सीबीआई और आरबीआई में घमासान

सीबीआई और आरबीआई दोनों में घमासान होने से यह पक्का हो गया है कि इस सरकार की पकड़ न आम लोगों की सुरक्षा पर है, न पैसे पर. अगर सीबीआई के सब से ऊंचे अफसर अपने से नीचे वालों को गिरफ्तार करने लगें और नीचे वाले खुद ऊपर वालों की शिकायतें करने लगें तो पक्का है कि सीबीआई यानी सैंट्रल ब्यूरो औफ इंटैलीजैंस की जगह सड़ा बैगन औफ इंडिया बन गया है. इसी तरह आरबीआई में रिजर्व बैंक औफ इंडिया की तरह काम नहीं कर रहा रुपया बरबादी इंजन बन गया है.

सरकार की समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करे. नरेंद्र मोदी को तो मंदिरों में पूजा करने, विदेशों के दौरे करने, मूर्तियों के फीते काटने, भाषण देने, नेहरू खानदान पर दोष मढ़ने के अलावा कुछ और काम नहीं है. उन के पहले दायां हाथ रहे अरुण जेटली केवल कमरे में बैठ कर बोल सकते हैं क्योंकि वे बीमार ही चल रहे हैं. आरबीआई उन की सुनता नहीं है या समझता है कि वकील को भला फाइनैंस के मामलों का क्या पता.

सीबीआई का काम राजनाथ सिंह के हाथों में होना चाहिए पर उन्हें भी और मंत्रियों की तरह देशभर में फालतू में हांफते देखा जा सकता है, देश का हिसाब रखते नहीं.

सीबीआई का अंदरूनी झगड़ा डराने वाला है क्योंकि ऊपर के दोनों अफसरों ने एकदूसरे पर करोड़ों की रिश्वत लेने का आरोप लगाया है. उम्मीद यह की जाती रही है कि सीबीआई ही बेईमानों को पकड़ेगी पर पिछले 4 डायरैक्टरों पर तरहतरह के इलजाम लग चुके हैं. अब हालात ये हो गए हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने एक तरह से दोनों ऊपरी अधिकारियों को कठघरे में खड़ा कर दिया है. जो नया अफसर सरकार ने बनाया है वह कोई फैसले नहीं ले सकता. सरकारी तोता अब पिंजरा तोड़ चुका है पर उस के पर तो सैकड़ों डोरों से बंधे हैं जो अपनी मनमरजी का काम कराते रहे हैं. साफ है कि जितने छापे सीबीआई ने पिछले 4 सालों में मारे हैं सारे सरकार ने बदले की भावना और विपक्षियों की टांग तोड़ने के लिए मरवाए हैं और सीबीआई ने बढ़चढ़ कर फायदा उठाया है.

अब जनता जनार्दन यह नहीं कह सकती कि पुलिस या सरकार गलत है तो सीबीआई से जांच कर लो. वे दिन हवा हो गए जब सीबीआई पर भरोसा था. अमेरिकी फिल्मों में अकसर एफबीआई और एनआईए (फैडरल ब्यूरो औफ इनवैस्टीगेशन और नैशनल इंटैलीजैंस एजेंसी) की ज्यादतियों के सीन दिखाए जाते हैं जबकि यहां सीबीआई को साफसुथरा, कर्मठ, मेहनती, देशप्रेमी ही दिखाया जाता रहा है. अब कलई उतर गई है. सोने की परत के नीचे पीतल का नहीं कच्ची मिट्टी का बरतन है जिस में जो चाहे जहां मरजी छेद कर ले.

आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना का झगड़ा सामने आया है क्योंकि दोनों को अब नरेंद्र मोदी की पकड़ पर भरोसा नहीं रह गया है. सरकार ने जो प्रधानमंत्री कार्यालय बना कर सत्ता कुछ हाथों में समेट ली थी, उन हाथों के काले कारनामे इन दोनों अफसरों के पास मौजूद हैं. इन का चाहे तो भी कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता, इसीलिए छुट्टी पर जाने के आदेशों के बावजूद इन दोनों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की हिम्मत दिखाई. यह सरकार राज करना भूल चुकी है. इसे तो यज्ञहवन करना ही आता है.

जरीन खान क्यों हुई भावुक?

हाल ही में शार्ट फिल्म ‘उड़ने दो’ का ट्रेलर मुंबई में लौन्च किया गया. इस मौके पर अभिनेत्री जरीन खान अतिथि के तौर पर आई थीं. इस दौरान उन्होंने फिल्म निर्माता ऊषा काकड़े से एक सवाल पूछा और उन्होंने यह जानने  कि कोशिश की, जो युवा माएं हैं या जो पहली बार मां बनी हैं, वे अपने बच्चे को अच्छे और बुरे स्पर्श के बारे में किस तरह समझाएं.

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इस प्रश्न का उत्तर देते हुए फिल्म निर्माता ऊषा काकड़े ने बताया कि उन्होंने अब तक इसके 3 लाख बच्चों के साथ सेशन किए हैं और उन्हें बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. जब यह चल रहा होता है तो बच्चों से संबंधित कई प्रकार के प्रश्न पूछते हैं कि माता-पिता के हाथों स्नान करना चाहिए या नहीं.

इस पर उत्तर देते हुए वह उन्हें बताती हैं बच्चों से कि उनके स्पर्श की भावभंगिमा से आपको समझ में आ जाता है और अब आपको तय करना चाहिए और यही बात वह अन्य के बारे में भी बताती है. उनका उत्तर सुनकर जरीन भावुक हो गईं.

दरअसल ‘उड़ने दो’ एक शार्ट फिल्म है जिसमें फिल्म अभिनेत्री रेवती ने मुख्य भूमिका निभाई है. गौरतलब है कि इस शार्ट फिल्म के माध्यम से बच्चों को अच्छे और बुरे स्पर्श से अवगत कराना है ताकि अगर उनके साथ कहीं पर भी कोई गलत काम हो रहा है तो वह तुरंत इसकी जानकारी उनके माता-पिता को दे सकें या औनलाइन शिकायत के जरिए भी कर सकते हैं. इस मौके पर मनीष मल्होत्रा, लारा दत्ता, पंकजा मुंडे और अमृता फडणवीस भी उपस्थित थे.

नादान मोहब्बत का नतीजा

उत्तर प्रदेश के शहर आगरा के थाना छत्ता की गली कचहरी घाट में रामअवतार अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी के अलावा 3 बेटियां थीं. बड़ी बेटी की वह शादी कर चुका था, मंझली के लिए लड़का ढूंढ रहा था. सब से छोटी शिल्पी हाईस्कूल में पढ़ रही थी.

शिल्पी की उम्र  भले ही कम थी, पर उस की शोखी और चंचलता से रामअवतार और उस की पत्नी चिंतित रहते थे. पतिपत्नी उसे समझाते रहते थे, पर 15 साल की शिल्पी कभीकभी बेबाक हो जाती थी. इस के बावजूद रामअवतार ने कभी यह नहीं सोचा था कि उन की यह बेटी एक दिन ऐसा काम करेगी कि वह समाज में मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे.

कचहरी घाट से कुछ दूरी पर जिमखाना गली है. वहीं रहता था शब्बीर. उस का बेटा था इरफान, जो एक जूता फैक्ट्री में कारीगर था. इरफान के अलावा शब्बीर के 2 बेटे और थे.

शिल्पी जिमखाना हो कर ही स्कूल आतीजाती थी. वह जब स्कूल जाती तो इरफान अकसर उसे गली में मिल जाता. आतेजाते दोनों की निगाहें टकरातीं तो इरफान के चेहरे पर चमक सी आ जाती. इस से शिल्पी को लगने लगा कि इरफान शायद उसी के लिए गली में खड़ा रहता है.

शिल्पी का सोचना सही भी था. दरअसल शिल्पी इरफान को अच्छी लगने लगी थी. यही वजह थी, वह उसे देखने के लिए गली में खड़ा रहता था. कुछ दिनों बाद वह शिल्पी से बात करने का बहाना तलाशने लगा. इस के लिए वह कभीकभी उस के पीछेपीछे कालोनी के गेट तक चला जाता, पर उस से बात करने की हिम्मत नहीं कर पाता. जब उसे लगा कि इस तरह काम नहीं चलेगा तो एक दिन उस के सामने जा कर उस ने कहा, ‘‘मैं कोई गुंडालफंगा नहीं हूं. मैं तुम्हारा पीछा किसी गलत नीयत से नहीं करता. मैं तुम से एक बात कहना चाहता हूं.’’

