Satyakatha- इश्क का जुनून: प्यार को खत्म कर गई नफरत की आग- भाग 3

सौजन्य- सत्यकथा

लेखक-  दिनेश बैजल ‘राज’/संजीव दुबे

वहां पहुंच कर फ्लाईओवर से नीचे उतर कर लिंक रोड पर आ गए. यहीं पर उन लोगों ने बोलेरो में ही उत्तम के गले में रस्सी का फंदा कस कर उस की हत्या कर शव फेंक दिया. इस के साथ ही उस का प्राइवेट पार्ट काट दिया. इस के बाद नेहा को ले कर मुरैना रोड होते हुए राजस्थान के धौलपुर आ गए.

अलगअलग राज्यों में मिले शव

राजा खेड़ा रोड पर थाना दिहौली से करीब एक किलोमीटर दूर सुनसान जगह पर गाड़ी रोक ली. यहां नेहा की भी गले में रस्सी का फंदा लगा हत्या कर दी. उस की लाश भी वहीं फेंक दी.

हत्यारों ने लाश के चेहरे को मिट्टी से ढंक दिया. दोनों की हत्या कर शव ठिकाने लगा कर सभी हत्यारे पिनाहट वापस आ गए. फिर सभी अपनेअपने घर चले गए. देवीराम भी गांव अपने घर आ गया.

4 अगस्त, 2021 को राजस्थान के जिला धौलपुर जिले के थाना दिहौली क्षेत्र में कस्बा मरैना-दिहौली के बीच सड़क के किनारे खेत से सुबह 10 बजे नेहा का शव पुलिस ने बरामद किया था.

उस के गले में नाइलोन की पीले रंग की रस्सी से फंदा लगा था, जिस में 8-10 गांठे लगी थीं तथा चेहरा मिट्टी में दबा हुआ था.

इस पर एसपी धौलपुर केसर सिंह शेखावत ने शव की शिनाख्त नहीं होने पर 7 अगस्त को मैडिकल बोर्ड से उस का पोस्टमार्टम कराया. इस के बाद अंतिम संस्कार करा दिया गया. थाना दिहौली में हत्या का मुकदमा अज्ञात के नाम दर्ज कर लिया गया.

यहां से करीब 100 किलोमीटर दूर मध्य प्रदेश के जिला ग्वालियर के थाना आंतरी क्षेत्र में ग्वालियर झांसी हाईवे के पास भरतरी रोड पर सड़क के किनारे एक युवक की लाश उसी तरह की रस्सी से गला घोंट कर फेंकी हुई पुलिस को मिली.

पीले रंग की रस्सी में 8-10 गांठें लगी थीं. युवक का प्राइवेट पार्ट कटा हुआ था. यह शव उत्तम का था. लेकिन यह बात पुलिस को पता नहीं थी कि मृतक उत्तम है.

शिनाख्त न होने पर पोस्टमार्टम कराने के बाद धर्म का पता न चलने पर उसे दफना दिया गया. इस संबंध में थाना आंतरी पर हत्या का मुकदमा अज्ञात के खिलाफ दर्ज कर लिया गया.

एसपी (ग्वालियर) अमित सांगी के अनुसार, जांच के दौरान पुलिस के सामने एक महत्त्वपूर्ण तथ्य सामने आया कि राजस्थान के धौलपुर में एक युवती की इसी तरह लाश मिली थी. इस पर धौलपुर पुलिस से जानकारी साझा की गई.

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दोनों हत्याओं में समानता मिली. क्योंकि दोनों हत्याओं में जिस रस्सी का प्रयोग किया गया था, वह एक ही रस्सी के 2 टुकड़े थे. इस बात की पुष्टि उन के फोरैंसिक एक्सपर्ट ने भी की. दोनों लोग कपड़े भी पर्टिक्युलर कीमोफ्लाई के पहने हुए थे.

इस से अंदाजा लगाया गया कि हत्या के इन दोनों मामलों में कुछ न कुछ संबंध जरूर है. प्रथमदृष्टया ही लग रहा था कि प्रेमप्रसंग का या परिजनों द्वारा की गई हत्या है. इस के बाद  पुलिस ने किशोरी व युवक के शवों की शिनाख्त के लिए उन के फोटो समाचारपत्रों में भी प्रकाशित कराए.

ऐसे हुआ खुलासा

उधर जब फिरोजाबाद पुलिस को यमुना में प्रेमी युगल की लाशें नहीं मिलीं, तब पुलिस ने आरोपियों के मोबाइल फोन की लोकेशन को खंगाला. इस से पुलिस को यह जानकारी मिल गई कि घटना के समय कहांकहां ये लोग गए थे.

पुलिस ने उस रूट पर पड़ने वाले सभी थानों से अज्ञात लाशों की जानकारी जुटाई. फोटो, कपड़ों व मृतकों के हुलिए के आधार पर नेहा और उत्तम की शिनाख्त हुई. फिर पुलिस आरोपियों को ले कर ग्वालियर पुलिस से मिली.

पुलिस आरोपी शिवराज व सुनील के साथ ही उत्तम के पिता सुघर सिंह व अन्य परिजनों को साथ ले गई थी. आरोपियों से शवों के फेंके गए स्थानों की तसदीक कराई. संबंधित दोनों थानों पर संपर्क किया. नेहा व उत्तम के फोटो व कपड़ों को देख कर पहचान लिया गया.

सक्षम अधिकारी के आदेश पर उत्तम के दफनाए गए शव को जमीन से निकलवा कर परिजनों के सुपुर्द किया गया. थानाप्रभारी प्रवेंद्र कुमार सिंह व इस मामले के आईओ मोहम्मद खालिद दोनों थानों से सारे सबूत एकत्र कर फिरोजाबाद लौट आए.

उत्तम का शव जैसे ही गांव जहांगीरपुर पहुंचा, परिवार में कोहराम मच गया. बड़ी संख्या में भीड़ जुट गई. दोनों के भागने के बाद घरवाले समझ रहे थे कि वे लोग दोनों की तलाश कर रहे हैं. लेकिन नेहा के पिता व चाचा द्वारा हत्या करने की बात कुबूलने के बाद दोनों परिवारों में चीखपुकार मच गई.

जांच में पुलिस को पता चला कि प्रेमी युगल की हत्या में प्रयुक्त नाइलोन की लगभग 15 मीटर रस्सी पिनाहट से खरीदी गई थी. इसी रस्सी के 2 टुकड़े कर दोनों का गला घोंट कर हत्या की गई थी.

थाना सिरसागंज पुलिस ने पिनाहट से इस रस्सी विक्रेता की दुकान से वह बंडल भी बरामद कर लिया है, जिस से आरोपियों ने रस्सी खरीदी थी. इस के साथ ही बोलेरो भी बरामद कर ली. इसी गाड़ी में प्रेमी युगल की हत्या की गई थी.

हत्यारे इतने शातिर थे कि उन्होंने प्रेमी युगल की अलगअलग स्थानों पर हत्या कर शव अलगअलग राज्यों के दूरदराज इलाकों में इसलिए फेंके, ताकि सुनियोजित ढंग से की गई इन हत्याओं का कभी खुलासा न हो सके.

साथ ही देवीराम सिरसागंज पुलिस को गुमराह करता रहा कि हत्या कर दोनों के शव यमुना नदी में फेंक दिए थे, ताकि शव न मिलने पर वे लोग हत्या जैसे अपराध से बच जाएं.

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लेकिन तीनों राज्यों की पुलिस की सूझबूझ से औनर किलिंग का परदाफाश हो गया. आंतरी और दिहौली थाना पुलिस ने दोनों मृतकों के डीएनए सैंपल सुरक्षित रख लिए थे, जो फिरोजाबाद पुलिस को सौंप दिए.

इस के बाद दोनों थानों में दर्ज मुकदमे थाना सिरसागंज में दर्ज मुकदमे में समाहित हो गए.

पुलिस इस अपहरण और हत्याकांड में शामिल 12 आरोपियों में से देवीराम व सुनील को गिरफ्तार कर चुकी है, जबकि शिवराज ने कोर्ट में सरेंडर कर दिया था.

अन्य फरार चल रहे आरोपियों बालकराम, जैकी, जितेंद्र, श्याम बिहारी, रोहित, राहुल, अमन उर्फ मोनू, गुंजन व दगाबाज दोस्त वीनेश की तलाश की जा रही थी.

नेहा और उत्तम एकदूसरे से बेइंतहा प्यार करते थे. दोनों शादी करना चाहते थे. लेकिन नेहा के घर वालों को यह रिश्ता मंजूर नहीं था. इस के बाद नेहा के घर वालों की झूठी शान की नफरत का शोला प्रेमी युगल के प्यार पर ऐसा गिरा कि प्रेमी युगल की जान ले ली.

Manohar Kahaniya- गोरखपुर: मोहब्बत के दुश्मन- भाग 3

सौजन्य- मनोहर कहानियां

Writer- शाहनवाज

काल रिसीव करते हुए अनीश चाचा को इशारे से हिसाब देखने को कहते हुए दुकान से बाहर निकल गया और सड़क के एक किनारे बात करने में मशगूल हो गया. तभी साए की तरह उस के पीछे पीछे चाचा देवी दयाल भी बाहर निकल आए और कुछ दूरी पर खड़े भतीजे की निगरानी करने लगे.

उसी समय दूसरी तरफ से तेजी से 2 बाइक आ कर अनीश के पीछे रुकीं. दोनों बाइक पर 2-2 नकाबपोश युवक सवार थे. एक बाइक पर पीछे बैठे नकाबपोश ने अपने कमर में पीछे खोंस रखा धारदार दतिया निकाला और फिल्मी स्टाइल में अचानक अनीश के सिर, गले और सीने पर ताबड़तोड़ कई वार कर दिए.

भतीजे अनीश पर हमला होते देख चाचा देवी दयाल हमलावरों से भिड़ गए. अपनी जान की परवाह किए बिना उन्होंने भतीजे पर हमला करने वाले एक नकाबपोश को धर दबोचा.

यह देख कर नकाबपोश हड़बड़ा गया और उन से छूटने के लिए देवी दयाल के सीने पर प्रहार कर दिया. अचानक हुए हमले से देवी दयाल पल भर के लिए गश खा कर जमीन पर गिर गए. कुछ पलों बाद जब उठे तो नकाबपोश ने उन पर फिर से पलटवार किया. तब तक चीखपुकार तेज हो गई थी.

देवी दयाल की चीख सुन कर पासपड़ोस के दुकानदार शोर मचाते हुए बाहर निकले. पब्लिक को बदमाशों ने अपनी ओर आते हुए देखा तो चौंकन्ने हो गए और जिधर से आए थे, मौके पर हथियार फेंक कर उसी दिशा में फरार हो गए.

