Short Story In Hindi: मन का दाग – सरोज को क्यों भड़का रही थी पड़ोसन

Short Story In Hindi: ‘‘अरे तेरी बहू अब तक सो रही है और तू रसोई में नाश्ता बना रही है. क्या सरोज, तू ने तो अपने को घर की मालकिन से नौकरानी बना लिया,’’ सरोज की पड़ोसिन सुबहसुबह चीनी लेने आई और सरोज को काम करता देख सहानुभूति दिखा कर चली गई. उस के जाने के बाद सरोज फिर से अपने काम में लग गई पर मन में कही पड़ोसिन की बात खटकने लगी. वह सोचने लगी कि पिछले 30 साल से यही तो कर रही है. सुबह का नाश्ता, दोपहर को क्या बनना है, बाजार से क्या लाना है, बच्चों को क्या पसंद है, इसी में सारा दिन निकल जाता है. घर के बाकी कामों के लिए तो बाई आती ही है. बस, बच्चों को अपने हाथ का खाना खिलाने का मजा ही कुछ और है. इतने में सोच में डूबी सरोज के हाथ से प्लेट गिर गई तो पति अशोक ने रसोई में आ कर कहा, ‘‘सरोज, जरा ध्यान से, बच्चे सो रहे हैं.’’

‘‘हांहां, गलती से गिर गई,’’ सरोज ने प्लेट उठा कर ऊपर रख दी. आज से पहले भी छुट्टी वाले दिन सुबह नाश्ता बनाते हुए कभी कोई बरतन गिरता तो अशोक यही कहते कि बच्चे सो रहे हैं. बस, फर्क इतना था तब मेरा बेटा और बेटी सो रहे होते थे और आज बेटा और बहू. आज रविवार था, इसलिए बच्चे इतनी देर तक सो रहे हैं. वरना रोज तो 8 बजे तक औफिस के लिए निकल जाते हैं.

‘‘तुम इतनी सुबहसुबह रसोई में कर क्या रही हो?’’ इन्होंने रसोई में मेरे पास आ कर पूछा.

‘‘कुछ नहीं जी, आज रविवार है. अमन और शिखा की छुट्टी है. सोचा कुछ अच्छा सा नाश्ता बना दूं. बस, उसी की तैयारी कर रही हूं.’’

‘‘ओ अच्छा, फिर तो ठीक है. सुनो, मेरे लिए चाय बना दो,’’ ये अखबार ले कर बैठ गए. इन को चाय दे कर मैं फिर रसोई में लग गई. 10.30 बजे अमन जगा तो चाय लेने रसोई में आया.

‘‘मां, 2 कप चाय बना दो, शिखा भी उठ गई है. बाथरूम गई है. और हां मां, जल्दी तैयार हो जाओ. हम सब फिल्म देखने जा रहे हैं.’’

मैं ने पूछना चाहा कि चाय लेने शिखा क्यों नहीं आई और फिल्म का प्रोग्राम कब बना पर तब तक अमन अपने कमरे में जा चुका था.

‘‘अरे वाह, फिल्म, मजा आ गया. आज की छुट्टी का तो अच्छा इस्तेमाल हो जाएगा. सरोज, मैं तो चला नहाने. तुम मेरी वह नीली वाली कमीज जरा इस्तिरी कर देना,’’ अशोक फिल्म की बात सुन कर खुश हो गए और गुनगुनाते हुए नहाने चले गए. मैं अभी रसोई में ही थी कि शिखा आ गई.

‘‘अरे मम्मी, आप अभी तक यहां ही हैं, 12 बजे का शो है. चलिए, जल्दी से तैयार हो जाइए. चाय मैं बनाती हूं. मम्मी आप वह गुलाबी साड़ी पहनना. वह रंग आप पर बहुत अच्छा लगता है.’’

अमन भी अब तक रसोई में आ गया था. ‘‘शिखा, यह फिल्म का प्रोग्राम कब बना? देखा, मैं ने नाश्ते की सारी तैयारी कर रखी थी…’’ मेरी बात पूरी होने से पहले ही शिखा की जगह अमन बोल पड़ा, ‘‘मम्मी, रात को शिखा ने प्रोग्राम बनाया और फिर इंटरनैट पर ही बुकिंग भी कर ली. अब प्लीज, जल्दी चलो न, मम्मी, नाश्ता हम डिनर में खा लेंगे,’’ अमन ने मेरा हाथ प्यार से पकड़ा और कमरे तक ले आया. बचपन से ही मैं अमन को कभी किसी बात के लिए मना नहीं कर पाती थी. यहां तक कि जब उस ने शिखा को पसंद किया था तब भी मेरी मरजी न होते हुए भी मैं ने हां की ताकि अमन खुश रह सके. अमन जितना चुलबुला और बातूनी था, शिखा उतनी ही शांत थी. मुझे शादी के कुछ ही दिनों में महसूस होने लगा था कि शिखा अमन के अधिकतर फैसले खुद लेती थी, चाहे वह किसी के घर डिनर का हो या कहीं घूमने जाने का. खैर, उस दिन हम चारों ने बहुत मजा किया. फिल्म ठीक थी. पर रात को किसी ने खाना नहीं खाया और मुझे सारा नाश्ता अगले दिन काम वाली को देना पड़ा. मेरी मेहनत खराब हुई और मुझे बहुत दुख हुआ. कुछ दिन के बाद पड़ोस में मेरी सहेली माधुरी के पोते का मुंडन था. मैं ने सोचा मैं ही चली जाती हूं. मैं ने अशोक को फोन कर के बता दिया कि घर पर ताला लगा हुआ है और मैं पड़ोस में जा रही हूं. बच्चे तो रात को लेट ही आते हैं, इसलिए उन्हें बताने की जरूरत नहीं समझी. कुछ ही देर बाद मेरे फोन पर शिखा का फोन आया, ‘‘मम्मी, आप कहां हो, घर पर ताला लगा है. मैं आज जल्दी आ गई.’’

‘‘शिखा, तुम रुको, मैं आती हूं,’’ मैं घर पहुंची तो देखा कि शिखा बुखार से तप रही थी. मैं ने जल्दी से ताला खोला और उसे उस के कमरे में लिटा दिया. बुखार तेज था तो मैं ने बर्फ की पट्टियां उस के माथे पर रख दीं. थोड़ी देर बाद शिखा दवा खा कर सो गई. इतने में दरवाजे की घंटी बजी, माधुरी, जिस का फंक्शन मैं अधूरा छोड़ कर आ गई थी, मुझे मेरा पर्स लौटाने आई थी जो मैं जल्दी में उस के घर भूल आई थी.

‘‘क्या हुआ, सरोजजी, आप जल्दीजल्दी में निकल आईं?’’ माधुरी, जिन्हें मैं दीदी कहती हूं, ने मुझ से पूछा तो मैं ने कहा, ‘‘बस दीदी, बहू घर आ गई थी, थोड़ी तबीयत ठीक नहीं थी उस की.’’

‘‘क्या बात है सरोज, तू भी कमाल करती है, बहू घर जल्दी आ गई तो तू सबकुछ बीच में छोड़ कर चली आई. अरे उस से कहती कि 2 घर छोड़ कर माधुरी के घर में हूं. आ कर चाबी ले जा. सरोज, तेरी बहू को आए अभी सिर्फ 2 महीने ही हुए हैं और तू ने तो उसे सिर पर बिठा लिया है. मुझे देख, 3-3 बहुएं हैं, उन की मजाल है कि कोई मुझे कुछ कह दे. सिर से पल्ला तक खिसकने नहीं देती मैं उन का. पर तू भी क्या करेगी? बेटे की पसंद है, सिर पर तो

बिठानी ही पड़ेगी,’’ माधुरी दीदी न जाने मुझे कौन सा ज्ञान बांट कर चली गईं. पर उन के जाते ही मैं सोच में पड़ गई कि उन्होंने जो कहा वह ठीक था. हर लड़की को शादी के बाद घर की जिम्मेदारियां भी समझनी होती हैं. यह क्या बात हुई, मुझे क्या समझ रखा है शिखा ने. पर अगर शिखा की जगह मेरी बेटी नीति (मेरी बेटी) होती तब भी तो मैं सब छोड़ कर आ जाती. लेकिन बहुओं को घर का काम तो करना ही होता है. शिखा के ठीक होते ही मैं उस से कहूंगी कि सुबह मेरे साथ रसोई में मदद करे. पर वह तो सुबह जल्दी जाती है और रात को देर से आती है और मैं सारा दिन घर पर होती हूं. बहू की मदद के बिना भी काम आराम से हो जाता है. फिर क्यों उस को परेशान करूं. इसी पसोपेश में विचारों को एक ओर झटक कर मैं रात के खाने की तैयारी में जुट गई. बहू की तबीयत ठीक नहीं है उस के लिए कुछ हलका बना देती हूं और अमन के लिए बैगन का भरता. उसे बहुत पसंद है. फिर दिमाग के किसी कोने से आवाज आई 2-2 चीजें क्यों बनानी, बहू इतनी भी बीमार नहीं कि भरता न खा सके. पर दिल ने दिमाग को डांट दिया-नहीं, तबीयत ठीक नहीं है तो हलका ही खाना बनाती हूं. रात को अमन शिखा के लिए खाना कमरे में ही ले गया. मुझे लगा तबीयत कहीं ज्यादा खराब न हो जाए, इसलिए मैं पीछेपीछे कमरे में चली गई. शिखा सोई हुई थी और खाना एक ओर रखा था. अमन लैपटौप पर कुछ काम कर रहा था.

‘‘क्या हुआ, अमन? शिखा ने खाना नहीं खाया?’’

‘‘नहीं, मम्मी, उस को नींद आ रही थी. मैं कुछ देर में खाना रखने आ रहा था. आप आ गई हो तो प्लीज, इसे ले जाओ.’’ अमन फिर लैपटौप पर काम करने लगा. मुझे बहुत गुस्सा आया, एक तो मैं ने उस की बीमारी देखते हुए अलग से खाना बनाया और शिखा बिना खाए सो गई. श्रीमती शर्मा ठीक ही कहती हैं, मैं कुछ ज्यादा ही कर रही हूं. मुझे शिखा की लगाम खींचनी ही पड़ेगी, वरना मेरी कद्र इस घर में खत्म हो जाएगी. अगले दिन मैं रसोई में थी तभी शिखा तैयार हो कर औफिस के लिए निकलने लगी, ‘‘मम्मी, मैं औफिस जा रही हूं.’’

‘‘शिखा, तुम्हारी तो तबीयत ठीक नहीं है, औफिस क्यों जा रही हो?’’ मैं ने पूछा.

‘‘मम्मी, बहुत जरूरी मीटिंग है, टाल नहीं सकती. कल भी जल्दी आ गई थी तो काम अधूरा होगा…’’ अपनी बात खत्म किए बिना ही शिखा औफिस चली गई. मुझे बहुत गुस्सा आया कि कैसी लड़की है, अपने आगे किसी को कुछसमझती ही नहीं. घर में हर किसी को अपने तरीके से चलाना चाहती है. घर की कोई जिम्मेदारी तो समझती नहीं, ऊपर से घर को होटल समझ रखा है…पता नहीं मैं क्याक्या सोचती रही. फिर अपने काम में लग गई. काम खत्म कर के मैं माधुरी दीदी के घर चली गई, जिन के पोते के मुंडन का कार्यक्रम मैं अधूरा छोड़ आई थी. सोचा एक बार जा कर शगुन भी दे आऊं. उन की बहू ने बताया कि माताजी की तबीयत ठीक नहीं है, वे अपने कमरे में हैं. मैं उन के कमरे में ही चली गई. माधुरी दीदी पलंग पर लेटी थीं और उन की दूसरी बहू उन के पैर दबा रही थी. मुझे देख कर उन्होंने अपनी बहू से कहा, ‘‘चल छुटकी, आंटी के लिए चाय बना ला.’’ उन की एक आवाज पर ही उन की बहू उठ कर रसोई में चली गई.

‘‘क्या हुआ, दीदी, आप की तबीयत खराब है क्या?’’ मैं ने पूछा.

‘‘अरे नहीं…कल की थकान है, बस. यों समझ लो कि आज आराम का मन है मेरा,’’ वह मुसकराते हुए बोलीं, ‘‘तेरी बहू की तबीयत कैसी है?’’

‘‘ठीक है, दीदी. औफिस गई है,’’ मैं ने कहा.

‘‘क्या, औफिस गई? देखो तो जरा, कल तक तो इतनी बीमार थी कि 2 घर छोड़ कर चाबी तक लेने नहीं आ पाई. अपनी सास को भगाया और आज औफिस चली गई. सब तेरी ही गलती है, सरोज. तू ने उसे बहुत ढील दे रखी है.

