Crime: एक ठग महिला से ‘दोस्ती का अंजाम’

सोशल मीडिया पर  खूबसूरत महिला से दोस्ती कुछ लोग गर्व का सबब मानते हैं. मृगतृष्णा सामान सोशल मीडिया का यह संसार मन को आकर्षित करता है. जहां कोई खूबसूरत चेहरा देखा तो फ्रेंडशिप करने के लिए मन लालयित हो उठता है. ऐसे में अगर कोई खूबसूरत चेहरा फ्रेंडशिप रिक्वेस्ट भेजे  तो कौन मना कर सकता है!

और जब खूबसूरत चेहरा  फोन पर बात करने लगता है ऐसे में आमतौर पर पुरुष वर्ग अपनी सुध बुध बिसार बैठता है. और कब यह खूबसूरत अदाएं ” बला” बन जाती है, पता ही नहीं चलता.

इस रिपोर्ट में आज आपको कुछ ऐसी ही घटनाओं के बारे में बताते हुए हम यह ठोस जानकारी दे रहे हैं कि आप और आपके आसपास के लोग सुरक्षित रहे.

पहली घटना-

मध्य प्रदेश के कटनी में सोशल मीडिया की फ्रेंडशिप में,एक उद्योगपति एक खूबसूरत लड़की के फेर में पड़कर लाखों रूपए लुटाने के बाद होश में आया. मामला पुलिस तक पहुंचा तो लड़की फरार हो गई. आखिर जेल की हवा खा रही है.

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दूसरी घटना-

राजस्थान की राजधानी जयपुर में एक अफसर महिला के मोह जाल में फंस गया ब्लैकमेल का शिकार हो गया जब मामला पुलिस तक पहुंचा तो पुलिस ने न्याय किया महिला जेल भेज दी गई.

तीसरी घटना-

छत्तीसगढ़ के रायपुर में एक अभिनेता महिला के चक्कर में पड़ गया लाखों रुपए ब्लेक मेल करने पर देने पड़े अंततः महिला पुलिस के शिकंजे में फसी.

सोशल मीडिया की बला!

फेसबुक पर दोस्ती कर पैसे ऐंठने वाली एक महिला को बस्तर पुलिस ने दिल्ली से गिरफ्तार किया है. साथ में उसके दो साथियों को भी पुलिस ने दबोचा है. आरोपियों के कब्जे से लाखों रुपये नगदी समेत अन्य सामान भी बरामद किया . पुलिस ने हमारे संवाददाता को बताया कि अगस्त 2020 में सरदार दरबारा सिंह ने रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि फेसबुक के माध्यम से एक “खूबसूरत महिला” ने उससे दोस्ती की.

दोस्ती करने के बाद विदेश से गिफ्ट मंगाकर उसे भेजने और गिफ्ट में कस्टम ड्यूटी के बहाने अलग-अलग किश्तों में 27 लाख 75 हजार 7 सौ रुपये अपने खाते में जमा कराए. कुछ दिनों बाद एहसास हुआ कि वह ठगी का शिकार हो चुका है.

मामला दर्ज होते ही पुलिस कप्तान दीपक कुमार झा के दिशा-निर्देश पर बोधघाट टीआई राजेश मरई और निरीक्षक धनंजय सिन्हा के नेतृत्व में एक टीम का गठन किया गया. जिसके बाद टीम ने मामले की जांच शुरू की. जांच के दौरान ही पुलिस को पुख्ता सबूत मिलते चले गए. सबूतों के आधार पर पुलिस टीम को आरोपियों की दिल्ली में होने की सूचना मिली. पुलिस ने तीन आरोपियों शोभराज थापा (37), रेणुका पोंडेल (33) और राजू हितांग (26) को दिल्ली से गिरफ्तार कर जेल भेज दिया.

पुलिस अधिकारी ने हमारे संवाददाता कोबताया कि यह तीनों आरोपी मूलतः नेपाल के रहवासी  हैं. कुछ सालों से दिल्ली में रह कर ठगी का नेटवर्क चला रहे थे.

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खूबसूरत बलाओं से कैसे बचें?

सोशल मीडिया के इस्तेमाल के समय खूबसूरत चेहरे जो आकर्षित करते हैं. उनके पीछे का सच आप नहीं जानते. आपको पता नहीं कि इस चेहरे के पीछे  कोई महिला अथवा ऐसा पुरुष सकता है जो आपको “गहरा दंश” दे सकता है.

जैसे की कहावत है- सुरक्षा हटी दुर्घटना घटी वैसे ही सोशल मीडिया के प्लेटफार्म में भी- जैसे ही आप का ध्यान हटा और आप का एक्सीडेंट हुआ!

लाखों रुपए बर्बाद होना संभव हो सकता है. ऐसे में कुछ महत्वपूर्ण बातों को अपने मन मस्तिष्क में बैठा कर आप हमेशा के लिए एक सुरक्षा कवच बना सकते हैं.

जिसमें सबसे महत्वपूर्ण पहली बात यह है कि सोशल मीडिया में आप अपनी मर्यादा बनाए रखें. कभी भी मर्यादा का बंधन नहीं तोड़े. लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन न करें.

पुलिस अधिकारी इंद्रपाल सिंह के मुताबिक आजकल सोशल मीडिया का जाल विस्तार ले चुका है और आए दिन लोगों के लोग जाने का मामला प्रकाश में आ रहा है. ऐसे में हम यही सलाह देंगे की फेसबुक आदि सोशल मीडिया पर बहुत ही समझदारी से आप भूमिका निभाएं. आर्थिक मामलों में वकील अथवा पुलिस से सलाह ले कर के ही आपका कदम आगे बढ़ना चाहिए.

एनकाउंटर स्पेशलिस्ट: 86 शिकार बने दया नायक के

गरीबी से भी नीचे की रेखा से उठ कर देश का टौप 10 एनकाउंटर स्पैशलिस्ट बन जाना मामूली बात नहीं थी, लेकिन दया नायक बने. जब वह एक के बाद एक एनकाउंटर कर रहे थे, मुंबई चैन की…

आम आदमी और पुलिस में एक फर्क यह है कि किसी पर गोली चलाने के लिए एक की मजबूरी होती है, दूसरे की खुन्नस या लालच. गोली चला कर एक बहादुर बन जाता है, दूसरा हत्यारा. ऐसे हत्यारों से निपटने के लिए पुलिस होती है. और अगर पुलिस वाला दया नायक जैसा हो तो कहने की क्या?

मुंबई की पुलिस दया नायक, जिन पर नाना पाटेकर अभिनीत फिल्म ‘अब तक छप्पन’ बनी थी और पसंद भी की गई थी. वह व्यक्ति हैं जिन्होंने मुंबई के अंडरवर्ल्ड को हिला दिया था. उन्होंने 86 एनकाउंटर किए.
मारे गए सभी ऐसे दुर्दांत अपराधी और अंडरवर्ल्ड के लोग थे, जिन्होंने मुंबई की नींद हराम कर रखी थी. फिल्म निर्माताओं, अभिनेताओं और बड़े बिजनैसमैन से दाऊद और छोटा शकील के नाम पर रंगदारी वसूलने वाले और न देने पर उन्हें मौत के घाट उतार देने वाले. ऐसे में इंसपेक्टर दया नायक उन की मौत बन कर मैदान में उतरे.

लेकिन आगे बढ़ने से पहले बता दें, दया नायक यूं ही इतने बड़े एनकाउंटर स्पैशलिस्ट नहीं बन गए थे. वह बेहद गरीबी से उबर कर आए थे. कर्नाटक के उडुपी जिले के एनहोले गांव निवासी बड्डा और राधा की इस तीसरी संतान ने गरीबी को बहुत करीब से देखा और जिया.

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इसी के चलते उन्होंने 11 वर्ष की उम्र में घर छोड़ दिया और मुंबई आ गए. कितनी ही रातें रेलवे स्टेशनों पर सो कर गुजारीं. जैतैसे काम भी मिला तो ढाबे पर, वह भी वेटर का. थोड़े पैसे अलग से मिल जाएं, इस के लिए दया ने लोगों के घरों की टोंटियां तक ठीक करने का काम किया.

