साहब- भाग 1: आखिर शादी के बाद दिपाली अपने पति को साहब जी क्यों कहती थी

महरू कामवाली बाई थी. बहुत ही ईमानदार. कपड़े इतने सलीके से पहनती थी कि अगर पोंछा या झाड़ू लगाने के लिए झुके तो मजाल है शरीर का कोई नाजुक हिस्सा दिख जाए. वह कई घरों में काम करती थी. उम्र होगी तकरीबन 42 साल.

रमेश अकेले रहते थे. उन्होंने शादी नहीं की थी और न करने की इच्छा थी. पिछले 4 सालों में महरू रमेश के बारे में और वे महरू के बारे में बहुतकुछ जान चुके थे.

अनपढ़ महरू ने जाति के बाहर शादी की थी. उस का पति शादी के पहले तो ठीक था, पर बाद में शराब पीने की लत लग गई थी. उस ने काम करना छोड़ दिया था. दिनरात शराब में डूबा रहता.

इस बीच महरू के एक बेटी हो गई. घर चलाने के लिए महरू को काम करना पड़ा. उस ने लोगों के घरों में झाड़ूपोंछा लगाने और बरतन धोने का काम शुरू कर दिया. उसे जो मजदूरी मिलती थी, पति छीन कर शराब पी जाता था.

शराब के नशे में बहकते कदमों के चलते एक दिन महरू का पति सड़क हादसे में मारा गया. अब महरू को अपनी बेटी के लिए जीना था.

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महरू जब रमेश के घर काम मांगने आई तो वे उस की सादगी से प्रभावित हुए थे. उन्होंने उस से साफ शब्दों में कहा था कि वे अकेले रहते हैं. घर पर कोई औरत नहीं है. खाना बाहर खाते हैं तो बरतन तो धोने के लिए निकलते नहीं. अब बचा झाड़ूपोंछा, चाहो तो कर सकती हो.

पहले महरू को कुछ डर हुआ, फिर पड़ोस की एक औरत ने उसे रमेश के अच्छे चरित्र के बारे में बताया. उसे काम की जरूरत भी थी. लिहाजा, वह काम करने को तैयार हो गई.

शुरूशुरू में जब महरू काम करने आती और रमेश उस के सामने पड़ते तो उस के चेहरे पर डर सा तैर जाता. अकेले होने की वजह से कुछ संकोच रमेश को भी होता और कभीकभार यह खयाल भी आता कि पता नहीं रुपएपैसे ऐंठने के चक्कर में महरू उन पर कौन सा आरोप लगा दे. महरू जिस कमरे में होती, रमेश दूसरे कमरे में चले जाते.

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आज होटल के भोजन में न जाने क्या था कि रमेश का सिर चकराने लगा. बुखार आ गया. उलटियां भी होने लगीं. वे रातभर बिस्तर पर पड़े रहे. घर के मैडिकल किट में बुखार और पेटदर्द की जो दवाएं थीं, वे खा चुके थे, लेकिन उन की हालत में कोई फर्क नहीं आया.

सुबह महरू ने जब दरवाजे की डोर बैल बजाई, तब रमेश ने बड़ी मुश्किल से दरवाजा खोला. महरू ने जब उन की हालत देखी तो वह घबरा गई. पूरा घर गंदा पड़ा था.

महरू ने सब से पहले गंदगी साफ की. रमेश के सिर पर हाथ रखा और देखा कि तेज बुखार था. उस ने अपने सस्ते से मोबाइल से फोन लगा कर अपनी बेटी को बुलाया.

जब तक महरू की बेटी वहां नहीं पहुंची, तब तक वह साफसफाई करती रही और रमेश को सुना कर बड़बड़ाती रही, ‘‘अकेले कब तक जिएंगे. कोई तो साथ चाहिए. शादी कर के घर बसा लेते तो एक देखभाल करने वाली होती. मैं नहीं आती तो पड़े रहते, पता भी नहीं चलता किसी को.’’

इस के बाद महरू ने रमेश को सहारा दे कर उठाया. उन के हाथमुंह धुलवाए. कपड़े बदलवाए और डाक्टर के पास ले जाने के लिए तैयार कर लिया.

तभी एक आटोरिकशा आ कर रुका. महरू की बेटी उस में से उतरी. बिलकुल फूल सी. गोरी दूध सी.

उम्र 15-16 साल.

महरू ने उस से कहा, ‘‘तू यहीं रहना. मैं आती हूं साहब को डाक्टर से दिखा कर.’’

‘‘क्या हो गया?’’ रमेश की हालत देख कर बेटी ने अपनी मां से पूछा.

‘‘कुछ नहीं. अभी आती हूं. तू घर देखना,’’ महरू ने कुछ तेज आवाज में कहा. फिर बेटी ने कुछ न पूछा.

महरू ने रमेश को सहारा दे कर आटोरिकशा में बिठाया और डाक्टर के पास ले गई. इलाज करवाया. घर वापस लाई. जब तक वे ठीक नहीं हुए तब तक वह उन की देखरेख करती रही. वह अपने घर से दलिया बना कर लाती. समय से दवा देती.

अब महरू रमेश के लिए महज औरत शरीर न रही और न रमेश उस के लिए मर्द शरीर. यह फर्क मिट चुका था. संकोच खत्म हो चुका था. अब वे दोनों एकदूसरे के लिए इनसान थे, मर्दऔरत होने से पहले. भरोसा था एकदूसरे पर.

प्रदेश के निजी विद्यालय सूचना अधिकार अधिनियम के दायरे में

उत्तर प्रदेश के सभी निजी विद्यालय सूचना अधिकार अधिनियम के दायरे में माने जाएंगी. अब निजी विद्यालय सूचना अधिकार अधिनियम के अन्तर्गत मांगी गयी सूचना देने के लिए बाध्य होंगे. राज्य सूचना आयुक्त श्री प्रमोद कुमार तिवारी ने आज श्री संजय शर्मा बनाम ज0सू0अधिकारी/मुख्य सचिव उ0प्र0 शासन, लखनऊ के विषय में योजित अपील के निस्तारण में यह व्यवस्था दी है. उन्होंने मुख्य सचिव उ0प्र0 शासन को यह संस्तुति की है कि जन सूचनाओं की महत्ता को देखते हुए निजी विद्यालयों प्रबन्धकों को भी जन सूचना अधिकारी घोषित करने की व्यवस्था करें.

उल्लेखनीय है कि अपीलार्थी श्री संजय शर्मा ने ज0सू0अ0/मुख्य सचिव, उ0प्र0 शासन, लखनऊ से लखनऊ के दो प्रतिष्ठित निजी विद्यालयों के विषय में आर0टी0आई0 एक्ट के तहत राज्य सूचना आयोग लखनऊ में द्वितीय अपील योजित की थी. यदि निजी विद्यालयों को विद्यालय की स्थापना हेतु रियायती दरों पर विकास प्राधिकरण द्वारा भूमि उपलब्ध करायी गयी है तो मा0 सर्वोच्च न्यायालय द्वारा डी0ए0वी0 कालेज ट्रस्ट एण्ड मैनेजमेंट सोसायटी एवं अन्य बनाम डायरेक्टर ऑफ पब्लिक इंन्सट्रक्शन एवं अदर्स में प्रतिपादित विधि अनुसार ऐसे विद्यालय राज्य द्वारा पर्याप्त रूप से वित्त पोषित समझे जायेंगे. उल्लेखनीय है कि निजी विद्यालय सूचना का अधिकार अधिनियम-2005 के तहत इस आधार पर सूचना नहीं देते थे कि वे राज्य द्वारा वित्त पोषित नहीं है एवं वे अधिनियम की परिधि से बाहर हैं.