‘‘अरे देख, मेरी बहुओं को, मजाल है कि आवाज निकल जाए इन की मेरे सामने.’’

इतने में छोटी बहू चायपकोड़े रख गई. माधुरी दीदी ने बात आगे शुरू की, ‘‘देख सरोज, मैं ने दुनिया देखी है. इन बहुओं को सिर पर बैठाएगी तो पछताएगी एक दिन. तेरे बेटे को तुझ से दूर कर देगी.’’ तब से वे बोली जा रही थीं और मैं मूक श्रोता बन उन की बातें सुने जा रही थी. दर्द से सिर फटने लगा था. वे बोले जा रही थीं, ‘‘सरोज, मेरी बहन भी तेरी तरह ही बड़ी सीधी है. आज देख उस को, बहुओं ने पूरा घर अपने हाथ में ले लिया.’’ उन्होंने चाय पीनी शुरू कर दी. मुझे कुछ अजीब सा लगने लगा. सिर बहुत भारी हो गया. मैं ने जैसे ही कप उठाया वह छलक कर मेरे कपड़ों पर गिर गया.

‘‘अरे सरोज, आराम से. जा, जल्दी इस को पानी से धो ले वरना निशान पड़ जाएगा.’’

दीदी के कहने पर मैं खुद को संभाल कर बाथरूम की ओर चल पड़ी. बाथरूम की दीवार रसोई के एकदम साथ थी. बाथरूम में खड़े हुए मुझे रसोई में काम कर रही दीदी की बहुओं की आवाजें साफ सुनाई दे रही थीं. ‘‘देखा बुढि़या को, कल सारा वक्त पसर के बैठी थी और फिर भी थक गई,’’ यह आवाज शायद छोटी बहू की थी.

‘‘और नहीं तो क्या, पता नहीं कब यह बुढि़या हमारा पीछा छोड़ेगी. पूरे घर पर कब्जा कर के बैठी है. जल्दी ये मरे और हम घर का बंटवारा कर लें.’’

‘‘हां दीदी, आप के देवर भी यही कहते हैं. कम से कम अपनी मरजी से जी तो पाएंगे. इस के रहते तो हम खुल कर सांस तक नहीं ले सकते.’’

‘‘चल, धीरे बोल. और काम खत्म कर. अगर इस बुढि़या ने सुन लिया तो बस,’’ दोनों दबी आवाज में हंस दीं.

उन दोनों की बात सुन कर मुझे मानो एक धक्का सा लगा, यह कैसी सोच थी उन दोनों की अपनी सास के लिए. पर ठीक ही था, दीदी ने कभी इन दोनों को अपने परिवार का हिस्सा नहीं माना. हाय, मैं भी तो यही करने की सोच रही थी. घर पर अपना ऐसा भी क्या कब्जा कर के रखना कि सामने वाला तुम्हारे मरने का इंतजार करता रहे. अगर मैं दीदी की बातों में आ कर शिखा को बंधन में रखने की कोशिश करती तो घर की शांति ही खत्म हो जाती और कहीं शिखा भी तो मेरे लिए ऐसा ही नहीं सोचने लगती. न न, बिलकुल नहीं, शिखा तो बहुत समझदार है.’’

‘‘क्या हुआ, सरोज, दाग गया या नहीं?’’ बाहर से दीदी की आवाज ने मुझे विचारों से बाहर निकाल दिया.

मैं ने तुरंत बाहर आ कर कहा, ‘‘हां दीदी, सब दाग निकल गए,’’ मैं ने मन में सोचा, ‘साड़ी के भी और मन के भी.’

मैं ने तुरंत घर आ कर शिखा को फोन किया. उस का हालचाल पूछा और उस से जल्दी घर आ कर आराम करने को कहा. फिर मैं रसोई में चली गई रात का खाना बनाने.

आज शिखा के लिए अलग से खाना बनाते हुए मैं ने एक बार भी नहीं सोचा. ऐसा लगा मानो कि अपनी बेटी की बीमारी से परेशान एक मां उस के औफिस से घर आने का इंतजार कर रही हो ताकि वह घर आ कर आराम कर सके. Short Story In Hindi

Hindi Family Story: मेहमान – रवि आखिर क्यों हो रहा था इतना उतावला

Hindi Family Story: रवि ने उस दिन की छुट्टी ले रखी थी. दफ्तर में उन दिनों काम कुछ अधिक ही रहने लगा था. वैसे काम इतना अधिक नहीं था. परंतु मंदी के मारे कंपनी में छंटनी होने का डर था इसलिए सब लोग काम मुस्तैदी से कर रहे थे. बिना वजह छुट्टी कोई नहीं लेता था. क्या पता, छुट्टियां लेतेलेते कहीं कंपनी वाले नौकरी से ही छुट्टी न कर दें.

रवि का दफ्तर घर से 20 किलोमीटर दूर था. वह बस द्वारा भूमिगत रेलवे स्टेशन पहुंचता और वहां से भूमिगत रेलगाड़ी से अपने दफ्तर पहुंचता. 9 बजे दफ्तर पहुंचने के लिए उसे घर से साढ़े सात बजे ही चल देना पड़ता था. उसे सवेरे 6 बजे उठ कर दफ्तर के लिए तैयारी करनी पड़ती थी. वह रोज उठ कर अपने और विभा के लिए सवेरे की चाय बनाता था. फिर विभा उठ कर उस के लिए दोपहर का भोजन तैयार कर डब्बे में रख देती, फिर सुबह का नाश्ता बनाती और फिर रवि तैयार हो कर दफ्तर चला जाता था.

विभा विश्वविद्यालय में एकवर्षीय डिप्लोमा कोर्स कर रही थी. उस की कक्षाएं सवेरे और दोपहर को होती थीं. बीच में 12 से 2 बजे के बीच उस की छुट्टी रहती थी. घर से उस विश्वविद्यालय की दूरी 8 किलोमीटर थी. उन दोनों के पास एक छोटी सी कार थी. चूंकि रवि अपने दफ्तर आनेजाने के लिए सार्वजनिक यातायात सुविधा का इस्तेमाल करता था इसलिए वह कार अधिकतर विभा ही चलाती थी. वह कार से ही विश्वविद्यालय जाती थी. घर की सारी खरीदारी की जिम्मेदारी भी उसी की थी. रवि तो कभीकभार ही शाम को 7 बजे के पहले घर आ पाता था. तब तक सब दुकानें बंद हो जाती थीं. रवि को खरीदारी करने के लिए शनिवार को ही समय मिलता था. उस दिन घर की खास चीजें खरीदने के लिए ही वह रवि को तंग करती थी वरना रोजमर्रा की चीजों के लिए वह रवि को कभी परेशान नहीं होने देती.

रवि को पिताजी के आप्रवास संबंधी कागजात 4 महीने पहले ही मिल पाए थे. उस के लिए रवि ने काफी दौड़धूप की थी. रवि खुश था कि कम से कम बुढ़ापे में पिताजी को भारत के डाक्टरों या अस्पतालों के धक्के नहीं खाने पड़ेंगे. इंगलैंड की चिकित्सा सुविधाएं सारी दुनिया में विख्यात हैं. यहां की ‘राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा’ सब देशों के लिए एक मिसाल है. खासतौर से पिताजी को सारी सुविधाएं 65 वर्ष से ऊपर की उम्र के होने के कारण मुफ्त ही मिलेंगी.

हालांकि भारत से लंदन आना आसान नहीं परंतु 3-3 कमाऊ बेटों के होते उन के टिकट के पैसे जुटाना मुश्किल नहीं था. खासतौर पर जबकि रवि लंदन में अच्छी नौकरी पर था. जब विभा का डिप्लोमा पूरा हो जाएगा तब वह भी कमाने लगेगी.

लंदन में रवि 2 कमरे का मकान खरीद चुका था. सोचा, एक कमरा उन दोनों के और दूसरा पिताजी के रहने के काम आएगा. भविष्य में जब उन का परिवार बढ़ेगा तब कोई बड़ा घर खरीद लिया जाएगा.

पिछले 2 हफ्तों से रवि और विभा पिताजी के स्वागत की तैयारी कर रहे थे. घर की विधिवत सफाई की गई. रवि ने पिताजी के कमरे में नए परदे लगा दिए. एक बड़ा वाला नया तौलिया भी ले आया. पिताजी हमेशा ही खूब बड़ा तौलिया इस्तेमाल करते थे. रवि अखबार नहीं खरीदता था, क्योंकि अखबार पढ़ने का समय ही नहीं मिलता था. किंतु पिताजी के लिए वह स्थानीय अखबार वाले की दुकान से नियमित अखबार देने के लिए कह आया. रवि जानता था कि पिताजी शायद बिना खाए रह सकते हैं परंतु अखबार पढ़े बिना नहीं.

रवि से पूछपूछ कर विभा ने पिताजी की पसंद की सब्जियां व मिठाइयां तैयार कर ली थीं. रवि और विभा की शादी हुए 3 साल होने को जा रहे थे. पहली बार घर का कोई आ रहा था और वह भी पिताजी. रवि और विभा बड़ी बेसब्री से उन के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे.

रवि ने एअर इंडिया वालों को साढ़े 11 बजे फोन किया. सूचना मिली, हवाई जहाज 4 बजे ही पहुंचने वाला था. रवि ने फिर 1 बजे एअर इंडिया के दफ्तर में फोन किया. इस बार एअर इंडिया वाले ने रवि की आवाज पहचान ली. वह झुंझला गया, ‘‘आप के खयाल से क्या हर 5 किलोमीटर के बाद विमानचालक मुझे बताता है कि कब हवाई जहाज पहुंचने वाला है. दिल्ली से सीधी उड़ान है. ठीक समय पर ही पहुंचने की उम्मीद है.’’

उस की बात सुन कर रवि चुप हो गया.

विमान साढ़े 4 बजे लंदन हवाई अड्डे पर उतर गया. रवि ने चैन की सांस ली. पिताजी को सरकारी कार्यवाही निबटाने में कोई परेशानी नहीं हुई. वे साढ़े पांच बजे अपना सामान ले कर बाहर आ गए. रवि पिताजी को देख कर खुशी से नाच उठा. खुशी के मारे उस की आंखों में आंसू आ गए.

विभा ने पिताजी के चरण छुए. फिर उन से उन का एअरबैग ले लिया. रवि ने उन की अटैची उठा ली. शाम के पौने 6 बजे वे घर की ओर रवाना हो गए. उस समय सभी दफ्तरों और दुकानों के बंद होने का समय हो गया था. अत: सड़क पर गाडि़यां ही गाडि़यां नजर आ रही थीं. घर पहुंचतेपहुंचते 8 बज गए. पिताजी सोना चाहते थे. सफर करने के कारण रात को सो नहीं पाए थे. दिल्ली में तो उस समय 2 बजे होंगे. इसलिए उन्हें नींद नहीं आ रही थी. विभा रसोई में फुलके बनाने लगी. रवि ने पिताजी के थैले से चीजें निकाल लीं. पिताजी मिठाई लाए थे. रवि ने मिठाई फ्रिज में रख दी. विभा सब्जियां गरम कर रही थी और साथ ही साथ फुलके भी बना रही थी. हर रोज तो जब वह फुलके बनाती थी तो रवि ‘माइक्रोवेव’ में सब्जियां गरम कर दिया करता था परंतु उस दिन रवि पिताजी के पास ही बैठा था.

विभा ने खाने की मेज सजा दी. रवि और पिताजी खाना खाने आ गए. पिताजी ने बस एक ही फुलका खाया. उन को भूख से अधिक नींद सता रही थी. खाने के पश्चात पिताजी सोने चले गए. रवि बैठक में टीवी चला कर बैठ गया.

विभा ने रवि को बुलाया, ‘‘जरा मेरी मदद कर दो. अकेली मैं क्याक्या काम करूंगी?’’
विभा ने सोचा कि आज रवि को क्या हो गया है? उसे दिखता नहीं कि रसोई का इतना सारा काम निबटाना है बाकी बची सब्जियों को फ्रिज में रखना है. खाने की मेज की सफाई करनी है. हमेशा तो जब विभा बरतन मांजती थी तब रवि रसोई संवारने के लिए ऊपर के सारे काम समेट दिया करता था.

रवि कुछ सकुचाता हुआ रसोई में आया और कुछ देर बाद ही बिना कुछ खास मदद किए बैठक में चला गया. विभा को रसोई का सारा काम निबटातेनिबटाते साढ़े 10 बज गए.

वह बहुत थक गई थी. अत: सोने चली गई.

सवेरे अलार्म बजते ही रवि उठ बैठा और उस ने विभा को उठा दिया, ‘‘कुछ देर और सोने दीजिए. अभी आप ने चाय कहां बनाई है?’’ विभा बोली.

