Editorial: किसानों के नाम पर राजनीति, असल में सिर्फ व्यापार

Editorial: सरकार का मानना है या कहिए कि उस का बहाना है कि उस ने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बात इसलिए नहीं मानी कि वह भारत के बाजार को अमेरिका के खेतों से आए अनाज और डेयरी प्रोडक्ट्स को सस्ते में देश में बिकने की छूट नहीं देना चाहती थी. सरकार ने अमेरिका को भारत से जाने वाले सामान पर 25 से 40 फीसदी की कस्टम ड्यूटी लगने दी पर अपने किसानों को बचा लिया है.

अफसोस यह है कि सरकार इस बात में उतनी ही गलतबयानी कर रही है जितनी वह नोटबंदी, टैक्सबंदी, तालाबंदी और अब बिहार वाली वोटबंदी में कर रही है. सरकार को, इस सरकार को किसानों से कोई प्यार नहीं उमड़ रहा. इस सरकार के लिए पुराणों के अनुसार किसान आम वैश्य या शूद्र हैं जो ऊंची जातियों की सेवा करने के लिए बने हैं. हमारी वर्णव्यवस्था में तो वैश्यों का काम खेती करना था क्योंकि उस युग में शायद व्यापार न के बराबर था.

शूद्र जो शायद आज के पिछड़े हैं और किसान बन गए हैं और वैश्य जो दुकानदार बन गए हैं, सरकार यानी राज्य के लिए बेमतलब के हैं. सरकार उन्हें नहीं बचा रही, वह उन मुट्ठी भर धन्ना सेठों को बचा रही है जिन्होंने आज किसानों की बनाई चीजों पर पूरी तरह कब्जा कर लिया है. आज किसान को अपना सामान घरों में सीधे बेचने नहीं दिया जाता. उसे मंडी में बेचना होता है या सरकार को.

सरकार ने इस तरह का ढांचा बना लिया है कि देश का किसान मेहनत कर के जो भी अनाज, दूध, गन्ना, फलफूल पैदा करता है तुरंत बड़ी, बहुत बड़ी कंपनियों के हाथों में चला जाता है, वह भी मनमाने दामों पर. मंडी और सुपर मंडी कौमेडिटी ऐक्सचेंज पर धन्ना सेठों का कब्जा है या सरकारों का. यही ताकत है जिस से वोटों को खरीदा जाता है.

भारत चाहे दुनिया की चौथी सब से बड़ी अर्थव्यवस्था है और सब से तेज बढ़ने वाली हो, उस की 80 फीसदी जनता, चाहे गांवकसबों में रह रही हो या शहरों की स्लम बस्तियों में, जानवरों की तरह रहती है. 2 डौलर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन आय पर. 700-800 डौलर सालाना. अमेरिका में किसानों की प्रति व्यक्ति आय 20,000 डौलर सालाना के आसपास है.

अमेरिका को भारत के खेती के सामान न आने देने का मतलब है कि सदियों से जो किसानों को लूटने का ढांचा बना है जिसे पौराणिक युग से आज तक चलाया जा रहा है, टूट न जाए. अमेरिकी जिस क्षेत्र में घुसते हैं वहां का नक्शा बदल देते हैं. वे गाडि़यों में घुसे तो अंबेसडर गाड़ी बननी बंद हो गई. मशीनों में घुसे तो लुहारों की जगह नईनई मशीनें आ गईं. अमेरिका के पीछेपीछे यूरोप, चीन और जापान भी आ जाएंगे और वे न सिर्फ खेती में उथलपुथल कर देंगे, गांवों का सामाजिक नक्शा भी बदल देंगे. सवर्णों की सामाजिक, सरकारी व राजनीतिक रोबदारी का युग खत्म कर देंगे.

भारत ने डोनाल्ड ट्रंप से बैर लिया है क्योंकि यहां के नेता, चाहे किसी की तरफ बैठे हों, नौकरशाह, व्यापारी, किसी भी तरह से गांवों का कायापलट होता नहीं देखना चाहते. उन्होंने पहले जम कर जीएम बीजों को नहीं आने दिया था. आज की फर्टिलाइजर व पैस्टीसाइड व इनसैक्टिसाइड को जमीन के लिए नुकसानदेय कह कर रोकते हैं. डोनाल्ड ट्रंप भारत का भला नहीं चाहते पर असल में अमेरिकी सामान के साथसाथ अमेरिकी सोच, जो अब खुद सड़ने लगी है, आएगी. भारत के आका उसे गांवों में नहीं घुसने देना चाहते क्योंकि वहीं से सस्ते, भूखे, जानवरों की तरह रहने वाले मजदूर मिल रहे हैं.

डोनाल्ड ट्रंप जैसे तो आतेजाते रहेंगे पर एक बार अमेरिकियों के लिए भारत की खेती के दरवाजे खुल गए तो वे ऐसे छा जाएंगे जैसे अमेरिकी तकनीक पर बने मोबाइल देश पर छा गए हैं जिन के बलबूते पर किसान अब मजबूत सरकार को हिला सकते हैं.

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भारतीय जनता पार्टी बिहार में मतदाता सूचियों को महज जांच करने का काम कर के वही कर रही है जो उस का पुराना, बहुत पुराना मकसद रहा है. भारतीय जनता पार्टी नहीं चाहती कि किसी भी तरह से देश के दलित, शूद्र (पिछड़े) जो हिंदू आबादी के 80-85 फीसदी हैं, ऊंची जातियों के बराबर बैठ सकें.

1757 में अंगरेजों ने जब प्लासी की लड़ाई के बाद राज करना शुरू किया तो उन्हें सिपाहियों की जरूरत हुई. उन्होंने बंगाल इंफैंट्री खड़ी की पर उस में उन्हें 5 फुट 6 इंच से ऊपर के केवल ऊंची जातियों के ब्राह्मण और राजपूत जो बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में खाली घरों में बैठे पुरोहिताई कर रहे थे या कुछ भूमिहार बन कर खेती कर रहे थे, अंगरेजों के यहां नौकरी कर के भारतीयों पर गोलियां चलाना तो उन्होंने सीख लिया पर अपना ऊंचापन नहीं छोड़ पाए और इन की अपनी जाति का सवाल अंगरेज कमांडर के हुक्म से ऊपर होता?था. कितनी ही बार इन लोगों ने उस कंपनी के खिलाफ विद्रोह किया जहां नौकरी कोई गुलामी नहीं थी-क्यों-इसलिए कि ये नीची जातियों के लोगों के साथ उठबैठ नहीं सकते थे.

आजादी के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू की सरकार ने न जाने क्यों इन दबदबे वाले ऊंची जातियों के संविधान सभा में भारी नंबरों में होने के बावजूद हरेक को वोट का हक दे दिया. नेहरूअंबेडकर ने 21 साल से ऊपर वालों को वोट का हक दिया तो राजीव गांधी ने इस घटा कर 18 साल कर दिया. जिन का इस बार जन्म ही पिछले जन्मों के पापों के कारण दलित या शूद्र जाति में हुआ है, वे भला कैसे ऊंची जातियों के साथ कंधे से कंधा मिला कर बैठ सकते हैं, रामविलास पासवान जैसे के बेटे चिराग पासवान या जतिन राम मांझी की यह जुर्रत कैसे है कि वे ऊंची जातियों के साथ एक टेबल पर बैठे सकें.

उन के पर काटना जरूरी है और अब भारतीय जनता पार्टी ने यह काम चुनाव आयोग को दिया है, विदेशी वोटरों को ढूंढ़ने के बहाने. असल में मतदाता सूचियों से दलितों अतिदलितों, पिछड़ों और अतिपिछड़ों में से काफियों के वोट काटने का काम ही चुनाव आयोग को दिया गया है. टीएन शेषन का जमाना गया जब चुनाव आयोग प्रधानमंत्री तक को आदेश दे सकता था. आज तो चुनाव आयोग जीहुजूर है.

वोट का हक ही ऐसा है जिस से भारतीय जनता पार्टी में अब कईकई लैवलों पर पिछड़ों को बैठाना पड़ रहा है. वे लोग जिन्होंने 1757 से 1857 तक अपने गोरे मालिकों के खिलाफ वे बंदूकें बारबार उठाई थीं जिन से वे हिंदुस्तानियों को ही डराया करते थे, अब पौराणिक राज लाना चाहते हैं. बिहार की गहन मतदाता सूची जांच उसी का पहला पर आखिरी कदम नहीं है.

क्या पिछड़े और दलित इस खेल को समझेंगे? शायद नहीं. उन के दिमागों में पिछले जन्मों के कर्मों के फल की कहानी इस तरह से फिट है कि वोट का हक छिनने को भी वे पिछले जन्म के पाप का फल मानेंगे. वे इस जन्म में और ज्यादा सेवा कर के अगले जन्म में ऊंची जाति में पैदा होने का इंतजार करेंगे, सुप्रीम कोर्ट के फैसले का नहीं. Editorial

डोनाल्ड ट्रंप के हथकड़ियों के फैसले पर खामोश हैं Narendra Modi

Narendra Modi : भारत ही क्या सारी दुनिया में यह बात मशहूर है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच गहरे दोस्ताना संबंध हैं. ऐसे संबंध कि वे एकदूसरे का सम्मान करते हैं और नरेंद्र मोदी का तो वे कहना मानते हैं. शायद यही वजह है कि नरेंद्र मोदी जिस तरह काम करते हैं, वैसा ही काम डोनाल्ड ट्रंप भी करते दिखाई दे रहे हैं.

एक और बड़ा उदाहरण सामने है. जैसे नरेंद्र मोदी चुनाव लड़ते रहे हैं, बहुतकुछ वैसी ही शैली डोनाल्ड ट्रंप ने भी अपनाई. इस से यह संदेश और भी मजबूत हो गया कि दोनों ही नेताओं में बड़ी अच्छी ट्यूनिंग है और वे एकदूसरे को सम झते हैं, मगर जिस तरह डोनाल्ड ट्रंप ने दोबारा अमेरिका का राष्ट्रपति बनते ही एकदम से भारत के प्रति कड़ा रुख अपनाया है, वह बताता है कि दोनों के ही संबंध कितने छत्तीसी हैं.

अमेरिका में अवैध प्रवासियों का निर्वासन एक खास मुद्दा बन कर सामने है. एक अनुमान के अनुसार, अमेरिका में तकरीबन 11 मिलियन अवैध प्रवासी रहते हैं, जिन में से ज्यादातर मैक्सिको और दूसरे लैटिन अमेरिकी देशों से आए हैं. इसी के मद्देनजर डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति बनने के बाद अवैध प्रवासियों के प्रति सख्त नीति अपनाई है.

ट्रंप प्रशासन ने अवैध प्रवासियों को निर्वासित करने के लिए कई सख्त कदम उठाए हैं, जिन में सीमा सुरक्षा को मजबूत करना, अवैध प्रवासियों की पहचान करने के लिए डाटाबेस का उपयोग करना और अवैध प्रवासियों को निर्वासित करने के लिए अधिक अधिकारियों की नियुक्ति करना शामिल है.

अब 205 भारतीय नागरिकों को ले कर सी-17 विमान सैन एंटोनियो, टैक्सास से भारत आ गया है, जिस से देश में सकते के हालात हैं. हर बात में प्रतिक्रिया देने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री जयशंकर तो मानो खामोश हैं.

दरअसल, अमेरिकी सरकार के इस ऐक्शन का नतीजा यह होगा कि अवैध प्रवासी अपने देश वापस जाएंगे. लेकिन इस ऐक्शन का विरोध भी हो रहा है, खासकर उन लोगों द्वारा, जो अवैध प्रवासियों के अधिकारों की रक्षा करते हैं. उन का मानना है कि अवैध प्रवासी भी इनसान हैं और उन्हें भी सम्मान और अधिकार मिलने चाहिए.

अमेरिकी सरकार की अवैध प्रवासियों को निर्वासित करने की कार्यवाही एक जटिल मुद्दा है, जिस में कई पक्ष और विपक्ष हैं, जबकि यह कार्यवाही अवैध प्रवास को रोकने के लिए एक कदम हो सकती है, लेकिन इस का नतीजा यह भी हो सकता है कि अवैध प्रवासी अपने देश वापस जाएंगे और उन के अधिकारों का उल्लंघन होगा.

