Social Story: गौसेवा के नाम पर हिंसा और चंदा वसूली

Social Story: पिछले कुछ सालों के आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो देश में गौरक्षा के नाम पर कुछ संगठनों द्वारा हिंसक वारदात को अंजाम दिया जा रहा है, जो चिंता की बात है. अमूमन इन वारदात में मुख्य रूप से मुसलिम ट्रक चालकों और व्यापारियों को निशाना बनाया गया है. ये हिंसक वारदात मवेशी तस्करी या अवैध वध को रोकने के बहाने की गई हैं. हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, असम, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, पंजाब, जम्मूकश्मीर और कर्नाटक सहित कई राज्यों में इन हमलों ने गौरक्षक समूहों द्वारा किए जा रहे हमलों में स्थानीय अधिकारियों, विशेष रूप से पुलिस की भूमिका भी गैरजिम्मेदाराना रही है.
भारत में जिस तरह से हिंदूमुसलिम को बांटने की राजनीति चल रही है,

उस में विभिन्न राज्यों में मुसलिमों के खिलाफ हिंसक हमलों की लहर सी चल रही है. गौरक्षा के नाम पर सक्रिय समूहों ने कानून को अपने हाथ में ले लिया है और गायों की तस्करी या वध के आरोपी मुसलिमों को निशाना बना रहे हैं. ऐसा नहीं है कि गायों की तस्करी और अवैध परिवहन में केवल मुसलिम समाज ही शामिल है, बल्कि हिंदू धर्म के लोग खुद को गाय का हिमायती बता कर सब से ज्यादा गौवंश की तस्करी में शामिल पाए जाते हैं. गौरक्षा दल और दक्षिणपंथी संगठनों के अन्य गौसंरक्षण संगठन के लोग कानून की परवाह किए बिना काम कर रहे हैं. पीडि़त, जो अकसर मवेशी या संबंधित उत्पादों के परिवहन में शामिल मुसलिम होते हैं, अनुचित हमले और धमकियों का शिकार हो रहे हैं.

मध्य प्रदेश के कई छोटे बड़े शहरों में सभी तरह की दुकानों पर गाय की आकृति वाली प्लास्टिक की चंदा जमा करने वाली गुल्लक रखी हुई हैं, जिन में दुकान पर आने वाले ग्राहक चंदे के नाम पर कुछ राशि डालते हैं. ग्राहकों को बताया जाता है कि कमजोर और आवारा गाय को सहारा देने के लिए गौशालाएं पैसा खर्च कर रही हैं, जबकि हकीकत इस से अलग है. गौशालाओं के नाम पर व्यापार किया जा रहा है. ऐसे ही एक दुकानदार से जब पूछा गया, तो उस ने बताया गया कि गौशाला चलाने वाली संस्थाओं के नुमाइंदे इन गुल्लकों को दुकान पर छोड़़ जाते हैं और एक निश्चित समय के बाद दुकान में कर उस में डले हुए रुपए निकाल कर ले जाते हैं. गौशाला चलाने वाले ज्यादातर लोग किसी राजनीतिक दल से जुड़े़ लोग होते है, जो स्वयंसेवी संस्था बना कर सरकारी अनुदान का जुगाड़़ करने में माहिर होते हैं.

सड़़को पर आवारा घूमती गायों और इन गुल्लकों को देख कर यह सवाल उठता है कि आखिर गौसेवा के नाम पर उगाहे जा रहे इस चंदे का इस्तेमाल कौन सी गायों की सेवा पर किया जाता है? हालांकि, कुछ ऐसी गौशालाएं आज भी हैं जो बिना चंदे या शासकीय अनुदान के प्रचार से कोसों दूर कमजोर और बीमार गायों की सेवा कर रही हैं. पर दर्जनों संगठन गौसेवा के नाम पर देश में हिंसा फैला रहे हैं, गौरक्षकों की टोली आएदिन सड़़कों पर गायों का परिवहन करने वाले ट्रकों को रोक कर ड्राइवर और क्लीनर से मारपीट कर उन से चौथ वसूली कर रही है और शासनप्रशासन इन लोगों को खुली छूट दे रहा है. सवाल यह भी उठता है कि गाय का परिवहन करने वाले ट्रकों को रोक कर उस के ड्राइवर से मारपीट करने वाले इन गौरक्षकों का खून सड़कों पर आवारा घूमती गाय को देख कर क्यों नहीं खोलता? गौहत्या और गौमांस के मुद्दे पर कानों सुनी बातों पर मौब लिंचिंग पर उतारू इन भक्तों की भीड़ को सोचना होगा कि वे गाय को एक तरफ तो मां का दर्जा देते हैं और फिर उन्हें इस तरह सड़कों पर आवारा छोड़ देते हैं.

क्यों? धार्मिक पाखंड है जिम्मेदार दरअसल, गाय की इस हालत के लिए धार्मिक पाखंड सब से ज्यादा जिम्मेदार है. कपोल कल्पित कथा पुराणों में जब यह बताया गया है कि गाय में तैंतीस करोड़ देवताओं को निवास है, तो फिर लोग गाय की पूजा करने के बजाय मंदिरों में भगवान को क्यों तलाशते फिर रहे हैं?
कपोल कल्पित कथाओं से बड़ेबड़े पंडालों में होने वाली धार्मिक कथाओं में बताया जाता है कि दान की गई इसी गाय की पूंछ पकड़ कर स्वर्ग के रास्ते में पड़ने वाली एक वैतरणी नदी को पार करना पड़ता है.
इसी पाखंड की वजह से मध्य प्रदेश की एक महिला मुख्यमंत्री तो सड़क पर अपने काफिले को रोक कर गाय को रोटी खिलाती थीं. आखिर लोगों को यह बात में क्यों नहीं आती कि गाय को हरे चारे और भूसा की जरूरत रोटी से कहीं ज्यादा है? सच बात तो यह है कि गाय सिर्फ और सिर्फ एक पालतू पशु है. धर्म के ठेकेदार पंडेपुजारी अपने फायदे के लिए गाय को दान करने का उपदेश देते हैं.

पापपुण्य का डर दिखा कर लोगों को बताया जाता है कि गौदान करने से आदमी सीधे स्वर्गलोक की टिकट पा? जाता है. सालभर में दान के नाम पर लाखों की संख्या में गायों को दान में दिया जाता है, मगर ये गायें पंडों के घरों में दिखाई नहीं देती हैं. जाहिर है कि दान में मिली गायों को पंडे व्यापारियों को बेच देते हैं या फिर दूध दुहने के बाद सड़कों पर छोड़ देते हैं. हिंदुओ में गाय को तब तक माता माना जाता है तब तक वह दूध देती है. इस के बाद उसे आवारा छोड़ दिया जाता है. गाय को माता मानने वालों का दोहरा चरित्र यह भी है कि वे अपनी बूढ़ी और बेकार गोमाता को कसाई को बेचने में भी संकोच नहीं करते हैं.
गोभक्ति का एक पक्ष यह भी है कि गोमाता के मरने पर वे उस की लाश को नहीं उठाते हैं, यहां तक कि उसे छूते भी नहीं हैं. ऐसा करने पर उन का धर्म भ्रष्ट हो जाता है, इसलिए उसे उठा कर ले जाने के लिए वे दलित बस्ती से उन लोगों को बुला कर लाते हैं, जो मरे पशुओं की खाल उतारने का काम करते हैं. यह भारत की अकेली पाखंडी कौम है, जो अपनी गोमाता को सड़़कों पर भूखा मरने के लिए छोड़़ देती है और मरने पर अपनी मां को कंधा भी नहीं देती है.

सरकारी
कोशिशें दिखावे तक सीमित सरकार गौवंश की रक्षा की बात तो करती है, पर गाय को सड़क से हटाने के लिए कोई ठोस प्रयास अभी तक नहीं कर पाई है. मध्य प्रदेश में गायें सड़कों पर मारीमारी फिर रही हैं और सरकार विदेशों से चीता ला कर उन पर करोड़ों रुपए पानी की तरह बहा रही है. मध्य प्रदेश की भगवा सरकार धर्म की दुहाई दे कर गाय को माता तो मानती है, मगर आवारा घूमती गाय की बेचारगी उसे दिखाई नहीं देती. आज मध्य प्रदेश के गांवकसबों और शहरों में सड़क पर आवारा घूमती गाय सरकार के नुमाइंदों को दिखाई नहीं दे रही है. गाय और गौमांस की तस्करी की खबर पर मौब लिंचिंग पर उतारू बजरंग दल के लोगों को सड़क पर भूखीप्यासी गाय दिखाई नहीं देती. दक्षिण अफ्रीका के नामीबिया से कूनोपालपुर नैशनल पार्क में चीते लाए गए हैं, जिन के भोजन के सैकड़ों की तादाद में चीतल सहित दूसरे जंगली जानवरों को हलाल किया जा रहा है.

यह बात लोगों के गले नहीं उतर रही है कि यह किस तरह का पर्यावरण संरक्षण है, जिस में सैकड़ों की तादाद में जंगली जानवरों की बलि दे कर केवल चीते का संरक्षण किया जा रहा है? मौजूदा दौर में खेती में मशीनीकरण से गौवंश के बैल बेकार होने चाहिए थे, लेकिन दूध देने वाली गाय क्यों बेकार हुई? इस सवाल का जवाब किसी के पास है, ही कोई खोजना चाहता है. आज तो छोटे शहर से ले कर दिल्ली तक सरकार की हर लेयर पर कथित गौरक्षा समर्थित दल हैं, तब क्यों नहीं कोई राष्ट्रीय गौनीति लाई जाती?
गौहत्या की चिंता करने वालों को यह चिंता भी करनी होगी कि गाय सड़कों पर अपमानित और मरने के
लिए नहीं आवारा फिरें, बल्कि घरों में जगह पाए. आज भी गांवदेहात में कई परिवारों की आजीविका का स्रोत गाय का दूध और उस से बने उत्पाद दहीमक्खन और घी हैं. गाय के गोबर से बने उपले लाखों घरों के चूल्हों का ईंधन बने हुए हैं, पर वर्तमान में गाय की बदहाली किसी से छिपी नहीं है. जनवरी, 2022 के आखिरी दिनों में भोपाल के नजदीक बैरसिया में एक महिला भाजपाई नेता की गौशाला में 100 से ज्यादा गायों की मौत हो गई थी.

इस गौशाला में 500 गायें हैं. उस समय गौशाला के नजदीक बने कुएं में 20 गायों के शव और मैदान में 80 से ज्यादा गायों के शव और कंकाल पड़े मिले थे. उस के बाद उन भाजपाई नेता पर पुलिस ने केस दर्ज किया था और प्रशासन ने गौशाला का संचालन अपने हाथ में ले लिया था.
आज भी प्रदेश में खोली गई ज्यादातर गौशालाओं का संचालन राजनीतिक रसूख वाले लोग ही कर रहे हैं. गौशालाओं में हट्टीकट्टी गायें ही रखी जाती हैं, जिन का घी दूध पी कर गौमाता की सेवा करने का ढोंग करते हैं और लाचार, बीमार गायें सड़कों पर आवारा घूमती हैं, उस की फिक्र इन को कभी नहीं रहती.
सरकार को चुनावी फायदे की बात छोड़ कर गाय की लाचारगी की चिंता है तो किसानों को गाय पालने की अनिवार्यता का नियम लागू करना चाहिए. जो किसान गाय का पालन करे, उसे ही सरकारी सब्सिडी और दूसरे फायदे मिल सकें.

मध्य प्रदेश में तो बाकायदा गौसेवा आयोग भी बना कर उस के अध्यक्ष को राज्यमंत्री का दर्जा भी दिया जाता है, पर प्रदेश में गायों की बदहाली गौसेवा आयोग के वजूद पर ही सवालिया निशान लगाती है.
छत्तीसगढ़ के रायपुर में रहने वाले के साहित्यकार, संपादक वरुण सखाजी चर्चा के दौरान बताते हैं कि गौहत्या का विरोध कर के उन्माद में कर मरनेमारने पर उतारू लोग भीड़तंत्र का हिस्सा तो बन जाते हैं, पर गायों की आवारगी पर बात नहीं करना चाहते. वे इसे एक तरह की छद्म धार्मिकता और जाहिलपन ही मानते हैं. वे तल्ख अंदाज में कहते हैं, ‘‘हम अपने बब्बा (पिता के पिता) को कोई गाली दे तो गाली देने वाले को मार डालेंगे, लेकिन अपने घर में उसे खुद चाहे दोनों टाइम पीटें, कोई फर्क नहीं पड़ता. यह दोहरापन ठीक नहीं है.’’फसलों को चट कर रहे आवारा पशु  एक दौर था जब पशुपालन किसानों के लिए आमदनी का जरीया हुआ करता था. लोग गायभैंस, बकरी पाल कर इन के दूध, घी, मक्खन को बेच कर घरपरिवार की जरूरतों को पूरा करते थे.

बैल खेती किसानी के कामों में हलबखर चलाते थे. बैलगाड़ी में किसान अपनी उपज मंडियों तक ले जाता था. नई तकनीक आने से अब खेती में कृषि उपकरणों का इस्तेमाल बढ़ गया है. इस के चलते पशुपालन में अब किसानों की दिलचस्पी कम हो गई है. अब लोग पालतू पशुओं को दूध देने तक घर में रखते हैं, पर बाद में उन्हें छुट्टा छोड़ देते हैं. आजकल गांवकसबों में आवारा पशुओं के चलते फसलों की हिफाजत करना एक बड़ी समस्या बन कर उभर रही है. साल 2023 में देश के पशुपालन और डेयरी विभाग ने एक रिपोर्ट जारी की थी, जिस के मुताबिक 20वीं पशुधन गणना से पता चलता है कि देश में 50.21 लाख आवारा मवेशी सड़कों पर घूम रहे हैं. इन में राजस्थान में सब से ज्यादा 12.72 लाख और उत्तर प्रदेश में 11.84 लाख मवेशी सड़कों पर आवारा घूमते हैं. देशभर में आवारा पशुओं को पालने की सालाना लागत 11,000 करोड़ रुपए से ज्यादा है. मवेशियों की हत्या पर बैन और गौरक्षकों के डर से आवारा पशुओं की समस्या तेजी से बढ़ी है और उत्तर प्रदेश में दूध देने वाले पशुओं को पालना किसानों के लिए मुश्किल होता जा रहा है.

लौकडाउन के पहले दतिया के रेलवे स्टेशन पर आवारा पशुओं का जमावड़ा लगा रहता था. ये आवारा गायबैल मुसाफिरों के खानेपीने की चीजों पर पट पड़ते थे. कई बार इन आवारा जानवरों के अचानक रेलवे प्लेटफार्म पर दौड़ लगाने से बच्चे, महिलाएं और बुजुर्गों को चोट भी लग जाती थी. होशंगाबाद जिले के पचुआ गांव में साल 2018 में चरनोई जमीन पर गांव के कुछ रसूख वाले किसानों ने कब्जा कर लिया था, जिस के चलते गांव के आवारा पशु किसानों के खेत में घुस कर फसलों को नुकसान पहुंचाने लगे थे. इस बात को ले कर 2 पक्षों में हो गया था, जिस में एक आदमी की मौत हो गई थी. दूसरे पक्ष के 2 लोग हत्या के आरोप में हवालात में बंद हैं. पिछले कुछ सालों में देश के अलगअलग इलाकों में हुईं ये घटनाएं बताती हैं कि हमारे देश में पशुओं की आवारगी लोगों के लिए मुसीबत का सबब बन गई है. किसानों की हाड़तोड़ मेहनत से उगाई गई फसल जब आवारा पशु चर लेते हैं, तो वे मनमसोस कर रह जाते हैं.

गांवकसबों में दबंगों के पाले पशु आवारा घूमते हैं और दलितपिछड़ों की जमीन पर उगी फसल चट कर
जाते हैं. दबंगों के डर से इन आवारा पशुओं को रोकने की हिम्मत कोई नहीं कर पाता. चरनोई जमीन की कमी में आवारा घूमते पशु मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के राज में आवासीय पट्टा देने के लिए सरकारी जमीन के अलावा चरनोई जमीन का भी अलौटमैंट राजस्व महकमे द्वारा दलितों को कर दिया गया था. सरकार के इस कदम से बचीखुची चरनोई जमीन भी खत्म हो गई. इसी तरह गांवदेहात के इलाकों में कृषि उपज मंडी, अस्पताल, स्कूल और दूसरी तरह की सरकारी इमारतों को भी चरनोई जमीन के रकबे पर बनाया जा रहा है. किसानों द्वारा भी वेयरहाउस, पैट्रोलपंप, बरातघर वगैरह भी खेती की जमीन पर बन रहे हैं. कसबों और शहरों में भी खेतीबारी वाली जमीन पर आवासीय कालोनी बना कर प्लाट बेचे जा रहे हैं. गांवों में चरनोई जमीन के अलावा जो पठारी क्षेत्र या सरकारी जमीन बची है, उस पर भी दबंगों का कब्जा है.

आज शहर और गांव की सड़कों पर बनाए बैठे पशुओं की आवारगी की खास वजह भी खत्म होती चरनोई जमीन ही है. गांवदेहात में चरनोई जमीन के नाम पर कुछ नहीं बचा है. ऐसे में वे किसान, जिन के पास खुद की जमीन नहीं है, गायभैंसों को खुला छोड़ देते हैं. चरनोई जमीन नहीं होने से गायें खेतों में घुस कर फसलों को खा जाती हैं और जिन किसानों की फसलों को नुकसान होता है, वे लड़ने पर आमादा हो जाते हैं. गांवों में चरनोई जमीन नहीं होने और गौपालन में किसानों की दिलचस्पी कम होने के चलते शहर की सड़कों में भी गायें आवारा घूमती हैं. लोगों द्वारा प्लास्टिक की पन्नी में फेंकी गई खाने की चीजों को खाने के चक्कर में गायें प्लास्टिक की पन्नी भी खा लेती हैं और गंभीर बीमारियों का शिकार हो रही हैं. चरनोई जमीन पर कब्जा किए दबंगों के राजनीतिक दबदबे के चलते इन पर शिकंजा नहीं कसा जा सका है. सरकार चरनोई जमीन को इन दबंगों के चंगुल से छुड़ाने की कोई योजना बनाए तो गायों के लिए चरने के इंतजाम के साथसाथ पशुपालन के प्रति किसानों की दिलचस्पी भी जाग सकती है.

हमारे देश की कानून भी दोहरे मापदंड वाला है. एक तरफ सुप्रीम कोर्ट कहता है कि आवारा पशुओं का भी खयाल रखो और अपनी फसलों को भी सहीसलामत रखो. पर यह कैसे मुमकिन है? जमीनी हकीकत
यह है कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश के इलाकों में नीलगाय, सूअर, गाय, बकरी, भैंस जैसे आवारा पशुओं से फसल बचाने के लिए किसान खेतों में रतजगा कर रहे हैं. आवारा पशुओं को किसान मार भी नहीं सकते, क्योंकि यह गैरकानूनी है. गांवदेहात में खेती करने वाले छोटे किसानों के पास जो जमीन है, उस पर किसी बड़े फार्महाउस जैसी तार की बाड़  नहीं होती है. गरीब और पिछड़े पशुपालक अपने पालतू पशुओं को खुद चराने ले जाते हैं, पर ऊंची जाति के दबंगों के पशु बेखौफ आवारा घूमते हैं. देश का कानून भी उपदेशकों की तरह केवल उपदेश देता है.       

