Serial Story: प्यार अपने से

Valentine’s Special: क्या यही प्यार है- जेबा और राहिल की कहानी

जेबा की बरात आने वाली थी. सभी पूरी तैयारी के साथ बरात के आने का इंतजार कर रहे थे कि तभी जेबा का आशिक राहिल कहीं से अचानक आंगन में आ गया.

‘‘आप डरें नहीं. मैं कुछ गड़बड़ करने नहीं आया हूं. मैं तो सिर्फ जेबा से मिलने आया हूं. आज से वह किसी दूसरे की हो जाएगी. प्लीज, मुझे उस से आखिरी बार मिल लेने दें,’’ आंगन में खड़ी औरतों से इतना कहने के बाद राहिल सीधा जेबा के कमरे में घुस गया, जिस में वह दुलहन बनी बैठी थी.

‘‘जेबा, यह तो मेरी शराफत है, जो तुम्हें किसी और की होते देख रहा हूं, वरना किस में इतनी हिम्मत थी कि जो तुम को मुझ से जुदा कर देता.

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‘‘खैर, मैं तुम से यह कहने आया हूं कि हम दो जिस्म जरूर हैं, लेकिन जान एक है. कोई दूसरा तुम्हारे सिर्फ तन पर हक जमा सकता है, लेकिन मन पर नहीं. मुझे पूरा यकीन है कि तुम मुझे कभी नहीं भूलोगी…’’

इतना कहने के बाद राहिल अपना मुंह जेबा के कान के पास ले जा कर धीरे से बोला, ‘‘तुम अपनी मांग में कभी सिंदूर मत भरना. मैं भी तुम से वादा करता हूं कि जिंदगीभर किसी दूसरी लड़की की तरफ नजर नहीं उठाऊंगा.

‘‘अच्छा जेबा, अब मैं चलता हूं. तुम हमेशा खुश रहो,’’ इतना कह कर राहिल उस कमरे से चला गया.

राहिल के जाने के बाद सब ने राहत की सांस ली, मगर दिलों में यह खटका बना रहा कि वह कमबख्त कहीं निकाह के वक्त आ कर किसी तरह की हंगामेबाजी न शुरू कर दे.

इन हालात से निबटने के लिए जेबा के घर वालों ने पूरी तैयारी कर रखी थी. पर सबकुछ शांति से पूरा हो गया और जेबा अपने हमसफर शबाब के साथ एक नई जिंदगी शुरू करने के लिए रवाना हो गई.

वैसे तो सबकुछ ठीक हो गया था, लेकिन जेबा और उस के घर वाले अंदर ही अंदर काफी परेशान थे कि राहिल न जाने कब क्या कर बैठे.

जेबा और राहिल एकदूसरे को चुपकेचुपके चाहते आ रहे थे. इस सचाई से परदा तब उठा, जब जेबा की शादी शबाब के साथ तय कर दी गई.

राहिल को जब इस बात का पता चला, तो उस के दिल की धड़कन जैसे थम सी गई.

कभी जी चाहता कि जेबा को ले कर कहीं भाग जाए, तो कभी उस के बाप का खून कर देने का मन करता. कभी यह विचार आता कि वह अपना और जेबा का खात्मा कर डाले. वह तो जेबा की सूझबूझ थी, जो पागल हाथी जैसे राहिल को किसी तरह काबू में किए थी.

‘‘आखिर मुझ में क्या कमी है, जो जेबा को मुझ से दूर किया जा रहा है?’’ एक दिन राहिल जेबा के अब्बा हशमत अली से उलझ पड़ा.

‘‘कमी यह है कि तुम दिमाग से ज्यादा दिल की सुनते हो और जज्बाती हो. सब से बड़ी कमी तो तुम में यह है कि तुम दूसरों पर मुहताज हो. जो खुद मुहताज हो, वह भला दूसरों को क्या दे सकता है,’’ हशमत अली की साफगोई राहिल को बेहद कड़वी लगी, फिर भी जवाब में वह खामोश रहा.

राहिल एक बेरोजगार और भावुक किस्म का नौजवान था. बाप के पास जो दौलत थी, बस उसी पर उस की जिंदगी का दारोमदार था. वह अपनी जिंदगी के प्रति कभी संजीदा नजर नहीं आया.

शौहर के रूप में शबाब को पा कर जेबा बहुत खुश थी. एक भले व संजीदा शौहर की सारी खूबियां उस में कूटकूट कर भरी थीं.

शबाब जेबा का पूरा खयाल रखता कि उसे किसी तरह की तकलीफ न पहुंचने पाए. मगर जेबा ही इस मामले में नाकाम थी, क्योंकि वह पूरे तनमन से चाह कर भी अपने शौहर के आगे खुद को पेश नहीं कर पाती थी.

जेबा इस बात को ले कर डरीसहमी रहती कि अपने शौहर से पहले वह किसी और की थी. कभीकभी उसे राहिल के दीवानेपन से भी डर लगता. वह जानती थी कि राहिल जुनून में आ कर किसी भी हद को पार कर सकता है, इसीलिए वह चाह कर भी शबाब को अपने प्यार से दूर रखती थी.

सब से बड़ी बात तो यह थी कि जेबा ने आज तक शबाब के नाम का सिंदूर अपनी मांग में नहीं लगाया, जो शबाब को अच्छा नहीं लग रहा था.

राहिल ने जेबा को इस बात के लिए मना कर के उस की शादीशुदा जिंदगी पर कितना बड़ा जुल्म ढाया था. जेबा राहिल के गुस्से से शबाब को बचाने के लिए ही अपनी मांग को सिंदूर से नहीं सजाती थी.

शादी के 2 दिन बाद ही जेबा की सूनी मांग को देख कर शबाब पूछ बैठा, ‘‘अरे, यह क्या जेबा, तुम्हारी मांग में सिंदूर क्यों नहीं है?’’

जेबा ने बड़े प्यार से शबाब को समझाया, ‘‘असल में सिंदूर से मुझे एलर्जी है. बचपन में गुड्डेगुडि़यों का ब्याह रचाने के दौरान गुड्डे की अम्मां बनी लड़की ने खेलखेल में मेरी मांग में सिंदूर डाल दिया था. इस के कुछ समय बाद ही मेरे सिर में खुजली होने लगी थी और मैं चकरा कर गिर पड़ी थी. तब से मैं सिंदूर से काफी दूर रहने लगी हूं.’’

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जेबा की दलील सुन लेने के बाद शबाब चुप तो हो गया था, लेकिन उसे कुछ अटपटा सा जरूर लगा था.

सास व ननदें जेबा को मांग में सिंदूर डालने की कहतेकहते थक चुकी थीं, लेकिन उस के कान पर जूं तक नहीं रेंगी. इस बात को ले कर परिवार में मनमुटाव सा रहने लगा था.

इस से पहले कि जेबा की जिद और ससुराल वालों की नाराजगी कोई गंभीर रूप लेती, एक दिन अचानक घटी एक घटना ने जेबा की सारी उलझनों को पलभर में ही सुलझा दिया.

राहिल ने जेबा के किसी करीबी रिश्तेदार के हाथों उस के पास एक खत भेजा, जिस में लिखा था:

‘जेबा, मैं तुम्हारे दिलोदिमाग पर हुकूमत तो नहीं कर सका, लेकिन उस पर नाजायज ढंग से कब्जा कर के तुम्हें ब्लैकमेल जरूर करता रहा. अब इस बात का एहसास मुझे पूरी तरह से होने लगा है.

