परिवर्तन- भाग 3: शिव आखिर क्यों था शर्मिंदा

कमला नीचे आई तो रसोईघर में घुस गई. उसे आज स्वयं भोजन बनाने की इच्छा थी. कमला ने हरी सब्जियां छांट कर निकालीं, फिर स्वयं ही छीलकाट कर चूल्हे पर रख दीं. आज से वह उबली सब्जियां खाएगी.

शिव सहाय कुछ दिनों के लिए बाहर गया था. कमला एक तृप्ति और आजादी महसूस कर रही थी. आज की सी जीवनचर्या को वह लगातार अपनाने लगी. शारीरिक श्रम की गति और अधिक कर दी. उसे खुद ही समझ में नहीं आया कि अब तक उस ने न जाने क्यों शरीर के प्रति इतनी लापरवाही बरती और मन में क्यों एक उदासी ओढ़ ली.

शिव सहाय दौरे से वापस आया और बिना कमला की ओर ध्यान दिए अपने कामों में व्यस्त हो गया. पतिपत्नी में कईकई दिनों तक बातचीत तक नहीं होती थी.

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शिव सहाय कामकाज के बाद ड्राइंगरूम की सामने वाली कुरसी पर आंख मूंद कर बैठा था. एकाएक निगाह उठी तो पाया, एक सुडौल नारी लौन में टहल रही है. उस का गौर पृष्ठभाग आकर्षक था. कौन है यह? चालढाल परिचित सी लगी. वह मुड़ी तो शिव सहाय आश्चर्य से निहारता रह गया. कमला में यह परिवर्तन, एक स्फूर्तिमय प्रौढ़ा नारी की गरिमा. वह उठ कर बाहर आया, बोला, ‘‘कम्मो, तुम हो, मैं तो समझा था…’’

कम्मो ने मुसकान बिखेरते हुए कहा, ‘‘क्या समझा आप ने कि कोई सुंदरी आप से मिलने के इंतजार में टहल रही है?’’

शिव सहाय ने बोलने का और मौका न दे कम्मो को अपनी ओर खींच कर सीने से लगाते हुए कहा, ‘‘तुम्हारी बहुत उपेक्षा की है मैं ने. पर यकीन करो, अब भूल कर भी ऐसा नहीं होगा. आखिर मेरी जीवनसहचरी हो तुम.’’ कम्मो का मन खुशी से बांसों उछल रहा था वर्षों बाद पति का वही पुराना रूप देख कर. वही प्यार पा कर उस ने निर्णय ले लिया कि अब इस शरीर को कभी बेडौल नहीं होने देगी, सजसंवर कर रहेगी और पति के दिल पर राज करेगी.

वैभव की शादी के लिए वधू का चयन दोनों की सहमति से हुआ. निमंत्रणपत्र रिश्तेदारों और परिचितों में बांटे गए. शादी की धूम निराली थी.

सज्जित कोठी से लंबेचौड़े शामियाने तक का मार्ग लहराती सुनहरी, रुपहली महराबों और रंगीन रोशनियों से चमचमा रहा था. स्टेज पर नाचरंग की महफिल जमी थी तो दूसरी ओर स्वादिष्ठ व्यंजनों की बहार थी. अतिथि मनपसंद पेय पदार्थों का आनंद ले कर आते और महफिल में शामिल हो जाते.

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आज कमला ने भी जम कर शृंगार किया था. वह अपने अनूठे सौंदर्य में अलग ही दमक रही थी. कीमती साड़ी और कंधे पर सुंदर पर्र्स लटकाए वह इष्टमित्रों की बधाई व सौगात ग्रहण कर रही थी. वह थिरकते कदमों से महफिल की ताल में ताल मिला रही थी.

लोगों ने शिव सहाय को भी साथ खींच लिया. फिर क्या था, दोनों की जोड़ी ने वैभव और नगीने सी दमकती नववधू को भी साथ ले लिया. अजब समां बंधा था. कल की उदास और मुरझाई कमला आज समृद्धि और स्वास्थ्य की लालिमा से भरपूर दिखाई दे रही थी. ऐसा लग रहा था मानो आज वह शिव सहाय के घर और हृदय पर राज करने वाली पत्नी ही नहीं, उस की स्वामिनी बन गई थी.

परिवर्तन – भाग 1: शिव आखिर क्यों था शर्मिंदा

शेव बनाते हुए शिव सहाय ने एक उड़ती नजर पत्नी पर डाली. उसे उस का बेडौल शरीर और फैलता हुआ सा लगा. वह नौकरानी को धुले कपड़े अच्छी तरह निचोड़ कर सुखाने का आदेश दे रही थी. उस ने खुद अपनी साड़ी झाड़ कर बताई तो उस का थुलथुल शरीर बुरी तरह हिल गया, सांस फूलने से स्थिति और भी बदतर हो गई, और वह पास पड़ी कुरसी पर ढह सी गई.

क्या ढोल गले बांध दिया है उस के मांबाप ने. उस ने उस के जन्मदाताओं को मन ही मन धिक्कारा-क्या मेरी शादी ऐसी ही औरत से होनी थी, मूर्ख, बेडौल, भद्दी सी औरत. गोरी चमड़ी ही तो सबकुछ नहीं.
‘तुम क्या हो?’ वह दिन में कई बार पत्नी को ताने देता, बातबात में लताड़ता, ‘जरा भी शऊर नहीं, घरद्वार कैसे सजातेसंवारते हैं? साथ ले जाने के काबिल तो हो ही नहीं. जबतब दोस्तयार घर आते हैं तो कैसी शर्मिंदगी उठानी पड़ती है.’

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जब देखो सिरदर्द, माथे पर जकड़ कर बांधा कपड़ा, सूखे गाल और भूरी आंखें. उस के प्रति शिव सहाय की घृणा कुछ और बढ़ गई. उस ने सामने लगी कलाकृतियों को देखा.

वार्निश के डब्बों और ब्रशों पर सरसरी निगाह डाली. बिजली की फिटिंग के सामान को निहारा. कुछ देर में मिस्त्री, मैकेनिक सभी आ कर अपना काम शुरू कर देंगे. उस ने बेरहमी से घर की सभी पुरानी वस्तुओं को बदल कर एकांत के उपेक्षित स्थान में डलवा दिया था.

