Hindi Story: छोटू

Hindi Story: उका असली नाम तो शायद उस को भी याद नहीं होगा, लेकिन नैशनल हाईवे 48 पर बनेशेर पंजाबढाबे पर वह सिर्फछोटूथा. कद उस का छोटा था, लेकिन फुरती ऐसी कि लोग उसेतूफानीभी कहते थे. ढाबे का मालिक मलखान सिंह, चिल्लाया, ‘‘ओए छोटू, टेबल नंबर 4 पर 2 कड़क चाय और मक्खन मार कर परांठा दे .’’ छोटू एक हाथ में 4 गिलास और दूसरे हाथ में तश्तरी संभाले दौड़ पड़ा. उस के चेहरे पर हमेशा एक टेढ़ी मुसकान रहती, मानो वह दुनिया को बता रहा हो कि भले ही उस की उम्र खेलनेखाने की है, पर उसे गृहस्थी का बोझ उठाने का सलीका पता है.


सुबह के 4 बजे थे. पूरा ढाबा सो रहा था, सिवा छोटू के. वह अपने फटे हुए स्वेटर के छेद से छनती ठंडी हवा को नजरअंदाज करते हुए कोयले की भट्ठी सुलगा रहा था. गीली लकडि़यों और नम कोयले से लड़ते हुए जब धुआं उस की आंखों में भर गया, तो वह मुसकरा कर बोला, ‘‘आज आग भी नखरे कर रही है.’’
उस ढाबे की दीवारों ने बहुतकुछ देखा था, टूटे सपने, अधूरी मंजिलें, थके चेहरे और कभीकभी अनकहे आंसू. लेकिन उन सब के बीच अगर कोई चीज सब से ज्यादा परमानैंट थी, तो वह थी छोटू की मौजूदगी. जैसे ढाबा नहीं, छोटू ही हाईवे पर टिका कोई मील का पत्थर हो.


छोटू की चपलता के चर्चे दूरदूर तक थे. पंजाब से आने वाला संतोख सिंह हो या दक्षिण से आने वाला सुब्रमण्यमहर कोईछोटू की चायका दीवाना था. वह केवल चाय नहीं देता था, बल्कि थके हुए ड्राइवरों को दो पल का ऐसा सुकून देता था, जो उन्हें घर की याद से दूर और मंजिल के करीब ले जाता था.
घर कितने दिन बाद जा रहे हो पाजी?’ ‘अम्मां ठीक हैं?’ ‘इस बार बेटी से बात हो गई अंकल?’ छोटू के
ये सवाल चाय के साथ ऐसे घुलते कि जवाब देतेदेते आंखें भीग जातीं. छोटू के लिए पढ़ाई का मतलब किताबों से कहीं ज्यादाहिसाबकिताबथा. वह स्कूल तो नहीं गया, लेकिन उसे यह बखूबी पता था कि 5,000 में से 2,000 रुपए मां की दवाओं के हैं, 1,500 छोटी बहन राधा की स्कूल ड्रैस और किताबों के और बाकी बचे पैसों में घर का चूल्हा जलना है.


मां की याद आते ही छोटू के हाथ थोड़े धीमे हो जाते. मां, जिस की कमर अब सीधी नहीं रहती थी, जिस की खांसी रातों में ज्यादा बोलती थी. वह जब कभी गांव जाता, मां उस के सिर पर हाथ फेर कर कहती, ‘‘मेरा छोटू सदा सुखी रहे.’’ छोटू हंस देता, ‘‘मैं सुखी हूं मां.’’ जब छोटू ढाबे के जूठे बरतन मांजता, तो स्टील के बरतनों में उसे अपना चेहरा नहीं, अपनी बहनों का भविष्य चमकता हुआ दिखता था. उसे याद था कि उस की छोटी बहन मुन्नी फटी हुई किताब से पढ़ रही थी. पन्ने आधे थे, अक्षर घिसे हुए थे. उस रात वह सोया नहीं था. अगले दिन छोटू ने मलखान सिंह से एक्स्ट्रा काम मांगा, ‘‘मालिक, रात को ट्रक ज्यादा आते हैं, मैं जागूंगा और काम करूंगा. मुझे बस थोड़ी और पगार बढ़ा देना मालिक.’’


मलखान सिंह, जो दिल का बुरा नहीं था, पर थोड़ा सख्त था, बोला, ‘‘नींद नहीं आएगी तुझे?’’ छोटू ने जवाब दिया, ‘‘मालिक, नींद तो उन्हें आती है जिन के सपने पूरे हो चुके हों. मेरे तो अभी पैदा भी नहीं हुए.’’ मलखान सिंह को उस दिन पहली बार लगा कि यह लड़का उम्र से कहीं ज्यादा सीख रखता है.
एक दिन एक महंगी सफेद कार ढाबे के सामने कर रुकी. उस में से एक साहब उतरे. आंखों पर चश्मा, हाथ में चमचमाता आईफोन. उन्होंने चिढ़ते हुए कहा, ‘‘भाई, यहां नैटवर्क नहीं है क्या? और
सुनो, एक ब्लैक कौफी मिलेगी? शुगर फ्री.’’ छोटू ने मासूमियत से सिर खुजलाया, ‘‘साहब, यहां तो चाय मिलती है, जो कलेजे को ठंडक और दिमाग को गरमी देती है.

पी कर देखो, नैटवर्क अपनेआप जाएगा.’’
साहब हंसे, ‘‘चलो, तुम भी क्या याद रखोगे. लाओ, वही पिला दो.’’
छोटू ने जब चाय पेश की, तो साहब ने एक घूंट भरा और दंग रह गए, ‘‘छोटू, क्याक्या डालते हो इस में?’’
छोटू ने आंख मारते हुए कहा, ‘‘थोड़ी अदरक, थोड़ी इलायची और ढेर सारी जिम्मेदारी साहब.’’
उस दिन के बाद वे साहब हर महीने उसी ढाबे पर आने लगे. कभी कुछ
कहते नहीं, बस चाय पीते और छोटू को देखते रहते.
छोटू को शहर जाने का मौका भी मिला था. एक ड्राइवर ने एक बात कही थी, ‘‘मेरे साथ चल, वहां होटल में काम दिला दूंगा.’’


छोटू ने मना कर दिया, ‘‘साहब, यहां की पगडंडियां भी मुझे पहचानती हैं. शहर में तो लोग अपने पड़ोसियों को भी नहीं पहचानते. मैं यहां खुश हूं, क्योंकि यहां मेरी जरूरत है.’’
एक बार ढाबे पर कुछ छात्र आए. उन्होंने मस्ती में पूछा, ‘‘छोटू, टाइम मैनेजमैंट कैसे कर लेते हो?’’
छोटू ने जूठे गिलास समेटते हुए कहा, ‘‘साहब, जब पेट खाली हो और घर की उम्मीदें भारी हों, तो हाथ और पैर अपने आप घड़ी की सूई से तेज चलने लगते हैं.’’
फिर वह रात आई, जब आसमान टूट पड़ा.


लगातार बारिश से हाईवे जाम हो गया. सैकड़ों गाडि़यां ढाबे के सामने कर खड़ी हो गईं. बिजली गुल, राशन खत्म, लोग घबराए हुए. बच्चों का रोना, बुजुर्गों की कराह.
मलखान सिंह ने हाथ खड़े कर दिए, ‘‘ओए छोटू, अब क्या होगा? आटा खत्म है, सब्जी भी नहीं है.’’
छोटू की आंखों में उस समय एक अलग ही चमक थी, ‘‘मालिक, आप परेशान मत होइए. आज ढाबा मैं चलाऊंगा.’’


छोटू ने पीछे के स्टोर से पुराने रखे चने निकाले, सूखी रोटियों को घी में तल करक्रिस्पी स्नैकबनाया. जंगल से लकडि़यां बीन लाया. उस रात उस ने सिर्फ खाना नहीं खिलाया, उस ने हौसला परोसा… ‘डरो मत…’ ‘सब ठीक होगा…’ ‘भूखे मत सोना…’ हर वाक्य में भरोसा था.
उस रात एक कौर्पोरेट महिला, जो घंटों से परेशान थीं, फाइलों और लैपटौप में खोई हुई थीं. वे छोटू को गौर से देखने लगीं.


छोटू बोला, ‘‘दीदी, यह डब्बा (लैपटौप) बंद करो. बाहर बारिश का संगीत सुनो और गरम खिचड़ी खाओ. काम तो कल भी हो जाएगा, लेकिन यह पल हमेशा याद रहेगा.’’ उन महिला की आंखें भर आईं.
एक बूढ़ी औरत ने छोटू का हाथ पकड़ा, ‘‘बेटा, तू थक नहीं रहा?’’ छोटू हंसा, ‘‘दादी, मेरी जिंदगी में थकना नहीं लिखा है. थकते तो वे हैं जो सिर्फ अपना बोझ ढोते हैं.’’ सुबह हुई. जाम खुला. लोग वहां से जाने लगे.
ब्लैक कौफी वाले साहब ने लिफाफा बढ़ाया, ‘‘यह तुम्हारी मेहनत के लिए.’’


छोटू ने हाथ जोड़ लिए, ‘‘अगर देना ही है, तो मेरी बहनों के लिए कुछ पुरानी किताबें लेते आइए साहब.’’
साहब की आंखों में आंसू गए. उन्होंने उस छोटे से बच्चे में एक बहुत बड़े इनसान को देखा था.
आज भीशेर पंजाबढाबा वहीं है. छोटू वह बड़ा हो गया है, लेकिन आज भी लोग उसेछोटूही कहते हैं.     

Crime Story: शर्मनाक कमांडो काजल दहेज लोभी पति ने मारा

Crime Story: रक्षा मंत्रालय. यह शब्द सुनते ही सब से पहला खयाल यही आता है कि ऐसा मंत्रालय जो देश की रक्षा के लिए बनाया गया है, ताकि भारत के बाहरी और भीतरी दुश्मन इस देश को हलके में लें.
अब कमांडो शब्द पर ध्यान देते हैं. इसे सुनते ही एक ऐसे शख्स की इमेज मन में कौंध जाती है, जो तन और मन से इतना मजबूत होता है कि अगर अपनी पर जाए तो कइयों पर अकेला ही भारी पड़ जाए.
अब काजल और अंकुर की बात करते हैं. काजल दिल्ली पुलिस की जांबाज महिला कमांडो थी और अंकुर रक्षा मंत्रालय में क्लर्क के पद पर काम करता है.

दोनों ने प्रेम विवाह किया था. अंकुर काजल दिल्ली के मोहन गार्डन में रहते थे. उन का एक डेढ़ साल का बेटा भी है. काजल 4 महीने के पेट से थी. ऊपरी तौर पर यह शादी बड़ी शांत लग रही थी. पतिपत्नी दोनों कमाऊ, सरकारी नौकरी, गोद में बेटा और दूसरे बच्चे के आने की तैयारी. छोटा परिवार, खुशियां अपार.
पर 22 जनवरी, 2026 की रात को कुछ ऐसा हुआ, जिस ने इस शादी की पोल खोल दी और साथ ही इस बात का भी खुलासा कर दिया कि मजबूत से मजबूत औरत भी अपने घर में कितनी अबला बन कर रह जाती है. काजल को तो अपने औरत होने की कीमत अपनी जान दे कर चुकानी पड़ी.