फिर एक कैंटीन में नौकरी मिल गई. काम आता था, मन में ईमानदारी और काम की लगन थी सो बाद में वर्सोवा के एक होटल में 600 रुपए पर नौकरी मिल गई. टिप मिला कर 7 साढ़े सौ रुपए हो जाते थे, जिस में से दया आधा पैसा मां को भेज दिया करते थे क्योंकि तब तक पिता का निधन हो चुका था.

पैसों की तंगी की वजह से पढ़ाई बचपन में ही छूट गई थी. पैसे मिलने लगे तो दया ने एक बार फिर पढ़ने का मन बनाया. होटल में काम करतेकरते उन्होंने पढ़ाई शुरू कर दी. होटल मालिक सहृदय था. दया की मेहनत और लगन देख कर उस ने उन का दाखिला गोरेगांव के एक नाइट स्कूल में करा दिया. इसी तरह अपनी मेहनत के बल पर दया ने एसएससी पास की. वह पुलिस में जाना चाहते थे, इसलिए उसी की परीक्षा की तैयारी की. इस के लिए उन्होंने बतौर लाइब्रेरियन दादर की एक लाइब्रेरी में नौकरी भी की.

उन की मेहनत रंग लाई और 1995 में वे मुंबई में सबइंसपेक्टर बन गए. जुहू पुलिस स्टेशन के डिटेक्शन विभाग में उन्हें जौइनिंग मिली. यहीं दया का सामना अंडरवर्ल्ड डौन छोटा राजन के गुर्गों से हुआ. इस मुकाबले में छोटा राजन के गुर्गों को मौत का मुंह देखना पड़ा.

यहीं से दया नायक की किस्मत पलटी. उन के हौसले को देखते हुए पूर्व पुलिस उपायुक्त चौधरी सतपाल सिंह (अब बीजेपी सांसद) ने उन्हें क्राइम इंटेलीजेंस यूनिट में शामिल करवा दिया.

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उस वक्त मुंबई के धुरंधर एनकाउंटर स्पैशलिस्ट प्रदीप शर्मा की देखरेख में उन्होंने सीआईयू जौइन कर लिया. दया नायक ने 1996 में प्रदीप शर्मा के साथ मिल कर अंडरवर्ल्ड डौन बबलू शर्मा के 2 गुर्गों को ढेर कर दिया. दया के एनकाउंटर स्पेशलिस्ट बनने की शुरुआत यहीं से हुई. उसी दौरान दया ने एलटीटीई के 3 सदस्यों को सरेआम मुठभेड़ में गोलियों से छलनी किया. ये तीनों गैंगस्टर अमर नाइक के लिए काम करते थे.

इस के बाद दया नायक ने सदिक कालिया, श्रीकांत मामा, रफीक डिब्बेवाला, परवेज सिद्दकी, विनोद भटकर और सुभाष समेत अंडरवर्ल्ड के दर्जनों गुंडों को मौत के घाट उतारा.
दया ने अपने गांव में एक शानदार स्कूल बनवाया जिस के उद््घाटन पर उन्होंने अमिताभ बच्चन जैसी कई जानीमानी हस्तियों को बुलवाया था.

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इस से उन पर अपने रसूख का गलत इस्तेमाल करने का आरोप लगा. उन पर आय से अधिक संपत्ति का मामला भी दर्ज हुआ, जिस में वह निर्दोष साबित हुए. 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने उन पर लगे सभी आरोप निरस्त कर दिए. 2012 में उन्हें फिर मुंबई पुलिस में शामिल कर लिया गया.

जौइनिंग के बाद दया नायक की पोस्ंटिंग नागपुर में की गई. पर वे वहां नहीं गए क्योंकि अंडरवर्ल्ड से उन के परिवार को खतरा था. इसी वजह से उन्हें 2015 में फिर निलंबित कर दिया गया.

2016 में दया नायक की पुलिस में फिर वापसी हुई और 2018 में उन्हें मुंबई के अंबोला पुलिस स्टेशन का इंस्पेक्टर बनाया गया. 2019 में दया नायक को एटीएस में ट्रांसफर कर दिया गया. फिलहाल दया नायक के खाते में 86 एनकाउंटर हैं. द्य

Birthday Special: भोजपुरी एक्ट्रेस Poonam Dubey बनना चाहती थीं एयर होस्टेस!

भोजपुरी सिनेमा की मशहूर एक्ट्रेस पूनम दुबे (Poonam Dubey) अपना 31वां जन्मदिन 9 फरवरी यानि कल सेलिब्रेट की. उनके बर्थडे के खास मौके पर पूनम दुबे के बारे में कुछ अनसुनी बातें बताते हैं, जिन्हें जानकार आप भी हैरान रह जाएंगे.

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पूनम दूबे ने बताया था कि वो कभी भी एक्ट्रेस नहीं बनना चाहती थीं. उनके मन में हमेशा से ही एक एयर होस्टेस बनने की इच्छा थी. इसके लिए पूनम दुबे के 3 महीने का कोर्स भी किया था.

 

खबरों के अनुसार, पूनम दुबे ने बताया कि उनकी मां को हवाई यात्रा करने से बहुत डर लगता है. उनकी मां ने ही पूनम को एयर होस्टेस बनने से मना किया था. उनकी मां ने यहां तक कह दिया था कि एयर होस्टेस बनने के अलावा कुछ भी बन जाओ.

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रिपोर्ट्स के अनुसार, इसके बाद पूनम दुबे के अंदर एक्ट्रेस बनने की इच्छा जागी और उन्होंने एक्टिंग की दुनिया में अपना करियर बनाने का मन बना लिया. और आज पूनम दुबे भोजपुरी इंडस्ट्री की मशहूर अभिनेत्री हैं. वह बॉलीवुड फिल्मों का भी हिस्सा रही चुकी हैं.

 

Bigg Boss 14 : कंटेस्टेंट्स के बीच Ticket to Finale के लिए होगा घमासान वार

बिग बॉस 14 का जल्द ही फिनाले एपिसोड टीवी पर प्रसारित किया जाने वाला है. और शो के विनर का नाम 21 फरवरी को ऐलान किया जाएगा.

शो में कंटेस्टेंट्स फिनाले में जाने के लिए जी जान से तैयारी में लगे हुए हैं. हर कंटेस्टेंट चाहता है कि वह फिनाले में जाए. शो के लेटेस्ट एपिसोड में टिकट टु फिनाले (Ticket To Finale) टास्क करवाया जाएगा, जिसके विनर को सीधे फाइनल का टिकट मिलेगा.

बिग बॉस 14 से जुड़ा लेटेस्ट प्रोमो जारी किया गया है. जिसमें आप देख सकते हैं कि इस टास्क में घरवाले एक-दूसरे पर जमकर वार करते दिखाई दे रहे हैं.

बता दें कि रुबीना दिलाइक (Rubina Dilaik) को सीधे फाइनल का टिकट नहीं मिलेगा क्योंकि रुबीना ने राखी सावंत पर पानी फेंक दिया था और इसी कारण बिग बॉस ने सजा के तौर उनसे ये अधिकार छीन लिया है.

इस टास्क में  जैस्मिन, निक्की तंबोली, देवोलीना, अली गोनी और राखी सावंत एक-दूसरे से भिड़ते हुए नजर आएंगे.  खबरों के अनुसार आज रात के एपिसोड में राहुल वैद्य और उनके कनेक्शन तोशी सबरी इस टास्क को जीतने के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार रहेंगे.

खबर ये भी आ रही है कि राहुल वैद्य अपनी दोस्त निक्की तम्बोली को भी धोखा दे देंगे. दरअसल टास्क के दौरान जब निक्की राहुल से कहेंगी कि वो स्ट्रेंथ का इस्तेमाल सही तरीके से करें तो वो बिफर जाएंगे. और इसके बाद राहुल वैद्य, तोशी सबरी से कहेंगे कि उन्हें निक्की को किसी भी तरह इस टास्क से आउट करना है,

Ankita Lokhande ने ऐसे किया ब्वायफ्रेंड विक्की जैन को प्रपोज, देखें Video

टीवी की फेमस एक्ट्रेस अंकिता लोखंडे सोशल मीडिया में काफी एक्टिव रहती हैं. वह इन दिनों अपने पोस्ट के जरिए सुर्खियों में छायी रहती हैं. फैंस को उनके फोटोज और वीडियो का बेसब्री से इंतजार रहता है.