क्या इस औरत से भी छुटकारा पाया जा सकता है? मन में इस विचार के आते ही वह स्वयं सिहर उठा.

42 वर्ष की उम्र के करीब पहुंची उस की पत्नी कमला कई रोगों से घिर गई थी. दवादारू जान के साथ लगी थी. फिर भी वह उसे सब तरह से खुश रखने का प्रयत्न करती लेकिन उन्नति की ऊंचाइयों को छूता उस का पति उसे प्रताडि़त करने में कसर नहीं छोड़ता. अपनी कम्मो (कमला) के हर काम में उसे फूहड़पन नजर आता. सोचता, ‘क्या मिला इस से, 2 बेटियां थीं जो अब अपना घरबार बसा चुकी हैं. बाढ़ के पानी की तरह बढ़ती दौलत किस काम आएगी? 58 वर्ष की उम्र में वह आज भी कितना दिलकश और चुस्तदुरुस्त है.

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कुरसी पर निढाल सी हांफती पड़ी पत्नी के रंगे बाल धूप में एकदम लाल दिखाई दे रहे थे. वह झल्लाता हुआ बाथरूम में घुस गया और देर तक लंबे टब में पड़ा रहा. पानी में गुलाब की पंखडि़यां तैर रही थीं. हलके गरम, खुशबूदार पानी में निश्चल पड़े रहना उस का शौक था.

कमला उस के हावभाव से समझ गई कि वह खफा है. उस ने खुद को संभाला और कमरे में आ कर दवा की पुडि़या मुंह में डाल ली.

बड़ी बेटी का बच्चा वैभव, उस ने अपने पास ही रख लिया था. बस, उस ने अपने इस लाड़ले के बचपन में अपने को जैसे डुबो लिया था. नहीं तो नौकरों से सहेजी इस आलीशान कोठी में उस की राहत के लिए क्या था? ढाई दशकों से अधिक समय से पत्नी के लिए, धनदौलत का गुलाम पति निरंतर अजनबी होता गया था. क्या यह यों ही आ गई? 18 वर्ष की मोहिनी सी गोलमटोल कमला जब ससुराल में आई थी तो क्या था यहां?

तीनमंजिले पर किराए का एक कमरा, एक बालकनी और थोड़ी सी खुली जगह थी. ससुर शादी के 2 वर्षों पहले ही दिवंगत हो चुके थे. घर में थीं जोड़ों के दर्द से पीडि़त वृद्धा सास और 2 छोटी ननदें.
पिता की घड़ीसाजी की छोटी सी दुकान थी, जो पिता के बाद शिव सहाय को संभालनी पड़ी, जिस में मामूली सी आय थी और खर्च लंबेचौड़े थे. उस लंबे से कमरे में एक ओर टीन की छत वाली छोटी सी रसोई थी.

दूसरी ओर, एक किनारे परदा डाल कर नवदंपती के लिए जगह बनाई गई थी. पीछे की ओर एक अलमारी और एक दीवारघड़ी थी. यही था उस का सामान रखने का स्थान. दिन में परदा हटा दिया जाता. शैय्या पर ननदें उछलतीकूदती अपनी भाभी का तेलफुलेल इस्तेमाल करने की फिराक में रहतीं.
कमला मुंहअंधेरे रसोई में जुट जाती. बच्चों को स्कूल जाना होता था, और पति को दुकान. जल्दी ही वह भी एक प्यारी सी बच्ची की मां बन गई

शुरू में शिव सहाय अपनी पत्नी को बहुत प्यार करता था. उसे लगता, उस की उजलीगुलाबी आभा लिए पत्नी कम्मो गृहस्थी की चक्की में पिसती हुई बेहद कमजोर और धूमिल होती जा रही है. रात को वह उस के लिए कभी रबड़ी ले आता तो कभी खोए की मिठाई.
कमला का आगमन इस परिवार के लिए समृद्धि लाने वाला सिद्ध हुआ. दुकान की सीमित आय धीरेधीरे बढ़ने लगी.

कमला ने पति को सलाह दी कि वह दुकान में बेचने के लिए नई घडि़यां भी रखे, केवल पुरानी घडि़यों की मरम्मत करना ही काफी नहीं है. चुपके से उस ने पति को अपने कड़े और गले की जंजीर बेचने के लिए दे दीं ताकि वह नई घडि़यां ला सके. इस से उस की आय बढ़ने लगी. काम चल निकला.

किसी कारण से पास का दुकानदार अपनी दुकान और जमीन का एक टुकड़ा उस के हाथों सस्ते दामों में बेच कर चला गया. दुकान के बीच का पार्टीशन निकल जाने से दुकान बड़ी हो गई. उस की विश्वसनीयता और ख्याति तेजी से बढ़ी. घड़ी के ग्राहक दूरपास से उस की दुकान पर आने लगे. मौडर्न वाच शौप का नाम शहर में नामीगिरामी हो गया.

मौडर्न वाच शौप से अब उसे मौडर्न वौच कंपनी बनाने की धुन सवार हुई. उस के धन और प्रयत्न से घड़ी बनाने का कारखाना खुला, बढि़या कारीगर आए. फिर बढ़ती आमदनी से घर का कायापलट हो गया. बढि़या कोठी, एंबेसेडर कारें और सभी आधुनिक साजोसामान.

बस पुरानी थी, तो पत्नी कमला. दौलत को वह अपने प्रयत्नों का प्रतिफल समझने लगा. लेकिन दिल के किसी कोने में उसे कमला के त्याग व सहयोग की याद भी उजागर हो जाती. अभावों की दुनिया में जीते उस के परिवार और उसे, आखिर इसी औरत ने तो संभाल लिया था. उस ने खुद भी क्याकुछ नहीं किया, घर सोनेचांदी से भर दिया है. इस बदहाल औरत के लिए रातदिन डाक्टर को फोन खटखटाते, मोटे बिल भरते खूबसूरत जिंदगी गंवा रहा है.

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परिवर्तन : शिव आखिर क्यों था शर्मिंदा

सत्यकथा: दोस्त को दी पति की सुपारी

राईटर  —वेणीशंकर पटेल ‘ब्रज’ 

मध्य प्रदेश के जबलपुर के पास पनागर थाना क्षेत्र में एक छोटा सा गांव है मछला. जिस की आबादी बमुश्किल एकडेढ़ हजार होगी. इसी गांव में 40 साल का नरेश मिश्रा अपनी पत्नी ऊषा और 13 साल के बेटे के साथ रहता है.