भारत की प्रतिक्रिया इस मुद्दे पर मिलीजुली बनी हुई है. एक ओर भारत सरकार ने अवैध प्रवासियों के मुद्दे पर अमेरिकी सरकार के साथ सहयोग करने की बात कही है, वहीं दूसरी ओर  विपक्षी दलों और मानवाधिकार संगठनों ने यह कह कर इस कदम की आलोचना की है कि यह अवैध प्रवासियों के मानवाधिकारों का उल्लंघन है.

इस मुद्दे पर आम लोगों की राय भी मिलीजुली है. कुछ लोगों का मानना है कि अवैध प्रवासी भारत की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के लिए खतरा हैं, जबकि दूसरे लोगों का मानना है कि उन्हें इनसानियत के नजरिए से देखा जाना चाहिए और उन्हें वापस भेजने से पहले उन के मामलों की समीक्षा की जानी चाहिए.

ऐसा लगता कि इस मामले में अमेरिका भी चीन के रास्ते पर चल रहा है. दोनों देशों की आव्रजन नीतियां और उन के कार्यान्वयन में काफी फर्क है. अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अवैध प्रवासियों को निर्वासित करने के लिए सख्त नीतियों का प्रस्ताव किया है, जबकि चीन में आव्रजन नीतियां ज्यादा सख्त और प्रतिबंधात्मक हैं. चीन में अवैध प्रवासियों को निर्वासित करने के लिए विशेष कानून और नियम हैं.

हालांकि, अमेरिका और चीन के माली, राजनीतिक और सामाजिक हालात अलगअलग हैं, जो उन की आव्रजन नीतियों पर असर करती हैं. मगर यह भी नहीं भूलना चाहिए कि अमेरिका लोकतंत्र का हिमायती है, मानवाधिकार का प्रहरी माना जाता है और वह ऐसा कदम उठाएगा, यह कोई सोच भी नहीं सकता था.

मगर अब जल्दी ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ऐसे मामले में कई कदम उठाने चाहिए. सब से पहले उन्हें अमेरिकी सरकार के साथ बातचीत करनी चाहिए और अवैध प्रवासियों के मुद्दे पर एक सम झौता करना चाहिए, जो भारतीय नागरिकों के हितों की हिफाजत करे.

इस के अलावा भारत सरकार को अवैध प्रवासियों के परिवारों को मदद देनी चाहिए, जो भारत में रहते हैं. सरकार को उन्हें माली मदद, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं देनी चाहिए.

सरकार को अवैध प्रवास रोकने के लिए भी कदम उठाने चाहिए. सीमा सुरक्षा को मजबूत करना चाहिए  और अवैध प्रवासियों को रोकने के लिए तकनीकी उपायों का उपयोग करना चाहिए.

यही नहीं, सरकार को अवैध प्रवासियों के मुद्दे पर जागरूकता बढ़ाने के लिए अभियान चलाना चाहिए. उन्हें लोगों को अवैध प्रवास के खतरों और इस के बुरे नतीजों के बारे में बताना चाहिए. इन कदमों से सरकार अवैध प्रवासियों के मुद्दे का समाधान कर सकती है और भारतीय नागरिकों के हितों की हिफाजत कर सकती है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के संबंधों में पिछले कुछ समय में काफी उतारचढ़ाव देखा गया है. ट्रंप प्रशासन ने यूएसएआईडी को बंद करने की घोषणा की थी, जिस से भारत को मिलने वाली माली मदद पर असर पड़ सकता है.

यह कैसी राजनीति के प्रहरी बने श्रीमान Narendra Modi

Narendra Modi : आजादी के बाद राजनीति अपने आदर्श और विपक्षियों को भी सम्मान देने के संदर्भ में जिस ऊंचाई पर थी, नरेंद्र दामोदरदास मोदी के साल 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद धीरेधीरे यह पतन की ओर आगे बढ़ रही है. ऐसा कई बार देखा गया है जब नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए राजनीति और इस पद को गरिमा को कम किया है. इस का एक बड़ा उदाहरण आप के सामने आया है दिल्ली विधानसभा चुनाव के दरमियान जब अरविंद केजरीवाल की राजनीतिक पार्टी ‘आप’ को नरेंद्र मोदी ‘आप दा’ कर कर कर बुला पुकार रहे हैं.

नरेंद्र मोदी ने 22 जनवरी, 2025 को भाजपा कार्यकताओं से विधानसभा चुनाव में 50 फीसदी से ज्यादा बूथों पर जीत का लक्ष्य रखने का आह्वान किया और कहा कि लोग अब खुल कर आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार के खिलाफ गुस्सा जाहिर कर रहे हैं और उसे उस के वादों की याद दिला रहे हैं.

‘नमो एप’ के जरीए ‘मेरा बूथ, सब से मजबूत’ कार्यक्रम के तहत भाजपा के कार्यकर्ताओं से संवाद करते हुए नरेंद्र मोदी ने ‘आप’ को एक बार फिर राष्ट्रीय राजधानी के लोगों के लिए ‘आप दा’ करार दिया और कहा, जब इस से मुक्ति मिलेगी तभी दिल्ली को ‘विकसित भारत’ की ‘विकसित राजधानी’ बनाने का संकल्प सिद्ध हो पाएगा.

नरेंद्र मोदी ने यह दावा भी किया कि ‘आप दा’ वाले विधानसभा चुनाव में इतने डरे हुए हैं कि उन्हें हर दिन एक नई घोषणा करनी पड़ रही है.

नरेंद्र मोदी के मुताबिक, दिल्ली वाले आप वालों की ‘आप दा’ और उन के झूठ और फरेब से अब ऊब चुके हैं. पहले कांग्रेस ने और फिर आप वालों की ‘आप दा’ ने दिल्ली के लोगों से बहुत विश्वासघात किया है. ये ‘आप दा’ वाले अब हर दिन एक नई घोषणा कर रहे हैं. इस का मतलब है कि उन को रोज पराजय की नईनई खबरें मिल रही हैं. ये इतने डरे हुए हैं कि इन्हें रोज सुबह एक नई घोषणा करनी पड़ रही है. लेकिन अब दिल्ली की जनता इन का खेल समझ गई है.

प्रधानमंत्री ने कहा कि इन दिनों वे अपनी चुनावी सभाओं में दावा करते हैं कि ‘फिर आएंगे’ लेकिन अब जनता उन्हें बोलती है कि वे ‘फिर खाएंगे.

इस तरह नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद पर उड़ते हुए देश की राजनीति राजनीतिक दल और आम जनता के समक्ष क्या कर रहे हैं, वह रेखांकित करता है कि राजनीति कितने नीचे चली गई है. पद और सत्ता प्राप्त करने के लिए प्रधानमंत्री पद पर बैठे नरेंद्र मोदी यह भूल जाते हैं कि इसे राजनीति और प्रधानमंत्री पद तारतार हो रहा है.

नरेंद्र मोदी ने कार्यकर्ताओं से ‘आप दा’ वालों की पोल खोलने और केंद्र की उपलब्धियां गिनाने का आह्वान किया. उन्होंने ‘आप’ पर पूर्वांचल के लोगों को दिल्ली से बाहर निकालने की साजिश रचने का आरोप लगाया और दावा किया कि दिल्ली की सत्ताधारी पार्टी में उन के लिए नफरत भरी हुई है. पानी जैसी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में विफल रहने के लिए दिल्ली सरकार पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि शराब उपलब्ध है, लेकिन पानी उपलब्ध नहीं है.

नरेंद्र मोदी के मुताबिक, भाजपा यह सुनिश्चित करने के लिए व्यापक अभियान चलाएगी कि यहां सत्ता में आने पर हर किसी तक पीने का पानी पहुंचे. उन्होंने लोगों के बिजली बिलों में वृद्धि के लिए दिल्ली सरकार को जिम्मेदार ठहराया. अरविंद केजरीवाल पर निशाना साधते हुए कहा
कि ‘शीशमहल’ आप के झूठ और छल का जीताजागता उदाहरण है.

नरेंद्र मोदी ने कहा कि अरविंद केजरीवाल ने यमुना नदी को साफ करने का वादा किया था, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री अब कह रहे हैं कि यमुना को साफ करने के लिए वोट नहीं मिलते. आप गरीबों के लिए घर बनाने के अपने वादे को पूरा करने में भी विफल रही, जबकि केंद्र ने उन के लिए हजारों घर बनाए हैं. भाजपा अपने बूथ कार्यकर्ताओं के बल पर भारी जीत दर्ज करेगी और लोग, विशेषकर महिलाएं उस के अभियान की अगुआई कर रही हैं. कांग्रेस अकसर झूठे वादे करती है और दावा किया कि ‘आप’ इस मामले में मुख्य विपक्षी पार्टी से काफी आगे निकल गई है. कांग्रेस में बरबादी व बुराइयां आने में सात दशक लग गए. इन में तो 7 माह में कांग्रेस की सारी बुराइयां आ गईं और अब तो पिछले 9 साल में इन्होंने उन बुराइयों को भी दोगुना कर दिया है.

नरेंद्र दामोदरदास मोदी देश के सर्वोच्च पद पर बैठे हुए हैं मगर उन्होंने हमेशा विपक्ष का माहौल उड़ाया है. इस का एक बड़ा उदाहरण विपक्षी पार्टियों के गठबंधन के नाम को ‘इंडी’ पुकाराना भी शामिल हैं.

सम्मानजनक इंडिया कहने में क्या उन्हें गुरेज है, यह देश की जनता को समझना चाहिए. और अब विधानसभा चुनाव में ‘आप’ पार्टी को ‘आप दा’ कहना, सीधासीधा नरेंद्र मोदी के द्वारा राजनीति को गंदी राजनीति में बदलने का एक उदाहरण है.

Amit Shah ने लिया अंबेडकर का नाम, राजनीति में मच गया घमासान

केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah पर कांग्रेस नेताओं द्वारा लगाए गए आरोपों ने एक बार फिर से राजनीतिक हलकों में तूफान मचा दिया है. अमित शाह पर गंभीर आरोप लगाया गया है. अगर यह कहा जाए कि उन्होंने सीधेसीधे संविधान निर्माता बाबा साहब डाक्टर भीमराव अंबेडकर का अपमान किया है, तो गलत नहीं होगा और जिस तरह से कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कहा है कि अमित शाह को गृह मंत्री पद से हटाया जाए, तो यह भी गलत नहीं है.

दूसरी तरफ गृह मंत्री अमित शाह का कहना है कि कांग्रेस ने राज्यसभा में बाबा साहब डाक्टर भीमराव अंबेडकर पर दिए गए उन के बयान को तोड़मरोड़ कर पेश किया है, जिस से समाज में भ्रांति फैलाई जा सके.

इस मामले में सब से बड़ा सवाल यह है कि क्या अमित शाह ने या फिर कांग्रेस ने वास्तव में डाक्टर अंबेडकर का अपमान किया है? क्या कांग्रेस ने इस मुद्दे को उठा कर भाजपा को घेरने की कोशिश की है?

इन सवालों के जवाब ढूंढ़ने से पहले हमें यह समझना होगा कि इस मामले में दोनों पक्षों के दावे और आरोप क्या हैं. एक ओर, अमित शाह ने आरोप लगाया है कि कांग्रेस ने डाक्टर अंबेडकर का अपमान किया है और उन के बयान को तोड़मरोड़ कर पेश किया है, तो दूसरी ओर कांग्रेस ने इन आरोपों का खंडन किया है और कहा है कि भाजपा ने इस मुद्दे को उठा कर उन्हें घेरने की कोशिश की है.

इस मामले में सब से बड़ा सवाल यह है कि क्या कांग्रेस ने वास्तव में डाक्टर अंबेडकर का अपमान किया है? इस का जवाब ढूंढ़ने से पहले हमें यह समझना होगा कि डाक्टर भीमराव अंबेडकर के विचार और देश के लिए उन का योगदान क्या है.

