Hindi Family Story: चक्रव्यूह भेदन – क्या सही थी वान्या की सोच?

Hindi Family Story: जून का महीना था. सुबह के साढ़े 8 ही बजे थे, परंतु धूप शरीर को चुभने लगी थी. दिल्ली महानगर की सड़कों पर भीड़ का सिलसिला जैसे उमड़ता ही चला आ रहा था. बसें, मोटरें, तिपहिए, स्कूटर सब एकदूसरे के पीछे भागे चले जा रहे थे. आंखों पर काला चश्मा चढ़ाए वान्या तेज कदमों से चली आ रही थी. उसे घर से निकलने में देर हो गई थी. वह मन ही मन आशंकित थी कि कहीं उस की बस न निकल जाए. ‘अब तो मुझे यह बस किसी भी तरह नहीं मिल सकती,’ अपनी आंखों के सामने से गुजरती हुई बस को देख कर वान्या ने एक लंबी सांस खींची. अचानक लाल बत्ती जल उठी और वान्या की बस सड़क की क्रौसिंग पर जा कर रुक गई.

वान्या भाग कर बस में चढ़ गई और धक्कामुक्की करती हुई अपने लिए थोड़ी सी जगह बनाने लगी. उस ने इधरउधर दृष्टि दौड़ाई. बस की सारी सीटें भर चुकी थीं. कहींकहीं 2 की सीट पर 3 लोग बैठे थे. कोई और उपाय न देख कर वह भी बस में खड़े अन्य यात्रियों की कतार में खड़ी हो गई. बस में बैठे पुरुषों में से किसी ने भी उठ कर उसे सीट देने की सहानुभूति न जताई. वान्या सोचने लगी, ‘ठीक ही तो है, जब महिलाओं ने घर से निकल कर बाहर की दुनिया में कदम रखा है, तो उन्हें अब अपनी सुकुमारता भी छोड़नी ही होगी.’

हरी बत्ती जल चुकी थी और बस ने क्रौसिंग पार कर के गति पकड़ ली थी. ‘उफ, इतनी गरमी और ऊपर से यह भीड़,’ वान्या पर्स से टिकट के पैसे निकालते हुए बुदबुदाई. वह अपनेआप को संभाल भी नहीं पाई थी कि बस अचानक एक ओर मुड़ी. बस के मुड़ने के साथ ही वान्या सामने की सीट पर बैठे पुरुष यात्रियों के ऊपर जा गिरी. किसी तरह उस ने पर्स से पैसे निकाल कर टिकट खरीदा और बस की छत में लगे पाइप को मजबूती से पकड़ कर खड़ी हो गई.

पड़ोसिन ने एक दिन व्यंग्य कसा था, ‘नौकरी करने में कितना आनंद है, प्रतिदिन अच्छीअच्छी साडि़यां पहनना और सुबहसुबह बनसंवर कर सैर को चल देना.’ ‘उन्हें तो मेरा सिर्फ बननासंवरना ही नजर आता है. बसों में भीड़ के बीच इस तरह पिचके रहना और घंटों हाथ ऊपर कर के खड़े रहना नजर ही नहीं आता. उस पर सारा दिन शिशु सदन में पड़े बच्चों की चिंता अलग से रहती है,’ वान्या अपने विचारों में खोई हुई थी कि अचानक उस ने अपने ऊपर कुछ भार सा महसूस किया. पलट कर देखा तो एक महाशय भीड़ का फायदा उठा कर अनावश्यक रूप से उस के ऊपर झुके जा रहे थे.

‘‘जरा सीधे खड़े रहिए,’’ वान्या खिसियाते हुए बोली.

बस ने गति पकड़ ली थी और इस के साथ ही वान्या के मन की परतें भी उघड़ने लगीं… 

आज तो कपड़े धो कर सूखने के लिए डालना ही भूल गई. सारे कपड़ों में सिलवटें पड़ गई होंगी और शाम को जा कर उन्हें फिर से पानी में निकालना पड़ेगा. सुबहसुबह काम का इतना तूफान मचा होता है कि कुछ होश ही नहीं रहता. बिस्तर से उठते ही सब से पहले पानी का झमेला. इसी बीच पति की चाय की फरमाइश. नौकरीपेशा महिलाओं की जिम्मेदारियां तो दोहरी हो गईं, परंतु पुरुषों की जिम्म्ेदारियां वहीं की वहीं रह गईं. शायद पुरुष यह सोचते हैं कि जब औरत में इतनी सामर्थ्य है कि वह घर का कामकाज संभालने के साथ बाहर का भी कर सकती है तो क्यों न उस के सामर्थ्य का सदुपयोग किया जाए.’

‘वान्या, जरा बाहर देखना, शायद समाचारपत्र आ गया होगा,’ अक्षत ने बिस्तर में लेटेलेटे ही आवाज दी थी. सोनू और लवी अभी सो कर नहीं उठे थे. सो उसे ही समाचारपत्र लाने के लिए बाहर भागना पड़ा था. वह चाय का घूंट भी नहीं ले पाई थी कि उस की कामवाली आ गई थी. फिर तो सारे काम छोड़ कर वह मायारानी की सहायिका बन कर उस के पीछेपीछे घूमती रही. मायारानी को बरतन धोने हैं तो पानी गरम कर के वह दे, उसे झाड़ू मारनी है तो सोफा, टेबल वह खिसकाए. माया की बच्ची रोए तो उसे भी चुप कराए. फिर मायारानी का काम समाप्त होने पर उसे चाय बना कर पिलाए. उसे दफ्तर के लिए देर माया के कारण ही हुई थी.

वान्या चिल्लाती रही, ‘माया, जल्दी, चाय पी ले, मुझे दफ्तर को देर हो रही है.’ पर वह बालकनी में बैठी अपनी 2 वर्षीया बेटी कमली को खिलाने में लगी थी.

‘तू यहां क्या कर रही है माया, अभी कमरे में पोंछा लगाना बाकी है.’आवाज सुनते ही वह हड़बड़ा कर उठी थी और पोंछा लगाने के लिए चल पड़ी थी. वान्या सोनू के टिफिन में सैंडविच डाल कर लवी की शिशु सदन की टोकरी तैयार करने लगी थी. दूध की बोतल, बदलने के लिए फ्रौक, बिस्कुट, फल आदि सबकुछ उस ने ध्यान से टोकरी में रख दिया था. अब सिर्फ लवी को दलिया खिलाना बाकी था. उस ने अक्षत को आवाज दी, ‘सुनो जी, जरा लवी को दलिया खिला देना, मैं सोनू की कमीज में बटन टांक रही हूं.’

‘वान्या, तुम मुझे प्रतिदिन दफ्तर के लिए देर कराती हो. अभी मुझे स्वयं भी तैयार होना है, सोनू को बस तक छोड़ना है.’ शिशु सदन का नाम सुनते ही वान्या की 3 वर्षीया बेटी लवी बिफर पड़ी थी, ‘मैं नहीं जाऊंगी वहां.’ लवी का यह रोनाधोना और फिर उसे मनाना उस का प्रतिदिन का काम था. 10-15 मिनट का समय तो इसी में निकल जाता था. वान्या लवी के आंसू पोंछ कर उसे पुचकारने लगी थी.

‘मैं तो कहता हूं वान्या, तुम यह नौकरी छोड़ दो. मेरा वेतन अब इतना तो हो ही चुका है कि मैं तुम्हारी नौकरी के बिना भी घर का खर्च चला सकता हूं,’ अक्षत ने गुसलखाने में जातेजाते कहा था. शायद अपनी लाड़ली बेटी को रोता हुआ देख कर उस का हृदय द्रवित हो उठा था. ‘तुम्हारी यह बेटी जरा सा रोई नहीं कि तुम तुरंत मेरी नौकरी छुड़वाने के बारे में सोचने लगते हो. याद नहीं तुम्हें, कितनी मुश्किलों से मिली है मुझे यह नौकरी,’ वान्या अक्षत को बीते दिनों की याद दिलाना चाहती थी.

अक्षत को कार्यालय के लिए देर हो रही थी. वह नहाने के लिए गुसलखाने की ओर चला गया और वान्या सोचती रही, ‘कितने पापड़ बेले हैं इस नौकरी को पाने के लिए और आज चार पैसे घर में लाने लगी हूं तभी तो थोड़ा सलीके से रह पा रहे हैं. इस नौकरी के पहले तो न उन के पास ढंग के कपड़ेलत्ते होते थे और न ही कोई कीमती सामान. उसे तो सिर्फ 2-4 साडि़यों में ही गुजारा करना पड़ता था. बेचारे सोनू के पास तो केवल 2 ही स्वेटर हुआ करते थे. अक्षत के पास स्कूटर तो क्या साइकिल भी नहीं हुआ करती थी. बस स्टौप तक पहुंचने के लिए उन्हें काफी दूर तक पैदल चलना पड़ता था. उन दिनों प्रतिदिन रिकशे का भाड़ा भी तो देने की सामर्थ्य नहीं थी उन में. एक बच्चे को भी वह पूरा पौष्टिक आहार नहीं दे पाती थी.

‘नहींनहीं, कभी नहीं छोड़ूंगी मैं यह नौकरी,’ वान्या सोचतेसोचते मुखर हो उठी थी.

डै्रसिंग टेबल के सामने खड़ा अक्षत उसे तिरछी नजरों से देख रहा था. शायद वह वान्या की मनोस्थिति को समझने की कोशिश कर रहा था. वान्या सोनू को नाश्ते के लिए आवाज लगा कर उस का बैग स्कूटर पर रखने लगी थी. अक्षत ने स्कूटर स्टार्ट किया तो उस ने स्कूटर के पीछे बैठे सोनू के सिर पर प्यार से हाथ फेरा. 10 वर्षीय सोनू समय से पहले ही इतना गंभीर हो गया था. वान्या को ऐसा लगता, जैसे वह अपराधिनी है, उस ने ही अपने बच्चों से उन का बचपन छीन लेने का अपराध किया है. वह खयालों में खोई हुई दूर तक जाते हुए अक्षत के स्कूटर को देखती रही. अचानक उसे ध्यान आया, अभी तो कमरे में फैला सारा सामान समेटना है. वह भाग कर ऊपर आई. उस ने एक दृष्टि पूरे कमरे में दौड़ाई. बिस्तर पर गीला तौलिया पड़ा था. उस ने तौलिए को निचोड़ कर बालकनी में फैला दिया. वान्या ने बिजली की गति से भागभाग कर सामान समेटना शुरू किया. सभी वस्तुओं को यथास्थान रखने में उसे कम से कम 10 चक्कर लगाने पड़े. नाश्ते का निवाला निगलतेनिगलते उसे ध्यान आया, ‘कहीं मायारानी गुसलखाने की बालटी खाली तो नहीं कर गई.’

वान्या ने स्नानघर में जा कर देखा तो बालटी सचमुच ही खाली पड़ी थी. अब तो पानी भी जा चुका था. वह गुस्सा पी कर रह गई. अभी उसे तैयार भी होना था. घड़ी की सूइयों पर नजर गई तो हड़बड़ा कर अलमारी में से साड़ी निकालने लगी. लवी को शिशु सदन में छोड़ते समय वान्या का मन बहुत विचलित हो गया था. उस की सोच जारी थी, ‘आखिर क्या दे पा रही है वह अपने बच्चों को इस नौकरी से? इस उम्र में जब उन्हें उस के प्यार की जरूरत है, तो वह उन्हें छोड़ कर दफ्तर चली जाती है और शाम को जब थकीहारी लौटती है तो उन्हें दुलारने, पुचकारने का उस के पास समय नहीं होता. आखिर इस नौकरी से उसे मिलता ही क्या है? सुबह से शाम तक की भागदौड़ जीवन स्तर बढ़ाने की होड़ और इस होड़ में कुछ भी तो नहीं बचा पाती वह अपनी आमदनी का.

‘जब वह नौकरी नहीं करती थी तो उस का काम 4-5 साडि़यों में ही चल जाता था, लेकिन कार्यालय के लिए अब 15-20 साडि़यां भी कम पड़ती हैं. वर्ष में 2-3 जोड़ी चप्पलें घिस ही जाती हैं. ऊपर से पाउडर, क्रीम, लिपस्टिक का खर्चा अलग से. पतिपत्नी दोनों कमाऊ हों तो ससुराल वाले भी कुछ ज्यादा ही अपेक्षा करते हैं. वह तो बस सुखसुविधा के साधन जुटाने की मशीन बन कर रह गई है और दिनरात पिस रही है, इसी चक्की में. पारिवारिक स्नेह और प्यार की जगह अब टीवी और स्टीरियो ने ले ली है. किसी को एकदूसरे से बात करने तक की फुरसत नहीं है.

‘उफ, नहीं करूंगी मैं ऐसी नौकरी,’ वान्या के होंठों से कुछ अस्फुट स्वर निकल पड़े. आसपास की सवारियों ने उसे चौंक कर देखा, तो उस की विचारतंद्रा रुकी. अब उस की आंखें बस की खिड़की से कहीं दूर कुछ तलाश रही थीं.

उसे फैसला करने में 4-5 दिन लगे. साथ काम करने वाली महिलाओं ने विरोध किया, ‘‘क्या मियां की पैर की जूती बन कर रहेगी?’’

चटकमटक वीना ने कहा, ‘‘लीना का पति रोज उस से झगड़ता था. उस ने पिछले 3 साल से अलग मकान ले रखा है.’’

‘‘हमारे पास इतनी दौलत कहां कि नौकरी छोड़ सकें,’’ यह सरोज का कहना था. कांतिहीन चेहरे वाली सरोज घर और दफ्तर के बीच पिस रही थी. वान्या को दोनों की सलाह में स्वार्थ नजर आया. फिर भी उस ने जी कड़ा कर के त्यागपत्र दे दिया. 2-4 दिन घर पर बेफिक्री से बीते. ढेरों काम थे, रसोई सड़ी हुई थी. पहले घर में डब्बाबंद सामान ही खाया जाता था, अब वह खुद बनाने लगी. बेटी भी अब संयत होने लगी. 7-8 दिन बाद अक्षत बोला, ‘‘मैं 4 दिनों के लिए टूर पर जा रहा हूं. तुम्हें दिक्कत तो न होगी?’’

‘लो बोलो, घर बैठी नहीं कि पति के पर निकलने लगे,’ वान्या ने सोचा. फिर विवाद न खड़ा करने की नीयत से बोली, ‘‘दिक्कत क्यों होगी, आप निश्चिंत हो कर जाइए.’’ अक्षत के बिना 4 दिन काफी लगने लगे. पहले वह टूर पर जाना टाल देता था कि वान्या को दिक्कत होगी. वह घर का जो छोटामोटा काम कर देता था, वह कौन करेगा… 

4 दिन बाद जब अक्षत लौटा तो बहुत खिलाखिला था, बोला, ‘‘मेरे अधिकारी भी साथ थे. मेरे काम से बहुत खुश थे. वहीं मेरी तरक्की भी कर दी और यह लो 5 हजार रुपए बोनस भी दिया है.’’

