प्रदेश सरकार किसानों के हितों के लिए कृतसंकल्प है: श्री नवनीत कुमार सहगल

लखनऊ . अपर मुख्य सचिव ‘सूचना’ श्री नवनीत सहगल ने बताया कि मुख्यमंत्री जी 3टी का फार्मूला ट्रेस, ट्रैक और ट्रीट तथा आंशिक कोरोना कफ्र्यू एवं वृहद टीकाकरण का परिणाम है कि प्रदेश को संक्रमण नियंत्रण में सफलता मिली है. उन्होंने बताया कि 30 अप्रैल के लगभग 03 लाख 10 हजार एक्टिव मामलों में लगभग 96 प्रतिशत की कमी आयी है. सर्विलांस के माध्यम से निगरानी समितियों द्वारा ट्रेसिंग के तहत घर-घर जाकर संक्रमण की जानकारी ली जा रही है. उन्होंने बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में एक विशेष अभियान चलाकर, जिसमें निगरानी समितियों द्वारा घर-घर जाकर उन लोगों का जिनमें किसी प्रकार के संक्रमण के लक्षण होने पर उनका एन्टीजन टेस्ट भी कराया जा रहा है. अगर एन्टीजन टेस्ट निगेटिव आ रहा है और लक्षण हैं तो उनका आरटीपीसीआर टेस्ट भी कराया जा रहा है, इसके साथ-साथ उनको 11 लाख मेडिकल किट भी बांटी गयी है. उन्होंने बताया कि सर्विलांस के माध्यम से सरकारी मशीनरी द्वारा उत्तर प्रदेश की 24 करोड़ की जनसंख्या में से अब तक 18 करोड़ लोगों से उनका हालचाल जाना गया है. प्रदेश में संक्रमण कम होने पर भी कोविड-19 के टेस्टों की संख्या में निरन्तर बढ़ोत्तरी की जा रही है, ताकि संक्रमित व्यक्ति की पहचान करके इलाज किया जा सके. उन्होंने बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक से अधिक टेस्ट कराये जा रहे हैं. 31 मार्च से अब तक 65 प्रतिशत टेस्ट ग्रामीण क्षेत्रों में किये गये है.

श्री सहगल ने बताया कि प्रदेश के सभी जनपदों में कोविड के एक्टिव केसों की संख्या 600 से कम होने पर जनपदों में आंशिक कोरोना कफ्र्यू हटाकर पूर्व की तरह साप्ताहिक बंदी एवं रात्रिकालीन कफ्र्यू लागू रहेगा. उन्होंने बताया कि साप्ताहिक बंदी के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों व शहरी क्षेत्रों मंे फोगिंग, सैनेटाइजेशन व साफ-सफाई का अभियान चलाया जा रहा है. इस अभियान में ग्रामीण क्षेत्रों में 86,700 तथा शहरी क्षेत्रों में 82,000 कर्मचारी लगाये गये है.

श्री सहगल ने बताया कि प्रदेश में पिछले 24 घंटे में कोरोना सेे संक्रमित 642 नये मामले आये हैं. प्रदेश में विगत 24 घंटों में 1,231 लोग कोविड-19 से ठीक हो चुके हैं. प्रदेश में कोरोना के कुल 12,244 एक्टिव मामले हैं. प्रदेश में रिकवरी रेट 98 प्रतिशत है.  उन्होंने बताया कि बीते 24 घंटों में 03 जनपदों में शून्य, 24 जनपदों में दो डिजिट तथा 48 जनपदों में सिंगल डिजिट में कोरोना के नये मामले आये हैं. गत एक दिन में कुल 3,05,731 सैम्पल की जांच की गयी है. प्रदेश में अब तक कुल 05 करोड़ 25 लाख से अधिक सैम्पल की जांच की गयी है. कोविड-19 के टेस्ट में आधे से ज्यादा आरटीपीसीआर के माध्यम किए जा रहे हैं. उन्होंने बताया कि प्रदेश में कोविड टीकाकरण अभियान तेजी से चलाया जा रहा है. टीकाकरण अभियान के तहत अब तक 2,15,88,323 लोगों का टीकाकरण किया गया है. कल एक दिन में 3,91,441 लोगों का टीकाकरण किया गया है, जो कि अन्य प्रदेशों में किए जा रहे एक दिन के टीकाकरण से अधिक है. मुख्यमंत्री जी द्वारा प्रतिदिन किए जा रहे टीकाकरण को 06 लाख करते हुए इसे 10 लाख तक बढ़ाने के निर्देश दिए हैं. माह जून में 01 करोड़ टीकाकरण का लक्ष्य रखा गया है. अगले माह से प्रतिदिन 10 लाख से अधिक टीके लगाने का लक्ष्य रखा गया है. तीन महीनों में 10 करोड़ टीकाकरण का लक्ष्य रखा गया है.

श्री सहगल ने बताया कि मुख्यमंत्री जी द्वारा टीम-9 की समीक्षा बैठक में ब्लैक फंगस बीमारी की समीक्षा की गई, जिसमें मुख्यमंत्री जी द्वारा ब्लैक फंगस की दवाएं समुचित मात्रा में उपलब्ध कराने के संबंध में निर्देश दिए गए हैं. उन्होंने बताया कि प्रदेश में आॅक्सीजन की बेड की संख्या में निरन्तर बढ़ोत्तरी की जा रही है. कल 100 बेड बढ़ाये गये हैं, जिसमें 50 आईसीयू एवं 50 आइसोलेशन बेड हैं. प्रदेश में आॅक्सीजन समुचित मात्रा में उपलब्ध है. भविष्य में आॅक्सीजन की प्रदेश में कोई समस्या न हो इसके लिए 428 आॅक्सीजन प्लाण्ट अस्पतालों में लगाये जा रहे हैं, जिसमें से 78 प्लाण्ट क्रियाशील हो गए हैं. प्रदेश में कल लगभग 325 मी0टन आॅक्सीजन की सप्लाई की गयी है.

श्री सहगल ने बताया कि मुख्यमंत्री जी कल 23 लाख संगठित क्षेत्र में कार्य कर रहे श्रमिकों को 1000 रुपये भत्ता उनके खातों में स्थानान्तरित किया गया. रेहड़ी, पटरी आदि लोगों को 1000 रुपये भत्ता देने हेतु 14 लाख से अधिक पात्र व्यक्तियों का सत्यापन करा दिया गया है. ग्रामीण क्षेत्रों में 17 लाख मजदूर मनरेगा के तहत कार्य कर रहे हैं. मुख्यमंत्री जी द्वारा मनरेगा के माध्यम से स्थानीय स्तर पर रोजगार देने के कार्यों का और तेजी से अमल में लाने के निर्देश दिये गये हैं. उन्होंने बताया कि मनरेगा के तहत प्रतिदिन रोजगार देने की संख्या में बढ़ोत्तरी की जा रही है. प्रदेश सरकार द्वारा मिशन रोजगार चलाया जा रहा है. जिसके तहत समस्त विभाग, आयोग, निगम तथा बोर्डों में जहां पर भी रिक्तियां हैं उन्हें पारदर्शी तरीके भरा जा रहा है. अब तक 04 सालों में 04 लाख सरकारी नौकरियां दी गई हैं. उन्होंने बताया कि विगत 04 वर्षों में एमएसएमई द्वारा 02 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार के अवसर मुहैया कराया गया है.

श्री सहगल ने बताया कि मुख्यमंत्री जी द्वारा गेंहूँ खरीद की निरन्तर समीक्षा की जा रही है. गेहँू खरीद 15 जून, 2021 तक की जाती है. मुख्यमंत्री जी द्वारा कहा गया है कि इसके बाद भी अगर किसान अपना गेंहँू लेकर क्रय केन्द्र पर आता है तो उसके आगे भी खरीद होती रहेगी. प्रदेश सरकार किसानों के हितों के लिए कृतसंकल्प है और किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर उनकी फसल को खरीदे जाने की प्रक्रिया कोविड प्रोटोकाल का पालन करते हुए तेजी से चल रही है. गेहँू क्रय अभियान में 10 लाख से अधिक किसानों से 48,85,366.26 मी0 टन गेहूँ खरीदा गया है, जो विगत वर्ष से डेढ़ गुना अधिक है. उन्होंने बताया कि खरीफ फसल के लिए खाद, बीज की व्यवस्था की जाये.

उलटी गंगा- भाग 2: आखिर योगेश किस बात से डर रहा था

मैं तो कहती हूं उस की पत्नी को भी जेल में डाल देना चाहिए, जो एक गुनहगार की अगुआई कर रही है,’’ गुस्से से अपनी आंखें लाल कर नीलिका बोली.

