Diwali Special: जुआ खेलना जेब के लिए हानिकारक है

कहते हैं जुए की लत में जर, जोरू और जमीन, सब दांव पर लग जाते हैं. महाभारत से ले कर आज के भारत में जुए की गंदी लत ने न जाने कितने घरों को बरबाद किया है, कितने घरों में अशांति फैलाई है. क्या आप भी इस की लत में सबकुछ खोने को तैयार हैं?

तीजत्योहारों पर धार्मिक रीतिरिवाजों के नाम पर कई कुरीतियां भी हम ने पाल रखी हैं, जैसे होली पर शराब और भांग का नशा करना और दीवाली पर जुआ खेलना, जिस के पीछे अफवाह यह है कि आप अपनी किस्मत और आने वाले साल की आमदनी आंक सकते हैं. दीवाली पर जुए के पीछे पौराणिक कथा यह है कि इस दिन सनातनियों के सब से बड़े देवता शंकर ने अपनी पत्नी पार्वती के साथ जुआ खेला था, तब से यह रिवाज चल पड़ा.

बात सौ फीसदी सच है कि जिस धर्म के देवीदेवता तक जुआरी हों, उस के अनुयायियों को भला यह दैवीय रस्म निभाने से कौन रोक सकता है. महाभारत का जुए का किस्सा और भी ज्यादा मशहूर है जिस में कौरवों ने पांडवों से राजपाट तो दूर की बात है, उन की पत्नी द्रौपदी तक को जीत लिया था. मामा शकुनी ने ऐसे पांसे फेंके थे कि पांडव बेचारे 12 साल जंगलजंगल भटकते यहांवहां की धूल फांकते रहे थे. महाभारत की लड़ाई, जिस में हजारोंलाखों बेगुनाह मारे गए थे, के पीछे वजह यही जुआ था.

जुए के नुकसान आज भी ज्यों के त्यों हैं, फर्क इतना है कि युग, सतयुग, त्रेता या द्वापर न हो कर कलियुग है और किरदार यानी जुआरी आम लोग हैं जो पांडवों की तरह दांव पर दांव हारे हुए जुआरी की तरह लगाए चले जाते हैं लेकिन सुधरते नहीं. भोपाल के अनिमेश का ही उदाहरण लें जो पुणे में एक सौफ्टवेयर कंपनी में इंजीनियर हैं. पिछले साल दीवाली पर लौकडाउन के चलते घर नहीं आ पाए थे, सो दीवाली अपने किराए के फ्लैट में दोस्तों के साथ मनानी पड़ी. शाम को जम कर जाम छलके, फिर रात 9 बजे के करीब प्रशांत ने जुआ खेलने का प्रस्ताव रिवाज का हवाला देते रखा तो सभी पांचों दोस्तों ने हां कर दी.

दुनिया का सब से प्रचिलित खेल ‘तीन पत्ती,’ जिस का एक और नाम फ्लैश है, शुरू हुआ तो यों ही था लेकिन खत्म यों ही नहीं हुआ. सुबह होतेहोते अनिमेष एकदो महीने की नहीं, बल्कि पूरे सालभर की सैलरी हार चुका था. 60 हजार तो नकदी गए और तकरीबन 2 लाख अनिमेश ने तुरंत औनलाइन ट्रांसफर किए, बाकी बचे और 2 लाख उस ने 6 महीनों की किस्तों में चुकाए. सालभर की बचत एक  झटके में ठिकाने लग गई.

अनिमेश बताता है कि ये सेविंग के पैसे थे, जिन से वह पापा की मदद करना चाहता था. बड़ी बहन की शादी कभी भी तय हो सकती है, इस के लिए उस ने पापा से कह रखा था कि वह 5 लाख रुपए देगा. दीदी की शादी जल्द हो जाए, यह मनाते रहने वाला यह युवा अब रोज मन्नत मांगता है कि शादी अभी तय न हो क्योंकि वह दोबारा पैसे इकट्ठे कर रहा है जिस में करीब एक साल लगेगा.

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अफसोस उसे है, लेकिन इस बात का ज्यादा है कि उस ने पक्की रन पर बेवजह लंबी चालें चलीं जबकि सामने वाला गुलाम की ट्रेल रख कर खेल रहा था. कई रात उसे नींद नहीं आई. सोते वक्त उसे अपनी पक्की रन और प्रशांत की ट्रेल ही दिखती रही जो चाल डबल किए जा रहा था. तब जाने क्यों उसे यह सम झ नहीं आया कि सामने वाले के पास बड़ा पत्ता हो सकता है. अगली बार के लिए उस ने यह सबक नहीं लिया है कि जो हुआ सो हुआ लेकिन अब जुआ नहीं खेलना है बल्कि वह सोच यह रहा है कि फड़ के पैसे फड़ से ही वसूलेगा.

अब कौन उसे बताए और सम झाए कि महाभारत के जुए में युधिष्ठिर ने भी हर बार यही सोचा था कि बस, इस बार दांव लग जाए, फिर तो पौ बारह है. युधिष्ठिर हार कर भी धर्मराज कहलाया लेकिन अनिमेश जैसे लोगों को क्या कहा जाए जो दिनरात की मेहनत से कमाया पैसा एक रात में गंवा देते हैं पर फिर भी जुए का लालच छोड़ नहीं पाते.

सिगरेट सरीखा ऐब 

इस में शक नहीं कि जुए के खेल का अपना अलग रोमांच है लेकिन यह लत या शौक लगता कैसे है, इस सवाल का जवाब बहुत साफ है कि अधिकतर घरों में दीवाली का जुआ एक तरह से मान्य है. बच्चे हर साल बड़ों को रोशनी के इस त्योहार के दिनों में बड़े चाव से जुआ खेलते देखते हैं तो उन में भी जिज्ञासा पैदा हो जाती है और वे इस खेल के दांवपेंच भी जल्द सीख जाते हैं. बड़े होने पर होस्टल या अपने ही शहर की किसी फड़ पर वे भी भविष्य आजमाने लगते हैं.

यह बिलकुल सिगरेट की लत जैसा काम है जिस का पहला कश चोरीछिपे लिया जाता है. फिर धीरेधीरे यह आदत और फिर लत बन जाती है. चूंकि बड़े खुद गलत होते हैं, इसलिए बच्चों को यह कहते रोक नहीं पाते कि यह गलत है. गलत कहेंगे तो बच्चे के इस सवाल का जवाब वे नहीं दे पाएंगे कि अगर गलत है  तो फिर आप क्यों खेलते हो.

