Hindi Story: तुम, मैं और 2 कप चाय

बारिश की हलकी फुहार थी. सड़क किनारे वही पुरानी सी चाय की दुकान, जहां अकसर भीड़ नहीं होती थी.
संजय वहां बैठा था, हाथ में गरम चाय का कप लिए.
तभी सवि आई और बोली, ‘‘आज भी यहीं बैठे हो?’’
संजय ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘हां, लगा तुम आओगी.’’
सवि संजय के सामने बैठ गई. दुकानदार ने बिना पूछे चाय का दूसरा कप रख दिया.
सवि ने पूछा, ‘‘तुम्हें कैसे पता मैं चाय पीऊंगी?’’
‘‘पिछले 3 सालों से हर मुश्किल
में तुम ने चाय ही तो मांगी है,’’

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संजय बोला.
सवि हंस पड़ी. वही हंसी, जिस में सुकून था.
सवि बोली, ‘‘कभीकभी लगता है, हमारी पूरी कहानी इन्हीं 2 कप चाय में सिमटी है.’’
संजय ने कहा, ‘‘हां, एक तुम्हारे
हाथ में, एक मेरेऔर बीच में ढेर
सारी बातें.’’
कुछ पल खामोशी रही. बारिश तेज हो गई.
सवि धीमे से बोली, ‘‘अगर मैं कभी दूर चली जाऊं तो?’’
संजय बोला, ‘‘तो भी यहां कर
2 कप चाय मंगाऊंगा. एक तुम्हारे
इंतजार में.’’
सवि ने संजय की ओर देखा. आंखों में नमी थी, पर चेहरे पर मुसकान.
सवि ने पूछा, ‘‘कभी कहा क्यों नहीं कि तुम मुझ से…’’
संजय बीच में बात काट कर बोला, ‘‘डरता था, कहीं चाय की यह आदत भी छूट जाए,’’ फिर वह मुसकरा दिया.
सवि ने संजय का हाथ थाम लिया और बोली, ‘‘पागल, प्यार कहा नहीं जाता, महसूस किया जाता है. जैसे
यह चाय.’’ बारिश थम रही थी. चाय खत्म हो चुकी थी, पर कहानी नहीं.
संजय ने पूछा, ‘‘तो कल फिर?’’
सवि बोली, ‘‘हांतुम, मैं और
2 कप चाय.’’
उस दिन संजय को समझ आया
कि प्यार बड़े वादों में नहीं, छोटी
दुकानों, गरम चाय और सच्चे इंतजार में होता है.                             

संजय सिंह चौहान

Welcomed divorcee daughter: ढोल-नगाड़ों के साथ तलाकशुदा बेटी का स्वागत किया।

Welcomed divorcee daughter: अक्सर हमारे समाज में तलाक को एक ‘कलंक’ के रूप में देखा जाता है, लेकिन मेरठ के एक पिता ने इस सोच को पूरी तरह बदल दिया है. जब उनकी बेटी की शादी ससुराल वालों के खराब व्यवहार के कारण टूट गई, तो उन्होंने उसे पूरे सम्मान और खुशी के साथ घर वापस लाकर एक नई मिसाल कायम की.

मेरठ के रहने वाले श्याम किशोर शर्मा की बेटी प्रणिता शर्मा की शादी 14 अक्टूबर, 2018 को शाहजहांपुर के मेजर गौरव अग्निहोत्री से हुई थी. पिता का कहना है कि शादी के कुछ समय बाद ही प्रणिता की ससुराल वालों का व्यवहार बदलने लगा. पिछले 7 वर्षों से प्रणिता लगातार प्रताड़ना और मानसिक तनाव झेल रही थी. आखिरकार, जब हालात ज्यादा बिगड़े तब प्रणिता ने तलाक की अर्जी दाखिल की.

4 अप्रैल को मेरठ फैमिली कोर्ट ने तलाक की अर्जी मंजूर कर ली. इस फैसले के बाद, बेटी के पिता ने उसे जश्न के साथ घर लाने का निर्णय लिया. परिवार के सभी सदस्य ‘आई लव माय डॉटर’ लिखी हुई टीशर्ट पहनकर ढोलनगाड़ों के साथ अपनी बेटी के स्वागत में पहुंचे.

पिता श्याम किशोर शर्मा ने कहा, “मेरी बेटी को शादी में मैंने खुशी-खुशी विदा किया था. आज जब वह वापस आ रही है, तो मेरा दायित्व है कि मैं उसे उसी सम्मान और खुशी के साथ घर लाऊं. मैंने ससुराल वालों से कोई सामान या एलिमनी नहीं ली है.”

प्रणिता अब जालंधर में पोस्टेड हैं और खुद को आत्मनिर्भर बनाने के लिए काम कर रही हैं. पिता ने सबको सलाह दी है कि अगर वे किसी भी प्रकार की प्रताड़ना झेल रही हैं, तो चुप न रहें. शिक्षित बनें, आत्मनिर्भर बनें और अपने आत्मसम्मान के लिए मजबूती से फैसले लें.

यह घटना हमारे समाज के लिए एक बड़ा संदेश है कि रिश्ता टूटने का मतलब जीवन का अंत नहीं है, बल्कि अपनी खुशी और सम्मान के साथ नई शुरुआत करने का एक अवसर है.

Readers Problem: मेरा बौयफ्रैंड मुझे चीट कर रहा है

Readers Problem: मैं अपने बौयफ्रैंड से बहुत प्यार करती हूं, लेकिन हाल ही में उस की जिंदगी में एक और लड़की आ गई है. वह उस से ज्यादा बात करने लगा है और  दूरी बनाने लगा है. मैं अंदर से टूट रही हूं. मैं क्या करूं?

आप का टूटना स्वाभाविक है, क्योंकि यह सिर्फ किसी इंसान को खोने का डर नहीं, बल्कि अपनी जगह छिनते जाने का दर्द है. जब हम किसी से सच्चा प्यार करते हैं और अचानक महसूस होता है कि उस की जिंदगी में कोई और अहम होने लगा है तो आत्मसम्मान, सुरक्षा और भविष्य तीनों एकसाथ हिल जाते हैं. इस दर्द में खुद को कमजोर या दोषी ठहराना ठीक नहीं है.

 यह  जरूरी है कि प्यार में तीसरे व्यक्ति का आना संयोग नहीं, बल्कि संकेत होता है. यह संकेत इस बात का कि आप का बौयफ्रैंड या तो भ्रम में है या भावनात्मक रूप से स्पष्ट नहीं या फिर आप के रिश्ते को ले कर उतना गंभीर नहीं रहा. उस की दूरी आप की कमी का प्रमाण नहीं है. किसी और से ज्यादा बात करना और आप से कटते जाना उस के चुनाव हैं, आप की असफलता नहीं.

ऐसे समय में खुद को तोड़ कर, चुपचाप सब सह लेना प्रेम नहीं होता. शांत और स्पष्ट शब्दों में उस से बात करना जरूरी है आरोप नहीं, लेकिन सच्चाई के साथ. यह जानना आप का अधिकार है कि वह क्या चाहता है और आप उस के जीवन में कहां खड़ी हैं. अगर वह टालता है, भ्रम में रखता है या आप को ओवरथिंकिंग कह कर चुप कराना चाहता है तो यह भावनात्मक लापरवाही है.

सब से कठिन, लेकिन सब से जरूरी बात खुद को पकड़ कर रखना. जिस रिश्ते में आप रोज टूट रही हैं, वहां सिर्फ प्यार के नाम पर ठहरना धीरेधीरे आप को खो देगा. प्यार वह नहीं होता जिस में आप को बारबार अपनी अहमियत साबित करनी पड़े. अगर वह सच में आप का है तो वह आप को असुरक्षा में नहीं छोड़ेगा और अगर नहीं तो खुद को बचा कर निकलना हार नहीं, आत्मसम्मान की जीत है.

आप अभी दर्द में हैं, इसलिए साफ सोचना मुश्किल है लेकिन याद रखिए आप किसी की औप्शन बनने के लिए नहीं, बल्कि किसी की चौइस बनने के लायक हैं.

मैं 25 साल की युवती हूं और मेरा बौयफ्रैंड मुझ से शादी का वादा करता है, लेकिन जब भी मैं घरवालों से बात करने की बात करती हूं तो वह टाल देता है. वह कहता है कि अभी सही समय नहीं है. मुझे डर लगता है कि कहीं वह टाइम पास तो नहीं कर रहा. मुझे क्या फैसला लेना चाहिए.

हम आप की परेशानी समझ रहे हैं. भविष्य को ले कर अनिश्चिता होना बहुत चिंता देता है. केवल वादा करना और सच में कदम उठाना-दोनों अलग बातें हैं. आप को उन से साफसाफ पूछना चाहिए कि वे शादी के बारे में कब और कैसे आगे बढ़ना चाहते हैं. उन से एक तय समय पूछें और जानें कि वे क्या तैयारी कर रहे हैं.

अगर वे ईमानदारी से अपनी वजह बताते हैं और सच में कुछ कदम उठाने को तैयार हैं तो थोड़ा इंतजार करना ठीक हो सकता है. लेकिन अगर वे हर बार बहाना बनाते हैँ और कोई साफ जवाब नहीं देते तो आप को अपने आत्मसम्मान और भविष्य के बारे में सोचना चाहिए. किसी भी रिश्ते में साफ बात और सच्ची नीयत बहुत जरूरी होती है.   

Sexual Blackmail: मैं ने एक अमीर लड़के के साथ फिजिकल संबंध बना लिया

Sexual Blackmail: अगर आप भी अपनी समस्या भेजना चाहते हैं, तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें.

सवाल –

मैं 19 साल की लड़की हूं और दिल्ली के एक कालेज में पढ़ती हूं. मेरे परिवार वाले हिमाचल प्रदेश में रहते हैं. मैं दिखने में बेहद ही फिट और सैक्सी हूं. मेरे घर वाले ज्यादा अमीर नहीं हैं, तो मुझे काफी कम पौकेटमनी मिलती है जिस में दिल्ली जैसे शहर में मुश्किल से ही गुजारा हो पाता है. मेरी एक फ्रैंड है, जो हर रोज घूमने निकल जाती है और हर दूसरे दिन महंगीमहंगी चीजों की शौपिंग करती है. उस के घरवाले भी ज्यादा अमीर नहीं हैं. जब मैं ने उस से पूछा कि वह इतना सब कैसे अफोर्ड कर पाती है, तो उस ने बताया कि वह बड़े घर के अमीर लड़कों के साथ सैक्स करती है और बदले में उन से पैसे लेती है. मुझे काफी अजीब लगा, लेकिन फिर मैं ने सोचा कि अगर ऐसा करने से मेरी लाइफस्टाइल सुधर सकती है, तो क्यों न मैं भी ट्राय करूं. मैं ने एक अमीर लड़के से बात करनी शुरू की और जब उस ने मेरे साथ फिजिकल संबंध बनाने को कहा, तो मैं ने उसे बोला कि उसे इस के बदले मुझे पैसे देने होंगे. वह मान गया और हमारे बीच संबंध भी बन गए, लेकिन उस लड़के ने मेरी वीडियो बना ली और अब वह मुझे ब्लैकमेल कर रहा है कि मुझे उस के साथ यह सब बारबार करना होगा. मैं पहली बार ही यह सब कर के फंस गई हूं. मुझे समझ नहीं आ रहा है कि मैं क्या करूं?