‘‘हो सकता है अमनजी सही कह रहे हों और वह लड़की झूठ…’’

‘‘झूठ…? बीच में ही नीलिमा बोल पड़ी,’’ और वे सच बोल रहे हैं? क्यों, क्या वह लड़की पागल है जो खुद को ही बदनाम करेगी? जरूर कुछ किया ही होगा तभी तो वह बोल रही होगी… इसलिए गुनाह कर के भी मर्द बच निकलते हैं, क्योंकि उन की पत्नियां उन्हें बचाने के लिए दीवार बन कर उन के सामने खड़ी हो जाती हैं. जानती हैं कि पति गुनहगार है फिर भी… सच कहती हूं अगर उस की जगह मेरा पति होता न, तो मैं उसे नहीं छोड़ती. जेल भिजवा कर ही रहती साले को, ‘‘नीलिमा के मुंह से ऐसी बातें सुन कर योगेश के रोंगटे खड़े हो गए.’’

‘‘सोचो, खुद की भी बेटी है, अगर उस के साथ कोई ऐसा करे तो? छि:, अरे, औरत क्या कोई वस्तु है, जो जिस का जब मन चाहे इस्तेमाल कर लो, बिना उस की मरजी के?’’

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आज नीलिमा के तेवर देख योगेश की रूह कांप रही थी. बस मन ही मन यही

प्रार्थना किए जा रहा था कि वह इस सब से बचा रहे किसी तरह.

‘‘अब तुम्हें क्या हुआ?’’ योगेश के चेहरे पर हवाइयां उड़ते देख नीलिमा कहने लगी, ‘‘हां, पता है मुझे, तुम्हें भी सुन कर बुरा लग रहा होगा, है न? अरे किसी भी शरीफ इंसान को सुन कर बुरा लगेगा, मगर देखो, हम उन्हें क्या समझते थे और क्या निकले?’’ किसी का कुछ कहा नहीं जा सकता,’’ भुनभुनाते हुए नीलिमा किचन की तरफ बढ़ गई.

योगेश धम्म से वहीं सोफे पर बैठ गया. सोचने लगा कि आज जिस तरह से संस्कारी अमन अंकल की थूथू हो रही है, कल उस की बारी न हो. फिर कैसे नजरें मिलाएगा वह अपनी बेटियों से? गुमसुम सा वह आ कर कमरे में बैठ गया. नीलिमा ने पूछा, ‘‘कुछ खाओगे?’’

बच्चे और नीलिमा तो सो गए, उस की आंखें अब भी जाग रही थीं. अचानक उस के दिल में एक शूल सा उठता, फिर शांत हो जाता. कभी वह अपने सो रहे बच्चों को निहारता, तो कभी एकटक नीलिमा को देखता. आज नीलिमा उसे उस की पत्नी नहीं, बल्कि चंडिका का रूप लग रही थी, जो छूते ही भस्म कर देगी. इसलिए वह हौल में जा कर सोफे पर सोने की कोशिश करने लगा, लेकिन वहां भी उसे कहां चैन.

घर का 1-1 सामान जैसे उस के मुंह चिढ़ा रहा हो, हंस रहा हो उस पर और कह रहा हो, ‘‘देख रहे हो, कैसी उलटी गंगा बह रही है? नहीं बच पाओगे तुम भी योगेश बाबू. देरसबेर ही सही, पर कर्मों का फल तो सब को मिलता ही है. तुम्हें भी जरूर मिलेगा. उन की बातें सुन वह घबरा कर उठ बैठता और लंबीलंबी सांसें लेने लगता. डर के मारे हालत खराब हो रही थी उस की, पर बताए तो किसे और क्या? सोच कर ही कंपकंपा उठता कि अगर उस के किए गुनाह सब के सामने आ गए, तब क्या होगा? उस की तो बसीबसाई गृहस्थी ही उजड़ जाएगी.’’

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‘नहींनहीं, ऐसा कुछ नहीं होगा. क्यों मैं बेकार की बातें सोच रहा हूं? वह कभी अपना मुंह नहीं खोलेगी और अगर खोल दिया तो? तो मैं उसे झूठा साबित कर दूंगा. कह दूंगा वही मुझ पर डोरे डाल रही थी. जब दाल नहीं गली, तो मुझ पर इलजाम लगा रही है. मगर उस ने कोई सुबूत पेश कर दिया या गवाह खड़ा कर दिया तो, तो क्या होगा? कौन गवाह? किस की  इतनी हिम्मत है कि जो मेरे खिलाफ बोले,’ वह खुद से ही सवालजवाब किए जा रहा था और परेशान हुए जा रहा था. मुक्ता के साथ किए 1-1 अत्याचार आज उस की आंखों के सामने चलचित्र की तरह नाचने लगे.

बात 7-8 साल पहले की है. जिस कंपनी में योगेश बौस था. उसी कंपनी में मुक्ता भी काम करती थी, पर छोटे पद पर. चूंकि योगेश मुक्ता का बौस था, इसलिए उस की मजबूरी थी उस की हर बात को मानना. गोरा रंग, लंबे घने बाल, मोटीमोटी झील सी आंखें और उस का छरहरा बदन देख योगेश उसे देखता ही रह जाता. जिस तरह वह उसे नजरें गड़ाए देखा करता. उस से मुक्ता एकदम असहज हो जाती और अपने कपड़े ठीक करने लगती.

जानती थी वह कि उसे ले कर योगेश के विचार कुछ ठीक नहीं हैं, इसलिए वह अपना काम समय के साथ कर लिया करती ताकि योगेश को उसे कुछ कहने का मौका ही न मिले. फिर भी किसी न किसी बहाने वह उसे अपने कैबिन में बुला ही लेता और घंटों बेमतलब के कामों में उलझाए रखता. जब वह कामों में उलझी रहती, योगेश लगातार अपनी नजरें उस पर ही टिकाए रखता.

आप कितने भी अपने काम में व्यस्त क्यों न हों अगर कोई आप को एकटक निहार रहा हो, तो आप की नजरें खुदबखुद उस ओर चली जाती हैं. ऐसा अकसर होता है. जब मुक्ता की नजर योगेश पर पड़ती, तब भी ढीठ की तरह वह उसे उसी प्रकार निहारता रहता. हार कर मुक्ता ही अपनी नजरें नीची कर लेती या वहां से हट जाती.

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मुक्ता को अब योगेश के सामने जाने से भी डर लगने लगा था, क्योंकि जिस तरह से वह उस के सीने पर अपनी नजरें गड़ाए रहता, उस से वह सहम सी जाती. योगेश के डर से ही अब उस ने जींस टीशर्ट और स्लीवलैस कपड़े पहनने छोड़ दिए थे. जानबूझ कर ढीलेढाले कपड़े पहन कर औफिस जाती, ताकि योगेश उसे न देखे, पर उस की गंदी नजरें फिर भी उसे घूरती रहतीं.

कई बार तो वह जानबूझ कर उस से टकरा जाता, फिर भी मुक्ता ही सौरी बोलती. एक बार तो उस ने उस के सीने पर हाथ ही रख दिया और फिर सौरीसौरी कहने लगा, लेकिन योगेश ने ऐसा जानबूझ कर किया, यह बात मुक्ता जानती थी. ऐसा पहली बार नहीं हुआ था. जब भी मौका मिलता, वह मुक्ता को यहांवहां छू देता और बेचारी कुछ न बोल कर आगे बढ़ जाती.

रोना आता उसे अपनी हालत पर. सोचती क्या लड़की होना इतना बड़ा पाप है? शुरू से ही मुक्ता पर उस की गंदी नजर थी. जानता था वह कि यह नौकरी उस के लिए कितना माने रखती है, क्योंकि उस के घर में कमाने वाला उस के सिवा और कोई नहीं था. पिता की असमय मौत ने घरपरिवार की सारी जिम्मेदारी उस के कंधों पर डाल दी थी. इसी कारण वक्तबेवक्त योगेश उस का फायदा उठाता रहता था.

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उस दिन जानबूझ कर योगेश ने मुक्ता को देर रात तक औफिस में रोक लिया और कहा कि वह उसे घर छोड़ देगा. औफिस के चपरासी को भी उस ने छुट्टी दे दी. लेकिन मुक्ता जल्दीजल्दी अपना काम निबटा कर वहां से जाने ही लगी कि पीछे से आ कर योगेश ने उसे अपनी बांहों में दबोच लिया और उसे यहांवहां छूने लगा.

‘‘सर, यह क्या कर रहे हैं आप? छोडि़ए मुझे,’’ कह कर मुक्ता ताकत लगा कर उस की पकड़ से निकली ही कि फिर से उस ने उसे दबोचना चाहा, यह बोल कर कि इसी मौके की तो उसे कब से तलाश थी. मगर ऐन वक्त पर वही चपरासी वहां पहुंच गया और मुक्ता बच गई. वरना तो आज योगेश उसे नहीं छोड़ता. शायद वह चपरासी भी योगेश के गंदे इरादे भांप गया था, इसलिए अपना खाने का डब्बा छूट जाने का बहाना कर वापस आ गया और मुक्ता बरबाद होने से बच गई.

जरा सी आजादी- भाग 4: नेहा आत्महत्या क्यों करना चाहती थी?