बाबा साहब डाक्टर भीमराव अंबेडकर एक महान समाजसुधारक और राजनीतिज्ञ थे, जिन्होंने भारतीय संविधान के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, इसलिए उन का अपमान करना न केवल उन के विचारों और योगदान का अपमान करना है, बल्कि यह भारतीय संविधान और लोकतंत्र का भी अपमान है. लिहाजा, यह जरूरी है कि हम डाक्टर अंबेडकर के विचारों और योगदान का सम्मान करें और उन के अपमान के खिलाफ आवाज उठाएं.

इस मामले में एक और महत्त्वपूर्ण बात यह है कि क्या भाजपा ने इस मुद्दे को उठा कर कांग्रेस को घेरने की कोशिश की है? इस का जवाब ढूंढ़ने से पहले हमें यह समझना होगा कि भाजपा और कांग्रेस के बीच क्या राजनीतिक मतभेद हैं.

भाजपा और कांग्रेस के बीच सब से बड़ा मतभेद यह है कि भाजपा एक राष्ट्रवादी और हिंदुत्ववादी पार्टी है, जबकि कांग्रेस एक धर्मनिरपेक्ष और उदारवादी पार्टी है, इसलिए भाजपा और कांग्रेस के बीच अकसर राजनीतिक मतभेद होते रहते हैं.

लिहाजा, यह जरूरी है कि हम भाजपा और कांग्रेस के बीच के राजनीतिक मतभेदों को समझें और उन के बीच के विवादों को शांतिपूर्ण और रचनात्मक तरीके से हल करने की कोशिश करें.

इस मामले में एक और महत्त्वपूर्ण बात यह है कि क्या हमारे देश में राजनीतिक दलों के बीच के विवादों को शांतिपूर्ण और रचनात्मक तरीके से हल करने की कोशिश की जा रही है? इस का जवाब ढूंढ़ने से पहले हमें यह समझना होगा कि हमारे देश में राजनीतिक दलों के बीच के विवादों को हल करने के लिए क्या तरीके अपनाए जा सकते हैं.

हमारे देश में राजनीतिक दलों के बीच विवादों को हल करने के लिए कई तरीके अपनाए जा सकते हैं. सब से पहले हमें यह समझना होगा कि राजनीतिक दलों के बीच के विवादों को हल करने के लिए संवाद और समझौता करना बहुत महत्त्वपूर्ण है. इस के अलावा हमें यह भी समझना होगा कि राजनीतिक दलों के बीच के विवादों को हल करने के लिए न्यायपालिका की भूमिका भी बहुत महत्त्वपूर्ण है, इसलिए यह जरूरी है कि हम राजनीतिक दलों के बीच के विवादों को हल करने के लिए संवाद, समझौता और न्यायपालिका की भूमिका को समझें और उन का सम्मान करें.

इस के अलावा हमें यह भी समझना होगा कि हमारे देश में राजनीतिक दलों के बीच के विवादों को हल करने के लिए एकदूसरे के प्रति सहानुभूति और समझ रखनी होगी.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस मामले में गृह मंत्री अमित शाह का साथ दिया है. दरअसल, सच यह है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने डाक्टर भीमराव अंबेडकर के बारे में एक बयान दिया था, जिस पर विवाद हुआ था.

अमित शाह ने कहा था कि अब अंबेडकर का नाम लेना एक फैशन हो गया है. अंबेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर… इतना नाम अगर भगवान का लेते तो सात जन्मों तक स्वर्ग मिल जाता.

इस बयान के बाद विपक्षी दलों ने अमित शाह की आलोचना की और उन्हें अपना बयान वापस लेने के लिए कहा.

मध्य प्रदेश : दांव पर सब दलों की साख

ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस छोड़ कर मध्य प्रदेश की जनता और चुनी गई कांग्रेसी सरकार से गद्दारी की थी या फिर अपनी गैरत की हिफाजत की थी, इस का सटीक फैसला अब मीडिया या चौराहों पर नहीं, बल्कि जनता की अदालत में 10 नवंबर, 2020 को होगा जब 28 सीटों पर हुए उपचुनावों के वोटों की गिनती हो रही होगी. इन 28 सीटों में से 16 सीटें ग्वालियरचंबल इलाके की हैं, जहां वोट जाति की बिना पर डलते हैं और इस बार भी भाजपा और कांग्रेस के भविष्य का फैसला हमेशा की तरह एससीबीसी तबके के लोग ही करेंगे, जिन का मूड कोई नहीं भांप पा रहा है.

साल 2018 के विधानसभा के चुनाव में इन वोटों ने भाजपा और बसपा को अंगूठा दिखाते हुए कांग्रेस के हाथ के पंजे पर भरोसा जताया था, लेकिन तब हालात और थे. ये हालात बारीकी से देखें और समझें तो महाराज कहे जाने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया का असर कम, बल्कि एट्रोसिटी ऐक्ट से पैदा हुई दलितों और सवर्णों की भाजपा से नाराजगी ज्यादा थी.

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दलित इस बात से खफा थे कि भाजपा सवर्णों को शह दे रही है और इस मसले पर अदालत भी उस के साथ है, इस के उलट ऊंची जाति वाले इस बात से गुस्साए हुए थे कि संसद में अदालत के फैसले को पलट कर मोदी सरकार उन की अनदेखी करते हुए दलितों को सिर चढ़ा रही है, जबकि वे हमेशा उसे वोट देते आए हैं.

इसी इलाके में बड़े पैमाने पर एट्रोसिटी ऐक्ट को ले कर हिंसा हुई थी. इस का नतीजा यह हुआ कि इन दोनों ही तबकों के वोट भाजपा से कट कर कांग्रेस की झोली में चले गए और वह इस इलाके की 36 सीटों में से 26 सीटें ले गई.

भाजपा राज्य में 230 सीटों में से महज 109 सीटें ले जा पाई और कांग्रेस 114 सीटें ले जा कर बसपा, सपा और निर्दलीय विधायकों की मदद से अल्पमत की सही सरकार बना ले गई.

दिग्गज और तजरबेकार कमलनाथ ने बहैसियत मुख्यमंत्री जोरदार शुरुआत की जिस से लोगों को आस बंधी थी कि 15 साल बाद सत्ता में आई कांग्रेस सरकार भाजपा से बेहतर साबित होगी, लेकिन सवा साल में ही कांग्रेस की खेमेबाजी और फूट उजागर हुई तो हुआ वही जिस का हर किसी को डर था.

कमलनाथ और परदे के पीछे से सरकार हांक रहे पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने ज्योतिरादित्य सिंधिया की अनदेखी शुरू कर दी नतीजतन वे राम भक्तों की पार्टी से जा मिले जिस के एवज में भाजपा ने उन्हें राज्यसभा में ले लिया और उन के 22 समर्थक विधायकों की मदद से सरकार बना ली जिस की अगुआई एक बार फिर वही शिवराज सिंह चौहान कर रहे हैं, जिन्हें जनता ने 2018 में खारिज कर दिया था.

इतना ही नहीं, भाजपा ने सिंधिया समर्थक 14 विधायकों को मंत्री पद से भी नवाजा और वादे या सौदे के मुताबिक सभी को उन की सीटों से ही टिकट भी दिए.

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सब की हालत पतली

अब क्या ये सभी कांग्रेसी भाजपा के हो कर दौबारा जीत पाएंगे, यह सवाल बड़ी दिलचस्पी से सियासी गलियारों में पूछा जा रहा है जिस का सटीक जवाब तो 10 नवंबर को ही मिलेगा, पर इन नए भगवाइयों की हालत खस्ता है, जो पहले भाजपा की बुराई करते थकते नहीं थे और अब जनता को बता रहे हैं कि भाजपा क्यों कांग्रेस से बेहतर है. लेकिन ऐसा करते और कहते वक्त उन की आवाज में वह दमखम नहीं रह जाता जो 2018 के चुनाव प्रचार के वक्त हुआ करती था. कांग्रेस इन्हें गद्दार और दागी कह तो रही है, लेकिन उस के पास भी इस सवाल का कोई जवाब नहीं है कि आखिर क्यों वह अपने विधायकों को बांधे रखने में नाकाम रही और क्यों उन्हें अपनी ही पार्टी की सरकार गिराने मजबूर होना पड़ा.

अब ज्यादातर सीटों पर मुकाबला कांग्रेस बनाम कांग्रेस छोड़ चुके नए भाजपाइयों के बीच हो रहा है. भाजपा को बहुमत के लिए 9 सीटें और चाहिए, जबकि कांग्रेस को सरकार बनाने पूरी 28 सीटों पर जीत की दरकार है. लेकिन राह दोनों की ही आसान नहीं है, तो इस की अपनी वजहें भी हैं. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह पहले जैसे लोकप्रिय नहीं रह गए हैं और भाजपा कार्यकर्ता सिंधिया खेमे की खातिरदारी में जुटने से बच रहा हैं, क्योंकि उसे मालूम है कि ये जीत भी गए तो उन्हें कोई फायदा नहीं होने वाला. हालांकि ज्योतिरादित्य सिंधिया जनता को यह बताने लगे हैं कि वे और उन के समर्थक दिलोदिमाग दोनों से भाजपाई हो चुके हैं. इस के लिए वे जयजय श्रीराम का नारा सड़कों पर आ कर लगाने लगे हैं और भाजपाई उसूलों पर चलते हुए संघ के दफ्तर की भी परिक्रमा करने लगे हैं.

दूसरी तरफ पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ को यह एहसास है कि उन के पास खासतौर से इस इलाके में जमीनी कार्यकर्ताओं का टोटा है और 16 में से कोई 10 सीटों पर सिंधिया खेमे के उम्मीदवारों की खुद की अपनी भी साख है जिसे तोड़ पाने के लिए उन के पास काबिल और लोकप्रिय उम्मीदवार नहीं हैं जिस की भरपाई करने वे सिंधिया की गद्दारी को चुनावी मुद्दा बनाने की जुगत में भिड़े हैं.

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भाजपा निगल रही बसपा वोट

कोई मुद्दा न होने और कोरोना महामारी के चलते वोटिंग फीसदी कम होने के डर से भी सभी पार्टियां हलकान हैं. ऐसे में जो पार्टी अपने वोटर को बूथ तक ले आएगी, तय है कि वह फायदे में रहेगी. साफ यह भी दिख रहा है कि कोरोना के डर के चलते बूढ़े वोट डालने नहीं जाएंगे. इस इलाके में कभी मजबूत रही बसपा अब दम तोड़ती नजर आ रही है. 2018 के चुनाव में वह यहां महज एक सीट जीत पाई थी जो अब तक का उस का सब से खराब प्रदर्शन था, इस के बाद भी 6 सीटों पर उस ने भाजपा और कांग्रेस दोनों का खेल बराबरी से बिगाड़ा था. बसपा के वोटरों पर इन दोनों पार्टियों की नजर है, जिस के चलते दोनों का दलित प्रेम उमड़ा जा रहा है.

मायावती का भाजपा के लिए झुकाव किसी सुबूत का मुहताज नहीं है. नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद दलित समुदाय कई फाड़ हो चुका है. सामाजिक समरसता के जरीए भाजपा एससीबीसी तबके में थोड़ीबहुत ही सही सेंध लगा चुकी है. उसे उम्मीद है कि अगर इस तबके के 30 फीसदी वोट भी उसे मिले तो सवर्ण वोटों के सहारे दिनोंदिन मुश्किल होती जा रही इस जंग को वह जीत लेगी. दूसरी तरफ कांग्रेस को उम्मीद है कि पिछली बार की तरह ये वोट उसे ही मिलेंगे. बसपा के खाते में अब वही वोट जा रहे हैं जो 20 साल से उसे मिलते रहे हैं, लेकिन मायावती के ढुलमुल रवैए के चलते दलित नौजवान वोटर यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि कौन सी पार्टी हकीकत में उस की हिमायती है.