‘‘चाय तुम्हीं बनाओ. पिताजी के सामने अगर मैं चाय बनाऊंगा तो वे क्या सोचेंगे?’’

पिताजी तो पहले ही उठ गए थे. उन को लंदन के समय के अनुसार व्यवस्थित होने में कुछ दिन तो लगेंगे ही. सवेरे की चाय तीनों ने साथ ही पी. रवि चाय पी कर तैयार होने चला गया. विभा दरवाजे के बाहर से सवेरे ताजा अखबार ले आई. पिताजी अखबार पढ़ने लगे. पता नहीं, पिताजी कब और क्या नाश्ता करेंगे?

उस ने खुद पिताजी से पूछ लिया, ‘‘नाश्ता कब करेंगे, पिताजी?’’

‘‘9 बजे कर लूंगा, पर अगर तुम्हें कहीं जाना है तो जल्दी कर लूंगा,’’ पिताजी ने कहा.

तब तक रवि तैयार हो कर आ गया. उस ने तो वही हमेशा की तरह का नाश्ता किया. टोस्ट और दूध में कौर्नफ्लैक्स.

‘‘विभा, पिताजी ऐसा नाश्ता नहीं करेंगे. उन को तो सब्जी के साथ परांठा खाने की आदत है और एक प्याला दूध. तुम कोई सब्जी बना लेना थोड़ी सी. दोपहर को खाने में कल शाम वाली सब्जियां नहीं चलेंगी. दाल और सब्जी बना लेना,’’ रवि बोला. दफ्तर जातेजाते पिताजी की रुचि और सुविधा संबंधी और भी कई बातें रवि विभा को बताता गया.

विभा को 10 बजे विश्वविद्यालय जाना था परंतु पिताजी का नाश्ता और भोजन तैयार करने की वजह से वह पढ़ने न जा सकी.

उस ने 2 परांठे बनाए और आलू उबाल कर सूखी सब्जी बना दी. वह सोचने लगी, ‘पता नहीं भारत में लोग नाश्ते में परांठा और सब्जी कैसे खा लेते हैं? यदि मुझ से नाश्ते में परांठासब्जी खाने के लिए कोई कहे तो मैं तो उसे एक सजा ही समझूंगी.’

‘‘विभा बेटी, मैं जरा नमक कम खाता हूं और मिर्चें ज्यादा,’’ पिताजी ने प्यार से कहा.

‘बापबेटे की रुचि में कितना फर्क है? रवि को मिर्चें कम और नमक ज्यादा चाहिए,’ विभा ने सोचा, ‘कम नमकमिर्च की सब्जियां बनाऊंगी. जिस को ज्यादा नमकमिर्च चाहिए वह ऊपर से डाल लेगा.’

नाश्ते के बाद विभा ने दोपहर के लिए दाल और सब्जी बना ली. यह सब करतेकरते 11 बज गए थे. विभा ने सोचा, ‘पिताजी को 1 बजे खाना खिला कर 2 बजे विश्वविद्यालय चली जाऊंगी.’

साढ़े ग्यारह बजे उस ने फुलके बना कर खाने की मेज पर खाना लगा दिया. पिताजी ने रोटी जैसे ही खाई उन के चेहरे के कुछ हावभाव बदल गए, ‘‘शायद तुम ने सवेरे का गुंधा आटा बाहर छोड़ दिया होगा, इसलिए कुछ महक सी आ रही है,’’ पिताजी बोले.

विभा अपने को अपराधी सी महसूस करने लगी. उस को तो रोटियों में कोई महक नहीं आई, ‘कुछ घंटों पहले ही तो आटा गूंधा था. खैर, आगे से सावधानी बरतूंगी,’ विभा ने सोचा. खाना खातेखाते सवा बारह बज गए. बरतन मांजने और रसोई साफ करने का समय नहीं था. विभा सब काम छोड़ कर विश्वविद्यालय चली गई.
विश्वविद्यालय से घर आतेआते साढ़े चार बज गए. पिताजी उस समय भी सो ही रहे थे. जब उठेंगे तो चाय बनाऊंगी. यह सोच कर वह रसोई संवारने लगी.

पिताजी साढ़े पांच बजे सो कर उठे. वे हिंदुस्तानी ढंग की चाय पीते थे, इसलिए दूध और चायपत्ती उबाल कर चाय बनाई. फल काट दिए और पिताजी की लाई मिठाई तश्तरी में रख दी. चाय के बरतन धोतेधोते साढ़े छह बज गए. वह बैठक में आ गई और पिताजी के साथ टीवी देखने लगी. 7 बजे तक रवि भी आ गया.

‘‘रवि के लिए चाय नहीं बनाओगी, विभा?’’ पिताजी ने पूछा.

विभा हमेशा की तरह सोच रही थी कि रवि दफ्तर से आ कर खाना ही खाना चाहेगा परंतु दिल्ली में लोग घर में 9 बजे से पहले खाना कहां खाते हैं.

‘‘चाय बना दो, विभा. खाने के लिए भी कुछ ले आना. खाना तो 9 बजे के बाद ही खाएंगे,’’ रवि ने कहा.

विभा कुछ ही देर में रवि के लिए चाय बना लाई. रवि चाय पीने लगा.

‘‘शाम को क्या सब्जियां बना रही हो, विभा?’’ रवि ने पूछा.

‘‘सब्जियां क्या बनाऊंगी? कल की तीनों सब्जियां और छोले ज्यों के त्यों भरे रखे हैं. सवेरे की सब्जी और दाल रखी है. वही खा लेंगे,’’ विभा ने कहा.

रवि ने विभा को इशारा करते हुए कुछ इस तरह देखा जैसे आंखों ही आंखों में उस को झिड़क रहा हो.

‘‘बासी सब्जियां खिलाओगी, पिताजी को?’’ रवि रुखाई से बोला.

‘‘मैं तो आज कोई सब्जी खरीद कर लाई ही नहीं. चलिए, बाजार से ले आते हैं. विमलजी की दुकान तो खुली ही होगी. इस बहाने पिताजी भी बाहर घूम आएंगे,’’ विभा ने कहा.

रवि ने अपनी चाय खत्म कर ली थी. वह अपनी चाय का प्याला वहीं छोड़ कर शयनकक्ष में चला गया. विभा को यह बहुत अटपटा लगा. सोचा, ‘क्या हो गया है रवि को? घर में नौकर रख लिए हैं क्या, जो कल से साहब की तरह व्यवहार कर रहे हैं.’

कुछ देर बाद तीनों विमल बाबू की दुकान पर पहुंच गए. रवि की जिद थी कि खूब सारी सब्जियां और फल खरीद लिए जाएं. पिताजी जरा कुछ दूरी पर देसी घी के डब्बे की कीमत देख कर उस की कीमत रुपए में समझने की कोशिश कर रहे थे.

‘‘इतनी सारी सब्जियों का क्या होगा? कहां रखूंगी इन को? फ्रिज में?’’ विभा ने शिकायत के लहजे में कहा.

‘‘जब तक यहां पिताजी हैं तब तक घर में बासी सब्जी नहीं चलेगी. मुझे तुम्हारे पीहर का पता नहीं, परंतु हमारे यहां बासी सब्जी नहीं खाई जाती,’’ रवि दबी आवाज में यह सब कह गया.

विभा को रवि के ये शब्द कड़वे लगे.

‘‘मेरे पीहर वालों का अपमान कर के क्या मिल गया तुम्हें?’’ विभा ने कहा.

घर आते ही रवि ने विभा को ताजी सब्जियां बनाने के लिए कहा. पिताजी ने जिद की कि नई सब्जी बनाने की क्या जरूरत है जबकि दोपहर की सब्जियां बची हैं. विभा की जान में जान आई. अगर सब्जियां बनाने लग जाती तो खाना खातेखाते रात के 11 बज जाते. पिताजी रसोई में ही बैठ गए. रवि भी वहीं खड़ा रहा. वह कभी विभा के काम में हाथ बंटाता और कभी पिताजी से बातें कर लेता. खाना 9 बजे ही निबट गया. रवि और पिताजी टीवी देखने लगे.

विभा रसोई का काम सवेरे पर छोड़ कर अपने अध्ययन कक्ष में चली गई. पढ़तेलिखते रात के 12 बज गए. बीचबीच में रसोई से बरतनों के खड़कने की आवाज आती रही. शायद रवि चाय या दूध तैयार कर रहा होगा अपने और पिताजी के लिए. विभा इतना थक गई थी कि उस की हिम्मत बैठक में जा कर टीवी देखने की भी न थी. बिस्तर पर लेटते ही नींद ने उसे धर दबोचा.
अलार्म की पहली घंटी बजते ही उठ गई विभा. रसोई में चाय बनाने पहुंची. पिताजी को वहां देख कर चौंक गई. पिताजी ने रसोई को पूरी तरह से संवार दिया था. बिजली की केतली में पानी उबल रहा था. मेज पर 3 चाय के प्याले रखे थे.

‘‘आप ने इतनी तकलीफ क्यों की?’’ विभा ने कहा.

‘‘अब मेरी सफर की थकान उतर गई है. मैं यहां यही निश्चय कर के आया था कि सारा दिन टीवी देख कर अपना समय नहीं बिताऊंगा बल्कि अपने को किसी न किसी उपयोगी काम में व्यस्त रखूंगा. तुम अपना ध्यान डिप्लोमा अच्छी तरह से पूरा करने में लगाओ. घर और बाहर के कामों की जिम्मेदारी मुझ पर छोड़ दो,’’ पिताजी बोले.

पिताजी की बात सुन कर विभा की आंखें नम हो गईं. पिताजी ने रवि को आवाज दी. रवि आंखें मलता हुआ आ गया. विभा ने सोचा, ‘रवि इन को मेहमान की तरह रखने की सोच रहा था? पिताजी क्या कभी मेहमान हो सकते हैं?’ Hindi Family Story

Family Story In Hindi: क्षतिपूर्ति – शरद बाबू को किस बात की चिंता सता रही थी

Family Story In Hindi: हरनाम सिंह की जलती हुई चिता देख कर शरद बाबू का कलेजा मुंह को आ रहा था. शरद बाबू को हरनाम के मरने का दुख इस बात से नहीं हो रहा था कि उन का प्यारा दोस्त अब इस दुनिया में नहीं था बल्कि इस बात की चिंता उन्हें खाए जा रही थी कि हरनाम को 2 लाख रुपए शरद बाबू ने अपने बैंक के खाते से निकाल कर दिए थे और जिस की भनक न तो शरद बाबू की पत्नी को थी और न ही हरनाम के घरपरिवार वालों को, उन रुपयों की वापसी के सारे दरवाजे अब बंद हो चुके थे.

हरनाम का एक ही बेटा था और वह भी 10-12 साल का. उस की आंखों से आंसू थम नहीं रहे थे, और प्रीतो भाभी, हरनाम की जवान पत्नी, वह तो गश खा कर मूर्छित पड़ी थी. शरद बाबू ने सोचा कि उन्हें तो अपने 2 लाख रुपयों की पड़ी है, इस बेचारी का तो सारा जहान ही लुट गया है.

मन ही मन शरद बाबू हिसाब लगाने लगे कि 2 लाख रुपयों की भरपाई कैसे कर पाएंगे. चोर खाते से साल में 30-40 हजार रुपए भी एक तरफ रख पाए तो भी कहीं 7-8 साल में 2 लाख रुपए वापस उसी खाते में जमा हो पाएंगे. हरनाम को अगर उन्होंने दुकान के खाते से रुपए दिए होते तो आज उन्हें इतना संताप न झेलना पड़ता. उस समय वे हरनाम की बातों में आ गए थे.

हरनाम ने कहा था कि बस, एकाध साल का चक्कर है. कारोबार तनिक डांवांडोल है. अगले साल तक यह ठीकठाक हो जाएगा. जब सरकार बदलेगी और अफसरों के हाथों में और पैसा खर्च करने के अधिकार आ जाएंगे तब नया माल भी उठेगा और साथ में पुराने डूबे हुए पैसे भी वसूल हो जाएंगे.

शरद बाबू अच्छीभली लगीलगाई 10 साल की सरकारी नौकरी छोड़ कर पुस्तक प्रकाशन के इस संघर्षपूर्ण धंधे में कूद पड़े थे. उन की पत्नी का मायका काफी समृद्ध था. पत्नी के भाई मर्चेंट नेवी में कप्तान थे. बहुत मोटी तनख्वाह पाते थे. बस शरद बाबू आ गए अपनी पत्नी की बातों में. नौकरी छोड़ने के एवज में 10 लाख रुपए मिले और 5 लाख रुपए उन के सालेश्री ने दे दिए यह कह कर कि वे खुद कभी वापस नहीं मांगेंगे. अगर कभी 10-20 साल में शरद बाबू संपन्न हों तो लौटा दें, यह उन पर निर्भर करता है.

