बिहार पर पड़ेगा पश्चिम बंगाल चुनाव का असर

भारतीय जनता पार्टी ने पश्चिम बंगाल और असम चुनाव में अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया है. मुसलिम वर्ग वहां असर वाला माना जाता है. वहां रहने वालों में बड़ी तादाद में बिहार के लोग भी शामिल हैं. ऐसे में भाजपा ने 17 साल बाद शाहनवाज हुसैन को प्रमुखता देने का काम किया है. इस के जरीए वह पश्चिम बंगाल और असम के मुसलिमों को बताना चाहती है कि उन की चिंता भी उसे है.

दूसरी तरफ बिहार में नीतीश कुमार पर राष्ट्रीय जनता दल हमलावर है. उन को ‘निर्लज्ज कुमार’ का नाम दे कर 5 साल तक विधासभा के बौयकौट का नारा दिया गया है. कमजोर पड़ते नीतीश कुमार को भाजपा भी बिहार से दूर करना चाहती है. इस के लिए भाजपा की बहुतकुछ रणनीति पश्चिम बंगाल और असम के चुनाव नतीजों पर निर्भर करती है. असम और पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद बिहार में भी राजनीतिक दंगल देखने को मिलेगा.

राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का नया नाम ‘निर्लज्ज कुमार’ रख दिया है. तेजस्वी यादव का कहना है कि बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस विधेयक की चर्चा के दौरान विधानसभा में मौजूद विधायकों को जिस बुरी तरह से मारापीटा गया और उन की बेइज्जती की गई, उसे शब्दों में बताया नहीं जा सकता है.

तेजस्वी यादव ने ये बातें अपने ट्विटर हैडिंल पर बताईं. उन्होंने लिखा, ‘महिला विधायक अनीता देवी नौनिया के पैर में चोट लगी. उन का ब्लाउज पकड़ कर घसीटा गया. उन के साथ बताई न जा सकने वाली बदसुलूकी की गई. जिस समय विधानसभा में यह हो रहा था, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भाजपा के चरणों में बैठ कर आनंद ले रहे थे.’

तेजस्वी यादव ही नहीं, दूसरे कई विधायकों ने भी इस बात की शिकायत की. विधायक सत्येंद्र कुमार ने कहा, ‘एसपी ने मेरी छाती पर पैर रख कर मारा.’

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इस घटना के विरोध में तेजस्वी यादव ने कहा, ‘अगर सीएम नीतीश कुमार ने घटना पर माफी नहीं मांगी तो वे 5 साल तक विधानसभा का बौयकौट करेंगे.’

किसी विरोधी नेता द्वारा 5 साल तक विधानसभा के बौयकौट का यह पहला मामला है. वैसे, पिछले कुछ सालों में विधानसभा में मारपीट की तमाम घटनाएं हुई हैं. उत्तर प्रदेश विधानसभा में भी ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं, पर किसी विपक्षी नेता द्वारा 5 साल तक विधानसभा का बौयकौट पहली बार हो रहा है.

राजद और बिहार सरकार के बीच विधानसभा में मारपीट का मामला नाक का सवाल बन गया है. राजद के नेता तेजस्वी यादव ही नहीं, बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव भी इस घटना को ले कर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर हमला बोलते हुए अपने ट्विटर पर लिखते हैं, ‘लोहिया जयंती के दिन कुकर्मी आदमी कुकर्म नहीं करेगा तो कुकर्मी कैसे कहलाएगा?’

लालू प्रसाद यादव अपने ट्विटर पर आगे लिखते है, ‘जब पुलिस विधानसभा में घुस कर विधायकों को मार सकती है, तो सोचिए जब उन के घर पर जाएगी तो क्या करेगी.’

पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने भी अपने ट्विटर पर लिखा, ‘तुम ने आज जो चिनगारी भड़काई है, वह कल तुम्हारे काले सुशासन को जला कर राख कर देगी.’

इस घटना को ले कर तमाम ऐसे वीडियो भी सोशल मीडिया पर दिखे, जिन में पुलिस महिला विधायक को घसीट कर ले जा रही थी. सरकार की तरफ से दावा किया गया कि राजद के विधायक विधानसभा अध्यक्ष को विधानसभा में आने से रोक रहे थे. विधायकों के हमले से उन्हें बचाने के लिए यह किया गया.

तेजस्वी यादव और लालू परिवार के विरोध पर बिहार के मुख्यमंत्री ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है. नीतीश कुमार की खामोशी की वजह यह है कि वे इस घटना को तूल नहीं देना चाहते हैं, जबकि तेजस्वी यादव इस बात को मुद्दा बनाना चाहते हैं. आने वाले दिनों में यह मुद्दा बिहार में राजनीति का नया अखाड़ा बनेगा.

क्या है बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस विधेयक 2021

बिहार विधानसभा में मारपीट की घटना का कारण राजद के विधायकों द्वारा बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस विधेयक 2021 का विरोध किया जाना था. राजद और बाकी विपक्ष जैसे कांग्रेस और वाम दलों का कहना है कि नीतीश सरकार इस विधेयक की आड़ में पुलिस को विशेष अधिकार दे रही है, जिस के बाद पुलिस बिना किसी वारंट के किसी को भी गिरफ्तार कर सकती है. विधायक इस बात का विरोध कर रहे थे, जिस की वजह से विधानसभा में पुलिस बुलानी पड़ी और मारपीट की यह घटना घट गई, जिसे बिहार की राजनीति में एक काला अध्याय माना जा रहा है. यह केवल काला अध्याय ही नहीं है, विपक्षी दलों को एकजुट करने का जरीया भी बन गया है.

बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस विधेयक 2021 को ले कर राजद, कांग्रेस और वाम दल नीतीश सरकार पर हमलावर हैं. नीतीश कुमार की सहयोगी भारतीय जनता पार्टी भी अलग से पूरे प्रकरण को देख रही है. उस के लिए भी यह अवसर की तरह से है. जैसेजैसे विपक्षियों द्वारा नीतीश कुमार पर हमले होंगे, उन की पकड़ बिहार से कम होगी. इस से भाजपा को नीतीश कुमार को हाशिए पर धकेलना आसान होता जाएगा.

पश्चिम बंगाल चुनाव नतीजे के बाद बिहार की राजनीति में नए गुल खिलने के आसार प्रबल होते जा रहे हैं. बिहार में भाजपा अपनी पकड़ मजबूत करने की फिराक में है, जिस से नीतीश कुमार की ताकत को कम किया जा सके. भाजपा बिहार में नीतीश कुमार को इस कदर मजबूर करना चाह रही है कि वे भाजपा की हर बात मान लें. वे अपने मन से मुख्यमंत्री की कुरसी से हट जाएं, जिस से भाजपा वहां अपना आदमी बैठा सके.

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शाहनवाज बन सकते हैं भाजपा का नया चेहरा

बिहार की राजनीति में शाहनवाज हुसैन को ले कर अटकलों का दौर चल रहा है. राजनीतिक जानकार मानते हैं कि शाहनवाज हुसैन बिहार में भाजपा का नया चेहरा होंगे. इन के जरीए वह मुसलिम वर्ग में अपनी पैठ बनाने का काम करेगी.

मुसलिम वर्ग बिहार में यादव समाज के साथ मिल कर भाजपा को विस्तार नहीं करने दे रहा है. राजद को कमजोर करने के लिए भी जरूरी है कि मुसलिम वर्ग को उस से अलग किया जाए. शाहनवाज हुसैन ऐसे नेता हैं जिन से यह काम हो सकता है.

साल 2001 में 32 साल की उम्र में केंद्र की अटल सरकार में शाहनवाज हुसैन को उड्डयन मंत्री बनाया गया था और साल 2003 में उन को कपड़ा मंत्री बना दिया गया था. तब वे भाजपा के ‘पोस्टर बौय’ कहे जाते थे.

शाहनवाज हुसैन की इमेज कट्टर मुसलिम की नहीं है. उन का प्रेम विवाह रेनू नामक लड़की से हुआ था, जो उन के साथ पढ़ती थी. साल 2004 में जब वे किशनगंज सीट से अपना चुनाव हार गए तो भाजपा की राजनीति में हाशिए पर चले गए. साल 2009 में वे सांसद बने, पर भाजपा में उन के महत्व को कम कर दिया गया.

तकरीबन 17 साल के बाद शाहनवाज हुसैन को केंद्र की राजनीति से बिहार भेजा गया. यहां नीतीश सरकार में उन्हें मंत्री बनाया गया.

भाजपा की मुख्यधारा में शाहनवाज हुसैन की वापसी को नए अर्थों में देखा जा रहा है. बिहार में शाहनवाज हुसैन को मंत्री बनाने के लिए विधानपरिषद का सदस्य बनाया गया. इस के बाद वे उद्योग मंत्री बनाए गए. उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया गया.

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शाहनवाज हुसैन के बहाने भाजपा मुसलिमों को यह संदेश देने का काम कर रही है कि वह उन की चिंता करती है. दिल्ली में मोदीशाह की जोड़ी बनने के बाद शाहनवाज हुसैन को पहली बार महत्व दिया जा रहा है. शाहनवाज हुसैन के बारे में एक आकलन यह भी लगाया जा रहा है कि केंद्र में उन की उपयोगिता दिख नहीं रही थी, जिस कारण उन्हें बिहार भेजा गया है.

भाजपा उन के नाम पर कोई बड़ा दांव नहीं लगाएगी. भाजपा की रणनीति पश्चिम बंगाल चुनाव के नतीजों पर टिकी है. ये नतीजे बिहार में भी उथलपुथल मचा सकते हैं. इस में शाहनवाज हुसैन की भूमिका भी चर्चा में है. नीतीश कुमार का राजद द्वारा किया जा रहा विरोध भी महत्वपूर्ण हो जाता है, जिस की आड़ में भाजपा नीतीश कुमार पर दबाव बढ़ाने का काम करेगी.

नक्सल बनाम भूपेश बघेल: “छाया युद्ध” जारी आहे

हाल ही में बीजापुर में 24 जवानों की नृशंस हत्या ने छत्तीसगढ़ सहित देश को झकझोर दिया है. ऊपर से “एक जवान” को अगवा करने के बाद “सरकार को नरम”  करने में भी नक्सली  सफल हो गए हैं. अब केंद्र सरकार भी पहले से ज्यादा छत्तीसगढ़ के नक्सलवाद पर अपनी पैनी नजर रख रही है.  केंद्रीय गृह मंत्री एवं अमित शाह के छत्तीसगढ़ दौरे और अगुआ जवान की रिहाई में ली गई  रूचि से यह  साफ है.

छत्तीसगढ़ सरकार और नक्सलियों के घात प्रतिघात पर  अगर दृष्टि डालें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि वर्तमान में नक्सली लगातार हमलावर हुए चले जा रहे हैं. वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस की  भूपेश बघेल सरकार पीछे हटने को तैयार नहीं. ऐसी परिस्थितियों में अखिर लाख टके का सवाल यह है कि नक्सलवाद छत्तीसगढ़ से कब और कैसे  खत्म होगा.

पिछले सप्ताह नक्सलियों के घटनाक्रम का जो ड्रामेटिक घटनाक्रम चला. उसे संपूर्ण देश ने देखा है. जो नई परिस्थितियां  आई है उनके अनुसार-

बीजापुर में नक्सली हमले के बाद अगवा किए गए “कोबरा कमाण्डो” राकेश्वर सिंह को 8 अप्रेल को देर शाम  नक्सलियों ने छोड़ दिया . मगर यह अभी साफ नहीं हुआ  कि जवान को छोड़ने के बदले नक्सलियों ने क्या शर्ते रखी? और क्या क्या समझौता हुआ है.

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बीजापुर हमले 24 जवानों की शहादत के बाद जो  घटनाक्रम हुआ .उसमें दो स्थानीय पत्रकारों को एक  कॉल आई थी. कॉल में कहा गया था कि सीआरपीएफ जवान उनके कब्जे में है. महत्वपूर्ण यह है कि पत्रकारों के दावों का तब बीजापुर  पुलिस अधीक्षक ने खंडन कर दिया था.

बात धीरे-धीरे उजागर हुई तथ्य सामने आया कि नक्सलियों ने राकेश्वर की फोटो जारी करके साबित कर दिया कि कोबरा जवान उन्हीं की गिरफ्त में है. नक्सलियों ने फोटो जारी करने के साथ माँग की, कि सरकार बातचीत के लिए मध्यस्थ की नियुक्ति करे.इसके बाद राकेश्वर को छोड़  जाएगा. अखिर सरकार अगवा जवान को 6 दिन तक छुड़ाने के लिए गंभीर क्यों नहीं थी…?

किस तरह अगवा जवान की पत्नी और परिजनों ने जम्मू में सड़क पर हंगामा किया,  केंद्र सरकार से सवाल पूछे, छत्तीसगढ़ सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया. यह सब घटनाक्रम बताता है कि छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद और सरकार अब आमने-सामने हैं. बस्तर में एक छाया युद्ध चल रहा है

सोनी सोरी और पत्रकार!