थोड़ी देर बाद अक्षत फिर बोला, ‘‘अधिकारी कह रहे थे कि पहले घरेलू कठिनाइयों के कारण ही वे मुझे जिम्मेदारियां देने से कतरा रहे थे. वे नहीं चाहते थे कि बाहर जाने के कारण घर में विवाद हो.’’ वान्या सन्न रह गई. वह तो सोचती थी कि उस की नौकरी से घर में बरकत थी, पर यह तो उलटा था. उसे अपने निर्णय पर गर्व हो आया. उस ने सोचा कि नौकरी नहीं तो क्या, वह भी तो अक्षत की कमाई में हिस्सा देती ही है. Hindi Family Story

Family Story In Hindi: पैकेज 24 लाख का – आशा को किस बात का गुमान था

Family Story In Hindi: अरुणा को जब पता चला कि उस की बहन आशा पुणे से नोएडा पिताजी के पास 4-5 दिनों के लिए रहने के लिए आ रही है, तो उस ने एक पल भी नहीं गंवाया सोचने में और उस से मिलने का मन बना लिया. हापुड़ से नोएडा दूर ही कितना था. उस के पति ने भी मना नहीं किया.

4 साल पहले मां की मृत्यु के समय ही आशा से मिलना हुआ था. मां के जाने के बाद अरुणा का उस घर में न तो कभी जाना ही हुआ और न ही कभी उस ने जाना चाहा. मां के बिना उस घर की कल्पना कर के ही वह सिहर उठती थी. लेकिन इस बार उस ने 3-4 दिनों का कार्यक्रम बना कर झटपट अटैची लगाई और बेटी के साथ बस में बैठ कर नोएडा के लिए रवाना हो गई.

रास्तेभर जहां उसे इतने सालों बाद आशा से मिलने की खुशी हो रही थी, वहीं मां विहीन उस उजड़े घर में कैसे प्रवेश करेगी, इस की भी चिंता हो रही थी. आशा को सरप्राइज देने का मन हुआ, इसलिए अरुणा ने उसे सूचित नहीं किया और पहुंच गई. अचानक उसे आया देख कर आशा ने हमेशा की तरह बनावटी खुशी दिखाई. उस के इस स्वभाव को जानते हुए भी यह सोच कर कि पता नहीं फिर कब मिलना होगा, अपने को आने से रोक नहीं पाई. आखिर थी तो उस की छोटी और इकलौती सगी बहन.

अरुणा की बहन आशा, उस से 2 साल छोटी थी, लेकिन बचपन से ही, उस से बेहतर अपनी कदकाठी के कारण तथा अपने व्यवहार से, अपना वर्चस्व रख कर उस पर हावी रहती थी.

अरुणा इस के विपरीत बहुत मृदुल स्वभाव की थी. कोई भी अनजान व्यक्ति आशा को अरुणा की बड़ी बहन समझ सकता था. पढ़ाईलिखाई में अरुणा हमेशा उस से अव्वल रही, लेकिन फिर भी आशा उसे अपने आगे कुछ भी नहीं गिनती थी. अरुणा को बहुत मानसिक कष्ट भी होता था, लेकिन आशा को कोई परवा न थी. उस का विवाह अरुणा के विवाह के सालभर बाद ही हो गया था.

जहां अरुणा के पति हापुड़ जैसे छोटे शहर में छोटी सी सरकारी नौकरी करते थे, वहीं आशा के पति पुणे में किसी बहुत बड़ी कंपनी के मालिक थे. विवाह के बाद भी आशा के स्वभाव में रत्तीभर परिवर्तन नहीं आया, बल्कि ससुराल में बड़ी बहू होने के कारण और पति के ऊंचे ओहदे पर होने के कारण वह पहले से भी अधिक अभिमानी हो गई थी.

मायके में जब भी वे दोनों मिलतीं, आशा अरुणा को नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ती थी. और तो और, उस के बच्चों में और अपने बच्चों में भी बहुत अंतर रखती थी. एक दिन तो हद हो गई जब अरुणा ने अपनी मां के घर, रसोई से फुरसत पा कर कमरे में जा कर देखा कि आशा अपनी बेटी के साथ रजाई में बैठ कर टैलीविजन देख रही थी और उस की बेटी बिना रजाई के ठिठुर रही थी. उस ने अपनी बेटी को रजाई तो ओढ़ा दी, लेकिन अपना रिश्ता स्थिर रखने के लिए आशा से कुछ नहीं कहा, जानती थी कि बोलने पर बात बहुत बढ़ जाएगी.

उन की मां भी यदि आशा को कुछ समझाने के लिए कुछ कहती तो वह उलट कर तुरंत उत्तर देती, ‘हां, हां, आप की लाड़ली बेटी है न. आप तो उस की तरफदारी करेंगी ही.’ मां क्या बोलती, चुप रह जाती थी. लाड़ली बेटी का ताना तो आशा अकसर देती रहती थी. उसे यह समझ नहीं थी कि मां के लिए सभी बच्चे बराबर होते हैं, वे अपने स्वभाव से ही अंतर पैदा करवाते हैं.

मां की असमय मृत्यु होने पर सभी भाईबहन इकट्ठे हुए थे. अरुणा का मन हुआ कि अपनी बहन आशा के गले से लिपट कर खूब रो ले, लेकिन उस का रुख देख कर लगा ही नहीं कि उस को रत्ती भर भी मां के जाने का संताप है. वह मन मसोस कर रह गई, दोनों भाई तो विवाह के बाद पहले ही पराए हो चुके थे, सभी अपनों के असली चेहरे देख कर अरुणा का मन बहुत क्षुब्ध हुआ. उस को लगा कि वह अकेली रह गई है.

उस का बेटा और बेटी दोनों ही नानी से बहुत जुड़े हुए थे. बेटी तो समझदार थी, लेकिन बेटा छोटा होने के कारण सब क्रियाकलाप देख कर बहुत विचलित हो गया था और सब से अजीब व्यवहार करने लगा था. आशा कारण की गहराई में गए बिना सब के सामने जोरजोर से बोलने लगी, ‘मांबाप ने सिर पर चढ़ा रखा है. जरा भी तमीज नहीं सिखाई. अभी से यह हाल है तो आगे क्या करेगा.’

अरुणा यह देख कर हतप्रभ रह गई. पहले तो वह समझ नहीं पाई कि वह किस के लिए बोल रही है, समझ में आने पर उस को विश्वास ही नहीं हुआ कि उस की बहन उस के बेटे की भावना को समझने के स्थान पर उस के लिए इतना अनर्गल बोल सकती है, वह भी ऐसे मौके पर. उस की 2 बेटियां ही थीं इसलिए वह इतनी कुंठित रहती थी कि उस को अरुणा का बेटा फूटी आंख नहीं सुहाता था.

मौसी को तो मां-सी माना गया है, फिर यह कैसी मौसी है, जिस ने इस रिश्ते को पराया करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. उस की बेटियों को अपनी मां का व्यवहार बिलकुल ठीक नहीं लग रहा था, यह साफ उन के चेहरे के भाव बता रहे थे. लेकिन वे अपनी मां से अत्यधिक डरती थीं, इसलिए मूकदर्शक बनी रहती थीं. अरुणा को बच्चों को इस तरह डरा कर रखना उचित नहीं लगता था. मां की तेरहवीं के अगले दिन ही वह आहत मन से वापस हापुड़ लौट गई.

उस के बाद आज मिलना हो रहा था. इतना कुछ होने के बाद भी अरुणा, उस से मिलने का लोभ संवरण नहीं कर पाई. इसी को तो खून का रिश्ता कहते हैं, जो अटूट माने जाते हैं. आशा अपनी बेटियों के साथ आई थी. बड़ी बेटी, नेहा ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई रुड़की के आईआईटी कालेज से पास की थी, आशा उसी को स्थायी रूप से वहां से ले जाने के लिए ही, रुड़की से लौटते हुए नोएडा आई थी. वह नेहा के गुणगान गाते नहीं थक रही थी कि पुणे जाते ही उसे नौकरी मिल जाएगी. फिर कंपनी अवश्य उसे अमेरिका भेजेगी. उस की शादी की वह जल्दी नहीं करेगी. उस का साथ उस के पति भी भरपूर दे रहे थे.

अरुणा उन की दंभभरी बातें सुन कर अवाक रह गई. वह तो उन की बातचीत का हिस्सा बनने लायक ही नहीं थी क्योंकि उस की बेटी, जो नेहा से कुछ ही महीने बड़ी थी, ने तो साधारण बीए किया था और टैक्सटाइल डिजाइनिंग का कोर्स, दिल्ली के किसी इंस्टिट्यूट से कर रही थी. इस बारे में सुनते ही आशा ने नाकभौं सिकोड़ ली. इस कोर्स के बाद उस को किसी फैक्टरी में ही नौकरी मिल सकती है. क्या पैकेज मिलेगा उस को, ज्यादा से ज्यादा साल का डेढ़ लाख. नेहा की तो एक महीने की इतनी सैलरी होगी,’’ उस ने अरुणा की बेटी की ओर तिरस्कारपूर्ण दृष्टि डालते हुए कहा. ‘‘लड़कियों का भविष्य अच्छा पैकेज नहीं, अच्छा ससुराल और उसे समझने वाला पति है. मैं ने उसे पैरों पर खड़ा कर दिया है, जिस से आवश्यकता पड़ने पर वह अपने परिवार की आर्थिक आवश्यकता भी पूरी कर सके, बस. और उस की पढ़ाई तो ऐसी है कि जिस से वह अपना व्यवसाय भी कर सकती है, जिस से उस का घर भी डिस्टर्ब नहीं होगा. मैं तो कोर्स पूरा होते ही उस के लिए अच्छा वर ढूंढ़ कर जल्द विवाह कर दूंगी, ससुराल जा कर जो चाहे करे. लड़कियों की प्राथमिकता घरपरिवार और बच्चे संभालना है, न कि नौकरी. पढ़ाई का सदुपयोग केवल नौकरी करना नहीं है, बल्कि पढ़ीलिखी लड़कियां, जागरूक होने के कारण अधिक अच्छी तरह, सुचारु रूप से परिवार को चला सकती हैं और बच्चे की बेहतर परवरिश कर सकती हैं,’’ अरुणा ने दो टूक जवाब देते हुए कहा. उस की बेटी के आत्मसम्मान को ठेस न पहुंचे, इसलिए बोले बिना अपने को रोक नहीं पाई.

‘‘दीदी, पढ़ीलिखी होने के बाद भी कैसी दकियानूसी बातें कर रही हैं आप. जमाना बहुत बदल गया है. पैसा हो तो घर संभालने के लिए हाउसकीपर रख सकते हैं और बच्चों के लिए, जैसा चाहो वैसे क्रेच खुले हुए हैं, उन में उन को छोड़ सकते हैं. उन को, वे जो चाहें, खरीद कर दे सकते हैं. हर उम्र के अनुसार खिलौने बाजार में आते हैं, जिन में वे बिजी रह सकते हैं. पैसे से हम बच्चों के लिए क्या नहीं उपलब्ध करा सकते…’’

आशा ने उस की बात नकारते हुए कहा, ‘‘बच्चे महंगे खिलौनों से सजे कमरे में नहीं, अपनी मां की गोद में सुरक्षित महसूस करते हैं. उन की प्रतिदिन की गतिविधियों को निहारने में जो सुख है, वह महंगी कारों में घूमने में और भोगविलास में भी नहीं है. पैसे से बच्चों के लिए भौतिक साधन तो जुटाए जा सकते हैं लेकिन अपने लिए उन के मन में जुड़ाव पैदा नहीं कर सकते. यह तभी संभव है जब हम उन्हें अपना साथ और समय देंगे, नहीं तो बड़े हो कर वे भी हमारे लिए सुखसाधन तो जुटा देंगे, लेकिन अपना समय नहीं देंगे और तुम्हें पता है, बुढ़ापे में अकेलापन किसी त्रासदी से कम नहीं होता है.’’

अरुणा को अपनी बहन की सोच पर तरस आ रहा था. लेकिन वह समझने वाली कहां थी. पलट कर थोड़ा उत्तेजित हो कर बोली, ‘‘ठीक है दीदी, आप अपनी बेटी को हाउसवाइफ बनाओ, मेरी बेटी ने इंजीनियरिंग घर में बैठने के लिए नहीं की है.’’ उस के इस तीखे जवाब से अरुणा का मन कसैला सा हो गया. उस ने चुप रहना ही उचित समझा. रात को आशा और उस के पति एक कमरे में, बाकी सभी दूसरे कमरे में सोने चले गए. आशा की बेटियां जैसे मौके की तलाश में थीं, बोलीं, ‘‘मौसी, आप तो ममा से बड़ी हैं न. फिर वे क्यों आप की बात नहीं सुनतीं? मुझे उन का आप से इस तरह का व्यवहार बिलकुल अच्छा नहीं लगता, पता है हम अपने घर में कुछ भी अपने मन का नहीं कर सकते. हमारे लिए सारे निर्णय वे ही लेती हैं, पापा की भी नहीं सुनतीं. अदिति कितनी अच्छी है न, कि उसे आप जैसी मां मिलीं.’’

‘‘नहीं बेटा, ऐसा कुछ नहीं है, अपनीअपनी सोच है, समय सब ठीक कर देगा.’’ इतना कहते ही अरुणा को नींद ने घेर लिया, लेकिन तीनों बहनों का वार्त्तालाप रातभर चलता रहा. अगले ही दिन भारी मन से अरुणा ने अपनी बहन से विदा ली. उस ने 1-2 दिन और रुकने के लिए उस से कहा. ‘‘नहीं, तेरे जीजाजी को खानेपीने की तकलीफ हो रही होगी,’’ अरुणा ने बहाना बनाया, जबकि आशा भी जानती थी कि वे बहुत अच्छा खाना पकाते हैं, फिर भी उस ने बात अनसुनी कर दी. अपनी बेटी को होस्टल छोड़ते हुए अरुणा वापस अपने घर पहुंच गई. समय बीतता गया.

अरुणा की बेटी, अदिति की सगाई एक कपड़े के व्यावसायिक परिवार में हो गई. लड़का पढ़ालिखा था और अकेला होने के कारण पिता के कपड़े के व्यवसाय से ही जुड़ा हुआ था. उस ने ही अदिति को किसी समारोह में देख कर पसंद किया था. अरुणा तथा उस के पति ने उन की सामाजिक स्थिति को देखते हुए कहा कि वे उन की हैसियत के अनुसार विवाह में खर्च नहीं कर पाएंगे, तो प्रत्युत्तर में उन्होंने कहा कि उन्हें सिर्फ उन की बेटी चाहिए और कुछ नहीं.