शरद बाबू को पुस्तक प्रकाशन का अच्छा अनुभव था. राज्य साहित्य अकादमी का उन का दफ्तर हर साल हजारों किताबें छापता था. जहां दूसरे लोग अपनी सीट पर बैठेबैठे ही लाखों रुपए की हेराफेरी कर लेते वहां शरद बाबू एकदम अनाड़ी थे. दूसरे लोग कागज की खरीद में घपला कर लेते तो कहीं दुकानों को कमीशन देने के मामले में हेरफेर कर लेते, कहीं किताबें लिखवाने के लिए ठेका देने के घालमेल में लंबा हाथ मार लेते. सौ तरीके थे दो नंबर का पैसा बनाने के, मगर शरद बाबू के बस में नहीं था कि किसी को रिश्वत के लिए हुक कर सकें. बकौल उन की पत्नी, शरद बाबू शुरू से ही मूर्ख रहे इस मामले में. पैसा बनाने के बजाय उन्होंने लोगों को अपना दुश्मन बना लिया था. वे अनजाने में ही दफ्तर के भ्रष्टाचार विरोधी खेमे के अगुआ बन बैठे और अब रिश्वत मिलने के सारे दरवाजे उन्होंने खुद ही बंद कर लिए थे.

मन ही मन शरद बाबू चाहते थे कि गुप्त तरीके से दो नंबर का पैसा उन्हें भी मिल जाए मगर सब के सामने उन्होंने अपनी साख ही ऐसी बना ली थी कि अब ठेकेदार व होलसेल वाले उन्हें कुछ औफर करते हुए डरते थे कि कहीं वे शरद बाबू को खुश करतेकरते रिश्वत देने के जुर्म में ही न धर लिए जाएं या आगे का धंधा ही चौपट कर बैठें.

पत्नी बिजनैस माइंडैड थी. शरद बाबू दफ्तर की हरेक बात उस से आ कर डिस्कस करते थे. पत्नी ने शरद बाबू को रिश्वत ऐंठने के हजार टोटके समझाए मगर शरद बाबू जब भी किसी से दो नंबर का पैसा मांगने के लिए मुंह खोलते, उन के अंदर का यूनियनिस्ट जाग उठता और वे इधरउधर की झक मारने लगते. अब यह सब छोड़ कर सलाह की गई कि शरद बाबू अपना धंधा खोलें. 10-12 लाख रुपए की पूंजी से उन दिनों कोई भी गधा आंखें मींच कर यह काम कर सकता था. 5 लाख रुपए उन की पत्नी ने भाई से दिलवा दिए. इन 5 लाख रुपयों को शरद बाबू ने बैंक में फिक्स्ड डिपौजिट करवा दिए. ब्याज दर ही इतनी ज्यादा थी कि 5 साल में रकम डबल हो जाती थी.

शरद बाबू के अनुभव और लगन से किताबें छापने का धंधा खूब चल निकला. हर जगह उन की ईमानदारी के झंडे तो पहले ही गड़े हुए थे. घर की आर्थिक हालत भी अच्छी थी. 5 सालों में ही शरद बाबू ने 10 लाख को 50 लाख में बदल दिया था. पूरे शहर में उन का नाम था. अब हर प्रकार की किताबें छापने लगे थे वे. प्रैस व राजनीतिक सर्कल में खूब नाम होने लगा था.

हरनाम शरद बाबू का लंगोटिया यार था. दरअसल, उसे भी इस धंधे में शरद बाबू ने ही घसीटा था. हरनाम की अच्छीभली मोटर पार्ट्स की दुकान थी. शरद बाबू की गिनती जब से शहर के इज्जतदार लोगों में होने लगी थी, बहुत से पुराने दोस्त, जो शरद बाबू की सरकारी नौकरी के वक्त उन से कन्नी काट गए थे, अब फिर से उन के हमनिवाला व हमखयाल बन गए थे.

हरनाम का मोटर पार्ट्स का धंधा डांवांडोल था. बिजनैस में आदमी एक ही काम से आजिज आ जाता है. दूर के ढोल उसे बहुत सुहावने लगते हैं. इधर, मोटर मार्केट में अनेक दुकानें खुल गई थीं, कंपीटिशन बढ़ गया था और लाभ का मार्जिन कम रह गया था. हरनाम के दिमाग में साहित्यिक कीड़ा हलचल करता रहता था. शरद बाबू से फिर मेलजोल बढ़ा तो इस नामुराद कीड़े ने अपनी हरकत और जोरों से करनी शुरू कर दी थी.

हरनाम ने अपनी मोटर पार्ट्स की दुकान औनेपौने दामों में अगलबगल की और अपनी रिहायशी कोठी में ही एक आधुनिक प्रैस लगवा ली. शुरू में शरद बाबू के कारण उसे काम अच्छा मिला मगर फिर धीरेधीरे उस की पूंजी उधारी में फंसने लगी. सरकारी अफसरों ने रिश्वत ले कर खूब मोटे और्डर तो दिला दिए मगर सरकारी दफ्तरों से बिलों का समय पर भुगतान न होने के कारण हरनाम मुश्किलों में फंसता चला गया.

हरनाम पिछले महीने शरद बाबू से क्लब में मिला तो उन से 2 लाख रुपयों की मांग कर बैठा. शरद बाबू ने कहा कि उन के पैसों का सारा हिसाबकिताब उन की पत्नी देखती है. हरनाम तो गिड़गिड़ाने लगा कि उसे कागज की बिल्टी छुड़ानी है वरना 50 हजार रुपए का और भी नुकसान हो जाएगा. खैर, किसी तरह शरद बाबू ने अपने व्यक्तिगत खाते से रकम निकाल कर दे दी.

किसे पता था कि हरनाम इतनी जल्दी इस दुनिया से चला जाएगा. सोएसोए ही चल बसा. शायद दिल का दौरा था या ब्रेन हैमरेज. आज श्मशान में खड़े लोग हरनाम की तारीफ कर रहे थे कि वह बहुत ही भला आदमी था. इतनी आसान और सुगम मौत तो कम ही लोगों को नसीब होती है.

शरद बाबू सोच रहे थे कि यह नेक बंदा तो अब नहीं रहा मगर उस के साथ नेकी कर के जो 2 लाख रुपए उन्होंने लगभग गंवा दिए हैं, उन की भरपाई कैसे होगी. हरनाम की विधवा तो पहले ही कर्ज के बोझ से दबी होगी.

हरनाम की चिता की लपटें अब और भी तेज हो गई थीं. जब सब लोगों के वहां से जाने का समय आया तो चिता के चारों तरफ चक्कर लगाने के लिए हरेक को एकएक चंदन की लकड़ी का टुकड़ा पकड़ा दिया गया. मंत्रों के उच्चारण के साथ सब को वह टुकड़ा चिता का चक्कर लगाते हुए जलती हुई अग्नि में फेंकना था. शरद बाबू जब चंदन की लकड़ी का टुकड़ा जलती हुई चिता में फेंकने के लिए आगे बढ़े तो एक अनोखा दृश्य उन के सामने आया.

उन्होंने देखा कि चिता में जलती हुई एक मोटी सी लकड़ी के अंतिम सिरे पर सैकड़ों मोटीमोटी काली चींटियां अपनी जान बचाने के लिए प्रयासरत थीं और चिता की प्रचंड आग से बाहर आने के लिए भागमभाग वाली स्थिति में थीं.

एक ठंडी आह शरद बाबू के सीने से निकली. क्या उन के दोस्त हरनाम ने इतने अधिक पाप किए थे कि चिता जलाने के लिए घुन लगी लकड़ी ही नसीब हुई. उन्होंने सोचा कि शायद वह आदमी ही खोटा था जो मरतेमरते उन्हें भी 2 लाख रुपए का चूना लगा गया.

घर आ कर सारी रात सो नहीं पाए शरद बाबू. सुबह अपनी दुकान पर न जा कर वे टिंबर बाजार पहुंच गए. वहां से 3 क्ंिवटल सूखी चंदन की लकड़ी तुलवा कर उन्होंने दुकान के बेसमैंट में रखवा दी और वसीयत करवा दी कि उन के मरने के बाद उन्हें इन्हीं लकडि़यों की चिता दी जाए.

शरद बाबू की पत्नी ने यह सब सुना तो आपे से बाहर हो गईं कि मरें आप के दुश्मन. और ये 3 लाख रुपए की चंदन की लकड़ी खरीदने का हक उन्हें किस ने दिया. शरद बाबू ने हरनाम की चिता में जलती लकड़ी से लिपटती चींटियों का सारा किस्सा पत्नी को सुना दिया और हरनाम द्वारा लिया गया उधार भी बता दिया. पत्नी थोड़ी नाराज हुईं मगर अब क्या किया जा सकता है.

हरनाम को मरे 5 साल हो गए. शरद बाबू अब शहर के मेयर हो गए थे. प्रकाशन का धंधा बहुत अच्छा चल रहा था. स्टोर में रखी चंदन की लकड़ी कब की भूल चुके थे. अब तो उन की नजर सांसद के चुनावों पर थी. एमपी की सीट के लिए पार्टी का टिकट मिलना लगभग तय हो चुका था. होता भी कैसे न, टिकट खरीदने के लिए 2 करोड़ रुपए की राशि पार्टी कार्यालय में पहुंच चुकी थी. कोई दूसरा इतनी बड़ी रकम देने वाला नहीं था.

चुनाव प्रचार के दौरान शरद बाबू एक शाम अपने चुनाव क्षेत्र से लौट रहे थे कि उन का मोबाइल बज उठा. पत्नी का फोन था.

पत्नी ने बताया कि सुबह ही नगर के बड़े सेठ घनश्याम दास की मौत हो गई है. टिंबर बाजार से रामा वुड्स कंपनी का फोन आया था कि सेठ के अंतिम संस्कार के लिए चंदन की लकड़ी कम पड़ रही है. वैसे भी जब से चंदन की तस्करी पर प्रतिबंध लगा है तब से यह महंगी और दुर्लभ होती जा रही है.

शरद बाबू की पत्नी ने उन्हें बताया कि मैं ने दुकान के स्टोर में पड़ी चंदन की लकड़ी बहुत अच्छे दामों में निकाल दी है.

पहले तो शरद बाबू को याद ही नहीं आया कि गोदाम में चंदन की लकड़ी पड़ी है. फिर उन्हें अपने दोस्त हरनाम की मौत याद आ गई और उन की चिता की लकड़ी पर रेंगती चींटियां देख कर भावुक हो कर अपने लिए चंदन की लकड़ी खरीदने का सारा मामला याद आ गया.

उधर, शरद बाबू की पत्नी कह रही थीं, ‘‘10 लाख का मुनाफा दे गई है यह चंदन की लकड़ी. यह समझ लो कि आप के दोस्त हरनाम ने अपने सारे पैसे सूद समेत लौटा दिए हैं.’’

शरद बाबू की आंखें पहली बार अपने दोस्त हरनाम की याद में छलछला उठीं. Family Story In Hindi

Family Story In Hindi: अलमारी का ताला – आखिर क्या थी मां की इच्छा?

Family Story In Hindi: हर मांबाप का सपना होता है कि उन के बच्चे खूब पढ़ेंलिखें, अच्छी नौकरी पाएं. समीर ने बीए पास करने के साथ एक नौकरी भी ढूंढ़ ली ताकि वह अपनी आगे की पढ़ाई का खर्चा खुद उठा सके. उस की बहन रितु ने इस साल इंटर की परीक्षा दी थी. दोनों की आयु में 3 वर्ष का अंतर था. रितु 19 बरस की हुई थी और समीर 22 का हुआ था. मां हमेशा से सोचती आई थीं कि बेटे की शादी से पहले बेटी के हाथ पीले कर दें तो अच्छा है. मां की यह इच्छा जानने पर समीर ने मां को समझाया कि आजकल के समय में लड़की का पढ़ना उतना ही जरूरी है जितना लड़के का. सच तो यह है कि आजकल लड़के पढ़ीलिखी और नौकरी करती लड़की से शादी करना चाहते हैं. उस ने समझाया, ‘‘मैं अभी जो भी कमाता हूं वह मेरी और रितु की आगे की पढ़ाई के लिए काफी है. आप अभी रितु की शादी की चिंता न करें.’’ समीर ने रितु को कालेज में दाखिला दिलवा दिया और पढ़ाई में भी उस की मदद करता रहता.

