News Story: एआई समिट, चीनी कुत्ता और भारत की साख

News Story: होली आने वाली थी. अनामिका अपने घर जाना चाहती थी, पर विजय को उसी के साथ होली खेलनी थी. एक दिन जब अनामिका विजय के घर आई, तो विजय ने कहा, ‘‘यार, होली पर घर मत जाओ . अब तो ठंड भी कम हो गई है. मुझे लगता है कि इस बार की होली हम दोनों मस्ती और मजे से मनाएंगे.’’


‘‘पर मैं पिछले 2 साल से अपने घर नहीं गई हूं. मम्मीपापा चाहते हैं कि मैं घर जाऊं उन के पास. अगर तुम्हें मेरे साथ होली खेलनी है, तो साथ चलो. बड़ा मजा आएगा,’’ अनामिका बोली.
‘‘तुम बात को कहां ले जा रही होमम्मी, आप कुछ बोलो …’’ विजय ने अपनी मम्मी को इस मामले में शामिल करते हुए कहा.


‘‘यह तुम दोनों का मामला है. मुझे तो होली वैसे भी ज्यादा पसंद नहीं है. पर एकदूसरे को रंग मलो, फिर उतारते फिरो. इस से तो अच्छा है कि घर पर बैठो और दहीभल्ले, गुजिया, चाय पार्टी करो. पर नहीं, लोगों को तो रंग के साथ भांग का नशा चाहिए. और नहीं तो दारू पार्टी कर के पूरे त्योहार का मजा बिगाड़ देते हैं.
‘‘मुझे तो रंगों से वैसे भी एलर्जी है. मैं इस पचड़े में नहीं फंसना चाहती.
यह तुम दोनों की समस्या है, खुद ही सुलझा,’’ मम्मी ने दो टूक अपनी
बात रखी.


‘‘वाह, बेटे ने मां का साथ मांगा, पर मां ने उसे ही लपेट दिया. अरे यार, हर त्योहार का अपना मजा होता है. तुम्हें रंग पसंद नहीं तो क्या लोग होली खेलना छोड़ दें,’’ इसी बीच पापा ने विजय का साथ दिया.
‘‘वही तो पापा. मम्मी को होली खेलना पसंद नहीं और ये अनामिकाजी अपने घर जा रही हैं. वैसे, जहां तक मम्मी की रंगों से एलर्जी से समस्या है, तो एआई कब काम आएगा,’’ विजय बोला.


‘‘एआई और रंग का क्या तालमेल बना?’’ अनामिका ने पूछा.
‘‘किस दुनिया में जी रही हो. क्या तुम नहीं जानती कि एआई होली की तैयारी में मदद करता है, जैसे कि रंगों की डिजाइनिंग, गानों की रिकमैंडेशन और होली के लिए खास औफर्स.
‘‘इतना ही नहीं, एआई होली के दौरान सुरक्षा को सुनिश्चित करने में मदद करता है, जैसे कि रंगों की पहचान और अवैध गतिविधियों की निगरानी,’’ विजय बोला.
तुम होली मेरे साथ खेलोगे या फिरओरियनरोबोटिक डौग के साथ?’’ अनामिका ने ताना कसा.
‘‘मतलब? यह तुम ने क्यों कहा?’’ विजय ने पूछा.
‘‘तुम ने दिल्ली में फरवरी महीने में हुए एआई समिट में हुए गलगोटियास यूनिवर्सिटी के विवाद का नहीं पढ़ा था क्या खबरों में?’’
‘‘गलगोटियास यूनिवर्सिटी का क्या मामला है?’’ विजय ने पूछा.
‘‘मैं ने खबर में पढ़ा था कि इस समिट में गलगोटियास यूनिवर्सिटी की एक प्रोफैसर नेहा सिंह ने एक रोबोट डौग को दिखाते हुए कहा कि इस का नामओरियनहै. उन्होंने यह भी कहा कि यह रोबोट उन की यूनिवर्सिटी के सैंटर औफ एक्सीलैंस में बनाया गया है.’’
‘‘तो इस पर विवाद कैसे हुआ?’’ विजय बोला.
‘‘दरअसल, सोशल मीडिया यूजर्स और फैक्ट चैकर्स ने तुरंत पकड़ लिया कि यहयूनिट्री जीओ2’ नाम का चाइनीज रोबोट है. चीन की कंपनी यूनिट्री रोबोटिक्स का ऐसा रेडीमेड प्रोडक्ट जो औनलाइन 2 से 3 लाख रुपए में आसानी से मिल जाता है.


‘‘इस का खुलासा होते ही सोशल मीडिया पर बवाल मच गया. लोग बोले कि यूनिवर्सिटी ने विदेशी प्रोडक्ट को अपना बता दिया,’’ अनामिका ने अपनी बात सम?ाई.
‘‘फिर यूनिवर्सिटी ने क्या कहा?’’ यह सवाल विजय के पापा का था.
‘‘यूनिवर्सिटी ने एक्स (ट्विटर) हैंडल पर बयान जारी किया, जिस में यूनिवर्सिटी की ओर से कहा गया कि गलगोटियास ने यह रोबोट डौग नहीं बनाया है, ही हम ने कभी ऐसा दावा किया है. हम दुनियाभर से (चीन, सिंगापुर, अमेरिका) सब से अच्छी टैक्नोलौजी ला कर छात्रों को एक्सपोजर देते हैं.
‘‘यूनिट्री से लिया गया रोबोट


सिर्फ दिखाने के लिए नहीं है, यह एक चलताफिरता क्लासरूम है. हमारे छात्र इसे इस्तेमाल करते हैं, इस की लिमिट्स टैस्ट करते हैं और अपनी नौलेज बढ़ाते हैं. इनोवेशन की कोई सीमा नहीं होती. लर्निंग की भी नहीं. हमारा मकसद छात्रों को आगे की टैक्नोलौजी से जोड़ना है, ताकि वे भारत में ही ऐसी चीजें डिजाइन, इंजीनियर और मैन्युफैक्चर कर सकें.


‘‘लेकिन यूनिवर्सिटी की इस बात पर भी मामला नहीं सुल? और कहा गया कि यूनिवर्सिटी का दावा गलत और भ्रामक है. वीडियो में प्रोफैसर (नेहा सिंह) ने साफ कहा था कि रोबोट हमारे सैंटर औफ एक्सीलैंस में बना है और नामओरियनदिया है. कई यूजर्स ने कहा कि पहले तो अपना बता दिया, अब क्लैरिफिकेशन में मुकर रहे हैं.’’


‘‘पर यह यूनिट्री रोबोट डौग आखिर बला क्या है?’’ इस बारे में विजय की मम्मी को अच्छी तरह जानना था.
‘‘आंटीजी, जितना मैं ने सम? है, यूनिट्री रोबोटिक्स एक चाइनीज कंपनी है. यह 4 पैरों वाले (क्वाड्रुपैड) रोबोट बनाती है. ये रोबोट असली जानवरों की तरह चलते हैं. ये औब्स्टेकल्स पार करते हैं. इंडस्ट्रियल इंस्पैक्शन करते हैं और मनोरंजन के काम भी आते हैं. यूनिट्री के रोबोट बौस्टन डायनामिक्स के स्पौट से सस्ते और आसानी से मिल जाते हैं,’’ अनामिका बोली.


‘‘मु? लगता है कि गलत या अधूरी जानकारी देने से अच्छा है कि अपना होमवर्क सही से किया जाए. गलगोटियास यूनिवर्सिटी की प्रोफैसर बिना सटीक जानकारी के कैमरे के सामने जोशजोश में ज्यादा बोल गईं,’’ विजय ने कहा.


‘‘गलगोटियास यूनिवर्सिटी ने सार्वजनिक रूप से माफी मांगी है. यूनिवर्सिटी ने इस पूरी घटना कोगलतफहमीकरार दिया है. यूनिवर्सिटी ने कहा कि पवेलियन पर तैनात प्रतिनिधि को प्रोडक्ट की तकनीकी उत्पत्ति की सही जानकारी नहीं थी. कैमरे के सामने आने के उत्साह में प्रतिनिधि ने उत्पाद के स्रोत को ले कर गलत और भ्रामक दावे कर दिए.


‘‘लेकिन यह मामला इतना ज्यादा बड़ा हो गया था कि बात बिगड़ती चली गई. सरकार ने इसे नैशनल एम्बैरसमैंट (राष्ट्रीय शर्म की बात) बताया. इस पूरे मामले पर आईटी सैक्रेटरी एस. कृष्णन ने साफ कहा, ‘एग्जिबिटर्स को ऐसे आइटम्स नहीं दिखाने चाहिए जो उन के नहीं हैं.’
‘‘18 फरवरी को गलगोटियास के स्टौल की बिजली काट दी गई और यूनिवर्सिटी को तुरंत एक्सपो खाली करने का आदेश दिया गया.’’


‘‘फिर तो विपक्ष ने केंद्र सरकार को खूब घेरा होगा?’’
‘‘बिलकुल. मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी के राज्यसभा सदस्य जौन ब्रिटास ने सोशल मीडिया हैंडलएक्सपर एक पोस्ट में आरोप लगाया कि ग्रेटर नोएडा में बनी गलगोटियास यूनिवर्सिटी कोप्रमुख भाजपा नेताओं का संरक्षण और समर्थनहासिल है.


‘‘शिव सेना (उद्धव ठाकरे) की नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने इस घटना कोशर्मनाकबताया और कहा कि इस से देश और इस शिखर सम्मेलन की साख को भारी नुकसान हुआ है.
‘‘तृणमूल कांग्रेस के सांसद साकेत गोखले ने कहा, ‘गलगोटियास नामक एक प्राइवेट यूनिवर्सिटी ने इंडिया एआई समिट में गो2 नामक चीनी रोबोट को अपना आविष्कार बताने की कोशिश की, लेकिन असली शर्मनाक बात यह है कि सरकारी चैनल डीडी न्यूज ने उन का पूरा प्रचार किया. आज डीडी न्यूज और भाजपा एकजैसे हैं. यह चैनल भाजपा का प्रचार माध्यम बन गया है.’
‘‘सही कहूं तो यह मुद्दा बहुत ज्यादा बड़ा बन गया था, जिस से इस एआई समिट की साख को बहुत बड़ा धक्का लगा है,’’ अनामिका बोली.


‘‘पर एक विवाद तो कांग्रेस ने भी खड़ा किया. सुना है कि समिट में कांग्रेस के लोगों ने खूब हंगामा किया था? क्या था पूरा मामला?’’ विजय ने पूछा.
अनामिका ने बताया,

‘‘शुक्रवार, 20 फरवरी को समिट में उस समय अफरातफरी मच गई थी, जब यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने वहां जम कर विरोध प्रदर्शन किया. जानकारी के मुताबिक, कार्यकर्ताओं ने सुरक्षा घेरे को तोड़ कर अंदर प्रवेश किया और नारेबाजी की.

‘‘विरोध प्रदर्शन का जो वीडियो सामने आया, उस में साफ देखा गया कि प्रदर्शनकारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ टीशर्ट उतार कर विरोध जता रहे थे. इन लोगों ने इस समिट, 2026 की आलोचना भी की और पीएम मोदी पर अमेरिका से ट्रेड डील परसम?ाताकरने का आरोप भी लगाया.
‘‘एक बयान में इंडियन यूथ कांग्रेस ने कहा कि उस के कार्यकर्ता एआई समिट में देश की पहचान से सम?ाता करने वाले प्रधानमंत्री के खिलाफ विरोध कर रहे थे. बाद में पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले लिया.’’


‘‘अमेरिका की ट्रेड डील से इस एआई समिट का क्या लेनादेना?’’ ‘‘इंडियन यूथ कांग्रेस के एक औफिशियल पोस्ट में कहा गया कि इंडियन यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने एआई समिट में देश की पहचान से सम?ाता करने वाले प्रधानमंत्री के खिलाफ अपनी आवाज उठाई और प्रोटैस्ट किया.
‘‘यह विरोध कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के उस बयान के बाद हुआ, जिस में उन्होंने समिट के और्गैनाइजेशन को ले कर सरकार पर हमला किया था. उन्होंने कहा था कि भारत के टैलेंट और डाटा का फायदा उठाने के बजाय, एआई समिट एक बेतरतीब तमाशा हैभारतीय डाटा बिक्री के लिए है, चीनी प्रोडक्ट दिखाए जा रहे हैं.


‘‘कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी एआई समिट में अव्यवस्था का आरोप लगाया था और दावा किया था कि जो भारत के लिए एकशोपीसइवैंट हो सकता था, वहपूरी तरह से अव्यवस्थामें बदल गया.


‘‘मल्लिकार्जुन खड़गे ने यह भी दावा किया कि खाने और पानी जैसी बेसिक सुविधाओं की कमी के कारण विजिटर्स और एग्जिबिटर्स दोनों कोबहुत ज्यादा परेशानीका सामना करना पड़ रहा है.
‘‘समिट में जिस समय कांग्रेस यूथ कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन किया उस समय एआई समिट में तमाम दिग्गज और प्रतिनिधि मौजूद थे. यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ता पोस्टरबैनर ले कर अंदर पहुंच गए थे.’’
‘‘पर सरकार तो इसे कामयाब समिट बता रही है. ऐसा क्यों? कांग्रेस के विरोध प्रदर्शन पर सरकार का क्या कहना है?’’ विजय के पापा ने पूछा.


‘‘अंकल, वे लोग तो भड़के हुए थे. भाजपा सांसद और राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने कांग्रेस के इस प्रदर्शन कोस्टुपिडिटी टू न्यूडिटी’ (मूर्खता से नग्नता) तक का सफर बताया. उन्होंने कहा कि यह देश की उपलब्धियों का अपमान है. वहीं, शहजाद पूनावाला ने इस प्रदर्शन कोएंटी इंडियाऔरचरित्रहीनकरार दिया. भाजपाई समर्थित कई संगठनों ने कांग्रेस के विरोध में खूब प्रदर्शन किए.


‘‘और जहां तक इस समिट के कामयाब होने की बात है, तो भारत सरकार के मुताबिक, ‘इंडिया एआई इम्पैक्ट समिटअब तक का सब से बड़ा एआई समिट था. ब्रिटेन, साउथ कोरिया और फ्रांस में यह समिट होने के बाद, पहली बारग्लोबल साउथके किसी देश में यह समिट हुआ.


‘‘21 फरवरी को 88 देशों और अंतराष्ट्रीय संगठनों ने नई दिल्ली एआई इम्पैक्ट समिट डिक्लेरेशन का समर्थन किया. इन में अमेरिका, चीन, ब्रिटेन, फ्रांस, जरमनी और यूरोपियन यूनियन शामिल हैं.
‘‘समिट के दौरान भारत के 3 एआई मौडल को भी लौंच किया गया. इन 3 मौडल के नाम हैंसर्वम, ज्ञानी और भारतजेन. इन मौडल्स का फोकस भारत की भाषाओं के इस्तेमाल पर था.