आयोग ने इस वाद में यह भी प्रतिपादित किया कि वर्ष 2009 में निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा अधिकार अधिनियम के पारित होने के बाद ऐसे समस्त विद्यालय जो उपरोक्त अधिनियम से आच्छादित है, अधिनियम एवं उ0प्र0 निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा अधिकार नियमावली-2011 के प्रपत्र-1 एवं 2 में वर्णित कतिपय सूचनाएं जिला शिक्षाधिकारी को सूचनाएं देना अपेक्षित है. ऐसी स्थिति में जिला शिक्षाधिकारी उक्त प्रपत्रों में उल्लिखित सूचनाओं को धारित करते हैं, एवं वे प्रपत्रों में वर्णित समस्त सूचनाओं को आर0टी0आई0 एक्ट की धारा-6(1) के तहत मांगे जाने पर याची को देने के लिए बाध्य है.

प्रदेश में 1.15 करोड़ लोगों के पास हैं गोल्‍डन कार्ड

प्रदेश के करोड़ों गरीब परिवारों के लिए राहत भरी खबर है. प्रदेश सरकार 26 जुलाई से आयुष्‍मान भारत योजना के तहत गोल्‍डन कार्ड बनाने के लिए विशेष अभियान चलाने जा रही है.  कोरोना काल के दौरान इलाज में गोल्‍डन कार्ड ने लोगों को काफी राहत दी थी. आयुष्‍मान योजना के तहत अस्‍पतालों में गोल्‍डन कार्ड धारकों को 5 लाख रूपए तक नि:शुल्‍क इलाज की सुविधा दी जाती है.

कोरोना काल के दौरान प्रधानमंत्री जन अरोग्‍य आयुष्‍मान योजना आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए संबल बनी थी. आयुष्‍मान योजना के तहत बने गोल्‍डन कार्ड के जरिए लाखों लोगों को पांच लाख रूपए तक नि:शुल्‍क इलाज की सुविधा दी गई है. गोल्‍डन कार्ड के जरिए लोग सरकारी व सरकार की ओर से अधिकृत निजी अस्‍पताल में अपना नि:शुल्‍क इलाज करा सकते हैं.  इससे पहले 30 अप्रैल तक गोल्‍डन कार्ड बनाए गए थे. प्रदेश सरकार अब फिर से विशेष अभियान चलाकर गोल्‍डन कार्ड बनाने जा रही है. मुख्‍यमंत्री के निर्देश पर 26 जुलाई से प्रदेश भर में आयुष्‍मान योजना के तहत गोल्‍डन कार्ड बनने के लिए जन सुविधा केन्‍द्र या फिर नजदीकी सरकारी अस्‍पताल में जाकर लोग कार्ड के लिए आवेदन कर सकते हैं.

यूपी में बने 1.15 करोड़ गोल्‍डन कार्ड

केन्‍द्र सरकार की आयुषमान योजना के तहत प्रदेश में 1 करोड़ 18 लाख गरीब परिवारों को 5 लाख रुपए का चिकित्‍सा बीमा कवर की सुविधा दी जा चुकी है. इसके अलावा आयुष्‍मान योजना से 6 करोड़ 47 लाख लोगों को लाभांवित किया जा चुका है. यूपी में अब तक 1.15 करोड़ गोल्‍डन कार्ड बनाए जा चुके हैं. इसके अलावा मुख्‍यमंत्री जनआरोग्‍य योजना में 42.19 लाख पात्रों को लाभांवित किया जा चुका है.

Family Story in Hindi- अपना अपना रास्ता: भाग 3

उन्होंने समझ लिया था कि उन का और इंद्रा का निबाह होना कठिन था. इंद्रा की बड़ीबड़ी महत्त्वाकांक्षाएं थीं, ऊंचेऊंचे सपने थे, जो उन के छोटे से घर की दीवारों से टकरा कर चूरचूर हो गए थे.

उन का छोटा सा घर, छोटा सा ओहदा, छोटीछोटी इच्छाएं और आवश्यकताएं, कोई भी चीज इंद्रा को पसंद नहीं आई थी. दिनदिनभर पड़ोसिनों के साथ फिल्में देखना और मौल्स के चक्कर लगाना अथवा किसी के घर में किट्टी पार्टियों के साथ नएनए फैशन की साडि़यों व गहनों की चर्चा करना, यही थी उस की कुछ चिरसंचित अभिलाषाएं जो मातापिता के कठोर नियंत्रण से मुक्त हो कर अब स्वच्छंद आकाश में पंख पसार कर उड़ना चाहती थीं.

दिनभर के थकेहारे सुरेंद्र घर लौट कर आते तो दरवाजे पर झूलते ताले को देख उन का तनमन सुलग उठता. ‘क्या तुम अपना घूमनाफिरना 5 बजे तक नहीं निबटा सकतीं, इंद्रा?’

‘ओहो, कौन सा आसमान टूट पड़ा, जो जरा सी देर इंतजार करना पड़ गया. ताश की बाजी चल रही थी, कैसे बीच से उठ कर आ जाती, बोलो?’ उस का स्वर सुरेंद्र को आरपार चीरता चला जाता. ‘खुद तो दिनभर दोस्तों के साथ मटरगश्ती करते फिरते हैं, मैं कहीं जाऊं तो जवाबतलबी होती है.’

‘नहीं, इंद्रा, मुझे गलत मत समझो. मेरी तरफ से तुम्हें पूरी आजादी है. कहीं जाओ, कहीं घूमो. बस, मेरे आने तक घर लौट आया करो. तुम्हारी खिलीखिली सी मुसकान मेरी दिनभर की थकान हर लेती है.’

सुरेंद्र पत्नी की जिह्वा का हलाहल कंठ में उतार वाणी में मिठास सी घोल देते.

‘ओफ, इच्छाएं तो देखो, मीठीमीठी मुसकान चाहिए इन्हें. करते हैं क्लर्की और ख्वाब देखते हैं महलों के?हुंह, ऐसी ही पलकपांवड़े बिछाने वाली का शौक था तो ले आए होते कोई देहातिन. मेरी जिंदगी क्यों बरबाद की?’

इंद्रा का तीखा स्वर सुरेंद्र के कानों में लावा सा पिघलाता उतर जाता. अंदर ही अंदर तिलमिला कर वे जबान पर नियंत्रण कर लेते. जितना बोलेंगे, बात बढ़ेगी, अड़ोसीपड़ोसी तमाशा देखेंगे. अभी नईनई शादी हुई है, और अभी से…

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चुपचाप कपड़े बदल कर वे बिस्तर पर पड़ जाते. वे सोचते, ‘क्या विवाह का यही अर्थ है? दिनभर के बाद घर आओ तो पत्नी नदारद. फिर ऊपर से जलीकटी सुनो? क्या शिक्षा का यही अर्थ है कि पति को हर क्षण नीचा दिखाया जाए?’

कैसे खिंचेगी जीवन की यह गाड़ी, जहां पगपग पर आलोचना और अपमान की बड़ीबड़ी शिलाएं हैं. कहां तक ठेल सकेंगे अकेले इस गाड़ी को, जहां दूसरा पहिया साथ देने से ही इनकार कर दे? क्या इन कठोर शिलाखंडों से टकरा कर एक दिन सबकुछ अस्तव्यस्त नहीं हो जाएगा?

जीवन को हतोत्साहित करने वाले इन निराशावादी विचारों को धकेलते हुए मन में आशा की किरण भी झिलमिला जाती कि अभी इंद्रा ने जीवन में देखा ही क्या है? सिर्फ मातापिता का स्नेह, बहनभाइयों का प्यारदुलार. गृहस्थी की जिम्मेदारियां बढ़ेंगी तो स्वयं रास्ते पर आ जाएगी. अभी नादान है. 20-22 की भी कोई आयु होती है.

लेकिन इंद्रा ने तो जैसे पति की हर झिलमिलाती आशा को पांवों तले रौंद कर चूरचूर कर देने का फैसला कर लिया था. 2-2 वर्षों के अंतराल से विनोद, प्रमोद और अचला आते गए. उन के साथ आई उन की नन्हींनन्हीं समस्याएं, उन के नाजुककोमल बंधन, उन के नन्हेनन्हे सुखदुख.

लेकिन इंद्रा को उन के वे भोलेभाले चेहरे, उन की मीठीतुतली वाणी, उन के स्नेहसिक्तकोमल बंधन भी बांध कर न रख सके. नौकरों के सहारे बच्चे छोड़ वह अपने महिला क्लब की गतिविधियों में दिनबदिन उलझती चली गई. वक्तबेवक्त आंधी की तरह घर में आती और तूफान की तरह निकल जाती.

