महिलाओं के सर चढ़ा “हिप्स” सेल्फी का क्रेज, आपने देखी ये तस्वीरें

महिलाओं में चढ़ा हिप्स सेल्फी का क्रेज़, आप ने ट्राई किया. जी हां सेल्फी का भूत इन दिनो हर किसी के सर पर चढ़ कर बोल रहा है, लेकिन ये भूत महिलाओं पर कुछ ज्यादा ही चढ़ गया है और वो लेने लगी है अपने हिप्स की सेल्फी. हैरान हो गए ना आप भी, एक खबर के मुताबिक इन दिनों न्यूयॉर्क शहर की महिलाएं बट्   सेल्फी लेने के लिए अपने हिप्स चमकाने में लगी हैं. असल में जब से मोबाइल पर सेल्फी लेने के ट्रैंड ने जोर पकड़ा है तभी से यहां की फैशन परस्त महिलाओं को अपने हिप्स की सेल्फी लेने का शौक सवार हुआ है.

यह बट् सेल्फी बेहतर आए इसीलिए यह महिलाएं इसको चमकाने में लगी हैं. इसके लिए बाकायदा सैलून भी खुल गए हैं जो आधा घंटे का तकरीबन 65 डॉलर तक चार्ज करते हैं. यह एक पूरा ब्यूटी ट्रीटमेंट होता है और इस दौरान महिला के हिप्स को स्टीम, एक्जोफोलिएट जैसे मार्डन तरीकों से चमका दिया जाता है. आपको बता दें कि रिहाना, माइली साइरस और निकी मिनाज जैसी सेक्सी हॉलीवुड तारिकाएं इन दिनों इस ट्रैंड को फॉलो कर इसे और हवा दे रही हैं.

हरियाणा में छाई हरदोई की लड़की

उत्तर प्रदेश का हरदोई शहर पिछड़े शहरों में गिना जाता है. यहां रहने वाली नेहा तिवारी के परिवार में 2 बहने सोनम तिवारी और खुशबू तिवारी के साथ डाक्टर पिता, मां और एक भाई हैं. तीनों बहनों को एक्टिंग के क्षेत्र में काम करना पंसद था. मातापिता ने पूरा साथ दिया. अपनी बेटियों को बेटा समझने वाले इस परिवार ने दिल्ली आकर बेटियों को एक्टिंग के कैरियर में आगे बढ़ने में मदद की. जिसके चलते नेहा, सोनम और खुशबू तीनों ही एक्टिंग की दुनिया में नाम कमा रही हैं. नेहा ने हिंन्दी, तमिल, भोजपुरी और हरियाणवीं में फिल्मों और सीरियलों में अपनी पहचान बनाई. सोनम हरियाणवी फिल्मों में काम करती है और खुशबू भोजपुरी फिल्मों में.

नेहा इसका सारा श्रेय अपने पैरेंट्स को देते कहती हैं ‘मुझे अपनी मां से हर बात शेयर करना अच्छा लगता है. उनकी वजह से मुझे बहुत मदद मिली. मेरी हरियाणा में बनी फिल्म ‘आठवां वचन’ वहां के स्कूल और कालेज में दिखाई जाती है. मैंने भोजपुरी फिल्मों में भी साफ सुथरे काम को महत्व दिया है. मेरा प्रयास है कि लोग अपने परिवार के साथ भोजपुरी फिल्में देंखे. तभी यहां पर सुधार होगा.’

रफटफ रोल करना पंसद करती हैं ग्लैमरस फिजा अली

जयपुर की रहने वाली फिजा अली ऐसे मुसलिम परिवार से हैं, जहां एक्टिंग करना अच्छा नहीं समझा जाता था. फिजा बचपन से ही संघर्षशील थी. बचपन में मातापिता अलग हो गये. वह मां और भाई के साथ रही. फिजा एक्टर बनना चाहती थी. घर वालों को यह पंसद नहीं था. ऐसे में उसने घर छोड़ कर एक्टिंग की फील्ड में जगह बनाने के लिये मेहनत करनी शुरू की. मुम्बई में आकर संघर्ष किया. कोई सफलता मिलती नहीं दिखी तो एक्टिंग की ट्रेनिंग लेने दिल्ली आ गई. यहां से उसका रास्ता बनाना शुरू हुआ. फिजा को अमिताभ बच्चन, जैकी श्राफ और यामी गौतम के साथ ‘सरकार 3’ में काम करने का मौका मिला. इसमें फिजा ने दुबई में रहने वाली एक लड़की का रोल अदा किया, जो जैकी श्राफ की प्रेमिका बनी है.

फिजा कहती हैं ‘इस फिल्म के बाद मेरे प्रति घर और परिवार के लोगों के साथ समाज की सोच भी बदल गई. जो लोग मुझे असफल मान कर बात करने से कतराते थे वह बात करने लगे. मुझे एक्टिग में ट्रेनिंग करने का लाभ मिला. मैं भले ही ग्लैमरस दिख रही हूं पर मुझे रफटफ रोल पंसद है. मेरा लुक ऐसा है जिससे रफटफ रोल बहुत भाते हैं. मैंने इसके लिये खुद को तैयार किया है. मैने मार्शल आर्ट, किक बाक्सिंग, जिम, डांस सहित तमाम तरह से स्पोर्ट में खुद को मजबूत बनाया. आज मेरे पास हिन्दी और साउथ फिल्मों के औफर आ रहे हैं.’

राजनीति में आने को बैचेन रजनीकांत

तमिल फिल्मों के सुपर स्टार रजनीकांत राजनीति में आ रहे हैं, यह सवाल अपनी जिज्ञासा खो चुका है, अब सुगबुगाहट यह है कि रजनीकांत कब राजनीति में आ रहे हैं और इससे भी ज्यादा अहम चर्चा इस बात पर हो रही है कि वे भाजपा की डोली में बैठकर दुल्हन बनकर राजनीति के आंगन में पांव रखेंगे या फिर खुद अपनी नई पार्टी बनाकर दूल्हा बनकर बारात निकालेंगे. रजनीकांत जो भी फैसला लें तमिलनाडु की जनता को इससे कोई फर्क नहीं पड़ना, जो पलक पांवड़े बिछाकर अपने इस हीरो के फैसले पर से घूंघट उठने का इंतजार कर रही है और मुंह दिखाई के शगुन में थोक में वोट न्योछावर करने तैयार बैठी है.

बीती 17 मई को चेन्नई में रजनीकांत ने अपने प्रशंसकों के लिए दरबार लगाया, तो पूरे तमिलनाडु में अघोषित अलर्ट हो गया था कि वे आज अपने पत्ते खोल सकते हैं लेकिन रजनीकांत का आठ साल बाद चहेतों का हुजूम जुटाने का मकसद कुछ और था, उन्होंने पहली बार राजनीति में आने की बात टरकाई नहीं, बल्कि उसे हां का आकार देते कहा कि राजनीति में आना कोई बुरी बात नहीं है, अगर भगवान चाहता है तो वे राजनीति में आएंगे  और अगर वे राजनीति में आए तो राजनीति से पैसा बनाने वालों से दूर रहेंगे.

