह किए बगैर अलीगढ़ की तहसील अतरौली के गांव जमनपुर के रहने वाले रमेश से उस की शादी तय कर दी.

जब इस बात की जानकारी सोनिया को हुई तो वह विरोध पर उतर आई. लेकिन उस के विरोध के बावजूद रामखिलाड़ी ने उस की शादी धूमधाम से रमेश के साथ कर दी. यह सन 2009 की बात है. मांबाप के इस फैसले से नाराज सोनिया ससुराल चली तो गई, पर बागी बन गई. ससुराल वालों ने उसे हाथोंहाथ लिया, पर उस के मन में जो था, उस में जरा भी बदलाव नहीं आया.

सोनिया ने पति को छूने देने की कौन कहे, चारपाई के भी नजदीक नहीं आने दिया. सवेरा होते ही उस ने साड़ी उतार कर फेंक दी और जींसटौप पहन लिया. बहू की इस हरकत से ससुराल वाले हैरान रह गए. उन्हें यह जरा भी पसंद नहीं आया. उन्होंने उसे नादान समझ कर समझाना चाहा, पर वह कुछ भी समझने को तैयार नहीं थी. उन्होंने फोन कर के सारी बात रामखिलाड़ी को बताई तो वह परेशान हो उठे.

बड़ी मुश्किल से तो उस ने बेटी की शादी की थी. ससुराल जा कर वह इस तरह का नाटक कर रही थी. 5 दिनों बाद वह मायके आई तो उस ने साफ कह दिया कि अब वह ससुराल नहीं जाएगी. इस के बाद लाख प्रयास के बावजूद भी वह ससुराल नहीं गई. मजबूर हो कर मांबाप ने बेटी के तलाक का मुकदमा अदालत में दायर कर दिया, जो अभी भी विचाराधीन है.

सोनिया तनमन से अपने सिलाई सैंटर में लग गई. उसे लड़कियों को सिलाई सिखाना पसंद था. न जाने क्यों उसे लड़कियों को छूना अच्छा लगता था. इसलिए वह उन्हीं के बीच लगी रहती थी. एक दिन पड़ोस के रूमगेला गांव की रहने वाली रीना उस के सिलाई सैंटर पर सिलाई सीखने आई तो उस ने उस में न जाने क्या देखा कि उसे लगा, इसी लड़की की उसे तलाश थी. रीना अभी पढ़ रही थी. वह सिलाई सीख कर अपनी पढ़ाई का खर्च खुद निकालना चाहती थी. उस के पिता लक्ष्मण खेती करते थे. उन के परिवार में पत्नी शांति के अलावा 4 बेटियां थीं. 3 बेटियों की वह शादी कर चुके थे. सब से छोटी रीना अभी पढ़ रही थी.

रूमगेला गांव अनोड़ा से 6 किलोमीटर दूर था. इस के बावजूद रीना रोज साइकिल से सोनिया के यहां सिलाई सीखने आती थी. रीना में ऐसा न जाने कौन सा आकर्षण था कि सोनिया उस की ओर खिंचती जा रही थी. जब तक वह सिलाई सैंटर में रहती, सोनिया को अजीब सा सुख महसूस होता. वह उसी के इर्दगिर्द मंडराती रहती थी. उसे छू कर उस के मन को असीम शांति ही नहीं मिलती थी, बल्ति अद्भुत सुख का भी अहसास होता था.

सोनिया की नजरें हमेशा रीना पर ही जमी रहती थीं, क्योंकि वह उसे अन्य लड़कियों से अलग नजर आती थी. रीना को भी जब उस के मन की बात का अहसास हुआ तो वह भी उस के करीब आने लगी. जल्दी ही वह उस की खास छात्रा बन गई.

एक दिन सोनिया ने बहाने से उसे अपने घर क्या रोका, उस दिन के बाद से वह उसी की हो कर रह गई. इस के बाद सोनिया ने रीना के पिता लक्ष्मण को फोन कर के कहा कि रीना रोजरोज 6 किलोमीटर आनेजाने में थक जाती है. अच्छा होगा कि उसे उस के पास ही रहनें दें. इस से रीना सिलाई भी जल्दी सीख जाएगी और रोजरोज की थकान से भी बच जाएगी.

लक्ष्मण को क्या पता था कि सोनिया के मन में क्या है. उन्होंने सहज भाव से इजाजत दे दी. अब रीना सोनिया के साथ ही रहने लगी. सप्ताह में एकाध दिन वह घर भी चली जाती थी. एक साथ रहने से सोनिया और रीना एकदूसरे के इतने करीब आ गईं कि वे अलग होने के नाम से घबराने लग%8

संघ को रिपोर्ट कर रहे हैं योगी के मंत्री

बेसिक शिक्षा, बाल विकास व पुष्टाहार राज्यमंत्री अनुपमा जायसवाल का राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ यानि आरएसएस को लिखा पत्र उजागर हुआ है. जिसके बाद यह बात पुख्ता हो गई है कि योगी सरकार के मंत्री संघ को सीधे रिपोर्ट करते हैं. अनुपमा जायसवाल इस पत्र को फर्जी बता रही हैं. इस पत्र में अनुपमा जायसवाल ने देवरिया दौरे की रिपोर्ट संघ को भेजी है. पत्र आरएसएस के सह कार्यवाहक को लिखा गया है. पत्र में सरकार की प्राथमिकताओं और विकास कार्यक्रमों की प्रभावी मानिटरिंग की रिपोर्ट भी सलग्न कहने की बात हुई है.

modi government ministers reports to mohan bhagwat rss

अब इस पत्र की सच्चाई का पता लगाने की बात हो रही है. असल में पहली बार जनता के सामने ऐसा कोई लिखित प्रमाण भले ही आया हो पर जो लोग भाजपा सरकार के कार्यक्रमों को देखते और समझते हैं उनको साफ पता है कि संघ का भाजपा सरकार पर प्रभाव है. बिना संघ की मर्जी के टिकट वितरण से लेकर पदाधिकारियों की नियुक्ति तक कुछ भी संभव नहीं है. भाजपा के संगठन मंत्री सुनील बंसल को सबसे पावरपफुल माना जाता है.

2019 के चुनावों को लेकर लखनऊ के आनंदी पार्क में हुई बैठक में सरकार और संघ दोनों के प्रतिनिधि थे. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के अलावा संघ के लोगों ने भी हिस्सेदारी की. भाजपा और संघ से जुडे 40 संगठनों के 300 से अध्कि पदाधिकारी मौजूद थे. ऐसे में मंत्री का संघ को रिपोर्ट करना कोई बडा मुद्दा नहीं है.

परेशानी वाली बात यह है कि भाजपा अभी तक अपनी सफाई में यह कहती रही है कि वह संघ के दबाव में काम नहीं करती. पहली बार जनता के सामने यह पत्र आया है. जिससे साफ पता चल रहा है कि मंत्री अपनी दैनिक रिपोर्ट संघ को भेजते हैं.

एनआरआई की हत्या की उलझी हकीकत

12 मई, 2017 की सुबह करीब 9 बजे सोहाना के थानाप्रभारी राजन परमिंदर सिंह मल्ही को किसी ने उन के मोबाइल पर फोन कर के जानकारी दी कि मोहाली इंटरनैशनल एयरपोर्ट रोड के पास स्थित गांव मौलीबैदवान की ओर से बहने वाले गंदे नाले की झाडि़यों में एक लाश पड़ी है.

यह खबर सुन कर परमिंदर सिंह एएसआई नायब सिंह, कांस्टेबल जसविंदर सिंह, मक्खन सिंह, नवतेज सिंह और सवनीत सिंह के अलावा होमगार्ड के जवान अंगरेज सिंह को साथ ले कर फोन पर बताई गई जगह की ओर रवाना हो गए.

मौके पर लोगों की खासी भीड़ जमा थी. परमिंदर सिंह ने झाडि़यों से जूट के बोरे से ढकी लाश बाहर निकलवाई. लाश नग्वावस्था में थी, जो किसी पुरुष की थी. वह कुछ फूली हुई थी. मुंह व गरदन पर कपड़ा बंधा था. दोनों हाथ भी पीठ पर ले जा कर रबड़ की ट्यूब से बंधे थे.

परमिंदर सिंह ने लाश मिलने की खबर उच्चाधिकारियों को दी तो मोहाली पुलिस के कई उच्चाधिकारियों के अलावा जिले के सीआईए इंसपेक्टर अतुल सोनी भी अपनी टीम के साथ वहां आ पहुंचे. इस बीच पुलिस फोटोग्राफर व डौग स्क्वायड के अलावा फोरैंसिक टीम के सदस्य भी आ कर अपनेअपने काम में लग गए थे.

मौके पर मौजूद लोगों से पुलिस ने लाश की शिनाख्त करानी चाही, पर कोई भी उसे पहचान नहीं सका. पुलिस मौके की काररवाई निपटा रही थी, तभी करीब 40 साल का एक आदमी तेज कदमों से चलता हुआ आया और परमिंदर सिंह से उस ने अपना नाम सुखजीत सिंह और मोहाली के गांव लखनौर का रहने वाला बता कर कहा, ‘‘सर, मुझे अभीअभी किसी ने फोन पर बताया है कि मेरे जीजा सुरजीत सिंह की किसी ने हत्या कर उन की लाश यहां डाल दी है.’’

‘‘हां, एक लाश मिली तो है. देख लें.’’ परमिंदर सिंह ने बोरे से ढकी लाश की तरफ इशारा कर के कहा.

एक कांस्टेबल ने लाश के ऊपर से बोरा हटा दिया. लाश से बदबू आने की वजह से सुखजीत अपनी नाक पर रूमाल रख कर उस लाश को गौर से देखने लगे. लाश बहुत खराब हो चुकी थी. वह काफी हद तक गल चुकी थी. चेहरा भी पूरी तरह पहचान में नहीं आ रहा था. इस के बावजूद भी उन्हें लगातार यही आशंका हो रही थी कि यह लाश उन के जीजा सुरजीत सिंह की ही है.

अचानक उन्हें ध्यान आया कि जीजा ने अपनी एक जांघ पर मोरनी का टैटू गोदवाया था. उन्होंने देखने का प्रयास किया तो वह एक जांघ पर मिल गया. इस के बाद तो संदेह की कोई गुंजाइश ही नहीं रह गई.

उस टैटू के आधार पर ही उन्होंने उस लाश की पहचान अपने बहनोई सुरजीत सिंह के रूप में कर दी. लाश की शिनाख्त होने पर पुलिस ने मौके की काररवाई पूरी की और लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. इस के बाद पुलिस ने सुखजीत सिंह की तहरीर पर अज्ञात के खिलाफ सुरजीत सिंह की हत्या की रिपोर्ट दर्ज कर ली.

पुलिस ने जब इस मामले की जांच शुरू की तो पता चला कि 55 साल के अनिवासी भारतीय सुरजीत सिंह मूलरूप से जिला फतेहगढ़ साहिब के गांव फतेहपुर जट्टां के रहने वाले थे. अच्छीखासी खेतीबाड़ी थी उन की. घर में किसी चीज की कोई कमी नहीं थी.

मगर बरसों पहले वह एक बार कनाडा क्या गए, वहीं के हो कर रह गए. उन्होंने वहीं की नागरिकता ले ली. उन की पत्नी बलजीत कौर की सन 2009 में मौत हो गई तो वह अपने बेटे रुपिंदर सिंह के परिवार के साथ रहने लगे. बेटे का परिवार भी कनाडा में ही रहता था.

सुरजीत सिंह भले कनाडावासी हो गए थे, मगर अपने देश व अपने गांव से बराबर उन का लगाव बना रहा. मोहाली तो उन्हें विशेष रूप से पसंद था. कनाडा से भारत आने का वह अकसर बहाना ढूंढा करते थे. मोहाली के सैक्टर-71 में उन्होंने अपनी तिमंजिला कोठी बना रखी थी.

इस कोठी का भूतल और ऊपर वाली मंजिल उन्होंने किराए पर दे रखी थी. बाकी बीच वाला फ्लोर उन्होंने अपने लिए खाली रख छोड़ा था. वह जब भी मोहाली आते थे, अपनी इसी कोठी में रुका करते थे. पिछले कुछ समय से सुरजीत सिंह भारत आए हुए थे. गांव में उन्होंने बड़ा अच्छा समय बिताया.