अक्सर वह अपने विक्की जैन के साथ फोटोज सोशल मीडिया पर शेयर करती रहती हैं, तो वहीं अब एक्ट्रेस ने एक वीडियो शेयर कर विक्की को प्रपोज किया है.

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अंकित लोखंडे ने सोशल मीडिया पर इस वीडियो को शेयर करते हुए विक्की जैन को टैग किया है. और कैप्शन में लिखा, किसी का तो होगा ही तू.. क्यू ना तुझे मैं ही जीतू… हैप्पी प्रपोज डे’.

हाल ही में अंकिता ने पीले रंग की साड़ी पहनकर जोरदार डांस किया था. उन्होंने इस वीडियो को शेयर करते हुए लिखा था कि एक आर्टिस्ट हमेशा आर्टिस्ट होता है, चाहे वो छोटे-बड़े स्क्रीन पर परफॉर्म करे या फिर इंस्टाग्राम रील पर.

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अंकिता के एक्टिंग और डांसिंग को फैंस काफी पसंद करते हैं. डांस के मुश्किल स्टेप्स को भी अंकिता आसानी से कर लेती हैं, जिसे देखकर फैंस भी हैरान रह जाते हैं. वो उनकी जमकर तारीफ करते हैं.

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कभी हिम्मत नहीं हारी: डी रूपा

डी.रूपा वह चर्चित नाम है जिसे रूपा दिवाकर मौदगिल के नाम से भी जाना जाता है. देश की यह चर्चित
आईपीएस अफसर किसी परिचय की मोहताज नहीं, इन के चर्चे मीडिया में सुर्खियां बनते रहते हैं. बेबाक, निडर और साहसी आईपीएस डी. रूपा का सर्विस रिकौर्ड बड़ा शानदार रहा है, हालांकि इस के लिए उन को अभी तक 20 साल के कैरियर में 43 बार ट्रांसफर का दर्द झेलना पड़ा. लेकिन वह इसे अपनी नौकरी का हिस्सा मानती रहीं, कभी कोई शिकायत नहीं की.

वह जिस राज्य में रहीं, वहां का मुख्यमंत्री कभी चैन से नहीं सो पाया. क्योंकि डी. रूपा अपने काम के तरीकों से कब और कहां के भ्रष्टाचार का खुलासा कर दें या कोई ऐसी काररवाई कर दें कि राज्य में भूचाल आ जाए और वह मीडिया में छा जाए, कोई नहीं जान सकता.

डी. रूपा कभी गलत होते नहीं देख सकतीं, सच को सब के सामने लाने के लिए वह बिलकुल भी नहीं डरती, सामने वाला कितना भी ताकतवर और रसूख वाला हो, वह इस की बिलकुल परवाह नहीं करती.
देश की बागडोर असल मायनों में अफसरों के हाथ में होती है, यदि नौकरशाही दुरुस्त हो तो कानूनव्यवस्था चाकचौबंद रहती है. डी. रूपा जैसे ही अफसर हैं जो देश सेवा का जुनून लिए नौकरशाही की साख बचाए हुए हैं. अफसर चुपचाप शांति से अपनी सर्विस लाइफ जीते रहते हैं. विरले ही अफसर होते हैं जो सिस्टम और भ्रष्ट राजनेताओं के खिलाफ आवाज उठाते हैं. डी. रूपा ऐसे ही अफसरों में से एक हैं. उन की दिलेरी के किस्से आज मिसाल के तौर पर पेश किए जा रहे हैं.

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सिस्टम से भी टकरा जाने वाली कर्नाटक कैडर की आईपीएस डी. रूपा पहली महिला आईपीएस अफसर तो थी ही, साथ ही राज्य के गृह सचिव पद को संभालने वाली भी पहली महिला थीं. डी. रूपा कर्नाटक के पश्चिमी घाट की तलहटी में बसे दावणगेरे कस्बे में पैदा हुई थीं, तब यह जिला नहीं हुआ करता था. तब यह एक छोटा सा कस्बा हुआ करता था.

रूपा के पिता जे.एच. दिवाकर सरकारी टेलीकौम कंपनी बीएसएनएल में इंजीनियर थे. मां हेमावती पोस्ट औफिस में डाक अधीक्षक की पोस्ट पर थीं.

रूपा की एक छोटी बहन थी रोहिणी दिवाकर. रोहिणी 2008 बैच की आईआरएस अधिकारी हैं और संयुक्त आयकर आयुक्त के पद पर तैनात हैं.

डी. रूपा जब तीसरी कक्षा में थीं, तब क्लास टीचर ने बच्चों से कहा कि वे बडे़ हो कर क्या बनना चाहते हैं. आज मत बताओ, घर जाओ, अपने मातापिता से बात करो, फिर कल आ कर बताना.

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बनना चाहती थीं आईपीएस

डी. रूपा घर पहुंचीं. मां हेमावती से बात की कि उन को बड़े हो कर क्या बनना है तो उन की मां ने कहा कि डाक्टर बनो. रूपा को यह कुछ नहीं भाया तब उन्होंने पिता से बात की. उन्होंने कहा कि आईएएस या आईपीएस अफसर बनना.

पिता ने रूपा को इस बारे में भी बताया कि आईएएस बनने से डीसी सा डीएम बन जाते हैं और आईपीएस बनने से एसपी बन जाते हैं. यह लीडरशिप रोल रूपा को इतना भाया कि रूपा ने अगले दिन कक्षा में जा कर अपनी क्लास टीचर को अपने आईपीएस बनने की इच्छा बता दी.

रूपा ही अकेली ऐसी छात्रा थी, जिस ने पुलिस अधिकारी बनने की बात कही थी. यह सुन कर अध्यापिका ने सभी बच्चों को ताली बजाने को कहा. रूपा का जवाब सुन कर सभी खुश हुए. तब रूपा को लगा था कि इस में कुछ विशेषता है, बड़े हो कर आईएएस या आईपीएस बनना है.

इसी दौरान रूपा ने एनसीसी जौइन कर ली. गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में कैंप होता है. जब रूपा नौंवीं कक्षा में थी तब उस ने गणतंत्र दिवस पर अपने राज्य का प्रतिनिधित्व करने के लिए इस कैंप में भाग लिया था. यह मौका उन्हें तब मिला था, जब उन्होंने वहां तक पहुंचने के लिए 4-5 पड़ाव पार किए थे.

उस समय गणतंत्र दिवस के मौके पर देश की चर्चित महिला अफसर किरन बेदी आई थीं, उन्होंने वहां युवाओं को प्रेरित करने के लिए जो भाषण दिया, उस से रूपा काफी प्रेरित हुईं. उस समय प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए एक पत्रिका आती थी ‘कंप्टीशन सक्सेस रिव्यू’. यह पत्रिका किसी ने रूपा को पढ़ने के लिए दी.

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उस पत्रिका में यूपीएससी में टौप किए लोगों के इंटरव्यू और सौल्व्ड पेपर्स आते थे. उस पत्रिका को पढ़ कर रूपा ने जाना कि कैसे उसे इस क्षेत्र में कैरियर बनाना है. उस समय कर्नाटक में इंजीनियरिंग और मैडिकल कालेजों की भरमार थी.

इंजीनियर और डाक्टर बनने की हवा चल रही थी. कोई पुलिस सेवा में जाने की सोचता तक नहीं था. इस संबंध में अधिक जानकारी भी नहीं मिल पाती थी.

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इस के बावजूद रूपा ने पुलिस सेवा को अपना कैरियर बनाने की ठानी. उन्होंने साइकोलौजी और सोशियोलौजी में यूपीएससी पास करने की ठान ली. उन की जलती हुई महत्त्वाकांक्षा में ईंधन का काम किया टीवी धारावाहिक ‘उड़ान’ ने, जोकि देश की दूसरी महिला पुलिस अधिकारी कंचन चौधरी के जीवन से पे्ररित था. दूरदर्शन पर प्रसारित इस धारावाहिक में पुलिस अधिकारी को एक दोस्त और जनता के रक्षक के रूप में दिखाया गया था. दूरदर्शन देख देख कर ही रूपा ने हिंदी बोलना सीखा.
रूपा ने 10वीं में स्टेट लेवल पर 23वीं रैंक हासिल की. रूपा ने आर्ट से आगे बढ़ने का फैसला किया. उन्होंने कर्नाटक के कुवेंपु विश्वविद्यालय से प्रथम रैंक में स्वर्ण पदक हासिल करने के साथ बीए की पढ़ाई पूरी की. इस के बाद बेंगलुरु विश्वविद्यालय से मनोविज्ञान से एमए किया. इस में उन की तीसरी रैंक थी.