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दीप्ति ने अपने ही घर वालों के खिलाफ लिखाई रिपोर्ट

इधर अचानक हुए हमले से अनीश डर गया था. गंभीर रूप से घायल वह हवा में लहराते हुए किसी कटे पेड़ की तरह जमीन पर धड़ाम से गिरा.

आननफानन में लोगों ने अनीश और देवी दयाल को टैंपो में लाद कर गोला स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाया, जहां डाक्टरों ने अनीश को देखते ही मृत घोषित कर दिया.

भतीजे की मौत की खबर सुनते ही देवी दयाल की हालत और बिगड़ गई. घबराहट के मारे उन की सांसों की रफ्तार और तेज हो गई. यह देख डाक्टर भी घबरा गए और उन्हें बाबा राघवदास (बीआरडी) मैडिकल कालेज, गुलरिहा रेफर कर दिया.

अनीश की हत्या की खबर मिलते ही इलाके में सनसनी फैल गई थी. जैसेजैसे उस के शुभचिंतकों को जानकारी हुई, वैसेवैसे कुछ घटनास्थल तो कुछ अस्पताल पर जुटते गए. उधर दिल दहला देने वाली घटना की सूचना गोला थाने के थानेदार सुबोध कुमार को मिल चुकी थी. घटना की सूचना मिलते ही वह फोर्स सहित अस्पताल पहुंच गए और अस्पताल को पुलिस छावनी में बदल दिया ताकि कोई अप्रिय घटना न घट सके.

सूचना पा कर थोड़ी ही देर में वहां तत्कालीन एसएसपी दिनेश कुमार प्रभु, एसपी (दक्षिणी) अरुण कुमार सिंह और सीओ गोला अंजनि कुमार पांडेय भी पहुंच गए थे. पुलिस अधिकारियों ने शव का निरीक्षण किया. सिर, गले और सीने पर किसी धारदार हथियार से ताबड़तोड़ हमला किया गया था. ज्यादा खून बहने से अनीश की मौत हुई थी.

पुलिस ने शव को अपने कब्जे में ले लिया और उसे पोस्टमार्टम के लिए बीआरडी मैडिकल कालेज, गुलरिहा भिजवा दिया. उस के बाद इंसपेक्टर सुबोध कुमार को कागजी काररवाई पूरी करतेकरते दोपहर के 2 बज गए थे.

अस्पताल से फारिग होते ही पुलिस गोपलापुर चौराहा पर उस जगह पहुंची, जहां घटना घटी थी. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया. मौके पर फैला खून जम चुका था, जिस पर ढेर सारी मक्खियां भिनभिना रही थीं.

मौके से कुछ दूरी पर खून से सना एक धारदार हथियार गिरा पड़ा था, पुलिस ने उसे बतौर सबूत अपने कब्जे में लिया. मौके पर पहुंची फोरैंसिक टीम अपनी जांच में जुट गई.

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पुलिस ने अनीश की पत्नी दीप्ति चौधरी की तहरीर पर आईपीसी की धारा 302, 307, 506, 120बी एवं एससी/एसटी की धारा 3(2)(वी) के तहत मायके के 17 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया.

जिन में नलिन मिश्र (पिता), मणिकांत मिश्र (बड़े पापा यानी ताऊ), अभिनव मिश्र (भाई), अनुपम मिश्र (भाई), विनय, उपेंद्र, अजय, प्रियंकर, अतुल्य, प्रियांशु, राजेश, राकेश, त्रियोगी, नारायण, संजीव, विवेक तिवारी और सन्नी सिंह सहित 4 अज्ञात शामिल थे. घटना की जांच की जिम्मेदारी गोला के सीओ अंजनि कुमार पांडेय को सौंपी गई थी.

इस मामले में पुलिस ने 4 आरोपियों मणिकांत मिश्र, विवेक तिवारी, अभिषेक तिवारी और सन्नी सिंह को गिरफ्तार कर लिया. उन्हें गोला के दीडीहा क्षेत्र से गिरफ्तार किया था. इन चारों से पूछताछ की गई तो उन्होंने अपराध स्वीकार करते हुए अन्य आरोपियों के नाम भी बता दिए. पुलिस ने इन्हें अदालत में पेश कर जिला जेल भेज दिया.

28 जुलाई, 2021 को एएसपी (साउथ) अरुण कुमार सिंह ने एक प्रैसवार्ता आयोजित कर 4 आरोपियों को गिरफ्तार करने की जानकारी दी और कहा कि जल्द ही बाकी के आरोपियों को भी गिरफ्तार कर लिया जाएगा. कथा लिखने तक अन्य आरोपी गिरफ्तार नहीं हो सके थे. पुलिस उन्हें तलाश रही थी.

वेटिंग रूम- भाग 4: सिद्धार्थ और जानकी की छोटी सी मुलाकात के बाद क्या नया मोड़ आया?

Writer- जागृति भागवत 

पिछले अंक में आप ने पढ़ा : जानकी अनाथालय में पलीबढ़ी थी. मेहनत और प्रतिभा के बल पर पढ़ाई कर पुणे के एक कालेज में लैक्चरर के इंटरव्यू के लिए जा रही थी. ट्रेन के इंतजार में रेलवे प्रतीक्षालय में उस की मुलाकात सिद्धार्थ से होती है जो एक संपन्न व्यवसायी का बिगड़ैल बेटा था. समय काटने के लिए दोनों के बीच बातचीत का सिलसिला शुरू होता है. सबकुछ होते हुए भी जिंदगी से नाराज सिद्धार्थ को जानकी की बातें एक नया नजरिया देती हैं. सिद्धार्थ स्वयं को शांत और सुलझा हुआ महसूस करने लगता है. उस के मातापिता उस में हुए बदलाव से हैरान थे. अब आगे…

सिद्धार्थ की आंखों से नींद कोसों दूर थी. जब तक नींद ने उसे अपनी आगोश में नहीं ले लिया तब तक वह सिर्फ जानकी के बारे में ही सोचता रहा. उसे अफसोस हो रहा था कि काश, वह थोड़ी हिम्मत कर के जानकी का फोन नंबर ही पूछ लेता. न जाने अब वह जानकी को देख पाएगा भी या नहीं? अचानक उसे याद आया कि 15 दिन बाद वह पुणे ही तो आ रही है नौकरी जौइन करने. उसी समय उस ने निश्चय किया कि 15 दिन बाद वह कालेज में जा कर जानकी को खोजेगा.

सुबह 11 बजे से पहले कभी न जागने वाला सिद्धार्थ आज सुबह 8 बजे उठ गया. नहा कर नाश्ते की मेज पर ठीक 9 बजे पापा के साथ आ बैठा और बोला, ‘‘पापा, आज मैं भी आप के साथ औफिस चलूंगा.’’ पापा का चेहरा विस्मय से भर गया. मां, जो सिद्धार्थ की रगरग पहचानती थीं, नहीं समझ पाईं कि सिद्धार्थ को क्या हो गया है. बस, दोनों इसी बात से खुश हो रहे थे कि उन के बेटे में बदलाव आ रहा है. हालांकि वे आश्वस्त थे कि यह बदलाव ज्यादा दिन नहीं रहेगा. जल्द ही सिद्धार्थ काम से ऊब जाएगा. फिर उस की संगत भी तो ऐसी थी कि अगर सिद्धार्थ कोशिश करे भी, तो उस के दोस्त उसे वापस गर्त में ले जाएंगे. जानकी अनाथालय पहुंच चुकी थी. सब लोग उस के इंतजार में बैठे थे. जैसे ही जानकी पहुंची, सब उस पर टूट पड़े. जानकी, मानसी चाची को उस की कामयाबी के बारे में पहले ही फोन पर बता चुकी थी, इसलिए सब उस के स्वागत के लिए खड़े थे. आज वात्सल्य से पहली लड़की को नौकरी मिली थी. अनाथालय में उत्सव का माहौल था.

रात को जानकी ने मानसी चाची को साक्षात्कार से ले कर सारी यात्रा का वृत्तांत काफी विस्तार से सुनाया, सिवा प्रतीक्षालय में सिद्धार् से हुई मुलाकात के. यह बात छिपाने के पीछे कोई उद्देश्य नहीं था फिर भी जानकी को यह गैरजरूरी लगा. पिछली रात नींद न आने से जानकी काफी थक गई थी, इस कारण लेटते ही नींद लग गई. सुबह भी काफी देर से जागी. पिछले 8-10 दिनों से लगातार बारिश के कारण मौसम बहुत सुहाना हो गया था. सुबह ठंडक और बढ़ गई थी. नींद खुलने के बाद भी उस का उठने का मन नहीं हो रहा था. जानकी उठी और बाहर आंगन में आ कर बैठ गई. बारिश रुक चुकी थी और हलकी धूप खिली थी लेकिन गमलों की मिट्टी अभी भी गीली थी. ठंडी हवाएं अब भी चल रही थीं. लगा कि कोई शौल ओढ़ ली जाए. ऐसे में अचानक ही उसे सिद्धार्थ का खयाल आया, ‘अब तक तो वह भी अपने घर पहुंच गया होगा. क्या लड़का था, थोड़ा अजीब लेकिन काफी उलझा सा था. काफी नकारात्मक सोच थी, यदि सोच को सही दिशा दे देगा तो बहुत कुछ पा सकता है.’ जानकी की यादों की लड़ी तब टूटी जब मानसी चाची ने आ कर पूछा, ‘‘अरे जानकी बेटा, तू कब उठी?’’

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‘‘बस, अभी उठी हूं, चाची,’’ थोड़ी हड़बड़ाहट में जानकी ने जवाब दिया, लगा जैसे उस की कोई चोरी पकड़ी गई हो और उठ कर रोजमर्रा के कामों में जुट गई. धीरेधीरे दिन बीतते गए और जानकी के पुणे जाने के दिन करीब आते गए. जानकी को काफी तैयारियां करनी थीं. पुणे जा कर सब से बड़ी दिक्कत उस के रहने की व्यवस्था थी. पुणे में वह किसी को नहीं जानती थी. इस बीच उसे कई बार ऐसा लगा कि उस ने सिद्धार्थ से उस का मोबाइल नंबर क्यों नहीं लिया. शायद, उस अनजान शहर में वह कुछ मदद करता उस की. अनाथालय को छोड़ कर मानसी चाची भी उस के साथ नहीं जा सकती थीं. इसी चिंता में वे आधी हुई जा रही थीं कि जानकी का क्या होगा वहां, अनजान शहर में बिलकुल अकेली, कैसे रहेगी. सिद्धार्थ में आया बदलाव बरकरार था. पहले वह काफी गुस्सैल था और अब काफी शांत हो चुका था, बोलता भी काफी कम था, लगभग गुमसुम सा रहने लगा था. कोई दोस्तीयारी नहीं, कोई नाइट पार्टीज और बाइक राइडिंग नहीं. मां ने कई बार पूछा इस बदलाव का कारण लेकिन सिद्धार्थ ने मां से सिर्फ इतना ही कहा, ‘‘मौम, जब जागो तभी सवेरा होता है और मुझे भी एक न एक दिन तो जागना ही था, अब मान लो कि वह दिन आ चुका है. बस, आप लोग जैसा सिद्धार्थ चाहते थे वैसा बनने की कोशिश कर रहा हूं.’’