‘मुझे दुख है कि मेरी घटिया सोच का शिकार हो कर तुम घुटनभरी जिंदगी जी रही हो और धीरेधीरे अपने ससुराल वालों की नजरों में गिरती जा रही हो. मुझे माफ कर दो. तुम ने सही कहा था कि मेरा यह गैरसंजीदापन कभी मुझे महंगा पड़ सकता है.

‘एक खुशखबरी सुनो. मैं शादी करने जा रहा हूं. वह भी एक ऐसी लड़की के साथ, जो मुझ जैसे किसी सड़कछाप आशिक के जुल्म का शिकार हो चुकी है. जानती हो, इस तरह की लड़की को अपना हमसफर बना कर मैं क्या करना चाहता हूं? मैं अपने गुनाह की सजा कम करना चाहता हूं.

‘शादी के बाद भी तुम पर अपना नाजायज हक जमा कर मैं ने गुनाह नहीं तो और क्या किया है. तुम मेरी दीवानगी का खौफ अपने जेहन से बिलकुल निकाल दो और पूरे तनमन से शबाब की बीवी बन कर जिंदगी गुजारो. आज से अपनी मांग सूनी मत रखना.

‘तुम्हारा नाचीज, राहिल.’

खत पढ़ लेने के बाद जेबा खुद को इतना हलका महसूस कर रही थी, मानो उस की छाती पर से कोई बहुत बड़ा बोझ हट गया हो.

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Valentine’s Special: कहां हो तुम- दोस्ती में प्यार का स्पर्श

ऋतु अपने कालेज के गेट के बाहर निकली तो उस ने देखा बहुत तेज बारिश हो रही है.

‘ओ नो, अब मैं घर कैसे जाऊंगी?’ उस ने परेशान होते हुए अपनेआप से कहा. इतनी तेज बारिश में तो छाता भी नाकामयाब हो जाता है और ऊपर से यह तेज हवा व पानी की बौछारें जो उसे लगातार गीला कर रही थीं. सड़क पर इतने बड़ेबड़े गड्ढे थे कि संभलसंभल कर चलना पड़ रहा था. जरा सा चूके नहीं कि सड़क पर नीचे गिर जाओ. लाख संभालने की कोशिश करने पर भी हवा का आवेग छाते को बारबार उस के हाथों से छुड़ा ले जा रहा था. ऐसे में अगर औटोरिक्शा मिल जाता तो कितना अच्छा होता पर जितने भी औटोरिक्शा दिखे, सब सवारियों से लदे हुए थे.

उस ने एक ठंडी सी आह भरी और पैदल ही रवाना हो गई, उसे लगा जैसे मौसम ने उस के खिलाफ कोई साजिश रची हो. झुंझलाहट से भरी धीरेधीरे वह अपने घर की तरफ बढ़ने लगी कि अचानक किसी ने उस के आगे स्कूटर रोका. उस ने छाता हटा कर देखा तो यह पिनाकी था.

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‘‘हैलो ऋतु, इतनी बारिश में कहां जा रही हो?’’

‘‘यार, कालेज से घर जा रही हूं और कहां जाऊंगी.’’

‘‘इस तरह भीगते हुए क्यों जा रही है?’’

‘‘तू खुद भी तो भीग रहा है, देख.’’

‘‘ओके, अब तुम छाते को बंद करो और जल्दी से मेरे स्कूटर पर बैठो, यह बारिश रुकने वाली नहीं, समझी.’’

ऋतु ने छाता बंद किया और किसी यंत्रचालित गुडि़या की तरह चुपचाप    उस के स्कूटर पर बैठ गई. आज उसे पिनाकी बहुत भला लग रहा था, जैसे डूबते को कोई तिनका मिल गया हो. हालांकि दोनों भीगते हुए घर पहुंचे पर ऋतु खुश थी. घर पहुंची तो देखा मां ने चाय के साथ गरमागरम पकौड़े बनाए हैं. उन की खुशबू से ही वह खिंचती हुई सीधी रसोई में पहुंच गई और प्लेट में रखे पकौड़ों पर हाथ साफ करने लगी तो मां ने उस का हाथ बीच में ही रोक लिया और बोली, ‘‘न न ऋ तु, ऐसे नहीं, पहले हाथमुंह धो कर आ और अपने कपड़े देख, पूरे गीले हैं, जुकाम हो जाएगा, जा पहले कपड़े बदल ले. पापा और भैया बालकनी में बैठे हैं, तुम भी वहीं आ जाना.’’

‘भूख के मारे तो मेरी जान निकली जा रही है और मां हैं कि…’ यह बुदबुदाती सी वह अपने कमरे में गई और जल्दी से फ्रैश हो कर अपने दोनों भाइयों के बीच आ कर बैठ गई. छोटे वाले मुकेश भैया ने उस के सिर पर चपत लगाते हुए कहा, ‘‘पगली, इतनी बारिश में भीगती हुई आई है, एक फोन कर दिया होता तो मैं तुझे लेने आ जाता.’’

‘‘हां भैया, मैं इतनी परेशान हुई और कोई औटोरिक्शा भी नहीं मिला, वह तो भला हो पिनाकी का जो मुझे आधे रास्ते में मिल गया वरना पता नहीं आज क्या होता.’’ इतना कह कर वह किसी भूखी शेरनी की तरह पकौड़ों पर टूट पड़ी.

अब बारिश कुछ कम हो गई थी और ढलते हुए सूरज के साथ आकाश में रेनबो धीरेधीरे आकार ले रहा था. कितना मनोरम दृश्य था, बालकनी की दीवार पर हाथ रख कर मैं कुदरत के इस अद्भुत नजारे को निहार रही थी कि मां ने पकौड़े की प्लेट देते हुए कहा, ‘‘ले ऋ तु, ये मिसेज मुखर्जी को दे आ.’’ उस ने प्लेट पकड़ी और पड़ोस में पहुंच गई. घर के अंदर घुसते ही उसे हीक सी आने लगी, उस ने अपनी नाक सिकोड़ ली. उस की ऐसी मुखमुद्रा देख कर पिनाकी की हंसी छूट गई.

वह ठहाका लगाते हुए बोला, ‘‘भीगी बिल्ली की नाक तो देखो कैसी सिकुड़ गई है,’’ यह सुन कर ऋ तु गुस्से में उस के पीछे भागी और उस की पीठ पर एक धौल जमाई.

पिनाकी उहआह करता हुआ बोला, ‘‘तुम लड़कियां कितनी कठोर होती हो, किसी के दर्द का तुम्हें एहसास तक नहीं होता.’’

‘‘हा…हा…हा… बड़ा आया दर्द का एहसास नहीं होता, मुझे चिढ़ाएगा तो ऐसे ही मार खाएगा.’’

मिसेज मुखर्जी रसोई में मछली तल रही थीं, जिस की बदबू से ऋ तु की हालत खराब हो रही थी. उस ने पकौड़ों की प्लेट उन्हें पकड़ाई और बाहर की ओर लपकते हुए बोली, ‘‘मैं तो जा रही हूं बाबा, वरना इस बदबू से मैं बेहोश हो जाऊंगी.’’