‘‘साथ ही, समिट के दौरान कई कंपनियों ने भारत में आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस में निवेश करने के वादे भी किए. इस में रिलायंस, माइक्रोसौफ्ट, गूगल जैसी कई कंपनियां शामिल हैं.’’ ‘‘मुझे लगता है कि जब कोई इतना बड़ा समिट होता है, तो वहां विवाद भी होते हैं. पर इस तरह के समिट के होते ही किसी तरह के फैसले पर नहीं पहुंचना चाहिए. कुछ समय देना चाहिए कि समिट में जोकुछ हुआ, उस का नतीजा क्या रंग लाएगा.


‘‘तकनीक से फायदा नुकसान दोनों होता है. यह तो उस को इस्तेमाल करने वाले पर निर्भर करता है कि वह आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस जैसी तकनीक को किस तरह से अपनी जिंदगी में उतारता है,’’ विजय ने कहा. ‘‘एकदम सही कहा. तकनीक दोधारी तलवार की तरह होती है. इस का इस्तेमाल सोचसम? कर करना चाहिए,’’ अनामिका ने हां में हां मिलाई, ‘‘चलो, हम ने खूब बहस कर ली अब तुम मु? कौफी पिलाओ. बाद में होली पर भी डिस्कस कर लेंगे.’’


‘‘क्यों नहीं. अब कोई रोबोट डौग तो हमारे लिए यहां कौफी लाएगा नहीं,’’ विजय का इतना कहते ही अनामिका खिलखिला कर हंस पड़ी. ‘‘तुम दोनों बैठो, आज कौफी मैं बनाता हूं,’’ विजय के पापा ने कहा तो मम्मी हैरान थीं यह सुन कर.        

Hindi Story: इनसानियत

Hindi Story: पूरे गांव में दीनानाथ की थूथू हो रही थी. शादी से पहले ही उन की बेटी लक्ष्मी पेट से हो गई थी. इतने में गांव के एक लड़के प्रकाश ने लक्ष्मी का हाथ थामना चाहा. क्या था यह पूरा मामला? गां के कुछ लोग चौपाल पर बैठे थे. दीनानाथ उन से निगाह चुरा कर आड़ में छिप गए. इस समय शर्म से उन का चेहरा जमीन में गड़ा जा रहा था. वे गांव वालों के किसी सवाल का जवाब नहीं देना चाहते थे.

चौपाल पर बैठा एक आदमी बोला, ‘‘कुछ सुना आप लोगों ने?’’ ‘‘क्या कह रहे हो?’’ दूसरे ने पूछा. ‘‘यह जो दीनानाथ मुंह छिपाए खड़ा है, इस की बेटी लक्ष्मी ने मोड़ीराम के बेटे प्रकाश से गुपचुप मंदिर में जा कर शादी कर ली.’’
‘‘मगर उस की तो सगाई हो चुकी थी, फिर?’’
‘‘हां, सगाई तो हो चुकी थी, मगर लक्ष्मी पेट से है.’’
‘‘उस ने किस के साथ मुंह काला किया?’’
‘‘सुना है कि भवानी शंकर का बिगड़ैल बेटा दिनेश, जो शहर के कालेज में पढ़ रहा है, का पाप लक्ष्मी के पेट में पल रहा है.’’
‘‘अरे धीरे बोल, दीवारों के भी कान होते हैं. बात भवानी शंकर के कानों तक पहुंच गई , तब हमारी खैर नहींछोड़ो ये बातेंवैसे, लक्ष्मी के साथ बहुत बुरा हुआ.’’
‘‘जब उस के ससुराल वालों को पता चलेगा कि लक्ष्मी ब्याह के पहले ही पेट से है, तब कैसे करेंगे वे शादी.’’
‘‘इसलिए तो ताबड़तोड़ प्रकाश से शादी करा दी.’’


आगे दीनानाथ कोई बात सुन सके. वे चुपचाप गरदन नीची कर के वहां से चलते बने. अब तो पूरे गांव को पता चल चुका है कि लक्ष्मी पेट से है और प्रकाश ने उस से शादी कर ली है. प्रकाश ने किन हालात में यह शादी की, किसी को नहीं मालूम. मगर दाई से कब तक वे पेट छिपाते रहेंगे. जहां भी चार आदमी बैठते हैं,
यही चर्चा पूरे गांव में हो रही है. दीनानाथ ऊंचा मुंह कर के चल भी नहीं सकते हैं. उस दिन जब दीनानाथ खेत से घर लौटे, तब उन की पत्नी कावेरी लक्ष्मी पर चिल्ला कर कह रही थीं, ‘‘अरी नासपीटी, बता किस का पाप तेरे पेट में पल रहा है? अब तालू में जबान क्यों चिपक गई है तेरी? बोल कौन है वह? किस के साथ तू ने मुंह काला किया? आग लगे तेरी जबान को.’’


मगर लक्ष्मी कोई जवाब नहीं दे पाई. वह नीचे मुंह किए खड़ी रही. तब दीनानाथ ने कहा, ‘‘अरे कावेरी, क्यों लक्ष्मी पर चिल्ला रही हो?’’ ‘‘पूछो अपनी लाड़ली से, इस ने क्या गुल खिलाया हैं,’’ उसी तरह गुस्से से कावेरी बोलीं. ‘‘क्या गुल खिलाया इस ने, जो इस पर इतनी नाराज हो रही हो?’’ ‘‘अरे, इच्छा तो ऐसी हो रही है कि इसे गला घोंट कर मार दूं. करमजली ने हम को कहीं का नहीं छोड़ा. अब हम समाज में कैसे मुंह दिखाएंगे,’’ कावेरी का गुस्सा शांत होने का नाम नहीं ले रहा था. दीनानाथ अब भी हालात को नहीं समझ पाए थे. वे कावेरी पर जोर देते हुए बोले, ‘‘अरे, कुछ बताओगी भी या यों ही इस तरह गुस्सा करती रहोगी?’’
‘‘तो सुन लो कान खोल कर, तुम्हारी लाड़ली पेट से है. किस के साथ इस ने काला मुंह किया, बता ही नहीं रही है,’’ यह कहते हुए कावेरी का गुस्सा सातवें आसमान पर था.


यह सुन कर दीनानाथ के होश उड़ गए. उन के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. मुंह से एक शब्द भी नहीं निकला. तब कावेरी गुस्से से बोलीं, ‘‘अब आप की जबान क्यों बंद हो गई यह सुन कर?’’ ‘‘क्यों बेटी, क्या यह सच है?’’ दीनानाथ ने जब शांत मन से यह पूछा, तब भी लक्ष्मी ने कोई जवाब नहीं दिया. कावेरी फिर गुस्से से बोलीं, ‘‘यही तो मैं पूछ रही हूं, मगर बता ही नहीं रही है.’’ ‘‘बताओ बेटी, घबराओ मतहम तुम्हारी मदद करेंगे,’’ दीनानाथ ने जब यह कहा, तब सिसकती हुई बापू के कंधे पर सिर रखती हुई लक्ष्मी मुश्किल से बोली, ‘‘बापू, भवानी शंकर के बिगड़ैल बेटे दिनेश का.’’


इस बात को सुन कर दीनानाथ और कोवरी को झटका लगा. वे दोनों कुछ बोल सके. भवानी शंकर गांव के सब से अमीर किसान थे. राजनीति में भी उन की अच्छी पकड़ थी. वे गांव के दबंग कहलाते हैं. किसी में भी हिम्मत नहीं है कि उन के खिलाफ कुछ बोले. भवानी शंकर का बिगड़ैल बेटा दिनेश शहर के कालेज में पढ़ रहा है. पढ़ क्या रहा है, वहां गुंडागर्दी कर रहा है. वह गांव में भी जिन गलियों से गुजरता है, औरतें और लड़कियां दरवाजे बंद कर लेती हैं. अगर थाने में भी रिपोर्ट लिखाओ, तब लेदे कर मामला रफादफा हो जाता है. कहने का मतलब यह है कि भवानी शंकर ने सब को खरीद लिया है. दीनानाथ ने लक्ष्मी से पूछा, ‘‘यह सब कैसे हुआ बेटी?’’


‘‘बापू, उस दिन आप शहर गए थे. खेत पर मैं अकेली ही काम कर रही थी. तभी दिनेश खेत पर आया और मुझे पकड़ लिया. मैं ने उस के चंगुल से निकलने की बहुत कोशिश की, मगर निकल सकी. उस ने मुझे जीप में डाल दिया. उस का साथी गाड़ी चला रहा था. वह उस के खेत वाली हवेली में ले गया…’’ आगे लक्ष्मी सिसकियां ले कर रोने लगी. इस समय कावेरी भी चुप हो गईं और दीनानाथ भी कुछ बोल सके. एक डर उन के भीतर बैठ गया, इसलिए उन को यह सच निगलते बन रहा है, उगलते. कावेरी का ऊपर का गुस्सा जरूर ठंडा हो गया, मगर भीतर तो भवानी शंकर के खिलाफ लावा सुलग रहा था. ‘‘अब क्या सोच रहे हो? सारे गांव में यह बात फैले, उस के पहले ही लक्ष्मण सिंह से मिल कर इस की शादी कर दो.’’  ‘‘अरे कावेरी, क्या लक्ष्मण सिंह को पता नहीं चला होगा?’’ दीनानाथ बीच में बात काट कर बोले. ‘‘अरे, आप तो यों ही बैठेबैठे बातें करते रहेंगे. जाओ, जल्दी से जल्दी शादी की तारीख तय कर के आओ,’’ जोर देते हुए कोवरी बोलीं.


‘‘जाता हूं,’’  कह कर दीनानाथ पास के गांव जाने के लिए बसस्टैंड पर कर बस का इंतजार करने लगे.
पूरे 5 घंटे बाद दीनानाथ मुंह लटकाए गांव में वापस आए. कावेरी उन का ही इंतजार कर रही थीं. वे बोलीं, ‘‘तारीख तय कर आए शादी की समधीजी से?’’ दीनानाथ ने कोई जवाब नहीं दिया, तो वे गुस्से से बोलीं, ‘‘अरे, क्या कहा समधीजी ने? यों मुंह लटकाए क्यों खड़े हो? बोलते क्यों नहीं?’’ ‘‘लक्ष्मण सिंह ने यह सगाई तोड़ दी,’’ दीनानाथ बोले. ‘‘क्यों तोड़ दी?’’ गुस्से से उफनती हुई कावेरी बोलीं. ‘‘किसी ने यह बात उन तक पहुंचा दी कि लक्ष्मी पेट से है.’’ ‘‘आग लगे उस को जिस ने यह बात उन तक पहुंचाई,’’ कावेरी बोलीं.
‘‘अब गाली देने से कुछ होगा कावेरी, फिर किसकिस को गाली देगी. इस बात का सभी को पता चल गया है,’’

दीनानाथ समझाते हुए बोले.
  ‘‘अब तो एक ही रास्ता है,’’ कावेरी बोलीं.
‘‘कौन सा?’’ 
‘‘दिनेश से कहें कि वह लक्ष्मी से शादी करे.’’
‘‘यह मुमकिन नहीं होगा कावेरी, वे बड़े लोग हैं.’’
‘‘बड़े हैं, तो इस का मतलब यह नहीं है कि ….’’
‘‘कावेरी, चुप हो जाओ. यह समय गुस्सा करने का नहीं है…’’ बीच में ही बात काट कर दीनानाथ बोले, ‘‘बड़े लोग यह साबित कर देंगे कि…’’
‘‘अरे, उस लक्ष्मी को ढूंढ़ कर लाओ, कहीं गुस्से में कर जान दे बैठे…’’ अचानक बीच में ही बात काटती हुई कावेरी बोलीं, ‘‘बिना कहे कहीं चली गई है.’’
‘‘एक मां हो कर भी तुम जवान लड़की पर अनापशनाप चिल्ला रही थीं, जबकि इतना गुस्सा करना ठीक नहीं है,’’

दीनानाथ बोले. ‘‘अरे, यह समय भाषण देने का नहीं है. जाओ उसे गांव में जा कर ढूंढ़ो. कहां गई है करमजली…’’ कावेरी फिर गुस्से से बोलीं, ‘‘फिर मैं तो उस पर गुस्सा इसलिए कर रही थी कि ऐसी हालत में अब उस से कौन करेगा शादी?’’
‘‘मैं कर रहा हूं लक्ष्मी से शादी,’’ अभी कावेरी की बात खत्म भी नहीं हुई थी कि मोड़ीराम के बेटे प्रकाश ने कर यह बात कह दी.
‘‘तुम करोगेमोड़ीराम क्या…?’’
‘‘छोड़ो बापू कोवे राजी नहीं होंगे. यही कहना चाहते हैं आप,’’ बीच में ही बात काट कर प्रकाश बोला, ‘‘मगर मैं आप की और लक्ष्मी की इज्जत की खातिर शादी करने को तैयार हूं. आप अपनी रजामंदी दें. मैं पढ़ालिखा हूं. लक्ष्मी भी पढ़ीलिखी है.
‘‘इस में लक्ष्मी का कहां कुसूर है? आएदिन इस देश में कई लड़कियों के साथ ऐसी घटनाएं होती हैं. जो थाने तक पहुंचती हैं, वे तो उजागर हो जाती हैं, मगर मेरा फैसला अटल है.’’
‘‘मगर बेटा, लक्ष्मी घर में नहीं है, कहीं चली गई है,’’ कावेरी ने जब यह बात कही तब प्रकाश बोला, ‘‘मैं लक्ष्मी को यहां से 5 किलोमीटर दूर एक मंदिर में दोस्तों के साथ छोड़ कर आया हूं.’’
‘‘मगर तुम्हें लक्ष्मी मिली कहां?’’ दीनानाथ ने पूछा.
‘‘उसी भवानी शंकर के  कुएं पर खुदकुशी करने जा रही थी. जब मैं ने वजह पूछी, तब उस ने सब सचसच बताया. क्या सोच रहे हैं आप लोग?’’
वे दोनों तत्काल प्रकाश के साथ हो लिए. इस तरह प्रकाश और लक्ष्मी के बीच मंदिर में हुई शादी के वे दोनों सहभागी बने.