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‘‘तुम मुझ से क्या चाहते हो?’’ शिल्पी ने पूछा.

‘‘बात सिर्फ इतनी है कि मैं तुम से दोस्ती करना चाहता हूं.’’ इरफान ने कहा.

‘‘लेकिन मैं तुम से दोस्ती नहीं करना चाहती. मम्मीपापा कहते हैं कि लड़कों से दोस्ती ठीक नहीं.’’ शिल्पी ने कहा और मुसकरा कर आगे बढ़ गई.

इरफान उस की मुसकराहट का मतलब समझ गया. हिम्मत कर के उस ने आगे बढ़ कर उस का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘कोई जल्दी नहीं है, तुम सोचसमझ लेना. मैं तुम्हें सोचने का समय दे रहा हूं.’’

‘‘कोई देख लेगा.’’ कह कर शिल्पी ने अपना हाथ छुड़ाया और आगे बढ़ गई. किसी लड़के ने उसे पहली बार ऐसे छुआ था. उस के शरीर में बिजली सी दौड़ गई थी. शिल्पी उम्र की उस दहलीज पर खड़ी थी जहां आसानी से फिसलने का डर रहता है. इरफान पहला लड़का था, जिस ने उस से दोस्ती की बात कही थी, पर मांबाप और समाज का डर आड़े आ रहा था.

इरफान के बारे में शिल्पी ज्यादा कुछ नहीं जानती थी. बस इतना जानती थी कि वह जिमखाना गली में रहता है. उसे उस का नाम भी पता नहीं था. धीरेधीरे इरफान ने उस के दिल में जगह बना ली. मिलने पर इरफान उस से थोड़ीबहुत बात भी कर लेता. पर उसे प्यार के इजहार का मौका नहीं मिल रहा था. एक दिन उस ने कहा, ‘‘चलो, ताजमहल देखने चलते हैं. वहीं बैठ कर बातें करते हैं.’’

शिल्पी ने हां कर दी तो दोनों औटो से ताजमहल पहुंच गए. वहां शिल्पी को जब पता चला कि उस का नाम इरफान है तो उस ने कहा, ‘‘ओह तो तुम मुसलमान हो?’’

‘‘हां, मुसलमान हूं तो क्या हुआ? क्या मुसलमान प्यार नहीं कर सकता. मैं तुम से प्यार करता हूं, ठीकठाक कमाता भी हूं. और मैं वादा करता हूं कि जीवन भर तुम्हारा बनकर रहूंगा. तुम्हें हर तरह से खुश रखूंगा.’’

इरफान देखने में अच्छाखासा था और ठीकठाक कमाई भी कर रहा था, केवल एक ही बात थी कि वह मुसलमान था. पर आज के जमाने में तमाम अंतरजातीय विवाह होते हैं. यह सब सोच कर शिल्पी ने इरफान की मोहब्बत स्वीकार कर ली. उस दिन के बाद वह अकसर उस के साथ घूमनेफिरने लगी.

मोहल्ले वालों ने जब शिल्पी को इरफान के साथ देखा तो तरहतरह की बातें करने लगे. किसी ने रामअवतार को बताया कि वह अपनी बेटी को संभाले. वह एक मुसलमान लड़के के साथ घूमतीफिरती है. कहीं उस की वजह से कोई बवाल न हो जाए.

बेटी के बारे में सुन कर रामअवतार के कान खड़े हो गए. दोपहर में जब वह घर पहुंचा तो पता चला कि शिल्पी अभी तक घर नहीं आई है. पत्नी ने बताया कि वह रोज देर से आती है. कहती है कि एक्स्ट्रा क्लास चल रही है.

रामअवतार दुकान पर लौट गया. कुछ देर बाद पत्नी का फोन आया कि शिल्पी आ गई है तो वह घर आ गया. उस ने शिल्पी से पूछताछ की तो उस ने कहा कि वह किसी लड़के से नहीं मिलती. छुट्टी के बाद मैडम क्लास लेती हैं. इसलिए देर हो जाती है.

रामअवतार जानता था कि शिल्पी झूठ बोल रही है. वह खुद उसे पकड़ना चाहता था, इसलिए उस ने उस से कुछ नहीं कहा. कुछ दिनों तक शिल्पी से कोई टोकाटाकी नहीं हुई तो वह निश्ंिचत हो गई. वह इरफान के साथ घूमनेफिरने लगी. फिर एक दिन रामअवतार ने उसे इरफान के साथ देख लिया. उस ने शिल्पी को डांटाफटकारा ही नहीं, उस का स्कूल जाना भी बंद करा दिया.

बंदिश लगने से शिल्पी का प्रेमी से मिलनाजुलना बंद हो गया. वह उस से मिलने के लिए बेचैन रहने लगी, जिस से उसे अपने ही घर वाले दुश्मन नजर आने लगे. अब घर उसे कैदखाना लगने लगा था. उस का मन कर रहा था कि किसी तरह वह इस चारदीवारी को तोड़ कर अपने प्रेमी के पास चली जाए. एक दिन उसे वह मौका मिला तो वह इरफान के साथ भाग गई.

हिंदू लड़की को मुसलमान लड़का भगा कर ले गया था. इस बात पर इलाके में तनाव फैल गया. थाना छत्ता में 28 अगस्त, 2010 को रामअवतार की तरफ से शिल्पी को भगाने वाले इरफान के खिलाफ मुकदमा दर्ज हो गया. इस के बाद पुलिस सक्रिय हो गई. जल्दी ही पुलिस ने दोनों को ढूंढ निकाला. पुलिस ने दोनों को अदालत में पेश किया. चूंकि शिल्पी नाबालिग थी, इसलिए अदालत ने उसे उस के पिता को सौंप दिया और इरफान को जेल भेज दिया.

प्रेमी के जेल जाने से शिल्पी बहुत दुखी थी. वह अपने पिता के खिलाफ खड़ी हो गई. मांबाप और रिश्तेदारों ने शिल्पी को लाख समझाने की कोशिश की, पर उस के दिलोदिमाग से इरफान नहीं निकला. शिल्पी की उम्र भले ही कमसिन थी, पर उस की मोहब्बत तूफानी थी. जबकि समाज और कानून की नजर में उस की मोहब्बत बेमानी थी, क्योंकि वह नाबालिग थी.

इरफान 3 महीने बाद जेल से बाहर आ गया. उस के जेल से बाहर आने पर शिल्पी बहुत खुश हुई. दोनों के बीच चोरीछिपे मोबाइल से बातचीत होने लगी. शिल्पी पर नजरों का सख्त पहरा था. उसे घर से निकलने की इजाजत नहीं थी. वह अपने प्रेमी से मिलने के लिए छटपटा रही थी, पर रामअवतार और उस की पत्नी माया सतर्क थे.

शिल्पी और इरफान साथसाथ रहने का मन बना चुके थे. मांबाप की लाख निगरानी के बावजूद एक दिन रात में शिल्पी प्रेमी के पास पहुंच गई. इरफान इस बार उसे ले कर इलाहाबाद चला गया. इरफान ने लव मैरिज के लिए हाईकोर्ट के वकीलों से बात की, लेकिन शिल्पी नाबालिग थी, इसलिए कोई मदद नहीं कर सका.

इस के बाद इरफान ने एक काजी की मदद से शिल्पी से निकाह कर लिया. शिल्पी दोबारा घर से भागी थी. इस बार किसी ने विरोध नहीं किया, पर रामअवतार परेशान था. वह मदद के लिए पुलिस के पास पहुंचा तो पुलिस ने इरफान के घर वालों पर दबाव डाला. करीब एक महीने बाद इरफान शिल्पी के साथ वापस आ गया. पुलिस ने दोनों को कोर्ट में पेश किया, शिल्पी अभी भी नाबालिग थी, लेकिन इस बार उस ने पिता के साथ जाने से इनकार कर दिया. तब अदालत ने उसे नारी निकेतन तो इरफान को जेल भेज दिया.

प्रेमी युगल को कानून ने एक बार फिर जुदा कर दिया. लेकिन उन की मोहब्बत जुनूनी हो गई थी. शिल्पी अब अपने बालिग होने का इंतजार कर रही थी. इस से तय हो गया कि बाहर आने के बाद दोनों साथसाथ रहेंगे. तब साथ रहने का उन के पास कानूनी अधिकार होगा.