पिछली बालकनी में खड़ी रही शुभा देर तक. नजर नेहा के घर पर थी. रोशनी जल रही थी. वहां क्या हाल है क्या नहीं, यह उसे बेचैन कर रहा था. तभी उस के पतिदेव विजय का फोन आया तो सहसा सारा किस्सा उन्हें सुना दिया.

‘‘मुझे बहुत डर लग रहा है, विजय. अगर नेहा ने कुछ…’’

‘‘ब्रजेश को सब बताया है न तुम ने. अब वह देख लेगा न.’’

‘‘नहीं देखेगा. मुझे लगता है उसे पता ही नहीं कि उसे क्या करना चाहिए.’’

‘‘देखो शुभा, तुम अपना दिमाग खराब मत करो. तुम्हारा ब्लड प्रैशर बढ़ जाएगा और मैं भी वहां नहीं हूं. तुम कोई झांसी की रानी नहीं हो जो किसी की भी जंग में कूदना चाहती हो.’’

‘‘सवाल उस के जीनेमरने का है, विजय. अगर मेरे कूदने से वह बच जाती है तो मेरे मन पर कोई बोझ नहीं रहेगा और अगर उस ने कुछ कर लिया तो जीवनभर अफसोस रहेगा.’’

‘‘तुम ने ठेका ले रखा है क्या सब का? न जान न पहचान.’’

‘‘हम जिंदा इंसान हैं, विजय. क्या मरने वाले को लौटा नहीं सकते? मुझे लगता है मैं उसे मरने से रोक सकती हूं. आप एक बार ब्रजेश से बात कीजिए न. उस का फोन नंबर है मेरे पास, मैं आप को लिखवा देती हूं.’’

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मंदमंद मुसकराने लगे विजय. जानते हैं अपनी पत्नी को. समस्या को सुलझाए बिना मानेगी नहीं और सच भी तो कह रही है. खिलौना टूट जाने के बाद कोई कर भी क्या लेगा? प्रयास का कोई भी औचित्य तभी तक है जब तक प्राण हैं. पखेरू के उड़ जाने के बाद वास्तव में उन्हें भी अफसोस होगा. शुभा का कहा मान लेना चाहिए, किसी के जीवन से बड़ा क्या होगा भला?

‘‘अच्छा बाबा, तुम जैसे कहो. नंबर दे दो, मैं एक बार ब्रजेश से बात करता हूं. शायद कोई रास्ता निकल ही आए.’’

विजय ने आश्वासन दिया और उस का रंग उसे दूसरी सुबह नजर भी आ गया. पूरे 10 बजे ब्रजेश नेहा को उस के पास छोड़ते गए.

‘‘आप पर भरोसा करना चाहता हूं जिस में मेरा ही फायदा होगा.’’

नेहा भीतर जा चुकी थी और जातेजाते कहा ब्रजेश ने, ‘‘शायद कहीं मैं ही सही नहीं हूं. आप मेरी बहन जैसी हैं. वह भी इसी तरह अधिकार से कान मरोड़ देती है. आप जैसा चाहें करें. मैं दखल नहीं दूंगा. बस, मेरा घर बच जाए. मेरी नेहा जिंदा रहे.’’

आभार व्यक्त किया ब्रजेश ने और यह भी बता दिया कि नेहा ने नाश्ता नहीं किया है अभी. एक पीड़ा अवश्य नजर आई उसे ब्रजेश के चेहरे पर और एक बेचारगी भी. ब्रजेश चले गए और शुभा भीतर चली आई.

‘‘नाश्ता क्यों नहीं किया तुम ने?’’

‘‘आप ने कर लिया क्या?’’

‘‘अभी नहीं किया. बोलो, क्या खाएं? तुम्हारा क्या मन है, वही खाते हैं.’’

‘‘मैं बनाऊं क्या? आप पसंद करेंगी?’’

‘‘अरे बाबा, नेकी और पूछपूछ. ऐसा करती हूं, मैं जरा अपनी अलमारी ठीक कर लेती हूं. तुम्हारा मन जो चाहे बना लो.’’

पैनी नजर रखी शुभा ने क्योंकि रसोई में चाकू भी थे. तेज धार चाकू उस ने उठा कर छिपा दिए थे जिस पर नेहा ने आवाज दी. ‘‘दीदी, आप का चाकू आलू तक तो काटता नहीं है, आप इस से काम कैसे करती हैं?’’

‘‘आज बाजार चलेंगे, नेहा. कुछ सामान लाना है. चाकू भी लाने वाले हैं.’’

आधे घंटे के बाद नेहा ने नाश्ता मेज पर सजा कर रख दिया. आलूटमाटर की सब्जी और पूरी. खातेखाते नेहा ने कहा, ‘‘दीदी, आप का घर कितना खुलाखुला है. ऐसा लगता है सांस आती भी है और जाती भी है. मेरे घर में सामान ही इतना है कि…’’

‘‘पुराना सामान निकाल देते हैं. थोड़ा सा बदलाव करते हैं. तुम्हारा घर भी खुलाखुला हो जाएगा. आज बाजार चलते हैं न. चलो, अभी चलें. दोपहर का लंच बाहर ही करेंगे.’’

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‘‘कुछ रुपए दिए हैं ब्रजेश ने. अपने लिए जो चाहूं खरीदने को कहा है.’’

‘‘कोई बात नहीं, मेरे पास भी कुछ रुपए हैं. जरूरत पड़ी तो बैंक से निकाल लेंगे. तुम जो चाहो, ले लेना.’’

‘‘अरे नहीं बाबा, मुझे क्या ताजमहल खरीदना है जो इतने रुपए चाहिए. न सोना चाहिए न महंगी साड़ी. कुछ भी भारीभरकम नहीं चाहिए. कुछ हलकाफुलका चाहिए जिस का मेरी छाती पर कोई बोझ न हो.’’

अभियान शुरू किया नेहा की रसोई से. दुनियाजहान के पुराने बरतन, जिन्हें कभी अपना घर बनाने पर निकाल देंगे, पुराना फ्रिज, पुराना टीवी, रेडियो, पुरानी प्रैस, पुराना लोहा, पुरानीपुरानी किताबें, पुराना फर्नीचर, पुराने परदे, पुराने कपड़े, पुरानी तसवीरें, पुरानी साडि़यां, और भी बहुतकुछ था जिसे बदलने की आवश्यकता थी.

‘‘कल जब अपना घर होगा तब ले लेना नया सब.’’

‘‘अपना घर होगा जब रिटायरमैंट होगा और उस में अभी 4 साल पड़े हैं. तब तक तो मन भी मर जाएगा. कल का इंतजार कब तक, दीदी?’’

‘‘कल का इंतजार तुम अपने हाथों समाप्त कर लो, नेहा.’’

‘‘ब्रजेश औफिस के काम से बाहर जाने वाले हैं इस सोमवार, कह रहे हैं मुझे साथ लेते जाएंगे.’’

‘‘तुम वहां क्या करोगी?’’

‘‘क्या करूंगी, होटल में सड़ूंगी और क्या.’’

‘‘तो मत जाओ. मैं कागजकलम देती हूं, सामान की लिस्ट बनाओ जिसे बदलना चाहती हो. वे बाहर रहेंगे तो हम आराम से सफाई अभियान पूरा कर लेंगे.’’

‘‘घर में तांडव हो जाएगा. मेरी इतनी औकात कहां.’’

‘‘तुम घर की मालकिन हो न. अपनी इच्छा का मान भी करना सीखो. घर के बरतन बदलने में भी तुम ब्रजेशजी का मुंह देखती हो. उन्हें उन के औफिस तक ही रहने दो न.’’

‘‘नहीं रहते न औफिस तक. रसोई के चम्मच तक में उन की मरजी होती है. घर में ऐसा कुहराम मचेगा कि मुझे सांस तक लेना मुश्किल हो जाएगा,’’ खीज पड़ी थी नेहा, ‘‘कल मेरी सास की मरजी थी, अब पति की है. कल बहू की होगी, मेरी मरजी शायद अगले जन्म में होगी.’’

‘‘अगला जन्म किस ने देखा है, पगली. कल क्या होगा कौन जानता है. आज देखो. ब्रजेश को मैं और विजय समझा लेंगे. आज भी शायद विजय ने समझाया होगा.’’

‘‘तो क्या इसीलिए आज बारबार मुझ से कह रहे थे कि मेरा जो जी चाहे मैं करूं, वे मना नहीं करेंगे. कुछ अजीबअजीब सी बातें कर तो रहे थे.’’

‘‘तुम्हारी मरजी की बात अजीबअजीब सी लगी तुम्हें?’’

‘‘जो कभी नहीं हुआ वह एक दिन होने लगे तो अजीब ही लगेगा न.’’

नेहा की बातों में शुभा दिलचस्पी ले रही थी.

Crime: ठगी के रंग हजार!