22 जनवरी, 2026 की रात के तकरीबन 10 बजे काजल पर उस के पति अंकुर ने जानलेवा हमला किया. सिर पर लोहे के डंबल से कई वार किए गए, जिस से काजल को गंभीर चोटें आईं. हमले के बाद आरोपी पति अंकुर ही काजल को मोहन गार्डन में बने तारक अस्पताल ले कर गया. अस्पताल में काजल की हालत बेहद नाजुक थी. वहां के डाक्टरों ने काजल को गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश के एक निजी अस्पताल में रैफर किया, जहां कई दिनों तक जिंदगी और मौत के बीच खेलने के बाद आखिरकार 27 जनवरी, 2026 को काजल ने दम तोड़ दिया. दहेज बना इस खून की वजह लव मैरिज और दहेज की मांग?

क्या यह सवाल थोड़ा अटपटा नहीं है? बिलकुल है, क्योंकि जब 2 लोग अपनी मरजी से प्यार में पड़ कर शादी करते हैं, तो उन में दहेज जैसी सामाजिक बुराई की जगह तो कहीं से नहीं बनती है, पर काजल के परिवार वालों का आरोप है कि शादी के महज 15 दिन बाद ही काजल के ससुराल पक्ष ने गाड़ी और पैसों की मांग शुरू कर दी थी. काजल को ताने दिए जाने लगे थे और उसे सताया जाने लगा था. कई बार समझौता कराने की कोशिश भी हुई.


इतना ही नहीं, काजल ने दिल्ली में अलग रहने का फैसला भी किया, लेकिन आरोप है कि पति अंकुर वहां भी गाड़ी और पैसों की मांग को ले कर उस के साथ मारपीट करता रहता था. काजल के परिवार के मुताबिक, काजल सबकुछ सहती रही, क्योंकि उसे अपने कैरियर और होने वाले बच्चे की चिंता थी.
काजल का परिवार दावा कर रहा है कि वह सबकुछ सहती रहती थी. पर क्यों? क्या वह अपाहिज थी? नहीं, वह तो 27 साल की जांबाज कमांडो थी. क्या वह अपना कैरियर और होने वाला बच्चा बचा पाई? नहीं. आज दोनों ही इस दुनिया में नहीं हैं.


मर्द मारे तो क्या गलत तो क्या यह मान लिया जाए कि जब काजल जैसी मजबूत औरत अपनी ससुराल में पिट सकती है, तो फिर एक आम घरेलू औरत पर तो परिवार की इज्जत की खातिर जुल्म होते ही रहते होंगे? इस बात को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता, पर जरा गहराई से सोचा जाए तो भारतीय समाज में आज भी लड़कियों को इस तरह से पाला जाता है कि उन्हें हर हाल में मर्द के साए की जरूरत पड़ती ही पड़ती है. घर में पिता और भाई और सुसराल में पति ही उन का रक्षक है. पर अगर औरतें ही पति से होने वाली पिटाई को सही मानती हों तो? कुछ साल पहले बीबीसी ने इसी सवाल पर एक रिपोर्ट छापी थी.


दरअसल, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण या (एनएफएचएस-5) की रिपोर्ट में कहा गया था कि औसतन
40 फीसदी से ज्यादा औरतों ने पतियों द्वारा कुछ हालात में पत्नियों को पीटना सही बताया था, जैसे अगर औरतें घर या बच्चों की अनदेखी करती हैं. सासससुर का खयाल नहीं रखती हैं. बिना बताए घर से बाहर निकलती हैं वगैरह. समस्या यहीं से बड़ी हो जाती है, जब देश की 51 फीसदी से ज्यादा औरतें यह स्वीकार कर लेती हैं कि पति से पिटना को बड़ा मुद्दा नहीं है. जो पति आप से प्यार करता है, कभीकभार वह आप पर हाथ उठा दे तो कोई बड़ी बात नहीं.


धर्मवादी सोच हावी यह पति को परमेश्वर मानने वाली सोच का नतीजा है, जो धर्म के ठेकेदार सदियों से औरतों के मन में भर रहे हैं. उन्हें बचपन से ही सिखा दिया जाता है कि घर से लड़की की डोली उठेगी
तो उस की लाश ही ससुराल से उठनी चाहिए, फिर चाहे पति कितना ही जल्लाद क्यों हो. यहीं से औरत को मर्द का गुलाम बनने की सीख पुख्ता होती है. कमांडो काजल अपने कैरियर और बच्चों (एक तो अभी दुनिया में आया ही नहीं था) के लिए जुल्म सह रही थी. पर वह तो अपने पैरों पर मजबूती से खड़ी थी, फिर क्यों उस ने पति के पहले वार पर ही जोरदार जवाब नहीं दिया?


यह सवाल बहुत ज्यादा अहम है हर उस औरत के लिए, जो परिवार बचाने के लिए कोल्हू के बैल की तरह जुटी पड़ी रहती है, पर इस से अंकुर जैसे मर्दों को कोई फर्क नहीं पड़ता है. घरेलू हिंसा इसी गंदी मर्दवादी सोच का नतीजा है.   

Hindi Story: ममता की जीत

Hindi Story: 3 बच्चों की विधवा मां राधा की वीरान जिंदगी में विजय  बहार बन कर आए. दुनिया की परवाह करते हुए उन्होंने राधा से शादी की. राधा खुश हो गईं. पर क्या राधा की जिंदगी में वाकई बहार आई थी? विजय का असली मकसद क्या थागंगा के किनारे बसे छोटे से कसबे इटावा में, जहां नदियां पुरानी लोककथाएं गाती हैं और खेतों की हवा में सोने सी धूप नाचती है, एक घर था जो कभी खट्टीमीठी हंसी से गूंजता था. वह घर था राधा कालकड़ी की पुरानी दीवारें और छत पर चढ़ी जूही की लताएं, जो हर सुबह भीनी खुशबू देती थीं.


राधा एक साधारण, सांवली औरत थीं. उम्र 40 के करीब, लेकिन जीवन ने उन के चेहरे पर गहरी और कठोर झुर्रियां उकेर दी थीं. उन के पति हरि प्रसाद एक मेहनती और सिद्धांतवादी किसान थे, जो खेतों में दिनरात खटते, भविष्य के सपने बोते थे. 5 साल पहले, उन की जिंदगी एक झटके में थम गई. हरि प्रसाद की सड़क हादसे में दर्दनाक मौत हो गई. ट्रैक्टर पर बाजार जाते वक्त एक तेज रफ्तार ट्रक ने उन्हें कुचल दिया. इटावा के छोटे अस्पताल में डाक्टर केवल निराशा में सिर हिला सके.


हरि प्रसाद की मौत के बाद, राधा ने टूट कर भी हिम्मत बांधी. वे अपने 3 बच्चों… 2 बेटियां और एक बेटाके साथ अपने मायके लौट आई थीं. मायका कानपुर के बाहरी इलाके में बसा एक शांत, कृषिप्रधान गांव हरिपुरा, जहां राधा देवी की मां सरला और पिता रामलाल रहते थे. हरिपुरा हराभरा था. गेहूं की सुनहरी फसल हवा में लहराती थी और शाम को गायें अपने खुरों की आवाज के साथ घर लौटती थीं. राधा को लगा था कि इस ममता की छांव में उन्हें और बच्चों को शांति मिलेगी. बच्चे स्कूल जाएंगे और वे छोटेमोटे काम कर के घर चलाएंगी.


लेकिन विधवा होना, खासकर एक छोटे गांव में, आसान नहीं होता. गांव वाले इशारे करते. उन के कानाफूसी भरे शब्द तीर बन कर राधा के आत्मसम्मान को भेदते थे. गांव की औरतें इशारों में कहतीं, ‘‘अरे राधा, अब तो बड़ी बेटी को ब्याह दोवरना दुनिया की बातें सुनसुन कर जीना मुश्किल हो जाएगा. जवान विधवा का क्या भरोसा?’’ राधा चुपचाप सब सहतीं. उन के पास विरोध करने की शक्ति नहीं थी, केवल सहनशक्ति थी. बड़ा बेटा छोटू सिर्फ 10 साल का था, पर पिता की तरह खेतों में बड़ों के साथ मदद करता. बेटियां सीता (8 साल की) और गीता (6 साल की) डर कर मां की गोद में सिर छिपातीं.


राधा दिनभर घर संभालतीं. खेतों में काम करतीं. रात को बच्चों को पुरानी लोककथाएं सुनातीं और लोरी गातीं. लेकिन अंदर का खालीपन हर रात उन की नींद और मन की शांति चुरा लेता था. वे अकसर तकिए में मुंह छिपा कर रोती थीं. एक दिन गांव के मेले में राधा की नजर एक अजनबी पर पड़ी. उन का नाम विजय था, जो लखनऊ के बाहरी इलाके के रहने वाले थे और एक ठेकेदार थे. लंबा कद, गोरा रंग और उन की मुसकान इतनी भोली थी कि राधा का बेजान दिल भी एक पल के लिए धड़क उठा.


विजय मिट्टी के बरतनों के स्टौल पर खड़े थे. राधा ने वहां से रंगबिरंगा दीया खरीदा. विजय ने दीया लपक कर पैक किया और शरारती हंसी के साथ बोले, ‘‘दीया जला दो बहनजीलेकिन इस रोशनी में खुद को भी देखना, कहीं अंधेरा छिप जाए. जिंदगी में उजाला रखना जरूरी है.’’ राधा मुसकराईं. यह सालों बाद पहली बार था कि वे दिल से मुसकराई थीं. बात बन गई. विजय ने बताया कि वे विधुर हैं, उन की पत्नी लंबी बीमारी से चल बसीं और उन के कोई बच्चे नहीं हैं. विजय ने अपनी जादुई बातों का सिलसिला जारी रखा, ‘‘जीवन छोटा है बहनजीहंसते रहो, रोते रहोगे तो आंसू भी थक जाएंगे. हर दिन एक नया मौका होता है.’’


विजय की बातों की मिठास, उन की हमदर्दी और स्नेह राधा के तड़पते दिल को सालों बाद छू गया. वे उन्हें अपने जीवन में एक नई आशा जैसे लगे. धीरेधीरे विजय हरिपुरा आने लगे. वे बच्चों के लिए फल ले कर आते, छोटी बच्चियों के लिए खिलौने लाते. वे छोटू से खेती की बातें करते. राधा की मां सरला को शक हुआ. उन्होंने राधा को टोका, ‘‘बेटी, गांव में बातें हो रही हैं. यह बारबार क्यों आता है?’’ राधा ने अपनी मां सरला को समझाया, ‘‘मां, हमारी बस दोस्ती हैइस खाली दिल को थोड़ी सी गरमाहट मिलती है. वे बहुत नेक इनसान हैं.