कमांडो जवान राकेश्वर की रिहाई और सरकार से बातचीत के लिए स्थानीय पत्रकार सामने आए और साथ ही बस्तर में नक्सलियों के समर्थक माने जाने वाली सोनी सोरी ने प्रयास शुरू किया. लेकिन उन्हें नक्सलियों ने  खाली हाथ लौटा दिया. वहीं घटना के बाद से कोबरा बटालियन का जवान राकेश्वर लापता था… समय बीता चला जा रहा था.

यही नहीं नक्सलियों से वार्ता करने के लिए कुछ सामाजिक कार्यकर्ता सामने आए. इनमें पद्मश्री धरमपाल सैनी, गोंडवाना समन्वय समिति के अध्यक्ष तेलम बोरैया के साथ कुछ और लोग शामिल थे. चर्चा है कि इनसे बातचीत के बाद ही जवान को छोड़ा गया है.मगर छत्तीसगढ़ सरकार ने अभी तक अधिकृत रूप से  इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं की है. यह भी सार्वजनिक नहीं है कि जवान को छोड़ने के बदले नक्सलियों ने कोई शर्त रखी है या नहीं. मगर यह माना जा रहा है कि नक्सली कुछ महत्वपूर्ण मांगों को सामने रख चुके हैं अगर सरकार उन्हें मान लेती है तो आने वाले समय में छत्तीसगढ़ से नक्सलवाद निर्मूल हो जाएगा.

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कैसे खत्म होगा नक्सलवाद?

छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल सरकार केंद्र सरकार की सहायता से नक्सलवाद को खत्म करना चाहती है यह तथ्य आज सामने है. यही कारण है कि अप्रैल के प्रारंभिक दिनों में दो हजार जवानों की  बटालियन नक्सलियों को खत्म करने आगे बढ़ी थी मगर नक्सलियों ने उन्हें घेरकर ऐसा हमला किया कि 24 जवान शहीद हो गए. घटना के बाद  जवान जो वहां उपस्थित थे पीछे हट गए. भूपेश बघेल सरकार के सत्ता काल का यह एक ऐसा समय है जब नक्सली खतरनाक ढंग से हमलावर हुए हैं. नक्सलियों ने हमेशा की तरह सरकार को बैकफुट  पर लाने के लिए एक जवान का अगवा भी कर लिया. संपूर्ण घटनाक्रम के पश्चात जहां मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने जवान की रिहाई पर प्रसन्नता व्यक्त की वहीं पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह ने तंज कसा है कि 6 दिन तक जवान को अगवा रखा गया और सरकार सोती रही.

नक्सलियों द्वारा घात प्रतिघात हमला और अगवा करने का खेल बहुत पुराना है कभी किसी मंत्री के रिश्तेदारों को और कभी जिलाधीश एलेक्स पॉल मेनन का अगवा किया जाना इसमें शामिल है. छत्तीसगढ़ में नक्सलियों का चल रहा यह जेहाद… छाया युद्ध कब खत्म होगा, एक बड़ा सवाल है.

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जातजमात की बैठकें- नेता बनने की जोर आजमाइश

लेखक- धीरज कुमार

बिहार सरकार ने घोषणा कर दी है कि साल 2021 के अप्रैल महीने में पंचायत चुनाव होंगे. हालांकि अभी तारीख तय नहीं की गई है, लेकिन ऐसी उम्मीद जताई जा रही है कि अप्रैलमई तक चुनाव करा लिए जाएंगे.

पंचायत चुनाव का बिगुल बजते ही गांवगांव में चुनाव की सरगर्मी तेज होने लगी है. लोग अपनेअपने कुनबे में चर्चा करने लगे हैं. साथ ही, कहींकहीं तो लोग जातीय बैठकें, सम्मेलन करना भी शुरू कर चुके हैं.

चुनाव आयोग ने घोषणा कर रखी है कि बिहार में पंचायत चुनाव ईवीएम मशीन से ही होंगे. सरकार ने इलैक्ट्रौनिक वोटिंग मशीन खरीदने के लिए 122 करोड़ रुपए मंजूर किए हैं. ऐसा लग रहा था कि ईवीएम खरीद से संबंधित मामला कोर्ट में जाने के चलते इस बार भी सरकार बैलेट पेपर पर ही चुनाव कराएगी, लेकिन सरकार ने 90,000 इलैक्ट्रौनिक वोटिंग मशीन खरीदने का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया है.

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बिहार में पंचायती राज व्यवस्था में तकरीबन 6 पदों के लिए चुनाव किए जाने हैं. इन में जिला परिषद अध्यक्ष, पंचायत समिति प्रमुख, मुखिया, वार्ड सदस्य, पंच, सरपंच आदि पद शामिल हैं. इन जीते हुए प्रतिनिधियों में से जिला परिषद उपाध्यक्ष, उपमुखिया, पंचायत समिति उपप्रमुख आदि का चयन चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा किया जाता है.

राज्य चुनाव आयोग के मुताबिक, इस बार पंचायत चुनाव में लगभग 10 लाख लोग अपना हाथ आजमाएंगे. इन में तकरीबन 5 लाख लोग नए उम्मीदवार खड़े होने की उम्मीद है.

बिहार की 8,387 ग्राम पंचायतों में चुनाव किए जाने हैं, इसलिए पूरे राज्य में तकरीबन 8,387 पद पर मुखिया, पंच, सरपंच वगैरह उम्मीदवारों का चयन किया जाएगा.

तकरीबन 1,14,667 वार्ड सदस्यों का चयन किया जाएगा. पंचायत समिति सदस्यों के 11,491 पदों पर चुनाव किए जाएंगे, जबकि जिला परिषद सदस्यों के 1,161 पद के लिए चुनाव किए जाने हैं.

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बिहार में अभी पंचायत चुनाव में दूसरे राज्यों की तरह राजनीतिक पार्टियां अपने उम्मीदवार खड़े नहीं करती हैं. अभी तक चुनाव में खड़े होने वाले उम्मीदवार दलरहित और पार्टीरहित ही होते हैं.

वैसे देखा जाए तो काम तो कार्यरत सरकार के अधीन ही करना पड़ता है. कार्यरत सरकार ही उन के लिए योजनाएं वगैरह बनाती है, इसीलिए इस चुनाव में स्थानीयता का असर ज्यादा रहता है.

बिहार सरकार ने पंचायती राज में चुने हुए उम्मीदवारों का वेतन पहले से ही तय कर रखा है, जिस में जिला परिषद प्रमुख को 12,000 रुपए दिए जाते हैं, वहीं जिला परिषद उपाध्यक्ष और पंचायत समिति सदस्य को 10,000 रुपए मिलते हैं. पंचायत समिति उपाध्यक्ष को 5,000 रुपए दिए जाते हैं.

मुखिया, सरपंच, जिला परिषद सदस्यों को 2,500 रुपए मासिक वेतन के रूप में मिलते हैं. उपमुखिया और उपसरपंच को 1,200 रुपए दिए जाते हैं.
पंचायत समिति सदस्य को 1,000 रुपए तय किए गए हैं. वार्ड सदस्य और पंच को 500-500 रुपए हर महीने दिए जाते हैं.

बिहार के रोहतास जिले के डेहरी ब्लौक की पहलेजा पंचायत के वर्तमान मुखिया प्रमोद कुमार सिंह का कहना है, ‘‘सरकार ने भले ही पंचायत प्रतिनिधियों का वेतन तय कर दिया है, लेकिन वह उन्हें समय से वेतन नहीं देती है. अभी भी मुखिया और वार्ड का पैसा तकरीबन डेढ़ साल से बकाया है.

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‘‘दरअसल, मुखिया को जो अनुदान अपने क्षेत्र में काम कराने के लिए मिलता है, उस का 80 फीसदी वार्ड सदस्यों के खाते में ट्रांसफर करना होता है यानी पंचायत के 80 फीसदी काम वार्ड सदस्यों द्वारा किए जाते हैं. मुखिया बची हुई 20 फीसदी राशि का उपयोग अपने लैवल से काम कराने के लिए करता है.
‘‘वार्ड सदस्य जो काम करते हैं, उस के लिए मुखिया भी जिम्मेदार होता है. काम गलत होने या भ्रष्टाचार के दोषी पाए जाने पर सरकार वार्ड सदस्य के साथसाथ मुखिया को भी दोषी ठहराती है और मुखिया को भी जेल जाना पड़ सकता है, भले ही उस काम को मुखिया ने नहीं करवाया हो.

‘‘इस तरह देखा जाए तो वार्ड सदस्यों का कार्य विस्तार तो किया गया है, पर मुखिया के अधिकारों को सीमित करने का काम किया गया है.’’ हालांकि इस चुनावी मौसम में गली, नुक्कड़, सड़कें, बाजार आदि में चर्चाएं तेज हो गई हैं कि इस बार किस जाति के वोट कितने हैं और इस बार कौनकौन लोग खड़े होने के लिए तैयारी कर रहे हैं. इस बार कौनकौन से नए चेहरे शामिल होने वाले हैं वगैरह.

कुछ लोगों ने तो बैनर, पोस्टर, होर्डिंग लगवाने भी शुरू कर दिए हैं. कुछ तो कई महीने पहले से ही बैनरहोर्डिंग से त्योहारों में शुभकामनाएं देने लगे थे, फिर भले ही वे बैनर में अपना नाम भावी उम्मीदवार के रूप में लिखते थे.

कुछ लोग समाज की कमियां गिना कर खुद को खास साबित करना चाह रहे हैं. अभी कुछ लोग चुपकेचुपके एकदूसरे की जातिकुनबे का भी विश्लेषण कर रहे हैं. इस के साथ ही पुराने उम्मीदवारों के कामकाज की समीक्षा गांवसमाज में होने लगी है.

कुछ लोगों का मानना है कि कुछ उम्मीदवारों ने तो अच्छा काम किया है. इस चुनाव में उन को दोबारा आने का मौका दिया जा सकता है. पर वे लोग
जो 5 साल मिलने के बाद भी अपना काम ठीकठाक नहीं कर पाए, अपने गांवसमाज के लिए अच्छा काम नहीं कर पाए, आम लोगों को बरगलाते रहे और नेता बन कर सरकारी पैसा हड़पते रहे, वैसे लोगों का पत्ता साफ करने के लिए कुछ लोगों में सुगबुगाहट शुरू हो गई है.

रोहतास जिले के डेहरी ब्लौक के अर्जुन महतो सब्जी विक्रेता हैं. उन का कहना है, ‘‘गली, नाली, सड़कें, जल, नल योजना में प्रतिनिधियों द्वारा जो काम किया गया है, उस की क्वालिटी कितनी है और कैसी है, किसी से छिपी नहीं है. आज भी कई गांव ऐसे हैं जहां नल लगे ही नहीं, जबकि कुछ ऐसे भी गांव हैं, जहां नल तो लगे, पर कुछ दिन में ही नल गायब हो गए.

‘‘अभी तक सरकार की घरघर स्वच्छ जल पहुंचाने की योजना अधूरी ही रह गई है. कहींकहीं जलनल योजना हाथी के दांत की तरह दिखावे की चीज बन गई है.’’
सरकार ने घोषणा कर रखी है कि जिन के पास चरित्र प्रमाणपत्र रहेगा, वही चुनाव में उम्मीदवार बनेंगे, इसलिए जिस तरह से एसपी दफ्तर में चरित्र प्रमाणपत्र बनवाने की भीड़ उमड़ रही है, लोगों ने कयास लगाना शुरू कर दिया है कि इस बार पंचायत चुनाव में नए लोगों की ऐंट्री काफी होगी. पुराने लोग तो जोरआजमाइश करेंगे ही, नए लोगों ने भी अपनी घुसपैठ के लिए कोशिश जारी कर दी है.

कल तक पंचायत चुनाव में ऊंचे तबके के लोगों का बोलबाला ज्यादा रहता था. निचले तबके के लोग चुनाव में खड़े होने की हिम्मत नहीं कर पाते थे. लेकिन सरकार ने पिछले चुनाव में खड़े होने के लिए पिछड़ी जाति के 26 फीसदी और एसटीएससी के 16 फीसदी लोगों के लिए आरक्षण लागू किया था.

इस बार भी पुरानी आरक्षण व्यवस्था पर ही चुनाव होंगे, इसलिए सामान्य जातियों के साथसाथ पिछड़ी जाति और एसटीएससी के लोग चुनाव में खड़े होने लगे हैं.

इस के साथ ही बिहार सरकार ने पंचायत चुनाव में महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण तय किया है, जिस के चलते महिलाओं की भागीदारी भी बढ़ी है. लेकिन आज भी महिलाएं नाममात्र की उम्मीदवार होती हैं. उन की आड़ में उन के पति या बेटे ही काम करते हैं.

उम्मीदवारों का अपनी जातजमात में आनाजाना, उठनाबैठना, बढ़चढ़ कर बातें करना शुरू हो गया है. उन्होंने अपने क्षेत्र में घूमनाफिरना शुरू कर दिया है. लोगों के घर शादीब्याह, जलसे वगैरह में जाना शुरू कर दिया है. लोगों में अपनी बात रखनी शुरू कर दी है, ताकि आने वाले चुनाव में उन्हें नेता बनने का मौका मिल सके.