जैसे-जैसे समाज, देश विकसित होता जा रहा है, वैसे वैसे लोगों में पैसों को लेकर लालच बढ़ती चली जा रही है. ऐसे में रुपए कमाने के लिए मेहनत से दूर रहने वाले, आलसी किस्म के लोग सबसे आसान रास्ता लोगों को ठगने, मुर्ख बनाने का समझते हैं. आज इस रिपोर्ट में हम आपको ठगी के कुछ ऐसे अनोखे प्रकरण बताने जा रहे हैं जो छत्तीसगढ़ में घटित हुए हैं और यह सब बताते हैं कि हमें सतर्क किस तरह रहना होगा.

छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर में अगरबत्ती में इस्तेमाल की जाने वाले कपूर के नाम पर लाखों रुपए की ठगी की घटना सामने आई है.यही नहीं किसानों को उन्नत बीज उपकरण देने के नाम पर ठग लिया गया. अंततः ठग किस तरह पकड़े गए पढ़िए आगे-

कपूर सप्लाई करने का झांसा देकर 1 लाख 86 हजार रु की धोखाधड़ी करने वाले तीन आरोपियों को बिलासपुर के कोतवाली पुलिस ने दिल्ली से गिरफ्तार कल की लाया . इन आरोपियों ने खुद को डिवाइन टेम्पर प्राइवेट लिमिटेड इंदौर का प्रतिनिधि बताया और घटना को अंजाम दिया था.

पीड़ित परेश सचदेव दयालबंद में रमेश केमिकल इंडस्ट्री के नाम से दुकान संचालन कर अगरबत्ती बनाने का काम करता है. जिसमें कच्चे माल के रूप में कपूर का इस्तेमाल होता है. उसके पास जुलाई महीने में एक नंबर से फोन आया और खुद को डिवाइन टेम्पर प्राइवेट लिमिटेड, इंदौर मध्य प्रदेश का प्रतिनिधि होना बताया . बातचीत के बाद दोनों के बीच कपूर लेन देन का रेट तय हुआ.

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जिसके बाद पीड़ित ने उसके खाते में 1 लाख 86 हजार रुए नेफ्ट के माध्यम से ट्रांसफर कर दिया, लेकिन पैसे ट्रांसफर करने के बाद भी उसने कपूर सप्लाई नहीं किया. जब 4 माह बीत गया और कपूर नहीं मिला तब प्रार्थी ने पुलिस थाने में दस्तक दी.

शिकायत के बाद पुलिस ने टीम गठित कर मामले की जांच की और साइबर सेल की मदद से टीम को दिल्ली रवाना किया . पुलिस ने दबिश देकर गुलशन सिंह ( 24 वर्ष ), मो जस्सीम ( 19 वर्ष ) और समीर प्रताप ठाकुर ( 36 वर्ष ) को गिरफ्तार किया. सभी आरोपी दिल्ली के रहने वाले है . इनके पास से नगद 1 लाख 50 हजार , 4 मोबाइल फोन , चेक बुक और एटीएम कार्ड बरामद किया गया है.

सीधे सरल किसानों को बनाते हैं ऐसे उल्लू!

छत्तीसगढ़ के न्यायधानी बिलासपुर में किसान इंडिया बायोटेक कंपनी के नाम से किसानों से करोड़ों की ठगी करने वाले गिरोह का पुलिस ने पर्दाफाश किया है. पुलिस ने गिरोह के तीन लोगों को गिरफ्तार कर बैंक पासबुक, एटीएम कार्ड, मोबाइल, रसायनिक खाद, 2.5 लाख रुपए सहित कागजात बरामद किया है. पुलिस बताती है कि इस ठग गिरोह ने छत्तीसगढ़ सहित मध्य प्रदेश, पंजाब, ओडिशा और बिहार में सैकड़ों लोगों को अपना शिकार बनाया है.

पुलिस अधिकारी के मुताबिक- कुछ लोगों ने गांधी नगर निवासी प्रतिमा मिश्रा को ऑर्गेनिक खाद की डीलरशिप देने का झांसा देकर किश्तों में 2 और 3 लाख रुपए वसूल लिया. बहुत दिनों तक खाद की सप्लाई नहीं होने पर प्रतिमा ने संपर्क साधा तो मोबाइल बंद थे. वह तोरवा स्थित ऑफिस भी पहुची तो वहां ताला लगा था. ऐसी परिस्थितियों में उसे ठगी का अहसास हुआ और सिविल लाइन थाने में फरियाद की. जिसके बाद पुलिस ने ‘ऑपरेशन किसान’ का शुभारंभ किया. जांच पड़ताल में जानकारी मिली . किसान इंडिया बायोटेक के नाम पर बंधन बैंक बिलासपुर में खोले गए खाते से जानकारी एकत्र की गई.

इससे पता चला कि दिसंबर 2019 से जनवरी 2020 तक खाते से करीब 1,76,41,744 रुपए का अदान-प्रदान किया गया. एक खाता सागर में भी कोटक महिंद्रा बैंक की शाखा में खोल 40 लाख रुपए से ज्यादा की रकम निकाली गई. यह खाते एक आधार नंबर पर अलग-अलग नाम से खोले गए थे. यह जानकारी भी पुलिस को मिली की आरोपी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर, बलरामपुर, लखनऊ आदि शहरों के रहवासी हैं. इस बीच‌ जिला राजनांदगांव में ग्लोबल एग्री बायोटेक के नाम से कुछ लोगों के प्रचार-प्रसार करने की सूचना मिली.इस पर पुलिस ने दबिश देकर देवरिया, उत्तर प्रदेश निवासी शक्ति सिंह उर्फ सतीश सिंह, बलरामपुर, उत्तर प्रदेश निवासी प्रदीप शर्मा उर्फ सौरभ सिंह और गोरखपुर निवासी कृष्ण मोहन पांडेय को धर दबोचा.

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महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि किसानों को “उन्नत फलदार वृक्ष के बीज” के नाम पर बनाते ठगा करते थे. आरोपियों ने पुलिस हिरासत में आने के बाद अपने इकबालिया बयान में बताया कि राजनांदगांव में ग्लोबल एग्री टेक्नोलॉजी के नाम से कार्यालय खोला था. राजनांदगांव, डोंगरगढ़, दुर्ग और कांकेर के लोगों को टार्गेट कर ठगी के फिराक में थे. हर बार अपना नाम बदल कर विभिन्न राज्यों के किसानों को उन्नत फलदार वृक्ष के बीज की डीलरशिप के लिए किसान इंडिया बायोटेक से जुड़ने का झांसा देते ठगते और गायब हो जाते .

Serial Story: अस्मत का सौदा- भाग 1

लेखक- नीरज कुमार मिश्रा

हवेलीनुमा घर के एक हाल में बने एक शानदार औफिस में एक युवक, जिस की उम्र बामुश्किल 30 से 35 साल होगी, एक ऊंची पुश्त वाली कुरसी पर बैठा हुआ कुछ फाइलों के पन्ने पलट रहा था.

‘‘देखिए, आप लोगों के कागज तो पूरे हैं, पर इस में ‘सपोर्टिंग डौक्यूमैंट्स‘ की कमी है,‘‘ उस युवक ने अपनी आंखों के सवाल को सामने बैठी 2 महिला में से एक की आंखों की तरफ उछाला.

‘‘पर, हम ने तो सारे कागज लगा दिए हैं सर,‘‘ एक महिला उत्तेजित स्वर में बोल उठी.

उस की ये बात सुन कर उस युवक के चेहरे पर एकसाथ कई रंग आए और गए.

‘‘अरे, तू चुप रह… सर, यह अभी नईनई आई है न, इसे पता नहीं है आप का तरीका. मैं आप के ‘सपोर्टिंग डौक्यूमैंट्स‘ पूरे कर दूंगी. बस, आप इतना बता दीजिए कि ये बाकी के कागजात कहां पहुंचाने हैं,‘‘ एक महिला ने कहा.

‘‘वहीं, जहां आप हर बार पहुंचाती आई हैं… पर, इस बार मेरी एक छोटी सी शर्त है,‘‘ युवक ने कहा.

‘‘जी… कैसी शर्त?‘‘

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‘‘यही शर्त कि बाकी के कागजात जब आप देने आएं तो इन्हें भी साथ ले कर आएं,‘‘ युवक ने दूसरी महिला के बदन को घूरते हुए कहा.

‘‘जी, बिलकुल. आप के कागज भी पहुंच जाएंगे…. और ये भी,‘‘ महिला इतना कह कर मुसकराते हुए औफिस से बाहर चली गई और वह युवक अपनी ऊंची पुश्त वाली कुरसी में आराम से धंस गया और सिगरेट सुलगा कर गोला छल्ले उड़ाने लगा.

उस युवक का नाम रणबीर सिंह था, जो कि शहर के एक बड़े नेता का सारा कामकाज देखता था.

नेताजी के आगामी एक महीने का कार्यक्रम रणबीर सिंह के अनुसार ही तय किया जाता. कब, कहां किस की प्रतिमा का अनावरण, किस अस्पताल का उद्घाटन, अनाथालयों और विधवा आश्रमों में दिया जाने वाला दान भी रणबीर सिंह ही तय करता था.

