Latest Bollywood Updates: अमृता राव का अंधविश्वास

Latest Bollywood Updates: ‘इश्कविश्क’ और ‘विवाह’ के अलावा और भी अच्छी फिल्में करने वाली खूबसूरत हीरोइन अमृता राव का फिल्म कैरियर ज्यादा हिट नहीं रहा है. पर हाल ही में एक इंटरव्यू में उन्होंने यह कहते हुए सब को चौंका दिया कि उन पर किसी ने काला जादू किया था. जब उन्होंने यह सुना था तो वे भी दंग रह गई थीं. ऐक्ट्रैस ने कहा कि उन की 3 फिल्में भी बंद हो गई थीं.

अमृता राव ने उस इंटरव्यू में आगे दावा किया कि एक बार वे अपने गुरुजी से मिली थीं. उन्होंने उस समय तो आर्शीवाद दिया, लेकिन 1-2 दिन बाद उन की मां से कहा कि उन की बेटी पर किसी ने काला जादू और वशीकरण किया है.

अमृता राव यह बात सुन कर चौंक गई थीं और उन्होंने कहा, ‘मैं वशीकरण जैसी बात पर अपनी लाइफ में कभी भरोसा नहीं करती, अगर यह बात मेरे गुरु के अलावा किसी और ने बोली होती.’

मानुषी छिल्लर पर साधा निशाना

मानुषी छिल्लर ने ‘मिस वर्ल्ड 2017’ का खिताब जीता था. इस के बाद उन्होंने साल 2022 में अक्षय कुमार की फिल्म ‘सम्राट पृथ्वीराज’ से हिंदी फिल्मों में डैब्यू किया था. फिर उन की 2 और फिल्में ‘मालिक’ और ‘तेहरान’ भी रिलीज हुई थीं, जबकि इस से पहले वे ‘बड़े मियां छोटे मियां’ और ‘द ग्रेट इंडियन फैमिली’ जैसी फिल्मों में नजर आ चुकी थीं. पर इन में से एक भी फिल्म नहीं चल पाई, तो उन पर फ्लौप हीरोइन का ठप्पा लग गया.

अब मानुषी छिल्लर ने दलजीत दोसांझ के एक म्यूजिक वीडियो ‘कुफर’ में काम किया है, जिस के बाद सोशल मीडिया पर यह कहा जा रहा है कि अब वे इन्हीं के लायक रह गई हैं. इस में सचाई भी है, क्योंकि मानुषी छिल्लर को अब ज्यादा फिल्में नहीं मिल रही हैं और हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में जमे रहने के लिए ऐसे छोटेमोटे प्रोजैक्ट करने से कोई बात नहीं बनेगी.

एपी ढिल्लों का खुलासा

पंजाबी गायक एपी ढिल्लों का गाना ‘ब्राउन मुंडे’ जेनजी में काफी मशहूर हुआ था और आज भी डीजे पर खूब बजता है. अभी हाल ही में एपी ढिल्लों ने खुलासा किया कि वे एक बार अपने बौलीवुड डैब्यू के करीब आ गए थे. एक फिल्म के लिए वे गाना गाने के लिए फाइनल हो चुके थे. इस गाने की डील में इंडस्ट्री के 2 सब से बड़े लोग थे. हालांकि, यह डील आखिरी समय पर टूट गई, क्योंकि एपी ढिल्लों ने इस गाने के औनरशिप राइट मांगे थे, जिसे मेकर्स ने नहीं माना.

इस के बाद अपने एक इंटरव्यू में एपी ढिल्लों ने बताया, ‘मैं एक ऐसी इंडस्ट्री का हिस्सा नहीं बनना चाहता, जो कलाकारों और उन की कला का पैसों के फायदे के लिए शोषण करती है.’

शरवरी वाघ को मिला सूरज बड़जात्या का साथ

महाराष्ट्र की लड़की शरवरी वाघ वैसे तो हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में काफी समय से हैं, पर उन्हें ज्यादातर परदे के पीछे ही काम करते देखा गया है. पर अब वे जल्द ही सूरज बड़जात्या की नई फिल्म में आयुष्मान खुराना के साथ रोमांस करती दिखाई देंगी.

इस फिल्म का नाम अभी फाइनल नहीं हुआ है, पर यह एकदम सूरज बड़जात्या स्टाइल फिल्म होगी, जिसे पूरा परिवार एकसाथ बैठ कर देख सकेगा. वैसे, शरवरी वाघ बहुत जल्द फिल्म ‘अल्फा’ में भी दिखाई देंगी, जिस में वे आलिया भट्ट और बौबी देओल के साथ स्क्रीन शेयर करेंगी. Latest Bollywood Updates

Celebrity Interview: मैं सरस सलिल का फैन हूं – केके गोस्वामी

Celebrity Interview: केके गोस्वामी मूल रूप से बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के रहने वाले हैं. इन्होंने भारतीय टैलीविजन सीरियलों, हिंदी, गुजराती, मराठी, बंगाली, भोजपुरी फिल्मों के जरीए अपनी अदाकारी से सभी को मुरीद बना लिया है.

हाल ही में लखनऊ में हुए ‘छठे सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड्स’ शो में बैस्ट कैरेक्टर ऐक्टर का अवार्ड लेने आए केके गोस्वामी से उन के फिल्म करियर पर बातचीत हुई. पेश हैं, उसी के खास अंश :

कई इंटरव्यू में आप ने अपने शुरुआती संघर्ष पर खुल कर बातें की हैं. क्या आप एक बार उन यादों को हम से साझा करेंगे?

मैं बिहार से ऐक्टर बनने की ख्वाहिश लिए मुंबई आया था. लेकिन मुझे स्क्रीन तक पहुंचने में काफी मशक्कत करनी पड़ी. एक बार मुझे मेरी ही कदकाठी के एक शख्स ने बीयर बार में नौकरी करने की सलाह दी. जब मैं बीयर बार में गया तो वाचमैन ने मुझे डंडा मार कर भगा दिया. यही वह पल था जब मैं ने ठान लिया था कि अब हर हाल में मुझे ऐक्टर बन कर दिखाना है. स्ट्रगल के दौरान ऐसा भी समय आया जब मै हफ्ते में एक दिन खाना खाता था. पैसों की तंगी के बावजूद मैं ने हार नहीं मानी और आखिरकार मुझे कामयाबी मिली.

आप की लवस्टोरी में भी ट्विस्ट रहा है. ऐसा क्या हुआ है?

मेरी हाइट 3 फुट ही है, वहीं मेरी बीवी पीकू मुझ से दोगुनी लंबी हैं. पीकू की हाइट तकरीबन 5 फुट है. मेरी हाइट कम होने के चलते पीकू के घर वालों के मना करने के बावजूद पीकू मुझ से ही शादी करना चाहती थी. आखिरकार पीकू की जिद के आगे घर वालों को मानना पड़ा.

आप के टीवी शो भी पौपुलर रहे हैं. छोटे परदे पर किया गया कौन सा रोल आप के लिए यादगार रहा है?

टीवी सीरियल में जो भूमिकाएं मेरे दिल के बेहद करीब हैं उन में ‘शक्तिमान’ में खली और बली का दोहरा रोल, ‘जूनियर जी’ में बोनापार्ट, ‘शाका लाका बूमबूम’ में क्रिस्टल खास हैं. ‘गुटूरगुं’ में मेरे किरदार पप्पू महाराज को भी लोगों ने खूब पसंद किया है.

हिंदी सिनेमा में किया गया कौन सा रोल आप के दिल के करीब है?

मैं ने जितनी भी हिंदी फिल्मों में काम किया उन में से फिल्म ‘भूत अंकल’ में निभाए गए टिंगु के रोल को काफी सराहना मिली थी. यह रोल देश के मनमस्तिष्क में रचबस गया था.

आप टीवी और हिंदी सिनेमा में काफी हिट रहे हैं, फिर अचानक आप का झुकाव भोजपुरी फिल्मों की तरफ कैसे हो गया?

मैं बिहार की माटी में पलाबढ़ा हूं. भोजपुरी तो मेरे रगरग में बसी हुई है. मेरा शुरुआत से ही भोजपुरी फिल्मों में काम करने की तरफ झुकाव रहा है. मुझे खुशी है कि मुझे जितना प्यार टीवी और हिंदी सिनेमा से मिला, उस से कहीं ज्यादा प्यार भोजपुरी सिनेमा से मिल रहा है.

आप को सरस सलिल पत्रिका की कौन सी बात अच्छी लगती है?

सच कहूं तो एक अभिनेता के रूप में अगर देखें तो दर्शक मेरे फैन हैं और मैं एक पाठक के रूप में ‘सरस सलिल’ पत्रिका का फैन हूं. मुझे ‘सरस सलिल’ के सभी स्तंभ काफी मजेदार, ज्ञानवर्धक, जागरूकता बढ़ाने वाले और रोचक लगते हैं.

Social Inequality: पूरन कुमार की मौत: ऊंचे ओहदे पर भारी जाति के सवाल

Social Inequality, लेखक – शकील प्रेम

एससी तबके को सताने की खबरें आएदिन अखबारों में छपती रहती हैं. कहीं दूल्हे को घोड़ी पर नहीं चढ़ने दिया जाता है, तो कहीं किसी एससी को बेरहमी से पीटा जाता है. यह आम एससी समाज के हालात हैं.

कहते हैं कि आम और खास में फर्क होता है, लेकिन दुख तो इस बात का है कि इस तबके को सताने के मामले में आम और खास में कोई फर्क नहीं दिखता. एससी अगर आईपीएस अफसर भी बन जाए, तो वहां भी उस का शोषण होता है. एससी अगर राष्ट्रपति भी हो तो भी दबाया जाता है. सेना, पुलिस, यूनिवर्सिटी या देश का कोई भी इंस्टिट्यूटशन हो, हर जगह एससी तबके के साथ भेदभाव और शोषण होता ही है. बस, सताने के तरीके बदल जाते हैं.

7 अक्तूबर, 2025 को हरियाणा के सीनियर आईपीएस अफसर वाई. पूरन कुमार ने चंडीगढ़ के सैक्टर 11 के अपने सरकारी आवास के बेसमैंट में अपनी सर्विस रिवौल्वर से खुद को गोली मार कर खुदकुशी कर ली थी.

वाई. पूरन कुमार 2001 बैच के एडीजीपी रैंक के अफसर थे. 8 पन्नों के सुसाइड नोट में उन्होंने 8 आईपीएस और 2 आईएएस अफसरों के नाम लिए थे. इस नोट के मुताबिक इन तमाम बड़े अफसरों ने उन्हें लगातार सताया था.

सुसाइड नोट में वाई. पूरन कुमार ने कैरियर में भेदभाव और अपने सीनियरों के द्वारा जातिवादी बरताव का जिक्र किया था. उन की पत्नी आईएएस अमनीत पी. कुमार ने भी अपनी शिकायत में कहा था कि उन के पति की खुदकुशी ‘सिस्टमैटिक उत्पीड़न’ का नतीजा है.

वाई. पूरन कुमार की खुदकुशी से 24 घंटे पहले उन के गनमैन हैड कांस्टेबल सुशील कुमार को रोहतक में शराब कारोबारी से ढाई लाख रुपए रिश्वत लेने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. पूछताछ में गनमैन ने
वाई. पूरन कुमार का नाम लिया था.

गनमैन सुशील कुमार के इसी बयान के आधार पर एफआईआर दर्ज हुई.

वाई. पूरन कुमार की पत्नी अमनीत पी. कुमार ने इस एफआईआर को एक साजिश बताया और उन्होंने कहा, ‘पूरन कुमार पहले से ही सिस्टम के खिलाफ आवाज उठाते रहे थे. उन्होंने कोर्ट में कई याचिकाएं और शिकायतें लगाई हुई थीं, जिस से वे बड़े अफसरों के लिए मुसीबत बने हुए थे, इसलिए उन्हें रिश्वतखोरी की झूठी साजिश में फंसाया गया.’

वाई. पूरन कुमार ने अपने सुसाइड नोट में आला अफसरों पर जो गंभीर आरोप लगाए हैं, वे बेहद चिंताजनक हैं. एससी समाज के अफसरों को प्रशासनिक तौर पर किस तरह का उत्पीड़न झेलना पड़ता है, वाई. पूरन कुमार इस बात का उदाहरण हैं.

वाई. पूरन कुमार की खुदकुशी के कुछ ही दिनों के अंदर रोहतक में हरियाणा पुलिस के एएसआई संदीप कुमार लाठर ने सर्विस रिवौल्वर से खुद को गोली मार कर खुदकुशी कर ली. संदीप कुमार ने 6 मिनट का वीडियो और 4 पन्नों का सुसाइड नोट छोड़ा. इन में उन्होंने वाई. पूरन कुमार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए. इस घटना से एडीजीपी वाई. पूरन कुमार की खुदकुशी का मामला और पेचीदा हो गया है.

एससी समाज से निकले आईपीएस वाई. पूरन कुमार भ्रष्टाचार में शामिल थे या नहीं यह तो जांच के बाद ही पता चल पाएगा, पर अगर वे भ्रष्ट अफसर थे तो भी उन के साथ हुए जातीय भेदभाव से इनकार नहीं किया जा सकता.

अगर वाई. पूरन कुमार जैसे बड़े सरकारी अफसर ही जातिवाद की सोच का शिकार हो सकते हैं, तो निचले लैवल पर एससी मुलाजिमों के हालात का अंदाजा लगाना भी मुश्किल है. एससी तबके को कार्पोरेट सैक्टर में भी कोई राहत नहीं है. वहां भी हर लैवल पर भेदभाव होता है.

विवेक राज जो बैंगलुरु में एक कार्पोरेट अफसर थे. वे लाइफस्टाइल इंटरनैशनल प्राइवेट लिमिटेड में पोस्टेड थे. विवेक राज को उन के अपर कास्ट सीनियरों द्वारा इतना उत्पीड़न झेलना पड़ा कि उन्होंने साल 2023 में खुदकुशी कर ली थी. पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज की गई थी, लेकिन कोई गिरफ्तारी नहीं हुई.

पिछले 10 सालों में आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थानों में 20 से ज्यादा एससी छात्रों ने जातिवाद के चलते खुदखुशी की. वैसे भी एससी छात्रों के साथ जाति आधारित भेदभाव तो प्राथमिक कक्षाओं से शुरू हो जाता है. यही वजह है कि देश की बड़ी यूनिवर्सिटियों तक एससी तबके के छात्रों का पहुंचना भी मुश्किल होता है.

एससी तबके के छात्रों का प्राइमरी लैवल से ऊंची पढ़ाई तक पहुंचने का फीसदी काफी कम है. ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 2023-24 में एससी छात्रों का ग्रौस इनरोलमैंट रेशियो प्राइमरी लैवल (कक्षा 1-5) पर 96.8 फीसदी, सैकंडरी लैवल (कक्षा 9-10) पर 80.6 फीसदी और हायर सैकंडरी लैवल (कक्षा
11-12) पर 57.9 फीसदी है. इस के बाद ऊंची पढ़ाईलिखाई (18-23 साल) में एससी छात्रों का ग्रौस इनरोलमैंट रेशियो महज 25.9 फीसदी है.

इस का मतलब है कि प्राइमरी लैवल से शुरू करने वाले एससी छात्रों में से तकरीबन 26 फीसदी ही देश की बड़ी यूनिवर्सिटियों या उच्च शिक्षा संस्थानों तक पहुंच पाते हैं, जबकि बाकी स्टूडैंट्स इस से आगे नहीं बढ़ पाते.