विवाह में आशा भी अपनी दोनों बेटियों के साथ आई थी. नेहा को देख कर, कई लोगों ने उस के रिश्ते की बात चलाई, तो उस ने अहंकारभरी आवाज में उत्तर दिया कि अभी 2 साल वह और नौकरी कर ले, उस के बाद ही वह उस का विवाह करना चाहती है. तब तक उस का पैकेज 24 लाख रुपए का हो जाएगा. लेकिन शर्त यह है कि लड़का इंजीनियर हो, दूसरा, लड़के का पैकेज नेहा के पैकेज से अधिक होना चाहिए.

नेहा अपनी मां की बात बड़े ध्यान से सुन रही थी. अदिति का विवाह धूमधाम से हो गया. बेटी को विदा करने के बाद सभी मेहमान एकएक कर के वापस चले गए, सिर्फ आशा अपने परिवार के साथ 2 दिनों के लिए रुकी थी. विवाह के अगले ही दिन आशा की बेटी नेहा ने कहा, ‘‘ममा, मैं थोड़े दिन मौसी के पास रहना चाहती हूं, जिस से इन को अदिति की कमी न महसूस हो. मैं औफिस से छुट्टी ले लूंगी, प्लीज ममा मना मत करना.’’

‘‘तेरा दिमाग तो नहीं खराब हो गया? यहां हापुड़ में रह कर क्या करेगी? टाइम वैस्ट होगा. न कोई घूमने की जगह…’’ इस से पहले कि आशा अपनी बात पूरी करे, नेहा बोली, ‘‘मुझे मौसी के साथ कुछ दिन रहना है, जिस से कि मैं इन से कुछ अच्छे संस्कार ले सकूं.’’

‘‘मतलब, तू अदिति जैसा जीवन जीना चाहती है. तुझे इसी दिन के लिए इंजीनियरिंग करवाई है मैं ने?’’

‘‘क्या बुराई है ममा, मैं अपने सहयोगी चेतन से विवाह करने वाली हूं और उस की मां की तबीयत ठीक नहीं रहती है, इसलिए मुझे नौकरी छोड़ कर घर पर रहना पड़ेगा. आप तो किटी पार्टी और क्लब में इतनी बिजी रहती हैं कि मुझे कुछ सीखने को मिला ही नहीं, इसलिए इन के पास रह कर कुछ लड़कियों वाले गुण सीखूंगी, जिस से चेतन और उस की मां को खुश रख सकूं.’’

‘‘चेतन, जो तेरा सबौर्डिनेट है, उस से विवाह करेगी, ऐसा तू ने सोचा भी कैसे?’’

‘‘ममा, अभी तक अपना जीवन आप के अनुसार जीती आई हूं, अब अपने विवाह का निर्णय मैं स्वयं लेना चाहती हूं. यह मेरा व्यक्तिगत मामला है.’’ आशा अवाक अपनी बेटी का मुंह देखती रह गई. नेहा, जिस ने कभी उस के सामने मुंह भी नहीं खोला था, उस को जवाबसवाल करते देख कर आशा भौचक्की रह गई थी. अरुणा ने नेहा को समझाते हुए कहा, ‘‘नहीं बेटा, ममा से इस तरह बात नहीं करते.’’ अरुणा की बात बीच में काट नेहा बोली, ‘‘यह तो मैं ने इन से ही सीखा है, नानी को और आप को भी तो ये इसी तरह जवाब देती हैं. मैं तंग आ गई हूं इन की तानाशाही से, अपने मन का कुछ कर ही नहीं सकती.’’

इतना कह कर नेहा रोंआसी हो कर सोफे पर बैठ गई. आशा को अपनी बेटी के इस अप्रत्याशित रूप को देख कर बहुत धक्का लगा, और धम्म से अपना सिर पकड़ कर सोफे पर बैठ गई तो अरुणा उसे गले लगाते हुए बोली, ‘‘आशा, मेरी बहन, आजकल के बच्चे हमारे जमाने वाले नहीं हैं. इन की डोर जितनी खींचोगे, उतनी ही दूर ये टूट कर जा गिरेंगे, आवश्यकतानुसार ही डोर खींचनी चाहिए. मैं बड़ी हूं, इसलिए समझा रही हूं, बुरा मत मानना.’’

‘‘नहीं दीदी, मेरी आंखें खुल गई हैं, मुझे माफ कर दीजिए, किसी ने सच कहा है, अपनी औलाद ही मांबाप को एक न एक दिन सबक सिखाती है,’’ आशा इतना बोल कर सुबकने लगी. आशा बीता वक्त तो लौटा नहीं सकती थी लेकिन भविष्य को तो संवार सकती थी. Family Story In Hindi

Indian Constitution: मनुवादी विधान की जकड़न में संविधान

Indian Constitution: डाक्टर भीमराव अंबेडकर ने शायद ही यह सोचा था कि उन के अनुयायी उन की बात को समझने के बजाय कोरा ‘जय भीम’ का जयजयकार करने लगेंगे. वे लोग समझ ही नहीं पा रहे हैं कि ‘जय गोपाल’, ‘श्रीराम’, ‘जय माताजी’ या ‘जय भीम’ सब मनु की परंपरा के परिचायक हैं.

भारतीय समाज में पिछड़ों और दलितों की दशा में सुधार लाने के लिए समाज के परंपरागत मजबूत तबकों से कड़ी जद्दोजेहद करते हुए संविधान सभा में पहुंचने के बाद दिनरात मेहनत कर के डाक्टर भीमराव अंबेडकर ने संविधान का मसौदा तैयार करने में कामयाबी हासिल की थी. पर, बेहद अफसोसजनक बात है कि हमारे देश में 76 साल से लागू संविधान आज भी महज एक राजकीय दस्तावेज ही बन कर रह गया है.

भारत की सब से बड़ी दिक्कत यह है कि इस देश का संविधान भले ही डाक्टर भीमराव अंबेडकर ने अपने ढंग से बनाया हो, पर इस संविधान की व्याख्या करने का पूरा काम आज भी मनु के कट्टर समर्थकों के हाथों में है, तभी तो राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ के सामने खड़ी मनु की प्रतिमा न्यायपालिका से संवैधानिक न्याय की उम्मीद से आने वालों को ठेंगा दिखा रही है.

गौरतलब है कि मनु का विधान हजारों सालों से इस देश के खून में घुला हुआ है, जिस ने गीता, धम्मपद, जिन्न सूत्र, गोरख वाणी, कबीर बीजक व गुरु ग्रंथ साहिब जैसी मजबूत आवाज को भी मुखर नहीं होने दिया है.

हालांकि, आधुनिक संविधान निर्माताओं ने अस्तित्व की आवाज की कोमलता को संविधान का हिस्सा नहीं बनने दिया. मनु की कठोरता से उपजे परंपरागत आरक्षण के जवाब में संवैधानिक आरक्षण की व्यवस्था भी की, पर क्योंकि मनु का विधान सदासदा से ही बेहद संरक्षित है, जिस का मूल कारण यह है कि यह विधिविधान सनातन धर्म व संस्कृति का चोला पहने हुए है.

लिहाजा, जो संवैधानिक व्यवस्थाएं इस देश की जिस 90 फीसदी आबादी के लिए की गई थीं, वही 90 फीसदी आबादी इन संवैधानिक व्यवस्थाओं के बजाय मनु की सनातन संस्कृति के धार्मिक विधान के अनुष्ठानों में लीन है.

यह दुख की बात है कि आजाद भारत के संविधान से वजूद में आई अदालतों में मनु की मूर्ति आज भी वैसी ही कुटिल मुसकान बिखेरती हुई संवैधानिक न्याय की उम्मीद में आए लोगों को चिढ़ा रही है.

आजादी के बाद वजूद में आई संवैधानिक व्यवस्था के कर्णधारों ने किसानों, मजदूरों व दलितों के लिए कुछ और ही उम्मीदें देखी थीं, तभी तो संविधान निर्माता ने संविधान की प्रस्तावना की शुरुआत में इन्हीं उम्मीदों के साथ लिखा था, ‘हम भारत के लोग भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए…’

बंद हो कोर्ट में पूजापाठ

पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस अभय ओका ने कानूनी बिरादरी के लोगों यानी वकीलों और जजों को सलाह दी थी कि उन्हें कोर्ट में पूजापाठ से बचना चाहिए.

जस्टिस अभय ओका का कहना था कि कानूनी जगत में शामिल लोगों को किसी भी काम की शुरुआत संविधान की प्रति के सामने झुक कर करनी चाहिए.

वहीं, जिस वक्त जस्टिस अभय ओका वकीलों और जजों से पूजापाठ की जगह संविधान के सामने सिर ?ाकाने को कह रहे थे, उस वक्त सुप्रीम कोर्ट के एक और जज जस्टिस भूषण आर. गवई भी वहां मौजूद थे. उन्होंने बिल्डिंग के समारोह का नेतृत्व किया था.

इस कार्यक्रम के दौरान जस्टिस भूषण आर. गवई ने भी कहा, ‘‘संविधान को अपनाए हुए 75 साल हो चुके हैं, इसलिए हमें संविधान का सम्मान दिखाने और इस के मूल्यों को अपनाने के लिए इस प्रथा की शुरुआत करनी चाहिए.’’

जस्टिस अभय ओका ने खुल कर कहा, ‘‘अब हमें न्यायपालिका से जुड़े हुए किसी भी कार्यक्रम के दौरान पूजापाठ या दीप जलाने जैसे अनुष्ठानों को बंद करना होगा. इस के बजाय हमें संविधान की प्रस्तावना रखनी चाहिए और किसी भी कार्यक्रम को शुरू करने के लिए उस के सामने झुकना चाहिए.

‘‘कर्नाटक में अपने कार्यकाल के दौरान मैं ने ऐसे धार्मिक अनुष्ठानों को रोकने की कोशिश की थी, लेकिन मैं इसे पूरी तरह से नहीं रोक पाया था. हालांकि, मैं इसे किसी तरह से कम करने में कामयाब जरूर रहा.’’
जयपुर हाईकोर्ट में

मनु की मूर्ति

जयपुर हाईकोर्ट देश का अकेला ऐसा हाईकोर्ट है, जिस के परिसर में ‘मनुस्मृति’ लिखने वाले मनु की मूर्ति लगी हुई है.

यह बेहद दुख की बात है कि औरतों और दलितों के विरोधी और इनसानी बराबरी के दुश्मन मनु की मूर्ति कोर्ट में लगी हुई है, जबकि उसी कोर्ट के बाहर अंबेडकर की मूर्ति लगाई गई है, जो अनदेखी की शिकार है.

गौरतलब है कि ‘मनुस्मृति’ में औरतों व शूद्रों के बारे में बेहद ऊंचनीच भरी बातें लिखी गई हैं. डाक्टर भीमराव अंबेडकर ने भी कहा था कि, ‘मनुस्मृति’ जाति की ऊंचनीच भरी व्यवस्था को मजबूत करती है, इसलिए उन्होंने 25 दिसंबर, 1927 को सरेआम ‘मनुस्मृति’ को जलाने की हिम्मत दिखाई थी.

साल 1989 में न्यायिक सेवा संगठन के अध्यक्ष पद्म कुमार जैन ने राजस्थान हाईकोर्ट के कार्यवाहक चीफ जस्टिस एमएम कासलीवाल की इजाजत से मनु की इस बड़ी मूर्ति को लगवाया था. तब राज्यभर में खूब हंगामा मचा था और राजस्थान हाईकोर्ट की प्रशासनिक पीठ ने इसे हटाने के लिए रजिस्ट्रार के जरीए न्यायिक सेवा संगठन को कहा था.

लेकिन तभी हिंदू महासभा की तरफ से आचार्य धर्मेंद्र ने मनु की मूर्ति को हटाने के खिलाफ हाईकोर्ट में स्टे और्डर की याचिका लगा दी थी कि एक बार लगाई गई मूर्ति हटाई नहीं जा सकती. तब से ले कर आज तक केवल 2 बार ही इस मामले की सुनवाई हुई है. जब भी सुनवाई होती है, कोर्ट में टकराव का माहौल बन जाता है और मामला बंद कर दिया जाता है.

मनु की मूर्ति के विरोधियों का कहना है कि रोजरोज चिढ़ाते मनु का हम कुछ नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि मनुवाद फिर से बेहद मजबूत रूप से दोबारा उभर रहा है.

इस की वजह यह है कि दलित बहुजनों को मनु, मनुस्मृति, मनु मूर्ति और मनुवाद से अब कोई तकलीफ नहीं लगती है. अब वे वारत्योहार बतौर रस्म ‘जय भीम’ व ‘जयजय भीम’ चिल्लाते हैं. उन के लिए अंबेडकर का दर्शन महज प्रदर्शन की चीज बन कर रह गया है. Indian Constitution

Child Heath: मेरा बेटा 4 साल का है और अभी तक ढंग से बोलना नहीं सीखा

Child Heath: अगर आप भी अपनी समस्या भेजना चाहते हैं, तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें.

सवाल –

मेरी उम्र 34 साल है. मेरी शादी को 6 साल हो चुके हैं और हमारा एक बेटा भी है. उस की उम्र 4 साल है. दिक्कत यह है कि मेरा बेटा अभी ढंग से बोलना नहीं सीखा है. ज्यादातर चुप ही रहता है और छोटा सा वाक्य बोलने में भी उसे दिक्कत होती है. इस बात से मैं और मेरी पत्नी परेशान रहते हैं. मेरी मां बोलती हैं कि उन के पोते पर ऊपरी नजर लग गई है और इस के लिए पूजापाठ कराना होगा. पर मुझे नहीं लगता कि ऐसा करने से समस्या का हल होगा. हमें क्या करना चाहिए?

जवाब –

यह कोई खास चिंता वाली बात नहीं है. कई बच्चे देर से बोलना शुरू करते हैं. आप बेटे को घर पर बोलने की प्रैक्टिस कराएं. शुरू में सरल शब्द और वाक्य सिखाएं. उस से छोटेछोटे सवाल करें और उसे कविता व गाना गाने के लिए बढ़ावा दें. अगर वह मोबाइल का आदी हो गया हो, तो उस का स्क्रीन टाइम कम कराएं.
कई बार बच्चे को सुनने में भी दिक्कत होती है, जिस का असर उस के बोलने पर भी पड़ता है, इसलिए बेहतर होगा कि उसे एक बार किसी स्पीच थेरैपिस्ट को दिखा लें.

अपनी मां को कहें कि वह अपना ज्ञान यानी डुकरिया पुराण अपने पास रखें. पूजापाठ, टोनेटोटके, तंत्रमंत्र जैसी बकवास बातों में पड़ कर अपना वक्त व पैसा बरबाद न करें.

