Manohar Kahaniya: पूर्व उपमुख्यमंत्री के घर हुआ खूनी तांडव, रास न आई दौलत- भाग 3

सौजन्य- मनोहर कहानियां

परमेश्वर ने धीरे से कहा, ‘‘क्यों न हम हरीश को ही रास्ते से हटा दें.’’

‘‘क्या मतलब… क्या कहना चाहते हो?’’ वह बोली.

‘‘सीधी सी बात है, मैं कहना चाहता हूं हरीश का खात्मा.’’ उस ने बात स्पष्ट की.

सोच कर के धनकंवर ने कहा, ‘‘वाह, यह तो बहुत अच्छा होगा, मगर यह कैसे संभव होगा?’’

‘‘उस की फिक्र मत करो. हां, कुछ पैसा लगेगा, मैं अपने एक दोस्त को तैयार करता हूं, उसे मैं जैसे कहूंगा वह करेगा. तुम बस जीजाजी को संभाल लेना.’’

बहन ने कहा, ‘‘भाई, तुम उन की चिंता मत करो, मैं उन्हें समझाने की कोशिश करती हूं. मैं तो बारबार उन्हें कहती रहती हूं. मगर वह मेरी सुनते ही नहीं, अब मैं कोशिश करूंगी कि ठीक से उन्हें मना ही लूं.’’

इस चर्चा और घटनाक्रम के बाद परमेश्वर और बहन धनकंवर दोनों ने मिल कर हरीश कंवर की कहानी का पटाक्षेप करने की योजना बनानी शुरू कर दी.

हरीश कुंवर के परिवार को खत्म करने की जो योजना बनी, उसे 21 अप्रैल 2021  दिन बुधवार सुबहसवेरे 4 बजे अमलीजामा पहनाया गया.

हरीश (36 वर्ष), पत्नी सुमित्रा ( 32 ) अपनी 4 वर्षीय बेटी आशी के साथ अभी नींद में ही थे कि भाई हरभजन परिवार सहित सुबह हमेशा की तरह अपने कमरे से सुबह की सैर के लिए निकल गया.

पिता हरभजन के निकलते ही उस की 16 वर्षीय बेटी रंजना (काल्पनिक नाम) ने अपने मामा परमेश्वर कंवर को मोबाइल पर मैसेज किया कि पापा सैर पर निकल गए हैं. यह मैसेज मिलते ही परमेश्वर ने अपने दोस्त रामप्रसाद मन्नेवार को फोन किया और दोनों थोड़ी ही देर में भैंसमा स्थित हरीश कंवर के पैतृक आवास के पास आ गए.

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बेरहमी से किए 3 कत्ल

यहां उन्हें खबर नहीं थी कि चौराहे पर एक दुकान पर सीसीटीवी कैमरा लगा है, जिस में दोनों के आने का वीडियो फुटेज रिकौर्ड हो गया है. दोनों हरीश कंवर के कमरे में चले गए और बकरी को रेतने का हथियार (कत्ता) निकाल कर हरीश पर हमला कर दिया.

दोनों के एक साथ धारदार हथियार से हमला करने से हरीश कंवर हड़बड़ा कर खून से लथपथ उठ खड़े हुए. उन्होंने अपना बचाव करने की कोशिश की, मगर दोनों ने उन पर लगातार हमले किए.

हरीश ने साहस के साथ अपने आप को बचाने का खूब प्रयास किया और हमलावरों से हथियार छीनने की कोशिश की, मगर सफल नहीं हो पाए. अंतत: दोनों ने मिल कर हरीश को वहीं मौत की नींद सुला दिया.

होहल्ला सुन कर हरीश कंवर की पत्नी सुमित्रा उठ खड़ी हुई और पति का बचाव करने आगे बढ़ी कि उन्हें भी दोनों ने मिल कर धारदार हथियार से हमला कर मार डाला. 4 साल की आशी चिल्लाहट सुन कर के उठ कर रो रही थी. दोनों हत्यारों ने बच्ची आशी की भी वहीं नृशंस हत्या कर दी.

इस के बाद वे कमरे से बाहर निकले तो शोरगुल सुन कर हरीश की 82 वर्षीय मां जीवनबाई वहां पहुंचीं.

उन्हें बहुत कम दिखाई देता था. वह चिल्लाहट सुन कर ‘क्या है…क्या हो गया’ पूछने लगीं तो उन्हें कोई जवाब न दिया. दोनों ने उन्हें धक्का देते हुए नीचे गिरा दिया और वहां से भाग खड़े हुए.

हत्याकांड को अंजाम दे कर दोनों बाहर आए तो सुबह के लगभग साढ़े 4 बज रहे थे. अभी चारों ओर अंधेरा ही था.

परमेश्वर और रामप्रसाद घर के बाहर आए और दोनों ने यह योजना बनाई कि जब तक मामला शांत नहीं हो जाता, दोनों अलगअलग हो जाएं और जब स्थितियां ठीक होंगी तो मुलाकात की जाएगी.

परमेश्वर आगे बढ़ा तो उसे यह खयाल आया कि उस के कपड़े खून से सन गए हैं और उस के चेहरे पर चोट आई है, जहां से खून बह रहा है. मगर वह आगे गांव सलिहाभाठा की ओर बढ़ गया.

आगे सिंचाई विभाग के डैम के पास  उस ने अपने रक्तरंजित कपड़ों को जला दिया और डैम में नहाधो कर उस ने डायल 112 नंबर पर फोन कर के खुद का एक्सीडेंट होने की सूचना दे दी. फिर वह करतला अस्पताल में भरती हो गया.

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दूसरी तरफ रामप्रसाद कोरबा जिला के समीप जिला चांपा जांजगीर के एक गांव में अपने रिश्तेदार के यहां चला गया. जहां से नगरदा थाना पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर उरगा पुलिस के हवाले कर दिया.

देर शाम को एसपी अभिषेक सिंह मीणा ने एसपी औफिस में एक पत्रकार वार्ता आयोजित कर सभी आरोपियों को प्रैस के समक्ष उपस्थित कर सारे घटनाक्रम से परदा उठा दिया.

पुलिस ने हरीश कंवर, उन की सुमित्रा और बेटी आशी की हत्या के आरोप में आरोपियों हरभजन कंवर, पत्नी धनकंवर, बेटी रंजना, साले परमेश्वर कंवर और उस के दोस्त रामप्रसाद मन्नेवार और सुरेंद्र कंवर के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 201, 120बी के तहत गिरफ्तार कर कोरबा के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी के समक्ष पेश किया, जहां से रंजना के अलावा सभी आरोपियों को जेल भेज दिया गया. रंजना को बाल सुधार गृह भेजा गया. द्य

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Serial Story: धनिया का बदला- भाग 3

लेखक- नीरज कुमार मिश्रा

धनिया रोते हुए गांव के बाहर जाने लगी. वह कहां जाएगी, उसे कुछ पता नहीं था. तभी रास्ते में उसे एक बूढ़ी काकी ने रोक कर कहा, ‘‘धनिया… मैं छंगा को अच्छी तरह जानती हूं. वह कभी अच्छा नहीं था और वह कालिया… वह तो एक नंबर का बदमाश है. उस ने ऐसे ही छल कर के लोगों की जमीन हड़प ली है. लोग उस के डर के चलते कुछ कह नहीं पाते.’’

‘‘पर काकी, अब मैं क्या करूं…?’’

‘‘दुनिया का दस्तूर ही यही है… जैसे को तैसा.’’

धनिया को कुछ समझ नहीं आया, तो काकी ने एक 30 साल के आदमी की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘यह मेरा बेटा राजू है. यह शहर से पढ़ कर आया है, तो गांव में कंप्यूटर की दुकान खोलना चाहता था, पर कालिया को यह मंजूर नहीं हुआ कि गांव के लोग बाहर की दुनिया के बारे में जागरूक बनें, इसलिए रात में मेरे बेटे की दुकान लूट ली और जब यह पुलिस में रिपोर्ट करने गया, तो मारमार कर इस की टांग ही तोड़ दी.

‘‘दीदी, मेरा नाम राजू है. मुझ से आप को जो भी मदद चाहिए, बेझिझक बता दीजिएगा,’’ राजू ने कहा.

काकी और राजू की बातों से धनिया को कुछ हिम्मत मिली, तो उस ने कुछ समय गांव में ही रहने का फैसला किया और एक पेड़ के नीचे जा कर बैठ गई. उस की बच्चियां भूख से परेशान हो रही थीं. धनिया उन का मन बहलाने के लिए उन्हें सेमल का फूल पानी में डुबा कर खिलाने लगी.