औरंगाबाद के बारुण के रहने वाले 75 साल के रामबालक सिंह मुसकराते हुए कहते हैं, ‘‘चुनाव आते ही उम्मीदवार बड़ेबुजुर्गों को दंडवत प्रणाम करना शुरू कर देते हैं. वे अपनी जातजमात में बैठकें कर आने वाले चुनाव में उम्मीदवार बनने की सहमति और समर्थन हासिल करना चाहते हैं. चूंकि यह लोकल चुनाव होता है, इसलिए लोकल लैवल पर जातजमात के वोट और उन का साथ मिलना जीत की उम्मीद को बढ़ा देता है.’’

निचले तबके से ताल्लुक रखने वाले 65 साल के मोहन प्रसाद रोहतास जिले के डेहरी औन सोन में रहते हैं. एक समय था, जब उन्होंने अपने गांव में मुखिया उम्मीदवार के रूप में खड़ा होने की कोशिश की थी.

उन का कहना है, ‘‘एक समय था, जब बिहार में निचले तबके के लोग कभी उम्मीदवार के रूप में खड़ा होने से डरते थे, लेकिन बिहार में लालू प्रसाद यादव के मुख्यमंत्री रहने के दौरान पिछड़ी जाति और निचले तबके के लोगों में आत्मविश्वास जगा और वे राजनीति में शिरकत करने लगे. आज इस बात को नीतीश कुमार भी स्वीकार करते हैं, तभी उन्होंने बिहार में आरक्षण भी लागू किया.

‘‘आज भी पिछड़ी जाति और निचले तबके में शिक्षा की कमी है, इसलिए वे अपने हक से अनजान हैं. आज भी इस तबके में जागरूकता की कमी है, जिस के कारण वे राजनीति से अपनेआप को दूर रखते हैं, जबकि ऊंची जाति के लोग आज भी हर क्षेत्र में आगे हैं.

‘‘दूसरी बात यह कि निचले तबके में गरीबी इतनी है कि वे राजनीति के बारे में सोच ही नहीं पाते हैं. गरीब बेचारा गरीबी से त्रस्त और रोटी के लिए दिनरात परेशान रहता है, तो भला वह राजनीति कहां से करेगा.’’

सब से बड़ी बात यह है कि चुनाव में वही लोग खड़ा होने की कोशिश कर रहे हैं, जो समाज के दबंग हैं, ऊंची जाति के लोग हैं, अपराधी सोच के हैं. समाज के पढ़ेलिखे और सम झदार लोग अपनेआप को राजनीति से दूर रख रहे हैं. यही वजह है कि समाज में बदलाव नहीं हो पा रहा है.

आज भी भ्रष्टाचार व अपराध हद पर है, इसलिए जरूरी है कि जो लोग समाज को नई दिशा दे सकते हैं, समाज में बदलाव ला सकते हैं, वैसे लोगों को राजनीति में जरूर शिरकत करनी चाहिए, तभी समाज की तसवीर बदल सकती है, वरना सिर्फ जातपांत की राजनीति की बात करने से कोई फायदा नहीं.

समाज को विकसित करने के लिए इस से ऊपर उठ कर विकास की बात करनी होगी, तभी समाज का भला होगा.

आंदोलन कारोबारी की रीढ़ है किसान

लेखक- रोहित और शाहनवाज

पंजाब राज्य के होशियारपुर नगरनिगम क्षेत्र में घोषित हुए रिजल्ट कई सवालों के साथ उभरे हैं. इस शहर में नगरनिगम की कुल 50 सीटें हैं और उन में से 41 सीटें कांग्रेस के हिस्से जाना इसीलिए भी हैरान करता है, क्योंकि इस इलाके में मिडिल क्लास कारोबारी तबका, जो पहले भारतीय जनता पार्टी के साथ था, ने पाला बदला है.

कांग्रेस की टिकट से जीते वार्ड नंबर 40 के पार्षद अनमोल जैन का औफिस सराजा चौक पर बना था. इस के आसपास कोतवाली बाजार, सर्राफा बाजार, कपड़ा बाजार, शीशमहल बाजार थे. इन बाजारों की दुकानों के बाहर कांग्रेस और भाजपा के  झंडे साफ देखे जा सकते थे यानी होशियारपुर में जिस इलाके को दोनों पार्टियां अपने कंट्रोल में रखना चाह रही थीं, वह यही कारोबारी का इलाका था.

दिलचस्प यह था कि इन बाजारों के ज्यादातर दुकानदार जैन समुदाय से थे और यह समुदाय नगरनिगम के पिछले चुनावों में लगातार भाजपा को अपना मत देता आ रहा था.

ऐसे ही एक कपड़ा कारोबारी मानिक जैन ने वहां के कारोबारियों के कांग्रेस की तरफ शिफ्ट होने की वजह बताई. उन का मानना था कि पंजाब के लोकल कारोबारियों की रीढ़ किसान समाज ही है, जो उन्हें मजबूत करता है.

मानिक जैन कहते हैं, ‘इस बार यहां के कारोबारी साइलैंट वोटर थे, जो भाजपा के समर्थक भी थे. उन्होंने सामने से उम्मीदवार को ‘हां’ तो कह दिया, लेकिन बैकडोर से कांग्रेस को ही वोट दिया.’

मानिक जैन ने आगे बताया, ‘हमारी यह मार्केट 2 वजह से चलती है, एक एनआरआई और दूसरा किसान. एनआरआई अब यहां आ नहीं रहे हैं और किसान फिलहाल यहां हैं नहीं. हम कारोबारियों का मूल जुड़ाव किसानों के साथ है.

‘होशियारपुर शहर के बाहरी इलाके खेती कर रहे किसानों के ही हैं और यहां का कारोबारी यह बात नहीं भूल सकता कि यही किसान हमारे मूल ग्राहक भी हैं. इस समय कृषि कानूनों की वजह से किसान शहरों की तरफ खरीदारी करने कम आ रहे हैं, जिस के चलते होशियारपुर का बाजार मंदा पड़ा हुआ है.

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‘किसान निराशा में डूबे हैं. उन के शादीब्याह और किसी दूसरी तरह के फंक्शन में होने वाले खर्चे बंद हो गए हैं. इस से जो दुकान पहले 60 फीसदी चलती थी, वह अब 30-35 फीसदी पर आ गई है.

‘हमारे लिए ग्राहक ही सबकुछ हैं. अगर वे इस समय तकलीफ में हैं, तो  उन का समर्थन करना हमारा भी फर्ज बनता है.’

मानिक जैन दबी जबान से कहते हैं कि वे खुद भाजपा के कट्टर समर्थक हैं. उन्होंने अपनी दुकान के बाहर भाजपा का  झंडा दिखाते हुए हमें इस का इशारा किया. लेकिन जिस तरह की आर्थिक नीतियां भाजपा बना रही है, उस से उन का नुकसान हो रहा है.

जब एक और कारोबारी अमित जैन से पूछा गया कि क्या सिर्फ कृषि कानून के चलते ही उन्होंने भाजपा से दूरी बनाई है, तो वे जवाब देते हुए बोले, ‘बात सिर्फ कृषि की नहीं है. भाजपा मुद्दों को ले कर बात नहीं कर रही है. भाजपा ने वोट सिर्फ अपने नाम पर मांगे, काम पर नहीं. वे लोग ‘मोदीजीमोदीजी’ करते रहे. मोदीजी क्या यहां नगरनिगम के पार्षद बनेंगे? अभी इस समय महंगाई का हाल देख लो. पैट्रोलडीजल के दाम ऐसे बढ़ रहे हैं कि हमारा गाड़ी से चलना मुश्किल हो रहा है.

‘भाजपा तो बस अब ‘पिछली सरकार, पिछली सरकार’ की रट लगा कर घूमती है. अरे भई, जब शासन तुम्हारे हाथ में है तो तुम अपना बताओ न. महंगाई के लिहाज से देखा जाए तो पिछली सरकार तो इस से बेहतर थी. कम से कम इतनी महंगाई तो नहीं थी.’

कुछ कारोबारियों का कहना था कि सरकार के खिलाफ जो भी बोल रहा है, सरकार उसे देश के खिलाफ बता रही है. यही हाल आजकल किसानों के साथ हो रहा है.

कपड़े की दुकान चला रहे अंकित जैन ने बताया, ‘पहले से बढ़ती महंगाई में अब कपड़े पर भी 10 फीसदी रेट बढ़ा दिया गया है. ऐसे में ग्राहक कम आते हैं और महंगा सामान खरीदने से बचते हैं, जिस से दुकानदारी पर भारी असर पड़ रहा है. यहां भाजपा का गढ़ था, लेकिन लौकडाउन के समय जब लोगों को राशन पहुंचाने की बात थी तो भाजपा के लोग अपने लोगों को ही राशन बांटने में बिजी थे और आम लोगों को राशन नहीं मिल पा रहा था.’

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अंकित जैन ने अकाली दल के हारने की वजह बताते हुए कहा, ‘यहां अकाली दल वैसे भी खास मजबूत नहीं था. वह ज्यादातर गांवदेहात के इलाकों में मजबूत था, लेकिन रही बात अकाली दल की एक भी सीट न आने की तो गेहूं के साथ घुन पिसता ही है और अकाली दल  सिर्फ भाजपा के साथ होने का किया भोग रहा है.’

पार्षद अनमोल जैन ने मीडिया वालों के सवालों का कोई खास जवाब नहीं दिया और कहा, ‘अभी मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह से यह हिदायत मिली है कि जब तक शपथ नहीं ले लेते, तब  तक मीडिया में किसी तरह की कोई बात  न रखें.’

अनमोल जैन फिलहाल वहीं सर्राफा बाजार में एक गहनों की दुकान के मालिक हैं और इस बदले समीकरण के लिए किसान आंदोलन के असर को खास वजह मानते हैं. उन की सोच है कि कृषि कानूनों के चलते किसान अब शादी जैसे फंक्शन में दुकानों से खुल कर सामान लेने से कतरा रहे हैं, जिस का असर कारोबारियों पर बहुत बुरा पड़ रहा है.

महंगाई मार गई

गरीब को तो लगातार बढ़ती महंगाई मार रही है. जालंधर शहर में चाय की टपरी चलाने वाले 52 साल के मोहन बिहार से हैं. वे पिछले 22 सालों से अपने परिवार के साथ जालंधर शहर की मिट्ठू बस्ती में रहते हैं, जो एक स्लम एरिया है. इस आंदोलन से उन के चाय वगैरह के धंधे पर  बुरा असर पड़ा है.

मोहन ने दुखी मन से कहा, ‘किसान आंदोलन के चलते हमारा धंधा बुरी तरह से पिट रहा है. आजकल शहरों में भीड़ ज्यादा नहीं हो रही है. गांवदेहात के लोग शहरों में बहुत कम आ रहे हैं. मैं रोडवेज बसों में चने बेचने का काम भी करता हूं, लेकिन आजकल कमाई बिलकुल भी नहीं हो रही है.

‘मैं रोज चना, प्याज, टमाटर, मसाला, नीबू चाट बनाने का सामान खरीदता हूं. लेकिन, इस हिसाब से कमाई बिलकुल भी नहीं हो रही है. मेरा तकरीबन 700-800 रुपए का सामान ही बिक पाता है, जिस में से 150 रुपए तो ठेकेदार को देने ही पड़ते हैं, चाहे सामान बेचो या न बेचो, सिर्फ 250-300 रुपए की कमाई हो पाती है.

‘इस बार की केंद्र सरकार सब से खराब है. हर समय महंगाई रहती है.  अब देखो प्याज की कीमत आजकल  50 रुपए प्रति किलो चल रही है.

‘मैं अपने परिवार के साथ किराए पर रहता हूं. मिट्ठू बस्ती  झुग्गी इलाका है. वहां भी किराया 3-4 हजार रुपए हर महीने है. हम गरीब लोग तो बढ़ती महंगाई में मारे जाते हैं.’

‘जिस ठेकेदार के नीचे मैं काम करता हूं, वह अब 11-12 साल के बच्चों को नेपाल से काम करने के लिए यहां उठा लाया है. वह बच्चे भी हमारी तरह चलती बस में सामान बेचने के लिए चढ़तेउतरते हैं. कोई मास्क बेचता है, कोई पानी की बोतल, तो कोई मूंगफली और समोसा. वे बच्चे चरसगांजा पीते हैं. यह उन के लिए बहुत खतरनाक बात है.’

गरीबों को ही खत्म करेंगे

पंजाब में हाल ही में हुए निकाय चुनावों में भारतीय जनता पार्टी के लिए गुस्सा साफतौर पर देखा जा सकता है.

मोगा में 63 साल के ओम प्रकाश और उन के 30 साल के बेटे धनपत राय की मिट्टी के बरतनों  की दुकान है. यह दुकान मोगा के मेन मार्केट रोड पर आते हुए वार्ड नंबर 20-21 में पड़ती है, जो मेन रोड से काफी अंदर की तरफ है.

ओम प्रकाश ने इस गली की खासीयत के तौर पर बताया कि इस गली की शुरुआत में फिल्म कलाकार सोनू सूद का घर है.