अनिमेष का कहना है कि जब वह छोटा था तो पापा लंबी ब्लाइंड के बाद उस से ही पत्ते खुलवाते थे. इस के पीछे उन का अंधविश्वास यह था कि बच्चा पत्ते खोलेगा तो सामने वाले से बड़े ही निकलेंगे. कभीकभार ऐसा हो भी जाता था तो उन का अंधविश्वास और गहरा जाता

था और अगर हार जाते थे तो समय को कोसते अगली चाल का इंतजार करने लगते थे.

भाग्यवादी और अंधविश्वासी बनाता जुआ

जैसे सिगरेट के नुकसान जानते हुए भी लोग स्मोकिंग करते हैं वैसा ही हाल जुए का है. लोग इस के नुकसान जानते हैं लेकिन इस के भी कश चाल की शक्ल में लगाते जाते हैं. एक हकीकत अनिमेश के उदाहरण से साबित भी होती है कि जुआ शुद्ध भाग्य और अंधविश्वास को पालतापोसता खेल है. अनुमान लगाना सहज मानवीय स्वभाव है. लेकिन हर अनुमान को सच होते देखना निरी बेवकूफी है. जुआ पूरी तरह अनुमान आधारित खेल है, इसलिए इस में रोमांच है.

लेकिन रोमांच से ज्यादा रोल किस्मत नाम की चीज का है जिस की आड़ ले कर इस की लत लगती है. लक्ष्मी अगर पूजा करने से आती होती तो देशदुनिया में कोई गरीब न होता. ठीक इसी तरह अगर किस्मत जुए से चमकती होती तो देश के कोई 30-40 करोड़ लोग बड़े भाग्यवान होते जो दीवाली की रात बतौर रस्म और बतौर लत जुआ खेलते हैं.

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जुआ लोगों को विकट का अंधविश्वासी भी बना देता है जो बुजदिली का दूसरा नाम है. जैसे, क्रिकेट और टैनिस सहित दूसरे खेलों के खिलाडि़यों के अपने मौलिक अंधविश्वास होते हैं कि कोई बल्ला उलटा पकड़ कर मैदान में आता है तो कोई बाएं पैर में पैड पहले बांधता है. इसी तरह जुआरियों के तो लाखों तरह के अंधविश्वास होते हैं. मसलन, कोई मन में गायत्री मंत्र बुदबुदा रहा होता है तो कोई पत्तों को उठाने से पहले उन्हें चूमता है तो कोई पहले उंगलियां चटका कर पत्ते खोलता है.

अब तो इस अंधविश्वासी मानसिकता पर बाकायदा बिजनैस भी करने वाले दुकान खोल कर धंधा करने लगे हैं. जुए में जीतने की शर्तिया तावीज बिकने लगी हैं तो  कहीं सिद्ध बंगाली टाइप बाबा तांत्रिक क्रियाएं कर जुए में जितवाने की गारंटी लेने लगे हैं.

कोई गुरुजी सौ से ले कर 10 हजार रुपए तक जुए में जीतने का मंत्र बताने लगा है तो कई तो शकुनी की तरह कौड़ी यानी ताश के पत्ते भी सिद्ध कर देने लगे हैं. यह बकबास जुआरियों की अंधविश्वासी मानसिकता पर खूब फलफूल रही है. बस, बाजार में जुए का व्रत आना ही बाकी रह गया है कि इस अमावस या पूर्णिमा यह धूत व्रत रखो तो जीत पक्की है.

कैसे बचें 

जुए की महिमा अपरंपार है जिस में जुआरी घंटों प्राकृतिक जरूरतों को दबाए बड़ी लगन से बैठा रहता है. लगातार हारते रहने के बाद भी उस की बुद्धि काम नहीं करती और जीत की उम्मीद में वह बहुतकुछ दांव पर लगा देता है. यह सोचना भी बेमानी है कि जो जीतते हैं, वाकई लक्ष्मी उन पर मेहरबान होती है और वे पैसे का सही इस्तेमाल करते हैं.

जीता हुआ पैसों को फुजूलखर्ची और गलत कामों में लगाता है क्योंकि उसे भी यह एहसास रहता है कि यह पैसा उस ने मेहनत से नहीं कमाया बल्कि जुए में जीता है. अनिमेश से जीतने के बाद प्रशांत ने कोई एक लाख रुपए तो शराबकबाब की पार्टियों में ही उड़ा दिए थे.

अब लाख टके का सवाल यह कि जुए से बचा कैसे जाए? इस के लिए कोई उपाय ढूंढ़ना मुश्किल है सिवा इस के कि दीवाली का कीमती वक्त अपनों के साथ आतिशबाजी चलाते और तरहतरह के पकवान खाते मनाया जाए. किसी फड़ पर जा कर जुआ खेलना एक बड़ा जोखिम वाला काम भी है. अगर पुलिस के छापे में पकड़े गए तो इज्जत तो मिट्टी में मिल ही जाती है, साथ ही 2-3 साल कोर्टकचहरी के चक्कर काटना उस से भी ज्यादा तकलीफदेह तजरबा साबित होता है.

दीवाली का जुआ सिर्फ दीवाली की रात ही नहीं होता, बल्कि 15 दिनों पहले से शुरू हो कर 15 दिन बाद तक चलता है और जो लोग फड़ का आयोजन करते हैं वे पहले से ही माहौल बनाना यानी उकसाना शुरू कर देते हैं कि क्या यार, साल में एक ही तो मौका आता है किस्मत आजमाने का और अगर दोचार हजार हार भी गए तो कोई कंगाल तो नहीं हो जाओगे. तुम तो किस्मत वाले हो, हो सकता है जीत  ही जाओ.

इस तरह की बातों और इस तरह की बातें बनाने वालों से दूर रहना ही बचाव है. नहीं तो जेब खाली होनी तय है. सिगरेट का पहला कश ही उस की लत की शुरुआत होती है. यही थ्योरी जुए पर भी लागू होती है कि एक बार फड़ पर बैठ गए तो पांडव बनने में देर नहीं लगती. इस के बाद भी मन न माने तो शंकर की तरह अपनी पार्वती के साथ जुआ खेलें. इस से घर का पैसा घर में तो रहेगा.

अपने अपने रास्ते- भाग 2: क्या विवेक औऱ सविता की दोबारा शादी हुई?

एक दिन ऐसा भी आया जब दोनों में सभी दूरियां मिट गईं. सविता की औरत को एक मर्द की और विवेक के मर्द को एक औरत की जरूरत थी. अपने प्रौढ़ावस्था के पुराने खयालों के पति की तुलना में विवेक बतरा स्वाभाविक रूप से ताजादम और जोशीला था, दूसरी ओर विवेक बतरा के लिए कम उम्र की लड़कियों के मुकाबले एक अनुभवी औरत से सैक्स नया अनुभव था.