‘‘अरे, यह सब करने से बच्चों का पेट नहीं भरेगा… यह लो, तुम भी खाना खाओ और इन्हें भी खिलाओ,’’ एक टोकरी में भर कर पूरीसब्जी ले कर आया था कालिया.

दोनों बच्चियां खाने की खुशबू से होंठों पर जीभ फेरने लगीं. धनिया से बेटियों का इस तरह से परेशान होना उसे दुखी कर रहा था.

धनिया ने निगाहें नीची रखीं, पर उस के हाथ खुद ब खुद खाने से भरी टोकरी लेने के लिए आगे बढ़ गए.

जैसे ही धनिया ने हाथ आगे बढ़ाए, कालिया ने अपने हाथों को रोकते हुए कहा, ‘‘खाना तो मैं दे रहा हूं, पर इस की कीमत तुम्हें देनी होगी,’’ कालिया ने अपनी एक आंख दबाते हुए कहा.

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‘‘क्या करना होगा मुझे…?’’ डर गई थी धनिया.

‘‘कुछ नहीं… तुम्हें कुछ नहीं करना होगा… जो भी करूंगा मैं करूंगा. तुम तो बस आज रात मेरे कमरे पर अकेली आ जाना बस,’’ कालिया ने धनिया को ऊपर से नीचे तक घूरते हुए कहा.

कालिया खाना देने के बदले धनिया से उस की इज्जत मांग रहा था. धनिया जानती थी कि उसे यह कदम तो उठाना ही पड़ेगा, इसलिए उस ने खाने की टोकरी ले ली और यह भी पूछ लिया कि उसे आना कहां पर है.

कालिया एक विजयी मुसकान के साथ वहां से चला गया.

रात हुई, तो धनिया कालिया की बताई गई जगह पर पहुंच गई. उस के इंतजार में कालिया बेकरार हुआ जा रहा था. जैसे ही धनिया उस के दरवाजे पर पहुंची, कालिया उस पर झपट पड़ा और पागलों की तरह उसे चूमने लगा.

धनिया उसे अपने से अलग करते हुए बोली, ‘‘सारा काम अभी कर लोगे, तो भला रातभर क्या करोगे… मैं तो सारी की सारी तुम्हारी हूं… इतनी भी बेचैनी ठीक नहीं.’’

‘‘अरे, तुम क्या जानो धनिया… मैं तो तुम से बहुत पहले से ही प्यार करता था, पर तुम ने शहर जाने के चक्कर में उस बीरू से शादी कर ली, पर मैं आज भी तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं… अब मैं तुम्हें कहीं नहीं जाने दूंगा… आओ मेरी बांहों में समा जाओ,’’ कालिया ने बांहें फैलाते हुए कहा.

धनिया ने शराब का गिलास कालिया की ओर बढ़ाया, जिसे वह जल्दी से गटक गया और धनिया के सीने को घूरने लगा, ‘‘बस, अब तुम आ गई हो, तो

मुझे रोज रात को ऐसे ही खुश करती रहना… मेरी धनिया,’’ कालिया नशे में आ रहा था.

‘‘हांहां, बिलकुल… अब तो मुझे तुम्हारा ही सहारा है… पर, मुझे यह समझ नहीं आ रहा है कि भला  तुम्हारी मेरे पति से क्या दुश्मनी थी, जो तुम ने उसे गोली मार दी?’’ धनिया  की सवालिया नजरें कालिया के चेहरे  पर थीं.

‘‘नहीं… मैं ने तुम्हारे पति को नहीं मारा, बल्कि तुम्हारा देवर छंगा ही तुम्हारे पति का कातिल है… वह गांव के साहूकार की लड़की से प्यार करता है और उस से शादी करने के लिए उसे पैसे की जरूरत थी, जो उसे जमीन बेचने से मिल सकती थी, पर बीरू के वापस आने से उस के प्लान पर पानी फिर गया, इसीलिए उस ने उसे गोली मार दी.

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‘‘मुझ में और उस में एक करार था कि वह जमीन मुझे बेच कर मुझ से पैसे लेगा और उस पैसे के बल पर अपने पसंद की लड़की से शादी करेगा और तुम को मुझे सौंप देगा.

‘‘यही वजह थी कि छंगा ने तुम्हें आज तक छुआ भी नहीं था, क्योंकि मैं ने ही उसे ऐसा करने से मना किया था,’’ नशे में सब बताता जा रहा था कालिया.

धनिया ने कालिया को शराब पिलाना तब तक जारी रखा, जब तक वह नशे के चलते बेसुध नहीं हो गया और जब वह बेहोश होने लगा, तो धनिया ने जमीन के कागज, जो उस ने गांव की बड़ी काकी के बेटे की मदद से पहले से ही तैयार करवा कर रखे हुए थे, पर बड़ी सफाई से कालिया का अंगूठा लगवा लिया.

रात को कालिया के पास जाने से पहले राजू ने एक मोबाइल फोन धनिया को दे दिया था और वीडियो बनाना  भी सिखा दिया था, जिस में बड़ी सफाई से धनिया ने वे सारी बातें वीडियो के रूप में रिकौर्ड कर ली थीं, जिन में कालिया छंगा की पोल खोलता नजर आ रहा था.

अगले दिन धनिया ने पंचायत बुलाई और फिर से छंगा और कालिया को बुलाया गया. धनिया ने जमीन के कागज पंचायत को दिखाए और बताया कि कालिया ने फिर जमीन उस के नाम कर दी है.

‘‘नहीं, यह मेरे अंगूठे का निशान नहीं है,’’ कालिया चिल्ला उठा, पर कालिया के अंगूठे की छाप भी मेल खा रही थी.

धनिया ने मोबाइल फोन पर बनाई गई वीडियो क्लिप भी पंचों को दिखाई, जिसे देख कर सरपंच ने फैसला सुनाया, ‘‘चूंकि जमीन के कागजों पर लगा हुआ कालिया का अंगूठा इस बात की साफ गवाही दे रहा है कि कालिया ने जमीन धनिया के नाम कर दी है, इसलिए अब उस जमीन पर धनिया का हक है.

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‘‘जहां तक बीरू की हत्या की बात है, उस की जांच के लिए हम ने पुलिस को खबर भेजी है. आगे की जांच पुलिस ही करेगी.’’

यह सुन कर छंगा और कालिया वहां से भागने की कोशिश करने लगे, पर वहां मौजूद गांव वालों ने उन्हें पकड़ लिया और पुलिस के आने पर हवाले कर दिया.

Crime: पति की हत्यारी मौडल पत्नी

लगभग 10 वर्ष बाद सुखमय वैवाहिक जीवन, एक मौडल ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर पति की हत्या करवा खत्म कर लिया. और प्रेमी एवं 7 लोगों के साथ जेल की हवा खा रही है.

यह कहानी है मॉडल आरोपी पत्नी की जिसने प्रेमी के साथ मिलकर पति के हत्या की सुपारी रायपुर के युवकों को दे दी थी. मामले में पुलिस ने पत्नी, आरोपी प्रेमी सहित 7 लोगों को गिरफ्तार किया है.घटना छत्तीसगढ़ के बलोद थाना क्षेत्र के तांदुला डेम की है. और अपने आप में कई पेंच लिए हुए वैवाहिक जीवन में एक समझदारी की शिक्षा दी जाती है.

दरअसल, हुआ यह कि पुलिस को सूचना मिली कि, तांदुला डेम किनारे एक अज्ञात व्यक्ति की खून से सनी लाश पड़ी हुई है. पुलिस, फाॅरेंसिक, सायबर और डाॅग रक्वाड की टीम मौके पर पहुंची. मृतक के गले, पसली और सिर पर गंभीर चोट के निशान थे, जिसके बाद मामले को हत्या से जोड़कर एसएसपी जितेंद्र मीणा ने जांच के आदेश दिए. इस दौरान पुलिस को खून से सनी एक स्कूटी बालोद बस स्टैण्ड के पास मिली. स्कूटी किसी माधुरी मांडले के नाम पर थी. पुलिस ने जब महिला से उस स्कूटी के संबंध में पूछताछ की तो पता चला की उसका पति हिमांशु मांडले 20 दिसंबर को घर से निकला था और वापस नहीं आया है.परिजनों की शिनाख्त के बाद शव की पहचान शासकीय स्कूल में खेल शिक्षक हिमांशु मांडले 35 वर्ष के रूप में की. हिमांशु अटल विहार काॅलोनी सिवनी बालोद में पदस्थ था.