वेणी शंकर पटेल ‘ब्रज’        

Bihar Politics: नीतीश कुमार बरखास्त-मंडल को कमंडल ने कुचला

Bihar Politics: नीतीश कुमार, जो पिछले 2 दशकों से बिहार के मुख्यमंत्री रहे, अब वे राज्यसभा में हैं. यह नीतीश कुमार का डिमोशन है, लेकिन इतना तय है कि बिहार में भारतीय जनता पार्टी के लिए अब रास्ता पूरी तरह साफ है. नीतीश कुमार कभी सामाजिक न्याय और सैकुलरिज्म की राजनीति के प्रमुख नेताओं में से एक थे, लेकिन राजनीतिक मजबूरियां, गठबंधन और उम्र के साथसाथ उन की इमेज बदलती गई. अब बिहार की राजनीति एक नए दौर में जा रही है, जहां नीतीश युग खात्मे की ओर है.

बड़ा सवाल यह है कि क्या नीतीश युग के साथसाथ बिहार में सैकुलरिज्म और सामाजिक न्याय की राजनीति का युग भी खत्म हो जाएगा? इस के साथ ही बिहार के पिछड़ों, दलितों, मुसलिमों की चाबी पूजापाठी ऊंची ब्राह्मण, राजपूत और कायस्थ जातियों के हाथों में अंगरेजों के जमाने की तरह जाएगी.
नीतीश कुमार जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन से राजनीति में आए थे. वे राम मनोहर लोहिया, कर्पूरी ठाकुर, सत्येंद्र नारायण सिन्हा और वीपी सिंह जैसे समाजवादी नेताओं की वैचारिक विरासत को आगे ले जाने वाले नेता रहे हैं.

साल 1990 में वीपी सिंह सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशें लागू की थीं, जिस से ओबीसी को
27 फीसदी रिजर्वेशन का रास्ता साफ हुआ था. नीतीश कुमार सामाजिक न्याय की इस विचारधारा का हिस्सा थे और बिहार में ओबीसी रिजर्वेशन के सब से बड़े समर्थक थे. साल 1994 में नीतीश कुमार ने कुर्मीकोइरी वोट बैंक को ध्यान में रख कर जौर्ज फर्नांडीस के साथ समता पार्टी बनाई. साल 1996 में समता पार्टी ने भाजपा से गठबंधन किया. भाजपा से नीतीश कुमार का यह शुरुआती गठबंधन सिर्फ राजनीतिक हितों के लिए था. नीतीश कुमार ने भाजपा से गठबंधन के बावजूद विचारधारा से कोई समझौता नहीं किया था. साल 1998 से साल 2004 तक अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में नीतीश कुमार रेल, भूतल परिवहन और कृषि मंत्री रहे. इस दौर तक सांप्रदायिक ताकतों के साथ राजनीतिक गठबंधन के बावजूद नीतीश कुमार की इमेज सैकुलर और समाजवादी नेता की ही रही.

साल 2005 में भाजपा के साथ गठबंधन में नीतीश कुमार पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने. मुख्यमंत्री बनने के बाद महिलाओं के लिए 50 फीसदी पंचायती राज आरक्षण लागू किया. अत्यंत पिछड़ी जातियों के लिए अलग श्रेणी ईबीसी बनाई और इस वर्ग के लिए विशेष योजनाएं शुरू कीं. ईबीसी को सरकारी नौकरियों में रिजर्वेशन दिया. साल 2023 में जब नीतीश कुमार भाजपा के साथ महागठबंधन की सरकार चला रहे थे, तब उन्होंने बिहार में पहली बार जाति पर आधारित सर्वे कराया. यह जातिगत सर्वे ओबीसी और ईबीसी को राजनीतिक फायदा पहुंचाने वाला ऐतिहासिक कदम साबित हुआ. नीतीश कुमार का यह कदम मंडल राजनीति का विस्तार ही था. कभी सैकुलरिज्म के प्रणेता थे नीतीश कुमार  आज भाजपा की गोद में बैठे हैं, लेकिन एक समय था जब वे सैकुलरिज्म को अपना मूल सिद्धांत मानते थे और अपने इस सिद्धांत के लिए किसी भी हद तक जा सकते थे. साल 2013 का उदाहरण सामने है, जब भाजपा ने गुजरात के तब के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने का फैसला किया, तो नीतीश कुमार ने भाजपा के साथ 17 साल पुराना गठबंधन एक झटके में तोड़ दिया था और इसे सिद्धांतों की लड़ाई बताया था.

भाजपा के साथ गठबंधन टूटने के बाद जद (यू) के राष्ट्रीय परिषद में दिए अपने भाषण में नीतीश कुमार ने साफ कहा था, ‘‘हम सैकुलरिज्म पर समझौता नहीं कर सकते. भारत एक ऐसा देश है जहां कई धर्म, जाति, भाषा और कल्चर के लोग साथ रहते हैं. ऐसे देश का नेतृत्व वही व्यक्ति कर सकता है, जिस के पास सैकुलर क्रेडेंशियल्स हों, समावेशी नजरिया हो और जो समाज के सभी वर्गों को साथ ले कर चल सके.’’
बिहार विधानसभा में दिए गए एक भाषण में उन्होंने कहा था, ‘‘मोदी की राजनीति संविधान के मूल्यों पर हमला है. देश का नेतृत्व करने वाला व्यक्ति सैकुलर होना चाहिए और उसे समावेशी विकास की दृष्टि रखनी चाहिए. यह देश संविधान के तहत बना है. ‘‘सवाल यह है कि संवैधानिक दृष्टि जीतेगी या हम यह देश विभाजन और धु्रवीकरण की विचारधारा को समर्पण कर देंगे? मैं वादा करता हूं हम विभाजन की राजनीति के हाथों इस देश को बरबाद नहीं करने देंगे.’’

सैकुलरिज्म के प्रति इस ईमानदार वक्तव्य के बाद कांग्रेस के तब के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नीतीश कुमार कोसैकुलर लीडरकरार दिया था, जिस पर नीतीश कुमार ने उन्हें धन्यवाद भी दिया था. यह नीतीश कुमार को सैकुलरिज्म के प्रणेता के रूप में स्थापित करने वाला दौर था. भाजपा के साथ 17 साल की रिलेशनशिप से साल 2013 के ब्रेकअप के बाद नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद यादव और कांग्रेस के साथमहागठबंधनबनाया. साल 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में यह गठबंधन भाजपा के खिलाफ सैकुलर ताकतों का प्रतीक बना. नीतीश कुमार ने तब इस सैकुलर मोरचे कोसंविधान बचाओकी लड़ाई बताया. इस चुनाव में महागठबंधन की भारी जीत हुई और नीतीश कुमार फिर मुख्यमंत्री बने. इस दौरान उन्होंने भाजपा कोबड़ा झूठा पार्टीजैसे शब्दों से नवाजा और कहा कि उन का सैकुलरिज्म सत्ता के लिए नहीं, बल्कि सिद्धांत के लिए है. नीतीश कुमार की राजनीतिक जड़ें समाजवादी आंदोलन से जुड़ी हैं.

उन्होंने जयप्रकाश नारायण और राम मनोहर लोहिया की परंपरा को कायम रखा. साल 2017 में जब भ्रष्टाचार के मुद्दे पर राजद छोड़ कर फिर भाजपा से हाथ मिलाया, तब बिहार विधानसभा में उन्होंने कहा था, ‘‘सैकुलरिज्म एक महान विचार है. यह सिर्फ भ्रष्टाचार छिपाने का शब्द नहीं है.’’ राजनीति में सत्ता की मजबूरी अलग बात है, लेकिन इतिहास के पन्नों में नीतीश कुमार का वह चेहरा हमेशा दर्ज रहेगा, जब वे सैकुलरिज्म के प्रणेता के रूप में खड़े थे. आज सत्ता की गोद में बैठे होने के बावजूद नीतीश कुमार के पुराने भाषण और फैसले याद दिलाते हैं कि राजनीति में सिद्धांत कभीकभी सत्ता से पहले आते हैं. बिहार की जनता नीतीश कुमार को आसानी से भुला नहीं पाएगी. नीतीश कुमार के पाला पलटने में पिछड़ी जातियों में धर्मकर्म की बढ़ती पैठ भी है. पिछड़ी जातियों का एक हिस्सा सोचता है कि वह भी पूजा कर के ही ऊंची जातियों जैसी ऐश कर सकता है. ऐसी ही सोच अमेरिका तक में है, जहां ईसाई कट्टर गुलामी को चर्चों के दरवाजों से लाने की कोशिश में हैं.

सिद्धांत बनाम सत्ता की जंग नीतीश कुमार की यात्रा समाजवादी विचारधारा से शुरू हुई और सांप्रदायिक सत्ता की गोद में खत्म होने के कगार पर है. नीतीश कुमार का यह राजनीतिक सफर मंडल से शुरू हो कर कमंडल पर खत्म होता नजर रहा है. बिहार में अब भाजपा की दक्षिणपंथी राजनीति हावी हो रही है जहां सामाजिक न्याय और सैकुलरिज्म का नैरेटिव कमजोर पड़ गया है. बिहार की राजनीति में साल 2020 से ही भाजपा का दबदबा बढ़ना शुरू हुआ. साल 2020 विधानसभा चुनाव में भाजपा ने जद (यू) से ज्यादा सीटें जीतीं. जद (यू) 43 सीटों पर जीती थी, तो भाजपा ने 74 सीटें जीती थीं. इस के बावजूद नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाए रखा गया. नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाए रखना भाजपा की मजबूरी थी. बिहार में भाजपा के पास अपना कोई नेता नहीं था. उस ने धीरेधीरे नीतीश कुमार के कोर वोट बैंक पर कब्जा करना शुरू किया और साल 2026 आतेआते भाजपा ने नीतीश को पूरी तरह साइडलाइन कर दिया.

2025 के विधानसभा चुनाव में राजग जीता और भाजपा सब से बड़ी पार्टी बन गई, फिर भी नीतीश को मुख्यमंत्री बनाए रखा गया, लेकिन यह सिर्फ ट्रांजिशन पीरियड था. असली खेल तो अब शुरू होने वाला था. नीतीश कुमार ने 5 मार्च, 2026 को राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन दाखिल किया. यह फैसला अचानक आया और जद (यू) के कई कार्यकर्ताओं ने इस का विरोध भी किया. इस से बिहार में पहली बार भाजपा का मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ हो गया. समाजवादी पार्टी ने पोस्टर जारी किया, जिस में लिखा था किपहले इस्तेमाल करो, फिर बरबाद करो’. राजद के तेजस्वी यादव ने कहा कि भाजपा नीतीश और जद (यू) को खत्म करने की साजिश रच रही है. भाजपा ने नीतीश कुमार की उम्र और सेहत की दुबली कंडीशन का फायदा उठाया. भाजपा हिंदुत्व कार्ड खेल कर ईबीसी और दलित वोट बैंक को काफी हद तक हड़पने में कामयाब रही. भाजपा ने नीतीश कुमार को धीरेधीरे कमजोर किया. वैसे यह भाजपा की पुरानी रणनीति का हिस्सा है. सहयोगी को जरूरत तक इस्तेमाल करो और खुद को मजबूत बनाओ.

अब बिहार में भाजपा की राजनीति शुरू हो चुकी है और जद (यू) का भविष्य संकट में है. बिहार में अब स्कूलकालेजों की जगह मंदिरों की मरम्मत की जा रही है. नीतीश कुमार खुद सीतामढ़ी में जानकी मंदिर बनवा रहे हैं. सामाजिक न्याय की लड़ाई क्यों जरूरी सदियों पुरानी जाति पर आधारित गैरबराबरी को चुनौती देने के लिए ही सामाजिक न्याय की लड़ाई शुरू हुई थी. यह ओबीसी की जातियों को मुख्यधारा से जोड़ने का मिशन था. सामाजिक न्याय का मतलब केवल आरक्षण या वोट बैंक की राजनीति नहीं है, बल्कि संवैधानिक मूल्यों की रक्षा, बराबरी, आजादी और भाईचारे को साकार करने की कोशिश है. ओबीसी वह वर्ग है जो वर्णव्यस्था में शूद्र माना गया और सदियों तक सामाजिक तौर पर अनदेखा और मजदूर बना रहा. यही वजह है कि ओबीसी की आबादी सब से ज्यादा होने के बावजूद संसाधनों में भागीदारी सब से कम रही. इसी भागीदारी को बढ़ाने के लिए ओबीसी के कई नेता उभरे. इन्हीं नेताओं की बदौलत बिहार में सामाजिक न्याय की लड़ाई की शुरुआत हुई.

कर्पूरी ठाकुर और बाबू जगदेव प्रसाद जैसे नेताओं ने बिहार में सामाजिक न्याय की सोच को जमीन पर उतारा और नीतीश कुमार ने इस मिशन को आगे बढ़ाया. डाक्टर भीमराव अंबेडकर ने संविधान के आर्टिकल 15 और 16 में गैरबराबरी को खत्म कर दिया था. संविधान का आर्टिकल 15 और 16 कहता है कि राज्य नागरिकों के बीच जाति, धर्म या जन्म के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा, लेकिन संविधान लागू होने के दशकों बाद तक सामाजिक लैवल पर यह बराबरी कायम नहीं हो पाई. शिक्षा, नौकरी और राजनीति में आज भी ऊंची जातियों का दबदबा बरकरार है, जबकि अन्य पिछड़ा वर्ग, दलित और आदिवासी आबादी का बड़ा हिस्सा आज भी हाशिए पर है. यही वजह है कि सामाजिक न्याय की लड़ाई जरूरी हो जाती है. ओबीसी जातियों की पहचान और उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने के लिए साल 1979 में बीपी मंडल की अध्यक्षता में मंडल आयोग बना था. मंडल आयोग ने साल 1980 में अपनी रिपोर्ट सौंपी थी. इस रिपोर्ट में ओबीसी को सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन के आधार पर 27 फीसदी रिजर्वेशन की सिफारिश की गई थी. साल 1990 में वीपी सिंह सरकार ने मंडल की शिफारिश को लागू किया जिस से देशव्यापी आंदोलन हुए.

ऊंची जाति को ओबीसी के लिए 27 फीसदी रिजर्वेशन मंजूर नहीं था. पूरे देश में बड़े पैमाने पर विरोध शुरू हुए, लेकिन ऊंची जातियों के विरोध के बावजूद ओबीसी रिजर्वेशन लागू हुआ और यहीं से भारत की राजनीति पूरी तरह बदल गई. मंडल से भी पहले 70 के दशक में कर्पूरी ठाकुर ने बिहार में 26 फीसदी ओबीसी रिजर्वेशन लागू किया था. 1990 के बाद लालू प्रसाद यादव नेमाययानी मुसलिमयादव गठबंधन से सामाजिक न्याय को सत्ता में उतारा. नीतीश कुमार ने ईबीसी और महादलितों को जोड़कर सामाजिक न्याय की राजनीति को विस्तार दिया. साल 2023 के बिहार जाति सर्वे ने सामाजिक न्याय की लड़ाई को नया डाटा दिया. इस सर्वे मे ईबीसी 36 फीसदी, ओबीसी 27 फीसदी, एससी 19 फीसदी, एसटी एक फीसदी और सामान्य वर्ग तकरीबन 15 फीसदी थे. इस ऐतिहासिक सर्वे में सब से खास बात यह निकल कर आई कि तकरीबन 63 फीसदी आबादी पिछड़ी जातियों की है. इस से सामाजिक न्याय की अहमियत पता चलती है. सामाजिक न्याय सिर्फ राजनीति नहीं है, बल्कि यह लोकतांत्रिक जरूरत भी है.

भारत की सामाजिक सच्चाई यही है कि मंडल लागू होने के 33 साल बाद भी सामाजिक और आर्थिक समानता पूरी तरह हासिल नहीं हुई है. रिजर्वेशन की बदौलत पिछड़ा समाज मुख्यधारा की ओर बढ़ा, लेकिन इस बीच सरकारी नौकरियां सिमटती चली गईं. निजी क्षेत्र में रिजर्वेशन नहीं होने का खमियाजा पिछड़े ही भुगत रहे हैं. सामाजिक न्याय के बिना आर्थिक विकास अधूरा रह जाता है. बिहार जैसे राज्य में जहां गरीबी और बेरोजगारी सब से ज्यादा है, पिछड़ों का मजबूत होना ही प्रगति का आधार है, इसलिए सामाजिक न्याय की लड़ाई बिहार की उन्नति के लिए जरूरी है. पिछड़ा वर्ग तरक्की करेगा तब ही बिहार में सदियों से फैली गरीबी दूर होगी. क्या सामाजिक न्याय हिंदुत्व की भेंट चढ़ा साल 2025 के विधानसभा चुनावों के नतीजे राजद और महागठबंधन की राजनीति का जैसे अंत साबित हुए हैं. सामाजिक न्याय और दलित चेतना की राजनीति हिंदुत्ववादी राजनीति की भेंट चढ़ गई. यह बदलाव अचानक नहीं हुआ, बल्कि लंबे राजनीतिक गठबंधनों, प्रोपेगेंडा और नए राजनीतिक समीकरणों का नतीजा है.

90 के दशक में लालू प्रसाद यादव के राजद ने मंडल कमीशन के जरीए ओबीसी को सत्ता में ला करसामाजिक न्यायकी लहर चलाई, जिस से पिछड़े वर्गों को सरकारी नौकरियों और राजनीति में जगह मिली. यही वजह है कि लालू प्रसाद यादव के काल कोजंगलराजकी श्रेणी में रखा गया. उच्च जातीय मीडिया का नैरेटिव कामयाब हुआ और साल 2005 में नीतीश कुमार भाजपा के साथ गठबंधन बना कर मुख्यमंत्री बन गए. भाजपा के समर्थन वाली इस सरकार को सुशासन का नाम दिया गया, हालांकि नीतीश कुमार ने ईसीबी, महादलित और महिलाओं के हितों को ध्यान में रखते हुए सामाजिक न्याय को ही मजबूती दी और साल 2023 में जाति जनगणना कर आरक्षण का दायरा बढ़ाया. यह हिंदुत्व की राजनीति के खिलाफ था, फिर भी उन्होंने ऐसा जोखिम भरा कदम उठाया और इसीलिए नीतीश कुमार को साइडलाइन किया जाना भाजपा के लिए बेहद जरूरी हो गया. साल 2025 चुनाव में राजद कासामाजिक न्याय बनाम हिंदुत्वका नारा फेल हो गया और राजग ने जीत हासिल की. चुनाव के दौरान मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के नाम पर हर महिला को 10,000 रुपए दिए गए, जिस से पूरा खेल पलट गया. इस चुनाव में महिलाओं का टर्नआउट पुरुषों से ज्यादा रहा और महिला वोटों की इस बढ़ोतरी का पूरा फायदा सीधे राजग के पक्ष में गया.

चुनाव आयोग ने भी भाजपा के एजेंट की भूमिका बड़ी ईमानदारी और कर्मठता से निभाई. एसआईआर के नाम पर तकरीबन 30 लाख वोटों का सत्यानाश हुआ, जिस का फायदा भाजपा को मिला. लालच और साजिश ने सामाजिक न्याय के नारे को पीछे धकेल दिया. जद (यू) ने कुर्मी और कोइरी यानी ईबीसी को थामे रखा तो भाजपा ने ऊपरी जातियों और गैरयादव ओबीसी के साथ शहरी वोटों पर पकड़ बनाए रखी. हालांकि बिहार में भाजपा हिंदुत्व का कार्ड खेलने से परहेज करती रही. राम मंदिर के बजाय डबल इंजन के नैरेटिव पर फोकस रखा. बूथ लैवल मैनेजमैंट को मजबूत रखा और भाजपा के संगठन ने जमीनी लैवल पर काम किया. जिस पिछड़ी जाति के लोगों ने दिल्ली, मुंबई, बैंगलुरु, चेन्नई, पंजाब में ही नहीं, बल्कि खाड़ी के देशों में भी चकाचौंध चमक लाने में हड्डी गलाई, वह अपनी जमीन बिहार में लालू और नीतीश की वजह से फिर औंधे मुंह गिर रही है. तेजस्वी यादव कामाययानी मुसलिमयादव बेस तो मजबूत रहा, लेकिन वे ईबीसी, महिलाओं और नई पीढ़ी को नहीं जोड़ पाए.

