बदलाव: भाग 3

अवधेश सिंह के 2 बेटे थे. दोनों ही शादीशुदा थे. गांव में खेतीकिसानी करते थे. बेटों ने दूसरी शादी का विरोध किया, तो उस ने उन से रिश्ता ही तोड़ लिया. दरअसल, अवधेश सिंह औरत के बिना नहीं रह सकता था. वह वासना का भेडि़या था. भोलीभाली और गरीब लड़कियों को बहलाफुसला कर वह अपने घर लाता था, फिर तरहतरह का लोभ दिखा कर उन के साथ मनमानी करता था.

अवधेश सिंह सुबहसवेरे कभीकभी गंगा स्नान के लिए भी जाता था. उस दिन सुबह 8 बजे गए, तो उर्मिला पर उस की नजर चली गई. वह समझ गया कि उर्मिला कहीं दूर देहात की है. वह उस के चाल में जल्दी आ जाएगी.

वह उसे अपने घर ले जाने में कामयाब भी हो गया. अवधेश सिंह उर्मिला को निहायत ही भोलीभाली समझता था, पर वह उस की चालाकी समझ नहीं पाया. उसे लगा कि वह उर्मिला की बात मान लेगा, तो वह राजीखुशी उस का बिस्तर गरम कर देगी. फिर तो वह उर्मिला का दिल जीतने के लिए जीतोड़ कोशिश करने लगा. उस की हर जरूरत पर ध्यान देने लगा. महंगे से महंगा गिफ्ट भी वह उसे देने लगा.

इस तरह 10 दिन और बीत गए. इस बीच उर्मिला को राधेश्याम की कोई खबर नहीं मिली. उस के बाद एक दिन अचानक उर्मिला ने पति राधेश्याम को छोड़ अवधेश सिंह के साथ एक नई जिंदगी की शुरुआत करने का फैसला किया. हुआ यह कि एक दिन अवधेश सिंह दफ्तर से लौट कर रात में घर आया. उस समय रतन सो चुका था. आते ही उस ने उर्मिला को अपने कमरे में बुलाया. उर्मिला कमरे में आई, तो अवधेश सिंह ने झट से दरवाजा बंद कर दिया.

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वह उर्मिला से बोला, ‘‘तुम मान जाओगी, तो जो कुछ कहोगी, वह सबकुछ करूंगा. तुम चाहोगी तो तुम से शादी भी कर सकता हूं.’’ उर्मिला उलझन में पड़ गई. बेशक, वह गांव से पति की तलाश में निकली थी, मगर शहरी चकाचौंध ने पति से उस का मोह भंग कर दिया था. अब वह गांव की नहीं, शहरी जिंदगी जीना चाहती थी.

अवधेश सिंह के प्रस्ताव पर वह यह सोचने लगी कि उस का पति मिल भी गया तो क्या वह अवधेश सिंह की तरह ऐशोआराम की जिंदगी दे पाएगा? अवधेश सिंह की उम्र भले ही उस से ज्यादा थी, मगर उस के पास दौलत की कमी नहीं थी. उस ने अवधेश सिंह का प्रस्ताव स्वीकार करने का फैसला किया.

अवधेश सिंह अपनी बात से मुकर न जाए, इसलिए उर्मिला ने लिखवा लिया कि वह उस से शादी करेगा. उस के बाद उर्मिला ने अपनेआप को उस के हवाले कर दिया. उर्मिला को पा कर अवधेश सिंह की खुशी का ठिकाना न रहा. उस ने अगले हफ्ते ही उस से शादी करने का फैसला किया.

उर्मिला भी जल्दी से जल्दी अवधेश सिंह से शादी कर लेना चाहती थी. 2 दिन बाद ही उस ने अपने भाई रतन को गांव जाने वाली ट्रेन में बिठा दिया. उस से कह दिया कि वह गांव लौट कर नहीं जाएगी. अवधेश सिंह के साथ शहर में ही रहेगी. शादी के 2 दिन बाकी थे, तो अचानक राधेश्याम के रूममेट राघव के फोन पर उर्मिला को बताया कि गणपत गांव से आ गया है.

उर्मिला हर हाल में अवधेश सिंह से शादी करना चाहती थी, इसलिए वह राधेश्याम का पता लगाने नहीं गई. तय समय पर उस ने अवधेश सिंह से शादी कर ली. एक महीने बाद अवधेश सिंह की गैरहाजिरी में राधेश्याम उर्मिला से मिला. ‘‘कहां थे इतने दिन…?’’ उर्मिला ने पूछा.

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‘‘गांव से आने के बाद मैं एक अमीर विधवा औरत के प्रेमजाल में फंस गया था. अब मैं उस के साथ नहीं रहना चाहता.

‘‘गणपत से मुझे जैसे ही पता चला कि तुम अवधेश सिंह के घर पर हो, मैं यहां चला आया. अब मैं तुम्हारे साथ गांव लौट जाना चाहता हूं.’’

‘‘आप ने आने में बहुत देर कर दी. मैं ने अवधेश सिंह से शादी कर ली है. अब मैं आप के साथ नहीं जा सकती.’’ राधेश्याम सबकुछ समझ गया. उस ने उर्मिला से फिर कुछ नहीं कहा और चुपचाप वहां से लौट गया.

Valentine’s Special: यह कैसा प्यार- क्या हो पाई शिवानी और नितिन की शादी?

आज मैं ने वह सब देखा जिसे देखने की मैं कल्पना भी नहीं कर सकती थी. कालिज से घर लौटते समय मुझे डैडी अपनी कार में एक बेहद खूबसूरत औरत के साथ बैठे दिखाई दिए. जिस अंदाज में वह औरत डैडी से बात कर रही थी, उसे देख कर कोई भी अंदाजा लगा सकता था कि वह डैडी के बेहद करीब थी.

10 साल पहले जब मेरी मां की मृत्यु हुई थी तब सारे रिश्तेदारों ने डैडी को दूसरा विवाह करने की सलाह दी थी लेकिन डैडी ने सख्ती से मना करते हुए कहा था कि मैं अपनी बेटी शिवानी के लिए दूसरी मां किसी भी सूरत में नहीं लाऊंगा और डैडी अपने वादे पर अब तक कायम रहे थे, लेकिन आज अचानक ऐसा क्या हो गया, जो वह एक औरत के करीब हो कर मेरे वजूद को उपेक्षा की गरम सलाखों से भेद रहे थे.

मुझे अच्छी तरह  से याद है कि मम्मी और डैडी के बीच कभी नहीं बनी थी. मम्मी के खानदान के मुकाबले में डैडी के खानदान की हैसियत कम थी, इसलिए मम्मी बातबात पर अपनी अमीरी के किस्से बयान कर के डैडी को मानसिक पीड़ा पहुंचाया करती थीं. मेरी समझ में आज तक यह बात नहीं आई कि जब डैडी और मम्मी के विचार आपस में मिलते नहीं थे तब डैडी ने उन्हें अपनी जीवनसंगिनी क्यों बनाया था.

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कालिज से घर आते ही काकी मां ने मुझ से चाय के लिए पूछा तो मैं उन्हें मना कर अपने कमरे मेें आ गई और अपने आंसुओं से तकिए को भिगोने लगी.

5 बजे के आसपास डैडी का फोन आया तो मैं अपने गुस्से पर जबरन काबू पाते हुए बोली, ‘‘डैडी, इस वक्त आप कहां हैं?’’

‘‘बेटे, इस वक्त मैं अपनी कार ड्राइव कर रहा हूं,’’ डैडी बडे़ प्यार से बोले.

‘‘आप के साथ कोई और भी है?’’ मैं ने शक भरे अंदाज में पूछा.

‘‘अरे, तुम्हें कैसे पता चला कि इस समय मेरे साथ कोई और भी है. क्या तुम्हें फोन पर किसी की खुशबू आ गई?’’ डैडी हंसते हुए बोले.

‘‘हां, मैं आप की इकलौती बेटी हूं, इसलिए मुझे आप के बारे में सब पता चल जाता है. बताइए, कौन है आप के साथ?’’

‘‘देखा तुम ने अरुणिमा, मेरी बेटी मेरे बारे मेें हर खबर रखती है.’’

मुझे समझते देर नहीं लगी कि डैडी के साथ कार में बैठी औरत का नाम अरुणिमा है.

‘‘जनाब, यहां आप गलत फरमा रहे हैं,’’ डैडी के मोबाइल से मुझे एक औरत की खनकती आवाज सुनाई दी, ‘‘अब वह आप की नहीं, मेरी भी बेटी है.’’

उस औरत का यह जुमला जहरीले तीर की तरह मेरे सीने में लगा. एकाएक मेरे दिमाग की नसें तनने लगीं और मेरा जी चाहा कि मैं सारी दुनिया को आग लगा दूं.

‘‘शिवानी बेटे, तुम लाइन पर तो हो न?’’ मुझे डैडी का बेफिक्री से भरा स्वर सुनाई दिया.

‘‘हां,’’ मैं बेजान स्वर में बोली, ‘‘डैडी, यह सब क्या हो रहा है? आप के साथ कौन है?’’

‘‘बेटे, मैं तुम्हें घर आ कर सब बताता हूं,’’ इसी के साथ डैडी ने फोन काट दिया और मैं सोचती रह गई कि यह अरुणिमा कौन है? यह डैडी के जीवन में कब और कैसे आ गई?

डैडी और अरुणिमा के बारे में सोचतेसोचते कब मेरी आंख लग गई, मुझे पता ही नहीं चला.

7 बजे शाम को काकी मां ने मुझे उठाया और चिंतित स्वर में बोलीं, ‘‘बेटी शिवानी, क्या बात है? आज तुम ने चाय नहीं पी. तुम्हारी तबीयत तो ठीक है न?’’