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डांस एकेडमी का वह डांसर?

पुलिस को जाँच के दौरान पता चला कि मृतक हिमांशु मांडले के घर लोकेन्द्र पटेल नामक युवक का आना-जाना लगा रहता था. पुलिस ने संदेह के आधार पर युवक से पूछताछ शुुुरू की पूछताछ पर लोकेन्द्र पटेल ने हत्या करने की बात कबूल कर ली और पुलिस को बताया कि उसकी बालोद स्थित ” वेस्टर्न डांस एकेडमी” है, यहां पर वो डांस सिखाने का काम करता था.

सिर्फ 9 माह पूर्व उसकी और माधुरी मांडले की जान पहचान हुई . वो महिला की 7 वर्षीय पुत्री को डांस सिखाया करता . शिक्षक की पत्नी माधुरी मांडले भी डांस की शौकीन थी और वो भी आरोपी युवक के पास डांस सीखने आया करती . इस दौरान लोकेन्द्र पटेल और माधुरी मांडले के बीच दोस्ती हो गई व फोन से बातचीत भी शुरू हुई. दोस्ती गहरी होने से दोनों एक दूसरे से प्रेम करने लगे. इस दौरान शिक्षक की पत्नी ने प्रेमी लोकेन्द्र को बताया कि उसके पति के साथ बहुत ज्यादा लड़ाई झगड़ा होते रहते है, जिससे वो काफी परेशान है और अब वो उससे अलग रहना चाहती है.

और ऐसी रची गई हत्या की साजिश

कुछ दिनों के विचार विमर्श के बाद दोनों ने मिलकर शिक्षक हिमांशु मांडले की हत्या की साजिश रची. आरोपी प्रेमी ने हिमांशु की हत्या के लिए अपने पूर्व परिचित रायपुर निवासी दोस्त निखिल सोनवानी को इसकी सुपारी दी . 20 दिसंबर को निखिल अपने दोस्त कृष्णकांत शर्मा उर्फ गोलू, गोविंद सोनी व 2 अन्य नाबालिग के साथ इनोवा कार किराये पर लेकर बालोद पहुंचा.
बालोद पहुंचने से पहले सभी ने अपना मोबाईल फोन बंद कर दिया. शाम लगभग 6 बजे के बीच बालोद बस स्टैण्ड पहुंचे जहां पहले से लोकेन्द्र पटेल मौजूद था.निखिल सोनवानी ने रायपुर से साथ आये सभी आरोपियों को लोकेन्द्र पटेल से मिलाया. इसके बाद सभी लोगों ने बस स्टैण्ड में चाय-नाश्ता किये और इनोवा कार से काॅलेज रोड़ तिराहा तक गये. इसके बाद इनोवा कार चालक को कुछ रूपये देकर नाश्ता करने तथा बस स्टैण्ड में ही रहने को कहा गया. आरोपी लोकेन्द्र पहले से ही मृतक हिमांशु को बता दिया था कि उसके कुछ दोस्त आ रहे हैं जिनके साथ वो पार्टी करेंगे.  बाद  में लोकेन्द्र पटेल ने हिमांशु मांडले को फोन करके बस स्टैण्ड बुलाया, जिसके बाद सभी शराब लेकर तांदुला डेम आये.यहां पर सभी ने छककर शराब पी और उसी दौरान लोकेन्द्र पटेल ने कृष्णकांत को इशारे से हिमांशु मांडले को मारने कहा, तब उसके नाबालिग दोस्तों ने जेब से चाकू निकालकर पीछे से हिमांशु मांडले के गर्दन में ताबड़तोड़ वार कर दिया. आरोपियों ने पत्थर,चाकू और हथौड़ी से हमला कर उसकी हत्या कर दी और मृतक की स्कूटी को बस स्टैंड में छुपाकर इनोवा कार से फरार हो गए. पुलिस ने मुख्य आरोपी लोकेन्द्र पटेल के निशानदेही पर रायपुर से सभी चारों आरोपियों को गिरफ्तार कर मामले का खुलासा एसएसपी जीतेन्द्र मीना ने किया.

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गिरफ्तार आरोपियों में मृतक की पत्नी माधुरी मांडले, लोकेन्द्र पटेल, निखिल सोनवानी ,कृष्णकांत शर्मा, गोविंद सोनी सहित सात लोगों को गिरफ्तार किया गया है.

जिसने हमारे संवाददाता को बताया कि आरोपी लोकेन्द्र पटेल पहले भी जेल जा चुका था. साथ ही आरोपी कृष्णकांत शर्मा उर्फ गोलू के विरूद्ध थाना कोतवाली रायपुर में चाकूबाजी के मामलों में गिरफ्तार हो चुका है. आरोपियों के पास से 1 नग बटन चाकू, हथौड़ी, पत्थर, 4 नग मोबाईल, इनोवा कार और मृतक की स्कूटी जब्त कर ली है.

संकरा- भाग 1: जब सूरज के सामने आया सच

‘बायोसिस्टम्स साइंस ऐंड इंजीनियरिंग लैब में कंप्यूटर स्क्रीन पर जैसेजैसे डीएनए की रिपोर्ट दिख रही थी, वैसेवैसे आदित्य के माथे की नसें तन रही थीं. उस के खुश्क पड़ चुके हलक से चीख ही निकली, ‘‘नो… नो…’’ आदित्य लैब से बाहर निकल आया. उसे एक अजीब सी शर्म ने घेर लिया था.

अचानक आदित्य के जेहन में वह घटना तैर गई, जब पिछले दिनों वह छुट्टियों में अपनी पुश्तैनी हवेली में ठहरा था. एक सुबह नींद से जागने के बाद जब आदित्य बगीचे में टहल रहा था, तभी उसे सूरज नजर आया, जो हवेली के सभी पाखानों की सफाई से निबट कर अपने हाथपैर धो रहा था.

आदित्य बोला था, ‘सुनो सूरज, मैं एक रिसर्च पर काम करने वाला हूं और मुझे तुम्हारी मदद चाहिए.’ सूरज बोला था, ‘आप के लिए हम अपनी जान भी लड़ा सकते हैं. आप कहिए तो साहब?’

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‘मुझे तुम्हारे खून का सैंपल चाहिए.’ सूरज बोला था, ‘मेरा खून ले कर क्या कीजिएगा साहब?’

‘मैं देखना चाहता हूं कि दलितों और ठाकुरों के खून में सचमुच कितना और क्या फर्क है.’ ‘बहुत बड़ा फर्क है साहब. यह आप का ऊंचा खून ही है, जो आप को वैज्ञानिक बनाता है और मेरा दलित खून मुझ से पाखाना साफ करवाता है.’

यह सुन कर आदित्य बोला था, ‘ऐसा कुछ नहीं होता मेरे भाई. खूनवून सब ढकोसला है और यही मैं विज्ञान की भाषा में साबित करना चाहता हूं.’ आदित्य भले ही विदेश में पलाबढ़ा था और उस के पिता ठाकुर राजेश्वर सिंह स्विट्जरलैंड में बस जाने के बाद कभीकभार ही यहां आए थे, पर वह बचपन से ही जिद कर के अपनी मां के साथ यहां आता रहा था. वह छुट्टियां अपने दादा ठाकुर रणवीर सिंह के पास इस पुश्तैनी हवेली में बिताता रहा था.

पर इस बार आदित्य लंबे समय के लिए भारत आया था. अब तो वह यहीं बस जाना चाहता था. दरअसल, एक अहम मुद्दे को ले कर बापबेटे में झगड़ा हो गया था. उस के पिता ने वहां के एक निजी रिसर्च सैंटर में उस की जगह पक्की कर रखी थी, पर उस पर मानवतावादी विचारों का गहरा असर था, इसलिए वह अपनी रिसर्च का काम भारत में ही करना चाहता था.

पिता के पूछने पर कि उस की रिसर्च का विषय क्या है, तो उस ने बताने से भी मना कर दिया था. आदित्य ने समाज में फैले जातिवाद, वंशवाद और उस से पैदा हुई समस्याओं पर काफी सोचाविचारा था. इस रिसर्च की शुरुआत वह खुद से कर रहा था और इस काम के लिए अब उसे किसी दलित का डीएनए चाहिए था. उस के लिए सूरज ही परिचित दलित था.