‘‘अरे दीनानाथ, किस धुन में जा
रहे हो. तुम्हारा घर तो पीछे छूट गया,’’ जब मानमल ने दीनानाथ से यह कहा
तब वे अतीत से वर्तमान में लौटे. वे पलट कर अपने घर में घुस गए.
घर में घुसते ही कावेरी बोलीं, ‘‘सारे गांव में हमारी थूथू हो रही है.’’
‘‘होने दो कावेरी, थोड़े दिन कह कर लोग चुप हो जाएंगे. मगर इनसानियत अब भी बची है कि प्रकाश ने लक्ष्मी से शादी कर के हमारी इज्जत बचा ली,’’ दीनानाथ ने यह बात कही.
कावेरी कुछ नहीं बोलीं, बल्कि गुमसुम खड़ी रहीं.     Hindi Story  

Film: रवि गोसाईं-अदाकारी का अलहदा सफर

Film: गुल आप अपनी शुरुआती जिंदगी के बारे में बताइए. मैं मूल रूप से दिल्ली का रहने वाला हूं. मेरी पढ़ाई लिखाई जैसे स्कूलकालेज सबकुछ दिल्ली से ही हुआ. मेरे मातापिता पंजाब से थे, लेकिन आज अगर पहचान की बात करूं, तो मैं खुद को पूरी तरह मुंबई का मानता हूं. यही शहर है जहां मैं ने अपने सपनों को जिया और उन्हें पूरा होते देखा.


आप की एक्टिंग और डांस की शुरुआत कैसे हुई?
बचपन से ही मुझे एक्टिंग और डांस का बेहद शौक था. पहले मैं ने प्रोफैशनल डांसिंग शुरू की और साथसाथ थिएटर वर्कशौप्स करने लगा. इसी दौरान नुक्कड़ नाटक किए, जिस से एक्टिंग की समझ और जमीन से जुड़ाव मिला.

आप को मुंबई आने का पहला बड़ा ब्रेक कैसे मिला?
मेरे कालेज के एक सीनियर दोस्त थे, जो डायरैक्टर गिरीश मलिक के साथ काम कर रहे थे. वे एक टीवी शो में लीड रोल कर रहे थे और उसी शो के लिए एक और किरदार कास्ट होना बाकी था. उन्होंने मेरा नाम डायरैक्टर साहब को दिया और मुझे मुंबई बुलाया गया. वह शो थापरवरिश’, जो जी टीवी पर आया और जिस में किरण कुमार मेरे पिता के रोल में थे.


आप का फिल्म की दुनिया में आगे का सफर कैसा रहा?
इस के बाद मैं केतन मेहता के असिस्टैंट प्रशांत नारायणन के साथ पृथ्वी थिएटर में एक्टिंग वर्कशौप्स करने लगा. उन्हीं के जरीए मुझे फिल्मओह डार्लिंग, ये है इंडियामें काम मिला. फिर मेरी जिंदगी का एक बेहद अहम मोड़ आया, जब मेरा दोस्त भूपिंदर, जो उस वक्त मेरा फ्लैटमेट भी था, ने मुझे गुलजार साहब की फिल्ममाचिसके बारे में बताया और उन से मुलाकात तय कराई. पहली ही मीटिंग में गुलजार साहब ने मुझे पसंद कर लिया. उन के साथ काम करना हर एक्टर का सपना होता है और मेरा सपना अचानक सच हो गया.


सीरियल ‘परवरिश’ के बाद टीवी में आप का सफर कैसे आगे बढ़ा?
फिल्ममाचिसके बाद जब मैं अलगअलग डायरैक्टर्स से मिलने लगा, तो संजीव भट्टाचार्य और रवि राय के पास अकसर जाता था. एक दिन मुझे संजीव भट्टाचार्य का फोन आया और उन्होंने कहा, ‘अब तो तुम्हारी फिल्म इतनी बड़ी हिट हो गई है, क्या अब भी मेरे साथ टीवी में काम करोगे?’ मैं ने बिना सोचेहांकर दी.
मैंअमानतसीरियल मेंचंदरका रोल करना चाहता था, लेकिन संजीव भट्टाचार्य ने कहा, ‘वह रोल तो कोई भी कर सकता है, लेकिननिगोड़ेके लिए मुझे एक मंझा हुआ, पुख्ता एक्टर चाहिए. इस किरदार में बहुत शेड्स हैं, जैसे यह हंसाता भी है, रुलाता भी है.’उस एक लाइन ने मुझे क्लीन बोल्ड कर दिया और वही किरदार मेरे लिए यादगार बन गया.


फिल्म ‘शूटआउट एट लोखंडवाला’ आप के लिए क्यों खास थी?
शूटआउट एट लोखंडवालामेरी जिंदगी की बेहद अहम फिल्म है. भले ही मेरा एक बड़ा सीन छोटा हो गया था, लेकिन किरदार बहुत असरदार था. सब से बड़ी बात यह रही कि मुझे फिल्म के पोस्टर में जगह मिली. प्रीमियर शो के दौरान मेरा कटआउट अमिताभ बच्चन साहब के साथ लगा हुआ था. वह पल मेरे लिए यादगार था. और जब फिल्म सुपरहिट हो जाए, तो फायदा तो होता ही है.


आप की महेश भट्ट के साथ जुड़ने की कहानी काफी चर्चित है. क्या था वह किस्सा?
हां, यह बिलकुल सच है. महेश सर अकसर नए एक्टर्स को सीधे फोन कर लेते हैं. एक पंजाबी फिल्मशेरा क्रैकके लिए गिरीश धमीजा के कहने पर उन्होंने मुझे चुना और खुद फोन किया. मैं उस समय सो रहा था. नींद में ही बोला, ‘कौन है यार, सो रहा हूं…’ उधर से आवाज आई, ‘मैं महेश भट्ट बोल रहा हूं. जब तुम सो रहे थे, तुम्हारी किस्मत जाग रही थी. उठ कर औफिस जाना.’ फोन रखते ही 5 मिनट बाद मुझे होश आया और मैं दौड़ पड़ा उन से मिलनेऔर मुझेशेरा क्रैकमिल गई.


आप का ‘द गांधी मर्डर केस’ फिल्म में इंटरनैशनल एक्टर्स के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा?
उस फिल्म में मुझे हौलीवुड के शानदार कलाकारों के साथ काम करने का मौका मिला, जिन में स्टीफन लैंग भी शामिल थे. साथ ही, ओम पुरी के साथ तकरीबन एक महीना बिताने का मौका मिला.


फिलहाल आप किन प्रोजैक्ट्स पर काम कर रहे हैं?
हाल ही मेंमेहंदी वाला घरऔरमेघा बरसेंगेसीरियल खत्म हुए हैं. इस के बाद वर्टिकल शोज की
एक लाइन सी लग गई हैअब तक मैं 6 सीरीज कर चुका हूं.इस समय मैं सन टीवी के बेहद हिट शोनंदिनी पार्ट 2 (राजनंदिनी)’ की शूटिंग कर रहा हूं, जो अप्रैल महीने तक वडोदरा में चलेगी. इस में मैं भास्कर का मेन नैगेटिव किरदार निभा रहा हूं. एक ऐसा इनसान, जो 2 अलगअलग रूपों में जी रहा है.


सोशल मीडिया को आप कैसे देखते हैं?
अगर सोशल मीडिया का सही इस्तेमाल किया जाए, तो यह बहुत पौजिटिव टूल है, लेकिन इस की एक लिमिट तय होनी चाहिए वरना यह समय भी खराब कर सकता है. आज इस के अच्छे और बुरे दोनों तरह के असर देखने को मिलते हैं.                                            

Press Release: पटना में सजेगा भोजपुरी सिनेमा का महोत्सव

Press Release: 7वां सरस सलिल भोजपुरी सिने अवॉर्ड्स समारोह का 15 मार्च, 2026 को पटना के बापू सभागार में*

पटना: भोजपुरी सिनेमा के प्रतिष्ठित और बहुप्रतीक्षित 7वें सरस सलिल भोजपुरी सिने अवॉर्ड्स शो का आयोजन 15 मार्च को सायं 6 बजे से बिहार की राजधानी पटना के ऐतिहासिक बापू सभागार में किया जाएगा। यह समारोह भोजपुरी फिल्म उद्योग के लिए एक बड़े सांस्कृतिक उत्सव के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें सिनेमा जगत की नामचीन हस्तियां शिरकत करेंगी।

इस संबंध में पटना स्थित आई.एम. ए. हाल में आयोजित प्रेस वार्ता में जानकारी देते हुए दिल्ली प्रेस में सरस सलिल के इंचार्ज भानु प्रकाश राणा ने बताया कि यह अवॉर्ड शो अब बिहार की राजधानी पटना में हो रहा है, जो एक नए अध्याय की शुरुआत है. इस बार इसे और भव्य और बड़े स्तर पर किया जाएगा और दर्शकों के लिए यह मनोरंजन का शानदार अनुभव रहेगा।

भानु प्रकाश राणा ने बताया कि इस अवॉर्ड शो में नामांकित फिल्मों और कलाकारों को जूरी द्वारा चयनित कर विभिन्न श्रेणियों में सम्मानित किया जाएगा। कार्यक्रम के दौरान रंगारंग सांस्कृतिक प्रस्तुतियां, लाइव म्यूजिकल परफॉर्मेंस और स्टार नाइट मुख्य आकर्षण रहेंगे।

*डिजिटल युग के साथ बदला अवॉर्ड शो का स्वरूप*
भोजपुरी सिनेमा में अपनी जबरदस्त कॉमेडी के जरिए हंसाने वाले अभिनेता रोहित सिंह मटरू ने बताया इस वर्ष के आयोजन की सबसे बड़ी विशेषता इसका परिवर्तित फॉर्मेट है। बदलते समय और डिजिटल प्लेटफॉर्म के विस्तार को ध्यान में रखते हुए इस बार अवॉर्ड शो को तीन प्रमुख वर्गों में बांटा गया है—सिनेमा (थिएटर रिलीज फिल्में), ओटीटी प्लेटफॉर्म और यूट्यूब/टीवी कंटेंट के आधार पर बेस्ट अवॉर्ड्स दिए जाएंगे। आयोजन समिति से जुड़े बृहस्पति कुमार पांडेय ने बताया कि भोजपुरी कंटेंट अब केवल सिनेमाघरों तक सीमित नहीं है, बल्कि ओटीटी और डिजिटल माध्यमों के जरिए विश्वभर में देखा जा रहा है। ऐसे में इन प्लेटफॉर्म पर कार्य करने वाले कलाकारों और तकनीशियनों को समान मंच देना समय की आवश्यकता है।

*2020 से शुरू हुआ सम्मान का यह सिलसिला*

सरस सलिल भोजपुरी सिने अवॉर्ड्स शो की शुरुआत वर्ष 2020 में बस्ती जिले से हुई थी जिसका उद्देश्य था भोजपुरी सिनेमा को एक व्यवस्थित और प्रतिष्ठित मंच प्रदान करना। लोकप्रिय पत्रिका सरस सलिल द्वारा शुरू की गई इस पहल ने कुछ ही वर्षों में भोजपुरी फिल्म उद्योग में अपनी विशेष पहचान बना ली।
इसके बाद अयोध्या में 3 बार, बस्ती में 2 बार, इसका आयोजन हुआ था। लगातार इस आयोजन की भव्यता और सहभागिता में वृद्धि होती गई।

*लखनऊ में हुआ था छठा भव्य आयोजन*
पिछले वर्ष ‘छठा सरस सलिल भोजपुरी सिने अवॉर्ड्स’ शो का आयोजन लखनऊ के प्रतिष्ठित इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में हुआ था। यह अब तक का सबसे बड़ा और व्यवस्थित समारोह माना गया।
उस समारोह में 50 से अधिक श्रेणियों में पुरस्कार प्रदान किए गए। बेस्ट फिल्म, बेस्ट अभिनेता, बेस्ट अभिनेत्री, बेस्ट निर्देशक, बेस्ट सिंगर, बेस्ट म्यूजिक डायरेक्टर और लाइफटाइम अचीवमेंट जैसी प्रमुख श्रेणियों में कलाकारों को सम्मानित किया गया।

अब तक हुए अवॉर्ड समारोह में यह अवॉर्ड दिनेशलाल यादव ‘निरहुआ’, अरविंद अकेला ‘कल्लू’, प्रदीप पांडे ‘चिंटू’, अंजना सिंह, आम्रपाली दुबे, ऋचा दीक्षित, संजय पांडेय, देव सिंह, अवधेश मिश्रा, रक्षा गुप्ता, मनोज टाइगर, प्रियंका सिंह, सीपी भट्ट, संजय कुमार श्रीवास्तव,विजय खरे, केके गोस्वामी, शुभम तिवारी, माही खान, मनोज भावुक, प्रसून यादव, कविता यादव, अनुपमा यादव, अंतरा सिंह ‘प्रियंका’, समर सिंह, सहित कई नामचीन एक्टरों को मिल चुका है।

पिछले वर्ष लखनऊ में हुए अवॉर्ड शो में लोकप्रिय अभिनेता अरविंद अकेला ‘कल्लू’, अभिनेत्री अंजना सिंह, निर्देशक रजनीश मिश्रा सहित कई चर्चित हस्तियों को उनके उत्कृष्ट कार्य के लिए सम्मान मिला। समारोह में बड़ी संख्या में दर्शकों और मीडिया की उपस्थिति ने इसे ऐतिहासिक बना दिया।

*इस बार पटना में और भी भव्य तैयारी*
अभिनेता और गायक विवेक पांडेय ने पटना में आयोजित हो रहे सातवें संस्करण को और भी भव्य और आकर्षक बनाने की तैयारी की गई है। रेड कार्पेट एंट्री, सेलिब्रिटी इंटरैक्शन, लाइव डांस परफॉर्मेंस और विशेष सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए इसे यादगार बनाने की योजना है।
भोजपुरी सिनेमा के चर्चित सितारे, निर्माता-निर्देशक, संगीतकार, गायक और तकनीकी विशेषज्ञ इस समारोह में भाग लेंगे। आयोजकों का कहना है कि यह मंच केवल सितारों को सम्मानित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि पर्दे के पीछे काम करने वाले तकनीकी कलाकारों को भी बराबर की पहचान देता है।

*क्षेत्रीय सिनेमा को नई ऊंचाई*
आयोजकों ने बताया कि सरस सलिल भोजपुरी सिने अवॉर्ड्स शो का मुख्य उद्देश्य भोजपुरी फिल्म उद्योग के प्रतिभाशाली कलाकारों और तकनीशियनों को प्रोत्साहित करना तथा क्षेत्रीय सिनेमा को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाना है।
भोजपुरी सिनेमा ने पिछले कुछ वर्षों में कंटेंट, तकनीक और प्रस्तुति के स्तर पर उल्लेखनीय प्रगति की है। डिजिटल प्लेटफॉर्म के विस्तार के साथ इसकी पहुंच देश-विदेश तक बढ़ी है। ऐसे में यह अवॉर्ड समारोह उद्योग को एक सकारात्मक प्रतिस्पर्धा और गुणवत्ता की दिशा में प्रेरित करता है।