देश के टौप संस्थानों जैसे आईआईटी या आईआईएम में पहुंचने वाले स्टूडैंट्स का फीसदी तो 0.1 फीसदी से भी कम है, क्योंकि इन टौप की यूनिवर्सिटियों में सीटें सीमित होती हैं और रिजर्वेशन के बावजूद कंपीटिशन ज्यादा होता है.

इतनी जद्दोजेहद के बाद कुछ छात्र इन यूनिवर्सिटियों तक पहुंच भी गए तो उन्हें हर कदम पर जातिवाद झेलना पड़ता है या उन की संस्थागत हत्याएं कर दी जाती हैं. साल 2016 में रोहित वेमुला और साल 2023 में दर्शन सोलंकी इस बात के उदाहरण हैं.

घोड़ी चढ़ने का हक नहीं

गुजरात के सांदीपाडा गांव में आकाश कोटडिया नाम के एससी नौजवान की शादी थी. गांव के ही कुछ ऊंची जाति के लोगों ने आकाश को शादी के दौरान घोड़ी पर चढ़ने से मना कर दिया. मामला इतना बढ़ा कि पुलिस को अतिरिक्त बल बुलाना पड़ा.

हालांकि, यह मामला फरवरी, 2020 का है, लेकिन इस मामले में खास बात यह है कि आकाश आर्मी का जवान था और जम्मूकश्मीर में तैनात था. वह कुछ दिन पहले छुट्टी ले कर शादी के लिए गांव आया था.

16 दिसंबर, 2024 को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में एक दलित पुलिस कांस्टेबल के बेटे नंदराम सिंह की बरात के दौरान ऊपरी जाति के तकरीबन 40 लोगों ने हमला किया. उन्होंने दूल्हे को घोड़ी से जबरन उतार दिया. जातिवादी गालियां दीं. डीजे सिस्टम तोड़ा. औरतों से छेड़छाड़ की और बरातियों पर पथराव किया. इस मामले में पुलिस ने एफआईआर दर्ज की और 5 लोगों को गिरफ्तार किया.

फरवरी, 2022 को मध्य प्रदेश के छतरपुर में 24 साल के दलित पुलिस कांस्टेबल दयाचंद अहिरवार की बरात में ऊपरी जातियों ने जम कर हंगामा किया और दूल्हे को घोड़ी से उतार दिया. अगले दिन प्रशासन ने भारी पुलिस सुरक्षा में उन्हें घोड़ी पर चढ़ाया.

इन तीनों मामलों में दूल्हे आर्मी या पुलिस में थे, इसलिए इन तीनों मामलों में पुलिस ने सक्रिय भूमिका निभाई और मामला सुर्खियों में आया. आम एससी तबके के ऐसे अनेक मामले तो खबरों में ही नहीं आ पाते या इन मामलों में कोई मुकदमा ही दर्ज नहीं होता.

इन वारदात को रोकने के लिए कई जिलों में ‘समानता समितियां’ बनाई गई हैं और एससी दूल्हों को पुलिस सुरक्षा दी जाती है फिर भी हर साल दर्जनों ऐसे मामले दर्ज किए जाते हैं.

संविधान के अनुच्छेद 17 में अस्पृश्यता को गैरकानूनी घोषित किया गया है, लेकिन एनसीआरबी डाटा के मुताबिक हर 20 मिनट में एससी तबके के खिलाफ ऐसे अपराध दर्ज होते हैं.

राष्ट्रपति होते हुए जातीय भेदभाव

रामनाथ कोविंद, जो 2017 से साल 2022 तक भारत के 14वें राष्ट्रपति रहे, केआर नारायणन के बाद वे भारत के दूसरे ऐसे राष्ट्रपति थे जो एससी तबके से आते थे. वे भाजपा द्वारा समर्थित राष्ट्रपति थे. यही वजह थी कि रामनाथ कोविंद की नियुक्ति को भाजपा ने ‘दलित उत्थान’ के प्रतीक के रूप में पेश किया था.

साल 2018 में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद जगन्नाथ पुरी मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करना चाहते थे, लेकिन मंदिर के पुजारियों ने उन्हें रोक दिया था. मंदिर के परंपरागत नियमों के अनुसार गैरहिंदू या निचली जाति के लोगों को गर्भगृह में जाने की इजाजत नहीं है.

इसी तरह वर्तमान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, जो संथाल जनजाति से आती हैं, भारत की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति हैं, जो 2022 में राष्ट्रपति चुनी गईं.

जून, 2023 में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने दिल्ली के श्री जगन्नाथ मंदिर में पूजा की. एक तसवीर वायरल हुई, जिस में वे मंदिर के गर्भगृह के बाहर पूजा करती दिखीं, जबकि केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव और धर्मेंद्र प्रधान गर्भगृह के अंदर पूजा करते दिखे. आदिवासी होने के कारण उन्हें गर्भगृह में प्रवेश नहीं दिया गया.

हालांकि, विवाद बढ़ने पर मंदिर के पुजारियों ने साफ किया कि राष्ट्रपति के साथ कोई भेदभाव नहीं हुआ, बल्कि उन्होंने ऐसा करते हुए सामान्य प्रोटोकौल का पालन किया.

सितंबर, 2023 में नए संसद भवन का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया. इस दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को न्योता ही नहीं दिया गया, जबकि देश का राष्ट्रपति संसद के दोनों सदनों का सर्वोच्च प्रतिनिधि होता है. इस हिसाब से नए बने संसद का उद्घाटन राष्ट्रपति को ही करना चाहिए.

तमिलनाडु के मंत्री उदयनिधि स्टालिन ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के साथ हुए इस भेदभाव को ‘सनातन धर्म आधारित जातीय भेदभाव’ कहा और दावा किया कि आदिवासी महिला होने के चलते उन्हें इस समारोह से दूर रखा गया.

इस राष्ट्रपति के साथ जातीय भेदभाव

केआर नारायणन भारत के 10वें राष्ट्रपति (1997से 2002) थे, जो एससी बैकग्राउंड से आए थे. वे केरल के उ झावूर गांव में एक अछूत परिवार में जनमे थे. उन की पूरी जिंदगी भारत की जाति व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष की मिसाल है. उन्होंने प्राइमरी ऐजूकेशन से ले कर हायर ऐजूकेशन और फिर लैक्चरर की नौकरी तक में सताया जाना और भेदभाव झेला और राष्ट्रपति बनने के बाद भी वे जातीय तानों का शिकार बने रहे.

साल 1943 में ट्रावणकोर यूनिवर्सिटी (अब केरल यूनिवर्सिटी) से एमए करने के बाद केआर नारायणन को उन की जाति के चलते लैक्चरर की नौकरी से निकाल दिया गया था. डिगरी समारोह में भी उन्हें बेइज्जत किया गया था. अपने आत्मसम्मान के लिए उन्होंने डिगरी लेने से ही इनकार कर दिया था.

बाद में, राष्ट्रपति बनने पर केआर नारारणयन उसी यूनिवर्सिटी में लौटे और अपने भाषण में उन्होंने कहा था, ‘‘मैं उन जातिवादियों को यहां नहीं देख पा रहा हूं, जिन्होंने मु झे अछूत होने के चलते नौकरी से निकाल दिया था.’’

साल 1948 में लंदन स्कूल औफ इकोनौमिक्स से अपनी पढ़ाई पूरी कर के केआर नारायणन आईएफएस के लिए चुने गए थे, लेकिन यहां भी वे सताए जाने का शिकार हुए थे. भारतीय विदेश सेवा (आईएफएस) में प्रवेश के लिए उन्हें ऊपरी जातियों के अफसरों का विरोध झेलना पड़ा था. तब डाक्टर बीआर अंबेडकर की मदद से वे आईएफएस में शामिल हुए.

साल 1997 में भारत के 10वें राष्ट्रपति के चुनाव में केआर नारायणन को 95 फीसदी वोट मिले थे, लेकिन तब उन पर आरोप लगे थे कि उन का चुनाव एससी कोटे के चलते हुआ न कि उन की काबिलीयत से. एक विदेशी यात्रा के दौरान उन्हें जहर देने की साजिश रची गई थी. इस साजिश के लिए दक्षिणपंथी ताकतों की भूमिका नजर आई थी.

गुजरात दंगों को रोकने के लिए राष्ट्रपति केआर नारायणन ने प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से सेना भेजने की मांग की थी, लेकिन उन की बात पर कोई कार्रवाई नहीं हुई थी. यही वजह थी कि साल 2002 में दूसरे कार्यकाल के लिए उन का नाम प्रस्तावित हुआ, लेकिन भाजपा ने उन्हें दोबारा राष्ट्रपति नहीं बनने दिया था. केआर नारायणन ने बाद में इसे साजिश बताया था.

ओहदे पर जाति भारी

एससीएसटी तबका सदियों से अछूत रहा है. भारत के गांव अछूतों के लिए यातना केंद्र रहे हैं. यही वजह थी कि डाक्टर भीमराव अंबेडकर ने अछूतों को शहरों में बस जाने पर जोर दिया. शहरों में बस जाने से अछूतपन खत्म नहीं होता, लेकिन गांवों की बजाय रोजगार के मौके ज्यादा थे.

आजादी के बाद एससी तबके ने बड़ी तादात में शहरों की ओर पलायन किया. राहत जरूर मिली, लेकिन शहरों में भी सताया जाना खत्म नहीं हुआ.

लोकतांत्रिक नियमों के मुताबिक पढ़ाईलिखाई के दरवाजे सब के लिए खुले थे, लेकिन अछूतों के लिए सामाजिक नियम इतने कठोर थे कि उन के लिए स्कूल तक पहुंचना आसान नहीं था. गांव हो या शहर एससी तबके की पढ़ाईलिखाई के मामले में दोनों जगह जातिवादी सोच कायम रही.

इस सब के बावजूद एससी तबके के लोग ऊंची तालीम की दहलीज तक पहुंचे और सिस्टम का हिस्सा बने, लेकिन उन्हें सताए जाने का दर्द भी झेलना पड़ा.

आज भी एससीएसटी तबके के लिए मुश्किलें कम नहीं हुई हैं. शुरुआती पढ़ाईलिखाई तक पहुंच आसान हुई है, लेकिन इस से आगे का रास्ता बेहद मुश्किल है. इन मुश्किल रास्तों पर चलते हुए कुछ लोग सिस्टम का हिस्सा बन भी रहे हैं, तो वहां भी जातिवाद उन का पीछा नहीं छोड़ रहा है. सब से बड़ा सवाल यह है कि क्या इस जातिवाद को खत्म करने का कोई समाधान है?

समाधान यही है की एससीएसटी तबके को पढ़ाईलिखाई की अहमियत को सम झना होगा. प्राइमरी लैवल की पढ़ाईलिखाई में 97 फीसदी एससी बच्चे पहुंच रहे हैं, लेकिन ऊंची पढ़ाईलिखाई में यही रेशियो महज 26 फीसदी रह जाता है.

एससी तबके को सब से पहले प्राइमरी से ऊंची पढ़ाईलिखाई के बीच के इस ड्रौपआउट रेशियो को कम करना होगा. जो समाज जितना कमजोर होता है, उस के लिए संघर्ष उतना ही बड़ा होता है.

यूनिवर्सिटी की पढ़ाई तक जितने ज्यादा एससी छात्र पहुंचेंगे, उन को सताया जाना उतना ही कम होगा. नौकरियों में भी ज्यादा से ज्यादा हिस्सेदारी हासिल करनी होगी. हर लैवल पर संगठन को मजबूत करना होगा, ताकि भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई जा सके.

एससी तबके के सांसदों और विधायकों पर लगातार दबाव बनाए रखना होगा, ताकि वे सिर्फ सत्ता सुख न भोगें, बल्कि समाज के हित में काम करें. समय लगेगा, लेकिन हालात जरूर बदलेंगे.

रहनसहन में बदलाव जरूरी

एससीएसटी और मुसलिम तबके मुख्यधारा से कटे हुए नजर आते हैं, तो इस में किस का दोष है? भारत के कल्चर का हिस्सा होते हुए भी कल्चर से अलग दिखने की नौटंकी क्यों? यहीं से समस्याएं शुरू होती हैं.

एससीएसटी और मुसलिम तबका खुलेपन और नएपन से परहेज करता है. मुसलिम अपने अकीदों के आगे किसी तरह का सम झौता नहीं कर पाते तो एससी तबका भी इसी रास्ते पर निकल पड़ा है.

एससीएसटी और मुसलिम तबके को शहरों में घर किराए पर लेना मुश्किल होता है, तो इस की वजह सिर्फ मकान मालिकों के अंदर भेदभाव भरी सोच ही नहीं है. ये लोग खुद ही मुख्यधारा से नहीं जुड़ पाते.

खानपान, पहनावा और रहनसहन की आदतें नहीं बदल पाते. साफसफाई के तौरतरीके नहीं सीख पाते. घर में लड़ाई झगड़े, घर की औरतों को पीटना, घर में हमेशा शोरशराबा होना और ज्यादा बच्चे होना यह आम बात होती है, इसीलिए इन्हें कोई किराए पर नहीं रखता.

वर्ग संघर्ष कितना जरूरी

दुनिया के किसी भी समाज में इनसानों की कीमत उस की प्रोडक्टिविटी से तय होती है. परिवार भी ऐसे ही चलते हैं. आज के समय परिवार में जो जितना प्रोडक्टिव होता है उस की इज्जत भी उसी हिसाब से होती है.

परिवार का जो सदस्य प्रोडक्टिव नहीं तो वह अपने परिवार में ही हाशिए पर चला जाएगा. कोई समाज अगर प्रोडक्टिव नहीं है, तो वह भी बाकी समाजों के बीच हाशिए पर चला जाएगा.

जो जाति या समाज टौप पर है, तो उस ने अपनी जायज या नाजायज प्रोडक्टिविटी को साबित किया है और जो जाति या समाज हाशिए पर है, वह अपनी प्रोडक्टिविटी को साबित नहीं कर पाया. यही लोग वर्ग संघर्ष की बात करते हैं. किसी भी संघर्ष की कीमत होती है. जिन के पास बहुतकुछ है वे आसानी से अपना दबदबा नहीं छोड़ेंगे और जिन के पास कुछ नहीं वे किसी भी संघर्ष के लायक भी नहीं हैं, इसलिए वर्ग संघर्ष की बात ही बेमानी है.

इज्जत और सा झेदारी के लिए अपने भीतर का संघर्ष जरूरी है. प्रोडक्टिविटी में भागीदार बनना जरूरी है. इस के लिए प्रोडक्टिव होना जरूरी है. आज जमाना बदल गया है. क्रांतियां किताबों में ही अच्छी लगती हैं. धरातल पर तो जू झना होता है. एससीएसटी और मुसलिम समाज को यह बात सम झनी होगी. बराबरी के हकदार बराबरी के लोग ही होते हैं. यह कड़वी हकीकत है.

‘घेटो’ की घुटन से बाहर निकलना जरूरी

16वीं सदी में इटली के वेनिस शहर में यहूदियों को अलगथलग इलाकों, जिन्हें ‘घेटो नुओवो’ (यहूदियों की नई बस्ती) कहा जाता था, में रहने के लिए मजबूर किया गया था. ये इलाके दूर से पहचाने जा सकते थे.