10 जनवरी, 2021 की शाम करीब सवा 7 बजे नरेश अपनी बोलेरो ले कर घर पहुंचा. घर के सामने खाली जगह में गाड़ी खड़ी कर वह घर के अंदर जाने के बजाय बाहर जाने को हुआ तो पत्नी ऊषा ने टोक दिया, ‘‘कहां जा रहे हो, पहले हाथमुंह धो कर खाना खा लो, फिर बाहर जाना.’’

‘‘मुझे अभी भूख नहीं है, मैं थोड़ी देर में आता हूं.’’ नरेश इतना कह कर घर से बाहर निकल गया.

ऊषा नरेश की रोजाना की आदत को जानती थी, उसे पता था कि नरेश गांव के नशेड़ी युवकों के साथ बैठ कर शराब पिएगा और आधी रात को लड़खड़ाते हुए घर वापस आएगा. लिहाजा वह नरेश की बात को अनसुना कर अपने कामों में लग गई.

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10 जनवरी की शाम घर से निकला नरेश उस रात घर वापस नहीं आया तो दूसरे दिन अलसुबह ऊषा ने इस की जानकारी अपने पड़ोसियों को दी. पड़ोसी भी नरेश की हरकतों से वाकिफ थे. उन्होंने ऊषा से कहा, ‘‘रात में ज्यादा टिका ली होगी तो कहीं सो गया होगा. जब होश आएगा तो खुदबखुद आ जाएगा.’’

जब दोपहर होने तक भी नरेश घर नहीं लौटा और न ही उस का कोई पता चला तो 11 जनवरी की शाम को ऊषा ने पनागर पुलिस थाने में जा कर उस की गुमशुदगी की सूचना दर्ज कराई.

ऊषा ने पुलिस को बताया कि उस का पति नरेश मिश्रा खेतीकिसानी के साथ खुद की बोलेरो चलाता है. उस ने हाल ही में आधा एकड़ खेत बेच कर बोलेरो खरीदी थी. गांव में उस की सोहबत ठीक नहीं है. अकसर गांव के लड़कों से उस का झगड़ा होता रहता है.

ऊषा ने बताया कि 10 जनवरी को भी नरेश का गांव के बाहर बनी पुलिया पर गांव के युवकों से विवाद हो गया था, उस झगड़े के बाद से उस का पता नहीं चल रहा है. उसे अंदेशा है कि कोई उसे शराब पिला कर कोई अनहोनी न कर दे. पनागर पुलिस थाना के टीआई ने ऊषा की सूचना दर्ज करते हुए जल्द ही उसे खोजने का भरोसा दिया.

12 जनवरी की सुबह पनागर पुलिस थाने के टीआई आर.के. सोनी नरेश मिश्रा की गुमशुदगी की जांच कर ही रहे थे कि उन के मोबाइल पर घंटी बज उठी. जैसे ही काल रिसीव की दूसरी तरफ से आवाज आई, ‘‘साब, मैं मछला गांव से सुखचैन गोंटिया बोल रहा हूं, गांव के नरेश मिश्रा का कटा हुआ सिर मछला गांव से 50 मीटर दूर बेलखाड़ू रोड पर उस के ही भतीजे अशोक के खेत में पड़ा हुआ है.’’

टीआई जानते थे कि नरेश मिश्रा का भतीजा अधारताल सीएसपी के यहां रीडर है. इस बजह से उन्होंने इस सूचना पर तत्काल एक्शन लेते हुए पुलिस के आला अधिकारियों को सूचना दे दी. इस के बाद पनागर पुलिस टीम, एफएसएल, डौग स्क्वायड टीम घटनास्थल पर पहुंच गई.

पुलिस टीम ने देखा कि सिर को किसी चीज से बेरहमी से कुचला गया था. पुलिस टीम ने धड़ की तलाश शुरू कर दी. आसपास के इलाकों की सघन चैकिंग के दौरान खून के दागधब्बों के निशान देख कर आखिरकार पुलिस धड़ को खोजने में भी कामयाब हो गई.

दोपहर में 100 मीटर दूर रोड के दूसरी ओर धड़ मिल गया. धड़ के पास काफी खून फैला हुआ था. खून छिपाने के लिए उस पर मिट्टी डाल दी गई थी. पनागर पुलिस ने अनुमान लगाया कि जहां धड़ मिला है, वहां पर ही घटना को अंजाम दिया गया होगा. उस के जांघ व सिर पर भी वार करने के निशान मिले.

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गांव के खेत में कटा सिर मिलने से पूरे इलाके में सनसनी फैल गई और लोगों की भीड़ उसे देखने जमा हो गई थी. गांव के लोगों ने कपड़ों के आधार पर पहचान कर इस बात की पुष्टि कर दी कि धड़ भी नरेश मिश्रा का ही है.

इसी बीच नरेश की पत्नी ऊषा भी खबर लगते ही खेत पर पहुंच गई और नरेश मिश्रा के सिर और धड़ के पास जा कर जोरजोर से रोने लगी. किसी तरह गांव के लोगों ने उसे समझाबुझा कर वहां से दूर किया. सिर को ले कर 2 तरह की बातें सामने आ रही थीं. सिर या तो वहां आरोपी ने जानबूझ कर पुलिस को भ्रमित करने के लिए फेंका होगा या फिर किसी जानवर ने वहां खींच कर पहुंचा दिया होगा. सिर व धड़ को बेरहमी से कुल्हाड़ी से काट कर अलग करने की बात कही जा रही है. घटनास्थल पर शराब की खाली बोतल भी मिली थी.

जबलपुर जिले में इस से पहले तिलवारा में इसी तरह सिर काट कर हत्या करने का सनसनीखेज मामला सामने आ चुका था. तिलवारा में प्रेम विवाह से नाराज धीरज शुक्ला ने 11 मार्च, 2021 को जीजा विजेत कश्यप की कुल्हाड़ी से गरदन उड़ा दी थी और बोरी में सिर ले कर वह खुद ही तिलवारा थाने पहुंच गया था.