जवाब –

आप की बातों को सुन कर मुझे यकीन नहीं हो पा रहा है कि चंद पैसों के लिए कैसे शरीफ लड़कियां भी अपनी इज्जत बेचने लग गई हैं. आप को एक बार अपने परिवार वालों के बारे में तो सोचना चाहिए था कि ज्यादा पैसा न होने के बावजूद भी वे आप को अच्छी शिक्षा दे रहे हैं और यह उम्मीद लगा कर बैठे हैं कि उन की बेटी दिल लगा कर पढ़ाई कर रही होगी. जब उन्हें पता लगेगा कि उन की बेटी पढ़ाई के अलावा यह सब कर रही है, तो सोचिए उन पर क्या बीतेगी.

जो हो गया सो हो गया और यह अच्छा हुआ कि आप को पहली बार में ही समझ आ गया कि यह काम कितना जोखिम भरा हो सकता है. अब आप को सीधा पुलिस के पास जाना है और उस लड़के के खिलाफ कंपलेंट करनी है कि वह आप को ब्लैकमेल करने की कोशिश कर रहा है. पुलिस के पास जाने के लिए आप को बिलकुल डरने की जरूरत नहीं है, क्योंकि इस सिच्युएशन में पुलिस ही आप की मदद कर सकती है.

सब से पहले आपको उस लड़के के खिलाफ सबूत इकट्ठे करने होंगे जैसे कि उस के मैसेज या कौल रिकौर्डिंग्स और सुबूत मिलते ही आप को पुलिस को सारी बात बता देनी है. पुलिस उस लड़के के पास से आप की वीडियो डिलीट कराने में भी मदद करेगी. लेकिन ध्यान रहे, आगे से आप को ऐसी चीजें कभी नहीं करनी हैं, क्योंकि इस का परिणाम बहुत बुरा हो सकता है.

व्हाट्सऐप मैसेज या व्हाट्सऐप औडियो से अपनी समस्या इस नम्बर पर 8588843415 भेजें. Sexual Blackmail

Story In Hindi: समुद्र से सागर तक

Story In Hindi: 3 दिनों से बंद फ्लैट की साफसफाई और हर चीज व्यवस्थित कर के साक्षी लैपटौप और मोबाइल फोन ले कर बैठी तो फोन में बिना देखे तमाम मैसेज पड़े थे. लैपटौप में भी तमाम मेल थे. पिछले 3 दिनों में लैपटौप की कौन कहे, मोबाइल तक देखने को नहीं मिला था. मां को फोन भी वह तब करती थी, जब बिस्तर पर सोने के लिए लेटती थी. मां से बातें करतेकरते वह सो जाती तो मां को ही फोन बंद करना पड़ता.

पहले उस ने लैपटौप पर मेल पढ़ने शुरू किए. वह एकएक मैसेज पढ़ने लगी. ‘‘हाय, क्या कर रही हो? आज आप औनलाइन होने में देर क्यों कर रही हैं?’’

‘‘अरे कहां है आप? कल भी पूरा दिन इंतजार करता रहा, पर आप का कोई जवाब ही नहीं आया?’’

‘‘अब चिंता हो रही है. सब ठीकठाक तो है न?’’

‘‘मानता हूं काम में बिजी हो, पर एक मैसेज तो कर ही सकती हो.’’ सारे मैसेज एक ही व्यक्ति के थे.

मैसेज पढ़ कर हलकी सी मुसकान आ गई सरिता के चेहरे पर. उसे यह जान कर अच्छा लगा कि कोई तो है जो उस की राह देखता है, उस की चिंता करता है. उस ने मैसेज टाइप करना शुरू किया.

‘‘मैं अपने इस संबंध को नाम देना चाहती हूं. आखिर हम कब तक बिना नाम के संबंध में बंधे रहेंगे. आप का तो पता नहीं, पर मैं तो अब संबंध की डोर में बंध गई हूं. यही सवाल मैं ने आप से पहले भी किया था, पर न जाने क्यों आप इस सवाल का जवाब टालते रहे. जवाब देने की कौन कहे, आप बात ही करना बंद कर देते हो. आखिर क्यों.?

‘‘एक बात आप अच्छी तरह जान लीजिए. बिना किसी नाम का दिशाहीन संबंध मुझे पसंद नहीं है. हमेशा दुविधा में रहना अच्छा नहीं लगता. पिछले 3 दिनों से आप के संदेश की राह देख रही हूं. गुस्सा तो बहुत आता है पर आप पर गुस्सा करने का हक है भी या नहीं, यह मुझे पता नहीं. आखिर मैं आप के किसी काम की या आप मेरे किस काम के..?

‘‘आप के साथ भी मुझे मर्यादा तय करनी है. है कोई मर्यादा? आप को पता होना चाहिए, अब मैं दुविधा में नहीं रहना चाहती. मैं आप को किसी संबंध में बांधने के लिए जबरदस्ती मजबूर नहीं कर रही हूं. पर अगर संबंध जैसा कुछ है तो उसे एक नाम तो देना ही पड़ेगा. खूब सोचविचार कर बताइएगा.

‘‘मेरे लिए आप का जवाब महत्त्वपूर्ण है. मैं आप की कौन हूं? इतनी निकटता के बाद भी यह पूछना पड़ रहा है, जो मुझे बहुत खटक रहा है. —आप के जवाब के इंतजार में सरिता.’’

सरिता काफी देर तक लैपटौप पर नजरें गड़ाए रही. उन के बीच पहली बार ऐसा नहीं हो रहा था. इस के पहले भी सरिता ने कुछ इसी तरह की या इस से कुछ अलग तरह की बात कही थी. पर हर बार किसी न किसी बहाने बात टल जाती थी. देखा जाए तो दोनों के बीच कोई खास संबंध नहीं था. दोनों कभी मिले भी नहीं थे. एकदूसरे से न कोई वादा किया था, न कोई वचन दिया था.

बस, उन के बीच बातों का ही व्यवहार था. कभी खत्म न हो, ऐसी बातें. उस की बातें सरिता को बहुत अच्छी लगती थीं. दोनों दिनभर एकदूसरे को मेल या चैटिंग करते रहते. बीचबीच में अपना काम कर के फिर चैटिंग पर लग जाते. समयसमय पर मेल भी करते.

दोनों की जानपहचान अनायास ही हुई थी. मेल आईडी टाइप करने में हुई एक अक्षर की अदलाबदली की तरह से. ध्यान नहीं दिया और मेल सैंड हो गया. उस के रिप्लाय में आया. सौरी, सामने से फिर जवाब, करतेकरते दोनों को एकदूसरे का जवाब देने की आदत सी पड़ गई.

जल्दी ही उन की बातें एकदूसरे की जरूरत बन गईं. दोनों का परिचय हुए 3 महीने हो चुके थे, पर ऐसा लगता था, जैसे वे न जाने कब से परिचित हैं, दोनों में गहरा लगाव हो गया था, उन का स्वभाव भी अलग था और व्यवसाय भी, फिर भी दोनों नजदीक आ गए थे.

वह दिल्ली यूनिवर्सिटी के एक कालेज में हिंदी का प्रोफेसर था. साहित्य का भंडार था उस के पास. कभी वह खुद की लिखी कोई गजल या शायरी सुनाता तो कभी अपनी यूनिवर्सिटी की मजाकिया बातें कह कर हंसाता. सरिता उस की छोटी से छोटी बात ध्यान से सुनती और पढ़ती. उस के साथ के क्षणों में, उस की बातों में आसपास का सब बिसार कर खो सी जाती.

पर जब वह 3 दिनों के लिए कंपनी टूर पर मुंबई गई तो मन जैसे अपनी बात कहने को विकल हो उठा. आज दिल की बात कह ही देनी है, यह निश्चय कर के वह दाहिने कान के पीछे निकल आई लट को अंगुलियों में ले कर डेस्क पर रखे लैपटौप की स्क्रीन में खो गई. जैसे वह सामने बैठा है और वह उस की आंखों में आंखें डाल कर अपनी बात कह रही है. वह मैसेज टाइप करने लगी.

‘‘हाय 3 दिनों के लिए कंपनी टूर पर मुंबई गई थी. जाने का प्लान अचानक बना, इसलिए तुम्हें बता नहीं सकी, बहुत परेशान किया न तुम्हें? पर सच कहूं, 3 दिनों तक तुम से दूर रह कर मेरे मन में हिम्मत आई कि मैं अपने मन की बात तुम से खुल कर कह सकूं. क्या करूं, थोड़ी डरपोक हूं न? आज तुम्हें मैं अपने एक दूसरे मित्र से मिलवाती हूं. अभी नईनई मित्रता हुई है जानते हो किस से? जी हां, दरिया से… हां, दरिया, समुद्र, सागर…

‘‘नजर में न भरा जा सके, इतना विशाल, चाहे जितना देखो, कभी मन न भरे. इतना आकर्षक कि मन करता है हमेशा देखते रहो. मेरे लिए यह सागर हमेशा एक रहस्य ही रहा है. कहीं कलकल बहता है तो कहीं एकदम शांत तो कहीं एकदम तूफानी.

‘‘समुद्र मुझे बहुत प्यारा लगता है. घंटों उस के सान्निध्य में बैठी रहती हूं, फिर भी थकान नहीं लगती. पर मेरा यह प्यार दूरदूर से है. दूर से ही बैठ कर उस की लहरों को उछलते देखना, उस की आवाज को मन में भर लेना. इस तरह देखा जाए तो यह सागर मेरा ‘लौंग डिसटेंस फ्रेंड’ कहा जा सकता है, एकदम तुम्हारी ही तरह. हम मन भर कर बात करते हैं, कभीकभी एकदूसरे से गुस्सा भी होते हैं, पर जब नजदीकी की बात आती है तो मैं डर जाती हूं. दूर से ही नमस्कार करने लगती हूं.

‘‘पर इस सब को कहीं एक किनारे रख दो. मैं भले ही सागर के करीब न जाऊं, दूर से ही उसे देखती रहूं, पर वह किसी न किसी युक्ति से मुझे हैरान करने आ ही जाता है. दूर रहते हुए भी उस की हलकी सी हवा का झोंका मेरे शरीर में समा जाता है. मजाल है कि मैं उस के स्पर्श से खुद को बचा पाऊं. एकदम तुम्हारी ही तरह वह भी जिद्दी है.

‘‘उस की इस शरारत से कल मेरे मन में एक नटखट विचार आया. मन में आया कि क्यों न हिम्मत कर के एक कदम उस की ओर बढ़ाऊं. चप्पल उतार कर उस की ओर बढ़ी. एकदम किनारे रह कर पैर पानी में छू जाए इतना ही बढ़ी थी. वह पहले से भी ज्यादा पागल बन कर मेरी ओर बढ़ा और मुझे पूरी तरह भिगो दिया. जैसे कह रहा हो, बस मैं तुम्हारी पहल की ही राह देख रहा था, बाकी मैं तो तुम्हें कब से भिगोने को तैयार था.

‘‘मैं उस के इस अथाह प्रेम में डूबी वहीं की वहीं खड़ी रह गई. मैं ने तो केवल पैर धोने के लिए पानी मांगा था, उस ने मुझे पूरी की पूरी अपने में समा लिया था. कहीं सागर तुम्हारा रूप ले कर तो नहीं आया था? शायद नाम की वजह से दोनों का स्वभाव भी एक जैसा हो. वह समुद्र और तुम सागर. दोनों का स्थान मेरे मन में एक ही है. सच कहूं, अगर मैं एक कदम आगे बढ़ाऊं तो क्या तुम मुझे खुद में समा लोगे? —तुम्हारी बनने को आतुर सरिता’’

क्या जवाब आता है, यह जानने के लिए सरिता का दिल जोजोर से धड़कने लगा था. दिल में जो आया, वह कह दिया. अब क्या होगा, यह देखने के लिए वह एकटक स्क्रीन को ताकती रही.