लेकिन दोस्ती रुकती कहां है, जब दिल प्यार और सहारे के लिए तरस रहा हो. एक शाम तेज बारिश हो रही थी. घर सो चुका था. तभी अचानक विजय आए. विजय ने राधा का हाथ पकड़ा, उन की आंखों में देखा और गंभीर स्वर में कहा, ‘‘राधामैं तुम्हें इस अकेलेपन में तड़पते नहीं देख सकता. यह तुम्हारे लिए नहीं है. शादी कर लो मुझ सेमैं तुम्हारे बच्चों को अपना नाम दूंगा. मैं तुम्हें वह खुशी दूंगा जो सालों से खो गई है. तुम्हारी हर सांस में खुशबू भर दूंगा.’’


राधा का दिल पूरी ताकत से धड़का. वे डर और उत्साह के बीच फंसी थीं. विधवा हो कर दोबारा शादी, गांव क्या कहेगा, बच्चे क्या सोचेंगे. लेकिन विजय की आंखों में सच्चा वादा था. 6 महीने बाद, सामाजिक विरोधों के बावजूद, उन्होंने सादे विवाह में सात फेरे लिए. राधा की मां सरला ने आंसू भरी आंखों से आशीर्वाद दिया. सरला ने कहा, ‘‘बेटीखुश रहना. अपना जीवन फिर से शुरू कर.’’ शादी के बाद विजय का काम लखनऊ में था, जबकि राधा बच्चों की पढ़ाई और गांव की जमीन के कारण हरिपुरा में ही थीं. विजय हफ्ते में 2-3 बार आते.


शुरुआत में सब अच्छा था. प्यार, हंसी और भविष्य की योजनाएं. लेकिन जल्द ही असली रंग दिखने लगे. पहले प्यार, फिर झगड़े. विजय ने एक शाम गुस्से में भर कर कहा, ‘‘तेरे बच्चेमेरे गले की फांस बन गए हैं. मैं यहां आता हूं, तो मुझे आराम नहीं मिलता, बस उन की देखभाल करनी पड़ती है. मुझे आजादी चाहिए.’’ राधा का दिल टूट कर बिखर गया. उन की आंखें अचानक नम हो गईं. उन्होंने हिम्मत बांध कर कहा, ‘‘विजयजीये मेरे कलेजे के टुकड़े हैं, निर्दोष हैं. आप ने शादी से पहले वादा किया था.


एक रात झगड़ा सीमा लांघ गया. विजय ने हिंसा का सहारा लिया और हाथ उठाया. राधा का गाल लाल हो गया. अंदर असहनीय दर्द की लहर दौड़ गई, लेकिन वे चुपचाप सह गईं. दूसरा रिश्ता भी टूटना नहीं चाहिए, इसी डर ने उन्हें जकड़ लिया. विजय का गुस्सा कम होने के बजाय बढ़ता गया. वे चिल्लाए, ‘‘मैं नया जीवन चाहता हूंएक नया परिवार. इन पुरानी जंजीरों से आजादी…’’ राधा हर तरह से विजय को मनाने की कोशिश करती रहीं. वे उन का मनपसंद खाना बनातीं, उन के कपड़े धोतीं, घर साफ रखतीं. लेकिन विजय शारीरिक और मानसिक दोनों तरह से और दूर होते गए.


एक साल बाद, राधा गर्भवती हुईं. उन के दिल में खुशी की लहर दौड़ी. यह विजय का अपना बच्चा था.
राधा ने उम्मीद से भर कर कहा, ‘‘विजयजीहमारा बच्चा होगा, हमारा अपना. अब सब ठीक हो जाएगा.’’
विजय का चेहरा काला पड़ गया. उन की आंखें गुस्से से लाल थीं. वे चीखे, ‘‘क्या बकवास है यह?
मैं नहीं चाहता यह बोझ. मेरे पास पहले से 3-3 बच्चे हैं. मुझे यह जिम्मेदारी नहीं चाहिए.’’ राधा का दिल धक से रह गया. आंसू छलक आए. उन्होंने डरते हुए, प्यार से कहा, ‘‘लेकिनयह हमारा है, हमारी खुशी की निशानी है.’’ विजय गुस्से में घर छोड़ कर चले गए और पूरे हफ्ते नहीं आए. जब लौटे तो धमकी भरे लहजे में बोले, ‘‘अगर यह बच्चा पैदा हुआ तोमैं तुम्हें और इन चारों बच्चों को छोड़ कर घर छोड़ दूंगा सब छोड़ दूंगा. मैं तुम्हें तलाक दूंगा.


राधा सिसकियां रोक नहीं पाईं. उन्होंने अकेले ही अपना गर्भ संभाला. मां सरला ने ममता और नैतिकता का सहारा दिया. सरला ने उसे दिलासा दिया, ‘‘बेटीसब ठीक हो जाएगा, बस हिम्मत मत हारना. तू अकेली नहीं है.’’ राधा रातें रोते काटतीं. विजय आतेजाते रहते, पर प्यार नहीं. वे मानसिक रूप से राधा को तंग
करते रहे. विजय ने दरिंदगी की सारी हदें पार करते हुए कहा, ‘‘मैं बाहर देख रहा हूंएक लड़की हैयुवा, बिना किसी बोझ की. मैं उस के साथ शादी करूंगा.’’ राधा चुप रहीं. उन का दिल हर पल चुभता. गर्भ के महीने कटे, पेट बढ़ा, और दर्द भी. गांव वालीं ताने मारतीं.


गांव की औरतें कहतीं, ‘‘राधा, संभल करविधवा हो कर दोबारा शादी, अब यह सब. इस नए बच्चे का क्या होगा? क्या पता क्या होगा आगे.’’ राधा मुसकरातीं, अंदर ही अंदर जलतीं और अपने आंसू पी जातीं. वे अपने अजन्मे बच्चे के लिए मजबूत बनी रहीं. 20 अक्तूबर की सुबह तेज प्रसव पीड़ा हुई. मां सरला ने पुरानी दाई बुलाई. घर में अचानक हलचल मच गई. छोटू अपनी मां को तड़पते देख कर रोया.
दाई ने खुशी से कहा, ‘‘लड़का होगासेहतमंद, मजबूत.’’ दोपहर को सेहतमंद बेटा जनमा. राधा ने उसे गोद में लिया. असीम खुशी के आंसू लुढ़क आए.


राधा ने फुसफुसाते हुए कहा, ‘‘मेरा बेटातू मेरा सहारा है, मेरी जिंदगी. तेरा नाम छोटे हरि होगा.’’
नाम रखा गया छोटे हरि. विजय शाम को आए, पर उन का चेहरा उदासी और असंतोष से भरा था.
विजय ने ठंडे स्वर में कहा, ‘‘अच्छा हैलेकिन अब क्या होगा? अब जिम्मेदारी और बढ़ गई.’’
राधा ने टूटे दिल से उम्मीद जताते हुए कहा, ‘‘परिवार पूरा हो गयाअब सब ठीक हो जाएगा. खुश हो जाओ हमारे लिए.’’ विजय की हंसी कड़वी निकली. वे बोले, ‘‘खुश? यह बोझ और बढ़ गयामेरे सपनों पर, मेरे भविष्य पर.

मैं इस सब को नहीं सहूंगा.’’ राधा का सीना दुखा. विजय उसी रात गुस्से में चले गए. अगली सुबह विजय लौटे. उन के हाथ में एक थैला था. राधा बच्चे को दूध पिला रही थीं. विजय ने बच्चे को देखा और तुरंत घबराए हुए स्वर में कहा, ‘‘बच्चा कमजोर लग रहा हैबुखार है, गंभीर. इसे तुरंत डाक्टर के पास ले जाना है.’’ राधा घबरा गईं. उन का दिल जोरों से धड़कने लगा. वे बोलीं, ‘‘क्या हुआ? मैं भी चलूंगीअपने बेटे के साथ.’’ विजय ने झूठा बहाना बनाया, ‘‘नहींतुम थकी हो, आराम करो. कानपुर का बड़ा अस्पतालआईसीयू में रखना पड़ेगा. 2-4 दिन की बात हैचिंता मत करो.’’


राधा ने कांपते हाथों से बच्चा विजय को सौंपा. उन की आंखें डर और अविश्वास से भरी थीं.
राधा ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘सावधान रहना जीयह मेरी जान है. इसे कुछ नहीं होना चाहिए.’’
विजय ने रूखेपन से कहा, ‘‘हांमैं हूं .’’ विजय बाइक पर चले गए. राधा खिड़की से उन्हें देखती रहीं. उन की बेचैनी बढ़ती गई. पहले दिन फोन आया. विजय ने कहा, ‘‘निमोनिया हैगंभीर. 2 दिन और लगेंगेडाक्टर कह रहे हैं.’’ राधा का कलेजा मुंह को आया. वे आंसू बहाती रहीं. उन्होंने दोबारा पूछा, ‘‘मैं जाऊंअपने बेटे के पास…’’


विजय का जवाब था, ‘‘नहींइंफैक्शन फैलेगा, तुम्हें भी हो जाएगा. तुम घर पर इंतजार करो.’’
दूसरे दिन फोन आया. विजय बोले, ‘‘अब ठीक हैलेकिन औब्जर्वेशन में रखा है.’’
राधा रातदिन रोतीं. सरला ने सांत्वना दी, ‘‘बेटीसब ठीक हो जाएगा. खुद पर भरोसा रखो.
तीसरा दिन फोन नहीं आया. राधा ने फोन किया, नंबर बंद रहा. उन का दिल बैठता गया.
चौथे दिन विजय घर आए. उन का चेहरा पीला पड़ा था, लेकिन वे शांत दिख रहे थे.
विजय ने कहा, ‘‘बच्चाअब ठीक है. अस्पताल में ही छोड़ा हैकल ले आएंगे. उस की हालत अब सुधर
गई है.’’


राधा गले लगीं, खुशी के आंसू छलके, ‘‘धन्यवाद जीमेरी जान बचाई आप ने.’’ लेकिन विजय की आंखें झूठी लगीं. वे डर और छिपाव से भरी थीं. दिन बीतते गए, विजय के बहाने चलते रहे, ‘‘डाक्टर ने कहाएक हफ्ता और.’’ राधा का दूध सूख गया. उन की ममता उफनती रही. वे रोईं, ‘‘मेरा बेटा भूखा होगामां का दूध मांगेगा. मैं उसे कब देखूंगी?’’ गांव की औरतें कानाफूसी करतीं, ‘‘बच्चा कहां है राधा? इतने दिनों तक अस्पताल में क्यों?’’ राधा झूठा आत्मविश्वास दिखाती, ‘‘अस्पताल मेंठीक हो रहा है. जल्दी आएगा.’’
शक बढ़ता गया. एक रात राधा ने डर समाए पूछा, ‘‘सच बताओ जीमेरा बेटा ठीक है ? आप झूठ तो नहीं बोल रहे?’’