मिसेज मुखर्जी ने हंसते हुए कहा, ‘‘तुम को मछली की बदबू आती है लेकिन ऋ तु अगर तुम्हारी शादी किसी बंगाली घर में हो गई, तब क्या करेगी.’’

बंगाली लोग प्यारी लड़की को लाली कह कर बुलाते हैं. पिनाकी की मां को ऋ तु के लाललाल गालों पर मुसकान बहुत पसंद थी. वह अकसर उसे कालेज जाते हुए देख कर छेड़ा करती थी.

‘‘ऋ तु तुमी खूब शुंदर लागछी, देखो कोई तुमा के उठा कर न ले जाए.’’

पिनाकी ने सच ही तो कहा था ऋ तु को उस के दर्द का एहसास कहां था. वह जब भी उसे देखता उस के दिल में दर्द होता था. ऋ तु अपनी लंबीलंबी 2 चोटियों को पीठ के पीछे फेंकते हुए अपनी बड़ीबड़ी और गहरी आंखें कुछ यों घूमाती है कि उन्हें देख कर पिनाकी के होश उड़ जाते हैं और जब बात करतेकरते वह अपना निचला होंठ दांतों के नीचे दबाती है तो उस की हर अदा पर फिदा पिनाकी उस की अदाओं पर मरमिटना चाहता है.

पर ऋतु से वह इस बात को कहे तो कैसे कहे. कहीं ऐसा न हो कि ऋतु यह बात जानने के बाद उस से दोस्ती ही तोड़ दे. फिर उसे देखे बिना, उस से बात किए बिना वह जी ही नहीं पाएगा न, बस यही सोच कर मन की बात मन में लिए अपने प्यार को किसी कीमती हीरे की तरह मन में छिपाए उसे छिपछिप कर देखता है. आमनेसामने घर होने की वजह से उस की यह ख्वाहिश तो पूरी हो ही जाती है. कभी बाहर जाते हुए तो कभी बालकनी में खड़ी ऋतु उसे दिख ही जाती है पर वह उसे छिप कर देखता है अपने कमरे की खिड़की से.

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‘‘पिनाकी, क्या सोच रहा है?’’ ऋतु उस के पास खड़ी चिल्ला रही थी इस बात से बेखबर कि वह उसी के खयालों में खोया हुआ है. कितना फासला होता है ख्वाब और उस की ताबीर में. ख्वाब में वह उस के जितनी नजदीक थी असल में उतनी ही दूर. जितना खूबसूरत उस का खयाल था, क्या उस की ताबीर भी उतनी ही खूबसूरत थी. हां, मगर ख्वाब और उस की ताबीर के बीच का फासला मिटाना उस के वश की बात नहीं थी. ‘‘तू चल मेरे साथ,’’ ऋतु उसे खींचती हुई स्टडी टेबल तक ले गई.

‘‘कल सर ने मैथ्स का यह नया चैप्टर सौल्व करवाया, लेकिन मेरे तो भेजे में कुछ नहीं बैठा, अब तू ही कुछ समझा दे न.’’

ऋ तु को पता था कि पिनाकी मैथ्स का मास्टर है, इसलिए जब भी उसे कोई सवाल समझ नहीं आता तो वह पिनाकी की मदद लेती है, ‘‘कितनी बार कहा था मां से यह मैथ्स मेरे बस का रोग नहीं, लेकिन वे सुनती ही नहीं, अब निशा को ही देख आर्ट्स लिया है उस ने, कितनी फ्री रहती है. कोई पढ़ाई का बोझ नहीं और यहां तो बस, कलम घिसते रहो, फिर भी कुछ हासिल नहीं होता.’’

‘‘इतनी बकबक में दिमाग लगाने के बजाय थोड़ा पढ़ाई में लगाया होता तो सब समझ आ जाता.’’

‘‘मेरा और मैथ्स का तो शुरू से ही छत्तीस का आंकड़ा रहा है, पिनाकी.’’

पिनाकी एक घंटे तक उसे समझाने की कोशिश करता रहा पर ऋ तु के पल्ले कुछ नहीं पड़ रहा था.

‘‘तुम सही कहती हो ऋ तु, यह मैथ्स तुम्हारे बस की नहीं है, तुम्हारा तो इस में पास होना भी मुश्किल है यार.’’

पिनाकी ने अपना सिर धुनते हुए कहा तो ऋ तु को हंसी आ गई. वह जोरजोर से हंसे जा रही थी और पिनाकी उसे अपलक निहारे जा रहा था. उस के जाने के बाद पिनाकी तकिए को सीने से चिपटाए ऋ तु के ख्वाब देखने में मगन हो गया. जब वह उस के पास बैठी थी तो उस के लंबे खुले बाल पंखे की हवा से उड़ कर बारबार उस के कंधे को छू रहे थे और इत्र में घुली मदहोश करती उस की सांसों की खुशबू ने पिनाकी के होश उड़ा दिए थे. पर अपने मन की इन कोमल संवेदनशील भावनाओं को दिल में छिपा कर रखने में, इस दबीछिपी सी चाहत में, शायद उस के दिल को ज्यादा सुकून मिलता था.

कहते हैं अगर प्यार हो जाए तो उस का इजहार कर देना चाहिए. मगर क्या यह इतना आसान होता है और फिर दोस्ती में यह और भी ज्यादा मुश्किल हो जाता है, क्योंकि यह जो दिल है,  शीशे सा नाजुक होता है. जरा सी ठेस लगी नहीं, कि छन्न से टूट कर बिखर जाता है. इसीलिए अपने नाजुक दिल को मनामना कर दिल में प्रीत का ख्वाब संजोए पिनाकी ऋ तु की दोस्ती में ही खुश था, क्योंकि इस तरह वे दोनों जिंदादिली से मिलतेजुलते और हंसतेखेलते थे.

ऋतु भले ही पिनाकी के दिल की बात न समझ पाई हो पर उस की सहेली उमा ने यह बात भांप ली थी कि पिनाकी के लिए ऋ तु दोस्त से कहीं बढ़ कर है. उस ने ऋतु से कहा भी था, ‘‘तुझे पता है ऋतु, पिनाकी दीवाना है तेरा.’’

और यह सुन कर खूब हंसी थी वह और कहा था, ‘‘धत्त पगली, वह मेरा अच्छा दोस्त है. एक ऐसा दोस्त जो हर मुश्किल घड़ी में न जाने कैसे किसी सुपरमैन की तरह मेरी मदद के लिए पहुंच जाता है और फिर यह कहां लिखा है कि एक लड़का और एक लड़की दोस्त नहीं हो सकते, इस बात को दिल से निकाल दे, ऐसा कुछ नहीं है.’’

‘‘पर मैं ने कई बार उस की आंखों में तेरे लिए उमड़ते प्यार को देखा है, पगली चाहता है वह तुझे.’’

‘‘तेरा तो दिमाग खराब हो गया लगता है. उस की आंखें ही पढ़ती रहती है, कहीं तुझे ही तो उस से प्यार नहीं हो गया. कहे तो तेरी बात चलाएं.’’

‘‘तुझे तो समझाना ही बेकार है.’’