‘‘काकी मां, मेरी तबीयत ठीक है. डैडी आ गए?’’ मैं ने पूछा.

‘‘हां, और वह तुम्हें बुला रहे हैं. उन्होंने कहा है कि तुम अच्छी तरह से तैयार हो कर आना,’’ इतना कह      कर काकी मां कमरे से बाहर निकल गईं.

थोड़ी देर बाद मैं ड्राइंगरूम में आई तो मुझे सोफे पर वही औरत बैठी दिखाई दी जिसे आज मैं ने डैडी के साथ उन की कार में देखा था.

‘‘अरु, यह है मेरी बेटी, शिवानी,’’ डैडी उस औरत से मेरा परिचय कराते हुए बोले.

न चाहते हुए भी मेरे हाथ नमस्कार करने की मुद्रा में जुड़ गए.

‘‘जीती रहो,’’ वह खुद ही उठ कर मेरे करीब आ गईं और फिर मेरा चेहरा अपने हाथों में ले कर उन्होंने मेरे माथे पर एक प्यारा चुंबन अंकित कर दिया.

‘‘अगर मेरी कोई बेटी होती तो वह बिलकुल तुम्हारे जैसी होती. सच में तुम बहुत प्यारी हो.’’

‘‘अरु, यह भी तो तुम्हारी बेटी है,’’ डैडी हंसते हुए बोले.

डैडी के ये शब्द पिघले सीसे की तरह मेरे कानों में उतरते चले गए. मेरा जी चाहा कि मैं अपने कमरे में जाऊं और खूब फूटफूट कर रोऊं. आखिर डैडी ने मेरे विश्वास का खून जो किया था.

‘‘बेटी, तुम करती क्या हो?’’  अरुणिमाजी ने मुझे अपने साथ बैठाते हुए पूछा.

उस वक्त मेरी हालत बड़ी अजीब सी थी. जिस औरत से मुझे नफरत करनी चाहिए थी वह औरत मेरे वजूद पर अपने आप छाती जा रही थी.

मैं उन्हें अपनी पढ़ाई के बारे में बताने लगी. हम दोनों के बीच बहुत देर तक बातें हुईं.

‘‘काकी मां, देखो तो कौन आया है?’’ डैडी ने काकी मां को आवाज दी.

‘‘मैं जानती हूं, कौन आया है,’’ काकी मां ने वहां चाय की ट्राली के साथ कदम रखा.

‘‘अरे, काकी मां आप,’’  अरुणिमा उन्हें देखते ही खड़ी हो गईं.

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चाय की ट्राली मेज पर रख कर काकी मां उन की तरफ बढ़ीं. फिर दोनों प्यार से गले मिलीं तो मैं दोनों को उलझन भरी निगाहों से देखने लगी.

अरुणिमा का इस घर से पूर्व में गहरा संबंध था, यह बात तो मैं समझ गई थी, लेकिन कोई सिरा मेरे हाथों में नहीं आ रहा था.

‘‘काकी मां, आप इन्हें जानती हैं?’’ मैं ने हैरत भरे स्वर में काकी मां से पूछा.

काकी मां के बोलने से पहले ही डैडी बोल पड़े, ‘‘बेटी, अरुणिमाजी का इस घर से गहरा संबंध रहा है. हम दोनों एक ही स्कूल और एक ही कालिज में पढ़े हैं.’’

तभी अरुणिमाजी ने डैडी को इशारा किया तो डैडी ने फौरन अपनी बात पलटी और सब को चाय पीने के लिए कहने लगे.

अब मेरी समझ में कुछकुछ आने लगा था कि मम्मीडैडी के बीच ऐसा क्या था जो वे एकदूसरे से बात करना तो दूर, देखना तक पसंद नहीं करते थे. निसंदेह डैडी शादी से पहले इसी अरुणिमाजी से प्यार करते थे.

चाय पीने के दौरान मैं ने अरुणिमाजी से काफी बातें कीं. वह बहुत जहीन थीं. वह हर विषय पर खुल कर बोल सकती थीं. उन की नालेज को देख कर मेरी उन के प्रति कुछ देर पहले जमी नफरत की बर्फ तेजी से पिघलने लगी.

उन की बातों से मुझे यह भी पता चला कि वह एक प्रोफेसर थीं. कुछ साल पहले उन के पति का देहांत हो गया था. उन का अपना कहने को इकलौता बेटा नितिन था, जो बिजनेस के सिलसिले में कुछ दिनों के लिए लंदन गया हुआ था.

रात का डिनर करने के बाद जब अरुणिमा गईं तो मैं अपने कमरे में आ गई. मैं ने कहीं पढ़ा था कि कुछ औरतों की भृकुटियों में संसार भर की राजनीति की लिपि होती है, जब उन की पलकें झुक जाती हैं तो न जाने कितने सिंहासन उठ जाते हैं और जब उन की पलकें उठती हैं तो न जाने कितने राजवंश गौरव से गिर जाते हैं.

अरुणिमाजी भी शायद उन्हीं औरतों में एक थीं, तभी डैडी ने दूसरी शादी न करने की जो कसम खाई थी, उसे आज वह तोड़ने के लिए हरगिज तैयार नहीं होते. मैं बिलकुल नहीं चाहती कि इस उम्र में डैडी अरुणिमाजी से शादी कर के दीनदुनिया की नजरों में उपहास का पात्र बनें.

सुबह टेलीफोन की घंटी से मेरी आंख खुली. मैं ने फोन उठाया तो मुझे अरुणिमाजी की मधुर आवाज सुनाई दी. ‘‘स्वीट बेबी, मैं ने तुम्हें डिस्टर्ब तो नहीं किया?’’

‘‘नहीं, आंटीजी,’’ मैं जरा संभल कर बोली, ‘‘आज मेरे कालिज की छुट्टी थी, इसलिए मैं देर तक सोने का मजा लेना चाह रही थी.’’

‘‘इस का मतलब मैं ने तुम्हारी नींद में खलल डाला. सौरी, बेटे.’’

‘‘नहीं, आंटीजी, ऐसी कोई बात नहीं है. कहिए, कैसे याद किया?’’

‘‘आज तुम्हारी छुट्टी है. तुम मेरे घर आ जाओ. हम खूब बातें करेंगे. सच कहूं तो बेटे, कल तुम से बात कर के बहुत अच्छा लगा था.’’

‘‘लेकिन आंटी, डैडी की इजाजत के बिना…’’ मैं ने अपना वाक्य जानबूझ कर अधूरा छोड़ दिया.

‘‘तुम्हारे डैडी से मैं बात कर लूंगी,’’ वह बडे़ हक से बोली, ‘‘वह मना नहीं करेंगे.’’

उस पल जेहन में एक ही सवाल परेशान कर रहा था कि जिस से मुझे बेहद नफरत होनी चाहिए, मैं धीरेधीरे उस के करीब क्यों होती जा रही हूं?

1 घंटे बाद मैं अरुणिमाजी के सामने थी. उन्होंने पहले तो मुझे गले लगाया, फिर बड़े प्यार से सोफे पर बैठाया. इस के बाद वह मेरे लिए नाश्ता बना कर लाईं. नाश्ते के दौरान मैं ने उन से पूछा, ‘‘आंटी, मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि आप से मिले हुए मुझे अभी सिर्फ 1 दिन हुआ है. सच कहूं तो मैं कल से सिर्फ आप के बारे में ही सोचे जा रही हूं. अगर आप मुझे पहले मिल जातीं तो कितना अच्छा होता,’’ यह कह कर मैं उन के घर को देखने लगी.

उन का सलीका और हुनर ड्राइंग रूम से बैडरूम तक हर जगह दिखाई दे रहा था. हर चीज करीने से रखी हुई थी. उन का घर इतना साफसुथरा और खूबसूरत था कि वह मुझे मुहब्बतों का आईना जान पड़ा.

उन के सलीके और हुनर को देख कर मेरे दिल में एक हूक सी उठ रही थी. मैं सोच रही थी कि काश, उन के जैसी मेरी मां होतीं. तभी मेरी आंखों के सामने मेरी मम्मी का चेहरा घूम गया. मेरी मम्मी एक मगरूर औरत थीं, उन्होंने अपनी जिंदगी का ज्यादातर वक्त डैडी से लड़ते हुए बिताया था.

मेरी मम्मी ने बेशक मेरे डैडी के शरीर पर कब्जा कर लिया था, लेकिन वह उन के दिल में जगह नहीं बना पाई थीं, जोकि एक स्त्री अपने पति के दिल में बनाती है.

अब अरुणिमाजी की जिंदगी एक खुली किताब की तरह मेरे सामने आ गई थी. उन के दिल के किसी कोने में मेरे डैडी के लिए जगह जरूर थी. लेकिन उन्होंने डैडी से शादी क्यों नहीं की थी, यह बात मेरी समझ से बाहर थी.

शाम होते ही डैडी मुझे लेने आ गए. रास्ते में मैं ने उन से पूछा, ‘‘डैडी, अगर आप बुरा न मानें तो मैं आप से एक बात पूछ सकती हूं?’’

डैडी ने बड़ी हैरानी से मुझे देखा, फिर आहत भाव से बोले, ‘‘बेटे, मैं ने आज तक  तुम्हारी किसी बात का बुरा माना है, जो आज तुम ऐसी बात कह रही हो. तुम जो पूछना चाहती हो पूछ सकती हो. मैं तुम्हारी किसी बात का बुरा नहीं मानूंगा.’’

‘‘आप अरुणिमाजी से प्यार करते हैं न?’’ मैं ने बिना किसी भूमिका के कहा.

डैडी पहले काफी देर तक चुप रहे फिर एक गहरी सांस छोड़ते हुए बोले, ‘‘यह सच है कि एक वक्त था जब हम दोनों एकदूसरे को हद से ज्यादा चाहते थे और हमेशा के लिए एकदूसरे का होने का फैसला कर चुके थे.’’