व्हाट्सऐप मैसेज या व्हाट्सऐप औडियो से अपनी समस्या इस नम्बर पर 8588843415 भेजें. Child Heath

Social Awareness: जब गले की हड्डी बने बीवी का आशिक

Social Awareness: कहते हैं कि सौत तो पुतले की भी नहीं भाती, लेकिन अब यह कहावत पतियों पर ज्यादा लागू होने लगी है, जो अपनी पत्नियों के आशिकों को पचा नहीं पा रहे हैं.

गांवदेहात से ले कर बड़े शहरों तक शादीशुदा औरतें अब इफरात से उसी तरह इश्क फरमा रही हैं, जिस तरह अब से कोई 30 -40 साल पहले तक मर्द सब्जी मंडी के छुट्टे सांड़ की तरह इधरउधर मुंह मारते फिरते थे और बीवी चूं भी नहीं कर पाती थी.

अब तसवीर बदल रही है. मीडिया में आएदिन ये हैडिंग सुर्खियों में रहती हैं कि पत्नी ने प्रेमी संग मिल कर पति की हत्या की. 3 बच्चों की मां आशिक संग भागी या फिर इस के उलट पति ने पत्नी के प्रेमी को बेरहमी से ठिकाने लगाया या फिर शौहर ने बदचलन बीवी की हत्या की.

नाजायज रिश्ते हमेशा से ही तकलीफदेह हो कर घर उजाड़ते रहे हैं, फिर चाहे वे पति के हों या पत्नी के. इन का अंत कभी सुखद नहीं होता, बल्कि आमतौर पर खूनखराबे से ही होता है.

पत्नी की नाक काटी

लेकिन यह खबर जरा हट कर थी, जिस में पति ने अपनी बेवफा पत्नी की नाक ही चबा डाली. दिलचस्प लेकिन चिंताजनक घटना उत्तर प्रदेश के हरदोई इलाके की बीती 18 जून की है.

32 साला पूजा की शादी देवरिया के एक प्रसिद्धनगर गांव के 36 साला रामखिलावन के साथ कोई 10 साल पहले हुई थी. शादी के बाद 9 साल ठीकठाक और हंसीखुशी गुजरे. दोनों के 2 साल के अंतर से 2 बेटे हुए जिन के नाम उन्होंने पवन और रमन रखे.

लेकिन पिछले एक साल से पूजा गांव के ही 37 साला सुशील कुमार को दिल दे बैठी. प्यार का यह खेल कब और कैसे शुरू हुआ, इस की भनक भी रामखिलावन को नहीं लगी और जब लगी तब तक पानी सिर से गुजर चुका था.

सुशील की पत्नी की मौत कुछ महीने पहले ही हुई है, इस के बाद से वह अकेला था. यह तनहाई पूजा ने दूर कर दी, जिस का जरीया मोबाइल फोन बना. दोनों नएनवेले प्रेमियों की तरह घंटों बतियाने लगे.

जब इस तरफ रामखिलावन का ध्यान गया तो उस ने पूजा को टोकना शुरू कर दिया, जिस पर पूजा यह बहाना बना कर बात को टरका जाती थी कि मायके वालों से बात हो रही है.

गलत नहीं कहा जाता कि इश्क और मुश्क यानी कस्तूरी छिपाए नहीं छिपते. यही पूजा और सुशील के साथ हुआ, जिन पर रामखिलावन को शक तो था, लेकिन कोई सुबूत नहीं था. लिहाजा, वह इस ताक में रहने लगा कि दोनों को रंगे हाथ पकड़ कर उन की पोल खोली जाए और सबक भी सिखाया जाए.

यह मौका रामखिलावन को 18 जून की शाम मिल भी गया, जब पूजा सुशील से मिलने उस के घर चली गई. तब उसे तनिक भी एहसास नहीं हुआ कि रामखिलावन, जो कई दिनों से जासूसों की तरह उस पर नजर रखे हुए है, दबे पैर पीछेपीछे चला आ रहा है.

अभी पूजा सुशील के पास जा कर बैठी ही थी कि झट से पति प्रकट हो गया और उस के बेवक्त सुशील के यहां होने के बाबत सवालजवाब करने लगा. उस ने पूजा से घर चलने को कहा तो पूजा ने जाने से इनकार कर दिया.

इस इनकार ने रामखिलावन के गुस्से में घी डालने जैसा काम किया. बात बढ़ी और बहस से होते मारपीट तक पहुंच गई. हल्ला मचा तो गांव के लोग भी मुफ्त का तमाशा देखने की गरज से इकट्ठा हो गए.

भीड़ देख पूजा ने भी शर्मलाज या लिहाज जो भी कह लें का घूंघट उतार फेंका और रामखिलावन पर ही आरोप लगाने लगी. बेवफाई के बाद की इस बेहयाई पर रामखिलावन और ज्यादा बौखला गया और उस की तरफ झपटा तो अपनी माशूका को बचाने के लिए सुशील बीच में आ गया.

इसी धक्कामुक्की और झगड़े के दौरान गुस्साए रामखिलावन ने पूजा की नाक चबा डाली, जिस से भीड़ भी दहशत में आ गई. पुलिस आई और मामला दर्ज हुआ पूजा और सुशील ने कटी नाक एहतियात से डब्बी में संभाल कर रख ली.

पहले सीएचसी और फिर हरदोई मैडिकल कालेज में पूजा को इलाज के लिए भरती किया गया, जहां डाक्टरों ने उस की नाक की मरहमपट्टी कर उसे लखनऊ रैफर कर दिया. लखनऊ मैडिकल कालेज के डाक्टर उस की कटी नाक जोड़ने की कोशिश में जुट गए.

2 रास्ते या कोई तीसरा भी

लेकिन समाज में जो नाक कटी उस को दुनिया का कोई डाक्टर नहीं जोड़ सकता. एक झटके में एक अच्छीखासी बसीबसाई गृहस्थी उजड़ गई. क्या पूजा या किसी शादीशुदा औरत को गैरमर्द से प्यार करने का हक नहीं? इस सवाल से ही जुड़ा एक अहम सवाल यह भी है कि जब शौहर बीवी की आशिकी से वाकिफ हो जाए तो वह बेचारा क्या करे?

जिन्हें लगता है कि घरवाली ही उन की मर्दानगी को कठघरे में खड़ा कर उन की गैरत और घरखानदान की इज्जत को मिट्टी में मिला रही है. रामखिलावन जैसे पतियों की रात की नींद और दिन का चैन छिन जाता है, जब उन्हें यह पता चल जाता है कि उन की पत्नी किसी गैरमर्द के पहलू में बैठी मौज कर रही है और डंके की चोट पर कर रही है, तो वह बेचारे क्या करे? खामोशी से बीवी को गुलछर्रे उड़ाते देखता रहे या फिर बीवी और उस के आशिक का कत्ल ही कर दे?

पति इन 2 रास्तों में से ज्यादातर दूसरा रास्ता चुनने के लिए मजबूर हो जाते हैं, जिस से उन्हें भी कुछ हासिल नहीं होता सिवा जेल जाने के. लेकिन एक तीसरा रास्ता भी है, जिसे जानने से पहले एक निगाह कुछ उन ताजा हादसों पर डालना जरूरी है, जिन से पता चलता है कि कैसे अब बीवी का आशिक शौहर के गले की हड्डी बनता जा रहा है :

* बैतूल, मध्य प्रदेश. 16 जून, 2025. इस दिन एक शादीशुदा औरत रानी (बदला नाम) अपने आशिक राजा के साथ गुजरात से वापस लौट रही थी. शाहपुर बसस्टैंड पर घेर कर राजा और रानी की जम कर धुनाई पति बलदेव नागले और उस के दर्जनभर साथियों ने की, जिन्होंने रानी को तो कम ही मारा, लेकिन राजा की धुनाई इतनी बेरहमी से की गई कि मौके पर ही उस की मौत हो गई. पुलिस ने 11 लोगों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया.

* अलीगढ़, उत्तर प्रदेश. 17 जून, 2025. शहर के गंगीरी इलाके में रहने वाले पेशे से ट्रक ड्राइवर ऋषि की हत्या उस की पत्नी ललिता ने अपने आशिक नीरेश के साथ मिल कर की. नीरेश रिश्ते में ललिता का देवर भी लगता है.

इस मामले में ललिता और नीरेश के संबंध काफी पहले से थे, जिन्हें ले कर ऋषि आएदिन ललिता की पिटाई किया करता था. इस से तंग आ कर ललिता और नीरेश ने उसे रास्ते से ही हटा दिया. अब दोनों प्रेमी जेल में हैं.

* कोटद्वार, उत्तराखंड. 5 जून, 2025. इस दिन एक लाश कोटद्वार, दुगड्डा रोड पर मिली थी, जिस की शिनाख्त दिल्ली के वसंतकुंज के बाशिंदे रविंद्र कुमार के तौर पर हुई. पुलिस जांच में पता चला कि रविंद्र कुमार की हत्या किसी और ने नहीं, बल्कि उस की ही बीवी रीना सिंधु ने अपने आशिक परितोष कुमार के साथ मिल कर की थी और लाश को उत्तराखंड में यह सोचते हुए फेंक दिया था कि कुछ दिनों में मामला आयागया हो जाएगा और दोनों कहीं और रहने लगेंगे. हत्या करने के बाद वे बिजनौर में रहने भी लगे थे. लेकिन अब वे जेल में हैं.

* भवानी मंडी, झलावाड़, राजस्थान. 20 जून, 2025. पति मनीष और पत्नी सरोज के बीच आ गया था उन का किराएदार रामसेवक, जिस पर सरोज मरमिटी थी. मनीष एक समझदार पति की तरह सरोज को समझाता भी रहता था कि यह सब ठीक नहीं लेकिन सरोज समझनेसमझाने की स्टेज से काफी आगे निकल चुकी थी.

कोई हल न निकलते देख मनीष ने रामसेवक से यह सोचते हुए अपना घर खाली करवा लिया कि दोनों दूर रहेंगे तो चोंच लड़ाना बंद हो जाएगा, लेकिन हुआ उलटा. सरोज और रामसेवक ने सोते हुए मनीष पर खौलता तेल डाल कर उस की हत्या करने की कोशिश की. सरोज ने यूट्यूब पर बौयलिंग औयल वीडियो सर्च कर के यह आइडिया लिया था. अब वह भी जेल में है. पर इस बंदे का गजब काम इन हत्याओं की गिनती दिनोंदिन बढ़ती ही जा रही है. पति बदले की आग में जलता रहता है, दूसरी तरफ पत्नी और उस का प्रेमी भी चैन और सुकून से नहीं रह पाते, क्योंकि उन्हें प्यार जताने के अलावा सैक्स सुख के रास्ते में सब से बड़ा रोड़ा पति ही लगता है. ऐसे में उन्हें हत्या के सिवा कोई दूसरा रास्ता नहीं सूझता.

कुछ ऐसा ही हाल जौनपुर के अरविंद बिंद नाम के नौजवान का था, जिस की शादी कुछ दिनों पहले ही रीता से हुई थी.

शादी के बाद ही अरविंद को पता चल गया था कि रीता ने मजबूरी और दबाव में उस से शादी की थी, वरना तो वह उन की ही बिरादरी के यशवंत बिंद से प्यार करती थी. शादी के कुछ दिन बाद तक रीता ससुराल में रही पर फिर यशवंत के साथ रहने चली गई.

एक मजबूर और सम?ादार पति की तरह अरविंद ने रीता को समझाने की कोशिश की लेकिन इस का उस पर कोई असर नहीं हुआ. उलटे उस ने साफसाफ कह दिया कि वह ससुराल में नहीं रहना चाहती और अगर इस बाबत ज्यादा जोरजबरदस्ती की गई, तो वह खुदकुशी कर लेगी.

इस पर अरविंद ने सब्र नहीं खोया, न ही उस ने हत्या जैसा कोई हिंसक रास्ता अख्तियार किया, उलटे उस ने यह फैसला लेते हुए सब को चौंका दिया कि वह खुद अपनी बीवी की शादी उस के आशिक के साथ करवाएगा. अपने कहे पर उस ने अमल भी किया और 16 जून को जौनपुर के दुर्गा मंदिर में रीता और यशवंत की शादी करा दी.

इस अनूठी शादी की चर्चा देशभर में हुई और हर किसी ने अरविंद के फैसले और पहल की तारीफ की.
तलाक है तीसरा रास्ता अरविंद की इस समझदारी से फायदा यह हुआ कि बेकार का खूनखराबा होने से बच गया, जबकि दूसरे मामलों से समझ यही आता है कि हर मामले में हत्या हुई या फिर हिंसा हुई, क्योंकि किसी को कोई हल नहीं सूझ रहा था.

यह भी ठीक है कि हर कोई अरविंद जितनी दिलेरी, बुद्धिमानी और दरियादिली नहीं दिखा सकता, लेकिन इतना तो कर ही सकता है कि न मानने या न समझाने पर पत्नी को तलाक दे दे, जिस से पत्नी भी चैन से अपने आशिक के साथ रहे और वह खुद भी दूसरी शादी कर सके.

यह ठीक है कि तलाक में सालोंसाल लग जाते हैं, लेकिन इस से बचने का भी आसान रास्ता यह है कि तलाक दोनों की रजामंदी से लिया जाए. हिंदू मैरिज ऐक्ट की धारा (13 बी) में यह इंतजाम है कि पतिपत्नी दोनों अदालत जा कर यह दरख्वास्त दें कि अब हमारा साथ रहना मुमकिन नहीं, इसलिए हमे तलाक की डिक्री दी जाए. आमतौर पर इस धारा के तहत एक साल के अंदर तलाक मिल जाता है और अदालतें ज्यादा सवालजवाब भी नहीं करतीं.

जब वजह कुछ भी खासतौर से किसी और से इश्क ही क्यों न हो, जिस के चलते पत्नी साथ नहीं रहना चाहती तो उसे जबरन रहने के लिए मजबूर करना एक हादसे या वारदात को न्योता देने जैसा ही काम है, जिस का खात्मा किसी की हत्या और फिर जेल ही होता है. फिर जिंदगी का भी कोई माने या सुख नहीं
रह जाता.

आपसी रजामंदी से तलाक में ये सारे झंझट आपसी समझौते कर दूर किए जा सकते हैं इन की भी लिखापढ़ी को तलाक के मसौदे में शामिल कर लेना चाहिए. Social Awareness

Family Story In Hindi: मिजाज

Family Story In Hindi: तेजतर्रार माधवी बचपन से ही बड़ी उत्साही थी. पढ़ाई के अलावा वह दूसरी तमाम गतिविधियों में भी अव्वल रहती थी. उस की बड़ी बहन मनीषा थी. मनीषा उस से 5 साल बड़ी थी, जो पढ़ाई के साथसाथ बरताव में भी बेहद संजीदा थी.