अतीत में झांकते हुए उन्होंने बड़ी मासूमियत से माना कि 21 साल पहले डीएमके गठबंधन का समर्थन कर उन्होंने भूल की  थी. बकौल रजनीकांत, वह एक राजनैतिक दुर्घटना थी. तभी से रजनीकांत के राजनीति में आने की अटकलें लगना शुरू हो गईं थीं पर उन्होने दौबारा ऐसे कोई संकेत नहीं दिये तो उन पर विराम भी लग गया. अम्मा के नाम से मशहूर जयललिता की मौत के बाद उनके उत्तराधिकारी अपनी पार्टी एआईएडीएमके संभाल कर रखने में नाकाम साबित हो चुके हैं और कांग्रेस व भाजपा यहां कहने भर को हैं, ऐसे में सारा फायदा डीएमके के मुखिया  एम करुणानिधि को न मिले, इस बाबत दक्षिण में पैर जमाने की कोशिश में जुटी भाजपा की नजरें और उम्मीदें रजनीकांत पर टिकी हैं तो बात कतई हैरत की नहीं.

पिछले तीन सालों में भाजपा के कई दिग्गज नेताओं और रजनीकांत की मुलाकातों से इन अटकलों को और बल मिला कि रजनीकांत भाजपा में जा सकते हैं. इस बाबत भाजपा के लिए हाड़ तोड़ मेहनत कर रहे आरएसएस को भी एतराज नहीं है जो किसी भी तरह दक्षिण भारत के इस अहम सूबे को भी भगवा रंग में नहला देना चाहता है, क्योंकि एम जी रामचंद्रन और जयललिता के अलावा डीएमके मुखिया करुणानिधि ने भी कभी उसे तमिलनाडु में पसरने का मौका नहीं दिया.

तमिलनाडु में दलित हितों वाला द्रविड़ आंदोलन 60 के दशक में इस तरह परवान चढ़ा था कि उसका असर और धमक जयललिता युग तक बरकरार रहे, फर्क इतना भर आया था कि जयललिता ने दलित की जगह गरीब शब्द का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था और उनकी तमाम कल्याणकारी योजनाएं सिर्फ इन्ही गरीब दलितों को ध्यान में रखते बनाई जाती थीं. गरीबों के लिए सस्ते खाने वाली अम्मा थाली की नकल मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह और उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ यूं ही नहीं कर रहे हैं.  ये दोनों भी अम्मा की तर्ज पर हीरो बन जाना चाहते हैं, यह और बात है कि इन दोनों में ही जयललिता सरीखा जज्बा और प्रशासनिक पकड़ दोनों का अभाव है. तमिलनाडु की राजनीति मे पिछले पांच दशकों से फिल्म स्टार्स भगवान की तरह पुजते आए हैं, उनकी पर्दे की चमत्कारी छवि को ही यहां का वोटर असली मानता है, इस लिहाज से रजनीकांत एक ऐसे इकलोते अभिनेता हैं जो इस पैमाने पर सौ फीसदी खरे उतरते हैं.

सोशल मीडिया पर उनके चमत्कारी किस्से रामायण के एक शक्तिशाली पात्र हनुमान की तरह एक से दूसरे मोबाइल फोन में छलांग लगाते रहते हैं जो किसी भी असंभव को संभव बना देने की कूबत रखता है. फिर दिक्कत क्या है या पेंच कहां उलझा है, जो रजनीकांत भाजपा के जरिये राजनीति में आने पूरी तरह हां अभी नहीं भर रहे, जबकि यह बात किसी सबूत की मोहताज नहीं कि तमिलनाडु के अगले सीएम वे ही प्रोजेक्ट किए जाएंगे और वे अगर अभी केंद्र में मंत्री पद मांगें, तो वह भी भाजपा उन्हें थाल में सजाकर देगी.

यह सवाल दरअसल में एक गुत्थी या पहेली भी है कि क्या रजनीकांत की नजर में भाजपा अभी भी सिर्फ सवर्णों और सामंतों की पार्टी है, जो दिखावे के लिए दलितों को गले लगाकर फिर से वर्ण व्यवस्था लोकतान्त्रिक तरीके से ही सही लागू करना चाहती है और उसके मन में दलित गरीबों के लिए वही जगह है जो हिन्दू धर्म ग्रन्थों में वर्णित है. लाख टके का सवाल यह भी मौजू है कि क्या 66 वर्षीय कम शिक्षित रजनीकांत दलित चिंतक पैरियार (इरोड वेंकट नायकर रामास्वामी) की तरह इतना सोच पा रहे होंगे कि उत्तर और दक्षिण भारत के दलितों की सामाजिक स्थिति में जमीन आसमान का फर्क है और अगर सत्ता उनके जरिये भाजपा की मुट्ठी में आई तो क्या गारंटी है कि तमिल ब्राह्मण फिर से पूरा निजाम अपने कब्जे में नहीं ले लेंगे.

जयललिता खुद ब्राह्मण थीं पर दलितों की वैसी ही पेरोकर थीं जैसे उत्तरप्रदेश में बसपा के संस्थापक कांशीराम हुआ करते  थे. जयलललिता इस वजह से भी  पुजतीं थीं कि वे मूलतया सवर्ण विरोधी मानसिकता वाली महिला हो गईं थीं और पौराणिक वादियों को उनके रहते तमिलनाडु में नो एंट्री का बोर्ड लटका मिलता था, जैसा इन दिनों पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने लटका रखा है, इसीलिए  बंगाल में हिंसा अब कट्टर  हिंदूवादियों और उदार  हिंदूवादियों के बीच होने लगी है. दूसरी दिक्कत रजनीकांत का मराठी मूल का होना भी है. इस मुद्दे पर अंदरूनी तौर पर कई सर्वे और मीटिंग हो चुकी हैं, जिनका निष्कर्ष यह निकला कि यह जन्म कुंडली के आंशिक मंगल जैसी समस्या है जिसकी वक्त रहते ग्रह शांति करा दी जाए तो जातक दोष मुक्त हो जाएगा. लेकिन खुद रजनीकांत इस दोष को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं यह उनके बयानों से झलकता भी है.

बड़बोले भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने 15 मई को इस मुद्दे को तूल देने की कोशिश भी यह कहते की थी कि रजनीकांत बेंगलुरु से आए मराठी हैं, वे कोई तमिल नहीं हैं, वे केवल मन बहलाने के लिए हैं और कई दलों से जुड़े रहने के कारण उनकी कोई स्पष्ट विचारधारा नहीं है, यानि वे कट्टर हिन्दुत्व से परहेज करते हैं. हालांकि इस बयान पर लीपापोती करते उन्होंने इसे मज़ाक बताया था. साफ दिख रहा है कि भाजपा और रजनीकांत की कुण्डली पूरी तरह नहीं मिल रही है और दोनों एक दूसरे को लेकर शंकित हैं. ऐसे में भले ही भाजपा अध्यक्ष अमित शाह , केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और आर एस एस चिंतक एस गुरुमूर्ति रजनीकांत पर डोरे डालते रहें, खुद रजनीकांत को राजनीति में आकर वास्तविक सुपरमेन बनने की अपनी ख्वाहिश पूरी करने से पहले हजार दफा सोचना पड़ेगा कि तमिलनाडु के हित वे कहां सुरक्षित रख पाएंगे, भाजपा में जाकर  या फिर खुद की पार्टी बनाकर.