हर दिन एक नया आयोजन, जहां पति और बच्चों का कोई अस्तित्व नहीं था. कोई आवश्यकता भी नहीं थी. शायद इंद्रा गृहस्थी के संकुचित दायरे में बंध कर जीने के लिए बनी ही नहीं थी. उस का अपना अस्तित्व था. अपना रास्ता था. जहां मान था, आदर था, यश और प्रशंसा की फूलमालाएं थीं. जहां से उसे वापस लौटा लाने का हर प्रयत्न सुरेंद्र को पहले से और अधिक तोड़ता चला गया था.

जबजब वे उसे गृहस्थी के दायित्वों के प्रति सजग रहने की सलाह देते, वह कु्रद्ध बाघिन सी भन्ना उठती, ‘तुम चाहते क्या हो? क्या मैं दिनभर अनपढ़गंवार औरतों की तरह बच्चों और चूल्हेचौके में सिर खपाया करूं? क्या मांबाप ने मुझे इसलिए कालेज में पढ़ाया था?’

‘नहीं तो क्या इसलिए पढ़ाया था कि अपनी जिम्मेदारियां नौकरों और पड़ोसियों पर छोड़ कर तुम दिनदिनभर सड़कों की धूल फांकती फिरो. जानती हो तुम्हारा यह घूमनाफिरना, यह सोशल लाइफ इन नन्हेनन्हे बच्चों का भविष्य बरबाद कर रहा है, इन्हें असभ्य और लावारिस बना रहा है. अनाथाश्रम में जा करतुम उन बिन मांबाप के बच्चों को सभ्य और सुशिक्षित बनाने की शिक्षा दिया करती हो, पर यह क्यों नहीं सोचतीं कि तुम्हारी अनुपस्थिति में तुम्हारे इन 3 बच्चों का क्या होगा?

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‘जानती हो, इंदु, भूख लगने पर इन्हें क्या मिलता है? नौकरों की झिड़कियां, थप्पड़. बीमारी में तुम्हारे स्नेहभरे संरक्षण की जगह मिलती है उपेक्षा, अवहेलना, तिरस्कार. सच, इंदु, क्या तुम्हें इन अनाथों पर तनिक भी दया नहीं आती?’

किंतु इंद्रा पर सुरेंद्र के इन तमाम उपदेशों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता था.

पत्नी से उपेक्षित सुरेंद्र देरदेर तक दफ्तर में बैठे कंप्यूटर में दिमाग खपाया करते. पर वहां का वातावरण भी धीरेधीरे असहनीय होने लगा. आतेजाते फब्तियां कसी जातीं, ‘अरे भई, इस बार तरक्की मिलेगी तो मिस्टर सुरेंद्र को. पत्नी शहर की प्रसिद्ध समाजसेविका, बड़ेबड़े लोगों के साथ उठनाबैठना, अच्छेअच्छे आदमियों का पटरा बैठ जाएगा, देख लेना.’

Satyakatha- कहानी खूनी प्यार की: भाग 2

सौजन्य- सत्यकथा

यह सुन कर उस ने डरतेडरते कहा, ‘‘सर, लगभग एक महीने से एक लूडो गेम में खेलते हुए कृष्णा से मेरा परिचय हुआ था. इस के बाद हमारी अकसर मोबाइल पर ही बात होती थी. मैं कभी उस से आमनेसामने नहीं मिला हूं. मगर हां, बीती रात उस का यह मैसेज आया था.’’ कह कर उस ने अपना मोबाइल अविनाश सिंह के समक्ष रख दिया.

थानाप्रभारी अविनाश सिंह ने देखा, मैसेज जैसा संजय चौहान के मोबाइल में था, ठीक वैसा ही नेवेंद्र के मोबाइल में भी आया था. सब कुछ साफ था. अब तो अविनाश सिंह के सामने पूरा चित्र स्पष्ट था कि हत्या औनर किलिंग में दिगपाल और उस के बेटे ने ही की है.

उन्होंने नेवेंद्र का पूरा बयान रिकौर्ड किया. उच्च अधिकारियों को सारी जानकारी से अवगत कराते हुए बताया कि मामला लगभग स्पष्ट हो चुका है हत्या बाप और बेटे ने ही की है.

दिगपाल और राजेश को कृष्णा कुमारी के हत्या के आरोप में पुलिस न्यायालय में पेश करने की तैयारी कर रही थी कि इस बीच अविनाश सिंह के दिमाग में एक आइडिया कौंध गया.

उन्होंने दिगपाल और राजेश को फिर से अपने कक्ष में बुलाया और सामने बैठा कर के पानी और चाय पिलवाई और फिर धीरे से कहा, ‘‘देखो दिगपाल, तुम जिन परिस्थितियों में थे, वैसे में कोई भी बेटी की करतूत को बरदाश्त नहीं कर सकता. मैं जानता हूं, गलती तुम से हो गई है. यह मैं भलीभांति समझ रहा हूं. अच्छा है कि पुलिस को सहयोग करो और सारी परिस्थितियों को हमारे सामने साझा करो, ताकि मैं तुम्हारी ज्यादा से ज्यादा मदद कर सकूं.’’

यह एक पुलिसिया पासा था. मगर इस के बाद भी दिगपाल ने भीगी पलकों से कहा, ‘‘साहब, मैं अपनी बेटियों की कसम खा कर कहता हूं कि मैं ने कृष्णा को नहीं मारा है. अगर यह काम मुझ से हुआ होता तो मैं अवश्य आप को बता देता.’’

कृष्णा कुमारी के भाई राजेश से भी अलग से पूछताछ की गई. उस ने भी साफसाफ यही कहा कि उस ने कृष्णा को नहीं मारा है. अब अविनाश सिंह के सामने एक ऐसा मोड़ था, जहां से रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था.

उन्हें बापबेटे की बातों में सच्चाई का एहसास हो रहा था. मगर लाख टके का सवाल यह था कि आखिर जब इन लोगों ने हत्या नहीं की तो फिर हत्यारा कौन है?

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कृष्णा की हत्या में सारे साक्ष्य साफ कह रहे थे कि हत्या पिता और पुत्र ने ही की है. वह कुछ समय तक अपने कक्ष में सिर पर हाथ रख कर आंख मूंद कर बैठ गए और सोचते रहे कि आखिर क्या हो सकता है, आखिर कृष्णा की हत्या कौन कर सकता है?

जांच अधिकारी के दिमाग में अब एक ही संदिग्ध सामने था और वह था कृष्णा का प्रेमी संजय चौहान. अगर कोई हत्या कर सकता था तो वह संजय हो सकता था.

मगर उस के खिलाफ कोई भी सबूत पुलिस के पास नहीं था. इस के बावजूद संजय चौहान को उन्होंने तलब किया और उस से एक बार फिर पूछताछ शुरू की गई.

23 वर्षीय संजय चौहान ने बताया कि लगभग 8 साल से उस के कृष्णा के साथ शारीरिक संबंध हैं. लेकिन अलगअलग जाति के होने के कारण उन का विवाह नहीं हो पाया था.

मगर जल्द ही वे आर्यसमाज मंदिर, बिलासपुर में विवाह भी करने वाले थे. उस ने जोर दे कर यह भी कहा कि हमारे विवाह में सब से बड़ी बाधा कृष्णा के पिता दिगपाल वैष्णव थे, जो उस का विवाह कहीं दूसरी जगह करने के लिए अकसर कृष्णा पर दबाव डालते थे, उस से झगड़ा करते थे.

पुलिस के सामने एक बार फिर यह तथ्य भी सामने आ गए कि हत्या दिगपाल और उस के भाई राजेश ने ही की है.

अविनाश सिंह के समक्ष दिगपाल का मासूम चेहरा घूम रहा था, जो बड़े ही दुख के साथ यह कह रहा था कि उस ने हत्या नहीं की है. अविनाश सिंह ने अंतिम जांच प्रक्रिया के तहत मनोवैज्ञानिक तरीके से संजय चौहान से पूछताछ करने का निर्णय किया और 3 अलगअलग अधीनस्थ अधिकारियों को कहा कि इस से थोड़ीथोड़ी देर में मिलना है और इस के बयान लेना है. हमें देखना है यह बयान में क्या कहता है.