विजय चिल्लाए, ‘‘चुप रहोसब ठीक है, बस चुप. ज्यादा सवाल मत पूछो.’’ राधा कांप उठीं. सरला ने राधा को अलग बुलाया. सरला बोलीं, ‘‘बेटीकुछ गड़बड़ है, मेरा दिल कह रहा है. पता करोजल्दी.’’
29 अक्तूबर की शाम, भयानक हलचल मच गई. गांव का एक लड़का दौड़ादौड़ा आया. लड़का बोला, ‘‘मां जीतालाब के पास कुछ मिला है. किसी बच्चे की लाश…’’ हरिपुरा के बाहर 300 मीटर दूर एक सूखा तालाब था, जहां झाडि़यां उग आई थीं. गाय चराने वाले ने एक पौलीथिन में लिपटा हुआ कुछ देखा था. उस ने खोला. नवजात बच्चे का शव निकला. गांव वाले जमा हो गए.


कोई बोला, ‘‘ओह, कौन सा बच्चा है यह?’’ किसी ने पहचान लिया, ‘‘राधा का तो गायब है.’’ सरला तुरंत दौड़ीं, ‘‘बेटीतालाब चल, जल्दी.’’राधा गईं. उन के पैर लड़खड़ाए. भीड़ जमा थी. पौलीथिन खुली पड़ी थी. छोटा शरीर, नीला पड़ गया था. राधा चीखीं. उन की चीख से पूरी दुनिया थम गई. राधा आह भरते हुए बोलीं, ‘‘मेरा बेटामेरा छोटे हरि.’’ राधा दौड़ीं छू ने, लेकिन गांव वालों ने दर्द से रोका. कोई चाचा बोले, ‘‘नहीं राधापुलिस को बुलाओ. इसे छूना नहीं.’’ राधा सिसकती रहीं, ‘‘कौनकौन कर सकता है यह? मेरा मासूमकिस शैतान ने?’’


सरला ने राधा को गले लगाया, ‘‘बेटीसंभाल खुद को. तू अकेली नहीं है.’’ 112 पर फोन किया गया. पुलिस आई. इंस्पैक्टर राजेश सिंह. शव को कवर किया गया. राधा को थाने ले गए. थाने में राधा बैठी थीं. उन की आंखें सूजी थीं, दिल टूट चुका था. इंस्पैक्टर ने पूछा, ‘‘क्या हुआ थासब बताओ. हमें सच जानना है.’’ राधा बयान देती रहीं. उन का गला रुंधता गया. राधा बोलीं, ‘‘साहबविजय ने किया, मेरे पति. वे नहीं चाहते थे बच्चाबोझ कहता था. उन्होंने मुझे झूठ कहा कि वह अस्पताल में है…’’ इंस्पैक्टर बोला, ‘‘तहरीर लिखाओसब लिखो. हम तुम्हें इंसाफ दिलाएंगे.’’ राधा ने कांपते हाथों से दस्तखत किए. पुलिस तलाश में निकली.


राधा घर लौटीं. छोटू ने पूछा, ‘‘मांभाई कहां है?’’ राधा ने टूटे स्वर में कहा, ‘‘नहीं रहा.’’ राधा रातभर जागीं, दर्द से करवटें बदलती रहीं. सुबह विजय पकड़े गए. कानपुर हाईवे पर भागते हुए. उन के खून लगे कपड़े मिले. वे टूट गए. विजय ने स्वीकार किया, ‘‘हांमैं ने मार डाला. वह रातभर रो रहा थामुझे बोझ लग रहा था. मैं ने राधा को झांसा दिया थाअब सब खत्म. मैं आजाद होना चाहता था.’’ पोस्टमार्टम हुआगला दबा कर हत्या निकली. कोर्ट चला. राधा गवाह बनीं. उन की आंखों में आग सुलगती रही. राधा ने कहा, ‘‘वह मेरा पति थालेकिन शैतान निकला. उस ने मेरी ममता को मारा.’’ विजय को सजा सुनाई गई. उम्रकैद. राहत मिली, पर दर्द नहीं गया.


राधा हरिपुरा में, अकेले बच्चों को पालती रहीं. वे तालाब जातीं, फूल चढ़ातीं, आंसू बहातीं. राधा बोलीं, ‘‘बेटामां के पास आया कर, सपनों में ही सही.’’ जीवन चला, लेकिन छाया रही. विधवा की, मां की, टूटे सपनों में जीती. सुबह सूरज उगता, गंगा बहती. राधा खेत जातीं, बच्चों को स्कूल भेजतीं. शाम को घर संभालतीं. रात को लोरी सुनातीं, छोटा सा कोना खाली रहता. छोटू बड़ा होता, बेटियां पढ़तीं. राधा मुसकरातीं, दर्द छिपातीं. गांव चुप, हमदर्दी देता. विजय जेल में था. वहां से चिट्ठी भेजता… ‘माफ कर दोअब पछता रहा हूं.’


राधा चिट्ठी फाड़ देतीं, ‘‘कभी नहींकभी नहीं.’’ सरला बूढ़ी हो गईं, रामलाल चल बसे. राधा ने सब संभाल लिया. छोटू ने कहा, ‘‘मांमैं डाक्टर बनूंगा, बच्चों को बचाऊंगा. कोई मासूम बच्चा नहीं मरेगा.’’
राधा की नम आंखें, गर्व से भर गईं, ‘‘हां, बेटाबिलकुल बनो, मेरे छोटे हरि की तरह.’’ राधा की बेटियां बोलीं, ‘मैं टीचरमैं पुलिस…’ राधा गले लगाई, खुशी के आंसू बहे, ‘‘सब बनोमेरे सपने बनो.’’ छोटू अब 20 साल का था. कानपुर मैडिकल कालेज में एमबीबीएस कर रहा था. छोटे हरि की मौत ने उसे इतना झकझोर दिया कि उस ने कसम खाई कि कोई मासूम नवजात उस की वजह से नहीं मरेगा.


छोटू रातदिन पढ़ता, गरीब बच्चों का मुफ्त इलाज करता. गांवदेहात के इलाकों में कैंप लगाता, मां की तरह दर्द समझता. उस का सपना था, हरिपुरा में छोटा क्लिनिक खोलेगाछोटे हरि की याद में.
सीता अब 18 की थी, कानपुर यूनिवर्सिटी में बीएड कर रही थी. वह गांव की लड़कियों को पढ़ाती, महिला समिति में सक्रिय थी. मां की तरह मजबूत, तानों से नहीं डरती. वह स्कूल टीचर बनेगी, जहां विधवाओं के बच्चों को मुफ्त तालीम देगी.


गीता 16 की थी, पुलिस की तैयारी कर रही थी. दौड़ती, जिम जाती, कानून की किताबें रटती. विजय की हैवानियत ने उसे सिखायाइंसाफ खुद लड़ कर लेना पड़ता है. वह इंस्पैक्टर बनेगी, हर राधा की आवाज बनेगी. तालाब साफ हुआ, राधा पौधे लगातीं, छोटे हरि की याद में. फूल खिलते गए. राधा बोलीं, ‘‘बेटा देखतेरी मां जी रही है, तेरे लिए.’’ झुर्रियां बढ़ीं, हिम्मत नहीं टूटी. गांव की औरतें सम्मान से देखतीं.
बारिश की शाम, छत पर खड़ीं. याद आईविजय की पहली बारिश. सपना रह गया. अंदर गईं, लोरी सुनाई, सो गईं. सपने में छोटे हरि आया, मुसकराया, ‘‘मांमैं ठीक हूं, तुम मुसकराओ.’’ सुबह नम आंखें, मुसकान आई, उम्मीद जगी. हरिपुरा बदला. राधा महिला समिति में हौसला देतीं, ‘‘मजबूत रहोटूटना नहीं. बच्चों के लिएसब सहना.’’


सपने पूरे हुए. छोटू मैडिकल में टौप कर रहा था, सीता कालेज में गोल्ड मैडलिस्ट, गीता पुलिस भरती में सिलैक्ट. राधा गर्व करतीं, आंसू खुशी के. ‘‘मेरा छोटे हरितुम सब में जी रहा है. मेरे बच्चेमेरी दुनिया, मेरी ताकत.’’ समय बीता, राधा अब 70 पार कर चुकी थीं. बाल सफेद, कद झुका, लेकिन आंखों में वही चमक. छोटू ने हरिपुरा मेंछोटे हरि मैमोरियल क्लिनिकखोला. सीता नेराधा देवी विद्या मंदिरशुरू किया. गीता कानपुर में इंस्पैक्टर बनी. राधा अब गंगा को निहारतीं. तालाब अब बगीचा बन चुका था. गांव वालेराधा मांकहते. आखिरी सर्दी में, राधा बीमार पड़ीं. बिस्तर पर लेटीं, बच्चों ने घेरा. छोटे हरि सपने में आया, हाथ बढ़ाया.


हलकी आवाज में राधा बोलीं, ‘‘ रही हूं बेटा…’’ आंखें बंद हुईं, मुसकान बरकरार. राधा मां नहीं रहीं.
अंतिम संस्कार गंगा तट पर हुआ. तालाब पर पत्थर लगा, ‘राधा मां : मां, योद्धा, प्रेरणा’. 20 अक्तूबर कोराधा स्मृति दिवसमनाया जाता है. उस रात गंगा की लहरें ऊंची उठीं. हवा में लोरी गूंजी. राधा की आत्मा बच्चों में, फूलों में, गंगा में समा गई. दर्द खत्म हुआ, प्यार अमर हो गया. राधा मां चली गईं, लेकिन उन की कहानी हर मां के दिल में धड़कती रहेगीटूट कर भी टूटने की, खो कर भी जीतने की.                    Hindi Story

Film: परदे की दुनिया-रितिक रोशन ने उठाए सिस्टम पर सवाल

Film: माफ कीजिए, रितिक रोशन की किसी फिल्म में सिस्टम की नाकामियों पर वार नहीं किया गया है, बल्कि 14 फरवरी को मुंबई के मुलुंड में मैट्रो लाइन का पिलर गिर गया था, जिस में एक शख्स की मौत हो गई थी और 3 लोग घायल हो गए थे. रितिक ने इस हादसे पर शोक जताते हुए सरकार पर गुस्सा निकाला था और उन्होंने जवाबदेही मांगते हुए सिस्टम पर सवाल उठाए थे.
रितिक रोशन ने अपने सोशल मीडिया हैंडल पर लिखा था, ‘मजदूरों और आम लोगों की सिक्योरिटी सब से जरूरी है. मैं उम्मीद करता हूं कि भविष्य में ऐसे हादसों से बचने के लिए सख्त नियम और प्रोटोकौल लागू किए जाएंगे.’



इम्तियाज ला रहेहीर रांझा

अलहदा किस्म का सिनेमा बनाने वाले इम्तियाज अली ने साल 2018 मेंलैला मजनूनाम की एक फिल्म बनाई थी, जिस में तृप्ति डिमरी और अविनाश तिवारी ने ये किरदार निभाए थे. फिल्म तो ज्यादा नहीं चल पाई थी, पर अब इम्तियाज अली और एकता कपूर फिल्महीर रांझाले कर रहे हैं, जिस का डायरैक्शन इम्तियाज अली के छोटे भाई साजिद अली करेंगे.
एकता कपूर ने फिल्महीर रांझाकी पहली झलक अपने इंस्टाग्राम पर पोस्ट की और लिखा, ‘कुछ प्रेम कहानियां कभी खत्म नहीं होतीं. लैला मजनू से ले कर हीर रांझा तक, प्यार की यह विरासत आज भी जारी है.’