वैसे तो ओम प्रकाश और उन का परिवार उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं, लेकिन लंबे समय से वे मोगा में ही रहते हैं और अब पंजाब के स्थानीय निवासी हो चुके हैं. उन की दुकान पर मिट्टी से बने बरतन, चूल्हा, घड़े और सजावट का दूसरा सामान बिकता है.

जब ओम प्रकाश के बेटे धनपत राय से पूछा गया कि यहां पर भाजपा का इतना बुरा हाल क्यों हुआ है, तो उन्होंने बताया, ‘यह तो नगरनिगम के चुनाव थे. यहां जो उम्मीदवार खड़े होते हैं, वे इन्हीं गलीमहल्लों के होते हैं. निगम के चुनाव में लोग पार्टी चाहे कैसी भी हो, कई बार उम्मीदवार के चालचलन, बातबरताव और उठनेबैठने के चलते ही जिता देते हैं. लेकिन भाजपा का अगर यह हाल हुआ है तो कुछ तो बात रही ही होगी.

‘मसला यह है कि जनता अभी भाजपा के फैसलों से परेशान है. नरेंद्र मोदी जो भी फैसले कर रहे हैं, वे बिना सोचेसम झे कर रहे हैं.

‘जिस इनसान के पास खाने के लिए पैसा नहीं है, वह क्या करेगा? एक दिहाड़ी मजदूर, जो यहां 200-300 रुपए रोजाना कमा रहा था, उस के लिए अब इतना कमाना भी बहुत मुश्किल हो गया है. ऊपर से जो पिछले साल लौकडाउन लगा, उस ने देश की कमर तोड़ दी. मेरे सामने तो एक भी ऐसा मामला नहीं है, जहां केंद्र सरकार ने गरीब को कोई फायदा पहुंचाया हो. यही वजह भी है कि भाजपा से लोग नाराज हैं.’

ओम प्रकाश के 2 बेटे हैं, जिन में से छोटे बेटे धनपत ने ग्रेजुएशन की पढ़ाई और कंप्यूटर में डिप्लोमा किया हुआ है, इस के बावजूद वह बेरोजगार है.

इस बारे में धनपत ने बताया, ‘सरकार ने रोजगार के कोई मौके नहीं पैदा किए हैं. यह बात नहीं है कि योजनाएं नहीं हैं, लेकिन उन योजनाओं का असर जमीन पर होता हुआ दिखाई नहीं देता. बाजार में कुछ कामधंधा ही नहीं होगा, तो मेरे जैसे नौजवान आखिर करेंगे ही क्या?

‘मैं ने डिगरी ले ली, डिप्लोमा भी लिया हुआ है, फिर भी पापा के साथ दुकान पर बैठने को मजबूर हूं. मेरी उम्र 30 साल है और ऐसा नहीं है कि मैं नौकरी नहीं करना चाहता, लेकिन नौकरी मिल ही नहीं रही. जहां बात बनती है, वहां तनख्वाह 5-6 हजार रुपए महीना है. क्या उस से गुजारा हो सकता है?’

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यह बोल कर धनपत कुछ देर लिए शांत हो गए, फिर एकाएक जोश में बोले, ‘चुनाव के समय नरेंद्र मोदी ने कहा था कि हर साल 2 करोड़ नौकरियां देंगे, लेकिन कहां है काम? हम तो अच्छे दिनों का सपना देख रहे थे, लेकिन हमें क्या पता था कि घर बैठने की नौबत आ जाएगी.’

इस बीच धनपत एनएसएसओ की राष्ट्रीय बेरोजगारी की उस रिपोर्ट को याद करने की कोशिश करने लगे, जो साल 2019 में ‘बिजनैस स्टैंडर्ड’ अखबार में छपी थी.

वे कहते हैं, ‘अच्छे दिनों की सरकार से हम ने क्या पाया है, कोई नहीं जानता. सब हवाहवाई चल रहा है. अभी पीछे एक आंकड़ा आया था, जिस में भारत 45 साल की सब से ज्यादा बेरोजगारी  झेल रहा है. इस में कोई दोराय नहीं कि लौकडाउन के बाद यह आंकड़ा और भी बढ़ गया होगा.’

इतने में धनपत के पिता ओम प्रकाश ने अंदर दुकान की ओर जा कर वहां रखे मटकों की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘मार्केट ठप है. हम ने यह दुकान खोली, ताकि जिंदगी पटरी पर आ सके, लेकिन हाल यह है कि सुबह  7 बजे से रात के 10 बजे तक दुकान में बैठने के बावजूद हमारी कमाई 500 रुपए तक की भी नहीं है. कभीकभी तो गल्ला खाली भी देखना पड़ जाता है.’

धनपत ने बताया कि उन की यह दुकान साल 2016 तक परचून की दुकान हुआ करती थी, लेकिन उन्होंने इसे बाद में मिट्टी के बरतन व सामान बेचने वाली दुकान में बदल लिया और अपना जातिगत पेशा करना ही ज्यादा बेहतर सम झा.

ओम प्रकाश ने बताया, ‘महंगाई बहुत है. घर के खर्चे पूरे नहीं हो रहे हैं. पहले यह था कि घर का एक आदमी कमाता था और जैसेतैसे काम चल जाता था. लेकिन अब तो सारे भी कमा लें, फिर भी भुखमरी बनी रहती है.

‘हर चीज महंगी हो रही है. पैट्रोल 100 रुपए पार कर गया है, सिलैंडर का रेट बढ़ गया है, सब्सिडी खत्म हो गई है. आम लोगों के लिए अब कुछ भी सस्ता नहीं रहा है.

‘नरेंद्र मोदी अच्छे दिनों की बात कर रहे थे… देखो, अच्छे दिन आ गए हैं. देश ‘खुशहाल’ बन गया है. मोदी गरीबी खत्म करने के लिए आए थे और अब लग रहा है कि वे चुनचुन कर गरीबों को खत्म कर के ही गरीबी दूर करेंगे.’

‘सड़क से संसद तक लड़ाई लड़ेंगे’: तुलेश्वर सिंह मरकाम

साक्षात्कार/ तुलेश्वर सिंह मरकाम, अध्यक्ष, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी

लगभग बीस वर्षों के राजनीतिक समय काल को देखें तो कहा जा सकता है कि गोंडवाना गणतंत्र पार्टी की चुनाव में उपस्थिति सिर्फ नाम मात्र की रहती है. हालात इतने गंभीर की पार्टी के सुप्रीमो हीरा सिंह मरकाम स्वयं अपनी परंपरागत सीट तानाखार से चुनाव में पराजित होते रहे हैं. ऐसे में दीगर “चेहरों” की स्थिति कितनी दयनीय होगी यह सहज कल्पना की जा सकती है.

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में गोंडवाना पार्टी सिर्फ एक “वोट” काटने वाली पार्टी के रूप में उभर कर खत्म हो जाती है. इसके बावजूद कहा जा सकता है कि छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश में गोंडवाना गणतंत्र पार्टी का आदिवासी हल्के में प्रभाव, राजनीतिक ताकत है. दोनों ही प्रदेश के चुनाव को प्रभावित करने की क्षमता गोंडवाना गणतंत्र पार्टी ने बारंबार दिखाई है यही वजह थी कि विगत विधानसभा चुनाव के दरमियान कांग्रेस प्रमुख रहे राहुल गांधी ने गोंडवाना पार्टी की और साझेदारी का हाथ बढ़ाया था. गोंगपा सुप्रीमो हीरा सिंह मरकाम के निधन के पश्चात पार्टी की कमान तुलेश्वर सिंह मरकाम संभाल रहे हैं.

प्रश्न- हीरा सिंह मरकाम के हाल ही में निधन के बाद पार्टी की कमान आपके हाथों में है, हीरा सिंह का क्या लक्ष्य था और उसे आप आगे कैसे बढ़ा रहे हैं?

उत्तर-हीरा सिंह मरकाम तीन दफा विधायक रहे, उन्होंने आदिवासियों के दुख दर्द को देखकर गोंडवाना गणतंत्र पार्टी की स्थापना की थी. आदिवासियों का जल, जंगल, जमीन लूटा जा रहा था, और लूटा जा रहा है. हमारी पार्टी राजनीतिक सामाजिक चेतना… अपने वोट की कीमत जानने , समझाने का काम कर रही है.

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प्रश्न- छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश के राजनीतिक हालात को आप कैसे देख रहे हैं.

उत्तर- कांग्रेस हो या भाजपा दोनों ही पार्टियां जनहित का काम नहीं कर पा रही है. आदिवासी समाज का शोषण, दमन, उत्पीड़न जारी है. अधिकार नहीं मिल रहा है. हमारी लड़ाई इसी दिशा में है कि आदिवासी समाज को जागृत करके ऐसी स्थितियां निर्माण करें सत्ता की धमक हमारे हिसाब से, समाज के हित में काम करें.

प्रश्न- आदिवासी समाज में खुशहाली कब और कैसे आ सकती है..?

उत्तर- छत्तीसगढ़- मध्य प्रदेश में तमाम खनिज संपदा है. जिसका दोहन सरकारें जनहित के नाम पर करती हैं मगर इसका लाभ हिस्सेदारी आदिवासी समाज को नहीं मिल पा रहा. परिणाम स्वरूप आज भी गरीबी,फटेहाली है, हाल ही में जशपुर में एक गरीब परिवार को भोजन नहीं मिलने पर बच्चे बेहोश हो गए जो सारी दुनिया ने देखा है. यही सच्चाई है छत्तीसगढ़ की… विकास यहां दिखाई नहीं देता हम सड़क से संसद तक लड़ाई लड़ेंगे, अधिकार अपना लेकर रहेंगे.

प्रश्न- छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल सरकार पर आप क्या कहेंगे?

उत्तर- यह तो उधार की सरकार है, निरंतर कर्ज ले रही है और कर्ज ले रही है. खनिज न्यास की जो निधि है उसका इस्तेमाल राजधानी में किया जा रहा है. यह न्याय नहीं है. और हमें इन सरकारों से न्याय की उम्मीद भी दिखाई नहीं देती क्योंकि इनकी प्राथमिकता में आदिवासी समाज नहीं है.

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प्रश्न – तो कुल मिलाकर सरकार कैसे चल रही है और सरकारी अमला क्या सही रास्ते पर चल रहा है.

उत्तर- स्थिति बेहद कष्टप्रद है, दुख होता है भूपेश बघेल प्रशासन को दिशा नहीं दे पा रहे हैं. भ्रष्टाचार अपनी सीमाएं तोड़ रहा है.कटघोरा वन मंडल को का ही उदाहरण लीजिए ग्राम बतरा में 94 लाख का काम हुआ और मनरेगा में मजदूरों को जांजगीर जिला का दिखाया जा रहा है एक पैसे का भी काम नहीं हुआ. यह सरकार के संरक्षण में ही तो हो रहा है।हमें लगता है, जनता देख रही है, जाग रही है और जवाब भी देगी.

प्रश्न- आदिवासी समाज का हित किसमें है आपकी लंबी लड़ाई का उद्देश्य क्या है?

उत्तर -पांचवी अनुसूची… छठी अनुसूची…. छत्तीसगढ़ को ही लीजिए यहां पांचवी अनुसूची कुछ जिलों में लागू है मगर इमानदारी से इसका पालन नहीं करवाया जा रहा है.जिसके कारण आदिवासी उत्पीड़न का शिकार हो रहे हैं और हमारी यही लड़ाई है.

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प्रश्न -प्रदेश सरकार की कार्यशैली पर आप क्या कहेंगे?

उत्तर- प्रदेश सरकार की हालत अच्छी नहीं है धान खरीदी का प्रश्न हो या किसानों के दूसरे हित सरकार लगातार विफल दिखाई दे रही है भूपेश सरकार के खिलाफ तो जन आंदोलन होकर रहेगा. किसानों को वाजिब समर्थन मूल्य नहीं मिल रहा है, रोजगार भत्ता का अता-पता नहीं है कांग्रेस ने जो वादे किए थे सरकार को 2 वर्ष हो गए वह वादे पूरे नहीं कर पाई है.

प्रश्न- मगर ऐसा तो पूर्व में भी था?

उत्तर- कांग्रेस सरकार 15 वर्ष बाद बनवास के लंबी अवधि के पश्चात सत्ता में आई है जनता को काफी उम्मीदें थी मगर अब सब धरी की धरी रह गई कोई वादा पूरा नहीं कर पा रहे हैं.

रालोपा ने भी कहा राजग को अलविदा

कृषि कानून के मसले पर शिरोमणि अकाली दल के बाद अब राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (रालोपा) ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) का साथ छोड़ दिया है. पार्टी के संयोजक और नागौर से सांसद हनुमान बेनीवाल ने हाल ही में इस की आधिकारिक घोषणा की थी.

घोषणा के बाद मीडिया से बात करते हुए हनुमान बेनीवाल ने कहा, “केंद्र सरकार कृषि बिलों को वापस न लेने पर अड़ी हुई है. ये तीनों बिल किसानों के खिलाफ हैं, इसीलिए मैंने राजग छोड़ दी है, पर कांग्रेस के साथ किसी तरह का गठबंधन नहीं करूंगा.”