‘‘ऐसी बात थी तो आप ने एकदूसरे से शादी क्यों नहीं की?’’

‘‘क्योंकि तुम्हारे दादा ने मुझे अरुणिमा से शादी करने से मना किया था. तब मैं ने अपने मांबाप की मर्जी के बिना घर से भाग कर अरुणिमा से शादी करने का फैसला किया, लेकिन उस वक्त अरुणिमा ने मेरा साथ नहीं दिया था. तब उस का यही कहना था कि हमारे मांबाप के हम पर बहुत एहसान हैं, हमें उन के एहसानों का सिला उन के अरमानों का खून कर के नहीं देना चाहिए. उन की खुशियों के लिए हमें अपने प्यार का बलिदान करना पडे़गा.

‘‘मैं ने तब अरुणिमा को काफी समझाया, लेकिन वह नहीं मानी. इसलिए हमें एकदूसरे की जिंदगी से दूर जाना पड़ा. कुछ दिन पहले वह मुझे एक पार्टी में नहीं मिलती तो मैं उसे तुम्हारी मम्मी कभी नहीं बना पाता. आज की तारीख में उस का एक ही लड़का है, जिसे अरुणिमा के तुम्हारी मम्मी बनने से कोई एतराज नहीं है.’’

‘‘लेकिन डैडी, मुझे एतराज है,’’ मैं कड़े स्वर में बोली.

‘‘क्यों?’’ डैडी की भवें तन उठीं.

‘‘क्योंकि मैं नहीं चाहती कि आप की जगहंसाई हो.’’

‘‘मुझे किसी की परवा नहीं है,’’ डैडी सख्ती से बोले, ‘‘तुम्हें मेरा कहा मानना ही होगा. तुम अपने को दिमागी तौर पर तैयार कर लो. कुछ ही दिनों में वह तुम्हारी मम्मी बनने जा रही है.’’

उस वक्त मुझे अपने डैडी एक इनसान न लग कर एक हैवान लगे थे, जो दूसरों की इच्छाओं को अपने नुकीले नाखूनों से नोंचनोंच कर तारतार कर देता है.

2 दिन पहले ही अरुणिमाजी का इकलौता बेटा नितिन लंदन से वापस लौटा तो उन्होंने उस से सब से पहले मुझे मिलाया. नितिन के बारे में मैं केवल इतना ही कहूंगी कि वह मेरे सपनों का राजकुमार है. मैं ने अपने जीवन साथी की जो कल्पना की थी वह हूबहू नितिन जैसा ही था.

कितनी अजीब बात है, जिस बाप को शादी की उम्र की दहलीज पर खड़ी अपनी औलाद के हाथ पीले करने के बारे में सोचना चाहिए वह बाप अपने स्वार्थ के लिए अपनी औलाद की खुशियों का खून कर के अपने सिर पर सेहरा बांधने की सोच रहा है.

आज अरुणिमाजी खरीदारी के लिए मुझे अपने साथ ले गई थीं. मैं उन के साथ नहीं जाना चाहती थी, लेकिन डैडी के कहने पर मुझे उन के साथ जाना पड़ा. शौपिंग के दौरान जब अरुणिमाजी ने एक नई नवेली दुलहन के कपड़े और जेवर खरीदे, तो मुझे उन से भी नफरत होने लगी थी.

मैं ने मन ही मन निश्चय कर अपनी डायरी में लिख दिया कि जिस दिन डैडी अपने माथे पर सेहरा बांधेंगे, उसी दिन इस घर से मेरी अर्थी उठेगी.

आज मुझे अपने नसीब पर रोना आ रहा है और हंसना भी. रोना इस बात पर आ रहा है कि जो मैं ने सोचा था वह हुआ नहीं और जो मैं ने नहीं सोचा था वह हो गया.

यह बात मुझे पता चल गई थी कि डैडी को अरुणिमा आंटी को मेरी मां बनाने का फैसला आगे आने वाले दिन 28 नवंबर को करना था और यह विवाह बहुत सादगी से गिनेचुने लोगों के बीच ही होना था.

28 नवंबर को सुबह होते ही मैं ने खुदकुशी करने की पूरी तैयारी कर ली थी. मैं ने सोच लिया था कि डैडी जैसे ही अरुणिमा आंटी के साथ सात फेरे लेंगे, वैसे ही मैं अपने कमरे में आ कर पंखे से लटक कर फांसी लगा लूंगी.

दोपहर को जब मैं अपने कमरे में मायूस बैठी थी तभी काकी मां ने कुछ सामान के साथ वहां कदम रखा और धीमे स्वर में बोलीं, ‘‘ये कपड़े तुम्हारे डैडी की पसंद के हैं, जोकि उन्होंने अरुणिमा बेटी से खरीदवाए थे. उन्होंने कहा है कि तुम जल्दी से ये कपड़े पहन कर नीचे आ जाओ.’’

मैं काकी मां से कुछ पूछ पाती उस से पहले वह कमरे से बाहर निकल गईं और कुछ लड़कियां मेरे कमरे में आ कर मुझे संवारने लगीं.

थोड़ी देर बाद मैं ने ड्राइंगरूम में कदम रखा तो वहां काफी मेहमान बैठे थे. मेहमानों की गहमागहमी देख कर मेरी समझ में कुछ नहीं आया.

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मैं सोफे पर बैठी ही थी कि वहां अरुणिमाजी आ गईं. उन के साथ नितिन नहीं आया था.

‘‘शिशिर, हमें इजाजत है?’’ उन्होंने डैडी से पूछा.

‘‘हां, हां, क्यों नहीं, यह रही तुम्हारी अमानत. इसे संभाल कर रखिएगा,’’  डैडी भावुक स्वर में बोले.

तभी वहां नितिन ने कदम रखा, जो दूल्हा बना हुआ था. मेरा सिर घूम गया. मैं ने उलझन भरी निगाहों से डैडी की तरफ देखा तो वह मेरे करीब आ कर बोले, ‘‘मैं ने तुम से कहा था न कि मैं अरुणिमा आंटी को तुम्हारी मम्मी बनाऊंगा. आज से अरुणिमा आंटी तुम्हारी मम्मी हैं. इन्हें हमेशा खुश रखना.’’ एकाएक मेरी रुलाई फूट पड़ी. मैं डैडी के गले लग गई और फूटफूट कर रोने लगी. इस के बाद पवित्र अग्नि के सात फेरे ले कर मैं नितिन की हमसफर और अरुणिमाजी की बेटी बन गई.

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Valentine’s Special: अनाम रिश्ता- कैसा था नेहा और अनिरुद्ध का रिश्ता

आज मेरे लिए बहुत ही खुशी का दिन है क्योंकि विश्वविद्यालय ने 15 वर्षों तक निस्वार्थ और लगनपूर्वक की गई मेरी सेवा के परिणामस्वरूप मुझे कालेज का प्रिंसिपल बनाने का निर्णय लिया था. आज शाम को ही पदग्रहण समारोह होने वाला है. परंतु न जाने क्यों रहरह कर मेरा मन बहुत ही उद्विग्न हो रहा है. ‘अभी तो सिर्फ 9 बजे हैं और ड्राइवर 2 बजे तक आएगा. तब तक मैं क्या करूं…’ मैं मन ही मन बुदबुदाई और रसोई की ओर चल दी. सोचा कौफी पी लूं, क्या पता तब मन को कुछ राहत मिले.

कौफी का मग हाथ में ले कर जैसे ही मैं सोफे पर बैठी, हमेशा की तरह मुझे कुछ पढ़ने की तलब हुई. मेज पर कई पत्रिकाएं रखी हुई थीं. लेकिन मेरा मन तो आज कुछ और ही पढ़ना चाह रहा था. मैं ने यंत्रवत उठ कर अपनी किताबों की अलमारी खोली और वह किताब निकाली जिसे मैं अनगिनत बार पढ़ चुकी हूं.

जब भी मैं इस किताब को हाथ में लेती हूं, एक अलग ही एहसास होता है मुझे, मन को अपार सुख व शांति मिलती है. ‘आप मेरी जिंदगी में गुजरे हुए वक्त की तरह हैं सर, जो कभी लौट कर नहीं आ सकता. लेकिन मेरी हर सांस के साथ आप का एहसास डूबताउतरता रहता है,’ अनायास ही मेरे मुंह से अल्फाज निकल पड़े और मैं डूबने लगी 30 वर्ष पीछे अतीत की गहराइयों में जब मैं परिस्थितियों की मारी एक मजबूर लड़की थी, जो अपने साए तक से डरती थी कि कहीं मेरा यह साया किसी को बरबाद न कर दे.

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जन्म लेते ही मां को खा जाने वाला इलजाम मेरे माथे पर लेबल की तरह चिपका दिया गया था. पिताजी ने भी कभी मुझे अपनी बेटी नहीं माना. उन्होंने तो कभी मुझ से परायों जैसा भी बरताव नहीं किया. मुझे इंसान नहीं, एक बोझ समझा. मैं अपने पिताजी के साथ अकेली ही इस घर में रहती थी, क्योंकि मुझे पालने वाले चाचाचाची इस दुनिया से चले गए थे. और मैं तो अभी 8वीं में पढ़ने वाली 13 साल की बच्ची थी. फिर भला मैं कहां जाती. मैं घर में पिताजी के साथ एक अनचाहे मेहमान की तरह रहती थी, लेकिन घर के नौकरचाकर मुझ से बहुत प्यार करते थे.