इटली से ही ‘घेटो शब्द इतना मशहूर हुआ कि यह अमेरिका के नीग्रो गुलामों की अलगथलग बस्तियों के लिए भी इस्तेमाल होने लगा. ब्रिटिश, डच और फ्रांसीसी उपनिवेशों में किसी कबीलाई समुदाय या धार्मिक अल्पसंख्यक को जबरन साथ रहने के लिए मजबूर किया जाता, तो यही इलाके घेटो बन जाते थे.

घेटो की घुटनभरी गलियों में कोई भी बाहरी नहीं घुसना चाहता था. अमेरिका में घेटो गुलामों की फैक्टरियां थीं, तो यूरोप के घेटो यहूदियों को अलगथलग रखने के डिटैंशन कैंप थे. यहां केवल एकजैसे लोग रहते थे, जो घेटो में पैदा होते और यहीं मर जाते थे.

आज भी शहरोंकसबों के आसपास ऐसे इलाके मौजूद होते हैं, जो अनपढ़ता, गरीबी और अपराध के लिए बदनाम होते हैं. ये इलाके आज के घेटो हैं. अमेरिका में अफ्रीकीअमेरिकी या हिस्पैनिक समुदाय के लोग जिन इलाकों में रहते हैं, उन्हें आज भी घेटो कहा जाता है.

भारत में भी ऐसे ‘घेटो’ की कमी नहीं है. यहां तो सदियों से घेटो मौजूद रहे हैं. गांव हो या शहर एससी तबके के लिए हर लैवल पर घेटो बनाए गए थे. शहरों के घेटो आगे चल कर झुग्गी झोंपडि़यों में बदल गए. हर गांव में एक घेटो नजर आ जाएगा.

शहरों में मुसलिम बहुल इलाकों को ही देख लीजिए. ये भी घेटो ही हैं. कई दलित बहुल महल्ले भी ऐसे ही हैं, जहां घुसने में भी घुटन होती है, जबकि वहां ये लोग आराम से जीते हैं. आज के इन घेटो की पहचान खराब बुनियादी ढांचे, अनपढ़ता, सेहत से जुड़ी सेवाओं की कमी और अपराध दर में बढ़ोतरी से होती है.

भारत के घेटो एससीएसटी और मुसलिमों के लिए किसी डिटैंशन कैंप से कम नहीं हैं. आखिर मजबूरी क्या है? घेटो की दीवारों को तोड़ कर मुख्यधारा तक पहुंचना मुश्किल तो नहीं है, लेकिन घेटो में जीने की आदत पड़ गई है. यहां से निकलने का एकमात्र जरीया पढ़ाईलिखाई है, लेकिन इन समाजों को तालीम की सम झ ही नहीं है.

समस्या आप की, हल भी आप ही निकालें

एससीएसटी तबके के साथ इतिहास में गलत हुआ या आज भी गलत हो रहा है, इस बात का रोना रोते रहने से कुछ नहीं बदलेगा. मुसलिम बादशाहों ने हजार साल तक इस देश पर हुकूमत की, इस बात पर इतराने से मुसलिमों के आज के हालात नहीं बदल जाएंगे. एससीएसटी तबके और मुसलिमों को यह तय करना होगा कि वर्तमान में उन के समाज की परफौर्मैंस और प्रोडक्टिविटी क्या है?

यह इस बात से तय होगा कि आप के समाज में पढ़ाईलिखाई और सम झदारी का लैवल क्या है?

पढ़ाईलिखाई और सम झदारी का रास्ता मुश्किल है, लेकिन इस के अलावा और कोई रास्ता ही नहीं है. हालात का रोना रोते रहने से हालात नहीं बदलते. नेता आते हैं और अपना उल्लू सीधा कर गायब हो जाते हैं. समाज इन नेताओं का पिछलग्गू बना रहता है. समस्या आप की है, तो बदलाव भी खुद से शुरू करना होगा. Social Inequality

Religion and Love: प्रेम विवाह करें तो घर और धर्म छोड़ें

Religion and Love: ‘‘हमारी बिटिया अब पापा किस को कहेगी…’’

22-23 साल की एक औरत अपनी गोद में डेढ़ महीने की बेटी को देखदेख कर रोते हुए बारबार यही कह रही थी. उस के पास एक और बूढ़ी औरत भी बैठी थी. वह भी रो रही थी. उन्हें देख कर लग रहा था कि वे दोनों शायद सासबहू हैं, क्योंकि जवान औरत बारबार घूंघट कर रही थी. मरने वाला उस डेढ़ महीने की बेटी का पिता होगा. उन के साथ कुछ दूरी पर एक बूढ़ा, एक लड़का और कुछ उन के साथी खड़े थे.

लखनऊ का पोस्टमार्टम हाउस अंदर से बंद था. बाहर खाली जगह पड़ी थी. वहां इंटरलौकिंग वाली ईंटों से बना फर्श था. पास में सीमेंट से बनी बैंच और एक प्लेटफार्म था. बैंच पर लोग बैठ कर किसी अपने की डैड बौडी का इंतजार करते थे.

सीमेंट से बना प्लेटफार्म डैड बौडी रखने के काम आता था. पूरे शहर से पोस्टमार्टम के लिए वहां वे डैड बौडी आती थीं, जिन में पुलिस केस दर्ज हो. पुलिस पोस्टमार्टम के जरीए यह जानने की कोशिश करती है कि डैड बौडी के साथ क्या हुआ होगा? उस को किस तरह से मारा गया होगा? मरने का क्या समय रहा होगा? पोस्टमार्टम के बाद जब सारी खानापूरी हो जाती है, तभी डैड बौडी घर वालों को सौंपी जाती है.

कुछ देर में एक आदमी हाथ में चाबी का गुच्छा ले कर आता है और पोस्टमार्टम हाउस के एक कमरे को खोलता है. दरवाजा खुलते ही एक अजीब सी गंध 12-15 फुट दूर तक बैठे लोगों तक आती है. वहां आसपास कुछ और लोग भी होते हैं. शायद उन के भी घरपरिवार का कोई वहां रहा हो. वे लोग भी किसी अपने की डैड बौडी का इंतजार कर रहे होंगे.

‘सनी रावत… थाना निगोहां…’ पोस्टमार्टम हाउस के कमरे में गए आदमी ने अंदर से ही आवाज लगाई.

यह सुनते ही उस रोतीबिलखती औरत की आवाज तेज हो गई. साथ वाली औरत भी रो रही थी. उन के पास खड़ा एक नौजवान तेजी से पोस्टमार्टम हाउस की तरफ बढ़ गया. उस के साथ 2 और लड़के भी गए और एक बूढ़ा आदमी लड़खड़ाते कदमों से आगे बढ़ रहा था.

अब तक तेजी से अंदर गए लड़के वापस आ रहे थे. उन के हाथ में काले रंग की पौलीथिन में बंधी एक डैड बौडी थी, जिसे उन लोगों ने उस सीमेंट से बने प्लेटफार्म पर रख दिया था.

पूरे परिवार के लोग रो रहे थे. एक लड़का अपने दुख को सहन करता हुए बाहर गेट की तरफ आया और वहां पहले से खड़ी गाड़ी को अंदर बुलाने लगा. ड्राइवर गाड़ी को मोड़ कर अंदर लाया.

एक बार लड़कों ने फिर डैड बौडी को उठाया और गाड़ी में रख दिया. उसी गाड़ी में घरपरिवार के सारे लोग बैठ गए. गाड़ी चल पड़ी.

यह डैड बौडी थाना मोहनलालगंज के शंकर बक्श खेड़ा गांव के मजरा रायभान खेड़ा के रहने वाले रामनरेश रावत के 24 साल के बेटे सनी रावत की थी. जिस औरत की गोद में 2 महीने की बेटी थी उस का नाम साधना था, जो मरने वाली की पत्नी थी. बूढ़ी औरत मरने वाली की मां इद्रानी और नौजवान का नाम राज बहादुर था, जो मरने वाले का भाई था.

सनी रावत 8 सितंबर, 2025 की शाम को 7 बजे घर से बाहर निकला था. इस के बाद वह घर वापस नहीं लौटा था. तब पिता ने उस के फोन नंबर पर बात की.

तब सनी ने बताया कि वह गोसाईंगंज के देवी खेड़ा के संतोष यादव के साथ है. कुछ देर में घर पहुंच जाएगा, पर देर रात तक जब वह घर नहीं पहुंचा तो पिता ने फिर से फोन किया, तो फोन उठा नहीं. इस के बाद घर वाले सोने चले गए.

अगली सुबह 5 बजे जब सब लोग उठे और सनी को वापस आया नहीं देखा, तो उसे फिर से फोन किया. इस बार फोन बंद था.

घर वाले सनी रावत की गुमशुदगी लिखाने थाना मोहनलालगंज पहुंचे. वहां पर सोशल मीडिया पर यह पता चला कि थाना निगोहां के गौतम खेड़ा गांव के पास बांका नाले में किसी नौजवान की लाश पड़ी है. परिवार के सभी लोग आननफानन में वहां के लिए निकल पड़े.

रामनरेश रावत ने लाश की शिनाख्त अपने बेटे सनी रावत के रूप में की. परिवार वालों का आरोप था कि सनी रावत की हत्या कर के लाश को नाले में फेंक दिया गया.

रामनरेश रावत की तहरीर पर निगोहां थाने में अपराध संख्या 174/2025 धारा – 103(1), 351(3) बीएनएस के तहत संतोष यादव निवासी देवी खेड़ा गोसाईंगंज, जीतू यादव और देवेश यादव के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया गया. फिर एक के बाद एक आरोपियों को पकड़ लिया गया.

इस के बाद जो खुलासा हुआ, वह एक दर्दनाक कहानी है.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट मे सनी रावत की मौत सिर पर लगी चोट और पानी में डूबने से हुई थी. सनी के घर से जहां उस की डैड बौडी मिली, वह जगह 15 किलोमीटर दूर थी. बांका नाले किनारे सनी कैसे पहुंचा? यह बड़ा सवाल था. जो उसे यहां लाया है, वही इस का जवाब दे सकता था. सनी के घर वालों के मुताबिक हत्या की वजह उस का साधना से प्रेम विवाह करना था.

3-4 साल पहले की बात है. सनी निगोहां थाना के मस्तीपुर गांव में अपनी ननिहाल में रहता था. उस के नाना के घर से कुछ दूरी पर ही जीतू यादव नामक नौजवान का घर था. सनी और जीतू यादव की आपस में दोस्ती हो गई. दोनों का एकदूसरे के घर आना भी हो गया. जीतू की बहन साधना से भी सनी की मुलाकात होने लगी. इस के बाद उन दोनों के बीच प्यार हो गया.

जब उन के प्यार की चर्चा गांव में फैलने लगी, तो जनवरी, 2004 में एक दिन दोनों ने घर से भाग कर लव मैरिज कर ली. इस से गुस्से में आए जीतू, उस के भाई देवेश और परिवार के दूसरे लोगों ने सनी के पिता रामनरेश और मां इद्रानी को मारपीट कर घर से भगा दिया. इन के घर में आग लगा दी.

राम नरेश अपनी पत्नी समेत अपने पुश्तैनी गांव शंकर बक्श खेड़ा में आ कर रहने लगे. सनी अपनी पत्नी साधना को ले कर मुंबई भाग गया. जब साधना पेट से हुई तो सनी उस को लेकर गोसाईंगंज आ गया, जो मोहनलालगंज कसबे के ही पास है.

2 साल बीत जाने के बाद भी साधना के भाई उस के पति को धमकी दे रहे थे. ऐसे में साधना और सनी छिपछिप कर रह रहे थे. डेढ़ महीना पहले ही साधना को बेटी हुई थी.

गांव के लोगों ने जीतू और उस के परिवार को ताना मारने के अंदाज में बधाई दी. इस से जीतू और उस के परिवार के लोगों के मन में लगे घाव हरे हो गए. अब जीतू ने तय कर लिया कि सनी को मार देना ही आखिरी इलाज है.

8 सितंबर, 2025 की शाम को जब सनी रावत जेल रोड के पास देशी शराब के ठेके के पास बैठा था, तो साधना के भाई जीतू यादव ने उस को अपनी स्कार्पियो गाड़ी में बैठा लिया. गाड़ी में उस का भाई देवेश यादव, साला संतोष यादव और दोस्त राज कपूर पहले से बैठे थे. गाड़ी सुनसान रास्तों में आगे बढ़ रही थी.

देवेश और जीतू ने सनी पर लोहे की रौड से वार कर के उसे मार दिया.

इस के बाद सनी की लाश को छिपाने के मकसद से वे लोग सिसेंडी रोड पर गौतमखेड़ा के पास बांका नाला के पास गए. सनी कहीं जिंदा न बच जाए, इस के लिए वहां रोड पर एक बार फिर लोहे की रौड से उसे मारा गया, फिर उस की लाश को नाले में फेंक दिया. इस के बाद वे सब अपनेअपने घर चले गए.

जब दूसरे दिन सनी रावत की लाश बरामद हुई और नामजद मुकदमा लिखा गया, तब पुलिस ने इन की धरपकड़ का अभियान चलाया. 11 सितंबर, 2025 को देवेश और संतोष को सिसेंडी रोड पर जंगल तिराहा के पास से पकड़ा गया.

उन की निशानदेही पर स्कार्पियो गाड़ी नंबर यूपी32 पीडब्ल्यू 6758, लोहे की रौड और खून से सना अंगोछा भी बरामद किया गया. पुलिस ने बरामद सामान जब्त कर पकड़े गए दोनों आरोपियों देवेश और संतोष को जेल भेज दिया.

पुलिस को अभी भी जीतू और राज कपूर की तलाश थी. 13 सितंबर, 2025 की शाम पुलिस को सूचना मिली कि जय सिंह और राज कपूर जबरौली के पास जंगल में छिपे हैं. पुलिस ने दोनों को पकड़ लिया.

आरोपी जेल पहुंच गए. डेढ़ महीने की बच्ची अनाथ हो गई. उस की 24 साल की मां साधना विधवा हो गई. पिता सनी बदले की भेंट चढ़ गया.

लाख कानून बन जाएं, लेकिन समाज अभी भी अपने हिसाब से चल रहा है. बेटी अभी भी पिता की जायदाद में हिस्सा नहीं ले पाती है. क्या साधना को अपने पिता की जायदाद में उस के भाइयों के बराबर हिस्सा मिलेगा? यह बड़ा सवाल है, जिस का जवाब अमूमन ‘न’ ही होता है. ऐसे में साधना अपनी बाकी जिंदगी कैसे काटेगी? अपनी छोटी बेटी का पालनपोषण कैसे करेगी? इस की वजह केवल इतनी थी कि साधना और सनी ने गैरजाति में प्रेम विवाह किया, जो उन के घर वालों को मंजूर नहीं था.

क्यों नहीं स्वीकारे जाते प्रेम विवाह

हमारे समाज में जाति और धर्म के रीतिरिवाजों की जड़ें इतने गहरे तक धंसी हैं कि उन से उबर पाना आसान नहीं है. जिंदगी के हर मोड़ पर कुछ न कुछ रीतिरिवाज होते हैं, जो धर्म से जुड़े होते हैं. अगर कहीं जन्मदिन भी मनाया जा रहा है, जिस में केक कटना है, जिस को हिंदू धर्म मानता नहीं है, वहां भी अब पूजापाठ होने लगी है. एक तरफ केक कटेगा, तो दूसरी तरफ पूजापाठ होगी.