संजय चौहान ने एक एसआई से जांच के दौरान कहा, ‘‘कृष्णा और उस का बहुत पुराना प्रेम संबंध है.’’

एसआई ने जब उस से पूछा कि उस ने घटना के दिन अपना फोन बंद क्यों रखा था. इस के जवाब में उस ने कहा, ‘‘सर, मेरी उस रात तबीयत ठीक नहीं थी.’’

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एक एएसआई से जब संजय का अलग से सामना हुआ तो बातोंबातों में उस ने कहा, ‘‘साहब, उस दिन मोबाइल की बैटरी लो हो गई थी. इसलिए मोबाइल बंद हो गया था.’’

जबकि तीसरे अधिकारी को उस ने अपने बयान में कहा, ‘‘सर, मोहल्ले में झगड़ा होने के कारण मैं ने अपना मोबाइल बंद कर दिया था.’’

तीनों अधिकारियों ने संजय के तीनों अलगअलग बयानों के बारे में बताया तो वह खुशी से उछल पड़े और बोले कि अब बहुत कुछ स्पष्ट हो चुका है. कृष्णा की हत्या किसी और ने नहीं, बल्कि संजय ने ही की है.

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उन्होंने संजय को बुला कर बातचीत की तो उन्होंने यह नोट किया कि बात करते समय वह उन से आंखें चुरा लेता. जांच अधिकारी अविनाश सिंह ने उस से पूछा, ‘‘मैं ने गौर किया कि जब तुम सुबह घटनास्थल पर आए थे तो तुम्हारी आंखें लाल थीं. इस का क्या कारण है?’’

इस पर संजय ने कहा, ‘‘साहब मेरी तबीयत ठीक नहीं थी. रात को मैं सो भी नहीं पाया था.’’

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यह कैसा प्यार- भाग 2

‘अंकल, आप कैसी बातें कर रहे हैं? आप की इज्जत मेरी इज्जत. रमा मेरी पत्नी बने, मेरे लिए गर्व की बात होगी.’’

विजय की बात सुन कर रमा के मन में फिर से एक बार कंपन हुई. इस कंपन में प्यार के साथ सम्मान भी था और आभार भी. विजय ने अपने घर में दोटूक उत्तर दिया, ‘‘मैं रमा से ही शादी करूंगा. यह मेरा पहला और आखिरी फैसला है. आप मना करेंगे तो भी मैं शादी करूंगा, चाहे कोर्ट में ही क्यों न करनी पडे़?’’

विजय के परिवार के लोग भी सहमत हो गए. शादी की तैयारियां शुरू हो गईं. रमा खुश थी, बहुत खुश. उसे बचपन से जवानी तक देखाभला युवक पति के रूप में मिल रहा था. रही विजय के बेरोजगार होने की बात, तो रमा के पिता ने स्पष्ट कह दिया कि ऐसे नेक लड़के के रोजगार लगने की प्रतीक्षा की जा सकती है. यदि नौकरी नहीं मिली तो अपनी जमा पूंजी से विजय के लिए रोजगार की व्यवस्था मैं करूंगा.

रमा के मोबाइल की रिंगटोन बजी. रमा ने मोबाइल उठा कर पूछा ‘‘हैलो कौन?’’

‘‘आप का शुभचिंतक.’’

‘‘नाम बताइए.’’

‘‘मैं बंगाली बाबा. आप को वशीभूत करने के लिए एक व्यक्ति ने मुझे रुपए दिए थे. यदि आप नाम जानना चाहें तो 10 हजार रुपए मेरे अकाउंट में जमा करवा दीजिए.’’

‘‘मुझे नहीं जानना.’’

‘‘हो सकता है जो तंत्रमंत्र के द्वारा आप का वशीकरण चाहता हो, कल आप को दूसरे तरीके से भी नुकसान पहुंचा दे.’’

‘‘कौन है वह?’’

‘‘पहले अकाउंट में रुपए.’’

‘‘आप सच कह रहे हैं, इस का क्या सुबूत है?’’

‘‘मेरे पास आप का फोटो, घर का पता, मातापिता का नाम, सारी जानकारी है आप की.’’

रमा का माथा ठनका. पिछले दिनों जो कुछ उस के साथ हुआ कहीं ये सब उसी व्यक्ति का कियाधरा तो नहीं है. रमा ने उस के अकाउंट में रुपए जमा करवा कर नाम पूछा. नाम सुन कर रमा भौचक्की रह गई. रमा सीधे पुलिसस्टेशन पहुंची. थाना इंचार्ज सीमा तिवारी से मिली. अपनी बदनामी और उन पत्रों की जानकारी दे कर बाबा द्वारा बताया गया नाम भी बताया.

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‘‘आप चिंता मत करिए. मैं बारीकी से जांच कर के अपराधी को कड़ी से कड़ी सजा दिलवाऊंगी.’’

पुलिस ने अपनी जांच शुरू की. रमा की शादी जिस लड़के से होने वाली थी उस लड़के और उस के परिवार वालों को थाने बुला कर पूछताछ की. लड़के को जिस नंबर से फोन पर जान से मारने की धमकी मिली थी, उस नंबर की जांच के साथ उन तमाम पत्रों की भी जांच की गई जो रमा के विरुद्ध महल्ले, कालेज में और लड़के वालों के घर भेजे गए थे. जांच का परिणाम यह निकला कि सबकुछ विजय द्वारा किया गया था. पुलिस की थर्ड डिगरी के आरंभिक दौर में ही विजय ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. रमा ने गुस्से में आ कर कई थप्पड़ विजय को जड़ दिए.

‘‘क्यों किया तुम ने ऐसा?’’

‘‘मैं तुम से प्यार करता हूं. तुम्हें पाने के लिए, तुम से शादी करने के लिए किया सब.’’

‘‘शर्म आनी चाहिए तुम्हें. जिस से प्यार करते हो उसी को सारे शहर में बदनाम कर दिया. यह कैसा प्यार है? यह प्यार है तो नफरत किसे कहते हो? कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा. मैं तुम्हें अपना दोस्त समझती रही. तुम पर भरोसा करती रही और तुम ने भरोसा तोड़ा, मेरी शादी तुड़वाई. गिर चुके हो तुम मेरी नजरों से. मैं चाहूं तो जेल भिजवा सकती हूं अभी लेकिन फिर तुम्हारी बहन की शादी कैसे होगी? तुम्हारे मातापिता कैसे जी पाएंगे?’’

रमा ने थाना प्रभारी सीमा तिवारी से निवेदन किया, ‘‘मैडम, आप का बहुतबहुत धन्यवाद. मैं इस व्यक्ति के खिलाफ कोई कानूनी कार्यवाही नहीं करना चाहती. इसे क्षमा करना ही इस की सब से बड़ी सजा होगी.’’

विजय नजरें झुकाएं हवालात में खड़ा था. रमा की डांट से, थप्पड़ से वह अंदर ही अंदर टूट चुका था. रमा थाने के बाहर आई. सामने शादी तोड़ने वाला परिवार खड़ा था. रमा से माफी मांग कर लड़के ने कहा, ‘‘दूसरे के बहकावे में आ कर मैं ने बहुत बड़ी गलती कर दी. मैं शादी करने को तैयार हूं.’’

‘‘लेकिन मैं तैयार नहीं हूं. किसी के बहकावे में आ कर शादी तोड़ने वालों पर विश्वास नहीं कर सकती. शादी के बाद यदि यही बातें तुम तक पहुंचतीं तब क्या करते, तलाक दे देते? विवाह के लिए भरोसा जरूरी है. पहले विश्वास करना सीखिए.’’

रमा ने अपनी स्कूटी उठाई और घर की ओर चल दी. धीरेधीरे यह बात सब जगह पहुंच गई कि रमा को बदनाम करने में विजय का हाथ था. वह तो रमा भली लड़की है जिस ने विजय के परिवार को ध्यान में रख कर उस पर कोई केस नहीं किया.