‘‘उमा, सच कहूं तो मुझे ये बातें बकवास लगती हैं. मुझे लगता है हमारे मातापिता हमारे लिए जो जीवनसाथी चुनते हैं, वही सही होता है. मैं तो अरेंज मैरिज में ज्यादा विश्वास रखती हूं, सात फेरों के बाद जीवनसाथी से जो प्यार होता है वही सच्चा प्यार है और वह प्यार कभी उम्र के साथ कम नहीं होता बल्कि और बढ़ता ही है.’’

उमा आंखें फाड़े ऋ तु को देख रही थी, ‘‘मैं ने सोचा नहीं था कि तू इतनी ज्ञानी है. धन्य हो, आप के चरण कहां हैं देवी.’’ और फिर दोनों खिलखिला कर हंस पड़ीं.

इस के बाद फिर कभी उमा ने यह बात नहीं छेड़ी, पर उसे इस बात का एहसास जरूर था कि एक न एक दिन यह एकतरफा प्यार पिनाकी को तोड़ कर रख देगा. पर कुछ हालात होते ही ऐसे हैं जिन पर इंसान का बस नहीं चलता. और अब घर में भी ऋ तु की शादी के चर्चे चलने लगे थे, जिन्हें सुन कर वह मन ही मन बड़ी खुश होती थी कि चलो, अब कम से कम पढ़ाई से तो छुटकारा मिलेगा. सुंदर तो थी ही वह, इसीलिए रिश्तों की लाइन सी लग गई थी.

उस के दोनों भाई हंसते हुए चुटकी लेते थे, ‘‘तेरी तो लौटरी लग गई ऋ तु, लड़कों की लाइन लगी है तेरे रिश्ते के लिए. यह तो वही बात हुई, ‘एक अनार और सौ बीमार’?’’

‘‘मम्मी, देखो न भैया को,’’ यह कह कर वह शरमा जाती थी.

ऋतु और उमा बड़े गौर से कुछ तसवीरें देखने में मग्न थीं. ऋ तु तसवीरों को देखदेख कर टेबल पर रखती जा रही थी, फिर अचानक एक तसवीर पर उन दोनों सहेलियों को निगाहें थम गईं. दोनों ने एकदूसरे की तरफ देखा. ऋतु की आंखों की चमक साफसाफ बता रही थी कि उसे यह लड़का पसंद आ गया था. गोरा रंग, अच्छी कदकाठी और पहनावा ये सारी चीजें उस के शानदार व्यक्तित्व की झलकियां लग रही थीं. उमा ने भौंहें उचका कर इशारा किया तो ऋतु ने पलक झपका दी. उमा बोली, ‘‘तो ये हैं हमारे होने वाले जीजाजी,’’ उस ने तसवीर ऋ तु के हाथ से खींच ली और भागने लगी.

‘‘उमा की बच्ची, दे मुझे,’’ कहती ऋ तु उस के पीछे भागी.

पर उमा ने एक न सुनी, तसवीर ले जा कर ऋतु की मम्मी को दे दी और बोली, ‘‘यह लो आंटी, आप का होने वाला दामाद.’’

मां ने पहले तसवीर को, फिर ऋतु को देखा तो वह शरमा कर वहां से भाग गई. लड़का डाक्टर था और उस का परिवार भी काफी संपन्न व उच्च विचारों वाला था. एक लड़की जो भी गुण अपने पति में चाहती है वे सारे गुण उस के होने वाले पति कार्तिक में थे. और क्या चाहिए था उसे. उस की जिंदगी तो संवरने जा रही थी और वह यह सोच कर भी खुश थी कि अब शादी हो जाएगी तो पढ़ाई से पीछा छूटेगा.

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उस ने जितना पढ़ लिया, काफी था. पर लड़के वालों ने कहा कि उस का ग्रेजुएशन पूरा होने के बाद ही वे शादी करेंगे. ऋ तु की सहमति से रिश्ता तय हुआ और आननफानन सगाई की तारीख भी पक्की हो गई.

सगाई के दिन पिनाकी और उस का परिवार वहां मौजूद नहीं था. उस की दादी की बीमारी की खबर सुन कर वे लोग गांव चले गए थे. गांव से लौटने में उन्हें 15 दिन लग गए. वापस लौटा तो सब से पहले ऋ तु को ही देखना चाहता था पिनाकी. और ऋ तु भी उतावली थी अपने सब से प्यारे दोस्त को सगाई की अंगूठी दिखाने के लिए. जैसे ही उसे पता चला कि पिनाकी लौट आया है वह दौड़ीदौड़ी चली आई पिनाकी के घर. पिनाकी की नजर खिड़की के बाहर उस के घर की ओर ही लगी थी. जब उस ने ऋ तु को अपने घर की ओर आते देखा तो वह सोच रहा था आज कुछ भी हो जाए वह उसे अपने दिल की बात बता कर ही रहेगा. उसे क्या पता था कि उस की पीठ पीछे उस की दुनिया उजाड़ने की तैयारी हो चुकी है.

‘‘पिनाकी बाबू, किधर हो,’’ ऋतु शोर मचाती हुई अंदर दाखिल हुई.

‘‘हैलो ऋतु, आज खूब खुश लागछी तुमी?’’ पिनाकी की मां ने उस के चेहरे पर इतनी खुशी और चमक देख कर पूछा.

‘‘बात ही कुछ ऐसी है आंटी, ये देखो,’’ ऐसा कह कर उस ने अपनी अंगूठी वाला हाथ आगे कर दिया और चहकते हुए अपनी सगाई का किस्सा सुनाने लगी.

पिनाकी पास खड़ा सब सुन रहा था. उसे देख कर ऋ तु उस के पास जा कर अपनी अंगूठी दिखाते हुए कहने लगी, ‘‘देख ना, कैसी है, है न सुंदर. अब ऐसा मुंह बना कर क्यों खड़ा है, अरे यार, तुम लोग गांव गए थे और मुहूर्त तो किसी का इंतजार नहीं करता न, बस इसीलिए, पर तू चिंता मत कर, तुझे पार्टी जरूर दूंगी.’’

पिनाकी मुंह फेर कर खड़ा था, शायद वह अपने आंसू छिपाना चाहता था. फिर वह वहां से चला गया. ऋ तु उसे आवाज लगाती रह गई.

‘‘अरे पिनाकी, सुन तो क्या हुआ,’’ ऋ तु उस की तरफ बढ़ते हुए बोली.

पर वह वापस नहीं आया और दोबारा उसे कभी नहीं मिला क्योंकि अगले दिन ही वह शहर छोड़ कर गांव चला गया. ऋ तु सोचती रह गई. ‘‘आखिर क्या गलती हुई उस से जो उस का प्यारा दोस्त उस से रूठ गया. उस की शादी हो गई और वह अपनी गृहस्थी में रम गई पर पिनाकी जैसे दोस्त को खो कर कई बार उस का दुखी मन पुकारा करता, ‘‘कहां हो तुम?’’

निष्पक्ष पत्रकारों पर सरकारी दमन के खिलाफ

लेखक- रोहित व शाहनवाज

26 जनवरी को दिल्ली में किसानों की ट्रैक्टर रैली के दौरान ‘असत्यापित’ खबर शेयर करने के चलते पत्रकारों पर लगाए गए गंभीर आरोपों, जिस में देशद्रोह जैसे संगीन आरोप भी शामिल हैं, के बारे में मीडिया और पत्रकारों की यूनियन बौडी ने 30 जनवरी को दिल्ली के प्रेस क्लब औफ इंडिया में एक प्रेस कौंफ्रेंस कर अपना विरोध दर्ज किया.