14 महीने बाद जब शिल्पी नारी निकेतन से बाहर आई, तब तक इरफान भी जेल से छूट चुका था. हालांकि नारी निकेतन के दरवाजे पर शिल्पी के मांबाप मौजूद थे, लेकिन शिल्पी ने साफ कहा कि वह अपने शौहर के साथ जाएगी. बेबस मांबाप देखते ही रह गए और बेटी प्रेमी के साथ चली गई. क्योंकि अब वह बालिग थी और अपनी मरजी की मालिक थी.

मांबाप के प्रति उस के मन में प्यार नहीं, नफरत थी. जिन के कारण उसे नारी निकेतन में रहना पड़ा तो प्रेमी को जेल में. शिल्पी जब नहीं मानी तो मांबाप ने भी उसे उस के हाल पर छोड़ दिया. अब वह इस दर्द को भूलना चाहते थे कि बेटी ने समाज में उन्हें कितना जलील किया था.

शिल्पी ने अपनी दुनिया प्रेमी के साथ बसा ली थी. उस ने कभी भी नहीं जानना चाहा कि उस के कारण मांबाप का क्या हाल हुआ. किस तरह से वो अपनी तारतार हुई इज्जत के साथ जी रहे थे.

धीरेधीरे प्यार का नशा उतरने लगा और शिल्पी को मांबाप की याद आने लगी. एक दिन वह पिता के घर पहुंच गई. मां का दिल पिघल गया, उस ने उसे गले से लगा लिया. उस दिन के बाद शिल्पी चोरीछिपे पिता के घर जाने लगी.

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इरफान का काफी पैसा पुलिसकचहरी और इधरउधर की भागदौड़ में खर्च हो गया था. उस ने फिर से जूता फैक्ट्री में काम शुरू कर दिया था, लेकिन शिल्पी की ख्वाहिशें बढ़ रही थीं. उस का खयाल था कि शादी के बाद शौहर उसे एक रंगीन दुनिया में ले जाएगा, पर उस ने महसूस किया कि जिंदगी उतनी रंगीन नहीं है, जैसा कि उस ने सोचा था. उस की चाहतों की उड़ान बहुत ऊंची थी. उसे लग रहा था कि इरफान ने जो खुशियां देने का वादा किया था, वह पूरा नहीं कर पा रहा है.

एक दिन उस ने इरफान से कहा, ‘‘जब तक तुम प्रेमी थे, तब तक मोहब्बत से लबरेज थे. लेकिन अब जब शौहर हो गए हो तो लगता है कि तुम्हारी मोहब्बत भी ठंडी पड़ गई है.’’

‘‘क्या मतलब है तुम्हारा? तुम्हारी मोहब्बत में मैं 2-2 बार जेल गया हूं. पुलिस के जुल्म सहे हैं. अब तुम मुझे ही ताने दे रही हो.’’ इरफान ने कहा.

‘‘मैं भी तो तुम्हारी खातिर नारी निकेतन में रही. मांबाप का घर छोड़ा, आज भी उन की उपेक्षा सह रही हूं.’’ शिल्पी ने तुनक कर कहा.

इसी तरह के छोटेछोटे झगड़ों में एक दिन इरफान ने उसे 2 तमाचे जड़ दिए तो शिल्पी हैरान रह गई पहले तो वह कहता था कि उसे फूलों की तरह रखेगा, उस ने उस पर हाथ उठा दिया. उस ने कहा कि अगर उसे पता होता कि उस की मोहब्बत इतनी कमजोर होगी तो वह उसे कभी स्वीकार न करती.

शिल्पी को लगा कि उस ने गलती कर दी है. लेकिन अब उसे जिंदगी इरफान के साथ ही गुजारनी थी. आखिर हिम्मत कर के वह मायके गई और रोरो कर मां को अपना दुख सुनाया. उस ने कहा कि इरफान पर काफी कर्जा हो गया, जिस से वह तनाव में रहता है. मां ने बेटी का दुख सुना और उसे माफ भी कर दिया. लेकिन जब रामअवतार को पता चला कि बेटी घर आई थी तो वह गुस्से से भर उठा. उस ने पत्नी से साफ कह दिया कि जिस आदमी को उस ने दामाद माना ही नहीं, वह उस की मदद कतई नहीं कर सकता.

घर में अब आए दिन झगड़े होने लगे थे. ससुराल में शिल्पी का कोई हमदर्द नहीं था. मायके वाले भी नहीं अपनाएंगे, शिल्पी यह भी जानती थी. वह तनाव में रहने लगी. उसे लगने लगा कि जिंदगी कैद के सिवाय कुछ नहीं है.

इरफान की समझ में आ गया कि मोहब्बत का खेल बहुत हो चुका है. उसे जिंदगी को पटरी पर लाने के लिए पैसे की जरूरत थी, जिस के लिए मेहनत जरूरी थी. बेटी ने भले ही परिवार को दर्द दिया था, पर ममता मरी नहीं थी. मांबाप बेटी के लिए परेशान थे, पर वह उसे अपनाना नहीं चाहते थे.

12 दिसंबर, 2016 को रामअवतार को किसी ने फोन कर के बताया कि शिल्पी को मार दिया गया है. बेटी की मौत की खबर से रामअवतार सदमे में आ गया. उस ने तुरंत माया को यह खबर सुनाई और पत्नी के साथ शब्बीर के घर पहुंच गया, जहां मकान की ऊपरी मंजिल पर बेटी का शव पलंग पर पड़ा था. उस के गले पर जो निशान थे, उस से साफ लग रहा था कि उसे गला घोंट कर मारा गया है. बेटी की लाश देख कर वह फूटफूट कर रोने लगा.

पुलिस को भी खबर मिल गई थी. थाना छत्ता के थानाप्रभारी शैलेंद्र सिंह मय फोर्स के घटनास्थल पर पहुंच गए थे. उन्होंने रामअवतार से पूछताछ की तो उस ने बताया कि करीब सवा महीने पहले बेटी को फोन कर के बताया था कि इरफान उसे मारतापीटता है और मायके से पैसा लाने को कहता है.

बेटी ने परिवार को बड़ा जख्म दिया था, इस कारण वह बेटी से नाराज था. इसलिए उस समय उसने उस से ज्यादा बात नहीं की थी. वह यह नहीं जानता था कि इरफान उसे जान से ही मार डालेगा.

इरफान और उस के घर वाले फरार हो चुके थे. पुलिस ने रामअवतार और मोहल्ले वालों की मौजूदगी में घटनास्थल की काररवाई पूरी कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया.

रामअवतार की तरफ से थाना छत्ता में शब्बीर और उस के बेटों इरफान, जमीर, फुरकान व शाहनवाज के खिलाफ भादंवि की धारा 498ए, 304बी, 201 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई तो पता चला कि शिल्पी की मौत दम घुटने से हुई थी. इस से पुलिस को विश्वास हो गया कि यह हत्या का मामला था. पुलिस अब आरोपियों के पीछे लग गई. पुलिस ने आरोपियों के कई ठिकानों पर छापे मारे, लेकिन कोई भी हाथ नहीं लगा.

घटना के हफ्ते भर बाद शब्बीर पुलिस की गिरफ्त में आ गया. इस के बाद धीरेधीरे सभी आरोपी पकड़े गए. शब्बीर ने बताया था कि उस ने बहू को नहीं मारा. अगर उसे कोई परेशानी होती तो वह बेटे का विवाह हिंदू लड़की से न होने देता. उस ने उसे सम्मान के साथ घर में रहने की जगह दी.

शब्बीर के अनुसार शिल्पी की मौत में उस का कोई हाथ नहीं है. इरफान शिल्पी के साथ ऊपर के कमरे में रहता था. जबकि अन्य लोग नीचे रहते थे. चूंकि रिपोर्ट नामजद दर्ज कराई गई थी, इसलिए पुलिस ने उस का बयान ले कर उसे न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. इस के बाद पुलिस ने एकएक कर के सभी को जेल भेज दिया.

सिर्फ इरफान पुलिस की गिरफ्त से दूर था. पुलिस ने उस की भी सरगर्मी से तलाश शुरू की तो जून, 2017 में उस ने अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया. लेकिन उस ने अपना अपराध स्वीकार नहीं किया. उस का कहना था कि वह शिल्पी से मोहब्बत करता था. शिल्पी को खुश रखने के लिए वह मेहनत कर के पैसा कमा रहा था. उस ने खुद ही फांसी लगा कर जान दी है.