सिद्धार्थ को अब उस दिन का इंतजार था जब जानकी पुणे आने वाली थी. निश्चित तारीख तो उसे पता नहीं थी लेकिन वह उस रात के बाद से हिसाब लगा रहा था. अब उसे एहसास हो रहा था कि जानकी उस के दिलोदिमाग पर छा चुकी है. वही लड़की है जो उस के लिए बनी है, अगर वह उस की जिंदगी में आ जाए तो सिद्धार्थ के लिए किसी से कुछ मांगने के लिए बचेगा ही नहीं. इस बीच, वह जा कर पुणे आर्ट्स कालेज का पता लगा कर आ चुका था और यह भी पता कर चुका था कि जानकी कब आने वाली है. 15 सितंबर वह तारीख थी जिस का अब सिद्धार्थ को बेसब्री से इंतजार था. आखिर वह दिन आ गया. 14 सितंबर को जानकी पुणे के लिए रवाना होने वाली थी. यहां अनाथालय में खुशी और दुख साथसाथ बिखर रहे थे. मानसी चाची की तो एक आंख रो रही थी तो दूसरी आंख हंस रही थी. एक ओर तो उन की बेटी आज नौकरी करने जा रही है लेकिन उसी बेटी से बिछड़ने का गम भी खुशी से कम नहीं था. आखिर जानकी पुणे के लिए रवाना हो गई.

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सुबहसुबह पुणे पहुंच कर उस ने स्टेशन के पास ही एक ठीकठाक होटल खोज लिया. तैयार हो कर नियत समय पर कालेज पहुंच गई. सारी जरूरी कार्यवाही पूरी करने के बाद कालेज की एक प्रोफैसर ने उसे पूरा कालेज दिखाया और सारे स्टाफ व विद्यार्थियों से परिचय भी करवाया. इस बीच, उस ने उस प्रोफैसर से रहने की व्यवस्था के बारे में पूछा. उस प्रोफैसर ने कुछ एक जगह बताईं लेकिन पुणे बहुत महंगा शहर है, जानकी के लिए ज्यादा खर्चा करना मुमकिन नहीं था. इधर सिद्धार्थ ने पापा से एक दिन की छुट्टी ले ली थी. सुबह से काफी उत्साहपूर्ण लग रहा था. उस के तैयार होने का ढंग भी कुछ अलग ही था. मां सबकुछ देख रही थीं और समझने की कोशिश कर रही थीं. बेटा चाहे जितना भी बदल जाए, मां उस का मन फिर भी पढ़ लेती है. लेकिन मां खामोशी से सब देखती भर रहीं, कुछ बोली नहीं.

‘कॉलेज रोमांस’ के ‘बग्गा’ यानी गगन अरोड़ा से जानिए नेपोटिज्म की सच्चाई

कंगना रानौट सहित कई कलाकार आए दिन नेपोटिज्म का मुद्दा उठाते रहते हैं. इन सभी का आरोप है कि बौलीवुड में नेपोटिजम इस कदर हावी है कि गैर फिल्मी परिवार से जुड़ी संतानों को बौलीवुड में प्रवेश नहीं मिलता. मगर फिल्म ‘‘स्त्री’’ में बतौर सहायक निर्देशक काम करने के बाद गगन अरोड़ा ने वेब सीरीज ‘‘कालेज रोमांस’’ में किशोर वय बग्गा का किरदार निभाकर अभिनय के संसार में कदम रखा और महज तीन वर्ष के अंदर ‘गर्ल्स होस्टल’ व अन्य वेब सीरीज के अलावा फिल्म ‘‘उजड़ा चमन’’ में अभिनय किया.

अब गगन अरोड़ा ने अजीत पाल सिंह निर्देशित वेब सीरीज ‘‘तब्बर’’ में पंजाबी युवक हैप्पी का अति संजीदा किरदार निभाया है ,जो कि 15 अक्टूबर से ओटीटी प्लेटफार्म ‘‘सोनी लिव’’ पर स्ट्रीम हो रही है.

प्रस्तुत है गगन अरोड़ा से हुई एक्सक्लूसिब बातचीत के अंश..

 सवाल : अभिनय से आपका जुड़ना कैसे हुआ?

जवाब यूं तो मैंने कॉलेज में अभिनय करना शुरू किया था. हम नुक्कड़ नाटक और मंचीय नाटक किया करते थे. पूरे तीन वर्ष तक मैं यही करता रहा. तीसरे वर्ष के अंत तक मेरा रुझान निर्देशन की ओर अधिक हो गया और मैं फिल्म निर्माण का अध्ययन करने के लिए मुंबई चला आया. मैने मुंबई के सेंट झेवियर कालेज से फिल्म मेकिंग सीखी. उसके बाद कुछ विज्ञापन फिल्मों और फिल्म ‘‘स्त्री’’ में बतार सहायक निर्देशक काम किया. अचानक एक दिन मेरे एक साथी के कहने पर मैने ऑडीशन दिया और मुझे वेब सीरीज ‘‘कालेज रोमांस’’ में अभिनय करने का अवसर मिल गया. इसमें मैने बग्गा का किरदार निभाया और रातों रात मुझे सफलता मिल गयी. फिर मैने ‘गर्ल्स होस्टल’, ‘बेसमेंट कंपनी’ भी किया. फिल्म ‘उजड़ा चमन’ में अभिनय किया.

 

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सवाल : क्या फिल्म मेकिंग सीखते सीखते आपके दिमाग में आया कि अभिनय की बनिस्बत निर्देशन का क्षेत्र ज्यादा बेहतर है?

जवाब नहीं सर..मैने देखा कि कलाकार के पीठ पीछे निर्देशक कलाकार को बुरा कहता है और निर्देशक के पीठ पीछे कलाकार उसे बुरा कहता है.मेरे मन में सवाल उठता था कि ऐसा क्यों होता है? तो मेरी समझ में आया कि सेट पर कलाकार नखरे और स्टारपना दिखाता है, इसलिए निर्देशक उसे बुरा कहता है. जबकि निर्देशक बार बार रीटेक लेता है या कलाकार से कहता है कि उसे क्या चाहिए, इसलिए कलाकार उसे बुरा कहता है. पर फिल्म मेकिंग सीखने के पीछे निर्देशन के प्रति प्यार या अभिनय के प्रति मेरे मन में प्यार नहीं उमड़ा था. मैं तो दोनों के बीच की थिन लाइन पर चला जा रहा था. हम गैर फिल्मी परिवार से आए थे, इसलिए आंख खुली रहती थी कि हमें अभिनय में जल्दी अवसर मिलने से रहा. हमारे लिए बैकअप लेकर चलना जरुरी था. सभी कहते है कि हर दिन हजारों लोग मुंबई फिल्म नगरी में अभिनेता बनने आते हैं, सभी को सफलता नहीं मिल पाती. मेरे निर्देशन की तरफ मुड़ने की भी यही वजह थी.

सवाल : सहायक निर्देशक के रूप में काम करने के दौरान आपने ऐसा क्या अनुभव लिया, जिससे अभिनय में आपको सहूलियत हो रही है?

जवाब मेरा अनुभव यह रहा कि कई लोगों को सेट पर कलाकार को लोगों का दुःख समझ में नहीं आता कि किसी चीज में इतना समय क्यों लग रहा है? अब अपने अनुभवो की वजह से निर्देशक मुझे जो कुछ समझाने का प्रयास करता है, वह मैं ज्यादा बेहतर तरीके से समझ सकता हूं. क्योकि मैं सहायक निर्देशक रहा हूं, तो मेरी समझ में आता है कि निर्देशक क्या समझाना चाहता है. इसी वजह से मैं दूसरे कलाकारों की बनिस्बत चीजों को ज्यादा बेहतर तरीके से समझ सकता हूं. हर कलाकार में कुछ विषेशता होती है.

मसलन मुझे याद है कि जब मैं फिल्म ‘‘स्त्री’’ में बतौर सहायक निर्देशक काम कर रहा था, तब पंकज त्रिपाठी सर ने मुझसे कहा था- ‘‘तुम काम करने आए हो, काम करो. यह जो आस पास का शोशा है न, जब तुम्हारा काम अच्छा होगा तो लोग अपने आप आकर तुम्हें देंगें. ’’मुझे उनकी बात अच्छे से समझ में आ गयी. मुझे समझ में आया कि मेरा काम अपने आप बोलेगा. मुझे मांगने की जरुरत नहीं पड़ेगी. मैने तय किया कि ऐसा काम करना है, जिसकी लोग तारीफ करें. यही बात मुझे फायदा दे रही है.

सवाल : पहली वेब सीरीज कॉलेज रोमांसकरने के बाद किस तरह की प्रतिक्रियाएं मिली थीं?

जवाब बहुत अच्छी प्रतिक्रियाएं मिली थी. यह तो रातों रात स्टार बन जाने का मसला था. रातों रात सफलता मिली थी. मैने क्या किसी ने भी इस बात की उम्मीद नहीं की थी. मजेदार बात यह थी कि इसका प्रिव्यू देखकर लोगो ने इसे सिरे से नकार दिया था. सभी का मानना था कि यह नहीं चलेगा. यह तो पैसे की बर्बादी कर दी है. लेकिन इसे जबरदस्त सफलता मिली और अब इसे एशिया का सर्वाधिक सफल वेब सीरीज माना जाता है. मुझे तो ऐसी सफलता की उम्मीद नहीं थी.

लोगों के संदेश से मेरा इंस्टाग्राम एकाउंट भर गया था. सड़क पर लोग मुझे पहचानने लगे थे. लोगों ने मेरे मम्मी पापा को बधाई संदेश भेजे. पर मेरे पिता जी ने मुझे समझाया था कि इस तरह की प्रशंसा से पागल मत बनना. यह सब क्षणिक है. यह पहला काम है. अभी लोग तुम्हारा सिर जितना चढ़ा रहे हैं, अगला काम खराब होते ही उतनी ही तेजी से नीचे भी उतार देंगें.