तापसी चाहे
कंगना से दोस्ती


बता दें कि साल 2018 में आई अनुराग कश्यप की फिल्ममनमर्जियांके प्रमोशन के दौरान एक इंटरव्यू में जब तापसी पन्नू से पूछा गया था कि वे कंगना राणावत को कौन से प्रोडक्ट की सलाह देंगी, तो उन्होंनेडबल फिल्टरकहा था. इसी बात से कंगना राणावत और उन की बहन रंगोली नाराज हो गई थीं और रंगोली ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर तापसी पन्नू कोसस्ती कौपीकह दिया था.
इस के बाद तापसी पन्नू और कंगना राणावत के बीच खींचतान बढ़ती चली गई थी, पर अब तापसी ने कंगना के साथ दोस्ती करने की बात कही है. उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा कि कंगना के लिए उन के मन में कई बुरी फीलिंग नहीं है. वे उन के साथ दोस्ती करने को तैयार हैं और अगर कभी आपस में टकराईं, तो वे उन से इज्जत के साथ मिलेंगी.                              द्य

तेजस्वी प्रकाश कीसाइको सैयां



खूबसूरत तेजस्वी प्रकाश अभी तक तो टैलीविजन पर ही नजर आती थीं, पर अब वे एक वैब सीरीजसाइको सैयांसे ओटीटी पर नजर रही हैं. इस वैब सीरीज में रोमांस से शुरू हुआ एक सफर कैसे जुनून, जलन और पार्टनर को कंट्रोल करने की फितरत में बदल जाता है, यही कहानी है.
इस वैब सीरीज में तेजस्वी प्रकाश के साथ रवि किशन भी बड़े खास किरदार में नजर रहे हैं. साथ में अश्विनी कालेसकर, सुरभि चंदना, अनुद सिंह ढाका, सृष्टि श्रीवास्तव और वरुण भगत भी हैं.

 

Crime Story: डेटिंग ऐप झूठा प्यार और फिरौती

Crime Story: राजस्थान. कभी मोबाइल स्क्रीन पर शुरू हुई एक बातचीत धीरेधीरे भरोसे में बदली. भरोसे से लालच पैदा हुआ और लालच ने हत्या की राह खोल दी. दुष्यंत शर्मा हत्याकांड की कहानी आज भी उतनी ही सिहरन पैदा करती है, जितनी साल 2018 में की थी. अब इसी कहानी में एक नया चैप्टर जुड़ गया है. इस हत्याकांड की मुख्य दोषी प्रिया उर्फ नेहा सेठ एक बार फिर चर्चा में है. इस बार वजह उस की शादी है, जो वह जेल की सलाखों के बीच मिले नए प्रेमी के साथ करने जा रही है.


आजीवन कारावास की सजा काट रही प्रिया सेठ को शादी के लिए 15 दिन की पैरोल दी गई है. जेल के भीतर बना रिश्ता अब सामाजिक रस्मों में बदलने की तैयारी में है. यह खबर सामने आते ही दुष्यंत शर्मा हत्याकांड एक बार फिर लोगों की यादों में ताजा हो गया है. वही सवाल फिर खड़े हो गए हैं. क्या घिनौने अपराध के बाद जिंदगी को नई शुरुआत मिल सकती है या फिर कानून सजा देता है, लेकिन जिंदगी रुकती नहीं?


राजस्थान हाईकोर्ट के निर्देशों के बाद जिला पैरोल एडवाइजरी कमेटी ने प्रिया सेठ की ओर से पेश रिप्रजैंटेशन को स्वीकार करते हुए उसे 15 दिन की पैरोल मंजूर की. इसी के साथ हत्या के एक और दोषी हनुमान प्रसाद को भी पैरोल दी गई. दोनों इस समय जयपुर की खुली जेल में सजा काट रहे हैं.
दिखावे की जिंदगी और बढ़ता लालच प्रिया सेठ की जिंदगी बाहर से जितनी चमकदार दि
खती
थी, अंदर से उतनी ही उलझी हुई थी.

पुलिस जांच में सामने आया था कि वह सोशल मीडिया और डेटिंग ऐप्स के जरीए अमीर नौजवानों से मेलजोल बढ़ाती थी. महंगे कपड़े, ब्रांडेड परफ्यूम, हवाई यात्राएं और आलीशान लाइफ स्टाइल उस का शौक बन चुके थे. बताया गया कि उस का मासिक खर्च तकरीबन डेढ़ लाख रुपए तक पहुंच गया था. इसी दौरान प्रिया सेठ की जिंदगी में दीक्षांत कामरा आया. दोनों के बीच प्रेम संबंध बने और वे लिवइन रिलेशनशिप में रहने लगे. लेकिन दीक्षांत पर तकरीबन 21 लाख रुपए का कर्ज था. यही कर्ज धीरेधीरे एक खतरनाक साजिश की वजह बना.


डेटिंग ऐप से मौत तक
दुष्यंत शर्मा से प्रिया की मुलाकात डेटिंग ऐप टिंडर के जरीए हुई थी. दुष्यंत टिंडर पर विवान कोहली नाम की फर्जी पहचान से मौजूद था. वह शादीशुदा था, लेकिन खुद को दिल्ली का अमीर बिजनैसमैन बताता था. उस की प्रोफाइल एक रईस और कामयाब इनसान की तसवीर पेश करती थी. यही झूठ उस की सब से बड़ी कमजोरी बन गया. 3 महीने तक बातचीत चली. भरोसा गहराया. फरवरी, 2018 में दोनों ने आमनेसामने मिलने का फैसला किया. प्रिया ने दुष्यंत को किराए के मकान में मिलने के लिए बुलाया.

दुष्यंत खुशीखुशी वहां पहुंच गया. उसे अंदाजा नहीं था कि यह मुलाकात पहले से रची गई साजिश का हिस्सा है. जैसे ही दुष्यंत मकान में दाखिल हुआ, प्रिया के साथ मौजूद दीक्षांत कामरा और लक्ष्य वालिया ने उसे काबू में कर लिया. इस के बाद दुष्यंत के परिवार को फिरौती के लिए फोन किया गया. पिता की बेबसी दुष्यंत के पिता रामेश्वर प्रसाद शर्मा को बेटे का फोन आया. कांपती आवाज में दुष्यंत कह रहा था, ‘पापा ये लोग मुझे मार डालेंगे. 10 लाख रुपए दे कर मुझे बचा लीजिए.’


इस के बाद प्रिया सेठ ने फोन छीन लिया और पैसे जमा करने का दबाव बनाने लगी. परिवार के पास इतनी बड़ी रकम नहीं थी. किसी तरह 3 लाख रुपए का इंतजाम किया गया. इस के बावजूद आरोपियों का लालच खत्म नहीं हुआ. सूटकेस में बंद एक जिंदगी पहले दुष्यंत का गला घोंटने की कोशिश की गई, फिर तकिए से उस का मुंह दबाया गया. जब वह फिर भी जिंदा रहा, तो दीक्षांत ने चाकू लाने को कहा. प्रिया चाकू ले कर आई और दुष्यंत का गला काट दिया गया.


हत्या के बाद लाश को सूटकेस में बंद किया गया. पहचान छिपाने के लिए चेहरे पर चाकू से कई वार किए गए. 4 मई, 2018 को जयपुर के बाहर एक गांव में सूटकेस में दुष्यंत की लाश मिली. दुष्यंत के पिता ने 3 मई, 2018 को झोटवाड़ा थाने में अपहरण का मामला दर्ज कराया था. उसी रात आमेर थाना क्षेत्र में लैश मिलने की सूचना ने पूरे मामले को उजागर कर दिया. पुलिस ने तेजी से जांच शुरू की और 4 मई को प्रिया सेठ, दीक्षांत कामरा और लक्ष्य वालिया को गिरफ्तार कर लिया.


अदालत का सख्त फैसला
पूछताछ के दौरान 1-1 कर पूरी साजिश सामने गई. मोबाइल चैट, काल डिटेल्स और दूसरे तकनीकी सुबूतों ने आरोपियों की भूमिका साफ कर दी. बाद में प्रिया सेठ ने भी अपना अपराध स्वीकार कर लिया. उस ने बताया कि यह पूरी योजना उस के प्रेमी दीक्षांत कामरा पर चढ़े तकरीबन 21 लाख रुपए के कर्ज को चुकाने के लिए बनाई गई थी. यह मामला अदालत में चला. अभियोजन पक्ष ने गवाहों के बयान और तकनीकी सुबूतों के आधार पर आरोपियों के खिलाफ मजबूत केस पेश किया.

सुनवाई के बाद अदालत ने 24 नवंबर, 2023 को प्रिया सेठ, दीक्षांत कामरा और लक्ष्य वालिया को भारतीय दंड संहिता की धारा 342, 302, 201 और 120 बी के तहत दोषी ठहराते हुए तीनों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई. आज का सवाल सजा के दौरान प्रिया सेठ की नजदीकियां हत्या के एक और दोषी हनुमान प्रसाद से बढ़ीं. जेल के भीतर बना यह रिश्ता अब शादी तक पहुंच गया है. 15 दिन की पैरोल ने समाज के सामने कई सवाल खड़े कर दिए हैं.


दुष्यंत शर्मा हत्याकांड सिर्फ एक अपराध नहीं है. यह डिजिटल युग में रिश्तों की खतरनाक हकीकत है. झूठी पहचान, दिखावा, लालच और एक गलत फैसला, जिस ने एक नौजवान की जिंदगी छीन ली.
कानून ने सजा दी है, लेकिन पीडि़त परिवार का दर्द आज भी जस का तस है. यही इस खुलासे की सब से कड़वी हकीकत है.                        

राकेश खुडिया

Sociopolitical: गहरी पैठ

Sociopolitical: भारत का किसान आज भी अपनी मेहनत का आधा चौथाई खा पाता है क्योंकि बाकी मंडियों के आढ़तियों, साहूकारों, रिटेलरों, फूड प्रोसैसरों के हाथों छीन लिया जाता है. जो दाम ग्राहक आखिर में देता है वह किसान को मिलने वाले पैसे का 4 गुना होता है. किसानों को दबा कर रखने की आदत सदियों पुरानी है क्योंकि हर राजा अपनी लंबीचौड़ी फौज, अपना महल, अपनी सैकड़ों रानियों, अपने दरबारियों को किसानों की मेहनत के बलबूते ही पालता था. आज भी यह बंद नहीं हुआ जबकि किसानों के पास आज वोट की ताकत है.


किसानों की वोट की ताकतों से बनी सरकारों ने इस तरह से किसानों को बेवकूफ बनाया है कि वे हमेशा यह सोचते रहे हैं कि अगर उन्हें 20 रुपए की जगह 21 रुपए मिल गए तो मानो खजाना टपक पड़ा. वे अब कई दशकों से वोट उन के फायदे की सोचने वाली पार्टी को नहीं, जाति, उपजाति, धर्म, भाषा के नाम पर दे रहे हैं. नेता इस का फायदा इसी तरह से उठा रहे हैं और लूट रहे हैं जैसे पहले राजाओं के कारिंदे राजा की जय बुलवा कर और तलवार की धमकी दे कर लगान वसूलते थे.