चंबल की पहचान बदलने को बेताब शाह आलम

उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा के बीच स्थित चंबल घाटी सदा से ही लोगों में दिलचस्पी का विषय रही है. इसकी वजह यहां रहने वाले खूंखार डकैत हैं. चंबल केवल डकैतों की वजह से ही मशहूर नहीं है. इसकी और भी खासियत है. चंबल को करीब से देखने समझने और यहां की दशा लोगों तक पहुंचाने के लिये युवा सोशल एक्टिविस्ट शाह आलम ने साइकिल से यहां की लंबी यात्रा की. साइकिल से चंबल की करीब 2300 किलोमीटर से अधिक की यात्रा कर चुके शाह आलम अब चम्बल के बीचों-बीच 25 मई से जन संसद शुरू करने जा रहे हैं. 25, मई 1857 में यहां से शुरू होने वाली जनक्रांति के 160 साल पूरे होने पर शुरू हो रही जनसंसद के दौरान चम्बल घाटी के अवाम, एक्टिविस्ट व जन प्रतिनिधि का जमावड़ा होगा.

जन संसद के दौरान चम्बल की समस्याओं को उजागर किया जाएगा. जनसंसद में उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और राजस्थान राज्यों के लोग शरीक होंगे. कई सत्रों में चलने वाली जन संसद में लोगों के बीच से एक-एक सत्र के लिए अलग-अलग जन सांसद चुना जाएगा, जो अपने इलाके की समस्याएं रखेंगे. इन समस्याओं का दस्तावेजीकरण कर सरकार व प्रशासन के सामने रखा जायेगा. हजारों किलोमीटर यात्रा करने वाले देश के पहले एक्टिविस्ट बने शाह आलम बीहड़ांचल को ‘नर्सरी ऑफ सोल्जर्स’ बताते हैं. वह कहते हैं कि चम्बल डकैतों  के लिए ही जाना गया, लेकिन यह धारणा गलत है. चम्बल ने देश को इतने क्रांतिकारी दिए हैं कि इसे ‘नर्सरी ऑफ सोल्जर्स’ कहना बड़ी बात नहीं होगी.

शाह आलम कहते है कि 25 मई, 1857 को चम्बल की मशहूर पचनदा (पांच नदियों का संगम) से छापामार जंग की शुरुआत हुई थी. 25 मई को इस क्रांति के 160 साल पूरे हो रहे हैं. क्रांतिकारियों ने इसी इलाके में अंग्रेजों के खिलाफ सामूहिक योजनायें बनाई. चम्बल की घाटी के बीहड़ो को क्रांतिकारियों ने तैयारी के लिए सबसे अहम स्थान बनाया. इतिहास खंगालने पर पता चलता है कि जैसी तैयारी यहां क्रांतिकारियों ने की, उत्तर भारत में वैसी तैयारी कहीं और नहीं हुई. यहां सैकड़ों क्रांतिवीरों ने अंग्रेजों सेना से लड़ते हुए शहादत दी थी.

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की फौज में सबसे ज्यादा सिपाही चम्बल की घाटी के थे. शहीद आजम भगत सिंह को चम्बल के जंगल पसंद थे. इसके साथ ही उत्तर भारत के क्रांतिकारियों के द्रोणाचार्य के नाम से विख्यात गेंदालाल दीक्षित, राम प्रसाद बिस्मिल, काशीबाई, जंगली-मंगली बालिमिकी, जन नायक गंगा सिंह, तेजाबाई, शेर अली नूरानी जैसे दर्जनों क्रांतिकारी चम्बल की घाटी को ट्रेनिंग सेंटर बनाया. उन्होंने बताया कि सन 1916 में बने उत्तर भारत के गुप्त क्रांतिकारी दल ‘मातृदेवी’ की सेन्ट्रल कमिटी के 40 सदस्यों में से 30 चम्बल के बागी ही थे. चम्बल में आजादी का बिगुल लगातार बजता रहा.

आजादी के बाद चम्बल की समस्याओं और अत्याचार ने डकैतों को जन्म दे दिया. डकैतों का पनपना आजाद भारत की सरकार की बड़ी खामी थी. देश और दुनिया ने चम्बल को डकैतों के रूप में जान लिया और चम्बल के गौरवशाली इतिहास को भुला दिया गया. शाह आलम ने बताया कि इसी उपेक्षा के कारण चम्बल समस्याओं की खान बन चुका है. चम्बल को उसका हक और पहचान दिलाने के लिए पांच नदियों के संगम पचनदा पर जनसंसद होगी. इसके साथ ही बीहड़ के रहवासियों के साथ जालौन के पचनद, जगम्मनपुर में घाटी की मौजूदा समस्याओं पर मंथन होगा. यहां चुने गए जनसांसद जो अपने इलाके की जन समस्याओं को प्रमुखता से सदन के बीच रखेगा. जनसंसद के दौरान चम्बल घाटी के तीन राज्यों औरैया, इटावा, जालौन, भिन्ड, मुरैना, धौलपुर के बीहड़ों में कठिन जीवनयापन से जूझ रहे ज्वलंत सवालों से पटल को रुबरु करायेंगे.

बस्ती जिले के नकहा गांव में जन्मे शाह आलम अयोध्या के निवासी हैं. अवध यूनिवर्सिटी और  जामिया सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी से पढ़ाई के बाद एक दशक से ज्यादा समय से दस्तावेजी फिल्मों का निर्माण किया. सामाजिक सरोकारों के लिए 2002 में चित्रकूट से अयोध्या तक, 2004 मेहंदीगंज बनारस से सिंहचर तक, 2005 में इंडो-पाक पीस मार्च दिल्ली से मुल्तान तक, 2005 में ही सांप्रदायिक सौहार्द के लिए कन्नौज से अयोध्या, 2007 में कबीर पीस हॉर्मोनी मार्च अयोध्या से मगहर, 2009 में कोसी से गंगा तक बिहार में पुनर्वास का हाल जानने के लिए पैदल यात्रा की. शाह आलम 2006 से ‘अवाम का सिनेमा’ के संस्थापक हैं. ‘अवाम का सिनेमा’ के देश में 17 केन्द्र हैं. जहां कला क विभिन्न माध्यमों को समेटे एक दिन से लेकर हफ्ते भर तक आयोजन अक्सर चलते रहते हैं. अवाम का सिनेमा के जरिये वह नई पीढ़ी को क्रांतिकारियों की विरासत के बारे में बताते हैं. शाह आलम ने बीते साल मई, जून, जूलाई के महीने में 2300 किमी से अधिक दूरी सायकिल से तय करके चंबल के बीहड़ो का दस्तावेजीकरण किया था.

ये हैं बॉलीवुड के 10 बेस्ट बाथरूम सीन, क्या आपने देखे

बॉलीवुड के बेस्ट बाथरूम सीन देखकर आपके भी होश उड़ सकते हैं. बॉलीवुड की हॉट हसीनाओं के बाथरूम में ऐसे जलवे देखकर लग रहा है, मानो पानी में ही आग लग जाएगी. यहां पेश है ऐसी ही कुछ आग लगाती तस्वीरें.