फिल्म व टीवी इंडस्ट्री में भी तमाम लोगों ने मेरा स्वागत किया. यह सब देखकर मेरा यह भ्रम दूर हो गया कि यहां गैर फिल्मी पृष्ठभूमि के लोगों को घुसने नहीं देते. क्योंकि मुझे तो कांस्टिंग डायरेक्टर, फिल्म निर्देशक, निर्माता और कई कलाकारों ने बधाई दी. लोगों ने मुझे बुलाकर काम दिया. यही वजह है कि मैं पिछले तीन वर्ष से लगातार काम कर रहा हूं. अब मैने वेब सीरीज ‘‘तब्बर की है, जो कि 15 अक्टूबर से सोनी लिव पर स्ट्रीम हो रही है.

 

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सवाल : वेब सीरीज ‘‘तब्बर’’को लेकर क्या कहना चाहेंगे?

जवाब यह एक पारिवारिक मगर क्राइम थिलर वेब सीरीज है, जिसमें मैनें अपनी चाकलेटी ब्वॉय की इमेज को तोड़ने के लिए अभिनय किया है. वेब सीरीज ‘तब्बर’ में मैनें परिवार के बड़े बेटे हैप्पी का अति संजीदा किरदार निभाया है. एक तरफ घर का बड़ा बेटा होने के नाते अब घर यानी कि परिवार को आगे ले जाने की उसकी जिम्मेदारी बनती है, तो दूसरी तरफ युवा होने के नाते प्यार को लेकर भी उसकी कुछ समस्याएं हैं.

सवाल : इस किरदार को निभाते समय किस तरह की दिक्कतें पेश आयीं?

जवाब किरदार की गहराई को ढूढ़ने में तकलीफ हुई. यह अति संजीदा किरदार है. लंबे समय से ऐसा किरदार निभाया नहीं था. तो थिएटर के समय किरदार को लेकर जो तलाश करने, खोदने की आदत थी, वह ठप्प हो चुकी थी. उसे नए सिरे से जगाना पड़ा. इसमें लेखक हरमन वडाला व निर्देशक अजीत पाल सिंह ने मेरी काफी मदद की. कलाकारों ने भी मेरी मदद की. इसमें मुझे सुप्रिया पाठक और पवन मल्होत्रा ने काफी मदद की. उनसे मैंने बहुत कुछ सीखा.

सवाल : सुप्रिया पाठक व पवन मल्होत्रा से आपने क्या सीखा?

जवाब इन दोनों कलाकारों से मेरी पहली मुलाकात ‘तब्बर’ के सेट पर ही हुई थी.उस दिन मैं बहुत डरा व घबराया हुआ था. मैं तो इन्हे फिल्म व टीवी में देखते हुए बड़ा हुआ हूं. पर दोनों ने पहले ही दिन मुझे अपने व्यवहार से एकदम सहज कर दिया. दूसरे दिन तो मैं पवन सर के गले में हाथ डालकर संवाद बोल रहा था. यह दोनो कलाकार मुझे हर दिन एक ऐसी नई सीख सिखाते थे, जो कि जिंदगी भर चलेगी.

पवन सर ने सिखाया कि ‘कुछ भी हो जाए, मगर डेडीकेशन/समर्पण भाव मत छोड़ना.’ समय की पाबंदी जरुरी है. अगर तुम समय की इज्जत नही करोगे, तो समय तुम्हारा सम्मान नहीं करेगा. ’सुप्रिया मैम ने सिखाया-‘‘ इफर्टलेस होना चाहिए. परदे पर तुम्हारा अभिनय नहीं दिखना चाहिए.

 

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सवाल : आपने वेब सीरीज करने के बाद फिल्म की. वेब सीरीज और फिल्म दोनो के अपने अलग अनुभव रहे होंगे. पर एक कलाकार के तौर पर एक फिल्म के रिलीज होने पर पहले ही दिन जो शोहरत या दर्शकों की जो प्रतिक्रिया मिलती है, क्या वैसी शोहरत वेब सीरीज से मिल पाती है?

जवाब जी मिलती है. मुझे फिल्म व वेब सीरीज दोनों का अच्छा रिस्पांस मिला. अब सोशल मीडिया का जमाना है. लोग आपके हाथ में लाकर प्रतिक्रियाएं देते हैं. आज की तारीख में माध्यम मायने नहीं रखता. अगर आप अच्छा काम करते हैं, तो लोग आपको व आपके काम को ढूंढ ही लेते हैं.आपका काम देखते हैं और फिर काम पसंद आने पर आपको बधाई भी देते हैं. जब से मैं अभिनेता बना हूं, तब से सोशल मीडिया है. उससे पहले की स्थिति के बारे में मैं कुछ नहीं जानता.

सवाल : पर आपको नहीं लगता कि अब आपको बतौर कलाकार काम भी सोशल मीडिया पर आपके फालोअर्स की संख्या बल पर मिलता है. इससे प्रतिभाषाली कलाकार को नुकसान उठाना पड़ता है?

जवाब मैं आपकी इस बात से सहमत हूं. मैने खुद इसी वजह से कई अच्छे प्रोजेक्ट खोए हैं. मैने चार राउंड के ऑडिशन दिए, फिर अंत में कहा गया कि आपके फालोवअर्स की संख्या कम है. फलां कलाकार के इतने मिलियन फालोअवर्स है, तो इस किरदार के लिए उन्हें ही चुना जा रहा है. तब बुरा लगता था. आज मैं उस मुकाम पर आ गया हूं, जहां मुझे पता है कि मेरी वजह से किसी न किसी प्रतिभाशाली कलाकार को नुकसान उठाना पड़ता है. लेकिन मेरी राय में इस तरह कलाकार का चयन न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता.

मैं यह भी समझता हूं कि निर्माता या निर्देशक की यह सोच रहती है कि फालोवअर्स अधिक होंगे, तो वह कलाकार उतने अधिक दर्शक खींचकर ले आएगा. मगर मेरी राय में किसी भी कलाकार को उसकी क्राफ्ट के अलावा किसी अन्य वजह से जज किया जाना सही नहीं है.

सवाल : इस बात की गारंटी कैसे ली जा सकती है कि सोशल मीडिया का फालोवर्स आपका काम देखना चाहता है?

जवाब यह बहुत मुश्किल काम है. फिल्मकार कैसे यह सोच रहे हैं, मुझे भी नहीं पता. मैं देखता हूं कि कई कलाकारों ने तो सोशल मीडिया को ही अपना जीवन बना लिया है. उनकी अपनी कोई निजिता नहीं है. यदि वह चाय पीने जा रहे हैं,  तो लोगो को पता है कि वह चाय पीने जा रहे हैं.

मैं वैसा इंसान नहीं हूं. मुझे कुछ दूरी बनाकर रखना अच्छा लगता है. मेरी कुछ चीजें लोगों को न पता हो तो ही अच्छा है.

 

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सवाल : तो फिर आप सोशल मीडिया पर अपने फालोवअर्स कैसे बढ़ाते हैं?

जवाब सर मैं काम करता हूं. मेरा काम अच्छा है, तो मेरे सोशल मीडिया के फालोवर्स की संख्या बढ़ेगी. काम के अलावा किसी अन्य वजह से कोई मुझे फॉलो कर रहा है, तो मुझे वह जायज वजह नहीं लगती है. अगर आप सिर्फ मेरा चेहरा देखने आ रहे हैं, तो मुझसे ज्यादा सुंदर मॉडल हैं.

सवाल : इसके अलावा क्या कर रहे हैं?

जवाब माधुरी दीक्षित के साथ वेब सीरीज ‘फाइंडिंग अनामिका’ की है, जो कि दीवाली के समय नेटफ्लिक्स पर स्ट्रीम होगी. इसमें संजय कपूर भी हैं. इसका निर्माण धर्मा प्रोड्क्शन कर रहा है. वेब सीरीज ‘फाइंडिंग अनामिका’ की कहानी एक वैश्विक सुपरस्टार के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अचानक गायब हो जाती है.

जैसे ही पुलिस और उसके चाहने वाले उसके लापता होने की खबर मिलती है, तो जांच शुरू होती है और फिर प्रतिष्ठित अभिनेत्री के जीवन में छिपी सच्चाई और दर्दनाक झूठ का खुलासा होता है. इससे अधिक अभी बता पाना मेरे लिए संभव नहीं है. इसमें माधुरी दीक्षित के अलावा संजय कपूर और मानव कौल जैसे संजीदा एक्टर भी हैं.

वर्जिनिटी: टूट रही हैं बेडि़यां

लेखिका- आशा शर्मा

आदिकाल से ही औरतों के लिए शुचिता यानी वर्जिनिटी एक आवश्यक अलंकार के रूप में निर्धारित कर दी गई है. यकीन न हो, तो कोई भी पौराणिक ग्रंथ उठा कर देख लीजिए.

अहल्या की कहानी कौन नहीं जानता. शुचिता के मापदंड पर खरा नहीं उतरने के कारण जीतीजागती, सांस लेती औरत को पत्थर की शिला में परिवर्तित हो जाने का श्राप मिला था. पुराणों के अनुसार, उस का दोष सिर्फ इतना ही था कि वह अपने पति का रूप धारण कर छद्मवेश में आए छलिए इंद्र को उस के स्पर्श से पहचान न सकी.

शुचिता के सत्यापन का कितना दबाव  औरतों पर हुआ करता था, इस का उदाहरण भला कुंती से बेहतर कौन हो सकता है. कुंती, जिसे अपनी शुचिता का प्रमाण विवाह के बाद अपने पति को देना था, ने विवाहपूर्व सूर्यपुत्र कर्ण को जन्म देने के बाद उसे नदी में प्रवाहित कर दिया ताकि उस की शुचिता पर आंच न आए.

क्या है शुचिता

शुचिता यानी यौनिक शुद्धता का पैमाना. स्त्री योनि के भीतर एक पतली गुलाबी  िझल्ली होती है जिसे हाइमन कहा जाता है. माना जाता है कि प्रथम समागम के दौरान इस के फटने से रक्तस्राव होता है. जिन स्त्रियों को यह स्राव नहीं होता उन का कौमार्य शक के घेरे में आ जाता है. यह जानते हुए भी कि इस  िझल्ली के फटने के कई अन्य कारण भी होते हैं.