मोदी सरकार बड़े जोरशोर से हिंदू किसानों के बचाव की बात करतेकरते आई पर धीरेधीरे उस ने लगातार किसानों को लूटना शुरू कर दिया. डीजल पर टैक्स बढ़ा दिया. कम कीमत की बिजली बंद कर दी. टै्रक्टरों और पंपों पर मिलने वाले टैक्स की छूट कम कर दी. मंडियों के हक बड़ा दिए. सरकारी मामले को औनलाइन का हथियार दे कर तरहतरह के नएनए रजिस्ट्रेशनों के लिए मजबूरकर दिया. किसानों के हालात में सुधार हुए हैं तो सिर्फ तकनीक की वजह से. टै्रक्टर, पंप, थ्रैशर, ट्रौली, ट्रंक, डंपर, जेसीबी मिलने लगे जिन में सरकार का कोई सहयोग नहीं है. किसानों के बच्चे शहरों में भागे हैं और छोटीमोेटी नौकरियां कर के गांव में खेती के नुकसान को पूरा करते नजर रहे हैं.


अब भारत सरकार ने अमेरिकी किसानों को भारत में सामान बेचने के लिए दरवाजे खोल दिए हैं. अमेरिकी किसान कम लोगों से सैकड़ों एकड़ जमीन भारतीय किसानों के मुकाबले कहीं सस्ती फसल पैदा कर लेते हैं. ये फार्म प्रोडक्ट्स पिछली सरकारें भारत में आने से रोकती रही हैं पर अब जीरो टैक्स पर आएंगी और फूड पैकेजिंग कंपनियां इन्हें ही खरीदेंगी क्योंकि उन की कैमिस्ट्री अमेरिकी अनाज पर ही तैयार की गई है. उन्हें जम कर फायदा हो सकता है और भारतीय किसानों को जबरदस्त नुकसान.


नरेंद्र मोदी की सरकार ने एकतरफा फैसला क्यों किया, यह नहीं कहा जा सकता. चीन अमेरिका की किसी धमकी को नहीं मान रहा जबकि हम कभी यूरोप, कभी इंगलैंड और अब अमेरिका की लिखी लाइनों पर साइन करे जा रहे हैं. यह ईस्ट इंडिया कंपनी का जमाना गया है क्या जब किसानों को जबरन नील और अफीम की खेती करनी पड़ती थी और फिर कंपनी के एजेंटों को कम दाम पर बेचनी होती थी?

॥॥॥
भा रत में जुगाड़ तकनीक का बड़ा बोलबाला है. यह नहीं समझें कि हमें टैक्नोलौजी की समझ है इसलिए हम जुगाड़ टाइप की मशीनें बना लेते हैं. असल में हमारे यहां पैसे की कमी होती है और चलताऊ पुरजे जोड़ कर कुछ भी चला लेने की तरकीब अपनाई जाती है. जुगाड़ शब्द का ऐसी गाडि़यां के लिए बहुत इस्तेमाल होता है जो आम डीजल इंजन की चार पहियों वाले फ्रेम के ऊपर फिट कर के बनाए जाते हैं. ये माल लोगों को ढोने के वाहन गांवों में तब तक खूब चले जब तक बड़ी गाडि़यां बनाने वाली कंपनियों ने सरकार से मिल कर इन्हें बंद नहीं करा दिया.


अब दिल्ली सरकार ने कहा है कि जो लोग अपनी पैट्रोल या डीजल की गाड़ी को बिजली के इंजन से चलाएंगे उन्हें सब्सिडी दी जाएगी. सरकार का मकसद है कि लोग 10-20 लाख खर्च कर के पुरानी गाड़ी में लाख से कम से बिजली से चलने वाली मोटर लगा लें. गाड़ी का बहुत सा हिस्सा वैसे ही काम जाएगा. आटो कंपनियां हमेशा की तरह सेफ्टी का मामला ले कर हल्ला मचा रही हैं. असल में सरकार ने तो 10 और 15 साल वाले ट्रकों, बसों और कारों पर जो रोक लगा रखी है उस का धुएं से कम आटो कंपनियों की जेबें भरने से ज्यादा मतलब है. आटो कंपनियों ने सरकार और अदालत से मिल कर यह नियम बनवाया है. वे पैट्रोल डीजल की जगह बिजली मोटर कार में लगाने के खिलाफ हैं क्योंकि इस से उन की नई इलैक्ट्रिक गाडि़यां बिकनी बंद हो जाएंगी.


तिपहिया वाले ईरिकशाओं ने 15 साल पहले जबरन बैटरी रिकशा सड़कों पर डाल कर साफसुथरे, बिना शोर करने वाले किराए के लिए वाहन लोगों को दे दिए थे. जब ये जम कर इस्तेमाल होने लगे तो पुलिस, सरकार, कंपनियां बीच में कूद पड़ीं. उन्होंने वही हल्ला किया जो अब कर रही हैं. पैट्रोलडीजल की कारबस में इलैक्ट्रिक मोटर लगवाने की इजाजत देने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए. अगर यह कामयाब नहीं होगा तो अपनेआप लोग छोड़ देंगे जैसे टाटा की 1 लाख की गाड़ी नैनो को लोगों ने नहीं अपनाया. सरकार का काम जनता की सुविधा बढ़ाना है, गेहूं के ढेर पर बैठा भौंकने वाला कटखना कुत्ता बनना नहीं है. भारत गरीब देश है. लोगों को जुगाड़ का इस्तेमाल करने दो, तभी वे मिल रही तकनीक का फायदा उठा पाएंगे.                                                             

  

Reader Problem: सच्ची सलाह

Reader Problem: मैं 28 साल की लड़की हूं और उत्तर प्रदेश के एक गांव में रहती हूं. मेरा छोटा भाई मोबाइल फोन पर इतना ज्यादा समय बिताता है और रील बनाता है कि हम सब उस से परेशान हो गए हैं. उस की उम्र अभी 24 साल है और वह यही राग गाता है कि रील बना कर पैसे कमाएगा.


इस चक्कर में वह एक दिन अपना मोबाइल फोन ले कर पेड़ पर चढ़ गया और मधुमक्खी का छत्ता छेड़ दिया. इस के बाद मधुमक्खियों ने उस का इतना बुरा हाल किया कि वह पेड़ से नीचे जा गिरा. मोबाइल फोन टूटा, सो अलग. पर इस बात से भी उस ने कोई सबक नहीं लिया. उस के दोस्त भी ऐसे ही हैं. रील बनाने में ऊटपटांग हरकतें करते हैं और अपनी जिंदगी बरबाद कर रहे हैं. मुझे ऐसा क्या करना चाहिए कि मेरे भाई को अक्ल जाए?


अब आप के भाई का सुधरना मुश्किल है, क्योंकि रील बनाने का नशा किसी ड्रग के नशे से कम नहीं होता. फिर भी ये उपाय आजमा कर देखें, शायद कुछ बात बने:
* उसे रील बनाने से रोकने के लिए सख्ती करें और ही डांटेपीटें. इस से वह या कोई सुधरता होता तो दुनिया से यह रोग कभी का खत्म हो जाता.
* उस की बनाई रील्स में दिलचस्पी लें. उस से पूछें कि यह रील बनाने का उस का मकसद क्या था और दर्शकों को इस से क्या मिलेगा.
* उसे रील बनाने के लिए कुछ आइडिया दें, जिन में ज्यादा मेहनत
लगनी हो.
* उसे समझाएं कि फिल्मों की तरह एक अच्छी रील बनाने से पहले उस की स्क्रिप्ट लिखें तो रील में जान जाएगी. इस से उस में लिखने का शौक पैदा होगा.
* कुछ दिन यह सब करने के बाद उस की रील्स की तारीफ करते हुए उसे बताएं कि रील बनाना कोई हर्ज की बात नहीं, लेकिन इस का टाइम फिक्स होना चाहिए. इस से आदत कम हो सकती है. फिर उसे समझाएं कि रील बनाने से जिंदगी नहीं चलती. इस से सिवा समय और पैसे की बरबादी के कुछ हासिल नहीं होता.
  
मेरी उम्र 37 साल है. मैं कानपुर की एक प्राइवेट कंपनी में काम करता हूं. चूंकि मैं मूल रूप से दक्षिण भारत का रहने वाला हूं, तो मुझे कानपुर वालों की एक बात बिलकुल भी अच्छी नहीं लगती कि ज्यादातर लोग पान
और पान मसाले का सेवन करते हैं और सड़क पर ही थूक देते हैं.
सरकारी दफ्तरों के आसपास भी पान की पीक के लाल निशान देखे जा सकते हैं.
प्रशासन ने इस पर जुर्माना भी तय किया हुआ है, पर लोग मानते ही नहीं हैं. ऐसा लगता है कि पूरा कानपुर ही पानमसाले से लाल हो गया है.
इस सब के चलते मुझे रात को नींद नहीं आती है और मैं तनाव में रहता हूं. मैं क्या करूं?
पान गुटखा खा कर कहीं भी पीक थूकना कानपुर का जैसे कल्चर है. इसे बदल पाना मुश्किल है. अकेले आप तो कुछ नहीं कर सकते, लेकिन अपने दफ्तर घर के आसपास के लोगों को समझा सकते हैं.
इन दिनों स्वच्छता अभियान का बड़ा जोर है. अपने लैवल पर इस का प्रचार करें और सोशल मीडिया पर मुहिम चलाएं कि हम कानपुर वाले स्वच्छता
के मामले में इंदौर को पीछे क्यों नहीं छोड़ सकते.
कानपुर पान मसाला, खैनी बनाने का भी गढ़ है, इसलिए भी वहां के लोग यहांवहांपिचपिचकरते रहते हैं और इस पर उन्हें शर्म नहीं आती, बल्कि गर्व होता है.
तो आप इस आदत पर मन ही मन लानत भेजते रहिए और दूसरों के किए गए तनाव को मत पालिए. इस पर भी तनाव कम हो, तो किसी दूसरे शहर में ट्रांसफर करवा लीजिए.          


सच्ची सलाह के लिए कैसी भी परेशानी टैक्स्ट या वौइस मैसेज से भेजें. मोबाइल
नंबर : 08826099608  

Hindi Story: सांवली

Hindi Story: शहर से काफी दूर बसा सज्जनपुर गांव पुराने समय से ही 3 हिस्सों में बंटा था. इस गांव के राजामहाराजा और बड़ेबड़े जमींदार एक जगह बसे थे. उन के सारे मकान पक्के थे. पैसे की कोई कमी नहीं थी, इसलिए उन के बच्चे अपना ज्यादा समय ऐशोआराम में बिताते थे.