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सूरज के बापदादा इस हवेली में सफाई के काम के लिए आते थे. उन के बाद अब सूरज आता था. सूरज के परदादा मैयादीन के बारे में आदित्य को मालूम हुआ कि वे मजबूत देह के आदमी थे. उन्होंने बिरादरी की भलाई के कई काम किए थे. नौजवानों की तंदुरुस्ती के लिए अखाड़ा के बावजूद एक भले अंगरेज से गुजारिश कर के बस्ती में उन्होंने छोटा सा स्कूल भी खुलवाया था, जिस की बदौलत कई बच्चों की जिंदगी बदल गई थी.

पर मैयादीन के बेटेपोते ही अनपढ़ रह गए थे. उस सुबह, जब आदित्य सूरज से खून का सैंपल मांग रहा था, तब उसे मैयादीन की याद आई थी.

पर इस समय आदित्य को बेकुसूर सूरज पर तरस आ रहा था और अपनेआप पर बेहद शर्म. आदित्य ने लैब में जब अपने और सूरज के डीएनए की जांच की, तब इस में कोई शक नहीं रह गया था कि सूरज उसी का भाई था, उसी का खून.

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आदित्य को 2 चेहरे उभरते से महसूस हुए. एक उस के पिता ठाकुर राजेश्वर सिंह थे, तो दूसरे सूरज के पिता हरचरण. आदित्य को साफसाफ याद है कि वह बचपन में जब अपनी मां के साथ हवेली आता था, तब हरचरण उस की मां को आदर से ‘बहूजीबहूजी’ कहता था. हरचरण ने उस की मां की तरफ कभी आंख उठा कर भी नहीं देखा था. ऐसे मन के साफ इनसान की जोरू के साथ उस के पिता ने अपनी वासना की भूख मिटाई थी. जाने उस के पिता ने उस बेचारी के साथ क्याक्या जुल्म किए होंगे.

यूपी में कोरोना कर्फ्यू खत्म होने टीकाकरण और ट्रेसिंग पर जोर

लखनऊ . उत्तर प्रदेश के अपर मुख्य सचिव ‘सूचना’ श्री नवनीत सहगल ने बताया कि मुख्यमंत्री जी नेतृत्व में प्रदेश में 3 टी के अभियान से प्रदेश में अन्य प्रदेशों की तुलना में कोविड संक्रमण सबसे कम समय में नियत्रण में आया है. देश में सबसे कम समय में प्रतिदिन आने वाले सक्रिय मामलों में कमी आई है. उन्होंने कहा कि प्रदेश का 3 टी अभियान अन्य प्रदेशों के लिए एक माॅडल के रूप में सामने आया है.

सर्विलांस से ट्रेसिंग :

सर्विलांस के माध्यम से निगरानी समितियों द्वारा ट्रेसिंग के तहत घर-घर जाकर संक्रमण की जानकारी ली जा रही है. उन्होंने बताया कि इसके साथ-साथ 05 मई, 2021 से ग्रामीण क्षेत्रों में एक विशेष अभियान चलाकर, जिसमें निगरानी समितियों द्वारा घर-घर जाकर उन लोगों का जिनमें किसी प्रकार के संक्रमण के लक्षण होने पर उनका एन्टीजन टेस्ट भी कराया जा रहा है. अगर एन्टीजन टेस्ट निगेटिव आ रहा है और लक्षण हैं तो उनका आरटीपीसीआर टेस्ट भी कराया जा रहा है, इसके साथ-साथ उनको 11 लाख से अधिक मेडिकल किट भी बांटी गयी है.

प्रदेश में संक्रमण कम होने पर भी कोविड-19 के टेस्टों की संख्या में निरन्तर बढ़ोत्तरी की जा रही है, ताकि संक्रमित व्यक्ति की पहचान करके इलाज किया जा सके. उन्होंने बताया कि 31 मार्च से अब तक 70 प्रतिशत टेस्ट ग्रामीण क्षेत्रों में किये गये है.

श्री सहगल ने बताया कि प्रदेश के सभी जनपदों में कोविड के एक्टिव केसों की संख्या 600 से कम होने पर जनपदों में आंशिक कोरोना कफ्र्यू हटाकर पूर्व की तरह साप्ताहिक बंदी लागू कर दी गयी है. उन्होंने बताया कि साप्ताहिक बंदी के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों व शहरी क्षेत्रों मंे फोगिंग, सैनेटाइजेशन व साफ-सफाई का अभियान चलाया जा रहा है. इस अभियान में लगभग 1.50 लाख से अधिक कर्मचारी लगाये गये है. प्रदेश में कोविड टीकाकरण अभियान तेजी से चलाया जा रहा है.

टीकाकरण पर जोर :

माह जून में 01 करोड़ टीकाकरण का लक्ष्य रखा गया है. अगले माह से प्रतिदिन 10 लाख से अधिक टीके लगाने का लक्ष्य रखा गया है. बड़े औद्योगिक ईकाइयों को कहा गया है कि वे अपनी ईकाइयों में कार्य कर रहे कर्मचारियों का टीकाकरण करायें सरकार द्वारा आवश्यक सहयोग दिया जायेगा. उन्होंने बताया कि प्रदेश में आॅक्सीजन युक्त बेडों की संख्या मंे निरन्तर बढ़ोत्तरी की जा रही है. जिसके क्रम में कल 106 बेडों की बढ़ोत्तरी की गयी है. कोविड-19 संक्रमण से बच्चों के उपचार के लिए पीकू/नीकू बेड भी तैयार किये जा रहे है.

श्री सहगल ने बताया कि आंशिक कोरोना कफ्र्यू के बावजूद भी औद्योगिक गतिविधियां में तेजी से कार्य किया जा रहा है. प्रदेश में आने वाले नये निवेशकों के प्रस्तावों पर सहमति अथवा अनुमति तत्काल दिये जाने के निर्देश मुख्यमंत्री जी द्वारा दिये गये हैं. लगभग 66,000 करोड़ के नये प्रस्ताव पर कार्यवाही चल रही है.

उन्होंने बताया कि एमएसएमई एक्ट में संसोधन करते हुए नये उद्योगों को लगाने को सरल किया गया है, जिसमें 1000 दिन तक किसी प्रकार के कागज की आवश्यकता नहीं है. जो एमओयू किये गये हैं उन्हें धरातल पर उतारा जा रहा है. उन्होंने बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में 15 लाख मजदूर मनरेगा के तहत कार्य कर रहे हैं. मुख्यमंत्री जी द्वारा मनरेगा के माध्यम से स्थानीय स्तर पर रोजगार देने के कार्यों का और तेजी से अमल में लाने के निर्देश दिये गये हैं.

कमजोर वर्गों पर नजर :

श्री सहगल ने बताया कि मुख्यमंत्री जी द्वारा कल संगठित और असंगठित श्रमिकों को 1000 रुपये भत्ता दिया जा रहा है, जिसके तहत डीबीटी के माध्यम से 30 लाख से अधिक लोगों को सीधे उनके खातों में भत्ता दिया जायेगा. उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के तहत अब तक 2 करोड़ 17 लाख पात्र लोगों को खाद्यान्न वितरित किया गया है.

प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के तहत 3 करोड़ 20 लाख से अधिक पात्र लोगों को खाद्यान्न वितरण किया जाना है. उन्होंने बताया कि प्रदेश सरकार द्वारा भी पात्र लोगों को खाद्यान्न वितरण किया जायेगा. मुख्यमंत्री हेल्पलाइन के माध्यम से कोविड संक्रमित मरीजों का हालचाल जानने के साथ-साथ खाद्यान्न योजना का भी फीडबैक लिया जा रहा है. सीएम हेल्पलाइन के माध्यम से 41 हजार लोगों से वार्ता की गई है.

श्री सहगल ने बताया कि प्रदेश सरकार किसानों के हितों के लिए कृतसंकल्प है और किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर उनकी फसल को खरीदे जाने की प्रक्रिया कोविड प्रोटोकाल का पालन करते हुए तेजी से चल रही है. 01 अप्रैल से 15 जून, 2021 तक गेहँू खरीद का अभियान जारी रहेगा. गेहँू क्रय अभियान में 10 लाख से अधिक किसानों से 46,96,521.87 मी0 टन गेहूँ खरीदा गया है, जो विगत वर्ष से डेढ़ गुना अधिक है.