घर का छोटा बच्चा अकसर चंचल स्वभाव का होता है और लापरवाह भी, सो माधवी भी वैसी ही थी. खूब शरारती और झगड़ालू, पर अपने तेज दिमाग और मनीषा की छोटी बहन होने के चलते वह सजा पाने से बची रहती थी. इस वजह से उस के भीतर एक अलग ही तरह का अहंकार जन्म ले कर फलताफूलता जा रहा था.

यह सब माधवी के शुभचिंतक देख तो रहे थे, पर उस को थाम पाने में नाकाम थे. कालेज में दाखिला लेते समय तक वह एक बिंदास और बेखौफ लड़की बन चुकी थी.

माधवी की बड़ी बहन मनीषा मैडिकल की पढ़ाई करने दूसरे शहर चली गई थी और माधवी प्रशासनिक सेवा में जाने की मंशा से एक नामी कालेज की आर्ट्स फैकल्टी में दाखिला ले चुकी थी.

पहले साल से ही कालेज के खुले माहौल ने माधवी को कालेज की राजनीति की तरफ खींच लिया था. कालेज के गुंडा टाइप छात्र भी उस के खतरनाक बरताव का सामना करने से डरते थे.

दूसरे साल में ही माधवी अपने कालेज छात्र संघ की अध्यक्ष बन गई. उस को अपने इस काम में इतना मजा आने लगा कि वह अपने दूसरे मकसद को तो बिलकुल भुला ही बैठी. अहंकार उस के दिमाग में इस कदर जम कर बैठ गया कि जो उसे सही सलाह देने की कोशिश करता, वह उस के गुस्से का सामना करता.

ग्रेजुएशन की डिगरी हाथ में आने तक माधवी का पढ़ाई से पूरी तरह मोह भंग हो चुका था. पर पूरे कालेज में वह एक जानापहचाना नाम बन चुकी थी. उस से डरने वाले लोग काफी थे, पर चाहने वाले भी इतने तो थे ही जो उस के अहंकार को सींच कर उस का पोषण बराबर करने में कमी न रखते.

ऐसे में माधवी के ब्याह के लिए प्रस्ताव घर पर आने लगे और एक बड़े नेता के बेटे मोहन के साथ बड़ी जद्दोजेहद के बाद उस के मातापिता ने उसे शादी करने के लिए राजी कर लिया था.

माधवी की बड़ी बहन मनीषा पिछले साल ही ब्याह की डोर में बंध चुकी थी और उस के समझाने पर ही माधवी ने भी शादी के बंधन में बंधने की बात मान ली.

माधवी समेत घर वालों ने यह बात स्वीकार कर ली थी कि प्रशासनिक सेवा में चयन होने का रास्ता अब बहुत दूर जा चुका है. शादी होने के बाद मायके से 500 किलोमीटर दूर ससुराल में माहौल पूरी तरह अलग था.

यह एक संयुक्त परिवार था, जहां माधवी से उम्र और रिश्ते में बड़े लोग काफी थे. मोहन नाम की वकालत करता था, पर कारोबार व राजनीति में रसूख रखने वाले परिवार से संबंधित होने से सभी लोग अमीर थे.

गांठ के पूरे थे, मगर आदत से वही पुरातनपंथी.

इस परिवार को रूढि़वाद ने अभी तक अपने शिकंजे से छुटकारा नहीं दिया था खासकर माधवी की सास की बहू से उम्मीदें उस की ज्यादातर इच्छाओं के उलट थीं.

थोड़े महीनों में ही परिवारिक खटपट ने कलह का रूप लेना शुरू कर दिया. बोलने में तेजी और खुले विचारों वाली माधवी को एक खराब और बेहया बहू का खिताब दिलवा दिया.

एक साल जैसेतैसे कटा, पर उस के बाद अलग घर में रहना मजबूरी हो गई. तब तक माधवी पेट से भी हो चुकी थी. मोहन उस का ध्यान तो रखता था, पर उस के दूसरी औरतों से भी नाजायज रिश्ते थे.

तेज नजर रखने वाली माधवी से यह बात कब तक छिपती. अपने हक से समझौता करना उस ने कभी सीखा ही नहीं था. लिहाजा, मोहन से ?ागड़े विकराल रूप लेने लगे.

जैसेतैसे 2 साल बीत गए और माधवी मां की जिम्मेदारी निभाती कुछ बिजी हो गई और मोहन घर के बजाय बाहर ज्यादा वक्त बिताने लगा.

मोहन का एक कुंआरा दोस्त सागर अकसर घर आया करता था, जिस से माधवी भी बेझिझक काम करवा लेती थी. भरोसे का होने से मोहन ने भी कभी रोकटोक नहीं की, पर सास जो पहले से ही उस की बदजबानी से गुस्सा थी, उस ने इस बात पर तूफान मचाना शुरू कर दिया.

माधवी ने भी जम कर खिलाफत की और बिना बात का लांछन अपने ऊपर लगाने से सास को खूब खरीखोटी सुना दी.

सास के अहम को इतनी ठेस पहुंची कि उस ने माधवी को उस के ही घर से जबरन बेदखल करवा दिया. बीचबचाव में मोहन की कोशिश धरी रह गई.

9 महीने का बच्चा गोद में और एक महीने का गर्भ पेट लिए गुस्साई माधवी मायके जाने के लिए बसस्टैंड आ गई, पर वह बस में चढ़ने के बजाय मोहन के उसी दोस्त सागर के घर चली गई.

सागर अकेला ही रहता था. उस के धर्मसंकट में आखिर एक आसरे की इच्छा रखने वाली औरत की पुकार की जीत हुई. उस ने माधवी को शरण दी.

माधवी को भरोसा था कि आज नहीं तो कल मोहन उसे समझ जाएगा और लेने आएगा, पर हफ्ता गुजर गया और मोहन को खबर भिजवाने के बावजूद वह माधवी से मिलने तक नहीं आया.

सागर ने भी मोहन को सम?ाने की पूरी कोशिश की, पर उलटा उस को भी लांछन के तीरों से बुरी तरह घायल होना पड़ा.

माधवी के मातापिता को भी पता चलते ही वे दौड़े आए. बेटी, दामाद और समधन से बातचीत कर समझाने की भरपूर कोशिश की, पर टूटी डोर को जोड़ने में कामयाबी न मिल सकी.

गुस्से ने अब बदले का रूप ले लिया था. माधवी ने सागर के सामने शादी का प्रस्ताव रखा. पहले तो वह कुछ अटका, मगर फिर हालात और माहौल को देख कर उस ने स्वीकार कर लिया.

कुछ महीनों पहले ही मोहन से तलाक और सागर से माधवी की कोर्टमैरिज हो गई. बेटे की कस्टडी भी पहले पति को मिल गई. जिंदगी में पहली बार माधवी अपनेआप को लाचार महसूस कर रही थी. एक बेटे को खोने का गम और दूसरे बच्चे का कुछ महीने में इस दुनिया में आने का संघर्ष उस के मन को तोड़ रहे थे, पर नए पति ने उस को बेहतर ढंग से समझाते हुए पूरा हौसला दिया और उस ने एक और बेटे को जन्म दिया.

राजसी ठाटबाट अब नहीं थे. एक स्कूल में टीचर पति अपने सीमित साधनों से माधवी की पूरी देखरेख कर रहा था. माधवी भी अब नौकरी तलाशने लगी और एक प्राइवेट स्कूल में उस ने पढ़ाना शुरू कर दिया. साथ ही, उस ने अपने आसपास के लोगों से मेलजोल बढ़ाना शुरू कर दिया.

आसपास ज्यादातर लोग गरीब थे. माधवी सब की मदद करने लगी. उस का तेज दिमाग लोगों की समस्याओं को सुलझाता और बेबाक बोली अपना असर छोड़ती.

दरअसल, वह सच का ही पक्ष लेती. समाज भी सच की फुसफुसाहट को जान और पहचान तो लेता ही है. वह एक मुहावरा बनती गई. कोई ‘शेरनी’ कहता था, कोई ‘झांसी की रानी’.

कुछ सालों में ही माधवी पूरे महल्ले में मशहूर हो गई. अपने स्कूल की भी वह अहम किरदार बन गई. उसे स्कूल का वाइस प्रिंसिपल बना दिया गया था.

अब नगरनिगम के चुनाव होने वाले थे और माधवी के महल्ले के कई लोग उसे अपने वार्ड में निर्दलीय पार्षद खड़ा होने के लिए कह रहे थे.

माधवी ने राजनीति में कदम रखने का फैसला कर लिया. लोगों से खूब समर्थन मिला और वह जीत गई.
अब माधवी अपने बच्चे के साथ अपने क्षेत्र के लोगों का भी ध्यान रखने लगी. अगले चुनाव में एक राष्ट्रीय पार्टी से उसे मेयर का टिकट औफर हुआ, जिसे उस ने स्वीकार कर लिया.

विरोधी पार्टी ने भी माधवी के पहले पति मोहन को मेयर का टिकट दिया था. चुनाव प्रचार में एक बार फिर उस पर लांछन लगा और बदनाम कर हराने के हथकंडे अपनाए गए. पर वह अपने किए गए कामों से लोगों के दिलों में जगह बना चुकी थी. उस की टीम ने दिल लगा कर पूरे जोश से प्रचार किया और अब वह शहर की मेयर थी.

शायद समय ने माधवी की जीवनधारा को इसी तरह बहाने का तय किया था. Family Story In Hindi

News Story In Hindi: जहाज बना आग का गोला

News Story In Hindi: 20 जून, 2025 की शाम. विजय और अनामिका आज 2 नाइट के लिए द्वारका के रैडिसन ब्लू होटल में रुके हुए थे. अनामिका के जन्मदिन पर तो विजय के साथ खतरनाक प्रैंक खेला गया था, जिस में अनामिका के दोस्तों ने उस की धुलाई कर दी थी. तब भी विजय अनामिका के साथ होटल में रात बिताना चाहता था, पर ऐसा हो नहीं पाया था.

फिलहाल तो विजय और अनामिका अपने रूम में थे. अनामिका अभीअभी नहा कर बाहर आई थी. गीले खुले बाल उस की खूबसूरती को बढ़ा रहे थे. सफेद रंग की शौर्ट ढीली टीशर्ट के अंदर उस ने कुछ नहीं पहना था. नीचे हलके गुलाबी रंग का पाजामा था.

विजय बालकनी में खड़ा था.

उसे बाथरूम का दरवाजा खुलने की आवाज आई, तो वह कमरे में आ गया. अनामिका को इस सैक्सी रूप में देख कर उस का मन मचल गया.

अनामिका समझ गई कि अब विजय के दिल में खुराफात ने जन्म ले लिया है, तो वह वहीं से बोली, ‘‘कोई भी फालतू की हरकत मत करना. मैं दोबारा नहाने के मूड में नहीं हूं. मुझ से दूर ही रहना.’’

‘‘पर यह तो सरासर चीटिंग है. तुम अकेलेअकेले नहा ली और अब मुझे करीब आने से मना कर रही हो. अब कहीं कली खिल रही हो तो भंवरा तो उस का रस चूसने के लिए आएगा ही न,’’ विजय ने इतना कहा और अनामिका को अपनी बांहों में जकड़ लिया.

अनामिका कुछ देर के लिए छटपटाई, पर विजय की मजबूत गिरफ्त से छूट न सकी.

विजय ने अनामिका को अपनी गोद में उठा लिया और बिस्तर पर पटक दिया. अनामिका समझ गई कि अब विजय नहीं मानेगा, तो उस ने भी ज्यादा नानुकर नहीं की.

थोड़ी देर में ही वे दोनों बिस्तर में थे और एकदूसरे के जिस्म से खेल रहे थे. रात के 9 बजे तक उन्होंने एकदूसरे का 2 बार बिस्तर पर साथ दिया और निढाल हो कर पड़ गए.

विजय की आंखों में शरारत थी, तो अनामिका बारबार उसे घड़ी दिखा रही थी कि डिनर का टाइम होने वाला है.

विजय ने कहा, ‘‘हम दोनों शानदार डिनर करेंगे, पर उस से पहले एकसाथ शावर लेंगे.’’

अनामिका समझ गई कि अभी भी विजय उस के जिस्म से खेलना चाहता है. वह जल्दी से उठ कर वाशरूम की तरफ भागी, पर दरवाजा बंद करने से पहले ही विजय भी उस के साथ वाशरूम में जा घुसा.

वे दोनों आधा घंटे के बाद वाशरूम से निकले. फिर 15 मिनट के बाद दोनों रैस्टोरैंट में बैठे थे. अभी डिनर सर्व नहीं हुआ था कि अनामिका का मोबाइल फोन बज उठा.

उधर से किसी लड़की की आवाज आई, ‘नमस्ते दीदी.’

अनामिका वह आवाज नहीं पहचान पाई. उस ने कहा, ‘‘नमस्ते. पर आप हैं कौन? मैं ने आप को पहचाना नहीं?’’

‘अरे दीदी, मैं डाक बाबू की बेटी देविका बोल रही हूं,’ उधर से दोबारा आवाज आई.

‘‘अरे देविका. अब पहचान लिया. कैसी हो? अपनी दीदी को कैसे याद कर लिया?’’ अनामिका ने कहा.

‘दीदी, मैं नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से बोल रही हूं. अभी उतरी हूं. आप मुझे अपना पता बता दो. मुझे आप के पास आना है,’ देविका ने कहा.

‘‘पर देविका, अभी तो मैं अपने दोस्त के साथ होटल में हूं…’’ अनामिका ने इतना कहा, तो तभी विजय ने धीरे से कहा कि देविका को यहीं बुला लो. इतनी रात को कहां जाएगी. मैं होटल के मैनेजर से बात कर लूंगा. वह मेरे दोस्त का खास दोस्त है. वह कुछ न कुछ इंतजाम कर देगा.

अनामिका देविका से बोली, ‘‘तुम ऐसा करो कि मैट्रो ट्रेन से द्वारका सैक्टर 13 आ जाओ. यहां से हम तुम्हें ले लेंगे.’’

‘पर दीदी, मैं अकेली कैसे आऊंगी?’ देविका ने झिझकते हुए कहा.

‘‘बड़ा आसान है. किसी भी पुलिस वाले से पूछ लेना. वे लोग सही तरीका बता देंगे द्वारका आने का. वैसे, तुम नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से पहले राजीव चौक की मैट्रो लेना और वहां से द्वारका सैक्टर 21 वाली मैट्रो में बैठ जाना. वहां तुम्हें हम मिल जाएंगे,’’ अनामिका ने समझाया.

‘ठीक है दीदी, मैं कोशिश करती हूं,’ देविका ने कहा.

‘‘कहीं भी किसी तरह की कोई दिक्कत हो, तो तुम फोन कर लेना. और हां, जब तुम उत्तम नगर पहुंच जाओ, तो मुझे फोन कर लेना. हम द्वारका सैक्टर 13 के मैट्रो स्टेशन पर तुम्हें लेने आ जाएंगे,’’ अनामिका ने देविका का हौसला बढ़ाया.