परिवारवाद, पुराना रिकौर्ड औरकेवल विरोधकी राजनीति की वजह से भी तेजस्वी यादव बुरी तरह हारे. साल 2020 में राजद सब से बड़ी पार्टी थी, लेकिन साल 2025 में तीसरे नंबर पर सिमट गई.
बिहार में जाति हिंदुत्व पर भारी है, लेकिन अब सामाजिक न्याय की मांग ओबीसी के दिमाग से छिटक कर दूर चली गई है. भाजपा का पूजापाठी नैरेटिव सोशल मीडिया के जरीए नई पीढ़ी तक पहुंच रहा है. गोदी मीडिया के शोर में प्रोपेगेंडा हावी है. नीतीश फैक्टर और मजबूत मंडल राजनीति के चलते ही बिहार में भाजपा का हिंदुत्व उस के जीते गए दूसरे राज्यों जितना कामयाब नहीं है. राजग की जीत में हिंदुत्व से ज्यादा दूसरे फैक्टर कारगर साबित हुए, लेकिन लंबे समय में भाजपा का दबदबा बढ़ने से सामाजिक न्याय की लड़ाई कमजोर हुई है. हिंदुत्व ने जाति को धार्मिक एकता से ओवरराइड कर दिया है. गठबंधन के पीछे
भाजपा का असली खेल साल 2014 से भाजपा ने बिहार में संघ के जरीए गांवदेहात के लैवल पर ऊंची जातियों और ओबीसी के खातेपीते घरों के कार्यकर्ताओं को मजबूत किया, जबकि जद (यू) नीतीश की व्यक्तिगत इमेज पर निर्भर रही.

साल 2020 के विधानसभा चुनावों में राजग की जीत के बाद भाजपा ने जद (यू) के विधायकों पर दबाव बढ़ाया. भाजपा ने जद (यू) के कई नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल किया, जिस से जद (यू) का वोट बैंक सिकुड़ गया. साल 2010 में भाजपा को सिर्फ 10 फीसदी वोट शेयर मिला था, वहीं साल 2025 में 20 फीसदी से ज्यादा वोट शेयर हासिल किया. भाजपा की रणनीति हर राज्य में अलगअलग है, लेकिन हर जगह सिद्धांत एक ही है, सहयोगियों को कमजोर करना. साल 2019 में भाजपा नेआपरेशन कमलके जरीए जेडीएस के 17 विधायकों को तोड़ लिया. साल 2018 में मध्य प्रदेश में भाजपा ने 28 विधायकों को तोड़ा. सहयोगियों को निगलने की साजिश ही भाजपा की कामयाबी का राज है. इस साजिश में भाजपा हर बार कामयाब रहती है. भाजपा की इस साजिश के पीछे संघ बड़ी भूमिका अदा करता है.

इस मामले में संघ के कार्यकर्ता ईमानदारी से काम करते हैं. महाराष्ट्र में शिव सेना और राकांपा को तोड़ कर तबाह कर दिया. भाजपा की यह रणनीति भारतीय लोकतंत्र को खाई की ओर ले जा रही है. वैसे भी भाजपा का फोकस सत्ता पर कब्जा करना है कि साझेदारी निभाने पर. विपक्ष को मजबूत गठबंधन बनाने होंगे वरना भाजपा रूपी इस अजगर का लोकतंत्र को निगलना जारी रहेगा. भाजपा के चलते बिहार की उपजाऊ जमीन पर गरीबी की कीकर उगती रहेगी  और नालंदा वाला बिहार देश का सब से गरीब राज्य बना रहेगा. नीतीश कुमार की वजह से बिहारी शब्द गाली बन जाएगा, ऐसे जने के लिए जो पलटूराम हो और जिसे राज्य और जनता की फिक्र हो. सामाजिक न्याय की लड़ाई अंबेडकर से मंडल तक की कवायद थी.

नीतीश कुमार ने इस लड़ाई को मूर्त रूप देने की कोशिश जरूर की, लेकिन आखिरकार वे संघ के चंगुल में फंस कर फेल हो गए. अपने राजनीतिक सपनों के चलते नीतीश कुमार ने बिहार को ऐसे मझधार में ला कर छोड़ दिया है, जहां एक ओर सामाजिक न्याय पिचका हुआ है, तो दूसरी ओर हिंदुत्व की तिलकधारी सोच है जो बराबरी के मिशन को पूरा निगल चुकी है. बिहार में भाजपा की लगातार बढ़ती हुई ताकत बिहार की राजनीति में एक नया अध्याय जरूर है, लेकिन यह अंत नहीं है. असली चुनौती अब सामाजिक न्याय की जरूरत की पहचान की है. यह भी सच है कि जब तक धर्म और जाति पर आधारित गैरबराबरी रहेगी, तब तक सामाजिक न्याय की यह लड़ाई जारी रहेगी, क्योंकि लोकतंत्र तब तक अधूरा है, जब तक सब से कमजोर को भी बराबरी का हक मिले.            

शकील प्रेम

Hindi Story: कफन – कैसे हटा रफीक मियां के सर से कफन सीने वाले दर्जी का लेबल

Hindi Story: ‘‘आजकल कितने कफन सी लेते हो?’’ रहमत अली ने रफीक मियां से पूछा.

‘‘आजकल धंधा काफी मंदा है,’’ रफीक मियां ने ठहरे स्वर में कहा.

‘‘क्यों, लोग मरते नहीं हैं क्या?’’

इस बेवकूफाना सवाल का जवाब वह भला रहमत अली को क्या दे सकता था. मौतें तो आमतौर पर होती ही रहती हैं. मगर सब लोग अपनी आई मौत ही मर रहे थे. आतंकवादियों द्वारा कत्लेआम का सिलसिला पिछले कई महीनों से कम सा हो गया था.

कश्मीर घाटी में अमनचैन की हवा फिर से बहने लगी थी. हर समय दहशत, गोलीबारी, बम विस्फोट भला कौन चाहता है. बीच में भारी भूकंप आ गया था. हजारों आदमी एकदम से मुर्दों में बदल गए थे.

सरकारी सप्लाई के महकमे में रफीक का नाम भी बतौर सप्लायर रजिस्टर्ड था. एकदम से बड़ा आर्डर आ गया था. दर्जनों अस्थायी दर्जियों का इंतजाम कर उसे आर्डर पूरा करना पड़ा था.

आर्डर से कहीं ज्यादा बड़े बिल और वाउचर पर उस को अपनी फर्म की नामपते वाली मुहर लगा कर दस्तखत करने पड़े थे. खुशी का मौका हो या गम का, सरकारी अमला सरकार को चूना लगाने से नहीं चूकता.

रफीक पुश्तैनी दर्जी था. उस के पिता, दादा, परदादा सभी दर्जी थे. कफन सीना दोयम दर्जे का काम था. कभी सिलाई मशीन का चलन नहीं था. हाथ से कपड़े सीए जाते थे. दर्जी का काम कपड़े सीना मात्र था. कफन कपड़े में नहीं गिना जाता था. कपड़े जिंदा आदमी या औरतें पहनती हैं न कि मुर्दे.

घर में मौत हो जाने पर संस्कार या जनाजे के समय ही कफन सीआ जाता था. कोई भी दुकानदार या व्यापारी सिलासिलाया कफन नहीं बेचता था और न ही तैयार कफन बेचने के लिए रखता था.

मगर बदलते जमाने के साथ आदमी ज्यादा पैदा होने लगे और ज्यादा मरने भी लगे. लिहाजा, तैयारशुदा कफनों की जरूरत भी पड़ने लगी थी. मगर अभी तक कफन सीने का काम बहुत बड़े व्यवसाय का रूप धारण नहीं कर पाया था.

फिर आतंकवाद का काला साया घाटी और आसपास के इलाकों पर छा गया तो अमनचैन की फिजा मौत की फिजा में बदल गई थी.

कामधंधा और व्यापार सब चौपट हो गया था. सैलानियों के आने के सीजन में भी बाजार, गलियां, चौक सब में सन्नाटा छा गया था. कभी कश्मीरी फैंसी डे्रसें, चोंगे, चूड़ीदार पायजामा, अचकन, लहंगा चोली, फैंसी जाकेट, शेरवानी, कुरतापायजामा, गरम कोट सीने वाले दर्जी व कारीगर सभी खाली हो भुखमरी का शिकार हो गए थे.

फिर जिस कफन को हिकारत या मजबूरी की वस्तु समझा जाता था वही सब से ज्यादा मांग वाली चीज बन गई थी. यानी थोक में कफनों की मांग बढ़ने लगी थी.

ढेरों आतंकी या दहशतगर्द मारे जाने लगे थे. उतने ही फौजी भी. आम आदमियों की कितनी तादाद थी कोई अंदाजा नहीं था. बस, इतना अंदाजा था कि कफन सिलाई का धंधा एक कमाई का धंधा बन गया था.

सफेद कपड़े से पायजामाकुरता भी बनता था. रजाइयों के खोल भी बनते थे और कभीकभार कफन भी बनता था. कपड़े की मांग तो बराबर पहले जैसी थी. मगर कपड़ा अब जिंदों के बजाय मुर्दों के काम ज्यादा आने लगा था. आखिर खुदा के घर भेजने से पहले मुर्दे को कपड़े से ढांकना भी जरूरी था. नंगा होने का लिहाज हर जगह करना ही पड़ता है…चाहे लोक हो या परलोक.

विडंबना की बात थी, आदमी नंगा ही पैदा होता है. दुनिया में कदम रखते ही उस को चंद मिनटों में ही कपड़े से ढांप दिया जाता और मरने के बाद भी कपड़े से ही ढका जाता है.

जिंदों के बजाय मुर्दों के कपड़ों का काम करना या सीना हिकारत का काम था. मगर रोजीरोटी के लिए सब करना पड़ता है. वक्त का क्या पता, कैसे हालात से सामना करा दे?

अलगअलग तरह के कपड़ों के लिए अलगअलग माप लेना पड़ता था. डिजाइन बनाने पड़ते थे. मोटा और बारीक दोनों तरह का काम करना पड़ता था. मगर, कफन का कपड़ा काटना और सीना बिना झंझट का काम था. लट््ठे के कपड़ों की तह तरतीब से जमा कर उस पर गत्ते का बना पैटर्न रख निशान लगा वह बड़ी कैंची से कपड़ा काट लेता था. फिर वह खुद और उस के लड़के सिलाई कर के सैकड़ों कफन एक दिन में सी डालते थे.

आतंकवाद के जनून के दौरान मरने वाले काफी होते थे. लिहाजा, धंधा अच्छा चल निकला था. दहशतगर्दी ने जहां साफसुथरा सिलाई का धंधा चौपट कर दिया था वहीं कफन सीने का काम दिला उस जैसे पुश्तैनी कारीगरों को काम से मालामाल भी कर दिया था.

जैसेजैसे काम बढ़ता गया वैसेवैसे मशीनों की और कारीगरों की तादाद भी बढ़ती गई. मगर जैसा काम होता है वैसा ही मानसिक संतुलन बनता है.

सिलाई का बारीक और डिजाइनदार काम करने वाले कारीगरों का दिमाग जहां नएनए डिजाइनों, खूबसूरत नक्काशियों और अन्य कल्पनाओं में विचरता था वहां सारा दिन कफन सीने वाले कारीगरों का दिमाग और मिजाज हर समय उदासीन और बुझाबुझा सा रहता था. उन्हें ऐसा महसूस होता था मानो वे भी मौत के सौदागरों के साथी हों और हर मुर्दा उन के सीए कफन में लपेटे जाते समय कोई मूक सवाल कर रहा हो.

दर्जीखाने का माहौल भी सारा दिन गमजदा और अनजाने अपराध से भरा रहता था. सभी कारीगरों को लगता था कि इतनी ज्यादा तादाद में रोजाना कफन सी कर क्या वे सब मौत के सौदागरों का साथ नहीं दे रहे. क्या वे सब भी गुनाहगार नहीं हैं?

दर्जीखाने में कोई भी खातापीता नहीं था. दोपहर का खाना हो या जलपान, सब बाहर ही जाते थे. रफीक के पास रुपया तो काफी आ गया था मगर वह भी खोयाखोया सा ही रहता था. कफन आखिर कफन ही था.

जैसे बुरे वक्त का दौर शुरू हुआ था वैसे ही अच्छे वक्त का दौर भी आने लगा. हुकूमत और आवाम ने दहशतगर्दी के खिलाफ कमर कस ली थी. हालात काबू में आने लगे थे.

फिर मौत का सिलसिला थम सा गया तो कफन की मांग कम हो गई. एक मशीन बंद हुई, एक कारीगर चला गया, फिर दूसरी, तीसरी और अगली मशीन बंद हो गई, फिर पहले के समान दुकान में 2 ही मशीनें चालू रह पाईं. बाकी सब बंद हो गईं.

उन बंद पड़ी मशीनों को कोई औनेपौने में भी खरीदने को तैयार नहीं था क्योंकि हर किसी को लगता था, कफन सीने में इस्तेमाल हुई मशीनों से मुर्दों की झलक आती है. तंग आ कर रफीक ने सभी मशीनों को कबाड़ी को बेच दिया.

कफन सीना कम हो गया या कहें लगभग बंद हो गया मगर थोड़े समय तक किया गया हिकारत वाला काम रफीक के माथे पर ठप्पा सा लगा गया. उस को सभी ‘कफन सीने वाला दर्जी’ कहने लगे.

धरती का स्वर्ग कही जाने वाली घाटी में दहशतगर्दी खत्म होते ही सैलानियों का आना फिर से शुरू हो गया था. ‘मौत की घाटी’ फिर से ‘धरती का स्वर्ग’ कहलाने लगी थी. मगर रफीक फिर से आम कपड़े का दर्जी या आम कपड़े सीने वाला दर्जी न कहला कर ‘कफन सीने वाला दर्जी’ ही कहलाया जा रहा था.

इस ‘ठप्पे’ का दंश अब रफीक को ‘चुभ’ रहा था. सारा रुपया जो उस ने दहशतगर्दी के दौरान कमाया था बेकार, बेमानी लगने लगा था. उस का मकान कभी पुराने ढंग का साधारण सा था मगर किसी को चुभता न था. आम आदमी के आम मकान जैसा दिखता था.

मगर अंधाधुंध कमाई से बना कोठी जैसा मकान अब एक ऐसे आलीशान ‘मकबरे’ के समान नजर आता था जिस के आधे हिस्से में कब्रिस्तान होता है. मगर जिस में कोई भी संजीदा इनसान रहने को राजी नहीं हो सकता.

रफीक मियां और उस के कुनबे को इस हालात में आने से पहले हर पड़ोसी, जानपहचान वाला, ग्राहक सभी अपने जैसा ही समझते थे. सभी उस से बतियाते थे. मिलतेजुलते थे. मगर एक दफा कफन सीने वाला दर्जी मशहूर हो जाने के बाद सभी उस से ऐसे कतराते थे मानो वह अछूत हो.

पिछली कई पीढि़यों से दर्जी चले आ रहे खानदानी दर्जी के कई पीढि़यों के खानदानी ग्राहक भी थे. कफन सीने का काम थोक में करने के कारण या मोटी रकम आने के कारण रफीक उन की तरफ कम देखने या कम ध्यान देने लगा था. धीरेधीरे वे भी उस को छोड़ गए थे.

दहशतगर्दी खत्म हो जाने के बाद हालात आम हो चले थे. मगर रफीक के पुराने और पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे ग्राहक वापस नहीं लौटे थे.

कफन सीना बंद हो चला था, लिहाजा, कमाई बंद हो गई थी. सैलानियों से काम ले कर देने वाले या सैलानियों को आम कश्मीरी पोशाकें, कढ़ाईदार कपड़े बेचने वाले दुकानदारों ने उस पर लगे ठप्पे की वजह से उसे काम नहीं दिया था.

जिस तरह झंझावात, अंधड़, आंधी या मूसलाधार बरसात में कुछ नहीं सूझता उसी तरह दहशतगर्दी की आंधी में बहते आ रहे आवाम को वास्तविक जिंदगी का एहसास माहौल शांत होने पर ही होता था.

यही हालात अब रफीक के थे. आतंकवाद से पहले इलाके में दोनों समुदाय के लोग थे. एक समुदाय थोड़ा बड़ा था दूसरा थोड़ा छोटा. जान की खैर के लिए एक समुदाय बड़ी तादाद में पलायन कर गया था.

अब घाटी में मुसलमान ही थे. हिंदू बराबर मात्रा में होते और वे भी काम न देते तो रफीक को मलाल न होता मगर अब जब सारी घाटी में मुसलमान ही मुसलमान थे और जब उसी के भाईबंदों ने उसे काम नहीं दिया तो महसूस होना ही था.

कफन सिर्फ कफन होता है. उस को हिंदू, मुसलमान, सिख या अन्य श्रेणी में नहीं रखा जा सकता मगर उस को आम हालात में कौन छूना पसंद करता है?

एक कारीगर दर्जी से कफन सीने वाला दर्जी कहलाने पर रफीक को महसूस होना स्वाभाविक था. उसी तरह क्या उस की कौम भी दुनिया की नजरों में आने वाले समय या इतिहास में दहशतगर्दी फैलाने या मौत की सौदागरी करने वाली कहलाएगी?

रफीक से भी ज्यादा मलाल उस के परिवार की महिला सदस्यों को होता था कि उन का अपना ही मुसलिम समाज उन को अछूत मानने लगा था.

रफीक को खानापीना नहीं सुहाता. शरीर सूखने लगा था. हरदम चेहरे पर शर्मिंदगी छाई रहती थी.

शुक्रवार की नमाज का दिन था. जुम्मा होने की वजह से आज छुट्टी भी थी. नमाज पढ़ी जा चुकी थी. वह मसजिद के दालान में अभी तक बैठा था तभी वहां बड़े मौलवी साहब आ पहुंचे. दुआसलाम हुई.

‘‘क्या हाल है, रफीक मियां? क्या तबीयत नासाज है?’’

‘‘नहीं जनाब, तबीयत तो ठीक है मगर…’’ रफीक से आगे बोला न गया.

‘‘क्या कोई परेशानी है?’’ मौलवी साहब उस के समीप आ कर बैठ गए.

‘‘आजकल काम ही नहीं आता.’’

‘‘क्यों…अब तो माहौल ठीक हो चुका है. सैलानी तफरीह करने खूब आ रहे हैं. बाजारों में रश है.’’

‘‘मगर मुझ पर हकीर काम करने वाले का ठप्पा लग गया है.’’

‘‘तो क्या?’’

रफीक की समस्या सुन कर मौलवी साहब भी सोच में पड़ गए. क्या कल की तारीख या इतिहास में उन की कौम भी आतंकवादियों का समुदाय कहलाएगी?

रफीक की परेशानी तो फौरी ही थी. काम आ ही जाएगा, नहीं आया तो पेशा बदल लेगा. मगर जिस पर उस का अपना समुदाय चलता आ रहा था उस का नतीजा क्या होगा?

‘‘अब्बाजान, हमारा धंधा अब नहीं जम सकता. क्यों न कोई और काम कर लें?’’ बड़े लड़के अहमद मियां ने कहा.

रफीक खामोश था. पीढि़यों से सिलाई की थी. अब क्या नया धंधा करें?

‘‘क्या काम करें?’’