एक रोज सहवास के दौरान विवेक बतरा ने कहा, ‘‘मुझ से शादी करोगी?’’

इस सवाल पर सविता सोच में पड़ गई. विवेक उस से काफी छोटा था. उस को हमउम्र या छोटी उम्र की लड़कियां आसानी से मिल जाएंगी. अपने से उम्र में इतनी बड़ी महिला से वह क्या पाएगा?

‘‘क्या सोचने लगीं?’’ सविता को बाहुपाश में कसते हुए विवेक ने कहा.

‘‘कुछ नहीं, जरा तुम्हारे प्रस्ताव पर विचार कर रही थी. मैं तुम से उम्र में बड़ी हूं. तलाकशुदा हूं. एक किशोर लड़की की मां हूं. तुम्हें तुम्हारी उम्र की लड़की आसानी से मिल जाएगी.’’

‘‘मैं ने सब सोच लिया है.’’

‘‘फिर भी फैसला लेने से पहले सोचना चाहती हूं.’’

इस के बाद विवेक और सविता काफी ज्यादा करीब आ गए. दोनों में व्यावसायिक संबंध काफी प्रगाढ़ हो गए. विवेक अन्य फर्मों को आयातनिर्यात के आर्डर देने से कतराने लगा, उस की कोशिश थी कि ज्यादा से ज्यादा काम सविता की कंपनी को मिले.

सविता भी उसे पूरी तरजीह देने लगी. उस ने अपने दफ्तर में विवेक के बैठने के लिए एक केबिन बनवा दिया जो उस के केबिन से सटा हुआ था. धीरेधीरे अनेक ग्राहकों को, जो पहले सविता के ग्राहक थे, विवेक अपने केबिन में बुला कर हैंडल करने लगा. आफिस स्टाफ को भी विवेक अधिकार के साथ आदेश देने लगा. मालकिन या मैडम का खास होने के कारण सभी कर्मचारी न चाहते हुए भी उस का आदेश मानने लगे.

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अभी तक विवेक, सविता से हर आर्डर पर कमीशन लेता था. सविता ने उस को कभी अपने व्यापार का हिसाबकिताब नहीं दिखाया था. मगर वह कभी कंप्यूटर से और कभी लेजर बुक्स से भी व्यापार के हिसाबकिताब पर नजर रखने लगा.

अभी तक विवेक फर्म का प्रतिनिधि और एजेंट ही था. उस को किसी सौदे या डील को फाइनल करने का अधिकार न था. ऐसा करने के लिए या तो वह फर्म का पार्टनर बनता या फिर उस के पास सविता का दिया अधिकारपत्र होता मगर एकदम से उस को यह सब हासिल नहीं हो सकता था. जो भी था आखिर वह एक एजेंट भर था, जबकि सविता फर्म की मालकिन थी.

वह एकदम से सविता से पावर औफ अटौर्नी देने को या पार्टनर बनाने को नहीं कह सकता था इसलिए वह अब फिर से सविता से विवाह के लिए कहने लगा था.

‘‘शादी किए बिना भी हम इतने करीब हैं फिर शादी की औपचारिकता की क्या जरूरत है?’’ सविता ने हंस कर कहा.

‘‘मैं चाहता हूं कि आप मेरी होममिनिस्टर कहलाएं. आप जैसी इतनी कामयाब और हसीन खातून का खादिम बनना समाज में बड़ी इज्जत की बात है,’’ विवेक ने सिर नवा कर कहा.

इस पर सविता खिलखिला कर हंस पड़ी. आखिर कोई स्त्री अपने रूपयौवन की प्रशंसा सुन कर खुश ही होती है. उस शाम विवेक उसे एक फाइवस्टार होटल के रेस्तरां में खाना खिलाने ले गया. वहीं एक ज्वैलरी शोरूम से हीरेजडि़त एक ब्रेसलेट ले कर भेंट किया तो सविता और भी अधिक खुश हो गई.

उस शाम यह तय हुआ कि सविता 3 दिन के बाद अपना पक्का फैसला सुनाएगी.

इन 3 दिनों के बीच में किसी विदेशी फर्म को एक सौदे के लिए भारत आना था जिसे अभी तक सविता खुद ही हैंडल करती आई थी. विवेक भी इस फर्म के प्रतिनिधि के रूप में सविता के साथ उस फर्म के प्रतिनिधि से मिलना चाहता था.

इस बार का सौदा काफी बड़ा था. दोपहर को सविता के दफ्तर में मिस रोज, जो एक अंगरेज महिला थी, ने सविता और विवेक से बातचीत की. सौदा सफल रहा. विवेक ने भी अपने वाक्चातुर्य का भरपूर उपयोग किया. मिस रोज भी विवेक के व्यक्तित्व से खासी प्रभावित हुई.

फिर कांट्रैक्ट साइन हुआ. सविता कंपनी की मालकिन थी. अत: साइन उसी को करने थे. विवेक खामोशी से सब देखता रहा था.

मिस रोज विदा होने लगी तो सविता ने उस को सौदा फाइनल होने की खुशी में रात के खाने पर एक फाइवस्टार होटल के रेस्तरां में आमंत्रित किया. मिस रोज ने खुशीखुशी आना स्वीकार किया.

उस शाम सविता ने आफिस जल्दी बंद कर दिया. फ्लैट पर नहा कर अपनी ब्यूटीशियन के यहां गई. नए अंदाज में मेकअप करवाने के बाद अब सविता और भी दिलकश लग रही थी.

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ब्यूटीपार्लर से निकल कर सविता अपने लवर के पास गई. आज विवेक को उसे अपना पक्का फैसला सुनाना था. ज्वैलर्स के यहां से विवेक को देने के लिए उस ने एक महंगी हीरेजडि़त अंगूठी खरीदी.

मिस रोज ठीक समय पर आ गई. वह नए स्टाइल के स्कर्ट, टौप में थी. उस ने हाईहील के महंगे सैंडिल पहने थे. गहरे रंग के स्कर्र्ट व टौप उस के सफेद दूधिया शरीर पर काफी फब रहे थे.

विवेक बतरा भी गहरे रंग के नए फैशन के इवनिंग सूट में था. अपने गोरे रंग और लंबे कद के कारण वह ‘शहजादा गुलफाम’ लग रहा था.

छोटी छोटी खुशियां- भाग 3: शादी के बाद प्रताप की स्थिति क्यों बदल गई?