धर्म को मानने वाले केवल हिंदू ही नहीं हैं, बल्कि जो ईसाई, मुसलिम यहां तक कि बौद्ध धर्म को मानते हैं, वे भी धार्मिक पाखंड का शिकार होते हैं. धर्म चलाने वालों को पता है कि जिस दिन जाति खत्म हो जाएगी, उस दिन धर्म और उस का पाखंड भी खत्म हो जाएगा.

धर्म और जाति की बात होती है, तो यह माना जाता है कि विवाद केवल जनरल, ओबीसी और एससी के होते हैं. असल में ऐसा नहीं है. जब भी प्रेम विवाह की बात होती है, तो जनरल में भी जातीय विभेद है. एससी और ओबीसी में भी अलगअलग जाति को ले कर भेदभाव है.

आजादी के बाद से 1980 तक जब तक राममंदिर आंदोलन का असर नहीं था, जाति के भेद मिटाने के कानून भी बने ठगे, जिन में स्पैशल मैरिज ऐक्ट सब से बड़ा उदाहरण है. उस समय ‘जाति तोड़ो’ का नारा भी दिया गया था और धर्म को ले कर विरोध हो रहा था.

पर बाद में धीरेधीरे यह विरोध खत्म हो गया. उस की वजह यह रही कि धर्म का प्रचार करने वाले को तो पैसा मिलता है, लेकिन उस के पाखंड का विरोध करने वाले को पैसा नहीं मिलता. उलटा धार्मिक भावनाओं को भड़काने के आरोप में कई मुकदमे कायम होने लगे. ऐसे में धर्म के पाखंड और जातीयता का विरोध करने वाले कमजोर होते गए. समाज का यह असर घरपरिवार के भीतर रसोईघर और बैडरूम तक पहुंच गया.

1980 के धार्मिक काल के बाद समाज में गैरजाति और गैरधर्म में प्रेम विवाह का विरोध होने लगा. संविधान, कानून और कोर्ट के आदेशों के बाद भी प्रेम विवाह करने वालों की जिंदगी महफूज नहीं है.

ऐसे में एक ही उपाय है कि अगर प्रेम विवाह करना है, तो हर तरह का धर्म छोड़ना होगा. इस के अलावा अपना घर छोड़ कर अलग रहना पड़ेगा, तभी जिंदगी महफूज हो सकेगी. अगर इतना करने की ताकत या हिम्मत नहीं है, तो प्रेम और विवाह दोनों करने का हक नहीं है, क्योंकि प्रेम जाति और धर्म देख कर नहीं होता है. जहां इस तरह का काम होगा, वहां समाज और घरपरिवार विरोध में खड़ा होगा.

सनी रावत के बेटी होने पर जीतू यादव को मामा बनने की बधाई देते समय समाज के लोग अगर उसे ताने नहीं मारते, तो सनी रावत की हत्या होने से बच सकती थी. दोनों परिवार तहसनहस नहीं होते. सनी और साधना मुंबई से वापस नहीं आते, तो भी यह वारदात टल सकती थी.

ऐसे में अगर प्रेम विवाह करने का फैसला लिया है, तो घरपरिवार और धर्म छोड़ कर जिंदगी गुजारनी होगी. Religion and Love

Editorial: भारत को ट्रंप की सजा – उद्योग जगत में मचा हाहाकार

Editorial: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अपने देश में आने वाले भारत के सामान पर 50 फीसदी के टैक्स से देश का कपड़ा, चमड़ा और डायमंड उद्योग बेहद खतरे में है. चमड़े के कारखानों में तकरीबन 50 लाख लोग काम करते हैं और 4,000 करोड़ रुपए का सामान बनाते हैं. इस में से एकचौथाई अमेरिका के व्यापारी खरीदते थे जिन्होंने अब और्डर देने बंद कर दिए हैं क्योंकि 50 फीसदी टैक्स भारतीय सामान पर देने की जगह वे वियतनाम, कंबोडिया, बंगलादेश से सस्ते में खरीदेंगे. डोनाल्ड ट्र्रंप ने यह सजा भारत को भारत सरकार के फैसलों पर दी है.

कानपुर, नोएडा, आगरा, तमिलनाडु ही नहीं, दूसरे छोटे राज्यों से भी चमड़े का जो सामान बनता था वह रुक गया है और 2,000 से ज्यादा कंपनियों में से कितनों का दिवाला इस चक्कर में पिट जाए पता नहीं.

दिल्ली में बैठे ऊंची जातियों के सवर्ण नेताओं को फर्क नहीं पड़ता कि जिस काम में ज्यादातर दलित कारीगर लगे हों वे ठप हो गए. उन्हें चिंता इस बात की है कि उन का अपना टैक्स न कम हो जाए जो वे ऐक्सपोर्ट में भी बीच की चीजों पर लगाते थे.

अमेरिका के और्डर अचानक बंद हो जाने से सैकड़ों कंपनियों के पास आज पैसे की तंगी हो गई है. वे न कर्मचारियों को बकाया पैसा दे पा रही हैं, न कर्ज पर ब्याज का भुगतान कर पा रही हैं. भारत सरकार को अपने गुरूर की फिक्र है कि विश्वगुरु देश को डोनाल्ड ट्रंप कैसे धमका सकता है और जिस तरह का व्यवहार नरेंद्र मोदी नोटबंदी, वोटबंदी, जीएसटी, घरबंदी, बुलडोजरी में करते रहे हैं, वैसा ही डोनाल्ड ट्रंप के साथ करने कीकोशिश कर रहे हैं.

डोनाल्ड ट्रंप को शिकायत चमड़े के सामान से नहीं या भारत के व्यापारियों से नहीं है, उन्हें शिकायत इस बात पर है कि भारत रूस से पैट्रोल क्यों खरीद रहा है, अमेरिका से आने वाले सामान पर टैक्स ज्यादा क्यों लगा रहा है, बजाय अपने बड़े खरीदार को सुनने के मोदी सरकार उस मंदिर के पुजारी की तरह बरताव कर रही है जो सोचता है कि वह किसी भगवान की मूर्ति का पुजारी नहीं, खुद भगवान है. अछूतों, चमड़े का काम करने वाले दलितों को तो सरकार वैसे भी पिछले जन्मों के कर्मों के फल भोगने वाला मानती है. कुछ और दिन वे भूखे रह गए तो क्या हो जाएगा?

अमेरिका सिर्फ एक चौथाई चमड़े का बना सामान खरीद रहा है पर यह न भूलें कि जब धंधा अचानक एकचौथाई कम हो जाए तो वह पूरे धंधे को ले डूबता है. पानी में तैरती किश्ती को डुबोने के लिए एक छोटा सा छेद ही काफी होता है.

अफसोस इस बात का है कि सरकार ने अपना घमंड ऊपर रखा है, 50 लाख मजदूरों की रोजीरोटी का खयाल नहीं रखा. दूसरे सामानों में और कितने बेरोजगार हुए हैं, यह तो अभी न पूछें.

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बिना जनगणना कराए अमित शाह का कहना कि भारत में मुसलिमों की गिनती बढ़ रही है, एकदम गैरजिम्मेदाराना बयान है जिस का मकसद सिर्फ हिंदूमुसलिम झगड़ा बढ़ाना है. यह हो सकता है कि आज भी एक औसत मुसलिम औरत के बच्चे ज्यादा हो रहे हैं पर जो आंकड़े मिलते हैं उन के हिसाब से अगर हिंदू औरतों के 2.1 बच्चे हो रहे हैं तो मुसलिम औरतों के 2.3.

20 करोड़ की आबादी वाले मुसलिमों के 2024 के अनुमानों के हिसाब से तकरीबन 66 लाख बच्चे पैदा हुए और हिंदुओं के 2 करोड़. मुसलिम बच्चों के पैदा होने की गिनती भी लगातार गिर रही है क्योंकि मुसलिम औरतें भी अब घरों में बंद रह कर बच्चे पालना नहीं चाहतीं, वे आजाद हो कर घूमना चाहती हैं.

नैशनल फैमिली हैल्थ सर्वे के हिसाब से 2015 में हिंदुओं की गिनती 105 करोड़ थी और मुसलिमों की 18 करोड़, 60 लाख. 2021 तक हिंदुओं की गिनती 7 करोड़ बढ़ कर 112 करोड़ हो गईर् और मुसलिमों की गिनती 1 करोड़, 40 लाख बढ़ कर 20 करोड़ हो गई यानी हिंदुओं की गिनती मुसलिमों से 3-4 गुना तेजी से बढ़ रही है पर आंकड़ों को घुमाफिरा कर अमित शाह फालतू का डर फैला रहे हैं. सरकार इसीलिए जनगणना को टाल रही है कि कहीं उस की पोल न खुल जाए.

एक तरह से मुसलिम औरत बुरके के अलावा हिंदू औरत से ज्यादा आजाद है क्योंकि उसे हर दूसरेतीसरे दिन व्रत, पूजापाठ, मंदिर में लाइनों में नहीं खड़ा होना पड़ता. उसे घंटों घर में कीर्तन, भजन में समय नहीं लगाना पड़ता. उसे बुरके का जहर तो पीना पड़ता है पर नंगे पांव सिर पर कलश रख कर मंदिरों से मंदिरों पैदल तो नहीं जाना पड़ता. वह सब के साथ बैठ कर खाने का हक रखती है, हिंदू औरतों की तरह पति को खिला कर ही खाने को मजबूर नहीं है.

मुसलिम आबादी बढ़ रही है इस के लिए दूसरे देशों से आने वाले घुसपैठियों को दोष देना देश के साथ एकदम बेईमानी है. पाकिस्तान के साथ देश की सीमा पर चप्पेचप्पे पर पहरेदारी है और वहां से लोग नहीं आ सकते, जबकि पाकिस्तान धर्म के चलते हर साल बदहाली की ओर बढ़ रहा है. और फिर पाकिस्तान से आने वाले वैसे भी अपने साथ औरतों को तो नहीं ला सकते और आबादी तो औरतों से ही बढ़ती है, आदमियों से नहीं.

बंगलादेश में अब भी कामधंधा भारत से ज्यादा है जबकि एक साल से वहां सरकार की अलटापलटी हुई है. मोहम्मद यूनुस, जो नोबेल पुरस्कार पाने वाला अर्थशास्त्री है, जानता है कि देश को कैसे चलाया जाता है.

वहां के लोग यूरोपअमेरिका जा रहे हैं, खाली हाथ वे भारत नहीं आ रहे क्योंकि भारत में तो खुद भुखमरी का हाल यह है कि 85 करोड़ को 5 किलो अनाज मुफ्त देना पड़ता है ताकि वे मरे नहीं. ऐसे भारत में छिपछिपा कर कौन आना चाहेगा.

अमित शाह अगर कह रहे हैं कि देश में घुसपैठिए आ रहे हैं तो यह गृह मंत्रालय पर एक बड़ा आरोप है निकम्मेपन का. भारत की बौर्डर सिक्योरिटी क्या कर रही है कि वह बाहर वालों को आने दे रही है. अब नेपाल, भूटान, चीन, म्यांमार से तो मुसलिम आने वाले नहीं हैं क्योंकि इन देशों में या तो हिंदू जनता है या बौद्ध.

वोटों की खातिर हिंदूमुसलिम झगड़ों में जनता को उल झाने का मतलब है उन से काम के मौके छीनना. सरकार बेरोजगारी, गंदगी, बेईमानी, रिश्वतखोरी, ठगी पर ध्यान दे, फालतू में धर्म का एजेंडा न बेचे. यह काम पंडों, मुल्लाओं को करने दें. Editorial

Bhojpuri Cinema: टौप 6 भोजपुरी फिल्में जिसने लोगों को किया दीवाना

Bhojpuri Cinema: उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में भोजपुरी फिल्मों का क्रेज लोगों में काफी ज्यादा है और वे भोजपुरी सिनेमा के तो मानो दीवाने हैं. उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में लोग भोजपुरी ऐक्टर्स और ऐक्ट्रैसेस से काफी लगाव रखते हैं और उन्हें अपने घर का सदस्य ही मानते हैं. ऐसा कहना गलत नहीं होगा कि भोजपुरी फिल्में देखने वाले लोगों की संख्या देशभर में काफी कम है, लेकिन जितने भी लोग भोजपुरी फिल्मों के शौकीन हैं, उन्हें भोजपुरी फिल्में देखना और भोजपुरी गाने सुनना काफी पसंद है.

आज हम आप को बताएंगे कुछ ऐसी भोजपुरी फिल्मों के नाम जो कि काफी सुपरहिट रहीं और जिन की आईएमडीबी पर रेटिंग भी काफी अच्छी है.

आशिकी (2022)

साल 2022 में रिलीज हुई एक्शन रोमांटिक फिल्म ‘आशिकी’ ने लोगों को खूब एंटरटेन किया. इस फिल्म में ऐक्टर खेसारीलाल यादव और ऐक्ट्रैस आम्रपाली दुबे लीड रोल में थे और इस फिल्म की रेटिंग आईएमडीबी पर 7.5 है. आप को बता दें कि फिल्म ‘आशिकी’ को मशहूर डायरैक्टर पराग पाटिल ने डायरैक्ट किया था.

प्यार किया तो निभाना (2021)

खेसारीलाल यादव और काजल राघवानी की फिल्म ‘प्यार किया तो निभाना’ को लोगों ने खूब प्यार दिया. यह फिल्म साल 2021 में रिलीज हुई थी जिस की रेटिंग आईएमडीबी पर 9.9 है. आप को बता दें कि ‘प्यार किया तो निभाना’ एक रोमांटिक फिल्म है, जिसे रजनीश मिश्रा ने डायरैक्ट किया था.

वन मैन आर्मी (2023)

साल 2023 में आई ऐक्शन फिल्म ‘वन मैन आर्मी’ में भोजपुरी ऐक्टर प्रदीप पांडेय और देव सिंह हैं और इन दोनों ही कलाकारों को लोगों द्वारा बेहद पसंद किया जाता है. इस फिल्म को डायरैक्टर सोनू खत्री ने डायरैक्ट किया था और इस की रेटिंग आईएमडीबी पर 9.0 है.

लाड़ला 2 (2023)

खेसारीलाल यादव की सब से ज्यादा पसंद की जाने वाली फिल्म ‘लाड़ला 2’ साल 2023 में रिलीज हुई थी और इस फिल्म में खेसारीलाल यादव के साथ ऐक्ट्रैस मेघाश्री और माया यादव नें लीड रोल में काम किया था. इस फिल्म को प्रेमांशु सिंह ने डायरैक्ट किया था और इस फिल्म की रेटिंग आईएमडीबी पर 8.9 है.

विवाह 2 (2021)

प्रदीप पांडेय, अक्षरा सिंह और आम्रपाली दुबे की सुपरहिट फिल्म ‘विवाह 2’ ने फैंस के दिलों में एक अलग ही जगह बनाई है. यह फिल्म साल 2021 में रिलीज की गई थी और इस फिल्म को ‘द टाइम्स औफ इंडिया’ ने भी 5 में से 4.5 की रेटिंग दी थी और साथ ही इस फिल्म की रेटिंग आईएमडीबी पर 8.7 है. इस सुपरहिट फिल्म को प्रेमांशु सिंह ने डायरैक्ट किया था.

मेहंदी लगा के रखना 2 (2018)

प्रदीप पांडेय, ऋचा दिक्षित, मनोज टाइगर, अंजना सिंह, पूनम दुबे, यश कुमार और माया यादव जैसे कलाकार अगर एक ही फिल्म में हों, तो उस फिल्म को सुपरहिट होने से कोई नहीं रोक सकता. फिल्म ‘मेहंदी लगा के रखना 2’ साल 2018 में रिलीज की गई थी और इस फिल्म को मंजुल ठाकुर द्वारा डायरैक्ट किया गया था. इस फिल्म की रेटिंग आईएमडीबी पर 8.6 है और ‘द टाइम्स औफ इंडिया’ ने भी इस फिल्म को 5 में से 4 की रेटिंग दी थी.