जन्म से ले कर आज तक कभी भी मैं ने मां और पापा शब्द नहीं पुकारा है. मुझे तो यह भी नहीं मालूम कि इन रिश्तों को नाम ले कर बुलाने से कैसा महसूस होता है. पिताजी की सख्त हिदायत थी कि जब तक वे घर में रहें, तब तक मैं उन के सामने न जाऊं. इसलिए जितनी देर पिताजी घर में रहते, मैं पीछे बालकनी में जा कर नौकरों से बातें करती थी.

बालकनी से ही मैं ने उन्हें पहली बार देखा था. सामने वाले मकान में किराएदार के रूप में आए थे वे. पहले मैं नहीं जानती थी कि वे कौन हैं, क्या करते हैं? लेकिन जब भी मैं बालकनी में खड़ी होती तो उन की दैनिक गतिविधियों को निहारने में मुझे अद्भुत आनंद आता था. उम्र में तो वे मेरे पिताजी के ही बराबर थे लेकिन उन का आकर्षक व्यक्तित्व किसी को भी आकर्षित कर सकता था.

मैं अकसर उन्हें पढ़ते हुए देखती थी. कभीकभार खाना बनाते या कपड़े धोते हुए देखा करती थी. कई बार उन की नजर भी मुझ पर पड़ जाती थी. मैं अकसर उन के बारे में सोचती थी, परंतु पास जा कर कुछ पूछने की हिम्मत नहीं होती थी.

एक दिन जब मैं स्कूल से लौटी तो उन्हें बैठक में पिताजी के साथ चाय पीते देख कर चकित रह गई. मैं कुछ देर वहां खड़ी रहना चाहती थी, लेकिन पिताजी का इशारा समझ कर तुरंत अंदर चली गई और छिप कर बातें सुनने लगी. उस दिन पहली बार मुझे पता चला कि उन का नाम अनिरुद्ध है. नहीं…नहीं, अनिरुद्ध सर क्योंकि वे वहां के महिला महाविद्यालय में हिंदी के लैक्चरर थे.

कालेज के ट्रस्टी होने के नाते पिताजी और अनिरुद्ध सर की दोस्ती बढ़ती गई. और साथ ही मैं भी उन के करीब होती गई. स्कूल से आते वक्त कभीकभी मैं उन के घर भी चली जाया करती थी. वे बेहद हंसमुख स्वभाव के थे. जब भी मैं उन से मिलती, उन के चेहरे पर खुशी और ताजगी दिखती थी. वे मुझ से केवल मेरे स्कूल और मेरी सहेलियों के बारे में ही पूछा करते थे.

मेरी पढ़ाई का उन्हें विशेष खयाल रहता था, जबकि उतनी फिक्र तो शायद मुझे भी नहीं थी. मैं तो केवल पढ़ाई नाम की घंटी गले में बांधे घूम रही थी.

मैं ने तो सर से मिलने के बाद ही जाना कि ये किताबें किस हद तक मंजिल तक पहुंचने में मददगार सिद्ध होती हैं. सर कहा करते थे कि ये किताबें इंसान की सच्ची दोस्त होती हैं जो कभी विश्वासघात नहीं करतीं और न ही कभी गलत दिशा दिखलाती हैं.

ये हमेशा खुशियां बांटती हैं और दुखों में हौसलाअफजाई का काम करती हैं. उसी दौरान मुझे यह भी पता चला कि वे एक अच्छे लेखक भी हैं. इन दिनों वे एक नई किताब लिख रहे थे जिस का शीर्षक था ‘निहारिका.’ जब मैं ने 9वीं कक्षा पास कर ली तब उन्होंने एक दिन मुझ से कहा कि उन की ‘निहारिका’ आज पूरी हो गई है, और वे चाहते हैं कि मैं उसे पढूं.

तब मैं साहित्य शब्द का अर्थ भी नहीं जानती थी. कोर्स की किताबों के अलावा अन्य किताबों से मेरा न तो कोई परिचय था और न ही रुचि. लेकिन ‘निहारिका’ को मैं पढ़ना चाहती थी क्योंकि उसे सर ने लिखा था और उन की इच्छा थी कि मैं उसे पढ़ूं. और सर की खुशी के लिए मैं कुछ भी कर सकती थी. जब मैं ने ‘निहारिका’ पढ़नी शुरू की तो उस के शब्दों में मैं डूबती चली गई. उस के हर पन्ने पर मुझे अपना चेहरा झांकता नजर आ रहा था. ऐसा लगता था जैसे सर ने मुझे ही लक्ष्य कर, यह कहानी मेरे लिए लिखी है, क्योंकि अंत में सर के हाथों मेरे नाम से लिखी वह चिट इस बात की प्रमाण थी.

‘प्रिय नेहा, ‘मैं जानता हूं कि तुम्हारे अंदर किसी भी कार्य को करगुजरने की अनोखी क्षमता है, लेकिन जरूरत है उसे तलाश कर उस का सही इस्तेमाल करने की. मेरी कहानी की नायिका निहारिका ने भी यही किया है. तमाम कष्टों को झेलते हुए भी उस ने अपने डरावने अतीत को पीछे छोड़ कर उज्ज्वल भविष्य को अपनाया है, तभी वह अपनी मंजिल पाने में कामयाब हो सकी है. मैं चाहता हूं कि तुम भी निहारिका की तरह बनो ताकि इस किताब को पढ़ने वालों को यह विश्वास हो जाए कि ऐसा असल जिंदगी में भी हो सकता है.

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‘तुम्हारा, अनिरुद्ध सर.’ इस चिट को पढ़ने के साथ ही इस के हरेक शब्द को मैं ने जेहन में उतार लिया और फिर शुरू हो गया नेहा से निहारिका बनने तक का कभी न रुकने वाला सफर. जिस में सर ने एक सच्चे गुरु की तरह कदमकदम पर मेरा मार्गदर्शन किया. 10वीं का पंजीकरण कराते समय ही मैं ने अपना नाम बदल कर नेहा भाटिया की जगह नेहा निहारिका कर लिया.

स्कूल तथा कालेज की पढ़ाई समाप्त करने के बाद मैं ने पीएचडी भी कर ली. मेरी 10 वर्षों की मेहनत रंग लाई और मुझे अपने ही शहर के राजकीय उच्च विद्यालय में शिक्षिका के रूप में नियुक्ति मिल गई.

उस दिन जब मैं अपना नियुक्तिपत्र ले कर सर के पास गई तो उन की खुशी का ठिकाना न रहा. तब उन्होंने कहा था, ‘नेहा, अपनी इस सफलता को तुम मंजिल मत समझना, क्योंकि यह तो मंजिल तक पहुंचने की तुम्हारी पहली सीढ़ी है. मंजिल तो बहुत दूर है जो अथक परिश्रम से ही प्राप्त होगी.’ उधर, पिताजी को मेरा नौकरी करना बिलकुल रास नहीं आ रहा था.

परंतु न जाने क्यों वे खुले शब्दों में मेरा विरोध नहीं कर रहे थे. इसलिए उन्होंने मेरी शादी करने का फैसला किया ताकि वे नेहा नाम की इस मुसीबत से छुटकारा पा सकें. बचपन से ही आदत थी पिताजी के फैसले पर सिर झुका कर हामी भरने की, सो, मैं ने शादी के लिए हां कर दी.

अगले ही दिन पिताजी के मित्र के सुपुत्र निमेष मुझे देखने आए. साथ में उन के मातापिता और 2 छोटी बहनें भी थीं. जैसे ही मैं बैठक में पहुंची, पिताजी ने मेरी बेटी नेहा कह कर मेरा परिचय दिया. पहली बार पिताजी के मुंह से अपने लिए बेटी शब्द सुना और तब मुझे शादी करने के अपने फैसले पर खुशी महसूस हुई. मगर यह खुशी ज्यादा देर तक न रह सकी.

निमेष और उन के परिवार वालों ने मुझे पसंद तो कर लिया, लेकिन कुछ ऐसी शर्तें भी रख दीं जिन्हें मानना मेरे लिए मुमकिन नहीं था.

निमेष की मां ने स्पष्ट रूप से कह दिया कि मुझे शादी के बाद नौकरी छोड़नी होगी और उन के परिवार के सदस्यों की तरह शाकाहारी बनना होगा. एक पारंपरिक गृहिणी के नाम पर शोपीस बन कर रहना मुझे गवारा नहीं था. मैं तो अपने सर के बताए रास्ते पर चलना चाहती थी और उन के सपनों को पूरा करना चाहती थी, जो अब मेरे भी सपने बन चुके थे.

सब के सामने तो मैं चुप रही परंतु शाम को हिम्मत कर के पिताजी से अपने मन की बात कह दी. यह सुन कर पिताजी आगबबूला हो गए. उस दिन मैं ने पहली बार बहुत कड़े शब्दों में उन का विरोध किया, जिस के एवज में उन्होंने मुझे सैकड़ों गालियां दीं व कई थप्पड़ मारे. फिर तो मैं लोकलाज की परवा किए बिना ही सर के पास चली गई. सर ने जैसे ही दरवाजा खोला, मैं उन से लिपट कर फफक पड़ी. इतनी रात को मेरी ऐसी हालत देख कर सर भी परेशान हो गए थे, लेकिन उन्होंने पूछा कुछ नहीं. फिर मैं ने उन के पूछने से पहले ही अपनी सारी रामकहानी उन्हें सुना डाली.

इतना कुछ होने के बाद भी सर ने मुझे पिताजी के पास ही जाने को कहा, लेकिन मैं टस से मस नहीं हुई. तब सर ने समझाना शुरू किया.

वे समझाते रहे और मैं सिर झुकाए रोती रही. उन की दुनिया व समाज को दुहाई देने वाली बातें मेरी समझ के परे थीं. फिर भी, अंत में मैं ने कहा कि यदि पिताजी मुझे लेने आएंगे तो मैं जरूर चली जाऊंगी, लेकिन वे नहीं आए. दूसरे दिन उन का फोन आया था.