इस संयुक्त प्रैस कौंफ्रेंस का आयोजन प्रैस क्लब औफ इंडिया (पीसीआई), एडिटर्स गिल्ड औफ इंडिया, प्रैस एसोसिएशन, भारतीय महिला प्रैस कोर (आईडब्लूपीसी), दिल्ली यूनियन औफ जर्नलिस्ट्स (डीयूजे) और इंडियन जर्नलिस्ट्स यूनियन (आईजेयू) इत्यादि द्वारा किया गया था, जिस में कई मुख्य मीडिया पर्सनैलटीज भी शामिल थीं.

दरअसल, 28 जनवरी को उत्तर प्रदेश पुलिस और मध्य प्रदेश पुलिस ने ‘द कारवां’ के मुख्य संपादक परेश नाथ, संपादक अनंत नाथ और कार्यकारी संपादक विनोद के. जोस के साथ ‘नेशनल हेराल्ड’ की सीनियर कंसल्टिंग एडिटर मृणाल पांडे, ‘इंडिया टुडे ग्रुप’ के सीनियर पत्रकार राजदीप सरदेसाई, ‘कौमी आवाज’ के एडिटर जफर आगा, सांसद शशि थरूर द्वारा 26 जनवरी, 2021 को दिल्ली में ट्रैक्टर रैली के दौरान एक किसान की मौत पर असत्यापित ट्वीट करने के आरोप में यह एफआईआर दर्ज किया.

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उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा सेडिशन के साथ अन्य आरोप लगाए गए हैं, जबकि एमपी पुलिस ने दुश्मनी को बढ़ावा देने का मामला दर्ज किया है.

बता दें, उन पर भारतीय दंड सहिता 1860 के तहत 124ए (देशद्रोह), 153ए (विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देना), 153बी (राष्ट्रीय-एकीकरण के लिए पूर्वाग्रह से जुड़े दावे) और अन्य धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है. इस मामले में कुल 11 धाराएं लगाई गई हैं, जिस में से 10 भारतीय दंड सहिता 1860 के तहत अंगरेजी हुकूमत से चलती आ रही हैं, जिस का विरोध समयसमय पर मानवाधिकारियों द्वारा होता रहा है. जिस पर आरोप लगता रहा है कि यह सरकार द्वारा अपने खिलाफ उठ रही आवाज को दबाने की साजिश का हिस्सा रहता है.

उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बाद इस सिलसिले में इन के खिलाफ मामलों को आगे बढ़ाने वाला हरियाणा तीसरा राज्य बन गया है. ध्यान देने वाली बात यह है कि तीनों राज्यों में भाजपा सत्ता में है, वहीं केंद्र के अधीन दिल्ली पुलिस द्वारा भी इस के तहत मामला दर्ज किया जा चुका है.

पत्रकारों पर लगाए गए इन संगीन आरोपों के खिलाफ ‘एडिटर गिल्ड औफ इंडिया’ की तरफ से 29 जनवरी को एक प्रैस स्टेटमेंट भी जारी किया गया था, जिस में उन्होंने विभिन्न भाजपाई राज्यों के प्रशासन द्वारा किए गए इस कृत्य की कड़े शब्दों में निंदा की, जिस में उन्होंने यह मांग की, “एफआईआर को तुरंत वापस लिया जाए और मीडिया को बिना किसी भय और स्वतंत्रता के साथ रिपोर्ट करने की अनुमति दी जाए.”

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उन्होंने आगे कहा, “हम अपनी पहले की मांग पर भी फिर से जोर देते हैं कि उच्च न्यायपालिका इस तथ्य को गंभीरता से संज्ञान में लें कि ‘देशद्रोह’ जैसे कानूनों का इस्तेमाल अकसर फ्रीडम औफ स्पीच को बाधित करने के लिए किया जाता है, जिस पर यह सुनिश्चित करने के लिए दिशानिर्देश जारी करें कि ऐसे कानूनों का उपयोग स्वतंत्र मीडिया के लिए उचित नहीं है.”

30 जनवरी को मीडिया से जुड़े यूनियनों ने इस विषय पर प्रैस कौंफ्रेंस की, जिस में अभिव्यक्ति की आजादी के खिलाफ इस प्रकार के संगीन सेडिशन जैसे आरोपों का विरोध किया व प्रैस स्टेटमेंट जारी किया.

‘प्रैस क्लब औफ इंडिया’ के प्रैसिडेंट आनंद किशोर सहाय ने प्रशासन की इस कार्यवाही का विरोध किया और कहा, “सेडिशन एक ऐसा कानून है, जिस की जगह दुनिया के किसी भी लोकतांत्रिक देश में नहीं होनी चाहिए.”

वे कहते हैं, “यह पहली बार नहीं है, जब पत्रकारों के साथ ऐसा हो रहा हो, इस से पहले भी विनोद दुआ, प्रशांत कनौजिया व अन्य के खिलाफ सेडिशन का चार्ज लगाया जा चुका है.

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साल 2017-18, नेशनल कमीशन फौर रिसर्च पुलिस ब्यूरो के अनुसार, लगभग 70-80 लोगों पर हर साल सेडिशन का चार्ज लगाया जा रहा है. 20 राज्यों में लगभग 55 पत्रकारों पर एफआईआर दर्ज हैं. कई मामले ऐसे हैं, जिन में पत्रकारों पर यूएपीए जैसे खतरनाक कानून लगाए गए हैं, जिन में बेल तक संभव नहीं है.”

एडिटर गिल्ड की प्रैसिडेंट सीमा मुस्तफा कहती हैं, “सेडिशन का कानून, जिसे पहले ही रद्द कर दिया जाना चाहिए था, उसे बेधड़क डराने और उत्पीड़ित करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है, ताकि कोई सवाल न उठाया जा सके.”

वे आगे कहती हैं, “हर कोई पत्रकार जो फील्ड पर हैं, कनफ्लिक्ट कवर कर रहे हैं, जो सड़क पर हैं, हर किसी को पता है कि गलतियां हो सकती हैं. जब आप चश्मदीदों को आधार बना कर अपनी रिपोर्टिंग करते हैं, चाहे वह असम के गृह युद्ध में हो, 84 के दिल्ली दंगों में हो, उत्तर प्रदेश व बिहार की जातीय हिंसा पर हो, आप जानते हैं कि आप उन्हीं चश्मदीदों के बयान के आधार पर ही रिपोर्ट बना रहे हैं.

“आज के समय में जल्द से जल्द रिपोर्ट बनाने की होड़ है. इस में गलतियों की संभावना हो सकती है, लेकिन उस पर सेडिशन जैसा कानून लगा देना क्या सही है? जबकि यह पता हो कि बिना किसी सुनवाई के इस केस में आप को बंद किया जा सकता है.”