आप को बता दें कि अगर आप भी भोजपुरी फिल्मों के शौकीन हैं और आप ने इन में से कोई भी फिल्म नहीं देखी है तो आप इन सभी फिल्मों को यूट्यूब पर फ्री में भी देख सकते हैं.

Hindi Family Story: विश्वासघात – सीमा के कारण कैसे टूटा प्रिया का घर

Hindi Family Story: प्रिया ने पालने में सोई अपनी नवजात बच्ची को मुसकराते देखा तो वह भी मुसकरा दी. प्रिया उस में अपना और निर्मल का अक्स ढूंढ़ने की कोशिश करने लगी. निर्मल को एक बेटी की चाह थी जबकि वह बेटा चाहती थी, क्योंकि वह निर्मल के व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित थी.

प्रिया एक छोटे शहर में पलीबढ़ी थी. इकलौती संतान होने के कारण मातापिता की दुलारी थी. निर्मल की बूआ उन के पड़ोस में रहती थीं. वे ही निर्मल का रिश्ता उस के लिए लाई थीं. निर्मल मुंबई में मल्टीनैशनल कंपनी में काम करते थे. उन के मातापिता कार दुर्घटना में चल बसे थे. उन के जाने के बाद बूआ ने ही उन की परवरिश की थी. प्रिया के मातापिता को निर्मल पसंद थे, इसलिए चट मंगनी और पट ब्याह कर दिया.

शादी के 1 हफ्ते बाद प्रिया निर्मल के साथ मुंबई आ गई. निर्मल एक अपार्टमैंट में 7वीं मंजिल पर 3 कमरों के फ्लैट में रहते थे. शादी के बाद दोनों ने फ्लैट को बड़े जतन से सजाया. निर्मल अपने नाम के अनुसार स्वभाव से बहुत ही निर्मल थे. उन में बिलकुल बनावटीपन नहीं था.

कुछ ही समय बाद प्रिया ने निर्मल को 2 से 3 होने की खुशखबरी सुना दी. दोनों बहुत खुश थे. अब निर्मल उस का बहुत ध्यान रखने लगे थे. उसी दौरान निर्मल के प्रमोशन ने उन की खुशी को दोगुना कर दिया. परंतु काम की जिम्मेदारी बढ़ने की वजह से अब वे ज्यादा व्यस्त रहने लगे.

प्रिया दिन भर अकेले काम करते थक जाती थी, इसलिए दोनों ने एक बाई रखने का फैसला किया. महानगर मुंबई में लोग बहुत व्यस्त रहते हैं. किसी को किसी से कोई लेनादेना नहीं होता. अंतर्मुखी होने के कारण प्रिया भी ज्यादातर घर में ही रहती थी. इसीलिए उन्होंने बिल्डिंग के सिक्योरिटी गार्ड से बाई ढूंढ़ने के लिए मदद मांगी. कुछ ही दिन बाद उस ने एक बाई को भेजा.

लगभग 30 साल की दुबलीपतली रमा बाई को उन्होंने मामूली पूछताछ के बाद काम पर रख लिया. रमा बाई ने बताया कि वह पास की बिल्डिंग में और 3 घरों में काम करती है. उसके 2 बच्चे हैं. पति स्कूल में चपरासी है. इस से अधिक जानने की उन्होंने जरूरत नहीं समझी.

रमा बाई सुबह 8 बजे काम पर आती और करीब 10 बजे तक काम निबटा कर चली जाती. जब वह काम करने आती तब निर्मल के औफिस जाने का समय होता था, इसलिए प्रिया ज्यादातर निर्मल के लिए नाश्ता और टिफिन तैयार करने में व्यस्त होती थी. धीरेधीरे रमा बाई घर की सदस्य जैसी बन गई. वह प्रिया के छोटेमोटे कामों जैसे बाजार से दूधसब्जी लाने में मदद करने लगी.

अब अकसर प्रिया का मौर्निंग सिकनैस की वजह से जी मचलाने लगा और उस के लिए खाना बनाना मुश्किल होने लगा. यह देख कर एक दिन रमा बाई ने उस के आगे एक प्रस्ताव रखा. बोली, ‘‘मैडमजी, मेरी एक छोटी बहन है. बेचारी गूंगी है, शादी नहीं हो पाई, इसलिए हमारे साथ ही रहती है.

अगर आप कहें तो जब तक आप की डिलिवरी नहीं हो जाती आप उसे खाना बनाने और दूसरे कामों के लिए रख लें. आप को जो ठीक लगे उसे दे देना. सुबह मैं साथ ले आया करूंगी और शाम को साथ ले जाया करूंगी.’’

प्रिया और निर्मल को उस की बात जंच  गई, इसलिए उन्होंने हां कह दिया. अगले ही दिन रमा बाई अपने साथ 22-23 वर्ष की लड़की को ले आई. उस ने उस का नाम सीमा बताया. सीमा देखने में बहुत सुंदर थी. प्रिया को उस के गूंगे होने पर बहुत तरस आया. सीमा उन के घर खाना बनाने का काम करने लगी. वह सभी काम बहुत अच्छे तरीके से व समय से पहले कर देती.

वह प्रिया को समय से फल काट कर खिलाती, समय पर खाना खिलाती. पतिपत्नी दोनों सीमा के काम से बेहद खुश थे. कभीकभी निर्मल को औफिस के काम से बाहर जाना पड़ता. तब प्रिया सीमा को रात को घर पर रोक लेती. सीमा निर्मल का कुछ विशेष ही ध्यान रखती थी, परंतु प्रिया को इस में कोई बुराई नजर नहीं आई, इसलिए उस ने उस पर कुछ ज्यादा ध्यान नहीं दिया. फिर उन दिनों अकसर तबीयत खराब रहने के कारण वह परेशान भी रहती थी.

हालांकि प्रिया को सीमा का निर्मल के बूट पौलिश करना और बाथरूम में कपड़े रखना शुरू से अखरता था, परंतु दूसरे ही क्षण वह इसे नारीसुलभ जलन समझ कर भूल जाती. कभीकभी तो उसे अपने इस विचार पर खुद पर शर्म महसूस होती कि एक गूंगी लड़की पर शक कर रही है.

इस बीच प्रिया का चौथा महीना शुरू हो गया था. उस दिन निर्मल औफिस की फाइलें घर ले आए थे और आते ही ड्राइंगरूम में टेबल पर सभी फाइलें फैला कर काम करने बैठ गए. प्रिया की तबीयत सुबह से ही ठीक नहीं थी, इसलिए उस ने सीमा को रात को घर पर रोक लिया. खाना खा कर वह बैडरूम में आराम करने लगी और निर्मल अपना काम निबटाने में व्यस्त हो गए.

करीब रात के 1 बजे कुछ आवाजों से उस की नींद टूट गई. निर्मल बिस्तर पर नहीं थे. उन के तेजतेज बोलने की आवाज आ रही थी. वह ड्राइंगरूम की ओर तेज कदमों से भागी. वहां का दृश्य देख कर अवाक रह गई. सीमा एक ओर खड़ी रो रही थी.

उस के कपड़े अस्तव्यस्त और कई जगह से फटे थे. प्रिया को देख कर निर्मल हकबका कर सफाई देने लगे, ‘‘प्रिया, मैं ने कुछ नहीं किया. यह अचानक आ कर मुझ से लिपट गई. जब मैं ने इसे पीछे धकेला तो इस ने अपने कपड़ों को फाड़ना शुरू कर दिया.’’

सीमा लगातार रोए जा रही थी. वह प्रिया के गले से लिपट गई. उस की हालत देख कर प्रिया का चेहरा तमतमा उठा. उस के अंदर की औरत जैसे जाग उठी. बोली, ‘‘मुझे आप से कतई यह उम्मीद नहीं थी कि आप इतना गिर जाएंगे.’’

‘‘प्रिया, यह झूठी है… मैं सच कह रहा हूं… मैं ने कुछ नहीं किया,’’ निर्मल लगातार अपनी सफाई दे रहे थे. ‘‘सचाई सामने है और फिर भी आप…छि:,’’ कहते हुए वह सीमा को अपने बैडरूम में ले आई. प्रिया ने उसे पानी पिलाया और किसी तरह चुप करवाया.

‘‘सीमा, मैं बहुत शर्मिंदा हूं…प्लीज मुझे माफ कर दो,’’ प्रिया ने सीमा के आगे हाथ जोड़ते हुए कहा.

प्रिया मन ही मन खुद को उस का कुसूरवार मान रही थी, क्योंकि उसी के कहने पर उस पर विश्वास कर सीमा रात को रुकी थी. फिर उस ने उसे अपने साथ ही सुला लिया. अगले दिन रमा बाई के आते ही सीमा ने रोरो कर और इशारों से उसे सब कुछ बता दिया.

वह बारबार निर्मल की ओर इशारा कर के रो रही थी. उस की हालत देख कर रमा बाई ने हंगामा खड़ा कर दिया. उस ने उन के सामने ही पुलिस को फोन कर दिया. प्रिया और निर्मल ने उसे रोकने का भरसक प्रयत्न किया. ‘‘क्या मैडमजी, तुम भी अपने आदमी को बचाना चाहती हो? सीमा की जगह तुम्हारी बहन होती तब क्या करतीं?’’ रमा बाई गुस्से से बोली.

10 मिनट में पुलिस की वरदी में 1 आदमी उन के सामने खड़ा था. निर्मल उसे और रमा बाई को अपनी सफाई देते रहे, पर दोनों ने उन की एक न सुनी. प्रिया दोनों हाथों से सिर पकड़े वहीं सोफे पर चुपचाप बैठी रही. पुलिस वाले ने निर्मल को थाने चलने को कहा. निर्मल बहुत घबरा गए. वे मिन्नत करने लगे. आखिर उस पुलिस वाले ने 50 हजार पर रमा बाई और निर्मल में समझौता करवा दिया.

अचानक बच्ची के रोने की आवाज से प्रिया की तंद्रा भंग हो गई. वह भूतकाल से वर्तमान में लौट आई. वह उठ कर बैठने का प्रयास करने लगी. तभी बाहर से निर्मल उस के मातापिता के साथ कमरे में दाखिल हुए और उन्होंने लपक कर बच्ची को गोद में उठा लिया. अपने मातापिता को देख कर प्रिया के पीले पड़े चेहरे पर खुशी फैल गई.

‘‘अरे हमारी गुडि़या अपने नानानानी के पास आने के लिए रो रही है,’’ प्रिया की मां ने निर्मल से बच्ची को अपनी गोद में लेते हुए कहा.

‘‘प्रिया, कैसी हो?’’ बाबूजी ने उस के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए पूछा.

‘‘बिलकुल ठीक हूं,’’ प्रिया ने मुसकरा कर उत्तर दिया.

‘‘तुम ने जूस नहीं लिया…यह लो जूस पी लो,’’ निर्मल ने जूस का गिलास उस के हाथ में थमा दिया.

प्रिया धीरेधीरे जूस पीने लगी. निर्मल के माथे पर बालों की एक लट झूलती बड़ी अच्छी लग रही थी. पिछले 2 दिनों से वे अकेले भाग दौड़ कर रहे थे. नर्स बता रही थी कि एक क्षण के लिए भी उन्होंने पलक नहीं झपकी. मां की गोद में गुडि़या सो गई थी. उसे पालने में लिटा कर मां ने उस के हाथ से जूस का खाली गिलास ले लिया.

‘‘नींद आ रही है…तू भी सो जा. मैं तेरे लिए नाश्ता बना कर लाती हूं,’’ फिर उस के बाबूजी से बोली, ‘‘आप भी नहा लीजिए. निर्मल बेटा, तुम किचन में सामान निकालने में मेरी मदद कर दो. मैं नाश्ता बनाती हूं. फिर सब साथ मिल कर बैठेंगे,’’ कहते हुए मां कमरे से बाहर निकल गईं. प्रिया को बहुत कमजोरी महसूस हो रही थी. पिछले 5 महीने उस ने बड़े ही कष्ट से काटे थे.

वह मानसिक और शारीरिक यातना से गुजरी थी. सीमा वाले हादसे के बाद वह निर्मल के साथ एक छत के नीचे रहना नहीं चाहती थी, परंतु आने वाले बच्चे के भविष्य और मांबाबूजी के खयाल से उस ने चुप्पी साध ली. आज भी वह यह सोच कर कांप जाती है कि अगर उस ने अलग होने का फैसला कर लिया होता और अपने मायके लौट जाती तब कितना बड़ा अनर्थ हो जाता.

वह तो गनीमत थी कि डाक्टर की सलाह मान कर उस ने रोज पार्क जाना शुरू कर दिया था. वहीं उस की मुलाकात तनु से हुई. तनु उस के साथ स्कूल में पढ़ती थी. एक दिन उस ने बताया कि उस ने घर के काम के लिए एक लड़की रख ली है जो गूंगी है, तो प्रिया का दिल जोर से धड़कने लगा.

‘‘क्या नाम है उस का?’’ कांपते होंठों से प्रिया ने पूछा.

‘‘सीमा, बेचारी बोल नहीं सकती. मेरी बाई को बहन है,’’ तनु ने जवाब दिया.

प्रिया का दिल अनजाने डर से कांप उठा. उसे लगा कि अगर तनु को पता चल गया तो क्या सोचेगी उस के पति के चरित्र को ले कर. प्रिया ने तनु से मेलजोल कम कर दिया. तनु का फोन भी वह नहीं उठाती. लगभग 2 महीने बीत गए.

फिर एक दिन कैमिस्ट की दुकान पर तनु उस से टकरा गई. उस का रंग पीला हो गया था. वह कुछ बुझीबुझी सी थी. उस ने पहले की तरह उस से बातचीत करने में कोई उत्सुकता नहीं दिखाई. औपचारिकता के नाते उस ने उस से बातचीत की.

उस के होंठों से हंसी जैसे गुम ही हो गई थी. 2 ही दिन बाद तनु उसे फिर से पार्क में मिल गई. वह बहुत उदास और बीमार सी लगी. प्रिया इस का कारण पूछे बिना रह नहीं सकी. थोड़ी सी नानुकर के बाद तनु टूट गई. उस ने रोतेरोते अपना दुख बांटा जिसे सुन कर प्रिया सकते में आ गई.

तनु ने उसे जो कुछ बताया वह हूबहू उस की कहानी से मिलता था. तनु के मोबाइल में सीमा का फोटो था, इसलिए उस के प्रति उस का संदेह गहरा हो गया.

उस ने अपनी आपबीती तनु को सुनाई. तब दोनों ने तय किया कि वे सीमा के बारे में पता लगाएंगी और फिर एक दिन वे दोनों सीमा और रमा बाई के बारे में पूछतेपूछते उन के घर जा पहुंचीं. बाहर गली में ही उन्होंने भीड़ लगी देखी. पानी भरने के लिए औरतें आपस में लड़ रही थीं.

‘‘तुम दोनों बहनें अपने को समझती क्या हो?’’ पानी की बालटी पकड़े एक औरत बोली.

‘‘खबरदार, जो कोई आगे आया, काट कर फेंक दूंगी सब को,’’ दूसरी आवाज आई. तनु और प्रिया वहीं रुक उन की लड़ाई देखने लगीं. दोनों यह देख कर हैरान रह गईं कि सीमा फर्राटे से बोल रही थी.