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नेताजी के कार्यक्रमों में उन की किस एंगल की तसवीर प्रैस में जाएगी और कौन सी तसवीर सोशल मीडिया पर अपलोड की जाएगी, इन सब बातों को रणबीर सिंह की पारखी नजरों के एक्सरे से ही गुजरना होता था.

रणबीर सिंह भौतिकवादी व्यक्ति था. एक बहुत अच्छी जीवनशैली जीने का आदी हो चुका था रणबीर. निजी मकान, 2-3 गाड़ियां और कई बैंकों में कई खाते भी थे. ऐशोआराम और दौलत रणबीर सिंह ने नेताजी के नाम पर ही बनाई थी.

बहुत से लोग कई प्रकार के काम करवाने के लिए नेताजी के पास आते थे, तो उन सब लोगों से काम करवाने के बदले और सहयोग राशि के नाम पर रकम ऐंठना ही रणबीर सिंह का काम था. मसलन, कोई अपने बेटे की नौकरी लगवाने के लिए नेताजी के पास आता, तो कोई अपना ट्रांसफर अपने मनमुताबिक जगह पर करवाने को आता, तो कोई सिर्फ यही फरियाद ले कर आता कि नेताजी से कह दो कि मेरे नाम का फोन ही कर दें, तो मेरा काम हो जाएगा. और भी बहुत प्रकार के काम आते थे, जिस के एवज में पैसे ऐंठ कर नेताजी से काम करवा देता था रणबीर सिंह. इन सब कामों में रणबीर सिंह का कोई सानी नहीं था.

एक दिन ‘मजनूं का टीला‘ के एक शरणार्थी कैंप में नेताजी को जा कर शरणार्थियों को आर्थिक सहायता प्रदान करने का कार्यक्रम था. नेताजी पंक्ति में खड़े हुए असहाय शरणार्थियों को आर्थिक सहायता दे रहे थे और रणबीर सिंह उन के फोटो उतारने में लगा हुआ था.

‘‘सर, अभी कुछ ठीक नहीं आया… हां, अब जरा इधर देखिए… हां सर, अब मुसकराइए… सर, जरा इस बच्चे के सिर पर हाथ रखने वाला फोटो हो जाए… ऐसी तसवीरें सीधे दिल में उतर जाती हैं,‘‘ कहते हुए रणबीर सिंह पूरी तन्मयता से अपना काम कर रहा था.

तभी सहसा रणबीर सिंह की नजर एक सहमी हुई सी जवान लड़की पर पड़ी, जिस के चेहरे पर मैल लगा होने के बाद भी उस की सुंदरता रूप के पारखी रणबीर सिंह से न छुप सकी. उस लड़की की उम्र महज 20-22 साल ही रही होगी.

‘‘कसम से… अगर इस लड़की पर 20 रुपए की साबुन की टिकिया पूरी तरह खर्च कर दी जाए और इस के जिस्म को मलमल कर धो दिया जाए, तो कोहिनूर हीरा भी फेल हो जाए,‘‘ मन ही मन रणबीर सिंह बुदबुदा उठा था.

रणबीर सिंह ने आगे बढ़ कर उस लड़की को करीब से देखा और उस के सीने पर एक नजर डालते हुए बोला, ‘‘नाम क्या है तेरा?‘‘

‘‘सर, ये नाम नहीं बता पाएगी, क्योंकि गूंगी है,‘‘ उस लड़की के पास खड़ी दूसरी लड़की ने बताया.

‘‘ओह… गूंगी है बेचारी,‘‘ कुटिल भाव रणबीर के मन में आनेजाने लगे और वह सोचने लगा, माना कि उस के और नेताजी के बिस्तर पर सोने वाली लड़कियों की अभी तक कोई कमी नहीं है, पर फिर भी कभीकभी स्वाद बदलने के लिए एक गरीब शरणार्थी लड़की बुरी नहीं रहेगी. और फिर नेताजी के घर का काम भी करेगी और गाहेबगाहे मन बहलाने के काम भी आया करेगी. एक तरीके से गाड़ी की स्टैपनी के तौर पर इस्तेमाल करना चाहता था रणबीर.

ऐसा सोच कर रणबीर ने आननफानन में नेताजी को इशारा किया, जिसे केवल नेताजी ही समझ पाए थे और बदले में उन से मिले हुए इशारे के अनुसार रणबीर ने अपना काम शुरू कर दिया था.

सेक्स टॉयज को देश में खुलेआम बिकने देना चाहिए: डाक्टर प्रकाश कोठारी

डाक्टर प्रकाश कोठारी को ‘फादर औफ सैक्सोलौजी स्टडी इन इंडिया’ कहते हैं. वे सेठ जीएस मैडिकल कालेज और केईएम हौस्पिटल, मुंबई में शुरू किए गए देश के पहले ‘सैक्सुअल मैडिसिन डिपार्टमैंट’ के संस्थापक प्रोफैसर रहे हैं.

साल 1981 में पीएचडी हासिल करने वाले डाक्टर प्रकाश कोठारी सातवीं वर्ल्ड कांग्रेस औफ सैक्सोलौजी (1985) और इंटरनैशनल कौंफ्रैंस औफ और्गज्म (1991) के अध्यक्ष रहे हैं और वर्ल्ड एसोसिएशन फोर सैक्सुअल हैल्थ (डब्ल्यूएएस) की सलाहकार समिति के संस्थापक सदस्य हैं.

वे पिछले 40 साल से सैक्सुअल मैडिसिन में प्रैक्टिस कर रहे हैं यानी सैक्स संबंधी समस्याओं का आधुनिक दवाओं से इलाज कर रहे हैं. अब तक उन्होंने तकरीबन 60,000 मरीजों का इलाज किया है.

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पिछले दिनों उन के मुंबई में चर्नी रोड पर बने क्लिनिक सुख सागर में सैक्स संबंधी कई विषयों पर बात की गई. पेश हैं, उसी के खास अंश :

राष्ट्रीय अपराध रिकौर्ड ब्यूरो की हालिया रिपोर्ट और हर तरह की मीडिया में आने वाली खबरों से लगता है जैसे देश में सैक्स अपराधों का खौफनाक तूफान आया हुआ है. हर 29 मिनट में देश में एक रेप हो रहा है. आखिर इस सब की वजह क्या है?

देखिए, वजह सोशल मीडिया हो या कुछ और, इन दिनों हर तरफ सैक्स की बातें हो रही हैं. इस सब के चलते माहौल में कामेच्छा का उभार आ गया है. लेकिन यह कामेच्छा चैनेलाइज कैसे हो, यह सिर्फ सैक्स ऐजूकेशन सिखा सकती है, जो है नहीं या सही से लागू नहीं है. दूसरी बात यह है कि उभरी हुई इस कामेच्छा को रिलीज करने के लिए वैकल्पिक उपाय नहीं हैं, इसलिए लोग उन्माद में कामेच्छा को रिलीज करने के लिए सैक्स अपराध कर रहे हैं.

तो क्या आप यह कहना चाहते हैं कि उभरी हुई कामेच्छा को रिलीज करने के लिए वैकल्पिक उपाय होने चाहिए, नहीं तो सैक्स अपराध होते रहेंगे?

जी, हां. देखिए, कामेच्छा को दबाने के हमारे पास 2 ही उपाय हैं, पहला ब्रह्मचर्य, जो आमतौर पर मुमकिन नहीं होता. वैसे, ब्रह्मचर्य गलत शब्द है, कहना चाहिए सैक्स में अलिप्त रहना. दूसरा है अल्टरनेटिव सैक्सुअल बिहेवियर यानी हस्तमैथुन को अपनाना. लेकिन अफसोस की बात यह है कि हस्तमैथुन के बारे में समाज में गलतफहमी बहुत है. यह गलतफहमी तब तक बनी रहेगी जब तक सही तरीके से लोगों को सैक्स ऐजूकेशन नहीं दी जाएगी.

लोग हस्तमैथुन को ले कर गलतफहमी का शिकार क्यों रहते हैं?

क्योंकि लोगों को लगता है कि हस्तमैथुन से उन में कमजोरी आ जाती है. यह समझने की बात है कि जब सहवास से शरीर में कमजोरी नहीं आती, बल्कि ताजगी आती है, तो भला हस्तमैथुन से कैसे आ जाएगी? आखिर सहवास भी मैथुन है और हस्तमैथुन कृत्रिम मैथुन है. अगर लोगों को यह बात सही तरीके से समझा दी जाए तो वे सैक्स के लिए क्राइम करने के बजाय हस्तमैथुन या दूसरे कृत्रिम उपायों को अपना कर संतुष्ट हो जाएंगे.

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हस्तमैथुन पार्टनर रहित शख्स के लिए सैक्स का एक अच्छा औप्शन है. सैक्स ऐजूकेशन सही ढंग से दी जाए तो समाज में रेप की संख्या कम हो सकती है. दुनिया के जिन भी देशों में सैक्स ऐजूकेशन सही ढंग से दी गई है, वहां एचआईवी एड्स, बढ़ती हुई आबादी और रेप की संख्या में काफी कमी आई है. उदाहरण के लिए स्वीडन.