इरफान भी जेल चला गया. शिल्पी मोहब्बत में इस कदर बागी हुई कि अपनों के मानसम्मान की भी परवाह नहीं की, पर उस को यह नहीं मालूम था कि समाज के नियमों को तोड़ने वालों को समाज माफ नहीं करता.

रामअवतार भले बेटी से नाराज था, पर अपनी गुमराह बेटी को उस की मौत के बाद माफ कर चुका है, अब वह बेटी के लिए इंसाफ की लड़ाई लड़ रहा है. वह नादान बेटी को गुमराह करने वालों को माफ नहीं करना चाहता बल्कि उन्हें सजा दिलाना चाहता है.

एक जनवरी से भोजपुरी फिल्में और संगीत हो जाएगा “अश्लीलता मुक्त”

मुंबई फिल्म इंडस्ट्री के भीतर अश्लीलता के खिलाफ क्रांति का बिगुल बज गया है. 5 लाख सदस्यों वाली ‘फेडरेशन औफ वेस्टर्न इंडिया सिने एम्प्लाइज’ ने ऐलान किया है कि भोजपुरी फिल्मों में अब अश्लीलता नहीं बर्दाश्त की जाएगी. ऐसी फिल्मों का बनना सामाजिक अपराध है. इसलिए कोई उनके निर्माण या प्रदर्शन में संलग्न न हो, जो लोग ऐसा नही करेंगे, उनकी सदस्यता रद्द की जाएगी. फेडरेशन ने इस बात का भी ऐलान किया है कि मुंबई, इलाहाबाद, पटना और रांची हाई कोर्ट में ‘‘पूर्वांचल विकास प्रतिष्ठान’’ द्वारा भोजपुरी मनोरंजन उद्योग में फैली अश्लीलता के खिलाफ दायर की जा रही याचिका में फेडरेशन भी सह याचिकाकर्ता बनेगा.

‘‘पूर्वांचल विकास प्रतिष्ठान’’ और ‘‘फेडरेनशन औफ वेस्टर्न इंडिया सिने एम्पलाईज’’ने यह घोषणा मुंबई में ‘सिने एंड टीवी आर्टिस्ट एसोसिएशन’ के दफ्तर में आयोजित एक प्रेस कांफ्रेंस में की. दोनों संगठनों ने ऐलान किया कि पहली जनवरी 2019 के बाद प्रदर्शित होने वाली हर भोजपुरी फिल्म की पूर्वांचल समाज और संस्कृति को जानने वाले किसी विद्वान व्यक्ति से समीक्षा करायी जाएगी और पूर्वांचल के समाज के मानदंडों के हिसाब से यदि कुछ गलत पाया गया, तो सेंसर बोर्ड के सामने यह सवाल प्रखरता से खड़ा किया जाएगा कि उसने इस फिल्म को कैसे पास किया?

इस अवसर पर फेडरेशन के अध्यक्ष बी एन तिवारी, महासचिव अशोक दुबे, कोषाध्यक्ष संजू श्रीवास्तव, प्रोड्यूसर एसोसिएशन के सदस्य शरद देराज शेलार और पूर्वाचल विकास प्रतिष्ठान की ओर से पूर्व मंत्री चंद्रकात त्रिपाठी, अश्लीलता विरोधी अभियान की ब्रांड अम्बेसेडर पद्मश्री डा शोमा घोष, ‘पूर्वांचल विकास प्रतिष्ठान’ के सचिव ओमप्रकाश सिंह, मुंबई हाई कोर्ट में याचिका दाखिल करने जा रहे एडवोकेट विजय सिंह और गायक अविनाश तिवारी ने भोजपुरी फिल्मों, भोजपुरी के संगीत अलबमों व भोजपुरी गीतों से एक माह के अंदर अश्लीलता को जड़ से समाप्त करने की बात की.

इन सभी का मानना है कि भोजपुरी मनोरंजन उद्योग में अश्लीलता इन दिनों चरम पर है. यह स्त्रियों की अस्मिता पर हमला है. इससे बच्चों, किशोरी, तरूणों का भविष्य बिगड़ रहा है. समाज की छवि बिगड़ रही है. भाषा, साहित्य, संस्कृति और समाज आदि की अवमानना हो रही है.

इन परिस्थितियों को रेखांकित करते हुए बी एन तिवारी ने कहा -‘‘बंद यानी बंद. भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में अश्लीलता अब नहीं चलेगी. यदि सेंसर बोर्ड ने भी नियमों का पालन नहीं किया, तो हम उसके खिलाफ मुखर विरोध के लिए तैयार हैं. अब तक भोजपुरी फिल्मों में जो अश्लीलता परोसी जा रही है, इसके लिए सेंसर बोर्ड ही जिम्मेदार है. सेंसर बोर्ड अपना काम सही ढंग से नहीं कर रहा है. यदि सेंसर बोर्ड सही ढंग से काम कर रहा होता, तो एक भी भोजपुरी फिल्मों में अश्लीलता परोसकर औरतों की अस्मिता के साथ खिलवाड़ नजर न आता. अश्लीलता के खिलाफ हमारी लड़ाई यहीं नहीं रूकेगी. पहले भोजपुरी की यह लडाई जीत ली जाए, इसके बाद हिंदी सिनेमा में भी अश्लीलता का विरोध किया जाएगा. सबसे पहले जहां ज्यादा बुराई है, उसे खत्म कर लिया जाए.’’

पद्मश्री डा शोमा घोष ने कहा – ‘‘पूर्वांचल की भोजपुरी बहुत मीठी बोली है. भोजपुरी बहुत संपन्न संस्कृति की बहुत विस्तृत फलक की है. चंद तिजारती लोग इसे बिगाड़ रहे हैं. हमारी यह लड़ाई तो मां के दूध की मिठास बचाने की लड़ाई है. समाज के होने और जीने की लड़ाई है. समाज ने अब तक संगठित विरोध नहीं किया था. इसलिए यह बुराई फैलती चली गयी.’’

पूव मंत्री चंद्रकांत त्रिपाठी ने भी अश्लीलता के खिलाफ बिगुल बजाने की बात पर जोर देते हुए कहा – ‘‘हम सभी इस लड़ाई को एक तार्किक अंजाम तक ले जाने के लिए प्रतिबद्ध हैं.’’

‘‘फेडरेशन आफ वेस्टर्न इंडिया इम्प्लौइज एसोसिएशन’’ संस्था से जुड़े अन्य लोगों ने भी यही प्रतिबद्धता जताते हुए कहा – ‘‘फेडरेशन अश्लीलता के खिलाफ अपनी इस प्रतिबद्धता को सभी सदस्यों को सूचित कर रही है. फिल्म निर्माताओं के दूसरे संगठनों से भी इस बारे में बात हो रही है. हमें विष्वास है कि इस लड़ाई में सभी साथ खडे़ होंगे. सबकी इस बारे में एक व्यापक सहमति बनेगी. सेंंसर बोर्ड को भी इस बारे में फेडरेशन की इस प्रतिबद्धता की जानकारी दी जा रही है. इस बाबत फेडरेशन के सलाहकार जाने माने निर्देशक अशोक पंडित से भी बात हो रही है.

‘‘पूर्वांचल विकास प्रतिष्ठान’’ के सचिव ओमप्रकाश सिंह ने मुंबई, इलाहाबाद व अन्य हाईकोर्ट में फाइल की जा रही याचिका का विवरण देते हुए कहा – ‘‘धारा 29 में दिए गए जीने के हक के मौलिक अधिकार को विचार का मुख्य बिंदु बनाया जा रहा है. इस मामले में यह याचिका एक अनोखी याचिका बनेगी. सवाल यह भी है कि भाषा को, साहित्य को, संस्कृति को, लोक कलाओं को मर्यादाओं को मूल्यों को मानकों को भी जीने का सम्मान से जीने का कोई हक है या नही? यही याचिका उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के राज्य मानवाधिकार आयोग में भी दाखिल की जा रही है. निर्माताओं, निर्देशकों, प्रदर्शकों, वितरकों, कलाकारों आदि को मिलाकर कुल 600 लोगों को हमने व्यक्तिगत चिट्ठी भेज कर आग्रह किया है कि वह भोजपुरी फिल्मों में अश्लीलता का कारण ना बनें.’’

कितने भरोसेमंद साबित होंगे राजा भैया

राजा भैया पर पोटा लगाकर जेल भेजने को लेकर क्षत्रिय समाज उस समय की मुख्यमंत्री मायावती के खिलाफ खड़ा हुआ. मायावती को सरकार से जाना पड़ा. राजा भैया को न्याय मिला. वह मंत्री बने. समाजवादी पार्टी और भाजपा के बीच खेलते रहे.