सब से खूब अपनत्व भाव से मिलतेमिलाते रहे. अपने सभी रिश्तेदारों व कई परिचितों के लिए वह तोहफे भी लाए थे. गांव में कई दिन रहने के बाद वह मोहाली चले गए. यह 5 मई, 2017 की बात है. मोहाली में अपनी कोठी पर उन्होंने 2-3 दिन बिताए. इस बीच उन की अपने कई रिश्तेदारों से फोन पर बातें होती रहीं. बातचीत में उन्होंने बताया था कि वह मोहाली में रुके हुए हैं.

8 मई की शाम करीब 5 बजे सुरजीत सिंह ने अपना बैग उठाया और कहीं चले गए. जाते समय उन के एक किराएदार ने उन्हें देखा जरूर था, मगर आगे बढ़ कर वह यह नहीं पूछ सका कि वह कहां जा रहे हैं.

उस दिन के बाद उन्हें किसी ने नहीं देखा. इस बीच उन के गांव के रहने वाले सेवा सिंह ने 10 मई को उन्हें अपने किसी काम से फोन किया. फोन सुरजीत सिंह ने न उठा कर किसी अन्य ने उठाया. उस आदमी ने अपना नाम परमिंदर सिंह बताते हुए कहा, ‘‘सुरजीत अंकल हम से मिलने आए थे. जाते वक्त अपना मोबाइल यहीं भूल गए. आप से उन की मुलाकात हो तो प्लीज उन्हें इस बारे में बता दीजिएगा.’’

‘‘हां, जरूर बता दूंगा. वैसे आप उन्हें कैसे जानते हैं और आप कहां से बोल रहे हैं? अपना एड्रैस बता दीजिए. टाइम मिला तो मैं ही उन का फोन लेने आ जाऊंगा.’’ सेवा सिंह ने कहा.

‘‘अजीब किस्म की बातें कर रहे हैं, मुझे तो आप कुछ शक्की मिजाज के लग रहे हैं. सुरजीत सिंह मेरी वाइफ गुरप्रीत कौर के अंकल हैं. लीजिए, आप गुरप्रीत से ही बात कर लें.’’ वह आदमी थोड़ा तल्ख लहजे में बोला.

तभी फोन पर किसी महिला की आवाज आई, ‘‘देखिए, मैं सुरजीत अंकल की कोठी में किराए पर रहती थी. वह मुझे अपनी बेटी की तरह मानते हैं. जब भी इंडिया आते हैं, मुझ से मिलने जरूर आते हैं. कल वह हमारे यहां आए थे, रात में खाना खाने के बाद यहीं सो गए थे. गांव जाने को कह कर वह आज सुबह चले गए. उन के जाने के कई घंटे बाद हम ने देखा कि उन का फोन यहीं रह गया है.’’

‘‘वह तो जब उन्हें ध्यान आएगा, वह किसी और के फोन से अपने नंबर पर फोन कर लेंगे. मुझ से बात होगी तो मैं इस बारे में उन्हें बता दूंगा. मगर मुझे हैरानी इस बात की है कि आप लोग अपना एड्रैस बताने से क्यों हिचकिचा रहे हैं?’’

सेवा सिंह के इतना कहते ही उस औरत ने फोन काट दिया. सेवा सिंह ने दोबारा फोन मिलाया तो इस बार फोन स्विच्ड औफ कर दिया गया था.

सेवा सिंह को शक हुआ. उन के पास सुरजीत सिंह के साले सुखजीत सिंह का मोबाइल नंबर था. उन्होंने सुखजीत सिंह को फोन कर के सारी बात बता दी. इस के बाद सुखजीत सिंह को बहनोई की चिंता हुई. वह उसी समय मोहाली के लिए रवाना हो गए. सेवा सिंह से भी उन्होंने मोहाली के सेक्टर-71 स्थित कोठी नंबर 3217 पर पहुंचने को कहा.

दोनों ही मोहली स्थित सुरजीत सिंह की कोठी पर पहुंचे. जिस फ्लोर पर वह रहते थे, वहां ताला लगा था. ऊपर की मंजिल और भूतल पर रहने वाले किराएदार घर पर मौजूद थे. उन से बात की गई तो उन्होंने किसी परमिंदर और उस की पत्नी गुरप्रीत कौर को जानने से इनकार कर दिया. हां, एक किराएदार ने यह जरूर बताया कि सुरजीत सिंह 8 मई की शाम 5 बजे के करीब अपना बैग ले कर घर से कहीं गए थे.

अब तक जितनी भी बातें सुखजीत सिंह के नोटिस में आई थीं, उन से उन्हें शक हो रहा था कि कहीं उन के बहनोई किसी साजिश का शिकार तो नहीं हो गए. आखिर वह एनआरआई थे, अच्छीखासी संपत्ति के मालिक थे. ऐसे में फिरौती की खातिर उन का अपहरण होने की भी आशंका थी.

उन की कोठी मोहाली के थाना मटौर के अंतर्गत आती थी. कोई दूसरा चारा न देख सुखजीत सिंह रिपोर्ट लिखाने थाने पहुंच गए. उन्होंने पुलिस को अपने बहनोई के गायब होने की बात बताई तो पुलिस ने केवल गुमशुदगी दर्ज की.

पुलिस ने सुखजीत सिंह से सुरजीत सिंह का फोटो मांगा. उन के पास उन का फोटो नहीं था, वह उन की कोठी से ही मिल सकता था. 2 पुलिस वालों के साथ सुखजीत बहनोई की कोठी पर पहुंचे. लोगों की मौजूदगी में दरवाजे पर लगा ताला तोड़ा गया. उन के कमरे से उन का फोटो तो मिल गया, लेकिन तभी पुलिस की नजर वहां लगे सीसीटीवी कैमरे पर पड़ी.

पुलिस ने कैमरे की फुटेज अपने कब्जे में ले ली. पुलिस ने जब वह फुटेज देखी तो उस में एक लड़का और लड़की उन के कमरों की तलाशी लेते दिखाई दिए. पुलिस ने कोठी में रहने वाले किराएदारों को वह फुटेज दिखाई तो वे उन्हें पहचान नहीं सके. मटौर पुलिस केस की जांच में जुट गई. उधर सुखजीत भी अपने बहनोई की तलाश में लगा था.

सुखजीत सिंह के अलावा अन्य रिश्तेदार और दोस्तों ने भी अपने स्तर से सुरजीत सिंह को संभावित जगहों पर तलाशा, लेकिन उन का कहीं कोई पता नहीं चला. आखिर 12 मई, 2017 की वह मनहूस सुबह आई, जब सुखजीत सिंह को उन के किसी परिचित ने फोन कर के बताया कि उन के जीजा सुरजीत सिंह को किसी ने मार कर उन की लाश मौलीबैदवान के गंदे नाले की झाडि़यों में फेंक दी है. इस पर सुखजीत सिंह वहां पहुंच गए थे.

मामला एक एनआरआई के कत्ल का था, इसलिए मोहाली के युवा एसएसपी कुलदीप सिंह चहल ने इसे गंभीरता से लेते हुए केस को जल्द से जल्द हल करने के आदेश थाना पुलिस को दिए.

थानाप्रभारी राजन परमिंदर सिंह मल्ही व एएसआई नायब सिंह ने संयुक्त रूप से केस की विवेचना शुरू की. उन्होंने सुरजीत सिंह के फोन नंबर की काल डिटेल्स को खंगालते हुए अपना पूरा ध्यान उस युवक व युवती पर केंद्रित कर दिया, जो सुरजीत सिंह के घर की तलाशी लेते हुए सीसीटीवी फुटेज में कैद थे.

सुरजीत सिंह की कोठी में रहने वाले किराएदारों का कहना था कि उन्होंने उस लड़केलड़की को वहां कभी नहीं देखा था. जबकि दूसरी ओर पड़ोसियों को उन के फोटो दिखाए गए तो कुछ लोगों ने बताया कि करीब 2 साल पहले तक यह लड़की यहां किराए पर रहती थी.

किराया देने की बात पर इस का सुरजीत सिंह से झगड़ा भी हुआ था. झगड़े के बाद उन्होंने इस से मकान खाली करवा लिया था. पुलिस का काम उस समय आसान हो गया, जब एक पड़ोसी ने यह जानकारी दी कि इन दिनों यह लड़की मोहाली के सेक्टर-79 की कोठी नंबर 1069 में किराए पर रह रही है.

यह जानकारी मिलते ही पुलिस टीम सेक्टर-79 के उस पते पर भेज दी गई. मगर पुलिस के वहां पहुंचने से पहले ही वह घर से गायब हो चुकी थी. फिर क्या था, पुलिस तमाम शिद्दत से उस की तलाश में जुट गई. मुखबिरों को भी सतर्क कर दिया गया.

अगले दिन एक गुप्त सूचना के आधार पर उसे अपने एक साथी के साथ खरड़ के नजदीक लांडरां चौक से हिरासत में ले लिया गया. पूछताछ करने पर युवती ने अपना नाम गुरप्रीत कौर निवासी सैक्टर-79, मोहाली बताया. जबकि उस के साथ वाले युवक ने अपना नाम परमिंदर सिंह उर्फ डौन, निवासी गांव इसरेल, जिला फतेहगढ़ साहिब बताया. दोनों की उम्र 30 व 32 साल के बीच थी. उन्होंने आपस में अपना रिश्ता देवरभाभी का बताया था.

जब उन से सुरजीत सिंह की हत्या के बारे में पूछा गया तो उन्होंने स्वीकार कर लिया कि एनआरआई सुरजीत सिंह का कत्ल उन्होंने ही किया था. हत्या की उन्होंने जो वजह बताई, उस से पता चला कि सुरजीत सिंह का गुरप्रीत कौर पर 25 हजार रुपया किराया बाकी था, जिसे वह दे नहीं पा रही थी. इस के एवज में सुरजीत सिंह ने उस से शारीरिक संबंध बनाने को कहा था, साथ ही यह शर्त भी रखी थी कि ऐसा करते समय वह उस की फिल्म भी बनवाएंगे.

गुरप्रीत कौर के पास पैसे नहीं थे, इसलिए वह उस की घिनौनी शर्त मानने को तैयार हो गई. उस ने इस बारे में परमिंदर से बात की तो वह उस की इज्जत बचाने के लिए उस का साथ देने को तैयार हो गया. इस तरह उन्होंने एक योजना बना डाली.

योजना के अनुसार, गुरप्रीत कौर ने सुरजीत सिंह को मनमानी करने का लालच दे कर फोन कर के अपने घर बुला लिया. फिर वहीं पर परमिंदर और गुरप्रीत कौर ने उस की हत्या कर दी. उन की इस कहानी पर पुलिस को पूरी तरह विश्वास नहीं हुआ. लिहाजा पुलिस ने उन्हें 14 मई की सुबह मोहाली की जेएमआईसी बिसमन मान के निवास पर पेश किया.

उस दिन रविवार की छुट्टी होने की वजह से ऐसा किया गया था. विद्वान दंडाधिकारी ने दोनों अभियुक्तों को 3 दिनों के पुलिस कस्टडी रिमांड पर दे दिया. रिमांड की इस अवधि में महिला पुलिस की मदद से परमिंदर सिंह ने दोनों से गहन पूछताछ की. इस पूछताछ में जो कुछ इन्होंने बताया, उस से लोमहर्षक अपराध की एक अलग ही कहानी सामने आई.

मूलरूप से लुधियाना की सैंट्रल जेल के नजदीक बसे प्रीतनगर की रहने वाली गुरप्रीत कौर शुरू से ही महत्त्वाकांक्षी थी. परिवार में पति हरजीत सिंह के अलावा एक बेटा था. हरजीत एक प्राइवेट फर्म में नौकरी करते हुए अपनी जिंदगी से पूरी तरह संतुष्ट था. गुरप्रीत कौर के साथ ऐसा नहीं था. अपनी ढर्रे की जिंदगी से हट कर वह कुछ ऐसा करना चाहती थी, जिस से पैसा उस के कदमों पर बरसे.

उस ने ब्यूटीपार्लर का काम सीख रखा था, जिसे वह धंधे के रूप में अपनाना चाहती थी. जबकि उस का पति इस के लिए तैयार नहीं था. इस से दोनों में तकरार रहने लगी, जो इस कदर बढ़ती गई कि आखिर दोनों ने एकदूसरे से तलाक ले लिया.