‘‘सब से पहले हम दोनों पानी भरेंगी. तुम सब चुडै़लें सुबहसुबह हमारा दिमाग क्यों खराब कर रहीं,’’ सीमा चिल्ला रही थी.

तनु प्रिया का हाथ पकड़ उसे खींचते हुए गली से बाहर ले आई.

‘‘यह सीमा गूंगी नहीं है. देखा कैसे फर्राटे से बोल रही है,’’ प्रिया ने कहा.

‘‘हां प्रिया, इस का मतलब इन दोनों ने जो हमारे साथ किया वह सोचीसमझी साजिश के तहत किया,’’ तनु ने गुस्से से कहा.

‘‘हमें इन्हें सबक सिखाना होगा, लेकिन कैसे, समझ नहीं आ रहा ,’’ प्रिया बोली.

‘‘चलो हम इन्हें पुलिस के हवाले करते हैं,’’ तनु ने प्रिया का हाथ पकड़ते हुए कहा.

‘‘लेकिन इस से पहले हमें इन के खिलाफ सुबूत इकट्ठे करने होंगे.’’ घर आ कर उन्होंने अपनेअपने पतियों को सारा माजरा समझाया. फिर सब ने मिल कर फैसला किया कि वे पुलिस के साथ मिल कर उस के सहयोग से इन्हें पकड़वाएंगे.

फिर चारों थाने में गए और अपने साथ हुई ठगी की आपबीती सुनाई. पुलिस ने सब से पहले मालूम किया कि वे दोनों फिलहाल कहां काम कर रही हैं. उन्हें पता चला कि वे अभी किसी नवदंपती के घर पर ही काम कर रही हैं. तब पुलिस ने उस दंपती के साथ मिल कर उन का भांडा फोड़ने की योजना बनाई. संयोग से उन के घर में सीसीटीवी कैमरा लगा था.

कुछ ही दिनों में रमा बाई और सीमा ने वहां भी ऐसा ही खेल खेला, परंतु कैमरे में उन की सारी हरकत कैद हो गई और जो आदमी पुलिस की वरदी में आया वह रमा बाई का शराबी पति था जो पहले दंपती को डराताधमकाता था और फिर पैसे ले कर समझौता करवाता था. उन तीनों को ठगी करने के जुर्म में जेल हो गई. प्रिया की मां उस के लिए नाश्ता ले आई थीं. उन्होंने प्रिया के सिर पर प्यार से हाथ रखा तो प्रिया मुसकरा दी. Hindi Family Story

Hindi Story: दलदल

Hindi Story: मोहनलाल की जब बैंक में नौकरी लगी, तो उस की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. उसे बैंक की शेखपुर ग्रामीण ब्रांच में पहली पोस्टिंग मिली. शहर में पलेबढ़े मोहनलाल को शेखपुर गांव की जिंदगी रास नहीं आई, पर गांव से शहर की किसी ब्रांच में तबादला कराना आसान नहीं था, इसलिए वह चाहते हुए भी गांव में रहने के लिए मजबूर था, जहां बिजली, सड़कें, अच्छे घर और दूसरी बुनियादी जरूरतों की कमी थी. बैंक में नौकरी मिलने के एक साल बाद ही मोहनलाल की शादी मोनिका से हो गई. मोनिका बहुत खूबसूरत थी और उतनी ही महत्त्वाकांक्षी भी.

शादी के बाद वह 2 महीने तक मोहनलाल के मातापिता के साथ रही और फिर उस के साथ शेखपुर गांव चली गई. मोनिका को शेखपुर गांव में रहना सजा काटने के बराबर लगा, पर बिना पति के साथ के रात काट पाना भी उस के लिए आसान नहीं था. वह मजबूर हो कर गांव में एकएक दिन काट रही थी और पति से अपना तबादला किसी शहरी ब्रांच में कराने की जिद कर रही थी. मोहनलाल ने उसे समझाया कि बैंक के जितने मुलाजिम गांव की ब्रांचों में काम करते हैं, उन में से आधे से ज्यादा लोग अपना तबादला किसी शहरी ब्रांच में कराना चाहते हैं, इसलिए तबादले के लिए दी गई अर्जियों पर बैंक कोई ध्यान नहीं देता और यूनियन के नेता भी ऐसे तबादलों के केस अपने हाथ में नहीं लेते.

मोहनलाल ने मोनिका को यह भी बताया कि उस की तो अभी 2 साल की ही नौकरी हुई है, यहां तो 10-12 साल से लोग लगे हैं और अभी तक उन की अर्जियों पर कोई कार्यवाही नहीं हुई. मोनिका के बारबार पूछने पर मोहनलाल ने बताया कि अगर जोनल मैनेजर चाहें, तो उस का तबादला शहर में हो सकता है. मोनिका जिद कर के मोहनलाल के साथ जोनल मैनेजर से मिलने उन के घर पहुंच गई. जोनल मैनेजर नरेश को जब मालूम हुआ कि मोहनलाल बैंक की शेखपुर ब्रांच में क्लर्क है, तो उन्हें उस का बिना इजाजत के घर आना बुरा लगा, पर मोनिका ने लपक कर उन के पैर छू लिए. जोनल मैनेजर नरेश ने एक निगाह मोनिका पर डाली, तो उस के तीखे नाकनक्श और कसी हुईर् देह देख कर उन के तेवर ढीले पड़ गए.

मोनिका को आशीर्वाद देने के बहाने वे देर तक उस की नंगी पीठ सहलाते रहे. मोनिका भी निगाह नीची किए उन से सटी मुसकराती रही. नरेश उन दोनों को घर के अंदर ले गए और नौकर से चाय लाने के लिए कहा. इस बीच मोनिका ने मोहनलाल के तबादले के लिए उन से गुजारिश की, जिसे नरेश ने उस की खूबसूरत देह को ललचाई नजर से घूरते हुए मान लिया. मोहनलाल चुपचाप जमीन पर नजर गड़ाए बैठा रहा. जब वे लोग लौटने लगे, तो मोनिका ने जबरन नरेश के फिर से पैर छू लिए. इस घटना के 15 दिन बाद जोनल मैनेजर नरेश शेखपुर ब्रांच का दौरा करने आए और रात को शेखपुर के डाक बंगले में रुकने का इंतजाम करने के लिए ब्रांच मैनेजर को निर्देश दिया. बैंक मैनेजर ने उन के रुकने का सारा इंतजाम करा दिया.

शाम को मोहनलाल बैंक से घर आया, तो उस ने नरेश के शेखपुर गांव आने की बात मोनिका को बताई. मोनिका ने मोहनलाल से कहा कि नरेशजी को डिनर के लिए अपने घर बुला लो. मोहनलाल ने ऐसा ही किया, जिसे नरेश ने बिना किसी नानुकर के मान लिया. साथ ही शराब पीने का इंतजाम रखने का इशारा भी किया. उन्होंने उस से यह भी कहा कि वे रात को 9 बजे डाक बंगले पर पहुंच जाए. रात के 9 बजे मोहनलाल जब डाक बंगले पर पहुंचा, तो नरेशजी उस का इंतजार कर रहे थे. उन्हें ले कर मोहनलाल घर पहुंचा, तो सजीधजी मोनिका ने दरवाजे पर उन का स्वागत किया. फिर शराब का दौर चला. शुरू में
तो मोहनलाल झिझका, मगर 2 पैग पीने के बाद ही वह खुल गया. इस के बाद नरेशजी के इशारा करने पर
उस ने मोनिका को भी जबरदस्ती पैग पिला दिया.

जब नरेशजी मस्ती में गए, तो डिनर हुआ. इस के बाद नरेशजी ने सिगरेट पीने की फरमाइश की. मोहनलाल सिगरेट लेने बाजार की ओर भागा. इस बीच नरेशजी ने मोनिका की कमर में हाथ डाल दिया और उस की मांसल देह को सहलाने लगे. जब मोनिका ने उन की इस हरकत का कोई विरोध नहीं किया, तो उन की हिम्मत बढ़ गई. उन्होंने उसे खींच कर अपनी गोद में बैठा लिया और उन के हाथ तेजी से मोनिका की देह पर फिसलने लगे. कुछ ही देर में मोनिका के हाथ भी नरेशजी की देह में कुछ खोजने लगे.
जल्दी ही नरेशजी ने उसे उठा कर पलंग पर लिटा दिया. जब तक मोहनलाल लौटा, तब तक वे हलके हो कर कुरसी पर बैठ चुके थे. पर उन की तेज चल रही सांसों और मोनिका के गालों पर दांत के हलके निशान बीती हुई घटना की चुगली मोहनलाल से कर रहे थे.

मोहनलाल कुछ उदास हो गया, पर चलते समय जब नरेशजी ने उसे छाती से लगा कर कहा कि आज से तुम मेरे भाई जैसे हो, तो उस का दिल बल्लियों उछलने लगा. नरेशजी ने जाते ही मोहनलाल के तबादले का आदेश जारी कर दिया. मोहनलाल और मोनिका अपने शहर के तबादले पर बेहद खुश थे. अब नरेशजी अकसर उस के घर आने लगे. शहर में मोहनलाल को बहुतकुछ मिला. उन के घर बेटी पैदा हुई और प्रमोशन में अफसर का पद भी मिल गया. हां, प्रमोशन के लिए मोहनलाल को कई बार नरेशजी को डिनर के लिए अपने घर बुलाना पड़ा था और डिनर के बाद घर में सिगरेट होते हुए भी मोनिका के इशारे पर सिगरेट लाने के लिए उसे रात के 10-11 बजे के बाद बाजार जाना पड़ा था. एक चतुर खिलाड़ी की तरह
मोनिका ने मोहनलाल और नरेशजी दोनों को अपने इशारों पर नचाना शुरू कर दिया.

कुछ ही महीने बाद नरेशजी की पोस्टिंग दूसरे शहर में हो गई, पर मोनिका लगातार उन से मिलती रही और अपने पति के प्रमोशन और शहरी ब्रांचों में नियुक्ति का इंतजाम कराती रही. बदले में वह नरेशजी की खुल कर सेवा करती रही. मोहनलाल ने भी हालात से समझौता कर लिया था. 4 साल बाद नरेशजी दोबारा तबादला हो कर मोहनलाल के शहर में गए. अब उन की मेहरबानियां खुल कर मोनिका पर बरस रही थीं. यहां तक कि उन्होंने कई बड़े कर्ज भी उन के लिए मंजूर किए थे. मोहनलाल के पास शहर में 2-2 मकान, बढि़या गाड़ी, नौकरचाकर सबकुछ था. उस के पुराने साथी अब भी बैंक में बाबू और बड़े बाबू के पद पर थे, जबकि वह मैनेजर बन गया था. मोहनलाल की बेटी चेतना ने 12वीं जमात का इम्तिहान सैकंड डिविजन में पास किया, तो कालेज में दाखिला लेने के लिए किसी यूनिवर्सिटी में बात नहीं बनी.

मजबूरन मोनिका को नरेशजी का सहारा लेना पड़ा और देखते ही देखते उस की बेटी को शहर के अच्छे कालेज में दाखिला मिल गया. मोनिका के कहने पर नरेशजी ने दोपहर में उस के घर आना शुरू कर दिया.
ऐसे ही एक दिन जब नरेशजी मोनिका के घर में थे, तो कालेज में एक लड़की की मौत होने की वजह से जल्दी छुट्टी हो गई और मोनिका की बेटी चेतना 12 बजे ही घर पहुंच गई. घर का बाहरी दरवाजा खुला था.
चेतना ने बैग ड्राइंगरूम में रखा और फ्रिज से पानी की बोतल निकालने लगी, तभी उसे अपनी मां की चीख सुनाई दी. उस ने खिड़की से छिप कर देखा, तो दंग रह गई. कुछ देर बाद मोनिका और नरेशजी जब कमरे से बाहर निकले, तो चेतना को ड्राइंगरूम में देख कर सकपका गए. नरेशजी बिना कुछ बोले ही बाहर निकल गए और मोनिका ने खुद को घरेलू कामों में मसरूफ कर लिया.

एक दिन मोहनलाल घर लौट रहा था. रास्ते में उस ने देखा कि एक अधेड़ शख्स स्कूटर चला रहा था और चेतना उस के पीछे बैठी थी. वह अपने दोनों हाथों से उस अधेड़ शख्स को जकड़े हुए थी. शाम को घर कर मोहनलाल ने यह बात मोनिका को बताई. मोनिका ने अकेले में चेतना से पूछा, ‘‘आज तुम दोपहर में किस के साथ स्कूटर पर जा रही थीं?’’ चेतना ने बताया कि वह बायोलौजी पढ़ाने वाले सर के साथ थी.
इस पर मोनिका ने पूछा, ‘‘तुम उन के साथ कहां गई थीं?’’
‘‘फिल्म देखने.’’
‘‘क्यों? तुम टीचर के साथ फिल्म देखने क्यों गई थीं?’’
‘‘अरे मां, 30 नंबर का प्रैक्टिकल होता है. अगर सर खुश हो गए, तो 30 में से पूरे 30 नंबर भी दे सकते

हैं. अगर वे चाहें, तो कैमिस्ट्री और फिजिक्स के टीचरों से भी प्रैक्टिकल में अच्छे नंबर दिला सकते हैं.’’
‘‘तो प्रैक्टिकल में अच्छे नंबर पाने के लिए तुम अपनी इज्जत लुटा दोगी?’’ मोनिका ने चीखते हुए कहा.
‘‘क्यों मां, इस में बुराई क्या है? आखिर आप भी तो मनचाही चीजें पाने के लिए यही करती हैं,’’ चेतना ने मां को घूरते हुए कहा.
यह सुन कर मोनिका के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई. उस का मुंह खुला का खुला रह गया.
बैडरूम में चुपचाप बैठे मांबेटी की बात सुन रहे मोहनलाल का हाल भी कुछ ऐसा ही था. वे दोनों अपने ही
बनाए गए दलदल में छटपटाने के लिए मजबूर थे.                             

डा. जीके शर्मा

Hindi Story: नल पुराण

देवकी के घर के आंगन और पिछवाड़े में बड़ीबड़ी घास और झाडि़यां उग आई थीं. मकान का प्लास्टर भी जगहजगह से उखड़ चुका था. देखने से लगता था जैसे कई महीनों से इस की किसी ने सुध नहीं ली है, पर आज अचानक उस के आंगन में रौनक सी लगी थी. कुछ लोग झाडि़यां साफ कर रहे थे, तो कुछ दीवारों के उखड़े प्लास्टर की मरम्मत में लगे थे. शाम तक रंगवार्निश लगा कर घर को चकाचक कर दिया गया. एक गरीब विधवा के घर की ऐसी कायापलटआखिर ऐसा क्या हो गया था?
‘‘जरा, जल्दीजल्दी हाथ चलाओ भाईऔर कितना टाइम लगाओगे स्टेज बनाने में?’’
‘‘अरे, यह शामियाना कैसे बांध रहे होजरा ढंग से बांधो…’’
‘‘कुरसियों का क्या हुआ? अभी तक नहीं आईं? और वह रैड कार्पेट?’’
‘‘कल सवेरे 8 बजे तक सारा काम पूरा हो जाना चाहिए, बेशक रातभर काम करना पड़े तो करो.’’