‘‘अब्बाजान, दर्जी के काम के सिवा क्या कोई और काम नहीं है?’’

‘‘वह तो ठीक है, मगर कुछ तो तजवीज करो कि क्या नया काम करें?’’ रफीक के इस सीधे सवाल का जवाब बेटे के पास नहीं था. वह खामोश हो गया.

रफीक दुकान पर काम हो न हो बदस्तूर बैठता था. दुकान की सफाई भी नियमित होती थी. बेटा अपने दोस्तों में चला गया था. पेट भरा हो तो भला काम करने की क्या जरूरत थी? बाप की कमाई काफी थी. खाली बातें करने या बोलने में क्या जाता था?

हुक्के का कश लगा कर रफीक कुनकुनी धूप में सुस्ता रहा था कि उस की दुकान के बाहर पुलिस की जीप आ कर रुकी.

पुलिस? पुलिस क्या करने आई थी? रफीक हुक्का छोड़ उठ खड़ा हुआ. तभी उस का चेहरा अपने पुराने ग्राहक सिन्हा साहब को देख कर चमक उठा.

एक दशक पहले 3 सितारे वाले सदर थाने में एस.एच.ओ. होते थे. अब शायद बड़े अफसर बन गए थे.

‘‘आदाब अर्ज है, साहब,’’ रफीक ने तनिक झुक कर सलाम किया.

‘‘क्या हाल है, रफीक मियां?’’ पुलिस कप्तान सिन्हा साहब ने पूछा.

‘‘सब खैरियत है, साहब.’’

‘‘क्या बात है, बाहर बैठे हो…क्या आजकल काम मंदा है?’’

‘‘बस हुजूर, थोड़ा हालात का असर है.’’

‘‘ओह, समझा, जरा हमारी नई वरदी सी दोगे?’’

‘‘क्यों नहीं, हुजूर, हमारा काम ही सिलाई करना है.’’

एस.एच.ओ. साहब एस.पी. बन गए थे. कई साल वहां रहे थे. ट्रांसफर हो कर कई जगह रहे थे. अब यहां बड़े अफसर बन कर आए थे.

रफीक मियां की उदासी, निरुत्साह सब काफूर हो गया था. वह आग्रहपूर्वक कप्तान साहब को पिस्तेबादाम वाली बरफी खिला रहा था, साथ ही मसाले वाली चाय लाने का आर्डर दे रहा था. आखिर उस के माथे से कफन सीने वाले दर्जी का लेबल हट रहा था.

कप्तान साहब नाप और कपड़ा दे कर चले गए थे. रफीक मियां जवानी के जोश के समान उन की वरदी तैयार करने में जुट गए थे.

कप्तान साहब की भी वही हालत थी जो रफीक की थी. 2 परेशान जने हाथ मिला कर चलें तो सफर आसान हो जाता है. Hindi Story

Hindi Family Story: क्या मैं गलत हूं – शादीशुदा मयंक को क्या अपना बना पाई मायरा?

Hindi Family Story: पियाबालकनी में आ कर खड़ी हो गई. खुली हवा में सांस ले कर ऐसा लगा जैसे घुटन से बाहर आ गई हो. आसपास का शांत वातावरण, हलकीहलकी हवा से धीरेधीरे लहराते पेड़पौधे, डूबता सूरज सबकुछ सुकून मन को सुकून सा दे रहा था. सामने रखी चेयर पर बैठ कर आंखें मूंद लीं. भरसक प्रयास कर रही थी अपने को भीतर से शांत करने का. लेकिन दिमाग शांत होने का नाम नहीं ले रहा था. एक के बाद एक बात दिमाग में आती जा रही थी…

मैं पिया इस साल 46 की हुई हूं. जानपहचान वाले अगर मेरा, मेरे परिवार का खाका खींचेंगे तो सब यही कहेंगे, वाह ऐश है पिया की, अच्छाखासा खातापीता परिवार, लाखों कमाता पति, होशियार कामयाब बच्चे, नौकरचाकर और क्या चाहिए किसी को लाइफ में खुद भी ऐसी कि 4 लोगों के बीच खड़ी हो जाए तो अलग ही नजर आती है. खूबसूरती प्रकृति ने दोनों हाथों से है. ऊपर से उच्च शिक्षा ने उस में चारचांद लगा दिए. तभी तो मयंक को वह एक नजर में भा गई थी.

‘नैशनल इंस्टिट्यूट औफ फैशन टैक्नोलौजी, बेंगलुरु’ से मास्टर डिगरी ली थी उस ने.

जौब के बहुत मौके थे. मयंक का गारमैंट्स का बिजनैस देशविदेश में फैला था. फैशन इलस्टेटर की जौब के लिए उस ने अप्लाई किया था. उस के डिजाइन्स किए गारमैंट्स के कंपनी को काफी बड़ेबड़े और्डर मिले. मयंक की अभी तक उस से मुलाकात नहीं हुई, बस नाम ही

सुना था.

पिया के काम की तारीफ और स्पैशल इंसैंटिव के लिए मयंक ने उसे स्पैशल अपने कैबिन में बुलाया. कंपनी के सीईओ से मिलना पिया के लिए फक्र की बात थी.

मयंक को देखा तो देखती रह गई. किसी फिल्मी हीरो जैसी पर्सनैलिटी थी उस की. लेकिन पिया कौन सी कम थी. मयंक के दिल में उसी दिन से उतर गई थी. पिया कंपनी के सीईओ के लिए कुछ ऐसावैसा सोच भी नहीं सकती थी, लेकिन मयंक ने तो बहुत कुछ सोच लिया था पिया को देख कर. अब तो वह नित नए बहाने बना कर पिया को डिस्कस करने के लिए कैबिन में बुला लेता. पिया बेवकूफ तो थी नहीं कि कुछ सम?ा न पाती. मयंक ने उस से जब बातों ही बातों में शादी का प्रस्ताव रखा तो पिया को लगा कि कहीं वह कोई सपना तो नहीं देख रही. सपनों का राजकुमार उसे मिल गया था.

शादी के बाद पिया का हर दिन सोना और रात चांदी थी. 1 साल के अंदर ही पिया बेटे अनुज की मां बन गई और डेढ़ साल बाद ही स्वीटी की किलकारियों से घर फिर से गुलजार हो गया.

कहते हैं न जब प्रकृति देती है तो छप्पर फाड़ कर देती है. दोनों बच्चे एक से बढ़ कर एक होशियार. अनुज 12वीं के बाद ही आस्ट्रेलिया चला गया और वहां से बीबीए करने के बाद उस ने मयंक के साथ बिजनैस संभाल लिया. बापबेटे की देखरेख में बिजनैस खूब फूलफल रहा था. स्वीटी का एमबीबीएस करते हुए शशांक के साथ अफेयर हो गया तो दोनों की पढ़ाई खत्म होते हुए उन की शादी कर दी. आज दोनों मिल कर अपना बड़ा सा क्लीनिक चला रहे हैं.

पिया की यह कहानी सुन कर यह लगेगा न वाऊ क्या लाइफ है. पिया को भी ऐसा लगता है. लेकिन लाइफ यों ही मजे से गुजरती रहे ऐसा भला होता है? बस पिया की जिंदगी में भी ट्विस्ट आना बाकी था.

मयंक का अपने बिजनैस के सिलसिले में दुबई काफी आनाजाना था. मायरा जरीवाला गुजरात से थी. गारमैंट्स स्टार्टअप से शुरुआत की थी उस ने और आज उस की गुजराती टचअप लिए क्लासिक और मौडर्न ड्रैसेज की खूब डिमांड हो रही थी. बहुत महत्त्वाकांक्षी लड़की थी. मयंक की गारमैंट इंडस्ट्री के साथ टाइअप कर के वह अपने और पांव पसारना चाहती थी. इसी सिलसिले में उस ने दुबई में मयंक के साथ एक मीटिंग रखी थी.

मयंक 48 वर्ष का हो चुका था. कहते हैं कि पुरुष इस उम्र में अपने अनुभव, अपने धीरगंभीर व्यक्तित्व और पैसे वाला हो तो उस की पर्सनैलिटी में गजब की रौनक आ जाती है. माएरा मयंक के इस रोबीले व्यक्तित्व से प्रभावित हुए बिना न रह सकी. उस की कंपनी के साथ टाइअप के साथसाथ उस की जिंदगी के साथ भी टाइअप करने की उस ने ठान ली.

पता नहीं क्यों पत्नी चाहे कितनी ही खूबसूरत, प्यार करने वाली हो, हर तरह से खयाल रखने वाली हो, लेकिन जहां कोई दूसरी औरत, ऊपर से खूबसूरत लाइन देने लगे तो पुरुष को उस की तरफ खिंचते हुए ज्यादा देर नहीं लगती. मयंक भी पुरुष था. मायरा एक बिजनैस वूमन थी. ऊपर से पूरी तरह आत्मविश्वास से भरी 35 साल की खूबसूरत औरत.

मयंक धीरेधीरे उस की ओर आकर्षित होता गया. मायरा नए दौर की औरत थी, जिस के लिए पुरुष के साथ रिलेशनशिप बनाना कोई बहुत बड़ी बात नहीं थी. अपनी खुशी उस के लिए सब से ज्यादा माने रखती थी. मयंक और वह अब अकसर दुबई में ही मिलते और हफ्ता साथ बिता कर अपनेअपने बिजनैस में लग जाते. दोनों बिजनैस वर्ल्ड में अपनी रैपो बना कर रखना चाहते थे.

‘‘मयंक डियर, मु?ो बुरा लगता है कि मेरे कारण तुम पिया के साथ धोखा कर रहे हो. लेकिन मैं क्या करूं. मैं तुम से बहुत प्यार करती हूं. अब मेरी खुशी तुम से जुड़ी है,’’ मायरा मयंक को अपनी बांहों के घेरे में घेरती हुई बोली.

‘‘मायरा, मैं तुम से ?ाठ नहीं बोलूंगा. पिया से मैं भी प्यार करता हूं. लेकिन अब जब भी तुम्हारे साथ होता हूं मु?ो अजीब सा सुकून मिलता है. मैं उसे कोई दुख नहीं पहुंचाना चाहता, लेकिन तुम्हें अब छोड़ भी नहीं सकता. वह मेरी जिंदगी है तो तुम मेरी सांस हो. मायरा, अब मैं तुम्हें जीवनभर यों ही प्यार करना चाहता हूं. मेरी जिंदगी में अब तक पिया की जगह एक तरफ

है और तुम्हारी दूसरी तरफ. मैं दोनों को ही शिकायत का मौका नहीं देना चाहता,’’ मयंक ने मायरा को एक भरपूर किस करते हुए अपने आगोश में ले लिया.

मयंक ने पूरी कोशिश की थी कि पिया को मायरा के बारे में कुछ पता न चले.

वह मायरा के साथ अपनी सारी चैट साथ ही

साथ डिलीट कर देता था. मोबाइल में अपना फिंगर पासवर्ड लगा रखा था. पिया खुद भी मयंक का मोबाइल कभी चैक नहीं करती थी, पूरा विश्वास जो था उस पर, लेकिन उस दिन मयंक नहाने के लिए जैसे ही बाथरूम में गया मायरा के 2-3 व्हाट्सऐप मैसेज आ गए.

पिया की नजर मोबाइल पर पड़ी. मोबाइल पर 2-3 बार बीप की आवाज हुई. नोटीफिकेशन में माई डियर लिखा दिख गया.

पिया का माथा ठनक गया. अब उसे मयंक की हरकतों पर शक होना शुरू हो गया. मयंक का बिजनैस ट्रिप की बात कह कर जल्दीजल्दी दुबई जाना, मोबाइल चैट पढ़ते हुए मंदमंद मुसकान, उस पर जरूरत से ज्यादा प्यार लुटाना, बातवेबात उसे गिफ्ट दे कर खुश रखना.

अपनी बौडी फिटनैस के लिए जिम एक दिन भी मिस न करना, डाइट पर पूरापूरा ध्यान देना जिस के लिए वह कहतेकहते थक जाती थी, लेकिन वह लापरवाही करता था. पिया को एक के बाद एक सब बातें जुड़ती नजर आने लगीं.

मयंक की जिंदगी में आजकल क्या चल रहा है उस का पता लगाना उस के लिए मुश्किल नहीं था. मयंक का ऐग्जीक्यूटिव असिस्टैंट समीर को एक तरह से पिया ने ही जौब पर रखा था. वह उस की फ्रैंड सीमा का कजिन था. समीर पिया की बहुत इज्जत करता था और अपनी बड़ी बहन मानता था.

पिया ने जब समीर से मयंक के प्रेमप्रसंग के बारे में पूछा तो उस ने अपना नाम बीच में न आने की बात कह पिया को मायरा के बारे में सबकुछ बता दिया.

समीर उसे मायरा और मयंक के बीच के बारे में बताता जा रहा था और पिया को लग रहा था जैसे उस के सपनों का महल जिसे उस ने प्यार से मजबूत बना दिया था आज रेत की तरह ढह गया है.

कहां कमी छोड़ दी थी उस ने. सबकुछ तो मयंक के कहे अनुसार करती रही थी. उस ने कहा नौकरी छोड़ दो, उस ने छोड़ दी. अपने कैरियर के पीक पर थी वह लेकिन मयंक के प्यार के आगे सब फीका लगा. उस ने कहा कि पिया बच्चों की देखभाल तुम्हारी जिम्मेदारी है, मैं अपने काम में बिजी हूं, तो यह बात भी उस ने मयंक की चुपचाप मान ली थी.

बच्चों की हर जिम्मेदारी उस ने खुद पर ले ली थी. अड़ोसपड़ोस, नातेरिश्तेदार, घरबाहर की सब व्यवस्था उस ने संभाल ली थी. किस के लिए, मयंक के लिए न, क्योंकि मयंक ही उस की दुनिया था. सबकुछ उस से ही तो जुड़ा था और उस ने कितनी आसानी से मायरा को उस के हिस्से का प्यार दे दिया. यह भी नहीं सोचा कि उस पर क्या बीतेगी, जब उसे पता चलेगा.

पिया को ऐसा लग रहा था जैसे उस की नसों में गरम खून दौड़ रहा है. तनमन दहक रहा है. मन कर रहा था कि मयंक को सब के सामने शर्मसार कर दे.

पिया यह सब तू क्या सोच रही है’, अचानक पिया को अपने मन की आवाज सुनाई दी, ‘पिया, यह तो तु?ो मयंक के बारे में अचानक शक हो गया तो तू ने सच पता कर लिया. अगर उस दिन फोन नहीं देखती तो? सबकुछ वैसा ही चलता रहता जैसे पिछले कई बरसों से चलता आ रहा है.’

पिया की सोच जैसे तसवीर का दूसरा पहलू देखने लगी थी. आज समाज में मयंक का एक रुतबा है. बेटे की बिजनैस टाइकून की इमेज बनी हुई. बेटी स्वीटी अपनी ससुराल में सिरआंखों पर बैठाई जाती है, क्योंकि उस का मायका रुसूखदार है. खुद का सोसाइटी में हाई प्रोफोइल स्टेट्स रखती है. आज अगर वह मुंह खोलती है तो मयंक के इस अफेयर को ले कर मीडिया वाले मिर्चमसाला लगा कर जगजाहिर कर देंगे. उन के बिजनैस पर इस का बहुत फर्क पड़ेगा.

बरसों से कमाई गई शोहरत पर ऐसा धब्बा लगेगा जिस का खमियाजा अनुज को भुगतना पड़ेगा, बेटा जो है. अभी तो उस का पूरा भविष्य पड़ा है आगे अपनी शोहरत बटोरने के लिए. स्वीटी के लिए मयंक उस के आइडियल पापा हैं. समाज में कितना रुतबा है उन के खानदान का. ऊफ, सब मिट्टी में मिल जाएगा. सोचतेसोचते पिया का सिर चकराने लगा था.

‘‘पिया मैडम, जरा संभल कर. आप ठीक तो हैं न, आप यहां आराम से बैठिए,’’ समीर ने पिया को कुरसी पर बैठाते हुए कहा.

पिया को पानी का गिलास दिया तो वह एक सांस में पी गई. उस की चुप्पी सबकुछ वैसा ही चलते रहने देगी जैसे चलता आ रहा है और अपने साथ हो रही बेवफाई को सरेआम करती है तो सच बिखर जाएगा. दिल और दिमाग में टकराव चल रहा था.

अचानक पिया कुरसी से उठ खड़ी हुई. पर्स से मोबाइल निकाला और

मयंक को फोन मिलाया, ‘‘मयंक, कहां हो तुम.’’

‘‘डार्लिंग, मीटिंग के लिए बाहर आया था. क्यों क्या बात है?’’ मयंक ने पूछा.

‘‘वह मैं तुम्हारे औफिस आई थी कि साथ लंच करते हैं.’’

‘‘ओह, यह बात है. नो प्रौब्लम, ऐसा करो तुम शंगरिला होटल पहुंचो, मैं सीधा तुम्हें वहां

15 मिनट में मिलता हूं. साथ लंच करते हैं वहां,’’ मयंक ?ाट से बोला.

‘‘ठीक है मैं पहुंचती हूं,’’ बोल कर पिया ने फोन काट दिया.

पिया जब होटल पहुंची तो मयंक उसे उस का इंतजार करता मिला.

पिया को लगा जैसे मयंक वही तो है जैसे पहले था. उस का खयाल रखने वाला. उसे इंतजार न करना पड़े इसलिए खुद पहले पहुंच जाना. मयंक के प्यार में कमी तो उसे कहीं दिख नहीं रही.

दोनों ने साथ लंच किया और मयंक ने उसे घर छोड़ा और औफिस चला गया, क्योंकि 4 बजे उस की क्लाइंट के साथ फिर मीटिंग थी.

घर आ कर पिया बालकनी में बैठ गई थी. उस ने निर्णय ले लिया. मयंक का सबकुछ बिखेर कर रख देगा. जो कुछ वह देख पा रही है शायद मयंक ने उस बारे में सोचा तक नहीं है. उस का सबकुछ तबाह हो जाएगा.

मयंक ने शायद सोचा ही नहीं कि मायरा के साथ उस की खुशी बस तभी तक है जब तक सब परदे के पीछे है. सच सामने आ गया तो सब खत्म हो जाएगा. न प्यार का यह नशा रहेगा, न परिवार में इज्जत, न समाज में मानप्रतिष्ठा.

‘उस की तो दोनों तरफ हार है. मयंक की तबाही से उसे क्या हासिल होगा. खुशी तो मिलने से रही. फिर यह ?ाठ ही क्यों नहीं अपना लिया जाए,’ पिया दिल को एक तरफ रख दिमाग से सोचने लगी, ‘मयंक उस से मायरा का सच छिपाने के लिए उस से बेइंतहा प्यार करने लगा है. प्यार तो कर रहा है न.

‘उस के प्यार के बिना वह नहीं रह सकती. नहीं जी पाएगी वह उस के बिना. मयंक इस भुलावे में रहे कि वह उस की सचाई जानती तो अच्छा ही है. सब अच्छी तरह तो चल रहा है.

‘पत्नी हूं मैं उस की, मेरा हक कोई और छीन नहीं सकता. पतिपत्नी के रिश्ते में सचाई होनी चाहिए. यह बात मानती है वह लेकिन अगर आज वह मयंक को उस के सच के साथ नंगा कर देगी तो क्या उन के बीच वह पहले जैसा प्यार रह पाएगा? नहीं, कई बार झूठ को ही अपनाना पड़ता है. दवा कड़वी होती है, लेकिन इलाज के लिए खानी ही पड़ती है.’