इस के बाद गुरप्रीत कौर मोहाली चली आई. बेटा तो उस के साथ था ही, मां से यह कह कर अपनी छोटी बहन को भी साथ ले आई कि वह उस की जिंदगी बनाएगी. मोहाली आते ही उस की छोटी बहन की नौकरी लग गई. बेटा भी स्कूल जाने लगा. मोहाली में गुरप्रीत ने एनआरआई सुरजीत सिंह की कोठी का एक हिस्सा किराए पर ले रखा था, जहां रहते हुए वह अपना ब्यूटीपार्लर भी चलाया करती थी.

गुरप्रीत कौर द्वारा पुलिस को बताए अनुसार, सुरजीत सिंह अकसर इंडिया आते रहते थे. वह उन्हें अंकल कहती थी. एक दिन जब उस का बेटा स्कूल गया हुआ था और बहन नौकरी पर, उसी समय उस ने सुरजीत सिंह को उकसाते हुए उन से शारीरिक संबंध बना लिए और फिर इस एवज में मकान का किराया देना बंद कर दिया.

इसी दौरान गुरप्रीत कौर की मुलाकात फतेहगढ़ निवासी हरजीत सिंह से हुई. दोनों में प्रेम हुआ, फिर इन लोगों ने चंडीगढ़ के सेक्टर-22 के गुरुद्वारा में आनंद कारज (ब्याह) रचा लिया. मगर उसी शाम हरजीत सिंह के घर वाले आ कर उसे जबरन अपने साथ ले गए. उन्होंने बताया कि वह नशा करने का आदी था.

बाद में उसे खरड़ के नशामुक्ति केंद्र में भरती करवा दिया गया. इस सब के चलते गुरप्रीत कौर की जानपहचान हरजीत के चचेरे भाई परमिंदर सिंह उर्फ डौन से हुई. इन के भी आपस में संबंध बने और दोनों ने शादी का मन बना लिया.

उन्हीं दिनों सुरजीत सिंह इंडिया आ गए. अब तक गुरप्रीत कौर उन का घर छोड़ कर कई मकान बदलते हुए सेक्टर-79 की कोठी नंबर 1069 में किराए पर रहने लगी थी. परमिंदर कोई कामधंधा नहीं करता था. गुरप्रीत ने जिस मकसद से घर छोड़ा था, वह पूरा नहीं हो रहा था. वह कोठी, गाड़ी सभी तरह के ऐशोआराम चाहती थी. यह सब उसे परमिंदर से भी मिलता नजर नहीं आ रहा था.

तब गुरप्रीत कौर और परमिंदर को एनआरआई सुरजीत सिंह ही मोटी मुर्गी दिखाई दिए. उन्हीं को दोनों ने न्यूड फोटो के जरिए ब्लैकमेल करने की योजना बनाई. गुरप्रीत कौर के सुरजीत से पहले शारीरिक संबंध बन चुके थे, इसलिए वह आसानी से झांसे में आ सकते थे.

योजनानुसार गुरप्रीत कौर ने सुरजीत सिंह से फोन पर बात कर अपने यहां बुला लिया. बेटा और बहन लुधियाना गए हुए थे. परमिंदर कमरे में पहले से छिप कर बैठ गया. देर रात तक सुरजीत और गुरप्रीत कौर का खानेपीने का दौर चलता रहा, फिर संबंध बनाने को उकसाते हुए गुरप्रीत ने उन के कपड़े उतरवा लिए.

उसी समय परमिंदर आगे आ कर अपने मोबाइल से उन की फिल्म बनाने लगा. इस पर सुरजीत सिंह गुस्से में उस से उलझ गए. मगर परमिंदर ने गुरप्रीत कौर की सहायता से सुरजीत सिंह को काबू कर उन के चेहरे व गरदन पर कपड़ा कस दिया, जिस से उन की मौत हो गई.

उन की योजना तो फोटो के बल पर उन्हें ब्लैकमेल करने की थी, पर अब उन की मौत हो गई. इस से वह घबरा गए. उन्होंने शव को बिस्तर में लपेट कर घर में ही एक तरफ रख दिया. तलाशी में सुरजीत सिंह की जेब से कुछ हजार रुपयों के अलावा और कुछ हाथ नहीं लगा.

जेब में उन की कोठी की चाबी मिल गई. चाबी ले कर वे सेक्टर-71 स्थित उन की कोठी पर पहुंचे. वहां भी वह नकदी, ज्वैलरी तलाशते रहे, पर इन के हाथ कुछ खास नहीं लगा. अलबत्ता घर पर लगे सीसीटीवी कैमरों में उन की फोटो जरूर कैद हो गई.

परमिंदर और गुरप्रीत कौर पतिपत्नी की तरह रह रहे थे. परमिंदर को इस बात पर गुस्सा आ रहा था कि सुरजीत सिंह गुरप्रीत कौर के जिस्म से खेलता रहा, इसलिए वह सुरजीत सिंह के शव का अंगअंग काट देना चाहता था. इस के लिए वह तेजधार वाली दरांती खरीद लाया.

घर में पड़े शव में से 2 दिनों बाद दुर्गंध उठने लगी. आखिर 11 मई, 2017 की रात एक जूट के बोरे में सुरजीत सिंह का शव भर कर अपनी कार से मौलीबैदवान के गंदे नाले के पास ले गए और झाडि़यों में डाल दिया. फेंकने से पहले खुन्नस में परमिंदर ने सुरजीत सिंह के दोनों पैर और गुप्तांग भी काट कर नाले में फेंक दिए. बाद में कार सेक्टर-43 बसअड्डे की पार्किंग में पार्क कर दी.

पुलिस ने इन की निशानदेही पर कार और अन्य सबूत भी बरामद कर लिए. इन का कहना था कि कपड़े से गला घोंटने से पहले इन लोगों ने सुरजीत सिंह के सिर पर बेसबाल बैट से वार भी किया था, जिस से खून निकल कर फर्श पर फैल गया था. इसे गुरप्रीत कौर ने साफ किया था.

दोनों पैर, गुप्तांग व दरांती इन लोगों से बरामद नहीं किए जा सके. यह बरामद करने के लिए माननीय अदालत ने दोनों अभियुक्तों की कस्टडी 19 मई तक बढ़ा दी. मगर अब इन लोगों का कहना है कि इन्होंने पैर व गुप्तांग नहीं काटे. आरोपी अपने बयान कई बार बदल चुके हैं.

पुलिस का यह भी मानना है कि इस अपराध में उक्त 2 लोगों के अलावा कुछ अन्य लोग भी शामिल हो सकते हैं.   इस रिमांड अवधि में भी पुलिस अभियुक्तों से मृतक के काटे हुए अंगों के बारे में पता नहीं लगा सकी तो उन्हें फिर से 19 मई, 2017 को कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें 2 जून तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. पुलिस अभी मामले की जांच कर रही है.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

5 राज्यों के चुनाव हैं मोदी का इम्तिहान

5 राज्यों के चुनाव जो नवंबरदिसंबर में होंगे 2019 की दस्तक देंगे. कांग्रेस के लिए तो नहीं पर नरेंद्र मोदी के लिए ये बड़े इम्तिहान हैं. एक तरफ पैट्रोल के दाम बढ़ने से जनता खाने को तैयार बैठी है तो दूसरी ओर दलित सवर्णों की धौंसबाजी से परेशान हैं. मुसलिम वोट तो पहले भी भाजपा को नहीं जाते थे पर अब सवाल उठ रहा है कि दलितों को मनाने के लिए जो कदम उठाए जा रहे हैं उन से ऊंची जातियां ही नाराज न हो जाएं.

देश की हालत पतली है, यह पक्का है. 2014 में जो उम्मीद जगी थी वह तो अब धुल चुकी है. आस है तो यही कि कांग्रेस अकेले अपने दम पर कुछ नहीं कर पाएगी और मायावती व अखिलेश यादव भाजपा के खिलाफ वोटों का बंटवारा कर के भाजपा को आखिर में जिता ही देंगे.

देश को ऐसी सरकार चाहिए जो चले. आम आदमी बेहतर जिंदगी चाहता है पर इस का फार्मूला किसी के पास नहीं है. कांग्रेस कहे कि उस का राज बेहतर होगा इस की कोई गारंटी नहीं है. सरकारों का रवैया एक तरह का हो गया है कि जहां चोट लगे वहीं मरहमपट्टी कर दो. चोट लगी ही क्यों इस पर सोचने और करने को तैयार नहीं.

नरेंद्र मोदी अगर आम लोगों की निगाह में खरे नहीं उतरे तो इसलिए कि उन्होंने सरकार चलाने का जो ब्लूप्रिंट दिया वह सिर्फ मंचों और फीते काटने तक रह गया.

बैंक फेल से न हों. सड़केंसुरंगें बनाने वाली कंपनियां दीवाला न पीटें. स्टील मिलें बंद न हों. नौकरियां कम न हों. पढ़ाई खराब न हो. जनता को सड़क पर निकलने में डर न लगे. कल क्या होगा, इस की चिंता न हो. यह नरेंद्र मोदी की सरकार न कर पाई.

हिंदू धर्म बचा रहे, इस से किसी को दो रोटी ज्यादा नहीं मिलेगी. वह जमाना लद गया जब लोग धर्म के नाम पर मरमिटते थे. कुछ हैं आज जो अपना सबकुछ धर्म को दे देते हैं पर सब नहीं ऐसे. वे हिंदू धर्म को बचा कर रखने में एक हद तक ही जा सकते हैं. अपने वजूद या कल की बलि दे दें, जरूरी नहीं.

नरेंद्र मोदी के पास अब कुछ करने का समय बचा नहीं है. हां, वे कांग्रेस और दूसरों के बीच खाइयां खोद सकते हैं. यह दूसरों की कमजोरी है कि वे अपना घर संभाल नहीं सकते. दूसरों को बांट कर राज करना पुरानी कला तो हम लोग सदियों से जानते हैं पर इस चक्कर में देश को गुलामी सहनी पड़ती रही है. उम्मीद है कि बांटने वालों और बंटने वालों को सबक मिलेगा.

शहीद भगत सिंह : मैं नास्तिक क्यों हूं

यों तो भगत सिंह अपने शहीदी दिवस या फिर जन्मशताब्दी आदि के मौकों पर स्कूलों में याद कर लिए जाते हैं. कुछ सरकारी व निजी संस्थाएं कार्यक्रम कर के उन की स्मृतियों की इतिश्री कर लेती हैं. लेकिन बीते दिनों भगत सिंह का जिक्र 2 रोचक घटनाओं के जरिए सुनने को मिला.

हाल ही में दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली विधानसभा में नारे लगाने और परचे फेंकने वाले 2 लोगों से, डपटते हुए, सवाल किया है कि आप लोग स्वतंत्र देश में रहते हैं तो भगत सिंह की तरह व्यवहार क्यों कर रहे थे. भगत सिंह ने जो भी किया, उसे दोहराने का क्या मकसद है?

दरअसल यह मामला तब का है जब इन दोनों को दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष रामनिवास गोयल ने 30 दिनों के लिए सश्रम कारावास की सजा के लिए भेजने का आदेश दिया था.

बाद में सदन के अध्यक्ष के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर अदालत ने सवाल उठाते हुए यह कहा है. अदालत इसे ध्यान खींचने वाला स्टंट इसलिए भी मान रही है क्योंकि तब भगत सिंह ने यह कारनामा अंगरेजों की मुखालफत में किया था और आज की यह हरकत महज राजनीतिक तमाशा है.

भगत सिंह से जुड़ी दूसरी खबर यह भी है कि जब लाहौर में वे जेल में थे तब उन्होंने लगभग 404 पेज की एक डायरी लिखी थी. अब उस ऐतिहासिक डायरी को हिंदी में अनुवादित कर प्रकाशित करने की तैयारी चल रही है. इस काम में उन के वंशज यादवेंद्र संधु, इतिहासकार डा. मोहन चंद्र और प्रो. पी एन सिंह मोरचा संभाले हैं. अंगरेजी व उर्दू में लिखी गई इस डायरी का हिंदी में आना सुखद समाचार है.

बहरहाल, आज भी गाहेबगाहे चाहेअनचाहे भगत सिंह की प्रासंगिकता सामने आ ही जाती है. अभी स्वतंत्रता दिवस के मौके पर भी उन्हें याद किया जाएगा. उन पर बनी फिल्मों के गीत सुनाए जाएंगे.