कठिनाई केवल एक बात की थी और वह थी रितु का जिद्दी स्वभाव. बचपन में तो ठीक था, भाई उस की हर बात मानता था पर अब बड़ी होने पर मां को उस का जिद्दी होना ठीक नहीं लगता क्योंकि वह हर बात, हर काम अपनी मरजी, अपने ढंग से करना चाहती थी.

पढ़ाई और नौकरी के चलते अब समीर ने बहुत अच्छी नौकरी ढूंढ़ ली थी. रितु का कालेज खत्म होते उस ने अपनी जानपहचान से रितु की नौकरी का जुगाड़ कर दिया था. मां ने जब दोबारा रितु की शादी की बात शुरू की तो समीर ने आश्वासन दिया कि अभी उसे नौकरी शुरू करने दें और वह अवश्य रितु के लिए योग्य वर ढूंढ़ने का प्रयास करेगा.

इस के साथ ही उस ने मां को बताया कि वह अपने औफिस की एक लड़की को पसंद करता है और उस से जल्दी शादी भी करना चाहता है क्योंकि उस के मातापिता उस के लिए लड़का ढूंढ़ रहे हैं. मां यह सब सुन घबरा गईं कि पति को कैसे यह बात बताई जाए. आज तक उन की बिरादरी में विवाह मातापिता द्वारा तय किए जाते रहे थे. समीर ने पिता को सारी बात खुद बताना ठीक समझा. लड़की की पिता को पूरी जानकारी दी. पर यह नहीं बताया कि मां को सारी बात पता है. पिता खुश हुए पर कहा, ‘‘अपना निर्णय वे कल बताएंगे.’’

अगले दिन जब पिता ने अपने कमरे से आवाज दी तो वहां पहुंच समीर ने मां को भी वहीं पाया. हैरानी की बात कि बिना लड़की को देखे, बिना उस के परिवार के बारे में जाने पिता ने कहा, ‘‘ठीक है, तुम खुश तो हम खुश.’’ यह बात समीर ने बाद में जानी कि पिता के जानपहचान के एक औफिसर, जो उसी के औफिस में ही थे, से वे सब जानकारी ले चुके थे. एक समय इस औफिसर के भाई व समीर के पिता इकट्ठे पढ़े थे. औफिसर ने बहाने से लड़की को बुलाया था कुछ काम समझाने के लिए, कुछ देर काम के विषय में बातचीत चलती रही और समीर के पिता को लड़की का व्यवहार व विनम्रता भा गई थी. ‘उल्टे बांस बरेली को’, लड़की वालों के यहां से कुछ रिश्तेदार समीर के घर में बुलाए गए. उन की आवभगत व चायनाश्ते के साथ रिश्ते की बात पक्की की गई और बहन रितु ने लड्डुओं के साथ सब का मुंह मीठा कराया. हफ्ते के बाद ही छोटे पैमाने पर दोनों का विवाह संपन्न हो गया. जोरदार स्वागत के साथ समीर व पूनम का गृहप्रवेश हुआ. अगले दिन पूनम के मायके से 2 बड़े सूटकेस लिए उस का मौसेरा भाई आया. सूटकेसों में सास, ससुर, ननद व दामाद के लिए कुछ तोहफे, पूनम के लिए कुछ नए व कुछ पहले के पहने हुए कपड़े थे. एक हफ्ते की छुट्टी ले नवदंपती हनीमून के लिए रवाना हुए और वापस आते ही अगले दिन से दोनों काम पर जाने लगे. पूनम को थोड़ा समय तो लगा ससुराल में सब की दिनचर्या व स्वभाव जानने में पर अधिक कठिनाई नहीं हुई. शीघ्र ही उस ने घर के काम में हाथ बटाना शुरू कर दिया. समीर ने मोटरसाइकिल खरीद ली थी, दोनों काम पर इकट्ठे आतेजाते थे.

समीर ने घर में एक बड़ा परिवर्तन महसूस किया जो पूनम के आने से आया. उस के पिता, जो स्वभाव से कम बोलने वाले इंसान थे, अपने बच्चों की जानकारी अकसर अपनी पत्नी से लेते रहते थे और कुछ काम हो, कुछ चाहिए हो तो मां का नाम ले आवाज देते थे. अब कभीकभी पूनम को आवाज दे बता देते थे और पूनम भी झट ‘आई पापा’ कह हाजिर हो जाती थी. समीर ने देखा कि पूनम पापा से निसंकोच दफ्तर की बातें करती या उन की सलाह लेती जैसे सदा से वह इस घर में रही हो या उन की बेटी ही हो. समीर पिता के इतने करीब कभी नहीं आ पाया, सब बातें मां के द्वारा ही उन तक पहुंचाई जाती थीं. पूनम की देखादेखी उस ने भी हिम्मत की पापा के नजदीक जाने की, बात करने की और पाया कि वह बहुत ही सरल और प्रिय इंसान हैं. अब अकसर सब का मिलजुल कर बैठना होता था. बस, एक बदलाव भारी पड़ा. एक दिन जब वे दोनों काम से लौटे तो पाया कि पूनम की साडि़यां, कपड़े आदि बिस्तर पर बिखरे पड़े हैं. पूनम कपड़े तह कर वापस अलमारी में रख जब मां का हाथ बटाने रसोई में आई तो पूछा, ‘‘मां, आप कुछ ढूंढ़ रही थीं मेरे कमरे में.’’

‘‘नहीं तो, क्या हुआ?’’

पूनम ने जब बताया तो मां को समझते देर न लगी कि यह रितु का काम है. रितु जब काम से लौटी तो पूनम की साड़ी व ज्यूलरी पहने थी. मां ने जब उसे समझाने की कोशिश की तो वह साड़ी बदल, ज्यूलरी उतार गुस्से से भाभी के बैड पर पटक आई और कई दिन तक भाईभाभी से अनबोली रही. फिर एक सुबह जब पूनम तैयार हो साड़ी के साथ का मैचिंग नैकलैस ढूंढ़ रही थी तो देर होने के कारण समीर ने शोर मचा दिया और कई बार मोटरसाइकिल का हौर्न बजा दिया. पूनम जल्दी से पहुंची और देर लगने का कारण बताया. शाम को रितु ने नैकलैस उतार कर मां को थमाया पूनम को लौटाने के लिए. ‘हद हो गई, निकाला खुद और लौटाए मां,’ समीर के मुंह से निकला.

ऐसा जब एकदो बार और हुआ तो मां ने पूनम को अलमारी में ताला लगा कर रखने को कहा पर उस ने कहा कि वह ऐसा नहीं करना चाहती. तब मां ने समीर से कहा कि वह चाहती है कि रितु को चीज मांग कर लेने की आदत हो न कि हथियाने की. मां के समझाने पर समीर रोज औफिस जाते समय ताला लगा चाबी मां को थमा जाता. अब तो रितु का अनबोलापन क्रोध में बदल गया. इसी बीच, पूनम ने अपने मायके की रिश्तेदारी में एक अच्छे लड़के का रितु के साथ विवाह का सुझाव दिया. समीर, पूनम लड़के वालों के घर जा सब जानकारी ले आए और बाद में विचार कर उन्हें अपने घर आने का निमंत्रण दे दिया ताकि वे सब भी उन का घर, रहनसहन देख लें और लड़कालड़की एकदूसरे से मिल लें. पूनम ने हलके पीले रंग की साड़ी और मैचिंग ज्यूलरी निकाल रितु को उस दिन पहनने को दी जो उस ने गुस्से में लेने से इनकार कर दिया. बाद में समीर के बहुत कहने पर पहन ली. रिश्ते की बात बन गई और शीघ्र शादी की तारीख भी तय हो गई. पूनम व समीर मां और पापा के साथ शादी की तैयारी में जुट गए. सबकुछ बहुत अच्छे से हो गया पर जिद्दी रितु विदाई के समय भाभी के गले नहीं मिली.

रितु के ससुराल में सब बहुत अच्छे थे. घर में सासससुर, रितु का पति विनीत और बहन रिचा, जिस ने इसी वर्ष ड्रैस डिजाइनिंग का कोर्स शुरू किया था, ही थे. रिचा भाभी का बहुत ध्यान रखती थी और मां का काम में हाथ बटाती थी. रितु ने न कोई काम मायके में किया था और न ही ससुराल में करने की सोच रही थी. एक दिन रिचा ने भाभी से कहा कि उस के कालेज में कुछ कार्यक्रम है और वह साड़ी पहन कर जाना चाहती है. उस ने बहुत विनम्र भाव से रितु से कोई भी साड़ी, जो ठीक लगे, मांगी. रितु ने साड़ी तो दे दी पर उसे यह सब अच्छा नहीं लगा. रिचा ने कार्यक्रम से लौट कर ठीक से साड़ी तह लगा भाभी को धन्यवाद सहित लौटा दी और बताया कि उस की सहेलियों को साड़ी बहुत पसंद आई. रितु को एकाएक ध्यान आया कि कैसे वह अपनी भाभी की चीजें इस्तेमाल कर कितनी लापरवाही से लौटाती थी. कहीं ननद फिर कोई चीज न मांग बैठे, इस इरादे से रितु ने अलमारी में ताला लगा दिया और चाबी छिपा कर रख ली.

एक दिन शाम जब रितु पति के साथ घूमने जाने के लिए तैयार होने के लिए अलमारी से साड़ी निकाल, फिर ताला लगाने लगी तो विनीत ने पूछा, ‘‘ताला क्यों?’’ जवाब मिला-वह किसी को अपनी चीजें इस्तेमाल करने के लिए नहीं देना चाहती. विनीत ने समझाया, ‘‘मम्मी उस की चीजें नहीं लेंगी.’’

रितु ने कहा, ‘‘रिचा तो मांग लेगी.’’ अगले हफ्ते रितु को एक सप्ताह के लिए मायके जाना था. उस ने सूटकेस तैयार कर अपनी अलमारी में ताला लगा दिया. सास को ये सब अच्छा नहीं लगा. सब तो घर के ही सदस्य हैं, बाहर का कोई इन के कमरे में जाता नहीं, पर वे चुप ही रहीं. मायके पहुंची तो मां ने ससुराल का हालचाल पूछा. रितु ने जब अलमारी में ताला लगाने वाली बात बताई तो मां ने सिर पकड़ लिया उस की मूर्खता पर. मां ने बताया कि यहां ताला पूनम ने नहीं बल्कि मां के कहने पर उस के भाई समीर ने लगाना शुरू किया था और चाबी हमेशा मां के पास रहती थी. ताला लगाने का कारण रितु का लापरवाही से भाभी की चीजों का बिना पूछे इस्तेमाल करना और फिर बिगाड़ कर लौटाना था. यह सब उस की आदतों को सुधारने के लिए किया गया था. वह तो सुधरी नहीं और फिर कितनी बड़ी नादानी कर आई वह ससुराल में अपनी अलमारी में ताला लगा कर. मां ने समझाया कि चीजों से कहीं ऊपर है एकदूसरे पर विश्वास, प्यार और नम्रता. ससुराल में अपनी जगह बनाने के लिए और प्यार पाने के लिए जरूरी है प्यार व मान देना. रितु की दोपहर तो सोच में डूबी पर शाम को जैसे ही भाईभाभी नौकरी से घर लौटे उस ने भाभी को गले लगाया. भाभी ने सोचा शायद काफी दिनों बाद आई है, इसलिए ऐसा हुआ पर वास्तविकता कुछ और थी.

रितु ने देखा यहां अलमारी में कोई ताला नहीं लगा हुआ, वह भी शीघ्र ससुराल वापस जा ताले को हटा मन का ताला खोलना चाहती है ताकि अपनी भूल को सुधार सके, सब की चहेती बन सके जैसे भाभी हैं यहां. एक हफ्ता मायके में रह उस ने बारीकी से हर बात को देखासमझा और जाना कि शादी के बाद ससुराल में सुख पाने का मूलमंत्र है सब को अपना समझना, बड़ों को आदरमान देना और जिम्मेदारियों को सहर्ष निभाना. इतना कठिन तो नहीं है ये सब. कितनी सहजता है भाभी की अपने ससुराल में, जैसे वह सब की और सब उस के हैं. मां के घुटनों में दर्द रहने लगा था. रितु ने देखा कि भाभी ने सब काम संभाल लिया था और रात को सोने से पहले रोज वे मां के घुटनों की मालिश कर देती थीं ताकि वे आराम से सो सकें. अब वही भाभी, जिस के लिए उस के मन में इतनी कटुता थी, उस की आदर्श बनती जा रही थीं.