 

 

 

 

 

 

 

 

 

इसे कहते हैं प्यार, अनूठी है ये कहानी

प्यार वो  होता है जिसके लिए कोई कुछ भी छोड़ने के लिए तैयार हो जाता है, फिर चाहे पैसा हो या प्रॉपर्टी, लेकिन एक आम लड़के के प्यार में एक राजकुमारी को अपना राज पाठ छोड़ते हुए आपने सिर्फ कहानियों में ही सुना होगा, लेकिन आज ये किस्सा सच हो गया है.

जापान की सुंदरी को हुआ इश्क और एक साधारण दिखने वाले लड़के के लिए उसने अपना पूरा साम्राज्य ठुकरा दिया. इस सुंदरी का नाम ‘मेको’ है. 25 साल के अपने प्रेमी ‘की कोमुरो’ से शादी के बंधन में बंधने के लिए उसने आधिकारिक आज्ञा मांगी है.

हालांकि इस बंधन में बंधने के बाद उसे अपना राज्य छोड़ना पड़ेगा, क्योंकि ऐसा करना वहां की परंपरा के खिलाफ है. अब बात है कि ऐसा क्या खास है उस लड़के में जो एक राजकुमारी को अपना राज्य छोड़ना पड़ रहा है. 25 साल का ‘की’ और राजकुमारी दोनों जापान के एक रेस्टोरेंट में मिले थे.

राजकुमारी का दिल जीतने वाला 25 साल का ‘की कोमुरो’ राजकुमारी ‘मेको’ के ही कॉलेज से ग्रेजुएट है. कुछ समय पहले जब दोनों रेस्टोरेंट में मिले, तब उन दोनों का इश्क परवान चढ़ा. अब बात राजकुमारी के त्याग पर आ रुकी है, एक तरफ प्यार है दूसरी तरफ साम्राज्य.

हालांकि राजकुमारी मेको अपने साथी को घर वालों से मिलवा चुकी हैं और घर वाले इस शादी के लिए राजी ही हैं, लेकिन उनका राजशाही परिवार ये नहीं चाहता कि इस बात की खबर किसी को लगे.

एलजीबीटी प्राइड परेड : एक उत्सव अधिकार का

क्या यौन संबंधों को किन्हीं भी शर्तों, कानून या सीमाओं में बांधा जाना एक उचित और मानवीय बात है? यह सवाल अब दुनिया भर में हर कहीं बड़े तार्किक तरीके से पूछा जाने लगा है, जिससे असहमत लोगों की संख्या सहमत लोगों के मुक़ाबले काफी कम हो चली है.  लोग अब मानने लगे हैं कि सेक्स सभी का हक है और इसके तौर तरीकों पर नजरिया बदला जाना चाहिए. कई देशों ने तो समलैंगिकता को कानूनी मान्यता दे भी दी है.

इसी बदलते नजरिए का आभार व्यक्त करती एक अनूठी प्राईड परेड भोपाल के बोट क्लब पर आयोजित थी, जिसका नाम था एलजीबीटी यानि लेस्बियन,गे, बाइसेक्सुअल और ट्रांसजेंडर समुदाय, जो आमतौर पर परिवार और समाज से बहिष्कृत हैं और कानून भी इनके हक में नहीं हैं. इसके बाद भी अच्छी बात यह है कि ये लोग निराश या हताश नहीं हैं और तरह तरह से जगह जगह अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं. एलजीबीटी परेड ने एक मीडिया को छोड़ सभी का ध्यान अपनी तरफ खींचा और खुलकर अपने दिल की बात कही. परेड में देश विदेश के कोई 300 सदस्य इस समुदाय के पूरी शिद्दत से शामिल  थे, जिनकी बातें और मांगे सुन मौजूद लोग इनसे सहमत भी थे और प्रभावित भी हुये. परेड में सांस्कृतिक आयोजन भी हुये और तरह तरह के ध्यान खींचने वोले दृश्य भी थे, लेकिन कहीं कोई फूहड़ता या कथित अश्लीलता नहीं थी.

यह बात भी स्वागत योग्य थी कि बोट क्लब से गुजरते कई आम और खास लोगों ने इन्हीं की तरह रंग में आते परेड में शामिल होते इन्हें अपना समर्थन दिया. परेड का मकसद बाताते हुए मित्र श्रंगार समिति के संस्थापक वेणु पिल्लई ने बताया, हम चाहते हैं कि एलजीबीटी कम्युनिटी से जुड़े लोग भी सामान्य जीवन जी सकें,  हमारी मांग है कि इस समुदाय के लोगों को भी वही सम्मान और अधिकार मिलें जो आम लोगों को मिले हुये हैं. परेड में शामिल सदस्य हाथों में फ्लेक्स लिए नारे भी लगा रहे थे कि धारा 377 खत्म की जाए, जिससे इनकी निजता और सम्मान बने रहें.

बकौल वेणु पिल्लई, मध्यप्रदेश सरकार थर्ड जेंडर्स के लिए काफी काम कर रही है, उनके लिए कई नियम और कानून बनाए गए हैं और एक बोर्ड के गठन का भी प्रस्ताव लंबित है. इस उपेक्षित और तिरस्कृत समुदाय के सदस्यों ने देर रात तक सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के जरिये भी अपनी बात कही. स्टेट एड्स कंट्रोल सोसाइटी की की डिप्टी डायरेक्टर सुनीता शर्मा ने भी अपने वक्तव्य में परेड को समर्थन दिया.

लेकिन मुद्दे की बात इन लोगों के यौन सम्बन्धों पर सामाजिक और कानूनी सहमति पर अभी और खुल कर चर्चा होना शेष है, इसके लिए जरूरी यह है कि सामान्य लोग इनकी पीड़ा समझते इनके साथ आयें और इनकी शारीरिक व मानसिक परेशानियों को समझें. दो वयस्क अगर आपसी रजामंदी से सेक्स करें तो कोई पहाड़ नहीं टूट पड़ना, फिर इस बात के कोई माने नहीं कि वे पुरुष–पुरुष और स्त्री–स्त्री हैं. एकांत में किया जाने वाला कथित अप्राकृतिक मैथुन गुनाह क्यों है, जबकि यह कोई हिंसा या आतंक नहीं और कानून की कोई धारा ऐसी नहीं तोड़ता, जो सामान्य जन जीवन में व्यवधान पैदा करना तो दूर की बात है किसी तीसरे को किसी भी तरह से प्रभावित करती हो.

आईपीसी की धारा 377 अब अप्रासंगिक हो चली है, जिसके तहत न के बराबर मामले दर्ज होते हैं, उलट इसके बलात्कार के हजारों मामले रोज दर्ज होते हैं, यानि एक पक्ष की असहमति एक अहम बात है, जो कम से कम इन लोगों में तो नहीं दिखती. परेड में शामिल एक सदस्य की मानें, तो एलजीबीटी से देश भर में कई युवा जुड़ रहे हैं, जो विपरीत लिंगी सम्बन्धों मे रुचि नहीं रखते, यह एक निहायत व्यक्तिगत बात है जिस पर किसी को खासतौर से पेरेंट्स को एतराज नहीं जताना चाहिए.  ऐसे कई युवाओं के अवसाद और आत्महत्या की वजह पारिवारिक दबाब होता है जो पीड़ित की चुप्पी के चलते दब जाता है. एक मामूली वजह के चलते जिंदगी बर्बाद या खत्म कर देना कहां की बुद्धिमानी या न्याय है. इस सदस्य का कहना है कि ग्लानि या अपराधबोध हममें नहीं, बल्कि हमसे नाकभों सिकोड़ने वालों में है, जो हमे वे अलग थलग देखना और करना चाहते हैं.