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रमा अब सरकारी नौकरी करती है. इसी शहर में उस का विवाह हो चुका है एक डाक्टर से. रमा के 2 बच्चे हैं. वह खुशहाल भरापूरा जीवन जी रही है. पुलिस थाने से निकलने के बाद विजय न घर आया न किसी ने उसे देखा. विजय की गुमशुदगी की रिपोर्ट थाने में दर्ज है.

फिल्म सितारों की अजीबोगरीब आदतें

हर इनसान में कुछ ऐसी आदतें होती हैं, जो देखनेसुनने में काफी अजीब होती हैं. जैसे किसी को नाखून चबाने की आदत होती है, तो किसी को बिना हाथ धोए खाना खाने की. लेकिन सिर्फ आम लोगों में ही नहीं, बल्कि, नामचीन लोगों में भी कुछ ऐसी आदतें होती हैं, जिन के बारे में देखसुन कर काफी अजीब लगता है. ऐसे लोग क्या करते हैं, कैसे रहते हैं, क्या खाते हैं, यह उन के चाहने वाले सिर्फ जानना ही नहीं चाहते हैं, बल्कि उन की आदतों को अमल में भी लाना चाहते हैं. तो आज हम कुछ बौलीवुड सितारों की ऐसी अजीबोगरीब आदतों के बारे जानते हैं, जो आप को हैरान कर देंगी :

सलमान खान

यह बात बहुत कम लोगों को पता है कि बौलीवुड के ‘भाईजान’ सलमान खान को तरहतरह के साबुन जमा करने का शौक है. वे पूरी दुनिया में घूमघूम कर कई तरह के साबुन जमा कर चुके हैं.

अमिताभ बच्चन

बौलीवुड के ‘महानायक’ अभिताभ बच्चन को अपनी कलाई पर 2 घड़ियां बांधने का शौक है. वे ऐसा तब करते हैं जब ऐश्वर्या राय और अभिषेक बच्चन विदेश यात्रा पर होते हैं. इस से वे दोनों जगह के टाइम जोन को मिलाते हैं, लेकिन अब वह उन का स्टाइल स्टेटमैंट बन गया है.

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विद्या बालन

बौलीवुड हीरोइन विद्या बालन की आदत भी बड़ी अजीब है. उन्हें इस हाईटैक जमाने में मोबाइल फोन इस्तेमाल करना बिलकुल भी पसंद नहीं है. वे कई घंटों तक अपना मोबाइल फोन चैक नहीं करती हैं, जिस की वजह से वे अकसर कई इवैंट मिस कर देती हैं. इस के अलावा उन्हें साड़ी खरीदने का बहुत शौक है. उन की अलमारी में कई सौ साड़ियां हैं.

सुष्मिता सेन

आप को सुन कर थोड़ा अजीब लगेगा कि सुष्मिता सेन को सांप पालने का शौक है. उन्होंने अपने घर में एक अजगर पाला हुआ है. इस के अलावा उन्हें ओपन टैरेस पर नहाना पसंद है और इस के लिए उन्होंने अपनी छत पर बाथटब भी बनवाया हुआ है.

करीना कपूर खान

करीना कपूर खान बौलीवुड की एक बेहतरीन अदाकारा होने के साथसाथ खूबसूरत हीरोइनों में से एक हैं. लेकिन उन की भी एक अजीब आदत है. जी हां, बता दें कि करीना कपूर को नाखून चबाने की आदत है. कई इवैंट्स के दौरान उन्हें ऐसा करते देखा गया है.

सैफ अली खान

सैफ अली खान को अपने बाथरूम में समय बिताना अच्छा लगता है और इस की वजह है कि उन के बाथरूम में लाइब्रेरी के साथसाथ फोन ऐक्सटैंशन भी है.

आयुष्मान खुराना

बौलीवुड हीरो आयुष्मान खुराना को अपना मुंह साफ रखने की ज्यादा ही आदत है. उन्होंने इस बात का खुलासा एक इंटरव्यू में किया था कि उन्हें दिनभर में तकरीबन 7 से 8 बार ब्रश करने की आदत है.

आमिर खान

आमिर खान से तलाक ले चुकी उन की दूसरी पत्नी किरण राव ने एक इंटरव्यू में खुलासा किया था कि आमिर खान को रोज नहाना बिलकुल पसंद नहीं है.

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दीपिका पादुकोण

बौलीवुड की खूबसूरत हीरोइनों में से एक दीपिका पादुकोण को खासकर एयरपोर्ट जैसी जगहों पर लोगों की ऐक्टिविटी को गौर से देखना, उन के बारे में अंदाजा लगाने की आदत है.

अलिया भट्ट

अलिया भट्ट को मर्दों का परफ्यूम इस्तेमाल करना पसंद है और यह बात उन्होंने खुद बताई थी.

प्रीति जिंटा

प्रीति जिंटा साफसफाई को ले कर इतनी ज्यादा संजीदा हैं कि वे कहीं होटल बुक करने से पहले वहां का वाशरूम जरूर चैक करती हैं.

जितेंद्र

बीते जमाने के हीरो जितेंद्र को अपने बाथरूम में कमोड पर बैठ कर पपीता खाना अच्छा लगता है.

शाहरुख खान

शाहरुख खान को जूते पहनना इतना ज्यादा पसंद है कि वे पूरे दिन अपने पैरों में जूते पहने रहते हैं. वे तभी जूते उतारते हैं, जब सोने जाते हैं. इस के अलावा उन के पास हजारों जींस हैं, कई वीडियो गेम और गेमिंग गैजेट भी हैं. वे जब भी खाली होते हैं, तब अपने इस शौक को पूरा कर लेते हैं.

शाहिद कपूर

शाहिद कपूर को कौफी पीने की ऐसी लत है कि वे दिनभर में 10 कप कौफी के गटक जाते हैं.

सनी लियोनी

सनी लियोनी शूटिंग के दौरान तकरीबन हर 15 मिनट में बाहर निकल आती हैं, ताकि वे अपने पैर साफ कर सकें. इस बात का जिक्र उन्होंने खुद किया था.

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Manohar Kahaniya: सेक्स रैकेट और बॉलीवुड हसीनाएं

सौजन्य- मनोहर कहानियां

बौलीवुड की तमाम शीर्ष और सफल अभिनेत्रियां कभी न कभी तवायफ या वेश्या के किरदार में जरूर नजर आई हैं. यहां तक कि स्वस्थ पारिवारिक भूमिकाओं के लिए पहचानी जाने वाली जया बच्चन भी इस से अछूती नहीं रह पाईं.

साल 1972 में प्रदर्शित फिल्म ‘बंसी बिरजू’ में वह तवायफ के रोल में नजर आई थीं. इस फिल्म में उन के अपोजिट अमिताभ बच्चन थे, जो उस वक्त फिल्म इंडस्ट्री में जमने के लिए हाथपैर मार रहे थे. ‘बंसी बिरजू’ अच्छे विषय पर आधारित होने के बाद भी चली नहीं और इस के बाद जया बच्चन ने इस शेड को नहीं दोहराया.

तवायफ समाज का जरूरी और महत्त्वपूर्ण हिस्सा शुरू से ही रही है, जिसे फिल्मों में तरहतरह से दिखाया गया है. मीना कुमारी की ‘पाकीजा’ से ले कर रेखा की ‘उमराव जान’ तक फिल्मी तवायफों ने दर्शकों का ध्यान अपनी तरफ खींचा है.

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रेखा ने तो रिकौर्ड दरजन भर फिल्मों में तवायफ की भूमिका निभाई है. ‘मुकद्दर का सिकंदर’ की जोहरा बाई लोगों के जेहन में लंबे वक्त तक बसी रही थी और नीचे के दर्शकों की पहली पसंद थी. पूजा भट्ट ने ‘सड़क’ फिल्म से वाहवाही बटोरी थी तो अपने करियर के उठाव के दौरान रति अग्निहोत्री ने भी ‘तवायफ’ फिल्म से अपने अभिनय की तारीफ उस समय आम दर्शक से करवा ली थी.