सामाजिक तानाबाना कुछ इस कदर बुना गया है कि स्त्री का शरीर सिर्फ उस के पति के भोग के लिए है और उस का कौमार्य उस के पति की अमानत. अकसर यही पाठ हर स्त्री को पढ़ाया जाता है. यह पाठ स्त्रियों को रटारटा कर इतना कंठस्थ करा दिया जाता है कि इस लकीर से बाहर निकले कदम अपराध की श्रेणी में रख दिए जाते हैं और इस अपराध की सजा स्त्री को ताउम्र भुगतनी पड़ती है.

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राजस्थान के सांसी समुदाय में स्त्रियों की वर्जिनिटी जांचने के लिए एक अत्यंत घिनौनी प्रथा प्रचलित है, जिसे कूकड़ी प्रथा कहा जाता है. इस प्रथा के अनुसार, शादी की पहली रात को स्त्री के बिस्तर पर सफेद धागों का गुच्छा रख दिया जाता है जिसे स्थानीय भाषा में कूकड़ी कहते हैं. शारीरिक संबंध बनाने के बाद बिस्तर की सफेद चादर और उस कूकड़ी की जांच होती है. यदि वह रंगदार नहीं है यानी उस में खून के धब्बे नहीं हैं तो यह माना जाता है कि स्त्री के शारीरिक संबंध शादी से पहले कहीं और स्थापित हो चुके हैं. सो, स्त्री को चरित्रहीन करार दे दिया जाता है. इसी आधार पर परिवार और समाज को उसे लांछित और प्रताडि़त करने का अधिकार भी मिल जाता है.

अमानवीयता की पराकाष्ठा यह होती है कि सुहागरात से पहले यह निश्चित किया जाता है कि कमरे में किसी तरह की कोई नुकीली या धारदार वस्तु न हो ताकि किसी तरह की चोट लगने के कारण रक्तस्राव की संभावना भी न हो. यहां तक कि लड़की के बालों से पिन तक हटा ली जाती है और उस की चूडि़यों को कपड़े से बांध दिया जाता है. इसी तरह का शुचिता परीक्षण महाराष्ट्र के कंजरभाट समाज और गुजरात के छारा समाज में भी प्रचलित है.

स्त्री साथी या संपत्ति

सदियों से यह कहावत प्रचलन में है कि संसार में लड़ाई झगड़े और युद्ध के सिर्फ 3 ही कारण होते हैं- जर, जोरू और जमीन यानी धन, स्त्री और जमीन. पति का शाब्दिक अर्थ मालिक ही होता है. इस रिश्ते से पत्नी को पति की संपत्ति माना जाता है. शायद इसी तर्क के आधार पर और महाभारत की कथानुसार युधिष्ठिर ने द्रौपदी को अपनी संपत्ति मानते हुए जुए में दांव पर लगा दिया था.

समय बेशक बदलता हुआ प्रतीत हो रहा है लेकिन परिस्थितियां आज भी कमोबेश वही हैं. आज भी स्त्री पुरुष की संपत्ति ही सम झी जाती है जिस की अपनी कोई स्वतंत्र विचारधारा नहीं हो सकती. जिस के हर व्यक्तिगत फैसले पर पुरुष की सहमति की मुहर आवश्यक सम झी जाती है. ऐसा न करने वाली स्त्रियां चरित्रहीन की श्रेणी में गिनी जाती हैं. आज भी स्त्रियों की यौनिक शुचिता को उन पर शासन करने या उन्हें नियंत्रित करने का हथियार सम झा जाता है.

अकसर 2 दलों के आपसी  झगड़े का शिकार महिलाएं बन जाती हैं. लोग अपना बदला चुकता करने के लिए एकदूसरे की बहनबेटियों से बलात्कार तक कर डालते हैं.

दंगों के दंश भी महिलाएं ही  झेलती हैं. पुरुष अपनी खी झ उतारने के लिए भी बलात्कार करते हैं मानो इस तरह वे उस स्त्री के शरीर पर नहीं बल्कि उस के पूरे वजूद पर अपना अधिकार जमा लेंगे. मुखर या हावी होती दिखती महिलाओं के साथ भी यही कुकर्म किया जाता है. मांबहन की गालियां भी तो इसी का उदाहरण हैं.

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पर कतरने की साजिश

कई कार्यालयों में जहां महिलाएं अधिक प्रतिभाशाली होती हैं, अकसर वे चारित्रिक उत्पीड़न का शिकार पाई जाती हैं. उन के सहकर्मी जब उन के द्वारा कुशलता से संपादित होने वाले कार्यों की अनदेखी कर उन का चारित्रिक मूल्यांकन करने लगते हैं तो कहीं न कहीं वे मानसिक रूप से टूटती ही हैं.

यही तो पुरुष को चाहिए. स्त्री को तोड़ कर उसे अपने अंकुश में रखना ही तो उस का ध्येय है.

इस बात में दोराय नहीं कि हर क्षेत्र में स्त्रियों ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है. प्रतिभा यदि पुरुष से कमतर है तब तक पुरुष को उस की तारीफ से गुरेज नहीं लेकिन जहां कहीं वह पुरुष से 21 हुई, सारा बवाल शुरू हो जाता है. ऐसे अनेक उदाहरण हमारे आसपास बिखरे पड़े हैं.

सीमा मेरी कालोनी में ही रहती है. पतिपत्नी दोनों सरकारी स्कूल में अध्यापक हैं. सीमा अपने पति से जूनियर है, इस नाते स्कूल से संबंधित मामलों में उस की सलाह लेती रहती थी. पति का अहं संतुष्ट होता रहता था. अपनी मित्रमंडली में वह सीमा की तारीफ करते नहीं अघाता था.

पिछले साल सीमा प्रतियोगी परीक्षा पास कर के प्रधानाध्यापक क्या बन गई, एक ही  झटके में उस की सारी प्रतिभा धूल में मिल गई. सीमा को दूसरे शहर में पोस्ंिटग मिली, जो उन के घर से लगभग 100 किलोमीटर की दूरी पर था.

पहले तो उस पर रोजाना आनेजाने के लिए दबाव बनाया गया. फिर, उस के दृढ़ता से मना करने पर, उस पर जौइन न करने का दबाव बनाया गया. विरोध करने पर पति ने सीधा उस के चरित्र पर निशाना साध लिया.

‘‘होगा कोई, जिस के लिए घर छोड़ने को तैयार है ताकि जम कर मस्ती की जा सके,’’ कह कर पति ने तुरुप का पत्ता फेंक कर उस का मनोबल तोड़ने की कोशिश की.

यह तो सीमा हिम्मत वाली निकली जिस ने पति की परवा न कर अपना नया पदभार ग्रहण कर लिया वरना अधिकतर महिलाओं को तो अपने कैरियर से अधिक अपनी शुचिता ही प्यारी लगती है.

हावी है पुरातन सोच

अतिआधुनिक कहे जाने वाले आज के कितने ही युवा हैं जो अपनी पत्नियों के विवाहपूर्व प्रेम प्रसंग को सहजता से स्वीकार कर सकें? शायद, एक भी नहीं. भले ही वे स्वयं अपने प्रेम के किस्से कितना ही रस ले कर पहली रात अपनी नवविवाहिता को सुनासुना कर उस पर अपनी मर्दानगी का रोब  झाड़ें लेकिन पत्नी का किसी के प्रति एकतरफा लगाव उन्हें कतई गवारा नहीं.

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बेशक स्त्रियों को पढ़नेलिखने, घूमनेफिरने या फिर अपना मनचाहा कैरियर चुनने की आजादी मिली है लेकिन आज भी उन की कमाई पर उन्हें भी पूरा अधिकार नहीं है. अपने पर किए गए खर्च को भी उन के चरित्र से जोड़ दिया जाता है. यही कारण है कि विधवा या तलाकशुदा स्त्री का हलका सा शृंगार भी समाज की आंखों में खटकने लगता है.

एक जाल है यह

बचपन में मैं ने दादी को गाय दुहते हुए देखा है. वे गाय को दुहने से पहले एक पतली सी रस्सी से उस के दोनों पांव बांध देती थीं.

मैं कहती, ‘दादी, इतनी बड़ी गाय को इतनी पतली सी रस्सी से कैसे बांध लिया आप ने?’

तब दादी कहतीं, ‘बेटा, इसे रस्सी की आदत हो गई है. पतलीमोटी से कोई फर्क नहीं पड़ता.’

ठीक ऐसी ही आदत महिलाओं को भी हो चुकी है. अपनी शुचिता को अपनी उपलब्धि सम झने की, अपनेआप को पुरुष के संरक्षण में रखने की, पहले पिता, फिर भाई, उस के बाद पति और अंत में बेटे की. स्त्रियों के संरक्षक समाज ने तय कर दिए, वही लकीर वे आज भी पीटे जा रही हैं या यों कहें कि उन्हें इस की आदत हो गई है.

बहुत सी महिलाओं को इस में कोई बुराई भी नहीं दिखती, बल्कि उन्हें अच्छा लगता है कि कोई उन का खयाल रख रहा है. इस के पीछे छिपी गुलामी की मानसिकता उन्हें दिखाई नहीं दे रही.

आज भी कुछ खेल, कुछ प्रोफैशन महिलाओं के लिए उचित नहीं सम झे जाते, जैसे सेना, पर्वतारोहण, साइकिल चलाना आदि. वहीं, कुछ खेल और व्यवसाय महिलाओं के लिए उत्तम सम झे जाते हैं, जैसे टीचिंग, बैंक आदि.

मौजूदा दौर में हालांकि वर्जनाएं टूट रही हैं लेकिन उन का प्रतिशत उंगलियों पर गिननेभर जितना ही है.

बदलाव की बयार

फिल्में समाज का आईना सम झी जाती हैं. कुछ फिल्में वही दिखाती हैं जो समाज में घटित हो रहा है, तो कुछ फिल्मों को देख कर समाज उन का अनुसरण करता है. पुरानी फिल्में देखें तो नायिका को शुचिता की मूर्ति दिखाया जाता था. यौनिक शुद्धता इतना हावी रहता था कि नायिका के मुंह से कहलाया जाता था कि मैं ने फलां पुरुष को अपना सर्वस्व सौंप दिया है. किसी अन्य पुरुष के साथ शादी के बारे में सोचना भी अब मेरे लिए पाप है.

इसी तरह यदि किसी फिल्म में नायिका से यह कथित पाप यानी विवाहपूर्व गर्भ ठहर गया हो तो स्त्री को ही उम्रभर इस पाप को ढोते हुए दिखाया जाता था.