GHKKPM: विराट करेगा सई से प्यार का इजहार तो पाखी का होगा बुरा हाल

टीआरपी चार्ट में शामिल होने वाला स्टार प्लस का चर्चित सीरियल ‘गुम है किसी के प्यार में’ (Ghum Hai Kisikey Pyaar Meiin) में इन दिनों हाईवोल्टेज ड्रामा चल रहा है. शो के बीते एपिसोड में दिखाया गया कि सई और विराट का रिश्ता टूटने की कगार पर है. तो वहीं विराट को अहसास हो रहा है कि कहीं उसे सई से प्यार हो रहा है. शो के लेटेस्ट एपिसोड में खूब धमाल हो रहा है. आइए जानते हैं शो के लेटेस्ट ट्रैक के बारे में.

शो में दिखाया जा रहा है कि पाखी चाहती है कि किसी भी तरह सई और विराट अलग हो जाए. और वह इसके लिए कुछ भी करने को तैयार है. तो उधर सई भी विराट को धोखेबाज समझ रही है,  वह विराट को ताना मारती नजर आ रही है.

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तो वहीं दूसरी तरफ विराट को इस बात का एहसास हो रहा है कि वो सई से प्यार करने लगा है. विराट सई को अपनी हालत बताने की कोशिश करता है. ऐसे में सई विराट की कोई भी बात सुनने से इनकार कर देती है. इतना ही नहीं सई पूरे परिवार के सामने विराट और पाखी के रिश्ते को लेकर सवाल करती है. सई पाखी से यह भी कहती है कि वह उसके पति सम्राट से भी इस मुद्दे पर बात करेगी.

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शो में यह भी दिखाया जा रहा है कि लड़ाई के बाद भी सई विराट का ख्याल रख रही है. तो वहीं विराट अपनी गर्दन के दर्द से परेशान है. ऐसे में सई विराट की गर्दन की मसाज करती नजर आ रही है. इस दौरान विराट चोरी छिपे सई को शीशे में से देखेगा.

 

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विराट को एहसास होगा कि वो सई को पसंद करने लगा है. सई को देखते हुए विराट मुस्कुराने लगेगा. चाहकर भी विराट ये बात सई से नहीं कह पाएगा कि वह उससे प्यार करने लगा है. अब शो के अपकमिंग एपिसोड में ये देखना दिलचस्प होगा कि इतनी मुश्किलों के बावजूद विराट सई से कैसे अपने प्यार का इजहार करता है.

Father’s Day Special- दूसरा पिता: क्या कल्पना को पिता का प्यार मिला?

वह यादों के भंवर में डूबती चली जा रही थी. ‘नहीं, न वह देवदास की पारो है, न चंद्रमुखी. वह तो सिर्फ पद्मा है.’ कितने प्यार से वे उसे पद्म कहते थे. पहली रात उन्होंने पद्म शब्द का मतलब पूछा था. वह झेंपती हुई बोली थी, ‘कमल’.

‘सचमुच, कमल जैसी ही कोमल और वैसे ही रूपरंग की हो,’ उन्होंने कहा था. पर फिर पता नहीं क्या हुआ, कमल से वह पंकज रह गई, पंकजा. क्यों हुआ ऐसा उस के साथ? दूसरी औरत जब पराए मर्द पर डोरे डालती है तो वह यह सब क्यों नहीं सोचा करती कि पहली औरत का क्या होगा? उस के बच्चों का क्या होगा? ऐसी औरतें परपीड़ा में क्यों सुख तलाशती हैं?

हजरतगंज के मेफेयर टाकीज में ‘देवदास’ फिल्म लगी थी. बेटी ने जिद कर के उसे भेजा था, ‘क्या मां, आप हर वक्त घर में पड़ी कुछ न कुछ सोचती रहती हैं, घर से बाहर सिर्फ स्कूल की नौकरी पर जाती हैं, बाकी हर वक्त घर में. ऐसे कैसे चलेगा? इस तरह कसेकसे और टूटेटूटे मन से कहीं जिया जा सकता है?’ लेकिन वह तो जैसे जीना ही भूल गई थी, ‘काहे री कमलिनी, क्यों कुम्हलानी, तेरी नाल सरोवर पानी.’ औरत का सरोवर तो आदमी होता है. आदमी गया, कमल सूखा. औरत पुरुषरूपी पानी के साथ बढ़ती जाती है, ऊपर और ऊपर. और जैसे ही पानी घटा, पीछे हटा, वैसे ही बेसहारा हो कर सूखने लगती है, कमलिनी. यही तो हुआ पद्मा के साथ भी. प्रभाकर एक दिन उसे इस तरह बेसहारा छोड़ कर चले जाएंगे, यह तो उस ने सपने में भी नहीं सोचा था. पर ऐसा हुआ.

उस दिन प्रभाकर ने एकदम कह दिया, ‘पद्म, मैं अब और तुम्हारे साथ नहीं रहना चाहता. अगर झगड़ाझंझट करोगी तो ज्यादा घाटे में रहोगी, हार हमेशा औरत की होती है. मुझ से जीतोगी नहीं. इसलिए जो कह रहा हूं, राजीखुशी मान लो. मैं अब मधु के साथ रहना चाहता हूं.’ पति का फैसला सुन कर वह ठगी सी रह गई थी. यह वही मधु थी, जो अकसर उस के घर आयाजाया करती थी. लेकिन उसे क्या पता था, एक दिन वही उस के पति को मोह लेगी. वह भौचक देर तक प्रभाकर की तरफ ताकती रही थी, जैसे उन के कहे वाक्यों पर विश्वास न कर पा रही हो. किसी तरह उस के कंठ से फूटा था, ‘और हमारी बेटी, हमारी कल्पना का क्या होगा?’

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‘मेरी नहीं, वह तुम्हारी बेटी है, तुम जानो,’ प्रभाकर जैसे रस्सी तुड़ा कर छूट जाना चाहते थे, ‘स्कूल में नौकरी करती हो, पाल लोगी अपनी बेटी को. इसलिए मुझे उस की बहुत फिक्र नहीं है.’

पद्मा हाथ मलती रह गईर् थी. प्रभाकर उसे छोड़ कर चले गए थे. अगर चाहती तो झगड़ाझंझट करती, घर वालों, रिश्तेदारों को बीच में डालती, पर वह जानती थी, सिवा लोगों की झूठी सहानुभूति के उस के हाथ कुछ नहीं लगेगा. समझदार होने पर कल्पना ने एक दिन कहा था, ‘मां, आप ने गलती की, इस तरह अपने अधिकार को चुपचाप छोड़ देना कहां की बुद्धिमत्ता है?’

‘बेटी, अधिकार देने वाला कौन होता है?’ उस ने पूछा था, ‘पति ही न, पुरुष ही न? जब वही अधिकार देने से मुकर जाए, तब कैसा अधिकार?’ पद्मा ने बहुत मुश्किल से कल्पना को पढ़ायालिखाया. मैडिकल की तैयारी के लिए लखनऊ में महंगी कोचिंग जौइन कराई. जब वह चुन ली गई और लखनऊ के ही मैडिकल कालेज में प्रवेश मिल गया तो पद्मा बहुत खुश हुई. उस का मन हुआ, उन्नाव जा कर प्रभाकर को यह सब बताए, मधु को जलाए, क्योंकि उस के बच्चे तो अभी तक किसी लायक नहीं हुए थे. वह प्रभाकर से कहना चाहती थी कि वह हारी नहीं. उन्नाव जाने की तैयारी भी की, पर कल्पना ने मना कर दिया, ‘इस से क्या लाभ होगा, मां? जब अब तक आप ने संतोष किया, तो अब तो मैं जल्दी ही बहुतकुछ करने लायक हो जाऊंगी. जाने दीजिए, हम ऐसे ही ठीक हैं.’

पद्मा अकेली हजरतगंज के फुटपाथ पर सोचती चली जा रही थी. जया वहीं से डौलीगंज के लिए तिपहिए पर बैठ कर चली गई थी. उसे मुख्य डाकघर से तिपहिया पकड़ना था. जया और वह एक ही स्कूल में पढ़ाती थीं. पद्मा अकेली फिल्म देखने नहीं जाना चाहती थी. लड़की की जिद बताई तो जया हंस दी, ‘चलो, मैं चलती हूं तुम्हारे साथ. अपने जमाने की प्रसिद्ध फिल्म है.’

पति के छिनते ही पद्मा की जैसे दुनिया ही छिन गई थी. कछुए की तरह अपने भीतर सिमट कर रह गई थी, अपने घर में, अपने कमरे में. कल्पना अकसर कहा करती, ‘मां, आप का जी नहीं घबराता इस तरह गुमसुम रहतेरहते?’