जल निगम का जूनियर इंजीनियर मजदूरों को डांटते हुए काम बता रहा था. यही मौका था उस के लिए अपनी अफसरी दिखाने का खासकर जब उस के बड़े अफसर भी साथ खड़े हों. दूसरे दिन ठीक सवेरे 8 बजे जल निगम के बड़े अफसर देवकी के घर पहुंच गए.
‘‘सर, रैड कार्पेट बिछवा दूं क्या? चीफ इंजीनियर साहब, कमिश्नर, डीएम और बाकी औफिसर्स की गाडि़यां नीचे रोड पर गई हैं,’’ जूनियर इंजीनियर ने धीरे से असिस्टैंट इंजीनियर से पूछा.
‘‘हां, बिछवा दो. और हां, नल की टोंटी बदली या नहीं? उस में बढि़या पीतल की टोंटी लगवा दो. ध्यान रहे
कि नल के स्टैंड पोस्ट का प्लास्टर उखड़े नहीं, अभी ताजा है.’’
‘‘पर साहब, बाकी जगह तो हम ने लोहे की टोंटी लगाई थी और स्टैंड पोस्ट भी नहीं बनाया था, बस यों ही लकड़ी का डंडा खड़ा कर के नल उस से बांध दिया था,’’ जूनियर इंजीनियर के बजाय काम पर लगे प्लंबर ने झिझकते हुए बताया.

‘‘चुप बे, तुझ से किस ने पूछा है? जितना कहा जाए, उतना कर, फालतू बोलने की जरूरत नहीं है,’’ असिस्टैंट इंजीनियर ने डांटते हुए कहा.
फिर एग्जीक्यूटिव इंजीनियर ने जूनियर इंजीनियर को इशारे से बुलाया और पूछा, ‘‘जेई साहब, जरा चैक तो करो, नल में पानी भी रहा है कि नहीं?’’
जूनियर इंजीनियर ने नल की टोंटी घुमा कर देखा तो उस की जान हलक में गई, हाथपैर फूल गए. डरते हुए, घबराई आवाज में वह बोला, ‘‘सर, गजब हो गयापानी तो नहीं रहा अबक्या होगा?’’
क्या कह रहे हो?… पानी नहीं रहा,’’ एग्जीक्यूटिव इंजीनियर को एक झटका सा लगा.
‘‘जी एकदम सही सर…’’ जूनियर इंजीनियर बोला.
यह सुनते ही एग्जीक्यूटिव इंजीनियर का पारा चढ़ गया और वह गुस्से में बोला, ‘‘कल से अभी तक चैक क्यों नहीं किया? अब बता रहे हो कि पानी नहीं रहा है. तुम से एक काम भी ढंग से नहीं हो सकता. एक घंटे के बाद मंत्रीजी आने वाले हैं उद्घाटन के लिए. पानी नहीं आया तो क्या जवाब देंगे? खुद तो सस्पैंड होगे ही, मुझे भी करवाओगे.’’

‘‘सर, कल शाम को तो चैक कर के ही गए थे. तब तो पानी रहा था. पता नही रातोंरात…’’
‘‘…तो रात में क्या हो गया? धरती निगल गई या आसमान खा गयाजो भी हो मुझे आधे घंटे में पानी चाहिए,’’ एग्जीक्यूटिव इंजीनियर ने सख्त लहजे में आदेश दिया.
‘‘ठीक है सर, चैक करता हूं,’’ कह कर जूनियर इंजीनियर ने मोटरसाइकिल उठाई और कैजुअल लाइनमैन को पीछे बिठा कर चल दिया.
इसी बीच इलाके के सभी बड़े अफसर, जल निगम के चीफ इंजीनियर, कमिश्नर, डीएम पंडाल पर पधार चुके थे, साथ ही मंत्रीजी की पार्टी से ब्लौक प्रमुख, भूतपूर्व विधायक, जिला और मंडल स्तर के पार्टी नेता आदि भी चुके थे. इन के अलावा, विपक्षी पार्टी के वर्तमान विधायक और उन के चेलेचपाटे भी पंडाल में पधार चुके थे. इंतजार था तो बस मंत्रीजी का.
अव्वल तो इतने छोटे कार्यक्रम में मंत्रीजी आते नहीं, पर पिछले इलैक्शन में पानी की समस्या को ले कर सत्ता पक्ष को मुंह की खानी पड़ी थी. अब  पार्टी किसी भी तरह अपने खोए वोट बैंक को वापस लाना चाहती थी, इसलिए सरकार ने इलाके की सब से बड़ी समस्या यानी पानी के लिएहर घर जल, हर घर नलका शिगूफा छोड़ दिया था.

2-3 महीने में फिर से इलैक्शन होने वाले थे. सरकार इस से पहले, इलाके के हर गांव में पानी पहुंचाना चाहती थी. इस का जिम्मा जल मंत्री रघुवीर सिंह उर्फजग्गू भैयाको सौंपा दिया गया था. वे खुद अपने हाथों से इस का शुभारंभ करना चाहते थे. जूनियर इंजीनियर और लाइनमैन पाइप लाइन को चैक करते हुए उस जगह पहुंचे जहां से देवकी के घर के लिए मेन लाइन से कनैक्शन दिया गया था. वहां का नजारा देख कर उन के होश उड़ गए. तकरीबन 100 मीटर लंबा पाइप गायब था.
‘‘साहब, अब हम क्या करें? इतनी जल्दी 100 मीटर लंबा पाइप ला कर कैसे जोड़ेंगे?’’ लाइनमैन ने घबराई आवाज में पूछा.
‘‘तेरी नौकरी तो गई बेटा. तेरे साथ मैं भी सस्पैंड होऊंगा,’’ जूनियर इंजीनियर ने घबराहट में माथे से पसीना पोंछते हुए लाइनमैन को धमकाया.
‘‘साहब, इस में मेरा क्या कुसूर है? रात में कोई पाइप उखाड़ कर ले जाएगा, ऐसा कौन सोच सकता था?’’ लाइनमैन ने डरतेडरते सफाई दी.
थोड़ी देर के लिए लगा कि उन दोनों को जैसे सांप सूंघ गया, एकदम चुप रहे.
‘‘खैर, जो भी होगा, देखा जाएगा. एग्जीक्यूटिव इंजीनियर साहब को तो तुरंत बताना ही होगा,’’ कहते हुए जूनियर इंजीनियर ने चुप्पी तोड़ी.

दरअसल, हुआ यों कि गांव में पानी की पाइप लाइन बिछाने की टारगेट डेट कब की निकल चुकी थी, पर जल निगम की लापरवाही और टालमटोली की वजह से अब तक पाइप लाइन नहीं बिछ पाई थी.
अचानक जल विभाग के सचिव का आदेश गया,’’ अगले 2-3 महीने में विधानसभा चुनाव की तारीख घोषित होने की उम्मीद है और फिर आचार संहिता लागू हो जाएगी. माननीय जल मंत्री चाहते हैं कि वेहर घर जल, हर घर नलयोजना का अगले हफ्ते अपने करकमलों से शुभारंभ करेंगे. इस के लिए जल्दी ही जरूरी तैयारी की जाए.’’ यह फरमान मिलते ही डिवीजन में हड़कम मच गया था. अभी तक तो गांव में मेन पाइप लाइन भी नहीं बिछी थी, फिर घरों तक पानी कैसे पहुंचाएंगेडिवीजन के सुपरिंटैंडिंग इंजीनियर ने आननफानन में मीटिंग बुलाई और तय हुआ कि गांव में ऐसा घर ढूंढ़ा जाए जो दूसरे गांव को जा रही मेन पाइप लाइन और रोड के एकदम नजदीक हो.

इस के लिए देवकी का घर सब से मुफीद था, जो कि दूसरे गांव को पानी की सप्लाई करने वाली मेन पाइप लाइन से महज 500 मीटर की दूरी पर था और  रोड के नजदीक भी. तय कार्यक्रम के मुताबिक चुपके से देवकी के घर के लिए दूसरे गांव को पानी सप्लाई करने वाले मेन पाइप से टैंपरेरी कनैक्शन जोड़ दिया गया. गांव के कुछ और घरों में भी दिखावे के लिए नल लगा दिए गए बिना पानी के कनैक्शन के ताकि गांव वाले भरोसे में रहें कि जल्दी उन के घर भी पानी जाएगा. एग्जीक्यूटिव इंजीनियर को जैसे ही पता चला कि कोई पाइप लाइन ही उखाड़े कर ले गया तो उस पर आसमान टूट पड़ा. हताशा और तनाव में वह मन ही मन भुनभुनाया, ‘‘आज तो मर गए अब कुछ नहीं हो सकता.’’ वह कुछ क्षण माथा पकड़ कर यों ही बैठा रहा, फिर जूनियर इंजीनियर पर सारी भड़ास निकाली, ‘‘इडियटतुम्हारे बस का कुछ नहीं है. मरवा दिया सब को. अब देखते हैं कि कौन बचाता है नौकरी…’’

फिर दौड़ादौड़ा सुपरिंटैंडिंग इंजीनियर के पास गया और सारी बात बताई. पहले तो सुपरिंटैंडिंग इंजीनियर गुस्से में एग्जीक्यूटिव इंजीनियर पर ही चढ़ पड़ा, फिर कुछ देर चुप्पी सी छाई रही. सब सोचने में लगे रहे कि अब क्या किया जाए? मंत्रीजी उद्घाटन के लिए पहुंचने वाले ही थे. तभी असिस्टैंट इंजीनियर को एक तरकीब सूझी. इसे उस ने दूसरे अफसरों के साथ साझा किया. यह सुनते ही सब के चेहरे खिल उठे और वे इस के लिए तुरंत राजी हो गए. पंडाल में जमा भीड़ में अचानक हलचल सी मच गई. कुछ लोग रोड की तरफ भाग रहे थे, तो कुछ अपनी जगह उचक कर देख रहे थे. शांत वातावरण को चीरते हुए सायरन की आवाज अब पंडाल तक रही थी. शायद मंत्रीजी का काफिला रोड के बिलकुल पास पहुंच चुका था.
पंडाल में मौजूद बड़े अफसर और उन के पार्टी के पदाधिकारी और नेता मंत्रीजी की अगवानी के लिए तेजतेज कदमों से रोड की तरफ जा रहे थे.

गाडि़यों के काफिले के बीच से एक सफेद चमचमाती हुई, लाल बत्ती वाली कार प्रकट हुई. उस में से झक सफेद कुरतापाजामा और काली नेहरूकट जैकेट पहने, आंखों पर काला चश्मा और गले में पार्टी का गमछा डाले, मंत्रीजी उतरे. वे किसी फिल्मी नेता से कम नहीं लग रहे थे. आते ही अफसरों और उन के पार्टी के नेताओं ने उन्हें घेर लिया और फूलमालाओं से इस कदर लाद दिया था कि चेहरे के अलावा और कुछ नजर नहीं रहा था. मंत्रीजी धीरेधीरे हाथ जोड़े मंच की ओर बढ़ रहे थे. पीछेपीछे स्थानीय नेता, पार्टी कार्यकर्ता, चेले और चमचे जोरजोर से नारे लगाते चल रहे थे, ‘जग्गू भैया जिंदाबाद. विकास पार्टी जिंदाबाद. अपना नेता कैसा हो, जग्गू भैया जैसा हो…’

मंच पर मंत्रीजी के लिए खास कुरसी मंगवाई गई थी, जिसे मंच के बीचोंबीच लगवाया गया था. मंत्रीजी सब का अभिवादन कर कुरसी पर बैठ गए. उन के दाएं तरफ ब्लौक प्रमुख, भूतपूर्व विधायक और फिर जिला स्तर के नेता बैठे थे. बाएं तरफ कमिश्नर, डीएम, चीफ इंजीनियर और बाकी ऊंचे सरकारी अफसर बैठे थे.
किंतु इस विधानसभा क्षेत्र के वर्तमान विधायक के लिए कुरसी, जो कि विपक्षी पार्टी लोक शक्ति से थे, मंच के एक कोने पर लगाई थी. विधायक अपनी कुरसी मंच एक कोने में देख कर भड़क उठे. इस क्षेत्र के वर्तमान विधायक की हैसियत से उन्हें उम्मीद थी कि उन की कुरसी भी मंच के बीच में मंत्रीजी के साथ लगाई जाएगी. इस को ले कर वे अफसरों से उलझ गए, पर कोई उन की बात सुनने को राजी नहीं था.

विरोध में वे मंच से नीचे उतर कर पंडाल में अपने कार्यकर्ताओं के साथ पीछे खड़े हो गए. पार्टी कार्यकर्ता उन के समर्थन में सरकार के खिलाफहायहायके नारे लगाने लगे. बड़ी मुश्किल से उन्हें चुप कराया गया.
जल निगम के चीफ इंजीनियर उठे और माइक पर जन समूह की ओर मुखातिब हो कर बोले, ‘‘भइयो और बहनो, जिस घड़ी का आप को बेसब्री इंतजार था वह गई है. माननीय मंत्रीजी के अथक प्रयास से आप के गांव तक पानी का नल गया है. मैं माननीय मंत्रीजी से अनुरोध करूंगा कि वे अपने हाथों से इस योजना का शुभारंभ करें.’’ सरकारी अफसर और पार्टी पदाधिकारी मंत्रीजी की अगवानी करते हुए उन्हें नल के पास ले गए. पूरे नल पोस्ट को फूलमालाओं से दुलहन की तरह सजाया गया था.

नल की पीतल की टोंटी सूरज की किरणों में सुनहरी रोशनी बिखेर रही थी. पास ही मेज पर करीने से मेजपोश बिछा कर उस पर एक तांबे का चमचमाता जग, गिलास और एक बड़े से टोकरे में बेसन के लड्डू रखे थे. मंत्रीजी ने नल की टोंटी घुमा कर जग में पानी भरा और लड्डू के साथ एक गिलास पानी पीने के लिए देवकी को दिया. पूरा पंडाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा. मंत्रीजी वापस मंच पर बैठ गए.
चीफ इंजीनियर ने फिर से मंत्रीजी से अनुरोध किया कि वे गांव वालों को आशीर्वाद के रूप में दो शब्द कहें. साथ ही उद्घोषणा की गई कि इस शुभारंभ की खुशी में सभी लोग लड्डू और नल का पानी ग्रहण करें. सभी लोगों को बारीबारी से एकएक  लड्डू और पीने के लिए पानी दिया जाने लगा. इस बीच नल की टोंटी खुली रही. लोग पीने के साथ साथ हाथ मुंह भी धोने लगे.

मंत्रीजी उबासी लेते हुए उठे. कुरते की सिलवटें ठीक की और धीरेधीरे माइक की तरफ बढ़े. एक नजर जन समूह पर डाली, फिर हाथ जोड़ कर सब का अभिवादन किया और बोलना शुरू  किया, ‘‘भाइयो और बहनो, 70 सालों में पिछली सरकारें जो नहीं कर पाईं, वह हमारी सरकार ने कर दिखाया. ऐसे दुर्गम क्षेत्र में भी हम ने घरघर नल पहुंचा दिया. ‘‘आज हमारे लिए बड़े सौभाग्य और खुशी का दिन है. ‘हर घर जल, हर घर नलका सपना अब पूरा हुआ. अब गांव वालों को खासकर औरतों, बच्चों और बूढ़ों को, पानी के लिए कोसों दूर नहीं जाना पड़ेगा. ‘‘भाइयो और बहनो, अगर आने वाले चुनाव में इस बार आप लोगों ने इस क्षेत्र से विकास पार्टी को भरी वोटों से जिताया, तो इसी तरह और भी बहुत सारी योजनाएं इस गांव के लिए लाऊंगा. आप का गांव प्रदेश में एक आदर्श और उत्कृष्ट गांव बन जाएगा.’’ लोगों का ध्यान भाषण ज्यादा लड्डू पर था. लोग लड्डू पाने की उम्मीद में धक्कामुक्की करने लगे. 2-3 आदमी भीड़ को कंट्रोल करने में लगे थे. लोग आतेजाते मुंहहाथ धोते, गिलास में पानी लेते और लड्डू खाते हुए निकल जाते.