दलित एक्ट और प्रमोशन में आरक्षण को लेकर ऊंची जातियां खासकर क्षत्रिय समाज ने भाजपा का विरोध करते चुनाव में विकल्प के रूप में ‘नोटा’ का बटन दबाने का अभियान चलाया, तब राजा भैया को एक बार फिर से क्षत्रिय समाज की याद आई.

अब वह अपनी नई पार्टी बनाकर राजनीतिक विकल्प बनने का दावा कर रहे है. राजा भैया कांग्रेस की मुखर आलोचना करते यह कहते हैं कि राजीव गांधी के समय ही दलित एक्ट बना था. वह यह भूल जाते हैं कि मोदी सरकार ने प्रमोशन में आरक्षण और दलित एक्ट पर सही फैसला नहीं किया. ऐसे में यह सवाल उठना जायज है कि चुनाव के बाद राजा भैया किसके मददगार होंगे?

राजा भैया यानि रघुराज प्रताप सिंह उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले की कुंडा विधनसभा सीट से लगातार 6 बार विधायक चुने जा रहे हैं. उनकी गिनती बाहुबली नेताओं में होती है. मायावती ने अपने मुख्यमंत्री कार्यकाल में राजा भैया पर अपनी सरकार गिराने का आरोप लगाकर पोटा एक्ट के तहत कार्यवाही करके जेल भेजा.

राजा भैया के समर्थन मे पूरा समाज एकजुट हो गया. मायावती और राजा भैया की इस लड़ाई में मायावती को मुंह की खानी पड़ी. पोटा रद्द हुआ. राजा भैया जेल से बाहर आये. मंत्री बने, करीब 15 साल के बाद अब राजा भैया को क्षत्रिय समाज की पीड़ा का अहसास हुआ, अब वह नया दल बनाकर आरक्षण और प्रमोशन में आरक्षण की लडाई लड़ने की बात करने लगे हैं.

समाज को एकजुट करने खासकर क्षत्रिय समाज की एकजुटता की बात करने वाले राजा भैया अपने ही जिले में राजशाही से जुडे राजनीतिक परिवारो को एकजुट नहीं कर पाये हैं. प्रतापगढ़ में राजा दिनेश प्रताप सिंह कालाकांकर स्टेट है. वहां की राजकुमारी रत्ना सिंह कांग्रेस नेता है. राजा भैया कुंडा के भदरी स्टेट के राजा हैं. दोनों हर राज परिवारों में आपसी दूरी बनी हुई है. राजा भैया जहां भाजपा और सपा दोनों से करीबी रिश्ते बनाने में सफल थे, वहां रत्ना सिंह शुरू से ही कांग्रेस के साथ रही है. दोनों ही राजपरिवारों के बीच दूरी क्षत्रिय राजनीति को कमजोर करती रही है.

केवल प्रतापगढ़ ही नहीं दूसरे कई जिलों में भी राज परिवार अलग अलग दलों में रहकर क्षत्रिय एकता को किसी सूत्र में पिरोने में असफल रहे हैं. यही वजह है कि क्षत्रिय समाज राजनीतिक रूप से हाशिये पर खड़ा है. राजा भैया ने अपनी नई पार्टी बनाने का एलान तब किया जब लोकसभा चुनाव के 6 माह भी नहीं बचे है. अभी तक न राजा भैया की पार्टी का नाम रजिस्टर्ड हुआ है और ना झंडा बना है. ऐसे में वह किसी दल का विकल्प कैसे बन पायेंगे?

ऐसे में वह महज किसी दल से समझौता करने के अलावा और कुछ हासिल नहीं कर पायेंगे. राजा भैया निर्दलीय विधायक बनने के बाद भी सपा-भाजपा के बीच झूलते रहे हैं. ऐसे में उन पर भरोसा होने की कोई ठोस वजह नजर नहीं आती.

राजनीतिक जानकार मानते हैं कि ठाकुर बिरादरी की भाजपा से नाराजगी को किसी और दल में जाने से रोकने के लिये राजा भैया ने यह प्रयास किया है. चुनाव के बाद वह जरूरत के अनुसार भाजपा के साथ खड़े हो सकते हैं. सपा में अखिलेश यादव से मतभेद होने के बाद से ही राजा भैया भाजपा के साथ खड़े हैं. भाजपा से ठाकुर बिरादरी की नाराजगी के बाद वह नया दल बनाकर नाराजगी के रूख को भांप नई पार्टी की कवायद कर रहे हैं. हवा का सही रुख तब सामने आयेगा, जब धीरे धीरे सारे पत्ते खुलेंगे. 30 नवबंर को राजा भैया अपनी नई पार्टी का ऐलान करेंगे. तब कुछ और धुंध साफ होगी.

प्लान बनाकर किया डिजाइनर का मर्डर

फैशन डिजाइनर माला लखानी (53) उनके नौकर बहादुर (50) की हत्या के आरोपियों से पूछताछ के बाद पुलिस ने दावा किया है कि योजना बनाकर मर्डर को अंजाम दिया गया. बाद में आरोपी डर गए और खुद ही थाने पहुंचकर सरेंडर कर दिया.

पूछताछ में पता चला है कि राहुल ने वारदात की योजना पहले से बनाई थी. इन लोगों को पैसों की जरूरत थी. राहुल को लगता था कि माला के घर से उसे काफी रुपये और जूलरी या दूसरा कीमती सामान हाथ लग सकता है. वह दोस्तों के साथ मिलकर हथियारों के बल पर लूट को अंजाम देना चाहता था. उसने बीते रविवार को ही वसंत कुंज इलाके में लगनेवाली संडे मार्केट से मीट काटने वाले 2 बड़े चाकू भी खरीद लिए थे.

फोन कर कहा- ड्रेस रेडी है : पुलिस के मुताबिक, बुधवार रात 10:30 या 10:45 बजे के करीब राहुल ने माला को कॉल करके बताया कि ड्रेस रेडी है. वह वर्कशाप में आकर चेक कर लें. माला टीवी देख रहीं थीं. राहुल की कॉल के बाद जब वह वर्कशॉप पहुंचीं, तो आरोपियों ने पीछे से उनका मुंह दबाकर जमीन पर गिराने की कोशिश की. माला ने विरोध कर खुद को छुड़ाना चाहा, उसी दौरान उनके गले और पेट पर चाकू से ताबड़तोड़ 5-6 वार कर दिए गए. गले की नस कटने से माला ने मौके पर ही दम तोड़ दिया.

बहादुर न आता तो शायद बच जाता : आरोपी वर्कशाप से निकले भी नहीं थे कि 10 मिनट बाद ही माला का नौकर बहादुर वहां पहुंच गया. उसने खून से लथपथ माला को देखा, तो हक्का-बक्का रह गया. इससे पहले कि बहादुर कुछ समझ पाता, आरोपियों ने उसे भी वर्कशाप के गेट से अंदर की तरफ धक्का देकर नीचे गिरा दिया. फिर दरवाजा लगाकर उस पर भी हमले कर दिए. आरोपियों को डर था कि अगर बहादुर बच गया, तो उनकी पहचान हो जाएगी. बहादुर ने काफी देर तक आरोपियों का मुकाबला किया, लेकिन पेट में चाकू के 5-6 वार के बाद उसने भी वहीं दम तोड़ दिया. उसके बाद आरोपियों ने कपड़े बदले. करीब एक घंटे घर के कोने-कोने को खंगाला. उन्हें थोड़ी बहुत जूलरी ही मिल पाई.

बोतल ले गए थे, लेकिन पी नहीं पाए : पुलिस का दावा है कि रात 12:15 बजे आरोपी माला की कार लेकर घर से निकले. रंगपुरी पहाड़ी पर पहुंचे. उन्होंने वहां चाकू और खून से सने कपड़ों को ठिकाने लगाया. देर रात तक वहीं रुके रहे. आरोपी माला के घर से शराब की एक बोतल भी ले गए थे, लेकिन इतने घबराए हुए थे कि शराब पी नहीं पाए.