इसी तरह 28 नवंबर, 2021 को परासिया झिरी गांव में 60 साल के गया प्रसाद कुसराम की गरदन काट कर हत्या कर दी गई. उस की गरदन 30 नवंबर को एक किलोमीटर दूर पुराने शमशान घाट में जमीन में गड़ी मिली थी.

इस तरह की तीसरी वारदात होने से जबलपुर जिले के एसपी सिद्धार्थ बहुगुणा, एडीशनल एसपी संजय अग्रवाल, एसपी (सिटी) प्रियंका करचाम भी उसी दिन शाम को मछला गांव पहुंचे. गांव में दहशत का माहौल था और लोगों में आक्रोश भी.

 

मामले की गंभीरता को देखते हुए एसपी (जबलपुर)  सिद्धार्थ बहुगुणा द्वारा मौके पर उपस्थित अधिकारियों को आवश्यक दिशानिर्देश देते हुए शीघ्र पतासाजी कर आरोपियों की गिरफ्तारी के निर्देश दिए.

एडीशनल एसपी संजय कुमार अग्रवाल एवं गोपाल खांडेल तथा एसपी (सिटी)  प्रियंका करचाम के मार्गदर्शन में उन्होंने एक टीम का गठन किया.

टीम में थानाप्रभारी आर.के. सोनी, एसआई अंबुज पांडे, आकाशदीप साहू, एएसआई ब्रह्मदत्त दूबे, संतोष पांडेय, कांस्टेबल राममिलन, विनय जायसवाल, देशपाल, कुलदीप, मोनू करारे, विवेक, नरेंद्र, लेडी कांस्टेबल मोनिका, अभिलाषा एवं क्राइम ब्रांच जबलपुर के एएसआई रामसनेही शर्मा, हैडकांस्टेबल अजीत पटेल, हरिशंकर गुप्ता, अरविंद, कांस्टेबल राजेश केवट आदि को शामिल किया गया.

एफएसएल टीम की डा. सुनीता तिवारी द्वारा मौके की पूरी कर लेने के बाद पुलिस ने शव पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. फिर पुलिस टीम जांच में जुट गई.

पुलिस ने सब से पहले गांव के उन 5 लड़कों को बुला कर पूछताछ की, जिन से नरेश का उसी दिन विवाद हुआ था. पूछताछ में यह बात सामने आई कि नरेश को उसी रात 8 बजे नरेश के जिगरी दोस्त अखिलेश विश्वकर्मा के साथ देखा गया था.

पुलिस ने जब नरेश के मोबाइल की काल डिटेल्स निकाली तो पता चला कि घटना वाले दिन उस की अखिलेश से बातचीत हुई थी. इस के बाद पुलिस ने अखिलेश के फोन नंबर की भी काल डिटेल्स निकलवाई. उस से यह पता चला कि अखिलेश की बातचीत नरेश की पत्नी ऊषा से कई बार हुई थी.

घटना वाली रात को भी 11 बजे दोनों की बातचीत हुई थी. इसी काल डिटेल्स के आधार पर पुलिस ने अखिलेश विश्वकर्मा से पूछताछ की तो पहले वह पुलिस को गुमराह करता रहा, लेकिन पुलिस की सख्ती के आगे वह जल्द ही टूट गया. पुलिस पूछताछ में अखिलेश ने नरेश मिश्रा की हत्या का जुर्म कुबूल करते हुए जो कहानी बताई, उसे जान कर लोग हैरान रह गए.

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कहानी की शुरुआत आज से 7 साल पहले 2015 में हुई थी. अपने मातापिता की इकलौती संतान नरेश मिश्रा पनागर में ट्रक चलाता था. एक दिन ट्रक ले कर वह घर लौट रहा था. रात का वक्त था, उस ने सोचा कि किसी ढाबे पर खाना खा कर ही वह घर की तरफ रवाना होगा.

कटनी के एक ढाबे पर ट्रक खड़ा कर वह खाना खाने के लिए रुका. वह ढाबे पर बिछी खाट पर बैठा कुछ सोच रहा था कि पानी ले कर आई एक युवती की आवाज से उस का ध्यान टूटा गया, ‘‘लो उस्ताद पानी पी लो.’’

नरेश ने उस युवती को देखा तो बस देखता ही रह गया. बाद में पता चला कि तीखे नाकनक्श वाली उस युवती का नाम ऊषा कुशवाहा है. ऊषा की शादी कटनी के पास के एक गांव में हुई थी और उस का 6 साल का एक बेटा भी था. उस का पति कोई कामधंधा करने के बजाय आवारागर्दी कर शराब पीता था.

घर में खाने के लाले थे. ऊषा अपने बच्चे को पढ़ालिखा कर कुछ बनाना चाहती थी. इसी वजह से उस ने ढाबे में खाना बनाने के साथ ग्राहकों को चायपानी देने का काम करना शुरू कर दिया था. 25 साल की ऊषा भरे हुए बदन की थी. उसे देख कर नरेश कुछ ऐसा मोहित हुआ कि वह रोज ही ढाबे पर आनेजाने लगा.

बातों ही बातों में नरेश उसे अपना दिल दे बैठा. पति से प्रताडि़त ऊषा को किसी पुरुष की सहानुभूति की जरूरत थी, लिहाजा वह भी अपनी भरी जवानी पर काबू न रख सकी. जब नरेश ने उस के साथ शादी करने का प्रस्ताव रखा तो ऊषा ने नरेश को बता दिया था कि वह शादीशुदा और 6 साल के बेटे की मां है.

नरेश इस की परवाह न करते हुए उस से शादी करने को राजी हो गया. ऊषा कटनी से पति को छोड़ कर बेटे संग नरेश के साथ मचला आ गई. नरेश की इस शादी को ले कर गांव में विरोध हुआ था. नरेश पहले ऊषा को ले कर अपने घर आया तो उस के मातापिता ने उसे खूब खरीखोटी सुनाई. गांव में भी जातिबिरादरी के लोगों ने नरेश के इस तरह एक महिला को रखने पर ऐतराज जताया.

धुन के पक्के नरेश ने किसी की नहीं मानी और उस ने ऊषा से विधिवत शादी रचा ली और बाद में ऊषा अपने बेटे के साथ आ कर नरेश के घर में पत्नी बन कर रहने लगी.