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वह हंसने का निष्फल प्रयास करती, ‘कहां हूं गुमसुम, खुश तो हूं.’ पर कहां थी, वह खुश? खाली हाथ, रीता जीवन, एक सतत प्यास लिए सूखा रेगिस्तान मन, उड़ती हुई रेत और सुनसान दिशाएं. औरत, पुरुष के बिना अधूरी क्यों रह जाती है? अपने जीवन से हट कर पद्मा देखी हुई फिल्म के बारे में सोचने लगी…उसे लगा, वह खुद देवदास के किरदार में है, ‘अब तो सिर्फ यही अच्छा लगता है कि कुछ भी अच्छा न लगे,’ ‘यह प्यास बुझती क्यों नहीं’, ‘क्यों पारो की याद सताती है?’, ‘कौन कमबख्त पीता है होश में रहने के लिए? मैं तो पीता हूं जीने के लिए कि कुछ सांसें ले सकूं’, ‘मैं नहीं कर सकता. क्या सभी लोग सभीकुछ करते हैं?’ फिल्म के ऐसे कितने ही वाक्य थे, जो उस के दिलोदिमाग में ज्यों के त्यों खुद से गए थे. क्या हर दुख झेलने वाला व्यक्ति देवदास है? क्या देवदास आज की भी कड़वी सचाई नहीं है?

‘चंद्रमुखी, तुम्हारा यह बाहर का कमरा तो बिलकुल बदल गया.’ क्या जवाब दिया चंद्रमुखी ने, ‘बाहर का ही नहीं, अंदर का भी सब बदल गया है.’

क्या सचमुच वह भी बाहरभीतर से बदल नहीं गई पूरी तरह? चंद्रमुखी ने वेश्या का पेशा छोड़ दिया है. देवदास कहता है, ‘छोड़ तो दिया है, पर औरतों का मन बहुत कमजोर होता है, चंद्रमुखी.’ पद्मा सोचती है, ‘क्या सचमुच औरतों का मन बहुत कमजोर होता है? क्या आदमी का मोह, आदमी की चाह, उसे कभी भी डिगा सकती है? वह कभी भी उस के मोहपाश में बंध कर अपना आगापीछा भुला सकती है?’

अचानक पद्मा हड़बड़ा गई क्योंकि आगे चलता एक व्यक्ति अचानक चकरा कर उस के पास ही फुटपाथ पर गिर पड़ा था. वह कुछ समझ नहीं पाई. बगल के पान वाले की दुकान से पद्मा ने पानी लिया और उस के चेहरे पर छींटे मारे. लोगों की भीड़ जुट गई, ‘कौन है? कहां का है? क्या हुआ?’ जैसे तमाम सवाल थे, जिन के उत्तर उस के पास नहीं थे. लोगों की सहायता से पद्मा ने उस व्यक्ति को एक तिपहिए पर लदवाया, खुद साथ बैठी और मैडिकल कालेज के आपात विभाग पहुंची.

पद्मा ने तिपहिया चालक की सहायता से उस व्यक्ति को उतारा और आपात विभाग में ले जा कर एक बिस्तर पर लिटा दिया. कल्पना को तलाश करवाया तो वह दौड़ी आई, ‘‘क्या हुआ, मां, कौन है यह?’’ पद्मा क्या जवाब देती, हौले से सारी घटना बता दी.

‘‘तुम भी गजब करती हो, मां. ऐसे ही कोई आदमी गिर पड़ा और तुम ले कर यहां चली आईं. मरने देतीं वहीं.’’ उस ने बेटी को अजीब सी नजरों से देखा कि यह क्या कह रही है? मरने देती? सहायता न करती? यह भी कोई बात हुई? अनजान आदमी है तो क्या हुआ, है तो आदमी ही.

‘‘दूसरे लोग उठाते और किसी अस्पताल ले जाते. या फिर पुलिस उठाती. आप क्यों लफड़े में पड़ीं, मरमरा गया तो जवाब कौन देगा?’’ भुनभुनाती कल्पना डाक्टरों के पास दौड़ी.

डाक्टरों ने कल्पना के कारण उस की अच्छी देखभाल की. 2 घंटे बाद उसे होश आया. दाएं हिस्से में जुंबिश खत्म हो गई थी, लकवे का असर था. जब उसे ठीक से होश आ गया तो पद्मा को खुशी हुई, एक अच्छा काम करने का आत्मसंतोष. उस ने उस व्यक्ति से पूछा, ‘‘आप कहां रहते हैं?’’

‘‘कहीं नहीं और शायद सब कहीं,’’ वह अजीब तरह से मुसकराया. ‘‘हम लोग आप के घर वालों को खबर करना चाहते थे, पर आप की जेब से कोई अतापता नहीं मिला. सिर्फ रुपए थे पर्स में, ये रहे, गिन लीजिए,’’ पद्मा ने पर्स उस की तरफ बढ़ाया.

कल्पना भी निकट आ कर बैठ गई थी. ‘‘मैडम, जो लोग सड़क पर गिरे आदमी को अस्पताल पहुंचाते हैं, वे उस का पर्स नहीं मारते,’’ वह उसी तरह मुसकराता रहा, ‘‘समझ नहीं पा रहा, आप को धन्यवाद दूं या खुद को कोसूं.’’

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‘‘क्यों भला?’’ कल्पना ने पूछा, ‘‘आप के बीवीबच्चे आप की कुशलता सुन कर कितने प्रसन्न होंगे, यह एहसास है आप को?’’ ‘‘कोई नहीं है अब हमारा,’’ वह आदमी उदास हो गया, ‘‘2 साल हुए, हत्यारों ने घर में घुस कर मेरी बेटी और पत्नी के साथ बलात्कार किया था. लड़के ने बदमाशों का मुकाबला किया तो उन लोगों ने तीनों की हत्या कर दी.’’

‘‘यह सुन कर वे दोनों सन्न रह गईं. काफी देर तक खामोशी छाई रही, फिर पद्मा ने पूछा, ‘‘आप कहां रहते हैं?’’

‘‘कहां बताऊं? शायद कहीं नहीं. जिस घर में रहता था, वहां हर वक्त लगता है जैसे मेरी बेटी, पत्नी और बेटा लहूलुहान लाशों के रूप में पड़े हैं. इसलिए उस घर से हर वक्त भागा रहता हूं.’’ ‘‘यहां लखनऊ में आप कैसे आए थे?’’ कल्पना ने पूछा.

‘‘इलाहाबाद में किताबों का प्रकाशक हूं. स्कूल, कालेजों की पुस्तकें प्रकाशित करता हूं-पाठ्यपुस्तकों से ले कर कहानी, उपन्यास, कविता, नाटक आदि तक,’’ वह बोला, ‘‘यहां इसी सिलसिले में आया था. हजरतगंज के एक होटल में ठहरा हूं. एक सिनेमाहौल में पुरानी फिल्म ‘देवदास’ लगी है, उसे देखने गया था कि रास्ते में गश खा कर गिर पड़ा.’’

डाक्टरों से बात कर के कल्पना उस व्यक्ति को मां के साथ घर लिवा लाई, ‘‘चलिए, आप यहीं रहिए कुछ दिन,’’ उस ने कहा, ‘‘हम आप का सामान होटल से ले आते हैं. कमरे की चाबी दीजिए और होटल की कोई रसीद हो, तो वह…’’

‘‘रसीद तो कमरे में ही है, चाबी यह रही,’’ उस ने जेब से निकाल कर चाबी दी. कल्पना ने मां को बताया, ‘‘इन्हें कोई ठंडी चीज मत देना. गरम चाय या कौफी देना.’’

फिर एक पड़ोसी को साथ ले कर कल्पना चली गई. पद्मा कौफी बना लाई. उस व्यक्ति ने किसी तरह बैठने का प्रयास किया, ‘‘बिलकुल इतनी ही उम्र थी मेरी बेटी की,’’ उस का गला भर्रा गया, आंखों में नमी तिर आई.

‘‘भूल जाइए वह सब, जो हुआ,’’ पद्मा बोली, ‘‘आप अकेले नहीं हैं इस धरती पर जिन्हें दुख झेलना पड़ा, ऐसे तमाम लोग हैं.’’ वह कुछ बोला नहीं, भरीभरी आंखों से पद्मा की तरफ देखता रहा और कौफी के घूंट भरता रहा.