Writer- वीरेंद्र सिंह

सुधा की जबान अभी भी कैंची की तरह चल रही थी, ‘‘सुन रहे हो न?’’ सुधा की कर्कश आवाज सुनते ही प्रताप की सोच टूटी. सुधा कह रही थी, ‘‘सुबह उठते ही किचन में घुस जाती हूं. तुम्हारे लिए चायनाश्ता और खाना बनाती हूं. एक दिन रसोई में जाओ तो पता चले. इस गरमी में खाने के साथ खुद सुलगते हुए तुम्हारे लिए रोटियां सेंकती हूं. इतना करने पर भी एहसान मानने के बजाय तुम…’’

प्रताप सिर झुकाए किसी तरह एकएक कौर मुंह में ठूंस रहा था. सुधा की बातों से प्रताप समझ गया था कि अभी तो यह शुरुआत है. पिछली रात भैयाभाभी आए थे. उन्होंने जो बातें की थीं, अभी तो वह मुद्दा पूरी उग्रता के साथ सामने आएगा. कोई बड़ा झगड़ा करने की शुरुआत सुधा छोटी बात से करती थी. उस के बाद मुख्य मुद्दे पर आती थी. प्रताप सुधा की लगभग हर आदत से परिचित हो चुका था.

‘‘और सुनो…’’ दाहिना हाथ आगे बढ़ा कर उंगली प्रताप की आंखों के सामने कर के सुधा तीखे स्वर में बोली, ‘‘मुझ से पूछे बगैर किसी को एक भी पैसा दिया तो मुझ से बुरा कोई न होगा. मुझ से हंस कर बातें करने में तो तुम्हारी नानी मरती है. कल भैयाभाभी आए थे तो किस तरह उछलउछल कर बातें कर रहे थे. मैं भी अनाज खाती हूं, घास नहीं खाती. सबकुछ अच्छी तरह समझती हूं मैं. मकान की मरम्मत करवानी है, इसलिए भिखारियों की तरह पैसा मांगने चले आए थे,’’ भैया ने जो बात कही थी, सुधा ने उस का ताना मारा, ‘‘80 हजार रुपए की जरूरत है. अपने स्टाफ कोऔपरेटिव से लोन दिला दो, तो बड़ी मेहरबानी होगी. हजार रुपए महीने दे कर धीरेधीरे अदा कर दूंगा.’’

फिर एक लंबी सांस ले कर आगे सुधा बोली, ‘‘कान खोल कर सुन लो, किसी को एक भी रुपया नहीं देना है. अपने भैया को फोन कर के बता दो कि स्टाफ सोसायटी में बात की थी. वहां से अभी लोन नहीं मिल सकता. गोलमोल जवाब देने के बजाय सीधे इनकार कर दो.’’

बड़े भाई के लिए सुधा ने जो बातें कही थीं, सुन कर प्रताप के बाएं हाथ की मुट्ठी कसती जा रही थी. दाहिने हाथ से वह खाना खा रहा था. उस ने कोई जवाब नहीं दिया तो सुधा ऊंची आवाज में बोली, ‘‘सुन रहे हो न तुम? फैक्टरी में फोन कर के साफसाफ मना कर देना,’’ फिर प्रताप की आंखों में आंखें डाल कर धमकीभरे स्वर में बोली, ‘‘यदि यह काम तुम न कर सको तो बोलो, मैं फोन कर के मना कर दूं.’’

मुंह का कौर प्रताप के गले में फंस गया. उसे उतारने के लिए उस ने पानी पिया. वाशबेसिन पर जा कर हाथ धोए और नैपकिन ले कर पोंछने लगा. इतना कहतेकहते जैसे सुधा थक गई थी, इसलिए वह डाइनिंग टेबल के पास पड़ी कुरसी पर बैठ गई.

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प्रताप मोजेजूते पहनने लगा. सुधा जलती नजरों से उसे ताक रही थी. प्रताप खाना खा रहा होता तो झगड़ा करने में शायद सुधा को कुछ अधिक ही मजा आता था. शुरूशुरू में दोचार बार ऐसा हुआ था तो वह थाली छोड़ कर खड़ा हो गया था. परंतु सुधा पर इस का कोई असर नहीं पड़ा था. पति ने खाना नहीं खाया है, इस बात का उस के लिए कोई महत्त्व नहीं था. धीरेधीरे प्रताप भी ढीठ हो गया था. वह खा रहा हो और सामने खड़ी सुधा कितना भी चीख रही हो, उस पर कोई असर नहीं होता था. वह चुपचाप बैठा खाता रहता था.

प्रताप जूते पहन कर खड़ा हुआ तो सुधा उस के पास आ कर चीखी, ‘‘एक बार फिर कह रही हूं, फोन कर के पैसे के लिए मना कर देना. यदि तुम ने मना नहीं किया, मैं किस तरह मना करूंगी, यह तुम अच्छी तरह जानते हो.’’

प्रताप का मन हुआ कि चटाकचटाक कई तमाचे उस के गोरेगोरे गालों पर जड़ दे. परंतु अगले ही क्षण उस की यह इच्छा म्यान में तलवार की तरह समा गई. 6-7 महीने पहले की घटना याद आ गई. एक छोटी सी बात पर सुधा बड़े भाई के घर पहुंच गई थी. वहां उस ने ऐसा बवाल मचाया था कि पूरा महल्ला इकट्ठा हो गया था. उस ने स्कूटर की चाबी ली और घर के बाहर निकल गया. पिछले आधे घंटे में उस ने जो मानसिक कष्ट झेला था, उस का बदला निकाला दरवाजे से. पूरी ताकत से उस ने भड़ाक से दरवाजा बंद किया.

सीढि़यों से स्कूटर तक पहुंचने में उसे लग रहा था कि दिमाग की नसें फट जाएंगी. सुधा ने जब उस के भाई को भिखारी कहा था तो उस का मन हुआ था कि हंटर ले कर उस पर टूट पड़े, उस की जबान खींच ले. पर यह आक्रोश सिर्फ दिमाग की नसों में तनाव पैदा कर के ही रह गया था.

ससुर का यह फ्लैट तीनमंजिला भवन के फर्स्ट फ्लोर पर था. 15 साल पहले जब यह भवन बना था तो सुधा के पापा ने यह फ्लैट खरीदा था. शादी के बाद प्रताप का कमरा देख कर सुधा ने नाकभौं सिकोड़ा था. भीड़ और गंदगीभरी उस जगह पर सुधा का रहना मुश्किल था. उस ने यह बात अपने पापा से कही. वैसे भी वे लोग कोठी लेने की सोच रहे थे. सुधा की बात सुन कर उन्होंने कोठी खरीद ली थी और फ्लैट सुधा को दे दिया था.