सीमा मुस्तफा कहती हैं, “यह सब इसीलिए हो रहा है ताकि पत्रकारों को डराया, धमकाया और उत्पीड़ित किया जा सके. इस के साथसाथ पेशेगत रूप से काम कर रहे इसी फील्ड के लोगों को आतंकित किया जा सके. आज एक फेसबुक पोस्ट से 3 जर्नलिस्ट्स पर ऐसे केस डाल दिए हैं, वहीं एक ट्वीट के कारण सेडिशन के चार्ज लगा दिए हैं. यह एक पैटर्न है, जिस का संदेश साफ है कि चुप हो जाओ.”

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दिल्ली यूनियन औफ जर्नलिस्ट्स (डीयूजे) के प्रैसिडेंट एसके पांडे का मानना है कि प्रशासन की पत्रकारों पर यह कार्यवाही अघोषित आपातकाल का प्रतीक है. वे कहते हैं, “लोग पहले भी आपातकाल की स्थिति देख चुके हैं, हम और भी बदतर स्थिति की तरफ आगे बढ़ रहे हैं, जहां अगर आप उन शक्तियों के खिलाफ आवाज उठाते हैं, तो उन के द्वारा आप पर निशाना बनाया जाएगा. चाहे वह देशद्रोह के माध्यम से हो, या एफआईआर दर्ज करने के माध्यम से, ताकि आप लड़ने की इच्छा खो दें या मजबूर महसूस करें.”

भारतीय महिला प्रैस कोर (आईडब्लूपीसी) से विनीता कहती हैं, “सरकार और पत्रकारों की आपस में कभी दोस्ती नहीं हो सकती. पत्रकारों का काम सरकार को आईना दिखाना है. मैं सीपीजी का डेटा देख रही थी तो पता चला कि इजिप्ट, टर्की, चाइना और सऊदी अरबिया इन देशों में सब से ज्यादा पत्रकारों को जेल होती है और अब मुझे लगता है कि भारत भी उस लिस्ट में जल्द ही शामिल होने वाला है. अगर आप एक ट्वीट पर सेडिशन जैसा चार्ज लगाते हैं, तो आप पूरे जस्टिस सिस्टम का मजाक उड़ा रहे हैं. पुलिस को पत्रकारों पर तुरंत कोई न कोई सेक्शन ठोकने में एक मिनट का भी समय नहीं लगता. सरकार के पास ही अपने फोरम हैं, वे प्रैस कौंसिल, प्रैस एसोसिएशन में जा सकते हैं, जहां पर वो किसी पत्रकार की शिकायत कर सकते हैं. लेकिन इस में तो कोई सड़क चलता आदमी किसी भी पत्रकार पर सेडिशन जैसा चार्ज लगा देगा.”

वे आगे कहती हैं, “हम कुछ समय से लगातार ही एक तरीके का पैटर्न देख रहे हैं. ऐसा लगता है कि सरकार ने पहले से ही चुनचुन कर लोगों को सलैक्ट किया हुआ है, जिन की एक गलती पर ही उन पर इस तरह से चार्जेज लगा दें. अगर हम सरकार की तारीफ और प्रशंसा के पुल नहीं बांध रहे तो हम आप के लिए बुरे हैं. हाल ही में उत्तर प्रदेश में ठंड में ठिठुरते बच्चों की सही रिपोर्टिंग करने के आरोप में 2 पत्रकारों पर यूएपीए का चार्ज लगा दिया. आप ने तो पूरे लौ सिस्टम का ही मजाक बना दिया है.”

इस बीच पत्रकार राजदीप सरदेसाई, जो उन पत्रकारों में से एक हैं, जिन के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है, ने भी देशद्रोह कानूनों के उदारवादी उपयोग की बात की और आलोचना की. उन्होंने कहा, “आप जम्मूकश्मीर या मणिपुर में पत्रकार हैं या कांग्रेसशासित राज्य में, राजद्रोह पत्रकारों के खिलाफ अस्वीकार्य आरोप है.”

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हम ने इस पूरे मामले को ले कर एसएन सिन्हा से बात की, जो आल इंडिया वोर्किंग न्यूज कैमरामेन एसोसिएशन के अध्यक्ष हैं. उन्होंने कहा, “जर्नलिस्ट आर नौट टेररिस्ट. जर्नलिस्ट का काम अथोरिटी से सवाल पूछना है. अगर हम सवाल पूछते हैं, तो हम पर सेडिशन का चार्ज लगा दिया जाता है. यह पूरा मामला कुछ इस प्रकार का है कि एक समय पर 4 तरह की खबरें आती हैं, हो सकता है कि एक वक्त तक आप को वह खबर लगे, लेकिन अंत में वह खबर न लगे, सेडिशन तो फिर भी नहीं बनता है. सेडिशन का कानून केवल लोगों को डराने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, ताकि वह सवाल न उठाए.”

वे आगे कहते हैं, “पहले के समय भी सरकारों ने इस कानून का इस्तेमाल किया है, पत्रकारों को चुप कराने के लिए पहले भी इस तरह के हथकंडे उपयोग किए गए हैं. लेकिन साल 2014 के बाद एक नया ट्रेंड चला है, जिस में सरकार दूसरी आवाज को सुनने को तैयार नहीं है. यह एक तरह से अथोरिटेरियन (अधिनायक) सरकार का स्टाइल है. पहले की सरकारें तो फिर भी लोगों की सुन लेती थीं, लेकिन यह सरकार तो किसी की भी सुनने को तैयार ही नहीं है.”

बता दें कि एसएन सिन्हा इंडियन जर्नलिस्ट यूनियन के पूर्व अध्यक्ष भी रह चुके हैं.

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वहीं हमारी बात जब सीनियर पत्रकार आशुतोष से हुई, तो उन्होंने बताया, “सेडिशन का चार्ज लगा कर सरकार पत्रकारों को दबाने का काम कर रही है. लेकिन अगर पत्रकार डर गए, तो लोकतंत्र सुरक्षित नहीं रहेगा. जो लोग सरकार के साथ हैं, उन पर किसी तरह का कोई ऐक्शन नहीं लिया जाता. वो चाहे सांप्रदायिकता फैलाएं, माइनौरिटीज को टारगेट करें, झूठ फैलाएं, नफरत का वातावरण पैदा करें, उन के खिलाफ कहीं कोई कानून नहीं है. जो सरकार के भोपूं बन जाएं वो फ्रीली घूम सकते हैं.”

वे आगे कहते हैं, “हमारे बीच के कुछ साथी सरकारी भोपूं बन चुके हैं, जिन्हें कुछ न कुछ फायदा सरकार से मिल ही रहा है. हम सरकार की चमचागिरी करने के लिए नहीं हैं, हम उन के अच्छे काम गिनवाने के लिए नहीं हैं, हम यह बताने के लिए हैं कि आप (सरकार) कहां क्या गलत कर रहे हैं.

बता दें कि इस कौंफ्रेंस में कई नामी और वरिष्ठ पत्रकार व वकील शामिल हुए, जिन में एनडीटीवी के मनोरंजन भारती व श्रीनिवास जैन, जय शंकर गुप्ता, शेखर गुप्ता, संजय हेगड़े व अन्य इत्यादि थे.