मुझे ले जाने के लिए नहीं, बल्कि सर के लिए धमकीभरा फोन…यदि सर ने कल तक मुझे पिताजी के घर पर नहीं छोड़ा तो वे पुलिस थाने में रिपोर्ट कर देंगे कि अनिरुद्ध सर ने मेरा अपहरण कर लिया है. इतना सबकुछ जानने के बाद मैं सर की और अधिक परेशानी का कारण नहीं बनना चाहती थी, इसलिए सर के ही कहने पर मैं अपनी सहेली निशा के घर चली गई. पूरा एक सप्ताह बीत चुका था. मेरे

पिताजी को पता चल चुका था कि मैं निशा के घर पर हूं. फिर भी वे मुझे लेने नहीं आए. लेकिन मुझे कोई चिंता नहीं थी. मैं तो बस इसलिए परेशान थी कि इतने सालों बाद मैं पहली बार सर से इतने दिनों के लिए दूर हुई थी. इसलिए मुझे घबराहट होने लगी थी, जिस के निवारण के लिए मैं सर के कालेज चली गई. वहां मैं ने जो कुछ भी सुना वह मेरे लिए अकल्पनीय व असहनीय था. सर ने अपना स्थानांतरण दूसरे शहर में करवा लिया था और दूसरे दिन जा रहे थे.

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फिर तो मैं शिष्या होने की हर सीमा को लांघ गई और सर को वह सबकुछ कह दिया जिसे मैं ने आज तक केवल महसूस किया था. अपने प्रति सर के लगाव को प्यार का नाम दे दिया मैं ने. और सर…एक निष्ठुर की भांति मेरी हर बात को चुपचाप सुनते रहे. अंत में बस इतना कहा, ‘नेहा, आज तक तुम ने मुझे गलत समझा है. मेरे गुरुत्व का, मेरी शिक्षा का अपमान किया है तुम ने.’ ‘नहीं सर, मैं ने आप का अपमान नहीं किया है. मैं ने तो केवल वही कहा है जो अब तक महसूस किया है.

मैं ने सिर्फ प्यार ही नहीं, बल्कि हर रिश्ते का अर्थ आप से ही सीखा है. आप ने एक पिता की तरह मेरे सिर पर हाथ रख कर मुझे स्नेहसिक्त कर दिया, एक प्रेमी की तरह सदैव मुझे खुश रखा, एक भाई की तरह मेरी रक्षा की, एक दोस्त और शिक्षक की तरह मेरा मार्गदर्शन किया. यहां तक कि आप ने एक पति की तरह मेरे आत्मसम्मान की रक्षा भी की है. सच तो यह है सर, मन से तो मैं हर रिश्ता आप के साथ जोड़ चुकी हूं. इस के लिए तो मुझे किसी से भी पूछने की कोई आवश्यकता नहीं है.’

‘नेहा, मेरा अपना एक अलग परिवार है और मैं अपने परिवार के साथ विश्वासघात नहीं कर सकता. साथ ही, गुरु और शिष्य के इस पवित्र रिश्ते को भी कलंकित नहीं कर सकता.’ सर की आंखों में समाज का डर सहज ही झलक रहा था. ‘मैं जानती हूं सर, और मैं कभी ऐसा चाह भी नहीं सकती.

मैं ने आप से प्यार किया है. आप के अस्तित्व को चाहा है, सर. इसलिए मैं आप को अपनी नजरों में कभी गिरने नहीं दूंगी. मैं ने तो बस अपनी भावनाएं आप के साथ बांटी हैं. आप जहां चाहे जाइए, मुझे आप से कोई शिकायत नहीं. बस, कामना कीजिए कि मैं आप की दी हुई शिक्षा का अनुसरण कर सकूं.’

‘मेरी शुभकामनाएं तो हमेशा तुम्हारे साथ हैं नेहा, पर क्या जातेजाते मेरी गुरुदक्षिणा नहीं दोगी?’ सर ने रहस्यात्मक लहजे में कहा तो मैं दुविधा में पड़ गई.

मुझे असमंजस में पड़ा देख कर सर बोले, ‘मैं तो, बस इतना चाहता हूं नेहा कि मेरे जाने के बाद तुम न तो मुझे ढूंढ़ने की कोशिश करना और न ही मुझ से संपर्क स्थापित करने का कोई प्रयास करना. हो सके तो मुझे भूल जाना. यही तुम्हारे भविष्य के लिए उचित रहेगा.’

इतना कह कर उन्होंने अपनी पीठ मेरी तरफ कर ली. कुछ पलों के लिए मैं सन्न रह गई. समझ में नहीं आ रहा था कि इतनी कीमती चीज मैं उन को कैसे दे दूं? फिर भी मैं ने साहस किया और बस इतना ही कह पाई, ‘सर, क्या आप अपनी ‘निहारिका’ को भूल पाएंगे? यदि आप ने इस का जवाब पा लिया तो आप को अपनी गुरुदक्षिणा अपनेआप ही मिल जाएगी.’

उस दिन मैं ने आखिरी बार अनिरुद्ध सर को आह भर के देखा. उन की शुभकामना ली तो? सर के मुंह से बस इतना ही निकला, ‘हमेशा खुश रहो.’ शायद इसीलिए मैं किसी भी परिस्थिति में दुखी नहीं हो पाती हूं. जिंदगी के हर सुखदुख को हंसते हुए झेलना मेरी आदत बन गई है.

मैं ने सर की आधी बात तो मान ली और उन से कभी भी संपर्क करने की कोशिश नहीं की मगर उन्हें भूल जाने वाली बात मैं नहीं मान सकी, क्योंकि मैं गुरुऋ ण से उऋ ण नहीं होना चाहती थी.

सर के चले जाने के बाद मैं ने आजीवन अविवाहित रह कर शिक्षा के क्षेत्र में अपना जीवन समर्पित करने का फैसला कर लिया. न चाहते हुए भी पिताजी को मेरी जिद के आगे झुकना पड़ा.

इसी बीच, लगातार बजते मोबाइल की रिंगटोन को सुन कर मेरी तंद्रा भंग हुई, और मैं अतीत से वर्तमान के धरातल पर आ गई. पिताजी का फोन था, ‘‘आखिर तुम ने अपनी जिद पूरी कर ही ली. खैर, बधाई स्वीकार करो. मुझे अफसोस है कि मैं शहर से बाहर हूं और समारोह में नहीं आ सकता. आगे यही कामना है कि तुम और तरक्की करो.’’ पिताजी ने ये सबकुछ बहुत ही रूखी जबान से कहा था. फिर भी, मुझे अच्छा लगा कि पिताजी ने मुझे फोन किया. काश, एक बार सर का भी फोन आ जाता…

बदलाव: भाग 1

गांव से चलते समय उर्मिला को पूरा यकीन था कि कोलकाता जा कर वह अपने पति को ढूंढ़ लेगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. कोलकाता में 3 दिन तक भटकने के बाद भी पति राधेश्याम का पता नहीं चला, तो उर्मिला परेशान हो गई. हावड़ा रेलवे स्टेशन के नजदीक गंगा के किनारे बैठ कर उर्मिला यह सोच रही थी कि अब उसे क्या करना चाहिए. पास ही उस का 10 साला भाई रतन बैठा हुआ था.

राधेश्याम का पता लगाए बिना उर्मिला किसी भी हाल में गांव नहीं लौटना चाहती थी. उसे वह अपने साथ गांव ले जाना चाहती थी. उर्मिला सहमीसहमी सी इधरउधर देख रही थी. वहां सैकड़ों की तादाद में लोग गंगा में स्नान कर रहे थे.

उर्मिला चमचमाती साड़ी पहने हुई थी. पैरों में प्लास्टिक की चप्पलें थीं. उर्मिला का पहनावा गंवारों जैसा जरूर था, लेकिन उस का तनमन और रूप सुंदर था. उस के गोरे तन पर जवानी की सुर्खी और आंखों में लाज की लाली थी.

हां, उर्मिला की सखीसहेलियों ने उसे यह जरूर बताया था कि वह निहायत खूबसूरत है. उस के अलावा गांव के हमउम्र लड़कों की प्यासी नजरों ने भी उसे एहसास कराया था कि उस की जवानी में बहुत खिंचाव है.

सब से भरोसमंद पुष्टि तो सुहागसेज पर हुई थी, जब उस के पति राधेश्याम ने घूंघट उठाते ही कहा था, ‘तुम इतनी सुंदर हो, जैसे मेरी हथेलियों में चौदहवीं का चांद आ गया हो.’ उर्मिला बोली कुछ नहीं थी, सिर्फ शरमा कर रह गई थी. उर्मिला बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के एक गांव की रहने वाली थी. उस ने 19वां साल पार किया ही था कि उस की शादी राधेश्याम से हो गई.

राधेश्याम भी गांव का रहने वाला था. उर्मिला के गांव से 10 किलोमीटर दूर उस का गांव था. उस के पिता गांव में मेहनतमजदूरी कर के परिवार का पालनपोषण करते थे. उर्मिला 7वीं जमात तक पढ़ी थी, जबकि राधेश्याम मैट्रिक फेल था. वह शादी के 2 साल पहले से कोलकाता में एक प्राइवेट कंपनी में चपरासी था.

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शादी के लिए राधेश्याम ने 10 दिनों की छुट्टी ली थी, लेकिन उर्मिला के हुस्नोशबाब के मोहपाश में ऐसा बंधा कि 30 दिन तक कोलकाता नहीं गया. जब घर से राधेश्याम विदा हुआ, तो उर्मिला को भरोसा दिलाया था, ‘जल्दी आऊंगा. अब तुम्हारे बिना काम में मेरा मन नहीं लगेगा.’