लेकिन यह क्याअभी तकरीबन आधे लोग ही पानी के साथ लड्डू खा पाए होंगे कि अचानक नल से पानी आना बंद हो गया. मंत्रीजी ने घूर कर चीफ इंजीनियर की तरफ देखा मानो कह रहे हों, यह क्या बदतमीजी है. चीफ इंजीनियर ने इशारे से सुपरिंटैंडिंग इंजीनियर को बुलाया और कान में कुछ फुसफुसाया. सुपरिटैंडिंग इंजीनियर खड़े हुए और भीड़ को संबोधित करते हुए बोले, ‘‘आप सभी सब्र से काम लें. असल में पंपहाउस में बिजली चली गई है, इसलिए कुछ देर के लिए पानी रुक गया है. बिजली आते ही पानी आना शुरू हो जाएगा.’’ उधर एग्जीक्यूटिव इंजीनियर डर और घबराहट के मारे पसीनेपसीने हुए जा रहा था. वह जल्दी से मंच से नीचे उतरा और जूनियर इंजीनियर को फोन किया, ‘‘अबे, मरवाओगे क्यापानी क्यों बंद हो गया?’’ ‘‘सर, जहां से पानी पंप कर रहे हैं, वहां गाड़ी नहीं जा सकती. बड़ी मुश्किल से  500 लिटर का पानी का टैंक लोगों से भरवाया था. उस से ही हम पाइपलाइन में पानी पंप कर रहे थे.

लोगों ने टोंटी शायद खुली छोड़ दी होगी, इसलिए पानी अब खत्म हो गया है. अगर आप कहें फिर पानी भरवा दें. बहुत जल्दी भी करें तो करीब एक घंटा लग जाएगा.’’ ‘‘बेवकूफतुम्हारे बस का कुछ नहीं है. मैं असिस्टैंट इंजीनियर को भेज रहा हूं. उन का ही यह आइडिया था.’’ ‘‘आप का ही यह सुपर आइडिया था ? जाओ अब मुंह क्या ताक रहे होजा कर कुछ करो.’’ असिस्टैंट इंजीनियर चुपचाप उठा और चल दिया. आधा घंटा बीत गया पर पानी नहीं आया. लोगों के सब्र का बांध अब टूट चुका था. लोग हल्ला मचाने लगे. विपक्षी पार्टी के विधायक, नेता और पार्टी कार्यकर्ता ऐसे ही मौके की तलाश में थे. उन्होंने पीछे सेजग्गू भैया, हायहाय, विकास पार्टी मुरदाबादके नारे लगाने शुरू कर दिए. विपक्षी पार्टी का विधायक जोरजोर से भाषण देने लगा, ‘‘भाइयो, मैं पहले ही कहता था कि यह सरकार जनता के साथ धोखधड़ी कर ही है.

यह पानी का नल बस दिखावा है. देखो, आधे घंटे में ही पानी बंद हो गया . अब ऐसी पार्टी को आने वाले चुनाव में फिर से बाहर का रास्ता दिखाना है…’’ भीड़ में सब लोग इन के स्वर में स्वर मिला करहायहाय…’ करने लगे. देखते ही देखते भीड़ कंट्रोल से बाहर हो गई. मंत्री, चीफ इंजीनियर, कमिश्नर, डीएम ने भीड़ को शांत कराने की कोशिश की, पर नाकाम रहे. अब भीड़ भी विपक्षी पार्टी के भड़कावे में कर गालीगलौज पर उतर आई. इतने में ही कुछ शरारती लोगों ने पीछे से सड़े टमाटर और आलू मंच की ओर फेंकने शुरू कर दिए. पुलिस जितना भीड़ को कंट्रोल करने की कोशिश करती, वह उतना ही भड़काऊ होती जा रही थी. टमाटर और आलू के बाद लोगों ने अब टूटे जूते और चप्पलें उछालनी  शुरू कर दीं.
एक जूता मंत्रीजी के सिर पर कर  टकराया. फिर क्या था, मंत्रीजी की पार्टी के कार्यकर्ताओं का गुस्सा भी फूट पड़ा. पक्ष और विपक्ष पार्टी के लोग एकदूसरे पर टूट पड़े. पहले लातघूंसों से गुत्थमगुत्था हुए और फिर खूब लाठियां और डंडे चले.

भीड़ भी 2 खेमों में बंट गई, पक्ष और विपक्ष. जिस के हाथ जो लग रहा था उसे ले कर एकदूसरे पर बरसाने लगते. करीब एक घंटे तक यह सब चलता रहा. आखिर में हालात को बेकाबू होता देख कर डीएम ने लाठीचार्ज का आदेश दिया. दंगाई भीड़ पुलिस को लाठी भांजते देख कर चुपचाप गायब हो गईरह गए तो बस सीधेसादे गांव वाले, औरतें, बच्चे और बूढ़े. उन्हें पुलिस ने दौड़ादौड़ा कर खूब पीटा. मंत्रीजी को अफसर और पुलिस वाले चुपके से मंच के पीछे से दंगा होने से पहले ही खिसका कर ले गए और वे गाड़ी के काफिले के साथ राजधानी की तरफ रवाना हो चुके थे. दूसरे दिन के सभी लोकल और बड़े अखबारों की हैडलाइन थी किजल मंत्री के उद्घाटन समारोह में दंगा : 2 मारे गए ओर 10 गंभीर रूप से घायल’. सभी टीवी चैनल्स की भी ये ब्रेकिंग न्यूज थी. एंकर चिल्लाचिल्ला कर इस घटना को मिर्चमसाला लगा कर परोस रहे थे. सोशल मीडिया प्लेटफार्म भी इस घटना से भरे पड़े थे.

मंत्रीजी यह खबर देखते ही बौखला गए. तुरंत जल विभाग, बिजली विभाग और पुलिस विभाग के बड़े  अफसरों को अपने औफिस में तलब किया. शाम तक सभी विभागों के अफसर मंत्री के औफिस में हाजिर हो गए थे. आधी रात तक मैराथन मीटिंग चली. पूरे समय सभी विभाग के अफसर एकदूसरे पर बस आरोप लगाते रहे, पर असली वजह का कुछ भी पता नहीं चला. अब चूंकि कुछ तो एक्शन लेना ही था यानी किसी को तो बलि का बकरा बनाना ही था. तय हुआ कि जल विभाग और बिजली विभाग के जूनियर इंजीनियर और उस इलाके के दारोगा को तुरंत सस्पैंड किया जाए. लाइनमैन और पंप आपरेटर को नौकरी से बरखास्त कर दिया जाए, क्योंकि ये दोनों कौन्ट्रैक्ट पर थे. संबंधित एग्जीक्यूटिव इंजीनियर, सुपरिंटैंडिंग इंजीनियर और डीएसपी को कारण बताओ नोटिस दिया जाए. उस जिले के डीएम को आदेश दिया गया
कि घटना की निष्पक्ष जांच कर के एक महीने में रिपोर्ट दे.

विपक्षी दलों खासकर लोक शक्ति पार्टी ने इसे चुनावी मुद्दा बना कर  सरकार के खिलाफ मोरचा खोल दिया. जल मंत्री पर इस घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा देने के लिए दबाव बनाने लगे. उधर सरकार और  जल मंत्री ने इस घटना की पूरी  जिम्मेदारी लोक शक्ति पार्टी के विधायक पर थोप दी.
सरकार का आरोप था कि लोक शक्ति पार्टी के विधायक और नेताओं ने ही लोगों को उपद्रव करने के लिए उकसाया, पर पक्के सुबूतों की कमी में अभी तक गिरफ्तारी नहीं हुई थी. वैसे भी कहीं इस का चुनाव पर उलटा असर पड़ जाए, यह सोच कर कुछ समय के लिए टाल दिया गया. हर चुनावी सभा में इस मुद्दे पर दोनों पार्टियां ने एकदूसरे पर खूब कीचड़ उछाला. चुनाव में सब से ज्यादा सीटें विकास पार्टी को ही मिली थीं और उस ने जोड़तोड़ कर किसी तरह फिर से सरकार बना ली, पर इस घटना की वजह से उसे इस विधानसभा क्षेत्र से फिर से हार का सामना करना पड़ा.

मंत्रीजी के मीटिंग से वापस आते हीअफसरों ने पहला काम दोनों जूनियर इंजीनियर और इलाके के दारोगा को सस्पैंड करने और लाइनमैन और पंप आपरेटर को बरखास्त करने का किया, क्योंकि यही काम सब से आसान था. जल विभाग के जूनियर इंजीनियर और दारोगा को तो इस की उम्मीद ही थी इसलिए उन्होंने चुपचाप सस्पैंशन लैटर ले लिया. पर बिजली विभाग के जूनियर इंजीनियर के लिए यह आदेश हैरान कर देने वाला था, इसलिए वह मिमियाने लगा, ‘‘सर, यह क्यामुझे सस्पैंशन लैटर क्यों दिया जा रहा है? आखिर मेरा कुसूर क्या है?’’
‘‘जल विभाग का कहना कि जब मंत्रीजी नल का उद्घाटन कर रहे थे तो तुम ने उस इलाके की बिजली काट दी जिस से पानी का पंप चलना बंद हो गया और नल में पानी आना भी बंद हो गया,’’ सस्पैंशन लैटर देने वाले अफसर ने समझाया.
‘‘नहीं सर, यह एकदम झूठ है. आप इलाके में किसी से भी पूछ सकते हैं. उस समय कोई बिजली कटौती नहीं की गई थी,’’ जूनियर इंजीनियर ने बताया.

‘‘देखो भई, यह सच है या झूठ, यह तो इन्कवायरी के बाद ही पता चलेगा. ऊपर से आदेश है तो हमें पालन करना ही पड़ेगा. वैसे भी सस्पैंशन से कोई नौकरी थोड़े ही जा रही है… 2-3 महीने घर पर आराम करो, फिर सस्पैंशन वापस ले लेंगे, वह भी बैक डेट से और सारी सैलरी भी मिल जाएगी एरियर के साथ,’’ अफसर ने जूनियर इंजीनियर को दिलासा देते हुए कहा. बरखास्तगी का आदेश सुन कर लाइनमैन और पंप आपरेटर भी हाथ जोड़ के गिड़गिड़ाने लगे, ‘साहब, नौकरी से मत निकालिए. बड़ी मुश्किल से जुगाड़ लगा कर यह नौकरी मिली थी.’ ‘‘तुम्हारा दर्द हम समझते है भाई, पर क्या करें, मजबूर हैं. ऊपर से ऐसा ही आदेश है. अभी जाओ. तुम लोगों के बारे में भी कुछ सोचेंगे,’’ अफसर ने दोनों को समझाते हुए घर वापस भेज दिया. जब से पता चला कि डीएम को घटना की जांच के आदेश दिए गए हैं, जल, बिजली और पुलिस विभाग के बड़े अफसर डीएम के इर्दगिर्द चक्कर काटने लगे ताकि जांच की आंच उन तक पाए.

यहां तक कि जल निगम के सुपरिंटैंडिंग इंजीनियर ने तो बर्थडे के बहाने अपने घर पर पार्टी का इंतजाम भी तक कर डाला. इस में डीएम और बाकी बड़े अफसरों को भी बुलाया गया. सब लोग डीएम से मिन्नतें करने लगे कि वे जांच की गोलमोल रिपोर्ट बनाएं, ताकि किसी बड़े अफसर पर गाज गिरे. भला डीएम भी नमक खा कर नमकहलाली कैसे करता. उस ने जानबूझ कर रिपोर्ट सौंपने में देरी की, ताकि तक लोग इस घटना के बारे में भूल जाएं. अब तक टीवी चैनल और सोशल मीडिया भी ठंडे पड़ चुके थे. डीएम ने पूरी घटना की जिम्मेदारी विपक्षी लोक शक्ति पार्टी के विधायक और नेताओं पर डाल दी और बाकी विभागों की भूमिका के बराबर बताई. रिपोर्ट भी तय समय एक महीने के बजाय 3 महीने में इस टिप्पणी के साथ भेजी गई किप्राकृतिक आपदा के काम में व्यस्तता की वजह से समय नहीं मिला’. रिपोर्ट जल विभाग के सचिवालय में कई महीनों तक यों ही ठंडे बस्ते में पड़ी रही. खानापूरी हो गई थी बस, अब किसी को इस से कोई मतलब था. इस तरह  और 6 महीने कट गए.

इस बीच गांव वालों ने इस घटना पर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं होने पर आवाज उठानी शुरू कर दी. विपक्षी दलों को भी सरकार को घेरने का अच्छा मुद्दा मिल गया और उन के नेताओं ने तो आग में घी काम किया. मुद्दा एक बार फिर से गरमा गया. आननफानन में सरकार को रिपोर्ट सार्वजनिक करनी पड़ी.
रिपोर्ट पढ़ कर विपक्षी दल खासकरलोक शक्ति पार्टीके नेता और कार्यकर्ता भड़क उठे. वे उस इलाके के गांव वालों को ले कर सड़कों पर उतर आए. उन का कहना था कि रिपोर्ट झूठी है. सरकार घटना की सीबीआई से जांच करवाए. जल निगम के सभी कुसूरवार अफसरों को बरखास्त कर उन पर मुकदमा चलाया जाए और जल मंत्री तुरंत इस्तीफा दे. फिर से यह मुद्दा देशप्रदेश में सुर्खियों में छाने लगा. प्रदेश के दूसरे हिस्सों से भी लोग इस आंदोलन में जुड़ने लगे. पानी सिर के ऊपर से गुजरता देख कर, सरकार ने इस घटना की जांच के लिए हाईकोर्ट के एक रिटायर्ड जस्टिस की अध्यक्षता में एक हाई लैवल कमेटी बना दी, जिस को 6 महीने में अपनी रिपोर्ट देनी थी.

वैसे, विपक्षी दल सीबीआई से जांच की मांग पर अड़े हुए थे. इस घटना को बीते पूरे 2 साल हो चुके थे. कुसूरवार लोगों पर कार्रवाई तो दूर अभी तक हाई लैवल कमेटी की जांच रिपोर्ट भी सार्वजनिक नहीं हुई थी. गांव वाले जब भी जल निगम के अफसरों से पूछते है कि उन के घर पर लगे नल में पानी कब आएगा? तो उन का सपाट से जवाब होता है, ‘‘अभी जांच चल रही है. जब जांच पूरी हो जाएगी तब पानी भी जाएगा.’’ देवकी के आंगन में फिर से बड़ीबड़ी घास और झाडि़यां उग आई हैं. पीतल की टोंटी कोई खोल के ले गया, शायद जल निगम के मुलाजिम ही ले गए होंगे. नल का स्टैंड पोस्ट टूट चुका है. देवकी रोज सवेरे जमीन पर पड़े नल को इस उम्मीद से देखती है कि शायद कभी पानी जाए, फिर निराश हो कर गगरी लिए पानी की तलाश में दूर निकाल जाती है.                           
दिनेश चंद्र कबडाल

 

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