पड़ोसियों के लिए यकीन करना मुश्किल

वसंत कुंज एनक्लेव के ए ब्लौक में जिस जगह माला का घर बना हुआ है, वहां आज भले ही महेंद्र सिंह धोनी और चेतन शर्मा जैसे नामी क्रिकेटर भी रह रहें हो, लेकिन पड़ोसी शकील अहमद और उनके भाई वसीम अहमद ने बताया कि माला तब से इस इलाके में अकेली रह रहीं थीं, जब यह इलाका ठीक से बसा भी नहीं था. वह काफी हिम्मत वाली महिला थीं और उन्हें बच्चों से बहुत प्यार था. उनकी हिम्मत की आस-पास के लोग भी दाद देते थे. गाड़ी भी वो खुद ही ड्राइव करती थीं.

वसीम ने बताया कि माला के घर में अक्सर जब कोई पार्टी होती थी या मेहमान आते थे, तो वह उन्हीं के घर से बड़े बर्तन मंगवाती थीं. साथ ही त्योहारों पर भी वे एक-दूसरे को विश करते थे. वसीम और शकील के बच्चों से भी माला बहुत प्यार और स्नेह से मिलती थीं. वसीम ने बताया कि गुरुवार तड़के 4 बजे के करीब जब उन्होंने शोरशराबा सुना और वो बाहर आए, तो उन्होंने भारी तादाद में पुलिस देखी. पुलिसवाले माला के घर के अंदर छानबीन कर रहे थे.

पहले उन्हें लगा कि शायद कोई चोरी हुई है, क्योंकि माला की कार नहीं दिख रही थी. पूछने पर पुलिसवालों ने कुछ नहीं बताया और अंदर चले जाने के लिए कहा. फिर 6 बजे के करीब जब पुलिसवालों ने दो लाशें घर से बाहर निकालीं, तो उसे देखकर हर कोई हैरान रह गया.

भरोसे का उठाया फायदा

मुख्य आरोपी राहुल अनवर माला के यहां साढ़े तीन साल से काम कर रहा था. वही उनका मेन टेलर था. माला ने वर्कशाप का पूरा जिम्मा उसी को दिया था. वर्कशॉप की चाबी भी राहुल के पास रहती थी. माला उसे जिस तरह के कपड़े बनाने के लिए कहतीं, राहुल जरूरत के हिसाब से दूसरे टेलरों और हेल्परों को हायर कर लेता था. माला ने राहुल को इसकी खुली छूट दे रखी थी. इसी का फायदा उठाकर राहुल ने बुधवार की शाम को 6:30 बजे के करीब अपने 2 साथियों वसीम और रहमत को वर्कशॉप पर बुला लिया था. एक-दो बार पहले भी राहुल उन्हें माला के घर बुला चुका था.

आखिर में तीनों आरोपियों ने रजामंदी से लिया सरेंडर का फैसला

करीब दो ढाई घंटे तक बातचीत के बाद आरोपियों को लगा कि पुलिस कभी न कभी उन्हें पकड़ लेगी. उनकी पहचान ज्यादा दिन छुपी नहीं रह पाएगी. तीनों घबरा गए. आखिरकार उन्होंने मिलकर सरेंडर का फैसला किया. रात 2:45 बजे सभी माला की गाड़ी लेकर वसंत कुंज (साउथ) थाने पहुंचे. ड्यूटी अफसर को बताया कि डबल मर्डर करके आए हैं. तब एसएचओ संजीव कुमार थाने में ही थे. तड़के 3 बजे पुलिस तीनों आरोपियों को लेकर मौके पर पहुंची. वहां माला और बहादुर की लाश थी.

क्लास में छेड़ते थे लड़के-लड़कियां, तो ट्रेन के आगे कूदी

12वीं की एक छात्रा अपने ही दो सहपाठियों की छेड़छाड़ से इतनी आहत हो गई कि उसने जान दे दी. मामला जवाहर कौलोनी का है. जीआरपी को बुधवार शाम 7:00 बजे जानकारी मिली कि एक लड़की ने न्यू टाउन रेलवे स्टेशन पर ट्रेन के आगे कूदकर आत्महत्या कर ली है. इसके बाद पुलिस मौके पर पहुंची और उसके परिवारजनों को बुलाया. लड़की के पिता की शिकायत पर पुलिस ने 4 छात्रों के खिलाफ आत्महत्या के लिए विवश करने का मामला दर्ज कर लिया है. इनमें दो लड़कियां भी शामिल हैं.

जीआरपी में दर्ज मामले के अनुसार, जवाहर कालोनी की रहने वाली 18 साल की एक लड़की यहीं के एक पब्लिक स्कूल में 12वीं कक्षा की छात्रा थी. उसी की क्लास में पढ़ने वाले दो लड़के उसका पीछा कर अश्लील शब्द बोलते थे.

आरोप है कि इसमें उनका सहयोग 12वीं कक्षा की ही दो लड़कियां भी करती थीं. पीड़ित छात्रा ने कई बार चारों को समझाया पर वे नहीं माने. आखिर में पीड़िता ने अपने परिवार के लोगों को आपबीती बताई. यह बात पता चलने के बाद परिवारजनों ने चारों छात्रों को समझाया, लेकिन इसका उनपर कोई असर नहीं हुआ. पिता का कहना है कि इससे उनकी बेटी परेशान रहने लगी थी.

वारदात वाले दिन वह बुधवार सुबह स्कूल गई थी. वहां पांचों के बीच स्कूल में कुछ कहासुनी हुई. इसके बाद दोपहर 2:00 बजे स्कूल की छुट्टी होने के बाद वह अपनी घर पहुंची. शाम 4:30 बजे वह स्कूटी चलाकर जवाहर कालोनी में ही ट्यूशन पढ़ने के लिए निकल गई, लेकिन देर शाम तक घर नहीं पहुंची.

उधर, जीआरपी एसएचओ ओमप्रकाश को बुधवार शाम 7:00 बजे जानकारी मिली कि एक लड़की ने न्यू टाउन रेलवे स्टेशन पर ट्रेन के आगे कूदकर आत्महत्या कर ली है. जानकारी मिलने पर एसएचओ ओमप्रकाश व एएसआई कृपाल सिंह मौके पर पहुंचे. शव की पहचान न होने से उसे बीके अस्पताल के रखवा दिया. उधर, छात्रा के रात 8:00 बजे तक घर न पहुंचने पर परिवारीजन जीआरपी थाने पहुंचे. पुलिस ने मौके से टूटी घड़ी और कंगन बरामद किए हैं.

पड़ोस में खड़ी कर दी थी स्कूटी

छात्रा ट्यूशन पढ़ने के लिए स्कूटी लेकर जाती थी. बुधवार शाम उसने स्कूटी जवाहर कालोनी में ही खड़ी कर दी. वह न्यू टाउन रेलवे स्टेशन कैसे पहुंची, यह अभी तक पता नहीं चल पाया है. एक अन्य थ्योरी यह भी सामने आई है कि छुट्टी होने के बाद रास्ते में लड़की समेत पांचों छात्रों ने किसी केक की दुकान से सामान भी खरीदा. इसी दौरान पांचों की आपस में कहासुनी हो गई. इससे नाराज छात्रा मौके पर ही स्कूटी छोड़कर न्यूटाउन स्टेशन पहुंच गई. स्कूल के प्रिंसिपल आकाश शर्मा ने बताया कि पीड़ित परिवारजनों ने स्कूल आकर बताया था कि 28 अक्टूबर को मृतक छात्रा के नाना की मौत हो गई है, इसलिए उनकी बेटी कुछ दिनों तक स्कूल नहीं आ पाएगी.

ऐसे ही सही (अंतिम भाग)

पूर्व कथा

पार्किंग में स्कूटर खड़ा कर के मैं अस्पताल के पूछताछ केंद्र की ओर गया. पूछने पर पता चला कि जिस व्यक्ति को मैं ने कल भरती करवाया था. वह आईसीयू में शिफ्ट हो गया है. वहां पहुंच कर मैं ने देखा कि उस की पत्नी मायूस बैठी थी. मुझे देख वह रोने लगी और बोली कि डाक्टर ने बोला है कि पति की स्पाइनल कौर्ड में गहरी चोट लगी है. कहना मुश्किल है कि ठीक हो भी पाएंगे या नहीं.

मैं बीमा एजेंट हूं. आफिस जाते समय एक एक्सीडेंट हो गया था. मैं उसे घायल अवस्था में नर्सिंग होम ले आया. उस की जेब टटोली तो घरआफिस का पता व फोन नंबर मिला और मैं ने उन की पत्नी को सूचित कर दिया. पत्नी के आने पर जब मैं ने जाने की इजाजत मांगी तो वह मुझ से गाड़ी का इंश्योरेंस क्लेम करने को कहने लगी.