इस बीच नरेश के मातापिता का निधन हो गया और सारी प्रौपर्टी उस के नाम हो गई. ऊषा का बेटा अब 13 साल का हो गया था. ऊषा नरेश पर अपने बेटे के नाम कुछ प्रौपर्टी करने का दबाव बना रही थी, पर नरेश इस के लिए तैयार नहीं था. क्योंकि उस की खुद की कोई औलाद नहीं हुई थी.

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नरेश शराब के नशे में ऊषा से झगड़ा और मारपीट भी करने लगा, जिस के कारण ऊषा का झुकाव अखिलेश नाम के युवक की तरफ हुआ.

 

अखिलेश और नरेश अच्छे दोस्त थे. नरेश रंगीनमिजाज था. उस के गांव की एक महिला से अवैध संबंध थे, जिस की जानकारी उस की पत्नी ऊषा को हो गई थी. इस बात को ले कर अकसर ही उन के बीच झगड़ा होता रहता था.

ऊषा सोचती कि जिस प्यार के लिए उस ने अपने पति को छोड़ दिया उसे वह प्यार भी नसीब नहीं हो रहा.

अखिलेश गांव के ही गिरिजाप्रसाद विश्वकर्मा का बेटा था. नशाखोरी की वजह से 32 साल की उम्र होने के बाद भी उस की शादी नहीं हुई थी. नरेश के साथ रहने से उसे मुफ्त की शराब पीने को मिलती थी.

दोनों ही अकसर गांव में साथसाथ घूमतेफिरते और साथ शराब पीते थे. सन 2019 में नरेश ने अपनी फितरत के अनुसार मौका पा कर अखिलेश की भाभी के साथ दुष्कर्म करने की कोशिश की थी, जिस की रिपोर्ट पनागर थाने में दर्ज की गई थी. मगर पैसों का लालच दे कर उस समय मामला रफादफा हो गया था.

उसी समय से अखिलेश मन ही मन नरेश से रंजिश रखने लगा था. उस के साथ बैठ कर वह शराब तो पीता था, मगर हरदम नरेश से बदला लेने की फिराक में रहता था.

अखिलेश मौका पा कर नरेश की पत्नी से भी मेलजोल बढ़ाने लगा था. अखिलेश नरेश से मिलने अकसर उस के घर आता रहता था. नरेश की पत्नी ऊषा भी उस की खूब आवभगत करती थी.

 

एक दिन जब अखिलेश नरेश से मिलने आया तो नरेश और उस का बेटा घर पर मौजूद नहीं थे. ऊषा ने अखिलेश से बातचीत के दौरान अपनी परेशानी बताई. उस ने कहा, ‘‘लगता है मेरे पति का मुझ से मन भर गया है और वह किसी दूसरी औरत में दिलचस्पी लेने लगा है.’’

इस पर अखिलेश बोला, ‘‘घर में जिस की इतनी खूबसूरत बीवी हो वह भला और कहीं और मुंह क्यों मारेगा.’’

ऊषा अपनी खूबसूरती की तारीफ सुनते ही शरमा कर बोली, ‘‘हमारी खूबसूरती किसे दिखती है.’’

‘‘भाभी, हमें तो तुम अप्सरा लगती हो. हमारी शादी तुम से हुई होती तो हम तो तुम्हारे कदमों में चांदतारे बिछा देते,’’ अखिलेश ने अपने मन की बात कह डाली.

‘‘तुम ठिठोली तो खूब कर लेते हो, पर तुम्हें मेरी कोई फिक्र ही नहीं है,’’ ऊषा ने शिकायती लहजे में कहा.

‘‘ऐसा नहीं है भाभी, मुझ से तुम्हारी हालत देखी नहीं जाती. मुझे मालूम है कि नरेश तो शराब पी कर तुम्हें मारतापीटता भी है. उसे तुम्हारे बेटे से भी कोई मतलब नहीं है. अगर उस के दिल में तुम्हारे और बेटे के प्रति जरा सी चाहत होती तो अपनी प्रौपर्टी उस के नाम नहीं कर देता.’’ अखिलेश सहानुभूति जताते हुए बोला.

‘‘मैं तंग आ गई हूं कब ऐसे मर्द से छुटकारा मिले,’’ ऊषा बोली.

‘‘भाभी, इस ने मेरी भाभी के साथ संबंध बनाने का प्रयास किया था, तब से मेरे अंदर भी इंतकाम की आग जल रही है. तुम कहो तो इसे रास्ते से हटा दूं.’’ अखिलेश ने ऊषा का मन जानने के लिए कहा.

‘‘सचमुच यदि तुम ऐसा कर दो तो मैं तुम्हें 2 लाख रुपए दूंगी,’’ ऊषा बोली.

‘‘तो भाभी, समझो काम हो गया. तुम बस रुपयों का इंतजाम कर लो,’’ पैसे के लालच और बदले की भावना से ग्रस्त अखिलेश ने ऊषा का प्रस्ताव मानते हुए कहा.

ऊषा अब नरेश से छुटकारा पाने का मन बना चुकी थी. जैसे ही उसे अखिलेश की शह मिली, वह पति को जान से मरवाने की योजना बनाने लगी. नरेश ने कुछ समय पहले अपनी आधा एकड़ जमीन बेच कर एक बोलेरो गाड़ी खरीदी थी, जिसे वह खुद किराए पर चलाता था. बाकी पैसे उस ने घर पर ही रखे थे. ऊषा ने सोचा कि घर में रखे हुए नरेश के पैसों से 2 लाख रुपए अखिलेश को दे कर नरेश का कत्ल करा कर वह उस की प्रौपर्टी की मालिक हो जाएगी. अखिलेश को पैसों के लालच के साथ नरेश से बदला लेना था.

अखिलेश तैयार हो गया तो ऊषा ने ही नरेश की हत्या के लिए उसे एक फरसा भी दिया. जिसे पहले ही खेत में एक पेड़ के नीचे छिपा कर अखिलेश ने रख दिया था.

तय साजिश के मुताबिक 10 जनवरी, 2022 की शाम अखिलेश ने नरेश को फोन किया और गांव के बाहर श्याम मिश्रा के खेत में शराब पीने के लिए बुलाया. दोनों ने साथ में बैठ कर शराब पी. नरेश को अखिलेश ने ज्यादा शराब पिला दी, जिस से वह नशे में धुत्त हो कर बेसुध हो गया.