दूसरे हिस्से में ब्राह्मण और राजपूत थे. कुछ मुसलिम भी थे. तीसरा हिस्सा पिछड़ी जाति या दलित तबके का था. उन लोगों की बस्ती अलग पहाड़ीनुमा टीले पर थी. उन के घर फूस के बने थे. वे लोग पैसे वाले जमींदारों, राजामहाराजाओं की मेहरबानी पर गुजरबसर कर रहे थे. उस गांव में एक प्राइमरी स्कूल था. 30-40 गांवों के बीच महज एक ही स्कूल था. आसपास की सारी सड़कें कच्ची और बड़ेबड़े गड्ढों वाली थीं.
उन सभी गांवों से स्कूल को जोड़ने वाली सड़कें जब पक्की हो गईं, तो स्कूल भी चल निकला और 2-3 साल में हाईस्कूल बन गया. फिर वहां इंटर तक की पढ़ाई शुरू हो गई थी.


दलित झोंपड़पट्टी का कोई बच्चा वहां पढ़ने नहीं आता था.
कहा जाता है कि महात्मा गांधी और भीमराव अंबेडकर भी एक बार वहां गए थे. दलितों के पक्के मकान बनवाने के वादे भी किए गए थे, पर महात्मा गांधी की हत्या के बाद उन दलितों की सुध लेने वाला कोई नहीं था. एक बार कलक्टर साहब का वहां दौरा हुआ. उन्होंने वहां के लोगों को समझाया कि आप अपने बच्चों को स्कूल क्यों नहीं भेजते हैं? अपने हक की जानकारी होने पर ही आप उस की मांग कर सकते हैं. सरकार बच्चों की सुविधा का खयाल करेगी, पहले उन्हें स्कूल में तो भेजिए.


बहुत समझाने के बाद एक निषाद की बेटी स्कूल जाने को तैयार हुई. फिर उस झोंपड़पट्टी के दूसरे बच्चे भी स्कूल जाने लगे. उस स्कूल के सारे मास्टर ऊंची जाति के थे. उन्हें दलित तबके के बच्चों से नफरत होने लगी, क्योंकि उन के कपड़े अच्छे नहीं होते थे. पैरों में जूते नहीं होते थे. शिष्टाचार की कमी भी थी.
स्कूल जाने वाली पहली दलित लड़की का नाम सांवली था. उसे शुरू से ही अपने कपड़ों का खयाल था. वह शिष्टाचार का पालन भी करती थी. एक तरह से वह सभी दलित बच्चों की हैड गर्ल बन गई थी. धीरेधीरे वह पढ़ने में भी होशियार हो गई.


बड़ीबड़ी आंखें, घुंघराले घने बाल, शरीर भी गठा हुआ. दुबली और मोटी. स्कूल में सब की चहेती थी सांवली. अपने महल्ले में भी सांवली का बहुत आदर होता था. लोग आपस में बात करते हुए कहते थे कि सांवली बड़ी हो कर अफसर बनेगी. कार में घूमेगी. सांवली के पिता मंगरू मल्लाह से लोग कहते, ‘देखो मंगरू, सांवली की पढ़ाई बंद मत करना. रुपएपैसे की किल्लत होगी, तो हम लोग आपस में चंदा कर के पैसे जुटाएंगे.’


जैसेजैसे सांवली बड़ी होती गई, वैसेवैसे उस की खूबसूरती भी बढ़ती गई. 9वीं जमात में आने पर सांवली के बदन पर जवानी भी दस्तक देने लगी थी. जब सांवली 7वीं जमात में थी, तब ऊंची जाति के एक मास्टर ने उस के अंकों को जानबूझ कर घटा दिया था, जिस से एक राजपूत की बेटी क्लास में फर्स्ट गई थी.
सांवली इस बात पर उस मास्टर से लड़ बैठी थी और उस ने हैडमास्टर से शिकायत भी कर दी थी. उन्होंने सांवली के साथसाथ सभी मास्टरों को बुलवा कर कहा था कि जो बच्चे जैसा लिखते हैं, उन्हें उतने ही अंक मिलने चाहिए. इस में जाति का फर्क नहीं होना चाहिए.


उस दिन से सांवली पढ़ने में ज्यादा मन लगाने लगी थी. उस की बस्ती में बिजली नहीं थी, इसलिए वह लालटेन की रोशनी में पढ़ती थी. तेल नहीं रहने पर महल्ले के कई लोग सांवली को तेल भरी लालटेन दे जाते थे. इधर सांवली का पिता मंगरू मल्लाह दिनभर मछली पकड़ता और शाम को नजदीक के बाजार में उन्हें बेचता था. अगर कुछ मछलियां बच जाती थीं, तो जमींदार को भी दे आता था. जमींदार मंगरू को कभी पैसे देते, कभी नहीं भी देते थे. सांवली 9वीं जमात में स्कूलभर में फर्स्ट आई थी. हर जगह उस की चर्चा होने लगी. राज्य सरकार ने अव्वल आने वाली लड़कियों को साइकिल देने का ऐलान किया था. सांवली को भी लाल रंग की साइकिल मिल गई थी.

अब वह साइकिल से ही स्कूल आनेजाने लगी थी. क्लास में लड़कियों की तरफ ताकझांक करने की हिम्मत लड़कों में नहीं थी, पर लंच टाइम में सभी लड़के अपनेअपने ढंग से मनोरंजन करते थे. सभी अपनीअपनी पसंद की लड़की बताते थे. मनोज नाम का लड़का कहता, ‘‘नाम भी सांवली और रंग भी सांवला. सांवली होने के बावजूद यह कितनी अच्छी लगती है. जी करता है कि चूम लूं इसे. लेकिन इशारा करने पर भी नहीं देखती है.’’ यह सुन कर दिनेश ने कहा, ‘‘साइकिल पर घंटी बजाती हुई जब वह हम सब लड़कों के बीच से गुजरती है, तो दिल पर छुरी चला देती है.’’


जमींदार राय साहब के बेटे मधुरेश ने कहा, ‘‘सांवली कहीं अकेले में मिल जाए, तो कसम से मैं इसे सीने से लगा कर चूम लूंगा.’’ अब सांवली 10वीं जमात में थी. बोर्ड के इम्तिहान भी नजदीक रहे थे. सांवली का मन पढ़ाई में ज्यादा लग रहा था. इधर लड़कों का मन पढ़ने से उचट रहा था. उस स्कूल में ही नहीं, आसपास के सभी गांवों में सांवली की चर्चा होने लगी थी. मधुरेश के पिता राय साहब को मालूम हो गया था कि उन का बेटा पढ़ाई में जीरो है और सांवली हीरो.


एक दिन राय साहब ने मधुरेश से पूछा, ‘‘क्या तुम्हारे स्कूल में दलित की बेटी पढ़ाई में फर्स्ट आती है?’’
‘‘सांवली पहले से ही पढ़ाई में तेज है,’’ मधुरेश का जवाब था. एक दिन शाम को जब मंगरू राय साहब के यहां मछली देने आया, तो वे बोल पड़े,  ‘‘मंगरू, मुझे तुझ से जरूरी काम है. इधर .’’ जब मंगरू उन के नजदीक पहुंचा, तो राय साहब ने कहा  ‘‘देखो मंगरू, तुम्हारे खानदान का मेरे खानदान से आज का नाता नहीं है.’’


‘‘हां, सो तो है,’’ मंगरू ने कहा.
‘‘क्या सांवली तुम्हारी बेटी है?’’
‘‘हां सरकार, आप लोगों की दुआ से,’’ मंगरू बोला.
‘‘वह पढ़ाई में बहुत तेज है ?’’
‘‘जी हां मालिक?’’
फिर राय साहब बोल उठे, ‘‘मेरा एक बेटा है और 2 बेटियां हैं. बड़ी बेटी की शादी की बात चल रही है. दूसरी बेटी तो बहुत छोटी है.
‘‘चिंता है तो सिर्फ मधुरेश की. वह 10वीं जमात में गया है, पर उसे आताजाता कुछ नहीं है. अगर तुम्हारी बेटी सांवली उसे थोड़ा पढ़ा दे, तो वह जरूर 10वीं पास कर जाएगा.’’
मंगरू ने कहा, ‘‘अब हम क्या बताएं मालिक, यह तो सांवली ही जाने. वह क्या पढ़ती है, क्या लिखती है, मुझे नहीं मालूम.’’
‘‘देखो मंगरू, सांवली बहुत अच्छी लड़की है. वह तुम्हारी बात नहीं टालेगी. साइकिल से आएगीजाएगी. तुम जितना कहोगे, हम उस को फीस दे दिया करेंगे.’’
‘‘ठीक है मालिक,’’ मंगरू ने हाथ जोड़ कर कहा.


मंगरू रात को जब अपने घर पहुंचा, तो उस ने सांवली को राय साहब की बातें बता दीं. सांवली का कहना था, ‘‘हम दोनों तो 10वीं जमात में ही पढ़ते हैं, फिर मैं कैसे उसे पढ़ा सकती हूं?’’ लेकिन बहुत नानुकर के बाद सांवली राय साहब के यहां जा कर पढ़ाने को राजी हो गई. स्कूल से छूटती, तो सांवली सीधे राय साहब के यहां अपनी साइकिल से पहुंच जाती. मधुरेश को बिन मांगी मुराद पूरी होती नजर आई. 2-3 महीनों के बाद मधुरेश समझ गया कि सांवली बहुत भोली है, घमंड तो उस में बिलकुल नहीं. वह सांवली के गदराए बदन को देखदेख कर मजा उठाता रहा.

लेकिन जब मधुरेश की हिम्मत बढ़ती गई, तो सांवली ने पूछ लिया, ‘‘ऐसे क्यों घूरते हो मुझे?’’
सांवली के मुंह से यह सुन कर मधुरेश बहुत डर गया.
‘‘मधुरेश, तुम मेरी तरफ घूरघूर कर क्यों देखते हो? बोलो ?’’ सांवली ने फिर पूछा.
‘‘जी करता है कि मैं तुम्हें चूम लूं,’’ मधुरेश धीरे से बोला.
सांवली ने कहा, ‘‘तो चूम लो मुझे, पर दूसरी चीज मत मांगना.’’
मधुरेश चुप रहा.
सांवली अपने गालों को उस की तरफ बढ़ाते हुए बोली,  ‘‘तो चूम लो .’’
मधुरेश उस को चूमने लगा, तो सांवली उस के सीने से चिपक गई.
इस तरह मधुरेश और
सांवली का एकदूसरेके प्रति खिंचाव बढ़ता गया.
मैट्रिक बोर्ड का रिजल्ट गया था. सांवली का नंबर पूरे राज्य में पहला था और मधुरेश भी सैकंड डिविजन से पास हो गया था.
रिजल्ट के बाद जब वे दोनों मिले, तो सांवली बोली, ‘‘मधुरेश, तुम मुझे चाहते हो ? शादी करोगे मुझ से?’’
मधुरेश का जवाब था, ‘‘मैं वादा करता हूं.’’
‘‘तो अपने पिताजी को समझाओ.’’
मधुरेश ने कहा, ‘‘पिताजी तो मुझ से ज्यादा तुम से खुश रहते हैं.’’
रात को सांवली ने अपने मातापिता को मधुरेश की बात बता दी.
मंगरू उसे समझाते हुए बोला, ‘‘देखो सांवली, प्यार सिर्फ बड़े लोगों के लिए है, पैसे वालों के लिए है, हम जैसे गरीब को यह सुहाता नहीं है.
‘‘क्या राय साहब अपने बेटे की शादी हम जैसे गरीब निषाद से करेंगे? नामुमकिन. वैसे, राय साहब तुम्हारी
जीभर कर तारीफ करते हैं. देखता हूं कि वे क्या कहते हैं.’’
एक शाम को मंगरू मछली ले कर राय साहब के यहां पहुंचा और उन से हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘सरकार, मैं आप से एक भीख मागने आया हूं.’’
‘‘कैसी भीख? ’’
‘‘आप का बेटा मधुरेश मेरी बेटी
से शादी करना चाहता है,’’ मंगरू ने डरतेडरते कहा.
यह सुनते ही राय साहब अपना आपा खो बैठे और मंगरू पर गरज पड़े, ‘‘तुम्हारी बेटी की हिम्मत कैसे हुई मेरे बेटे पर डोरे डालने की…’’
फिर वे एक मोटा सा डंडा ले
आए और जानवरों की तरह मंगरू पर बरसाने लगे. मंगरू बेहोश हो कर जमीन पर गिर पड़ा. राय साहब के लोगों ने उसे उठा कर सड़क के किनारे पटक दिया. मंगरू के पीटे जाने की खबर चारों ओर फैल गई थी. दलित बस्ती के लोग उग्र हो चुके थे. जल्दी ही मंगरू को अस्पताल पहुंचाया गया. उस की हालत चिंताजनक थी.