सब काम निबटा कर मैं घर पहुंचा तो पत्नी संगीता के ताने मेरे कानों में पड़े. संगीता स्वभाव की तेज थी. मैं ने उस के साथ तालमेल बिठाने की बहुत कोशिश की लेकिन शादी के 4 साल बाद भी उस पर से मायके का रंग नहीं उतरा था. रोजरोज की लड़ाई से मैं परेशान हो चुका था.

एक दिन मैं शर्माजी से मिलने अस्पताल पहुंचा तो उन की बदतर हालत देख कर बड़ा दुख हुआ. इसी बीच मेरे संबंध भी संगीता के साथ बदतर होते चले गए. अपने बड़े साहब के काम के सिलसिले में मुझे राजपत्रित अधिकारी के हस्ताक्षर की जरूरत थी तो मुझे शर्मा का ध्यान आया और मैं जा पहुंचा उन के पास.

और अब आगे…

‘‘सर, आप किसी को तो जानते होंगे. शायद आप का कोई कुलीग या…’’ तब तक सपनाजी भीतर से आ गईं और कहने लगीं, ‘‘मैं कुछ दिनों से आप को बहुत याद कर रही थी. मेरे पास आप का कोई नंबर तो था नहीं. दरअसल, इन की गाड़ी तो पूरी तरह से खराब हो चुकी है. यदि वह ठीक हो सके तो मैं भी गाड़ी चलाना सीख लूं. आखिर, अब सब काम तो मुझे ही करने पडे़ंगे. यदि आप किसी मैकेनिक से कह कर इन की गाड़ी चलाने लायक बनवा सकें तो मुझे बहुत खुशी होगी.’’

‘‘क्या आप के पास गाड़ी के इंश्योरेंस पेपर हैं?’’ मैं ने पूछा तो उन्होंने सारे कागज मेरे सामने रख दिए. मैं ने एकएक कर के सब को ध्यान से देखा फिर कहा, ‘‘मैडम, इस गाड़ी का तो आप को क्लेम भी मिल सकता है. मैं आप को कुछ और फार्म दे रहा हूं. शर्माजी से इन पर हस्ताक्षर करवा दीजिए, तब तक मैं गाड़ी को किसी वर्कशाप में ले जाने का बंदोबस्त करता हूं.’’

इस दौरान शर्माजी पासपोर्ट के फार्म को ध्यान से देखते रहे. मेरी ओर देख कर वह बोले, ‘‘वैसे यह फार्म अधूरा भरा हुआ है. पिछले पेज पर एक साइन बाकी है और इस के साथ पते का प्रूफ भी नहीं. किस ने भरा है यह फार्म?’’

‘‘सर, एक ट्रेवल एजेंट से भरवाया है. वह इन कामों में माहिर है.’’

‘‘कोई फीस भी दी है?’’ उन्होंने फार्म पर नजर डालते हुए पूछा.

‘‘500 रुपए और इसे भेजेगा भी वही,’’ मैं ने कहा.

‘‘500 रुपए?’’ वह आश्चर्य से बोले, ‘‘आप लोग पढ़ेलिखे हो कर भी एजेंटों के चक्कर में फंस जाते हैं. इस के तो केवल 50 रुपए स्पीडपोस्ट से खर्च होंगे. आप को क्या लगता है वह पासपोर्ट आफिस जा कर कुछ करेगा? इस से तो मुझे 300 रुपए दो मैं दिन में कई फार्म भर दूं.’’

मेरे दिमाग में यह आइडिया घर कर गया. यदि इस प्रकार के फार्म शर्माजी भर सकें तो उन की अतिरिक्त आय के साथसाथ व्यस्त रहने का बहाना भी मिल जाएगा. आज कई ऐसे महत्त्वपूर्ण काम हैं जो इन फार्मों पर ही टिके होते हैं. नए कनेक्शन, बैंकों से लोन, नए खाते खुलवाना, प्रार्थनापत्र, टेलीफोन और मोबाइल आदि के प्रार्थनापत्र यदि पूरे और प्रभावशाली ढंग से लिखे हों तो कई काम बन सकते हैं. मुझे खामोश और चिंतामग्न देख कर वह बोले, ‘‘अच्छा, आप परेशान मत होइए…मैं अपने एक कलीग मदन नागपाल को फोन कर देता हूं. आप का काम हो जाएगा. अब तो आप खुश हैं न.’’

मैं ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए कहा, ‘‘मैं सोच रहा था कि यदि आप फार्म भरने का काम कर सकें तो…’’ इतना कह कर मैं ने अपने मन की बात उन्हें समझाई. सपनाजी भी पास बैठी हुई थीं. वह उछल कर बोलीं, ‘‘यह तो काफी ठीक रहेगा. इन का दिल भी लगा रहेगा और अतिरिक्त आय के स्रोत भी.’’

इतना सुनना था कि शर्माजी अपनी पत्नी पर फट पडे़, ‘‘तो क्या मैं इन कामों के लिए ही रह गया हूं. एक अपाहिज व्यक्ति से तुम लोग यह काम कराओगे.’’ मैं एकदम सहम गया. पता नहीं कब कौन सी बात शर्माजी को चुभ जाए.

‘‘आप अपनेआप को अपाहिज क्यों समझ रहे हैं. ये ठीक ही तो कह रहे हैं. आप ही तो कहते थे कि घर बैठा परेशान हो जाता हूं. जब आप स्वयं को व्यस्त रखेंगे तो सबकुछ ठीक हो जाएगा,’’ फिर मेरी तरफ देखते हुए सपनाजी बोलीं, ‘‘आप इन के लिए काम ढूंढि़ए. एक पढ़ेलिखे राजपत्रित अधिकारी के विचारों में और कलम में दम तो होता ही है.’’

सपनाजी जैसे ही खामोश हुईं, मैं वहां से उठ गया. मैं तो वहां से उठने का बहाना ढूंढ़ ही रहा था. वह मुझे गेट तक छोड़ने आईं.

हमारे बडे़ साहब के परिवार के पासपोर्ट बन कर आ गए. वह मेरे इस काम से बहुत खुश हुए. उन के बच्चों की छुट्टियां नजदीक आ रही थीं. उन्होंने मुझे वह पासपोर्ट दे कर वीजा लगवाने के लिए कहा. मैं इस बारे में सिर्फ इतना जानता था कि वीजा लगवाने के लिए संबंधित दूतावास में व्यक्तिगत रूप से जाना पड़ता है. उन को तो मीटिंग से फुरसत नहीं थी इसलिए अपनी कार दे कर पत्नी और बच्चों को ले जाने को कहा.

अगले दिन सुबह ही मैं उन की पत्नी और उन की 20 साल की बेटी को ले कर जाने लगा. उसी समय मुझे अचानक याद आ गया कि उन की फोटो मैं घर से लाना भूल गया जो कल रात ही मैं ने बनवाई थी. मैं जैसे ही घर पहुंचा तो संगीता ने पूछा, ‘‘आज इतनी जल्दी कैसे आ गए…मुझ पर तरस आ गया क्या?’’

मैं कुछ नहीं बोला और अपनी अलमारी से फोटो निकाल कर चला गया. उत्सुकतावश वह भी मेरे पीछेपीछे बाहर आ गई. मेरे कार में बैठने से पहले ही पूछने लगी, ‘‘कौन हैं और इस समय इन के साथ कहां जा रहे हो? कार कहां से मिल गई?’’

‘‘यह हमारे साहब की पत्नी हैं और पीछे उन की बेटी बैठी है. मैं इन के ही काम से जा रहा हूं.’’

‘‘ऐसा तो मैं ने पहले कभी नहीं सुना कि साहब अपनी खूबसूरत पत्नी और बेटी को कार सहित तुम्हारे साथ भेज दें. कहीं कुछ तो है. शक तो मुझे पहले से ही था. तुम ने सोचा घर पर मैं नहीं होऊंगी तो यहीं रंगरलियां मना ली जाएं और अगर मिल गई तो साहब का बहाना बना देंगे.’’

उन के सामने ऐसी बातें सुन कर मैं बेहद परेशान हो गया और शर्मिंदा भी. मैं ने बहुत कोशिश की कि वह  चुप हो जाए पर उसे तो जैसे लड़ने का नया बहाना मिल गया था. साहब की पत्नी भी संगीता को लगातार समझाने का प्रयत्न करती रहीं. मुझे ऐसी बेइज्जती महसूस हुई कि मेरी आंखों में आंसू आ गए. मेरे लिए वहां खड़ा हो पाना अब बेहद मुश्किल हो गया. मैं जैसे ही कार में बैठा तो वह अपनी चिरपरिचित तीखी आवाज में बोली, ‘‘मैं अब इस घर में एक मिनट भी नहीं रहूंगी.’’