इस के बाद अखिलेश ने पहले से खेत में छिपा कर रखा फरसा निकाला और 4-5 वार कर नरेश की गरदन पर कर धड़ से अलग कर दी. अखिलेश शातिर दिमाग का था. कुछ देर इंतजार करने के बाद जब नरेश के सिर से खून निकलना बंद हो गया तो उस ने नरेश का सिर उठा कर रोड के दूसरी तरफ सुखचैन गोटियां के पीछे अशोक पटेल के खेत में ले जा कर फेंक दिया.

अखिलेश ने सोचा कि सुखचैन एवं अशोक पर नरेश की हत्या का शक पुलिस करेगी. क्योंकि अखिलेश को पता था कि सुखचैन गोटियां और नरेश के बीच मनमुटाव रहने से हमेशा विवाद होता रहता था.

इतना ही नहीं, नरेश की हत्या करने के बाद अखिलेश ने ऊषा को काम पूरा होने की खबर मोबाइल से दी और खून से सना फरसा घर के आंगन में फेंक वह घर चला गया, जिसे ऊषा ने धो कर घर में ही छिपा दिया था. नरेश की हत्या के बाद ऊषा ने पहले थाने जा कर उस की गुमशुदगी की सूचना लिखवाई. लाश मिलने पर अखिलेश और ऊषा दोनों दुखी होने का नाटक करते रहे. पुलिस ने जब पूछताछ की तो सारी कहानी सामने आ गई.

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पुलिस ने नरेश की पत्नी ऊषा मिश्रा को हिरासत में ले कर पूछताछ की तो उस ने भी स्वीकार कर लिया कि पति से परेशान हो कर उसे उस की हत्या कराने के लिए मजबूर होना पड़ा. पुलिस ने अखिलेश और ऊषा की निशानदेही पर घटना में प्रयुक्त फरसा एवं घटना के वक्त उपयोग में लाए गए 2 मोबाइल फोन बरामद कर लिए. दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर पुलिस ने जबलपुर न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

एसपी सिद्धार्थ बहुगुणा ने 24 घंटे के अंदर केस का खुलासा करने वाली पुलिस टीम की सराहना की.

—कथा पुलिस सूत्रों और मीडिया रिपोर्ट पर आधारित

 

बीमारी नहीं आत्मसम्मान की लड़ाई है विटिलिगो

राह चलते कई बार हमने अपने आस पास ऐसे लोगों को देखा होगा जिनकी सफेद धब्बे वाली स्किन होती है. कई लोगों का मानना होता है की मछली खाने के बाद दूध पीने से ये समस्या होती है. उन लोगों को देखते ही हम मन में कई ऐसी धारणाएं बना लेते है या फिर उनसे घृणा कर, दूर रहने की कोशिश करते है. हां ये पढ़ते समय आपको जरुर लगेगा की नहीं हम ऐसा नहीं करते पर भारत जैसे देश में जहां शरीर का रंग खूबसूरती से जोड़ा जाता है वहां इस तरह का भेदभाव होना कोई खास बात नहीं है.

25 जून को वर्ल्‍ड विटिलिगो डे (World Vitiligo Day)  पूरे दुनिया में मनाया जाता हैं. इस बीमारी के शारीरिक प्रभाव तो अमूमन सभी जानते है पर क्या इस बीमारी से परेशान लोगों की मानसिक स्थिति से आप वाकिफ हैं?

आपको जानकर हैरानी होगी की विटिलिगो वाले लोग आत्मविश्वास और आत्म-सम्मान से संबंधित मुद्दों से काफी जूझते हैं, खासकर अगर उनकी स्थिति ज्यादा नजर आने वाली होती है तब लोगों में सामान्य संवेदना ना होने के कारण विटिलिगो के रोगियों को भावनात्मक रूप से काफी परेशानी होती है.

क्या है विटिलिगो

जिन्हें बिल्कुल भी जानकारी नहीं है, उनके लिए विटिलिगो एक त्वचा की  समस्या/बीमारी है जहां पीले सफेद पैच त्वचा पर आना शुरू हो जाते हैं. मेलेनिन(Melanin) की कमी की वजह से डिपिग्मेंटेशन होता है. विटिलिगो त्वचा के किसी भी हिस्से में हो सकता है, लेकिन आम तौर पर यह चेहरे, गर्दन, हाथों और त्वचा की क्रीज जहां बनती हैं, वहां होने की संभावना ज्यादा होती है. लेकिन विटिलिगो एक जानलेवा बीमारी नहीं है, फर्स्ट स्टेज में किसी व्यक्ति को सुनने की शक्ति में कमी होना, आंखों में जलन और सनबर्न स्किन का अनुभव हो सकता है.

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मनोवैज्ञानिक प्रभाव क्या है

विटिलिगो से पीड़ित लोगों को अक्सर अपने दोस्तों, परिवार और साथियों से भेदभावपूर्ण व्यवहार का सामना करना पड़ता हैं. कुछ को तो स्कूल में ही छेड़ा और तंग किया जाता है, जो उन्हें गहराई से मनोवैज्ञानिक स्तर पर प्रभावित करता है.

विटिलिगो मरीजों के लिए क्या करें?

  • किसी भी मनोवैज्ञानिक स्थिति के लिए विटिलिगो वाले रोगियों का मूल्यांकन किया जाना चाहिए. डिप्रेशन और चिंता के लक्षणों की नियमित जांच के साथ-साथ रोगी के जीवन की गुणवत्ता का आकलन सबसे महत्वपूर्ण है.
  • मरीजों को त्वचा विशेषज्ञ और मनोवैज्ञानिक दोनों से मदद लेनी चाहिए.
  • चिकित्सा देखभाल के अलावा रोगियों के लिए सुरक्षित और सामाजिक रूप से स्वस्थ वातावरण सुनिश्चित करने के लिए विटिलिगो के लिए सार्वजनिक संवेदीकरण कार्यक्रम भी किए जाने चाहिए.