एक दिन जब पूनम और समीर को औफिस से आने में देर हो गई तब जल्दी कपड़े बदल पूनम रसोई में पहुंची तो पाया रात का खाना तैयार था. मां से पता चला कि खाना आज रितु ने बनाया है, यह बात दूसरी थी कि सब निर्देश मां देती रही थीं. रितु को अच्छा लगा जब सब ने खाने की तारीफ की. पूनम ने औफिस से देर से आने का कारण बताया. वह और समीर बाजार गए थे. उन्होंने वे सब चीजें सब को दिखाईं जो रितु के ससुराल वालों के लिए खरीदी गई थीं. इस इतवार दामादजी रितु को लिवाने आ रहे थे. खुशी के आंसुओं के साथ रितु ने भाईभाभी को गले लगाया और धन्यवाद दिया. मां भी अपने आंसू रोक न सकीं बेटी में आए बदलाव को देख कर. रितु ससुराल लौटी एक नई उमंग के साथ, एक नए इरादे से जिस से वह सब को खुश रखने का प्रयत्न करेगी और सब का प्यार पाएगी, विशेषकर विनीत का.

रितु ने पाया कि उस की सास हर किसी से उस की तारीफ करती हैं, ननद उस की हर काम में सहायता करती है और कभीकभी प्यार से ‘भाभीजान’ बुलाती है, ससुर फूले नहीं समाते कि घर में अच्छी बहू आई और विनीत तो रितु पर प्यार लुटाता नहीं थकता. रितु बहुत खुश थी कि जैसे उस ने बहुत बड़ा किला फतह कर लिया हो एक छोटे से हथियार से, ‘प्यार का हथियार’. Family Story In Hindi

‘Comedy King’ Kapil Sharma अब करेंगे बिजनैस, कनाडा में खोला कैफे

Comedy King Kapil Sharma: कौमेडियन कपिल शर्मा (Kapil Sharma) आज किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं. उन का शो जिसना नाम है ‘द कपिल शर्मा शो’ (The Kapil Sharma Show) सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि विदेश में पौपुलर है और हर कोई उन के इस शो का फैन है. पहले यह शो सोनी टीवी पर आया करता था, लेकिन अब पौपुलर ओटीटी प्लैटफार्म नैटफ्लिक्स ने इस शो के राइट्स ले लिए हैं और काफी समय से यह शो नैटफ्लिक्स पर आ रहा है.

इस शो में कपिल शर्मा (Kapil Sharma) हर हफ्ते सैलिब्रिटीज को बुला कर उन का इंटरव्यू लेते हैं और इस दौरान वे अपनी बातों से लोगों को हंसाहंसा कर लोटपोट कर देते हैं. इस शो में उन का साथ उन के कुछ करीबी दोस्त जैसे कि चंदन प्रभाकर (Chandan Prabhakar), राजीव ठाकुर (Rajiv Thakur), कृष्णा अभिषेक (Krushna Abhishek), सुनील ग्रोवर (Sunil Grover) देते हैं जिस से कि उन का यह शो टीआरपी का आसमान छूता है.

इसी के चलते कपिल शर्मा (Kapil Sharma) की वाइफ गिन्नी ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट के जरीए फैंस को एक खुशखबरी दी है. उन्होंने कुछ तसवीरें शेयर करते हुए बताया कि कपिल शर्मा (Kapil Sharma) ने कनाडा में एक बहुत ही सुंदर सा कैफे खोला है जिस का नाम उन्होंने ‘कैप्स कैफे’ (Kap’s Cafe) रखा है. इस से साफ पता चलता है कि कपिल शर्मा (Kapil Sharma) अब बिजनैस की ओर बढ़ते दिखाई दे रहे हैं.

कपिल शर्मा (Kapil Sharma) के फैंस इस खबर से काफी खुश हैं और उन को बधाई दे रहे हैं. फैंस का यह भी कहना है कि वे अपने शो से काफी कमाई कर रहे हैं. इस से पहले कपिल शर्मा (Kapil Sharma) फिल्म प्रोड्यूसर भी रह चुके हैं और उन्होंने खुद की ही फिल्म ‘फिरंगी‘ (Firangi) भी प्रोड्यूस की है, लेकिन उन की यह फिल्म फ्लौप हो गई थी. अब देखने वाली बात यह होगी कि कपिल शर्मा (Kapil Sharma) का यह नया बिजनैस क्या कमाल करता है. Comedy King Kapil Sharma

Family Crime: मां ने ली बेटे की जान, लाश को आंगन में दफनाया

Family Crime: नशेड़ी निरमैल सिंह मां को मारतापीटता ही नहीं था, बल्कि सीधेसीधे कहता था कि उस के अपने ही किराएदार रविंद्र सिंह से नाजायज संबंध हैं. बेटे की इन्हीं हरकतों से एक ममतामयी मां मजबूर हो कर हत्यारिन बन गई पंजाब के जिला तरनतारन के थाना सरहाली का एक गांव है शेरों. इसी गांव की रहने वाली मनजीत कौर के पति बलवंत सिंह की मृत्यु बहुत पहले हो गई थी. बलवंत सिंह की गांव में खेती की थोड़ी सी जमीन और रहने का अपना मकान था. कुल इतनी जायदाद मनजीत कौर को पति से मिली थी. इस के अलावा वह उसे 2 बेटे और 1 बेटी भी दे गया था.

जब बलवंत सिंह की मौत हुई थी, मनजीत कौर के तीनों बच्चे काफी छोटे थे. पति की मौत के बाद बड़ी मुश्किलों से उस ने तीनों बच्चों को पालपोस कर बड़ा किया. उस का भविष्य और उम्मीदें इन्हीं बच्चों पर टिकी थीं. उस ने सोचा था कि बच्चे बड़े हो कर उस का सहारा बनेंगे. बच्चे किसी लायक हो जाएंगे तो उस के दिन बदल जाएंगे. लेकिन ऐसा हो नहीं सका. क्योंकि एक चीज चुपके से खलनायक की तरह मनजीत कौर के घर में दाखिल हो गई, जो उस के घरपरिवार को तबाही के रास्ते पर ले गई. वह चीज कुछ और नहीं, नशा था, हेरोइन, स्मैक और कैप्सूलों का. यह घातक नशा वैसे भी पंजाब के गांवों में कहर बरपा रहा है. मनजीत कौर के दोनों बेटे बड़े हुए तो उन्हें मेहनत और मशक्कत कर के कमाई करने का नशा लगने के बजाय घर को बरबाद करने वाला नशा लग गया

इसी नशे की वजह से मनजीत कौर का एक बेटा बेवक्त काल के गाल में समा गया. बेटे की बेवक्त मौत ने मनजीत कौर को तोड़ कर रख दिया. एक जवान बेटे की बेवक्त मौत से डरी और घबराई मनजीत कौर को दूसरे बेटे निरमैल सिंह की चिंता सताने लगी. क्योंकि निरमैल सिंह भी नशे का आदी था. चिंतित मनजीत कौर को अचानक खयाल आया कि अगर वह बेटे की शादी कर दे तो शायद उस की नशा करने की आदत छूट जाए. यह खयाल आते ही मनजीत कौर बेटे की शादी के लिए दौड़धूप करने लगी. उस की दौड़धूप का नतीजा यह निकला कि नशेड़ी निरमैल सिंह की गुरप्रीत कौर से शादी हो गई. शादी के बाद निरमैल सिंह में कुछ सुधार नजर आया तो मनजीत कौर को लगा कि धीरेधीरे बेटा सुधर जाएगा. वह नशे के बजाय अपनी शादीशुदा जिंदगी का आनंद लेता दिखाई दिया.

यह देख कर मनजीत कौर ने काफी राहत महसूस की. मगर इस राहत की उम्र बहुत लंबी नहीं थी. शादी के कुछ दिनों बाद तक बीवी के जिस्म की गर्मी में डूबे रहने के बाद निरमैल सिंह फिर से नशे की ओर मुड़ा तो पहले से भी ज्यादा शिद्दत के साथ. इस से घर में जबरदस्त कलहक्लेश रहने लगा. मनजीत कौर की जान आफत में पड़ गई. पहले तो वह अकेली किसी तरह नशेड़ी बेटे से निपट लेती थी, लेकिन घर में बहू के आने से वह कुछ कमजोर सी पड़ गई थी. घर का खर्चा वैसे ही बढ़ गया था, इस के बावजूद अपनी जिम्मेदारियों से लापरवाह निरमैल सिंह जो भी कमाता था, अपने नशे में उड़ा देता था. इस से घर में अशांति और कलह का माहौल बनना स्वाभाविक था. घर के लगातार बिगड़ते माहौल से परेशान मनजीत कौर ने किसी तरह अपनी एकलौती बेटी राज कौर के हाथ पीले कर के उसे विदा कर दिया.

राज कौर की शादी से घर के हालात सुधरने के बजाय और खराब हो गए. उसी बीच नशेड़ी निरमैल एकएक कर के 2 बच्चों का बाप बन गया. बच्चों की जिम्मेदारी कंधों पर आने के बाद भी निरमैल में कोई बदलाव नहीं आया. उस की नशा करने की आदत वैसी की वैसी ही बनी रही. ऐसी हालत में घर का खर्चा कैसे चल सकता था. घर को आर्थिक तंगी से उबारने के लिए चिंतित मनजीत कौर ने घर के एक हिस्से को रविंद्र सिंह को किराए दे दिया.

मां का यह कदम नशेड़ी निरमैल को बिलकुल पसंद नहीं आया. नाराज हो कर उस ने घर में जबरदस्त क्लेश किया. लेकिन जब मनजीत कौर ने किराएदार रखने का अपना फैसला नहीं बदला तो वह खामोश हो गया. अब उस की गिद्धदृष्टि किराए की रकम पर जम गई. किराए से आने वाले पैसे जहां मनजीत कौर का सहारा बन गए थे, वहीं यह बात निरमैल को बरदाश्त नहीं हो रही थीवह किराएदार रविंद्र सिंह से भी इस बात को ले कर झगड़ा करने लगा. वह किराया खुद लेना चाहता था, जबकि रविंद्र किराया मनजीत कौर को देता था. निरमैल की नशे की लत से वाकिफ रविंद्र सिंह किसी भी कीमत पर किराया उसे देने को तैयार नहीं था.

दूसरी ओर नशे में डूबे रहने वाले निरमैल का दिमाग इस तरह खराब रहने लगा था कि वह रिश्तों की मर्यादा तक भूल गया था. वह खीझ और हताशा में किराएदार रविंद्र सिंह और अपनी मां को ले कर उन के चरित्र पर अंगुली उठाने लगा था. मनजीत कौर के लिए यह जीतेजी मरने वाली बात थी. वह एक विधवा औरत थी और उस की उम्र 60 साल के ऊपर हो गई थी. अब इस उम्र में अगर मनजीत कौर के चरित्र पर उस की कोख से जन्मा बेटा ही अंगुली उठाए तो उस के लिए मरने वाली बात थी. बेटे द्वारा चरित्र पर अंगुली उठाने से मनजीत कौर इतनी आहत हुई कि उस ने गुस्से में कहा, ‘‘दुनिया से डर बेटा, इतना भी हद से मत गुजर कि एक दिन मैं यह भी भूल जाऊं कि मैं तेरी मां हूं.’’

मनजीत कौर की इस चेतावनी को निरमैल समझ नहीं सका. नशे ने निरमैल को पूरी तरह नकारा बना दिया था. उस ने कामधंधा करना लगभग बंद कर दिया था. उसे नशे की तलब लगती तो उस की हालत पागलों जैसी हो जाती. वह नशे के लिए मां और पत्नी से पैसे मांगता. पैसे मिलते तो वह उन दोनों से झगड़ा और मारपीट करता. यही नहीं, अंत में वह घर का कोई कीमती सामान उठा ले जाता और बाजार में बेच कर नशे का सामान खरीद लेता. इस हालत में मनजीत कौर के दिल से बेटे के लिए बददुआएं ही निकलतीं. निरमैल के साथ रहना मनजीत कौर की मजबूरी थी. वह तो अपना घर छोड़ सकती थी और अपने नशेड़ी बेटे को. उस से घर से निकलने के लिए जरूर कहती थी. जबकि निरमैल से 2 बच्चों की मां बन चुकी गुरप्रीत कौर के लिए ऐसी कोई मजबूरी नहीं थी. नशेड़ी और निखट्टू पति के दुर्व्यवहार और मारपीट से परेशान हो कर गुरप्रीत कौर एक दिन दोनों बच्चों को ले कर मायके चली गई

मनजीत कौर ने बहू को रोकने की बहुत कोशिश की, लेकिन वह नहीं मानी. उस ने कहा, ‘‘आप का बेटा इंसान नहीं, जानवर है. मुझे अपने बच्चों के भविष्य को देखना है. इस नरक में एक जानवर की बीवी बन कर रहने से कहीं अच्छा होगा कि मैं खुद को बेवा मान कर मायके में ही रहूं.’’ गुरप्रीत कौर चली गई. उस के बाद घर में रह गई मनजीत कौर, निरमैल सिंह और किराएदार रविंद्र सिंह. पत्नी और बच्चों के घर छोड़ कर चले जाने की हताशा में नशेड़ी निरमैल सिंह हिंसक हो उठा. अब उस के निशाने पर सीधे मनजीत कौर और रविंद्र सिंह थे.