सांवली यह खबर सुन कर बेहोश हो गई थी. 2 दिनों के बाद दलित बस्ती के टीले पर गांव वालों की सभा बुलाई गई. तय हुआ कि कोई भी दलित किसी भी काम के लिए ऊंची जाति की बस्ती में कभी कदम नहीं रखेगा. एक महीने बाद राय साहब की बेटी की शादी थी. घर में चहलपहल थी. सारे सामान दूसरे शहर से मंगवाए गए थे. आज राय साहब का घर जश्न में डूबा हुआ था, उधर दलित बस्ती में हाहाकार मचा था, क्योंकि मंगरू दम तोड़ चुका था. दाह संस्कार के बाद सारे गांव वाले थाने पर टूट पड़े. वहां आग लगा दी गई. थानेदार भाग कर राय साहब के घर में छिप गया था. अगले दिन से धीरेधीरे माहौल शांत हो गया, पर राय साहब का घमंड ज्यों का त्यों बना हुआ था.


बरसात का मौसम गया था. सज्जनपुर गांव के बगल का बांध अचानक टूट गया और ऐसी भयंकर बाढ़ आई कि पूरा गांव बह गया. दलितों की बस्ती बहुत ऊंची थी, इसलिए महफूज थी. वहां के लोगों ने अपनीअपनी नावों से बहुत से लोगों को बह जाने से बचाया था. सांवली निषाद की बेटी थी, इसलिए वह अच्छी तैराक भी थी. वह किनारे पर नाव ले कर खड़ी थी कि एक टूटीफूटी नाव में राय साहब का पूरा परिवार खुद को बचा रहा था. नाव में पानी भर गया था. उस में सेसांवली बचाओ’, ‘सांवली बचाओकी आवाजें रही थीं.


सांवली का चाचा चिल्ला उठा, ‘‘उन्हें मत बचाओ सांवली.’’
इतने में राय साहब की नाव पानी से पूरी तरह भर गई थी.
सांवली का दिल पिघल कर मोम हो गया. वह झट से अपनी नाव को बड़ी तेजी से उन की ओर बढ़ाने लगी. राय साहब के परिवार के सारे लोग सांवली की नाव को पकड़ने लगे.
कुछ देर बाद कोई चिल्लाया, ‘‘मधुरेश डूब गया है.’’
सांवली झट से पानी में कूद गई. एक डुबकी के बाद उसे मधुरेश का कुछ
पता नहीं चला, तो उस ने दूसरी बार डुबकी लगाई.


इधर किनारे पर खड़े राय साहब के परिवार के सदस्य रो रहे थे. जब सांवली ने तीसरी बार डुबकी लगाई, तो वह मधुरेश को खींचती हुई पानी से बाहर निकाल लाई. एक नाव में मधुरेश को अस्पताल ले जाया गया. राय साहब का पूरा परिवार वहां था. जैसे ही मधुरेश की आंखें खुलीं, सामने सांवली को देख कर उस ने उस के पैरों में सिर झुका दिया और रोने लगा. मधुरेश को बिलखता देख कर सांवली भी उसे अपनी छाती से लगा कर रोने लगी. राय साहब सिर झुकाए खड़े रहेवे अपने किए पर शर्मिंदा लग रहे थे.   

श्यामानंद झा

Crime Story: धोखाधड़ी-ऐसी भी लूट

Crime Story: रमेश नौकरी की तलाश में था. घर की माली हालत ठीक नहीं होने से अब आगे वह पढ़ते हुए नौकरी करना चाहता था. यहांवहां पूछतेपूछते 2 महीने हो गए थे, लेकिन उसे उस के लायक कहीं काम नहीं मिला.

अचानक रमेश के दिमाग में यह आइडिया कौंध गया, ‘क्यों मैं मोबाइल पर ही यह नौकरी ढूंढ़ लूं?’
गूगल पर सर्च करते ही वर्क फ्रौम होम के जबरदस्त इश्तिहात और वीडियो देख कर रमेश को खुशी हुई.
सिर्फ 2 घंटे मेहनत कर के महीने में एक लाख रुपए कमाओ, कंपनी दे रही है घर बैठे माल, पैंसिल पैकिंग बैस्ट वर्क फ्रौम होम, रिलायंसजिओ में टैलीककौलर की आवश्यताघर से काम करें और कमाएं हजारों रुपए…’

और भी तरहतरह के दसों विज्ञापन स्क्रीन पर उभर आए. रिलायंसजिओ का नाम देख कर रमेश को इस इश्तिहार में दम लगा. उस ने उस की वैबसाइट और औफिस डिटेल्स देख कर कौन्टैक्ट नंबर पर फोन किया. सामने से जवाब संतोषजनक था, ‘रजिस्ट्रेशन के लिए सिर्फ 2,000 रुपए आप को भरना है, हमारा बंदा वहां कर आप को लैपटौप दे जाएगा और साथ ही बताएगा कि घर बैठे कैसे आप को काम करना है?’

रमेश के पास इतने रुपए नही थे. उस ने मांपिता को भी यह बात नहीं बताई, क्योंकि वह जानता था उन के पास इतने रुपए नहीं है और ही बताने पर वे उस की कुछ मदद कर पाएंगेलिहाजा, रमेश ने 2,000 रुपए अपने चाचा से मांगे. चाचा ने उस की जरूरत समझ कर पैसे दे दिए. रमेश ने वे रुपए बैंक जा कर अपने अकाउंट में डाले और फिर जिओ के उस कंपनी अकाउंट पर ट्रांसफर कर दिए.

दूसरे दिन रमेश को फोन आया, ‘आप ने हमारे यहां वर्क फ्रौम होम के लिए रजिस्ट्रेशन किया है. आप को बहुतबहुत बधाई. आप को जल्द से जल्द लैपटौप और अदर एसैसरिज के इंश्योरैंस के लिए 10,000 रुपए भरने होंगे. हम आप से लैपटौप वगैरह का पैसा नहीं ले रहे. ये रुपए इंश्योरैंस कंपनी लेगी. अगर लैपटौप वगैरह खराब होता है, तो यह जिम्मेदारी उन की होगी. आप को जल्द रुपए भरने होंगे वरना आप की फाइल पैंडिंग पड़ी रहेगी.’

रमेश ने कहा, ‘‘सर, मुझे पहले ऐसा नहीं बताया गया था कि इतने रुपए देने होंगे. मैं ने बहुत मुश्किल से उन रुपयों का इंतजाम किया है. आप मेरे रुपए वापस दीजिए प्लीज.’’ जवाब मिला, ‘आप की फाइल बन चुकी है और इसी प्रोसैस के लिए ये रुपए थे. पड़ी है आप की फाइल, हम क्या करें इस फाइल का…’
रमेश ठगा सा रह गया. दिनभर उस का कहीं दिल नहीं लगा, रात में वह बिना खाना खाए ही सो गया.

सिमरन के मोबाइल की घंटी बजी. उसे बताया गया कि फलांफलां प्रतियोगिता में उस के मोबाइल नंबर पर इनाम लगा है, जिस में 50 लाख रुपए कैश उसे मिलने वाले हैं. इस के लिए सिर्फ 3,500 रुपए प्रोसैस फीस उसे देनी है, ताकि जल्द से जल्द प्राइज अमाउंट उस के अकाउंट नंबर पर ट्रांसफर किया जा सके.
सिर्फ 3,500 ही तो देने हैं. मैं अपनी जमा की गई पौकेट मनी में से दे देती हूं,’ यह सोच कर सिमरन मचल उठी थी, लेकिन उस के पिता ने उसे रोक लिया.

गली से आवाज आई, ‘अपना लकी ड्रा खोलें और सिर्फ 3,000 रुपए में पाएं फ्रिज, वाशिंग मशीन…’
संजना ने आवाज सुनी और उसे बुला लिया. उस सेल्समैन ने बताया कि सिर्फ 1,000 रुपए में आप को यह
2 चादरों का एक पैकेट खरीदना है. इस में एक कूपन है. कूपन स्क्रैच करने पर 21 इंच का कलर टीवी, फ्रिज, इंडक्शन सिगड़ी जो भी कूपन पर खुले, उसे 2,000 रुपए दे कर आप को लेना ही पड़ेगा.
मतलब सिर्फ 3,000 रुपए में 2 चादर, फ्रीज या कलर टीवी…’ यह सोच कर संजना ने कूपन लेना तय किया. उसे विश्वास भी था कि लकी ड्रा में इंडक्शन सिगड़ी खुलेगा और हुआ भी यही. 2,000 रुपए में इंडक्शन सिगड़ी उसे लेना ही पड़ा. बिना जरूरत के संजना के 3,000 रुपए खर्च हो गए.

लूट के इन तरीकों में एक नया तरीका सामने आया, जब पता चला कि एक नामचीन मैरिज मैट्रीमोनी का नाम बोल कर किसी ने उस मैट्रीमोनी औफिस के नाम पर 20-25 लोगों से 4 से 5 हजार रुपए ऐंठ लिए.
एक कहावत है किकाली गाय कांटा खाए’. रोजगार की खोज में यहांवहां फंस रहे बेरोजगार नौजवानों के साथ यही हो रहा है. वे नएनए तरह के लालच में फंसते जा रहे हैं. यह साफ करना जरूरी नहीं है कि जो लूट रहे हैं, वे रोजगार नहीं चाहते. हो सकता है उन की भी बुरी हालत हो. भूखे मरने की जगह उन्होंने इस गलत रास्ते को अपना लिया हो.

मतलब यह है कि रोजगार के हालात इतने बदतर हैं कि हर महीने चंद हजार रुपए किए 10-10 घंटे काम करना पड़ रहा है. जरूरत है कि सरकार गांवशहरों में समय के मुताबिक रोजगार के सही रास्ते दिखाने की कोशिश करे और ठगने वालों पर कठोर कानून कार्रवाई करे.  

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