एमए करने के बाद रूपा ने नेट (हृश्वञ्ज) की परीक्षा पास की. उन्होंने जेआरएफ निकाला और साथ ही आईपीएस की तैयारी करती रहीं. उन्होंने यूपीएससी की परीक्षा में 43वीं रैंक हासिल की.
इस शानदार रैंक पर वह चाहतीं तो आईएएस चुन सकती थीं लेकिन उन्होंने आईपीएस को चुना. हैदराबाद में सरदार वल्लभभाई पटेल राष्ट्रीय पुलिस अकादमी से प्रशिक्षण लिया, जहां उन को अपने बैच में 5वां स्थान मिला. उन्हें कर्नाटक कैडर आवंटित किया गया.

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डी. रूपा शार्पशूटर थीं. ट्रेनिंग के दौरान उन्होंने कई पदक भी जीते. इस के अलावा वह भरतनाट्यम की कुशल डांसर थीं. रूपा ने भारतीय शास्त्रीय संगीत की भी शिक्षा ली थी. कन्नड़ फिल्म बेलाताड़ा भीमन्ना के लिए एक गीत भी अपनी आवाज में गाया था. इस फिल्म ने रविचंद्रन ने मुख्य भूमिका निभाई थी. रूपा तेज दिमाग के साथ खूबसूरती भी थीं. ब्यूटी विद ब्रेन के कारण रूपा ने 2 बार ‘मिस दावणगेरे’ का खिताब जीता था.

2000 बैच की आईपीएस अफसर रूपा ने 2002 में उडुपी से सहायक एसपी के रूप में अपना कैरियर शुरू किया. 2003 में रूपा ने 1998 बैच के आईएएस अधिकारी मौनिश मौदगिल से विवाह किया. पंजाब के रहने वाले मौनिश ने आईआईटी बौंबे से अपनी बीटेक इलैक्ट्रिकल इंजीनियरिंग पूरी की.

मौनिश ने यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा पास की और ओडिशा कैडर में आईएएस अफसर बने.
रूपा और मौनिश दोनों पहली बार मसूरी में फाउंडेशन ट्रेनिंग में मिले और शादी करने का फैसला किया. उन को एक बेटी अनघा और एक बेटा रौशिल है.

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पहली नियुक्ति बनी चुनौती

रूपा की एसपी के रूप में सब से पहली पोस्टिंग 2004 में कर्नाटक के धारवाड़ जिले में हुई. पोस्टिंग हुए एक महीने का समय ही बीता था कि उन को एक बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई, वह जिम्मेदारी थी मध्य प्रदेश की तत्कालीन मुख्यमंत्री उमा भारती को गिरफ्तार करने की. मामला कर्नाटक के हुबली से जुड़ा था, जहां 15 अगस्त, 1994 को ईदगाह पर तिरंगा फहराने के मामले में उमा भारती के खिलाफ वारंट जारी हुआ था. आरोप था कि उन की इस पहल से सांप्रदायिक सौहार्द खतरे में पड़ा था.

10 साल पुराने इस मामले में कोर्ट ने उमा भारती के खिलाफ गैरजमानती वारंट जारी किया था. इस वारंट को तामील कराने के लिए डी. रूपा धारवाड़ से निकलीं. लेकिन जब तक वह पहुंचती, उमा भारती ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था.

उमा भारती को गिरफ्तार कर के उन को कोर्ट मे पेश किया गया. इसी प्रकरण से पहली बार डी. रूपा चर्चा में आई थीं. रूपा धारवाड़ के बाद गडग, बीदर और यादगीर जिले में भी एसपी पद पर तैनात रहीं. 2008 में गडग में बतौर एसपी तैनाती के दौरान उन्होंने एक पूर्व मंत्री यावगल को गिरफ्तार किया था.

उन्होंने अपने ही अधीनस्थ डीएसपी मासूति को अपने और पूर्वमंत्री के बीच सौदा कराने की कोशिश के लिए निलंबित कर दिया था. कुछ महीनों के भीतर ही रूपा को स्थानांतरित कर दिया गया. इस मामले को 5 सालों तक खींचा गया. इस के लिए विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव लाया गया लेकिन रूपा कानूनी तौर पर सही थीं, इसलिए उन पर कोई काररवाई नहीं हुई.

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गुलबर्गा से अलग कर के बनाया गया था नया जिला यादगीर. नया जिला होने से कोई सशस्त्र बल नहीं था, ला ऐंड और्डर बनाए रखने की बड़ी मुश्किलें थीं. उस पर किसी तरह काम कर के रूपा ने जिले में पूर्णतया शांति बनाए रखी. एसपी के पद पर होते हुए भी वहां उन के रहने के लिए कोई आवास नहीं था.
किराए पर भी कोई आवास नहीं मिला. यादगीर में ही रूपा के पति मौनिश को अतिरिक्त चार्ज मिला हुआ था. उन्हें एक आवास आवंटित किया गया था. रूपा पति को मिले आवास में ही जा कर रहने लगीं.
वहां रूपा को कुछ कष्ट सहने पड़े. पास में ही एक गांव में स्कूल था. उस स्कूल से रूपा की बेटी अनिघा ने अपनी प्रारंभिक पढ़ाई शुरू की. वहां बच्चों को स्कूल में जमीन पर बैठ कर पढ़ना होता था.

कुछ लोग यह सोचते हैं कि आईपीएस की जिंदगी बड़ी सुखद होती है, आलीशन घर होते हैं, एसी चैंबर होते हैं, पैसा होता है, नौकरचाकर होते हैं, मगर चुनौतियां कुछ इस तरह की भी हो सकती हैं, जो रूपा के सामने आईं.

यादगीर के बाद 2013 में रूपा बेंगलुरु में डिप्टी कमिश्नर औफ पुलिस (सिटी आर्म्ड रिजर्व) के पद पर तैनात हुईं. वहां रूपा ने देखा कुछ राजनेता, विधायक और सांसद अनाधिकृत रूप से अतिरिक्त गनमैन रखे हुए थे. यह देख कर रूपा ने एक लिस्ट बनाई और 82 राजनेताआें से 290 गनमैन वापस ले लिए.
तत्कालीन मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा के पास कानवाय के लिए विभाग के 8 नए एसयूवी वाहन थे, किसी ने वापस नहीं लिए. वह रूपा ने वापस ले लिए. इस काररवाई के बाद रूपा का ट्रांसफर कर दिया गया.

नौकरशाही पर लगाम लगाने और उन को सबक सिखाने के लिए राजनेता ट्रांसफर को हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं. यही वजह है कि नौकरशाही ट्रांसफर के डर से और कंफर्ट जोन में रहने के लिए शांत रहती है. लेकिन रूपा शांत रहने वाले अफसरों में से नहीं थीं. कुछ भी गलत होते देख कर वह चुप नहीं बैठती थीं.

डी. रूपा को लगातार 2 साल 2016 और 2017 में राष्ट्रपति पदक से सम्मानित किया गया. जुलाई 2017 में रूपा को डीआईजी जेल के पद पर तैनात किया गया. रूपा का पहला जेल निरीक्षण एक घंटे का था. उन्होंने जेल में कैदियों से बात की तो वह उन को अंदर से रुला गई. कैदियों की कहानियों, जेल में बिताए वर्ष, उन की आंखों के पछतावे ने रूपा को रुला दिया. कुछ कैदी तो 12 साल की जेल की सजा काटने के बाद भी पैरोल पर नहीं गए थे.