इस सवाल का जबाब ढूंढना बड़ा मुश्किल काम है कि क्यों तवायफ की भूमिका लगभग हर किसी एक्ट्रैस ने निभाई और उस रोल में दर्शकों ने उसे पसंद भी किया. फिर वो विद्या बालन अभिनीत ‘बेगम जान’ हो या फिर शर्मीला टैगोर की ‘आराधना’ हो, जिस में एक तवायफ के अंदर की ममता को दर्शक कभी भूल नहीं पाए.

बात सिर्फ इन मानवीय और स्त्रियोचित संवेदनाओं की ही नहीं है, बल्कि तवायफों की भूमिका से जुड़ा एक दिलचस्प सच यह भी है कि इस में अभिनय प्रतिभा के प्रदर्शन की संभानाएं दूसरी किसी भूमिका से ज्यादा रहती हैं. यानी अभिनय की संपूर्णता इसी से है.

सच जो भी हो, पर हर फिल्म में यह भी दिखाया गया कि कोई भी औरत अपनी मरजी से तवायफ नहीं बनती, बल्कि मर्दों के दबदबे वाला समाज उसे किसी कोठे की जीनत बनने को मजबूर कर देता है या फिर वह सिर्फ पेट पालने या घर की जिम्मेदारियां निभाने के लिए इस घृणित और गंदे पेशे में आई.

यानी यह बात हवाहवाई और फिजूल की है कि हर औरत के अंदर एक वेश्या या तवायफ होती है. हां, यह जरूर हर कोई मानता है कि एक तवायफ के अंदर एक औरत का वजूद हमेशा रहता है. फिल्मों के मद्देनजर तवायफ और वेश्या में एक बड़ा मौलिक फर्क यह है कि जरूरी नहीं कि हर तवायफ जिस्मफरोशी करती ही हो.

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जिस्मफरोशी के धंधे पर बनी पहली सार्थक फिल्म ‘मंडी’ थी, जिस में शबाना आजमी, स्मिता पाटिल और नीना गुप्ता जैसी सधी अभिनेत्रियां थीं. श्याम बेनेगल की इस फिल्म का भी अपना अलग फ्लेवर था, जो यह तो एहसास करा गया था कि सभ्य समाज और राजनीति भी देहव्यापार के कितने नजदीक हैं. और नजदीक भी क्या, दरअसल उस का ही तिरस्कृत हिस्सा है, शरीर का ऐसा अंग है जो काट कर फेंक दिए जाने के बाद भी जिंदा रहता है.

चेतना से आई क्रांति

‘मंडी’ से भी 13 साल पहले 1970 में बी.आर. इशारा निर्देशित फिल्म ‘चेतना’ प्रदर्शित हुई थी. रेहाना सुलताना और अनिल धवन अभिनीत इस फिल्म में एक वेश्या अपने प्रेमी के साथ घर बसाने का फैसला कर लेती है लेकिन सफल नहीं हो पाती.

रेहाना ने कालगर्ल के रोल में जान डाल दी थी. उस समय इस फिल्म के बोल्ड सीन काफी चर्चित हुए थे और लोगों को समझ आया था कि एक मौडल कैसे पैसा कमाने के लिए दूसरों की रातें रंगीन करती है और दिन में धर्मस्थलों में माथा टेकती रहती है.

बौक्स औफिस पर पैसा बरसाने बाली ‘चेतना’ फिल्म की दूसरी खूबी यह थी कि इस ने देहव्यापार के धंधे के नए तौरतरीके उधेड़ कर रख दिए थे. 1970 के दशक में कोठे उजड़ने लगे थे और शहर के बदनाम इलाके आबाद होने लगे थे. इसी दौर में कालगर्ल्स की खेप आनी शुरू हो गई थी, जो मौडर्न और स्टाइलिश होती हैं. वे अपनी मरजी से धंधा करती हैं और अपनी फीस से कोई समझौता नहीं करतीं.

यह कालगर्ल पढ़ीलिखी थोड़ी दार्शनिक और थोड़ीथोड़ी बुद्धिजीवी भी होती थीं, जो ग्राहक के साथ मांग पर सैरसपाटे के लिए भी चली जाती थीं. खूबी यह भी थी और है भी कि कालगर्ल इसे एक बेहतर वैकल्पिक प्रोफेशन मानती है और किसी तरह का अपराधबोध नहीं रखती. वह भावनात्मक के साथसाथ पुरुष के सैक्स स्वभाव और जरूरत को भी समझती है, जो इस पेशे की एक जरूरी और अच्छी बात भी है.

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रेहाना सुलताना का फिल्मी सफर बहुत लंबा नहीं चला. ‘चेतना’ के बाद वह कम ही फिल्मों में दिखीं. लेकिन जातेजाते युवतियों के लिए यह मैसेज दे गईं कि मौडलिंग और फिल्मी दुनिया में जिस्म को दांव पर लगा कर भी जगह बनाई जा सकती है. जरूरत है बस थोड़े से टैलेंट, खूबसूरती और बड़े जोखिम उठाने की हिम्मत की.

70 के दशक में देश भर से एक्ट्रैस बनने के लिए लड़कियां मुंबई की ट्रेन पकड़ने लगी थीं. इन में से कुछ जगह बना पाने में कामयाब हुईं और कई गुमनामी और कमाठीपुरा जैसे बदनाम रेड लाइट इलाके की गलियों की खिड़की से झांकते ग्राहकों को इशारे करती नजर आईं.

मुंबई की चकाचौंध और दौलत व शोहरत की कशिश कभी किसी सबूत की मोहताज नहीं रही. हीरोइन बनने के लालच में आई अनेक युवतियां कोई भी समझौता करने लगीं. लेकिन मिलने के नाम पर अधिकांश को सी ग्रेड या एक्स्ट्रा के रोल मिले, इस के एवज में भी उन्हें निर्मातानिर्देशकों और दलालों का बिस्तर गर्म करना पड़ा.

स्याह पहलू श्वेता का

ऐसी ही एक एक्ट्रैस है श्वेता बसु प्रसाद, जिस ने इसी साल जनवरी में जिंदगी के 30 साल पूरे किए हैं. श्वेता हालांकि कोई बड़ा या जानामाना नाम नहीं है लेकिन प्रतिभा उस में है, जिसे उस ने साबित भी किया. महत्त्वाकांक्षी श्वेता ने पत्रकारिता का भी कोर्स किया है और कुछ दिन एक मशहूर अखबार में लेखन भी किया.

जमशेदपुर के मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखती इस खूबसूरत लड़की ने पहली बार बाल कलाकार के रूप में ‘मकड़ी’ फिल्म में काम किया था. साल 2002 में प्रदर्शित हुई इस फिल्म के निर्मातानिर्देशक विशाल भारद्वाज थे. भूतप्रेत वाली इस फिल्म में श्वेता चुन्नी और मुन्नी नाम की जुड़वां बहनों के रोल में खासी सराही गई थी.

उसे सर्वश्रेष्ठ बाल कलाकार का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिला था. इस के बाद उस ने कुछ तमिल, तेलुगू और बंगाली फिल्मों में भी काम किया, लेकिन उम्मीद के मुताबिक उसे नाम और दाम नहीं मिला. कुछ टीवी धारावाहिकों में भी वह नजर आई लेकिन इस से भी उस के डगमगाते करियर को सहारा नहीं मिला.

देह व्यापार में क्यों आई श्वेता

छोटेमोटे रोल करती श्वेता को लोग भूल ही चले थे कि साल 2014 में हैदराबाद से एक सनसनीखेज खबर आई कि मशहूर एक्ट्रैस श्वेता प्रसाद बंजारा हिल इलाके के एक बड़े होटल से देहव्यापार करती हुई पकड़ी गई.

बात सच थी गिरफ्तारी के बाद उसे सुधारगृह भेज दिया गया, जहां वह बच्चों को संगीत और कला का प्रशिक्षण देती रही. मीडिया और बौलीवुड में वह उत्सुकता और आकर्षण का विषय बन गई. हर कोई जानना चाह रहा था कि वह इस घृणित पेशे में क्यों आई.