*सिने प्रेमियों से अपील*
आयोजन समिति ने पटना और आसपास के जिलों के सिने प्रेमियों से अधिक से अधिक संख्या में उपस्थित होकर इस भव्य समारोह की शोभा बढ़ाने की अपील की है। जब बापू सभागार में रोशनी, कैमरा और तालियों की गूंज होगी, तब यह केवल कलाकारों का सम्मान नहीं बल्कि पूरी भोजपुरी संस्कृति का उत्सव होगा।

7वां सरस सलिल भोजपुरी सिने अवॉर्ड्स शो एक बार फिर यह साबित करने जा रहा है कि भोजपुरी सिनेमा अब क्षेत्रीय दायरे से निकलकर राष्ट्रीय और वैश्विक मंच पर अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रहा है।

दिल्ली प्रेस पिछले 86 वर्षों से भारत का एक अग्रणी प्रकाशन समूह रहा है और इसकी 9 भाषाओं में प्रकाशित होने वाली 30 पत्रिकाओं के जरिए देश-भर के पाठकों तक सीधी पहुंच है। हमारे यहां देश की सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली हिंदी पत्रिकाओं ‘सरिता’, ‘गृहशोभा’, ‘चंपक’, ‘सरस सलिल’, ‘मुक्ता’, मनोहर कहानियां’, ‘सत्यकथा’ का निरंतर सफल प्रकाशन किया जा रहा है, जिन्हें करोड़ों पाठक बड़े चाव से पढ़ते हैं।

दिल्ली प्रेस समूह की ‘सरस सलिल’ पत्रिका वर्ष 1993 से निरंतर प्रकाशित हो रही है और आमजन को जानकारी देने के साथ-साथ उनका मनोरंजन भी कर रही है।

Hindi Story: मर्दानगी की चिंता 

Hindi Story: यूट्यूब और सोशल मीडिया के इस जमाने में एक अजीब ट्रैंड चल रहा है कि मर्दों की सेहत को ले कर उन की पत्नियां ज्यादा चिंता में नहीं दिखती हैं, बल्कि जितने महिला यूटयूबरों के माथे पर बल दिखते हैं. वे महिलाएं, जिन्हें मर्दों के पीठदर्दब्लड प्रैशर, शुगर, दिमागी सेहत से ज्यादा उन की मर्दाना सेहत की चिंता है. इतनी चिंता कि लगता है जैसे इरैक्शन यानी मर्दाना अंग में तनाव कोई अनाथ बच्चा हो, जिसे अब यूट्यूब ने गोद ले लिया है.


यूट्यूब खोलते ही कोई सलोने पर गंभीर चेहरे वाली मोहतरमा चेतावनी देती दिखती है किमहाशय, आप ने अगर भूल से भी ये 3 फल खा लिए, तो समझ लीजिए आप की मर्दानगी का नैवर्क चला जाएगा.’
अब मर्द घबरा जाता है, क्योंकि उसे तो यही नहीं पता था कि इरैक्शन भी मोबाइल टावर से चलता है और फल खाने से उस का सिगनल गिर सकता है. दूसरी मोहतरमा बड़े दबदबे से दावा करती है किप्लीज, इन 5 चीजों का रोज सेवन कीजिए, 60 की उम्र में भी 20 वाली फीलिंग आएगी.’


मर्द सोचता है कि अगर 20 वाली फीलिंग गई तो 20 वाली बेरोजगारी, भरम और असुरक्षा भी साथ आएगी क्या? क्योंकि अनुभव बताता है कि उम्र सिर्फ शरीर में नहीं, जिम्मेदारियों में भी होती है. लेकिन यूट्यूब के लिए बुढ़ापा बीमारी है और जवानी प्रोडक्ट. 65 70 के मर्द सोचते हैं कि यह उन के साथ भेदभाव है, 60 की जगह 70-80 भी बोलना था. फिर प्रोस्टैट की सेहत के वीडियोज का दौर शुरू होता है. ऐसा लगता है कि यूटयूब ने प्रोस्टैट के वीडियोज का एक अलग सैक्शन बना रखा है कियह मत खाइए, वह मत खाइए. अरे, यह तो जहर है, प्रोस्टैट का बंटाधार कर देगा.’


अब प्रोस्टेट कोई अंग नहीं, बल्कि किराए की खोली लगती है, जो जरा
सी गलती पर खाली करवा ली जा सकती है. मर्द डरता है कि कल तक जो खाना सेहतमंद था, आज वही जहर बन चुका है. लगता है कि सब्जियां भी अब राजनीतिक दलों की तरह पाला बदल रही हैं. कुछ वीडियो बडे़ फौरवर्ड होते हैं. आखिर क्यों हों, जब मोहतरमाएं इतनी फौरवर्ड हो चुकी हैं. ‘मास्टरबेशन (हस्तमैथुन) प्रोस्टैट के लिए नुकसानदायक है या फायदेमंद?’ यह सवाल नहीं, बल्कि इंटरनैशनल डिबेट है. मर्द दुविधा में है कि अगर नुकसानदायक है तो छोड़ दे, अगर फायदेमंद है तो मैडिकल सर्टिफिकेट बनवाए. आत्मनिर्भर भारत के बाद अब आत्मनिर्भर शरीर का युग चुका है, जहां हर क्रिया के लिए रिसर्च पेपर चाहिए. सब से अचरज वाली बात यह है कि ऐसी महिलाएं अचानक से मर्दों से जुड़े वीडियोज की यूट्यूब पर सुनामी ले आई हैं. मर्द अगर बीमार पड़ा तो कहा जाता है किअरे, कुछ नहीं, हवा लग
गई होगी.’


आज वही मर्द अगर उबासी ले ले
तो यूट्यूब बता देता है, ‘यह आप के टैस्टोस्टैरोन के गिरते लैवल की निशानी है.’ अब थकान कमजोरी नहीं, कंटैंट है. यूट्यूब पर मर्दों की हालत चुनाव से पहले के वोटर जैसी हो गई है. हर चैनल कहता है किसच सिर्फ मेरे पास है, बाकी सब झूठे हैं और आप की मर्दानगी के दुश्मन हैं.’ अब मर्दानगी चरित्र नहीं रही, वह थंबनेल का सब्जैक्ट बन चुकी है. लाल तीर, चिंताग्रस्त चेहरा, बड़े अक्षरों में लिखा कियह गलती की
तो सब खत्म.’ और ये सारे शुभ काम महिला यूटयूबरों के सौजन्य से हो रहे हैं. एक वीडियो कहता है कि यह खाया तो इरैक्शन जाएगा. दूसरा वीडियो कहता है कि यह नहीं खाया तो आएगा ही नहीं. तीसरा वीडियो कहता है कि ऐसे इरैक्शन में करैक्शन आएगा.


मर्द सोचता है कि मैडम, पहले आप तय कर लीजिए कि मेरी समस्या खाना है, उम्र है या मर्द होना है.
यूट्यूब के इस मैडिकल नियम में मर्द शरीर एक मशीन है. सही फल डालो, सही ड्रिंक भरो और बटन
दबाते ही परफौर्मैंस शुरू. तनाव, रिश्ते, जिम्मेदारियां सब एक्स्ट्रा फीचर हैं, जिन्हें वीडियो में जगह नहीं मिलती या जानबूझ कर नहीं दी जाती. असली बीमारी सेहत की नहीं, भरोसे की है. पहले मर्दानगी को
रैस्टोर करने के दावे खानदानी हकीम करते थे, अब ये यूटयूबर मोहतरमाएं कर रही हैं. इन महिला यूट्यूबर के पास कई सीक्रेट हैं जैसे सीक्रेट फल, सीक्रेट ड्रिंक, सीक्रेट नुसखा. इतने सीक्रेट कि लगता है मर्दानगी कोई सीबीआई केस हो. जो जितना ज्यादा डर दिखाए, उतना ज्यादा व्यू पाए.


यूट्यूब की इस नई मर्द सेवा समिति को सलाम, जिस ने साबित कर दिया कि मर्दों की सब से बड़ी बीमारी कोई अंग नहीं, बल्कि हर वीडियो को गंभीरता से लेना, लाइक, कमैंट और सब्सक्राइब करना है. गंगाधर तो इस नतीजे पर पंहुचा है कि हर फल जहर है, हर वीडियो अमृत. सेहत शौर्टकट में नहीं मिलती है, बल्कि अनुशासन, सही खानपान सही सोच से सुधरती है. भले ही एल्गोरिदम तब तक तय कर चुका होता है कि आज इरैक्शन, कल प्रोस्टैट और परसों आत्मग्लानि. इसी को तो समझना है. और सच यह है कि कुछ समस्याएं डाक्टर से नहीं, बल्कि अपनेआप यानी यूट्यूब वीडियोज देखना बंद करने से ही ठीक हो जाती हैं. होमियोपैथी के प्लेसबो (विश्वास के चलते होने वाला सुधार) की तरह यह भी उपचार का एक तरीका है.                            

Hindi Story: हिसाब

Hindi Story: पिता का साया उठते ही मुन्नी का बचपना अचानक बालिग हो गया. परिवार पालने के लिए वह आर्केस्ट्रा में डांसर बनी जहां साहिल ने उस की देह भोगी. भाई भी उसे पसंद नहीं करता था. क्या मुन्नी के बलिदान का हिसाब हुआ?

मुन्नी को कभी यह एहसास ही नहीं हुआ कि वह कब बड़ी हो गई. उस के जीवन में उम्र का बढ़ना किसी उत्सव की तरह नहीं, बल्कि जिम्मेदारी की तरह आया, बिना पूछे, बिना रुके. मुन्नी घर की बड़ी बेटी थी. छोटे भाई की बड़ी बहन और मां के लिए एक ऐसा सहारा जो बचपन में ही बालिग बना दिया गया. जब मुन्नी 12 साल की थी, तभी पिता का साया उठ गया. प्राइवेट नौकरी थी उन की, कोई पैंशन नहीं, कोई जमीनजायदाद नहीं.

पिता की मौत के बाद सरकार की अनुकंपा पर मां को नौकरी तो मिली, पर इतनी मामूली कि उस से घर का गुजारा ही बड़ी मुश्किल से हो पाता था. घर में शोक था, पर उस से भी बड़ा बोझ जिम्मेदारी का था. पिता के जाने के कुछ महीनों बाद ही मुन्नी की किताबें धीरेधीरे बंद होने लगीं. 8वीं जमात के बाद स्कूल जाना छूट गया. मां ने कहा नहीं था कि पढ़ाई छोड़ दो, पर हालात ने कह दिया था. किसी ने जोर नहीं डाला, किसी ने रोका भी नहीं. समाज में यह तय था कि लड़की की पढ़ाई रुके तो चलेगा, पर लड़कों की नहीं. मुन्नी ने चुपचाप यह नियम स्वीकार कर लिया.

किशोरावस्था मुन्नी के जीवन में आई ही नहीं. जब उस की सहेलियां सपने बुन रही थीं, तब वह सुबह चूल्हा जलाती, भाई को स्कूल भेजती और मां की थकी आंखों में झांक कर समझ जाती कि शिकायत का कोई मतलब नहीं. वह खुद को भूले चली गई. 18 की उम्र, वही उम्र जब लड़कियां खुद को खोजती हैं, सजती संवरती हैं और भविष्य के सपने देखती हैं, लेकिन मुन्नी के लिए यह उम्र एक डर बन कर आई. समाज की बेरहम नजरें, महल्ले की फुसफुसाहट और हर दिन बढ़ता बोझ.

एक डाक्टर के यहां सेविका की नौकरी मिली, 5,000 रुपए महीना. यह नौकरी मुन्नी के लिए सम्मान नहीं, मजबूरी थी. सुबह से शाम तक काम, फिर घर लौट कर वही जिम्मेदारियां. शरीर थक जाता, मन उस से पहले. यहीं मुन्नी की मुलाकात साहिल से हुई. साहिल सिक्योरिटी गार्ड था, स्मार्ट, आत्मविश्वासी और बातों में चालाक. उस ने मुन्नी से वैसे बात की, जैसे अब तक किसी ने नहीं की थी. दया, आदेश, बस अपनापन.
मुन्नी के जीवन में पहली बार किसी ने उस से पूछा था, ‘‘तुम थक जाती हो ?’’

यह सवाल मुन्नी को भीतर तक छू गया. धीरेधीरे वह साहिल की बातों पर भरोसा करने लगी. उस ने मुन्नी को समझाया कि उस की मेहनत की सही कीमत नहीं मिल रही. उस ने शहर की एक नामी आर्केस्ट्रा कंपनी में काम करने का सुझाव दिया, जहां एक रात में 1,000 से 1,200 रुपए मिलते थे. खाना अलग.
‘‘इस से घर की हालत सुधर जाएगी,’’ साहिल ने कहा. मुन्नी ने ज्यादा नहीं सोचा. वह सोच भी कैसे पाती? उसे बचपन से यही सिखाया गया था कि वह दूसरों के लिए जिए. मां और भाई को बताया गया कि नाइट ड्यूटी है. सच आधा था, झूठ पूरा.

आर्केस्ट्रा कंपनी में मुन्नी की शुरुआतबैक डांसरके रूप में हुई. पहले दिन मंच पर चढ़ते समय उस के पैर कांप रहे थे. तालियों की आवाज अजनबी थी, नजरें और भी ज्यादा. धीरेधीरे उसे तालियों की आदत पड़ गई. फिर कपड़े छोटे हुए, कदम तेज हुए और आत्मसम्मान कहीं पीछे छूटा चला गया. एक साल के भीतर मुन्नी फ्रंट लाइन में थी. आमदनी बढ़ी, पर कीमत भी. पैसा घर जा रहा था, भाइयों की पढ़ाई चल रही थी, इसी ने उसे चुप रखा. साहिल से नजदीकियां बढ़ीं. मुन्नी ने पहली बार भविष्य के सपने देखेशादी, सम्मान, एक सामान्य जीवन. लेकिन हर बार जब वह शादी की बात करती, साहिल टाल देता.

साहिल के लिए मुन्नी कभी सिर्फ एक लड़की नहीं थी, बल्कि वह उस के लिए सुविधा थी, सहारा थी और बिना जवाबदेही का रिश्ता. उसे मुन्नी से वह सब मिला, जिस के लिए किसी भी मर्द को समाज के सामने कोई कीमत नहीं चुकानी पड़ती. मुन्नी के बढ़ते पैसों से साहिल की जिंदगी आसान होती गई. कभी मोबाइल रिचार्ज, कभी कपड़े, कभी दोस्तों के साथ शराबछोटीछोटी जरूरतों के नाम पर वह उस का पैसा लेता रहा और मुन्नी देती रही, क्योंकि उसे यह सिखाया गया था कि प्रेम में हिसाब नहीं होता. जिस देह को साहिल सार्वजनिक मंच पर नाचते देखता था, उसी देह को निजी कमरों में वह बिना किसी वचन, बिना किसी भविष्य के भोगता था.