प्रताप ने घड़ी देखी और स्कूटर के पास पहुंच गया. रोज की तरह आज भी स्कूटर के पास कचरा फैला हुआ था. स्कूटर की सीट पर गुटखे का खाली पाउच पड़ा था. रोज इसी तरह उस के स्कूटर पर ऊपर से कचरा फेंका जाता था. प्रताप ने हथेली से स्कूटर की सीट साफ की और ऊपर की ओर देखा. दोनों फ्लैटों की बालकनी में उस समय कोई नहीं था. मन हुआ कि पूरा कचरा एक थैली में भर कर उन के फ्लैटों में फेंक आए और उन्हें चार बातें भी सुना आए. पता नहीं ये लोग आदमी की तरह रहना कब सीखेंगे. परंतु ऐसा वह कर नहीं सकता था. 2-3 मिनट में ही सारा आक्रोश पानी की तरह बह गया, सिर्फ दिमाग की नसें तनी रहीं. प्रताप यहां रहने आया था तो यह बात उस ने सुधा को बताई थी. परंतु बातबात में प्रताप से उलझने वाली सुधा इस मामले में आश्चर्यजनक रूप से चुप रही थी. उस के पापा 15 साल यहां रहे थे. सभी पड़ोसियों से उन के मधुर संबंध थे. शायद पुराने संबंधों की वजह से सुधा कुछ भी कहने को तैयार नहीं थी.

सड़क पर आ कर प्रताप ने स्कूटर की गति बढ़ा दी थी. ब्रांच मैनेजर, दिलीप सिंह का खतरनाक कुत्ते जैसा चेहरा आंखों के सामने तैर उठा तो स्कूटर की गति थोड़ी और बढ़ा दी. इस मैनेजर को भी एक दिन सिखाना पड़ेगा. स्कूटर की गति के साथ प्रताप के विचारों की भी गति तेज हो गई थी. ब्रांच में उस की चमचागीरी करने वाला अशोक पूरे दिन शेयर बाजार का कारोबार करता रहता है. उसे कोई काम नहीं देता. कोई भी काम आ जाता है तो उसी को यह कह कर सौंप देता है, ‘मिस्टर प्रताप, प्लीज, जरा इसे भी कर देना…’

चौराहे पर ट्रैफिक जाम था. वह बेचैन हो उठा. आज गुरुवार है, उसे याद ही नहीं था. वह मन ही मन गालियां देने लगा. चौराहे पर ही शौपिंग सैंटर की एक दुकान में किसी धर्मभीरु ने साईं बाबा का मंदिर बना दिया था. इसलिए गुरुवार को दर्शनार्थियों की वजह से जाम लग जाता था. एक तो फूलमाला वाले पटरी पर दुकान लगा लेते थे, दूसरे, दर्शन करने वाले अपने वाहन इधरउधर खड़े कर देते थे. इधरउधर, तिरछासीधा कर के किसी तरह प्रताप ने चौराहा पार किया. आगे चलने वाले टैंपो काला जहरीला धुआं निकाल रहे थे. धुएं की गंध नाक में घुस रही थी और आंखें जल रही थीं. स्कूटर की गति बढ़ा कर वह आगे निकल गया. परंतु आगे चल कर बसें कुछ इस तरह खड़ी थीं कि आधी से अधिक सड़क बंद थी. इन बसों ने पूरी दिल्ली को परेशान कर रखा है. प्रताप की आंखों के सामने फिर से ब्रांच मैनेजर का चेहरा तैर गया. प्रताप बसों के बीच से स्कूटर निकाल कर आगे बढ़ा. ये बसें रोज इसी तरह परेशान करती हैं, परंतु बस वालों को न सरकार कुछ कहती है न ट्रैफिक पुलिस वाले. प्रताप के दिमाग की नसें तनती ही जा रही थीं.

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आज तो काफी देर हो चुकी है. मैनेजर साहब निश्चित ही बुला कर डांटेंगे. जितना संभव था, प्रताप ने स्कूटर की गति उतनी तेज कर दी. आगे के चौराहे पर उस ने लाइट की ओर देखा. ग्रीन लाइट देख कर उस ने स्कूटर की गति और तेज कर दी. उस चौराहे से 3-4 मिनट में ही वह बैंक पहुंच जाता. उस के आगे ट्रैफिक की भी कोई समस्या नहीं थी. वह बीच चौराहे में पहुंचता, उस से पहले ही पीली बत्ती जल गई. पीली बत्ती देख कर वह ठिठका, तब तक उस के पीछे से एक बस आगे निकल गई. उस ने भी अपना स्कूटर आगे बढ़ा दिया.

आदित्य के कमरे में मिली ड्रग्स तो इमली ने उठाया ये कदम

टीवी सीरियल ‘इमली’ (Imlie) में इन दिनों लगातार ट्विस्ट देखने को मिल रहा है. शो में अब तक आपने देखा कि इमली को पता चल गया है कि प्रणव घर से सबूत चुराने वाला है. दरअसल आदित्य ने एमएलए के खिलाफ कुछ सबूत जमा किया था. शो के आने वाले एपिसोड में आदित्य की गिरफ्तारी देखने को मिलेगी.

शो के लेटेस्ट एपिसोड में दिखाया गया कि त्रिपाठी हाउस में अचानक पुलिस की एंट्री हुई. और पुलिस वाले आदित्य को अपने साथ ले जाने लगे. घर का हर सदस्य हैरान हो गया. और सभी लोग कहेंगे कि पुलिस इस तरह आदित्य को लेकर नहीं जा सकते.

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तो वहीं इमली पूछेगी कि आखिर क्यों पुलिस वाले आदित्य को ले जा रहे हैं? ऐसे में पता चलेगा कि आदित्य के कमरे से ड्रग्स मिली है, इसलिए पुलिस गिरफ्तार कर रही है. ऐसे में अब ये देखना होगा कि क्या आदित्य ड्रग्स ले रहा है या प्रणव ने उसे फंसाया है?

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शो के बिते एपिसोड में दिखाया गया कि आदित्य एक MLA  और ड्रग डीलर्स के साथ उसकी साठ-गांठ पर रिपोर्ट करने गया था. वहां उसने दोनों की डीलिंग की फुटेज रिकॉर्ड कर ली थी और पेन ड्राइव इमली को दे दिया था.

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Film Review- ‘‘बबलू बैचलर”: शर्मन जोशी का बेहतरीन अभिनय भी फिल्म को स्तरीय नहीं बनाती!