मनजीत कौर के चरित्र पर एक बार फिर अंगुली उठा कर निरमैल सिंह किराएदार रविंद्र सिंह को घर से निकालने के लिए कहने लगा. इस पर मनजीत कौर ने बेटे को खरीखोटी सुनाते हुए कहा, ‘‘तुझ जैसे निखट्टू और ऐबी को जोरू तो पहले ही छोड़ कर चली गई. अब किराएदार को भी निकाल दिया तो गुजारा कैसे होगा? 2 वक्त की रूखीसूखी रोटी से भी जाएंगे.’’

‘‘अगर किरादार को नहीं निकालना तो जमीन बेच दो.’’ निरमैल ने कहा.

निरमैल की बात सुन कर मनजीत कौर के शरीर में जैसे आग लग गई. उस ने कहा, ‘‘पुरखों की मेहनत से बनाई गई जमीन तेरे नशे के लिए बेच दूं? ऐसा किसी भी कीमत पर नहीं होगा. अब कभी मुझ से जमीन के बारे में बात मत करना. मैं तुझे बेच दूंगी, पर जमीन नहीं बेचूंगी’’

‘‘लगता है, यह जमीन अपने किराएदार यार के लिए रखेगी.’’ निरमैल ने कहा.

बेटे के मुंह से निकले इन शब्दों से मां का कलेजा छलनी हो गया. वह एक तरह से इंत्तहा थी. जिस हृदय में बेटे के लिए लबालब ममता होती है, मां के उसी हृदय में भयानक नफरत पैदा हो गई. ऐसी भयानक नफरत, जिस के चलते मां वह सब सोचने को मजबूर हो गई, शायद ही कोई विरली जन्म देने वाली मां सोचती है. बेटे के प्रति नफरत से भरी मनजीत कौर के मन में जो सोच पैदा हुई, उसे परिपक्व हो कर इरादे में बदलने में थोड़ा समय लगा. इस बीच वह खुद से ही लड़ती रही. वह जो कुछ करने की सोच रही थी, एक मां के लिए वैसा करना असान नहीं था.

दूसरी ओर मां के अंदर चल रहे अंतर्द्वंद्व से अनजान निरमैल उसे सताने से बाज नहीं रहा था. मां पर हाथ उठाना और उसे गालियां देना उस के लिए आम बात हो गई थी. घर की ऐसी कोई चीज नहीं बची थी, जिसे निरमैल ने अपनी नशे की भट्ठी में स्वाहा नहीं कर दिया था. निरमैल की कोशिश अब यही थी कि किसी भी तरह मनजीत कौर गांव में मौजूद पुरखों की जमीन बेच दे. ऐसा करने के लिए वह उसे मजबूर भी कर रहा था. इस के लिए वह कुछ भी करने को अमादा दिखता था. मनजीत कौर को लगने लगा कि जमीन की खातिर किसी दिन नशेड़ी बेटा उस का गला घोंट देगा

ऐसा खयाल आते ही वह सोच उस पर हावी होने लगी, जिस से वह पिछले काफी दिनों से लड़ रही थी. रिश्ते का मोह टूटते ही मनजीत कौर का दिमाग एक अपराधी की तरह काम करने लगा. जब उस के दिमाग में योजना का एक अस्पष्ट खाका तैयार हो गया तो उस ने अपनी उस योजना में शामिल करने के लिए बेटी राज कौर और दामाद किशन सिंह को अपने घर बुला लिया. अपने भयानक इरादे से बेटी और दामाद को अवगत करा कर मनजीत कौर ने कहा, ‘‘मेरी कोख ही मेरी सब से बड़ी दुश्मन बन गई है. इस ने केवल मुझे सताया है, बल्कि मेरी ममता को भी जलील किया है. नशे ने इसे इंसान से हैवान बना दिया है. लगता है नशे की ही वजह से यह किसी दिन मेरी जान लेने से भी परहेज नहीं करेगा. लेकिन मैं इस के हाथों से मरना नहीं चाहती. जबकि मैं इस की नौबत ही नहीं आने देना चाहती.

ऐसे बेटे के होने और होने से क्या फर्क पड़ता है. मैं ने तुम लोगों को इसलिए  बुलाया है कि अगर मेरा इंसान से हैवान बना बेटा नहीं रहेगा तो मेरे बाद मेरी जमीन और घर के मालिक तुम लोग होगे. अब तुम लोगों को इस बात पर विचार करना है कि मैं जो करने जा रही हूं, उस में मेरा साथ देना है या नहीं?’’ मनजीत कौर क्या चाहती है, यह बेटी और दामाद को समझते देर नहीं लगी. उन्होंने मनजीत कौर का साथ देने की हामी भर दी. बेटे को खत्म करने की अपनी योजना में मनजीत कौर ने बेटी और दामाद को ही नहीं, किराएदार रविंद्र सिंह को भी शामिल कर लिया. इस के बाद में निरमैल को खत्म करने की पूरी योजना बन गई.

हमेशा की तरह 5 सितंबर की रात निरमैल सिंह नशे में डूबा घर आया और रोज की तरह मां से झगड़ा करने के घर के बाहर खुले आंगन में बेसुध सो गया. जब मनजीत कौर को यकीन हो गया कि निरमैल सिंह गहरी नींद सो गया है तो उस ने बड़ी ही खामोशी से बेटी राज कौर, दामाद किशन सिंह और किराएदार रविंद्र सिंह की मदद से गला घोंट कर अपने ही बेटे की हत्या कर दी. अपने इस बेटे से वह इस तरह परेशान और दुखी थी कि उसे मारते हुए उस के हाथ बिलकुल नहीं कांपे. निरमैल की हत्या कर सब ने आंगन की कच्ची जमीन में गड्ढा खोद कर उसी में उस की लाश को गाड़ दिया.

जब कई दिनों तक निरमैल सिंह दिखाई नहीं दिया तो गांव वाले उस के बारे में पूछने लगे. इस तरह निरमैल सिंह का एकाएक गायब हो जाना गांव में चर्चा का विषय बन गया. जितने मुंह उतनी बातें होने लगीं. कोई कहता था कि निरमैल मां से झगड़ा कर के घर छोड़ चला गया है तो कोई कहता कि वह कामधंधे के सिलसिले में कहीं बाहर गया है. लेकिन कुछ लोग दबी जुबान से कुछ दूसरा ही कह रहे थे. जब निरमैल के बारे में कोई सही बात सामने नहीं आई तो गांव के ही किसी मुखबिर ने थाना सरहाली पुलिस को खबर कर दी कि निरमैल का कत्ल हो चुका है और उस के कत्ल में किसी बाहरी व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस के घर वालों का ही हाथ है.

मुखबिर की इस खबर पर थाना सरहाली के थानाप्रभारी सर्वजीत सिंह मामले की तफ्तीश में जुट गए. तफ्तीश की शुरुआत में ही उन्हें लगा कि मुखबिर की खबर में दम है. उन्होंने शक के आधार पर 7 सितंबर को मनजीत कौर को हिरासत में ले लिया और थाने ला कर पूछताछ शुरू कर दी. पहले तो मनजीत कौर झूठ बोल कर पुलिस को गुमराह करने की कोशिश करती रही, लेकिन जब पुलिस ने थोड़ी सी सख्ती की तो उस ने अपने बेटे के कत्ल की बात स्वीकार कर ली. उस ने कहा, ‘‘हां, मैं ने ही अपने बेटे को मारा है और मुझे इस का जरा भी अफसोस नहीं है. क्या करती, नशे ने उसे आदमी से हैवान बना दिया था. उस का मर जाना ही बेहतर था.’’

इस के बाद मनजीत कौर ने निरमैल की हत्या की पूरी कहानी सुना दी. पूरी कहानी सुनने के बाद पुलिस ने मजिस्ट्रेट सुखदेव सिंह की मौजूदगी में आंगन की खुदाई कर के निरमैल सिंह की लाश बरामद कर के पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी. हत्या में सहयोग करने वाली राज कौर, उस के पति किशन सिंह, किराएदार रविंद्र सिंह को भी गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस ने सभी को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

   — कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, Family Crime

Family Story In Hindi: इस में बुरा क्या है – महेश और आभा ने मां के साथ क्या किया

Family Story In Hindi: महेश और आभा औफिस जाने के लिए तैयार हो ही रहे थे कि आभा का मोबाइल बज उठा. आभा ने नंबर देखा, ‘रुक्मिणी है,’ कहते हुए फोन उठाया. कुछ ही पलों बाद ‘ओह, अच्छा, ठीक है,’ कहते हुए फोन रख दिया. चेहरे पर चिंता झलक रही थी. महेश ने पूछा, ‘‘कहीं छुट्टी तो नहीं कर रही है?’’

‘‘3 दिन नहीं आएगी. उस के घर पर मेहमान आए हैं.’’ दोनों के तेजी से चलते हाथ ढीले पड़ गए थे. महेश ने कहा, ‘‘अब?’’

‘‘क्या करें, मैं ने पिछले हफ्ते 2 छुट्टियां ले ली थीं जब यह नहीं आई थी और आज तो जरूरी मीटिंग भी है.’’

‘‘ठीक है, आज और कल मैं घर पर रह लेता हूं. परसों तुम छुट्टी ले लेना,’’ कह कर महेश फिर घर के कपड़े पहनने लगे. उन की 10वीं कक्षा में पढ़ रही बेटी मनाली और चौथी कक्षा में पढ़ रहा बेटा आर्य स्कूल के लिए तैयार हो चुके थे. नीचे से बस ने हौर्न दिया तो दोनों उतर कर चले गए. आभा भी चली गई. महेश ने अंदर जा कर अपनी मां नारायणी को देखा. वे आंख बंद कर के लेटी हुई थीं. महेश की आहट से भी उन की आंख नहीं खुली. महेश ने मां के माथे पर हाथ रख कर देखा, बुखार तो नहीं है?

मां ने आंखें खोलीं. महेश को देखा. अस्फुट स्वर में क्या कहा, महेश को समझ नहीं आया. महेश ने मां को चादर ओढ़ाई, किचन में जा कर उन के लिए चाय बनाई, साथ में एक टोस्ट ले कर मां के पास गए. उन्हें सहारा दे कर बिठाया. अपने हाथ से टोस्ट खिलाया. चाय भी चम्मच से धीरेधीरे पिलाई. 90 वर्ष की नारायणी सालभर से सुधबुध खो बैठी थीं. वे अब कभीकभी किसी को पहचानती थीं. अकसर उन्हें कुछ पता नहीं चलता था. रुक्मिणी को उन्हीं की देखरेख के लिए रखा गया था. रुक्मिणी के छुट्टी पर जाने से बहुत बड़ी समस्या खड़ी हो जाती थी. इतने में साफसफाई और खाने का काम करने वाली मंजू बाई आई तो महेश ने कहा, ‘‘मंजू, देख लेना मां के कपड़े बदलने हों तो बदल देना.’’

मां का बिस्तर गीला था. मंजू ने ही उन्हें सहारा दे कर खड़ा किया. बिस्तर महेश ने बदल दिया. ‘‘मां के कपड़े बदल दो, मंजू,’’ कह कर महेश कमरे से बाहर गए तो मंजू ने नारायणी को साफ धुले कपड़े पहनाए और मां को फिर लिटा दिया.

नारायणी के 5 बेटे थे. सब से बड़ा बेटा नासिक के पास एक गांव में रहता था. बाकी चारों बेटे मुंबई में ही रहते थे. महेश घर में सब से छोटे थे. नारायणी ने हमेशा महेश के ही साथ रहना पसंद किया था. महेश का टू बैडरूम फ्लैट एक अच्छी सोसाइटी में दूसरे फ्लोर पर था. एक वन बैडरूम फ्लैट इसी सोसाइटी में किराए पर दिया हुआ था. पहले महेश उसी में रहते थे पर बच्चों की पढ़ाई और मां की दिन पर दिन बढ़ती अस्वस्थता के चलते बाकी भाइयों के आनेजाने से वह फ्लैट काफी छोटा पड़ने लगा था. तो वे इस फ्लैट में शिफ्ट हो गए थे. मां की सेवा और देखरेख में महेश और आभा ने कभी कोई कमी नहीं छोड़ी थी. कुछ महीनों पहले जब नारायणी चलतीफिरती थीं, रुक्मिणी का ध्यान इधरउधर होने पर सीढि़यों से उतर कर नीचे पहुंच जाती थीं. फिर वाचमैन ही उन्हें ऊपर तक छोड़ कर जाया करता था. महेश के सामने वाले फ्लैट में रहने वाले रिटायर्ड कुलकर्णी दंपती ने हमेशा महेश के परिवार को नारायणी की सेवा करते ही देखा था. उन के दोनों बेटे विदेश में कार्यरत थे. आमनेसामने दोनों परिवारों में मधुर संबंध थे. पर जब से नारायणी बिस्तर तक सीमित हो गई थीं, सब की जिम्मेदारी और बढ़ गई थी.