हाफ गर्ल फ्रेंड : हर किताब पर अच्छी फिल्म नहीं बनती

भाजपा समर्थक मशहूर उपन्यासकार चेतन भगत के कई उपन्यासों पर कई सफल फिल्में बन चुकी हैं, पर इसके यह मायने नहीं होते कि उनके हर उपन्यास पर एक अच्छी फिल्म का निर्माण किया जा सकता है. इस बार चेतन भगत के उपन्यास ‘हाफ गर्ल फ्रेंड’ पर बनी इसी नाम की यह फिल्म इस बात को साबित करती है कि हर कहानी को आप दृश्य श्रव्य माध्यम में नहीं बदल सकते. मजेदार बात यह है कि अपने हर उपन्यास पर बनी सफल फिल्मों से निर्माताओं को कमाई करते देख इस बार इस फिल्म का सह निर्माण कर चेतन भगत अपना हाथ जला बैठे हैं. अब उनकी समझ में आ जाएगा कि हर चमकने वाली पीले रंग की वस्तु सोना नहीं होती.

फिल्म ‘‘हाफ गर्लफ्रेंड’’ यह साबित करती है कि हर किताब पर एक अच्छी फिल्म नहीं बनायी जा सकती. माना कि चेतन भगत के उपन्यास पर ही ‘काई पे चे’, ‘टू स्टेट्स’ व ‘थ्री ईडियट्स’ जैसी सफल फिल्में बनी हैं. पर निर्माण के क्षेत्र में उतरते हुए चेतन भगत यह कैसे भूल गए कि अतीत में भी उनके एक उपन्यास पर बनी फिल्म ‘हेलो’ का क्या हश्र हुआ था.

फिल्म ‘‘हाफ गर्लफ्रेंड’’ की शुरुआत होती है माधव झा (अर्जुन कपूर) से अनबन के बाद रिया सोमानी (श्रद्धा कपूर) का टूटे दिल के साथ पटना छोड़ने से. उसके बाद माधव अतीत में खो जाता है, जब वह पहली बार दिल्ली के सेंट स्टीफन कालेज में रिया सोमानी से मिला था.

बिहार के बक्सर जिले के डुमराव गांव के रहने वाले माधव झा अंग्रेजी की पढ़ाई कर अपने गांव को सुधारने के लिए पहले पटना और फिर दिल्ली के सेंट स्टीफन कालेज पढ़ने पहुंचते हैं. उन्हे बास्केटबाल खिलाड़ी होने के चलते ही कालेज में प्रवेश मिला था. दिल्ली में रिया से मुलाकात होने पर दोनों की दोस्ती खिलाड़ी होने के कारण हो जाती है. रिया भी फुटबाल खिलाड़ी है. वैसे रिया अति अमीर परिवार से है और बड़ी गाड़ी में कालेज आती है. रिया को पहली बारिश में भीगते देख माधव उसे अपना दिल दे बैठता है. यानी कि एक अमीर लड़की और गरीब लड़के के रोमांस की शुरुआत. पता चलता है कि रिया सोमानी अपने घर पर हर दिन अपने पिता द्वारा अपनी मां को पिटते हुए देखती रहती है. इसलिए उसे भोला भाला माधव अच्छा लगता है. पर वह साफ कर देती है कि वह उसकी प्रेमिका नहीं हाफ गर्ल फ्रेंड है. और गिटार बजाती है. उसका सपना न्यूयार्क के क्लब में जैज सिंगर के रूप में काम करना है. उधर माधव अंग्रेजी नही आती की हीनग्रंथि से उबरने का प्रयास कर रहा है. माधव का दोस्त शैलेष (विक्रांत मैसे) उसकी मदद करता रहता है.

रिया व माधव का रिश्ता आगे बढ़ता है, मगर माधव की बेवकूफी के चलते दोनों के रिश्तों में दरार आ जाती है. रिया कहीं दूर चली जाती है. माधव वापस अपने गांव आकर गांव के अपने पारिवारिक स्कूल को विस्तार देने के अलावा लड़कियों को शिक्षा के प्रति प्रेरित करने का काम शुरू करता है. कई घटनाक्रम तेजी से बदलते हैं. एक बार फिर माधव और रिया की मुलाकात न्यूयार्क में होती है.

फिल्म ‘हाफ गर्लफ्रेंड’ की कमजोर कड़ी इसकी कहानी व पटकथा है. कहानी को जब आप किसी मकसद के अंदर पिरोने की कोशिश करते हैं, तो सब कुछ बिखर जाता है. कहानीकार व पटकथा लेखक ने इस फिल्म में अंग्रेजी व हिंदी भाषा के बीच के भेदभाव, महिला सशक्तिकरण, महिलाओं के साथ हिंसा, सेक्सुल अब्यूज, लड़कियों की शिक्षा सहित कई मुद्दों को फिल्म में पिरोन का प्रयास करते करते पूरी कहानी व फिल्म को तहस नहस कर दिया.

यह फिल्म न मुद्दों पर आधारित फिल्म रही और न ही प्रेम कहानी वाली फिल्म रही. फिल्म में रोमांस है ही नहीं. फिल्म के सभी किरदार बिखरे हुए नजर आते हैं. आखिर यह किरदार कहना क्या चाहते हैं, इसे फिल्मकार ठीक से बता ही नहीं पाता. इंटरवल से पहले की फिल्म और इंटरवल के बाद की फिल्म के बीच सामंजस्य ही नहीं बैठ पाता है. फिल्म का क्लायमेक्स बहुत घटिया है. इस फिल्म की मजेदार बात है कि दर्शक को लगता है कि फिल्म खत्म हो गई, पर पता चलता है कि अभी तक खत्म ही नहीं हुई. यह स्थिति भी पटकथा लेखक व निर्देशक की कमजोरी की ओर इशारा करती है. दर्शक सोचने पर मजबूर हो जाता है कि क्या कई सफल फिल्म दे चुके निर्देशक मोहित सूरी ही इस फिल्म के निर्देशक हैं?

फिल्म में इमोशंस का घोर अभाव है, जिसके चलते दर्शक किरदारों के साथ जुड़ ही नहीं पाता. निर्देशकीय कमजोरी के चलते जब तक दर्शक रिया व माधव की प्रेम कहानी के साथ खुद को जोड़ पाता, तभी दोनों के बीच समस्याएं आती हैं और दोनों अलग हो जाते हैं.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो इस फिल्म में अर्जुन कपूर और श्रद्धा कपूर की केमिस्ट्री नहीं जमी. दोनों का अभिनय भी औसत दर्जे का ही रहा है. विक्रांत मैसे भी ठीक ठाक रहे. फिल्म का गीत संगीत भी प्रभावित नहीं करता. फिल्म के संवाद बचकाने हैं.