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इस से पहले 19 दिसंबर, 2020 को राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (रालोपा) के प्रमुख हनुमान बेनीवाल ने किसानों के आंदोलन के समर्थन में 3 संसदीय समितियों से इस्तीफा दे दिया था. उन्होंने अपना इस्तीफा लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को भेजा था.

इस के बाद हनुमान बेनीवाल ने किसान आंदोलन के समर्थन में 2 लाख किसानों को ले कर राजस्थान से दिल्ली कूच करने का ऐलान किया था. दिल्लीजयपुर हाईवे 48 पर धरने पर बैठे किसानों ने राजस्थान के सांसद हनुमान बेनीवाल को अपना मंच साझा करने से रोक दिया था, जिस पर हनुमान बेनीवाल ने राजग से गठबंधन तोड़ने का ऐलान कर दिया.

किसानों के मुद्दे पर ही राजग के सहयोगी अकाली दल ने भी भारतीय जनता पार्टी का साथ छोड़ दिया था. तब मोदी सरकार में कृषि मंत्री रहीं शिरोमणि अकाली दल की सांसद हरसिमरत कौर ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था.

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हरियाणा में भाजपा सरकार में सहयोगी जननायक जनता पार्टी भी न्यूनतम समर्थन मूल्य के मुद्दे पर सरकार पर दबाव बनाए हुए है. इस सिलसिले में उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद सिंह तोमर और गृह मंत्री अमित शाह के साथ बैठक भी कर चुके हैं.

बढ़ती महंगाई, बिचौलियों की कमाई

जनता अब ‘महंगाई डायन खाए जात है’ जैसे गाने भले ही न गा रही हो, पर बढ़ती महंगाई उसे परेशान जरूर कर रही है. महंगाई में खाद्यान्नों की बढ़ती कीमतों का बहुत ज्यादा असर पड़ता है. बढ़ती महंगाई से उपभोक्ता परेशान हैं और किसान बेहाल हैं.

उपभोक्ताओं द्वारा ज्यादा कीमत देने के बाद भी किसानों को फसल की लागत भी ढंग से नहीं मिल रही है. केंद्र की मोदी सरकार किसानों की आमदनी को दोगुना करने के अपने वादे को भूल गई है. सरकार कितने भी कृषि कानून बना ले, पर जब तक वह किसानों को उन की उपज के न्यूनतम मूल्य की गारंटी नहीं देगी, तब तक उन की हालत खराब रहेगी.

किसानों की मेहनत का फायदा उन्हें नहीं, बल्कि बिचौलियों को ही होगा. मंडी में निजी खरीदारों के टाई लगा लेने से किसानों की हालत में सुधार नहीं आएगा, न ही महंगाई घटेगी.

किसान फसल बो कर खेत तैयार करते हैं, बीज की बोआई के साथसाथ खाद और कीटनाशकों का इस्तेमाल करते हैं. अच्छी पैदावार के लिए तमाम तरह के उपाय करते हैं. छुट्टा जानवरों  से खेत की दिनरात देखभाल करते हैं.

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खेत से कटाई के बाद जब तक फसल महफूज जगह नहीं पहुंच जाती है, तब तक उन्हें चैन नहीं मिलता है. जब यह फसल तैयार हो कर मंडी पहुंचती है, तो मंडी में बैठे खरीदार उस की कम से कम कीमत लगाने की कोशिश करते हैं.

कोरोना के चक्कर में देशभर में हुई तालाबंदी के बाद फैस्टिवल सीजन में आलू की कीमत 60 रुपए से 80 रुपए प्रति किलोग्राम तक बाजार में थी. यह आलू किसान से सीजन के समय मुश्किल से  10 रुपए प्रति किलोग्राम खरीदा गया था. आलू की महंगाई पर सरकार बिचौलियों पर कड़ी कार्यवाही करने की जगह इस बात का इंतजार कर रही है कि दिसंबर महीने तक जब किसानों का नया आलू बाजार में आएगा, तब आलू की कीमत कम हो जाएगी.

सरकार को बिचौलियों से पूछना चाहिए कि 10 रुपए प्रति किलोग्राम का आलू उपभोक्ता को 60 रुपए से 80 रुपए प्रति किलोग्राम में क्यों बिक रहा है? ट्रैजिडी यह देखिए कि जिस आलू की बोआई में किसानों ने अपनी पूरी मेहनत, समय और लागत लगाई, उस को इस  के हिसाब से कुछ नहीं मिला. जिस बिचौलिए ने केवल भंडारण किया, वह कई गुना कमाई करने में कामयाब रहा.

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आलू की कहानी हर साल

यह बात केवल आलू की ही नहीं है, बल्कि किसान के खेतों में तैयार हर फसल का यही हाल है. जैसे ही किसान के खेत में फसल तैयार होती है, वैसे ही बाजार में उस के दाम कम हो जाते हैं. यही वह ट्रैजिडी है, जो किसान को मुनाफा नहीं कमाने देती.

नवंबर महीने के आखिरी हफ्ते से उत्तर प्रदेश की मंडियों में यहां के किसानों के खेतों से तैयार आलू पहुंचने लगे हैं. 20 नवंबर तक तकरीबन 2,500 क्विंटल नया आलू बाजार में आ चुका है, जिस से फुटकर बाजार में आलू की कीमत गिरने लगी है.

उत्तर प्रदेश उद्यान विभाग के उद्यान निदेशक एसबी शर्मा कहते हैं, ‘प्रदेश का उत्पादित नया आलू अच्छी मात्रा में दिसंबर महीने तक बाजार में आ जाएगा. अभी ज्यादातर आलू पंजाब, हरियाणा और गुजरात से आ रहा है. जैसेजैसे किसान अपना नया आलू बाजार में लाएंगे, वैसेवैसे आलू की कीमत घट जाएगी.’

उत्तर प्रदेश में आलू की खुदाई नवंबर महीने के दूसरे हफ्ते से शुरू हो जाती है. कानपुर, फर्रुखाबाद, आगरा, कन्नौज, हाथरस और फिरोजाबाद की मंडियों में 20 नवंबर से 25 नवंबर तक नया आलू मंडियों तक पहुंच जाता है.

किसान अच्छी कीमत पाने के चक्कर में आलू की खुदाई कुछ समय पहले ही कर देते हैं, जिस की वजह से आलू में पानी की मात्रा ज्यादा होती है और यह खाने में पसंद नहीं किया जाता है. इस के मुकाबले पुराना आलू ज्यादा बिकता है.

किसानों का यही आलू सस्ते में खरीद कर बिचौलिए भंडारण कर लेते हैं. बाद में जब किसानों का आलू बिक जाता है, तो बिचौलिए अपने आलू की कीमत बढ़ा देते हैं. आलू की इस कहानी से किसान और बिचौलिए के फायदेनुकसान और लागत की बात साफ दिख रही है.

कमोबेश यही हालत दूसरी फसलों की भी होती है. बात केवल उत्तर प्रदेश की ही नहीं है, बल्कि हर प्रदेश में ऐसे ही हालात हैं.

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से 40 किलोमीटर दूर इटौंजा में किसान रामफल सब्जी की खेती करते हैं. वे बताते हैं, ‘हमारे यहां से बैगन 5 रुपए से 7 रुपए प्रति किलोग्राम के हिसाब से बिका और दुबग्गा की सब्जी मंडी में वही बैगन 25 रुपए से 30 रुपए प्रति किलोग्राम बिक रहा था. इस में न तो बिचौलिया किसी भी तरह का भंडारण का बोझ ढो रहा है और न ही कोई लागत लगा रहा है, इस के बाद भी वह  5 गुना तक का मुनाफा कमा रहा है.

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‘यही हाल मटर, धनिया, टमाटर और भिंडी का होता है. बिचौलिए के मुनाफे से आम आदमी और किसान दोनों ठगे जा रहे हैं. मोटा अंदाजा यह है कि बिचौलिए 8 से 10 गुना ज्यादा कीमत पर हरी सब्जियां बेच रहे हैं.

‘केरल में इस तरह की समस्या के समाधान के लिए वहां की सरकार ने सब्जियों का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय कर रखा है, जिस से कम पर किसी भी तरह के किसान से कोई सब्जी नहीं खरीद सकता है. ऐसी व्यवस्था पूरे देश में हो, तो किसान और उपभोक्ता दोनों को राहत मिलेगी.’

कैसे होता है मुनाफे का खेल

लखनऊ के मोहनलालगंज इलाके में रहने वाले शुभम सिंह खेतीकिसानी करने के साथसाथ किसानों की राजनीति और अपना कारोबार भी करते हैं. वे बताते हैं, ‘हम एक बार अपने खेत की भिंडी ले कर लखनऊ की दुबग्गा सब्जी मंडी गए. वहां बिचौलिए ने 8 रुपए प्रति किलोग्राम में भिंडी की कीमत तय की. कैसरबाग की फुटकर सब्जी मंडी में यही भिंडी  50 रुपए से 60 रुपए प्रति किलोग्राम हो गई और घरघर तक पहुंचने की कीमत 80 रुपए प्रति किलोग्राम हो गई.

‘किसान से उपभोक्ता तक सब्जी पहुंचने में  3 तरह के बिचौलिए जैसे थोक मंडी, फुटकर मंडी और दुकानदार शामिल होते हैं. 10 गुना फायदे में इन की हिस्सेदारी होती है. किसान महीनों मेहनत कर के जिस भिंडी से केवल  8 रुपए प्रति किलोग्राम पाते हैं, जबकि इस में उन की लागत और समय दोनों  ही लगा होता है, पर 3 बिचौलिए केवल उपभोक्ता तक सामान पहुंचाने के नाम पर सारा मुनाफा एक ही दिन में कमा लेते हैं. ये लोग पहले से ऐसी कीमत लगाते हैं, जिस में खराब होने वाली या न बिकने वाली सब्जी की कीमत भी जुड़ी होती है.’

शुभम सिंह आगे बताते हैं कि मंडी में किसान की फसल की कीमत कुछ बिचौलिए बोली लगा कर तय करते हैं. इसी कीमत पर किसान को अपनी फसल बेचनी होती है. मनमुताबिक कीमत न मिलने के बाद भी किसान पैदावार बेचने को मजबूर होते हैं. मंडी के बिचौलिए, आढ़ती और दलाल किसानों से किसी भी तरह की हमदर्दी नहीं रखते हैं. किसान को तो 2 फीसदी मंडी शुल्क भी अदा करना पड़ता है.

उत्तर प्रदेश सरकार मंडी शुल्क में कटौती कर के किसानों को राहत देने का दावा कर रही है. उत्तर प्रदेश सरकार की मंडियों में किसानों को अपनी फसल बेचने के लिए उन से 2 फीसदी मंडी शुल्क लिया जाता है. इस शुल्क से बचने के लिए किसान बिचौलियों  को मंडी के बाहर ही अपनी फसल बेच देते हैं.

सरकार ने मंडियों में किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए बढ़ावा देने के लिए मंडी शुल्क घटा कर आधा कर दिया है. अब किसानों को केवल एक फीसदी मंडी शुल्क देना होगा. किसान और उस से जुडे संगठन काफी दिनों से यह मांग कर रहे थे. इस से किसानों को कितना फायदा होगा, यह देखने वाली बात है.

नए कृषि कानून में किसानों की उपज को खरीदने का काम निजी कारोबारियों और मंडियों को भी दिया गया है. ऐसे में यह जरूरी है कि फसल का न्यूनतम मूल्य जरूर तय किया जाए.

किसानों का शोषण

मंडियों में किस तरह से किसानों को मजबूर किया जाता है, इस को बताते हुए नवनीत सिंह कहते हैं, ‘जब किसान कोई जल्दी खराब होने वाली अपनी उपज ले कर मंडी जाता है, तो वहां बिचौलिए उस की बोली लगाने से ही इनकार कर देते हैं. किसानों को लगता है कि कम से कम आनेजाने और कुछ सामान खरीदने भर का ही पैसा मिल जाए. उन की मजबूरी को समझने के बाद भी बिचौलिए उपज की बोली नहीं लगाते हैं. ये लोग इतने संगठित होते हैं कि अगर एक ने मना कर दिया, तो दूसरा भी खरीदता नहीं है.

‘एक बार हम अपने खेत से उगाई गई हरी प्याज बेचने मंडी गए. हरी प्याज के जल्दी खराब होने और सड़ने का खतरा रहता है. कई बार तो यह रातभर भी नहीं रुक पाती है. मंडी में इस को खरीदने से इनकार कर दिया गया. बहुत कहा तो एक आढ़ती ने कहा कि चबूतरे पर रख जाओ, सड़ीगली निकाल कर. अगर कुछ बिक गई तो पैसा दे देंगे.

‘एक तरह से कूड़े की तरह हम अपनी हरी प्याज के 10 गट्ठर फेंक कर चले आए. बदले में आढ़ती ने केवल 1,000 रुपए दिए.’

जिस प्याज को वह आढ़ती सड़ीगली, कूड़ा कह रहा था, उसे उस ने खोल कर छोटेछोटे गट्ठर बना लिए और 10 रुपए प्रति गट्ठर फुटकर मंडी के किसान को बेच दिया. वैसे, कई बार किसान परेशान हो कर ऐसी उपज को फेंक देते हैं या पशुओं को खिला देते हैं.