जेलों का देखा हाल

डीआईजी रूपा ने सब से पहले जरूरतमंद कैदियों को मुफ्त कानूनी सहायता दी और बेकरी का प्रशिक्षण भी दिलाया. तुमकुरू जेल में भी उन्होंने 21 महिला कैदियों के लिए बेकरी प्रशिक्षण इकाई खोली.
10 जुलाई, 2017 को डीआईजी डी. रूपा ने परप्पना अग्रहारा जेल का दौरा किया. उसी जेल में एआईडीएमके की अध्यक्ष जयललिता की सहयोगी वी.के. शशिकला भी बंद थी. शशिकला को कर्नाटक उच्च न्यायालय ने आय से अधिक संपत्ति के मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद जेल में बंद किया गया था. शशिकला उस समय मजबूत सीएम कैंडिडेट थी और पावर में थी.

शशिकला को जेल में वीआईपी सुविधा मिल रही थी. शशिकला को उन की बैरक से अटैच एक किचन दिया गया था, जिस में उन के लिए विशेष तौर पर खास खाना बनाया जाता था. डी. रूपा ने शासन को भेजी गई अपनी रिपोर्ट में जेल प्रशासन पर आरोप लगाया कि इन सुविधाओं के लिए शशिकला द्वारा उन को 2 करोड़ रुपए दिए गए थे.

इस के अलावा उन्होंने और भी अवैध गतिविधियां होते देखीं. उन के मुताबिक 25 कैदियों का ड्रग टेस्ट कराया तो उन में से 18 का टेस्ट पौजिटिव आया. फेक स्टांप पेपर केस में दोषी पाए गए अब्दुल करीम तेलगी, जिस को भर्ती के वक्त व्हीलचेयर चलाने के लिए एक व्यक्ति दिया गया था, वह असल में 4 लोगों से मालिश करवा रहा था.

डी. रूपा ने डीजीपी (जेल) के. सत्यनारायण राव पर अपने काम में बाधा डालने का भी आरोप लगाया. आरोपों के बदले पुलिस महकमे की ओर से रूपा को शो कौज नोटिस भेजा गया.

साथ ही रूपा पर 20 करोड़ रुपए का मानहानि का मुकदमा दायर किया गया. 17 जुलाई, 2017 को रूपा का स्थानांतरण डीआईजी जेल से आईजी (ट्रैफिक रोड ऐंड सेफ्टी) पद पर कर दिया गया.

डी. रूपा इजरायल के विदेश मंत्रालय द्वारा दोनों देशों के बीच संबंधों को बढ़ावा देने के लिए ‘डिस्कवर इजरायल प्रतिनिधिमंडल’ का हिस्सा बनने के लिए चुनी गईं.

2020 में डी. रूपा कर्नाटक की प्रथम महिला गृह सचिव (कारागार, अपराध और सहायक सेवाएं) बनीं. रूपा सोशल मीडिया पर काफी ऐक्टिव रहती हैं खासतौर पर माइक्रो ब्लौगिंग साइट ट्विटर पर. वह रोज के रोज अपने से जुड़ी हर बात को ट्विटर पर शेयर करती हैं.

14 नवंबर, 2020 को ट््विटर पर उन्होंने ट्वीट किया, ‘कुछ लोग पटाखों पर प्रतिबंध लगाने पर आपत्ति क्यों जताते हैं.’ इस ट्वीट के बाद ‘ट्रूइंडोलौजी’ नाम के यूजर से उन की बहस हो गई. डी. रूपा का मत था कि पटाखे दीवाली से जुडे़ रीतिरिवाजों का हिस्सा नहीं रहे और 15वीं शताब्दी में आतिशबाजी का जन्म हुआ. इसलिए इस बैन को सकारात्मक रूप से लेना चाहिए. हालांकि ट्विटर पर सनातन धर्म से जुड़े सही तथ्यों को रखने का दावा करने वाले ट्विटर यूजर ट्रूइंडोलौजी ने इस का विरोध किया. इस यूजर ने शास्त्रों का उदाहरण देते हुए यह साबित करने की कोशिश की कि कई हजार सालों से आतिशबाजी दीवाली पर्व का हिस्सा रही है.

दोनों के बीच बहस इस हद तक पहुंच गई कि ट्विटर ने ट्रूइंडोलौजी एकाउंट को सस्पेंड कर दिया. आरोप लगा कि डी. रूपा ने अपनी पावर का गलत इस्तेमाल कर के विरोधी यूजर का एकाउंट सस्पेंड कराया है, जबकि ऐसा नहीं था. यूजर के एकाउंट को वापस लाने के लिए हैशटैग चलने लगा. इस बहस में फिल्म एक्ट्रैस कंगना रनौत ने भी डी. रूपा को काफी कुछ कहा.

619 करोड़ रुपए के ‘बेंगलुरु सेफ सिटी प्रोजेक्ट’ के तहत पूरे बेंगलुरु शहर में सीसीटीवी कैमरे लगने थे, जिन के टेंडर निकाले गए थे. इसी टेंडर प्रक्रिया में गृह सचिव रूपा ने अतिरिक्त पुलिस आयुक्त (प्रशासन) हेमंत निंबालकर पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे. डी. रूपा को टेंडर प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं मिली थीं.

भिड़ गईं सीनियर से

इस पर हेमंत निंबालकर ने 7 दिसंबर, 2020 को प्रमुख सचिव को भेजी गई रिपोर्ट में कहा कि किसी ने खुद को गृह सचिव बता कर इस योजना के बारे में गोपनीय सूचना हासिल करने की कोशिश की थी. इस पर रूपा ने बतौर गृह सचिव कहा, ‘मैं शिकायत करती हूं कि किसी अन्य व्यक्ति की ओर से अपने आप को गृह सचिव के रूप में पेश करने की बात झूठी और व्यक्तिगत दुर्भावना से प्रेरित है.’

प्रोजेक्ट को ले कर 2 वरिष्ठ अधिकारियों के बीच में ठन गई तो कर्नाटक सरकार ने बेंगलुरु के पुलिस कमिश्नर कमल पंत को इस प्रक्रिया में अवैध दखल की जांच करने का आदेश दिया. दोनों के बीच बढ़े विवाद के बाद सरकार ने दोनों का तबादला कर दिया.

31 दिसंबर, 2020 को डी. रूपा को गृह सचिव के पद से हटा कर कर्नाटक राज्य हस्तशिल्प विकास निगम के प्रबंध निदेशक के पद पर भेज दिया गया. एक जनवरी, 2021 को उन्होंने अपना पदभार ग्रहण कर लिया.

यह थी देश की महिला आईपीएस अफसर डी. रूपा की कहानी, जो आज के युवाओं को प्रेरणा देने वाली है कि किस तरह एक छोटी सी जगह से निकल कर अपनी मेहनत और लगन के बल पर अपने सपने को पूरा किया जाता है, हकीकत में अपने सपने को कैसे जिया जाता है.

परिस्थितियां कैसी भी हों, इंसान को साहस से काम लेना चाहिए, उन का डट कर मुकाबला करना चाहिए. डी. रूपा पूरे कैरियर में बड़ी ईमानदारी से अपने कार्यों को करती आईं, कभी अपने तबादलों से नहीं डरीं. बल्कि इन तबादलों को अपनी नौकरी का एक हिस्सा मानती रहीं.

20 साल के कैरियर में दोगुने से ज्यादा तबादले हुए लेकिन उन के माथे पर कभी शिकन नहीं आई. आज हमारे देश को ऐसे ही कर्तव्यनिष्ठ और ईमानदार पुलिस अधिकारियों की जरूरत है जो अपने सेवा भाव से देश और समाज का भला कर सकें.

निशाने पर एकता: भाग 1

दिल्ली में किन्नरों के कई ग्रुप हैं, जो मोटी कमाई करते हैं. अंडरवर्ल्ड की तरह किन्नरों में भी आपसी रंजिश रहती है. कई हत्याएं भी हुई हैं. एकता जोशी की हत्या भी किसी ग्रुप ने ही कराई, लेकिन किस ग्रुप ने, यह पता लगाना आसान नहीं होगा. फिर भी…

पूर्वी दिल्ली के जीटीबी एनक्लेव में बने डीडीए के जनता फ्लैट्स का वह कंपाउंड सब से आलीशान था. 6 फ्लैट के इस पूरे कंपाउड को 3 किन्नरों ने खरीद कर इसे आलीशान बंगले के रूप में तब्दील कर दिया था. इस बंगलेनुमा कंपाउंड में 3 किन्नरों के परिवार रहते हैं. किन्नरों के इस ग्रुप ने कुछ महीनों पहले ही इस कपांउड में आ कर रहना शुरू किया था.