पिया ने अब निर्णय ले लिया और एक नई पहल शुरू करने के लिए वह कमरे के भीतर गई. लाइट औन की. पूरा कमरा लाइट से जगमगा उठा. अब अंधेरा नहीं था. मयंक के सामने जाहिर नहीं होने देगी कि वह सब जान चुकी है. शायद यही सब के लिए ठीक है. गलत तो नहीं है वह कहीं? Hindi Family Story

Story In Hindi: औरों से जुदा – निशा ने जब खुद को रवि को सौंपने का फैसला किया

Story In Hindi: अपनीसहेली महक का गुस्से से लाल हो रहा चेहरा देख कर निशा मुसकराने से खुद को रोक नहीं सकी. बोली, ‘‘मयंक की बर्थडे पार्टी में तेरे बजाय रवि प्रिया को क्यों ले जा रहा है?’’ निशा की मुसकराहट ने महक का गुस्सा और ज्यादा भड़का दिया.

निशा ने प्यार से महक का हाथ थामा और फिर शांत स्वर में जवाब दिया, ‘‘परसों रविवार को मेरा जापानी भाषा का एक महत्त्वपूर्ण इम्तिहान है, इसलिए मैं ने रवि को सौरी बोल दिया था. रही बात प्रिया की, तो वह रवि की अच्छी फ्रैंड है. दोनों का पार्टी में साथ जाना तुझे क्यों परेशान कर रहा है?’’ ‘‘क्योंकि मैं प्रिया को अच्छी तरह जानती हूं. वह तेरा पत्ता साफ रवि को हथियाना चाहती है.’’

‘‘देख एक सुंदर, स्मार्ट और अमीर लड़के को जीवनसाथी बनाने की चाह हर लड़की की तरह प्रिया भी अपने मन में रखती है, तो क्या बुरा कर रही है?’’ ‘‘तू रवि को खो देगी, इस बात को सोच कर क्या तेरा मन जरा भी चिंतित या परेशान नहीं होता है?’’

‘‘नहीं, क्योंकि रवि की जिंदगी में मुझ से बेहतर लड़की और कोई नहीं है,’’ निशा का स्वर आत्मविश्वास से लबालब था. ‘‘उस ने पहले मुझ से ही पार्टी में चलने को कहा था, यह क्यों भूल रही है तू?’’

‘‘प्रिया को रवि के साथ जाने का मौका दे कर तू ने गलती करी है, निशा. तुम जैसी मेहनती लड़की को इम्तिहान में पास होने की चिंता करनी ही नहीं चाहिए थी. रवि के साथ पार्टी में तुझे ही जाना चाहिए था, बेवकूफ.’’ ‘‘सच बात तो यह है कि मेरा मन भी नहीं लगता है रवि के अमीर दोस्तों के द्वारा दी जाने वाली पार्टियों में, महक. लंबीलंबी कारों में आने वाले मेहमानों की तड़कभड़क मुझे नकली और खोखली लगती है. न वे लोग मेरे साथ सहज हो पाते हैं और न मैं उन सब के साथ. तब रवि भी पार्टी का मजा नहीं ले पाता है. इन सब कारणों से भी मैं ऐसी पार्टियों में रवि के साथ जाने से बचती हूं,’’ निशा ने बड़ी सहजता से अपने मन की बात महक से कह दी.

‘‘तू मेरी एक बात का सचसच जवाब देगी?’’ ‘‘हां, दूंगी.’’

‘‘क्या तू रवि से शादी करने की इच्छुक नहीं है?’’

कुछ पलों के सोचविचार के बाद निशा ने गंभीर लहजे में जवाब दिया, ‘‘यह सच है कि रवि मेरे दिल के बेहद करीब है…उस का साथ मुझे बहुत अच्छा लगता है, लेकिन हमारी शादी जरूर हो, ऐसी उलझन मैं अपने मन में नहीं पालती हूं. भविष्य में जो भी हो मुझे स्वीकार होगा.’’ ‘‘अजीब लड़की है तू,’’ महक हैरानपरेशान हो उठी, देख, ‘‘अमीर खानदान की बहू बन कर तू अपने सारे सपने पूरे कर सकेगी. तुझे रवि को अपना बना कर रखने की कोशिशें बढ़ा देनी चाहिए. इस मामले में जरूरत से ज्यादा आत्मविश्वासी होना गलत और नुकसानदायक साबित होगा, निशा.’’

‘‘रवि को अपना जीवनसाथी बनाने के लिए मेरा उस के पीछे भागना मूर्खतापूर्ण और बेहूदा लगेगा, महक. अच्छे जीवनसाथी साथसाथ चलते हैं न कि आगेपीछे.’’ ‘‘लेकिन…’’

‘‘अब लेकिनवेकिन छोड़ और मेरे साथ जिम चल. कुछ देर वहां पसीना बहा कर मैं तरोताजा होना चाहती हूं,’’ निशा ने एक हाथ में अपना बैग उठाया और दूसरे हाथ से महक का हाथ पकड़ कर बाहर चल पड़ी. निशा ने अपनी मां को जिम जाने की बात बताई और फिर दोनों सहेलियां फ्लैट से बाहर आ गईं.

जिम में अच्छीखासी भीड़ इस बात की सूचक थी कि लोगों में स्वस्थ रहने व स्मार्ट दिखने की इच्छा बढ़ती जा रही है. निशा वहां की पुरानी सदस्य थी, इसलिए ज्यादातर लोग उसे जानते थे. उन सब से हायहैलो करते हुए वह पसीना बहाने में दिल से लग गई. लेकिन महक की दिलचस्पी तो उस से बातें करने में कहीं ज्यादा थी.

खुद को फिट रखने की आदत ने निशा की फिगर को बहुत आकर्षक बना दिया था. उस का पसीने में भीगा बदन वहां मौजूद हर पुरुष की प्रशंसाभरी नजरों का केंद्र बना हुआ था. उन नजरों में अश्लीलता का भाव नहीं था, क्योंकि अपने मिलनसार स्वभाव के कारण वह उन सभी की दोस्ती, स्नेह व आदरसम्मान की पात्रता हासिल कर चुकी थी. लगभग 1 घंटा जिम में बिताने के बाद दोनों घर चल पड़ीं.

‘‘यू आर द बैस्ट, निशा,’’ अचानक महक के मुंह से निकले इन प्रशंसाभरे शब्दों को सुन कर निशा खुश होने के साथसाथ हैरान भी हो उठी. ‘‘थैंकयू, स्वीटहार्ट, लेकिन अचानक यों प्यार क्यों दर्शा रही है?’’ निशा ने भौंहें मटकाते हुए पूछा.

‘‘मैं सच कह रही हूं, सहेली. तेरे पास क्या नहीं है? सुंदर नैननक्श, गोरा रंग, लंबा कद… एमकौम, एमबीए और जापानी भाषा की जानकारी…बहुराष्ट्रीय कंपनी में शानदार नौकरी…एक साधारण से स्कूल मास्टर की बेटी के लिए ऐसे ऊंचे मुकाम पर पहुंचना सचमुच काबिलेतारीफ है.’’ ‘‘जो गुण और परिस्थितियां कुदरत ने दिए हैं, मैं न उन पर घमंड करती हूं और न ही कोई शिकायत है मेरे मन में. अपने व्यक्तित्व को निखारने व कड़ी मेहनत के बल पर अच्छा कैरियर बनाने के प्रयास दिल से करते रहना मेरे लिए हमेशा महत्त्वपूर्ण रहा है. अपनी गरीबी और सुखसुविधाओं की कमी का बहाना बना कर जिंदगी में तरक्की करने का अपना इरादा कभी कमजोर नहीं पड़ने दिया. मेरे इसी गुण ने मुझे इन ऊंचाइयों तक पहुंचाया है,’’ अपने मन की बातें बताते हुए निशा की आवाज में उस का आत्मविश्वास साफ झलक रहा था.

‘‘अब रवि से तेरी शादी भी हो जाए तो फिर तेरी जिंदगी में कोई कमी नहीं रहेगी,’’ महक ने भावुक लहजे में अपने मन की इच्छा दर्शाई. कुछ पल खामोश रह कर निशा ने किसी दार्शनिक के से अंदाज में कहा, ‘‘मैं ने अपनी खुशियों को रवि के साथ शादी होने से बिलकुल नहीं जोड़ रखा है. कुछ खास पा कर अपनी खुशियां हमेशा के लिए तय कर लेना मुमकिन भी नहीं होता है, सहेली. जीवनधारा निरंतर गतिमान है और मैं अपनी जिंदगी की गुणवत्ता बेहतर बनाने को निरंतर गतिशील रहना चाहती हूं. मेरे लिए यह जीवन यात्रा महत्त्वपूर्ण है, मंजिलें नहीं. रवि से मेरी शादी हो गई, तो मैं खुश हूंगी और नहीं हुई तो दुखी नहीं हूंगी.’’

‘‘तुम दूसरी लड़कियों से कितनी अलग हो.’’ ‘‘सहेली, हम सब ही इस दुनिया में अनूठे और भिन्न हैं. दूसरों से अपनी तुलना करते रहना अपने समय व ताकत को बेकार में नष्टकरना है. मैं अपनी जिंदगी को खुशहाल अपने बलबूते पर बनाना चाहती हूं. इस यात्रा में रवि मेरा साथी बनता है, तो उस का स्वागत है. ऐसा नहीं होता है, तो भी कोई गम नहीं क्योंकि कोई दूसरा उपयुक्त हमराही मुझे जरूर मिलेगा, ऐसा मेरा विश्वास है.’’

‘‘शायद तेरे इस अनूठेपन के कारण ही रवि तेरा दीवाना है… तेरा आत्मविश्वास, तेरी आत्मनिर्भरता ही तेरी ताकत और अनूठी पहचान है.’’ महक के मुंह से निकले इन वाक्यों को सुन कर निशा बड़े रहस्यमयी अंदाज में मुसकराने लगी थी.

महक और निशा ने घर का आधा रास्ता ही तय किया होगा जब रवि की कार उन की बगल में आ कर रुकी. उसे अचानक सामने देख कर निशा का चेहरा गुलाब के फूल सा खिल उठा. ‘‘हाय, तुम यहां कैसे?’’ निशा ने रवि से प्रसन्न अंदाज में हाथ मिलाया और फिर छोड़ा

ही नहीं. ‘‘पार्टी में जाने का मन नहीं किया,’’ रवि ने उस की आंखों में प्यार से झांकते हुए जवाब दिया, ‘‘कुछ समय तुम्हारे साथ बिताने के बाद पार्टी में जाऊंगा.’’

‘‘क्या? प्रिया को भी साथ ले जाओगे?’’ महक चुभते से लहजे में यह पूछने से खुद को नहीं रोक पाई. ‘‘नहीं, वह अमित के साथ जा चुकी है. चलो, आइसक्रीम खाने चलते हैं,’’ रवि ने महक के सवाल का जवाब लापरवाही से देने के बाद अपना ध्यान फिर से निशा पर केंद्रित कर लिया.

‘‘पहले मुझे घर छोड़ दो,’’ महक का मूड उखड़ा सा हो गया. ‘‘ओके,’’ रवि ने साथ चलने के लिए महक पर जरा भी जोर नहीं डाला.

निशा रवि की बगल में और महक पीछे की सीट पर बैठ गई तो रवि ने कार आगे बढ़ा दी. ‘‘पहले तुम दोनों मेरे घर चलो,’’ निशा ने मुसकराते हुए माहौल को सहज करने की कोशिश करी. ‘‘नहीं, यार. मैं कुछ वक्त सिर्फ तुम्हारे साथ गुजारना चाहता हूं,’’ रवि ने उस के प्रस्ताव का फौरन विरोध किया.

‘‘पहले घर चलो, प्लीज,’’ निशा ने प्यार से रवि का कंधा दबाया, ‘‘मां के हाथ की बनी एक खास चीज तुम्हें खाने को मिलेगी.’’ ‘‘क्या?’’

‘‘वह सीक्रेट है.’’ ‘‘लेकिन…’’

‘‘प्लीज, बड़े प्यार से करी गई प्रार्थना को रवि अस्वीकार नहीं कर सका और फिर कार निशा के घर की तरफ मोड़ दी.’’

महक अपने घर की तरफ जाना चाहती थी, पर निशा ने उसे प्यार से डपट कर खामोश कर दिया. वह समझती थी कि उस की सहेली रवि को उस के प्रेमी के रूप में उचित प्रत्याशी नहीं मानती है. महक को डर था कि रवि उसे प्रेम में जरूर धोखा देगा. काफी समझाने के बाद भी निशा उस के इस डर को दूर करने में सफल नहीं रही थी. इसीलिए जब ये दोनों उस के साथ होती थीं, तब उसे माहौल खुश बनाए रखने के लिए अतिरिक्त प्रयास हमेशा करना पड़ता था.

रवि मीठा खाने का शौकीन था. निशा की मां के हाथों के बने शाही टोस्ट खा कर उस की तबीयत खुश हो गई. मीठा खा कर महक अपने घर चली गई. निशा ने रवि को खाना खिला कर ही भेजा. हंसतेबोलते हुए 2 घंटे कब बीत गए पता ही नहीं चला.

‘‘लंबी ड्राइव पर जाने का मौसम हो रहा है,’’ ताजी ठंडी हवा को चेहरे पर महसूस करते हुए रवि ने कार में बैठने से पहले अपने मन की इच्छा व्यक्त करी. ‘‘आज के लिए माफी दो. फिर किसी दिन कार्यक्रम…’’

‘‘परसों चलने का वादा करो…, इम्तिहान के बाद?’’ रवि ने उस की आंखों में प्यार से झांकते हुए पूछा. ‘‘श्योर,’’ निशा ने फौरन रजामंदी जाहिर

कर दी. ‘‘इम्तिहान खत्म होते ही निकल लेंगे.’’

‘‘ओके.’’ ‘‘पूछोगी नहीं कि कहां चलेंगे?’’

‘‘तुम्हारा साथ है, तो हर जगह खूबसूरत बन जाएगी.’’

‘‘आई लव यू.’’ ‘‘मी टू.’’

रवि ने निशा के हाथ को कई बार प्यार से चूमा और फिर कार आगे बढ़ा दी. रवि के चुंबनों के प्रभाव से निशा के रोमरोम में अजीब सी मादक सिहरन पैदा हो गई थी. दिल में अजीब सी गुदगुदी महसूस करते हुए वह अपने कमरे में लौटी और तकिए को छाती से लगा कर पलंग पर लेट गई. रवि के बारे में सोचते हुए उस का तनमन अजीब सी खुमारी में डूबता जा रहा था. उस के होंठों की मुसकान साफ जाहिर कर रही थी कि उस वक्त उस के सपनों की दुनिया बड़ी रंगीन बनी हुई थी.

रविवार को दोपहर 12 बजे निशा की जापानी भाषा की परीक्षा समाप्त हो गई. वह हौल से बाहर आई तो उस ने रवि को अपना इंतजार करते पाया. सिर्फ 1/2 घंटे बाद रवि की कार दिल्ली से आगरा जाने वाले राजमार्ग पर दौड़ रही थी. दोनों का साथसाथ किसी दूसरे शहर की यात्रा करने का यह पहला मौका था.

मौसम बहुत सुहावना था. ठंडी हवा अपने चेहरों पर महसूस करते हुए दोनों प्रसन्न अंदाज में हसंबोल रहे थे. कुछ देर बाद निशा आंखें बंद कर के मीठे, प्यार भरे गाने गुनगुनाने लगी. रवि रहरह कर उस के सुंदर, शांत चेहरे को देख मुसकराने लगा.

‘‘तुम संसार की सब से सुंदर स्त्री हो,’’ रवि के मुंह से अचानक यह शब्द निकले, तो निशा ने झटके से अपनी आंखें खोल दीं.

रवि की आंखों में अपने लिए गहरे प्यार के भावों को पढ़ कर उस के गौरे गाल गुलाबी हो उठे और फिर शरमाए से अंदाज में वह सिर्फ इतना ही कह पाई, ‘‘झूठे.’’

रवि ने कार की गति धीमी करते हुए उसे एक पेड़ की छाया के नीचे रोक दिया. फिर उस ने झटके से निशा को अपनी तरफ खींचा और उस के गुलाबीि होंठों पर प्यारा सा चुंबन अंकित कर दिया. निशा की तेज सांसों और खुले होंठों ने उसे फिर से वैसा करने को आमंत्रित किया, तो रवि के होंठ फिर से निशा के होंठों से जुड़ गए.

इस बार का चुंबन लंबा और गहन तृप्ति देने वाला था. उस की समाप्ति पर दोनों ने एकदूसरे की आंखों में गहन प्यार से झांका. ‘‘तुम एक जादूगरनी हो,’’ निशा की पलक को चूमते हुए रवि ने उस की तारीफ करी.

‘‘वह तो मैं हूं,’’ निशा हंस पड़ी. ‘‘मेरा दिल इस वक्त मेरे काबू में नहीं है.’’

‘‘मेरा भी.’’ ‘‘मैं तुम्हें जी भर कर प्यार करना चाहता हूं.’’

‘‘मैं भी.’’ ‘‘सच?’’

निशा ने बेहिचक ‘हां’ में सिर ऊपरनीचे हिलाया, तो रवि की आंखों में हैरानी के भाव उभरे. ‘‘क्या तुम्हें अपनी बदनामी का, अपनी छवि खराब होने का डर नहीं है?’’

‘‘क्या करना है और क्या नहीं, इसे मैं दूसरों की नजरों से नहीं तोलती हूं, रवि.’’ ‘‘फिर भी शादी से पहले शारीरिक संबंध बनाने को समाज गलत मानता है, खासकर लड़कियों के लिए.’’

निशा ने आगे झुक कर रवि के गाल को चूमा और फिर सहज अंदाज में बोली, ‘‘स्वीटहार्ट, पुरानी मान्यताओं को जबरदस्ती ओढ़े रखने में मेरा विश्वास नहीं है. मैं इतना जानती हूं कि मैं तुम्हें प्यार करती हूं और तुम्हारा स्पर्श मेरे रोमरोम में मादक झनझनाहट पैदा कर देता है.’’ ‘‘तुम्हारे साथ सैक्स संबंध बनाने का फैसला मैं तुम्हारी और अपनी खुशियों को ध्यान में रख कर करूंगी. वैसा करने के लिए तुम मुझ से शादी करने का झूठासच्चा वादा करो, यह कतई जरूरी नहीं है.’’

‘‘तो क्या तुम मेरे साथ सोने को तैयार हो?’’ ‘‘बड़ी खुशी से,’’ निशा का ऐसा जवाब सुन कर रवि जोर से चौंका, तो वह खिलखिला कर हंस पड़ी.

‘‘तुम्हें समझना मेरे बस की बात नहीं है. साधारण से घर में पैदा हुई लड़की इतनी असाधारण… इतनी अनूठी… इतनी आत्मविश्वास से भरी कैसे हो गई है?’’ कार को फिर से आगे बढ़ाते हुए हैरान रवि ने यह सवाल मानो खुद से ही पूछा हो. ‘‘जिस के पास अपने सपनों को पूरा करने के लिए हिम्मत, लगन और कठिन मेहनत करने जैसे गुण हों, वह इंसान साधारण घर में पैदा होने के बावजूद असाधारण ऊंचाइयां ही छू सकती है,’’ होंठों से बुदबुदा कर निशा ने रवि के सवाल का जवाब खुद को दिया और फिर रवि के हाथ को प्यार से पकड़ कर शांत अंदाज में आंखें मूंद लीं.