सब से बड़ा फायदा यह था कि साहिल को कुछ भी साबित नहीं करना पड़ता था. शादी का दबाव, जिम्मेदारी का बोझ, समाज का डर, क्योंकि समाज का नियम सीधा है कि अगर रिश्ता टूटेगा, तो सवाल औरत से होंगे. साहिल जानता था कि मुन्नी  के पास जाने को कोई सुरक्षित रास्ता नहीं है. उस की मजबूरी ही साहिल की ताकत थी. जब तक मुन्नी उस के लिए उपयोगी थी, भावनात्मक रूप से भी, आर्थिक रूप से भी, तब तक साहिल मुसकराता रहा. और जिस दिन मुन्नी ने सम्मान मांगा, शादी की बात की, भविष्य में बराबरी चाही, उसी दिन साहिल ने समाज का सब से पुराना हथियार उठायाचरित्र.

‘‘तुम जैसी लड़कियों से शादी नहीं की जाती,’’ यह कहते समय साहिल यह भूल गया या जानबूझ कर अनदेखा कर गया कितुम जैसी लड़कीउस ने खुद बनाई थी, अपने फायदे के लिए, अपनी सुविधा के लिए. यह एक वाक्य नहीं था. यह समाज का फैसला था, साहिल के मुंह से निकला हुआ. मुन्नी को लगा जैसे किसी ने उस के भीतर सालों से जमा आत्मसम्मान को एक झटके में कुचल दिया हो. उसे याद आया वही साहिल, जिस ने उसे इस रास्ते पर चलने की सलाह दी थी. वही साहिल, जिस ने उस की देह को चाहा, उस के पैसों से सुविधा पाई और उस के त्याग को चुपचाप इस्तेमाल किया.

आज वही साहिल उसेतुम जैसी लड़कीकह रहा था. उस पल मुन्नी को पहली बार साफ दिखा कि समाज और मर्द, दोनों की नैतिकता एकजैसी होती है. जरूरत पड़ने तक चुप्पी और जरूरत खत्म होते ही चरित्र का सवाल. आर्केस्ट्रा में नाचते समय जिन हाथों ने तालियां बजाई, उन्हीं हाथों ने अब उंगलियां उठाईं. दिन में वही लोग उसे गिरी हुई कहते थे और रात में उसी पर नोट उड़ा कर खुद को सभ्य समझते थे. मुन्नी ने महसूस किया कि उस ने कभी कोई गलत चुनाव नहीं किया, उस के सामने बस गलत औप्शन रखे गए थे. उस की सब से बड़ी गलती यह थी कि उस ने भरोसा किया और इस समाज में एक औरत का भरोसा ही उस का सब से बड़ा अपराध होता है.

उस रात मुन्नी देर तक आईने के सामने बैठी रही. उस आईने में उसे नर्तकी दिखी, प्रेमिका बस एक औरत दिखी, जिसे हर किसी ने अपनी सुविधा के हिसाब से परिभाषित किया था. मुन्नी को समझ गया कि औरत की देह जब तक जरूरत है, तब तक मौन स्वीकृति है और जैसे ही वह सम्मान मांगती है, उसे उस के अतीत से सजा दी जाती है. मुन्नी इस दुनिया से निकलना चाहती थी. लेकिन पैसों की कमी, भाई की पढ़ाई और घर का खर्च, सब ने उस के पैरों में बेडि़यां डाल रखी थीं. मुन्नी की उम्र 30 के पार पहुंची. काम मिलने लगा कम. भाई बड़ा हो गया था. उसे सबकुछ समझ आने लगा था, पर उस ने भी आंखें बंद कर लीं. सच देखना आसान नहीं होता खासकर जब सच आप के आराम की कीमत पर हो.

मां की मौत के बाद मुन्नी पूरी तरह अकेली रह गई. मुन्नी का भाई सबकुछ जानता था. वह इतना मासूम था कि सच समझ पाता, इतना नासमझ कि हालात से अनजान रहता. भीतर ही भीतर उसे बहन के काम से नफरत थी, ऐसी नफरत जो बोलती नहीं, बस जलाती रहती है. लेकिन वह चुप रहा. इसलिए नहीं कि उसे सच स्वीकार था, बल्कि इसलिए कि वही सच उन के भविष्य की सीढ़ी बन चुका था. मुन्नी की कमाई से भाई की पढ़ाई चली, किताबें आईं, कपड़े बदले, सपने बड़े हुए. वह घर में उस की ओर
देखता कम था, उस के पैसों की ओर ज्यादा. जब पड़ोस में बातें होतीं, सिर झुका लेता. विरोध नहीं, बस बचाव. क्योंकि विरोध की कीमत होती है और उस कीमत को चुकाने की हिम्मत उस में नहीं थी.

भाई ने अपना घर बसा लिया था. जिस के लिए मुन्नी ने सबकुछ दांव पर लगाया था, वही उस से दूरी बनाने लगा. अब उसे उस के पैसों की जरूरत नहीं थी और समाज में एक औरत की कीमत अकसर उस की जरूरत तक ही होती है. वह उस समय चाहता था कि बहन इस दलदल से बाहर आए, लेकिन बिना यह पूछे कि बाहर आने के बाद वह जिएगी कैसे. उस की चुप्पी में नाराजगी भी थी, अपराधबोध भी, पर उस से ज्यादा सुविधा थी. और यह सुविधा नैतिकता की सब से बड़ी कमजोरी बन गई. आज जब मुन्नी अपने घर में सम्मान से बैठी है, तब उस की चुप्पी और भी गहरी हो गई है. अब बोलने से सिर्फ एक ही सवाल उठेगा किजब तुम्हें नफरत थी, तब तुम ने आवाज क्यों नहीं उठाई?’

मुन्नी उसी एक कमरे में रह गई, खामोश, अकेली, थकी हुई. आज वह समझ रही है कि औरत का जीवन अकसर कर्तव्य औरचरित्रके बीच पिसता है. अगर वह परिवार के लिए जिए, तो त्याग की देवी. अगर अपने लिए कुछ चाहे, तो चरित्र पर सवाल. नाचने वाली औरत को हर मर्द भोगता है, चाहे वह प्रेमी के रूप में हो, भाई के रूप में या समाज के रूप में. आज मुन्नी किसी मंच पर नहीं नाचती. अब उस के जीवन में तालियां नहीं हैं, सिर्फ सन्नाटा है. वह उसी एक कमरे में रहती है, जहां दीवारों पर अब भी बीते सालों की आवाजें टकरा कर लौट आती हैं. कभी मां की थकी सांसें, कभी भाई की पढ़ाई की चिंता, कभी साहिल की मीठी और फिर कड़वी बातें.

मुन्नी अब किसी से शिकायत नहीं करती. शायद इसलिए नहीं कि दर्द कम हो गया है, बल्कि इसलिए कि वह समझ चुकी है कि इस समाज में औरत की पीड़ा सुनने वाला कोई नहीं, जब तक वह मनोरंजन बने.
मुन्नी अपनेआप से पूछती है कि क्या उस का त्याग कभी किसी खाते में दर्ज हुआ? क्या उस की जवानी, उस का श्रम, उस का मौन किसी रजिस्टर में लिखा गया? या फिर औरत का बलिदान हमेशा स्वाभाविक मान कर भुला दिया जाता है? मुन्नी को याद आता है कि जब वह कमाती थी, तब सब चुप थे. जब उस ने सवाल किया, तब सब ने चरित्र देखा. समाज ने उस से कभी यह नहीं पूछा कि उस ने क्या खोया, बस यह गिना कि उस ने क्यागलतकिया.

मुन्नी को इस बात का दुख नहीं है कि उस ने सब के लिए जिया, दुख इस बात का है कि किसी ने यह जानने की कोशिश ही नहीं की कि वह भी इनसान थी. आज उस का भाई अपने बच्चों को अच्छे संस्कार सिखाता हैं. उन्हें नाचती औरतें बुरी लगती हैं. मुन्नी यह सोच कर मुसकरा देती है कि शायद उस के जीवन का बलिदान अगली पीढ़ी के लिए उदाहरण बन गया, लेकिन उस के लिए कभी इंसाफ नहीं बन सका. मुन्नी अब यह नहीं पूछती, ‘‘मेरे लिए कौन जिएगा?’’ अब मुन्नी एक और सवाल पूछती है, ‘‘कब तक औरत का बलिदान बिना हिसाब के चलता रहेगा?’’ शायद अब यही  सवाल मुन्नी की नई शुरुआत बने और उसे कुछ सुकून दे.     

पाकिस्तानी हौकी खिलाडि़यों ने आस्ट्रेलिया में धोए बरतन पाकिस्तान की नैशनल हौकी टीम के कप्तान इमाद बट ने आस्ट्रेलिया से लौटने के बाद लाहौर हवाई अड्डे पर मीडिया से बात करते हुए कहा कि आस्ट्रेलिया में नैशनल टीम के खिलाडि़यों से रसोई, बरतन, कपड़े और बाथरूम साफ करवाए जाते थे. वे अपना खाना खुद पकाते थे और सड़कों पर रहते थे

बरतन धोने और सफाई करने के बाद खिलाड़ी मैच में कैसा प्रदर्शन करेंगे? कप्तान इमाद बट ने पाकिस्तान हौकी फैडरेशन के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए और कहा कि वे मौजूदा टीम मैनेजमैंट के साथ आगे नहीं बढ़ सकते. दरअसल, पिछले कुछ दिनों से आस्ट्रेलिया में खेल रही पाकिस्तानी हौकी टीम के खिलाडि़यों की तसवीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे थे, जिन में उन्हें अपना खाना पकाते और बरतन साफ करते हुए देखा जा रहा था. कई तसवीरों में वे बैग के साथ सड़क किनारे बैठे हुए भी नजर रहे थे.

मुनीष भाटिया

 

Crime Story: हाथरस में औनर किलिंग-सैनिक को दी प्यार की सजा

Crime Story: जगह थी उत्तर प्रदेश की हाथरस और तारीख थी 5 फरवरी, 2026. दोपहर के तकरीबन 3 बजे सादाबाद कोतवाली इलाके के आगराअलीगढ़ नैशनल हाईवे पर चंद्रा हाउस के पास एक सैनिक की गोली मार कर हत्या कर दी गई थी. एक इको कार और बाइक सवार हमलावरों ने भारतीय सेना के सैनिक की कार को घेर लिया था और इस के बाद उस पर ताबड़तोड़ फायरिंग कर दी थी.


इस तरह अचानक हमला हुआ तो वह सैनिक अपनी जान बचाने के लिए भागा, लेकिन हमलावरों ने दौड़ादौड़ा कर उसे गोलियों से भून दिया. उस सैनिक का नाम अखिलेश चौधरी था जो गांव समदपुर का रहने वाला था और हाथरस कोर्ट में पेशी से वापस लौट रहा था. पुलिस ने इस हत्याकांड को सुलझाने में तेजी दिखाई और मारे गए सैनिक अखिलेश चौधरी की पत्नी की बूआ के 2 बेटों को गिरफ्तार किया. दरअसल, सैनिक अखिलेश चौधरी ने अपने गांव की ही एक लड़की से लवमैरिज की थी. इस बात से लड़की के परिवार वाले उन की जान के दुश्मन बन गए थे. इस के बाद यह कांड हो गया.


हाथरस पुलिस ने गिरफ्तार किए गए दोनों आरोपियों बौबी उर्फ विशाल और राजा उर्फ राहुल के पास से 2 तमंचे, कारतूस और वारदात में इस्तेमाल की गई एक इको कार बरामद की. पुलिस की पूछताछ के दौरान इस हत्याकांड को अंजाम देने वाले आरोपियों ने खुलासा किया कि फौजी अखिलेश चौधरी ने उन के परिवार की एक लड़की से लव मैरिज की थी. इस के चलते परिवार की समाज में बेइज्जती हो रही थी. इस बदनामी का कलंक मिटाने के लिए उन्होंने अखिलेश चौधरी की हत्या की योजना बनाई.


मारे गए सैनिक अखिलेश चौधरी की बहन ने 10 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया, जबकि पत्नी निधि ने एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल कर सादाबाद कोतवाली पुलिस पर गंभीर आरोप लगाए थे. निधि ने पुलिस की मिलीभगत से उस के पति हत्या का आरोप लगाया था. सैनिक अखिलेश चौधरी की बहन ने तो प्रदेश सरकार से अपील भी की कि उस के भाई की हत्या करने वालों के घरों पर बुलडोजर चला दिया जाए.    

 

Hindi Story: स्वयंसिद्धा – दादी ने कैसे चुनी नई राह

Hindi Story: रात 1 बजे नीलू के फोन की घंटी घनघना उठी. दिल अनजान आशंकाओं से घिर गया. बेटा विदेश में है. बेटी पुणे के एक होस्टल में रहती है. किस का फोन होगा, मैं सोच ही रही थी कि पति ने तेज कदमों से जा कर फोन उठा लिया. पापा का देहरादून से फोन था, मेरी दादी नहीं रही थीं. यह सुनते ही मैं रो पड़ी. इन्होंने मुझे चुप कराते हुए कहा, ‘‘देखो मधु, दादी अपनी उम्र के 84 साल जी चुकी थीं, आखिर एक न एक दिन तो यह होना ही था. तुम जानती ही हो कि जन्म और मृत्यु जीवन के 2 अकाट्य सत्य हैं.’’

उन्होंने मुझे पानी पिला कर कुछ देर सोने की हिदायत दी और कहा, ‘‘सवेरे 4 बजे निकलना होगा, तभी अंतिमयात्रा में शामिल हो पाएंगे.’’

मैं लेट गई पर मेरी अश्रुपूरित आंखों के सामने अतीत के पन्ने उलटने लगे…

मेरी दादी शांति 16 वर्ष की आयु में ही विधवा हो गई थीं. 2 महीने का बेटा गोद में दे कर उन का सुहाग घुड़सवारी करते समय अचानक दुर्घटनाग्रस्त हो कर इस दुनिया से हमेशा के लिए विदा हो गया.

वैधव्य की काली घटाओं ने उन की खुशियों के सूरज को पूर्णतया ढक दिया. गोद में कुलदीपक होने के बावजूद उन पर मनहूस का लेबल लगा उन्हें ससुरालनिकाला दे दिया गया.

ससुराल से निर्वासित हो कर दादी ने मायके का दरवाजा खटखटाया. मायके के दरवाजे तो उन के लिए खुल गए पर सासससुर की लाचारी का फायदा उठा कर उन की भाभी ने उन्हें एक अवैतनिक नौकरानी से ज्यादा का दर्जा न दिया.