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इन्हीं दिनों में श्वेता का एक बयान खूब वायरल हुआ था, जिस में वह यह कहती नजर आ रही थी कि मैं अपने ही कुछ गलत फैसलों के चलते कंगाल हो गई थी. मुझे अपने परिवार को भी संभालना था और कुछ अच्छे काम भी करने थे. लेकिन मेरे लिए सारे दरवाजे बंद थे, इसलिए कुछ लोगों ने मुझे वेश्यावृत्ति का रास्ता दिखाया. मैं कुछ नहीं कर सकती थी और न ही मेरे पास कोई और चारा था, इसलिए मैं ने यह काम किया.

सुधारगृह से छूटने के बाद वह इस बयान से मुकर गई और नएनए बयान देती रही, जिन के कोई खास मायने नहीं थे. लेकिन दाद देनी होगी श्वेता की हिम्मत और आत्मविश्वास को, जो वह देहव्यापार के आरोप में पकड़े जाने के बाद भी टूटी नहीं और उसे जो भी रोल मिला, वह उस ने स्वीकार लिया.

साल 2018 में उस ने फिल्मकार रोहित मित्तल से शादी की, लेकिन एक साल बाद ही वह टूट गई. ‘चेतना’ फिल्म की सीमा और श्वेता की असल जिंदगी में काफी समानताएं दिखती हैं, पर फिल्म के और जिंदगी के दुखांत में जमीन आसमान का अंतर होता है, जो दिख भी रहा है.

वेश्या होने का दाग आसानी से नहीं धुलने वाला पर श्वेता अभी भी जिस लगन से काम कर रही है. उस के लिए वह शुभकामनाओं की हकदार तो है कि कड़वा अतीत भूल कर मकड़ी जैसा कारनामा एक बार फिर कर दिखाए.

कड़वी मिष्ठी

श्वेता को तो हैदराबाद सेशन कोर्ट ने देह व्यापार के आरोप से बाइज्जत बरी कर दिया था, लेकिन सन 2014 में ही एक और एक्ट्रैस मय पुख्ता सबूतों के देहव्यापार के आरोप में रंगेहाथों धरी गई थी, जिस का नाम था मिष्ठी मुखर्जी. भरेपूरे गुदाज बदन की मालकिन मिष्ठी थी तो बंगाली फिल्मों की सी ग्रेड की अभिनेत्री, लेकिन 2012 में राकेश मेहता निर्देशित एक हिंदी फिल्म ‘लाइफ की तो लग गई’ में वह नजर आई थी और मुंबई में ही बस गई थी.

हैरानी की बात यह है कि इस फिल्म की समीक्षाओं में कहीं उस का जिक्र नहीं हुआ. मिष्ठी की कहानी किसी फिल्म से कम नहीं. मुंबई के पौश मीरा टावर के सी विंग में फ्लैट नंबर 502 में वह परिवार सहित रह रही थी. इस फ्लैट का किराया ही 80 हजार रुपए महीना था.

मिष्ठी आलीशान जिंदगी जी रही थी. मीरा टावर में लगभग 75 फ्लैट्स आईएएस और आईपीएस अधिकारियों के हैं. इस अपार्टमेंट में हंगामा 9 जनवरी, 2014 को तब मचा था, जब एक छापामार काररवाई में ओशिवरा पुलिस ने मिष्ठी को अपने बौयफ्रैंड दिल्ली के फैशन डिजाइनर राकेश कटारिया के साथ आपत्तिजनक हालत में पकड़ा था.

इस छापे में पुलिस ने कोई ढाई लाख ब्लू फिल्मों की सीडी बरामद की थीं. पुलिस के मुताबिक ये सीडी दक्षिण भारत से ला कर मुंबई और ठाणे में बेची जाती थीं. देह व्यापार में सहयोग देने के आरोप में पुलिस ने मिष्ठी, उस की मां सहित पिता चंद्रकांत मुखर्जी और भाई समरत को भी गिरफ्तार किया था. पुलिस के मुताबिक इस फ्लैट का इस्तेमाल ब्लू फिल्में बनाने में भी किया जाता था.

बाद में मिष्ठी और उस के परिवारजनों ने सफाई दी थी, लेकिन तब तक एक और एक्ट्रैस के दामन में जिस्मफरोशी का दाग लग चुका था. इस मुकदमे का फैसला हो पाता, इस के पहले ही महज 27 साल की उम्र में मिष्ठी किडनी फेल हो जाने से 4 अक्तूबर, 2020 को इस दुनिया से चल बसी.

लोगों को इस कांड के अलावा यह भर याद रहा कि उस ने कुछ क्षेत्रीय फिल्मों सहित हिंदी फिल्म ‘मैं कृष्णा हूं’ में एक गाना गाया था.

बाद में अंदाजा भर लगाया गया, जो सच के काफी करीब है कि अगर वह ब्लू फिल्मों का कारोबार कर रही थी या सैक्स रैकेट चला रही थी तो अपने परिवार के खर्चे पूरे करने के लिए इस गैरकानूनी रास्ते पर चल पड़ी थी.

ऐश के ऐश

ऐसा ही रास्ता दक्षिण भारत की उभरती एक्ट्रैस ऐश अंसारी ने भी चुना था, जो साल 2013 में जोधपुर के तख्त विलास होटल में रंगेहाथों जिस्मफरोशी करते पकड़ी गई थी. इस छापे में 9 लोग पकड़े गए थे. यह भी एक हाइटेक मामला था और औनलाइन चलता था.

पुलिस के मुताबिक, ऐश अपने ग्राहकों को खुश करने गई थी और इस गिरोह का हिस्सा थी. सैक्सी ऐश ने बचाव में शाहरुख खान के साथ अपनी कुछ तसवीरें पुलिस को दिखाई थीं, जो जाहिर है एक बचकानी और फिजूल की बात थी.

दरअसल, वह शाहरुख खान के साथ  ‘ओम शांति ओम’ और ‘चलते चलते’ जैसी फिल्मों में काम कर चुकी थी. इस के अलावा उस ने साउथ की भी कुछ फिल्मों में काम किया है. ‘बूम बूम’ नाम के म्यूजिक वीडियो से भी उस ने धूम मचाई थी.

ऐश ने यह रास्ता परिवार के लिए नहीं, बल्कि जल्द अमीर बनने के चक्कर में चुना था. लेकिन पकडे़ जाने के बाद वह ऐसी गायब हुई कि फिर फिल्मों में नजर नहीं आई. मुमकिन है उस का जमीर उसे कचोटने लगा हो.

ऐश में एक खास बात सैक्सी फिगर के साथसाथ उस के असामान्य उभार हैं जो किसी को भी पागल और मदहोश कर देने के लिए काफी हैं. देह के शौकीनों में उस की डिमांड ज्यादा थी और इस की कीमत वह वसूल भी रही थी.

घर को ही बनाया अड्डा

पर्यटन स्थलों के रिसोर्ट और भव्य होटलों के अलावा कुछ अभिनेत्रियों ने घर से देह व्यापार करना ज्यादा सुरक्षित समझा. इन में एक उल्लेखनीय नाम साउथ की ही भुवनेश्वरी का है, जो अब से 20 साल पहले तक एक उभरता नाम हुआ करता था. अक्तूबर, 2009 में एक छापे में उसे चेन्नई में गिरफ्तार किया गया था.

बोल्ड सीन देने के लिए पहचानी जाने वाली इस खूबसूरत बला और बाला के गिरोह में कई और सी ग्रेड की एक्ट्रैस भी शामिल थीं. भुवनेश्वरी ने टीवी धारावाहिकों से भी नाम कमाया था.  रियल लाइफ में देहव्यापार करने वाली इस एक्ट्रैस ने रील लाइफ में भी वेश्या का किरदार तमिल फिल्म ‘लड़के’ में निभाया था.

अब 46 की हो चुकी भुवनेश्वरी भी गायब है, जिस ने फिल्मों से ज्यादा नाम और दाम वेश्यावृत्ति से कमाया और इसे बेहद सहजता से उस ने लिया और जिया.