साख का सवाल

ज्योतिरादित्य सिंधिया को यह साबित करने में पसीने आ रहे हैं कि 2018 की तरह वोट उन के नाम पर पड़ेंगे तो शिवराज सिंह भी यह साबित नहीं कर पा रहे हैं कि भाजपा और वे खुद पहले की तरह अपराजेय हैं, इसलिए उन्होंने ‘शिवज्योति ऐक्सप्रेस’ का नारा दिया है. ज्योतिरादित्य सिंधिया की बूआ कैबिनेट मंत्री यशोधरा राजे भी अपने बबुआ के लिए हाड़तोड़ मेहनत कर रही हैं.

साख मायावती की भी दांव पर लगी है कि बसपा अगर इस बार भी सिमट कर रह गई तो आगे के लिए उस के दामन में कुछ नहीं रहेगा. कमलनाथ को भी साबित करना है कि वे एक बेहतर मुख्यमंत्री थे जो अपनों की ही साजिश का शिकार हुए थे.

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यानी अब जो जीता वह सिकंदर हो जाएगा और हारे के पास हरि नाम भी नहीं बचेगा, इसलिए सारे नेता वोटरों को लुभाने के लिए साम, दाम, दंड, भेद सब का सहारा ले रहे हैं, जिन्हें मालूम है कि यह चुनाव आम चुनाव से भी ज्यादा अहम उन के वजूद के लिए है और जानकारों की दिलचस्पी इस इलाके में बिहार के बराबर ही है. फर्क सिर्फ इतना है कि अगर कांग्रेस वोटर के दिमाग में यह बात बैठा पाई कि भाजपा ने जोड़तोड़ कर सरकार बना कर राज्य का भला नहीं किया है तो बाजी भगवा खेमे को महंगी भी पड़ सकती है, क्योंकि विकास और रोजगार के मुद्दों पर तो वोटर की नजर में दोनों ही पार्टियां नकारा हैं.

खेती जरूरी या मंदिर

देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जिस दिन (17 सितंबर) जन्मदिन था, भाजपा के कार्यकर्ता सरकार की उपलब्धियां गिनागिना कर जहां एकदूसरे को मिठाइयां बांट रहे थे, वहीं देश की कई जगहों पर किसानों को मारापीटा जा रहा था.

हरियाणा में किसान सरकार के खिलाफ मोरचा खोले बैठे थे. विरोध का आलम यह था कि इस प्रदर्शन से घबरा कर पुलिस को लाठीचार्ज तक करना पड़ा था, जिस में कई किसानों को गंभीर चोटें आई थीं. पुलिस ने बुजुर्गों तक को नहीं छोड़ा था.

दरअसल, यह विरोध प्रदर्शन हरियाणा, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश और पंजाब के किसान कृषि क्षेत्रों में सुधार के लिए मोदी सरकार के 3 विधेयकों के खिलाफ कर रहे थे, जिस में उन की मांग थी कि इन कानूनों को तत्काल वापस लिया जाए.

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इस विधेयक के विरोध में हरियाणा में किसानों ने जम कर विरोध किया. यहां के प्रदर्शन कर रहे किसानों का मानना था कि जो अध्यादेश किसानों को अपनी उपज खुले बाजार में बेचने की इजाजत देता है, वह तकरीबन 20-22 लाख किसानों खासकर जाटों के लिए तो एक झटका ही है.

मगर किसानों की आवाज को सरकार दबाना चाहती थी, ताकि इस का असर दूसरे राज्यों में न फैले. इस वजह से प्रदर्शन कर रहे किसानों पर पुलिस ने लाठियां भांजनी शुरू कर दीं. इस में किसी को गहरी चोटें आईं तो किसी के पैर की हड्डी टूट गई.

हरियाणा के एक किसान अरविंद राणा कहते हैं, “देश का पेट भरण आले किसान, देश की रक्षा करण आले किसान के बेटे, देश के भीतर कानून व्यवस्था बणाण आले सारे किसानों के बेटे, सारे व्यापारी, नेताअभिनेता और सारे अमीर आदमियां की सिक्योरिटी करण आले किसानों के बेटे, वोट दे कर सरकार बणाण आले किसान, देश की नींव किसान… और फिर भी अन्नदाता क लठ मारन का आदेश देते शर्म नहीं आई?”

गुस्सा बेवजह भी नहीं

सरकार के खिलाफ किसानों का गुस्सा बेवजह भी नहीं है, क्योंकि पहले नोटबंदी फिर जीएसटी और फिर कोरोना काल में पूरी तरह फिसड्डी रही सरकार ने एक बार फिर कृषि विधेयक बिल से देश के किसानों को खुश नहीं कर पाई.

किसान संगठनों का आरोप है कि नए कानून के लागू होते ही कृषि क्षेत्र भी पूंजीपतियों या कौरपोरेट घरानों के हाथों में चला जाएगा और इस का नुकसान किसानों को उठाना पड़ेगा.

किसान सौरव कुमार कहते हैं, “देश के किसानों की चिंता जायज है. किसानों को अगर बाजार में अच्छा दाम मिल ही रहा होता तो वे बाहर क्यों जाते? जिन उत्पादों पर किसानों को एमएसपी यानी समर्थन मूल्य ₹ नहीं मिलता, उन्हें वे कम दाम पर बेचने को मजबूर हो जाते हैं.

“पंजाब में होने वाले गेहूं और चावल का सब से बड़ा हिस्सा या तो पैदा ही एफसीआई द्वारा किया जाता है या फिर एफसीआई उसे खरीदता है.”

वहीं प्रदर्शनकारियों को यह डर है कि एफसीआई अब राज्य की मंडियों से खरीद नहीं पाएगा, जिस से ऐजेंटों और आढ़तियों को तकरीबन 2.5 फीसदी के कमीशन का घाटा होगा.

इस का सब से बड़ा नुकसान आने वाले समय में होगा और धीरेधीरे मंडियां खत्म हो जाएंगी. इस से बेरोजगारी भी बढ़ेगी.

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अब पछता रहा हूं

कृषि मामलों के जानकार व खुद किसान रहे आदेश कुमार को मोदी सरकार से कोफ्त है. वे कहते हैं, “मैं ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए भाजपा को वोट किया था, पर अब पछता रहा हूं.

“यह सरकार हर मोरचे पर फेल रही है और किसानों के लिए कभी कुछ नहीं कर पाई. पहले नोटबंदी फिर जीएसटी के बाद सरकार का कृषि का नया कानून देश के किसानों के खिलाफ है.

“अभी पिछले ही साल का एक वाकिआ बताता हूं. पैप्सिको ने भारत में 4 किसानों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया. कंपनी का आरोप था कि ये किसान आलू की उस किस्‍म की खेती कर रहे थे, जो कि कंपनी द्वारा अपने लेज पोटेटो चिप्‍स के लिए विशेष रूप से रजिस्‍टर्ड है.

“तब किसान संगठन और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने पैप्सिको का विरोध किया था. पैप्सिको ने नुकसान की भरपाई के लिए हर किसान से 1-1 करोड़ रुपए की मांग भी की.”

मालूम हो कि पैप्सि‍को भारत की सब से बड़ी प्रोसेस ग्रेड आलू की खरीदार है और यह उन पहली कंपनियों में से एक है जो आलू की विशेष संरक्षित किस्‍म को खुद के लिए उगाने के लिए हजारों स्‍थानीय किसानों के साथ काम कर रही है.

तब किसान संगठन और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने पैप्सिको के खिलाफ कार्यवाही करने की मांग की थी और अपना पक्ष रखते हुए कहा था कि भारतीय कृषि कानून के तहत संरक्षित फसल को उगाना और उसे बेचना किसानों का अधिकार है.

किसानों को इसलिए भी डराया और कानूनी रूप से प्रताड़ित किया गया, ताकि किसान डर जाएं और इस फसल की खेती ही न करें.

किसानों ने सरकार को चिट्ठी भी लिखी थी जिस में उन्होंने आरोप लगाए थे कि पैप्सिको ने तथाकथित आरोपी किसानों के पास प्राइवेट जासूसों को संभावित ग्राहक बना कर भेजा, चुपचाप उन के वीडियो बनाए और आलू के सैंपल हासिल किए.

रोजगार जरूरी मंदिर नहीं

आदेश बताते हैं, “असल में सरकार की मंशा ही सही नहीं है. अगर देश में खुशहाली नहीं रहेगी, बेरोजगारी चरम पर होगी, नौकरियां खत्म हो जाएंगी, किसानों की सुनी नहीं जाएगी तो सरकार पर सवालिया निशान लगना वाजिब है.

“हमें न मंदिर चाहिए न मसजिद, पहले बेरोजगारी तो खत्म करो. किसान, जो देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है उन के लिए तो कुछ करो. पहले से मरे किसानों को सरकार और मार रही है.”

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अपने ही खेत में मजदूर

आदेश कहते हैं, “2 राज्यों के बीच व्यापार को बढ़ावा देने के प्रावधान पर भी भरम की हालत है. 80-85 फीसदी छोटे किसान एक जिले से दूसरे जिले में नहीं जा पाते, किसी दूसरे राज्य में जाने का तो सवाल ही नहीं उठता. यह बिल बाजार के लिए बना है, किसानों के लिए नहीं.”

“इस प्रावधान से किसान अपनी ही जमीन पर मजदूर हो जाएगा. काला बाजारी को बढ़ावा मिल सकता है.”

आखिर क्या है इस बिल में

जिन विधेयकों को मंजूरी मिली है उस में कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य विधेयक 2020 और कृषक कीमत आश्वासन समझौता और कृषि सेवा पर करार विधेयक 2020 शामिल हैं.

कृषि उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन एवं सरलीकरण) विधेयक 2020 के तहत किसान या फिर व्यापारी अपनी उपज को मंडी के बाहर भी दूसरे जरीयों से आसानी से व्यापार कर सकेंगे.

इस बिल के मुताबिक राज्य की सीमा के अंदर या फिर राज्य से बाहर, देश के किसी भी हिस्से पर किसान अपनी उपज का व्यापार कर सकेंगे. इस के लिए व्यवस्थाएं की जाएंगी. मंडियों के अलावा व्यापार क्षेत्र में फौर्मगेट, वेयर हाउस, कोल्डस्टोरेज, प्रोसैसिंग यूनिटों पर भी बिजनैस करने की आजादी होगी.

मगर असल में भारत में छोटे किसानों की तादाद ज्यादा है, तकरीबन 80-85 फीसदी किसानों के पास 2 हैक्टेयर से कम जमीन है, ऐसे में उन्हें बड़े खरीदारों से बात करने में परेशानी होती आई है. इस के लिए वे या तो बड़े किसान या फिर बिचौलियों पर निर्भर होते थे. अब उन्हें फसल बेचने के लिए खुद पहल करनी होगी और यह पूरी संभावना है कि किसानों को इन प्रकियाओं से गुजरने में हिचक होगी या फिर उन्हें समझ ही नहीं आएगा कि वे फसल कहां और कब बेचें.

खुद भाजपा की वरिष्ठ नेता रहीं सुषमा स्वराज ने साल 2012 में सदन में किसानों की दशा और दिशा पर वर्तमान सरकार का ध्यान खींचने की कोशिश की थी.

सुषमा स्वराज ने बताया था कि किस तरह किसान अपने ही फसल को नहीं बेच पाते और आश्चर्य तो यह कि देश में पोटैटो चिप्स बनाने वाली कंपनियां देश के किसानों द्वारा तैयार फसल से चिप्स न बना कर विदेशी आयातित आलूओं से चिप्स बना कर बेचती हैं.

राज्य सरकारों की चिंता

किसानों की इन चिंताओं के बीच राज्‍य सरकारों खासकर पंजाब और हरियाणा को इस बात का डर सता रहा है कि अगर निजी खरीदार सीधे किसानों से अनाज खरीदेंगे तो उन्‍हें मंडियों में मिलने वाले टैक्‍स का नुकसान होगा, इसलिए कई राज्यों के सरकार भी इस का विरोध कर रहे हैं. खुद सरकार की सहयोगी रही अकाली शिरोमणि दल भी सरकार के इस फैसले से सहमत नहीं दिखी और पार्टी की वरिष्ठ नेता हरसिमरन कौर बादल ने केंद्रीय मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया.

कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने बिल को ले कर सवाल उठाए और अपने ट्वीटर हैंडल पर उन्‍होंने लिखा, ‘अगर ये बिल किसान हितैषी हैं तो समर्थन मूल्य का जिक्र बिल में क्यों नहीं है? बिल में क्यों नहीं लिखा है कि सरकार पूरी तरह से किसानों का संरक्षण करेगी? सरकार ने किसान हितैषी मंडियों का नैटवर्क बढ़ाने की बात बिल में क्यों नहीं लिखी है? सरकार को किसानों की मांगों को सुनना पड़ेगा.’

हालांकि जिस समर्थन मूल्य को ले कर किसानों और विपक्ष को एतराज है सरकार ने उस को पूरी तरह साफ नहीं किया है. दरअसल, किसानों के हितों की रक्षा करने के लिए देश में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की व्यवस्था लागू है. अगर कभी फसलों की कीमत बाजार के हिसाब से गिर भी जाती है, तब भी केंद्र सरकार तय न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ही किसानों से फसल खरीदती है, ताकि किसानों को नुकसान से बचाया जा सके.

किसी फसल की एमएसपी पूरे देश में एक ही होती है और इस के तहत अभी 23 फसलों की खरीद की जा रही है. कृषि मंत्रालय, भारत सरकार के अधीन कृषि लागत और मूल्य आयोग की सिफारिशों के आधार पर एमएसपी तय की जाती है.

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आम आदमी पार्टी के नेता नीरज गुप्ता कहते हैं, “जब आप मजदूरी करने जाते हैं तो सरकार द्वारा मिनिमम भत्ता तय किया हुआ होता है.

“इस को इस तरह से समझना होगा कि प्राइवेट नौकरी में अनुभव और योग्यता के आधार पर पे स्केल तय होता है. सरकारी नौकरियों में पे ग्रेड होता है यानी किसी भी काम में कम से कम आप को क्या मिलेगा यह तय है, तो अकेले किसान का क्या कुसूर है कि उस के लिए उस एमएसपी को ही हटाया जा रहा है?

“प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि एमएसपी नहीं हट रहा तो उसे लिखने में क्या गुरेज है? पिछले कुछ दिनों का इतिहास उठा कर देखिए, ओला व उबर जैसी कंपनियों की वजह से कितनी कारें सड़कों पर आ गईं आज वे सब कौड़ियों के दाम बिकने को तैयार हैं. इस बिल से किसान जो कुछ भी कमाता रहा है, वह भी उसे नहीं मिलेगा.”

नोटबंदी जैसा हश्र होगा

किसान परिवार से संबंध रखने वाले संदीप भोनवाल कहते हैं, “सरकार द्वारा किसानों के लिए लाए हुए अध्यादेश ठीक उसी तरह साबित होंगे जिस तरह सरकार ने कुछ साल पहले नोटबंदी कर के देश को किया था. तब सरकार ने कहा था कि इस से देश को फायदा होगा, लेकिन आज तक एक भी फायदा नोटबंदी से देश को नहीं दिखा.

“ठीक उसी तरह जो ये बिल सरकार किसानों के लिए ले कर आई है, आने वाले समय में इस के नतीजे ठीक नोटबंदी की तरह ही घातक होंगे.

“इस बिल की सब से गलत बात यह भी लगी कि कोई भी किसानों का संगठन सरकार ने अपने दायरे में ले कर उस बिल का निर्माण नहीं कराया. अब आप ही समझें कि जो बिल किसानों के लिए बन रहा है अगर उस में किसानों की ही राय  शामिल न हो तो ऐसे बिल का क्या फायदा?”

किसान कुदरत की मार तो जैसेतैसे झेल जाते हैं लेकिन देश की दोहरी आर्थिक नीतियां उन का मनोबल तोड़ कर रख देती हैं.

किसानों द्वारा खुदकुशी

पिछले दिनों राजस्थान के एक किसान सुरेश कुमार ने इसलिए फांसी लगा ली क्योंकि वह कर्ज से फंसा पड़ा था. बीते कुछ साल से उन की फसल अच्छी नहीं हुई थी और जो हुई उस के भी वाजिब दाम नहीं मिल पाए. इस दौरान सुरेश कुमार पर कर्ज  बढ़ता गया.

मध्य प्रदेश के एक किसान संत कुमार सनोडिया ने इसलिए जहर खा कर जान दे दी, क्योंकि बेची गई फसल के एवज में उसे 4 महीने सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने पड़े, मगर फिर भी पैसे नहीं मिले.

नैशनल क्राइम रिकौर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक बीते तकरीबन 20 सालों में देशभर के 3 लाख से ज्यादा किसानों को खुदकुशी करने के लिए मजबूर होना पड़ा है.

एनसीआरबी की एक हालिया रिपोर्ट बताती है कि साल 2018 में कृषि क्षेत्र से जुड़े 10,349 लोगों ने खुदकुशी कर ली थी. वहीं साल 2017 में यह आंकड़ा 10,655 था.

राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) के एक सर्वे के मुताबिक देश के आधे से ज्यादा किसान कर्ज के बोझ तले दबे हैं और एक स्टडी के मुताबिक हर तरफ से निराश हो चुके देश के 76 फीसदी किसान खेती छोड़ कर कुछ और करना चाहते हैं.

आर्थिक सर्वे 2018-19 के आंकड़े भी बताते हैं कि साल 2016-17 की तुलना में कृषि की सकल मूल्य वृद्धि (जीवीए) में तकरीबन 54 फीसदी की कमी देखी गई है.

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चौपट अर्थव्यवस्था

रहीसही कसर कोरोना ने पूरी कर दी. कोरोना काल में अर्थव्यवस्था को तगड़ा झटका लगा तो इस ने 40 साल का रिकौर्ड तोड़ दिया. सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 23.9 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है. कोरोना काल में पहली तिमाही में देश का सकल घरेलू उत्पादन वृद्धि दर जीरो से 23.9 फीसदी नीचे चली गई है.

इस से बेरोजगारी दर में भी इजाफा हुआ. सैंटर फौर मौनिटरिंग इंडियन इकोनौमी (सीएमआईई) ने देश में बेरोजगारी पर सर्वे रिपोर्ट जारी किया है. इस सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक 3 मई को खत्म हुए हफ्ते में देश में बेरोजगारी दर बढ़ कर 27.1 फीसदी हो गई है, वहीं अप्रैल, 2020 में देश में बेरोजगारी दर बढ़ कर 23.5 फीसदी पर पहुंच गई थी.

सरकारी उदासीनता की वजह से देश में कई उद्यम बंद हो गए हैं. बेरोजगारी की दर शहरी क्षेत्रों में सब से ज्यादा बढ़ी है.

सीएमआईई ने अंदाजा लगाया गया है कि अप्रैल में दैनिक वेतन भोगी श्रमिकों और छोटे व्यवसायी सब से ज्यादा बेरोजगार हुए हैं. सर्वे के मुताबिक 12 करोड़ से ज्यादा लोगों को नौकरी गंवानी पड़ी है. इन में फेरी वाले, सड़क के किनारे सामान बेचने वाले, निर्माण उद्योग में काम करने वाले कर्मचारी और कई लोग शामिल हैं.

मगर सरकार को इन सब से कोई चिंता नहीं. लोगों को रोजगार चाहिए, रोटी चाहिए पर भाजपा शासित राज्यों में वहां की सरकारों को इस से कुछ लेनादेना नहीं.

राम की चिंता किसानों की नहीं

भाजपा शासित राज्य उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने बेरोजगारी पर भले कुछ ध्यान न दे रही हो, मगर राज्य में मंदिरों व तीर्थस्थलों में जम कर पैसा बहाया जा रहा है.

योगी सरकार की अयोध्या में राम के नाम पर लगभग 135 करोड़ रुपए खर्च करने की तैयारी है. यह रकम उसे केंद्र सरकार देगी.

इस पैसे से योगी सरकार अयोध्या को सजाएगीसंवारेगी. राम और दशरथ के महल और राम की जलसमाधि वाले घाटों पर रौनक बढ़ाया जाएगा.

योगी सरकार उत्तर प्रदेश में रामलीला स्थलों में चारदीवारी निर्माण के लिए 5 करोड़ रुपए भी खर्च करेगी. मगर भगवा रंग में रंगी सरकार से यही उम्मीद भी है, क्योंकि राम के नाम पर राजनीति तेज है और देश के किसानों की हालत भी राम भरोसे से कम नहीं. अब देश के किसानों को थाली और ताली बजाने के सिवा और कोई रास्ता भी तो नहीं दिख रहा.

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गहरी पैठ

अच्छे दिनों की तरह प्रधानमंत्री का एक और वादा आखिर टूट ही गया. 24 मार्च, 2020 को उन्होंने वादा किया था कि लौकडाउन के 21 दिनों में वे कोरोना वायरस को हरा देंगे और महाभारत को याद दिलाते हुए कहा था कि 18 दिन के युद्ध की तरह कोरोना की लड़ाई भी जीती जाएगी.

अंधभक्तों ने यह बात उसी तरह मान ली थी जैसे उन्होंने नोटबंदी, जीएसटी, धारा 370 से कश्मीर में बदलाव, राष्ट्रभक्ति, 3 तलाक के कानून में बदलाव, नागरिक कानून में बदलाव मान लिया था. महाभारत के युद्ध की चाहे जितनी वाहवाही कर लो असलियत तो यही?है न कि युद्ध के बाद पांडवों की पूरी जमात में सिर्फ 5 पांडव और कृष्ण बचे थे, बाकी सब तो मारे गए थे.

पिछले 6 सालों से हम हर युद्ध में खुद को मरता देख रहे हैं. कोरोना के युद्ध में भी अब 15 लाख से ज्यादा मरीज हो चुके हैं और 35,000 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं. कहां है महाभारत का सा वादा?

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कोरोना की लड़ाई में हम उसी तरह हारे हैं जैसे दूसरी झड़पों में हारे. नोटबंदी के बाद करोड़ों देशवासियों को कतारों में खड़ा होना पड़ा पर काला धन वहीं का वहीं है. जीएसटी के बाद भी न तो सरकार को टैक्स ज्यादा मिला, न नकद लेनदेन बंद हुआ.

कश्मीर में धारा 370 को बदलने के बाद पूरा कश्मीर जेल की तरह बंद है. जो लोग वहां प्लौट खरीदने की आस लगा रहे थे या वादा जगा रहे थे अब भी मुंह छिपा नहीं रहे क्योंकि जो लोग रोज झूठे वादे करते हैं उन्हें वादों के झूठ के पकड़े जाने पर कोई गिला नहीं होता.

कोरोना के बारे में हमारी सरकार ने पहले जो भी कहा था वह इस भरोसे पर था कि हम तो महान हैं, विश्वगुरु हैं. हमें तो भगवान की कृपा मिली है. पर कोरोना हो या कोई और आफत वह धर्म और पूजा नहीं देखती. उलटे जो धर्म में भरोसा रखता है वह कमजोर हो जाता है. वह तैयारी नहीं करता. हम ने सतही तैयारी की थी.

हमारा देश अमेरिका और ब्राजील की तरह निकला जहां भगवान पर भरोसा करने वाले बहुत हैं. दोनों जगह पूजापाठ हुए. अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के कट्टर समर्थक गौडगौड करते फिरते हैं. कई महीनों तक ट्रंप ने मास्क नहीं पहना. नरेंद्र मोदी भी मास्क न पहन कर अंगोछा पहने रहे जो उतना ही कारगर है जितना मास्क, इस पर संदेह है. देश की बड़ी जनता उन की देखादेखी मास्क की जगह टेढ़ासीधा कपड़ा बांधे घूम रही है.

इस देश में बकबकिए भी बहुत हैं. यहां बोले बिना चैन नहीं पड़ता और बोलने वाले को सांस लेने के लिए मास्क या अंगोछा टेढ़ा करना पड़ता है. यह अनुशासन को ढीला कर रहा है. नतीजा है 15 लाख लोग चपेट में आ चुके हैं और 5 लाख अभी भी अस्पतालों में हैं. जहां साफसफाई हो ही नहीं सकती क्योंकि साफसफाई करने वाले जिन घरों में गायों के दड़बों में रहते हैं वहां गंद और बदबू हर समय पसरी रहती है.