सागर में उछाल मार रहे समुद्र की एक फोटो भेजी. मतलब सरिता की पहल को उस ने स्वीकार कर लिया था.

प्रकृति के नियम के अनुसार फिर एक सरिता बहती हुई अपने सागर मे मिलने का अनोखा मिलन रचने जा रही थी. Story In Hindi

Hindi Kahani: हिंडोला – दीदी और अपने प्यार के बीच झूलती अनुभा

Hindi Kahani: ढाई इंच मोटी परत चढ़ आई थी, पैंतीसवर्षीय अनुभा के बदन पर. अगर परत सिर्फ चर्बी की होती तो और बात होती, उस के पूरे व्यक्तित्व पर तो जैसे सन्नाटे की भी एक परत चढ़ चुकी थी. खामोशी के बुरके को ओढ़े वह एक यंत्रचालित मशीनीमानव की तरह सुबह उठती, उस के हाथ लगाने से पहले ही जैसे पानी का टैप खुल जाता, गैस पर चढ़ा चाय का पानी, चाय के बड़े मग में परस कर उस के सामने आ जाता. कार में चाबी लगाने से पहले ही कार स्टार्ट हो जाती और रास्ते के पेड़ व पत्थर उसे देख कर घड़ी मिलाते चलते, औफिस की टेबल उसे देखते ही काम में व्यस्त हो जाती, कंप्यूटर और कागज तबीयत बदलने लगते.

आज वह मल्टीनैशनल कंपनी में सीनियर पोस्ट पर काबिज थी. सधे हुए कदम, कंधे तक कटे सीधे बाल, सीधे कट के कपड़े उस के आत्मविश्वास और उस की सफलता के संकेत थे.

कादंबरी रैना, जो उस की सेके्रटरी थी, की ‘गुडमार्निंग’ पर अनुभा ने सिर उठाया. कादंबरी कह रही थी, ‘‘अनु, आज आप को अपने औफिस के नए अधिकारी से मिलना है.’’

‘‘हां, याद है मुझे. उन का नाम…’’ थोड़ा रुक कर याद कर के उस ने कहा, ‘‘जीजीशा, यह क्या नाम है?’’

कादंबरी ने हंसी का तड़का लगा कर अनुभा को पूरा नाम परोसा, ‘‘गिरिजा गौरी शंकर.’’

किंतु अनुभा को यह हंसने का मामला नहीं लगा.

‘‘ठीक है, वह आ जाए तो 2 कौफी भेज देना.’’

बाहर निकल कर कादंबरी ने रोमा से कहा, ‘‘लगता है, एक और रोबोट आने वाली है.’’

‘‘हां, नाम से तो ऐसा ही लगता है,’’ दोनों ने मस्ती में कहा.

जीजीशा तो निकली बिलकुल उलटी.  जैसा सीरियस नाम उस का, उस के उलट था उस का व्यक्तित्व. क्या फिगर थी, क्या चाल, फिल्मी हीरोइन अधिक और एक अत्यंत सीनियर पोस्ट की हैड कम लग रही थी. उस के आते ही सारे पुरुषकर्मी मुंहबाए लार टपकाने लगे, सारी स्त्रियां, चाहें वे बड़ी उम्र की थीं

या कम की, अपनेअपने कपड़े, चेहरे व बाल संवारने लगीं.

लगभग 35 मिनट के बाद जीजीशा जब अनुभा के कमरे से लौटी तो उस के कदम कुछ असंयमित से थे. वह कादंबरी के सामने की कुरसी पर धम से बैठ गई.

‘‘लीजिए, पानी पीजिए. उन से मिल कर अकसर लोगों के गले सूख जाते हैं,’’ मिस रैना ने अनुभा के औफिस की तरफ इशारा किया. अनुभा तो थी ही ऐसी, कड़क चाय सी कड़वी, किंतु गर्म नहीं. कड़वाहट उस के शब्दों में नहीं, उस के चारों ओर से छू कर आती थी.

जीजीशा अनुभा की हमउम्र थी, परंतु औफिस में उसे रिपोर्ट तो अनुभा को ही करना था. औफिस में सब एकदूसरे का नाम लेते थे, सिर्फ नवीन खन्ना को बौस कहते थे.

ऐसा नहीं था कि गला सिर्फ जीजीशा का सूखा हो, उस से मिल कर अनुभा की जीवनरूपी मशीन का एकएक पुर्जा चरचरा कर टूट गया था. जीजीशा ने उसे नहीं पहचाना, किंतु अनुभा उसे देखते ही पहचान गई थी. जीजीशा, उर्फ गिरिजा गौरी शंकर या मिट्ठू?

पलभर में कोई बात ठहर कर सदा के लिए स्थायी क्यों बन जाती है? अनुभा के स्मृतिपटल पर परतदरपरत यह सब क्या खुलता जा रहा था? कभी उसे अपना बचपन झाड़ी के पीछे छुप्पनछुपाई खेलता दिखता तो कभी घुटने के ऊपर छोटी होती फ्रौक को घुटने तक खींचने की चेष्टा में बढ़ा अपना हाथ.

एक दिन फ्रौक के नीचे सलवार पहन कर जब वह बाहर निकली थी उस की फैशनेबल दीदी यामिनी, जो कालेज में पढ़ती थीं, उसे देख कर हंसते हुए उस के गाल पर चिकोटी काट कर बोलीं, ‘अनु, यह क्या ऊटपटांग पहन रखा है? सलवारसूट पहनने का मन है तो मम्मी से कह कर सिलवा ले, पर तू तो अभी कुल 14 बरस की है, क्या करेगी अभी से बड़ी अम्मा बन कर?’

इठलाती हुई यामिनी दीदी किताबें हवा में उछाल कर चलती बनीं.

अनुभा कभी भी दीदी की तरह नए डिजाइन के कपड़े नहीं पहन पाई. उस में ऐसा क्या था जो तितलियों के झुंड में परकटी सी अलगथलग घूमा करती थी. घर में भी आज्ञाकारी पुत्री कह कर उस के चंचल भाईबहन उस पर व्यंग्य कसते थे.

‘मां की दुलारी’, ‘पापा की लाड़ली’, ‘टीचर्स पैट’ आदि शब्दों के बाण उस पर ऐसे छोड़े जाते थे मानो वे गुण न हो कर गाली हों. अनुभा के भीतर, खूब भीतर एक और अनुभा थी, जो सपने बुनती थी, जो चंचल थी, जो पंख लगा कर आकाश में ऊंची उड़ान भरा करती थी. उस के अपने छोटेछोटे बादल के टुकड़े थे, रेशम की डोर थी और तीज बिना तीज वह पींग बढ़ाती खूब झूला झूलती थी, जो खूब शृंगार करती थी, इतना कि स्वयं शृंगार की प्रतिमान रति भी लजा जाए. पर जिस गहरे अंधेरे कोने में वह अनुभा छिपी थी उसे कोई नहीं जान पाया कभी.

एक दिन जब उस के साथ कालेज आनेजाने वाली सहेली कालेज नहीं आई थी, वह अकेली ही माल रोड की चौड़ी छाती पर, जिस के दोनों ओर गुलमोहर के सुर्ख लाल पेड़ छतरी ताने खड़े थे, साइकिल चलाती घर की तरफ आ रही थी. रेशमी बादलों के बीच छनछन कर आ रही धूप की नरमनरम किरणों में ऐसी उलझी कि ध्यान ही नहीं रहा कि कब उस की साइकिल के सामने एक स्कूटर और स्कूटर पर विराजमान एक नौजवान उसे एकटक देख रहा था.

‘लगता है आप आसमान को सड़क समझ रही हैं. यदि मैं अपना पूरा बे्रक न लगा देता तो मैडम, आप उस गड्ढे में होतीं और दोष मिलता मुझे. माना कि छावनी की सड़कें सूनी होती हैं, पर कभीकभी हम जैसे लोग भी इन सड़कों पर आतेजाते हैं और आतेजाते में टकरा जाएं और वह भी किस्मत से किसी परी से…’

अनुभा इस कदर सहम गई, लजा गई और पता नहीं ऐसा क्या हुआ कि गुलमोहर का लाल रंग उस के चेहरे को रंग गया. अटपटे ढंग से ‘सौरी’ बोल कर तेजतेज साइकिल भगाती चल पड़ी वहां से.

स्कूटर वाला तो निकला उस के भाई सुमित का दोस्त, जो कुछ दिन पहले ही एअरफोर्स में औफिसर बन कर लौटा था. बड़ा ही स्मार्ट, वाक्चतुर. ड्राइंगरूम में उसे बैठा देख वह चौंक पड़ी, वह बच कर चुपके से अपने कमरे की ओर लपकी तभी उस के भाई ने उसे आवाज दी, अपने मित्र से परिचय कराया, ‘आलोक, मिलो मेरी छोटी बहन अनुभा से.’

‘हैलो,’ कह कर वह बरबस मुसकरा पड़ी.

‘सुमित, अपनी बहन से कहो कि सड़क ऊपर नहीं, नीचे है.’

और वह भाग गई, उस के कानों में उन दोनों की बातचीत थोड़ीथोड़ी सुनाई पड़ रही थी, समझ गई कि माल रोड की चर्चा चल रही थी. अपने को बातों का केंद्र बनता देख वह कुमुदिनी सी सिमट गई थी. रात होने को आई, पर उस रात वह कुमुदिनी बंद होने के बदले पंखड़ी दर पंखड़ी खिली जा रही थी.

उन के घर जब भी आलोक आता, उस के आसपास मीठी सी बयार छोड़ जाता. पगली सी अनुभा आलोक की झलक सभी चीजों में देखने लगी थी, सिनेमा के हीरो से ले कर घर में रखी कलाकृतियों तक में उसे आलोक ही आलोक नजर आता था. अनुभा अचानक भक्तिन बनने लगी, व्रतउपवास का सिलसिला शुरू कर दिया. मां ने समझाया, ‘पढ़ाई की मेहनत के साथ व्रतउपवास कैसे निभा पाएगी?’

‘मम्मी, मेरा मन करता है,’ उस ने उत्तर दिया था.

‘अरे, तो कोई बुरा काम कर रही है क्या? अच्छे संस्कार हैं,’ दादी ने मम्मी से कहा.

अनुभा के मन में सिर्फ अब आलोक को पाने की चाहत थी. कालेज जाने से पहले वह मन ही मन सोचती कि बस किसी तरह आलोक मिल जाए.

‘बिटिया, कहीं पिछले जन्म में संन्यासिनी तो नहीं थी? पता नहीं इस का मन संसार में लगेगा कि नहीं?’ मम्मी को चिंता सताती.

‘कुछ नहीं होगा. अपनी यामिनी तो दोनों की कसर पूरी कर देती है. चिंता तो उस की है. न पढ़ने में ध्यान, न घर के कामकाज में. जब देखो तब फैशन, डांस और हंगामा,’ उस के पिता ने मां से कहा था.

‘हां जी, ठीक कहते हो, अब यामिनी की शादी कर दो. फिर मेरी अनुभा के लिए एक अच्छा सा वर ढूंढ़ देना.’