फोन काटने पर विजय ने अनामिका से पूछा, ‘‘यह देविका है कौन? पहले तो कभी तुम्हारे मुंह से इस का जिक्र नहीं सुना.’’

‘‘यह हमारे पड़ोस के डाक बाबू की बेटी है. अब यह अचानक दिल्ली क्यों आई है, यह तो मुझे भी नहीं पता,’’ अनामिका ने थोड़ा चिंतित होते हुए कहा.

रात के 11 बजे विजय, अनामिका और देविका होटल के कमरे में थे. दरमियाने कद की सांवले रंग की देविका फ्रैश हो चुकी थी. डिनर वह ट्रेन में ही कर चुकी थी, तो उस ने कहा, ‘‘दीदी, मुझे तो बड़ी तेज नींद आ रही है. कहां सोना है?’’

अनामिका बोली, ‘‘तुम सोफे पर सो जाओ.’’

‘‘आप कहां सोएंगी?’’ देविका ने पूरे कमरे पर नजर दौड़ाते हुए कहा. वहां डबल बैड के अलावा और कुछ नहीं था.

‘‘मैं और विजय इस डबल बैड पर सोएंगे,’’ अनामिका ने कहा.

यह सुन कर देविका हैरान रह गई. उसे पता था कि अनामिका दीदी ने अभी शादी नहीं की है, फिर शादी से पहले वे किसी लड़के के साथ एक ही बिस्तर पर सोएंगी…

पर फिलहाल देविका को गहरी नींद आ रही थी, तो वह सोफे पर सो गई.

देर रात हो गई थी, तो विजय और अनामिका भी सो गए.

अगली सुबह विजय, अनामिका और देविका रैस्टोरैंट में नाश्ता करने बैठे थे. वहां कई विदेशी भी बैठे हुए थे. देविका बड़े होटल का माहौल देख कर हैरान थी और उसे समझ नहीं आ रहा था कि विजय और अनामिका शादी से पहले ही शादीशुदा जोड़े की तरह क्यों रह रहे हैं.

‘‘दीदी, मुझे तो दिल्ली का माहौल बिलकुल भी समझ नहीं आया. आप का और इन साहब का रिश्ता क्या है, जो शादी से पहले ही…’’ देविका ने अपने मन की बात रखी.

यह सुन कर अनामिका हंस दी और बोली, ‘‘इन साहब का नाम विजय है और ये मेरे बौयफ्रैंड हैं. हम दोनों यहां होटल में मेरा जन्मदिन मनाने आए हैं.’’

‘‘लेकिन तुम यहां अचानक दिल्ली में कैसे?’’ विजय ने सवाल किया.

‘‘विजय साहब, मुझे मुंबई से एक सिंगिंग कंपीटिशन में गाने के लिए बुलाया है. मेरा सिलैक्शन हो गया है. मेरे साथ कोई एक और जना वहां जा सकता है, तो मैं ने दीदी का नाम लिखवा दिया. ये पढ़ीलिखी हैं और मुंबई में मेरा साथ देंगी,’’ देविका ने कहा.

‘‘अरे, तुम ने पहले क्यों नहीं बताया… बधाई हो. कब जाना है वहां?’’ अनामिका खुश हो कर बोली.

‘‘दीदी, परसों चलेंगे. आप हवाईजहाज की टिकट करवा देना. वे लोग हम दोनों का हवाईजहाज से आनेजाने और वहां रहनेखाने का पूरा इंतजाम करेंगे,’’ देविका ने बताया.

‘‘ठीक है. मैं तुम्हारे साथ चलूंगी,’’ अनामिका ने कहा.

‘‘हवाईजहाज से… दिमाग तो नहीं खराब हो गया है. 12 जून का हादसा भूल गई. ट्रेन की टिकट करा लो,’’ विजय ने कहा.

‘‘12 जून को क्या हुआ था?’’ देविका ने पूछा.

‘‘अरे, तुम्हें पता ही नहीं…’’ विजय हैरान था.

‘‘गांव में रहने की वजह से ज्यादा तो नहीं पता. आप ही बता दो कि ऐसा क्या हुआ था, जो आप इतना बौखला गए,’’ देविका बोली.

विजय ने बताया, ‘‘गुजरात के अहमदाबाद में गुरुवार, 12 जून को एयर इंडिया का एक हवाईजहाज क्रैश हो गया. यह बोइंग हवाईजहाज अहमदाबाद से लंदन जा रहा था और उड़ान भरने के 2 मिनट बाद ही एयरपोर्ट से सटे मेघानीनगर इलाके में हादसे का शिकार हुआ.

‘‘इस हवाईजहाज में 12 क्रू मैंबरों (2 पायलट भी) और 230 सवारियों समेत कुल 242 लोग सवार थे. इस हवाईजहाज में गुजरात के मुख्यमंत्री रह चुके विजय रुपाणी भी सवार थे.’’

‘‘ओह, यह तो बहुत बड़ी अनहोनी हो गई,’’ देविका के मुंह से निकला.

‘‘खबरों के मुताबिक, हवाईजहाज में उस समय 169 भारतीय, 53 ब्रिटिश, 7 पुर्तगाली और एक कनाडाई नागरिक सवार थे. हवाईजहाज का एक हिस्सा मेघानीनगर में बने रैजिडैंट डाक्टर्स के होस्टल पर जा कर गिरा और वहीं अटक गया. इस के बाद होस्टल में अफरातफरी मच गई.

‘‘हवाईजहाज का हिस्सा टकराने से बिल्डिंग में आग लग गई और पूरी इमारत खंडहर में बदल चुकी है. इमारत में मौजूद कई लोग घायल हुए, जिन्हें अस्पताल पहुंचाया गया. कुछ की तो जान भी चली गई,’’ विजय ने आगे बताया.

‘‘इस के बाद सरकार ने क्या कदम उठाए?’’ देविका ने पूछा.

‘‘इस हादसे के तुरंत बाद इमरजैंसी रिस्पौंस टीम की तैनाती मौके पर कर दी गई थी. दमकल, बीएसएफ और एनडीआरएफ की टीमों ने पहले दुर्घटनास्थल पर आग बुझाने का काम किया और हवाईजहाज के मलबे को हटाया गया. क्रैश प्लेन बोइंग का 787-8 ड्रीमलाइनर था, जो तकरीबन 11 साल पुराना बताया गया.’’

‘‘फिर तो बहुत सारे लोग मर गए होंगे,’’ देविका ने चिंता जताई.

विजय ने कहा, ‘‘इस हादसे के बाद अहमदाबाद पहुंचे गृह मंत्री अमित शाह ने कहा, ‘‘सवा लाख लिटर ईंधन होने के चलते तापमान इतना ज्यादा था कि किसी को बचाए जाने की कोई उम्मीद नहीं थी.’’

‘‘क्या कोई भी जिंदा नहीं बचा?’’ देविका ने पूछा.

‘‘बस एक आदमी ही जिंदा बच पाया. समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक, अहमदाबाद के पुलिस कमिश्नर जीएस मलिक ने फोन पर बताया कि एक शख्स विश्वास कुमार रमेश जिंदा बचा है, जो बोइंग 787-8 ड्रीमलाइनर हवाईजहाज की सीट 11ए पर था.’’

‘‘जिस होस्टल पर वह हवाईजहाज गिरा था, क्या वहां भी लोग मरे?’’ देविका ने चिंतित हो कर पूछा.

‘‘जो पहली सूचना मिली थी, उस के मुताबिक, बीजे मैडिकल कालेज और सिविल अस्पताल की डीन मीनाक्षी पारिख ने बताया कि इस हादसे में 4 छात्रों और छात्रों के 4 परिजनों की मौत हुई थी,’’ विजय बोला.
‘‘वहां तो बड़ा ही भयावह मंजर रहा होगा,’’ देविका ने कहा.

‘‘मैं ने बीबीसी पर खबर पढ़ी थी. उस के मुताबिक, सब से पहले छत को हवाईजहाज के पंख ने चीर दिया, उस के बाद फ्यूसलेज (हवाईजहाज का मुख्य हिस्सा) गिरा. जब मुख्य हिस्सा गिरा, तो उस से सब से ज्यादा नुकसान हुआ.

‘‘इस अफरातफरी में छात्र जान बचाने के लिए इमारत से कूदने लगे. यहां तक कि इमारत के दूसरे और तीसरे माले से भी. बाद में छात्रों ने बताया कि होस्टल की एकमात्र सीढ़ी का रास्ता मलबे की वजह से बंद हो गया था.’’

‘‘उफ, बड़ा ही भयावह मंजर रहा होगा,’’ देविका अपने दिल पर हाथ रख कर बोली.

‘‘अरे, सोचो न कि लोग इतनी बुरी तरह से जल गए कि उन के शवों की पहचान डीएनए टैस्ट के जरीए शुरू की गई. हवाईजहाज के हादसों में कोई नहीं बचता है. मैं इसलिए तो बोल रहा हूं कि तुम दोनों रेल से मुंबई चली जाओ,’’ विजय ने अपनी बात रखी.

‘‘यह क्या बात हुई… एक हादसे के बाद क्या लोग हवाईजहाज में बैठना छोड़ तो नहीं देंगे,’’ अनामिका ने कहा.

‘‘लेकिन रेल से जाने में क्या बुराई है?’’ विजय ने अपनी बात रखी.

‘‘बात रेल या बस से जाने की नहीं है. हादसा तो घर से बाहर निकलते ही हो सकता है. इस हादसे में उन होस्टल वालों का क्या कुसूर था, जो कैंटीन में बैठे खाना खा रहे थे? वे तो हवाईजहाज से सफर भी नहीं कर रहे थे,’’ अनामिका बोली.

थोड़ा रुक कर अनामिका ने दोबारा कहा, ‘‘तुम जानते हो कि रेल हादसों में भी लोग अपनी जान गंवा देते हैं. एक खबर के मुताबिक, 2023-24 में 40 रेल हादसों में कम से कम 313 लोगों की मौत हुई थी. ऐसा ही कुछ सड़क हादसों में भी होता है. देशभर में हर घंटे 53 सड़क हादसे हो रहे हैं और हर 4 मिनट में एक मौत होती है.’’

‘‘अरे, विजय साहब… इतना भी मत डरिए. मुझे और दीदी को हवाईजहाज से मुंबई जाने दीजिए. मेरी जैसी गांवदेहात की लड़की को दोबारा हवाईजहाज में बैठने का मौका कब मिलेगा, कोई नहीं जानता. फिर कौन सा हम अपने खर्च पर जा रही हैं. इतना भी अनहोनी से मत डरिए. चलो, अब नाश्ता करते हैं, मुजे बहुत तेज भूख लगी है,’’ देविका ने कहा. यह बात सुन कर उन तीनों के चेहरों पर मुसकान खिल उठी. News Story In Hindi

Family Story In Hindi: झूठी शान

Family Story In Hindi: अपने फ्लैट की बालकनी में दीपा खड़ी दिखाई दी. वह वहीं से आवाज देती हाथ के इशारे से बुला रही थी, ‘‘दीदी, ओ दीदी. कहां जा रही हो? आओ न… बगल से आने की सीढ़ी है.’’

रेखा चंद पलों तक दीपा को देखती रह गई. पहले से उस का रंग साफ हो गया था. जिस्म पर मांस भी चढ़ आया था. गाल भर आए थे. बाल भी ढंग से संवार रखे थे. कत्थई रंग की साड़ी और नीले ब्लाउज में वह खिल रही थी.

पहले दीपा गंवारों की तरह रहती थी. बातें भी बेवकूफों की तरह करती थी. चेहरा हमेशा तना रहता. अपने को ‘किराएदार’ समझ कर दुखी रहती. कभीकभार ऐंठ कर कह भी देती, ‘‘भाड़ा दे कर रहती हूं मुफ्त में नहीं…’’ तब वह रेखा के मकान में ही किराएदार की हैसियत से रहती थी.

तब रेखा ने दीपा को मकान देने से पहले सोचा था कि दोनों सहेलियों की तरह रहेंगी. उस ने कभी मकान मालकिन होने का रोब भी नहीं गांठा था. पर न जाने क्यों दीपा हमेशा दबीदबी रहती थी. अपने पति रमेश को डब्बा थमा कर कारखाने भेजती और कमरे में कैद हो जाती, टैलीविजन से दिल बहलाती.

कभीकभी दीपा सुनाती, ‘‘मेरा अपना मकान होता तो उसे सलीके से सजाती, कीमती साजसामान रखती.’’
रेखा कह देती, ‘‘हम ने तो मकान बनाने में ही इतने रुपए खर्च कर दिए कि नया और कीमती सामान खरीद ही नहीं पाए. प्रशांत की नौकरी से मकान बन गया, यही काफी है. अब आधा हिस्सा भाड़े पर उठा दिया है कि हाथ तंग न रहे.’’

भाड़े का नाम सुनते ही दीपा भड़क उठती. मुंह टेढ़ा कर लेती. तब रेखा कहती, ‘‘दीपा, मैं ने तुम्हें भाड़े के लिए नहीं, साथ हंसनेबोलने और अकेलापन दूर करने के लिए रखा है. प्रशांत दफ्तर जाते हैं तो मैं अकेली घर में रहती हूं. कोई दूसरा तो है नहीं कि गपशप मारूंगी. तुम्हारे पति भी दिन में काम पर जाते हैं. क्यों नहीं आ जाती मेरे पास… या अपने दरवाजे खुले रखो, मैं ही आ बैठूंगी.’’

‘‘मैं बंद कमरे में किसी दूसरे को ले कर पड़ी तो नहीं रहती न दीदी. कामकाज से थकी रहती हूं बस, आंख लग जाती है.’’

‘‘हंसनेबोलने से भी थकान दूर हो जाती है.’’

‘‘तुम अपने को बड़ी गुणी और तेज समझती हो दीदी… यही मुझे अच्छा नहीं लगता,’’ दीपा की बातों से रेखा झुंझला जाती.

‘‘दीपा, तुम्हें अगर मैं अच्छी नहीं लगती और तुम सहेली बन कर नहीं रह सकती तो कहीं और मकान ढूंढ़ लो.’’

तब दीपा ऐंठ कर बोलती, ‘‘दिखाने लगी न मालिकाना रुख.’’

फिर कुछ महीने बाद दीपा दूसरे मकान में चली गई. उस की जगह सुधा आ गई. वह बातबात में हंसनेहंसाने वाली और सलीकेदार औरत थी.

रेखा सुधा के साथ सीढि़यां चढ़ कर ऊपर आई. दीपा ने मुसकराते हुए पूछा, ‘‘आप कौन?’’ उस ने सुधा के बारे में जानना चाहा.