‘‘सच पूछिए तो अब जीने की इच्छा ही नहीं रह गई,’’ वह बोला, ‘‘कोई मतलब नहीं रह गया जीने का. बिना मकसद जिंदगी जीना शायद सब से मुश्किल काम है.’’ ‘‘शायद आप ठीक कहते हैं,’’ पद्मा के मुंह से निकल गया, ‘‘मैं ने भी ऐसा ही कुछ अनुभव किया जब कल्पना के पिता ने अचानक एक दिन मुझे छोड़ दिया.’’

‘‘आप जैसी नेक औरत को भी कोई आदमी छोड़ सकता है क्या?’’ उसे विश्वास नहीं हुआ. ‘‘मधु नामक एक लड़की पड़ोस में रहती थी. हमारे घर आतीजाती थी. वे उसी के मोह में फंस गए. कल्पना तब छोटी थी. वे चले गए मुझे छोड़ कर,’’ पता नहीं वह यह सब उस से क्यों कह बैठी.

3-4 दिनों में वह व्यक्ति चलनेफिरने लगा था. एक सुबह पद्मा ने पूछा, ‘‘अभी तक आप ने अपना नाम नहीं बताया?’’

जवाब कल्पना ने दिया, ‘‘कमलकांत,’’ और होटल की रसीद मां की तरफ बढ़ाई, ‘‘रसीद पर इन का यही नाम लिखा है,’’ वह मुसकरा रही थी.

थोड़ी देर बाद जब वह सूटकेस में अपने कपड़े रखने लगा तो पद्मा ने पूछा, ‘‘कहां जाएंगे अब?’’ ‘‘क्या बताऊं?’’ कमलकांत बोला, ‘‘इलाहाबाद ही जाऊंगा. वहां मेरा कुछ काम तो है ही, लोग परेशान हो रहे होंगे.’’

कल्पना ने उस के हाथ से सूटकेस ले लिया, ‘‘आप अभी कहीं नहीं जाएंगे. इतने ठीक नहीं हुए हैं कि कहीं भी जा सकें. दोबारा अटैक हो गया तो लेने के देने पड़ जाएंगे. यहीं रहिए कुछ दिन और, अपने दफ्तर में फोन कर दीजिए.’’ पद्मा कुछ बोली नहीं. कहना तो वह भी यही सब चाहती थी, पर अच्छा लगा, बेटी ने ही कह दिया. शायद वह समझ गई, पर क्या समझ गई होगी? देर तक चुप बैठी पद्मा सोचती रही. कहां पढ़ा था उस ने यह वाक्य- ‘प्यार जानने, समझने की चीज नहीं होती, उसे तो सिर्फ महसूस किया जाता है.’

‘क्या कमलकांत उसे अच्छे लगने लगे हैं?’ पद्मा ने अपनेआप से पूछा. एक क्षण को वह सकुचाई. फिर झेंप सी महसूस की, ‘नहीं, अब इस उम्र में फिर से कोई नई शुरुआत करना बहुत मुश्किल है. न मन में उत्साह रहा, न इच्छा. प्रभाकर के साथ जुड़ कर देख लिया. क्या मिला उसे? क्या दोबारा वही सब दोहराए? आदमी का क्या भरोसा? क्यों सोच रही है वह यह सब इस आदमी को ले कर? क्या लगता है यह उस का? कोई भी तो नहीं…क्या सचमुच कोई भी नहीं?’ अचानक उस के भीतर से किसी ने पूछा. और वह अपनेआप को भी कोई सचसच जवाब नहीं दे पाई थी. व्यक्ति दूसरे से झूठ बोल सकता है, अपनेआप से कैसे झूठ बोले?

कल्पना कालेज जाती हुई बोली, ‘‘मां, आप अभी एक सप्ताह की और छुट्टी ले लीजिए, इन की देखरेख कीजिए.’’ पद्मा बुत बनी बैठी रही, न हां बोली, न इनकार किया.

उस के जाने के बाद पद्मा ने छुट्टी की अर्जी लिखी और पड़ोस के लड़के को किसी तरह स्कूल जाने को राजी किया. उस के हाथों अर्जी भिजवाई. शाम को जया आई, ‘‘क्या हुआ, पद्मा?’’ एक अजनबी को घर में देख कर वह भी चकराई.

जवाब देने में वह लड़खड़ा गई, ‘‘क्या बताऊं?’’ जया उसे एकांत में ले गई, ‘‘ये महाशय?’’

सवाल सुन कर पद्मा का चेहरा अपनेआप ही लाल पड़ गया, पलकें झुक गईं. जया मुसकरा दी, ‘‘तो यह बात है… कल्पना के नए पिता?’’

पद्मा अचकचा गई, ‘‘नहीं रे, पर… शायद…’’ बाद में देर तक पद्मा और जया बातें करती रहीं. अंत में जया ने पूछा, ‘‘कल्पना मान जाएगी?’’

‘‘कह नहीं सकती. मेरी हिम्मत नहीं है, जवान बेटी से यह सब कहने की. अगर तू मदद कर सके तो बता.’’ ‘‘कल्पना से कल बात करूंगी,’’ जया बोली, ‘‘और प्रभाकर ने टांग अड़ाई तो…?’’

‘‘इतने सालों से उन्होंने हमारी खबर नहीं ली. मैं नहीं समझती उन्हें कोई एतराज होगा.’’ ‘‘सवाल एतराज का नहीं, कानून का है. आदमी अपना अधिकार कभी भी जता सकता है. तुम स्कूल में अध्यापिका हो, बदनामी होगी.’’

‘‘तब से यही सब सोच रही हूं,’’ पद्मा बोली, ‘‘इसीलिए डरती भी हूं. कुछ तय नहीं कर पा रही कि कदम सही होगा या गलत. एक मन कहता है, कदम उठा लूं, जो होगा, देखा जाएगा. दूसरा मन कहता है, मत उठा. लोग क्या कहेंगे. दुनिया क्या कहेगी. समाज में क्या मुंह दिखाऊंगी. यह उम्र बेटी के ब्याह की है और मैं खुद…’’ पद्मा संकोच में चुप रह गई. ‘‘ठीक है, पहले कल्पना का मन जानने दे, तब तुम से बात करती हूं और कमलकांत से भी कहती हूं,’’ जया चली गई.

पद्मा पास की दुकान से घर की जरूरत की चीजें ले कर आई तो देखा, कमलकांत के पास कल्पना बैठी गपशप कर रही है और दोनों बेहद खुश हैं. ‘‘मां, जया मौसी रास्ते में मिली थीं.’’

सुन कर पद्मा घबरा गई. हड़बड़ाई हुई सामान के साथ सीधे घर में भीतर चली गई कि बेटी का सामना कैसे करे? ?

अचानक कल्पना पीछे से आ कर उस से लिपट गई, ‘‘मां, आप से कितनी बार कहा है, हर वक्त यों मन को कसेकसे मत रहा करिए. कभीकभी मन को ढीला भी छोड़ा जाता है पतंग की डोर की तरह, जिस से पतंग आकाश में और ऊंची उठती जाए.’’ वह कुछ बोली नहीं. सिर झुकाए चुप बैठी रही. कल्पना हंसी, ‘‘मैं बहुत खुश हूं. अच्छा लग रहा है कि आप अपने खोल से बाहर आएंगी, जीवन को फिर से जिएंगी, एक रिश्ते के खत्म हो जाने से जिंदगी खत्म नहीं हो जाती…

‘‘मुझे ये दूसरे पिता बहुत पसंद हैं. सचमुच बहुत भले और सज्जन व्यक्ति हैं. हादसे के शिकार हैं, इसलिए थोड़े अस्तव्यस्त हैं. मुझे विश्वास है, हमारा प्यार मिलेगा तो ये भी फिर से खिल उठेंगे.’’ पता नहीं पद्मा को क्या हुआ, उस ने बेटी को बांहों में भर कर कई बार चूम लिया. उस की आंखों से अश्रुधारा बह रही थी और कल्पना मां का यह नया रूप देख कर चकित थी.

देसी मेम- भाग 1: क्या राकेश ने अपने मम्मी-पापा की मर्जी से शादी की?

लेखक- शांता शास्त्री

हवाई जहाज से उतर कर जमीन पर पहला कदम रखते ही मेरा अंग-अंग रोमांचित हो उठा. सामने नजर उठा कर देखा तो दूर से मम्मी और पापा हाथ हिलाते नजर आ रहे थे. इन 7 वर्षों में उन में कोई खास परिवर्तन नहीं हुआ था. हां, दोनों ने चर्बी की भारीभरकम चादर जरूर अपने शरीर पर लपेट ली थी.