कोरोना की वजह से गरीबों की नौकरियां चली गईं. करोड़ों को अपने गांवों को लौटना पड़ा. जमापूंजी लौटने में ही खर्च हो गई. अब वे सरकारी खैरात पर जैसेतैसे जी रहे हैं. यह जीत नहीं हार है पर हमेशा की तरह हम घरघर पर भी जीत का सा जश्न मनाएंगे जैसे महाभारत पढ़ कर या रामायण पढ़ कर मनाते हैं.

देश में नौकरियों का अकाल बड़े दिनों तक बना रहेगा. पहले भी सरकारी फैसलों की वजह से देश के कारखाने ढीलेढाले हो रहे थे और कई तरह के काम नुकसान के कगार पर थे, अब कोरोना के लौकडाउनों की वजह से बिलकुल ही सफाया होने वाला है. रैस्टोरैंटों का काम एक ऐसा काम था जिस में लाखों नए नौजवानों को रोजगार मिल जाता था. इस में ज्यादा हुनर की जरूरत नहीं होती. गांव से आए लोगों को सफाई, बरतन धोने जैसा काम मिल जाता है. दिल्ली में अकेले 1,600 रैस्टोरैंट तो लाइसैंस वाले थे जो अब बंद हैं और उन में काम करने वाले घर लौट चुके हैं. थोड़े से रैस्टोरैंटों ने ही अपना लाइसैंस बनवाया है क्योंकि उन्हें नहीं मालूम कि कब तक बंदिशें जारी रहेंगी.

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ऐसा नहीं है कि लोग अपनी एहतियात की वजह से रैस्टोरैंटों में नहीं जाना चाहते. लाखों तो खाने के लिए इन पर ही भरोसा रखते हैं. ये सस्ता और महंगा दोनों तरह का खाना देते हैं. जो अकेले रहते हैं उन के लिए अपना खाना खुद बनाना एक मुश्किल काम है. अब सरकारी हठधर्मी की वजह से न काम करने वाले को नौकरी मिल रही है, न खाना खाने वाले को खाना मिल रहा है. यह हाल पूरे देश में है. मकान बनाने का काम भी रुक गया. दर्जियों का काम बंद हो गया क्योंकि सिलेसिलाए कपड़ों की बिक्री कम हो गई. ब्यूटीपार्लर बंद हैं, जहां लाखों लड़कियों को काम मिला हुआ था. अमीर घरों में काम करने वाली नौकरानियों का काम खत्म हो गया.

बसअड्डे बंद हैं. लोकल ट्रेनें बंद हैं. मैट्रो ट्रेनें बंद हैं. इन के इर्दगिर्द सामान बेचने वालों की दुकानें भी बंद हैं और इन में वे लोेग काम पा जाते हैं जिन के पास खास हुनर नहीं होता था. ये सब बीमार नहीं बेकार हो गए हैं और गांवों में अब जैसेतैसे टाइम बिता रहे हैं.

दिक्कत यह है कि नरेंद्र मोदी से ले कर पास के सरकारी दफ्तर के चपरासी तक सब की सोच है कि अपनी सुध लो. नेताओं को कुरसियों की पड़ी है, चपरासियों को ऊपरी कमाई की. ये जनता के फायदेनुकसान को अपने फायदेनुकसान से आंकते हैं. ये सब अच्छे घरों में पैदा हुए और सरकारी दया पर फलफूल कर मनमानी करने के आदी हो चुके हैं. इन्हें आम जनता के दुखदर्द का जरा सा भी खयाल नहीं है. ये गरीबों की सुध लेने को तैयार नहीं हैं. इन के फैसले बकबक करने वाले होते हैं, नारों की तरह होते हैं और 100 में से 95 खराब और गलत होते हैं. अगर देश चल रहा है तो उन लोगों की वजह से जो सरकार की परवाह किए बिना काम किए जा रहे हैं, जो कानून नहीं मानते, जो सड़कों पर घर बना सकते हैं, सड़कों पर व्यापार कर सकते हैं.

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आज अगर भुखमरी नहीं है तो उन किसानों की वजह से जो बिना सरकार के सहारे काम कर रहे हैं. उन कारीगरों की वजह से जो छोटेमोटे कारखानों में काम कर रहे हैं. आज देश गरीबों की मेहनत पर चल रहा है, अमीरों की सूझबूझ और सरकार के फैसलों पर नहीं.

न्याय करता ‘गुंडों का गैंग’

भीड के रूप में ‘गुंडो का गैंग’ बनाकर न्याय देने का चलन नया नहीं है. महाभारत में द्रोपद्री का गुनाह इतना था कि वह अंधेपन पर हंस दी थी. द्रोपदी को दंड देने के लिये जुएं में उसका छलपूर्वक जीता गया और भरी सभा में अपमानित करके दंड दिया गया. सभा भीड का ही एक रूप थी. औरत के अपमान पर मौन थी. ऐसी तमाम घटनायें धार्मिक ग्रंथों में मौजूद है. यही कहानियां बाद में कबीलों में फैसला देने का आधार बनने लगी. देश की आजादी के बाद कबीले खत्म हो गये पर उनकी संस्कृति खत्म नहीं हुई. कबीलों की मनोवृत्ति ‘खाप पंचायतो’ में बदल गई. कानूनी रूप से खाप पंचायतो पर रोक लगी तो भीड के रूप में न्याय देने की शुरूआत हो गई. इनको राजनीति से ताकत मिलती है. भीड के रूप में उमडी जनता ने 1992 में अयोध्या में ढांचा ढहा दिया. जिन पर आरोप लगा वह हीरो बनकर समाज का प्रतिनिधित्व कर रहे है. मजेदार बात यह है कि ढांचा ढहाने की जिम्मेदारी भी कोई लेने को तैयार नहीं है. कानून के समक्ष चैलेंज यह है कि भीड के रूप में किसको सजा दे ? भीड के रूप को तय करने की उहापोह हालत ही अपराध करने वालों को बचने का मौका दे देती है.

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कन्नौज जिले के कोतवाली क्षेत्र के बनियान गांव में शिवदेवी नामक की महिला अपने मायके में रहती थी. शिवदेवी के पति की मौत हो चुकी थी. उसके अपने 5 बच्चे भी थे. पति की मौत के बाद ससुराल वालों के व्यवहार से दुखी होकर शिवदेवी अपने मायके रहने चली आई थी. यहां भी परिवार के लोग उसका साथ नहीं दे रहे थे. ऐसे में गांव के ही रहने वाले दीपक ने उसकी मदद करनी शुरू की. दीपक दिव्यांग था. वह अक्सर समय बेसमय भी जरूरत पडने पर शिवदेवी के घर आ जाता था. शिवदेवी के चाचा और उनके परिजनों को यह बुरा लगता था. 24 अगस्त 2020 को दीपक शिवदेवी से मिलने उसके घर आया तो शिवदेवी के चाचा और उनके लडको ने उसे और शिवदेवी को कमरे में बंद करके पीटना शुरू कर दिया. इसके बाद अगले दिन बुद्ववार की सुबह दोनो के सिर मुंडवाकर मुंह पर कालिखपोत कर, गले में जूतों की माला पहनाकर, डुगडुगी बजाकर पूरे गांव में जुलूस बनाकर निकालना शुरू कर दिया.

मुंह पर कालिख पोते, गले में जूतों की माला पहने शिवदेवी और दीपक भीड के द्वारा पूरे गांव में घुमाये जा रहे थे. गांव के बच्चे, महिलायें, बडेबूढे इस तमाषें को देख रहे थे. कुछ लोग इसका वीडियों भी बना रहे थे. वीडियों बनाकर वायरल भी कर दिया गया. जिसकी आलोचना षुरू हो गई. इसके बाद पुलिस गांव पहुंची तो भीड से किसी तरह से दोनो को छुडाकर थाने लाई. शिवकुमारी और दीपक को थाने में नजरबंद किया गया. पुलिस ने भीड के खिलाफ मुकदमा कायम करने की बात कही. भीड का यह न्याय केवल कन्नौज भर तक सीमित नहीं है. पूरे देश में भीडतंत्र ‘गुंडो का गैंग’ बनाकर न्याय देने का काम करने लगा है. यही घटना जब हिन्दू मुसिलम के बीच होती है तो ‘मौब लिन्चिग‘ मान लिया जाता है.

जैसा नेता वैसी प्रजा:

कहावत कि ‘जैसा राजा वैसी प्रजा‘ कन्नौज में भी यह कहावत पूरी तरह से फिट बैठती है. कोरोना काल में सही तरह से काम ना करने का आरोप लगाते हुये कन्नौज के भाजपा सासंद सुब्रत पाठक ने कन्नौज के दलित तहसीलदार अरविंद कुमार और लेखपाल को उनके घर में घुसकर पीटा. सांसद अकेले नहीं थे वहां पर 25 से अधिक उनके समर्थक थे. पीटे गये तहसीलदार ने न्याय की गुहार लगाई. विपक्ष के नेता अखिलेश यादव और मायावती भी घटना के विरोध में बयान देने लगे. इसके बाद पुलिस ने मुकदमा कायम कर पूरे मामलें की लीपापोती कर दी. अखिलेश यादव ने कहा कि ‘संासद के द्वारा एक दलित अफसर को पीटा जाना सरकार के चरित्र का बताता है‘.

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मायावती ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से कडे कदम उठाने की मांग की. सरकार ने कोई ऐसा कडा कदम उठाया नही. जो नजीर बन सके. इससे भयभीत होकर तहसीलदार अरविंद कुमार कर पत्नी अलका रावत ने कहा कि यहां हमें खतरा है इसलिये हमारा तबादला कहीं और कर दिया जाये. सांसद को किसी भी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ कदम उठाने का अधिकार है. पर इस तरह से किसी अफसर को घुसकर उसके औफिस में पीटना सहीं नहीं है. जब नेता इस तरह से अपने काम करता है तो जनता भी उसी की राह पर चलने लग रही है. उसे भी कानून और पुलिस पर भरोसा नहीं रहा. वह ‘गुंडों का गैंग’ बनाकर खुद की फैसला करने लगी है.

मौब लिन्चिग‘ बनाम ‘गुंडो का गैंग’:

हिन्दू मुसलिम विवाद में भीड तंत्र के काम को ‘मौब लिन्चिग‘ का नाम दिया जाता है. भीड केवल अगल धर्म के लोगों के साथ ही भीड का रूप रखकर न्याय नहीं करती है अपने धर्म में भी यह भीड खूब न्याय करती है. यह न्याय ‘गुंडो का गैंग’ करता है. जिसे प्रषासन और सरकार का समर्थन हासिल होता है. उनको लगता है कि सरकार के बहाने वह प्रषासन को दबा लेगे. दबाव में पुलिस दरोगा उनके खिलाफ कोई काररवाई नहीं कर सकेगी. उत्तर प्रदेश में योगी सरकार आने के बाद ऐसी घटनाओं में ‘गुंडो के गैंग’ द्वारा भगवा कपडे या गमछा ले लिया जाता है. जिससे पुलिस को लगे की यह सरकार के आदमी है.

डायन, बाइक चोर, गौ-तस्कर, बच्चा चोर, हिंदू- मुस्लिम विवाद, धर्म का अपमान न जाने क्या-क्या कारण ढूंढ भीड़ बिना सुनवाई के सड़क पर ‘न्याय‘ करने लगी है. भीड़ आरोपी को बिना किसी सुनवाई के मौत के घाट उतार देती है. लोकतंत्र का अर्थ देश की जनता भूल गई है. झारखंड के खूंटी जिले के पास कर्रा में दिव्यांग व्यक्ति की गोकशी के संदेह में पीटकर हत्या कर दी जाती है. गुजरात के जामनगर जिले में चोर होने के शक में सात लोगों के एक समूह ने एक अज्ञात व्यक्ति की कथित तौर पर लाठी-डंडों से पिटाई कर दी. दरभंगा में चोरी के शक में एक युवक को भीड़ ने पीट-पीट कर अधमरा कर दिया, अस्पताल में उसकी मौत हो गई. झारखंड में तबरेज अंसारी को भीड़ द्वारा चोरी के शक में पकडा गया था, शक चोरी का था लेकिन उससे जय श्रीराम का नारा लगवाया जा रहा था. उसने जय श्री राम भी बोला और जय हनुमान भी, लेकिन मर चुकी मानवीय संवेदना को कहा फर्क पड़ने वाला था. वो उसे घंटों पीटते गए. तबरेज ही नहीं इससे पहले अखलाक और पहलू खान के साथ भी यही हुआ.