उर्मिला झट से बोली थी, ‘ऐसी बात है, तो मुझे भी अपने साथ ले चलिए. आप का दिल बहला दिया करूंगी. नहीं तो वहां आप तड़पेंगे, यहां मैं बेचैन रहूंगी.  उर्मिला ने राधेश्याम के मन की बात कही थी. लेकिन उस की मजबूरी यह थी कि 4 दोस्तों के साथ वह उर्मिला को रख नहीं सकता था.

सच से सामना कराने के लिए राधेश्याम ने उर्मिला से कहा, ‘तुम 5-6 महीने रुक जाओ. कोई अच्छा सा कमरा ले लूंगा, तो आ कर तुम्हें ले चलूंगा.’ राधेश्याम अंगड़ाइयां लेती उर्मिला की जवानी को सिसकने के लिए छोड़ कर कोलकाता चला गया.

फिर शुरू हो गई उर्मिला की परेशानियां. पति का बिछोह उस के लिए बड़ा दुखदाई था. दिन काटे नहीं कटता था, रात बिताए नहीं बीतती थी. तिलतिल कर सुलगती जवानी से उर्मिला पर उदासीनता छा गई थी. वह चंद दिन ससुराल में, तो चंद दिन मायके में गुजारती.

साजन बिन सुहागन उर्मिला का मन न ससुराल में लगता, न मायके में. मगर ऐसी हालत में भी उस ने अपने कदमों को कभी बहकने नहीं दिया था. पति की अमानत को हर हालत में संभालना उर्मिला बखूबी जानती थी, इसलिए ससुराल और मायके के मनचलों की बुरी कोशिशों को वह कभी कामयाब नहीं होने देती थी.

ससुराल में सासससुर के अलावा 2 छोटी ननदें थीं. मायके में मातापिता के अलावा छोटा भाई रतन था. उर्मिला ने जैसेतैसे बिछोह में एक साल काट दिया. मगर उस के बाद वह पति से मिलने के लिए उतावली हो गई. हुआ यह कि कोलकाता जाने के 6 महीने तक राधेश्याम ने उसे बराबर फोन किया. मगर उस के बाद उस ने फोन करना बंद कर दिया. उस ने रुपए भेजना भी बंद कर दिया.

राधेश्याम को फोन करने पर उस का फोन स्वीच औफ आता था. शायद उस ने फोन नंबर बदल दिया था. किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि आखिर राधेश्याम ने एकदम से परिवार से संबंध क्यों तोड़ दिया?

गांव के लोगों को यह शक था कि राधेश्याम को शायद मनपसंद बीवी नहीं मिली, इसलिए उस ने घर वालों व बीवी से संबंध तोड़ लिया है. लेकिन उर्मिला यह बात मानने के लिए तैयार नहीं थी. वह तो अपने साजन की नजरों में चौदहवीं का चांद थी. राधेश्याम जिस कंपनी में नौकरी करता था, उस का पता उर्मिला के पास था. राधेश्याम के बाबत कंपनी वालों को रजिस्टर्ड चिट्ठी भेजी गई.

15 दिन बाद कंपनी का जवाब आ गया. चिट्ठी में लिखा था कि राधेश्याम 6 महीने पहले नौकरी छोड़ चुका था. सभी परेशान हो गए. कोलकाता जा कर राधेश्याम का पता लगाने के सिवा अब और कोई रास्ता नहीं था. उर्मिला का पिता अपंग था. कहीं आनेजाने में उसे काफी परेशानी होती थी. वह कोलकाता नहीं जा सकता था.

उर्मिला का ससुर हमेशा बीमार रहता था. जबतब खांसी का दौरा आ जाता था, इसलिए वह भी कोलकाता नहीं जा सकता था. हिम्मत कर के एक दिन उर्मिला ने सास के सामने प्रस्ताव रखा, ‘अगर आप कहें, तो मैं अपने भाई रतन के साथ कोलकाता जा कर उन का पता लगाऊं?’

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परिवार के लोगों ने टिकट खरीद कर रतन के साथ उर्मिला को हावड़ा जाने वाली ट्रेन में बिठा दिया. राधेश्याम जिस कंपनी में काम करता था, सब से पहले उर्मिला वहां गई. वहां के स्टाफ व कंपनी के मैनेजर ने उसे साफ कह दिया कि 6 महीने से राधेश्याम का कोई अतापता नहीं है. उस के बाद उर्मिला वहां गई, जहां राधेश्याम अपने 4 दोस्तों के साथ एक ही कमरे में रहता था. उस समय 3 ही दोस्त थे. एक गांव गया हुआ था.

तीनों दोस्तों ने उर्मिला का भरपूर स्वागत किया. उन्होंने उसे बताया कि 6 महीने पहले राधेश्याम यह कह कर चला गया था कि उसे एक अच्छी नौकरी और रहने की जगह मिल गई है. मगर सचाई कुछ और थी.

‘कैसी सचाई?’ पूछते हुए उर्मिला का दिल धड़कने लगा.

बदलाव: भाग 2

‘दरअसल, उसे किसी अमीर औरत से प्यार हो गया था. वह उसी के साथ रहने चला गया था,’ 3 दोस्तों में से एक दोस्त ने बताया. उर्मिला को लगा, जैसे उस के दिल की धड़कन बंद हो जाएगी और वह मर जाएगी. उस के हाथपैर सुन्न हो गए थे, मगर जल्दी ही उस ने अपनेआप को काबू में कर लिया.

उर्मिला ने पूछा, ‘वह औरत कहां रहती है?’

तीनों में से एक ने कहा, ‘यह हम तीनों में से किसी को पता नहीं है. सिर्फ गणपत को पता है. उस औरत के बारे में हम लोगों ने उस से बहुत पूछा था, मगर उस ने बताया नहीं था. ‘उस का कहना था कि उस ने राधेश्याम से वादा किया है कि उस की प्रेमिका के बारे में वह किसी को कुछ नहीं बताएगा.’

‘गणपत कौन…’ उर्मिला ने पूछा.

‘वह हम लोगों के साथ ही रहता है. अभी वह गांव गया हुआ है. वह एक महीने बाद आएगा. आप पूछ कर देखिएगा. शायद, वह आप को बता दे.’

‘मगर, तब तक मैं रहूंगी कहां?’

‘चाहें तो आप इसी कमरे में रह सकती हैं. रात में हम लोग इधरउधर सो लेंगे.’ मगर उर्मिला उन लोगों के साथ रहने को तैयार नहीं हुई. उसे पति की बात याद आ गई थी. गांव से विदा लेते समय राधेश्याम ने उस से कहा था, ‘मैं तुम्हें ले जा कर अपने साथ रख सकता था, मगर दोस्तों पर भरोसा करना ठीक नहीं है.

‘वैसे तो वे बहुत अच्छे हैं. मगर कब उन की नीयत बदल जाए और तुम्हारी इज्जत पर दाग लगा दें, इस की कोई गारंटी नहीं है.’ उर्मिला अपने भाई रतन के साथ बड़ा बाजार की एक धर्मशाला में चली गई. धर्मशाला में उसे सिर्फ 3 दिन रहने दिया गया. चौथे दिन वहां से उसे जाने के लिए कह दिया गया, तो मजबूर हो कर उसे धर्मशाला छोड़नी पड़ी.

अब उर्मिला अपने भाई रतन के साथ गंगा किनारे बैठी थी कि अचानक उस के पास एक 40 साला शख्स आया. पहले उस ने उर्मिला को ध्यान से देखा, उस के बाद कहा, ‘‘लगता है कि तुम यहां पर नई हो. कहीं और से आई हो. काफी चिंता में भी हो. कोई परेशानी हो, तो बताओ. मैं मदद करूंगा…’’

वह शख्स उर्मिला को हमदर्द लगा. उस ने बता दिया कि वह कहां से और क्यों आई है.

वह शख्स उस के पास बैठ गया. अपनापन जताते हुए उस ने कहा, ‘‘मेरा नाम अवधेश सिंह है. मेरा घर पास ही में है. जब तक तुम्हारा पति मिल नहीं जाता, तब तक तुम मेरे घर में रह सकती हो. तुम्हें कोई परेशानी नहीं होगी.

‘‘मेरी जानपहचान बहुतों से है. तुम्हारे पति को मैं बहुत जल्दी ढूंढ़ निकालूंगा. जरूरत पड़ने पर पुलिस की मदद भी लूंगा.’’ कुछ सोचते हुए उर्मिला ने कहा, ‘‘अपने घर ले जा कर मेरे साथ कुछ गलत हरकत तो नहीं करेंगे?’’

‘‘तुम पति की तलाश करना चाहती हो, तो तुम्हें मुझ पर यकीन करना ही होगा.’’

‘‘आप के घर में कौनकौन हैं?’’

‘‘यहां मैं अकेला रहता हूं. मेरा बेटा और परिवार गांव में रहता है. मेरी पत्नी नहीं है. उस की मौत हो चुकी है.’’

‘‘तब तो मैं हरगिज आप के घर नहीं रह सकती. अकेले में आप मेरे साथ कुछ भी कर सकते हैं.’’ अवधेश सिंह ने उर्मिला को हर तरह से समझाया. उसे अपनी शराफत का यकीन दिलाया. आखिरकार उर्मिला अपने भाई रतन के साथ अवधेश सिंह के घर पर इस शर्त पर आ गई कि वह उस के घर का सारा काम कर दिया करेगी. उस का खाना भी बना दिया करेगी.

अवधेश सिंह के फ्लैट में 2 कमरे थे. एक कमरा उस ने उर्मिला को दे दिया. शुरू में उर्मिला अवधेश सिंह को निहायत ही शरीफ समझती थी, मगर 10 दिन होतेहोते उस का असली रंग सामने आ गया. अवधेश सिंह अकसर किसी न किसी बहाने से उस के पास आ जाता था. यहां तक कि जब वह रसोईघर में खाना बना रही होती, तो वह उस के करीब आ कर चुपके से उस का अंग छू देता था. कभीकभी तो उस की कमर को भी छू लेता था.