सुधा बोली, ‘‘मैं दीदी की किराएदारिन हूं. बड़ा सुखचैन है इन के यहां…’’

‘‘सुखचैन?’’ दीपा हंस पड़ी, ‘‘यहां जैसा तो नहीं होगा. यहां कंपनी की बिजली और पानी है. वहां की तरह बारबार बिजली गायब नहीं हो जाती कि अंधेरे में रहो और गरमी सहो. फिर वहां तो कुएं का पानी पीना पड़ता है.’’

रेखा को दीपा की बात तीर सी लगी. उसे महसूस हुआ जैसे दीपा ने शायद उसे जलील करने के लिए बुलाया है. सच ही उस का मकान कंपनी के इलाके से बाहर था, इसलिए सरकारी बिजली लेनी पड़ी थी, जो आतीजाती रहती थी.

दीपा ने दोनों को सोफे पर बैठाया. पहले सोफा नहीं था. शायद फ्लैट में आने के बाद नया ले लिया था.

फिर दीपा दूसरे कमरे में गई और 2 गिलासों में फ्रिज का ठंडा पानी ले आई. 2 प्लेटों में बिसकुट और नमकीन भी थी.

‘‘दीदी, चाय बनाऊं या कौफी? कहो तो शरबत…?’’

‘‘नहींनहीं… यही काफी?है,’’ रेखा जल्दी से बोली.

‘‘मेरी बचत की न सोचो दीदी, भले ही खुद बचत कर के कोठी बना लो,’’ दीपा हंस कर बोली. रेखा भला क्या बोलती, वह सुधा की ओर देखने लगी.

पानी पीते हुए रेखा पूछ बैठी, ‘‘दीपा, क्या कंपनी की ओर से यह फ्लैट मिला है?’’

‘‘नहीं, भाड़े पर लिया है. इन के एक दोस्त को मिला था. पर उस का अपना मकान है, बस्ती में. वह फ्लैट में आना नहीं चाहता था, सो हमें भाड़े पर दे दिया. 1 लाख रुपए ‘पगड़ी’ दे कर 5,000 देने पड़ते हैं हर महीने.

‘‘बड़ा आराम है यहां. न कोई झिकझिक न कोई दबाव और न ही कोई ‘किराएदार’ कहने वाला. हम तो अपने रहनसहन को ऊंचा उठाने में लगे हुए हैं.’’

फिर वह ताना सा देती हुई बोली, ‘‘दीदी, हमारे ठाटबाट देख कर जलन तो तुम्हें हो ही रही होगी. तुम भी न जाने क्यों बस्ती में रहने पर तुली हो. अरे, अपना मकान है तो क्या हुआ ऐसा सुख तो नहीं है न वहां? देखो, चारों ओर कितना खुलाखुला है.’’

रेखा भी थोड़ी देर के लिए उदास दिल से सोचने लगी, ‘सच, अब तक मकान बनाने में रुपए फेंकती रही, कभी बढि़या सामान से घर भरने के लिए सोचा ही नहीं. सिर्फ टैलीविजन, पंखा, कुरसी, मेज होने से क्या होता है, फ्रिज, कूलर, सोफा वगैरह भी होना चाहिए.

‘पता नहीं क्यों, प्रशांत के सिर पर शानदार मकान बनाने का भूत सवार है. अब तो दूसरी मंजिल की तैयारी चल रही है.’

‘‘दीपा, अब मैं चलती हूं,’’ थोड़ी देर बाद रेखा बोली.

‘‘क्यों, सिरदर्द होने लगा है क्या?’’

‘‘नहीं, बाजार जाना है.’’

‘‘क्यों दीदी, तुम्हारे पति को कंपनी की ओर से कब तक फ्लैट मिलेगा?’’

‘‘अभी कुछ पता नहीं.’’

रेखा मन पर ढेर सारा बोझ ले कर बाहर आ गई. सुधा पर भी शायद असर हुआ था. वह बोली, ‘‘दीदी, मेरे पति को भी क्वार्टर मिलेगा तो चली जाऊंगी.’’

‘‘चली जाना, रोकूंगी नहीं.’’

‘‘बुरा तो नहीं मान गईं?’’

‘‘नहीं, जो सच है, उसे मानना ही होगा न.’’

रेखा का दिल दुखी सा हो गया. वह थोड़ी सी सब्जी ले कर घर लौट आई.

प्रशांत घर में ही था. वह मिस्तरी से ऊपरी मंजिल के बारे में बात कर रहा था.

‘‘क्या बात है रेखा? उदासउदास सी क्यों लग रही हो?’’ प्रशांत उस के पास आ खड़ा हुआ.

‘‘दीपा मिली थी… अरे वही, पहले वाली किराएदारिन.’’

‘‘तो क्या हुआ?’’

‘‘उस के ठाट देखते ही बनते हैं. क्या नहीं है उस के घर में? फ्लैट में रहती है. फ्रिज, कूलर, सोफा, अलमारी, मिक्सी सब है. अपने यहां क्या है? तुम तो सिर्फ घर बनाने में लगे हो.’’

प्रशांत हंस पड़ा, ‘‘रेखा, कहो तो काम बंद कर दूं और कल ही उठा लाऊं सब सामान. पर सोचता हूं कि पहले शानदार मकान पूरा हो जाए. इस से हमारी शान बढ़ेगी, दोस्तों और रिश्तेदारों में इज्जत होगी.’’

रेखा ने प्रशांत से बहस न की. वह महसूस करने लगी कि वह अपनी जगह सही है पर दीपा के ताने उसे अब भी कांटों से चुभ रहे थे.

रेखा यह भी सोच रही थी, ‘प्रशांत को जब कंपनी की ओर से फ्लैट या क्वार्टर मिलेगा तो उस में जा कर रहनसहन को ऊंचा उठाने की कोशिश करेगी.’

उस ने एक दिन प्रशांत से पूछा, ‘‘तुम्हें कब क्वार्टर मिलने वाला है?’’

‘‘क्या तुम यहां से भागना चाहती हो? दीपा ने शायद तुम्हें दुखी कर दिया है?’’ प्रशांत बोला.

अपनी कमजोरी पकड़ी जाती देख वह उठ कर पानी पीने लगी. फिर बोली, ‘‘कुएं का पानी कुछ खारा लगता है. साफ करा देना या ब्लीचिंग पाउडर डलवा देना.’’

‘‘4 महीने पहले ही तो कुआं साफ कराया था.’’

‘‘एक फ्रिज लेना ठीक रहेगा.’’

‘‘ले लेंगे. वैसे कुएं का पानी गरमी में ठंडा और जाड़े में गरम रहता है.’’

एक दिन सुधा बोली, ‘‘दीदी, एक अच्छी सी साड़ी खरीदनी है… बाजार चलो न.’’

सुधा की जिद पर रेखा तैयार होने लगी. उसे कीमती साड़ी में देख सुधा पूछ बैठी, ‘‘दीदी, हम किसी बरात में तो नहीं जा रहे हैं?’’

‘‘अरे दीपा मिल गई तो मुझे टोक देगी. साधारण साड़ी में देख फब्ती कसेगी. उस का ठिकाना नहीं कि कब क्या बोल दे.’’

दोनों चल पड़ीं. दीपा का फ्लैट निकट आता जा रहा था.

‘‘दीदी, दीपा के घर के सामने औरतों की भीड़ क्यों है? चलो देखें तो,’’ सुधा बोली. फिर दोनों उधर बढ़ गई.

कुछ औरतें एक सब्जी बेचने वाले को घेर कर खड़ी थीं. उन के बीच दीपा का चेहरा लाल हो रहा था.

रेखा और सुधा को देख कर दीपा झल्ला कर बोली, ‘‘अरे सब्जी वाले, मैं भाग तो नहीं रही हूं. सिर्फ 300 के लिए मेरी बेइज्जती पर उतर आए हो. तनख्वाह मिलते ही पूरा चुकता कर दूंगी.’’

‘‘आप तो हर महीने यही कहती हैं बहनजी. पर देती नहीं… उलटे उधार लेती जाती हैं,’’ सब्जी वाला भुनभुनाता हुआ चला गया. दूसरी औरतें भी हंसती हुई चली गईं.

दीपा रेखा और सुधा को ऊपर ले गई. उन के बैठते ही बोली, ‘‘देखा न दीदी, बेइज्जती कर गया वह. ठीक
ही कहा गया है कि छोटों के मुंह नहीं लगना चाहिए.’’

‘‘तुम कौन सी बड़ी हो? बड़ी होती तो उधार नहीं लेती,’’ रेखा की बात से दीपा तिलमिला उठी. वह बोली, ‘‘तंगी तो हर किसी को होती है. सरकार भी उधार लेतीदेती है.’’

फिर दीपा ट्रे में 2 गिलास ठंडा पानी ले आई और बोली, ‘‘उन को बिसकुट लाने के लिए बोला था, पर नहीं लाए. रुकोगी तो शरबत बना दूंगी.’’

‘‘चलो, मैं तुम्हें बाजार में आइसक्रीम खिलाऊंगी,’’ रेखा ने कहा तो दीपा साथ चलने को तैयार हो गई. उस ने भी कीमती साड़ी पहन ली.

दुकान में घुसते ही मालिक दीपा की ओर देख कर बोला, ‘‘बहनजी, हम उधार देने से रहे… पहले ही 2,000 चढ़े हैं.’’

दीपा का चेहरा लाल हो उठा.

रेखा बोल उठी, ‘‘भाई साहब, हम नकद लेने आई हैं.’’

दीपा बीचबीच में रेखा को देख लेती थी. उस से नजर मिलाने की उस की हिम्मत नहीं हो रही थी.

आइसक्रीम खाते वक्त रेखा ने पूछ लिया, ‘‘क्यों दीपा, ज्यादा कर्ज तो नहीं चढ़ा लिया है, तू ने?’’

‘‘इस की परवाह मुझे नहीं. धीरेधीरे दूंगी. अपने को रुपयों की कमी नहीं. अभी हाथ तंग है. पिछले महीने मैं ने प्रेमलाल का उधार चुकता किया था.’’

‘‘प्रेमलाल को किसी प्यारेलाल से ले कर दिया होगा, यही हेराफेरी है न?’’ रेखा हंस पड़ी. दीपा का चेहरा देखते ही बनता था.

सुधा को भी हंसी आ गई, पर मुंह पर पल्लू रख लिया.

‘‘दीदी, इस में छिपाना क्या… तुम तो अपनी हो. एक बात कहूं?’’ दीपा बोली.

‘‘कहो,’’ रेखा ने कहा.

‘‘तुम मुझे 10,000 दे दो तो दूसरों के सारे कर्ज उतार दूं. उन लोगों से बातें तो नहीं सुननी पड़ेंगी. तुम्हारा कर्ज धीरेधीरे उतार दूंगी.’’

‘‘कहीं रुपए ले कर कीमती साड़ी खरीद लाई तो कर्जे रह जाएंगे. वैसे भी मैं मकान की दूसरी मंजिल बनाने में लगी हूं.’’

दीपा झुंझला गई, ‘‘तुम तो हमेशा मकान में ही रुपए लगाती रहती हो कि भाड़ा आता रहे. किसी की मदद करने से पहले भी तुम दूर रहती थीं. यह ठीक नहीं कि देखसुन कर भी बहाना बनाया जाए. अपना तो वह, जो दुख में साथ दे.’’

दीपा का साथ छूटते ही रेखा हंसने लगी. सुधा ने भी उस का साथ दिया.

घर में प्रशांत ने भी सुना तो हंस पड़ा. वह बोला, ‘‘रेखा, तुम्हारी बुनियाद मजबूत है और उन की खोखली.’’

मकान का काम पूरा हो गया तो रेखा ऊपरी मंजिल में रहने लगी. नीचे का हिस्सा किराए पर देने की सोच ही रही थी कि एक दिन दीपा आ गई.

रेखा ने पूछा, ‘‘कहो, कैसे आना हुआ?’’

‘‘तुम्हारे कुएं का पानी मीठा लग रहा है न, सो मेरा मन यहां आने को करने लगा है.’’ दीपा बोली.

‘‘मजाक मत करो.’’ रेखा बोली.

‘‘दीदी, तुम नीचे के 2 कमरे हमें ही किराए पर दे दो न… आधे में सुधा है ही. हम तीनों सहेलियों की तरह रह लेंगी. मजा भी आएगा.’’

‘‘बात क्या है, साफसाफ कहो?’’ रेखा ने पूछा.

‘‘फ्लैट मालिक हमें वह घर खाली करने को कह रहा है.’’

‘‘तुम्हारा दिल यहां नहीं लगेगा. फिर रहनसहन में भी फर्क आ जाएगा.’’

‘‘यह कहो न कि देने का मन नहीं. सोचती हूं कि तुम ही ठीक हो. तुम्हारा अपना मकान है, किसी का रोबदाब नहीं. भाड़े का झंझट नहीं… कहीं भाड़े का मकान खोजने की भागदौड़ नहीं.’’ दीपा बोली.

रेखा समझ न सकी कि क्या जवाब दे. वह उस की आदतें अच्छी तरह जानती थी.

प्रशांत ने ही हल ढूंढ़ निकाला. वह बोला, ‘‘4-5 महीने में मुझे कंपनी की ओर से क्वार्टर मिल जाएगा. तुम उसे ही ले लेना. इस से तुम्हारा रहनसहन भी ऊंचा रहेगा.’’

‘‘कितनी पगड़ी देनी होगी?’’ दीपा ने पूछा

ढाई लाख का रेट चल रहा है, ऊपर से भाड़े के 6,000 रुपए.’’

‘‘मैं पगड़ी तो नहीं दे सकूंगी. वैसे आप सब अपने हैं… और अपनों से क्या लेना. हां, भाड़े के दे दूंगी.’’

‘‘अगर रहनसहन ऊंचा बनाए रखना है तो खर्च से डर क्यों? क्वार्टर लेने के लिए लोग पगड़ी और भाड़ा ले कर पीछे घूमते रहते हैं,’’ प्रशांत मुसकराया.

फिर एक दिन पता चला कि दीपा पर ढेर सारा कर्ज है. उस ने कर्ज चुकाने के लिए फ्रिज, अलमारी और सोफा बेच दिया है.

एक बार रेखा सुधा के साथ दीपा के फ्लैट पर गई तो पता चला कि वह वहां से एक बस्ती में रहने चली गई है. वहां अब वह एक कमरे में ही रह रही है, 2,000 रुपए किराया दे कर.

रहनसहन ऊंचा करने के चक्कर में कर्जदार हो कर वह नीचे ही गिरी थी. Family Story In Hindi

Social Story In Hindi: जाति क्यों नहीं जाती

Social Story In Hindi, लेखक – शकील प्रेम

रघुराम छोटी जाति का था. उस का बेटा सिपाही भरती हुआ, तो उस ने भोज कराया, पर ऊंची जाति का जानकीदास भोज में नहीं आया. उसे निराशा हुई. इसी बीच जानकीदास और एक ठेकेदार गंगू में घर की बिजली का ठेका हुआ, पर जानकीदास ने उसे कम पैसे दिए. यह मामला डीएम तक गया. क्या मामला सुलझ पाया?