और अनुभा के भीतर वाली अनुभा ‘धत्’ बोल कर हंस पड़ी.

उस के पैर द्रुतगति से तिगदा-तिग-तिग, तिगदा-तिग-तिग तिगदा-तिग-तिग-थेई की ताल पर थिरक रहे थे. परंतु सहसा उस के पैरों की थिरकन द्रुतगति से विलंबित ताल पर होती हुई समय आने से पहले ही रुक गई. पैरों से घुंघरू उतार कर वह चुपचाप जाने लगी तो उस के डांस टीचर ने कहा, ‘आज एक नया तोड़ा सिखाना था, यामिनी तो कभी ठीक से सीखती नहीं, अब तुम भी जा रही हो.’

‘5 साल से नृत्य सीख रही हूं मास्टरजी, अब मैं सितार सीखूंगी,’ अनुभा ने सहज भाव से कहा.

‘हांहां क्यों नहीं,’ मास्टरजी ने भी हामी भर दी थी.

कौन जान पाया कि अनुभा के पैरों की थिरकन क्यों रुक गई. उस में कोई बाहरी परिवर्तन होता तो कोई देखता. अनुभा अपनी पढ़ाई और सितार के तारों में खो गई. दीदी यामिनी की शादी में आलोक दूल्हा बन के आया. दीदी चली गई, उस सपने के हिंडोले में बैठ कर जो उस ने अपने लिए बुना था.

‘याद है माल रोड वाली सड़क की वह टक्कर.’

जीजा बना आलोक उस से ठिठोली करता. जीजा को साली से मजाक करने का पूरा अधिकार था.

जिस घोड़ी पर बैठ कर आलोक आया था उस के गले में पड़ा खूबसूरत हार सब के आकर्षण का केंद्रबिंदु था. उस हार में जड़ा था खूबसूरत पत्थर, जिसे सब देखते नहीं थकते थे.

‘यह कौन है?’ जिज्ञासा से भरे सवाल निकले.

‘आलोक की क्या लगती है?’

‘हाय कितनी सुंदर है, पूरी मौडल जैसी.’

पता चला कि आलोक के पिता के मित्र की लड़की थी और आलोक की बचपन की ‘स्वीटहार्ट’. तब आलोक ने उस से शादी क्यों नहीं की? वह अभी छोटी थी और बहुत महत्त्वाकांक्षी. उस ने अपने लिए जो लक्ष्य तय किए थे उस में विवाह का स्थान था ही नहीं. विवाह को वह बंधन मानती थी. वे दोनों स्वतंत्र थे और स्वच्छंद भी.

यामिनी दीदी ने अपना घर बसाया, खिड़कियों पर झालरदार सफेद लेस के पर्दे टांगे, परंतु जब वह ‘खूबसूरत पत्थर’ उन के घर की खिड़कियों के सारे शीशे तोड़ गया, तब 6 महीने की अपनी प्यारी सी गुडि़या आन्या को गोद में लिए, अपने हाथों बसाए घर का दरवाजा खोल कर, मायके लौट आई थीं. टूटे हुए दिल व उजड़ी हुई गृहस्थी के दुख से यामिनी दीदी थरथर कांप रही थीं. मम्मी, पापा और पूरे घर ने उसे आत्मीयता का गरम लिहाफ ओढ़ा कर संभाल लिया था. दीदी की सारी मस्ती स्वाह हो गई. वे कभी ठीक से पढ़ी नहीं, जैसेतैसे उन्हें पापा ने एकआध कोर्स करवा कर स्कूल में नौकरी दिलवा दी थी. पुनर्विवाह तो क्या, उस घर में विवाह शब्द एक अछूत रोग की तरह माना जाने लगा. यहां तक कि अनुभा के लिए विवाह प्रसंग कभी छिड़ा ही नहीं. वह तो अच्छा हुआ कि सुमित की शादी यामिनी की शादी के महीने भर बाद ही हो गई थी वरना…

आज वही खूबसूरत नुकीला पत्थर उस के सामने कुरसी पर बैठा था. अनुभा सोच में पड़ी थी. क्या वह पोल खोल दे?

न मालूम कितनी और गृहस्थियां उजाड़ देगी यह! किंतु ऐसा क्यों होता है कि हमेशा ‘पति, पत्नी और वो’ में सब से अधिक दोष ‘वो’ को देते हैं? क्या स्त्री प्यार, प्रशंसा व प्रलोभनों से परे है? क्यों पुरुष के हाथ उस के अपने वश में नहीं रहते? इसी उधेड़बुन में डूबतीउतराती, वह नवीन खन्ना से आज की मीटिंग के बारे में बताने दाखिल हुई.

केवल 40 वर्ष की उम्र में नवीन जिस मुकाम पर पहुंचा था, वह मुकाम पुराने जमाने में 60 साल तक भी हासिल नहीं होता था. कंपनी का सीईओ मोटी तनख्वाह, उस से भी मोटे बोनस, उस से भी अधिक धाक. देशविदेश की डिगरियां हासिल कर के उस ने अपने लिए कौर्पोरेट जगत में एक विशिष्ट स्थान बना लिया था. बड़ीबड़ी कंपनियां व बैंक उसे पके आम की तरह लपकने को तैयार रहते थे.

अनुभा स्वयं भी अत्यंत मेधावी थी. आईआईएम में सब से पहला व बड़ा पैकेज उसी को मिला था. 2 साल जापान रही, फिर लंदन. नवीन खन्ना से उस की मुलाकात लंदन में हुई थी. जिस कंपनी में अनुभा काम कर रही थी उस का विलय दूसरी कंपनी में होने वाला था, नवीन खन्ना ने उस की योग्यता को भांप लिया था और उसे सीधे 4 सोपान आगे की पोस्ट व तनख्वाह दे डाली थी.

अनुभा भी भारत वापस आना चाहती थी. सो आ गई. बस तब से वह मुंबई में काम कर रही थी. उस पर नवीन की योग्यताओं की प्रमाणपट्टी का कोई प्रभाव नहीं पड़ता था. जो व्यक्ति अनेक डिगरियां हासिल कर ले, जो करोड़ों रुपयों का ढेर लगाता हो, परंतु जिस का कोई नैतिक चरित्र न हो, जो धड़ल्ले से बातबात पर झूठ बोलता हो, जो अपनी पत्नी का फोन देख कर काट देता हो, जो मीटिंग व क्लायंट का भूत अपनी घरगृहस्थी पर लादे रहता हो, जो पति, पिता व पुरुष की मर्यादा न पहचानता हो, उसे अनुभा न तो आदर दे सकती थी न अपनी मित्रता. अनुभा के पिता अकसर अंगरेजी की एक कहावत कहा करते थे, जिस का सारांश था, ‘मैं कालेज तो गया, परंतु शिक्षित नहीं हुआ.’

बस यों समझ लीजिए कि नवीन खन्ना उस कहावत का साक्षात प्रमाण था.

एक बार एक बेहद खूबसूरत किंतु 55 वर्षीय महिला क्लायंट ने अनुभा से कहा था, ‘तेरा बौस तो मुझ जैसी बुढि़या पर भी लाइन मार रहा था.’

अनुभा कर भी क्या सकती थी. चारों तरफ यही सब तो बिखरा पड़ा था. आज के जमाने में दो ही तो पूजे जा रहे हैं, लाभ और पैसा.

कभी वह सोचती थी, क्या इन पुरुषों की पत्नियों को इन के चक्करों का पता नहीं चलता? क्या औफिस में काम कर रही विवाहित स्त्रियों के पतियों को पता नहीं चलता या फिर पता होते हुए भी वे खुली आंखों सोते रहते हैं या फिर पैसे की हायहाय ने प्यार व वफा का कोई मतलब नहीं रहने दिया है?

जो भी हो जीजीशा की नियुक्ति के बाद जीजीशा और नवीन को अकसर  औफिस के बाद इकट्ठे बाहर निकलते देखा जाता था. जीजीशा अभी तक स्वतंत्र थी और उसी तरह स्वच्छंद भी. पता नहीं आलोक को और आलोक की तरह कितनों को कब और कहां छोड़ आई थी?

अनुभा का रिश्ता शुद्ध कामकाज से था. रात को सोते समय कभीकभी पापा की सुनाई हुई लाइनें ‘किसकिस को याद कीजिए, किसकिस को रोइए, आराम बड़ी चीज है, मुंह ढक के सोइए’ मजे के लिए दोहराती थी.

परंतु वह आराम की नींद कब सो पाई थी. अभी जीजीशा को आए 4-5 महीने ही हुए थे कि वह अचानक एक हफ्ते तक औफिस नहीं आई और जब आई तो बेहद दुबली लग रही थी. मेकअप के भीतर भी उस के गालों का पीलापन छिप नहीं पा रहा था. एक भयावह डर उस की आंखों में तैर रहा था. पता चला कि जीजीशा बीमार है, बहुत बीमार.

‘क्या हुआ है उसे?’ सब की जबान पर यही प्रश्न था.

15 दिन औफिस आने के बाद वह फिर गैरहाजिर हो गई थी. वह अस्पताल में भरती थी. उस के रोग का निदान नहीं हो पा रहा था. अनुभा फूलों का गुलदस्ता ले कर उस से मिलने गई थी और ‘शीघ्र स्वस्थ हो जाओ’ भी कह आई थी.

फिर एक दिन औफिस में उस खबर का बर्फीला तूफान आया. जीजीशा के रोग की पहचान की खबर. जिस रोग के लक्षण उसे क्षीण कर रहे थे उस ने उस के अंतरंग मित्रों के होश उड़ा दिए थे. नवीन खन्ना का औफिस व घर मानो 8 फुट मोटी बर्फ से ढक गया था. सब के दिमाग में अफरातफरी मची थी. जिस बीमारी का नाम लेने की हिम्मत न होती हो, उस एचआईवी के लक्षण जीजीशा की रक्त धमनियों में बह रहे थे. कितने ही लोग अपनेअपने रक्त का निरीक्षण करा रहे थे. अनुभा भयभीत हो उठी. आज पहली बार अनुभा इतनी बेचैन हुई. वह उस कड़ी को देख कर कातर हो रही थी जो यामिनी दीदी, आन्या और आलोक को जोड़ रही थी. आलोक और जीजीशा के रिश्ते की कड़ी. घबरा कर उस ने पहली फ्लाइट पकड़ी और मुंबई से अपने घर इलाहाबाद आ गई.

‘अनुभा मैडम को क्या हुआ?’ उस के औफिस में एक प्रश्नवाचक मूक जिज्ञासा तैर गई. इलाहाबाद पहुंच कर बगैर किसी से कुछ कहेसुने, उस ने यामिनी दीदी और आन्या के तमाम टैस्ट करवाए और जब दोनों के निरीक्षण से डाक्टर संतुष्ट हो गए, तब जा कर वह इत्मीनान से पैर पसार कर लेट गई. मां ने उस का सिर अपनी गोद में ले लिया और स्नेहपूर्वक उस के माथे का पसीना पोंछने लगीं, ‘‘एसी चल रहा है और तू है कि पसीने में तरबतर, जैसे किसी रेस में दौड़ कर आई हो.’’

‘‘रेस में ही नहीं मम्मा, मैं तो महारेस में दौड़ कर आई हूं. ट्राईथालौन समझती हो, बस उसी में दौड़ कर लौटी हूं.’’