इन्हीं में एक परिवार था एकता जोशी (40) का. एकता मूलरूप से उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल की रहने वाली थी. एकता के पिता दिल्ली के पूसा इंस्टीट्यूट में जौब करते हैं, जबकि मां और भाई गांव में रहते हैं.

एकता ने भाई के बच्चों 3 बेटों व एक बेटी को अपने पास रखा हुआ था. जबकि भाईभाभी और मां गांव में रहते थे. एकता चाहती थी कि उस के भाई के बच्चे अच्छे स्कूलों में पढ़लिख कर काबिल बने.चारों बच्चों की पढ़ाई के खर्चे एकता खुद उठाती थी.

एकता बचपन से किन्नर थी, इसलिए युवावस्था में पहले वह उत्तराखंड में रही, इस के बाद दिल्ली के किन्नर समाज में आ कर रहने लगी. किन्नरों की गुरू अनीता का एकता से खास लगाव था. इसलिए जिस कंपाउंड में एकता रहती थी, अनीता का निवास भी उसी कंपाउंड में था.

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धर्मालु स्वभाव और घूमनेफिरने की शौकीन एकता की सुंदरता के कारण लोगों को इस बात का पता ही नहीं चलता था कि वह किन्नर है. एकता का एक ही सपना था कि उस के भतीजेभतीजी पढ़लिख कर काबिल बने और उन्हें जीवन की हर खुशी मिले.

एकता का अपने परिवार से बहुत ज्यादा लगाव था. इसीलिए वह हमेशा परिवार के संपर्क में रहती थी. कभी वह बच्चों को ले कर गांव चली जाती तो कभी मां, भाई और भाभी उस से मिलने के लिए चले आते थे.

5 सितंबर, 2020 की रात के लगभग 9 बजे का वक्त था. उस दिन बड़े भतीजे अमित ने बुआ एकता से नई जींस और कुछ दूसरे कपड़े खरीदने की फरमाइश की थी.

कोरोना महामारी के चलते लगे लौकडाउन के बाद से एकता ने बच्चों के लिए और अपने लिए भी कोई नई ड्रैस नहीं खरीदी थी. इसलिए वह भतीजे अमित को ले कर लक्ष्मीनगर में शौपिंग करने के लिए निकल गई. अपने व सभी बच्चों के लिए उस ने कुछ ना कुछ खरीदा.

कई घंटे तक शौपिंग करने के बाद 9 बजे वह वापस घर लौट आई. अमित कपड़ों से भरे बैग ले कर घर के भीतर चला गया. एकता कार को घर के सामने पार्क करने के बाद जैसे ही बाहर निकली, अचानक तेजी से एक सफेद रंग की स्कूटी उस के पास आ कर रुकी.

अज्ञात स्कूटी सवारों का हमला

स्कूटी पर 2 लोग सवार थे, दोनों ने चेहरों पर मास्क और सिर पर हेलमेट पहने थे. एकता जब तक स्कूटी सवार आगंतुकों से कुछ पूछती, तब तक उन दोनों ने पैंट के अंदर खोंस रखे पिस्तौल निकाले और एक के बाद एक 4 गोलियों की आवाजों से इलाका गूंज उठा. आगंतुक स्कूटी सवारों के पिस्तौल से बेहद करीब से चलाई गई चारों गोलियां एकता के शरीर के नाजुक हिस्सों में लगी थी.

गोलियां लगते ही एकता के हलक से बचाओ…ओ….ओ की चीख निकली और खून में नहाया उस का शरीर लहरा कर जमीन पर गिर गया. गोलियों की आवाज और एकता की चीख सुन कर उस कंपाउंड में रहने वाले किन्नरों के परिवार और राहगीर वहां एकत्र हो गए.

इस बीच एकता पर गोलियां दागने वाले स्कूटी सवार जिस तेजी से आए थे, उसी तेजी के साथ वहां से नौ दो ग्यारह हो गए.

एकता के भाई के चारों बच्चे भी शोर व गोलियों की आवाज सुन कर वहां पहुंच गए. एकता को खून में लथपथ देख वे फूटफूट कर रोने लगे. तब तक किसी ने अस्पताल ले चलने की बात कही तो कंपाउंड में रहने वाले कुछ किन्नर एकता को जल्दी से गाड़ी में डाल कर समीप के जीटीबी अस्पताल ले गए. लेकिन वहां पहुंचते ही डाक्टरों ने बता दिया कि उस की मौत हो चुकी है. किन्नरों के कंपाउंड में रहने वाले किसी व्यक्ति ने तब तक पुलिस नियंत्रण कक्ष को फोन कर के वारदात की सूचना दे दी थी.

सूचना मिलने के 10 मिनट बाद ही पीसीआर की गाड़ी मौके पर पहुंच गई. वारदात की पुष्टि करने के बाद पीसीआर ने घटनास्थल से संबंधित इलाके के जीटीबी एनक्लेव थाने को फोन कर के घटना की जानकारी दे दी और तत्काल वहां पहुंचने के लिए कहा.

सूचना मिलते ही जीटीबी थाने के एसएचओ अरुण कुमार अपने इंसपेक्टर इनवैस्टीगेशन धर्मेंद्र कुमार को ले कर वारदात वाले स्थान पर पहुंच गए.

पता चला कि एकता किन्नर को कुछ लोग जीटीबी अस्पताल ले गए हैं और उस की मौत हो चुकी है. एसएचओ अरुण कुमार ने इंसपेक्टर धर्मेंद्र कुमार को पंचनामे की काररवाई के लिए जीटीबी अस्पताल भेज दिया और खुद घटनास्थल पर जांच व पूछताछ का काम शुरू कर दिया.

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सब से पहले उन्होंने अमित से पूछताछ की, जिस ने लक्ष्मीनगर बाजार से शौपिंग कर के लौटने और घर के भीतर जाने के बाद बाहर अपनी बुआ को गोली मार जाने की सारी बात बता दी.

तब तक वारदात की सूचना पा कर एसीपी (सीमापुरी) मुकेश त्यागी और शाहदरा जिले के डीसीपी अमित शर्मा भी क्राइम व फोरैंसिक टीम के साथ मौके पर आ गए.

पूछताछ में पता चला कि वारदात के बाद कातिल मुश्किल से 5 मिनट में वारदात को अंजाम दे कर वहां से फरार हो गए थे.

इंसपेक्टर धर्मेंद्र कुमार भी एकता के शव की जांचपड़ताल और उस के शव के पंचनामे की काररवाई कर के वापस घटनास्थल पर पहुंच गए.

एकता के सीने व पेट में 4 गोली लगी थीं. गोली मारने के बाद मौके से स्कूटी पर फरार हुए कातिलों का चेहरा किसी ने नहीं देखा था. जिस कंपाउंड में एकता व अन्य किन्नरों के परिवार रहते थे, उस के गेट पर सीसीटीवी कैमरे लगे थे.

पुलिस ने सीसीटीवी कैमरों की फुटेज को जांच के लिए अपने कब्जे में ले लिया.एसीपी मुकेश त्यागी के निर्देश पर उसी रात एसएचओ अरुण कुमार ने धारा 302 के तहत हत्या का मुकदमा दर्ज कर जांच का काम इंसपेक्टर इनवैस्टीगेशन धर्मेंद्र के सुपुर्द कर दिया. साथ ही उन की मदद के लिए एक विशेष टीम का गठन कर दिया.

अगले भाग में पढ़ें-  किन्नर एकता जोशी की हत्या किसने की ?

निशाने पर एकता: भाग 2

सौजन्य- मनोहर कहानियां

जांच का काम शुरू करते ही पुलिस ने सब से पहले सीसीटीवी फुटेज की जांच की, लेकिन उस से कोई विशेष मदद नहीं मिली. क्योंकि बदमाशों के चेहरे पूरी तरह हेलमेट व मास्क से ढके थे. पुलिस को वारदात में इस्तेमाल की गई स्कूटी के नंबर से मदद मिलने की उम्मीद थी. क्योंकि सीसीटीवी में उस का नंबर स्पष्ट नजर आ रहा था.