दूसरी तरफ, आज की फिल्में या वैब सीरीज की बात करें तो इन में विवाहपूर्व के शारीरिक संबंध बहुत ही सहज दर्शाए जा रहे हैं. इस तरह के समागम के पश्चात नायिका को किसी गिल्ट, अपराधबोध या शर्मिंदगी का एहसास नहीं होता, बल्कि वह अगली सुबह न तो शरमाती हुई उठती है और न ही लाज से उस के गाल गुलाबी होते हैं. वह आम दिनों की ही भांति सहजता से अपना दिनभर का काम निबटाती है.

यह बदलाव की ठंडी बयार सुकून देने वाली है. यदि पुरुष को इस तरह के संबंध के बाद गिल्ट नहीं है तो स्त्री ही क्यों इस गठरी को ढोए?

स्त्री अपनी ऊर्जा शुचिता को सलामत रखने में जाया नहीं करती, बल्कि ‘जो हो गया वह मेरी मरजी’ कह कर हवा में उड़ा देती है. वह अब ब्रेकअप के बाद आंसू भी नहीं बहाती. लिवइन रिलेशन के रिश्ते इसी श्रेणी में गिने जा सकते हैं.

आजकल शादियां देर से होती हैं और शरीर की अपनी मांग होती है. ऐसे में सिर्फ शादी के बाद पति के सामने शुचिता के सत्यापन के लिए आज की लड़कियां अपने आज के रोमांच को खत्म नहीं करना चाहतीं.

लड़कियों का बढ़ता आत्मविश्वास उन्हें हर अपराधबोध से बाहर ला रहा है. उन्हें खुल कर जीने का न्यौता दे रहा है और वे इसे स्वीकार भी कर रही हैं.

सरकार भी उन के पक्ष में कानून बना कर उन के पंखों को मजबूती दे रही है. आज महिलाएं अकेली यात्राएं कर रही हैं, अपनी संपत्ति बना रही हैं, पहाड़ों पर चढ़ रही हैं, आसमान में उड़ रही हैं, सागर की गहराई नाप रही हैं आदिआदि.

सब से बड़ी और सकारात्मक बात यह है कि बलात्कार और एसिड अटैक जैसे हादसों के बाद भी महिलाएं आज मुसकरा कर जी रही हैं, यानी, शुचिता के सत्यापन को नकार रही हैं और शुचिता की आड़ में अपने ऊपर जबरन शासन किए जाने को अस्वीकार कर रही हैं. यही बदलाव तो चाहिए था.

Crime- रोहतक चौहरा हत्याकांड: बदनामी, भय और भड़ास का नतीजा

फरवरी, 2021 को रोहतक के जाट कालेज अखाड़े में रात के तकरीबन सवा 8 बजे कुश्ती के कोच सुखविंदर ने अंधाधुंध फायरिंग कर 5 लोगों की हत्या कर दी थी. मरने वालों में जाट कालेज के कोच मनोज, रेलवे में काम कर रही उन की पत्नी साक्षी, उत्तर प्रदेश की पहलवान पूजा समेत 2 और कोच शामिल थे.

इस वारदात से 5 दिन पहले ही पूजा ने कोच मनोज को बताया था कि सुखविंदर उसे परेशान कर रहा है और शादी के लिए दबाव बना रहा है.

यह सुन कर कोच मनोज ने सुखविंदर की अखाड़े में आने से रोक लगा दी थी. इसी बात की रंजिश के चलते सुखविंदर ने यह घिनौना कदम उठाया था. हालांकि वह बाद में पकड़ा गया था.

इस बात को 7 महीने भी नहीं हुए थे कि विजय नगर कालोनी, रोहतक में ही एक चौहरे हत्याकांड ने नई सुर्खियां बना दीं. 27 अगस्त, 2021 को दिनदहाड़े घर में घुस कर 3 लोगों की हत्या कर दी गई, वहीं एक 17 साल की लड़की इस फायरिंग में घायल हुई, जिस ने वारदात के 40 घंटे बाद अस्पताल में दम तोड़ दिया.

पुलिस को मिली पहली जानकारी के मुताबिक, अज्ञात हथियारबंद बदमाशों ने घर में घुस कर परिवार के 4 सदस्यों पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसाईं, जिस के चलते 45 साल के प्रदीप उर्फ बबलू पहलवान, उन की 40 साल की पत्नी बबली और 60 साल की सास रोशनी की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि प्रदीप की 17 साल की बेटी तमन्ना ने बाद में अस्पताल में दम तोड़ा.

प्रदीप उर्फ बबलू पहलवान और उस की सास रोशनी से हत्यारा सब से ज्यादा गहरी रंजिश रखता था, क्योंकि उस ने बबलू पहलवान को 3 और सास रोशनी को 2 गोलियां मारी थीं.

Crime: अठारह साल बाद शातिर अपराधी की स्वीकारोक्ति

पुलिस के पास जो पोस्टमार्टम रिपोर्ट पहुंची, उस में सामने आया कि बबलू पहलवान को माथे में पहली गोली मारने के बाद हत्यारे ने सटा कर उसी जगह

2 गोलियां और मारीं, वहीं सास रोशनी को भी पौइंट ब्लैंक रेंज से पहली गोली मारने के बाद दूसरी गोली भी सिर में पिस्टल सटा कर मारी गई.

इस हंसतेखेलते परिवार में 20 साल का एकलौता अभिषेक उर्फ मोनू ही बचा, जो बबलू पहलवान का बेटा था और वारदात के समय घर पर नहीं था. बाद में उसी ने घर आ कर यह खूनखराबा देखा था और पड़ोसियों को जमा किया था.

हुआ सनसनीखेज खुलासा

पुलिस इस हत्याकांड की पेचीदगी में उलझ गई थी. कभी इस बात का शक होता कि क्योंकि बबलू पहलवान दबंग था और प्रोपर्टी डीलर था, लिहाजा किसी ने उस से दुश्मनी निकाली होगी. पर हर एंगल से जांच करने के बाद पुलिस ने हैरतअंगेज तरीके से अभिषेक उर्फ मोनू को गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस के मुताबिक, अभिषेक उर्फ मोनू अपनी बहन तमन्ना के नाम प्रोपर्टी करवाने से नाराज था. ऐसा नहीं था कि प्रदीप उर्फ बबलू पहलवान अभिषेक से प्यार नहीं करता था.

लोगों की मानें, तो उस ने अपने बेटे अभिषेक को होंडा सिटी कार व सवा लाख रुपए का एप्पल का फोन तक दे रखा था. उसे दिल्ली में एयरलाइंस में क्रू मैंबर का कोर्स करवाया था. साथ ही, शहर के एक कालेज में दाखिला दिलवाया था. यहां तक कि एक निजी एयरलाइंस में नौकरी के लिए भी बातचीत की थी और उसे विदेश भेजने के लिए तैयार हो गया था.

बाद में पुलिस को पता चला कि अभिषेक कई दिन से अपने पिता से  5 लाख रुपए मांग रहा था, पर जब पिता ने वजह पूछी तो उस ने संतोषजनक जवाब नहीं दिया और जब परिवार को उस वजह की भनक लगी, तो अभिषेक की तुड़ाई कर दी गई.

दरअसल, पुलिस पूछताछ में अभिषेक उर्फ मोनू ने खुलासा किया कि वह सैक्स सर्जरी के जरीए अपना जैंडर बदलवाना चाहता था यानी लड़के से लड़की बनना चाहता था. वह पिछले एक साल से सर्जरी के लिए इंटरनैट पर इस तरह के क्लिनिक की जानकारी जुटा  रहा था.

यही नहीं, वह ऐसा कर के उत्तराखंड के एक दोस्त के साथ विदेश भागना चाहता था. इस दोस्त से अभिषेक की मुलाकात क्रू मैंबर का कोर्स करने के दौरान हुई थी.

पुलिस के मुताबिक, अभिषेक उर्फ मोनू अपने इस काम को अंजाम दे पाता, उस से पहले परिवार को इस बात का पता चला तो उसे जम कर पीटा गया. इस से गुस्सा हो कर उस ने यह वारदात कर डाली.

पुलिस के मुताबिक, अभिषेक उर्फ मोनू ने बड़े ही शातिर तरीके से इस वारदात को अंजाम दिया. अपना परिवार खत्म करने के बाद वह छत के रास्ते से फरार हुआ और एक होटल में जा छिपा, जहां उस का वही उत्तराखंड का तथाकथित दोस्त था, जिस के लिए वह अपना सैक्स बदलवा कर लड़की बनना चाहता था.

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वहां उन दोनों ने जिस्मानी रिश्ता बनाया और फिर एक घंटे के बाद अभिषेक दोबारा घर गया और इस हत्याकांड का पहला चश्मदीद गवाह बनते हुए पड़ोसियों को जमा कर लिया.

पुलिस रिमांड में जब कुछ मनोवैज्ञानिक अभिषेक उर्फ मोनू से मिले, तो वह सामान्य बना रहा और एक तरह से उन्हें भी उलझा दिया. बाद में वकील मोहित वर्मा ने शनिवार, 11 सितंबर, 2021 को सुनारिया जेल में जा कर उस से तकरीबन 12 मिनट तक बातचीत की तो अभिषेक ने खुद को बेकुसूर बताया.

अभिषेक उर्फ मोनू ने यह भी बताया कि पुलिस ने उसे बिना वजह फंसाया है. उस से काफी दस्तावेजों पर दस्तखत भी कराए गए हैं. उस का इस हत्याकांड से कोई मतलब नहीं है. उस ने सीबीआई जांच की भी मांग की.

अभिषेक उर्फ मोनू अपने बचाव में दलील रखने का हकदार है, पर खुद को बेकुसूर कहने भर से वह इस हत्याकांड से पीछा नहीं छुड़ा सकता. वैसे, वह ऐसे परिवार और समाज से आता है, जहां किसी लड़के का लड़की बन कर जीने की सोच रखना ही सब से बड़ी सजा है.

जिस हरियाणा में दूसरी जाति में शादी करने से ओनर किलिंग हो जाती है, वहां प्रदीप उर्फ बबलू पहलवान कैसे सहन कर सकता था कि उस का लाड़ला बेटा ऐसी शर्मनाक डिमांड उस के सामने रख दे.

अभिषेक उर्फ मोनू को पता था कि आज यह बात बताने पर उस की पिटाई हुई है, तो कल को समाज में अपनी इज्जत की खातिर बाप ही उस की बलि चढ़ा सकता है.

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हो सकता है कि उस के उत्तराखंड वाले दोस्त ने उसे यह राह दिखाई हो, पर उम्र के जिस पड़ाव पर अभिषेक था, उसे खुद का वजूद बचाने के लिए यही एक रास्ता समझ आया हो.