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छूट जाते है आरोपी:

भीड में ‘गुंडो का गैंग’ अपना काम कर जाता है और प्रषासन, पुलिस और कोर्ट इनको कोई सजा नहीं दे पाते. जिसके कारण आरोपियों के हौसले बुलंद होते है. भीड के द्वारा मारे गये लोगो के कई मामलों में ऐसा ही हुआ है. षाहजहांपुर में पुलिस के इंसपेक्टर की हत्या भीड के द्वारा की जाती है. आरोपी जमानत पर छूट कर बाहर आता है तो भगवा गैंग के लोग उसको सम्मान करते है. भीड के सामाजिक और मनोविज्ञानिक व्यवहार को देखे तो पता चलता है कि किसी घटना में एक व्यक्ति या संस्था के द्वारा भीड को भडकाया जाता है. भीड को भडकाने के बाद वह दूर से तमाषा देखता है. भीड के रूप में अपराध करने वाले दूसरे लोग होते है. पुलिस भडकाने वाले के खिलाफ मुकदमा कायम करके उसको हीरो बना देती है. कोई सबूत एकत्र नहीं किया जाता जिसकी वजह से भडकाने वाले व्यक्ति को अदालत छोड देती है. भीड के रूप में अपराध करने वाला कभी कानून की पक डमें नहीं आता है.

भीड के रूप में न्याय करने वाले हमेषा बहुसंख्यक होते है. यह जाति, धर्म, भाशा, बोली और क्षेत्रवाद के रूप मे अलग अलग हो सकते है. कहीं उत्तर भारत के रहने वालों पर भीड हमला करती है कहीं नार्थ ईस्ट के रहने वालों पर भीड हमला करती है तो कहीं उत्तर प्रदेश और बिहार के रहने वालों को इसका षिकार बनाया जाता है. जहां जैसी जरूरत होती है वहां वैसा फैसला भीड करती है. भीड के काम का श्रेय लेने वाले भी होते है पर कानून के सामने यह जिम्मेदारी नहीं लेते. देश में राममंदिर विवाद में अयोध्या का ढांचा ढहाया जाना सबसे बडी मिसाल है. भीड को भडकाने वालों ने राजनीति की. उसके बल पर कुर्सी हासिल की. जब अदालत ने पूछा तो सबसे इंकार कर दिया कि उन्होने भीड को भडकाया था.

भीड का बचाव है डायन-बिसाही जैसी प्रथायें:

बिहार और झारखंड से डायन-बिसाही जैसी कुप्रथा और अंधविश्वास की आड में भीड डायन बताकर औरतों को पीटपीट कर मार देती है. इसके तहत मारी गई औरतों की सबसे अधिक संख्या विधवाओं की होती है. इसकी वजह केवल यह होती है कि इनको मार दो जिससे जमीन जायदाद में हिस्सा ना देना पडे. रांची से तकरीबन 10 किलोमीटर दूर नामकुम के हाप पंचायत के बरूडीह में 55 वर्षीय चामरी देवी को डायन बताकर उनके ही परिवारवालों ने मार डाला था. इस मामले में सूमा देवी के परिवार के ही फौदा मुंडा, उनके बेटे मंगल मुंडा और रूसा मुंडा, खोदिया मुंडा समेत पांच लोगों पर आईपीसी की धारा 302 और 34 के तहत मामला दर्ज किया गया है.

इस तरह की एक नहीं तमाम घटनायें है. एनसीआरबी की रिपोर्ट में बताया गया है कि साल 2017 में झारखंड में डायन बताकर हत्या के 19 मामले समाने आए हैं. झारखंड पुलिस के अनुसार 2017 में ऐसी हत्याओं की संख्या 41 थी. 2016 में एनसीआरबी के हिसाब से राज्य में 27 औरतों को डायन बताकर मार दिया गया. झारखंड पुलिस के अनुसार यह आंकड़ा 45 है. साल 2015 में एनसीआरबी ने यह संख्या 32 बताई और झारखंड पुलिस ने 51. इसके बाद भी डायन और बिसाही बताकर भीड के द्वारा औरतों को मारने की आजादी पर रोक लगाने की बात कोई नहीं कर रहा है.

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एनसीआरबी के पांच साल के आंकड़ें बताते है कि भारत भर में डायन-बिसाही के नाम 656 हत्याएं हुई हैं. झारखंड में 2011 से लेकर सितंबर 2019 तक डायन-बिसाही के नाम पर 235 हत्याएं हुई है. सामाजिक संस्थाओं के द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार 1992 से लेकर अब तक 1800 महिलाओं को सिर्फ डायन, जादू-टोना, चुड़ैल होने और ओझा के इशारे पर मारा गया. झारखंड में डायन-बिसाही का शिकार होने वाली महिलाओं में 35 प्रतिशत आदिवासी और 34 प्रतिशत दलित हैं. बिहार में ‘डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम 1999’ लागू होने के बाद वहां घटनायें जारी है. देश में न्याय कानून और संविधान से नहीं भीड के तंत्र और गंुडों के गैंग से चलता है. भीड पर सही फैसला ना होने के कारण हौसला बढता जा रहा है. भीड का न्याय रूकने का नाम नहीं ले रहा है.

मास्क तो बहाना है असल तो वोटरों को लुभाना है

बौलीवुड अभिनेत्री रवीना टंडन के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मधुबनी में मिथिला पेंटिंग के कलाकारों द्वारा तैयार किए गए मास्क के मुरीद हो गए हैं, मगर आश्चर्य की बात यह है कि देश के प्रधानमंत्री को मधुबनी पेंटिंग्स की तब याद आई जब बिहार विधानसभा चुनाव में कुछ ही दिन शेष रह गए हैं.

यों बिहार का मिथिला अथवा मधुबनी पेंटिंग पूरे विश्व में मशहूर है. कभी शादीविवाह के दौरान दूल्हादुलहन के कोहबर (सुहागरात का कमरा) में गांव की महिलाएं इस पेंटिंग को बना कर कमरे को सजाती थीं, लेकिन धीरेधीरे यह पेंटिंग लोकप्रिय होती गई और अब तो इस पेंटिंग की प्रदर्शनी भी लगाई जाती है.

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मोदी राज में बेबस बुनकर

प्रधानमंत्री मोदी के मधुबनी पेंटिंग पर बयान के बाद मधुबनी के राष्ट्रीय जनता दल के विधायक समीर कुमार महासेठ कहते हैं,”देखिए, मोदीजी को अब मधुबनी पेंटिंग और इस कला से जुङे कलाकारों की याद आई तो यह अच्छी बात है. देर आए दुरूस्त आए, लेकिन सचाई यही है कि इस कला के कलाकारों, बुनकरों के लिए केंद्र सरकार ने कुछ भी नहीं किया है. पिछले 15 साल से बिहार की कुरसी संभाले नीतीश सरकार ने तो कोई सुध तक नहीं ली.

“आज भी मधुबनी के सैकड़ों बुनकरों को राष्ट्रीयकृत बैंकों में ब्लैक लिस्टेड कर दिया गया है और बैंक वाले उन्हें  लोन तक नहीं देते.”

समीर बताते हैं,”आज देश के कई जगहों पर मधुबनी पेंटिंग के नाम पर पेंटिंग्स बना कर खूब पैसा बनाया जा रहा है मगर यहीं के लोग, खासकर वे जो इस कला से जन्मजात रूप से जुङे हैं बेरोजगार हैं और बाजार में पहचान बनाने के लिए छटपटा रहे हैं.”

अब जबकि देश में कोरोना कहर बरपा रहा है लोगों के लिए मास्क और सोशल डिस्टैंसिंग का पालन करना जरूरी हो गया है, घरों की

दीवारों से कागज, फिर कपड़े और खिलौनों के बाद मास्क पर पेंटिंग ने इस कला को नई पहचान जरूर दी है.

मछली, फूलपत्ती, पशुपक्षियों की पेंटिंग वाले सूती कपड़े का 2-3 लेयर वाला मास्क लोगों को खूब लुभा रहा है.

साहब मुश्किल से घर चला पाता हूं

मधुबनी जिले के रहने वाले प्रभात बाबा ऐसे कलाकारों में से एक हैं जो एक दुकान ही मधुबनी पेंटिंग्स की चलाते हैं. दुकान में ग्राहक कम ही आते थे. पर अब वे घर से ही मास्क बनाते हैं. डिमांड बढ़ा तो उन्होंने 3-4 बुनकरों को भी रख लिया है जो कपङों से बने मास्क पर मधुबनी पेंटिंग का काम करते हैं.

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प्रभात कहते हैं,”इस काम में मेरे साथ परिवार के अन्य लोग भी सहयोग दे रहे हैं. मधुबनी पेंटिंग वाले मास्क को लोग बाजार में ₹70 से 100 तक में आसानी से खरीद लेते हैं. इस से कुछ कमाई भी हो जाती है.”

वे बताते हैं,”साहब हम गरीब लोग हैं. हाथों में हुनर है पर सरकार अगर ध्यान दे तो इस कला के माध्यम से लाखों लोगों को रोजगार मिल सकता है.

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“कोरोना से लोग डरे हुए हैं पर इस की वजह से हम आज कुछ कमा भी रहे हैं वरना तो घर चलाना भी मुश्किल होता था.”

वहीं समस्तीपुर के रहने वाले कलाकार अजय कुमार बताते हैं कि एक मास्क तैयार करने में करीब ₹35-50 की लागत आ रही है. एक कलाकार प्रतिदिन 25-30 मास्क तैयार कर लेता है. इस से रोज  ₹1-2 हजार की आमदनी जरूर हो जा रही है.

मधुबनी के ही रहने वाले हीरानंद को खुशी है कि वे मधुबनी पेंटिंग वाले मास्क लगा कर बाहर निकलते हैं.

वे कहते हैं,”मिथिला की अपनी एक खास पहचान है. फिर मधुबनी पेंटिंग का तो जवाब ही नहीं.

“कोरोना वायरस से बचाव के लिए मास्क पहन कर बाहर निकलने से संक्रमण का खतरा कम होता है. मैं मधुबनी पेंटिंग वाला खास डिजाइनर मास्क पहनता हूं. इस से मैं मिथिला कल्चर से जुङाव महसूस करता हूं.”

दिल्ली सरकार ने मिथिला को नई पहचान दी है

दिल्ली सरकार में मैथिली भोजपुरी अकादमी के वाइस चेयरमैन, नीरज पाठक ने बताया,”दिल्ली सरकार शुरू से ही, चाहे वह लोकसंगीत हो या फिर लोककला, इस क्षेत्र से जुङे लोगों को तवज्जो देती आई है. सरकार समयसमय पर मैथिलीभोजपुरी गीतसंगीत व कला का आयोजन भी करती आई है और यह आगे भी जारी रहेगा. दिल्ली सरकार हाल ही में कई लोगों को सम्मानित भी कर चुकी है.”

नीरज कहते हैं,”मधुबनी पेंटिंग दुनियाभर में मशहूर है. अब तो विदेशों में भी इस कला को नाम और दाम दोनों मिल रहे हैं.

“मधुबनी पेंटिंग कलाकारों द्वारा बनाए जा रहे मास्क फैशन में शुमार हो चुका है. मास्क की लोकप्रियता से इस काम से जुङे लोगों के लिए न सिर्फ रोजगार के अवसर बढेंगे, बल्कि इस से इस पेंटिंग को नई पहचान मिलेगी.”

चौपट रोजगार बेहाल व्यवसायी

यों नोटबंदी, जीएसटी लागू करने और फिर कोरोनाकाल में लागू लौकडाउन के बाद व्यवसायिक क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित है.