सो, उन्हें याद करने व उन के प्रति सम्मान व्यक्त करने के अनेक कार्यक्रम किए जाते हैं – कुछ सरकारी, कुछ अर्धसरकारी और कुछ गैरसरकारी. इन्हीं कार्यक्रमों के दौरान भगत सिंह के स्वरूप और धर्म को ले कर चर्चाएं भी होती रहती हैं. कुछ उन के केशधारी स्वरूप को आगे लाने की कोशिश करते दिखेंगे तो दूसरे उन के हैटधारी स्वरूप को. जब उन के नाम पर सिक्का या टिकट जारी करने की बात चली तब भी यही विवाद उठा था.

सांप्रदायीकरण और विवाद

प्रश्न पैदा होता है कि ऐसा सब क्यों? इस का सीधासादा उत्तर तो यही है कि जब कुछ लोग शहीद का सांप्रदायीकरण करने का प्रयास करते हैं तो दूसरे उस का विरोध करते हैं. इस से विवाद का उपजना स्वाभाविक ही है.

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भगत सिंह का जन्म सिख परिवार में हुआ, यह निर्विवाद है. परंतु वह परिवार विचारधारा की दृष्टि से आर्यसमाजी था. यह बात स्वयं भगत सिंह ने लिखी है. परंतु बाद में भगत सिंह आर्यसमाजी के स्थान पर बुद्घिवादी व वैज्ञानिक विचारधारा के हो गए और उन के लिए सिख या आर्यसमाजी होना बेमाने हो गया. यह उन की सच्ची महानता थी.

वे यदि महान हैं तो इसलिए नहीं कि वे कभी केशधारी थे. वे इसलिए भी महान नहीं हैं कि वे कभी आर्यसमाजी विचारधारा के पक्षधर थे. उन की महानता उन की उस स्पष्टमानवी, बुद्धिवादी और वैज्ञानिक विचारधारा में निहित है, जिस पर वे जीवन के अंतिम क्षणों तक चले और अटल बने रहे.

भगत सिंह जब जेल में बंद थे और उन के केस का फैसला आने वाला था, तभी उन्हें मालूम पड़ चुका था कि अंगरेज सरकार उन्हें जीवित छोड़ने वाली नहीं. उन्होंने 5 और 6 अक्तूबर, 1930 को एक लेख के रूप में अपनी विचारधारा को अंगरेजी में लिपिबद्ध किया, जो 27 सिंतबर, 1931 को लाहौर से प्रकाशित होने वाले ‘द पीपल’ में ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ शीर्षक से छपा था. ध्यान रहे 7 अक्तूबर, 1930 को अदालत ने उन्हें फांसी की सजा सुना दी थी.

लेख में भगत सिंह ने इस प्रश्न का विस्तार से उत्तर दिया है कि मैं नास्तिक क्यों हूं. अपने बारे में चर्चा करते हुए वे लिखते हैं, ‘‘मेरे दादा, जिन के प्रभाव

में मेरा पालनपोषण हुआ, कट्टर आर्यसमाजी हैं… मैं लाहौर के डीएवी स्कूल में सुबह और शाम की प्रार्थनाओं के अलावा भी घंटों गायत्री मंत्र जपता रहा… आगे चल कर मैं अपने पिता के साथ रहने लगा… वे उदारवादी हैं… अब, मैं बिना कटेछंटे दाढ़ी और केश रखने लगा था, मगर मैं सिख मत या किसी अन्य धर्म के मिथकों व सिद्धांतों में विश्वास कभी नहीं कर पाया. फिर भी ईश्वर के अस्तित्व में मेरी पक्की आस्था थी.’’

(भगत सिंह और उन के साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज, पृ. 457)

भगत सिंह जब क्रांतिकारी दल में शामिल हुए तो अनेक क्रांतिकारी नेताओं से उन का संपर्क हुआ. वे लिखते हैं, ‘‘मैं पहलेपहल जिस नेता के संपर्क में आया, वह ईश्वर को मानता तो नहीं था लेकिन उस के अस्तित्व को नकारने का साहस भी उस में नहीं था. जब मैं उस से ईश्वर के बारे में लगातार प्रश्न करता तो वह कह दिया करता था ‘जब तुम्हारा मन करे, प्रार्थना कर लिया करो.’ ’’

इस के बाद भगत सिंह शचींद्रनाथ सान्याल के संपर्क में आए, जो आस्तिक थे. उन्होंने अपनी एकमात्र किताब ‘बंदीजीवन’ के पहले पृष्ठ से ही ईश्वर की महिमा का जबरदस्त गुणगान किया है.

भगत सिंह लिखते हैं कि काकोरी कांड के चारों विख्यात शहीदों ने अपना अंतिम दिन प्रार्थनाएं करते हुए बिताया था. रामप्रसाद बिस्मिल कट्टर आर्यसमाजी थे. समाजवाद और साम्यवाद के अपने विस्तृत अध्ययन के बावजूद राजेंद्र लाहिड़ी उपनिषदों और गीता के श्लोकों का पाठ करने की अपनी इच्छा को दबा नहीं सके. उन लोगों में मैं ने सिर्फ एक आदमी ऐसा देखा जो कभी प्रार्थना नहीं करता था, लेकिन ईश्वर के अस्तित्व को नकारने का साहस वह भी कभी नहीं जुटा सका.

वे लिखते हैं कि ऐसे में जब आगे चल कर क्रांतिकारी आंदोलन की पूरी जिम्मेदारी मुझे अपने कंधों पर उठाने का मौका मिला तो मेरे दिमाग के हर कोने-अंतरे से एक ही आवाज रहरह कर उठती ‘अध्ययन करो, स्वयं को विरोधियों के तर्कों का सामना करने लायक बनाने के लिए अध्ययन करो’, ‘अपने मत के समर्थन में तर्कों से लैस होने के लिए अध्ययन करो.’

आतंकवाद से मुंह मोड़ा

भगत सिंह के शब्दों में, ‘‘मैं ने अध्ययन करना शुरू किया. उस से मेरी पूर्ववर्ती आस्थाओं और मान्यताओं में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए. केवल हिंसात्मक उपायों में विश्वास करने का रूमानीपन जाता रहा. रहस्यवाद और अंधविश्वास के लिए अब कोई गुंजाइश नहीं रही. यथार्थवाद हमारा मत बन गया.’’

अपने अध्ययन का संक्षिप्त सा परिचय देते हुए भगत सिंह लिखते हैं, ‘‘मैं ने अराजकतावादी नेता बाकुनिन को पढ़ा, थोड़ा सा साम्यवाद के जनक कार्ल मार्क्स को पढ़ा और अपने देश में सफलतापूर्वक क्रांति करने वाले लेनिन, त्रात्सकी और अन्य लोगों को खूब पढ़ा. ये सब नास्तिक थे. बाकुनिन की पुस्तक ‘ईश्वर और राज्य’ अधूरीसी होने के बावजूद इस विषय का एक रोचक अध्ययन है. बाद में निर्लम्ब स्वामी की पुस्तक ‘सहज ज्ञान’ मेरे पढ़ने में आई.

‘‘अध्ययन के फलस्वरूप 1926 के अंत तक मैं इस बात का कायल हो गया कि सारी दुनिया को बनाने, चलाने और निमंत्रित करने वाली कथित सर्वशक्तिमान परमसत्ता का अस्तित्व निराधार है. मैं ने अपने अविश्वास के बारे में दूसरों को बता भी दिया था. मित्रों के साथ मैं इस विषय पर बहस करने लगा. मैं घोषितरूप से नास्तिक बन चुका था.’’

(भगत सिंह और उन के साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज, पृ. 459).

मई 1927 में भगत सिंह की गिरफ्तारी हुई उस घटना के लिए जिस के लिए वे जिम्मेदार नहीं थे. 1926 के दशहरे के दिन भीड़ पर किसी द्वारा फेंके बम केस में उन्हें धमकाया, फुसलाया गया. सीआईडी के तत्कालीन वरिष्ठ अधीक्षक मि. न्यूमैन ने उन से कहा, ‘मेरे पास तुम्हें सजा दिलाने और फांसी पर चढ़ाने के लिए पर्याप्त सुबूत हैं.’

भगत सिंह लिखते हैं, ‘‘मैं पूरी तरह बेकुसूर था, फिर भी मुझे पता था कि पुलिस चाहे तो मुझे किसी भी केस में फंसा कर सजा दिला सकती है.’’

उन दिनों कुछ पुलिस अफसरों ने भगत सिंह को सुबहशाम दोनों समय नियमपूर्वक प्रार्थना करने के लिए प्रेरित करना शुरू कर दिया. भगत सिंह ने अपने मन में सोचा कि क्या वे सुखशांति के दिनों में ही नास्तिक होने की शेखी बघारते हैं या ऐसी कठिन परिस्थितियों में भी अपने सिद्धांतों पर अटल रह सकते हैं. वे लिखते हैं, ‘‘बहुत सोचविचार करने के बाद मैं ने यह निश्चय किया कि मैं स्वयं को ईश्वर में विश्वास करने और उस की प्रार्थना करने के लिए तैयार नहीं कर सकता और मैं ने प्रार्थना नहीं की.’’

आत्मविश्वास बनाम अहंमन्यता

भगत सिंह से उन के साथी कहते रहे कि ईश्वर को न मानना उन की अहंमन्यता है, अहंकार है. साथियों की बात को काटते हुए भगत सिंह लिखते हैं, ‘‘आदमी ईश्वर में बड़ी राहत और दिलासा पा सकता है, जबकि उस (ईश्वर) के बिना आदमी को अपने ऊपर ही भरोसा करना होता है और आंधियोंतूफानों के बीच अपने पैरों पर खड़े रहना बच्चों का खेल नहीं है. परीक्षा की ऐसी घडि़यों में अहंमन्यता (वेनिटी) अगर हो भी, तो कपूर की तरह उड़ जाती है और आदमी प्रचलित विश्वासों को ठुकराने की हिम्मत नहीं कर पाता, अगर करता है तो हमें कहना पड़ेगा कि उस में निरी अहंमन्यता के अलावा और ताकत है.’’

भगत सिंह आगे लिखते हैं, ‘‘सब लोग अच्छी तरह जानते हैं कि हमारे मुकदमे का फैसला क्या होना है. (जिस दिन भगत सिंह ने यह वाक्य लिखा उस के तीसरे दिन 7 अक्तूबर को उन्हें फांसी की सजा हो गई थी.) हफ्तेभर में वह सुना भी दिया जाएगा. मेरे लिए इस खयाल के अलावा और क्या राहत हो सकती है कि मैं एक उद्देश्य के लिए अपने प्राणों का बलिदान करने जा रहा हूं. ईश्वर में विश्वास करने वाला हिंदू राजा के रूप में पुनर्जन्म लेने की आशा कर सकता है, मुसलमान या ईसाई जन्नत में मिलने वाले मजे लूटने और अपनी मुसीबतों व कुरबानियों के बदले ईनाम हासिल करने के सपने देख सकता है. मगर मैं किस चीज की उम्मीद करूं?

‘‘मैं जानता हूं कि जब मेरी गरदन में फांसी का फंदा डाल कर मेरे पैरों के नीचे से तख्ते खींचे जाएंगे, सबकुछ समाप्त हो जाएगा. वही मेरा अंतिम क्षण होगा. मेरा, अथवा आध्यात्मिक शब्दावली में कहूं तो, मेरी आत्मा का, संपूर्ण अंत उसी क्षण हो जाएगा. बाद के लिए कुछ नहीं बचेगा. अगर मुझ में इस दृष्टि से देखने का साहस है तो एक छोटा सा संघर्षमय जीवन ही, जिस का अंत भी कोई शानदार अंत नहीं, अपनेआप में मेरा पुरस्कार होगा. बस, और कुछ नहीं.’’

वे आगे लिखते हैं, ‘‘किसी स्वार्थपूर्ण इरादे के बिना, इहलोक या कथित परलोक में कोई पुरस्कार पाने की इच्छा के बिना, बिलकुल अनासक्त भाव से मैं ने अपना जीवन आजादी के उद्देश्य के लिए अर्पित किया क्योंकि मैं ऐसा किए बिना रह नहीं सका.’’