मंडियों में भी आपस में किसानों की खरीद को ले कर एक समझौता होता है. कोई किसान चाह कर भी अपनी उपज फुटकर मंडी या दुकानदार को नहीं बेच सकता. इसी तरह कोई उपभोक्ता अगर चाहे कि वह फुटकर मंडी या थोक मंडी से अपने रोज की जरूरत के लिए कुछ खरीद ले, तो नहीं खरीद सकता है. शहरों में रेहड़ी लगाने के लिए भी किसान को इजाजत नहीं होती. इस के अलावा वह सस्ती कीमत पर भी उपभोक्ता को सीधे उपज नहीं बेच सकता है.

मोहनलालगंज, लखनऊ की ब्लौक प्रमुख विजय लक्ष्मी कहती हैं, ‘किसानों को उपज का दाम लागत से भी कम मिल रहा है. केंद्र सरकार को नया कृषि कानून बनाने से पहले यह तय करना चाहिए था कि किसानों को उपज की सही कीमत मिले. किसानों के हितों की हिफाजत करने के लिए सरकार को गंभीरता से विचार करना चाहिए.’

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महंगाई पर पड़ता असर

सब्जियों और दूसरे खाद्यान्नों की महंगाई का असर आम जीवन पर भी पड़ता है. तालाबंदी के दौर में भी रसोई की जरूरतों को नजरअंदाज करना मुश्किल काम नहीं था. भंडारण कर के रखी जाने वाली चीजों की ज्यादा खरीदारी की गई, जिस में आटा, चावल, आलू, प्याज, दालें और तेलमसाले  प्रमुख थे.

मुनाफाखोरों ने इन के दामों में न केवल बढ़ोतरी कर दी, बल्कि घटिया माल की सप्लाई भी की. तालाबंदी के समय में फैक्टरियों में माल तैयार नहीं हो रहा था. बाजार में बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए तमाम लोकल ब्रांड भी माल बना कर बेचने लगे, जो उतना अच्छा भले ही नहीं होता था, पर कीमत में बहुत अंतर नहीं था.

लखनऊ के सप्रू मार्ग पर शर्मा चाट का एक ठेला लगता है. तालाबंदी के पहले वह 30 रुपए प्लेट की दर से आलू की टिक्की बेचता था. तालाबंदी के बाद जब सरकार ने सड़कों पर दुकानें खोलने की इजाजत दे दी, तो उस ने चाट की कीमत में बढ़ोतरी कर दी.

इसे चलाने वाले प्रकाश शर्मा का कहना है कि 50 रुपए प्रति प्लेट टिक्की इसलिए करनी पड़ी, क्योंकि हर चीज के दाम बढ़ गए हैं खासकर आलू के दाम बहुत बढ़े हुए हैं. इस के अलावा हम ने  3 साल के बाद दाम बढ़ाए हैं और करीबकरीब हर जगह इसी कीमत पर चाट बिक रही है. दुकानों में तो 80 रुपए प्रति प्लेट टिक्की बिक रही है.

उपभोक्ता मामलों के जानकार पत्रकार रजनीश राज कहते हैं, ‘तालाबंदी  के बाद घाटे को पूरा करने के लिए कुछ कारोबारियों ने कीमतों में बढ़ोतरी कर दी. इस का असर यह हुआ कि खानेपीने की हर चीज 15 फीसदी से ले कर 30 फीसदी तक महंगी हो गई.

‘दुकानदार महंगाई का बहाना बना कर दाम बढ़ा देते हैं, लेकिन दाम घटने पर कोई माल सस्ता नहीं बिकता है. आलू के महंगे होने से टिक्की के दाम बढ़ गए, पर आलू के सस्ते होने पर टिक्की के दाम घटेंगे नहीं. खानेपीने की चीजों में इस तेजी की वजह लेबर की कमी और फैक्टरियों में कम उत्पादन होना भी है.’

किसान आत्महत्या कर रहे, मुख्यमंत्री मौन हैं!

छत्तीसगढ़ में किसान लगातार आत्महत्या कर रहे हैं सन् 2019 में 629 आत्महत्याओं में 233 किसान व खेतिहर मजदूर हैं जिन्होंने आत्महत्या की. और मुख्यमंत्री भूपेश बघेल किसानों की कथित”आत्महत्या” पर मौन है आखिर क्यों?

पहला पक्ष- अभनपुर के विधायक पूर्व मंत्री धनेंद्र साहू ने कहा  किसान की मानसिक दशा ठीक नहीं थी, इसलिए आत्महत्या कर ली है. ऐसा ही तोरला गांव के सरपंच और सचिव ने अपने बयान में कहा है जिसका विरोध मृतक किसान के परिजनों ने किया.

दूसरा पक्ष – छत्तीसगढ़ सरकार के जांच टीम ने पाया फसल क्षति, कर्ज और भुखमरी का आत्महत्या से कोई संबंध नहीं. दरअसल सरकार किसान आत्महत्या मामलों को स्वतंत्र जांच एजेंसियों के मध्यम से नहीं कराना चाहती.

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तीसरा पक्ष – हमारे संवाददाता ने रायगढ़ ,जांजगीर और कोरबा के कई किसानों से चर्चा की और पाया सरकार की नीतियों और  नकली कीटनाशक दवाइयों के कारण वर्तमान में किसान बेहद क्षुब्ध अवसाद में हैं.

छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले के अभनपुर तहसील के ग्राम तोरला के कृषक  प्रकाश तारक की आत्महत्या देशभर में सुर्खियों में रही. इसी तरह मुख्यमंत्री के गृह जिला दुर्ग में एक युवा किसान दुर्गेश निषाद किसान ने आत्महत्या कर ली है.

यहां उल्लेखनीय है कि जब भी कोई किसान  आत्महत्या करता है तो सरकार यही कहती है कि इसमें हमारी नीतियों का कोई लेना देना नहीं है. यह किसान के परिवारिक और व्यक्तिगत कारण से हुआ है. वहीं विपक्ष हमेशा यही कहता है कि यह सरकार की नीतियों के कारण आत्महत्या हुई है. वही चौथा स्तंभ प्रेस मीडिया सच को दिखाने का प्रयास करता है.

छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी की सरकार हो अथवा डॉक्टर रमन सिंह की 15 वर्ष की लंबी अवधि की भाजपा सरकार. प्रत्येक सरकार के समय काल में किसान लगातार आत्महत्या करते रहे हैं. यह मामले राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में बने, मगर सरकार ने हर दफा यही कहा कि हम तो बेदाग है. तो आखिर सरकार के  कोशिशों के बाद किसान आत्महत्या क्यों कर लेता है? यह एक ऐसा यक्ष प्रश्न है, जिसका जवाब अगर आप गांव के चौराहे और चौपाल पर पहुंचे तो आसानी से मिल सकता है. मगर सरकार का दावा यही रहता है कि इसमें हमारी छोटी सी भी खामी नहीं है. आज हम इस रिपोर्ट में छत्तीसगढ़ के किसानों के हालात पर और सरकार की नीति की खामियों पर आपको महत्वपूर्ण तथ्य बताने जा रहे हैं-

भूपेश बघेल का सरकारी ढोल..

किसान की आत्महत्या के संदर्भ में कलेक्टर रायपुर द्वारा अधिकारियों की गठित जांच टीम ने अपने जांच प्रतिवेदन में इस बात का उल्लेख किया कि कृषक  प्रकाश तारक की आत्महत्या का फसल क्षति, कर्ज और भुखमरी से कोई संबंध नहीं है. मृतक ने मानसिक अवसाद के चलते फांसी लगाकर आत्महत्या की है. अनुविभागीय दण्डाधिकारी अभनपुर, तहसीलदार एवं नायब तहसीलदार अभनपुर ने अपने संयुक्त जांच प्रतिवेदन में इस बात का उल्लेख किया है. फसल बर्बाद होने से निराश किसान  प्रकाश तारक द्वारा आत्महत्या किए जाने की खबरों को जांच टीम ने बेबुनियाद बताया है नाराजगी व्यक्त करते हुए कड़ी प्रतिक्रिया  व्यक्त की है.

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सनद रहे कि कृषक  प्रकाश तारक द्वारा फांसी लगाकर आत्महत्या किए जाने के मामले की कलेक्टर रायपुर ने एसडीएम अभनपुर के नेतृत्व में एक संयुक्त टीम गठित कर इसकी जांच कराई है. अधिकारियों की संयुक्त टीम ने ग्राम तोरला पहुंचकर मृतक के परिजनों, ग्रामीणों एवं स्थानीय जनप्रतिनिधियों के बयान लिए और मृतक की परिवारिक स्थिति के बारे में भी जानकारी ली.अधिकारियों की संयुक्त टीम ने अपने जांच प्रतिवेदन में इस बात का स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है कि मृतक प्रकाश तारक की मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी.  अधिकारियों की संयुक्त टीम ने ग्राम तोरला में ग्रामवासियों, हल्का पटवारी, जन प्रतिनिधियों और मृतक परिवार के सदस्यों की उपस्थिति में जांच कर पंचनामा तैयार किया.

अनुविभागीय दण्डाधिकारी अभनपुर और अधिकारियों की संयुक्त टीम ने अपने जांच प्रतिवेदन में मृतक की पत्नी  दुलारी बाई के शपथपूर्वक कथन में बताई गई बातों का उल्लेख करते हुए कहा है कि मृतक को कोई परेशानी नहीं थी न ही उसके उपर कोई कर्ज था, न ही किसी के द्वारा उसको परेशान एवं धमकाया जा रहा था. खेत में लगी फसल की स्थिति सामान्य है। मृतक फसल की कटाई करने के लिए खेत गया हुआ था. मृतक की पत्नी ने अपने बयान में यह भी कहा है कि उसके पति बीते कुछ दिनों से गुमसुम रहा करते थे। तोरला गांव के सरपंच और सचिव ने अपने प्रतिवेदन में इस बात का स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है कि मृतक की बीते तीन-चार महीनों से मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी. वह गुमसुम रहता था.किसी से कोई बात-चीत नहीं करता था. पूछने पर दवाई लेता हूं, यह कहता था. मृतक के परिवार को शासकीय उचित मूल्य दुकान से नियमित रूप से चावल प्रदाय किया जाता रहा है परिवार में भुखमरी की कोई नौबत नहीं है. हल्का पटवारी ने अपने रिपोर्ट में मृतक  प्रकाश तारक के फसल की स्थिति को सामान्य बताया है. ग्रामीणों एवं जनप्रतिनिधियों की उपस्थिति में तैयार किए गए पंचनामा के आधार पर जांच अधिकारियों की संयुक्त टीम ने मृतक पर कोई कर्ज न होने, उसके परिवार को नियमित रूप से पीडीएस का राशन मिलने, उसके गुमसुम तथा अवसाद से ग्रसित होने का उल्लेख किया है.

जांच अधिकारियों की संयुक्त टीम ने मृतक की पत्नी  दुलारी बाई, परिवार के अन्य सदस्यों, ग्राम के कोटवार के शपथ पूर्व कथन तथा गोबरा नवापारा थाना में कायम मर्ग तथा विवेचना में इस बात का उल्लेख है कि मानसिक बीमारी से दुखी होकर मृतक प्रकाश तारक ने आत्महत्या की है. वस्तुतः सरकार के कारिंदों द्वारा जारी की गई जांच रिपोर्ट पढ़कर कोई भी समझ सकता है कि इस तरह किसान की आत्महत्या को झुठलाया जा रहा है.

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सरकार का “सफेद झूठा” होना

यहां सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि किसान प्रकाश के परिजन क्षेत्रीय विधायक व पूर्व मंत्री धनेंद्र साहू से बेहद नाराज हैं जिन्होंने सबसे पहले यह कहा कि प्रकाश मानसिक रूप सेअवसाद ग्रस्त था. और साफ साफ कह रहे हैं कि ऐसी कोई बात नहीं थी. सवाल यह है कि सरकार अपने शासकीय अमले से किसान की आत्महत्या की जांच क्यों करवाती है.क्यों नहीं किसी स्वतंत्र जांच एजेंसी के द्वारा किसान की आत्महत्या की सच्चाई को जानने का प्रयास किया जाता इसे हेतु “न्यायिक जांच” भी गठित की जा सकती है अथवा विपक्ष को भी जांच का अधिकार दिया जाना चाहिए. मगर कोई भी सरकार किसान आत्महत्या के मामले में सिर्फ अपने अधीनस्थ एसडीएम, कलेक्टर अथवा पटवारी से जांच करवा कर मामले की इतिश्री कर लेती है. और इस तरह किसान की आत्महत्या की सच्चाई को दबा दिया जाता है. अगर सरकार किसानों की हितैषी है जैसा कि वह हमेशा ढोल बजाते जाती है छत्तीसगढ़ में तो प्रति क्विंटल 25 सो रुपए धान का मूल्य दिया जा रहा है करोड़ों रुपए विज्ञापन पर खर्च किए जाते हैं और यह प्रचार प्रसार किया जाता है कि भूपेश बघेल की सरकार किसानों की हितैषी सरकार है, ऐसे में कोई किसान आत्महत्या कर ले तो यह सरकार के सफेद कपड़े पर एक काला दाग बन कर उभर आता है. शायद यही कारण है कि

अनुविभागीय दण्डाधिकारी, अभनपुर ने बताया कि मृतक मृतक के परिवार में उसकी पत्नी और 4 बच्चे है. संयुक्त परिवार बंटवारा में प्राप्त 1.79 हेक्टेयर भूमि में  प्रकाश तारक कृषि करता था. उसे मनरेगा से जॉब कार्ड भी मिला है. पारिवारिक बंटवारा में उसे तीन कमरा और एक किचन वाला मकान मिला है. मृतक के उपर कोई कर्ज नहीं था। उसके परिवार को नियमित रूप से शासकीय उचित मुल्य दुकान से चावल मिल रहा था. परिवार में भुखमरी की नौबत नहीं है. मृतक के घर से 1 कट्टा धान शासकीय उचित मूल्य दुकान से प्राप्त चावल पाया गया. हल्का पटवारी के अनुसार फसल की स्थिति सामान्य है.समिति के माध्यम से पिछले खरीफ धान विक्रय के दौरान मृतक के  सम्मिलात खाते में 105 क्विटल धान बेचा था. जिसके एवज में एक लाख 83 हजार की राशि मिली थी.