मायके में दिनरात सेवा कर उन्होंने अपने बेटे के 10 साल के होते ही मायके को भी अलविदा कह दिया.

देहरादून में बरसों पहले ब्याही बचपन की सहेली का पता उन के पास था. बस, सहेली के आसरे ही वे देहरादून आ पहुंचीं.

सहेली तो मिली ही, साथ ही वहां एक कमरे का आश्रय भी मिल गया. सहेली और उस के पति दोनों उदार व दयालु थे. उन्होंने उन के बेटे यानी हमारे पापा का दाखिला भी एक नजदीकी स्कूल में करवा दिया.

दादी स्वेटर बुनने और क्रोशिए व धागे से विभिन्न तरह की चीजें बनाने में सिद्धहस्त थीं. स्वेटर पर ऐसे सुंदर नमूने डालतीं कि राह चलने वाला एक बार तो गौर से अवश्य देखता. उन के  बुने स्वेटरों और क्रोशिए के काम की धूम पूरे महल्ले में फैल गई. देखते ही देखते उन्हें खूब काम मिलने लगा. दिनरात मेहनत कर के वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो गईं. उन्होंने सहेली को तहेदिल से धन्यवाद दिया और उसी के घर के पास 2 कमरों का मकान ले कर रहने लगीं, पर सहेली का उपकार कभी नहीं भूलीं.

पापा भी 16-17 वर्ष के हो चुके थे. उन्हें भी किसी जानकार की दुकान पर काम सीखने भेजने लगीं. पापा होनहार थे, बड़ी मेहनत और लगन से वे काम सीखने लगे. मायका छोड़ते समय भाभी की नजर से बचा उन की मां ने एक गहने की छोटी सी पोटली उन्हें थमा दी थी. उन्होंने उसे लेने से स्पष्ट इनकार कर दिया था पर उन की मां ने अपनी कसम दे दी थी. अपनी मां की बेबसी और डबडबाई आंखें देख उन्हें वह पोटली लेनी पड़ी. दादी अपनी मां की निशानी बड़ी जतन से संभाल कर रखती आई थीं. कठिनतम परिस्थितियों में भी कभी उसे नहीं छुआ पर आज अपने होनहार बेटे का कारोबार जमाने की खातिर उस निशानी का भी मोलभाव कर दिया.

आज मैं स्वयं को और इस नई पीढ़ी को देखती हूं तो चारों और असहिष्णुता व आक्रोश फैला देखती हूं. छोटीछोटी बातों में गुस्सा, तुनकमिजाजी देखने को मिलती है. सारी सुखसुविधाएं होते हुए भी असंतुष्टता दिखाई देती है, पर दादी के जीवन में तो 16 वर्ष के बाद ही पतझड़ ने स्थायी डेरा जमा लिया था. जीवन में कदमकदम पर अपमान, अभाव व धोखे खाए थे पर इन सब ने उन में गजब की सहनशीलता भर दी थी. हम ने कभी घर में उन्हें गुस्सा करते, चिल्लाते नहीं देखा. अपनी मौन मुसकान से ही वे सब के दिलों पर राज करती थीं. मम्मीपापा को उन से कोई शिकायत न थी. वे उन को मां बन कर सीख भी देतीं और दोस्त बना कर हंसीमजाक भी करतीं.

दादीजी के बारे में सोचतेसोचते कब सवेरा हो गया, पता ही नहीं चला. पति टैक्सी वाले को फोन करने लगे. मैं ने जल्दी से 2 कप चाय बना ली. हम चल दिए दादी की अंतिमयात्रा में शामिल होने.

टैक्सी में बैठते ही मैं ने आंखें मूंद लीं. दादी की यादों के चलचित्र की अगली रील चलने लगी…

दादी स्वयं पुराने जमाने की थीं लेकिन पासपड़ोस और महल्ले की औरतों की आजादी के लिए उन्होंने ही शंखनाद किया. ससुराल में घूंघट से त्रस्त कई महिलाओं को उन्होंने घूंघट से आजादी दिलवाई. घरों के बड़ेबुजुर्गों को समझाया कि सिर पर ओढ़नी, आंखों और दिल में बुजुर्गों के लिए आदरसेवा यही सबकुछ है. हाथभर का घूंघट निकाल कर बड़ेबूढ़ों का अपमान करना, उन की मजबूरी और लाचारी

में उन्हें कोसना गलत है. घूंघटों से बेजार महिलाओं को जीवन में बड़ी राहत मिल गई थी. दादी की बातें लोगों के दिलोजेहन में ऐसे उतरतीं जैसे धूप व प्यास से खुश्क गलों में मीठा शरबत उतरता.

दादी स्वयं पढ़ीलिखी न थीं. पर उन्होंने मम्मी के बीए की अधूरी पढ़ाई को पूरा करवाने का बीड़ा उठाया. घरपरिवार की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले कर मम्मी को कालेज भेजा. मुख्य विषय संगीत था, इसलिए हारमोनियम मंगवाया. शाम के समय मां सुर लगातीं तो दादी मंत्रमुग्ध हो कर आंखें बंद कर बैठ जातीं और 2-3 गाने सुने बिना न उठती थीं.

हमारे भाई का जन्मदिन भी वे बड़े निराले तरीके से मनवातीं. न तो पार्टी न डांस, बस, मां का बनाया मिल्ककेक काटा जाता. दोपहर को बड़ेबड़े कड़ाहों और पतीलों में जाएकेदार कढ़ीचावल और शुद्ध देशी घी में हलवा बनवाया जाता. विशेष मेहमान होते अनाथाश्रम के प्यारेप्यारे बच्चे जो अपने आश्रय का सुरीला बैंड बजाते हुए पंक्तिबद्ध हो कर आते और बड़े ही चाव से कढ़ीचावल व हलवे के भोजन से तृप्त होते थे.

साथ ही, रिटर्नगिफ्ट के रूप में एकएक जोड़ी कपड़े ले कर जाते थे. उस के बाद होता था महल्ले के सभी लोगों का महाभोज. एक बड़े से दालान में बच्चेबड़े सभी भोजन करते थे. हम सब घर वाले तब तक पंगत से नहीं उठते थे जब तक सब तृप्त न हो जाते. हलकेफुलके हंसी के माहौल में भोज होता मानो एक विशाल पिकनिक चल रही हो.

मैं तब 10वीं कक्षा में थी. स्कूल से घर आई तो देखा दीदी रो रही हैं और मम्मी पास ही में रोंआसी सी खड़ी हैं. दीदी ने आगे पढ़ने के लिए जो विषय लिया था, उस के लिए उन्हें सहशिक्षा कालेज में दाखिला लेना था. पर पापा आज्ञा नहीं दे रहे थे. दादी उन दिनों हरिद्वार गई हुई थीं. दीदी ने चुपके से उन्हें फोन कर दिया.

दादी ने आते ही एक बार में ही पापा से हां करवा ली. उन्होंने पापा को सिर्फ एक बात कही, मीरा को हम सब ने मिल कर संस्कार दिए हैं. उन में क्या कुछ कमी रह गई है जो मीरा को उस कालेज में जाने से तू रोक रहा है. हमें अपनी मीरा पर पूरा भरोसा है. वह वहां पर लगन से पढ़ कर अच्छे अंक लाएगी और हमारा सिर ऊंचा करेगी. परोक्षरूप से उन्होंने मीरा दीदी को भी हिदायत दे दी थी और वास्तव में दीदी ने प्रथम रैंक ला कर घरपरिवार का नाम रोशन कर दिया. इसी क्षण टैक्सी के हौर्न की आवाज ने हमें यादों के झरोखों से बाहर निकाला.

टैक्सी रफ्तार पकड़े हुए थी. शीघ्र ही हम देहरादून पहुंच गए. घर में प्रवेश करते ही दादी के पार्थिव शरीर को देखते ही यत्न से दबाई हुई हिचकी तेज रुदन में बदल गई. सभी पहुंच चुके थे. बस, मेरा इंतजार हो रहा था. पापा ने मेरी पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘मधु बेटी, इस प्रकार रो कर तुम अपनी दादी को दुखी कर रही हो. वे तो संसार के मायाजाल से मुक्त हुई हैं. एक 16 साल की विधवा का, साथ में एक दूधमुंहे बच्चे के साथ, इस संसाररूपी सागर को पार करना बहुत ही कठिन था. मुझे अपनी मां पर गर्व है. उन्होंने अपने आत्मसम्मान व इज्जत को गिरवी रखे बिना इस सागर को पार किया. वे तो स्वयंसिद्धा थीं. उन्होंने समाज की खोखली रूढि़यों, पाखंडों से दूर रह कर अपने रास्ते खुद बनाए. जो उन्हें अच्छा और सही लगा उसे ग्रहण किया और व्यर्थ की मान्यताओं को उन्होंने अपने मार्ग से हटा दिया. उन के मुक्तिपर्व को शोक में मत बदलो.’’

कुछ देर बाद दादी की अंतिमयात्रा आरंभ हो गई. बहुत बड़ी संख्या में लोग साथ थे. दादी की मृत्यु प्रक्रिया उन की इच्छानुसार की गई. न तो ब्राह्मण भोज हुआ न पुजारीपंडों को दान दिया गया. लगभग 200 गरीबों को भरपेट भोजन कराया गया और 1-1 कंबल उन्हें दानस्वरूप दिए गए. पापा ने दादी की इच्छानुसार अनाथाश्रम, महिला कल्याण घर और अस्पताल में 2-2 कमरे बनवा दिए.

देखतेदेखते दादी हम से बहुत दूर चली गईं. वे अपने पीछे छोड़ गईं संघर्षों का ऐसा अनमोल खजाना जो सभी नारियों के लिए एक सबक है कि कैसे कठिन से कठिनतम परिस्थितियों में भी अपने मानसम्मान व इज्जत को बचाते हुए आगे बढ़ें. वे इस युग की ऐसी महिला थीं जिस ने अपनी मृतप्राय जीवनबगिया को नवीन विचारों, दृढ़संकल्पों, कर्मठता व मेहनत के बलबूते फिर से हरीभरी बना दिया. वास्तव में वे स्वयंसिद्धा थीं.

Short Story: बर्मा के जंगलों में

Short Story: मैं 3 साल पहले अपने अखबार की ओर से दीमापुर,   इम्फाल के दौरे पर गया था. कुछ संसद सदस्य  असम, नागालैंड तथा मणिपुर के विकास कार्यों की समीक्षा करने वहां जा रहे थे. गुवाहाटी, दीमापुर के बाद हम लोग इम्फाल पहुंचे. वहां से हमारा काफिला मोरे के लिए रवाना हुआ.

मोरे, भारत और बर्मा की सीमा पर इम्फाल से 110 किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक छोटा सा गांव है जो चारों तरफ पहाडि़यों से घिरा है. रास्ते में मेरी गाड़ी खराब हो गई और मैं काफिले से बिछुड़ गया. मोरे से 10 किलोमीटर पहले एक सैनिक छावनी पर हमें रुकना पड़ा. वहां हमारी तलाशी ली गई. पता चला कि आगे रास्ता अचानक खराब हो गया है. करीब 4 घंटे हमें वहां रुकना पड़ा फिर हम रवाना हुए.

हम अभी कुछ दूर ही चले थे कि बीच रास्ते में बड़ेबड़े पत्थर रखे दिखाई दिए. ड्राइवर और हम सभी यात्री उतर कर पत्थर हटाने लगे. इतने में 10-12 हथियारबंद लोगों ने हमें घेर लिया और बंदूक की नोक पर मुझे साथ चलने को कहा. ड्राइवर और बाकी यात्रियों को उन्होंने छोड़ दिया. मैं हाथ ऊपर कर के उन के साथसाथ चलने लगा.

करीब 2 घंटे तक जंगल में पैदल चलने के बाद, उन के साथ मैं एक पहाड़ी के नीचे पहुंचा तो देखा वहां

3-4 झोपडि़यां बनी हुई थीं. वहीं उन का कैंप था. एक झोंपड़ी में लकड़ी के खंभे के सहारे मुझे बांध दिया गया. थोड़ी देर बाद एक लड़की आई और उस ने मुझे चाय व बिस्कुट खाने को कहा. मेरे हाथ ढीले कर दिए गए. मैं ने चाय पी ली. अगले दिन सुबह उन का नेता आया और मुझ से प्रश्न करने लगा. शुद्ध हिंदी में उसे बात करते देख मुझे बहुत ताज्जुब हुआ.

‘‘आप का नाम क्या है?’’

‘‘मंगल सिंह,’’ मैं ने जवाब में कहा, ‘‘मैं नई दिल्ली स्थित एक अखबार में संवाददाता की हैसियत से काम कर रहा हूं. यहां मैं संसद सदस्यों के दौरे की रिपोर्ट लिखने आया था. मैं पहली बार इस इलाके में आया हूं. यहां मेरा कोई जानपहचान का नहीं है.’’

‘‘लगता है हमारे लोग आप को गलती से उठा लाए हैं. हमारा निशाना तो कृष्णमूर्ति था जो इस इलाके में मादक पदार्थों की तस्करी करता है. आप का चेहरा थोड़ाथोड़ा उस से मिलता है. मुझे खबर मिली थी कि वह आप वाली गाड़ी में ही सफर कर रहा है. फिर भी आप के बारे में तहकीकात की जाएगी. यदि आप की बात सच होगी तो कुछ दिन बाद आप को छोड़ दिया जाएगा. तब तक आप को यहीं रखा जाएगा. आप को जो तकलीफ हुई उस के लिए मैं माफी चाहता हूं’’

‘‘क्या आप मेरे घर या संपादक तक मेरी खबर भिजवा सकते हैं बूढ़े मांबाप मेरी चिंता करेंगे.’’

‘‘आप एक पत्र लिख दें. दिल्ली में मेरे संगठन से जुड़े लोग आप के अखबार तक आप का पत्र पहुंचा देंगे पर पत्र पहले मैं पढूंगा. उस में इन सब बातों का जिक्र नहीं होना चाहिए. आप के हाथपांव मैं खोल देता हूं पर आप भागने की कोशिश न करें, क्योंकि अभी आप बर्मा के जंगलों में हैं. यदि आप भागेंगे तो हम आप को गोली मार देंगे और यदि आप कृष्णमूर्ति नहीं हैं तो आप को आजादी मिल जाएगी.’’

‘‘यदि आप बुरा न मानें तो मैं कृष्णमूर्ति के बारे में और ज्यादा जानना चाहता हूं आखिर यह किस्सा क्या है?’’ मेरा पत्रकार मन एक अनजान व्यक्ति के बारे में जानने को इच्छुक हो उठा था.