अहंमन्यता नहीं, आत्मविश्वास

भगत सिंह के सिद्धांत को अहंमन्यता नहीं कहा जा सकता. यह आत्मविश्वास है. जो लोग इसे अहंमन्यता कहते हैं, उस का कारण दूसरा है. ‘‘आप जब भी लकीर से हट कर चलेंगे, किसी प्रचलित विश्वास का विरोध करेंगे अथवा किसी नायक या महान व्यक्ति की आलोचना करेंगे तो आप के तर्कों से पराजित व मजबूर हो कर लोग आप को अहंकारी कह कर आप का मजाक उड़ाएंगे. इस का कारण मानसिक जड़ता है,’’ भगत सिंह लिखते हैं.

क्रांतिकारी के गुण

क्रांतिकारी में, भगत सिंह के अनुसार, 2 गुण अनिवार्य होते हैं- आलोचना और स्वतंत्र चिंतन. उन के अनुसार, ‘‘क्रांतिकारी यह नहीं मानता कि महात्माजी महान हैं, सो किसी को उन की आलोचना नहीं करनी चाहिए. चूंकि वे पहुंचे हुए आदमी हैं इसलिए राजनीति, धर्म, अर्थशास्त्र या नीतिशास्त्र पर वे जो कुछ भी कह देंगे, वह सही ही होगा, आप सहमत हों या न हों, आप को कहना ही होगा कि यही सत्य है. यह मानसिकता प्रगति की ओर नहीं ले जा सकती.’’

भगत सिंह कहते हैं, ‘‘इसी तरह ईश्वर में विश्वास है. हमारे पूर्वजों ने किसी परमसत्ता में, ईश्वर में, विश्वास बना लिया था. उस के विरोध में जब तर्क दिया जाता तो उस का जवाब देने में अपने को असमर्थ पा कर ईश्वरवादी कभी उस के कोप के कारण आने वाली मुसीबतों का भय दिखाते और कभी उसे तर्क देने वाले को काफिर, गद्दार, नास्तिक आदि कह कर दबाते और कभी उसे अहंकारी, अहंमन्य आदि कह कर उस का मजाक उड़ाते. परंतु यह सब इस बात का प्रमाण था कि ईश्वरवादियों के पास विरोधी तर्कों का न जवाब था और न उन के तर्क विरोधियों को कायल करने वाले थे.’’

यथार्थ का सामना

भगत सिंह जीवन के यथार्थ का सामना बिना किसी नशे के, वह चाहे भक्ति का हो या परलोक में मिलने वाले बताए जाते स्वर्ग या रहस्यवाद आदि का, करने के पक्षधर थे. कई बार संभव है, आदमी फिसल जाए, परंतु यह तो एक अपवाद है और अपवाद को नियम नहीं बनाना चाहिए. इसलिए भगत सिंह कहते हैं, ‘‘मैं अपनी नियति का सामना करने के लिए किसी नशे का सहारा लेना नहीं चाहता. मैं यथार्थवादी हूं. मैं अपनी सहजवृत्ति पर विवेक से विजय पाने की कोशिश करता रहा हूं. मैं इस कोशिश में हमेशा कामयाब नहीं रहता हूं. मगर इंसान का फर्ज है कि वह कोशिश करे.’’

प्रगति के लिए आलोचना अनिवार्य

भगत सिंह से पहले के क्रांतिकारी बहुत से मामलों में लकीर के फकीर थे, सिर्फ आजादी के मामले में वे क्रांतिकारी थे. बाकी मामलों में आम आदमी के समान ही दकियानूसी विचार ढोते रहते थे.

सो, भगत सिंह कहते हैं, ‘‘प्रगति के समर्थक प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह अनिवार्य है कि वह पुराने विश्वास से संबंधित हर बात की आलोचना करे, उस में अविश्वास करे और उसे चुनौती दे. प्रचलित विश्वास की एकएक बात के हर कोने-अंतरे की विवेककपूर्ण जांचपड़ताल उसे करनी होगी. यदि कोई विवेकपूर्ण ढंग से पर्याप्त सोचविचार के बाद किसी सिद्घांत या दर्शन में विश्वास करता है तो उस के विश्वास का स्वागत है… मगर कोरा विश्वास और अंधविश्वास खतरनाक होता है, क्योंकि वह दिमाग को कुंद करता है और आदमी को प्रतिक्रियावादी बना देता है.’’

वे आगे कहते हैं, ‘‘यथार्थवादी होने का दावा करने वाले को तो समूचे पुरातन विश्वास को चुनौती देनी होगी. यदि विश्वास विवेक की आंच बरदाश्त नहीं कर सकता तो ध्वस्त हो जाएगा. यथार्थवादी आदमी को सब से पहले उस विश्वास के ढांचे को पूरी तरह गिरा कर उस की जगह एक नया दर्शन खड़ा करने के लिए जमीन साफ करनी होगी.’’

सकारात्मक कार्य

भगत सिंह कहते हैं कि कईर् बार पुराने विश्वास की कुछ सामग्री पुनर्निर्माण के लिए भी इस्तेमाल की जा सकती है यदि वह किसी काम की हो, जैसे भौतिकवादी दृष्टि या आलोचनात्मक दृष्टि के लिए प्राचीन चार्वाक दर्शन का कुछ हद तक आज भी उपयोग किया जा सकता है.

हमारा दर्शन

अपने दर्शन का सारांश प्रस्तुत करते हुए भगत सिंह कहते हैं कि हम प्रकृति में विश्वास करते हैं और प्रकृति को मानव की सेवा में नियोजित करने के लिए उसे मनुष्य की वशवर्ती बनाना समूचे प्रगतिशील आंदोलन का लक्ष्य है. उसे चलाने वाली कोई चेतनाशक्ति उस के पीछे नहीं है. यही हमारा दर्शन है.

क्यों नहीं है?

भगत सिंह ईश्वर नामक चेतनाशक्ति के अस्तित्व से इनकार करते हैं तो अकारण नहीं. वे अपने कारण प्रस्तुत करते हैं, अपने तर्क पेश करते हैं और अपने प्रश्न उठाते हैं, जिन के आज तक किसी ने संतोषजनक उत्तर नहीं दिए हैं.

ईश्वरवादियों से प्रश्न भगत सिंह ईश्वरवादियों से कहते हैं कि यदि आप के अनुसार कोई सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी और सर्वज्ञ ईश्वर है तो उस ने ऐसी दुनिया क्यों बनाई, जिस में तमाम दुख हैं, तकलीफें हैं, त्रासदियों का एक अनंत व निरंतर सिलसिला है और एक भी प्राणी पूरी तरह संतुष्ट नहीं?

वे कहते हैं कि आप यह मत कहना कि ईश्वर नियम का बंधा है, क्योंकि यदि उसे नियम का बंधा कहोगे तो फिर वह सर्वशक्तिमान नहीं रहेगा. तब तो वह हमजैसा ही एक गुलाम है.

शाश्वत नीरो

भगत सिंह कहते हैं कि यह भी मत कहना कि यह उस की लीला है, जिस में उसे आनंद आता है. वेदांत में उस की लीला की ही बात की जाती है. इसीलिए तो रामलीला और कृष्णलीला हैं परंतु भगत सिंह कहते हैं, ‘‘नीरो ने तो एक ही रोम को जलाया था, उस ने तो थोड़े से ही लोगों की जानें ली थीं, फिर भी इतिहास में उस की जगह कहां है? इतिहासकार उसे किस नाम से याद करते हैं? उस पर दुनियाभर की नफरतभरी लानतें बरसाई जाती हैं. अत्याचारी, हृदयहीन और दुष्ट नीरो की भर्त्सना करते हुए पृष्ठ पर पृष्ठ गालियों से भरी कटु निंदाओं से काले किए गए हैं.

‘‘एक चंगेजखां था, जिस ने हत्या का आनंद लेने के लिए कुछ हजार लोगों की जानें ली थीं और हम उस के नाम तक से नफरत करते हैं.

‘‘तब आप अपने सर्वशक्तिमान, शाश्वत नीरो को उचित कैसे ठहराएंगे जो हर दिन, हर घंटे और हर मिनट असंख्य त्रासदियों को जन्म देता रहा है और आज भी दे रहा है? कैसे आप उस के इन कुकृत्यों का समर्थन करेंगे, जो प्रतिक्षण चंगेजखां के दुष्कृत्यों को मात करते हैं.’’

(भगत सिंह और उन के साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज, पृ. 464).

भगत सिंह आगे कहते हैं, ‘‘मैं पूछता हूं उस ने यह दुनिया बनाई ही क्यों, जो साक्षात नरक है, अनंत और तलख बेचैनी का घर है? उस कथित सर्वशक्तिमान ने मनुष्य की सृष्टि क्यों की जबकि उस के पास ऐसी सृष्टि न करने की शक्ति थी? इस सब का औचित्य क्या है?’’

परलोक का तर्क या ग्लैडिएटरों का?

ईश्वरवादी कहा करते हैं कि जो निर्दोष यहां उत्पीडि़त होते हैं, उन्हें परलोक में पुरस्कार मिलता है और जो यहां कुकर्म करते हैं, वे परलोक में दंडित होते हैं.

भगत सिंह कहते हैं, ‘‘आप उस आदमी को कहां तक सही ठहराएंगे जो बाद में मुलायम और आरामदेह मरहम लगाने के लिए आप के शरीर को जख्मों से छलनी कर दे?’’ वे ग्लैडिएटरों का उदाहरण दे कर पूछते हैं, ‘‘ग्लैडिएटरों की संस्था के समर्थक और प्रबंधक, जो पहले तो लोगों को भूखे और क्रूर शेरों के सामने फेंक देते थे और बाद में अगर वे लोग जिंदा बच जाते तो उन की बड़ी अच्छी तरह देखभाल करते थे, कहां तक सही थेइ, सीलिए मैं पूछता हूं कि उस कथित चेतन परमसत्ता ने इस दुनिया की और उस में भी मनुष्य की सृष्टि क्यों की, अपने मजे के लिए तो फिर उस में और नीरो में क्या फर्क है?’’

ईसाइयों और मुसलमानों से

भगत सिंह ईसाइयों और मुसलमानों को संबोधित कर के कहते हैं कि आप के पास उपरोक्त प्रश्न का क्या उत्तर है? आप तो हिंदुओं की तरह यह तर्क भी नहीं दे सकते कि प्रत्यक्षरूप से निर्दोष लोग इसलिए दुख पा रहे हैं कि इन्होंने पिछले जन्म में बुरे कर्म किए थे, क्योंकि आप लोग तो पूर्वजन्म में विश्वास ही नहीं करते.

वे कहते हैं, ‘‘मैं आप ईसाइयों और मुसलमानों से पूछता हूं कि उस सर्वशक्तिमान ने 6 दिनों तक शब्द के द्वारा इस दुनिया को बनाने की मेहनत क्यों की और क्यों प्रतिदिन यह कहा कि ‘सब ठीक है.’

‘‘आज उसे बुलाइए, उसे पिछला इतिहास दिखाइए, उस से कहिए कि वह वर्तमान स्थिति का अध्ययन करे. देखें तब वह कैसे कहता है कि ‘सब ठीक है.’

‘‘जेलों की कालकोठरियों, गंदी बस्तियों और झुग्गीझोंपडि़यों में भूखे मरते लाखों लोगों, शोषित और जरूरतमंदों में बांटने के बजाय अतिरिक्त उत्पादन को समुद्र में फेंक देने जैसे कार्यों से ले कर नरकंकालों की नींव पर खड़े किए गए शाही महलों तक हर चीज उसे दिखाइए और जरा उस से कहलवाइए कि ‘सब ठीक है.’

‘‘यह सब क्यों और कहां से आया? यह है मेरा सवाल.’’

(भगत सिंह… दस्तावेज, पृ. 465).

पूर्वज चालाक थे

भगत सिंह हिंदुओं से कहते हैं, ‘‘अच्छा, हिंदुओ, आप कहते हैं कि जो लोग आज दुख पा रहे हैं, वे पूर्वजन्मों के पापी हैं. ठीक, आप यह भी कहते हैं कि आज के उत्पीड़क लोग पूर्वजन्मों के धर्मात्मा हैं, इसलिए उन के हाथ में सत्ता है.’’