गांव गांव के किसान हलाकान!

हमारे संवाददाता की जमीनी रिपोर्ट यह बताती है कि छत्तीसगढ़ के अनेक गांवों में किसान  नकली कीटनाशक दवाइयों के कारण त्रासदी भोग रहे हैं.

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यह पहली बार हुआ है कि 1 एकड़ के कृषि में किसान को पांच हजार रुपए के कीटनाशक दवाइयों की जगह लगभग 12000  रूपए  कीटनाशकों पर खर्च करना पड़ रहा है. मगर इसके बावजूद  कीट रातों-रात खेतों को सफाचट कर रहे हैं, किसान समझ नहीं पा रहे हैं कि यह सब क्या हो रहा है. हमारे संवाददाता ने रायगढ़ के जोबी गांव के किसान कृपाराम राठिया, कोरबा जिला के ग्राम मुकुंदपुर के शिवदयाल कंवर, राम लाल यादव, तरुण कुमार देवांगन से चर्चा की तो यह तथ्य सामने आया कि सत्र 2019 -20 में किसानों के कीटनाशकों के खरीदी में बेइंतेहा पैसे खर्च हुए हैं इसके बावजूद खेतों में कीट रातो रात फसल को साफ कर रहे हैं. जिससे किसान समझ नहीं पा रहे हैं कि आखिर यह सब क्यों हो रहा है. जानकार सूत्रों के अनुसार छत्तीसगढ़ में नकली कीटनाशक दवाइयों की बिक्री जोरों पर है जिससे किसान लूटे जा रहे हैं, बर्बाद हो रहे हैैं. सरकार कोई एक्शन नहीं ले  रही है. परिणाम स्वरूप किसान आत्महत्या करने के कगार पर है.

बिहार में का बा : लाचारी, बीमारी, बेरोजगारी बा

जिस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के नाम अपने संदेश में लोगों को कोरोना से बचने के लिए आगाह कर रहे थे, उसी समय भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा बिहार विधानसभा चुनाव के सिलसिले में एक रैली को संबोधित कर रहे थे. उस भीड़ में न मास्क था और न ही आपस में 2 गज की दूरी. इसी साल के मार्च महीने में जब कोरोना की देश में आमद हो रही थी, तब 2,000 लोगों के जमातीय सम्मेलन को कोरोना के फैलने की वजह बता कर बदनाम किया गया था, पर अब बिहार चुनाव में लाखों की भीड़ से भी कोई गुरेज नहीं है.

बिहार चुनाव इस बार बहुत अलग है. नीतीश कुमार अपने 15 साल के सुशासन की जगह पर लालू प्रसाद यादव के 15 साल के कुशासन पर वोट मांग रहे हैं. इस के उलट बिहार के 2 युवा नेताओं चिराग पासवान और तेजस्वी यादव ने बड़ेबड़े दलों के समीकरण बिगाड़ दिए हैं.

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बिहार चुनाव में युवाओं की भूमिका अहम है. बिहार में बेरोजगारी सब से बड़ा मुद्दा बन गई है. एक अनजान सी गायिका नेहा सिंह राठौर ने ‘बिहार में का बा’ की ऐसी धुन जगाई है कि भाजपा जैसे बड़े दल को बताना पड़ रहा है कि ‘बिहार में ई बा’ और नीतीश कुमार अपने काम की जगह लालू के राज के नाम पर वोट मांग रहे हैं.

बिहार की चुनावी लड़ाई अगड़ों की सत्ता को मजबूत करने के लिए है. एससी तबके की अगुआई करने वाली लोक जनशक्ति पार्टी को राजग से बाहर कर के सीधे मुकाबले को त्रिकोणात्मक किया गया है, जिस से सत्ता विरोधी मतों को राजदकांग्रेस गठबंधन में जाने से रोका जा सके.

जिस तरह से नीतीश कुमार का इस्तेमाल कर के पिछड़ों की एकता को तोड़ा गया, अब चिराग पासवान को निशाने पर लिया गया है, जिस से कमजोर पड़े नीतीश कुमार और चिराग पासवान पर मनमाने फैसले थोपे जा सकें.

बिहार चुनाव में अगर भाजपा को पहले से ज्यादा समर्थन मिला, तो वह तालाबंदी जैसे फैसले को भी सही साबित करने की कोशिश करेगी. बिहार को हिंदुत्व का नया गढ़ बनाने का काम भी होगा.

बिहार के चुनाव में जातीय समीकरण सब से ज्यादा हावी होते हैं. यह कोई नई बात नहीं है. आजादी के पहले से ही यहां जातीयता और राजनीति में चोलीदामन का साथ रहा है. 90 के दशक से पहले यहां की राजनीति पर अगड़ों का कब्जा रहा है.

लालू प्रसाद यादव ने मंडल कमीशन लागू होने के बाद बिहार की राजनीति की दिशा को बदल दिया था. अगड़ी जातियों ने इस के खिलाफ साजिश कर के कानून व्यवस्था का मामला उठा कर लालू प्रसाद यादव के राज को ‘जंगलराज’ बताया था. उन के सामाजिक न्याय को दरकिनार किया गया था.

पिछड़ी जातियों में फूट डाल कर नीतीश कुमार को समाजवादी सोच से बाहर कर के अगड़ी जातियों के राज को स्थापित करने में इस्तेमाल किया गया था. बिहार की राजनीति के ‘हीरो’ लालू प्रसाद यादव को ‘विलेन’ बना कर पेश किया गया था.

भारतीय जनता पार्टी को लालू प्रसाद यादव से सब से बड़ी दुश्मनी इस वजह से भी है कि उन्होंने भाजपा के अयोध्या विजय को निकले रथ को रोकने का काम किया था. साल 1990 में जब अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए सोमनाथ से अयोध्या के लिए रथ ले कर भाजपा नेता लाल कृष्ण अडवाणी निकले, तो उन को बिहार में रोक लिया गया.

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भाजपा को लालू प्रसाद यादव का यह कदम अखर गया था. केंद्र में जब भाजपा की सरकार आई, तो लालू प्रसाद यादव को चारा घोटाले में उल झाया गया और इस के सहारे उन की राजनीति को खत्म करने का काम किया गया.

लालू प्रसाद यादव के बाद भी बिहार की हालत में कोई सुधार नहीं आया. बिहार में पिछले 15 साल से नीतीश कुमार मुख्यमंत्री रह चुके हैं. इस के बाद भी बिहार बेहाल है.

साल 2020 के विधानसभा चुनावों में लालू प्रसाद यादव का ‘सामाजिक न्याय’ भी बड़ा मुद्दा है. लालू प्रसाद यादव भले ही चुनाव मैदान में नहीं हैं, पर उन का मुद्दा चुनाव में मौजूद है.

नई पीढ़ी का दर्द

तालाबंदी के बाद मजदूरों का पलायन एक दुखभरी दास्तान है. नई पीढ़ी के लोगों को यह दर्द परेशान कर रहा है. नौजवान सवाल कर रहे हैं कि 15 साल तक एक ही नेता के मुख्यमंत्री रहने के बाद भी बिहार की ऐसी हालत क्यों है? अब उसी नेता को दोबारा मुख्यमंत्री पद के लिए वोट क्यों दिया जाए?

मुंबई आ कर उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग अपनी रोजीरोटी के लिए तिलतिल मरते हैं. अगर उन के प्रदेशों में कामधंधा होता, रोजीरोटी का जुगाड़ होता, तो ये लोग अपने प्रदेश से पलायन क्यों करते?

फिल्म कलाकार मनोज बाजपेयी ने अपने रैप सांग ‘मुंबई में का बा…’ में मजदूरों की हालत को बयां किया है.  5 मिनट का यह गाना इतना मशहूर  हुआ कि अब बिहार चुनाव में वहां की जनता सरकार से पूछ रही है कि ‘बिहार में का बा’.

दरअसल, बिहार में साल 2005 से ले कर साल 2020 तक पूरे 15 साल नीतीश कुमार मुख्यमंत्री रहे हैं. केवल एक साल के आसपास जीतनराम मां झी मुख्यमंत्री की कुरसी पर बैठ पाए थे, वह भी नीतीश कुमार की इच्छा के मुताबिक.

किसी भी प्रदेश के विकास के लिए 15 साल का समय कम नहीं होता. इस के बाद भी बिहार की जनता नीतीश कुमार से पूछ रही है कि ‘बिहार में का बा’ यानी बिहार में क्या है?

तालाबंदी के दौरान सब से ज्यादा मजदूर मुंबई से पलायन कर के बिहार आए. 40 लाख मजदूर बिहार आए. इन में से सभी मुंबई से नहीं आए, बल्कि कुछ गुजरात, पंजाब और दिल्ली से भी आए.

ये मजदूर यह सोच कर बिहार वापस आए थे कि अब उन के प्रदेश में रोजगार और सम्मान दोनों मिलेंगे. यहां आ कर मजदूरों को लगा कि यहां की हालत खराब है. रोजगार के लिए वापस दूर प्रदेश ही जाना होगा. बिहार में न तो रोजगार की हालत सुधरी और न ही समाज में मजदूरों को मानसम्मान मिला.

बीते 15 सालों में बिहार की  12 करोड़, 40 लाख आबादी वाली जनता भले ही बदहाल हो, पर नेता अमीर होते गए हैं. बिहार में 40 सांसद और 243 विधायक हैं. इन की आमदनी बढ़ती रही है. पिछले 15 सालों में  85 सांसद करोड़पति हो गए और 468 विधायक करोड़पति हो गए.

मनरेगा के तहत बिहार में औसतन एक मजदूर को 35 दिन का काम मिलता है. अगर इस का औसत निकालें तो हर दिन की आमदनी 17 रुपए रोज की बनती है. राज्य में गरीब परिवारों की तादाद बढ़ती जा रही है.

गरीबी रेखा से नीचे यानी बीपीएल परिवारों की तादाद तकरीबन 2 करोड़, 85 लाख है. नीतीश कुमार के 15 सालों में गरीबों की तादाद बढ़ी है और नेताओं की आमदनी बढ़ती जा रही है.

जंगलराज या सामाजिक न्याय

मंडल कमीशन लागू होने के बाद बिहार की राजनीतिक और सामाजिक हालत में आमूलचूल बदलाव हुआ. लालू प्रसाद यादव सामाजिक न्याय के पुरोधा बन कर उभरे. उन के योगदान को दबाने का काम किया गया.

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साल 1990 से साल 2020 के  30 सालों में बिहार पर दलितपिछड़ा और मुसलिम गठजोड़ राजनीति पर हावी रहा है. अगड़ी जातियों का मकसद है कि  30 सालों में जो उन की अनदेखी हुई, अब वे मुख्यधारा का हिस्सा बन जाएं.

भारतीय जनता पार्टी की अगुआई में अगड़ी जातियां काफीकुछ अपने मकसद में कामयाब भी हो गई हैं. बिहार में भाजपा का युवा शक्ति के 2 नेताओं तेजस्वी यादव और चिराग पासवान से सीधा मुकाबला है.

भाजपा के पास बिहार में कोई चेहरा नहीं है, जिस के बल पर वह सीधा चुनाव में जा सके. सुशील कुमार मोदी भाजपा का पुराना चेहरा हो चुके हैं.

विरोधी मानते हैं कि बिहार में लालू प्रसाद यादव के समय जंगलराज था. जंगलराज का नाम ले कर लोगों को डराया जाता है कि लालू के आने से बिहार में जंगलराज की वापसी हो जाएगी.

राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव कहते हैं, ‘मंडल कमीशन के बाद वंचितों को न्याय और उन को बराबरी की जगह दे कर सामाजिक न्याय दिलाने का काम किया गया था. अब आर्थिक न्याय देने की बारी है.

‘जो लोग जंगलराज का नाम ले कर बिहार की छवि खराब कर रहे हैं, वे बिहार के दुश्मन हैं. इन के द्वारा बिहार की छवि खराब करने से यहां पर निवेश नहीं हो रहा. लोग डर रहे हैं. अब हम आर्थिक न्याय दे कर नए बिहार की स्थापना के लिए काम करेंगे.’