दो घंटे 15 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘हाफ गर्लफ्रेंड’’ का निर्माण शोभा कपूर, एकता कपूर, मोहित सूरी व चेतन भगत तथा निर्देशन मोहित सूरी ने किया है. फिल्म की संवाद लेखक इशिता मोएत्रा, पटकथा लेखक तुषार हिरानंदानी, संगीतकार मिठुन, तनिष्क बागची, अमि मिश्रा, राहुल मिश्रा, कैमरामैन विष्णु राव व कलाकार हैं – अर्जुन कपूर, श्रद्धा कपूर, विकारंत मैसे, सीमा विश्वास व अन्य.

भारत के लिए चुनौती रेशम मार्ग पर चलती रेल

चीन से ब्रिटेन की दूरी हजारों किलोमीटर है. अकसर ऐसी दूरियां विमान या फिर पानी के जहाज से तय की जाती हैं, ट्रेन से नहीं. पर वर्ष 2017 में इस मिथक को तोड़ने की एक शुरुआत चीन से की गई. यहां साल के आरंभ में चीन के झेजियांग प्रांत के छोटे से पूर्वी शहर यीवू से एक मालगाड़ी लंदन के लिए रवाना की गई. चीन के मशहूर थोक बाजार यीवू से चलाई गई मालगाड़ी इतिहास बनाने के रास्ते पर है. पहली जनवरी को चली यह ट्रेन 18 दिनों में 12 हजार किलोमीटर की दूरी तय कर के लंदन पहुंची. रास्ते में वह कई देशों — कजाकिस्तान, रूस, बेलारूस, पोलैंड, बेल्जियम और फ्रांस से हो कर गुजरी.

चीन जिस तरह से ट्रेनों की गति और रेलमार्ग के विस्तार की योजनाओं पर आक्रामक रूप से काम कर रहा है, यह ट्रेन उसी का एक उदाहरण है और भारत के लिए चुनौती भी. क्योंकि हम न सिर्फ पहाड़ी व दुर्गम जगहों पर ट्रेन पहुंचाने में काफी पिछड़े हुए हैं, बल्कि रेलों की गति के मामले में भी चीन के पासंग भी नहीं ठहर पा रहे हैं.

चीन के यीवू से नया सिलसिला : चीन के यीवू शहर को घरेलू इस्तेमाल की चीजों के उत्पादन के लिए जाना जाता है. यहीं से चलाई गई नई मालगाड़ी में घरेलू इस्तेमाल की चीजें जैसे कपड़े, थैले, सूटकेस लादे गए. रेल के जरिए दुनिया के एक छोर से दूसरे छोर तक सामान भेजने में भले ही 18 दिनों का समय लग रहा है, पर इस माध्यम से हवाई सेवाओं के मुकाबले समान ढुलाई में होने वाला खर्च 50 फीसदी कम होगा. यही नहीं, अगर यह सामान समुद्री रास्ते यानी पानी के जहाजों से भेजा जाता तो उस में एक महीने से ज्यादा का वक्त लगता. वैसे तो चीन से पहले ही यूरोप के कई देशों के बीच ट्रेन सुविधा उपलब्ध है लेकिन लंदन तक चली यह पहली रेल है. असल में लंदन को चीन से हाल में ही रेल नैटवर्क से जोड़ा गया है और इस रास्ते पर ट्रेन चलाने की जिम्मेदारी ईवू टाइमैक्स इंडस्ट्रियल इवैंस्टमैंट नामक कंपनी को दी गई है. यही कंपनी इस से पहले से स्पेन की राजधानी मैड्रिड और चीन के बीच ट्रेन संचालन कर चुकी है.

वन बैल्ट, वन रूट का कमाल : ऊपर से देखने पर लगता है कि चीन से लंदन तक का कोई नया, एकदम सीधा रेलमार्ग बनाया गया होगा, पर ऐसा नहीं है. असल में इस यात्रा में कई रेल नैटवर्कों को आपस में जोड़ा गया है. ऐसे में कोई एक ट्रेन 12 हजार किलोमीटर की पूरी दूरी तय नहीं करती है, बल्कि उस में लदे कंटेनरों को कई बार अलगअलग ट्रेनों से जोड़ कर आगे के लिए रवाना किया जाता है.

वन बैल्ट वन रोड : ओबीओआर

 चीन असल में अपनी ‘वन बैल्ट, वन रोड’ योजना के तहत पूरे एशिया में सड़कें, रेलवे, बंदरगाह और दूसरे इंफ्रास्ट्रक्चर बना कर अपनी अर्थव्यवस्था को दूसरे देशों के साथ मजबूती से बांधना चाहता है. चीन ने यह योजना अपने रणनीतिक और आर्थिक हितों को दुनियाभर में आगे बढ़ाने के उद्देश्य से तैयार की है.

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने 2013 में वन बैल्ट, वन रोड की शुरुआत करते हुए कहा था कि इस के तहत एशिया, अफ्रीका और यूरोप के देशों को सड़क व रेलमार्ग से जोड़ा जाएगा. चाइनीज नेतृत्व इसे शांति और समृद्धि की ओर बढ़ाई गई अंतर्राष्ट्रीय पहल का भी नाम दे रहा है. खुद राष्ट्रपति शी जिनपिंग कह चुके हैं कि यह क्षेत्रीय और वैश्विक सहयोग की समय की मांग के मुताबिक है.

ब्रिटेन में चीन के राजदूत ने वर्ष 2014 में कहा था कि चीन की वन बैल्ट वन रोड योजना में दुनिया के 60 देश शामिल होंगे यानी धरती की दोतिहाई आबादी. पर चीन के एक सरकारी दस्तावेज के मुताबिक, इस में वे देश शामिल होंगे जो चीन के कुल विदेश व्यापार में 26 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखते हैं.

यह सही है कि इस वृहद योजना के लिए चीनी सरकार के बैंक और उस की कई कंपनियां पानी की तरह पैसा बहा रही हैं. इस योजना के लिए वर्ष 2014 में 40 अरब डौलर का सिल्क रोड फंड शुरू किया गया था जो वन बैल्ट, वन रोड योजना को पैसा दे रहा है. चीन के सरकारी बैंक इस प्रोजैक्ट में शामिल होने वाले देशों को भी खुल कर कर्ज दे रहे हैं.

मकसद घाटा दूर करना : चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग भले ही इस योजना को वैश्विक बंधुत्व के खाके में पेश कर रहे हों, पर सचाई यह है कि इस के जरिए चीन अपने वित्तीय घाटे को पूरा करते हुए अपनी विकास दर बढ़ाना चाहता है. पिछले 25 वर्षों में ऐसा पहली बार हुआ है जब चीन की विकास दर 7 फीसदी से नीचे (6.9 फीसदी पर) चली गई है. 2015 में उस का निर्यात 2014 के 2.34 लाख करोड़ डौलर के मुकाबले घट कर 2.27 लाख करोड़ डौलर हो गया. चीनी कंपनियां घरेलू स्तर पर स्लोडाउन का सामना कर रही हैं. ऐसे में जाहिर है चीन में विदेशों से व्यापार बढ़ाने के नए रास्ते खोजने को ले कर बेकरारी है. पर सवाल यह भी उठाया जा रहा है कि क्या इस नए रेलमार्ग की वजह से यीवू में उत्पादन बढ़ेगा?