निर्माता: राफत फिल्मस

निर्देशक और कैमरामैन: अग्निदेव चटर्जी

कलाकार: शर्मन जोशी, पूजा चोपड़ा, तेज श्री प्रधान, राजेश शर्मा, लीना प्रभू, मनोज जोशी, लीना भट्ट,राजू खेर , स्वीटी वालिया, सुमित गुलाटी व अन्य

अवधि: दो घंटे दस मिनट

प्यार व शादी को लेकर कई फिल्में बन चुकी हैं. अब फिल्मकार परफैक्ट जीवन साथी की तलाष को लेकर एक फिल्म ‘‘बबलू बैचलर’’ लेकर आए हैं, जो कि 22 अक्टूबर को सिनेमाघरों में पहुंची है. वैसे यह फिल्म 22 मार्च 2020 को सिनेमाघरों मंे आने को तैयार थी, मगर 17 मार्च 2020 से ही पूरे देश के सिनेमाघर बंद हो जाने से यह फिल्म प्रदर्शित नहीं हो पायी थी. अब यह फिल्म प्रदर्शित हुई है.

कहानीः

फिल्म की कहानी के केंद्र में लखनउ शहर में रह रहे जमींदार ठाकुर साहब(राजेश शर्मा) के बेटे बबलू (शर्मन जोशी ) के इर्द गिर्द घूमती है. बबलू पिछले सात साल से परफैक्ट जीवन साथी की तलाश में लगे हुए हैं. शादी कराने वाले मशहूर एजेंट तिवारी(असरानी) भी उनकी मदद नही कर पाते. तिवारी, बबलू व उनके परिवार को अवंतिका(पूजा चोपड़ा )से मिलवाते हैं.

लेकिन अवंतिका का अपना बॉयफ्रेंड है, पर वह अपने माता पिता से इस बारे में नहीं बताती, जिसके चलते अवंतिका और बबलू की शादी तय हो जाती है. मगर दूसरे दिन अवंतिका, बबलू को मिलने के लिए बुलाती है और उसे सच बताते हुए शादी तोड़ने के लिए कहती है. बबलू अपने घर पर ऐेलान कर देता है कि वह अवंतिका से शादी नहीं करेगा. फिर अपने फूफा की बेटी की शादी में बबलू की मुलाकात महत्वाकांक्षी व फिल्म हीरोईन बनने का सपना देख रही स्वाती (तेजश्री प्रधान) से होती है.जिससे बबलू को प्यार हो जाता है.

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और बबलू अपने घर पर स्वाती को अपनी बचपन की प्रेमिका बताकर षादी कर लेता है. एक रियालिटी शो के लिए ऑडिशन दे चुकी स्वाती को उसके परिणाम की प्रतीक्षा है, इसलिए वह पहली रात हनीमून मनाने से इंकार कर देती है.फिर दोनों हनीमून मनाने के लिए दूसरी जगह जाते हैं, पर रियालिटी शो में चयन हो जाने के कारण वह बबलू को नींद की गोली मिश्रित दूध पिलाती है,कुछ देर में बबलू सो जाते हैं और बबलू के नाम पत्र लिखकर स्वाती मंुबई चली जाती है.अपनी पत्नी को वापस लाने के लिए बबलू मंुबई जाता है,जहां उसकी मुलाकात फिर से अवंतिका से होती है,जो कि अब पत्रकार और एक टीवी चैनल की हेड बन चुकी है.

अवंतिका,बबलू को स्वाती तक पहुंचाती है. मगर स्वाती, बबलू संग वापस आने से इंकार कर देती है.बबलू को अवंतिका से और अवंतिका को बबलू से प्यार भी हो जाता है. मगर स्वाती की वजह से बबलू अवंतिका के प्यार को स्वीकार किए बगैर लखनउ वापस आ जाता है. इधर अवंतिका का सहायक चैनल पर स्वाती के षादीषुदा होने की खबर चला देता है.

अचानक एक दिन पता चलता है कि ठाकुर साहब ने बबलू की पुनः स्वाती से शादी करने की तैयारी कर ली है, तभी वहां पर अवंतिका भी पहुंचती है. फिर काफी कुछ घटता है.

लेखन व निर्देशनः

अग्निदेव चटर्जी अच्छे कैमरामैन हैं, मगर निर्देशन में वह मात खा गए. उनका निर्देशन किसी भी दृश्य में प्रभावी नहीं लगता. फिल्म की पटकथा भी काफी बिखरी हुई और कमजोर है. फिल्म की शुरूआत रेडियो पर प्रसारित हो रहे शादी कराने वाले एक एप के विज्ञापन से होती है, पर उसका फिल्म की कहानी में कोई योगदान नही होता.इसका उपयोग ही गलत -सजयंग से किया गया है.

कहानीकार सौरभ पांडे ने उत्तर प्रदेश की पृष्ठभूमि में परफैक्ट जीवन साथी की तलाश की एकदम सही उठायी, मगर बाद में कई तरह के उपदेश ठूंसते हुए पटकथा बहुत गड़बड़ कर दी. सारे दृश्य घिसे पिटे हैं. मसलन,बबलू और उनके पिता का सिगरेट पीने वाला दृष्य जिसमें स्वाती के घर से भाग जाने पर बात करते हुए पिता, बबलू से उसे वापस लेकर आने के लिए कहते हैं. मुंबई में जब बबलू , अवंतिका के साथ स्वाति के घर पर मिलता है,तो स्वाती जिस तरह का व्यवहार करती है, वह बहुत ही हास्यास्पद है.

इंटरवल से पहले कुछ हद तक फिल्म ठीक है,मगर इंटरवल के बाद जिस तरह से फिल्म आगे ब- सजय़ती है, उसे देखते हुए दर्शक सोचने लगता है कि यह कब खत्म होगी. क्लायमेक्स तक पहुंचते पहुंचते फिल्म दम तोड़ चुकी होती है.फिल्म के ज्यादातर संवाद बेकार है. अवंतिका के सहायक द्वारा स्वाती के षादीषुदा होने की खबर को जिस -सजयंग से दिखाया गया है, उसका भी कहानी में कोई योगदान नजर नही आता.पटकथा लेखक व फिल्मकार ने रायता काफी फैलाया, मगर उसे समेटने में बुरी तरह से विफल रहे हैं.

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अभिनयः

कुंवारे बबलू के किरदार में शर्मन जोशी ने बेहतरीन अभिनय किया है. वह विभिन्न भावनाओं को व्यक्त करने में सफल रहे हैं. लेकिन पब के अंदर के गाने में वह जमते नही है. मगर शर्मन जोशी का उत्कृ-ुनवजयट अभिनय फिल्म को डूबने से बचाने में समर्थ नहीं है.