लेकिन जब नंबर की पड़ताल की गई तो पता चला कि इस नंबर पर स्कूटी रजिस्टर्ड ही नहीं है, जिस से साफ हो गया कि कातिलों ने स्कूटी पर फरजी नंबर प्लेट का इस्तेमाल किया था. पुलिस को शक था कि संभव है पिछले दिनों एकता का किसी से कोई झगड़ा हुआ हो या फिर किसी ने धमकी दी हो. क्योंकि आमतौर पर किन्नर समाज में सब से ज्यादा झगड़े इलाके को ले कर होते हैं.

कई ग्रुप हैं किन्नरों के

दिल्ली में किन्नरों के अलगअलग ग्रुप हैं और अकसर इलाके में काम करने को ले कर कोई ग्रुप किसी दूसरे इलाके में घुस आता है तो उस इलाके में काम करने वाले किन्नर झगड़ा कर लेते हैं.

जब इस बिंदु पर जांच हुई और कंपाउंड में रहने वाले किन्नरों से पूछताछ की गई तो पता चला एकता स्वभाव से बेहद मिलनसार थी. उस का किसी से कोई विवाद नहीं था.

पूछताछ करने पर पता चला कि इसी कंपाउंड में रहने वाली अनीता जोशी इस इलाके की गुरु हैं, जिन्होंने एकता को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था. इसलिए पैसे के लेनदेन का सारा हिसाब एकता ही रखती थी. किन्नर समाज में एकता का रुतबा बन चुका था. वह पूरी दिल्ली की गुरु बनने की रेस में शामिल हो गई थी.

एकता के करीबियों से पूछताछ में यह भी पता चला कि जिस रात एकता की हत्या हुई, उसी सुबह नंदनगरी 212 बस स्टैंड पर जनता फ्लैट्स के किन्नर ग्रुप का दूसरे किन्नरों के ग्रुप से विवाद हुआ था.

दूसरा ग्रुप कमजोर पड़ गया था, जिस ने रात को देख लेने की धमकी दी थी. इसलिए पुलिस को आशंका हुई कि कहीं इस हत्याकांड को आपसी रंजिश के तहत अंजाम न दिया गया हो.

पुलिस ने किन्नरों से पूछताछ के बाद किन्नरों के दूसरे गुट के बारे में जानकारी हासिल की और कुछ किन्नरों को हिरासत में ले कर पूछताछ की. लेकिन पूछताछ के बाद भी पुलिस किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी.

फिर भी न जाने क्यों एसएचओ अरुण कुमार को अंदेशा था कि किन्नर समाज के लोग ही इस हत्या में शामिल हैं, गुरु की कुरसी हासिल करने के चलते भी यह हत्या हो सकती है. जिन संदिग्ध लोगों को पुलिस ने हिरासत में लिया था, उन से हत्याकांड के बारे में तो पता नहीं चला लेकिन यह जरूर पता चल गया कि एकता को उत्तराधिकारी घोषित किए जाने के बाद दिल्ली में कई किन्नर गुरु एकता से नाराज थे.

दूसरी तरफ पुलिस की टीम ने इलाके के सौ से ज्यादा लोगों से पूछताछ कर ली थी और 2 सौ से ज्यादा कैमरों की फुटेज खंगाल चुकी थी. लेकिन इस के बावजूद कोई ठोस जानकारी हासिल नहीं हो पाई थी.

कुछ किन्नरों से पूछताछ के बाद पुलिस को ऐसे संकेत मिले कि एकता जोशी की हत्या में भाड़े के हत्यारों का इस्तेमाल हो सकता है. ऐसा इसलिए भी लग रहा था क्योंकि गोली चलाने वाले बेहद प्रोफेशनल थे.

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दूसरी तरफ देश के कई हिस्सों में किन्नर समाज के लोगों ने एकता जोशी की हत्या पर आक्रोश जताते हुए हत्याकांड का जल्द खुलासा करने की मांग शुरू कर दी थी.

एकता के रुतबे का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता था कि उस की हत्या के बाद शिवसेना के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष जयभगवान भी शोक प्रकट करने के लिए उस के घर पर पहुंचे. किन्नर महामंडलेश्वर लक्ष्मी किन्नर एकता को अपनी खास दोस्त मानती थी, इसलिए वह भी शोक प्रकट करने के लिए उन के घर पहुंची.

एसएचओ अरुण कुमार ने जांचपड़ताल में साइबर सेल टीम की भी मदद ली थी. साइबर टीम के सहयोग से पुलिस ने घटनास्थल के आसपास उस रात एक्टिव मोबाइल फोन नंबरों का डंप निकाल कर छानबीन शुरू कर दी थी. एकता जोशी के मोबाइल की काल डिटेल्स निकाल कर पुलिस ने उस की भी छानबीन की.

इस बिंदु पर की गई छानबीन के बाद पुलिस को पता चला कि एकता जोशी की पश्चिमी यूपी के मेरठ व गाजियाबाद में कुछ लोगों से बातचीत होती थी. जिन नंबर से उन्हें काल आती या की जाती, वे सभी मेरठ के अपराधियों के नंबर थे. इसीलिए एसीपी मुकेश त्यागी ने मेरठ में एसटीएफ टीम से संपर्क कर हत्याकांड में मदद करने के लिए कहा था.

उत्तर प्रदेश पुलिस की स्पैशल टास्क फोर्स के डीएसपी बृजेश सिंह ने अपने तेजतर्रार इंसपेक्टर रविंद्र कुमार के नेतृत्व में एक टीम गठित कर दी, जिस में सबइंसपेक्टर संजय कुमार, हेडकांस्टेबल संजय सिंह, रवि वत्स, रकम सिंह, कांस्टेबल दीपक कुमार व अंकित श्यौरान को शामिल किया गया.

छानबीन पहुंची मेरठ तक

पुलिस की इस टीम के पास मेरठ के अधिकांश अपराधियों की कुंडली थी. दिल्ली पुलिस से सूचना मिलने के बाद पुलिस ने अपने मुखबिर नेटवर्क का इस्तेमाल करना शुरू किया. एसटीएफ की टीम ने ऐसे अपराधियों को चिह्नित करना शुरू किया, जो सुपारी ले कर हत्या करने के लिए जाने जाते थे. पुलिस ने चिह्नित किए गए सभी बदमाशों के मोबाइल नंबर हासिल कर उन की काल डिटेल्स निकाल कर उसे खंगालना शुरू कर दिया.

इसी पड़ताल के दौरान एसटीएफ की टीम को आमिर गाजी नाम के एक बदमाश के मोबाइल की लोकेशन 5 सितंबर को दिल्ली में मिली. संयोग से आमिर के मोबाइल की लोकेशन रात को साढ़े 8 से 9 बजे के करीब जीटीबी एनक्लेव के जनता फ्लैट के आसपास थी और यहीं एकता जोशी की हत्या हुई थी.

एसटीएफ की टीम समझ गई कि दिल्ली पुलिस का शक सही है कि एकता जोशी की हत्या करने वाले बदमाशों का संबंध मेरठ से है. इतनी जानकारी मिलने के बाद एसटीएफ की टीम ने आमिर गाजी को ट्रैक करना शुरू कर दिया. और 9 नवंबर को सटीक सूचना मिलने के बाद एसटीएफ टीम ने शाम को करीब 7 बजे उसे इस्माइल वाली गली से गिरफ्तार कर लिया.

आमिर के साथ एक अन्य युवक भी था. तलाशी लेने के बाद दोनों के कब्जे से एक आटोमैटिक पिस्टल और एक तमंचा बरामद हुआ. आमिर के साथ पकड़े गए युवक का नाम सुहैल खान था.

पुलिस को दोनों से पूछताछ करने में ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी. थोड़ी सी सख्ती के बाद आमिर ने कबूल कर लिया कि उसी ने अपने एक दोस्त गगन पंडित के साथ मिल कर किन्नर एकता जोशी की हत्या की थी.

आमिर मेरठ के कुख्यात अपराधी और गाजियाबाद की डासना जेल में बंद सलमान गाजी का छोटा भाई है. सलमान की मेरठ के दूसरे कुख्यात अपराधी शारिक से जानलेवा दुश्मनी चल रही है.