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बहुत हद तक ग्लोबल साईकोलोजी पहले ही विकसित होना शुरू हो गया है. लोगों में विटिलिगो के बारे में जागरूकता और लोगों के बीच बेहतर संवेदनशीलता बढ़ रही है. विटिलिगो से पीड़ित लोगों को अपना समर्थन देने के लिए विभिन्न फाउंडेशन और सपोर्ट ग्रुप आगे आ रहे हैं. हालांकि, भारत में जागरूकता की स्थिति अभी भी बहुत अच्छी नहीं है. अधिक जागरूकता वाले अभियान और सार्वजनिक संवेदीकरण कार्यक्रम के साथ, हम अधिक समावेशी भविष्य की आशा कर सकते हैं. विटिलिगो कोई छुआछूत की बीमारी नही है, इससे डरने या उन पीड़ितो से भागने की बजाएं उनका साथ दे और उनके आत्मसम्मान पर कोई आंच ना आने दे.

जीने की इच्छा : कैसे अरुण ने दिखाया बड़प्पन

‘‘जल्दी करो मां. मुझे देर हो रही है. फिर ट्रेन में जगह नहीं मिलेगी,’’ अरुण ने कहा.

मां बोलीं, ‘‘तेरी गाड़ी तो 12 बजे की है. अभी तो 7 भी नहीं बजे हैं.’’

‘‘मां, तुम समझती क्यों नहीं हो. मैं यार्ड में ही जा कर डब्बे में बैठ जाऊंगा. प्लेटफार्म पर सभी जनरल डब्बे बिलकुल भरे हुए ही आते हैं,’’ अरुण बोला.

उन दिनों ‘श्रमजीवी ऐक्सप्रैस’ ट्रेन पटना जंक्शन से 12 बजे खुल कर अगले दिन सुबह 5 बजे नई दिल्ली पहुंचती थी. अरुण को एक इंटरव्यू के लिए दिल्ली जाना था. अगले दिन सुबह के 11 बजे दिल्ली के दफ्तर में पहुंचना था.

अरुण के पिता किसी प्राइवेट कंपनी में चपरासी थे. अभी कुछ महीने पहले ही वे रिटायर हुए थे. वे कुछ दिनों से बीमार थे. वे किसी तरह 2 बेटियों की शादी कर चुके थे. सब से छोटे बेटे अरुण ने बीए पास करने के बाद कंप्यूटर की ट्रेनिंग ली थी. वह एक साल से बेकार बैठा था.

अरुण 1-2 छोटीमोटी ट्यूशन करता था. उस के पास स्लीपर क्लास के भी पैसे नहीं थे, इसीलिए पटना से दिल्ली जनरल डब्बे में जाना पड़ रहा था.

मां ने कहा, ‘‘बस हो गया. मैं ने  परांठा और भुजिया एक पैकेट में पैक कर दिया है. तुम याद से अपने बैग में रख लेना.’’

पिता ने भी बिस्तर पर पड़ेपड़े कहा, ‘‘जाओ बेटे, अपने सामान का खयाल रखना.’’

अरुण मातापिता को प्रणाम कर स्टेशन के लिए निकल पड़ा. यार्ड में जा कर एक डब्बे में खिड़की के पास वाली सिंगल सीट पर कब्जा जमा कर उस ने चैन की सांस ली.

ट्रेन प्लेटफार्म पर पहुंची, तो चढ़ने वालों की बेतहाशा भीड़ थी. अरुण जिस खिड़की वाली सीट पर बैठा था, वह इमर्जैंसी खिड़की थी. एक लड़की डब्बे में घुसने की नाकाम कोशिश कर रही थी. उस लड़की ने अरुण के पास आ कर कहा, ‘‘आप इमर्जैंसी खिड़की खोलें, तो मैं भी डब्बे में आ सकती हूं. मेरा इस ट्रेन से दिल्ली जाना बहुत जरूरी है.’’

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अरुण ने उसे सहारा दे कर खिड़की से अंदर डब्बे में खींच लिया.

लड़की पसीने से तरबतर थी. दुपट्टे से मुंह का पसीना पोंछते हुए उस ने अरुण को ‘थैंक्स’ कहा. थोड़ी देर में गाड़ी खुली, तो अरुण ने अपनी सीट पर जगह बना कर लड़की को बैठने को कहा. पहले तो वह झिझक रही थी, पर बाद में और लोगों ने भी बैठने को कहा, तो वह चुपचाप बैठ गई.

तकरीबन 2 घंटे बाद ट्रेन बक्सर पहुंची. यह बिहार का आखिरी स्टेशन था. यहां कुछ लोकल मुसाफिरों के उतरने से राहत मिली.

अरुण के सामने वाली सीट खाली हुई, तो वह लड़की वहां जा बैठी.

अरुण ने लड़की का नाम पूछा, तो वह बोली, ‘‘आभा.’’

अरुण बोला, ‘‘मैं अरुण.’’

दोनों में बातें होने लगीं. अरुण ने पूछा, ‘‘पटना में तुम कहां रहती हो?’’

आभा बोली, ‘‘सगुना मोड़… दानापुर के पास.’’

‘‘मैं बहादुरपुर… मैं पटना के पूर्वी छोर पर हूं और तुम पश्चिमी छोर पर. दिल्ली में कहां जाना है?’’

‘‘कल मेरा एक इंटरव्यू है.’’

‘‘वाह, मेरा भी कल एक इंटरव्यू है. बुरा न मानो, तो क्या मैं जान सकता हूं कि किस कंपनी में इंटरव्यू है?’’

आभा बोली, ‘‘लाल ऐंड लाल ला असोसिएट्स में.’’

अरुण तकरीबन अपनी सीट से उछल कर बोला, ‘‘वाह, क्या सुहाना सफर है. आगाज से अंजाम तक हम साथ रहेंगे.’’

‘‘क्या आप भी वहीं जा रहे हैं?’’

अरुण ने रजामंदी में सिर हिलाया और मुसकरा दिया. रातभर दोनों अपनीअपनी सीट पर बैठेबैठे सोतेजागते रहे थे. ट्रेन तकरीबन एक घंटा लेट हो गई थी. इस के बावजूद काफी देर से गाजियाबाद स्टेशन पर खड़ी थी. सुबह के 7 बज चुके थे. अरुण नीचे उतर कर लेट होने की वजह पता लगाने गया.

अरुण अपनी सीट पर बैठते हुए बोला, ‘‘गाजियाबाद और दिल्ली के बीच में एक गाड़ी पटरी से उतर गई है. आगे काफी ट्रेनें फंसी हैं. ट्रेन के दिल्ली पहुंचने में काफी समय लग सकता है.’’