पापा का सिर रनवे जैसा सपाट हो गया था. दूर से बस, इतना ही पता चला. पास पहुंचते ही दोनों मुझ से लिपट गए. उन के पास ही एक सुंदर सी लड़की हाथ में फूलोें का गुलदस्ता लिए खड़ी थी.

‘‘मधु, कितनी बड़ी हो गई तू,’’ कहते हुए मैं उस से लिपट गया.

‘‘अरे, यह क्या कर रहे हो? मैं तुम्हारी लाड़ली छोटी बहन मधु नहीं, किनी हूं,’’ उस ने  मेरी बांहों में कुनमुनाते हुए कहा.

‘‘बेटा, यह मंदाकिनी है. अपने पड़ोसी शर्माजी की बेटी,’’ मां ने जैसे मुझे जगाते हुए कहा. तभी मेरी नजर पास खडे़ प्रौढ़ दंपती पर पड़ी. मैं शर्मा अंकल और आंटी को पहचान गया.

‘‘लेट मी इंट्रोड्यूस माइसेल्फ. रौकी, आई एम किनी. तुम्हारी चाइल्डहुड फ्रेंड रिमेंबर?’’ किनी ने तपाक से हाथ मिलाते हुए कहा.

‘‘रौकी? कौन रौकी?’’ मैं यहांवहां देखने लगा.

टाइट जींस और 8 इंच का स्लीवलेस टौप में से झांकता हुआ किनी का गोरा बदन भीड़ का आकर्षण बना हुआ था. इस पर उस की मदमस्त हंसी मानो चुंबकीय किरणें बिखेर कर सब को अपनी ओर खींच रही थी.

‘‘एक्चुअली किनी, रौकी अमेरिका में रह कर भी ओरिजिनल स्टाइल नहीं भूला, है न रौकी?’’ एक लड़के ने दांत निपोरते हुए कहा जो शर्मा अंकल के पास खड़ा था.

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‘‘लकी, पहले अपनी आईडेंटिटी तो दे. आई एम श्योर कि रौकी ने तुम्हें पहचाना नहीं.’’

‘‘या…या, रौकी, आई एम लकी. छोटा भाई औफ रौश.’’

‘‘अरे, तुम लक्ष्मणशरण से लकी कब बन गए?’’ मुझे वह गंदा सा, कमीज की छोर से अपनी नाक पोंछता हुआ दुबलापतला सा लड़का याद आया जो बचपन में सब से मार खाता और रोता रहता था.

‘‘अरे, यार छोड़ो भी. तुम पता नहीं किस जमाने में अटके हुए हो. फास्ट फूड और लिवइन के जमाने में दैट नेम डजंट गो.’’

इतने में मुझे याद आया कि मधु वहां नहीं है. मैं ने पूछा, ‘‘मम्मी, मधु कहां है, वह क्यों नहीं आई?’’

‘‘बेटा, आज उस की परीक्षा है. तुझे ले कर जल्दी आने को कहा है. वरना वह कालिज चली जाएगी,’’ पापा ने जल्दी मचाते हुए कहा.

कार के पास पहुंच कर पापा ड्राइवर के साथ वाली सीट पर बैठ गए. मंदाकिनी उर्फ किनी मां को पहले बिठा कर फिर खुद बैठ गई. अब मेरे पास उस की बगल में बैठने के अलावा और कोई चारा न था. रास्ते भर वह कभी मेरे हाथों को थाम लेती तो कभी मेरे कंधों पर गाल या हाथ रख देती, कभी पीठ पर या जांघ पर धौल जमा देती. मुझे लगा मम्मी बड़ी बेचैन हो रही थीं. खैर, लेदे कर हम घर पहुंचे.

घर पहुंच कर मैं ने देखा कि माधवी कालिज के लिए निकल ही रही थी. मुझे देख कर वह मुझ से लिपट गई, ‘‘भैया, कितनी देर लगा दी आप ने आने में. आज परीक्षा है, कालिज जाना है वरना…’’

‘‘फिक्र मत कर, जा और परीक्षा में अच्छे से लिख कर आ. शाम को ढेर सारी बातें करेंगे. ठीक है? वाई द वे तू तो वही मधु है न? पड़ोसियों की सोहबत में कहीं मधु से मैड तो नहीं बन गई न,’’ मैं ने नकली डर का अभिनय किया तो मधु हंस पड़ी. बाकी सब लोग सामान उतारने में लगे थे सो किसी का ध्यान इस ओर नहीं गया. किनी हम से कुछ कदम पीछे थी. शायद वह मेरे सामान को देख कर कुछ अंदाज लगा रही थी और किसी और दुनिया में खो गई थी.

नहाधो कर सोचा सामान खोलूं तब तक किनी हाथ में कोई बरतन लिए आ गई. वह कपडे़ बदल चुकी थी. अब वह 8-10 इंच की स्कर्ट जैसी कोई चीज और ऊपर बिना बांहों की चोली पहने हुए थी. टौप और स्कर्ट के बीच का गोरा संगमरमरी बदन ऐसे चमक रहा था मानो सितारे जडे़ हों. मानो क्या, यहां तो सचमुच के सितारे जड़े थे. किनी माथे पर लगाने वाली चमकीली बिंदियों को पेट पर लगा कर लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर रही थी. मैं ने अपने कमरे में से देखा कि वह अपनी पेंसिल जैसी नोक वाली सैंडिल टकटकाते रसोई में घुसी जा रही है. मैं कमरे से निकल कर उस की ओर लपका…

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‘‘अरे, किनी, यह क्या कर रही हो? रसोई में चप्पलें?’’

‘‘यार रौकी, मुझे तो लग रहा है कि तुम अमेरिका से नहीं बल्कि झूमरीतलैया से आ रहे हो. बिना चप्पलों के नंगे पैर कैसे चल सकती हूं?’’

जी में आया कह दूं कि नंगे बदन चलने में जब हर्ज नहीं है तो नंगे पैर चलने में क्यों? पर प्रत्यक्ष में यह सोच कर चुप रहा कि जो अपनेआप को अधिक अक्लमंद समझते हैं उन के मुंह लगना ठीक नहीं.

सारा दिन किनी घंटे दो घंटे में चक्कर लगाती रही. मुझे बड़ा अटपटा लग रहा था. अपने ही घर में पराया सा लग रहा था. और तो और, रात को भी मैं शर्मा अंकल के परिवार से नहीं बच पाया, क्योंकि रात का खाना उन के यहां ही खाना था.

अगले दिन मुंहअंधेरे उठ कर जल्दीजल्दी तैयार हुआ और नाश्ता मुंह में ठूंस कर घर से ऐसे गायब हुआ जैसे गधे के सिर से सींग. घर से निकलने के पहले जब मैं ने मां को बताया कि मैं दोस्तों से मिलने जा रहा हूं और दोपहर का खाना हम सब बाहर ही खाएंगे तो मां को बहुत बुरा लगा था.

मां का मन रखने के लिए मैं ने कहा, ‘‘मां, तुम चिंता क्यों करती हो? अच्छीअच्छी चीजें बना कर रखना. शाम को खूब बातें करेंगे और सब साथ बैठ कर खाना खाएंगे.’’

दिन भर दोस्तों के साथ मौजमस्ती करने के बाद जब शाम को घर पहुंचा तो पाया कि पड़ोसी शर्मा अंकल का पूरा परिवार तरहतरह के पश्चिमी पकवानों के साथ वहां मौजूद था.

किनी ने बड़ी नजाकत के साथ कहा, ‘‘रौकी, आज सारा दिन तुम कहां गायब रहे, यार? हम सब कब से तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं कि इवनिंग टी तुम्हारे साथ लेंगे.’’

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कल से मैं अपने पर नियंत्रण रखने की बहुत कोशिश कर रहा था मगर आते ही घर में जमघट देख कर मैं फट पड़ा.

‘‘सब से पहले तो किनी यह रौकीरौकी की रट लगानी बंद करो. विदेश में भी मुझे सब राकेश ही कहते हैं. दूसरी बात, मैं इतना खापी कर आया हूं कि अगले 2 दिन तक खाने का नाम भी नहीं ले सकता.’’

मां ने तुरंत कहा, ‘‘बुरा न मानना मंदाकिनी बेटे, मैं ने कहा न कि राकेश को बचपन से ही खानेपीने का कुछ खास शौक नहीं है.’’

पिताजी ने भी मां का साथ दिया.

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