वंचितों के नेता

लालू प्रसाद यादव की राजनीति को हमेशा से जातिवादी और भेदभावपूर्ण बता कर खारिज करने की कोशिश की गई. लालू प्रसाद यादव अकेले नेता नहीं हैं, जिन को वंचितों के हक की आवाज उठाने पर सताया गया हो. नेल्सन मंडेला, भीमराव अंबेडकर, मार्टिन लूथर किंग जैसे अनगिनत उदाहरण पूरी दुनिया में भरे पड़े हैं.

लालू प्रसाद यादव सामंतियों के दुष्चक्र के शिकार हुए, जिन की वजह से उन का राजनीतिक कैरियर खत्म करने की कोशिश की गई. इस के बाद भी लालू प्रसाद यादव के योगदान से कोई इनकार नहीं किया जा सकता है.

लालू प्रसाद यादव साल 1990 से साल 1997 तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे. साल 2004 से साल 2009 तक उन्होंने केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार यानी संप्रग सरकार में रेल मंत्री के रूप में काम किया.

बिहार के बहुचर्चित चारा घोटाला मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो अदालत ने 5 साल के कारावास की सजा सुनाई. चारा घोटाला मामले में दोषी करार दिए जाने के बाद उन्हें लोकसभा से अयोग्य ठहराया गया.

लालू प्रसाद यादव मंडल विरोधियों के निशाने पर थे. इस की सब से बड़ी वजह यह थी कि साल 1990 में लालू प्रसाद यादव ने राम रथ यात्रा के दौरान समस्तीपुर में लाल कृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार किया.

मंडल विरोधी भले ही लालू प्रसाद यादव के राज को जंगलराज बताते थे, पर सामाजिक मुद्दे के साथसाथ आर्थिक मोरचे पर भी लालू सरकार की तारीफ होती रही है.

90 के दशक में आर्थिक मोरचे पर विश्व बैंक ने लालू प्रसाद यादव के काम की सराहना की. लालू ने शिक्षा नीति में सुधार के लिए साल 1993 में अंगरेजी भाषा की नीति अपनाई और स्कूल के पाठ्यक्रम में एक भाषा के रूप में अंगरेजी को बढ़ावा दिया.

राजनीतिक रूप से लालू प्रसाद यादव के जनाधार में एमवाई यानी मुसलिम और यादव फैक्टर का बड़ा योगदान है. लालू ने इस से कभी इनकार भी नहीं किया है.

साल 2004 के लोकसभा चुनाव में लालू प्रसाद यादव रेल मंत्री बने. उन के कार्यकाल में ही दशकों से घाटे में चल रही रेल सेवा फिर से फायदे में आई.

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भारत के सभी प्रमुख प्रबंधन संस्थानों के साथसाथ दुनियाभर के बिजनैस स्कूलों में लालू प्रसाद यादव के कुशल प्रबंधन से हुआ भारतीय रेलवे का कायाकल्प एक शोध का विषय बन गया.

अगड़ी जातियों की वापसी

राजनीतिक समीक्षक अरविंद जयतिलक कहते हैं, ‘जनता यह मानती है कि राज्य की कानून व्यवस्था अच्छी रहे. यही वजह है कि लालू प्रसाद यादव के विरोधियों ने उन की पहचान को जंगलराज से जोड़ कर प्रचारित किया. उन के प्रतिद्वंद्वी नीतीश कुमार के राज को सुशासन कहा गया.

‘इसी मुद्दे पर ही नीतीश कुमार हर बार चुनाव जीतते रहे और 15 साल तक मुख्यमंत्री बने रहे. लालू प्रसाद यादव ने जो सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ी और जो आर्थिक सुधारों के लिए काम किया, उस की चर्चा कम हुई.

‘लालू प्रसाद यादव की आलोचना में विरोधी कामयाब रहे. बहुत सारे काम करने के बाद भी लालू यादव को जो स्थान मिलना चाहिए था, नहीं मिला.’

बिहार में तकरीबन 20 फीसदी अगड़ी जातियां हैं. पिछड़ी जातियों में 200 के ऊपर अलगअलग बिरादरी हैं. इन में से बहुत कोशिशों के बाद कुछ जातियां ही मुख्यधारा में शामिल हो पाई हैं. बाकी की हालत जस की तस है. इन में से 10 से 15 फीसदी जातियों को ही राजनीतिक हिस्सेदारी मिली है.

1990 के पहले बिहार की राजनीति में कायस्थ, ब्राह्मण, क्षत्रिय और भूमिहार प्रभावी रहे हैं. दलितों की हालत भी बुरी है. बिहार की आबादी का 16 फीसदी दलित हैं. अगड़ी जातियों ने दलितों में खेमेबंदी को बढ़ावा देने का काम किया है.

साल 2005 में भाजपा और जद (यू) ने अगड़ी जातियों को सत्ता में वापस लाने का काम किया. साल 2020 के विधानसभा चुनाव में भाजपा अब नीतीश कुमार को भी दरकिनार करने की कोशिश कर रही है.

विधानसभा चुनाव : गूंजेगा हाथरस गैंगरेप

प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को 15 सालों के सत्ता विरोधी मतों का ही सामना नहीं करना होगा, बल्कि उत्तर प्रदेश के हाथरस में एससी तबके की लड़की के साथ हुए गैंगरेप का भी असर वहां पड़ेगा.

इस बात का अंदेशा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को लग चुका था. जनता दल (यूनाइटेड) के नेता केसी त्यागी गैंगरेप और लड़की की लाश को आननफानन जलाने में तीखी प्रतिक्रिया देने वाले नेताओं में सब से आगे थे.

केसी त्यागी ने कहा था, ‘अगर बलात्कार और हत्या के मामले में कार्यवाही करने के लिए किसी प्रधानमंत्री को अपने मुख्यमंत्री को फोन करना पड़े तो इस से शर्मनाक कोई दूसरी बात नहीं हो सकती.’

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हाथरस की घटना को देखने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खुद भी इस बात का अंदाजा लग चुका था कि यह घटना बिहार चुनाव पर असर डाल सकती है. इस वजह से उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को फोन कर के पूरे मामले को खुद के लैवल पर देखने को कहा.

इस की सब से बड़ी वजह यह भी थी कि भाजपा बिहार चुनाव मोदी के चेहरे पर ही लड़ रही है. दलित लड़की से गैंगरेप और उस की लाश को जबरन जलाने के सवालों से मोदी को जोड़ा न जा सके, इस के चलते प्रधानमंत्री द्वारा हस्तक्षेप किया गया.

उत्तर प्रदेश और बिहार के हालात एकजैसे ही हैं. एससी तबके को सताने की घटनाएं वहां भी होती रहती हैं. 2007 से 2017 के बीच अपराध के आंकड़े बताते हैं कि बिहार इस तरह के मामलों में देश में तीसरे नंबर पर रहा. बिहार में भाजपा व जद (यू) के साझेदारी की सरकार है. बिहार में 2016 में अनुसूचित जाति के लोगों पर जोरजुल्म के 5,701 मामले दर्ज हुए.

बिहार में वोट डालने का सब से बड़ा आधार जाति होती है. भाजपा ने रिया चक्रवर्ती और सुशांत सिंह राजपूत मामले में बिहार को उलझाने का काम किया, पर कुछ ही समय में यह मुद्दा दरकिनार हो गया. अब वहां 15 साल के सुशासन पर वोट पड़ने हैं. इन सालों के विकास का हिसाब देना जद (यू) और भाजपा को भारी पड़ेगा. एससी तबका सवर्ण और बीसी तबके के साथ खड़ा नहीं होना चाहता.

दरार से और बिगड़े हालात

बिहार में तकरीबन 16 फीसदी एससी हैं. इस में से 5 फीसदी सब से ज्यादा पासवान और 4 फीसदी वाल्मीकि वोट हैं. हाथरस में गैंगरेप की पीडि़ता लड़की इसी जाति की थी. उस के साथ इंसाफ को ले कर उत्तर प्रदेश के अलगअलग जिलों में वाल्मीकि समाज ने धरना और विरोध प्रदर्शन करना शुरू किया था.

जैसेजैसे बिहार में चुनाव प्रचार होगा, वैसेवैसे विपक्षी दल हाथरस कांड को मुद्दा बनाएंगे. यह बात समझ आने के बाद ही बिहार में राजग के सहयोगी लोक जनशक्ति पार्टी ने अपना रास्ता बिहार में अलग कर दिया. लोजपा बिहार में राजग के गठबंधन के साथ चुनाव नहीं लड़ रही है.

लोजपा नेता चिराग पासवान ने खुल कर कह दिया है कि वे केंद्र सरकार में भाजपा और राजग के साथ हैं, पर बिहार चुनाव में जद (यू) के चलते राजग गठबंधन में नहीं हैं.

बिहार भाजपा और जद (यू) दोनों का मत है कि चिराग पासवान के दोहरे फैसले का फायदा विरोधी दल उठाएंगे. इस आपसी लड़ाई में राजग को नुकसान हो जाएगा, इसलिए वे बारबार कह रहे हैं कि जो नीतीश के साथ नहीं वह राजग के साथ नहीं.

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तमाम दबाव के बाद भी चिराग पासवान नीतीश कुमार के सामने झुकने को तैयार नहीं हैं. यही नहीं, चिराग का झुकाव राजद यानी राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव की तरफ होने से राजग को दलित वोटों की ज्यादा फिक्र होने लगी है.

एससी बनेंगे मुद्दा

बिहार के विधानसभा चुनाव में इस बार लालू प्रसाद यादव सामने नहीं हैं. इस के बाद भी उन के सामाजिक न्याय की लड़ाई मुख्य मुद्दा है. लालू प्रसाद यादव को ‘शोषितों की असली आवाज’ और ‘सामाजिक न्याय के प्रतीक’ के रूप में देखा जाता है. वे भले ही पिछड़ी यादव जाति से हैं, पर बिहार में दलितों की गैरपासवान बिरादरी उन के साथ खड़ी होती रही है.

नीतीश कुमार ने महादलित आयोग का गठन कर के एससी तबके को रिझाने का काम भले ही किया हो, पर यह तबका कभी उन के साथ नहीं रहा है. नीतीश कुमार के लिए दलित ही नहीं, मुसलिम वोट बैंक भी परेशानी खड़ी करने वाला है. कश्मीर में धारा 370 के मुद्दे, राम मंदिर और नागरिकता कानून के चलते वह राजग के साथ खड़ा नहीं होगा. ऐसे में राजग के मुकाबले कांग्रेसराजद गठबंधन ज्यादा असरदार दिख रहा है.

बिहार में कोरोना के समय पलायन कर के आने वाला मजदूर तबका तकरीबन 40 लाख है, जिसे बिहार में कोई रोजीरोजगार नहीं मिला. उसे वापस बड़े शहरों की तरफ लौटना पड़ा. इन में बड़ी तादाद दलितों की है. उन को लग रहा है कि बीते 15 सालों में दलितों के हालात जस के तस ही हैं. हाथरस गैंगरेप मामले ने इस पर मुहर भी लगा दी है. जो बातें एससी तबका भूलने वाला था, वे उसे फिर से याद आ रही हैं.

नीतीश कुमार ने किया शर्मिंदा

जनता दल (यूनाइटेड) ने जिन 115 उम्मीदवारों  के नामों का ऐलान किया है, उन में से एक नाम कुख्यात मंजू वर्मा का भी है. मंजू वर्मा को नीतीश कुमार ने  चेरिया बरियारपुर विधानसभा सीट से टिकट दिया है. ये वही मंजू वर्मा हैं, जो नीतीश सरकार में समाज कल्याण विभाग की मंत्री थीं  और जिन के कार्यकाल में पिछले साल मुजफ्फरपुर बालिका गृह बलात्कार कांड हुआ था. इस कांड ने बिहार में सरकारी संरक्षण में बच्चियों के साथ यौन हिंसा  और दरिंदगी का एक ऐसा भयावह सच उजागर किया था, जिसे जान कर समूचा देश हैरान रह  गया था.

इस कांड के उजागर होने के बाद मंत्री मंजू वर्मा पर इस्तीफे का दबाव बना था और आखिरकार उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था. इस पूरे मामले में कथित रूप से मंजू वर्मा के पति चंद्रशेखर वर्मा के भी शामिल होने की बात सामने आई थी.

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जांच के दौरान पुलिस ने मंजू वर्मा के घर पर छापेमारी की थी, जहां से गैरकानूनी हथियार और कारतूस भी बरामद हुए थे. इस पूरे मामले में मंजू वर्मा और उन के पति को गिरफ्तार किया गया था और जेल जाना पड़ा था. हालांकि कुछ दिनों बाद कोर्ट से दोनों को जमानत मिल गई थी.

मंजू वर्मा को जद (यू) से एक बार फिर से टिकट दे कर नीतीश कुमार ने यह संकेत दे दिया है कि अगर वे फिर से मुख्यमंत्री बनते हैं, तो मंजू वर्मा की अगुआई और संरक्षण में बिहार में बच्चियों के साथ रेप और जोरजुल्म बदस्तूर जारी रहेगा.

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