सरकार द्वारा निष्पक्ष पत्रकारिता कर रहे पत्रकारों पर उत्पीड़न मुखर होता जा रहा है. इस का ज्वलंत उदाहरण हमारे सामने है. स्वतंत्र व ‘द कारवां’ के लिए लिखने वाले पत्रकार मंदीप पुनिया की घटना इसी की ही जीतीजागती मिसाल है. 30 जनवरी की शाम को किसानों के आंदोलन को लगातार कवर कर रहे मंदीप को दिल्ली पुलिस ने रात को धरनास्थल से ही गिरफ्तार कर लिया. उन के खिलाफ सेक्शन 186, 323 और 353 के तहत आरोप दर्ज किया गया है. इस के पहले एक अन्य पत्रकार धर्मेंद्र को भी हिरासत में लिया गया था, जिन्हें सुबह 5:30 बजे छोड़ा गया, लेकिन मंदीप अभी भी पुलिस हिरासत में ही हैं. जिस के बाद सरकार के इस दमन के खिलाफ अब पत्रकार समूहों से विरोध होना शुरू हो चुका है.

भोजपुरी सुपरस्टार खेसारी लाल यादव का ये नया होली सॉन्ग हुआ वायरल

भोजपुरी सुपरस्टार खेसारी लाल यादव का पहला होली सॉन्ग रिलीज हो चुका है. इतने कम टाइम में सोशल मीडिया पर इस गाने को लाखों व्यूज मिले है. फैंस इस गाने को खूब पसंद कर रहे हैं.

खेसारी लाल यादव का यह नया होली गाना सोशल मीडिया पर छा गया है. इस गाने का नाम है ‘देवर चोली रंगे’. इस गाने को खुद सुपरस्टार खेसारी लाल यादव ने गाया हैं. और इस गाने को दीपक ठाकुर और गौरव रोशन ने म्यूजिक दिया है.

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बता दें कि अभी इस गाने का केवल ऑडियो ही जारी किया गया है. इस गाने के वीडियो रीलिज होने की उम्मीद की जा रही है.

 

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हाल ही में खेसारीलाल यादव का गाना ‘हार गया मेहरारू से’  दर्शकों के बीच छाया हुआ था. इस गाने में खेसारीलाल यादव के साथ एक्ट्रेस चांदनी सिंह भी  हैं. इस गाने में दोनों जबरदस्त डांस और रोमांस करते दिखाई दे रहे हैं. खेसारी लाल यादव ने इस गाने को भी खुद ही गाया है.

Bigg Boss 14: गोपी बहू ने खोया आपा, गुस्से में अर्शी खान को सुनाईं खरी-खोटी

‘बिग बॉस 14’ के लेटेस्ट एपिसोड में दर्शकों का भरपूर एंटरटेनमेंट हो रहा है. जी हां घर में मौजूद कंटेस्टेंट के बीच तीखी बहस जारी है. आइए जानते हैं, शो के लेटेस्ट एपिसोड के बारे में.

शो के लेटेस्ट एपिसोड में दिखाया गया कि राहुल वैद्य (Rahul Vaidya) , अर्शी खान (Arshi Khan) को परेशान करने की प्लानिंग की और वो अपनी प्लानिंग में कमयाब भी हो गये.

दरअसल इस प्लानिंग के अनुसार, राहुल और अली गोनी, अर्शी खान के सामने राखी सावंत की तारीफ करते हुए दिखे. दोनों अर्शी के सामने ये कहा कि राखी सावंत तो टॉप 3 में जाकर ही रहेंगी और ये बात अर्शी हजम नहीं कर पाईं.

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अर्शी ने जाकर राखी सावंत से कहा, अली गोनी और राहुल वैद्य का कहना है कि तुम इस हफ्ते घर से बेघर होने वाली हो. राखी सावंत के साथ किचन में मौजूद देवोलीना भट्टाचार्जी (Devoleena Bhattacharjee) बाहर आईं और उन्होंने अली-राहुल से ये बात पूछी तो अर्शी खान की पोल खुल गई.

तो वहीं देवोलीना भट्टाचार्जी ने अर्शी से कहा कि ऐसे ही घरवालों के बीच में आग लगाती हैं. घर में जैसे ही देवोलीना  ने ये बात कही, इसके बाद  अर्शी खान और उनके बीच खूब लड़ाई हुई. देवोलीना भट्टाचार्जी अपना आपा खो बैठी और अर्शी खान को खूब गाली दी, यहां तक की, उन्होंने अर्शी को मिडिल फिंगर भी दिखा दी.

अर्शी खान ने भी देवोलीना को करारा जवाब देते हुए कहा कि अगर वो बार-बार बदतमीजी करेंगी तो वो उन्हें झापड़ भी मार देंगी.

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क्या Sidharth Shukla और Shehnaaz Gill ने कर ली है शादी? जानिए Viral Photo का सच

पंजाब की कटरीना कैफ शहनाज गिल (Shehnaaz Gill) और मशहूर एक्टर सिद्धार्थ शुक्ला (Sidharth Shukla) से जुड़े खबर का फैंस को बैसब्री से इंतजार रहता है. उन दोनों की जोड़ी को फैंस खूब पसंद करते हैं.

सिद्धार्थ और शहनाज, दोनों को अक्सर साथ में देखा जाता है लेकिन उन्होंने अपने रिलेशनशिप को लेकर औफिशियल अनाउंसमेंट नहीं किया है. तो इसी बीच उन दोनों की एक फोटो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रही है.

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दरअसल इस फोटो में शहनाज गिल की मांग में सिंदूर नजर आ रहा और सिद्धार्थ शुक्ला भी इस फोटो में दिखाई दे रहे हैं. और इस फोटो के कैप्शन में लिखा है कि ये कसने किया.

सोशल मीडिया पर यह फोटो वायरल होते ही फैंस भी बार-बार यही सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर ये सब कब हुआ. कई यूजर्स ने इस फोटो पर कमेंट किया है.

एक यूजर ने लिखा, दोनों एक दूसरे के लिए बने हैं. इस फोटो में शहनाज की मांग में सिंदूर और गले में मंगलसूत्र दिखाई दे रहा है तो वहीं सिद्धार्थ शुक्ला सफेद रंग की शर्ट पहने हुए है.

 

बता दें कि सिद्धार्थ शुक्ला और शहनाज गिल की इस फोटो को सोशल मीडिया पर फैन ने एडिट किया है. सिडनाज की दोस्ती बिग बॉस 13 के घर में हुई थी और अक्सर आज भी उन दोनों को साथ में देखा जाता है.

दोनों ने साथ में कई म्यूजिक वीडियोज में एक साथ काम कर चुके हैं. हाल ही में दोनों के ‘शोना शोना’ गाने ने यूट्यूब 100 मिलियन व्यूज क्रौस किए हैं.

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6 साल से मेरा तलाक का केस चल रहा है पर कोई फैसला नहीं हुआ है, मैं क्या करूंं?

सवाल

मैं 33 साल का हूं. मेरी पत्नी 8 साल से मेरे साथ नहीं रह रही है. 6 साल से मेरा तलाक का केस चल रहा है, पर अभी तक कोई फैसला नहीं हुआ है. मैं बहुत परेशान हूं. क्या करूं?

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जवाब

अदालती कार्यवाही में सालों गुजर जाते हैं. आप को तलाक के बजाय समझौते वाला रास्ता अपनाना चाहिए था. आप अभी भी बीवी से बात कर के टूटा घर जोड़ सकते हैं, वरना इंतजार के अलावा कुछ नहीं कर सकते.