दक्षिण भारतीय फिल्मों की वैंप के खिताब से नवाजी गई इस एक्ट्रैस ने कभी दुनिया जहान का लिहाज नहीं किया. उस पर भी कभी देहव्यापार के आरोप अदालत में साबित नहीं हो पाए, लेकिन बदनामी से वह खुद को बचा नहीं पाई.

28 साल की होने जा रही तमिल और तेलुगू फिल्मों की अभिनेत्री श्री दिव्या भी घर से ही सैक्स रैकेट चलाते पकड़ी गई थी.  ‘बीटेक बाबू’ उस के करियर की चर्चित फिल्म थी. महज 3 साल की उम्र से परदे पर पांव रख चुकी इस हौट एक्ट्रैस ने कोई डेढ़ दरजन फिल्मों में काम किया, जिन में से कुछ में उस ने अपने अभिनय की छाप भी छोड़ी.

साल 2014 में पड़े गुंटूर के चर्चित छापे में पकड़ी गई दिव्या को कुदरत ने अजीम खूबसूरती से नवाजा भी है. लेकिन ज्यादा  पैसों के लालच से वह भी नहीं बच सकी.

पतली कमर वाली दिव्या भी गिरोहबद्ध तरीके से जिस्मफरोशी के कारोबार में गले तक डूब चुकी थी. छापे में कई दूसरी मौडल और एक्ट्रैस मय ग्राहकों के पकड़ी गई थीं.

शर्म से दूर शर्लिन चोपड़ा

हैदराबादी गर्ल के नाम से मशहूर हुई शर्लिन चोपड़ा फिल्मों से कम, गरमागरम फोटो सेशन और हर कभी वायरल होते अपने कामुक वीडियोज के चलते ज्यादा जानीपहचानी जाती है. विवादों में रहना उस का खास शगल है. प्लेबौय मैगजीन के लिए नग्न फोटो देने वाली 37 वर्षीया इस एक्ट्रैस ने फिल्मों से ज्यादा गौसिप से अपनी पहचान बनाई.

रूपेश पाल की थ्री डी फिल्म ‘कामसूत्र’ में उस ने उन्मुक्त दृश्य दिए हैं. रियल्टी शो बिग बौस सीजन-3 की प्रतिभागी भी वह रह चुकी है. उस के नाम छोटे बजट की 3 फिल्में ‘टाइम पास’, ‘रेड स्वास्तिक’ और ‘गेम’ ही हैं जो न के बराबर चलीं.

मौडलिंग से अपने करियर की शुरुआत करने वाली शर्लिन कभी देह व्यापार के किसी छापे में तो नहीं पकड़ी गई, बल्कि उस ने खुद ही उजागर किया था कि वह देह व्यापार करती है और पैसों के लिए कई मर्दों के साथ उस ने सैक्स किया है. सुर्खियों में बने रहने को ऐसे कई विवादों से उस ने खुद को जोड़े रखा.

फिल्मकार साजिद खान पर आरोप लगाते हुए उस ने अप्रैल 2015 में कहा था कि एक मुलाकात में साजिद ने पेंट से अपना प्राइवेट पार्ट निकाल कर उसे छूने के लिए कहा था. तब उस ने बिना घबराए साजिद को कहा था कि मैं जानती हूं कि प्राइवेट पार्ट कैसा होता है और उन से मिलने का उस का ऐसा कोई मकसद या इरादा नहीं है.

इस बयान से फिल्म इंडस्ट्री में तहलका मच गया था, जो सच और झूठ की बाउंड्री लाइन पर खड़ा था. यानी फिल्म इंडस्ट्री में ऐसा होना न तो नामुमकिन है और न ही ऐसा होने पर कोई मौडल एक्ट्रैस ऐसी आपबीती इतने खुले लफ्जों में बयां कर सकती है.

नैतिकता तो लोगों की निगाह में यह है कि ऐसा किसी लड़की के साथ हो भी तो उसे खामोश रहना चाहिए. शर्लिन ने दो टूक कहा तो इसे पब्लिसिटी स्टंट कह कर हवा में उड़ा दिया गया.

रियल और रील में फर्क

दरजनों और ऐसी फिल्म एक्ट्रैस हैं, जो देहव्यापार करते पकड़ी गई हैं. दिलचस्प बात यह है कि ये सभी सी ग्रेड की असफल और महत्त्वाकांक्षी युवतियां हैं. लगभग सभी ने रियल लाइफ में यह किरदार निभाया तो इस की वजह साफ है कि पैसा कमाने का इस से बेहतर शार्टकट और कोई है भी नहीं.

लग्जरी जिंदगी जीने की आदी इन नायिकाओं के पास अपने खर्च पूरे करने का कोई दूसरा जरिया होता भी नहीं. परदे पर इन्हें देख चुके शौकीन पैसे वाले भी मुंहमांगे दाम इन्हें देने को तैयार रहते हैं. इन तवायफों को एक रात का अपने नाम, हैसियत और शोहरत के मुताबिक एक से 5 लाख रुपया तक मिलता भी है.

अब तो बी ग्रेड के शहरों में भी इन की मांग बढ़ने लगी है और ये वहां जाती भी हैं. आनेजाने, हवाई जहाज और फाइवस्टार होटलों में ठहरने का खर्च या तो ग्राहक उठाता है या फिर वह दलाल, जो इन के और ग्राहक के बीच कड़ी का काम करता है. ठीक वैसे ही जैसे ‘चेतना’ फिल्म में रेहाना सुलताना के लिए एक दलाल करता था.

प्रेम संबंधों को लीलता कोविड

कोविड का काला साया हजारों प्रेमसंबंधों को लील जाएगा. हम मौतों की बात नहीं कर रहे. शहरों में पनप रहे लवअफेयर युवाओं के अब अपने शहरगांव लौटने की वजह से आधेअधूरे रह गए. जिन को मिल कर बर्थडे मनाने थे, मांबाप के घर में मातम मना रहे हैं. जो उसी शहर में हैं तो भी एकदूसरे से मिल नहीं पा रहे. आज आधुनिक दौर की मोहब्बत/दोस्ती का दस्तूर यह है कि जो दिखा नहीं, वह दूर हुआ. सिर्फ फेसबुक, वीडियो चैट पर देखा जाएगा तो सिर्फ चेहरा दिखेगा, हाथों का टच नहीं होगा, बांहों की गिरफ्त नहीं. जो प्रेमसंबंध अभी अधपके थे वे तो गारंटी से सूख जाएंगे.

वैसे भी, युवा मन चंचल होता है. अगर शहर की डैशिंग पर्सनैलिटी नहीं है तो पड़ोस की आधीअधूरी से ही काम चला लो. सैक्सुअल अट्रैक्शन का न तो जेब से सीधा संबंध है, न स्मार्टनैस से. अगर 2 जवां हों तो यह कहीं भी पैदा हो सकता है. पुराना वाला छूट गया, तो कोई बात नहीं, नया हाजिर है जो कम से कम कोविड तक तो गारंटी से चलेगा.

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अब कोविड के बाद कौन, कहां पहुंचेगा, यह कौन जानता है. शहर बदल सकते हैं, चेहरे लटक सकते हैं, समस्याएं बदल सकती हैं. कोविड की डैथ किसी से लव सौंग छीन सकती है. डैथ की वजह से आई नई जिम्मेदारियां रंग में भंग डाल सकती हैं.

आज जो युवा पनपते प्रेम का पौधा छोड़ कर आए हैं उन्हें यह सोच कर चलना चाहिए कि उस की मार को सहने की क्षमता उन में बहुत कम है. सो, ज्यादा सपने न देखें. यदि व्हाट्सऐप संदेश सूखने लगें,  डीपी धूमिल होने लगे, आई लव यू की जगह बिजी दिखने लगे तो बेचैन न हों, यह कोविड की पैदा की गई नई सिचुएशन है. कोई बिट्रेयल हो, जरूरी नहीं.

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कोविड तो शादियों तक को खाने लगा हैप्रेमसंबंधों को तो छोड़ ही दें. यह महामारी ऐसी है जिस के फुटप्रिंट न जाने जीवन में कहांकहां पड़ेंगे. सफल वही होंगे जो हर एंगल से सोच रहे हैं.

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