बच्चे स्कूल से वापस आए तो महेश ने हमेशा की तरह पहले मां को बिठा कर अपने हाथ से खिलाया. उस के औफिस में रहने पर रुक्मिणी ही उन का हर काम करती थी. फिर बच्चों के साथ बैठ कर खुद लंच किया. मां की हालत देख कर महेश की आंखें अकसर भर आती थीं. उसे एहसास था कि उस के पैदा होने के एक साल बाद ही उस के पिता की मृत्यु हो गई थी. पिता गांव के साधारण किसान थे. 5 बेटों को नारायणी ने कई छोटेछोटे काम कर के पढ़ायालिखाया था. अपने बच्चों को सफल जीवन देने में जो मेहनत नारायणी ने की थी उस के कई प्रत्यक्षदर्शी रिश्तेदार थे जिन के मुंह से नारायणी के त्याग की बातें सुन कर महेश का दिल भर आता था. यह भी सच था कि जितनी जिम्मेदारी और देखरेख मां की महेश करते थे उतनी कोई और बेटा नहीं कर पाया था. शायद, इसलिए नारायणी हमेशा महेश के साथ ही रहना पसंद करती थीं.

नारायणी को एक पल के लिए भी अकेला नहीं छोड़ा जाता था, यहां तक कि घूमनेफिरने का प्रोग्राम भी इस तरह बनाया जाता था कि कोई न कोई घर पर उन के पास रहे. मनाली की इस साल 10वीं बोर्ड की परीक्षा थी. तो वह अपनी पढ़ाई में व्यस्त थी. शाम को महेश के बड़े भाई का फोन आया कि वे होली पर मां को देखने सपरिवार आ रहे हैं. मनाली के मुंह से तो सुनते ही निकला, ‘‘पापा, उस दौरान बोर्ड की परीक्षाएंशुरू होंगी. मैं सब लोगों के बीच कैसे पढ़ूंगी?’’ ‘‘ओह, देखते हैं,’’ महेश इतना ही कह पाए. सबकुछ ठीकठाक चल रहा था पर आजकल मां को देखने के नाम पर जो भीड़ अकसर जुटती रहती थी उस से महेश और आभा को काफी असुविधा हो रही थी. हर भाई के 2 या 3 बच्चे तो थे ही, सब आते तो उन की आवभगत में महेश या आभा को औफिस से छुट्टी करनी ही पड़ती थी, ऊपर से बच्चों की पढ़ाई में व्यवधान पड़ता. मां को देखने आने का नाम ही होता, उन के पास बैठ कर उन की सेवा करने की इच्छा किसी की भी नहीं होती. सब घूमतेफिरते, अच्छेअच्छे खाने की फरमाइश करते. भाभियां तो मां के गीले कपड़े बदलने के नाम से ही कोई बहाना कर वहां से हट जातीं. आभा ही रुक्मिणी के साथ मिल कर मां की सेवा में लगी रहती. अब महेश थोड़ा चिंतित हुए, दिनभर सोचते रहे कि क्या करें, मां की तरफ से भी लापरवाही न हो, बच्चों की पढ़ाई में भी व्यवधान न हो.

महेश और आभा दोनों ही मल्टीनैशनल कंपनी में अच्छे पदों पर थे. आर्थिक स्थिति अच्छी ही थी, शायद इसलिए भी दिनभर कई तरह की बातें सोचतेसोचते आखिर एक रास्ता महेश को सूझ ही गया. रात को आभा लौटी तो महेश, भाई के सपरिवार आने का और मनाली की परीक्षाओं का एक ही समय होने के बारे में बताते हुए कहने लगे, ‘‘आभा, दिनभर सोचने के बाद एक बात सूझी है. मैं दूसरा फ्लैट खाली करवा लेता हूं. मां को वहां शिफ्ट कर देते हैं. मां के लिए किसी अतिविश्वसनीय व्यक्ति का उन के साथ रहने का प्रबंध कर देते हैं.’’

‘‘यह क्या कह रहे हो महेश? मां अकेली रहेंगी?’’

‘‘अकेली कहां? हम वहां आतेजाते ही रहेंगे. पूरी नजर रहेगी वहां हमारी. जो भी रिश्तेदार उन्हें देखने के नाम से आते हैं, वहीं रह लेंगे और यहां भी आने की किसी को मनाही थोड़े ही होगी. मैं ने बहुत सोचा है इस बारे में, मुझे इस में कुछ गलत नहीं लग रहा है. थोड़े खर्चे बढ़ जाएंगे, 2 घरों का प्रबंध देखना पड़ेगा, किराया भी नहीं आएगा. लेकिन हम मां की देखरेख में कोई कमी नहीं करेंगे. बच्चों की पढ़ाई भी डिस्टर्ब नहीं होने देंगे.’’

‘‘महेश, यह ठीक नहीं रहेगा? मां को कभी दूर नहीं किया हम ने,’’ आभा की आंखें भर आईं.

‘‘तुम देखना, यह कदम ठीक रहेगा. किसी को परेशानी नहीं होगी. और अगर किसी को भी तकलीफ हुई तो मां को यहीं ले आएंगे फिर.’’

‘‘ठीक है, जैसा तुम्हें ठीक लगे.’’

अगला एक महीना महेश और आभा काफी व्यस्त रहे. दूसरा फ्लैट बस 2 बिल्ंडग ही दूर था. किराएदार भी महेश की परेशानी समझ जल्दी से जल्दी फ्लैट खाली करने के लिए तैयार हो गए. महेश ने स्वयं उन के लिए दूसरा फ्लैट ढूंढ़ने में सहयोग किया. महेश की रिश्तेदारी में एक लता काकी थीं, जो विधवा थीं, जिन की कोई संतान भी नहीं थी. वे कभी किसी रिश्तेदार के यहां रहतीं, कभी किसी आश्रम में चली जातीं. महेश ने उन की खोजबीन की तो पता चला वे पुणे में किसी रिश्तेदार के घर में हैं. महेश खुद कार ले कर उन्हें लेने गए. नारायणी जब स्वस्थ थीं, वे तब कई बार उन के पास मिलने आती थीं. महेश को देख कर लता काफी खुश हुईं और जब महेश ने कहा, ‘‘बस, मैं आप पर ही मां की देखभाल का भरोसा कर सकता हूं काकी, आप उन के साथ रहना, घर के कामों के लिए मैं एक फुलटाइम मेड का प्रबंध कर दूंगा,’’ लता खुशीखुशी महेश के साथ आ गईं.

दूसरा फ्लैट खाली हो गया. एक फुलटाइम मेड राधा का प्रबंध भी हो गया था. एक रविवार को मां को दूसरे फ्लैट में ले जाया जा रहा था. महेश और आभा ने उन के हाथ पकड़े हुए थे. वे बिलकुल अंजान सी साथ चल रही थीं. सामने वाले फ्लैट के मिस्टर कुलकर्णी पूरी स्थिति जानते ही थे. वे कह रहे थे, ‘‘महेशजी, आप ने सोचा तो सही है पर आप की भागदौड़ और खर्चे बढ़ने वाले हैं.’’

‘‘हां, देखते हैं, आगे समझ आ ही जाएगा, यह सही है या नहीं?’’ आभा ने वहां किचन पूरी तरह से सैट कर ही दिया था. लता काकी को सब निर्देश दे दिए गए थे. महेश ने उन्हें यह भी संकेत दे दिया था कि वे उन्हें हर महीने कुछ धनराशि भी जरूर देंगे. वे खुश थीं. उन्हें अब एक ठिकाना मिल गया था. सोसाइटी में पहले तो जिस ने सुना, हैरान रह गया. कई तरह की बातें हुईं. किसी ने कहा, ‘यह तो ठीक नहीं है, बूढ़ी मां को अकेले घर में डाल दिया.’ पर समर्थन में भी लोग थे. उन का कहना था, ‘ठीक तो है, मां जी को देखने इतना आनाजाना होता है, लोगों की भीड़ रहती थी, यह अच्छा विचार है.’ महेश और बाकी तीनों भी मां के आसपास ही रहते, जिस को समय मिलता, वहीं पहुंच जाता. मां अब किसी को पहचानती तो थीं नहीं, पर फिर भी सब ज्यादा से ज्यादा समय वहीं बिताते. वहां की हर जरूरत पर उन का ध्यान रहता. मिस्टर कुलकर्णी ने अकसर देखा था महेश सुबह औफिस जाने से पहले और आने के बाद सीधे वहीं जाते हैं और छुट्टी वाले दिन तो अकसर सामने ताला रहता, मतलब सब नारायणी के पास ही होते. 3 महीने बीत गए. होली पर भाई सपरिवार आए. पहले तो उन्हें यह प्रबंध अखरा पर कुछ कह नहीं पाए. आखिर महेश ही थे जो सालों से मां की सेवा कर रहे थे. मनाली की परीक्षाएं भी बिना किसी असुविधा के संपन्न हो गई थीं. मां की हालत खराब थी. उन्होंने खानापीना छोड़ दिया था. डाक्टर को बुला कर दिखाया गया तो उन्होंने भी संकेत दे दिया कि अंतिम समय ही है. कभी भी कुछ हो सकता है. बड़ी मुश्किल से उन के मुंह में पानी की कुछ बूंदें या जूस डाला जाता. लता काकी को इन महीनों में एक परिवार मिल गया था.

मां को कुछ होने की आशंका से लता काकी हर पल उदास रहतीं और एक रात नारायणी की सांसें उखड़ने लगीं तो लता काकी ने फौरन महेश को इंटरकौम किया. महेश सपरिवार भागे. मां ने हमेशा के लिए आंखें मूंद लीं. सब बिलख उठे. महेश बच्चे की तरह रो रहे थे. आभा ने सब भाइयों को फोन कर दिया. सुबह तक मुंबई में ही रहने वाले भाई पहुंच गए, बाकी रिश्तेदारों का आना बाकी था. सोसाइटी में सुबह खबर फैलते ही लोग इकट्ठा होते गए. भीड़ में लोग हर तरह की बातें कर रहे थे. कोई महेश की सेवा के प्रबंध की तारीफ कर रहा था, वहीं सोसाइटी के ही दिनेशजी और उन की पत्नी सुधा बातें बना रहे थे, ‘‘अंतिम दिनों में अलग कर दिया, अच्छा नहीं किया, मातापिता बच्चों के लिए कितना करते हैं और बच्चे…’’

वहीं खड़े मिस्टर कुलकर्णी से रहा नहीं गया. उन्होंने कहा, ‘‘भाईसाहब, महेशजी ने अपनी मां की बहुत ही सेवा की है, मैं ने अपनी आंखों से देखा है.’’

‘‘हां, पर अंतिम समय में दूर…’’

‘‘दूर कहां, हर समय तो ये सब उन के आसपास ही रहते थे. उन की हर जरूरत के समय, वे कभी अकेली नहीं रहीं, आर्थिक हानिलाभ की चिंता किए बिना महेशजी ने सब की सुविधा का ध्यान रखते हुए जो कदम उठाया था, उस में कुछ भी बुरा नहीं है. आप के बेटेबहू भी तो अपने बेटे को ‘डे केयर’ में छोड़ कर औफिस जाते हैं न, तो इस का मतलब यह तो नहीं है न, कि वे अपने बेटे से प्यार नहीं करते. आजकल की व्यस्तता, बच्चों की पढ़ाई, सब ध्यान में रखते हुए कुछ नए रास्ते सोचने पड़ते हैं. इस में बुरा क्या है. बातें बनाना आसान है. जिस पर बीतती है वही जानता है.  महेशजी और उन का परिवार सिर्फ प्रशंसा का पात्र है, एक उदाहरण है.’’ वहां उपस्थित बाकी लोग मिस्टर कुलकर्णी की बात से सहमत थे. दिनेशजी और उन की पत्नी ने भी अपने कहे पर शर्मिंदा होते हुए उन की बात के समर्थन में सिर हिला दिया था. Family Story In Hindi

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