रघुराम के बेटे का सिपाही पद के लिए सिलैक्शन हुआ था. घर वाले बहुत खुश थे. उन्हें अपने होनहार लड़के पर गर्व था. दौड़ में वह पूरे राज्य में 9वें नंबर पर आया था. 2 दिन पहले लड़के का जौइनिंग लैटर भी आ चुका था. तब से रघुराम के परिवार में खुशी का माहौल था. यह अलग बात थी कि घूस देने में जमीन चली गई थी, लेकिन अब रघुराम को इस का कोई मलाल नहीं था.

गांव की जिस बस्ती में रघुराम रहता था, वहां के लिए यह बहुत बड़ी बात थी, क्योंकि उन लोगों की पूरी बस्ती में एक भी सरकारी नौकरी वाला नहीं था. पहली बार उन की जाति का कोई लड़का सिपाही बनने वाला था.

हालांकि, उसी गांव के कई दबंग परिवारों में बड़ीबड़ी नौकरियां थीं. कोई प्रोफैसर, तो कोई दारोगा. टीचर तो कई थे. कुछ रेलवे में भी थे, लेकिन इस दलित बस्ती में यह पहली सरकारी नौकरी थी.

रघुराम ने इस खुशी में भोज का आयोजन किया, जिस में उस ने बड़े लोगों को भी न्योता दिया. जानकीदास को भी न्योता दिया गया, लेकिन उस के घर से कोई नहीं आया, तो रघुराम को इस बात से बहुत दुख पहुंचा.

रघुराम अगले कई दिनों तक अपनी बस्ती के लोगों से कहता रहा, ‘‘अरे, ये बड़े लोग जब भी कोई काम कहते हैं हम बिना मोलभाव किए कर देते हैं, लेकिन आज मेरे बेटे की नौकरी से इन की छाती सुलग गई है.

‘‘अब देखते हैं, इन बड़े लोगों का काम कौन करता है? अब सब से पहले दिहाड़ी तय होगी, उस के बाद ही कोई काम होगा.’’

रघुराम ने पूरी बस्ती को चेता दिया था कि उन लोगों का कोई भी काम हो तो नहीं करना है. अगर करना ही पड़ जाए तो पहले मजदूरी तय कर के ही करना है. किसी से अब कोई लागलपेट नहीं रखना है.

रघुराम अपनी बस्ती में पहले से ही रोबदाब रखता था. अब तो वह एक सिपाही बेटे का बाप हो चुका था, इसलिए बस्ती पर उस का रोब सीधे डबल हो गया था.

एक महीने के बाद एक सुबह रघुराम हाथ में थैला लिए घर का सामान लेने पास की किराना की दुकान की ओर जा रहा था कि तभी उस के कानों में आवाज आई, ‘‘रघु चाचा…’’

रघुराम ने मुड़ कर देखा तो वह गंगू था जो उस की ओर साइकिल लिए चला आ रहा था.

‘‘चाचा, तुम से एक जरूरी काम है,’’ गंगू बोला.

‘‘इतना भी क्या जरूरी काम है? मैं दुकान से कुछ सामान लेने जा रहा हूं,’’ रघुराम बोला.

‘‘चाचा, तुम सामान ले कर आ जाओ, मैं तुम्हारे घर बैठा हूं,’’ गंगू ने कहा.

‘‘ठीक है, तू घर चल. मैं 10 मिनट में आ रहा हूं,’’ रघुराम बोला.

एक घंटे के बाद रघुराम हाथमुंह धो कर घर की चारपाई पर गंगू के साथ बैठा चाय पी रहा था.

‘‘हां गंगू, अब बोल कि तुझे क्या परेशानी है?’’ रघुराम ने पूछा.

‘‘चाचा, जानकीदास का जो नया मकान बना है न, मैं ने उस मकान में बिजली का ठेका लिया था, जो 20,000 रुपए में तय हुआ था. लेकिन अब काम पूरा हो गया तो जानकीदास ने 6,000 रुपए थमाए और बोला कि इस से ज्यादा की मेरी औकात नहीं है.’’

गंगू के मुंह से इतना सुनते ही रघुराम को गुस्सा आ गया और वह बोला, ‘‘मैं ने पहले ही तुम लोगों से कहा था कि इन ऊंचे लोगों का कोई भी काम मेरे बिना पूछे नहीं करना है, लेकिन अब मेरी सुनता कौन है. अब जाओ रोओ, मरो मैं क्या कर सकता हूं…

‘‘अगर तुम ने मुझे पहले बताया होता तो जानकीदास की इतनी मजाल नहीं होती…’’ रघुराम ने कहा.

गंगू ने कहा, ‘‘चाचा, मुझ से गलती हो गई. मुझे माफ कर दो और मेरा बकाया पैसा दिलवा दो. पूरा नहीं तो 6,000 रुपए और मिल जाएंगे, तो मेरा काम बन जाएगा.’’

‘‘ठीक है, पहले तू चाय पी ले, उस के बाद चल मेरे साथ,’’ रघुराम ने कुछ सोचते हुए कहा.

जानकीदास के घर पर रघु ने काफी हंगामा खड़ा किया.

जानकीदास बोला, ‘‘इस गंगू ने मेरे पूरे मकान का सत्यानाश कर दिया. जब इस को बिजली का काम आता ही नहीं तो क्यों जिम्मेदारी ली. बल्ब का बटन दबाओ तो पंखा चलता है. बाथरूम में भी ठीक से वायरिंग नहीं की. बाकी सारा काम भी उलटासीधा किया है. सब दोबारा करवाना पड़ेगा.’’

गंगू बोला, ‘‘नहीं रघु चाचा. यह सरासर ?ाठ है. मैं पिछले 5 साल से यही काम कर रहा हूं. गुजरात, दिल्ली और पंजाब तक में मैं ने काम किया है. पिछले महीने ही महाराष्ट्र से काम खत्म कर के आया हूं.

‘‘मैं गांव आया तो इन्होंने ही मु?ा से कहा कि बिजली की फिटिंग का काम बाकी है. चलो, तुम कर दो. 20,000 रुपए में ठेका हुआ. काम पूरा हो गया तो इन्होंने खुद ही कनैक्शन उलटासीधा कर दिया, ताकि मेरे काम में गलती निकाल कर पूरे पैसे न देने पड़ें.’’

रघुराम ने गंगू की ओर से जानकीदास पर अपनी सारी भड़ास निकाल दी. बात बनने के बजाय और बिगड़ गई. मामला बातचीत से शुरू हो कर हाथापाई तक पहुंच गया. किसी तरह मास्टरजी के बीचबचाव के बाद दोनों अलग हुए.

इस के बाद जानकीदास ने एक फूटी कौड़ी और देने से इनकार कर दिया और बोला, ‘‘तेरा बेटा सिपाही बना है तो इतना घमंड और अगर वह ससुरा कलक्टर बन गया होता तब तू न जाने क्या करता. जा, तुझे जो करना है कर ले, अब एक फूटी कौड़ी भी मैं इस गंगू को नहीं दूंगा.’’

रघुराम के लिए अब बात महज चंद रुपयों की नहीं रह गई थी, बल्कि उस की इज्जत का सवाल बन गया था. उसे अब हर हाल में जानकीदास को सबक सिखाना था.

रघुराम अपनी बस्ती के कुछ लोगों को ले कर थाने पहुंचा और हरिजन ऐक्ट में मारपीट का मामला दर्ज कराने की कोशिश की, लेकिन दारोगा को पहले ही खबर मिल चुकी थी. उस ने रघुराम को समझाया और किसी तरह उसे वापस घर भेज दिया.

घर पहुंच कर रघुराम को लगा कि दारोगा और जानकीदास की जाति एक होने की वजह से दारोगा ने उस की नहीं सुनी.

अगले दिन रघुराम अपने साथ कुछ लोगों को ले कर सीधे डीएम के यहां पहुंचा. डीएम से मुलाकात होने पर रघुराम ने कहा, ‘‘हमारे गांव के कुछ ऊंची जाति के लोगों ने हमारा जीना दूभर किया हुआ है. वे हम से छुआछूत करते हैं और काम करवा कर पूरा पैसा नहीं देते हैं. पैसा मांगने जाओ तो मारते हैं.’’

डीएम ने कहा, ‘‘कल हमारा उस तरफ का दौरा भी है, इसलिए हम कल 12 बजे तक तुम्हारे गांव आएंगे. तुम अभी जाओ.’’

रघुराम घर लौट आया, लेकिन उसे डीएम की बात पर रत्तीभर भी यकीन नहीं था. उसे लगा कि उस ने उसे बेवकूफ बना कर भगा दिया है.

अगले दिन रघुराम अपनी चारपाई पर बैठा बस्ती के कुछ लोगों के साथ बात कर रहा था कि तभी गंगू हड़बड़ाता हुआ उस के दरवाजे पर पहुंचा और चिल्ला कर बोला, ‘‘डीएम साहब आए हैं. प्रधान के यहां बैठे हैं. तुम्हें बुला रहे है. दारोगा भी हैं साथ में और डीएम साहब ने जानकीदास को भी बुलाया है.’’

थोड़ी देर में प्रधान के घर लोगों का मजमा लगा हुआ था. बाहर डीएम की गाड़ी के साथ 4-5 गाडि़यां और लगी हुई थीं. डीएम साहब सामने कुरसी पर बैठे थे. दारोगा और प्रधान दोनों चारपाई पर बैठे थे. सामने वाली चारपाई पर जानकीदास और कुछ और लोग थे.

रघुराम ने दारोगा की ओर देखे बिना सीधे डीएम साहब को नमस्कार किया और खाली पड़ी कुरसी पर बैठ गया.

डीएम साहब की फटकार के बाद जानकीदास ने गंगू के बकाया पैसे दे दिए. डीएम साहब ने रघुराम से कहा, ‘‘अब से कोई भी मजदूरी रोके तो सीधे डीएम औफिस चले आना, सब को ठीक कर दूंगा. अब तो तुम्हें कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए, फिर भी और कोई शिकायत है, तो अभी बता दो.’’

रघुराम ने कहा, ‘‘ये लोग हम से छुआछूत करते हैं. हमारे यहां भोज नहीं करते, क्योंकि हम निचली जाति के हैं. इस जानकीदास से पूछो. मेरे बेटे की नौकरी लगने की खुशी में मैं ने भोज किया था. जानकीदास को न्योता भेजा था, लेकिन यह नहीं आया, क्योंकि मैं छोटी जाति से हूं न.’’

डीएम साहब ने पूछा, ‘‘तुम किस जाति से हो?’’

रघुराम ने जवाब दिया, ‘‘मल्लाह.’’

डीएम ने फिर पूछा, ‘‘तुम्हारी बस्ती में और कौनकौन सी जातियां हैं?’’

रघुराम बोला, ‘‘हमारी बस्ती में केवल हमारी जाति के ही लोग रहते हैं. दूसरी छोटी जाति के लोगों का टोला अलग है.’’

डीएम ने बाल्मीकि टोले से एक आदमी को बुलाया और उस से पूछा, ‘‘तुम्हारा नाम क्या है?’’

‘‘जी हुजूर, मेरा नाम भुवन है,’’ उस आदमी ने हाथ जोड़ कर कहा.

डीएम साहब ने कहा, ‘‘भुवन, जाओ और अपने घर से एक थाली में खिचड़ी बनवा लाओ.’’

भुवन ने आदेश का पालन किया. थोड़ी देर में वह थाली हाथ में लिए हाजिर था, जो अब भी थोड़ी गरम थी. सब लोग इस नजारे को हैरत भरी निगाहों से देख रहे थे.

डीएम ने प्रधान के यहां से चम्मच मंगवाया और पहले खुद 2-3 चम्मच खिचड़ी खाई, फिर दारोगा को बोला
कि खाओ तो दारोगा ने भी 2 चम्मच खिचड़ी निगल ली. उस के बाद डीएम ने जानकीदास से कहा, ‘‘लो भई, तुम भी खाओ.’’

न चाहते हुए जानकीदास ने भी एक चम्मच खिचड़ी खा ही ली. अब बारी रघुराम की थी. डीएम ने थाली उस के आगे बढ़ा दी और बोले, ‘‘लो, तुम भी खाओ. भुवन ने बड़ी स्वाद खिचड़ी बनाई है.’’

भुवन ने कहा, ‘‘नहीं सरकार, मैं ने नहीं बनाई, बल्कि मेरी बीवी ने बनाई है. जल्दबाजी में शायद थोड़ी कच्ची रह गई है.’’

डीएम साहब ने कहा, ‘‘अरे नहीं भुवन, ऐसी खिचड़ी तो मैं ने जिंदगी में पहली बार खाई है. लाजवाब है.’’

डीएम साहब ने थाली रघुराम के सामने रख दी, लेकिन उसे तो जैसे सांप सूंघ गया था. उस के सामने खिचड़ी पड़ी रही, लेकिन उस ने उसे हाथ तक नहीं लगाया.

थोड़ी देर इंतजार करने के बाद डीएम साहब ने रघुराम के सामने से थाली उठा ली और प्रधान के यहां से थोड़ा अचार मंगा कर खुद ही बची हुई खिचड़ी डकार गए.

डीएम साहब जाने लगे तो उन्होंने जानकीदास से कहा, ‘‘जातिवाद हमारे समाज की काली सचाई है. जब तक तुम जैसे लोग अपने श्रेष्ठ होने का भरम पाले रखोगे, तब तक यह सामाजिक कलंक बना रहेगा, इसलिए जितनी जल्दी हो सके अपना जातीय दंभ छोड़ कर इनसान बन जाओ.’’

जातेजाते डीएम साहब ने रघुराम से भी कहा, ‘‘जातिवाद खुद को दूसरों से श्रेष्ठ समझने की एक दिमागी बीमारी भी है, जिस से पूरा समाज ग्रसित है. तुम दूसरों के बदलने की उम्मीद तब तक नहीं कर सकते, जब तक तुम खुद इस बीमारी से न निकल जाओ, इसलिए आज के बाद कभी भी किसी से भी जातिवाद या छुआछूत की शिकायत मत करना.

‘‘पहले तुम खुद इस बीमारी से नजात पा जाओ, उस के बाद ही किसी और से इस की उम्मीद करना. जब तक तुम्हारा बरताव तुम से नीचे के लोगों के प्रति जायज नहीं है, तब तक तुम्हें अपने से ऊपर के लोगों पर उंगली उठाने का कोई हक नहीं है.’’

शर्मिंदा रघुराम नजरें नीची किए वहीं खड़ा रहा. Social Story In Hindi

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