शाम को मैं जल्दी घर आ गया और जो होना चाहिए था वही हुआ. संगीता की मां और बहन बैठी मेरा इंतजार कर रही थीं. मैं उन्हें इस समय वहां देख कर चौंक गया पर खामोश रहा. अपने ऊपर लगाए गए आरोपों का विरोध करने की मुझ में हिम्मत नहीं थी क्योंकि मेरे विरोध करने का मतलब उन तीनों की तीखी और आक्रामक आवाज से अपने ही महल्ले में जलील होना.

‘‘मैं अपना हक लेना जानती हूं और कभी यहां वापस नहीं लौटूंगी,’’ कह कर वे तीनों वहां से चली गईं. सारा सामान वे ले गईं. स्त्रीधन और सारा सामान उस के हिस्से आया और मानसिक पीड़ा मेरे हिस्से में. अब मेरे लिए वहां रुकने का कोई प्रयोजन नहीं था. उसी शाम अपनी जरूरत भर की वस्तुओं को ले कर मैं अपने मातापिता के यहां आ गया.

मुझे इस वेदना से उभरने में काफी समय लग गया. इन्हीं दिनों 2-3 बार सपना के फोन आए थे जो मैं ने व्यस्त होने का बहाना बना कर टाल दिए.

अपने को व्यस्त रखने के लिए मैं ने सब से पहला काम शर्माजी का विज्ञापन स्थानीय अखबार में दे दिया. पासपोर्ट से ले कर सभी सुविधाओं का विवरण था. एलआईसी का एजेंट  होने के नाते मुझे दिन में 2 घंटे ही आफिस जाना होता था.

इस विज्ञापन के प्रकाशित होते ही मेरे पास आशाओं से अधिक फोन आने लग गए. मैं बहुत उत्साहित था. लोग अपनी समस्याओं को सुनाते और मैं उस से संबंधित पेपर ले कर शाम को शर्माजी के पास पहुंच जाता. इस प्रकार हफ्ते में 2 बार जा कर अपना काम सौंप कर पुराना काम ले आता.

दिन बीतते गए. मैं जब भी घर पहुंचता, सपनाजी अपनी कई बातें मुझ से कहतीं. अपना कोई न कोई काम मुझे देती रहतीं. शाम को कई बार ऐसा संयोग होता कि वह रास्ते में ही मुझ से मिल जातीं और मेरे साथ ही घर आ जातीं. कभीकभी उन का कोई ऐसा काम फंस जाता जो वह नहीं कर सकतीं तो उसे मुझे ही करना पड़ता था.

एक दिन दोपहर को मुझे किसी जरूरी काम से शर्माजी के घर जाना पड़ा. मैं ने देखा बड़ी तल्लीनता से वह सब कागज फैला कर अपना काम करने में व्यस्त थे. मुझे बड़ी खुशी हुई कि शायद उन की जीवन के प्रति नकारात्मक सोच में बदलाव हो गया. सपनाजी पास ही बैठी उन्हें पैड पकड़ा रही थीं. मेरे वहां पहुंचते ही वह हंस कर बोलीं, ‘‘जानते हो, इन दिनों यह बहुत खुश रहते हैं. मुझे तो पूछते भी नहीं.’’

‘‘तुम ऐसा मौका ही कहां देती हो. बस, सवेरे उठ कर तैयार हो जाती हो और चल देती हो. दोपहर तक स्कूल में फिर शाम को बाहर घूमने चली जाती हो.’’

‘‘यह तो आप भी अच्छी तरह जानते हैं कि कितना काम हो जाता है.’’

‘‘मैं सब जानता हूं कि तुम क्या करती हो.’’

कहतेकहते अपने सारे कागज एक तरफ रख कर मुझे घूरने लगे, जैसे भीतर उठी खीज को दबा लिया हो. वह जिन नजरों से मुझे देख रहे थे, मुझे बड़ी बेचैनी महसूस होने लगी. मैं ने विज्ञापन देने से पहले ही सपनाजी  को पता और फोन नंबर देने के लिए कहा था. सपनाजी भी अपनी जगह ठीक थीं. कहने लगीं कि घर पर आने वाले सभी व्यक्तियों को शर्माजी की हालत के बारे में पता चल जाएगा. घर पर मैं और बेटी ही रहती हैं तो कोई कुछ भी कर सकता है. मैं चुप रहा था.

मैं ने औपचारिकता निभाते हुए नया काम दिया और जाने लगा तो सपनाजी बोलीं, ‘‘कहां तक जा रहे हैं आप?’’

‘‘अब तो आफिस ही जाऊंगा,’’ मैं ने सरलता से कहा.

‘‘क्या आप मुझे सिविल लाइंस तक छोड़ देंगे?’’ उन्होंने पूछा.

मैं इनकार नहीं कर सका. शर्माजी टीवी पर मैच देखने में व्यस्त हो गए.

सपनाजी तैयार हो कर आईं और अपना बैग उठा कर बोलीं, ‘‘मैं ममता के घर जा रही हूं. उस के बेटे का जन्मदिन है. आप का उस तरफ का कोई काम हो तो…’’

‘‘जाओजाओ. तुम्हें तो बस, घूमने का बहाना चाहिए. मैं घर पर पड़ा सड़ता रहूं पर तुम्हें क्या फर्क पड़ता है,’’ कहतेकहते उन की आवाज तेज और मुद्रा आक्रामक हो गई, ‘‘तुम क्या समझती हो. मैं कुछ जानता नहीं हूं. तुम्हें बाहर जाने की छूट क्या दी तुम ने तो इस का नाजायज फायदा उठाना शुरू कर दिया…मुझे तुम्हारा इस तरह गैर मर्दों के साथ जाना एकदम अच्छा नहीं लगता.’’

सपनाजी  एकदम सहम गईं. आंखों में आंसू भर कर चुपचाप भीतर चली गईं. शर्माजी का ऐसा रौद्र रूप मैं ने कभी नहीं देखा था.

अचानक वातावरण में भयानक सन्नाटा पसर गया. मैं पाषाण बना चुपचाप वहीं बैठा रहा. नारी शायद हर संबंधों को सीमाओं में रह कर निभा लेती है पर पुरुष इतना सहज और सरल नहीं होता. शक की दवा तो हकीम लुकमान के पास भी नहीं थी

डर कहीं मेरे भीतर भी बैठ गया था. मौका देख कर मैं ने कहा, ‘‘सर, अब रोजरोज मेरा आना संभव नहीं है. और अब तो आप भी सभी कामों को अच्छी तरह समझ गए हैं. फिर बहुत जल्दी मेरा तबादला भी होने वाला है. आगे से सभी लोगों को मैं आप के पास ही भेज दिया करूंगा,’’ वह मुझे अजीब सी नजरों से देखने लगे पर कहा कुछ नहीं.

वहां से उठतेउठते ही मैं ने कहा, ‘‘साहब, मेरा कहासुना माफ करना. मुझ से जो बन पड़ा, मैं ने किया.’’

मैं दबे पांव वहां से निकल जाना चाहता था. गेट खोल कर जैसे ही स्कूटर स्टार्ट किया, सपनाजी धीरे से दूसरे कमरे से निकल कर मेरे पास आ गईं और बेहद कोमल स्वर में बोलीं, ‘‘आप ने हमारे लिए जो कुछ भी किया है उस का एहसान तो नहीं चुका सकती पर भूलूंगी भी नहीं. शर्माजी की बातों का बुरा मत मानना,’’ कहतेकहते वह अपराधी मुद्रा में तब तक खड़ी रहीं जब तक मैं चला नहीं गया. मैं भारी मन और उदास चेहरे से वहां से चला गया.

सच, अपने हिस्से की पीड़ा तो स्वयं ही भोगनी पड़ती है. झूठे आश्वासनों के अलावा हम कुछ नहीं दे सकते. कोई किसी की पीड़ा को बांट भी नहीं सकता. उस के बाद मैं उस घर में कभी नहीं गया. यह जीवन का एक ऐसा यथार्थ था जिसे मैं नजरअंदाज नहीं कर सकता. यदि इस दुनिया में यही जीने का ढंग और संकीर्ण मानसिकता है तो ऐसे ही सही.

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