आत्मविश्वासी निशा अपने भविष्य के प्रति पूरी तरह आश्वस्त थी. मस्त अंदाज में सीटी बजा रहे रवि ने भी भविष्य को ले कर एक फैसला उसी समय कर लिया. ताजमहल के सामने निशा के सामने शादी करने का प्रस्ताव रखने का निर्णय लेते हुए उस का दिल अजीब खुशी और गुदगुदी से भर उठा था, साधारण बगीचे में उगे इस असाधारण फूल की महक से वह अपना भावी जीवन भर लेने को और इंतजार नहीं करना चाहता था. Story In Hindi

Bhojpuri Cinema: मैं दिखावे में यकीन नहीं करती-रिंकू भारती गोस्वामी

Bhojpuri Cinema:भोजपुरी सिनेमा में अपने दमदार किरदारों के जरीए राज करने वाली रिंकू भारती गोस्वामी का जादू इन दिनों 28 करोड़ भोजपुरिया दर्शकों के दिलों पर छाया हुआ है. वे भोजपुरी फिल्मों में अकसर किसी किसी दमदार रोल से दर्शकों का मनोरंजन करती दिखाई देती हैं. वे फिल्मों में सैकंड लीड समेत बतौर सपोर्टिंग एक्ट्रेस चाची, बहन और भाभी के रोल में छाई हुई हैं.

रिंकू भारती गोस्वामी का भोजपुरी फिल्मों में भाभी का रोल इस तरह पसंद किया जाने लगा है कि अब फिल्म इंडस्ट्री समेत भोजपुरिया दर्शक भी उन्हेंरिंकू भाभीके नाम से ही पुकारने लगे हैं.
रिंकू भारती गोस्वामी एक्टिंग के लिए तो सुर्खियां बटोरती ही हैं, साथ ही अपने बेबाक और बिंदास अंदाज के लिए भी जानी जाती हैं. वे हर मुद्दे पर खुल कर अपनी राय रखती हैं.
सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड्सशो के दौरान रिंकू भारती गोस्वामी से हुई एक मुलाकात में उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री और अपने एक्टिंग कैरियर पर बेबाक बातें साझा कीं. पेश हैं, उन से हुई बातचीत के खास अंश :
आप का सिवान जैसे छोटे शहर से सिनेमा की दुनिया का सफर कैसा रहा है?
यह सफर आसान तो बिलकुल नहीं था. छोटे शहर से आने पर सब से पहले लोगों की सोच से लड़ना पड़ता है. लेकिन मैं ने हमेशा अपने सपनों पर भरोसा रखा. मुश्किलें आईं, लेकिन वे ही मुझे मजबूत
बनाती गईं.
आप ने टीवी से शुरुआत की और फिर भोजपुरी सिनेमा में पहचान बनाई. इस सफर को आप कैसे देखती हैं?
मेरे लिए यह एक सीखने का प्रोसैस रहा है. टीवी ने मुझे कैमरे के सामने खड़ा होना सिखाया और भोजपुरी सिनेमा ने मुझे असली पहचान दी. हर पड़ाव ने मुझे निखारा है.
लोग आप को ‘रिंकू भाभी’ कह कर बुलाते हैं. इस पहचान को आप कैसे लेती हैं?
यह मेरे लिए बहुत बड़ा प्यार है. जब लोग आप को आप के किरदार के नाम से पहचानने लगें, तो समझ लीजिए आप ने कुछ सही किया है. ‘रिंकू भाभीमेरे दिल के बहुत करीब है. इतने सालों तक भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में काम करने के
बाद आप को बैस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस का अवार्ड मिला. इस खुशी को कैसे सैलिब्रेट किया?
यह अवार्ड जीतना मेरे लिए बहुत खास बात है. मैं ने इसे अपने परिवार और टीम के साथ सैलिब्रेट किया. यह सिर्फ मेरी नहीं, हम सब की मेहनत का फल है. आप को भोजपुरी फिल्मों में अकसर भाभी, चाची, बहन जैसे सैकंड लीड किरदारों में देखा जाता है.
क्या आप की कभी लीड रोल की चाह नहीं होती?
हर कलाकार के मन में लीड रोल का सपना होता है, तो जाहिर है कि मेरा सपना भी है, लेकिन मेरे लिए किरदार की अहमियत ज्यादा है.
आप अपने बेबाक अंदाज के लिए जानी जाती हैं. क्या इस से कभी विवाद भी हुए हैं?
हां, कई बार विवाद हुए हैं. लेकिन मैं वही बोलती हूं जो मुझे सही लगता है. मैं किसी तरह के दिखावे में यकीन नहीं करती, इसलिए लोग मुझे असली मानते हैं.
अगर आप को एक फिल्म में लीड रोल चुनने का मौका मिले, तो कैसा किरदार निभाना चाहेंगी?
मैं एक ऐसी महिला का किरदार निभाना  चाहूंगी जो समाज के खिलाफ जा कर अपनी पहचान बनाती है. उस में स्ट्रगल भी हो, इमोशन भी और एक मजबूत संदेश भी.
फिल्म सैट पर कोई ऐसा मजेदार या यादगार किस्सा जो आज भी आप को हंसा देता हो?
एक बार शूटिंग के दौरान मेरा इमोशनल सीन था और पीछे से किसी ने मजाक कर दिया, पूरा सीन हंसी में बदल गया. मुझे वह दिन आज भी याद आता है.
अगर आप को अपनी अब तक की यात्रा को एक लाइन में बयान करना हो, तो क्या कहेंगी?
संघर्ष से सफलता तक, और अभी सफर जारी है.                    

बृहस्पति कुमार पांडेय

Internship Opportunity: इंटर्नशिप

Internship Opportunity: घर की मुरगी दाल बराबर नहीं, सेनौकरी’. कितना सुखद और शानदार शब्द हैहर उस बेरोजगार के लिए जो हर लिहाज से काबिल तो है, पर बेचारे को मिल नहीं पा रही है. यह बात अलग है कि आजकल जो नौजवान सोशल मीडिया पर रील स्क्रौलिंग में अपना अंगूठा घिसते रहते हैं, उन्हें तो यही नौकरी पाने के लिए जाने कितनी तरह के पापड़ बेलने पड़ सकते हैं.
देश में बढ़ती बेरोजगारी और नौकरियों की कमी से अब इन पापड़ों का भी कोई मोल नहीं रह गया है, क्योंकि सरकारी हो या प्राइवेट, नौकरी पाना खाला के घर जाने जितना आसान तो बिलकुल भी नहीं है. पर जिस तरह से कुकुरमुत्तों की तरह प्राइवेट एजूकेशनल इंस्टीट्यूट खुल गए हैं, उम्मीद की एक किरण यह नजर आती है कि बहुत सी प्राइवेट कंपनियां नौकरी देने से पहले बहुत बार छात्रों को इंटर्नशिप दे देती हैं.
अब यह इंटर्नशिप क्या बला है?
इंटर्नशिप एक ऐसा टैम्परेरी काम होता है, जो किसी छात्र या नए ग्रेजुएट को किसी फील्ड में प्रैक्टिकल नौलेज और एक्सपीरियंस हासिल करने के लिए दिया जाता है. यह आमतौर पर कुछ महीनों से एक साल तक चलता है और कभीकभी पैसे के साथ या बिना पैसे के भी हो सकता है.
इसी के साथ दूसरा सवाल भी मन में उठ सकता है कि इंटर्नशिप करना क्यों जरूरी है? वैसे, इंटर्नशिप करने का फायदा यह हो सकता है :
छात्र को थ्योरी के साथसाथ रिएल वर्क एनवायरनमैंट का एक्सपीरिंयस मिलता है.
नई स्किल्स सीखने और मौजूदा स्किल्स को बेहतर बनाने का मौका मिलता है.
इंडस्ट्री के प्रोफैशनल्स से जुड़ने और कनैक्शन बनाने का मौका हासिल होता है.
जो इंटर्न अच्छा काम करते हैं, उन्हें कई बार कंपनियां अपने यहां फुलटाइम जौब औफर करती हैं.
इंटर्नशिप से इंटर्न का रेज्यूमे (बायोडाटा) ज्यादा मजबूत बनता है.
इतना सब होने के बावजूद बहुत से इंटर्न अपनी इंटर्नशिप को सीरियसली नहीं लेते हैं. उन्हें यह बोरिंग काम लगता है. पर ऐसा होने की वजह क्या है?

इंटर्न अपनी इंटर्नशिप को सीरियसली क्यों नहीं लेते?
दिल्ली कालेज औफ आर्ट्स एंड कौमर्स, दिल्ली यूनिवर्सिटी के एक छात्र आदिब खान, जो फिलहाल इंटर्न हैं, का मानना है, ‘‘इंटर्नशिप एक दिलचस्प दौर होता है. जब मैं ने नईनई इंटर्नशिप शुरू की थी, तब मैं काफी जोश में था कि अपने से सीनियर और ज्यादा अनुभवी लोगों के साथ काम करने का मौका मिलेगा.
‘‘लेकिन कुछ दिनों बाद ऐसा महसूस होने लगा कि वे अपना ज्यादातर काम  ही करवा रहे हैं. कभीकभी यह भी लगता था कि जब उन से कम पैसे मिल रहे हैं, तो मैं उन के जितना काम क्यों करूं?
‘‘लेकिन धीरेधीरे यह एहसास हुआ कि मैं ऐसा बहुतकुछ सीख रहा हूं, जो मेरे कैरियर और जिंदगी में आगे चल कर काम आएगा. आज के समय में, जब प्रतियोगिता इतनी ज्यादा बढ़ गई है, तो बिना इंटर्नशिप के अनुभव के कार्पोरेट दुनिया में अपनी अच्छी जगह बनाना बहुत मुश्किल हो गया है.’’
आदिब खान ने बहुत अच्छी बात कही. लेकिन यहां पर सब से बड़ी कमी इंटर्न की से जुड़ी होती है, क्योंकि वे इंटर्नशिप को टैम्परेरी और कम इम्पोर्टेंस देते हैं. साथ ही, अगर इंटर्नशिप अनपेड या कम पैसे वाली हो तो इंटर्न का मोटिवेशन कम हो सकता है.

कच्ची उम्र का भी बहुत ज्यादा फर्क पड़ता है. इस वजह से इंटर्न के अपनी इंटर्नशिप के मकसद और एक्सपेक्टेशन क्लियर नहीं हो पाते हैं. अमूमन कोई इंटर्नशिप ऐसे समय में होती है जब छात्र अपनी पढ़ाई के आखिरी साल में होता है. इस के चलते छात्र को पढ़ाई और दूसरी एक्टिविटीज के साथ बैलेंस करना मुश्किल लगता है. बहुत बार इंटर्नशिप देने वाली कंपनी भी इंटर्न को सपोर्ट नहीं करती है और उस में मैंटौरशिप की भारी कमी दिखाई देती है. इस से इंटर्न कभीकभार निराशा के घेरे में चला जाता है.
पर हमेशा ऐसा नहीं होता. कालेज औफ वोकेशनल स्टडीज, दिल्ली यूनिवर्सिटी में दूसरे साल के एक छात्र ईशान शर्मा ने बताया, ‘‘इंटर्नशिप जौइन करने का मेरा खास मकसद यह है कि मैं अपने खर्चों को खुद संभाल सकूं और जिंदगी में ज्यादा इंडिपैंडैंस महसूस कर सकूं.
‘‘यह मेरी पहली इंटर्नशिप है, इसलिए मेरे लिए यह एक नया और सीखने का भरपूर अनुभव है. मेरे कलीग्स बहुत सहयोगी हैं और हमेशा मदद के लिए तैयार रहते हैं. खासतौर पर मेरे मैनेजर नईनई चीजें सिखाते हैं और हर कदम पर मेरा मार्गदर्शन करते हैं, जिस से मेरा कौन्फिडैंस बढ़ता है. मैं इसी तरह सीखते हुए अपने कौशल को बेहतर बनाना चाहता हूं और भविष्य में और ज्यादा कामयाब बनना चाहता हूं.’’

याद रखिए कि जब भी कोई कंपनी किसी को अपने यहां इंटर्न रखती है, तो वह उस पर बहुत खर्चा करती है. उस पर अपना बेशकीमती समय देती है. इंटर्न को यह बात कभी भी महसूस नहीं होती है. वे अनगढ़ पत्थर की तरह होते हैं और इंटर्नशिप उन्हें कीमती और चमकदार बनाने की पहली पौलिश होती है.
इस बात को ध्रुव कालिया के विचार सच साबित करते हैं. नैशनल यूनिवर्सिटी औफ एडवांस्ड लीगल स्टडीज (एनयूएएलएस), कोच्चि के आखिरी साल में पढ़ाई कर रहे इस छात्र ने बताया, ‘‘टाटा एआईए में मेरी इंटर्नशिप ने किसी पेशेवर की तरह सीखने की समझ दी.
‘‘इस से यह भी समझआया कि बीमा और वित्तीय सेवाओं के क्षेत्र में कानून के नियम कैसे काम करते हैं और मुझे कालेज की किताबों से परे कानून की असली दुनिया में उन के लागू होने की जानकारी दी. इंटर्नशिप ने मेरी पेशेवर कुशलता को भी बढ़ाया और कार्पोरेट प्रैक्टिस में अपनी जवाबदेही की अहमियत को समझने में मदद मिली.
‘‘कुलमिला कर, इस एक्सपीरिंयस ने मेरे कानूनी विकास में अहम योगदान दिया और कार्पोरेट कानूनी ढांचे के भीतर अपनी उम्मीदों और जिम्मेदारियों को निखारने में मदद की.’’
लिहाजा, जब भी कोई छात्र कहीं इंटर्नशिप करता है, तो वहां टाइमपास करने के लिए जाए वरना उस की आगे की जिंदगी टाइमपास बनते देर नहीं करेगी. जो भी काम करें, उस में जीजान लगा दें. कंपनी ने आप में विश्वास जताया है, तो आप की भी जिम्मेदारी बनती है कि उस विश्वास पर सौ फीसदी खरे उतरें.                           

Hindi Story: अजनबी – भारती अपने परिवार के प्यार से क्यों वंचित रही?

Hindi Story: ‘‘देखिए भारतीजी, आप अन्यथा  न लें, आप की स्थिति को देखते हुए तो मैं कहना चाहूंगी कि अब आप आपरेशन करा ही लें, नहीं तो बाद में और भी दूसरी उलझनें बढ़ सकती हैं.’’

‘‘अभी आपरेशन कैसे संभव होगा डाक्टर, स्कूल में बच्चों की परीक्षाएं होनी हैं. फिर स्कूल की सारी जिम्मेदारी भी तो है.’’

‘‘देखिए, अब आप को यह तय करना ही होगा कि आप का स्वास्थ्य अधिक महत्त्वपूर्ण है या कुछ और, अब तक तो दवाइयों के जोर पर आप आपरेशन टालती रही हैं पर अब तो यूटरस को निकालने के अलावा और कोई चारा नहीं है.’’

डा. प्रभा का स्वर अभी भी गंभीर ही था.

‘‘ठीक है डाक्टर, अब इस बारे में सोचना होगा,’’ नर्सिंग होम से बाहर आतेआते भारती भी अपनी बीमारी को ले कर गंभीर हो गई थी.

‘‘क्या हुआ दीदी, हो गया चेकअप?’’ भारती के गाड़ी में बैठते ही प्रीति ने पूछा.

प्रीति अब भारती की सहायक कम छोटी बहन अधिक हो गई थी और ऊपर वाले फ्लैट में ही रह रही थी तो भारती उसे भी साथ ले आई थी.

‘‘कुछ नहीं, डाक्टर तो आपरेशन कराने पर जोर दे रही है,’’ भारती ने थके स्वर में कहा था.

कुछ देर चुप्पी रही. चुप्पी तोड़ते हुए प्रीति ने कहा, ‘‘दीदी, आप आपरेशन करा ही लो. कल रात को भी आप दर्द से तड़प रही थीं. रही स्कूल की बात…तो हम सब और टीचर्स हैं ही, सब संभाल लेंगे. फिर अगर बड़ा आपरेशन है तो इस छोटी सी जगह में क्यों, आप दिल्ली ही जा कर कराओ न, वहां तो सारी सुविधाएं हैं.’’

भारती अब कुछ सहज हो गई थी. हां, इसी बहाने कुछ दिन बच्चों व अपने घरपरिवार के साथ रहने को मिल जाएगा, ऐसे तो छुट्टी मिल नहीं पाती है. किशोर उम्र के बच्चों का ध्यान आता है तो कभीकभी लगता है कि बच्चों को जितना समय देना चाहिए था, दिया नहीं. रोहित 12वीं में है, कैरियर इयर है. रश्मि भी 9वीं कक्षा में आ गई है, यहां इस स्कूल की पिं्रसिपल हो कर इतने बच्चों को संभाल रही है पर अपने खुद के बच्चे.

‘‘तुम ठीक कह रही हो प्रीति, मैं आज ही अभय को फोन करती हूं, फिर छुट्टी के लिए आवेदन करूंगी.’’

स्कूल में कौन सा काम किस को संभालना है, भारती मन ही मन इस की रूपरेखा तय करने लगी. घर में आते ही प्रीति ने भारती को आराम से सोफे पर बिठा दिया और बोली, ‘‘दीदी, अब आप थोड़ा आराम कीजिए और हां, किसी चीज की जरूरत हो तो आवाज दे देना, अभी मैं आप के लिए चाय बना देती हूं, कुछ और लेंगी?’’

‘‘और कुछ नहीं, बस चाय ही लूंगी.’’

प्रीति अंदर चाय बनाने चल दी.

सोफे पर पैर फैला कर बैठी भारती को चाय दे कर प्रीति ऊपर चली गई तो भारती ने घर पर फोन मिलाया था.

‘‘ममा, पापा तो अभी आफिस से आए नहीं हैं और भैया कोचिंग के लिए गया हुआ है,’’ रश्मि ने फोन पर बताया और बोली, ‘‘अरे, हां, मम्मी, अब आप की तबीयत कैसी है, पापा कह रहे थे कि कुछ प्राब्लम है आप को…’’

‘‘हां, बेटे, रात को फिर दर्द उठा था. अच्छा, पापा आएं तो बात करा देना और हां, तुम्हारी पढ़ाई कैसी चल रही है? नीमा काम तो ठीक कर रही है न…’’

‘‘सब ओके है, मम्मी.’’

भारती ने फोन रख दिया. घड़ी पर नजर गई. हां, अभी तो 7 ही बजे हैं, अजय 8 बजे तक आएंगे. नौकरानी खाना बना कर रख गई थी पर अभी खाने का मन नहीं था. सोचा, डायरी उठा कर नोट कर ले कि स्कूल में कौन सा काम किस को देना है. दिल्ली जाने का मतलब है, कम से कम महीने भर की छुट्टी. क्या पता और ज्यादा समय भी लग जाए.

फिर मन पति और बच्चों में उलझता चला गया था. 6-7 महीने पहले जब इस छोटे से पहाड़ी शहर में उसे स्कूल की प्रधानाचार्य बना कर भेजा जा रहा था तब बिलकुल मन नहीं था उस का घरपरिवार छोड़ने का. तब उस ने पति से कहा था :

‘बच्चे बड़े हो रहे हैं अजय, उन्हें छोड़ना, फिर वहां अकेले रहना, क्या हमारे परिवार के लिए ठीक होगा. अजय, मैं यह प्रमोशन नहीं ले सकती.’

तब अजय ने ही काफी समझाया था कि बच्चे अब इतने छोटे भी नहीं रहे हैं कि तुम्हारे बिना रह न सकें. और फिर आगेपीछे उन्हें आत्मनिर्भर होना ही है. अब जब इतने सालों की नौकरी के बाद तुम्हें यह अच्छा मौका मिल रहा है तो उसे छोड़ना उचित नहीं है. फिर आजकल टेलीफोन, मोबाइल सारी सुविधाएं इतनी अधिक हैं कि दिन में 4 बार बात कर लो. फिर वहां तुम्हें सुविधायुक्त फ्लैट मिल रहा है, नौकरचाकर की सुविधा है. तुम्हें छुट्टी नहीं मिलेगी तो हम लोग आ जाएंगे, अच्छाखासा घूमना भी हो जाएगा.’’