हक्कीबक्की मां उस का मुंह ताकती रह गईं. मन ही मन अनुभा मां से जाने क्याक्या कहे जा रही थी. एक ही जीवन में कई तरह की दौड़ हो गई. सब से पहले मालरोड पर साइकिल चलाई, फिर पढ़ाई कैरियर और यामिनी दीदी की बिखरी हुई जिंदगी के दलदल में फंसी और दौड़ का अंतिम चरण? वह तो मुंबई से इलाहाबाद, इलाहाबाद से अस्पताल, अस्पताल के गलियारों की दौड़. उफ, यह अंतिम दौर उस का कठिनतम दौर था. उसे लगा जैसे दीदी और आन्या किसी सुनामी से बच कर किनारे पर सुरक्षित पड़ी हों.

निश्ंिचतता और मां की गोद उसे धीरेधीरे नींद की दुनिया में ले जाने लगी, वह सपनों के हिंडोले में झूलने लगी. अचानक उसे लगा कि अगर आलोक उसे मिल गए होते तो…तो…हिंडोला टूट गया. यह क्या? फिर भी वह हंस रही है. खुशी की हंसी, राहत की हंसी. अच्छा हुआ, आलोक की वह नहीं हुई. Hindi Kahani

Hindi Story: सफर – जिस्म का मजा और रंगीन नोटों की सजा

Hindi Story: रात के ठीक 10 बजे ‘झेलम ऐक्सप्रैस’ ट्रेन ने जम्मूतवी से रेंगना शुरू किया, तो पलभर में रफ्तार पकड़ ली. कंपार्टमैंट में सभी मुसाफिर अपना सामान रख आराम कर रहे थे. गीता ने भी लोअर बर्थ पर अपनी कमर टिकाई. कमर टिकाते ही उस ने देखा कि सामने वाली बर्थ पर जो साहब अभी तक बैठे थे, मुंह खुला रख कर खर्राटों भरी गहरी नींद सो चुके थे. गीता की नजर उन साहब के ऊपर वाली बर्थ पर गई तो देखा कि एक नौजवान अपनी छाती पर मोबाइल फोन रख कानों में ईयरफोन लगाए उस में बज रहे गानों के संग जुगलबंदी में मस्त था.

गीता को नींद नहीं आ रही थी. उस के ऊपर वाली बर्थ पर कोई हलचल नहीं थी. उस पर सामान रखा हुआ था और सामान वाला उसी कंपार्टमैंट के आखिरी छोर पर अपने दोस्त के साथ कारोबार की बातें कर रहा था.

रात गुजर गई. गीता लेटी रही, मगर सो नहीं पाई थी. सुबह के 5 बज चुके थे. अपनी ही दुनिया में मस्त वह नौजवान उठा और वाशरूम की तरफ चल दिया.

जब वह लौटा, तो उस का चेहरा एकदम तरोताजा दिख रहा था. तब तक गाड़ी अंबाला कैंट रेलवे स्टेशन पर रुक चुकी थी. वह नौजवान छोलेकुलचे ले कर आया और फिर उस ने देखते ही देखते नाश्ता कर लिया.

सामने वाली बर्थ पर लेटे साहब हरकत में आने शुरू हुए. उन्होंने गीता से पूछा, ‘‘मैडम, यह गाड़ी कौन से स्टेशन पर रुकी हुई है?’’

गीता ने उन के सवाल का जवाब देते हुए कहा, ‘‘जी, अंबाला स्टेशन पर.’’

तभी ट्रेन ने रेंगना शुरू कर दिया. उन साहब ने सवाल किया, ‘‘क्या कोई चाय वाला नहीं आया अब तक?’’

गीता बोली, ‘‘जी, बहुत आए थे, मगर आप सो रहे थे.’’

वे साहब चाय की तलब लिए फिर से अपनी बर्थ पर आलू की तरह लुढ़क गए. थोड़ी देर बाद उन का मुंह खुला और वे फिर से खर्राटे लेने लगे.

गीता ने सामने ऊपर वाली बर्थ पर उस नौजवान पर निगाह डाली तो देखा कि वह कोई उपन्यास पढ़ रहा था.

न जाने क्यों गीता की निगाहों को वह अच्छा लगने लगा था. उस का डीलडौल, कदकाठी, हेयरकट और उस के दैनिक रूटीन से उस ने अंदाजा लगा लिया था कि यह तो पक्का फौजी है.

इस के बाद गीता वाशरूम चली गई. थोड़ी देर बाद वह होंठों को और गुलाबी कर, आंखों को कजरारी कर, चेहरे को चमका कर व जुल्फों को संवार कर जब वापस अपनी बर्थ की ओर लौटने लगी, तो उस की नजरें दूर से ही उस नौजवान पर जा टिकीं. वह उपन्यास के पात्रों में खोया हुआ था.

गीता ने ठोकर लगने की सी ऐक्टिंग कर उस का ध्यान अपनी ओर खींचने की कोशिश की, मगर सब बेकार.

गीता खिसियाई सी खिड़की के पास आ कर बैठ गई और बाहर झांकने लगी.

तकरीबन 8 बजे गाड़ी पानीपत स्टेशन पर रुकी, तो गीता ने अपनी नजरें नौजवान पर टिका कर सामने वाले साहब को पुकारते हुए कहा, ‘‘जी उठिए, स्टेशन पर गाड़ी रुकी है… चायनाश्ता सब है यहां.’’

‘‘ओके थैंक्यू, चाय पीने का बड़ा मन है मेरा,’’ उन साहब ने कहा.

‘‘जी, इसीलिए तो उठाया है. मैं जानती हूं कि आप चाय की तलब के साथ ही सो गए थे,’’ गीता बोली.

चाय वाला जैसे ही खिड़की पर आया, तो उन साहब ने झट से चाय का कप लिया और अपनी जेब से पैसे निकाल कर चाय वाले को थमा दिए. इस के तुरंत बाद आलूपूरी वाले ने खिड़की पर दस्तक दी, तो पलभर में उन साहब ने आलूपूरी अपने हाथों में थाम ली.

गीता की नजर दोबारा ऊपर वाली बर्थ पर गई, तो उस ने देखा कि वह नौजवान अभी भी उपन्यास पढ़ने में डूबा हुआ था.

चायनाश्ते से निबट कर जब उन साहब को फुरसत मिली, तो उन्होंने गीता को ‘थैंक्यू’ कहा. तभी ऊपर बैठे उस नौजवान ने नीचे झांका तो देखा कि साहब नाश्ता कर चुके थे.

उस नौजवान ने बड़ी नम्रता से कहा, ‘‘सर, अगर आप बैठ रहे हैं, तो मैं अपनी बर्थ नीचे कर लूं क्या?’’

‘‘हांहां क्यों नहीं.’’

थोड़ी देर बाद वह नौजवान उन साहब की बगल में, तो गीता के ठीक सामने बैठ चुका था.

गीता अपनी बर्थ पर बैठीबैठी खिड़की से बाहर झांकतेझांकते अपनी नजरें उस नौजवान की नजरों से मिलाने की कोशिश करने लगी.

लेकिन वह नौजवान तो उसे देख ही नहीं रहा था. वह सोचने लगी, ‘ऐसा कभी हुआ ही नहीं कि मुझे कोई देखे भी न. अगर कोई मेरी बगल से भी गुजरता है, तो वह पलट कर मुझे जरूर देखता है.’

उस नौजवान पर टकटकी लगाए गीता सोच रही थी कि तभी उस ने पानी की बोतल गीता की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘मैडम, पानी पी लीजिए.’’

यह सुन कर गीता के गंभीर चेहरे पर एक मुसकान उभरी. उस की ओर देखतेदेखते गीता पानी की बोतल अपने हाथ में थाम बैठी और दोचार घूंट गटागट पी भी गई.

पानी की बोतल उसे वापस देते हुए गीता ने अपने कयास को पुख्ता करने के लिए पूछ लिया, ‘‘आप फौजी हैं न?’’

‘‘जी…’’

गीता ने उस से दोबारा कहा, ‘‘बुरा मत मानना प्लीज… मैं ने किसी से सुना था कि फौजी दिमाग से पैदल होते हैं… जहां लड़की देखी नहीं कि कभी उन के सिर में तो कभी बदन में खुजली होने लगती है और फिर वे पागलों की तरह लड़कियों को देखने लगते हैं. पर आप ने यह साबित कर दिया कि सभी फौजी एकजैसे नहीं होते.’’

‘‘हां, पर फौजियों को ठीक रहने कौन देता है… जहां फौजी ऐसी हरकत नहीं करते, वहां लड़कियां उन के साथ ऐसा ही करने लगती हैं. आखिर कोई कहां तक बचे?’’ उस नौजवान की यह बात सीधा गीता के दिल को जा कर लगी.

बातचीत का सिलसिला चला, तो उस नौजवान ने पूछ लिया, ‘‘क्या नाम है आप का?’’

‘‘गीता.’’

‘‘क्या करती हैं आप?’’

‘‘जी, मैं बैंक में हूं.’’

‘‘बहुत अच्छा,’’ वह फौजी बोला.

गीता ने पूछा, ‘‘और आप का नाम?’’

‘‘मेरा नाम प्रिंस है.’’

‘‘प्रिंस… वह भी सेना में… पर कौन रहने देता होगा आप को वहां प्रिंस की तरह…’’

इस बात पर वे दोनों हंस दिए थे, हंसीठहाकों के बीच उन्हें पता ही नहीं चला कि टे्रन कब नई दिल्ली स्टेशन पर आ कर रुक गई.

सवारियों ने उतरना शुरू किया, तो साथ ही साथ नई सवारियों का चढ़ना भी जारी था.

तभी एक बंगाली जोड़ा अपना बर्थ नंबर ढूंढ़तेढूंढ़ते वहां आ पहुंचा. अधेड़ उम्र के उस बंगाली जोड़े ने अपना सामान सीट के नीचे रखा और वे दोनों गीता व प्रिंस के साथ ही आ बैठे.

दिनभर की प्यारभरी बातों के सिलसिले के साथ ही एक के बाद एक स्टेशन भी पीछे छूटते रहे और पता ही नहीं चला कि कब शाम हो गई. पैंट्री वाले आए, खाने का और्डर बुक किया. कुछ देर बाद रात का भोजन सब के सामने था.

खाना खाने के बाद प्रिंस ने टूथब्रश किया, तो गीता ने भी उस की देखादेखी यह काम कर डाला. सभी सुस्ताने के मूड में आए, तो सब ने अपनीअपनी बर्थ संभालनी शुरू कर दी.

बंगाली जोड़ा कुछ परेशान सा इधरउधर ताकनेझांकने लगा.

प्रिंस ने उन्हें टोकते हुए पूछ ही लिया, ‘‘क्या बात है जी?’’

बंगाली आदमी ने अपना दर्द बयां किया, ‘‘क्या बताएं बेटा. एक तो हम शरीर से भारी, उस पर उम्र के उस पड़ाव पर हैं कि जहां हमारे लिए ऊपर वाली बर्थ पर चढ़नाउतरना किसी किले को फतेह करने से कम नहीं है. कहीं इस चढ़नेउतरने में फिसल कर गिर गए, तो 2-4 हड्डियां तो टूट ही जाएंगी.’’

इतने में बंगाली औरत की याचक निगाहें गीता के छरहरे बदन पर जा पड़ीं. उन्होंने विनती करते हुए कहा, ‘‘बेटी, क्या आप हमारी मदद कर सकती हैं?’’