एक तो जीएसटी ने व्यवसायियों की कमर तोङ दी व फिर कोरोना वायरस महामारी के बाद बाजार पूरी तरह चौपट हो गया है.

लेकिन सुखद बात यह है कि इसी कोरोनाकाल में मधुबनी पेंटिंग के कलाकारों द्वारा तैयार किए मास्क की बाजार में धूम है.

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पहले से कङकी में जूझ रहे कलाकारों के लिए यह काफी सुखद है कि अब उन के पास नाम और पैसा दोनों है. वैश्विक विपदा यहां के कलाकारों के लिए बङा अवसर बन कर आई है और इस से इस लोककला को भी नई पहचान मिल रही है.

लोकल बाजार से अमेजन तक

मधुबनी पेंटिंग वाले मास्क की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस की पहुंच आज लोकल बाजार से निकल कर अमेजन तक जा पहुंचा है.

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औनलाइन साइट्स पर मौजूद यह मास्क लोकप्रिय हो चुका है और लोग इसे औनलाइन खरीद भी रहे हैं.

उधर, बिहार में चुनाव है और सियासी पार्टियों के नेता व कार्यकर्ता भी मधुबनी पेंटिंग वाले मास्क में नजर आने लगे हैं.

क्योंकि अब चुनाव है

हाल ही में जब बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री व राजद नेता तेजस्वी यादव मधुबनी पेंटिंग वाले मास्क में नजर आए तो उन की देखादेखी लोजपा के नेता भी इन मास्कों को लगा कर घूमते हुए देखे जा रहे हैं.

लोजपा के युवा नेता व रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान भी इस मास्क में अकसर नजर आने लगे हैं और इतना ही नहीं लोजपा अपने कार्यकर्ताओं के लिए 2 लाख मास्क भी बनवा रही है. लोजपा ने इस बार के चुनाव में नारा दिया है,’बिहार फर्स्ट बिहारी फर्स्ट.’

राजनीति के जानकार, समाजसेवी अजीत कुमार कहते हैं,”देशदुनिया में लगभग 7 करोङ लोग मैथिली बोलते हैं. दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, पुर्णिया, सहरसा, सुपौल आदि जिलों को मिथिलांचल कहा जाता है और यहां की जनता वोटिंग में निर्णायक भूमिका निभाती है. लिहाजा, राजनीतिक दलों के लोगों को लगता है कि इस से वे यहां की जनता से खास जुङाव महसूस करेंगे.

“वैसे, न सिर्फ मास्क बल्कि मिथिला या मधुबनी पेंटिंग का अपना खास इतिहास भी रहा है. अब तो देश के अलगअलग जगहों पर रहने वाले लोग भी मधुबनी पेंटिंग से खूब नाम कमा रहे हैं.”

मधुबनी पेंटिंग का जवाब नहीं

नोएडा की रहने वाली अर्चना झा इन में से ही एक हैं. उन्होंने पश्चिम बंगाल से फाइन आर्ट्स में डिप्लोमा की डिग्री हासिल की है.

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वे कहती हैं,”मैं झारखंड की रहने वाली हूं लेकिन मधुबनी पेंटिंग से गहरा जुङाव रखती हूं. मेरी मां ने मुझे इस पेंटिंग को करना सिखाया और वे ही मेरी गुरू हैं.

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“मैं शुरू से ही देश के कई शहरों में पेंटिंग प्रदर्शनी लगाती रही हूं और इस वजह से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी औनलाइन प्रदर्शनी कर मैं ने खूब वाहवाही बटोरी है.

“मुझे खुशी है कि अब मधुबनी पेंटिंग वाले मास्क बाजार में खूब बिक रहे हैं. इस से मिथिला के गरीब बुनकरों को नई पहचान जरूर मिलेगी.”

जो भी हो, बिहार विधानसभा चुनाव में भले ही मधुबनी पेंटिंग वाले मास्क की मांग में इजाफा हो गया है और नेता व कार्यकर्ता इसे पहन कर गलीगली घूम रहे हैं, मगर इतना जरूर है कि इस मास्क की धमक से यहां के कलाकारों, बुनकरों का हौसला काफी बुलंद है.

गहरी पैठ

कोरोना के कहर में तबलीगी जमात की नासमझी से जो समस्याएं बढ़ी हैं, उन्होंने केंद्र सरकार को फिर से हिंदू मुसलिम करने का कट्टर कार्ड थमा दिया है. देखा जाए तो देश की जनता को आराम से जीने का मौका देने का वादा दे कर जीतने वाली भारतीय जनता पार्टी सरकार ने अपना एक और दांव, दंगे चला कर अब घरघर में दहशत का माहौल खड़ा कर दिया है. किसी को भी देश का गद्दार कहने का हक खुद ब खुद लेने के बाद अब उन्होंने जगहजगह गोली मारो गद्दारों को नारा गुंजाना शुरू कर दिया है. बिना सुबूत, बिना गवाह, बिना अदालत, बिना दलील, बिना वकील के किसी को भी गद्दार कह कर उसे मार डालने का हक बड़ा खतरनाक है.

न सिर्फ मुसलमानों को डराया जा सकता है, इस नारे से हर उस को डराया जा सकता है, जिस ने अपनी अक्ल लगा कर भगवा भीड़ की मांग को पूरी करने से इनकार कर दिया हो.

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आज देश का दलित, किसान, मजदूर, बेरोजगार युवा, बलात्कारों से परेशान लड़कियां, छोटे व्यापारी सरकारी फैसलों से परेशान हैं. दलितों के घोड़ी पर चढ़ कर शादी करने पर मारपीट ही नहीं हत्या कर दी जाती है और जिस ने भी उस के खिलाफ आवाज उठाई, उसे गद्दार कह कर गोली मारने का हक ले लिया गया है. अगर किसान कर्ज माफ करने के लिए सरकार के खिलाफ मोरचा खोलें तो उन्हें गद्दार कहा जा सकता है. अगर व्यापारी नोटबंदी, जीएसटी और बैंकों के फेल होने पर होने वाले नुकसान की बात करें तो उन्हें गद्दार कहा जा सकता है. नागरिकता कानून ?की फुजूल की बात करने वाले को गद्दार कहने का हक है. छोटीबड़ी अदालतों में वकीलों के झुंड मौजूद हैं जो अपने हकों को मांगने वालों को गद्दार कह कर जज के सामने तक नहीं जाने दे रहे. जजों को गद्दार कह कर उन का रातोंरात तबादला कर दिया जा रहा है.

सारे देश में सरकार डिटैंशन सैंटर बनवा रही है जो आधी जेल की तरह हैं जहां नाममात्र का खाना मिलेगा, नाममात्र के कपड़े मिलेंगे, पर बरसों रहना पड़ सकता है. उन को गुलाम बना कर उन से काम कराया जा सकता है. लड़कियों को बदन बेचने पर मजबूर किया जा सकता है. यह हिटलर ने जरमनी में किया था. स्टालिन ने रूस में किया था. माओ ने चीन में किया था. कंबोडिया में पोलपौट ने किया था.

गद्दार कह कर कैसे सिर फोड़े जा सकते हैं. घरों को जला कर सजा दी जा सकती है. इस का नमूना दिल्ली में दिखा दिया गया. जिन्होंने किया वे आजाद घूम रहे हैं. जो शांति के लिए जिम्मेदार हैं, वे भड़काऊ भाषण देने में लगे हैं.

इस सब से मुसलमानों को तो लूटा जा ही रहा है, दलित और पिछड़े भी लपेटे में आ गए हैं. आज सरकारी नौकरियों में केवल ऊंचों को पद देने का हक एक बार फिर मिल गया है, क्योंकि या तो सरकारी काम ठेके पर दे दिए गए हैं या बंद कर दिए गए हैं. दहशत के माहौल की वजह से कोई बोल नहीं पा रहा. कन्हैया कुमार जो बिहार में भारी भीड़ जमा कर रहा था को अब दिल्ली की अदालतों में बुला कर परेशान करने की साजिश की जा रही है. चंद्रशेखर आजाद को बारबार लंबी जेल में भेज दिया जाता है. हार्दिक पटेल का मुंह बंद कर दिया गया है.

देश को अमन चाहिए, क्योंकि अगर पेट में आधा खाना ही हो, कपड़े फटे हुए हों तो भी अगर चैन हो तो जिंदगी कट जाती है. अब यह चैन भी गद्दार के नारे के नीचे दब रहा है.

पूरी दुनिया कोरोना की महामारी से जूझ रही है. लौकडाउन के बाद जरूरी कीमती सामान से लदे ट्रक जहां थे वहीं खड़े हैं. पहले भी हालात ट्रक ड्राइवरों के पक्ष में कहां थे. देखें तो देश के ट्रक ड्राइवरों की जिंदगी वैसे ही उबाऊ और खानाबदोशी होती है, उस पर हर नाके पर, हर सड़क पर बैठे खूंख्वारों से निबटना एक आफत होती है. सेव लाइफ फाउंडेशन का अंदाजा है कि ट्रक ड्राइवर हर साल तकरीबन 50,000 करोड़ रुपए रिश्वत में देते हैं. रिश्वत ट्रैफिक पुलिस वाले, टैक्स वाले, नाके वाले, चुंगी वाले, पोल्यूशन वाले तो लेते ही हैं, अब धार्मिक धंधे करने वाले भी जम कर लेने लगे हैं. धार्मिक धंधे वाले ट्रकों और टैक्सियों को रोक कर ड्राइवरों से उगाही करते हैं.

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कोई कह सकता है कि यह रिश्वत तो मालिक की जेब से जाती होगी, पर यह गलत है. बहुत से ट्रकों को लगभग ठेके पर दे दिया जाता है कि ट्रक पहुंचाओ, रास्ते में जो हो, भुगतो और एकमुश्त पैसा ले लो. ड्राइवर को ऐसे में अपने मुनाफे में कटौती नजर आती है. वह कानूनी, गैरकानूनी दोनों रोकटोक पर रिश्वत देने में हिचकिचाता है और अकसर झगड़ा हो जाता है और मारपीट तक हो जाती है तो नुकसान ट्रक ड्राइवर का ही होता है.

ड्राइवरों की जिंदगी वैसे ही बड़ी दुखद है. उन्हें 12 घंटे ट्रक चलाना होता है, इसलिए अकसर वे शराब और दवाओं का नशा करते हैं. देश की सड़कें बेहद खराब हैं जो ट्रक चलाने में ड्राइवर की हड्डीपसली दुखा देती हैं. आमतौर पर सड़कों पर लाइट नहीं होती. अंधेरे में चलाना मुश्किल होता है. भारत में अब तक सुरक्षित ट्रक नहीं बनने शुरू हुए हैं. ड्राइवरों के केबिन एयरकंडीशंड नहीं होते, उन ट्रकों के भी नहीं जिन में खाने के सामान या दवाओं के लिए रेफ्रीजरेटर लगे होते हैं, इसलिए बेहद गरमीसर्दी का मुकाबला करना पड़ता है. बहुत से ड्राइवरों को बदलते साथियों के साथ चलना होता है.

हमारे यहां ड्राइवरों को रास्ते में सोने के लिए ढाबों पर पड़ी चारपाइयां ही होती हैं, जिन पर न गद्दे होते हैं, न पंखे तक.

घरों से दूर रहने की वजह से ड्राइवर राह चलती बाजारू औरतों को पकड़ते हैं, पर वे लूटने की फिराक में रहती हैं. उन के गैंग अलग बने होते हैं जो परेशान करते हैं. ड्राइवरों को बीवियों की चिंता भी रहती है कि उन के पीछे वे औरों के साथ तो नहीं आंखें लड़ा रहीं.

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यही वजह है कि आज 1000 ट्रकों पर 400-500 ड्राइवर ही मिल रहे हैं. ट्रांसपोर्ट उद्योग को ड्राइवरों की कमी की वजह से भारी नुकसान होने लगा है. एक तरफ बेरोजगारी है, पर दूसरी तरफ ट्रेनिंग न मिलने की वजह से ड्राइवरों की कमी है. ट्रेनिंग तो आज सिर्फ जय श्रीराम कह कर मंदिर के धंधे कैसे चलाए जाएं की दी जा रही है.

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