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अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz
 
सब्जेक्ट में लिखे…  सरस सलिल- व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

 

वे 3 दिन: इंसान अपनी नई सोच से मौडर्न बनता है!

Valentine’s Special: उसके लिए- क्या प्रणव की हो पाई अपूर्वा

वह मुंह फेर कर अपूर्वा के सामने खड़ा था. अपूर्वा लाइब्रेरी में सैल्फ से अपनी पसंद की किताबें छांट रही थी. पैरों की आवाज से वह जान गई थी कि प्रणव है. तिरछी नजर से देख कर भी अपूर्वा ने अनदेखा किया. सपने में यह न सोचा था कि दिलफेंक आशिक किसी दिन इस तरह से आ सकता है. दोनों का यह प्यार परवान तो नहीं चढ़ा, पर दिलफेंकों के लिए जलन का सबब रहा. प्रणव तो अपूर्वा की सीरत और अदाओं पर ही क्या काबिलीयत पर भी फिदा था. रिसर्च पूरी होने तक पहुंचतेपहुंचते एक अपूर्वा ही उस के मन चढ़ी. मन चढ़ने के प्रस्ताव को उस के साथ 2 साल गुजारते भी उगल न सका.

अपूर्वा प्रणव की अच्छी सोच की अपनी सहेलियों के सामने कई बार तारीफ कर चुकी थी. मनचले और मसखरे भी प्रणव को छेड़ते, ‘अपूर्वा तो बनी ही आप के लिए है.’

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कुछ मनचले ऐसा कहते, ‘यह किसी और की हो भी कैसे सकती है? यह ‘बुक’ है, तो सिर्फ आप के वास्ते.’

कुछ कहते, ‘इसे तो कोई दिल वाला ही प्यार कर सकता है.’

अपूर्वा के सामने आने का फैसला भी प्रणव का एकदम निजी फैसला था. यह सब उस ने अपूर्वा के दिल की टोह लेने के लिए किया था कि वह उसे इस रूप में भी पसंद कर सकती है या नहीं. प्रणव ने बदन पर सफेद कपड़ा पहन रखा था और टांगों पर धोतीनुमा पटका बांधा था. पैरों में एक जोड़ी कपड़े के बूट थे. माथे पर टीका नहीं था. अपूर्वा रोज की तरह लाइब्रेरी में किताबें तलाशने में मगन थी.

प्रणव दबे पैर उस के बहुत करीब पहुंचा और धीमे से बोला, ‘‘मिस अपूर्वा, मुझे पहचाना क्या?’’ अपूर्वा थोड़ा तुनकते हुए बोली, ‘‘पहचाना क्यों नहीं…’’ फिर वह मन ही मन बुदबुदाई, ‘इस रूप में जो हो.’

प्रणव ने कनैक्शन की गांठ चढ़ाने के मकसद से फिर पूछा, ‘‘मिस अपूर्वा, मैं ने आप के पिताजी को अपनी कुछ कहानियों की किताबें आप के हाथ भिजवाई थीं. क्या आप ने उन्हें दे दी थीं?’’

‘‘जी हां, दे दी थीं,’’ वह बोली.

‘‘आप के पिताजी ने क्या उन्हें पढ़ा भी था?’’

‘‘जी हां, उन्होंने पढ़ी थीं,’’ अपूर्वा ने छोटा सा जवाब दिया.

‘‘तो क्या आप ने भी उन्हें पढ़ा था?’’

‘‘हां, मैं ने भी वे पढ़ी हैं,’’ किताबें पलटते व छांटते हुए अपूर्वा ने जवाब दिया और एक नजर अपने साथ खड़ी सहेली पर दौड़ाई.

सहेली टीना ने बड़ी मुश्किल से अपनेआप को यह कहते हुए रोका, ‘‘रसिक राज, उन्हें तो मैं ने भी चटकारे लेते गटक लिया था. लिखते तो आप अच्छा हो, यह मानना पड़ेगा. किसी लड़की को सस्ते में पटाने में तो आप माहिर हो. चौतरफा जकड़ रखी है मेरी सहेली अपूर्वा को आप ने अपने प्रेमपाश में.’’ प्रणव ने फिर हिम्मत जुटा कर पूछा, ‘‘मिस अपूर्वा, क्या मैं उन किताबों की कहानियों में औरत पात्रों के मनोविज्ञान पर आप की राय ले सकता हूं? क्या मुझे आज थोड़ा वक्त दे सकती हैं?’’

अपूर्वा इस बार जलेकटे अंदाज में बोली, ‘‘आज तो मेरे पास बिलकुल भी समय नहीं है. हां, कल आप से इस मुद्दे पर बात कर सकती हूं.’’

प्रणव टका सा जवाब पा कर उन्हीं पैरों लाइब्रेरी से बाहर आ गया. अगले कल का बिना इंतजार किए लंबा समय गुजर गया, साल गुजर गए. इस बीच बहुतकुछ बदला. अपूर्वा ने शादी रचा ली. सुनने में आया कि कोई एमबीबीएस डाक्टर था. खुद प्रोफैसर हो गई थी. बस…

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प्रणव ने सिर्फ शादी न की, बाकी बहुतकुछ किया. नौकरीचाकरी 3-4 साल. संतों का समागम बेहिसाब, महंताई पौने 4 साल. 65 साल का होने पर लकवे ने दायां हिस्सा मार दिया. लिखना भी छूट गया. नहीं छूटा तो अपूर्वा का खयाल.

लंगड़ातेलंगड़ाते भाई से टेर छेड़ता है अनेक बार. कहता है, ‘‘भाई साहब, वह थी ही अपूर्वा. जैसा काम, वैसा गुण. पढ़नेलिखने में अव्वल. गायन में निपुण, खेलकूद में अव्वल, एनसीसी की बैस्ट कैडेट, खूबसूरत. सब उस के दीवाने थे.

‘‘वह सच में प्रेम करने के काबिल थी. वह मुझ से 9 साल छोटी थी. मैं तो था अनाड़ी, फिर भी उस ने मुझे पसंद किया.’’

प्रणव का मन आज बदली हुई पोशाक में भी अपूर्वा के लिए तड़प रहा है. भटक रहा है. उसे लगता है कि अपूर्वा आज भी लाइब्रेरी की सैल्फ से किताबें तलाश रही है, छांट रही है. एनसीसी की परेड से लौट रही है. वह उसे चाय पिलाने के लिए कैंटीन में ले आया है. पहली बार पीले फूलदार सूट में देखी थी अपने छोटे भाई के साथ. रिसैप्शन पार्टी में उस ने सुरीला गीत गया था. श्रोता भौंचक्क थे. प्रणव ने कविता का पाठ किया था. इस के बाद पहली नजर में जो होता है, वह हुआ. कविताकहानियों की पोथियां तो आईं, पर रिसर्च पूरी नहीं हुई. वह अभी भी जारी है.

40-45 सालों के बाद भी ये सारे सीन कल की बात लगते हैं. बारबार दिलोदिमाग पर घूमते हैं. वह कल आज में नहीं बदल सकता, प्रणव यह बात अच्छी तरह जानता है. वह आज सिर्फ अपूर्वा की खैर मांगता है. उस की याद में किस्सेकहानियां गढ़ता है. उस की खुशहाली के गीत रचता है.

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