जिस तरह से अभिषेक उर्फ मोनू ने क्राइम सीन पर पुलिस के सामने सबकुछ उगल कर यह हत्याकांड कबूल किया है, उस से शक की कोई गुंजाइश नहीं बचती है, बशर्ते इस वारदात में जमीनजायदाद से जुड़े पारिवारिक झगड़े का कोई दूसरा पेंच न फंसता हो.

सजा- भाग 1: तरन्नुम ने असगर को क्यों सजा दी?

असगर ने अपने दोस्त शकील से शर्त जीत कर तरन्नुम से निकाह तो कर लिया था लेकिन तरन्नुम को जब उस के विवाहित होने का पता चला तो उस ने आम औरतों की तरह सामंजस्य करने से इनकार कर दिया और असगर को वह सजा दी जिस की कल्पना भी वह नहीं कर सकता था.

असगर अपने दोस्त शकील की शादी में शरीक होने रामपुर गया. स्कूल के दिनों से ही शकील उस के करीबी दोस्तों में शुमार होता था. सो दोस्ती निभाने के लिए उसे जाना मजबूरी लगा था. शादी की मौजमस्ती उस के लिए कोई नई बात नहीं थी और यों भी लड़कपन की उम्र को वह बहुत पीछे छोड़ आया था.

शकील कालेज की पढ़ाई पूरी कर के विदेश चला गया था. पिछले कितने ही सालों से दोनों के बीच चिट्ठियों द्वारा एकदूसरे का हालचाल पता लगते रहने से वे आज भी एकदूसरे के उतने ही नजदीक थे जितना 10 बरस पहले.

असगर को दिल्ली से आया देख शकील खुशी से भर उठा, ‘‘वाह, अब लगा शादी है, वरना तेरे बिना पूरी रौनक में भी लग रहा था कि कुछ कसर बाकी है. तुझ से मिल कर पता लगा क्या कमी थी.’’

‘‘वाह, क्या विदेश में बातचीत करने का सलीका भी सिखाया जाता है या ये संवाद भाभी को सुनाने से पहले हम पर आजमाए जा रहे हैं.’’

‘‘अरे असगर, जब तुझे ही मेरे जजबात का यकीन न आ रहा हो तो वह क्यों करेगी मेरा यकीन, जिसे मैं ने अभी देखा भी नहीं,’’ शकील, असगर के कंधे पर हाथ रखते हुए बोला.

बातें करतेकरते जैसे ही दोनों कमरे के अंदर आए असगर की निगाहें पल भर के लिए दीवान पर किताब पढ़ती एक लड़की पर अटक कर रह गईं. शकील ने भांपा, फिर मुसकरा दिया. बोला, ‘‘आप से मिलिए, ये हैं तरन्नुम, हमारी खालाजाद बहन और आप हैं असगर कुरैशी, हमारे बचपन के दोस्त. दिल्ली से तशरीफ ला रहे हैं.’’

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दुआसलाम के बाद वह नाश्ते का इंतजाम देखने अंदर चली गई. असगर के खयाल जैसे कहीं अटक गए. शकील ने उसे भांप लिया, ‘‘क्यों साहब, क्या हुआ? कुछ खो गया है या याद आ रहा है?’’

असगर कुछ नहीं बोला, बस एक नजर शकील की तरफ देख कर मुसकरा भर दिया.

शादी के सारे माहौल में जैसे तरन्नुम ही तरन्नुम असगर को दिखाई दे रही थी. उसे बिना बात ही मौसम, माहौल सभी कुछ गुनगुनाता सा लगने लगा. उस के रंगढंग देख कर शकील को मजा आ रहा था. वह छेड़खानी पर उतर आया. बोला, ‘‘असगर यार, अपनी दुनिया में वापस आ जाओ. कुछ बहारें देखने के लिए होती हैं, महसूस करने के लिए नहीं, क्या समझे? भई, यह औरतों की आजादी के लिए नारा बुलंद करने वालियों की अपने कालेज की जानीमानी सरगना है, तुम्हारे जैसे बहुत आए और बहुत गए. इसे कुछ असर होने वाला नहीं है.’’

‘‘लगानी है शर्त?’’ असगर ने चुनौती दी, ‘‘अगर शादी तक कर के न दिखा दूं तो मेरा नाम असगर कुरैशी नहीं.’’

शकील ने उसे छेड़ते हुए कहा, ‘‘मियां, लोग तो नींद में ख्वाब देखते हैं, आप जागते में भी.’’

‘‘बकवास नहीं कर रहा मैं,’’ असगर ने कहा, ‘‘बोल, अगर शादी के लिए राजी कर लूं तो?’’

‘‘ऐसा,’’ शकील ने उकसाया, ‘‘जो नई गाड़ी लाया हूं न, उसी में इस की डोली विदा करूंगा, क्या समझा. यह वह तिल है जिस में तेल नहीं निकलता.’’

और इस चुनौती के बाद तो असगर तरन्नुम के आसपास ही नजर आने लगा. अचानक ही एक से एक शेर उस के होंठों पर और हर महफिल में गजलें उस की फनाओं में बिखर रही थीं.

शकील हैरान था. यह तरन्नुम, जो हर आदमी को, आदमी की जात पर लानत देती थी, कैसे अचानक ही बहुत लजीलीशर्मीली ओस से भीगे गुलाब सी धुलीधुली नजर आने लगी.

घर में उस के इस बदलाव पर हलकी सी चर्चा जरूर हुई. शकील के साथ तरन्नुम के अब्बाअम्मी उस से मिलने आए. शकील ने कहा, ‘‘ये तुम से कुछ बातचीत करना चाहते थे, सो मैं ने सोचा अभी ही मौका है फिर शाम को तो तुम वापस दिल्ली जा ही रहे हो.’’

असगर हैरान हो कर बोला, ‘‘किस बारे में बातचीत करना चाहते हैं?’’

‘‘तुम खुद ही पूछ लो, मैं चला,’’ फिर अपनी खाला शहनाज की तरफ मुड़ कर बोला, ‘‘खालू, देखो जो भी बात आप तफसील से जानना चाहें उस से पूछ लें, कल को मेरे पीछे नहीं पडि़एगा कि फलां बात रह गई और यह बात दिमाग में ही नहीं आई,’’ इस के बाद शकील कमरे से बाहर हो गया.

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असगर ने कहा, ‘‘आप मुझ से कुछ पूछना चाहते थे, पूछिए?’’

शहनाज बड़ा अटपटा महसूस कर रही थीं. उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वे क्या सवाल करें. उन के शौहर रज्जाक अली ने चंद सवाल पूछे, ‘‘आप कहां के रहने वाले हैं. कितने बहनभाई हैं, कहां तक पढ़े हैं? सरकारी नौकरी न कर के आप प्राइवेट नौकरी क्यों कर रहे हैं? अपना मकान दिल्ली में कैसे बनवाया? वगैरहवगैरह.’’

असगर जवाब देता रहा लेकिन उसे समझ में नहीं आ रहा था कि इतनी तहकीकात किसलिए की जा रही है. शहनाज खाला थीं कि उस की तरफ यों देख रही थीं जैसे वह सरकस का जानवर है और दिल बहलाने के लिए अच्छा तमाशा दिखा रहा है. खालू के चंदएक सवाल थे जो जल्दी ही खत्म हो गए.

शहनाज खाला बोलीं, ‘‘तो बेटा, जब तुम्हारे सिर पर बुजुर्गों का साया नहीं है तो तुम्हें अपने फैसले खुद ही करने होते होंगे, है न…’’

‘‘जी,’’ असगर ने कहा.

‘‘तो बताओ, निकाह कब करना चाहोगे?’’

‘‘निकाह?’’ असगर ने पूछा.

‘‘और क्या,’’ खाला बोलीं, ‘‘भई, हमारे एक ही बेटी है. उस की शादी ही तो हमारी जिंदगी का सब से बड़ा अरमान है. फिर हमारे पास कमी भी किस चीज की है. जो कुछ है सब उसे ही तो देना है,’’ खाला ने खुलासा करते हुए कहा.

‘‘पर आप यह सब मुझ से क्यों कह रही हैं?’’

इस पर खालू ने कहा, ‘‘बात ऐसी है बेटा कि आज तक हमारी तरन्नुम ने किसी को भी शादी के लायक नहीं समझा. हम लोगों की अब उम्र हो रही है. अब उस ने तुम्हें पसंद किया है तो हमें भी अपना फर्ज पूरा कर के सुर्खरू हो लेने दो.’’

‘‘क्या?’’ असगर हैरान रह गया, ‘‘तरन्नुम मुझे पसंद करती है? मुझ से शादी करेगी?’’ असगर को यकीन नहीं आ रहा था.

‘‘हां बेटा, उस ने अपनी अम्मी से कहा है कि वह तुम्हें पसंद करती है और तुम्हीं से शादी करेगी. देखो बेटा, अगर लेनेदेने की कोई फरमाइश हो तो अभी बता दो. हमारी तरफ से कोई कसर नहीं रहेगी.’’

‘‘पर खालू मैं तो शादी,’’ असगर कुछ कहने के लिए सही शब्द सोच ही रहा था कि खालू बीच में ही बोले, ‘‘देखो बेटा, मैं अपनी बच्ची की खुशियां तुम से झोली फैला कर मांग रहा हूं, न मत कहना. मेरी बच्ची का दिल टूट जाएगा. वह हमेशा से ही शादी के नाम से किनारा करती रही है. अब अगर तुम ने न कर दी तो वह सहन नहीं कर सकेगी.’’

एक पल को असगर चुप रहा, फिर बोला, ‘‘आप ने शकील से बात कर ली है.’’

‘‘हां,’’ खालू बोले, ‘‘उस की रजामंदी के बाद ही हम तुम से बात करने आए हैं.’’

शहनाज खाला उतावली सी होती हुई बोलीं, ‘‘तुम हां कह दो और शादी कर के ही दिल्ली जाओ. सभी इंतजाम भी हुए हुए हैं. इस लड़की का कोई भरोसा नहीं कि अपनी हां को कब ना में बदल दे.’’

‘‘ठीक है, जैसा आप सही समझें करें,’’ असगर ने कहा.

शहनाज खाला ने उस का हाथ पकड़ कर अपनी आंखों से लगाया, ‘‘बेटा, तुम तो मेरे लिए फरिश्ते की तरह आए हो, जिस ने मेरी बच्ची की जिंदगी बहारों से भर दी,’’ खुशी से गमकते वह और खालू घर के अंदर खबर देने चले गए.