उर्मिला को यह समझते देर नहीं लगी कि उस का मन बेईमान है. वह उस का जिस्म पाना चाहता है.

एक बार उर्मिला का मन हुआ कि वह उस का घर छोड़ कर कहीं और चली जाए, मगर इस विचार को उस ने यह सोच कर तुरंत दिमाग से हटा दिया कि वह जाएगी तो कहां जाएगी? क्या पता दूसरी जगह कोई उस से भी घटिया इनसान मिल जाए.

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गणपत के गांव से लौट आने तक उर्मिला को कोलकाता में रहना ही था. उस ने मीठीमीठी रोमांटिक बातों से अवधेश सिंह को उलझा कर रखने का फैसला किया. एक दिन उर्मिला रसोईघर में काम कर रही थी, अचानक वह वहां आ गया. उसी समय किसी चीज के लिए उर्मिला झुकी, तो ब्लाउज के कैद से उस के उभारों का कुछ भाग दिखाई पड़ गया.

फिर तो अवधेश सिंह अपनेआप को काबू में न रख सका. झट से उस ने कह दिया, ‘‘मैं तुम्हें प्यार करने लगा हूं. तुम मेरी बन जाओ.’’

सही मौका देख कर उर्मिला ने अवधेश सिंह पर अपनी बातों का जादू चलाने का निश्चय कर लिया.

उर्मिला ने भी झट से कहा, ‘‘मैं भी अपना दिल आप को दे चुकी हूं.’’

अवधेश सिंह खुशी से झूम उठा. उस का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘सच कह रही हो तुम?’’

‘‘आप तो अच्छे आदमी नहीं हैं. मैं तो आप को शरीफ समझ कर अपना दिल दे बैठी थी, मगर आप ने तो मेरा हाथ पकड़ लिया.’’

अवधेश सिंह ने तुरंत हाथ छोड़ कर कहा, ‘‘तो क्या हो गया?’’

‘‘मेरी एक मुंहबोली भाभी कहती हैं कि किसी का प्यार कबूल करने से पहले कुछ समय तक उस का इम्तिहान लेना चाहिए.

‘‘वे कहती हैं कि जो आदमी झट से हाथ लगा दे, वह मतलबी होता है. प्यार का वास्ता दे कर जिस्म हासिल कर लेता है. उस के बाद छोड़ देता है, इसलिए ऐसे आदमियों के जाल में नहीं फंसना चाहिए.’’ ‘‘तुम मुझे गलत मत समझो उर्मिला. मैं मतलबी नहीं हूं, न ही मेरी नीयत खराब है. तुम जितना चाहो इम्तिहान ले लो, मुझे हमेशा खरा प्रेमी पाओगी.’’

‘‘तो फिर हाथ क्यों पकड़ लिया?’’

‘‘बस यों ही दिल मचल गया था.’’

‘‘दिल पर काबू रखिए. जबतब मचलने मत दीजिए. एक बात साफ बता देती हूं. ध्यान से सुन लीजिए.

‘‘अगर आप मेरा प्यार पाना चाहते हैं, तो सब्र से काम लेना होगा. जिस दिन यकीन हो जाएगा कि आप मेरे प्यार के काबिल हैं, उस दिन हाथ ही नहीं, पैर भी पकड़ने की छूट दे दूंगी. तब तक आप सिर्फ बातों से प्यार जाहिर कीजिए. हाथ न लगाइए.’’

‘‘वह दिन कब आएगा?’’ अवधेश सिंह ने पूछा.

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‘‘कम से कम एक महीना तो लगेगा.’’ उर्मिला की चालाकी अवधेश सिंह समझ नहीं पाया और उस की शर्त को मान लिया. अवेधश सिंह सरकारी अफसर था. कोलकाता में वह अकेला ही रहता था. जब तक उस की पत्नी जिंदा थी, वह साल में 4-5 बार गांव जाता था. पत्नी की मौत के बाद उस ने गांव जाना ही छोड़ दिया था. बात यह थी कि पत्नी की मौत के बाद उस ने दूसरी शादी करने का निश्चय किया, जिस का उस के बेटों ने पुरजोर विरोध किया था.

खेसारी लाल यादव के इस गाने को 8 घंटे में ही मिले 2 मिलियन व्यूज, देखें Video

भोजपुरी फिल्मों के सफल कलाकार खेसारी लाल यादव अभिनीत भोजपुरी फिल्म ‘बाप जी’ का एक गाना “मछरिया” वर्ल्डवाइड रिकार्ड्स भोजपुरी के ऑफिसियल चैनल से रिलीज होते ही वायरल हो गया.

इस गाने को इतना ज्यादा पसंद किया गया है कि इसने मात्र 8 घंटे में ही 2 मिलियन व्यूज यूट्यूब पर पार कर लिया. यह रिकॉर्ड वर्ल्डवाइड रिकॉर्ड्स ही कर सकता है, जो हमेशा अच्छे गानों व फिल्मों को प्रमोट करता है.

इस मनोरंजन पूर्ण गाने में खेसारीलाल यादव और काजल राघवानी थिरकते हुए नजर आने वाले हैं. इस गाने में उनका लुक और डांस काफी शानदार है. इस गाने को स्वयं खेसारीलाल यादव ने खुशबू तिवारी केटी के साथ मिलकर स्वरबद्ध किया है.

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ज्ञातब्य है कि इससे पहले वर्ल्डवाइड रिकार्ड्स भोजपुरी से ही फिल्म ‘‘बाप जी’’का ट्रेलर रिलीज किया गया था. इसमें बाप और बेटे के रिश्ते की अनोखी दास्तां नजर आती है. इसमें बेटे की भूमिका में खेसारीलाल यादव और पिता के किरदार में मनोज टाईगर हैं. इन दोनों की केमिस्ट्री जबरदस्त है.

फिल्म के निर्देशक व लेखक देव पांडेय हैं. ‘‘गोविंदा एंड सागर फिल्म्स इंटरटेनमेंट’’ प्रस्तुत फिल्म ‘बाप जी” के निर्माता रामजी जयसवाल 1⁄4गोविंदा1⁄2 है. फिल्म के निर्देशक व कहानीकार देव पांडेय, सहनिर्माता श्यामजीत बरई, पटकथा लेखक अरबिन्द तिवारी, संगीतकार ओम झा, गीतकार प्यारेलाल यादव, आजाद सिंह, यादव राज और कुंदन प्रीत, कैमरामैन आर आर प्रिंस, एडीटर गुरजंट सिंह, एक्शन मास्टर एस मलेश, डांस मास्टर रिक्की गुप्ता, कला निर्देशक सतीश गिरी, कार्यकारी निर्माता संतोष वर्मा हैं. फिल्म के मुख्य कलाकार खेसारी लाल यादव, ऋतू सिंह, काजल राघवानी, मनोज टाइगर, प्रकाश जैस, राजबीर, रीतू पाण्डेय, सी पी भट्ट, सम्भावना सेठ, बृजेश त्रिपाठी, संजय वर्मा हैं.

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सरकारी अस्पताल: गरीबों की उम्मीद की कब्रगाह

सरकारी अस्पताल का मतलब है सरकार द्वारा बनवाया गया ऐसा अस्पताल जहां तकरीबन मुफ्त में ऐसे गरीब लोगों का इलाज भी हो जाए, जो बड़े और महंगे प्राइवेट अस्पताल में जाने की सपने में भी नहीं सोच सकते हैं. ऐसे सरकारी अस्पताल हर राज्य के हर बड़े शहर में बनाए जाते हैं, ताकि आसपास के गरीब लोगों को कम समय में ही इलाज की सुविधा मिल सके.

हरियाणा के फरीदाबाद शहर में बादशाह खान अस्पताल ऐसा ही सरकारी अस्पताल है. साल 2020 के आखिर में मुख्यमंत्री मनोहर लाल के आदेश पर इस अस्पताल का नाम बदल कर हमारे देश के प्रधानमंत्री रह चुके अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर कर दिया गया है.

यह फरीदाबाद का एकलौता 200 बिस्तर का सरकारी अस्पताल है, जिस में रोजाना हजारों की तादाद में मरीज इलाज कराने के लिए आते हैं. पर क्या नाम बदलने से इस अस्पताल की हालत में कोई बदलाव हुआ है या सिर्फ वोट की राजनीति के चलते ही ऐसा हुआ है? वजह, यह अस्पताल कुछ ऐसी खबरों के लिए भी सुर्खियों में रहा है, जो इनसानियत को शर्मसार कर देती हैं.

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साल 2019 की बात है. महीना था अगस्त का. फरीदाबाद के इसी बीके अस्पताल में इलाज कराने आई 12 साल की एक बच्ची के साथ अस्पताल के एक मुलाजिम ने कथिततौर पर छेड़छाड़ कर दी थी.

पुलिस के मुताबिक, 12 साल की उस बच्ची को कुछ दिन पहले चोट लग गई थी. वह अपनी मां के साथ अस्पताल में पट्टी कराने आई थी. पट्टी करने के दौरान आरोपी ने बच्ची के साथ गलत हरकत की. बच्ची ने अपनी मां को बता दिया. बच्ची की मां ने अस्पताल में हंगामा करना शुरू कर दिया. सूचना मिलने पर महिला थाना पुलिस ने आरोपी मुलाजिम, जो कंपाउंडर था, को हिरासत में ले लिया.

इतना ही नहीं, एक बार तो यह अस्पताल इस खबर की भी सुर्खियां बना था कि जब किसी के बच्चा पैदा होता है तो वहां का स्टाफ बच्चे के पिता या दूसरे परिवार वालों से ‘बधाई’ के पैसे नहीं ले लेता, तब तक जच्चाबच्चा को आपरेशन थिएटर से वार्ड में नहीं भेजा जाता है. एक तरह की वसूली या जबरदस्ती की जाती है.