गीता हैरानी से उन की ओर देखते हुए बोली, ‘‘कैसे आंटी?’’

‘‘आप बर्थ ऐक्सचेंज कर लीजिए प्लीज. आप जवान लोग हो, ऊपर की बर्थ पर चढ़उतर सकते हो.’’

‘‘ठीक है आंटी. मैं ऊपर वाली बर्थ पर चली जाती हूं, आप मेरी बर्थ पर सो जाइए,’’ गीता ने कहा.

गीता पायदान में पैर अटका कर प्रिंस के सामने ऊपर वाली बर्थ पर चढ़ गई, तो बंगाली जोड़ा भी नीचे वाली बर्थ पर लेट गया.

प्रिंस, जो पहले से ही अपनी बर्थ पर मौजूद था, अब तक उपन्यास के पन्नों में डूब चुका था.

गीता ने ऊंघते हुए उस की तरफ देखा और एक बदनतोड़ अंगड़ाई लेते हुए अपनी छाती को उभारा, तो फौजी की नजरें उपन्यास से हट कर उस के बदन पर आ ठहरीं. उपन्यास हाथ से छूट कर नीचे गिर गया.

गीता के चेहरे पर मादकता में लिपटी जीत की मुसकान तैर गई. उस ने नीचे गिरे हुए उपन्यास को देखा तो उस के उभार झांकने लगे. फौजी की निगाहें तो मानो वहीं पर अटक कर रह गईं.

फौजी ने गीता की ओर देख कर कहा, ‘‘बुरा मत मानना, आप की हंसी तो बेहद खूबसूरत है.’’

गीता ने भी जवाब में कहा, ‘‘आप का चालचलन बहुत अच्छा है… मैं कल से देख रही हूं.’’

यह बात सुन कर प्रिंस हंस पड़ा और बोला, ‘‘आर्मी वालों का चालचलन बिगड़ने कौन देता है मैडम? कैद में रहते हैं. कोई हमें खुला छोड़ कर तो देखे.’’

गीता मुसकराते हुए कहने लगी, ‘‘अब चालचलन कुछ ठीक नहीं लग रहा है आप का.’’

‘‘कहां से ठीक रहता… आप जो कल रात से मुझ पर डोरे डालती आ रही हैं. हम कंट्रोल करना जानते हैं, तो इस का मतलब यह तो नहीं हुआ कि किसी हुस्नपरी को देख कर हमारा दिल ही नहीं धड़कता. हम बात मौका देख कर करते हैं मैडम.’’

गीता ने उस की बातों में दिलचस्पी लेते हुए पूछा, ‘‘गाने के शौकीन हो बाबू, फौज में क्यों चले गए?’’

प्रिंस गंभीर हो गया, फिर कुछ सोचते हुए बोला, ‘‘एक लड़की के चक्कर में फौजी बन गया. उसे आर्मी वाले पसंद थे.’’

‘‘ओह… अब तो वह लड़की आप की पत्नी होगी?’’

‘‘न… जब मैं ट्रेनिंग कर के गांव लौटा, तब तक उस ने किसी कारोबारी से शादी कर ली थी. मगर मैं फौजी हो कर रह गया.’’

‘‘बहुत दुख हुआ होगा उस के ऐसा करने पर?’’

‘‘हां, पर क्या करता? जिंदगी है ही चलने का नाम. कभी दोस्तों ने मुझ को, तो कभी मैं ने खुद को समझा लिया कि जो होता है, अच्छे के लिए ही होता है.’’

फिर गीता की ओर आंख मार कर प्रिंस ने हलके से मुसकराते हुए कहा, ‘‘बस, अब मैं कुछ अच्छा होने का इंतजार कर रहा हूं.’’

‘‘क्या बात है साहब… मुझे आप की यही अदा तो बड़ी पसंद है.’’

‘‘मुझ से दोस्ती करोगी?’’

‘‘वह तो हो ही गई है अब… इस में कहने की क्या बात है?’’

फिर उन दोनों ने एकदूसरे से हाथ मिलाया, तो गीता ने प्रिंस की हथेली में अपनी उंगलियों से सरसराहट सी पैदा कर दी. उस सरसराहट ने प्रिंस के तनमन में खलबली मचा दी थी. दोनों एकदूजे की आंखों में डूबने लगे.

रात अपने शबाब पर चढ़नी शुरू हो गई थी. वे दोनों कब एक ही बर्थ पर आ गए, किसी को भनक तक न हुई.

गीता के बदन से आ रही गुलाब के इत्र की भीनीभीनी खुशबू में प्रिंस बहकता चला गया.

गीता ने थोड़ी ढील दी, तो प्रिंस के हाथ उस के बदन से खेलने लगे. गीता ने कुछ नहीं कहा, तो प्रिंस ने उसे अपनी बांहों में जकड़ लिया.

थोड़ी ही देर में वे दो बदन एक जान हो गए. चलती टे्रन में उन के प्यार का सफर अब अपनी हद पर था. फिर इसी सफर में वे दोनों हांफतेहांफते नींद के आगोश में समा गए.

सुबह के तकरीबन 3 बजे गाड़ी ने अपनी रफ्तार कम की, तो गीता की नींद खुल गई. उस ने अपनेआप को प्रिंस की बांहों से आजाद कर कपड़े पहने. उस का खंडवा स्टेशन आने वाला था.

गीता ने एक कागज पर प्रिंस के लिए कुछ लिखा और उस के सिरहाने रख दिया. फिर कुछ सोचा और जल्दबाजी में एक और पुरजे पर कुछ लिखा और पर्स निकाल कर उस पुरजे को पर्स में रखा और पैंट की जेब के हवाले किया.

फिर गीता ने अपना सामान समेटा और बिना आहट किए ही प्लेटफार्म पर उतर गई.

रात के प्यार में थके प्रिंस की नींद सुबह के 5 बजे खुली, तो उस ने अपनी बगल में गीता को टटोला. वह वहां नहीं थी और न ही उस का सामान.

प्रिंस हैरानपरेशान सा इधरउधर ताकने लगा. गीता का कहीं नामोनिशान न मिलने पर उस ने खुद को ठीकठाक करने के लिए सिरहाने रखी अपनी शर्ट उठाई, तो उसे उस के नीचे एक चिट्ठी मिली. लिखा था:

‘डियर,

‘आप बहुत अच्छे फौजी हैं. देर से बहकते हो जरा… पर बहकते जरूर हो. सफर रोमांचक गुजरा. आप की बात ही कुछ और थी… फिर कभी दोबारा आप से इसी तरह मुलाकात हो.

‘लव यू डियर, गुड बाय.’

चिट्ठी पढ़ कर प्रिंस हैरान हुआ. उस भोलीभाली दिखने वाली मासूम बला के बारे में सोचतेसोचते उस के माथे पर सिलवटें पड़ने लगीं, तभी चाय वाला वहां आया.

‘‘अरे भैया, एक कप चाय दे दो,’’ कहते हुए प्रिंस ने अपना पर्स निकाला, तो उस में से एक और पुरजा निकला, जिस पर लिखा हुआ था:

‘आप का पर्स रंगीन नोटों की गरमी से लबालब था. दिल आ गया… सो, निशानी के तौर पर सभी रंगीनियां साथ लिए जा रही हूं… उम्मीद है कि आप बुरा नहीं मानेंगे.’

प्रिंस के मुंह से बस इतना ही निकला, ‘‘चाय के लिए चिल्लर तो छोड़ जाती…पर फौजी पर तरस खाता कौन है…’’ Hindi Story

Prostitution: एक लड़की फिजिकल होने के लिए मुझसे पैसे मांग रही है

Prostitution: अगर आप भी अपनी समस्या भेजना चाहते हैं, तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें.

सवाल –

मेरी उम्र 22 साल है और मैं उत्तर प्रदेश के आगरा का रहने वाला हूं. हाल ही में मैं ने एक प्राइवेट कंपनी में जौब करना शुरू किया है. मेरे औफिस में एक लड़की है जो बेहद खूबसूरत है. सभी लड़के उस के आगेपीछे घूमते रहते हैं. मैं पहली ही नजर में उस लड़की को अपना दिल दे बैठा था और मन ही मन उस के साथ शादी के सपने सजाने लगा था. एक दिन हिम्मत कर मैं ने उस लड़की को प्रोपोज किया तो उस ने हां भी कर दी. मैं बेहद खुश था. फिर एक दिन हम घूमने का प्लान बनाने लगे और जब मैं ने उसे बोला कि चलो अकेले में किसी होटल में मिलते हैं तो उस के बाद उस ने जो कहा वह सुन कर मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई. जिस लड़की से मैं बेहद प्यार करने लगा था और शादी के सपने सजाने लगा था, उस लड़की ने मुझ से फिजिकल होने के पैसे मांगे. मैं काफी हैरान था और इस सोच में पड़ गया कि आखिर यह लड़की न जाने कितने लड़कों के साथ सिर्फ पैसों के लिए फिजिकल हो चुकी होगी. मैं उस लड़की को खोना भी नहीं चाहता, लेकिन समझ भी नहीं आ रहा है कि क्या करूं?

जवाब –

जहां आज के मौडर्न वर्ल्ड में लड़कियां चंद पैसों के लिए अपनी इज्जत तक बेचने लगी हैं, वहीं पहले के जमाने में औरतों को मरना मंजूर था, लेकिन उन की इज्जत पर कोई गैर मर्द हाथ डाले, यह मंजूर नहीं था. मैं आप की फीलिंग्स अच्छे से समझ सकता हूं. आप ने लड़की को दिल से प्यार किया, लेकिन वह लड़की ऐसी निकलेगी, आप को क्या पता था.

अगर आप सच में उस लड़की को खोना नहीं चाहते हैं और उस से बेहद मुहब्बत करते हैं, तो उस से एक दिन प्यार से बात कर के देखिए कि वह ऐसा सब क्यों कर रही है. हो सकता है कि उस लड़की को पैसों की जरूरत हो या हो सकता है कि वह या उस का परिवार किसी मुसीबत से गुजर रहा हो, जिस के चलते वह यह सब कर रही है.

आप पूरी जांच पड़ताल कीजिए और साथ ही उसे विश्वास दिलाइए कि अगर वह किसी मुसीबत में है तो आप उसे उस मुसीबत से बाहर निकालेंगे, लेकिन उस के लिए उसे ये सब काम छोड़ने पड़ेंगे. हो सकता है कि इस से पहले उस लड़की को जो भी मिला हो, बस फिजिकल होने के लिए ही मिला हो. अगर आप सच में उस से प्यार करते हैं, तो आप का प्यार उस लड़की को जरूर सही रास्ते पर ले आएगा.

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News Story: ‘विश्वगुरु’ का विदेश कूटनीति में फेल होना

News Story: इ बार दिल्ली में मौसम नेताओं की तरह पलटूराम बना हुआ है, कभी सर्द तो कभी गरम. बेचारे कूलर बेचने वाले दुकान पर मक्खियां मारते दिख रहे हैं और सिर खुजा रहे हैं कि कूलर का बाजार तेज रहेगा या मंदा. पर आम आदमी थोड़ी राहत की सांस ले रहा है. विजय भी ऐसे ही लोगों की लिस्ट में शामिल है और चूंकि आज रविवार है तो उस ने अनामिका के साथ कहीं घूमने का प्लान बनाया है. पर अनामिका अब तक क्यों नहीं आई? इतने में बाहर कोई हलचल हुई. विजय ने देखा कि कोई काले रंग की उबर गाड़ी से आया था. एक जवान लड़की. पर जैसे ही वह गाड़ी से नीचे उतरी, तो आसपास जमा लोगों की भीड़ की नजरें उस पर ही जम गईं.