उन के जाने के बाद शकील कमरे में आते हुए बोला, ‘‘तो हुजूर ने मुझे शह देने के लिए सब हथकंडे आजमाए.’’

असगर ने कहा, ‘‘तू डर मत, मैं जीत का दावा कार मांग कर नहीं कर रहा हूं.’’

‘‘तू न भी मांगे,’’ शकील ने कहा, ‘‘तो भी मैं कार दूंगा. हम मुगल अपनी जबान पर जान भी दे सकने का दावा करते हैं, कार की तो बात ही क्या.’’

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‘‘मजाक छोड़ शकील,’’ असगर ने कहा, ‘‘कल उसे पता लगेगा तब…’’

‘‘अब कुछ असर होने वाला नहीं है,’’ शकील ने कहा, ‘‘अपनेआप शादी के बाद हालात से सुलह करना सीख जाएगी. अपने यहां हर लड़की को ऐसा ही करने की नसीहत दी जाती है.’’

‘‘पर तू कह रहा था शकील कि वह आम लड़कियों जैसी नहीं है, बड़ी तेजतर्रार है.’’

कैक्टस के फूल- भाग 2: क्यों ममता का मन पश्चात्ताप से भरा था?

Writer- इंदिरा राय

ममता पटना में केंद्रीय विद्यालय में अध्यापिका थी और सौरभ भी उन दिनों वहीं कार्यरत था. छुट्टियों के बाद पटना जा कर पहला काम जो उस ने किया वह था ममता से मुलाकात. स्कूल के अहाते में अमलतास के पीले गुच्छों वाले फूलों की पृष्ठभूमि में ममता का सौंदर्य और भी दीप्त हो आया था. वह तो ठगा सा रह गया किंतु तब भी ममता ने यथार्थ की खुरदरी बातें ही की थीं, ‘‘वह विवाह के बाद भी नौकरी करना चाहती है क्योंकि इतनी अच्छी स्थायी नौकरी छोड़ना बुद्धिमानी नहीं है.’’

सौरभ तो उस समय भावनाओं के ज्वार में बह रहा था. ममता जो भी शर्त रखती वह उसे मान लेता फिर इस में तो कोई अड़चन नहीं थी. दोनों को पटना में ही रहना था. अड़चन आई 6 वर्ष बाद जब सौरभ का स्थानांतरण बिहार शरीफ के लिए हो गया. उस की हार्दिक इच्छा थी कि ममता नौकरी छोड़ दे और उस के साथ चले. 5 वर्ष की मीनी का उसी वर्ष ममता के स्कूल में पहली कक्षा में प्रवेश हुआ था. चीनी साढ़े 3 वर्ष की थी. वैसे सौरभ नौकरी छोड़ने को न कहता यदि ममता का तबादला हो सकता. वह केंद्रीय विद्यालय में थी और प्रत्येक शहर में तो केंद्रीय विद्यालय होते नहीं. परंतु ममता इस के लिए किसी प्रकार सहमत नहीं थी. उस के तर्क में पर्याप्त बल था. सौरभ के कई सहकर्मियों ने बच्चों की शिक्षा के लिए अपने परिवार को पटना में रख छोड़ा था. उन लोगों की बदली छोटेबड़े शहरों में होती रहती है. सब जगह बढि़या स्कूल तो होते नहीं. फिर आज मीनीचीनी छोटी हैं कल को बड़ी होंगी.

उस ने अपनी नौकरी के संबंध में कुछ नहीं कहा था परंतु सौरभ नादान तो नहीं था. मन मार कर ममता और बच्चों के रहने की समुचित व्यवस्था कर के उसे अकेले आना पड़ा. गरमी की छुट्टियों में पत्नी और बच्चे उस के पास आ जाते, छोटीछोटी छुट्टियों में कभी दौरा बना कर, कभी ऐसे ही सौरभ आ जाता.

गत 4 वर्षों से गृहस्थी की गाड़ी इसी प्रकार धकियाई जा रही थी. अकेले रहते और नौकर के हाथ का खाना खाते उस का स्वास्थ्य गड़बड़ रहने लगा था. 2 जगह गृहस्थी बसाने से खर्च भी बहुत बढ़ गया था. परंतु ममता की एक मुसकान भरी चितवन, एक रूठी हुई भंगिमा उस की सारी झुंझलाहट को धराशायी कर देती थी और वह उस रूपपुंज के इर्दगिर्द घूमने वाला एक सामान्य सा उपग्रह बन कर रह जाता.

9 बजे ममता और बच्चियों के जाने के बाद सौरभ ने स्नान किया, तैयार हो कर सोचा कि सचिवालय का एक चक्कर लगा आए. पटना स्थानांतरण के लिए किए गए प्रयासों में एक प्रयास और जोड़ ले. दरवाजे पर ताला लगा कर चाबी सामने वाले मकान में देने के लिए घंटी बजाई. गृहस्वामिनी निशि गीले हाथों को तौलिए से पोंछती हुई बाहर निकलीं, ‘‘अरे भाईसाहब, आप कब आए?’’

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‘‘कल रात,’’ सौरभ ने उन्हें चाबी थमाने का उपक्रम किया. निशि ने चाबी लेने में कोई शीघ्रता नहीं दिखाई, ‘‘अब तो भाईसाहब, आप यहां बदली करवा ही लीजिए. अकेली स्त्री के लिए बच्चों के साथ घर चलाना बहुत कठिन होता है. बच्चे हैं तो हारीबीमारी चलती ही रहती है, यह तो कहिए आप के संबंधी कपिलजी हैं जो आप की अनुपस्थिति में पूरी देखरेख करते हैं, आजकल इतना दूसरों के लिए कौन करता है?’’

सौरभ अचकचा गया, वह तो कपिल को जानता तक नहीं. ममता ने झूठ का आश्रय क्यों लिया? उस ने निशि की ओर देखा, होंठों के कोनों और आंखों से व्यंग्य भरी मुसकान लुकाछिपी कर रही थी.

‘‘हां, बदली का प्रयास कर तो रहा हूं,’’ सौरभ सीढि़यों से नीचे उतर आया. नए जूते के कारण उंगलियों में पड़े छाले उसे कष्ट नहीं दे रहे थे क्योंकि देह में कैक्टस का जंगल उग आया था.

सचिवालय के गलियारे में इधरउधर निरुद्देश्य भटक कर वह सांझ गए लौटा. मीनीचीनी की मीठी बातें, ममता की मधुर मुसकान उस पर पहले जैसा जादू नहीं डाल सकीं. 10 वर्षों की मोहनिद्रा टूट चुकी थी.

ममता ने पूछा, ‘‘क्या हुआ? तबादले की फाइल आगे बढ़ी?’’

‘‘कुछ होनाहवाना नहीं है, सभी तो यहीं आना चाहते हैं. मैं तो सोचता हूं कि अब हम सब को इकट्ठे रहना चाहिए.’’

‘‘यह कैसे संभव होगा?’’ ममता के माथे पर बल पड़ गए थे.

‘‘संभव क्यों नहीं है? यहां का खर्च तुम्हारे वेतन से तो पूरा पड़ता नहीं. दोनों जनों की कमाई से क्या लाभ जब बचत न हो.’’

‘‘क्या सबकुछ रुपयों के तराजू पर तोला जाएगा? मीनीचीनी को केंद्रीय विद्यालय में शिक्षा मिल रही है, वह क्या कुछ नहीं?’’

‘‘आजकल सब शहरों में कान्वेंट स्कूल खुल गए हैं…फिर तुम स्वयं उन्हें पढ़ाओगी. तुम नौकरी करना ही चाहोगी तो वहां भी तुम्हें मिल जाएगी.’’

‘‘और मेरी 12 वर्षों की स्थायी नौकरी? क्या इस का कुछ महत्त्व नहीं?’’ ममता का क्रोध चरम पर था.

‘‘अब सबकुछ चाहोगी तो कैसे होगा?’’ हथियार डालते हुए सौरभ सोच रहा था. मैं क्यों ममता के तर्ककुतर्कों के सामने झुक जाता हूं? अपनी दुर्बलता से उत्पन्न खीज को दबाते हुए वह मन ही मन योजना बनाने लगा कि कैसे वह अपने क्रोध को अभिव्यक्ति दे.

दूसरे दिन प्रात:काल ही वह जाने के लिए तैयार हो गया. ममता ने आश्चर्य से टोका, ‘‘आज तो छुट्टी है…सुबह से ही क्यों जा रहे हो?’’

‘‘मुझे वहां काम है,’’ उस ने रुखाई से कहा. ममता को जानना चाहिए कि वह भी नाराज हो सकता है.

वापस आने के बाद भी सौरभ को चैन नहीं था. हर समय संदेह के बादलों से विश्वास की धूप कहीं कोने में जा छिपी थी. मन में युद्ध छिड़ा हुआ था, ‘स्त्री की आत्मनिर्भरता तो गलत नहीं, कार्यरत स्त्री की पुरुषों से मैत्री भी अनुचित नहीं फिर उस का सारा अस्तित्व कैक्टस के कांटों से क्यों बिंधा जा रहा है?’

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विवेक से देखने पर तो सब ठीक लगता है परंतु भावना का भी तो जीवन में कहीं न कहीं स्थान है. इच्छा होती है कि एक बार उन लोगों के सामने मन की भड़ास पूरी तरह निकाल ले. इसी धुन में 3-4 दिन बाद वह पुन: पटना पहुंचा. उस समय शाम के 7 बज रहे थे. द्वार पर ताला लगा था.

निशि ने भेदभरी मुसकान के साथ बताया, ‘‘कपिलजी के साथ वे लोग बाहर गए हैं.’’

वह उन्हीं की बैठक में बैठ गया. आधे घंटे बाद सीढि़यों पर जूतेचप्पलों के शोर से अनुमान लगा कि वे लोग आ गए हैं. सौरभ बाहर निकल आया. आगेआगे सजीसंवरी ममता, पीछे चीनी को गोद में लिए कपिल और हाथ में गुब्बारे की डोर थामे मीनी. अपने स्थान पर कपिल को देख कर आगबबूला हो उठा.

ममता भी सकपका गई थी, ‘‘सब ठीक है न?’’

‘‘क्यों, कुछ गलत होना चाहिए?’’ अंतर की कटुता से वाणी भी कड़वी हो गई थी.

‘‘नहींनहीं, अभी 3 दिन पहले यहां से गए थे, इसी से पूछा.’’

‘‘मुझे नहीं आना चाहिए था क्या?’’ सौरभ का क्रोध निशि और कपिल की उपस्थिति भी भूल गया था.

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