बीके अस्पताल में भ्रष्टाचार भी हद तक है. एक हालिया खबर की बानगी देखिए. फरीदाबाद के एसजीएम नगर के नवीन की मां की कुछ महीने पहले इलाज के दौरान मौत हो गई थी. यह इलाज चिमनीबाई धर्मशाला के पास प्राची अस्पताल में कराया गया था.

नवीन ने प्राची अस्पताल के डाक्टर सुरेश पर इलाज में लापरवाही बरतने का आरोप लगाते हुए सिविल सर्जन को लिखित में शिकायत दी. सिविल सर्जन ने इस मामले की जांच का जिम्मा बीके अस्पताल के एनीथिसिया महकमे के एचडीओ डाक्टर नवदीप सिंघल को सौंप दिया.

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आरोप है कि इस मामले की जांच के दौरान डाक्टर सुरेश और डाक्टर नवदीप सिंघल पीड़ित नवीन पर शिकायत वापस लेने के लिए दबाव डाल रहे थे. यह भी आरोप है कि मामले को रफादफा करने के लिए वे दोनों नवीन को 5 लाख रुपए देने की बात भी कह रहे थे. लेकिन नवीन ने इस की शिकायत विजिलैंस महकमे में कर दी.

विजिलैंस महकमे में डीएसपी कैलाश चंद ने बताया कि जैसे ही शिकायत करने वाले नवीन को डाक्टर नवदीप सिंघल और डाक्टर सुरेश ने रुपए दिए, तभी विजिलैंस महकमे की टीम ने उन्हें रंगेहाथ पकड़ लिया.

भंडारा में दुखद हादसा

महाराष्ट्र के भंडारा जिले का एक दिल दहलाने वाला मामला ही लीजिए. इस साल की शुरुआत में 8 जनवरी, शुक्रवार की देर रात को वहां के एक सरकारी अस्‍पताल में आग लगने से एक वार्ड की सिक न्यूबौर्न केयर यूनिट में रखे गए 10 नवजात बच्‍चों की दर्दनाक मौत हो गई.

इस वार्ड में 17 नवजात बच्‍चों को रखा गया था. एक नर्स ने जब वार्ड से धुआं निकलते हुए देखा तो उसे इस हादसे के बारे में पता चला.

दरअसल, इस अस्‍पताल में आग रात के तकरीबन 2 बजे लगी थी. आग लगने की वजह शौर्ट सर्किट बताया गया. इस वार्ड में एक दिन से ले कर 3 महीने तक के बच्‍चों को रखा गया था. यह एक खास तरह का वार्ड होता है जिस में उन्‍हीं बच्‍चों को रखा जाता है जिन की हालत काफी नाजुक होती है और जन्‍म के समय जिन का वजन बहुत कम होता है.

मौके पर गए कई मीडिया हाउस वालों की रिपोर्ट से पता चला था कि बच्चों की उस यूनिट में आग लगने से धुआं भर गया था. जब फायर ब्रिगेड वाले और अस्पताल के मुलाजिम किसी तरह दरवाजा तोड़ कर अंदर गए तो उन्होंने पाया कि कुछ बच्चे बुरी तरह जल गए थे, जबकि कुछ बच्चे धुएं के चलते अपनी जान गंवा चुके थे.

इस हादसे पर देश के हर छोटेबड़े नेता ने अपना दुख जाहिर किया. प्रदेश सरकार ने अस्पताल प्रशासन की इस घोर लापरवाही के लिए उसे लताड़ लगाई तो विपक्ष ने सत्ता पक्ष को आड़े हाथ लिया. पीड़ित परिवारों को मुआवजे का मरहम लगाया गया, पर क्या कुछ लाख रुपए की रकम से उन मांबाप का दर्द किया जा सकता है, जिन्होंने अपने उन नवजातों को खोया है, जिन्होंने अपनी आंखें भी ढंग से नहीं खोली थीं?

दुख की बात तो यह है कि देश तकरीबन हर सरकारी अस्पताल में बदहाली का आलम एकजैसा है. कभी उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर से खबर आती है कि वहां के जिला अस्पताल में एक वार्डबौय किसी घायल मरीज के टांके लगा रहा था, तो कभी पश्चिम बंगाल के मालदा अस्पताल में 24 घंटों में 9 नवजात शिशुओं की मौत दिल दहला देती है. एक साल की उम्र से कम के इन नवजात शिशुओं की मौत की वजह तय समय से पहले जन्म, कम वजन और सांस लेने संबंधी समस्याएं थीं.

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मध्य प्रदेश के जबलपुर में एक अजीब सा ही मामला सामने आया. जनहित याचिका दायर करने वाले एक आदमी के वकील ने वीडियो कौंफ्रैंसिंग के जरीए हाईकोर्ट में दलील रखी कि मध्य प्रदेश के असंगठित क्षेत्र के मजदूरों खासकर बीड़ी कामगार और माइनिंग फील्ड के मजदूर कोरोना काल में खतरे में हैं. ऐसा इसलिए है, क्योंकि वहां डाक्टरों की कमी के साथसाथ दूसरे संसाधनों की भी बेहद कमी है. अगर डाक्टर हैं भी उन की ड्यूटी एकसाथ 2 से ज्यादा अस्पतालों में लगा दी गई है. इन अस्पतालों में पीपीटी किट, मास्क और सैनेटाइजर मुहैया नहीं हैं.

इस दलील के बाद हाईकोर्ट ने हैरानी जाहिर की कि ऐसे अस्पतालों का संचालन महज चपरासियों के भरोसे कैसे चल सकता है.

सरकारी अस्पतालों की बदहाली, भ्रष्टाचार और बदइंतजामी का ही नतीजा है कि आज छोटे कसबों में भी प्राइवेट अस्पताल खुल रहे हैं. गरीब लोग उन में जा भी रहे हैं, फिर चाहे उन्हें अपनी जमापूंजी ही को ही क्यों न स्वाहा करना पड़े.

नागिन एक्ट्रेस’ जैस्मिन भसीन का रुबीना पर तीखा वार, कहा- फेक है वो!

‘बिग बॉस 14’ फेम जैस्मिन भसीन को घर से बाहर आए हुए काफी टाइम हो गया है. और खबर ये आ रही है कि  अली गोनी (Aly Goni) को सपोर्ट करने के लिए वे फिर से घर में एंट्री लें सकती हैं.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक जैस्मिन भसीन ने अली गोनी को लेकर कहा है कि वह बिग बॉस हाउस का सबसे सच्चा इंसान है और वह गेम के लिए डर्टी पॉलिटिक्स नहीं करता है.

तो वहीं उन्होंने रुबीना (Rubina Dilaik) और अभिनव (Abhinav Shukla) को लेकर एक बड़ी बात कही. जैस्मिन ने कहा कि रुबीना और अभिनव, दोनों ही लोगों को अपने फेवर में करना जानते हैं. उन्होंने आगे कहा कि घर से बाहर होकर रुबीना का गेम देखने के बाद चौंक गईं.

 

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उन्होंने ये भी कहा कि रुबीना और अभिनव घर के दो सबसे चालाक लोग हैं. उनके गेम प्लान के लिए फुल मार्क्स. वे अच्छे से जानते हैं कि विरोध वाली परिस्थिति में भी लोगों को कैसे तोड़ मरोड़कर अपने समर्थन में किया जाए.

खबरों के अनुसार जैस्मिन ने ये कहा कि मैं अली को ये सलाह दूंगी कि गेम के किसी भी पॉइंट पर रुबीना और अभिनव पर वो विश्वास ना करे.

 

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खबर ये आ रही है कि जैस्मिन ने ये भी कहा कि रुबीना वो है जो आगे बढ़कर लोगों को टारगेट करती है, उनके खिलाफ झूठी कहानी गढ़ लेती है और लोगों के दिमाग में अपने आपिनियन भर देती है. जैसे ही उसे लगा कि लोग उससे दूरी बना रहे हैं तो रुबीना ने अली की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ा दिया.

Bigg Boss 14: Salman की डांट सुनकर फूट-फूट कर रोईं निक्की, कहा ‘सिगरेट से जला लूं खुद को’

बिग बॉस 14 में इस हफ्ते वीकेंड के वार में  सुपसस्टार सलमान खान घरवालों की जमकर क्लास लगाई. तो वहीं ड्रामा क्वीन राखी सावत का सपोर्ट करते हुए दिखाई दिए.

सलमान खान ने निक्की तंबोली को काफी खरी-खोटी सुनाई. और ऐसे में शो से जुड़े एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें सलमान के डांटने से निक्की तंबोली काफी हर्ट हुई है और खुद को सिगरेट से जलाने की बात कर रही हैं.

दरअसल इस वीडियो में निक्की स्मोकिंग रुम में जाकर जोर-जोर से रोने लगती हैं और इसके बाद रुबीना दिलाइक और अभिनव शुक्ला निक्की को चुप कराने के लिए वहां जाते हैं.

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वीडियो में आप देख सकते हैं कि अभिनव निक्की को समझाते हुए दिखाई दे रहे हैं और वो कहते हैं कि सलमान खान ने जो भी किया तुम्हारे भले के लिए किया है और उस बारे में तुम ज्यादा मत सोचो.

तो वहीं निक्की, रुबीना और अभिनव से ये कहती हुई नजर आती हैं कि जब उसे पहली बार घर से निकाला गया था, तब उनकी बहुत तारीफ की गई थी. लेकिन इस बार क्या-क्या सुनना पड़ा. उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था. मन कर रहा है अपने आपको चटका लगा दूं यार.

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