उस लड़की ने बिहार के मछुआरों की पारंपरिक चोली और घाघरा जैसी ड्रैस पहनी हुई थी. उस ड्रैस से उस के उभार और ज्यादा उभर आए थे. सिंगार भी किसी मछुआरिन सा था. नंगे पैर जब वह मटकमटक कर चल रही थी, तब कुछ मनचले सीटियां बजाने लगे. चूंकि अभी वह लड़की विजय को साफसाफ नहीं दिख रही थी, तो उसे महसूस ही नहीं हुआ कि यह बिंदास मछुआरिन किस के घर जाएगी. थोड़ा आगे आने पर जब विजय ने उस लड़की को देखा, तो अपना सिर पीट लिया, क्योंकि वह और कोई नहीं, अनामिका थी. विजय हैरान रह गया कि आज अनामिका को इस तरह उस के घर आने की क्या जरूरत थी. थोड़ी देर में डोरबैल बजी और बाहर से आवाज आई, ‘‘ बाबू, हम बाड़, हमरा के जान…’’

विजय ने जल्दी से दरवाजा खोला और अनामिका को ऊपर से नीचे घूरा. टाइट ब्लाउज, बदन से चिपकी धोती और हाथ में एक बैग, अनामिका एकदम अतरंगी लग रही थी.
‘‘जल्दी से अंदर आओ. और यह सब क्या नौटंकी है?’’
‘‘हम बाड़हमरा के खाना चाही,’’ अनामिका ने इतना कहा और खिलखिला कर हंस दी.
‘‘अनामिका, ज्यादा मजाक नहीं.
तुम उतरी तो काली गाड़ी से हो और यह सब प्रपंच क्यों? गाड़ी से आने की क्या जरूरत थी? और तुम आज बिहारी क्यों बोल रही हो? यह मेरे सिर के ऊपर से जा रही है,’’ विजय झल्लाया.
‘‘क्या एक मछुआरे की बेटी अपनी पारंपरिक वेशभूषा नहीं पहन सकती?’’ अनामिका ने सवाल किया.
‘‘पर मौका भी तो होना चाहिए . कोई फैंसी ड्रैस कंपीटिशन तो चल नहीं रहा. तुम तो टीशर्ट और जींस ज्यादा पहनती हो. तुम ने देखा नहीं, लोग तुम्हारी खिल्ली उड़ा रहे थे,’’ विजय
ने कहा.

‘‘मैं विश्वगुरु बनने निकली हूं. मुझे अपनी पारंपरिक वेशभूषा और बिहारी भाषा पर गर्व है.’’
‘‘यहां भाषा कहां से बीच में गई?’’ विजय बोला.
‘‘अपनी महल्ले वाली लड़ाई भूल गया. उन सरदारजी के हक में तू ने खूब बोला, पर उन की ठेठ पंजाबी तू खुद नहीं समझ पाया था. बड़ा चला था तू उन अंकलों का झगड़ा सुलटाने, खुद ही बुराई मोल ले कर बैठ गया. तू भी मोदीजी की तरह कूटनीति में फेल हो गया.’’
‘‘अब यहां पर कूटनीति और मोदीजी कैसे बीच में गए?’’

‘‘जैसे तू उन अंकलों का झगड़ा निबटाने में नाकाम रहा, उसी तरह मोदीजी दावे तो बहुत कर रहे थे, पर ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच की जंग की कूटनीति पर वे फेल हो गए. इस में भाषा का बड़ा रोल होता है. शब्दों का सही खेल ही कूटनीति की कामयाबी की पहली सीढ़ी है. विदेश के मसलों पर आप की भाषाई जानकारी बेवकूफी भी जाहिर कर सकती है.’’
‘‘क्या तुम मुझे आसान शब्दों में समझा सकती हो? मुझ में और मोदीजी की कूटनीति में क्या समानता है?’’
‘‘तुम समझ नहीं रहे हो. किसी राज्य का मुख्यमंत्री होने और देश का प्रधानमंत्री होने में बहुत ज्यादा फर्क है. आप को दुनियाभर में आनाजाना पड़ सकता है. यह ठीक है कि आप की अपनी भाषा पर अच्छी पकड़ है, पर उस का असर विदेशी कूटनीति पर पड़ भी रहा है या नहीं, यह भी बहुत ज्यादा अहम बात है.
‘‘विदेश कूटनीति में भाषा का रोल बहुत खास होता है. वहां वह भाषणबाजी के टूल की तरह इस्तेमाल नहीं होती है, बल्कि एक देश की संस्कृति, इतिहास, और मूल्यों को भी सब के सामने रखती है,’’ अनामिका बोली.

‘‘जैसे?’’ विजय ने सवाल किया.
‘‘जैसे तुम्हें मेरी बिहारी भाषा के चंद शब्द ही बरदाश्त नहीं हो रहे थे. तुम्हें कोफ्त हो रही थी. तुम मुझे झेल रहे थे.
‘‘पर जब विदेश कूटनीति की बात होती है, तो भाषा विदेश मंत्रियों, राजदूतों और दूसरे कूटनीतिज्ञों के बीच संचार का मुख्य साधन बन जाती है.
‘‘भाषा एक देश की संस्कृति को दूसरे देश में पहुंचाने में मदद करती है, जिस से दोनों देशों के बीच समझ और सहयोग बढ़ता है. यही वजह है कि भाषा व्यापार और वाणिज्य को बढ़ावा देने में मदद करती है, क्योंकि यह व्यावसायिक संचार को आसान बनाती है.
‘‘सब से जरूरी बात तो यह है कि भाषा राजनयिक संबंधों को मजबूत बनाने में मदद करती है, क्योंकि यह दोनों देशों के बीच समझ और विश्वास को बढ़ाती है.

‘‘मैं हिंदी में किसी प्रधानमंत्री के बात करने को गलत नहीं मानती, पर उस हिंदी को अन्य भाषाओं में जब ट्रांसलेट किया जाता है और दूसरे लोगों को सुनाया जाता है, तब उस दुभाषिए ने क्या उसे सही से समझा है या कहने वाले कीमन की बातका मतलब समझा है, इस की जवाबदेही कौन तय करेगा?’’
‘‘क्या तुम किसी उदाहरण से अपनी बात समझा सकती हो?’’ विजय ने सवाल किया.
‘‘बात बहुत पुरानी है. मैं ने बीबीसी में एक लेख पढ़ा था देवीलाल के बारे में. वही देवीलाल जो हरियाणा के दबंग नेता थे और जिन्हें हरियाणा की जनता नेताऊकी उपाधि दी थी.
‘‘बात साल 1989 की है. 1 दिसंबर, 1989 को आम चुनाव के बाद नतीजे आने के बाद संयुक्त मोरचा संसदीय दल की बैठक हुई और उस बैठक में विश्वनाथ सिंह के प्रस्ताव पर चंद्रशेखर के समर्थन से चौधरी देवीलाल को संसदीय दल का नेता मान लिया गया था.


‘‘देवीलाल धन्यवाद देने के लिए खड़े जरूर हुए, लेकिन सहज भाव से उन्होंने कहा, ‘मैं सब से बुजुर्ग हूं, मुझे सबताऊकहते हैं, मुझेताऊबने रहना ही पसंद है और मैं यह पद विश्वनाथ प्रताप को सौंपता हूं.’
‘‘उस समय तरह तरह की बातें चली थीं. देवीलालकिंगबन सकते थे, परकिंगमेकरबन गए. वीपी सिंह और उन के बीच पहले ही कोई समझौता हो चुका था. हालांकि, कुछ राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक तो देवीलाल के खुद का आत्मविश्वास प्रधानमंत्री पद के लायक नहीं था.
‘‘मुझे लगता है कि अगर खुद में आत्मविश्वास की कमी में भाषा पर अच्छी पकड़ होना भी बहुत माने रखती है. मैं 2 लोगों की बातों से अपना पक्ष रखूंगी. नरेंद्र मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्री और नामचीन संपादक पत्रकार रहे एमजे अकबर ने देवीलाल के निधन पर लिखे स्मृति लेख में लिखा था, ‘दरअसल, देवीलाल ने महसूस कर लिया था कि शहरी भारत उन्हें स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है, लिहाजा उन्होंने खुद को सब से बड़े पद की दौड़ से अलग कर लिया था.’


‘‘इसी तरह देवीलाल की राजनीतिक जीवनी लिख चुके और आधुनिक भारतीय इतिहासकार प्रोफैसर केसी यादव बताते हैं, ‘देवीलाल खुद बहुत संपन्न परिवार के थे. वे 1930 से ही राजनीति में सक्रिय हो गए थे, लेकिन उन का अंदाज ठेठ ग्रामीणों वाला ही रहा. वे दिल्ली के पावर कौरिडोर में खेतिहर मजदूरों और गरीबगुरबों की सब से बड़ी उम्मीद थे. देश का अभिजात्य तबका उन को भदेस, दबंग और लठैत नेता की तरह ही देखता रहा.’
‘‘देवीलाल की यहताऊवाली इमेज हरियाणा में तो लोगों को खूब पसंद थी, पर पूरा देश उन्हें उन के भाषाई तेवर से पसंद करता, शायद देवीलाल को भी इस में शक था. खुद उन्होंने या उन के सलाहकारों ने इसे ध्यान में रख कर ही यह फैसला लिया होगा, जो समझदारी भरा फैसला था. इस से देवीलाल कीकिंगमेकरकी इमेज हमेशा के लिए इतिहास में दर्ज हो गई.’’
‘‘तुम्हारी बात में दम है. हम 8,000 करोड़ के हवाईजहाज में तो चल सकते हैं, करोड़ों की काली गाड़ी में सड़कें नाप सकते हैं, पर जब विदेश की कूटनीति पर बात करनी हो, तो भाषा का टूल सब से खास होता है.

‘‘अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप मुंहफट नेता हैं. वे कब क्या बोल दें, कोई नहीं जान सकता. वे दुनिया के एक धड़े में मशहूर हो सकते हैं, पर उन का भाषा का लैवल भी कोई कमाल का
नहीं है. ‘‘इधर नरेंद्र मोदीविश्वगुरुहोने का दावा तो करते हैं, पर विदेश कूटनीति में फेल दिखते हैं. उन के हाल में लिए गए बहुत से फैसले लोगों के मन में शक पैदा करते हैं. पड़ोसी देशों से बिगड़ते संबंध इस का सब से बड़ा उदाहरण है.
‘‘चीन की बात करें तो साल 2020 में गलवान घाटी झड़प के बाद एलएसी पर तनाव लगातार बना रहा. व्यापार घाटा रिकौर्ड लैवल पर पहुंचा और सीमा विवाद का कोई पक्का हल नहीं निकला.
‘‘इतना ही नहीं, पाकिस्तान में तथाकथित सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट के बाद भी आतंकवाद और सीमा पार घुसपैठ जारी रही. कूटनीतिक संवाद पूरी तरह ठप है. भारत नेपाल, मालदीव और बंगलादेश में चीन के बढ़ते असर को रोकने में भारत नाकाम रहा. नेपाल ने नया नक्शा जारी किया, मालदीव मेंइंडिया आउटअभियान चला, बंगलादेश में भी चीन का निवेश बढ़ा.