इस समय, जबकि सैक्स अपराध बहुत ज्यादा बढ़े हुए हैं, इन्हें कम करने के लिए आप सरकार को तात्कालिक उपाय क्या सुझा सकते हैं?

जब ‘कौन बनेगा करोड़पति’ जैसा कार्यक्रम सुपरडुपर हिट हो सकता है. कश्मीर से ले कर कन्याकुमारी तक लोग उसे चाव से देख सकते हैं तो सैक्स तो और भी दिल के करीब का विषय है. अगर मर्यादित भाषा और सही तौरतरीके से सैक्स के बारे में लोगों को जानकारियां दी जाएं तो निश्चित रूप से लोगों में जागरूकता आएगी. लेकिन यह काम सरकार को करना होगा, क्योंकि जब कोई काम सरकार करती है तो उस में एक खास किस्म की ग्रैविटी होती है.

एक बात मैं जोर दे कर कहना चाहूंगा कि यह काम होगा टैलीविजन के माध्यम से ही, क्योंकि आज टैलीविजन खासकर सरकारी टैलीविजन की गांवगांव, घरघर तक पकड़ है. मैं तो यह भी कहूंगा कि यह कई तरह से फायदे वाला काम होगा.

क्या आप ने कभी ऐसा कोई सुझाव भारत सरकार को दिया है?

मुझ से किसी ने संपर्क नहीं किया. हां, जब शंकर दयाल शर्मा राष्ट्रपति थे, उस समय मैं ने जरूर सुझाव दिया था और तब की सरकार ने उस पर अमल करने की बात भी कही थी, लेकिन सरकार बदली और सब बदल गया.

आप को क्या लगता है, रेप के खिलाफ कठोर कानून होने के बावजूद सैक्स अपराधों में कोई कमी क्यों नहीं आती है?

देखो, कानून चाहे जितना सख्त बना लीजिए मुझे नहीं लगता कानून से कभी सैक्स अपराधों में कोई कमी आएगी. अगर वास्तव में सही तरीके से फर्क हासिल करना है तो वास्तविक सैक्स ऐजूकेशन का प्रचारप्रसार करना ही होगा यानी दिल के तारों को टटोलना होगा.

देखिए, अज्ञान से विकृत कौतूहल में इजाफा होता है और ज्ञान से विकृत कौतूहल कम होता है. मतलब यह कि अगर आप लोगों को सही ज्ञान दें तो उन के अंदर का विकृत कौतूहल कम हो जाएगा.

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हस्तमैथुन के अलावा और कौन से कृत्रिम सैक्स के उपाय हो सकते हैं, जिन को बढ़ावा दे कर सैक्स अपराधों को कम किया जा सकता है?

सैक्सुअल टौयज भी ऐसे उपायों में शामिल हो सकते हैं. वे विदेशों में सैक्स की जरूरत को पूरा करने का बहुत बड़ा जरीया हैं.

भारत में भी सैक्स टौयज मिलते हैं लेकिन चोरीछिपे. सरकार को इन्हें न केवल खुलेआम बिकने देना चाहिए, बल्कि इन को बढ़ावा देना चाहिए। याद रखिए, सैक्स की ऊर्जा को कोई कम नहीं कर सकता. हम सब लोग एक ऐसी उम्र से गुजरे हैं या गुजरते हैं जब सैक्स की ऊर्जा अपने नैतिक मूल्यों के दबाव में और ज्यादा बढ़ जाती है. ऐसे समय में कोई कितना ही पढ़ालिखा क्यों न हो, फिसल जाएगा.

आज तो ‘लाइफ साइज डौल’ मुहैया हैं. सरकार को बाकायदा इन के लिए खास इमारतें बनानी चाहिए और ऐसे संभोग को बढ़ावा देना चाहिए जिस से रेप और एचआईवी जैसी बीमारी पर रोक लग सके.

सैक्स जैसे विषय में लोगों की बहुत कम जानकारी या अज्ञानता के पीछे कहीं न कहीं सांस्कृतिक वजह भी शामिल नहीं है? मसलन बंद संस्कृति वाले देशों, क्षेत्रें में सैक्सुअल कट्टरता कहीं ज्यादा है खासकर कौमार्यता और पवित्रता को ले कर?

सही कहा. भारत, भारतीय उपमहाद्वीप और तमाम एशियाई देशों में कौमार्यता आज भी एक बड़ी नासमझी है. यह पूरी तरह से गलतफहमी है कि पहली बार हमबिस्तरी करोगे तो खून निकलेगा ही. मैं ने तो इस धारणा के चलते तमाम शादियों को टूटते देखा है. निश्चित रूप से यह सांस्कृतिक कट्टरता है, लेकिन मैं फिर कहूंगा कि यह कट्टरता गलतफहमी और नासमझी की देन है. ऐसी सांस्कृतिक कट्टरताओं या धारणागत जड़ताओं का निदान भी सैक्स ऐजूकेशन ही है.

वैसे, इस सब के बीच में मैं एक बात अपने अनुभव से कहूंगा कि भारत ऐसा देश है, जहां मुहब्बत की आखिरी मंजिल तो हमबिस्तरी हो सकती है, लेकिन हमबिस्तरी की आखिरी मंजिल मुहब्बत नहीं है.

मैं ने ऐसे जोड़े देखे हैं जिन में सुहागरात से ले कर 25-25, 30-30 साल तक कोई शारीरिक संबंध नहीं बने, लेकिन शादियां बनी रही हैं, टूटी नहीं हैं. विदेशी इसे सच के रूप में स्वीकार ही नहीं कर पाते.

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Serial Story: निर्वासित राजकुमार का प्यार- भाग 3

रायसिंह अपनी पत्नी और 2 बेटों के साथ जैसलमेर रियासत छोड़ कर चले गए थे. इन्हीं रायसिंह की राजकुमारी थी नागरकुंवर बाईसा. नागरकुंवर को महारावल मूलराज ने रायसिंह के साथ नहीं जाने दिया था. इस कारण नागरकुंवर बाईसा रनिवास जैसलमेर में ही रहती थी.

रनिवास में कुंवर भीमसिंह की नजर नागरकुंवर पर पड़ी. गोरी गट्ट मोतियों के पानी जैसी. गाल जैसे मक्खन की डलियां, होंठ ऐसे जैसे मलाई में लाल रंग मिला कर मक्खन पर 2 फांके बना दी हों. आंखें ऐसी जैसे मखमल के बटुए में हीरे रखे हुए हों. भीमसिंह तो उस का रूप देख कर जड़ हो गया.

वापस मूलसागर आने पर एक ही चेहरा बेचैन किए जा रहा था. आंखें बंद करे तो नागरकुंवर, खोले तो नागरकुंवर. किसी से बात करे तो नागरकुंवर. वह परेशान हो गए. बहुत टालने की कोशिश की मगर मन पर काबू नहीं रहा. तब भीमसिंह अकसर रनिवास में जा कर नागरकुंवर से मिलने लगे.

नागरकुंवर 15-16 बरस की थी. ये वही दिन होते हैं, जब कोई दिल को अच्छा लगने लगता है. नागरकुंवर को भीमसिंह अच्छे लगे थे. यही हाल भीमसिंह का भी था. उन्हें नागरकुंवर के अलावा कुछ भी अच्छा नहीं लगता था.

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भीमसिंह का आनाजाना रनिवास में बढ़ा और नागरकुंवर से मिलनाजुलना भी. तब महारावल सा को उन के दीवान ने एक रोज कहा, ‘‘दाता, बड़ेबुजुर्गों के लिए बच्चे हमेशा बच्चे ही रहते हैं. पर हुकुम, समय आने पर वे भी बड़े होने लगते हैं. हम को उन की भावनाओं का ध्यान रखना चाहिए. बाईसा 15-16 के पेटे में पहुंच गई हैं. वह शादी के लायक हो गई हैं. अब महाराज कुंवर रायसिंह तो यहां हैं नहीं. बाईसा की जिम्मेदारी अपने ऊपर है. दाता, आप फरमाएं तो शादी की बात चलाई जाए.’’

‘‘बाईसा इतनी बड़ी हो गईं क्या?’’

‘‘हां हुकुम, समय तो अपनी गति से चलता है.’’ दीवान बोला.

‘‘ठीक है, कोई ध्यान में है क्या?’’ महारावल मूलराज सफेद दाढ़ी को टटोलते हुए बोले.

‘‘एक है, आप माफी बख्शें तो अर्ज करूं.’’ दीवान ने कहा.

‘‘कौन है?’’ महारावल ने पूछा तो दीवान बोला, ‘‘राठौड़ अपने पुराने रिश्तेदार हैं. जोधपुर के कुंवर भीमसिंहजी यहां पधारे हुए हैं. शादी के हकदार भी हैं. कल को उन्हें राज मिलेगा. ऐसा मौका कब मिलेगा हुकुम. अभी अहसानों से दबे हैं. लगे हाथ बाईसा का ब्याह महाराज कुंवर भीमसिंह जी से कर लें तो सोने पर सुहागा हो जाए. घरघराना सब ठीक है.’’