‘‘हमारा संगठन हर उस व्यक्ति के खिलाफ है जो मादक पदार्थों की तस्करी में लिप्त है. मैं ने उसे चेतावनी भी दी थी पर वह अपनी हरकतों से बाज नहीं आता. अत: इस संगठन के कमांडर ने उसे गोली मारने का आदेश दिया है. इस बार फिर वह बच निकला है. लेकिन कब तक बचेगा. हमारे आदमी उसे ढूंढ़ ही लेंगे.’’

‘‘नशीले पदार्थों की तस्करी रोकने के लिए तो पुलिस है, कानूनव्यवस्था है. आप यह काम क्यों कर रहे हैं?’’ मुझ से रहा नहीं गया और पूछ लिया.

‘‘हम एक तरह से कानून की ही मदद कर रहे हैं. हमारे देश के लोग यदि नशे के गुलाम बनेंगे तो देश का भविष्य कैसा होगा. आप तो जानते ही हैं कि एक बार जिस को नशे की लत लग जाए फिर उस की बरबादी निश्चित है. हम अपनी मातृभूमि की सेवा करते हैं. किसी भी बाहरी व्यक्ति को यह हक नहीं है कि हमारे भाईबहनों को पतन के रास्ते पर ले जाए. चूंकि कानून की नजरों में हम बागी हैं इसलिए कानून से हमें भागना पड़ता है. हमारी अपनी न्याय व्यवस्था है जिस में कमांडर का आदेश ही सर्वोपरि है. इस में कोई अपील या सुनवाई नहीं होती. आप के देश के नियमकानून काफी लचीले हैं. कई बार व्यक्ति अपराध कर के साफ बरी हो जाता है और फिर उसी काम को करने लगता है. खैर, इस विषय को यहीं समाप्त करते हैं.’’

इतना कह कर संगठन का वह नेता चला गया और मेरे हाथपैर खोल दिए गए. मैं थोड़ा इधरउधर टहल सकता था. वहां कुल 15 आदमी और 3 लड़कियां थीं. लड़कियों का मुख्य काम खाना बनाना था पर उन्हें हथियार चलाना भी आता था. मैं ने अपने संपादक को एक छोटा सा पत्र लिख दिया था ताकि वह मेरे मांबाप को सांत्वना दे सकें. कुछ देर के बाद एक लड़की आई और मुझे खाना खाने के लिए कहने लगी. वहां जा कर देखा तो पूरा शाकाहारी भोजन का प्रबंध था. मैं खुश हो गया क्योंकि मैं शुद्ध शाकाहारी था. भोजन में चावल, दाल, आलूप्याज की सब्जी, रोटी और सलाद था. मैं ने सब चिंता छोड़ कर भरपेट खाया क्योंकि खाना मुझे काफी स्वादिष्ठ लगा.

अगले दिन सुबह 5 बजे मेरी नींद खुल गई. मैं नित्यकर्म से निबट कर बाहर आ कर  बैठ गया. सूरज धीरेधीरे पहाड़ी के पीछे उदय हो रहा था. इतना सुंदर नजारा मैं ने जीवन में कभी नहीं देखा था. वह जगह प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर थी. दूरदूर तक पेड़ ही पेड़ दिखाई पड़ रहे थे. उन पर तरहतरह के पक्षियों के चहचहाने की आवाजें आ रही थीं. मैं कुछ समय तक इन में खो गया.

मेरी तंद्रा तब टूटी जब एक लड़की चाय, बिस्कुट ले आई और उस ने मुझ से अंगरेजी में पूछा कि इस के अलावा और भी कुछ चाहिए. मैं ने  भी अंगरेजी में उसे जबाब दिया कि यहां और क्या- क्या मिल सकता है. वह बोली कि

ब्रेड, केक, पेस्ट्री आदि सभी चीजों का प्रबंध है और 8 बजे नाश्ता भी मिल जाएगा. नाश्ते में आलू का परांठा और टमाटर की चटनी होगी. उस के बोलने के अंदाज से मुग्ध हो कर मैं एकटक उसे ही देखता रहा तो वह चली गई.

थोड़ी देर बाद देखा कि कुछ बर्मीज औरतें सामान ले कर आ रही हैं. एक के पास बरतन में दूध था. किसी के पास सब्जी थी तो कोई चावल लाई थी. यानी जो भी खानेपीने का सामान चाहिए वह आप खरीद सकते हैं.

मैं भी उन के पास चला गया. कैंप की रसोई प्रमुख का नाम नीना था. उस ने अपनी जरूरत के हिसाब से सामान खरीद लिया. कल क्या लाना है, यह भी बता दिया. यह सब देख कर नीना से मैं ने पूछा, ‘‘क्या सब सामान ये लोग यहां ला कर दे देते हैं?’’

‘‘बर्मीज लोग बड़े शांत, सरल हृदय होते हैं. छल, कपट और झूठ बोलना तो जैसे जानते ही नहीं. यहां काम मुख्य तौर पर औरतें ही करती हैं. सभी तरह का व्यापार इन्हीं के हाथ में है. अभी जो औरतें यहां सामान ले कर आई

हैं, ये करीब 10 किलोमीटर की दूरी तय कर के आई हैं. शाम को फिर एक बार सामान ले कर आएंगी.’’

‘‘ये औरतें रोज इतना पैदल सफर कर लेती हैं.’’

‘‘नहीं,’’ नीना बोली साइकिल पर 50-60 किलो माल ले आती हैं. यहां अभी भी पूरी ईमानदारी से काम होता

है. मिलावट करना ये लोग जानते ही नहीं.’’

अब तक मैं समझ गया था कि नीना से मुझे और भी जानकारी मिल सकती है. बस, इसे बातचीत में लगाना होगा. तब मुझे इस संगठन के बारे में काफी नई बातें जानने को मिल सकती हैं और जितने दिन यहां रहना पड़ेगा थोड़ी परेशानी कम हो सकती है. अत: जब भी मौका मिलता मैं नीना से बातचीत करता रहता.

इस तरह 4-5 दिन गुजर गए. नीना कभीकभी गिटार पर कोई धुन भी बजाने लगती तो मैं भी जा कर साथ में गाने लगता. वह काफी अच्छा गिटार बजाना जानती थी. मुझे भी संगीत का काफी शौक था. मैं हिंदी गाने और भजन गाता और वह उसे गिटार पर बजाने की कोशिश करती. यह देख कर राजन नामक उस के साथी को भी जोश आ गया और वह बगल के किसी गांव से एक ढोलक ले आया. इस तरह हम लोग रोज रात में गानाबजाना करने लगे.

सच ही है, संगीत में कोई भेदभाव नहीं होता, मजहब की दूरी नहीं होती, कोई अमीरगरीब की सोच नहीं होती.

एक रात मैं सो रहा था कि एक बड़े काले सांप ने मुझे काट लिया और भाग कर झोंपड़ी के कोने में छिप गया. मुझे बहुत दर्द हुआ और मैं जोर से चिल्लाया. आवाज सुन कर नीना और 3-4 व्यक्ति दौड़ेदौड़े आए. मैं ने उन्हें बताया कि मुझे सांप ने काटा है और अभी भी वह झोंपड़ी में मौजूद है.

नीना दौड़ कर एक डंडा ले आई और सांप को खोज कर मार दिया. मैं उस का साहस देख कर आश्चर्यचकित रह गया. फिर नीना ने बताया कि यह सांप तो बहुत जहरीला है अब आप लेट जाइए इस का जहर निकालना पड़ेगा वरना यह पूरे शरीर में फैल सकता है. मैं लेट गया. नीना ने जहां सांप ने काटा था वहां चाकू से एक चीरा लगाया और मुंह से चूसचूस कर जहर निकालने लगी. फिर मुझे नींद आ गई. सुबह पता चला कि नीना रात भर मेरे पास बैठी रही. एक अनजान व्यक्तिके लिए इतनी पीड़ा उस ने उठाई.

अब धीरेधीरे नीना मुझ से खुलने लगी. हम आपस में विविध विषयों पर बातचीत करने लगे. उस के व्यक्तित्व के बारे में मुझे और जानकारी मिली. उस के मांबाप की मृत्यु एक सड़क दुर्घटना में हो गई थी. अब उस का दुनिया में कोई नहीं था. मणिपुर विश्व- विद्यालय से उस ने अंगरेजी में एम.ए. किया था और आगे उस का इरादा पीएच.डी. करने का है.

नीना ने बाकायदा संगीत सीखा था. वह बहुत अच्छा खाना बनाती थी. देखने में सुंदर थी. मैं उसे थोड़ीथोड़ी हिंदी भी सिखाने लगा. वह मेरी इस तरह सेवा करने लगी जैसे कोई ममतामयी मां अपने बच्चे की देखभाल करती है. मुझे जीवन- दान तो उस ने दिया ही था. अब तक कैंप के और लोग भी मुझ से थोड़ा खुल गए थे.

वहां कुछ नेपाली औरतें भी आती थीं जिन्हें हिंदी का ज्ञान था. उन से मैं ने बर्मा के बारे में काफी प्रश्न किए. तो पता चला कि बर्मा में भारत की तरह भ्रष्टाचार नहीं है. लोग घर पर ताला न भी लगाएं तो चोरी नहीं होती. दिन भर मेहनत करते हैं और रात को खाना खा कर सो जाते हैं. सब अनुशासन में रहते हैं. खेती वहां का मुख्य व्यवसाय है.

मेरा मन वहां लग गया था. पर बीचबीच में घर के लोगों की चिंता हो जाती थी. समय अच्छी तरह कट रहा था. इस तरह करीब 20-25 दिन गुजर गए. नीना मेरे साथ एकदम खुल गई थी. उस का संकोच पूरी तरह समाप्त हो गया था. मेरे मन में भी कैंप छोड़ कर दिल्ली लौटने की इच्छा समाप्त हो गई थी पर परिवार के प्रति मेरी जिम्मेदारी थी. जीने के लिए अखबार की नौकरी भी जरूरी थी.

एक दिन अचानक कैंप का वही नेता जो पहले आया था लौट आया. सब बहुत खुश हुए. उस ने मुझे बुलाया और कहा, ‘‘मेरे कमांडर ने आप को छोड़ने का आदेश दे दिया है. 1-2 दिन के बाद आप को मोरे गांव तक पहुंचा देंगे. वहां से आप को इम्फाल की बस मिल जाएगी. आप को जो कष्ट पहुंचा उस के लिए मैं अपने कमांडर की तरफ से क्षमा चाहता हूं.’’

‘‘क्षमा कैसी. मेरा तो जाने का मन ही नहीं कर रहा पर जाना तो पड़ेगा ही क्योंकि आप के कमांडर का आदेश है. आप के साथियों ने मेरा काफी ध्यान रखा जिस के लिए मैं इन सब का आभारी हूं. नीना ने तो मुझे नया जीवन दिया है. मैं उस का ऋणी भी हूं. हां, जाने से पहले मेरी एक शर्त आप को माननी पड़ेगी अन्यथा मैं यहीं पर आमरण अनशन करूंगा,’’ मैं ने कहा.

‘‘वह क्या? आप को तो खुश होना चाहिए कि आप आजाद हो  रहे हैं. हां, कमांडर ने आप के लिए 10  हजार रुपए भेजे हैं. रास्ते के खर्च के लिए और आप के एक मास के वेतन के नुकसान की भरपाई करने के लिए. इम्फाल एअरपोर्ट पर दिल्ली का टिकट आप को मिल जाएगा, इस का प्रबंध हो गया है. दिल्ली में हम ने आप के संपादक और आप के मातापिता तक खबर भेज दी थी और आप की पूरी तहकीकात हम कर चुके हैं. अब आप अपनी शर्त के बारे में बताएं,’’ थाम किशोर ने पूछा.

‘‘मैं नीना से शादी करना चाहता हूं यदि आप को और नीना को कोई एतराज न हो तो. यदि मैं नीना जैसी लड़की को पत्नी के रूप में पा सका तो अपने आप को धन्य समझूंगा. आप सोचविचार कर मुझे जवाब दें और नीना से भी पूछ लें,’’ मैं ने कहा.

पूरे कैंप में खामोशी छा गई. उन     लोगों को मेरी बात पर काफी आश्चर्य हुआ. खामोशी थाम किशोर ने ही तोड़ी.

‘‘भावुकता से भरी बातें न करें. आप की जाति, संप्रदाय, आचारविचार सब अलग हैं. नीना कैसे माहौल में

रह रही है आप देख ही चुके हैं. हम लोग मातृभूमि की सेवा का संकल्प कर चुके हैं. फिर भी मुझे नीना से तथा अपने कमांडर से पूछना होगा. आप

2-4 दिन और रुकें फिर मैं आप को फैसला सुना देता हूं.’’

बाद के दिनों में नीना ने मुझ से थोड़ी दूरी बढ़ानी चाही पर मैं ने उसे ऐसा करने नहीं दिया. नीना ने बताया कि वह भी मुझे पसंद करती है और शादी भी करने को तैयार है लेकिन क्या इस शादी से आप के घर वाले एतराज नहीं करेंगे?

मैं ने उस के मन में उठे संदेह को शांत करने के लिए समझाया कि मेरे मातापिता को ऐसी बहू चाहिए जो उन की सेवा कर सके. तुम्हारा सेवाभाव तो मैं देख चुका हूं. तुम को पा कर मेरा   जीवन सफल हो जाएगा. बस, कमांडर हां कर दे तो बात बन जाए.

3 दिन के बाद संगठन के नेता थाम किशोर सिंह ने यह खुशखबरी दी कि कमांडर ने हां कर दी है और कहा है कि धूमधाम से कैंप में ही शादी का प्रबंध किया जाए. वह भी आने की कोशिश करेंगे.

मेरी और नीना की शादी धूमधाम से वहीं कैंप में कर दी गई और एक झोंपड़ी में सुहागरात मनाने का प्रबंध भी कर दिया गया. अगले दिन सुबह कैंप से विदा होने की तैयारी करने लगे. सभी सदस्यों ने रोते हुए हमें विदा किया.

थाम किशोर ने एक लिफाफा दिया और कहा कि कमांडर ने नीना को एक तोहफा दिया है. वह तो आ नहीं सके. हम लोग मोरे इम्फाल होते हुए दिल्ली पहुंच गए. नीना पूरे सफर में बहुत खुश थी.

Short Story: बंद आकाश खुला आकाश

Short Story, लेखक- भुवनचंद्र जोशी

अपने शौक के चलते मैं ने एक तोते के बच्चे को खरीद कर पिंजरे में बंद कर दिया. लेकिन कुछ समय बाद जब तोतों के झुंड को देख उस तोते ने उड़ने की कोशिश की तो पिंजरे में उस की छटपटाहट व बेचारगी ने हम सब को विचलित कर दिया.