इस पर टिप्पणी करते हुए भगत सिंह लिखते हैं, ‘‘मानना पड़ेगा कि आप के पूर्वज बड़े चालाक थे. उन्होंने ऐसे सिद्धांत खोज निकालने का प्रयास किया जिन से विवेक और अविश्वास के आधार पर की जाने वाली तमाम कोशिशों को दबा दिया जाए.’’

वे अपराध और दंड की चर्चा करते हुए कहते हैं कि दंड का उद्देश्य या तो बदला लेना हो सकता है या सुधार करना या फिर दंड के भय से लोगों को अपराध करने से रोकना (निवारण).

बदले के लिए दंड देने को आज कोई बुद्धिमान उचित नहीं मानता. भगत सिंह कहते हैं कि निवारण के सिद्घांत का यही हश्र होने वाला है. सो, एकमात्र सुधार का सिद्घांत ही सारवान है जो मानवीय प्रगति के लिए अपरिहार्य है. इस का उद्देश्य है दोषी व्यक्ति को अत्यंत सुयोग्य व शांतिप्रिय बना कर समाज को वापस कर देना.

वे कहते हैं, ‘‘अब अगर हम सभी मनुष्यों को अपराधी मान भी लें तो ईश्वर द्वारा उन्हें दी जाने वाली सजा कैसी है? मैं पूछता हूं, इस का मनुष्य पर कौन सा सुधारात्मक प्रभाव पड़ता है? आप को ऐसे कितने लोग मिले जो कहते हों कि पाप करने के कारण पिछले जन्म में वे गधा बने थे? एक भी नहीं. अपने पुराणों के उदाहरण रहने दीजिए. आप की पौराणिक कहानियों के लिए मेरे पास फुरसत नहीं है.’’

(भगत सिंह… दस्तावेज, पृ. 466).

गरीबी : सजा या पाप?

ईश्वरवादियों से भगत सिंह कहते हैं, ‘‘दुनिया में सब से बड़ा पाप गरीब होना है. परंतु आप के अनुसार, यह लोगों को ईश्वर द्वारा दी गई सजा है. मैं पूछता हूं कि आप उस अपराधविज्ञानी को, उस विधिवेत्ता या विधायक को कैसे उचित ठहराएंगे जो आदमी के लिए ऐसी सजाएं सुझाए व तजवीज करे जो उसे अनिवार्यतया और ज्यादा अपराध करने के लिए मजबूर करने वाली हों? गरीबी में पड़ा व्यक्ति तो और भी अपराध करने को विवश होता है. क्या आप के ईश्वर ने इस चीज पर गौर नहीं किया? या, उसे भी ऐसी बातें अनुभव से सीखनी पड़ती है?’’

विषय को स्पष्ट करते हुए वे आगे कहते हैं, ‘‘किसी गरीब, अनपढ़, अछूत परिवार में पैदा होने वाले आदमी की नियति क्या होगी? वह गरीब है, इसलिए पढ़लिख नहीं सकता. उस के इर्दगिर्द के लोग अपने को श्रेष्ठ मानते हैं क्योंकि वे तथाकथित ऊंची जातियों जन्में हैं, वे उसे अछूत मान कर अलगथलग रखते हैं.

‘‘उस का अज्ञान, उस की गरीबी और उस के साथ किया जाने वाला बरताव उसे समाज के प्रति कठोर हृदय बना देगा. अब वह यदि कोई पाप करता है, तो उस की सजा कौन भुगतेगा? ईश्वर या वह स्वयं या समाज के ज्ञानवान लोग?’’

भगत सिंह बहुत स्पष्ट शब्दों में कहते हैं, ‘‘घमंडी और स्वार्थी ब्राह्मणों द्वारा जानबूझ कर अज्ञानी बना कर रखे गए उन लोगों की सजा के बारे में आप क्या कहते हैं जिन्हें आप के पवित्र ज्ञानग्रंथों, अर्थात वेदों, की कुछ पंक्तियां सुन लेने का दंड अपने कानों में पिघले हुए गरम रांगे (सीसे) की धार झेल कर भरना पड़ता था, उन का अगर कोई अपराध था भी तो उस के लिए जिम्मेदार कौन था और उस का परिणाम किस को भुगतना चाहिए था.’’

(भगत सिंह… दस्तावेज, पृ. 466).

अमरता का सिद्धांत : लूट का लाइसैंस

भगत सिंह कहते हैं, ‘‘मेरे प्यारे दोस्तो, ये सिद्धांत का विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के मनगढंत सिद्धांत हैं. इन सिद्धांतों द्वारा वे बलात हथियाई हुई अपनी शक्ति, संपन्नता और श्रेष्ठता को उचित ठहराते हैं.’’

अपटन सिंक्लैर ने कहीं लिखा है कि आदमी को अमरता में विश्वास करने वाला बना दो, फिर उस की चाहे सारी धनसंपत्ति लूट लो, वह उफ तक नहीं करेगा. यही नहीं, वह अपने को लूटने में खुद आप की मदद करेगा. धार्मिक उपदेशकों और सत्ताधारियों की मिलीभगत से ही जेलों, फांसियों, कोड़ों और इन सिद्घांतों का निर्माण हुआ है.

ईश्वर : बुराई से रोकता क्यों नहीं?

भगत सिंह कहते हैं, ‘‘मैं आप से पूछता हूं कि आदमी जब पाप या अपराध करना चाहता है, तब आप का सर्वशक्तिमान ईश्वर उसे रोकता क्यों नहीं? उस के लिए तो यह बहुत आसान होना चाहिए, फिर उस ने जंगबाजों को मार कर या उन के भीतर के युद्घोन्माद को मार कर मानवता को विश्वयुद्ध की महाविपत्ति से क्यों नहीं बचाया? वह अंगरेजों के मन में कोई ऐसी भावना क्यों पैदा नहीं कर देता कि वे भारत को आजाद कर दें?’’

(ध्यान रहे ये बातें 1930 में लिखी गई हैं.)

शक्ति ईश्वर में नहीं, तोपों और फौजों में है

भगत सिंह कहते हैं, ‘‘आप गोलमाल तर्क देना बंद कीजिए. वे नहीं चलेंगे. अंगरेजों का शासन यहां इसलिए नहीं है कि यह कथित ईश्वर की इच्छा है, बल्कि इसलिए है कि उन के पास ताकत है और हम उन का विरोध नहीं करते. वे ईश्वर की सहायता से नहीं, बल्कि तोपों, बंदूकों, बमों, गोलियों, पुलिस व फौज की सहायता से तथा हमारी उदासीनता के चलते हमें गुलाम बनाए हुए हैं. और एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र का निर्लज्ज शोषण करने का सब से घृणित पाप समाज के विरुद्घ सफलतापूर्वक करते चले जा रहे हैं.’’

इस के बाद भगतसिंह निष्कर्ष स्वरूप पूछते हैं, ‘‘कहां है ईश्वर? क्या कर रहा है वह? क्या वह मानवजाति के इन सब दुखोंकष्टों का मजा ले रहा है? तब तो वह नीरो है, चंगेजखां है, उस का नाश हो.’’

(भगत सिंह… दस्तावेज, पृ. 467).

दुनिया व इंसान कहां से आए

यदि तुम मुझ से पूछते हो कि यदि ईश्वर नहीं है तो यह दुनिया व इंसान कहां से आए, तो मैं तुम्हें बताता हूं, तो चार्ल्स डार्विन ने इस विषय पर प्रकाश डालने की कोशिश की है. उस का अध्ययन कीजिए. निर्लम्ब स्वामी की पुस्तक ‘सहज ज्ञान’ पढि़ए. (अब और बहुत सी पुस्तकें उपलब्ध हैं, यथा गुणाकर मूले कृत ‘ब्रह्मांड परिचय’, हाकिंज कृत ‘समय का इतिहास’, प्रगति प्रकाशन, मास्को की ‘मानव जाति की उत्पत्ति’ आदि). इन के अध्ययन से आप के सवाल का जवाब मिल जाएगा.

यह दुनिया बनना एक प्राकृतिक घटना है. विभिन्न पदार्थों के आकस्मिक संयोग से उत्पन्न नीहारिका से पृथ्वी की उत्पत्ति हुई. कब? यह जानने के लिए इतिहास देखिए. इसी प्रकार जीवधारी उत्पन्न हुए और उन में से ही एक लंबे अरसे बाद मनुष्य का विकास हुआ. (ध्यान रहे, विकास हुआ, उत्पत्ति नहीं हुई.) डार्विन की पुस्तक ‘जीवों की उत्पत्ति’ (अब यह हिंदी में भी उपलब्ध है) पढि़ए.

आप का दूसरा तर्क कि जन्म से ही अंधे या लंगड़े पैदा होने वाले बच्चे यदि पूर्वजन्म के कर्मों के कारण ऐसे नहीं हैं, तो किस कारण से ऐसे हैं?

भगत सिंह कहते हैं कि इस विषय में मेरा उत्तर है कि जीवविज्ञानी इस की व्याख्या कर चुके हैं कि यह एक जीव वैज्ञानिक घटना है, न कि ईश्वरीय या कार्मिक. उन के अनुसार, इस के लिए बहुत बार मातापिता उत्तरदायी होते हैं, जो तरहतरह के नशे करते हैं या दवाइयां खाते हैं या दूसरे कई तरह के उलटेसीधे काम करते हैं चाहे वे गर्भावस्था में ही बच्चे में हो जाने वाली विकृतियों को जन्म देने वाले अपने कार्यों के प्रति सचेत हों या न हों.

ईश्वर नहीं तो विश्वास कैसे जन्मा?

भगत सिंह कहते हैं, ‘‘आप पूछ सकते हैं कि यदि ईश्वर था ही नहीं तो लोग उस में विश्वास कैसे करने लग गए?’’ उत्तर में वे कहते हैं, ‘‘इस बचकाना प्रश्न के उत्तर में मैं संक्षेप में यही कहूंगा कि जिस तरह लोग भूतों और प्रेतात्माओं में विश्वास करने लगे, उसी तरह ईश्वर में विश्वास करने लगे, फर्क सिर्फ यह है कि भूतों आदि की अपेक्षा ईश्वर में विश्वास सर्वव्यापी है और इस का दर्शन बहुत विकसित है. पर चीज एक ही है.’’

ईश्वर : शोषकों की चालबाजी?

कई लोग यह कहा करते हैं कि ईश्वर की उत्पत्ति उन शोषकों की चालबाजी से हुई है जो एक परमसत्ता के अस्तित्व का प्रचार कर के और फिर उस से प्राप्त होने वाली सत्ता व विशेषाधिकारों का दावा कर के लोगों को गुलाम बनाना चाहते थे.

भगत सिंह कहते हैं, ‘‘मैं यह नहीं मानता कि ईश्वर को उन्हीं लोगों ने पैदा किया, चाहे मैं इस मूल बात से सहमत हूं कि सभी विश्वास, धर्म, मत और इस प्रकार की अन्य संस्थाएं आखिरकार दमनकारी तथा शोषक संस्थाओं, व्यक्तियों और वर्गों की समर्थक बन कर ही रहीं. राजा के विरुद्घ विद्रोह करना हर धर्म के मुताबिक पाप रहा है.’’

नास्तिक: आत्मविश्वास व दृढ़ता

भगत सिंह कहते हैं, ‘‘ईश्वर में विश्वास के विरुद्घ उसी तरह संघर्ष करना होगा जिस तरह मूर्तिपूजा और धार्मिक संकीर्णताओं के विरुद्घ किया गया है. जब मानव अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश करेगा और यथार्थवादी बनेगा, वह आदिम युग के इस अवशेष ईश्वर में विश्वास को छोड़ देगा, उसे अपनी आस्तिकता को झटक कर फेंक देना पड़ेगा. तब परिस्थितियां चाहे उसे कैसी भी मुसीबत और परेशानी में डाल दें उसे उन का मुकाबला दृढ़ता के साथ करना पड़ेगा. मेरी हालत ठीक इसी तरह की है.’’

प्रेरणास्रोत नास्तिक

वे आगे कहते हैं, ‘‘मेरे दोस्तो, यह मेरी अहंमन्यता नहीं है. यह मेरे सोचने का तरीका है, जिस ने मुझे नास्तिक बना दिया है. मैं नहीं जानता कि ईश्वर में विश्वास करने और रोज प्रार्थना करने से, जिसे मैं आदमी का सब से स्वार्थपूर्ण और घटिया काम समझता हूं, मुझे राहत मिलती या मेरी हालत और भी बदतर हुई होती.’’