आवाज को दबाते हुए दीवान आगे बोले, ‘‘हुकुम, जोधपुर से रोजरोज के झगड़ेटंटे होते हैं, वे भी खत्म हो जाएंगे. भीमसिंह जी के गद्दी बिराजने के बाद सरहद पर रोजरोज की किटकिट भी नहीं होगी.’’

‘‘पर भीमसिंह जी यह न समझें कि हम शरण दे कर अहसानों की कीमत ले रहे हैं.’’ महारावल ने कहा.

‘‘नहीं दाता, अहसान तो हम कर रहे हैं, शरण भी दी और बेटी भी.’’

‘‘महाराज कुंवरसा तो निर्वासित हैं. बारात कहां से आएगी. यों कैसे हो पाएगा ब्याह.’’

महारावल चिंता में पड़ गए. उन के बूढ़े चेहरे पर उदासी छा गई. ललाट पर पड़ी सलवटें और अधिक गहरा गईं. आखिर महारावल की सहमति मिल गई.

तब मूलसागर जा कर कुंवर भीमसिंह जी से बात की गई. सुन कर कुंवर भीमसिंह को अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था. उन का दिल बल्लियों उछलने लगा. मगर प्रत्यक्षत: गंभीर बने हुए बोले, ‘‘महारावलसा को पता है कि मैं एक निर्वासित राजकुमार हूं. निर्वासित का क्या भरोसा. उम्र भटकते हुए कट सकती है.’’

‘‘हम संबंधों को देखते हैं, सत्ता को नहीं. सत्ता तो आज है कल नहीं भी होगी. पर संबंध तो शाश्वत रहेंगे. राठौड़ वंश तो पीढि़यों से हमारे समधी रहे हैं. आप यहां पधारे हुए हैं. उस से अच्छा सुयोग और क्या होगा. आप नागरकुंवर बाईसा का पाणिग्रहण करें तो यह जैसलमेर पर आप का अहसान होगा. दाता की इच्छा है कि आप स्वीकृति दें तो विवाह की तिथि तय कर ली जाए.’’

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सारी बात खोल कर सामने रखी तो कुंवर जानबूझ कर पशोपेश में पड़े दिखाई देने लगे.

‘‘मैं आप लोगों का आभारी हूं कि आप ने मुझे इस योग्य समझा. पर आप तो जानते ही हैं कि बारात जोधपुर से नहीं आ पाएगी. इस से आप लोगों की गरिमा को ठेस पहुंच सकती है.’’

‘‘इतिहास गवाह है कुंवरसा, राजेमहाराजे कभी मुहूर्तों और बारातों के मोहताज नहीं होते. आप आदेश करें, सारे इंतजाम हो जाएंगे.’’

इस बार जवाब ठाकुर सवाईसिंह ने दिया, ‘‘जरूर हुकुम. महाराज कुंवरसा का विवाह बडे़ धूमधाम से होगा. आप तैयारियां कीजिए.’’

तुरंत शगुन में हीरे की अंगूठी, गुड़ और नारियल दिया, ‘‘आप ने शगुन कबूल किया हुकुम, सारा जैसलमेर आप का ऋणी हो गया है. महाराज कुंवरसा के यहां न होने से हमारी चिंताएं बढ़ गई थीं. आज हम धन्य हो गए हुकुम.’’

बात पक्की कर दी गई. शादी की तैयारियां बड़ी धूमधाम से की गईं. मूलसागर से बारात जैसलमेर आई. उस का भव्य स्वागत किया गया. सारा शहर दूल्हे की एक झलक देखने के लिए उमड़ पड़ा. रायसिंह अपनी बेटी का कन्यादान करने नहीं पहुंचे. न ही युवरानी या राजकुमारों को ही भेजा. महारावल ने स्वयं कन्यादान किया. शादी धूमधाम से संपन्न हुई.

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कुंवर भीमसिंह व राजकुमारी नागरकुंवर की मुलाकातों के चर्चे शहर में न हों और राजमहल की बदनामी न होने लगे, इसलिए उन दोनों का विवाह कर दिया गया. अब दोनों जीवनसाथी बन गए थे और उन्होंने अपना नवजीवन शुरू कर दिया था.

चंद दिन ही बीते थे कि महाराजा विजय सिंह का 46 साल की उम्र में स्वर्गवास हो गया. गुलाबराय की हत्या के बाद महाराजा विजय सिंह को कुछ भी अच्छा नहीं लगता था और थोड़े समय बाद वह भी चल बसे थे. तब कुंवर भीमसिंह अपनी रानी नागरकुंवर के साथ जोधपुर आ गए. भीमसिंह जोधपुर की राजगद्दी पर बैठ गए और नागरकुंवर महारानी बन गईं.

Satyakatha: अधेड़ औरत के रंगीन सपने- भाग 3

सौजन्य- सत्यकथा

तीनों भाई संतराम के मकान के पास ही किराए का कमरा ले कर एक साथ रहते थे. मनोज जहां राजमिस्त्री का काम करता था तो उस के दोनों भाई दिहाड़ी मजदूरी का काम करते थे.

पड़ोस में रहने वाला संतराम चूंकि ठेकेदारी का काम करता था, इसलिए वह अकसर दिहाड़ी मजदूर या दूसरे राजमिस्त्री  की जरूरत पड़ने पर तीनों भाइयों को बुला लेता था. संतराम को पीनेखाने का शौक था.

तीनों भाई भी शराब पीने के आदी थे. इसलिए कुछ समय बाद संतराम के साथ उन की खानेपीने की बैठकें भी होने लगीं. कई बार मनोज संतराम के घर पर ही बैठा था. इसलिए जल्द ही संतराम की पत्नी सुशीला से भी उस की बोलचाल हो गई.

सुशीला की 20 साल पहले जो चंचल स्वभाव की आदत थी, आज भी वह बरकरार थी. सुशीला की नजर मनोज पर पड़ी तो उसे संतराम भी उस के सामने फीका लगने लगा.

मनोज ने पहली ही नजर में सुशीला की आखों से उस के मन की बात भांप ली. एक कुंआरे नौजवान को अगर कोई स्त्री आमंत्रण दे तो भला वह कैसे ठुकरा सकता है. सुशीला के जीवन में एक बार फिर वही कहानी दोहराई जाने लगी, जो उस ने 18 साल पहले दोहराई थी.

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जल्द ही मनोज से सुशीला के जिस्मानी संबंध बन गए. सुशीला की उम्र भले ही 55 साल हो चुकी थी, लेकिन उस के हसरतें आज भी उतनी ही जवान थीं जितनी जवानी की दहलीज पर कदम रखने वाली एक लड़की के होती हैं.

इधर, पिछले कुछ सालों में संतराम के अंदर एक बुरी प्रवृत्ति ने जन्म ले लिया था. वह शराब पीने के बाद अकसर सुशीला के साथ किसी न किसी बात पर मारपीट कर देता था. इस कारण सुशीला और संतराम के संबंधों में एक दरार भी पैदा हो गई थी.

जब 6 महीने पहले मनोज सुशीला की जिदंगी में आया तो उसे जिंदगी में रोशनी की एक नई किरण दिखाई देने लगी. लेकिन इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपते.

कुछ दिन पहले संतराम को इस बात का शक हो गया कि सुशीला फिर से अपने पुराने ढर्रे पर चलने लगी है. उसे मनोज के साथ उस के संबध होने का शक हो गया था. वैसे भी सुशीला को संतराम से कोई बच्चा तो था नहीं, इसलिए उसे वैसे भी उस से बहुत लगाव नहीं था.

जब संतराम ने उस के साथ कई बार मारपीट की तो सुशीला ने एक दिन मनोज से कहा कि अगर वह उसे संतराम से छुटकारा दिला दे तो वह पूरी तरह उस की हो कर रहेगी. इतना ही नहीं, उस के घर में जो कुछ भी है और बैंक में जो पैसा या जेवर है, सब उस के हो जाएंगे.

मनोज भी उस के चक्कर में अविवेकी बन गया था. लिहाजा उस ने सुशीला से वादा कर लिया कि वह उसे संतराम से मुक्ति दिलाएगा.

मनोज ने अपनी माशूका से वादा तो कर लिया लेकिन इस काम को अकेले अंजाम देना उस के बस की बात नहीं थी. इसीलिए उस ने सगे भाई आकाश व मौसेरे भाई राजेश को संतराम की हत्या करने में मदद करने के लिए तैयार कर लिया.

आकाश व राजेश कम उम्र के जवान लड़के थे, वे बस इसी से खुश हो गए कि चलो मनोज घर बसा लेगा तो उन्हें पकापकाया खाना मिलना शुरू हो जाएगा. लिहाजा उन्होंने मनोज का साथ देने की हामी भर दी. जब तीनों ने इरादा बना लिया तो सुशीला के साथ मिल कर उन्होंने संतराम की हत्या को अंजाम देने के लिए योजना बनाई.