एक जमीन को ले कर कई साल पहले शुरू हुई शारिक व सलमान की दुश्मनी में अब तक दोनों के गैंग के कई लोग मारे जा चुके हैं. इन दिनों सलमान व शारिक दोनों ही जेल में बंद हैं.

आमिर गाजी ने बताया कि कोतवाली क्षेत्र में सराय बहलीम निवासी गगन पंडित ने किन्नर गुरु एकता जोशी की हत्या कराई थी. चूंकि उस के भाई सलमान के गैंग की रंजिश शारिक गैंग से चल रही है. इसलिए जेल में बंद सलमान ने आमिर से कहा था कि किसी भी तरह शारिक की हत्या करा दें तो शहर में उन की पकड़ मजबूत हो जाएगी.

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बस इसी काम के लिए आमिर ने कुछ दिन पहले गगन पंडित से मदद मांगी थी. आमिर की गगन पंडित से 6 महीने पहले ही हाजी याकूब गली में रहने वाले असलम पहलवान के जरिए मुलाकात हुई थी. दोनों की जानपहचान जल्द ही दोस्ती में बदल गई थी.

अगले भाग में पढ़ें- गगन पंडित की गिरफ्तारी हुई या नहीं?

निशाने पर एकता: भाग 3

सौजन्य- मनोहर कहानियां

3 महीने पहले गगन पंडित ने आमिर से कहा था कि वह पहले दिल्ली के शाहदरा में जीटीबी एनक्लेव में एक हत्या करने में उस की मदद कर दे तो उस के बाद वह शारिक गैंग का खात्मा कराने में उस की मदद करेगा.

आमिर ने कह दिया कि वह उस के काम में मदद जरूर करेगा, लेकिन उस के बाद उसे शारिक गैंग को खत्म करने में उस की मदद करनी पडे़गी. इस बात पर दोनों की ही सहमति बन गई थी.

5 सितंबर, 2020 को आमिर मेरठ में था जब सुबह के वक्त उस के पास गगन पंडित का फोन आया. उस ने बताया कि वह दिल्ली में है. गगन ने उस से कहा, दोस्त जिस काम के लिए तुम्हें मेरी मदद करनी है उसे पूरा करने का वक्त आ गया है. इसी वक्त दिल्ली चले आओ.

मदद लेने से पहले दोस्त की मदद करने का वायदा किया था, लिहाजा आमिर उसी समय दिल्ली के लिए रवाना हो गया. शाम को 3 बजे के करीब वह दिल्ली पहुंच गया और नंदनगरी में उस जगह पहुंचा, जहां गगन ने उसे पहुंचने के लिए कहा था.

गगन पंडित के साथ वहां कुछ और लोग भी थे. यहीं पर गगन ने उसे बताया कि जीटीबी एनक्लेव में रहने वाले एक किन्नर एकता जोशी से उस की खुन्नस चल रही है.

‘‘किन्नर से तुम्हारी किस बात की खुन्नस गगन भाई?’’ आमिर ने उत्सुकता में पूछा.

‘‘मेरी सीधी तो खुन्नस नहीं है लेकिन उसी की बिरादरी के कुछ लोग हैं, जिन से अपनी दोस्ती है और वे मदद भी करते रहते हैं. उन्हीं के रास्ते का कांटा बन गई है एकता जोशी, बस इसीलिए टपकाना है. समझो, पीछे से डिमांड मिली है.’’ गगन जोशी ने थोड़े शब्दों में पूरी बात बता दी.

‘‘ठीक है भाई, आप चाहते हो तो टपका देते हैं साली को.’’ आमिर ने जोश के साथ कहते हुए पूछा, ‘‘सामान वगैरह है या जुगाड़ करने पडें़गे?’’

‘‘चिंता मत करो पूरा सामान है.’’ कहते हुए गगन ने उसे एक इंग्लिश पिस्टल दी और खुद भी एक पिस्टल निकाल कर अपनी पैंट में खोंस ली.

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गगन का खेल

इस के बाद वे किसी के फोन का इंतजार करने लगे. शाम को किसी का फोन आने के बाद गगन आमिर को एक स्कूटी पर बैठा कर अपने साथ जीटीबी एनक्लेव में जनता फ्लैट के पास पहुंचा और इंतजार करने लगा. पहचान छिपाने के लिए दोनों ने सिर पर हेलमेट लगा लिए थे और चेहरे पर मास्क भी पहन रखे थे. उन्हें बैकअप देने के लिए गगन के कुछ साथी भी स्कूटी ले कर उन के आसपास थे.

रात करीब 9 बजे जैसे ही एकता जोशी की कार उस के कंपाउंड के बाहर आ कर रुकी तो गगन ने थोड़ी दूर पर खड़ी अपनी स्कूटी स्टार्ट की और जब तक एकता कार से बाहर निकलती, तब तक स्कूटी ले जा कर एकता के पास रोक दी.

एकता जैसे ही कार से बाहर निकली आमिर और गगन ने उस पर 2-2 गोलियां इतने नजदीक से दागीं कि उस के बचने की गुजांइश ही नहीं थी. गोलियां मारने के बाद दोनों फौरन घटनास्थल से फरार हो गए.

एकता की हत्या के बाद आमिर और गगन दोनों ही मेरठ वापस आ गए. हालांकि आमिर के साथ गिरफ्तार हुए सुहैल खान उर्फ सोनू का एकता की हत्या से कोई वास्ता नहीं था, लेकिन उस से पुलिस ने अवैध हथियार बरामद किया था. इसलिए एसटीएफ ने उस के खिलाफ भी आमिर के साथ शस्त्र अधिनियम के तहत मामला दर्ज कर लिया.

मेरठ के नूरनगर का रहने वाला सुहैल ईव्ज चौराहे पर कार वाशिंग का काम करता है. सुहैल 2 साल से आमिर के संपर्क में था. श्यामनगर निवासी इरफान ने परवेज से उस का संपर्क कराया था. परवेज मेरठ के एक बड़े गैंगस्टर हाजी इजलाल का भाई है.

इजलाल ने 10 साल पहले दिल्ली पुलिस के रिटायर्ड एसीपी एस.के. गिहा के भतीजे पुनीत गिरि, उस के दोस्त सुनील ढाका और कुलदीप उज्ज्वल की हत्या कर उन के शव बागपत नहर में डाल दिए थे.

इजलाल ने अपनी प्रेमिका के कहने पर मेरठ कालेज में पढ़ने वाले इन तीनों लड़कों की बेरहमी से हत्या की थी. इस हत्याकांड में परवेज भी जेल गया था, लेकिन 2 साल पहले उसे जमानत मिल गई थी.

उसी इजलाल के भाई परवेज ने सुहैल को 2 हत्याओं के लिए 10-10 लाख रुपए की सुपारी दी थी, लेकिन उस ने अभी यह नहीं बताया था कि उसे किस की हत्या करनी है.

परवेज ने सुहैल से कहा था कि किस की हत्या करनी है और कब करनी है, इस के बारे में आमिर उसे बताएगा. आमिर को परवेज ने बता दिया था कि उसे सुहैल के साथ मिल कर किन लोगों की हत्या को अंजाम देना है.

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आमिर गाजी के एकता हत्याकांड के कबूलनामे के बाद एसटीएफ के डीएसपी बृजेश सिंह ने सीमापुरी एसीपी मुकेश त्यागी और जीटीबी एनक्लेव थाने के एसएचओ अरुण कुमार को आमिर की गिरफ्तारी और एकता हत्याकांड के खुलासे की सूचना दे दी और उन के खिलाफ शस्त्र अधिनियम का मामला दर्ज कर मेरठ की अदालत में पेश कर दिया. जहां से उन्हें मेरठ जेल भेज दिया गया.

कथा लिखे जाने तक हत्याकांड में शामिल गगन पंडित की गिरफ्तारी नहीं हुई थी. पुलिस को आशंका है कि एकता की हत्या किसी विरोधी किन्नर ग्रुप ने सुपारी दे कर कराई है. आमिर व गगन से पूछताछ के बाद ही पूरे राज से परदा उठेगा. लेकिन वह लापता है.

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