जीवित होगा सिल्क रूट : सिल्क रूट यानी रेशम मार्ग एक प्राचीन व्यापारिक रास्ता था जिस से चीन के सिल्क का व्यापार भूमध्यसागर से एशिया तक होता था. आज के वन बैल्ट, वन रोड प्लान का एक हिस्सा असलियत में प्राचीन रेशम मार्ग का नया रूप है जो वाणिज्यिक बैल्ट के रूप में विकसित किया जा रहा है.

यह सिल्क रोड चीन से शुरू हो कर सैंट्रल एशिया से होते हुए यूरोप तक जाएगी. इसी के दूसरे हिस्से में 21वीं सदी की मैरीटाइम सिल्क रोड बनाई जा रही है जो चीन को अहम समुद्री रास्तों से जोड़ने के अलावा साउथ ईस्ट एशिया, मिडल ईस्ट और अफ्रीका से जोड़ेगी. यह रास्ता पश्चिम पैसिफिक महासागर और हिंद महासागर से हो कर गुजरेगा.

कुल मिला कर वन बेल्ट, वन रोड योजना के पीछे उद्देश्य यह है कि तकनीक का इस्तेमाल कर के बीचबीच में क्षेत्रीय उत्पादन केंद्र बनाए जाएं.

जिन के जरिए चीन समुद्र, रेल और सड़क से पश्चिम देशों पर अपना प्रभाव कायम करे. नई सिल्क रोड परियोजना के तहत चीन मध्यपूर्व और अफ्रीका तक अपनी पहुंच बनाना चाहता है, इसलिए वह इस पर रेललाइन, बंदरगाह और राजमार्गों का निर्माण कर रहा है. मध्य एशिया, पूर्वी यूरोप और पश्चिमी यूरोप को एशिया की मुख्य जमीन (मेन लैंड) से जोड़ने वाला यह वही रास्ता है जिस से हो कर 800 साल पहले आक्रमणकारी चंगेज खान ने दुनिया के कई इलाके अपने कब्जे में लिए थे. इसी के साथ चीन की योजना समुद्रीमार्ग से चीन सागर, हिंद महासागर, हौर्न औफ अफ्रीका और लालसागर होते हुए भूमध्य सागर तक पहुंचने की है.

आज भले ही इस रेलमार्ग पर सिर्फ मालगाड़ी चलाई जा रही हो, लेकिन उम्मीद है कि आने वाले वक्त में इस पर पैसेंजर ट्रेनें भी चलेंगी. इस का फायदा सिर्फ चीन को नहीं, बल्कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप को हो सकता है.

यह विडंबना ही है कि पूरे यूरेशिया महाद्वीप को लंबे समय तक आपस में जोड़े रखने वाला रेशम मार्ग पिछले एक हजार वर्षों में गुम सा हो कर रह गया था और पड़ोसियों से दूर हो कर हम यूरोपअमेरिका से जुड़ते चले गए. पर अब उम्मीद है कि इस नए व्यापारमार्ग से न सिर्फ व्यापार बढ़ेगा बल्कि पड़ोसियों के बीच मेलजोल भी कायम होगा, बशर्ते चीन भारत को अपना स्वाभाविक पड़ोसी और मित्र माने.

चीन–ईरान रेलमार्ग

 लंदन तक मालगाड़ी चलाने से पहले पिछले ही साल चीन ने तुर्कमेनिस्तान होते हुए ईरान तक एक ट्रेन (मालगाड़ी) भी चलाई थी. यह ट्रेन चीन के झेनझियांग से चल कर कजाकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान होते हुए 9,500 किलोमीटर का सफर तय कर के ईरान की राजधानी तेहरान पहुंची थी. तेहरान तक जो ट्रेन चलाई गई वह अपना सफर 14 दिनों में तय करती है. यह मालगाड़ी चीनी सामानों से भरे 32 कंटेनर ले कर तेहरान पहुंची. खास बात यह थी कि चीनी बंदरगाह से ईरानी बंदरगाह तक पहुंचने का जो पुराना रूट था उस के मुकाबले इस रूट ने 30 दिन कम लिए. तब से यह ट्रेन हर महीने चल रही है. ईरान का एकतिहाई से ज्यादा विदेश व्यापार चीन से होता है. वहीं, चीन ईरान का सब से बड़ा तेल आयातक है.

भारत के लिए खतरा

वैसे तो आबादी के मामले में, विकास के मामले में और अंतरिक्ष व रक्षा तैयारियों के मामले में दुनिया भी भारत व चीन के बीच तुलना करती रहती है लेकिन इधर कुछ वर्षों से चीन ने एक मामले में भारत के मुकाबले काफी आगे बढ़ कर कुछ ऐसा किया है कि जिस से हमारे देश की सुरक्षा को ले कर भी चुनौती पैदा हो गई है. असल में यह सारा मामला चीनी रेल के विकास से जुड़ा है.

2 साल पहले (अप्रैल 2015) में खबर आई थी कि चीन मशहूर पर्वत शिखर माउंट एवरेस्ट के नीचे सुरंग बना कर तिब्बत और नेपाल को आपस में जोड़ने की योजना बना रहा है. इस के लिए तिब्बत व नेपाल के बीच 540 किलोमीटर लंबा हाईस्पीड रेलनैटवर्क बिछाया जाएगा. यह असल में मौजूदा 1,956 किलोमीटर लंबे क्ंिवगहाइ-तिब्बत रेलनैटवर्क को और आगे बढ़ाने की योजना का हिस्सा है जिस में नेपाल को तिब्बत से जोड़ने का प्रस्ताव किया गया है.

चीन ने इस के लिए द्विपक्षीय व्यापार और पर्यटन को बढ़ावा देने की बात का हवाला दिया था पर हिमालय में चीनी रेलनैटवर्क की मौजूदगी का भारत के लिए क्या अर्थ है, यह किसी से छिपा नहीं है. चीन अभी तक विकास के ऐसे काम अपनी ही सीमा के भीतर रह कर कर रहा था, लेकिन अब भारतीय सीमाओं तक रेल पहुंचाने की उस की योजनाओं से साफ है कि उस ने भारत की  घेरेबंदी की पुख्ता तैयारी कर ली है.

वैसे तो एवरेस्ट के नीचे से नेपाल को चीन से जोड़ने वाले रेलनैटवर्क को बनाने का अनुरोध नेपाल सरकार ने ही उस से किया था पर भारत के लिए यह खतरे की बात इसलिए है क्योंकि इस चुनौती से निबटने को हमारा देश तैयार नहीं है.

चीन इस नैटवर्क के लिए तिब्बत में कोमोलांग्मा पर्वत के नीचे खुदाई कर के लंबीलंबी सुरंगें तैयार करेगा. कोमोलांग्मा असल में माउंट एवरेस्ट का ही चीनी नाम है यानी चीन में एवरेस्ट को इस नाम से पुकारा जाता है.