अवंतिका के किरदार में पूजा चोपड़ा अपने अभिनय की छाप छोड़ जाती हैं. स्वाती के किरदार में तेजश्री प्रधान कुछ खास जलवा नही दिखा पायीं.

Ghum Hai Kisikey Pyaar Meiin की पाखी ने विराट के साथ शेयर की रोमांटिक फोटो, लिखा ये इमोशनल नोट

टीवी सीरियल ‘गुम है किसी के प्यार में’  (Ghum Hai Kisikey Pyaar Meiin) फेम एक्ट्रेस ऐश्वर्या शर्मा (Pakhi) सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती हैं.  एक्ट्रेस की सोशल मीडिया पर जबरदस्त फैन फॉलोविंग है. शो में सई और विराट की जोड़ी को फैंस खूब पसंद करते हैं लेकिन असल जिंदगी में पाखी और विराट कपल है.

पाखी यानी ऐश्वर्या शर्मा और विराट रियल लाइफ में एक-दूसरे को बेहद प्यार करते हैं. दोनों की सगाई भी हो चुकी है और जल्द ही ये शादी करने वाले हैं. पाखी अक्सर विराट के साथ रोमांटिक फोटोज और वीडियो शेयर करती रहती है.

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हाल ही में विराट-पाखी का रिलेशनशिप ने एक साल पूरा कर लिया है. तो इस खास मौके पर ऐश्वर्या शर्मा (पाखी) ने अपने मंगेतर नील (विराट) के लिए Heart Touching पोस्ट किया है. एक्ट्रेस ने लिखा, एक साल हो गया है माय लव नील भट्ट. अक्टूबर में हमने एक-दूसरे के लिए अपने प्यार को कुबूल किया था. हमने एक-दूसरे के साथ रहने का फैसला किया और हमारे Parents को बताया कि हम एक-दूसरे से बहुत प्यार करते हैं.

 

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इस पोस्ट पर शो के कलाकारों ने भी बधाईयां दी है. सई ने कमेंट करते हुए लिखा, आप दोनों को बहुत-बहुत बधाई. शो के लेटेस्ट एपिसोड की बात करें तो सई और विराट वापस घर आ गए हैं. विराट सई का काफी ख्याल रख रहा है.

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चौहान हाउस में सब चाहते हैं कि सई और विराट के बीच की दूरियां खत्म हो जाए लेकिन पाखी किसी भी हाल में  विराट को पाना चाहती है. ऐसे में वह नई चाल चल रही है.

पंजाब: पैरों में कुल्हाड़ी मारते अमरिंदर सिंह

पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह का राजनीतिक कद राष्ट्रीय स्तर का है. कांग्रेस से बाहर आने के बाद अब उन्होंने एक नई राजनीतिक पार्टी, किसानों और पंजाब के भविष्य को मजबूत बनाने की बात कह कर ऐलान किया है.

अमरिंदर सिंह की पार्टी के एलान के बाद पंजाब का राजनीतिक परिदृश्य कुछ ऐसा हो जाएगा मानो सत्ता ना तो अब कांग्रेस के हाथों में होगी और ना ही भाजपा के हाथों में. एक ऐसी त्रिशंकु सरकार बनाने में मददगार हो सकती है अमरिंदर सिंह की नई राजनीतिक पार्टी.

लगभग 80 वर्ष की उम्र में अमरिंदर सिंह का जज्बा जहां आकर्षित करता है वहीं सोचने को विवश करता है.

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अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में 80 के दशक में अमरिंदर सिंह ने अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत की थी आगे जब ऑपरेशन ब्लू स्टार घटित हुआ तो उन्होंने पार्टी से इस्तीफा दे दिया था और लंबे समय बाद फिर राजीव गांधी के साथ उन्होंने राजनीति के हाईवे पर दौड़ना शुरू किया. परिणाम स्वरूप दो दफा पंजाब के मुख्यमंत्री रहे पंजाब कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष रहे और एक समय तो ऐसा भी आ गया जब अमरिंदर सिंह पंजाब में कांग्रेस का पर्याय बन गए. अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस आलाकमान को एक तरह से नजरअंदाज करते हुए उन्होंने लंबे समय तक मुख्यमंत्री के रूप में अपनी भूमिका निर्वाह की, शायद यही कारण था कि आलाकमान ने नवजोत सिंह सिद्धू को शतरंज की बिसात पर आगे बढ़ा दिया. और अभी हाल ही में पिछले दिनों देश ने देखा कि किस तरह पंजाब की राजनीति ने एक नई करवट बदली है नवजोत सिंह सिद्धू के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद जिस तरह सिद्धू ने राजनीतिक दांव खेले परिणाम स्वरूप अमरिंदर सिंह के सामने दो विकल्प रह गए या तो कांग्रेस आलाकमान के सामने आत्मसमर्पण करना  अथवा मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा. और जैसा कि सभी ने देखा अमरिंदर सिंह ने एक झटके में आलाकमान को बिना जानकारी दिए ही राज्यपाल से मिलकर के 21 सितंबर 2021 को अपना इस्तीफा सौंप कर मानो कोप भवन में चले गए.

निसंदेह अमरिंदर सिंह के पास दीर्घ राजनीतिक अनुभव है उनकी छवि भी एक लोकप्रिय राजनेता की रही है. मगर राजनीति में बहुत आगे तक वही जाता है जो सबको लेकर चलता है या जिसमें एक दूर दृष्टि होती है. अमरिंदर सिंह ने अपने राजनीति के इस उत्तरार्ध काल में जहां आलाकमान के साथ दो दो हाथ करके अपना नुकसान किया है वहीं कांग्रेस पार्टी का भी नुकसान स्पष्ट दिखाई दे रहा है. क्योंकि नवजोत सिंह सिद्धू और चरणजीत सिंह चन्नी दोनों का ही मल युद्ध अगर चलाता रहा तो कांग्रेस की कब्र बनाने के लिए पर्याप्त माना जा रहा है.