काफी लंबी चर्चा के बाद ही वह अपनेआप को इस छोटे से शहर में आने के लिए तैयार कर पाई थी.

रोहित और रश्मि भी उदास थे, उन्हें भी अजय ने समझाबुझा दिया था कि मां कहीं बहुत दूर तो जा नहीं रही हैं, साल 2 साल में प्रधानाचार्य बन कर यहीं आ जाएंगी.

यहां आ कर कुछ दिन तो उसे बहुत अकेलापन लगा था, दिन तो स्कूल की सारी गतिविधियों में निकल जाता पर शाम होते ही उदासी घेरने लगती थी. फोन पर बात भी करो तो कितनी बात हो पाती है. महीने में बस, 2 ही दिन दिल्ली जाना हो पाता था, वह भी भागदौड़ में.

ठीक है, अब लंबी छुट्टी ले कर जाएगी तो कुछ दिन आराम से सब के साथ रहना हो जाएगा.

9 बजतेबजते अजय का ही फोन आ गया. भारती ने उन्हें डाक्टर की पूरी बात विस्तार से बता दी थी.

‘‘ठीक है, तो तुम फिर वहीं उसी डाक्टर के नर्सिंग होम में आपरेशन करा लो.’’

‘‘पर अजय, मैं तो दिल्ली आने की सोच रही थी, वहां सुविधाएं भी ज्यादा हैं और फिर तुम सब के साथ रहना भी हो जाएगा,’’ भारती ने चौंक कर कहा था.

‘‘भारती,’’ अजय की आवाज में ठहराव था, ‘‘भावुक हो कर नहीं, व्यावहारिक बन कर सोचो. दिल्ली जैसे महानगर में जहां दूरियां इतनी अधिक हैं, वहां क्या सुविधाएं मिलेंगी. बच्चे अलग पढ़ाई में व्यस्त हैं, मेरा भी आफिस का काम बढ़ा हुआ है. इन दिनों चाह कर भी मैं छुट्टी नहीं ले पाऊंगा. वहां तुम्हारे पास सारी सुविधाएं हैं, फिर आपरेशन के बाद तुम लंबी छुट्टी ले कर आ जाना. तब आराम करना. और हां, आपरेशन की बात अब टालो मत. डाक्टर कह रही हैं तो तुरंत करा लो. इतने महीने तो हो गए तुम्हें तकलीफ झेलते हुए.’’

भारती चुप थी. थोड़ी देर बात कर के उस ने फोन रख दिया था. देर तक फिर सहज नहीं हो पाई.

वह जो कुछ सोचती है, अजय उस से एकदम उलटा क्यों सोच लेते हैं. देर रात तक नींद भी नहीं आई थी. सुबह अजय का फिर फोन आ गया था.

‘‘ठीक है, तुम कह रहे हो तो यहीं आपरेशन की बात करती हूं.’’

‘‘हां, फिर लंबी छुट्टी ले लेना…’’ अजय का स्वर था.

प्रीति जब उस की तबीयत पूछने आई तो भारती ने फिर वही बातें दोहरा दी थीं.

‘‘हो सकता है दीदी, अजयजी ठीक कह रहे हों. यहां आप के पास सारी सुविधाएं हैं. नर्सिंग होम छोटा है तो क्या हुआ, डाक्टर अच्छी अनुभवी हैं, फिर अगर आपरेशन कराना ही है तो कल ही बात करते हैं.’’

भारती ने तब प्रीति की तरफ देखा था. कितनी जल्दी स्थिति से समझौता करने की बात सोच लेती है यह.

फिर आननफानन में आपरेशन के लिए 2 दिन बाद की ही तारीख तय हो गई थी.

अजय का फिर फोन आ गया था.

‘‘भारती, मुझे टूर पर निकलना है, इसलिए कोशिश तो करूंगा कि उस दिन तुम्हारे पास पहुंच जाऊं पर अगर नहीं आ पाऊं तो तुम डाक्टर से मेरी बात करा देना.’’

हुआ भी यही. आपरेशन करने से पहले डाक्टर प्रभा की फोन पर ही अजय से बात हुई, क्योंकि उन्हें अजय की अनुमति लेनी थी. सबकुछ सामान्य था पर एक अजीब सी शून्यता भारती अपने भीतर अनुभव कर रही थी. आपरेशन के बाद भी वही शून्यता बनी रही.

शरीर का एक महत्त्वपूर्ण अंग निकल जाने से जैसे शरीर तो रिक्त हो गया है, पर मन में भी एक तीव्र रिक्तता का अनुभव क्यों होने लगा है, जैसे सबकुछ होते हुए भी कुछ भी नहीं है उस के पास.

‘‘दीदी, आप चुप सी क्यों हो गई हैं, आप के टांके खुलते ही डाक्टर आप को दिल्ली जाने की इजाजत दे देंगी. बड़ी गाड़ी का इंतजाम हो गया है. स्कूल के 2 बाबू भी आप के साथ जाएंगे. अजयजी से भी बात हो गई है,’’ प्रीति कहे जा रही थी.

तो क्या अजय उसे लेने भी नहीं आ रहे. भारती चाह कर भी पूछ नहीं पाई थी.

उधर प्रीति का बोलना जारी था, ‘‘दीदी, आप चिंता न करें…भरापूरा परिवार है, सब संभाल लेंगे आप को, परेशानी तो हम जैसे लोगों की है जो अकेले रह रहे हैं.’’

पर आज भारती प्रीति से कुछ नहीं कह पाई थी. लग रहा था कि जैसे उस की और प्रीति की स्थिति में अधिक फर्क नहीं रहा अब.

हालांकि अजय के औपचारिक फोन आते रहे थे, बच्चों ने भी कई बार बात की पर उस का मन अनमना सा ही बना रहा.

अभी सीढि़यां चढ़ने की मनाही थी पर दिल्ली के फ्लैट में लिफ्ट थी तो कोई परेशानी नहीं हुई.

‘‘चलो, घर आ गईं तुम…अब आराम करो,’’ अजय की मुसकराहट भी आज भारती को ओढ़ी हुई ही लग रही थी.

बच्चे भी 2 बार आ कर कमरे में मिल गए, फिर रोहित को दोस्त के यहां जाना था और रश्मि को डांस स्कूल में. अजय तो खैर व्यस्त थे ही.

नौकरानी आ कर उस के कपड़े बदलवा गई थी. फिर वही अकेलापन था. शायद यहां और वहां की परिस्थिति में कोई खास फर्क नहीं था, वहां तो खैर फिर भी स्कूल के स्टाफ के लोग थे, जो संभाल जाते, प्रीति एक आवाज देते ही नीचे आ जाती पर यहां तो दिनभर वही रिक्तता थी.

बच्चे आते भी तो अजय को घेर कर बैठे रहते. उन के कमरे से आवाजें आती रहतीं. रश्मि के चहकने की, रोहित के हंसने की.

शायद अब न तो अजय के पास उस से बतियाने का समय है न पास बैठने का, और न ही बच्चों के पास. आखिर यह हुआ क्या है…2 ही दिन में उसे लगने लगा कि जैसे उस का दम घुटा जा रहा है. उस दिन सुबह बाथरूम में जाने के लिए उठी थी कि पास के स्टूल से ठोकर लगी और एक चीख सी निकल गई थी. दरवाजे का सहारा नहीं लिया होता तो शायद गिर ही पड़ती.

‘‘क्या हुआ, क्या हुआ?’’ अजय यह कहते हुए बालकनी से अंदर की ओर दौडे़.

‘‘कुछ नहीं…’’ वह हांफते हुए कुरसी पर बैठ गई थी.

‘‘भारती, तुम्हें अकेले उठ कर जाने की क्या जरूरत थी? इतने लोग हैं, आवाज दे लेतीं. कहीं गिर जातीं तो और मुसीबत खड़ी हो जाती,’’  अजय का स्वर उसे और भीतर तक बींध गया था.

‘‘मुसीबत, हां अब मुसीबत सी ही तो हो गई हूं मैं…परिवार, बच्चे सब के होते हुए भी कोई नहीं है मेरे पास, किसी को परवा नहीं है मेरी,’’ चीख के साथ ही अब तक का रोका हुआ रुदन भी फूट पड़ा था.

‘‘भारती, क्या हो गया है तुम्हें? कौन नहीं है तुम्हारे पास? हम सब हैं तो, लगता है कि इस बीमारी ने तुम्हें चिड़चिड़ा बना दिया है.’’

‘‘हां, चिड़चिड़ी हो गई हूं. अब समझ में आया कि इस घर में मेरी अहमियत क्या है… इतना बड़ा आपरेशन हो गया, कोई देखने भी नहीं आया, यहां अकेली इस कमरे में लावारिस सी पड़ी रहती हूं, किसी के पास समय नहीं है मुझ से बात करने का, पास बैठने का.’’

‘‘भारती, अनावश्यक बातों को तूल मत दो. हम सब को तुम्हारी चिंता है, तुम्हारे आराम में खलल न हो, इसलिए कमरे में नहीं आते हैं. सारा ध्यान तो रख ही रहे हैं. रही बात वहां आने की, तो तुम जानती ही हो कि सब की दिनचर्या है, फिर नौकरी करने का, वहां जाने का निर्णय भी तो तुम्हारा ही था.’’

इतना बोल कर अजय तेजी से कमरे के बाहर निकल गए थे.

सन्न रह गई भारती. इतना सफेद झूठ, उस ने तो कभी नौकरी की इच्छा नहीं की थी. ब्याह कर आई तो ससुराल की मजबूरियां थीं, तंगहाली थी. 2 छोटे देवर, ननद सब की जिम्मेदारी अजय पर थी. सास की इच्छा थी कि बहू पढ़ीलिखी है तो नौकरी कर ले. तब भी कई बार हूक सी उठती मन में. सुबह से शाम तक काम से थक कर लौटती तो घर के और काम इकट्ठे हो जाते. अपने स्वयं के बच्चों को खिलाने का, उन के साथ खेलने तक का समय नहीं होता था, उस के पास तो दुख होता कि अपने ही बच्चों का बालपन नहीं देख पाई.

फिर यह बाहर की पोस्ंिटग, उस का तो कतई मन नहीं था घर छोड़ने का. यह तो अजय की ही जिद थी, पर कितनी चालाकी से सारा दोष उसी के माथे मढ़ कर चल दिए.

इच्छा हो रही थी कि चीखचीख कर रो पड़े, पर यहां तो सुनने वाला भी कोई नहीं था.

पता नहीं बच्चों से भी अजय ने क्या कहा था, शाम को रश्मि और रोहित उस के पास आए थे.

‘‘मम्मी, प्लीज आप पापा से मत लड़ा करो. सुबह आप इतनी जोरजोर से चिल्ला रही थीं कि अड़ोसपड़ोस तक सुन ले. कौन कहेगा कि आप एक संभ्रांत स्कूल की पिं्रसिपल हो,’’ रोहित कहे जा रहा था, ‘‘ठीक है, आप बीमार हो तो हम सब आप का ध्यान रख ही रहे हैं. यहां पापा ही तो हैं जो हम सब को संभाल रहे हैं. आप तो वैसे भी वहां आराम से रह रही हो और यहां आ कर पापा से ही लड़ रही हो…’’

विस्फारित नेत्रों से देखती भारती सोचने लगी कि अजय ने बच्चों को भी अपनी ओर कर लिया है. अकेली है वह… सिर्फ वह…

Hindi Story: लोकलाज का इलाज

Hindi Story: डाक्टर राहुल रात को थकेहारे घर लौट कर चैन की नींद सोए ही थे कि अस्पताल से फोन गया. एक बुजुर्ग की हालत बहुत गंभीर थी. डाक्टर राहुल अस्पताल पहुंचे. क्या वे उस मरीज को बचा पाए? दिनभर अस्पताल की भागदौड़ के बाद जब डाक्टर राहुल शाम को घर लौटे, तो थकान जैसे उन के पूरे शरीर में उतर आई थी. कई घंटे लगातार आपरेशन, मरीजों की भीड़ और लगातार आते फोन ने उन की रगरग को थका दिया था. घर पहुंचे तो पत्नी ने चिंता से पूछा, ‘‘इतना थक गए हो राहुलसब ठीक तो था आज अस्पताल में?’’ राहुल ने मुसकराने की कोशिश की, ‘‘आज का दिन बहुत भारी था. लगातार आते मरीज, एक से एक गंभीर केस. बस, अब थोड़ी देर चैन से बैठना चाहता हूं.’’

पत्नी ने गरमागरम खाना परोसा, दोनों ने साथ खाना खाया. हलकीफुलकी बातें हुईं, फिर डाक्टर राहुल बिस्तर पर लेटते ही गहरी नींद में खो गए. रात के तकरीबन साढ़े 11 बजे फोन की घनघनाहट ने घर की शांति को तोड़ दिया. पत्नी ने फोन उठाया. फोन पर अस्पताल का रेजिडैंट डाक्टर था, जिस की आवाज में घबराहट साफ झलक रही थी, ‘‘मैम, एक बहुत गंभीर मरीज आया है. 85 साल के बुजुर्ग हैं. तेज बुखार है, होश नहीं है. परिवार वाले कह रहे हैं कि डाक्टर राहुल ही उन की आखिरी उम्मीद हैं.
‘‘सरपंच रामकुमार भी उन के साथ हैं. वे कह रहे हैं कि डाक्टर साहब उनके पुराने परिचित हैं. अगर राहुल सर को एक बार बुला लें, तो शायद मरीज बच जाए.’’
पत्नी बेचैन हो गई थीं. डाक्टर राहुल अभी गहरी नींद में थे. पूरे दिन की थकान के बाद बस कुछ पल आराम के मिले थे.

पत्नी ने रेजिडैंट डाक्टर को समझाने की कोशिश की, ‘‘डाक्टर राहुल बहुत थके हुए हैं. उन की तबियत भी ठीक नहीं है. आप ही इलाज शुरू कीजिए, सुबह होते ही वे खुद देख लेंगे.’’ रेजिडैंट डाक्टर ने कहा, ‘‘मैं संभाल लेता हूं मैम. मैं सब टैस्ट और दवाएं शुरू कर देता हूं.’’ पत्नी ने राहत की सांस ली, ‘‘कम से कम आज तो राहुल को थोड़ा आराम मिल जाएगा.’’ पर मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं. 15 मिनट बाद फिर फोन बजा. इस बार आवाज में हताशा थी, ‘‘मैम, मरीज के परिवार वाले नहीं मान रहे. उन का कहना है कि सिविल अस्पताल और बाकी डाक्टरों ने जवाब दे दिया है.
‘‘सब ने कहा है कि अब सिर्फ डाक्टर राहुल ही देख सकते हैं. सरपंच रामकुमार खुद कह रहे हैं कि राहुल सर उन के दोस्त हैं, वे जरूर आएंगे.’’

पत्नी की हालत विचित्र थी. एक ओर डाक्टर राहुल की थकान और उन का सख्त निर्देश था किआज किसी भी हालत में मुझे जगाया जाए’, दूसरी ओर एक जिंदगी की आखिरी सांसें थीं. पत्नी ने इनसानियत का पक्ष चुना और धीरे से डाक्टर राहुल को जगाया और सारी बात बताई. डाक्टर राहुल बिना कोई सवाल किए तुरंत उठे, कपड़े बदले और अस्पताल पहुंच गए. वहां उन्होंने बुजुर्ग मरीज पाला राम की जांच की. उन्हें तेज बुखार था, दिमाग पर चढ़ गया था और होश खो चुका था. डाक्टर राहुल ने तुरंत इलाज शुरू किया, टैस्ट करवाए, दवाएं दीं और परिवार वालों को समझाया,

‘‘इनकी हालत नाजुक है, लेकिन मैं पूरी कोशिश करूंगा.’’
3 घंटे की मेहनत के बाद पाला राम की सांसें सामान्य हुईं, आंखें खुलीं और बुखार उतरने लगा. डाक्टर राहुल के चेहरे पर राहत झलकने लगी. परिवार के एक सदस्य ने हाथ जोड़ कर धन्यवाद दिया,
‘‘डाक्टर साहब, आप ने तो कमाल कर दिया.’’
डाक्टर राहुल मुसकराए, पर ज्यादा कुछ बोले नहीं.
अगली सुबह तकरीबन 4 बजे डाक्टर राहुल घर लौटे और थकान से चूर हो कर सो गए. सुबह अस्पताल पहुंचे तो देखा कि पाला राम की हालत और सुधर रही थी.
डाक्टर राहुल ने परिवार वालों को समझाया, ‘‘अब लगातार दवाएं देते रहिए, एक हफ्ते में हालत काफी बेहतर हो जाएगी.’’
पर बाहर वार्ड के कोने में फुसफुसाहटें शुरू हो चुकी थीं, ‘‘हम तो सोच रहे थे कि यह आज रात ही मर जाएगा, अब तो बचता दिख रहा है.’’
‘‘अब 7 दिन अस्पताल में रखेंगे, तो पैसे कहां से आएंगे?’’
‘‘इतना खर्च कौन करेगा, जब सब डाक्टरों ने पहले ही कह दिया था कि यह नहीं बचेगा?’’

धीरेधीरे उन कानाफूसियों ने एक फैसले का रूप ले लिया. अगले दिन परिवार वालों में से एक ने डाक्टर राहुल से कहा, ‘‘डाक्टर साहब, हमारी बहू सिविल अस्पताल में भरती है, उस का भी केस गंभीर है. हम 2 जगह इलाज नहीं करा सकते. कृपया छुट्टी दे दीजिए, हम मरीज को घर ले जा कर देखभाल करेंगे.’’
डाक्टर राहुल ने उन्हें बहुत समझाया, ‘‘पाला राम की हालत अभी पहले से बेहतर है, लेकिन पूरी तरह ठीक नहीं. अगर अब इलाज बीच में छोड़ा, तो हालत फिर बिगड़ जाएगी.’’
परिवार वालों ने सिर झुका दिया. सच यह था कि वे खर्च से घबराए
हुए थे. पैसे थे, इच्छा, पर गांव में यह स्वीकार करना किहम इलाज का खर्च नहीं उठा सकतेउन्हें समाज में बेइज्जती वाला काम लगता, इसलिए उन्होंने अपनीलाजको झूठ का जामा पहन लिया.
पाला राम को छुट्टी दे दी गई. राहुल ने आखिरी बार कहा, ‘‘कम से कम दवा और इंजैक्शन समय पर लगवाते रहिए, तभी उम्मीद है.’’

उन्होंने सिर हिला कर हामी भरी, पर वह सिर्फ औपचारिकता थी. 15 दिन बाद गांव का वही सरपंच रामकुमार अस्पताल आया. डाक्टर राहुल ने पूछा, ‘‘अब कैसे हैं पाला राम?’’ सरपंच रामकुमार ने गहरी सांस ली, ‘‘कल रात उन की मौत हो गई.’’ डाक्टर राहुल सन्न रह गए, ‘‘कैसे? वे तो ठीक हो रहे थे…’’ सरपंच ने धीमे स्वर में कहा, ‘‘घर ले जा कर उन्होंने सारी दवाएं बंद कर दीं. गांव वालों से कहा, डाक्टर राहुल ने खुद जवाब दे दिया है, अब बस सेवा करो. शायद पैसे की भी तंगी थी, पर असली वजह थी लोकलाज. ‘‘उन्हें डर था कि गांव वाले कहेंगे कि शहर में रह कर इलाज क्यों नहीं करवाया? क्यों उस को
बचाने की कोशिश नहीं की गई? इसलिए उन्होंने झूठ बोलना ही आसान समझा.’’
डाक्टर राहुल लंबे समय तक चुप रहे. मन में तूफान था. एक ओर डाक्टर के रूप में उन का काम, जो पूरी ईमानदारी से निभाया गया था, दूसरी ओर समाज का वह सच, जहां झूठी लाज के लिए लोग जिंदगी की डोर काट देते हैं.