नेपाल की भारत के मुकाबले चीन को प्राथमिकता

 नेपाल के तत्कालीन प्रधानमंत्री राम बरन यादव ने मार्च 2015 में स्वायत्त तिब्बती इलाके का दौरा किया था, उसी के बाद रेलनैटवर्क बनाने की बात उठी थी. चीन का कहना है कि वह 2020 तक रेलनैटवर्क को तैयार कर लेगा. इस के लिए तिब्बत के रेलवेस्टेशन केरमग तक मौजूद रेललाइन को बढ़ाते हुए एवरेस्ट के भीतर सुरंगों से गुजार कर नेपाल सीमा तक लाया जाएगा.

कहा जा रहा है कि नेपाल में एवरेस्ट के नीचे से लाई जाने वाली रेलवेलाइन पर ट्रेनें 120 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ेंगी.

यह रेलनैटवर्क भारत के लिए खतरा कैसे है, यह एक उदारहण से स्पष्ट होता है. असल में, भारतीय सीमाओं में दर्जनों बार घुसपैठ कर चुकी चीनी सेना ने इधर एक नया मोरचा खोला है. पिछले वर्ष (22 जुलाई, 2016) चीनी सेना के कुछ जवान उत्तराखंड के बाड़ाहोती इलाके में भारतीय सीमा के भीतर घुस आए थे. चीनी सेना पीपुल्स लिबरेशन आर्मी का एक हैलीकौप्टर भी उस इलाके में उड़ते हुए देखा गया.

सवाल यह है कि आखिर बेहद दुर्गम और दूरदराज के सीमाई इलाकों में चीनी सैनिक इतनी आसानी से कैसे पहुंच जाते हैं, जबकि भारत सरकार को इस घुसपैठ का पता चलने में ही हफ्तों लग जाते हैं. इस का एक जवाब है रेलनैटवर्क की मौजूदगी.

तिब्बत में रेलों का जाल

 अगस्त 2013 में ही चीन ने नेपाल सीमा के नजदीक तिब्बत के सब से बड़े शहर शिगाजे को तिब्बत की राजधानी ल्हासा से जोड़ने वाली 253 किलोमीटर लंबी रेललाइन बना कर तैयार कर ली थी.

अक्तूबर 2014 में शुरू हुए इस रेल ट्रैक का महत्त्व चीन के मुताबिक यह है कि शिगाजे में चीन समर्थित 11वें पंचेन लामा ग्वैनसैन नोरबू का मुख्यालय है. चीनियों के लिए पंचेन लामा का पद दलाई लामा के बाद दूसरा सब से महत्त्व का माना जाता रहा है. चीन की नजर में यह धार्मिक व राजनीतिक महत्त्व का रेलनैटवर्क है, पर भारत के नजरिए से देखें तो इस का सैन्य और रणनीतिक महत्त्व भी समझ में आ जाता है. यह बेशक चीन व नेपाल का आंतरिक मामला है लेकिन इस से भारत का चिंतित होना स्वाभाविक है.

चीन ने तिब्बत में सब से ऊंचे और दुर्गम इलाकों तक रेललाइनें बिछा कर अपनी इंजीनियरिंग की क्षमता का परिचय तो दिया ही है, साथ में भारत के नजदीकी सीमावर्ती इलाकों में रेलें पहुंचा कर अपनी सेनाओं की मूवमैंट को भी आसान कर दिया है. अभी इन ज्यादातर इलाकों में आम जनता के अलावा सेना की पहुंच भी महज सड़कों के जरिए थी, बारिश और बर्फबारी के दिनों में वहां आवागमन थम जाता था.

यही नहीं, सड़क यातायात की धीमी रफ्तार कई अहम मौकों पर सेनाओं की पहुंच में विलंब का कारण बनती है, जिस से कोई बाजी भी हाथ से निकल सकती है. शिगाजे का उदाहरण इस मामले में अहम है. सड़कमार्ग से ल्हासा से यहां पहुंचने में 5 घंटे का वक्त लगा करता था, जबकि ट्रेन यही दूरी अधिकतम 120 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तय करने में सिर्फ 2 घंटे का समय लगाती है.

अब चीनी सैनिकों को 1962 की तरह भारतीय सीमाओं तक पहुंचने के लिए हफ्तों दुर्गम पहाड़ी इलाकों में पैदल चल कर नहीं आना पड़ता है. इस के लिए वे शिनहाइ यानी तिब्बत रेलवे का इस्तेमाल करते हैं.

पाकिस्तान–चीन रेलमार्ग

सिर्फ नेपाल ही नहीं, चीन की रेल के पाकिस्तान से भी हो कर गुजारने की योजना है. कुछ समय पहले खबर आई थी कि चीन अपने सीमावर्ती प्रांत शिनजियांग से पाक अधिकृत कश्मीर के रास्ते पाकिस्तान तक एक अंतर्राष्ट्रीय रेल लिंक बनाने की योजना पर काम करने की तैयारी में है.

यह प्रस्तावित रेल लिंक 1,800 किलोमीटर लंबा होगा और इसलामाबाद व कराची से गुजरते हुए पाकिस्तान के  ग्वादर बंदरगाह को चीन के शिनजियांग प्रांत के काशगर शहर को आपस में जोड़ेगा. इस का सब से चिंताजनक पहलू पाक अधिकृत कश्मीर से हो कर गुजरना है.

भारत की तैयारियां

 भारत की तैयारियां चीन के मुकाबले नाकाफी हैं. अब इस मोरचे पर लंदन तक की मालगाड़ी की चुनौती भी चीन पेश कर चुका है. देखना होगा कि हमारा देश इन चुनौतियों से कब और कैसे मुकाबला कर पाता है.

इन चुनौतियों को देखते हुए कहा जा सकता है कि हिमालय में ट्रेन पहुंचाने के काम में विलंब होना भारत को रणनीतिक रूप से भारी पड़ सकता है. पाकिस्तान, पीओके (पाक अधिकृत कश्मीर) और तिब्बत में चीनी रेल का जवाब हमारी सरकार को सोचना ही पड़ेगा और इस बारे में कश्मीर के बाहर भी जोरदार पहल करनी होगी. पर्वतीय इलाकों में पर्यटन और व्यावसायिक गतिविधियों में तेजी लाने के लिए हमारी सरकार को ठीक वैसा ही नजरिया अपनाना होगा, जैसा अंगरेज शासकों ने अपनाया था.

अपने शासनकाल में अंगरेजों ने सैरसपाटे और व्यावसायिक-रणनीतिक उद्देश्यों के साथ कालका-शिमला, सिलीगुड़ी–दार्जिलिंग, माथेरान और कांगड़ा घाटी में रेललाइनें बिछाई थीं. सिलीगुड़ी से दार्जिलिंग को जोड़ने वाली दार्जिलिंग हिमालयन रेललाइन वर्ष 1879 से 1881 के बीच बनी थी. करीब 86 किलोमीटर लंबी इस रेललाइन ने दूसरे विश्व युद्ध में उस समय महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की थी, जब इस का उपयोग अंगरेजों ने कलकत्ता से पूर्वाेत्तर के युद्ध क्षेत्र तक सेना व सैनिक साजोसमान पहुंचाने में किया.

अगर हम समय रहते रेलमार्गों से खुद को सक्षम नहीं बना पाए तो सीमाओं पर हमारी मौजूदगी बहुत असरदार नहीं रह पाएगी और व्यापारिक मोरचे पर भी हम पीछे रह जाएंगे.

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