एक दिन मैं तोते का बच्चा खरीद कर घर ले आया. उस के खानेपीने के लिए 2 कटोरियां पिंजरे में रख दीं. नयानया कैदी था इसलिए अकसर चुप ही रहता था. हां, कभीकभी टें…टें की आवाज में चीखने लगता.

घर के लोग कभीकभी उस निर्दोष कैदी को छेड़ कर आनंद ले लेते. लेकिन खाने के वक्त उसे भी खाना और पानी बड़े प्यार से देते थे. वह 1-2 कौर कुटकुटा कर बाकी छोड़ देता और टें…टें शुरू कर देता. फिर चुपचाप सीखचों से बाहर देखता रहता.

उसे रोज इनसानी भाषा बोलने का अभ्यास कराया जाता. पहले तो वह ‘हं…हं’ कहता था जिस से उस की समझ में न आने और आश्चर्य का भाव जाहिर होता पर धीरेधीरे वह आमाम…आमाम कहने लगा.

अब वह रोज के समय पर खाना या पानी न मिलने पर कटोरी मुंह से गिरा कर संकेत भी करने लगा, फिर भी कभीकभी वह बड़ा उदास बैठा रहता और छेड़ने पर भी ऐसा प्रतिरोध करता जैसे चिंतन में बाधा पड़ने पर कोई मनीषी क्रोध जाहिर कर फिर चिंतन में लीन हो जाता है.

एक दिन तोतों का एक बड़ा झुंड हमारे आंगन के पेड़ों पर आ बैठा, उन की टें…टें से सारा आंगन गूंज उठा. मैं ने देखा कि उन की आवाज सुनते ही पिंजरे में मानो भूचाल आ गया. पंखों की निरंतर फड़फड़ाहट, टें…टें की चीखों और चोंच के क्रुद्ध आघातों से वह पिंजरे के सीखचों को जैसे उखाड़ फेंकना चाहता था. उस के पंखों के टुकड़े हवा में बिखर रहे थे. चोंच लहूलुहान हो गई थी. फिर भी वह उस कैद से किसी तरह मुक्त होना चाहता था. झुंड के तोते भी उसे आवाज दे कर प्रोत्साहित करते से लग रहे थे.

झुंड के जाने के बाद उस का उफान कुछ शांत जरूर हो गया था लेकिन क्षतविक्षत उस कैदी की आंखों में गुस्से की लाल धारियां बहुत देर तक दिखाई देती रहीं. उस की इस बेचारगी ने घर के लोगों को भी विचलित कर दिया और वे उसे मुक्त करने की बात करने लगे, लेकिन बाद में बात आईगई हो गई.

कुछ दिनों बाद की बात है. एक दिन मैं ने इस अनुमान से उस का पिंजरा खोल दिया कि शायद वह उड़ना भूल गया होगा, द्वार खुला. वह धीरेधीरे पिंजरे से बाहर आया. एक क्षण रुक कर उस ने फुरकी ली और आंगन की मुंडेर पर जा बैठा. उस के पंखों और पैरों में लड़खड़ाहट थी. फिर भी वह अपनी स्वाभाविक टें…टें के साथ एक डाल से दूसरी डाल पर फुदकता जा रहा था. उस के बाद वह पहाड़ी, सीढ़ीदार खेतों पर बैठताउड़ता हुआ घर से दूर होने लगा.

अपनी भूल पर पछताता मैं, और गांव भर के बच्चे, तोते के पीछेपीछे उसे पुचकार कर बुलाते जा रहे थे और वह हम से दूर होता जा रहा था. मैं ने गौर किया कि उस की उड़ान में और तोतों जैसी फुरती नहीं थी. उस की इस कमी को लक्ष्य कर के मुझे शंका होने लगी कि अगर वह लौटा नहीं तो न तो अपने साथियों के साथ खुले आकाश में उड़ पाएगा और न ही अपना दाना जुटा पाएगा.

तोते को भी जैसे अपनी लड़खड़ाहट का एहसास हो चुका था. इसीलिए कुछ दूर जाने पर वह एक पेड़ की डाल पर बैठा ही रह गया और उसे पुचकारते हए मैं उस के पास पहुंचा तो उस ने भी डरतेझिझकते अपनेआप को मेरे हवाले कर दिया.

काश, उस ने अपनी लड़खड़ाहट को अपनी कमजोरी न मान लिया होता तो वह उसी दिन नीलगगन का उन्मुक्त पंछी होता. मगर वह अपनी लड़खड़ाहट से घबरा कर हिम्मत हार बैठा और फिर से पिंजरे का पंछी हो कर रह गया.

करीब साल भर के बाद, एक दिन फिर उस के उड़ने की जांच हुई. अब की बार खुले में पिंजरा खोलने का जोखिम नहीं लिया गया. घर की बैठक में 2 बड़ी जालीदार खिड़कियों को छोड़ कर बाकी रास्ते बंद कर दिए गए. पिंजरा खोला गया. कुछ दूर खड़े हो कर हम सबउसे ही देखने लगे. पहले वह खुले द्वार की ओर बढ़ा. फिर रुक कर गौर से उसे देखने लगा.

उस ने एक फुरकी ली लेकिन द्वार की ओर नहीं बढ़ा. हमें लगा कि हमारे डर से वह बाहर नहीं आ रहा है. हम सब ओट में हो कर उसे देखने लगे. लेकिन वह दरवाजे की तरफ फिर भी नहीं बढ़ा. कुछ देर बाद वह दरवाजे की ओर बढ़ा जरूर लेकिन एक निगाह बाहर डाल कर फिर पिंजरे में मुड़ गया. फिर पिंजरे से निकल कर बाहर आया. हम सब उत्सुकता से उसे ही देख रहे थे. उस ने एक लंबी फुरकी ली, जैसे उड़ने से पहले पंखों को तोल रहा हो. वह पहली मुक्ति के समय की अपनी बेबसी को शायद भूल गया था.

उस ने 2-3 जगह अपने पंखों को चोंच से खुजलाया और झटके से पंखों को फैलाया कि एक ही उड़ान में वहां से फुर्र हो जाए लेकिन पंख केवल फड़फड़ा कर रह गए. वह चकित था. उस ने एक उड़ान भर कर पास के पीढ़े तक पहुंचना चाहा, लेकिन किनारे तक पहुंचने से पहले ही जमीन पर गिर पड़ा और फड़फड़ाने लगा. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि उसे हो क्या गया है. वह बारबार उड़ने की कोशिश करता और हर बार मुंह की खाता.

अंत में, थकाहारा, पिंजरे की परिक्रमा करने के बाद वह द्वार पर आ रुका. उस ने एक निराश नजर अपने चारों ओर डाली और सिर झुका कर धीरेधीरे पिंजरे के अंदर चला गया. मुड़ कर एक बार फिर ललचाई नजरों से उस ने पिंजरे के खुले द्वार को निहारा और हताशा से मुंह फेर लिया. पिंजरे में अपनी चोंच को पंखों के बीच छिपा कर आंख मूंद खामोश बैठ गया. अब चाह कर भी वह उस दिन पिंजरे को छोड़ कर नहीं जा सकता था.

वह शायद पछता रहा था कि मैं ने उस दिन उड़ जाने का मौका क्यों खो दिया. काश, उस दिन थोड़ी हिम्मत कर के मैं उड़ गया होता तो फिर चाहे मेरा जो होता, इस गुलामी से लाख गुना बेहतर होता, पर अब क्या करूं? उस ने मान लिया कि मुक्त उड़ान का, खुले आकाश का, बागों और खेतों की सैर का, प्रकृति की ममतामयी गोद का और नन्हे से अपने घोंसले का उस का सपना भी उसी की तरह इस पिंजरे में कैद हो कर रह जाएगा और एक दिन शायद उसी के साथ दफन भी हो जाएगा.

मुझे लगा जैसे आज उस का रोमरोम रो रहा है और वह पूरी मानव जाति को कोसते हुए कह रहा है:

‘यह आदमी नामक प्राणी कितना स्वार्थी है. खुद तो आजाद रहना चाहता है पर आजाद पंछियों को कैद कर के रखता है. ऊपर से हुक्म चलाता है, यह जताने के लिए कि कोई ऐसा भी है जो उस के इशारों पर नाचता है. मुझे कैद कर दिया पिंजरे में. ऊपर से हुक्म देता है, यह बोलो, वह बोलो. बोल दिया तो ‘शाबाश’ कहेगा, लाल फल खाने को देगा. न बोलो तो डांट पिलाएगा.

‘मुझे नहीं सीखनी इनसान की भाषा. खुद तो बोलबोल कर इनसानों ने इनसानियत का सत्यानाश कर रखा है. और हमें उन के बोल बोलने की सीख देते हैं. कहां बोलना है, कैसे बोलना है और कितना बोलना है यह इनसान अभी तक समझ नहीं पाया. इसे इनसान समझ लेता तो बहुत से दंगेफसाद, झगड़े और उपद्रव खत्म हो जाते.

‘चला है मुझे सिखाने, मेरी चुप्पी से ही कुछ सीख लेता कि दर्द अकेले ही सहना पड़ता है. फिर चीखपुकार क्यों? इतना भी इनसान की समझ में नहीं आता. बहुत श्रेष्ठ समझता है अपनेआप को. शौक के नाम पर पशुपक्षियों को कैद कर के उन पर हुक्म चलाता है और कहता है ‘पाल’ रखा है.

‘कुत्तेबिल्ली इसलिए पालता है कि उन पर धौंस जमा सके. दुनिया को दिखाना चाहता है कि देखो, ये कैसे मेरा हुक्म बजा लाते हैं. कैसे मेरे इशारों पर जीतेमरते हैं. हुक्म चलाने की, शासन करने की, अपनी आदम इच्छा को आदमी न जाने कब काबू कर पाएगा? इसीलिए तो निरंकुश घूम रहा है सारी सृष्टि में.

‘इनसान मिलजुल कर क्या खाक रहेगा, जबकि इसे दूसरा कोई ऐसा चाहिए जिस पर यह हुक्म चलाए. जब तक लोग हैं तो लोगों पर राज करता है. लोग न मिलें तो हम पशुपक्षियों पर रौब गांठता है. जब लोगों ने हुक्म मानने से यह कहते हुए मना कर दिया कि जैसे तुम, वैसे हम. तो फिर तुम कौन होते हो हम पर राज करने वाले? तब शामत हम सीधेसादे पशुपक्षियों पर आई. किसी ने मेरी बिरादरी को पिंजरे में डाला तो किसी ने प्यारी मैना को. किसी ने बंदर को धर पकड़ा तो किसी ने रीछ की नाक में नकेल डाल दी.

‘इनसान है कि हमें अपने इशारों पर नचाए जा रहा है. हमें नाचना है. हमारी मजबूरी है कि हम इनसान से कमजोर हैं. हमारे पास इनसान जैसा शरीर नहीं. हमारे पास आदमी जैसा फितरती दिमाग नहीं. आदमी जैसा सख्त दिल नहीं. हम आदमी जैसे मुंहजोर नहीं. इसीलिए हम बेबस हैं, लाचार हैं और इनसान हम पर अत्याचार करता चला आ रहा है.

काश, इनसान में यह चेतना आ जाए कि वह किसी को गुलाम बनाए ही क्यों? खुद भी आजाद रहे और दूसरे प्राणियों को भी आजाद रहने दे. जैसेजैसे ऐसा होता जाएगा वैसेवैसे यह दुनिया सुघड़ होती जाएगी, सुंदर होती जाएगी, सरस होती जाएगी. जब आदमी के ऊपर न तो किसी का शासन होगा और न ही आदमी किसी पर शासन करेगा तब उस की समझ में आएगा कि आजाद रहने और आजाद रहने देने का आनंद क्या है. बंद आकाश और खुले आकाश का अंतर क्या है? तब आदमी महसूस करेगा कि जब वह हम पशुपक्षियों को अपना गुलाम बनाता है तो हम पर और हमारे दिल पर क्या गुजरती है.’

तोते की टें…टें की आवाज ने मेरी तंद्रा भंग कर दी. मैं झटके से उठा. खूंटी पर से तोते का पिंजरा उतारा और चल पड़ा झुरमुट वाले खेतों की ओर.

खेत शुरू हो गए थे. पकी फसल की बालियां खाने के लिए हरे चिकने तोते झुरमुट से खेतों तक उड़ान भरते और चोंच में अनाज की बाली लिए लौटते. झुरमुट और खेत दोनों में उन के टें…टें के स्वर छाए थे. पिंजरे का तोता भी अब चहकने लगा था.

मैं रुक गया और पिंजरे को अपने चेहरे के सामने ले आया और ‘पट्टूपट्टू’ पुकारने लगा. वह पिंजरे में इधर से उधर, उधर से इधर व्याकुलता से घूमता जा रहा था. बीचबीच में पंख भी फड़फड़ाता जाता. उस में अप्रत्याशित चपलता आ गई थी. शायद यह दूसरे तोतों की आवाज का करिश्मा था जो वह मुक्ति के लिए आतुर हो रहा था.

मैं ने ज्यादा देर करना ठीक नहीं समझा. पिंजरे का द्वार झुरमुटों की तरफ कर के खोला और प्यार से बोला, ‘‘जा, उड़ जा. जा, शाबाश, जा.’’

वह सतर्क सा द्वार तक आया. गरदन बाहर निकाल कर जाने क्या सूंघा, पंख फड़फड़ाए और उड़ गया.  एक छोटी सी उड़ान. वह सामने के पत्थर पर जा टिका. एक क्षण वहां रुक कर पंख फड़फड़ाए और फिर उडान ली. यह उड़ान, पहली उड़ान से कुछ लंबी थी.

अब वह एक झाड़ी पर जा बैठा. उस के बाद उड़ा तो एक जवान पेड़ की लचकदार डाल पर जा बैठा. उस के बैठते ही डाल झूलने लगी. उस ने 1-2 झूले खाए और फिर यह जा, वह जा, तोतों के झुंड में शामिल हो गया.

मैं ने संतोष की सांस ली.

लौटने लगा तो हाथ में खाली पिंजरे की तरफ ध्यान गया. एक पल पिंजरे को देखा और विचार कौंधा कि सारे खुराफात की जड़ तो यह पिंजरा ही है. यह रहेगा, तो न जाने कब किस पक्षी को कैद करने का लालच मन में आ जाए.

मैं ने घाटी की ओर एक सरसरी नजर डाली और पिंजरे को टांगने वाले हुक से पकड़ कर हाथ में तोलते हुए एक ही झटके से उसे घाटी की तरफ उछाल दिया. पहाड़ी ढलान पर शोर से लुढ़कता पिंजरा जल्दी ही मेरी आंखों से ओझल हो गया.

घर लौटते समय मैं खुद को ऐसा हलका महसूस कर रहा था जैसे मेरे भी पंख उग आए हों.

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