6 और 7 मई की रात को उन्होंने संतराम की हत्या के लिए चुना. योजना के मुताबिक रात करीब साढ़े 12 बजे मनोज ने जब दरवाजा खटखटाया तो पहले से उन के इंतजार में जाग रही सुशीला ने दरवाजा खोल दिया और वे कमरे के भीतर घुस आए.

संतराम शराब के नशे में बिस्तर पर पड़ा खर्राटे ले रहा था. इस के बाद उन्होंने कमरे में रखी एक ईंट से संतराम के चेहरे व सिर पर इतने वार किए कि बिस्तर पर ही उस की छटपटाते हुए मौत हो गई. घर में लूटपाट की वारदात को दर्शाया जा सके, इसलिए सब ने मिल कर घर का सामान भी इधरउधर बिखेर दिया.

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हालांकि मनोज वारदात के बाद संतराम की मोटरसाइकिल ले जाना चाहता था, लेकिन उस की चाबी उसे नहीं मिली. बाद में जब मनोज अपने भाइयों के साथ वहां से चला गया तो सुशीला ने अपने कपड़े अस्तव्यस्त कर थोड़े फाड़ लिए और घर से बाहर निकल कर शोर मचा दिया कि बदमाशों ने उस के पति की हत्या कर दी है.

मनोज से जब हत्याकांड की सारी जानकारी मिल गई तो पुलिस ने उसी दिन सुशीला को भी गिरफ्तार कर लिया. थोड़ी नानुकुर के बाद उस ने भी अपना अपराध कबूल कर लिया. जांच अधिकारी सुजीत उपाध्याय ने हत्या के मामले में आईपीसी की धारा 120बी व 34 जोड़ कर उन चारों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया. सभी को न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.

—कहानी पुलिस की जांच व आरोपियों से पूछताछ पर आधारित है

पुनर्मरण- भाग 3: शुचि खुद को क्यों अपराधी समझती थी?

मैं अपने पांवों को घसीटते हुए उधर गई जहां बैठ कर विभु भोजन कर रहे थे. देखा, वहां चावल, रोटी के बीच खून की धारें बह रही थीं. शरीर के चिथड़े बिखरे पड़े थे. इस विस्फोट ने माता के कई भक्तों की जानें ले ली थीं. मुझे विभु कहीं नजर नहीं आए. मैं जिसे देखती उसी से पूछती, ‘क्या आप ने विभु को देखा है?’ पर मेरे विभु को वहां जानता ही कौन था. कौन बताता भला.

घायलों की तरफ मैं गई तो विभु वहां भी नहीं थे. तभी मेरा कलेजा मुंह को आ गया. पांव बुरी तरह कांपने लगे. थोड़ी दूर पर विभु का क्षतविक्षत शव पड़ा हुआ था. मैं बदहवास सी उन के ऊपर गिर पड़ी. मैं चीख रही थी, ‘कोई इन्हें बचा लो…यह जिंदा हैं, मरे नहीं हैं.’

मेरी चीख से एक पुलिस वाला वहां आया. विभु का निरीक्षण किया और सिर हिला कर चला गया. मैं चीखतीचिल्लाती रही, ‘नहीं, यह नहीं हो सकता, मेरा विभु मर नहीं सकता.’ सहानुभूति से भरी कई निगाहें मेरी तरफ उठीं पर मेरी सहायता को कोई नहीं आया.

इस आतंकवादी हमले के बाद जो भगदड़ मची उस में मेरा पर्स, मोबाइल सभी जाने कहां खो गए. मैं खाली हाथ खड़ी थी. किसे अपनी सहायता के लिए बुलाऊं. विभु को ले कर कोलकाता तक का सफर कैसे करूंगी?

मैं ने हिम्मत की. विभु को एक तरफ लिटा कर मैं गाड़ी की व्यवस्था में लग गई. पर मुझे विभु को ले जाने से मना कर दिया गया. पुलिस का कहना था कि लाशें एकसाथ पोस्टमार्टम के लिए जाएंगी. मैं विभु को यों नहीं जाने देना चाहती थी पर पुलिस व्यवस्था के आगे मजबूर थी.

मेरा मन क्षोभ से भर गया, धर्म के नाम पर यह आतंकवादी हमले जाने कब रुकेंगे. क्यों करते हैं लोग ऐसा? मैं सोचने लगी, मेरे पति की तरह कितने ही लोग 24 घंटे के भीतर मर गए हैं. क्या गुजर रही होगी उन परिवारों पर. मैं खुद अनजान जगह पर विवश और परेशान खड़ी थी.

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विभु का शव मिलने में पूरा दिन लग गया. मेरे पास पैसा भी नहीं था. एक आदमी मोबाइल लिए घूम रहा था, मैं ने उस से विनती कर के अपने घर फोन मिलाया. घंटी बजती रही, किसी ने फोन नहीं उठाया. मांजी शायद मंदिर गई होंगी. फिर मैं ने बड़े बेटे का नंबर लगाया तो वह सुन कर फोन पर ही रोने लगा, ‘मां, हम जल्दी ही पहुंचने की कोशिश करेंगे पर फिर भी आने में 3 दिन तो लग ही जाएंगे. आप कोलकाता पहुंचिए. हम वहीं पहुंचेंगे.’

विभु का मृत शरीर मेरे पास था. कोई भी गाड़ी वाला लाश को कोलकाता ले जाने को तैयार नहीं हुआ. मैं परेशान, क्या करूं. उधर दूसरे दिन ही विभु का शरीर ऐंठने लगा था. कुछ लोगों ने सलाह दी कि इन का अंतिम संस्कार यहीं कर दीजिए. आप अकेली इन्हें ले कर इतनी दूर कैसे जाएंगी?

विभु जीवन भर पूजापाठ करते रहे. क्या इसी मौत के लिए विभु भगवान को पूजते रहे?

विभु के बेजान शरीर की और छीछालेदर मुझ से सही नहीं गई. मैं ने सोचा, यहीं गंगा के किनारे उन का अंतिम संस्कार कर दूं. कुछ लोगों की सहायता से मैं ने यही किया. विभु का पार्थिव शरीर अनंत में विलीन हो गया. मेरे आंसू सूख चुके थे. मेरे आंसुओं को पोंछने वाला हाथ और सहारा देने वाला संबल दोनों ही छूट गए थे.

मेरी तंद्रा किसी के स्पर्श से टूटी. जाने कितनी देर से मैं बिस्तर पर इसी हाल में पड़ी रह गई थी. दोनों बहुएं मेरे अगलबगल बैठी थीं और छोटी बहू का हाथ मेरे केशों को सहला रहा था.

‘‘उठिए, मां.’’

मैं ने धीमे से अपनी आंखें खोलीं. दोनों बहुएं आंखों में प्यार, सहानुभूति लिए मुझे देख रही थीं. छोटी बहू की आंखों में प्रेम के साथ कौतूहल भी था. वह बेचारी क्या समझ पाती कि यहां क्या कहानी गढ़ी जा रही है. वह बस टुकुरटुकुर मुझे निहारती रहती.

‘‘नीचे चलिए, मां, पंडितजी आ गए हैं और कुछ पूजाहवन करवा रहे हैं,’’ बड़ी बहू रेवती बोली.

‘‘शायद मेरी उपस्थिति मांजी को अच्छी न लगे. तुम लोग जाओ. मैं यहीं ठीक हूं.’’

‘‘पिताजी के किसी भी संस्कार में शामिल होने का आप को पूरा अधिकार है, मां. आप चलिए,’’ बड़ी बहू ने मुझ से कहा.

भारी कदमों से मैं नीचे उतरी तो वहां का दृश्य देख कर मन भारी हो गया. मांजी त्रिशंक से कह रही थीं, ‘‘बेटा, पंडितजी आ गए हैं. यह जैसा कहें वैसा कर, यह ऐसी पूजा करवा देंगे जिस से विभु का अंतिम संस्कार तेरे हाथों से हुआ माना जाएगा.’’

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अपने को बिना किसी अपराध के अपराधिनी समझ बैठी हूं मैं. एक मरे इनसान की अनदेखी आत्मा की शांति के लिए जो अनुष्ठान किया जा रहा था वह मेरी सोच के बाहर का था. इस क्रिया से क्या विभु की आत्मा प्रसन्न हो जाएगी? यदि मांजी यह सब करतीं तो शायद मुझे इतना दुख न लगता जितना अपने बड़े बेटे को इस पूजा में शामिल होते देख कर मुझे हो रहा था.

पंडितजी जोरजोर से कोई मंत्र पढ़ रहे थे. त्रिशंक सिर पर रूमाल रखे हाथ जोड़ कर बैठा था. एक ऊंचे आसन पर विभु का शाल रख दिया गया था. मांजी रोते हुए यह सब करवा रही थीं. काश, आज विभु यह सब देख पाते कि उन के संस्कारों ने किस तरह उन के बेटे में प्रवेश कर लिया है. गलत परंपरा की नींव त्रिशंक और मांजी मिल कर डाल रहे हैं. मैं भीगी आंखों से अपने पति को एक बार फिर मरते हुए देख रही थी.

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