‘‘इजराइल के खुल कर समर्थन से अरब देशों में भारत की पारंपरिक साख को नुकसान पहुंचा है. कतर में
8 पूर्व नौसैनिकों को मौत की सजा का मामला और फिर ईरान इजराइल तनाव में साफ रुख ले पाना, विदेश नीति की दुविधा दिखाता है,’’ विजय ने अपनी बात रखी.
‘‘अब तुम ने सही रग को पकड़ा है. चुनाव के समय जनता के सामने विदेश नीति की बड़ी बड़ी बातें करने से देश की कूटनीति पर कोई फर्क नहीं पड़ता है, बल्कि हमें समस्या की जड़ में जा कर उस का पक्का हल ढूंढ़ना होता है.
‘‘पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेनाध्यक्ष असीम मुनीर ईरान, इजराइल और अमेरिका के युद्ध में कितना अहम रोल निभाते हैं, यह तो आने वाला समय बताएगा, पर उन की गुपचुप कूटनीति पर आज दुनियाभर में बात हो रही है. जो काम भारत के लोग नरेंद्र मोदी से पूरा होने की उम्मीद देख रहे थे, वे सीन में कहीं भी नहीं दिखाई दे रहे हैं,’’ अनामिका बोली.


‘‘तभी तुम आज अपनी पारंपरिक वेषभूषा और बिहारी भाषा का ज्यादा ही दिखावा कर रही थी. मुझे समझ गया है कि दिखावा करना और अमल में लाना दोनों अलग बातें हैं.
‘‘किसी प्रदेश में दिए गए चुनावी भाषण में आप कुछ भी पारंपरिक पहन कर वहां की भाषा के
2-4 वाक्य बोल कर जनता का दिल एक बार को जीत सकते हैं, पर विदेश कूटनीति में हर कदम सोचसमझ कर उठाना पड़ता है. यहीविश्वगुरुबनने का मूलमंत्र है,’’ जब विजय ने यह बात कही, तो अनामिका ने तालियां बजाईं.
‘‘चलो, आज इसी खुशी में मैं तुम्हें लिट्टीचोखा खिलाती हूं. हरी मिर्च का अचार जरूर खाना, उस का स्वाद ही अलग लैवल का होता है,’’ अनामिका ने इतना कहा और आईने के सामने अपने बाल संवारने लगी. अभी उसे अपनी ड्रैस भी बदलनी थी. टीशर्ट और जींस, जिस में वह कमाल की लगती है.         

Hindi Story: पीता हूं सरकार चलाने को

Hindi Story ‘तू अपना जिगरी यार है. तू रोज पीने का कोई कोई नया बहाना क्यों ढूंढ़ता रहता है?’ मैं जबतब उसे समझाता हूं, ‘ मेरे जिगरी दोस्त, पी, लेकिन बहुत मत पी. लिमिट में पी. जैसेजैसे सरकार सुरा महंगी कर रही है, तू उतनी ही और पी रहा है. सरकार और तुझ में कोई कनैक्शन है क्या? तेरी बीवी और मेरी भाभी से अब तुझ से पहले मुझे जूते पड़ने लगे हैं कि कैसा दोस्त पाल रखा है?

देख दोस्त, तेरी सेहत भी अब अलाऊ नहीं करती. जब तू सुरापान किए सरकार की तरह बारबार गिरता हुआ बड़ी मुश्किल से संभलता है , तो मुझे अपने पर बहुत दया आती है. पर एक तू है कि मानता ही नहीं. जब देखो, अपने बारे में सोचना बंद कर सरकार के बारे में ही सोचता रहता है.
अरे, जब कोई भी सरकार तेरे बारे में नहीं सोचती तो तू उस के बारे में क्यों सोचता है? बेकार का सरकारवादी कहीं का…’

मेरा वह दोस्त मेरे बारबार पीने से रोकने पर मेरा महंगाई से सिकुड़ा सीना पीटता हर बार यही कहता है, ‘देखो दोस्त, मैं उन की तरह सरकार का खासमखास सरकार फरामोश नहीं जो जहां से देखो, जब देखो, चटी सरकार को भी चाटने में लगे रहते हैं. सुरापानी उसी का, सरकार जिस की.
यह जो मैं सीना ठोंक कर पीता हूं , मैं अपने लिए कतई नहीं पीता. जितना पीता हूं सब सरकार के लिए पीता हूं. यह जो मैं पीता हूं , मैं अपने लिए  हरगिज नहीं पीता. टोटली सरकार के फायदे के लिए पीता हूं.
अच्छा बता, मैं पिऊंगा नहीं तो सरकार को रेवैन्यू कहां से जैनेरेट होगा? हर महकमा तो घाटे में है. जहां देखो, खाने वालों की फौज. ऐसे में मैं भी नहीं पिऊंगा तो सरकार का रेवैन्यू हो गया जीरो? अगर रेवैन्यू नहीं आएगा तो वह अपने अमले को कहां से पिलाएगीखिलाएगी? रोतीचीखती जनता की परवाह किए बिना उन को मौज कहां से कराएगी?

यह जो मैं इधरउधर से उधार ले कर ठेके के चक्कर पर चक्कर लगाता हूं , अगर जो मैं ये चक्कर लगाने बंद कर दूं तो बता, वे जनहित के बहाने विदेशों के दौरे कैसे करेंगे?
दोस्त, समुद्र मंथन के वक्त शिव ने सृष्टि बचाने के लिए तो बस एक बार ही गरल पिया था, पर मैं तो सरकार बचाने के लिए दिन में दसदस बार हलाहल पीता हूं. बता, मैं बड़ा कि शिव?
कोई मेरी सही से कीमत लगाए, तो मेरा त्याग शिव से बीस ही होगा दोस्त.
मैं पीने वालों का सीना पीटपीट कर कहता हूं कि सरकार की आमदनी का सब से बड़ा कोई सोर्स है तो वह केवल और केवल मैं हूं. बता दे कोई दूसरा माई का लाल जो मेरे नाली में गिरने पर, कुत्तों से अपना मुंह चटवाते हुए मुझ से ज्यादा सरकार को इनकम देता हो? बाकी सब तो बस खाने वाले हैं.
दोस्त, मैं नहीं पिऊंगा तो वह 4-4 महीने से पैंशनरों की पैंडिंग पैंशन कहां से देगी?
दोस्त, मैं पिऊंगा नहीं तो वह दिन में 10-10 बार एरियर के लिए रो रहे एरियर वालों को बकाया एरियर कहां से देगी?

दोस्त, मैं नहीं पिऊंगा तो वह 4-4 सालों से बीमारों के मैडिकल बिलों का भुगतान कहां से करेगी? अपनी जेब से देने से तो वह रही.
दोस्त, मैं नहीं पिऊंगा तो विनाशसौरीसौरीविकास का रास्ता बंद हो जाएगा.
दोस्त, मैं नहीं पिऊंगा तो सरकार को टीएडीए कहां से मिलेगा? मैं नहीं पिऊंगा तो सरकार की तनख्वाह कहां से आएगी? दोस्त, मैं नहीं पिऊंगा तो 100 ग्राम की फाइल अपने चपरासी से उठवाने वालों का बोझ कहां जाएगा?
दोस्त, मैं नहीं पिऊंगा तो सरकारी गाड़ी में अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल छोड़ सरकारी स्कूल के बच्चों को प्लानिंग पर प्लानिंग करने वालों की गाड़ी का पैट्रोल कहां से आएगा?
दोस्त, मैं नहीं पिऊंगा तो यार बेलियों की मौजमस्ती पर क्या ताला नहीं लग जाएगा? ऐसे में हर पियक्कड़ सरकार भक्त का फर्ज बनता है कि वह अपनी सेहत की परवाह किए बिना सरकार की सेहत के हित में पिए,डट कर पिए, बढ़ते रेट की परवाह किए बिना पिए.

यहां सवाल अपनी सेहत का नहीं, सरकार की सेहत का है. सरकार की सेहत पर मेरी सारी सेहतें कुरबान. बुरे वक्त में जब सरकार के चचेरेममेरे ही उस का साथ नहीं देते, तो ऐसे में मैं सरकार का साथ नहीं दूंगा तो और कौन देगा? डियर, मैं पी कर गिर जाऊं तो गिर जाऊं, पर सरकार को किसी भी सूरत में गिरने नहीं दूंगा. इतनी ताकत तो अभी भी है मेरे पास. यह मेरा वादा है अपने आप से.
बोल, अब समझा, मैं क्यों पीता हूं? मैं पी कर अपने गिरने की परवाह किए बिना सरकार को गिरने से बचाने के लिए पीता हूं,’ उस ने कहा और मेरे सामने ही सरकार हित में एक पैग और खींचा तो मैं ने उस के आगे हाथ जोड़ते हुए कहा, ‘गुरु, सरकार के बारे में सोचना अच्छी बात है, पर सरकार को भी तो चाहिए कि वह तुम्हारे हित का ध्यान रखते हुए शराब और महंगी करे. अपने खर्चे के साथसाथ तो तुम्हारी जेब का भी ध्यान रखे.’

अरे दोस्त, यहां मेरे सिवा दूसरों के बारे में सोचता ही कौन है? यहां सस्ता है ही क्या? दोस्ती तो पहले ही सस्ती नहीं थी, अब तो यहां दुश्मनी तक सस्ती नहीं. कमेटी का हफ्ते में एक दिन आने वाला पानी तक पिछले साल के मुकाबले इस साल 4 गुना महंगा हो गया है. अस्पताल में टैस्ट महंगे हो गए हैं. रैस्टहाउसों के रैस्ट महंगे हो गए हैं. पर जो कल को सरकार की इनकम बंद गई तो पता है, जाने कितने भरे पेटों के खाली दिमागों में चूहे कूदने लग जाएंगे? जनता तो वे हैं नहीं जो भूखे पेट भी भजन करने में मस्त रहें.
देख दोस्त, कुलमिला कर कहूं तो मुझे पीने का शौक नहीं, मैं पीता हूं तो सरकार चलाने कोजीना तो है उसी का जिस ने यह राज जाना, है काम हर वोटर का, कुरसी के काम आना. तू क्या समझता है कि मैं ने पी रखी है?’

पिएं तेरे दुश्मनपर दोस्त, जो वैष्णव से वैष्णव जीव और कुरसी को एक बार कुछ भी पीने की लत लग जाए तो वह किसी तंत्र में भी नहीं छूटती…’ अब मुझे लग गया था कि वह सुराड़ी से कथावाचक होने लगा है, तो मैं ने झट आरती शुरू कर दी, ताकि वह अपनी सुराकथा खत्म करे.
प्रभुधन्य हो ऐसा सरकार हितैषी, जो हर कहीं पिए हुए भी गिरता सरकार खड़ी रखने में जुटा है.
हे सरकार, आप से मेरी विनम्र रिक्वैस्ट हैहो सके तो मेरे जिगरी यार को किसी खास मौके पर सम्मानित जरूर करें. देशभक्तों की खालों वाले सियारों को तो मौके और बेमौके पर आप उन के देश के लिए किए झूठे त्याग को ले कर सम्मानित करते ही रहे हैं. ऐसा करने से सुरापानी कौम में आप के प्रति और इमोशन जगेंगे और वह अपना सबकुछ बेच कर आप का साथ देने के लिए बेचैन हो उठेगी. ऐसा सरकार का हमदर्द आप को अपनों के बीच भी चिराग ले कर शायद ही मिले.       

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