‘‘मैं ने उन नास्तिकों के बारे में पढ़ा है जिन्होंने साहसपूर्वक सारी मुसीबतों का सामना किया. उन्हीं की तरह मैं भी यह कोशिश कर रहा हूं कि आखिर तक, फांसी के तख्ते पर भी, मर्द की तरह सिर ऊंचा किए खड़ा रहूं. देखिए, इस कोशिश में कहां तक कामयाब होता हूं.’’

(भगत सिंह… दस्तावेज, पृ. 469)

आस्तिकता : स्वार्थ व पस्तहिम्मती

भगत सिंह कहते हैं कि एक मित्र ने उन से प्रार्थना करने के लिए कहा था. लेकिन जब उसे पता चला कि मैं नास्तिक हूं तो उस ने कहा, ‘अपने अंतिम दिनों में तुम ईश्वर को मानने लगोगे.’ मैं ने उत्तर में कहा, ‘नहीं जनाब, यह नहीं होगा. मैं इसे अपने लिए अपमान और पस्तहिम्मती का काम समझूंगा. स्वार्थपूर्ण इरादों से प्रार्थना हरगिज नहीं करूंगा.’

अंत में भगत सिंह कहते हैं, ‘‘पाठकों और मित्रो, क्या यह अहंमन्यता है? अगर है, तो मैं इस का हामी हूं.’’

(भगत सिंह… दस्तावेज पृ. 469)

इतिहास गवाह है कि भगत सिंह को जब फांसी पर लटकाने के लिए जेल के अधिकारी व संतरी गए तो वे कालकोठरी में लेनिन के बारे में एक किताब पढ़ रहे थे.

वीरेंद्र सिंधू ने अपनी पुस्तक में उस समय का जो चित्र, संतरी के कहे के अनुसार, चित्रित किया है, वह कुछ इस प्रकार है :

भगत सिंह अपने मित्र व वकील प्राणनाथ मेहता से मंगवाईर् लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे जब दरवाजा खुला. दहलीज पर अफसर खड़ा था.

‘‘सरदारजी,’’ उस ने कहा, ‘‘फांसी लगाने का हुक्म आ गया है. तैयार हो जाइए.’’

भगत सिंह के दाएं हाथ में किताब थी. उस से नजरें उठाए बिना ही उन्होंने बायां हाथ उठा कर कहा, ‘‘ठहरिए. यहां एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिल रहा है.’’

कुछ पंक्तियां और पढ़ कर उन्होंने किताब एक तरफ रख दी और उठ खड़े हुए तथा बोले, ‘‘चलिए.’’

इस तरह के थे भगत सिंह. उन्होंने जिस नास्तिक दृष्टिकोण का प्रतिपादन किया, जीवन के अंतिम क्षण तक फांसी के फंदे को चूमने तक उस पर दृढ़ रहे. न कोई पूजा, न पाठ, बल्कि उन क्षणों में एकदूसरे नास्तिक व्यक्तित्व लेनिन की पुस्तक का अध्ययन किया.

जो लोग आज भगत सिंह के समागमों क अवसर पर धार्मिक पाखंड करते हैं, वे दरअसल उस शहीद का घोर अपमान करते हैं. यदि हमें भगत सिंह के प्रति जरा भी लगाव है, उन के प्रति हमारे अंदर यदि जरा भी सम्मान है, तो हमें उन्हें उसी रूप में स्वीकार करना होगा जो उन का अपना असली स्वरूप है. यदि उन के विचार हम में से किसी को अच्छे नहीं लगते, तो उसे उन्हें पूजने, उन के समागम करने की क्या विवशता है? हमें उन्हें अपनी इच्छा या पसंद के अनुरूप विकृत करने का, उन का कार्टून बनाने का कोई अधिकार नहीं है.

भगत सिंह तभी तक भगत सिंह  हैं जब हम उन की कथनी और करनी को एकसाथ उसी रूप में स्वीकार करते हैं जिस क दर्शन उन के लेख और कालकोठरी के अंदर के उन के जीवन में पाते हैं. यदि ऐसा नहीं करेंगे तो हम उन की पैरोडी बनाने का जघन्य कुकृत्य कर रहे होंगे, जो एक अक्षम्य अपराध होगा.

सशक्त प्रेरणास्रोत

आज 21वीं शताब्दी में जब भारत, धर्म के नाम पर पाखंड के साथसाथ आतंकवाद की मार भी झेल रहा है, दूरदर्शन के विभिन्न चैनल जब धर्म के नाम पर हर तरह की संकीर्णता, अंधविश्वास, क्रूरता और अवैज्ञानिकता को निरंतर परोस रहे हैं, चारों ओर भ्रष्टाचार, स्वार्थपरता और उत्तरदायित्वहीनता का बोलबाला है, धर्म के अनेक स्वयंभू ठेकेदारों व धर्मध्वजियों के घिनौने चेहरों पर से परदा उठ रहा है और युवा पीढ़ी राजनीतिबाजों व धर्म के धंधेबाजों से निराश व हताश हो कर उद्देश्यहीनता के चौराहे पर पहुंच गई है.

तब, आशा है कि शहीद ए आजम भगत सिंह के ये विचार व उन का बलिदान उसे वैज्ञानिक विचारधारा अपनाने, देश के लिए निस्वार्थभाव से कुछ कर गुजरने और अपना दायित्व पहचानने के लिए सशक्त प्रेरणास्रोत सिद्ध होंगे.

नशा : विनाश की ओर बढ़ते कदम

कैलिफोर्निया में एक एलएसडी प्रेमी को नशे की झोंक में यह सनक सवार हो गई कि  वह पक्षियों की तरह हवा में उड़ सकता है. अपनी सनक को पूरा करने के लिए वह एक बहुमंजिली इमारत की 10वीं मंजिल पर चढ़ा और वहां से कूद कर मौत का शिकार हो गया.

होस्टल में रह रहे एक विद्दार्थी को नशे में यह भ्रम हो गया कि वह अपने आकार से दोगुना लंबा हो गया है और उस के पैर 6 फुट लंबे हो गए हैं. उस ने अपनी लंबाई के हिसाब से पास वाली मंजिल पर कूदने के लिए छलांग लगाई और वह 8 मंजिल से नीचे जमीन पर गिर पड़ा.

ये 2 उदाहरण मादक द्रव्यों के प्रभाव और उन की विध्वंसता को दर्शाते हैं.

अनुभूतियों और संवेदनाओं का केंद्र मनुष्य का मस्तिष्क है. सुखदुख, कष्टआनंद, सुविधा और अभावों का अनुभव मस्तिष्क को ही होता है तथा मस्तिष्क ही प्रतिकूलताओं को अनुकूलता में बदलने का जोड़तोड़ करता है. कई लोग इन समस्याओं से घबरा कर अपना जीवन ही नष्ट कर लेते हैं.

अधिकांश व्यक्ति जीवन से पलायन करने के लिए अजीब उपाय अपनाते हैं, जैसे शुतुरमुर्ग संकट को देख कर अपना सिर रेत में छिपा लेता है. उसी तरह की पलायनवादी प्रवृत्तियों में मुख्य है, द्रव्यों की शरण में जाना. शराब, गांजा, भांग, चरस, अफीम, ताड़ी आदि नशे वास्तविक जीवन से पलायन करने की इसी मनोवृत्ति के परिचायक हैं. लोग इन का सेवन या तो जीवन की समस्याओं से घबरा कर करते हैं या फिर अपने संगीसाथियों को देख कर इन्हें अपना कर अपना मनोबल चौपट करते हैं.

मादक द्रव्यों के प्रभाव से वे अपनी अनुभूतियों, संवेदनाओं तथा भावनाओं के साथसाथ सामान्य समझबूझ और सोचनेविचारने की क्षमता भी खो देते हैं. मादक द्रव्य इतने उत्तेजक होते हैं कि सेवन करने वाले को तत्काल अपने आसपास की दुनिया से काट देते हैं और उसे विक्षिप्त कर देते हैं.

ऐसी वस्तु जिस की मांग हमारा मस्तिष्क करता है लेकिन उस से शारीरिक नुकसान हो, तो वह नशा कहलाता है. मानसिक स्थिति को उत्तेजित करने वाले रसायन जो नींद, नशे या भ्रम की हालत में शरीर को ले जाते हैं, वे ड्रग्स कहलाते हैं. नशे को 2 भागों में बांटा जा सकता है.

  1. पारंपरिक नशा : इस के अंतर्गत तंबाकू, अफीम, खैनी, सुल्फा और शराब आती हैं.
  2. सिंथैटिक ड्रग्स : इस के अंतर्गत स्मैक, हेरोइन, आइस, कोकीन, क्रेक कोकीन, एलएसडी, मारिजुआना, एक्टेक्सी, सिलोसाइविन मशरूम, फेनसिलेडाइन मोमोटिल, पारवनस्पास, कफसिरप आदि मादक दवाएं आती हैं.

मादक दवाओं के गुण और दुष्प्रभाव

मादक दवाएं ट्रंकोलाइजर ऐंटीसाइकोटिक्स, ऐंटीडिप्रेसैंट और साइकोस्टुमुलैंट आदि हैं. इन के अधिक सेवन से मस्तिष्क विकृत हो जाता है और व्यक्ति इन का आदी हो जाता है, जिस से उसे शारीरिक, मानसिक व आर्थिक हानि उठानी पड़ती है.

कोकीन : यह ट्रोपेन एलकालाइड है. इसे सूंघ कर, धूम्रपान कर नशा किया जाता है. यह मानसिक स्थिति को कमजोर करता है. यह हृदय गति तेज कर उच्च रक्तचाप को बढ़ाता है. इस में नशा लेने वाले को आनंद की अनुभूति होती है. इस के 1 ग्राम के 8वें हिस्से की कीमत 4 हजार रुपए है.

मेथामेप्टामाइन : यह साइकोस्टूमेलैंट है, इसे मैथ या आइस भी कहते हैं. इस को धूम्रपान से या इंजैक्ट कर लिया जाता है. इस से शरीर में उत्तेजना उत्पन्न होती है और आनंद का अनुभव होता है. इस को लेने से अवसाद, उच्च रक्तचाप और नपुंसकता होती है.

क्रेक कोकीन : इस से पूरा स्नायुतंत्र प्रभावित होता है और हृदय को नुकसान पहुंचता है. इस के सेवन से हृदयगति बढ़ जाती है और धमनियां सिकुड़ जाती हैं. इस के नशे का आदी व्यक्ति अपराधी प्रवृत्ति का होता है. इस को लेने से अवसाद, अकेलापन और असुरक्षा की भावना उत्पन्न होती है. क्रेक कोकीन के नशे के आदी व्यक्ति को गलतफहमी होती है कि वह बहुत ताकतवर है.

एलएसडी : यह लाइसर्जिक अम्ल से बनती है जो अरगट में पाया जाता है. यह गोलियों के रूप में मिलती है. इस का नशा करने से व्यक्ति का मस्तिष्क अत्यंत क्रियाशील हो जाता है. करीब 30 से 90 मिनट बाद इस का प्रभाव शुरू होता है. इस मादक द्रव्य को लेने से व्यक्ति के भाव तेजी से बदलने लगते हैं.

अधिक मात्रा में इस का सेवन करने से व्यक्ति के समक्ष काल्पनिक भ्रम पैदा होता है, जिस से उसे आनंद की अनुभूति होती है. इस का नशा करने वाला नशेड़ी अवसादग्रस्त, वस्तुओं के आकार और रंग में भ्रमित तथा मधुमेह व उच्च रक्तचाप का रोगी हो सकता है. एक बार नशा करने पर करीब 10 से 12 घंटे तक इस का असर रहता है.

हेरोइन : यह मादक पदार्थ मौर्फिन से बनता है. इस का नशा शीघ्र होता है. इस का नशा व्यक्ति के श्वसनतंत्र पर प्रभाव डालता है. इस नशे का सेवन करने वाले को निमोनिया की तीव्र आशंका रहती है. इस के प्रभाव से धमनियों में थक्का जमने लगता है और  फेफड़े, लिवर व किडनी खराब हो जाते हैं.