डाक्टर राहुल ने सोचा, ‘गरीबी तो फिर भी किसी दिन मिट सकती है, पर यह दिखावे की बीमारीयह समाज के भीतर का जहर है, जो आदमी से उस का इनसान छीन लेती है.’ उस रात डाक्टर राहुल बहुत देर तक छत की ओर टकटकी लगाए रहे. उन की आंखों में सिर्फ एक चेहरा था, पाला राम का, जो मरते समय शायद यह भी नहीं जानता था कि उसे उस के अपने ही लोग उस की झूठीइज्जतके लिए मौत की तरफ धकेल गए. डाक्टर राहुल की आंखों से एक बूंद गिरी. वह आंसू किसी मरीज के लिए नहीं था, बल्कि उस समाज के लिए था, जो आज भीलाजके नाम परजिंदगीकी कीमत चुका देता है.   

डा. सुभाष चंद्र गर्ग ‘पार्थ’

Hindi Family Story: नया सवेरा – आलोक की क्या कहानी थी

Hindi Family Story, लेखिका- डा. अनीता सहगल ‘वसुन्धरा’

सावन का महीना, स्कूल-कालेज के बच्चे सुबह 8.30 बजे सड़क के किनारे चले जा रहे थे, इतने घमें नघोर घटाओं के साथ जोर से पानी बरसने लगा और सभी लड़के, लड़कियाँ पेड़ के नीचे, दुकानों के शेड के नीचे खड़े हो गये थे. उन्हें सबसे ज्यादा डर किताब, कापी भीगने का था. उन्हीं बच्चों में एक लड़की जिसका नाम व्याख्या था और वह कक्षा-6 में पढ़ती थी, वह एक मोटे आम के तने से सटकर खड़ी थी. पेड़ का तना थोड़ा झुका हुआ था जिससे वह पानी से बच भी रही थी. लगभग दस मिनट बाद पानी बन्द हो गया और धूप भी निकल आई.

एक लड़का जिसका नाम आलोक था, वह भी कक्षा-6 में ही व्याख्या के साथ पढ़ता था. वहाँ पर कोई कन्या पाठशाला न होने के कारण लड़के और लड़कियाँ उसी सर्वोदय काॅलेज में पढ़ते थे. आलोक बहुत गोरा व सुगठित शरीर का था लेकिन व्याख्या बहुत सांवली थी, व्याख्या संगीत विषय लेकर पढ़ रही थी, उसकी आवाज में एक जादू था, जो उसकी एक पहचान बन गयी थी. काॅलेज के कार्यक्रमों में वह अपने मधुर स्वर के कारण सभी की प्रिय थी. इसी तरह समय धीरे-धीरे आगे बढ़ता गया और व्याख्या ने संगीत में कक्षा-10 तक काफी ख्याति प्राप्त कर ली थी.

आलोक उसी की कक्षा में था और वह व्याख्या को देखता रहता था. कभी भी कोई भी दिक्कत, परेशानी किसी भी प्रकार की होती थी, तो आलोक उसे हल कर देता था. दोपहर इन्टरवल में लड़कियों की महफिल अलग रहती और लड़कों की मंडली अलग रहती थी. लेकिन आलोक की नजर व्याख्या पर ही होती थी.

हाईस्कूल की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कर व्याख्या कक्षा-11 में पहुंच गयी थी और आलोक भी कक्षा-10 उत्तीर्ण कर कक्षा-11 में पहुंच गया था. शाम 3 बजे से 4 बजे तक संगीत की क्लास चलती थी तथा सभी बच्चों में सबसे होशियार और मेहनती व्याख्या ही मानी जाती थी. कक्षा ग्यारह के बाद यानि कि छः वर्ष में व्याख्या ने संगीत प्रभाकर की डिग्री हासिल कर ली थी, जिससे शहर और अन्य शहरों में स्टेज कार्यक्रम के लिए आमंत्रित की जाने लगी. माँ वीणादायिनी ने व्याख्या को बहुत उम्दा स्वर प्रदान किये थे, जिसके कारण गायन में व्याख्या का नाम प्रथम पंक्ति में लिया जाना लगा. व्याख्या को कई सम्मानों से सम्मानित किया जाने लगा. अब तो जहाँ कहीं भी संगीत-सम्मेलन होता, सबसे पहले व्याख्या आहूत की जाती. यदि शहर में कार्यक्रम होता तो आलोक वहाँ व्याख्या को सुनने पहुँच जाता और व्याख्या कार्यक्रम देते समय एक नजर आलोक को जरूर देख लेती थी मगर उसका अधिक सांवलापन उसके जेहन को हमेशा झझकोरता रहता था.

धीरे-धीरे समय बीतता गया और व्याख्या ने संगीत की प्रवीण परीक्षा भी उत्तीर्ण कर ली, लेकिन इतना होने पर भी वह हर समय यही सोचती रहती थी कि मेरे माता-पिता इतने सुन्दर है फिर मैं काली कैसे पैदा हो गयी. उसका रूप-रंग ना जाने किस पर चला गया.

आज व्याख्या संगीत के चरम पर विराजमान थी. शास्त्रीय संगीत की दुनिया में लगातार सीढ़ियाँ चढ़ती चली जा रही थी और संगीत की दुनिया में राष्ट्रीय स्तर की एक जानी-मानी गायिका कहलाने लगी थी. उसे आज भी याद है कि…..

घर के बाहर खूबसूरत लाॅन में बैठी धीरे-धीरे ना जाने क्या सोचते-सोचते वह चाय का प्याला हाथ में लिए अपनी आरामवाली कुर्सी पर बैठी थी. ‘‘मेम साहब, आपका पत्र आया है ? ‘अरे आप ने तो चाय पी नहीं, अब तो यह बहुत ठंडी हो गयी होगी, लाइये दूसरी बना लाऊँ. ‘‘ बिना उत्तर की प्रतीक्षा करे हरि काका ने मेरे हाथ से प्याला लिया और पत्र मेज पर रखकर चले गये. मैंने देखा आलोक का पत्र था. ‘‘व्याख्या, तुम्हारे जाने के बाद मैं बहुत अकेला हो गया हूँ बहुत लड़ चुका हूँ मैं अपने अहं से. अब थक गया हूँ, हार चुका हूँ…….. मुझे नहीं मालूम कि मैं किसके लिए जी रहा हूँ,? मैं नहीं जानता कि मैं इस योग्य हूँ या नहीं, पर तुम्हारे वापस आने की उम्मीद ही मेरे जीवन का मकसद रह गया है, बस उसी क्षण का इन्तजार है, ना जाने क्यों…………….? आओगी न,…………..

पत्र पढ़ने के बाद व्याख्या की भाव शून्य आंखों में एक भाव लहरा कर रह गया. पत्र तहा कर उसने लिफाफे में रख दिया, उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि आलोक जैसा जिद्दी, अभिमानी और कठोर दिल इंसान भी इस तरह की बातें कर सकता है. जरूर कोई मतलब होगा, मेज पर पड़ी किताब के पन्ने हवा के झोंके के कारण फड़फड़ाते हुये एक तरफ होने लगे. जिंदगी के पंद्रह वर्ष पीछे लौटना व्याख्या के लिए मुश्किल नहीं था क्योंकि उसके आज पर पन्द्रह वर्षों के यादों का अतीत कहीं न कहीं हावी हो जाता है.

सोचते-सोचते वह आज भी नहीं समझ पाई कि माँ-पापा तो खूबसूरत थे, पर उसकी शक्ल न जाने किस पर चली गयी, पर माँ उसे हमेशा हिम्मत बंधाती थी कि ‘‘कोई बात नहीं बेटी, ईश्वर ने तुझे रंग नहीं दिया तो क्या हुआ, तू अपने नाम को इतना विकसित कर ले कि सब तेरी व्याख्या करते ना थके.’’ बस व्याख्या ने सचमुच अपने नाम को एक पहचान देनी प्रारम्भ कर दी. उसने हुनर का कोई भी क्षेत्र नहीं छोड़ा, साथ ही ईश्वर की दी गयी वो नियामत जिसे व्याख्या ने पायी थी., ‘सुरीली आवाज’ जिसके कारण वह संगीत की दुनिया में लगातार सीढ़िया चढ़ती गयी और शास्त्रीय संगीत की दुनिया में राष्ट्रीय स्तर की एक जानी मानी गायिका कहलाने लगी.

उसे आज भी याद है कि अहमदाबाद का वो खचाखच भरा सभागार और सामने बैठे जादू संगीतज्ञ पं0 राम शरन पाठक जी. सितार पर उंगलिया थिरकते ही, सधी हुई आवाज का जादू लगातार डेढ़ घंटे तक दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर गया. दर्शकों की तालियाँ और पं0 जी के वो वचन कि ‘‘बेटी तुम बहुत दूर तक जाओगी. शायद आज उनकी वो बात सच हो गयी लेकिन उन दर्शकों में एक हस्ती, जो नामी-गिरामी लोगों में जानी जाती थी, देवाशीस जी, उनका खत एक दिन पिता के नाम पहुँचा कि ‘‘हमें अपने बेटे के लिए आपकी सुपुत्री चाहिए जो साक्षात सरस्वती का ही रूप है. ‘‘एक अंधा क्या मांगे दो आंखे. मेरे पिताजी ने बगैर कुछ सोचे समझे हाँ कर दी. शादी के समय मंडप पर बैठे उन्हें देखा था, एक संुदर राजकुमार की तरह लग रहे थे. सभी परिवार के लोग मुझे मेरी किस्मत पर बधाई दे रहे थे. पर खुदा को कुछ और मंजूर था. आलोक जिन्हें मैं बिल्कुल पसन्द नहीं थी. शादी के बाद क्या, उसी दिन ही अपने पिताजी से लड़ना कि ‘‘कहाँ फसा दिया’’ इस बदसूरत लड़की के साथ.

आलोक घर पर नहीं रूके और पूरे आग बबूला होकर घर छोड़कर चले गये. मेरे सास-ससुर ने सचमुच दिलासा दी. सुबह उठकर नहा धोकर बहू के सारे कर्तव्य निभाते हुये मैं भगवान भजन भी गाती रही. सास ससुर तो अपनी बहू की कोयल सी आवाज पर मंत्र मुग्ध थे, पर मैं कहीं न कहीं अपनी किस्मत को रो रही थी. आलोक पन्द्रह-बीस दिन में कभी-कभार आते थे, लेकिन मेरी तरफ रूख भी नहीं करते थे, बस अपनी जरूरत की चीजें लेकर तुरन्त निकल जाते थे, अब तो यह नियम सा बन गया था. मैं भी अपनी किस्मत को ही निर्णय मान लिया लेकिन कहीं न कही आलोक का इंतजार भी था.

एक दिन मुझे चुपचाप बैठे देख ससुर जी ने कहा-कि ‘‘मैं तो एक बढ़िया सी खुशखबरी लाया हूँ, वो यह कि एक संगीत आयोजन में विशेष  प्रस्तुति के लिए तुम्हारे नाम का आमंत्रण आया है, ‘‘पर बाबूजी मुझे तो दो साल हो गये हैं स्टेज शो किये हुए. अब डर लगता है, पता नहीं क्यों ? में आत्मविश्वास खो सा गया है. नहीं-नहीं मैं नहीं गा पाऊँगी‘‘व्याख्या ने कहा. तुम गा सकती हो, मेरी बेटी जरूर गायेगी और जायेगी, पिता जी ने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा. ‘‘बाबूजी के विश्वास से ही मैंने अपना रियाज शुरू कर दिया. बाबूजी घंटो मेरे साथ रियाज में मेरा साथ देते. वो दिन आ गया. खचाखच भरा वही सभागार, अचानक उसे याद आया कि उसी मंच से तो उसके जीवन में अंधेरा आया लेकिन आज इसी मंच से तो उसके जीवन का नया सवेरा होने वाला है. कार्यक्रम के बाद दर्शकों की बेजोड़ तालियों ने एक बार फिर मुझे वो आत्मविश्वास भर दिया जो सालों पहले कहीं खो गया था.

दूसरे दिन मैं अपनी तस्वीर अखबार में देख रहीं थी कि बाबूजी अचानक घबराते हुए आये और कहने लगे बेटी ‘‘जल्दी तैयार हो जाओ, आलोक का एक्सीडंेट हो गया.’’ व्याख्या के चेहरे पर कोई शिकन न उभरी लेकिन अचानक हाथ सर की मांग में भरे सिंदूर पर गया कि यह तो आलोक के नाम का है.

मैं बाबूजी के साथ गाड़ी में बैठ गयी. अस्पताल में शरीर पर कई जगह पर गहरी चोटों को लिए आलोक बुरी हाल में डाक्टरों की निगरानी में था. पुलिस ने मुझसे आकर पूछा कि-‘‘आप जानती हैं, इसके साथ कार में कौन था ?‘‘मैं समझ नहीं पाई कि किसकी बात हो रही है, फिर थोड़ी देर में पता चला कि आलोक के गाड़ी में जो मैडम थी, उनको नहीं बचाया जा सका. पूरे एक हफ्ते बाद जब आलोक को होश आया तो आंखें खुलते ही उसने पूछा-‘‘मेघा कहाँ है’’? डाॅक्टर साहब, वह ठीक तो है न ? वह मेरी पत्नी है.‘‘ पुलिस की पूछ-ताछ से पता चला कि उन दोनों का एक पाँच महीने का बेटा भी है जो अभी नानी के यहां है ? व्याख्या के सब्र का बांध टूट गया और उसमें इससे ज्यादा कुछ सुनने की शक्ति न बची. 6-7 महीने का कम्पलीट बेड रेस्ट बताया था डाॅक्टर ने. आलोक घर आ चुका था. व्याख्या आलोक का पूरा ध्यान रखती, खाने-पीने का, दवाई का. पूरी दिनचर्या के हर काम वह एक पत्नी की अहमियत से नहीं, इंसानियत के रिश्ते से कर रही थी. चेहरे पर पूरा इत्मीनान, कोमल आवाज, सेवा-श्रद्धा, धैर्य, शालीनता ना जाने और कितने ही गुणों से परिपूर्ण व्याख्या का वह रूप देखकर खुद अपने व्यवहार के प्रति मन आलोक का मन आत्मग्लानि से भर जाता. इतना होने पर भी वही भावशून्य व्यवहार.

कितनी बार मन करा कि वो मेरे पास बैठे और मैं उससे बाते करूँ, लेकिन वह सिर्फ काम से काम रखती, सेवा करती और मेरे पास बोलने की हिम्मत न होने के कारण शब्द मुंह में रह जाते. व्याख्या अपने कार्यक्रम के लिए बाबूजी के साथ भोपाल गयी थी. आलोक ने सोचा लौटने पर अपने दिल की बात जरूर व्याख्या से कह देगा और मांफी मांग लेगा. भोपाल से लौटने पर बाबूजी ने खबर दी कि-‘‘मेरी बहू का दो साल तक विदेशों में कार्यक्रम का प्रस्ताव मिला है, अब मेरी बहू विदेशों में भी अपने स्वर से सबको आनन्दित करेगी. ‘‘एक दिन जब व्याख्या सुबह नहाकर निकली तो आलोक ने कहा-‘‘ मैं अपनी सारी गलतियों को स्वीकारता हूँ. मैं गुनहगार हूँ तुम्हारा………………….मुझे माफ कर दो………..’’ कितना आसान होता है न मांफी मांगना. पर सब कुछ इससे नहीं लौट सकता ना, जो मैंने खोया है, जितनी पीड़ा मैने महसूस की है, जितने आंसू मैनें बहाए हैं, जितने कटाक्ष मैनें झेले हैं. क्या सच है उसकी बिसात और फिर आलोक जो आपने किया यदि मैं करती तो क्या मुझे स्वीकारते ? नहीं, कभी नहीं बल्कि मुझे बदचलन होने का तमगा और तलाक का तोहफा मिलता. व्याख्या ने बिना कुछ कहे मन में सोचा. व्याख्या के कुछ न कहने पर उस समय तो आलोक को मानो काठ मार गया. वो अपनी जिंदगी की असलियत पर  पड़ा परदा हटते देख रहा था कि वह कैसा था…‘‘इतने दिनों तक मैनें आपकी सेवा की, आपका एहसान उतारने के लिए. मैं वास्तव में एहसान मंद हूँ. आपने जितना अपमानित किया उतना ही अधिक अपने लक्ष्य के प्रति मेरा निश्चय दृढ हुआ है.‘‘ अचानक व्याख्या की आवाज से आलोक अपनी सोच से बाहर आया. व्याख्या एक आर्कषक अनुबंध के अंतर्गत विदेश यात्रा पर निकल गयी और अब जब कभी वह लौटती तो, प्रायोजकों के द्वारा भेंट किये गये किराये के बंगले पर ठहरती, लेकिन कभी-कभार बाबूजी से मिलने जरूर आती. एक-एक दिन करके महीने और अब तो कई साल गुजर गये, सभी अपने आप में मस्त हैं. संगीत के अलावा कुछ नहीं सूझता व्याख्या को. अब तो वही उसके लिए प्यार, वही जीवनसाथी. कार्यक्रमों की धूम, प्रशंसकों की भीड़ पूरे दिन व्यस्त रहती, मगर फिर एक रिक्तता थी, जीवन में. रह रहकर आलोक का ख्याल आता, दुर्घटना के पहले और बाद में आलोक के साथ बिताए एक-एक पल उसकी स्मृति में उमड़ने-घूमड़ने लगे. लेकिन आज आलोक की यह छोटी सी चिट्ठी. पर इतने छोटे से कागज पर, कम मगर कितने स्पष्ट शब्दों में बरसों की पीड़ा को सहजता से उकेर कर रख दिया है उसने, आखिर कब तक अकेली रहेगी वह? सब कुछ है उसके पास, मगर वह तो नहीं है जिसकी ज़रूरत सबसे ज्यादा है. व्याख्या सोच में पड़ गयी. बाबूजी भी बीमार चल रहे हैं, मिलने जाना होगा.

अगले ही दिन व्याख्या ससुराल पहुँची, चेहरे पर टांको के निशानों के साथ आलोक बहुत दुबला प्रतीत हो रहा था. बाबूजी को देखने के पश्चात जैसे ही व्याख्या दरवाजे के बाहर निकली, आलोक ने उसका हाथ थाम लिया. बरसों पहले कहा गया वाक्य फिर से लड़खड़ाती जुबान से निकल पड़ा-‘‘व्याख्या, क्या हम नई जिंदगी की शुरूआत नहीं कर सकते? ‘‘क्या तुम मुझे माफ नहीं कर सकती? व्याख्या की निगाहें आलोक के चेहरे पर टिक गयी. घबरा कर आलोक व्याख्या का हाथ छोड़ने ही वाला था कि व्याख्या मुस्करा उठी. मजबूती से आलोक ने उसके दोनों हाथ पकड़ लिए ‘‘अब मैं तुम्हें जाने नहीं दूंगा. ‘‘व्याख्या शरमा कर आलोक के सीने से लग गयी. आज उसके दीप्तिमान तेजोमय मुखमंडल पर जो मुस्कान आई उसे लगा वास्तव में आज ही उसकी संगीत का रियाज पूरा हुआ और आत्म संगीत की वर्षा हुई है. क्योंकि कल उसके जीवन का नया सवेरा जो आने वाला था. Hindi Family Story

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