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अमरिंदर सिंह का “कोप भवन”

यह सत्य है कि अमरिंदर सिंह को पंजाब में कांग्रेस पार्टी ने जो कुछ दिया वह बहुत कम लोगों के भाग्य में होता है. मगर स्वयं को अंतिम ताकतवार मान करके उन्होंने जिस तरह राजनीतिक दांवपेच खेले हैं वह अपने ही पैरों में कुल्हाड़ी मारने जैसा है. आलाकमान को नजरअंदाज करना किसी भी राजनीतिक पार्टी या फिर व्यवस्था के लिए नुकसानदायक ही होता है. अनुशासन तो होना ही चाहिए. एक समय ऐसा भी था जब अमरिंदर सिंह कांग्रेस अनुशासन से बहुत दूर हो करके स्वतंत्र अपना काम कर रहे थे. और जब आलाकमान की तलवार चली और विधायक सिद्धू की तरफ भागने लगे तो नाराज अमरिंदर सिंह “कोप भवन” में चले गए. और अब 80 की उम्र में उनका ताल ठोकना देश की राजनीति का एक भदेस सच है.

ऐसा देश के जन-जन ने पहले भी देखा है जब पार्टी लाइन से हटकर के प्रादेशिक दिग्गजों ने अपनी लाइन खींचने की कोशिश की और बुरी तरह मात खाई जिनमें मध्य प्रदेश के दिग्गज अर्जुन सिंह उत्तर प्रदेश के दिग्गज नेता नारायण दत्त तिवारी, भाजपा में उमा भारती आदि नाम गिनाए जा सकते हैं. वहीं यह भी सच है कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी ने महाराष्ट्र में शरद पवार ने अपनी राजनीतिक बखत को दिखाया है. मगर पंजाब में अमरिंदर सिंह के मामले में यह कहा जा सकता है कि उम्र के इस पड़ाव में क्या आम मतदाता उन्हें तरजीह देंगे या फिर वह सिर्फ कांग्रेस को नेस्तनाबूद करने के लिए खिसियानी बिल्ली खंबा नोचे की तरह भूमिका निभा करके राजनीतिक इतिहास के पन्नों में रह जाएंगे.

अनकहा प्यार- भाग 1: क्या सबीना और अमित एक-दूसरे के हो पाए?

वे फिर मिलेंगे. उन्हें भरोसा नहीं था. पहले तो पहचानने में एकदो मिनट लगे उन्हें एकदूसरे को. वे पार्क में मिले. सबीना का जबजब अपने पति से झगड़ा होता, तो वह एकांत में आ कर बैठ जाती. ऐसा एकांत जहां भीड़ थी. सुरक्षा थी. लेकिन फिर भी वह अकेली थी. उस की उम्र 40 वर्ष के आसपास थी. रंग गोरा, लेकिन चेहरा अपनी रंगत खो चुका था. आधे से ज्यादा बाल सफेद हो चुके थे. जो मेहंदी के रंग में डूब कर लाल थे. आंखें बुझबुझ सी थीं.

वह अपने में खोईर् थी. अपने जीवन से तंग आ चुकी थी. मन करता था कि  कहीं भाग जाए. डूब मरे किसी नदी में. लेकिन बेटे का खयाल आते ही वह अपने झलसे और उलझे विचारों को झटक देती. क्याक्या नहीं हुआ उस के साथ. पहले पति ने तलाक दे कर दूसरा विवाह किया. उस के पास अपना जीवन चलाने का कोई साधन नहीं था. उस पर बेटे सलीम की जिम्मेदारी.

पति हर माह कुछ रुपए भेज देता था. लेकिन इतने कम रुपयों में घर चलाए या बेटे की परवरिश अच्छी तरह करे. मातापिता स्वयं वृद्ध, लाचार और गरीब थे. एक भाई था जो बड़ी मुश्किल से अपना गुजारा चलाता था. अपना परिवार पालता था. साथ में मातापिता भी थे. वह उन से किस तरह सहयोग की अपेक्षा कर सकती थी.

उस ने एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने का काम शुरू कर दिया. वह अंगरेजी में एमए के साथ बीएड भी थी. सो, उसे आसानी से नौकरी मिल गई. सरकारी नौकरी की उस की उम्र निकल चुकी थी. वह सोचती, आमिर यदि बच्चा होने के पहले या शादी के कुछ वर्ष बाद तलाक दे देता, तो वह सरकारी नौकरी तो तलाश सकती थी. उस समय उस की उम्र सरकारी नौकरी के लायक थी. शादी के कुछ समय बाद जब उस ने आमिर के सामने नौकरी करने की बात कही, तो वह भड़क उठा था कि हमारे खानदान में औरतें नौकरी नहीं करतीं.

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उम्र गुजरती रही. आमिर दुबई में इंजीनियर था. अच्छा वेतन मिलता था. किसी चीज की कमी नहीं थी. साल में एकदो बार आता और सालभर की खुशियां हफ्तेभर में दे कर चला जाता. एक दिन आमिर ने दुबई से ही फोन कर के उसे यह कहते हुए तलाक दे दिया कि यहां काम करने वाली एक अमेरिकन लड़की से मुझे प्यार हो गया है. मैं तुम्हें हर महीने हर्जाखर्चा भेजता रहूंगा. मुझे अपनी गलती का एहसास तो है, लेकिन मैं दिल के हाथों मजबूर हूं. एक बार वापस आया तो तलाक की शेष शर्तें मौलवी के सामने पूरी कर दीं और चला गया. इस बीच एक बेटा हो चुका था.

आमिर को कुछ बेटे के प्रेम ने खींचा और कुछ अमेरिकन पत्नी की प्रताड़ना ने सबीना की याद दिलाई. और वह माफी मांगते हुए दुबई से वापस आ गए. लेकिन सबीना से फिर से विवाह के लिए उसे हलाला से हो कर गुजरना था. सबीना इस के लिए तैयार नहीं हुई. आमिर ने मौलवी से फिर निकाह के विकल्प पूछे जिस से सबीना राजी हो सके. मौलवी ने कहा कि 3 लाख रुपए खर्च करने होंगे. निकाह का मात्र दिखावा होगा. तुम्हारी पत्नी को उस का शौहर हाथ भी नहीं लगाएगा. कुछ समय बाद तलाक दे देगा.

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‘ऐसा संभव है,’ आमिर ने पूछा.

‘पैसा हो तो कुछ भी असंभव नहीं,’ मौलाना ने कहा.

‘कुछ लोग करते हैं यह बिजनैस अपनी गरीबी के कारण. लेकिन यह बात राज ही रहनी चाहिए.’

‘मैं तैयार हूं,’ आमिर ने कहा और सबीना को सारी बात समझई. सबीना न चाहते हुए भी तैयार हो गई. सबीना को अपनी इच्छा के विरुद्ध निकाह करना पड़ा. कुछ समय गुजारना पड़ा पत्नी बन कर एक अधेड़ व्यक्ति के साथ. फिर तलाक ले कर सबीना से आमिर ने फिर निकाह कर लिया.

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