मारिजुआना : यह टेट्रा हाइड्रो कैनाबिनोलिक एसिड है जो केनिबस पौधे से प्राप्त होता है. यह एक खतरनाक नशा है और प्रतिवर्ष करीब 1 करोड़ लोग इस की चपेट में आ रहे हैं. इसे धूम्रपान के रूप में लिया जाता है. इसे हशीश भी कहते हैं. इस नशे को लेने वाले व्यक्ति की आंखें लाल रहती हैं और नींद बहुत आती है. यह नशा भ्रम उत्पन्न करता है, जिस से व्यक्ति निर्णय नहीं ले पाता और अनावश्यक बातें करता है.

एक्टेसी : इसे एमडीएमए भी  कहते हैं. यह उत्तेजना पैदा करने वाली दवा है. इस से शरीर का तापमान इतना बढ़ जाता है कि शरीर के अंग जैसे किडनी और हृदय काम करना बंद कर सकते हैं. इस के प्रभाव से मांसपेशियों में खिंचाव, उत्तेजना और भ्रम पैदा होता है.

नशे के आदी होने के कारण

मादक द्रव्यों के बढ़ते प्रचलन के लिए आधुनिक सभ्यताओं को भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, जिस में व्यक्ति यांत्रिक जीवन व्यतीत करता हुआ भीड़ में इस कदर खो गया है कि उसे अपने परिवार के लोगों का भी ध्यान नहीं रहता. नशा एक अभिशाप है. यह एक ऐसी बुराई है जिस से इंसान का अनमोल जीवन मौत की आगोश में चला जाता है और उस का परिवार बिखर जाता है. व्यक्ति के नशे के आदी होने के कई कारण हो सकते हैं, जिन में से निम्न मुख्य हैं :

  • मातापिता की अति व्यस्तता बच्चों में अकेलापन भर देती है. प्यार से वंचित होने के कारण वे नशे की दुनिया का रुख कर लेते हैं.
  • परिवार में कलह का वातावरण व्यक्ति को नशे की ओर ढकेलता है.
  • मानसिकरूप से परेशान व्यक्ति नशे का आदी हो जाता है. यह मानसिक परेशानी पारिवारिक, आर्थिक तथा सामाजिक भी हो सकती है.
  • बेरोजगारी भी नशे की ओर उन्मुख होने का एक प्रमुख कारण है. खाली दिमाग शैतान का घर होता है. दिनभर घर में खाली और बेरोजगार बैठे रहने से व्यक्ति हीनभावना का शिकार होता है और इसे दूर करने के लिए वह नशे का सहारा लेता है.
  • शारीरिक कमजोरी व पढ़ने में कमजोर होने के कारण बच्चे उस कमी को पूरा करने के लिए नशे का सहारा लेने लगते हैं.
  • जो व्यक्ति तनाव, अवसाद और मानसिक बीमारी से पीडि़त है वह नशे का आदी हो जाता है.
  • परिवार के व्यक्ति, दोस्त तथा अपने आदर्श व्यक्ति को नशा लेते देख कर युवा नशे का शिकार होते हैं.
  • कुछ लोग यह सोच कर नशा लेते हैं कि नशा तनाव को दूर करता है.
  • किसी दूसरे की दवा को खुद पर आजमाने से व्यक्ति नशे का आदी हो जाता है. चोट या दर्द की वजह से डाक्टर दवा लिखता है, जिस से आराम मिलता है. जब भी चोट लगे या दर्द हो, वह दवा बारबार लेने लगता है, जिस से वह नशे का आदी हो जाता है.
  • पुरानी, दुखद घटनाओं को भूलने के लिए भी लोग नशे का सहारा लेते हैं.
  • लोग सोचते हैं कि ड्रग्स लेने से वह फिट और तंदुरुस्त रहेंगे, विशेषकर खिलाड़ी किसी कारण मादक द्रव्यों की चपेट में आ जाते हैं.
  • बच्चों में भेदभाव करने पर वे हीनभावना से ग्रसित हो जाते हैं और विद्रोह स्वरूप नशे की ओर मुड़ जाते हैं.

नशा और अपराध

अपराध ब्यूरो रिकौर्ड के अनुसार छोटेबड़े अपराधों, बलात्कार, हत्या, लूट, डकैती, राहजनी आदि तमाम तरह की वारदातों में नशे के सेवन का मामला लगभग साढ़े 73 फीसदी तक है. अपराधजगत पर गहन नजर रखने वाले मनोविज्ञानी बताते हैं कि अपराध करने के लिए जिस उत्तेजना, मानसिक उद्वेग और दिमागी तनाव की जरूरत होती है उस की पूर्ति नशा करता है, जिस का सेवन मस्तिष्क के लिए एक उत्प्रेरक की तरह काम करता है.

पुनर्वास तथा उपचार

नशे की लत वाले व्यक्ति को विभिन्न स्तरों पर उपचार की जरूरत होती है. इस के लिए कुशल चिकित्सक की देखरेख में उपचार जरूरी है. अधिकांश इलाज नशे के सेवन को बंद करने में मदद करने पर केंद्रित होते हैं, जिस के बाद उन्हें नशे के प्रयोग पर फिर लौटने से रोकने में उन की मदद करने के लिए जीवन प्रशिक्षण सामाजिक समर्थन की आवश्यकता होती है. कुछ तरीके इस प्रकार हैं :

डिटौक्सीफिकेशन : यह उपचार का शुरुआती स्तर है. इस में नशे के परिणामों को कम करने के लिए दूसरी दवाओं का प्रयोग किया जाता है. इस का प्रबंधन बहुत सतर्कता से किया जाना चाहिए. दवा उपचार, अनुकूलन और मनोवैज्ञानिक सहायता के बिना संभव नहीं है.

गंभीर नशे के आदी व्यक्ति को लंबे उपचार की जरूरत पड़ती है. इस में रोगी को 24 घंटे चिकित्सक की देखरेख में रखा जाता है. इस में 8 से 12 माह लगातार सामाजिक, पारिवारिक और मानसिक स्तरों पर चिकित्सक उपचार करते हैं. छोटे उपचार में रोगी करीब 3 से 6 सप्ताह तक चिकित्सक की निगरानी में रहता है.

बाह्य रोगी उपचार : यह उपचार रोगी की स्थिति तथा मादक द्रव्य के असर पर निर्भर करता है. यह उपचार ग्रुप या व्यक्तिगत रूप से दिया जाता है. इस में रोगी को आंशिक रूप से अस्पताल में भरती होना पड़ता है.

व्यक्तिगत परामर्श : व्यक्तिगत परामर्श उपचार में रोगी के संपूर्ण इतिहास पर परामर्श दिया जाता है. रोगी की पारिवारिक पृष्ठभूमि, रोजगार, सामाजिक और आर्थिक स्थिति के बारे में गहन अध्ययन पर चिकित्सक उस के योग्य उचित सलाह तथा इलाज का परामर्श देते हैं. परामर्शदाता 12 सप्ताह तक रोगी को नशे से दूर रहने के लिए प्रोत्साहित करते हैं.

अन्य उपचार जोकि व्यक्ति के नशे के आदी के स्तर पर चिकित्सक द्वारा प्रस्तावित किए जाते हैं, ये हैं-

  • आचरण या व्यवहारवाद उपचार
  • मानववादी उपचार.
  • संज्ञानात्मक व्यवहार उपचार
  • द्वंद्वात्मक व्यवहार उपचार
  • मानसंगति उपचार
  • अर्थपूर्ण उपचार
  • एकीकृत उपचार
  • हार्म रिडक्शन ट्रीटमैंट
  • जानवर आधारित उपचार.

नशा रोकने के उपाय

नशे से लड़ने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर पारिवारिक, सामाजिक और सामूहिक संकल्प की आवश्यकता है. सिर्फ सरकार या नशामुक्ति संस्थाएं इस के लिए पर्याप्त नहीं हैं. नशा रोकने में सब से बड़ी समस्या है कि हम सिर्फ जागरूकता पर जोर देते हैं, उस की रोकथाम के प्रयास कम करते हैं. जागरूकता सिर्फ बड़ों को नशे की लत से दूर करती है जबकि रोकथाम बचपन से नशे की लत न लगे, इस के लिए जरूरी है. राष्ट्रीय स्तर पर चेतना जरूरी है.

नशे को रोकने के लिए निम्न प्रयासों का क्रियान्वयन किया जाना चाहिए.

  • सामाजिक स्तर पर नशा रोकथाम कार्यक्रम बनना चाहिए.
  • नशे का व्यापक फैलाव समाज से संबंधित है, सो, ऐसे समाजों को चिह्मित कर के व्यापक जागरूकता अभियान चलाना चाहिए.
  • स्वस्थ, सफल और सुरक्षित छात्र कैसे बनें, इस थीम पर सभी विद्यालयों में नशामुक्ति अभियान को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना होगा.
  • नशा रोकने के लिए कारगर रणनीति राष्ट्रीय स्तर पर क्रियान्वित होनी चाहिए.
  • राष्ट्रीय युवा नशामुक्ति आंदोलन महाविद्यालयी स्तर पर पाठ्यक्रम में लागू होना चाहिए.
  • बच्चे नशे से दूर रहें, ऐसे क्षेत्रों में नशा रोकथाम केंद्र होने चाहिए. इस के लिए 3 स्थानों विद्यालय, कालेज और कार्यक्षेत्र पर विशेष ध्यान देना चाहिए.
  • नशे की रोकथाम वाली संस्थाओं और कानून तथा न्याय संस्थाओं में आपसी समन्वय व सूचनाओं का आदानप्रदान होना चाहिए.
  • नशे की हालत में गाड़ी चलाने पर रोकथाम के लिए कड़े कानून का प्रावधान होना चाहिए.
  • मादक दवाओं से जुड़े लोगों पर कठिन दंड का प्रावधान होना चाहिए.
  • आवासीय उपचार कार्यक्रमों को बढ़ावा मिलना चाहिए.
  • विद्दालय तथा परिवार में बच्चों और युवाओं का नशे के संकेत पहचानने वाले कार्यक्रमों का आयोजन एवं प्रशिक्षण देना चाहिए.

नशीले पदार्थों के सेवन से विश्व स्तर पर आपातस्थिति बन गई है. नशे के प्रभाव से न केवल एक जीवन बल्कि संपूर्ण परिवार का विनाश हो जाता है. शस्त्र तथा पैट्रोलियम उद्योग के बाद अवैध मादक द्रव्यों का धंधा विश्व का तीसरा सब से बड़ा उद्योग है. नशे के फैलाव से देशों का आर्थिक विकास पिछड़ रहा है और समाज में आपराधिक प्रवृत्तियां पनप रही हैं.

भयावह आंकडे़

ग्लोबल एडल्ट टोबैको सर्वे औफ इंडिया की रिपोर्ट काफी चौंकाने वाली है. युवा किस तरह से नशे का शिकार हो रहा है इस की बानगी इन आंकड़ों से स्पष्ट झलकती है :

  • भारत में तंबाकू व मादक द्रव्य का सेवन करने वालों में खैनी का प्रयोग सब से ज्यादा किया जाता है. करीब 13 फीसदी लोग इस का सेवन करते हैं.
  • 2009-10 के ग्लोबल एडल्ट टोबेको सर्वे के मुताबिक भारत में तब 12 करोड़ लोग तंबाकू का सेवन कर रहे थे.
  • तंबाकू से होने वाली बीमारियों के इलाज पर 2011 में भारत में 1,04,500 करोड़ रुपए खर्च हुए.
  • एक सिगरेट आप की जिंदगी के 9 मिनट पी जाती है.
  • तंबाकू की एक पीक आप की जिंदगी के 3 मिनट कम कर देती है.
  • हर 7 सैकंड में तंबाकू और अन्य मादक द्रव्यों से एक मौत होती है.
  • भारत में हर साल साढ़े 10 लाख मौतें तंबाकू के सेवन से होती हैं.
  • 90 फीसदी  फेफड़े का कैंसर, 50 फीसदी ब्रोंकाइटस एवं 25 फीसदी घातक हृदय रोगों का कारण धूम्रपान है.

राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय दिवस

  • 31 मई को अंतर्राष्ट्रीय तंबाकू निषेध दिवस.
  • 26 जून को अंतर्राष्ट्रीय नशा निवारण दिवस.
  • 2 से 8 अक्तूबर तक मद्यपान निषेध सप्ताह.
  • 18 दिसंबर को मद्यनिषेध दिवस.
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