आभा यह सुन कर घबरा गई. अरुण ने उसे शांत करते हुए कहा, ‘‘डोंट वरी. हम दोनों यहीं उतर जाते हैं. यहीं फ्रैश हो कर कुछ चायनाश्ता कर लेते हैं. फिर यहां से आटोरिकशा ले कर सीधे कनाट प्लेस एक घंटे के अंदर पहुंच जाएंगे.’’

दोनों ने गाजियाबाद स्टेशन पर ही चायनाश्ता किया. फिर आटोरिकशा से दोनों कंपनी पहुंचे. दोनों ने अलगअलग इंटरव्यू दिए. इस के बाद कंपनी के मालिक मोहनलाल ने दोनों को एकसाथ बुलाया.

मोहनलाल ने दोनों से कहा, ‘‘देखो, मैं भी बिहार का ही हूं. दोनों की क्वालिफिकेशंस एक ही हैं. इंटरव्यू में दोनों की परफौर्मेंस बराबर रही है, पर मेरे पास तो एक ही जगह है. अब तुम लोग बाहर जा कर तय करो कि किसे नौकरी की ज्यादा जरूरत है. मुझे बता देना, मैं औफर लैटर इशू कर दूंगा.’’

अरुण और आभा दोनों ने बाहर आ कर बात की. अपनीअपनी पारिवारिक और माली हालत बताई.

आभा की मां विधवा थीं. उस की एक छोटी बहन भी थी. वह पटना के कंप्यूटर इंस्टीट्यूट में पार्ट टाइम नौकरी करती थी, पर उसे बहुत कम पैसे मिलते थे. परिवार को उसी को देखना होता था.

अरुण ने आभा के पक्ष में सहमति जताई. आभा को वह नौकरी मिल गई. मालिक मोहनलाल अरुण से बहुत खुश हुआ और बोला, ‘‘नौकरी तो तुम भी डिजर्व करत थे. मैं तुम से बहुत खुश हूं. वैसे तो किराया देने का कोई करार नहीं था. फिर भी मैं ने अकाउंटैंट को कह दिया है कि तुम्हें थर्ड एसी का अपडाउन रेल किराया मिल जाएगा. जाओ, जा कर पैसे ले लो.’’

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अरुण ने पैसे ले लिए. आभा उसे धन्यवाद देते हए बोली, ‘‘यह दिन मैं कभी नहीं भूलूंगी. मिस्टर मोहनलाल ने मुझे बताया कि तुम ने मेरी खाितर बड़ा त्याग किया है.’’

दोनों ने एकदूसरे का फोन नंबर लिया और संपर्क में रहने को कहा.

अरुण जनरल डब्बे में बैठ कर पटना लौट आया. उस ने किराए का काफी पैसा बचा लिया था. मातापिता को जब पता चला कि उसे नौकरी नहीं मिली, तो वे दोनों उदास हो गए.

कुछ ही दिनों में अरुण के पिता चल बसे. अरुण किसी तरह 2-3 ट्यूशन कर अपना काम चला रहा था. जिंदगी से उस का मन टूट चुका था. कभी सोचता कि घर छोड़ कर भाग जाए, तो कभी सोचता गंगा में जाकर डूब जाए. फिर अचानक बूढ़ी मां की याद आती, तो आंखों में आंसू भर आते.

एक दिन अरुण बाजार से कुछ सामान खरीदने गया. एक 16-17 साल का लड़का अपने कंधे पर एक बैग लटकाए कुछ बेच रहा था. उस के एक पैर में पोलियो का असर था. लाठी के सहारे चलता हुआ वह अरुण के पास आ कर बोला, ‘‘भैया, क्या आप को पापड़ चाहिए? 10 रुपए का एक पैकेट है.’’

अरुण ने कहा, ‘‘नहीं चाहिए पापड़.’’

लड़के ने थैले से एक शीशी निकाल कर कहा, ‘‘आम का अचार है. चाहिए? पापड़ और अचार दोनों घर के बने हैं. मां बनाती हैं.’’ अरुण के मन में दया आ गई. उस के पास 5 रुपए ही बचे थे. उस ने लड़के को देते हुए कहा, ‘‘मुझे कुछचाहिए तो नहीं, पर तुम इसे रख लो.’’

अरुण ने रुपए उस के हाथ में पकड़ा दिए. दूसरे ही पल वह लड़का गुस्से से बोला, ‘‘मैं विकलांग हूं, पर भिखारी नहीं. मैं मेहनत कर के खाता हूं. जिस दिन कुछ नहीं कमा पाता, मांबेटे पानी पी कर सो जाते हैं.’’

इतना बोल कर उस लड़के ने रुपए अरुण को लौटा दिए. पर वह अरुण की आंखों में उम्मीद की किरण जगा गया. वह सोचने लगा, ‘जब यह लड़का जिंदगी से हार नहीं मान सकता है, तो मैं क्यों मानूं?’

अरुण के पास दिल्ली में मिले कुछ रुपए बचे थे. वह कोलकाता गया. वहां के मंगला मार्केट से थोक में कुछ जुराबें, रूमाल और गमछे खरीद लाया. ट्यूशन के बाद बचे समय में न्यू मार्केट और महावीर मंदिर के पास फुटपाथ पर उन्हें बेचने लगा.

इस इलाके में सुबह से ले कर देर रात तक काफी भीड़ रहती थी. अरुण की अच्छी बिक्री हो जाती थी.

शुरू में अरुण को कुछ झिझक होती थी, पर बाद में उस का इस में मन लग गया. इस तरह उस ने देखा कि एक हफ्ते में तकरीबन 7-8 सौ रुपए, तो कभी हजार रुपए की बचत होती थी.

इस बीच बहुत दिन बाद उसे आभा का फोन आया. उस ने कहा, ‘‘अगले हफ्ते मेरी शादी होने वाली है. कार्ड पोस्ट कर दिया है. तुम जरूर आना और मां को भी साथ लाना.’’

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अरुण मां के साथ आभा की शादी में सगुना मोड़ उस के घर गया. आभा ने अपनी मां, बहन और पति से उन्हें मिलवाया और कहा, ‘‘मैं जिंदगीभर अरुण की कर्जदार रहूंगी. मुझे नौकरी अरुण की वजह से ही मिली थी.’’

शादी के बाद आभा दिल्ली चली गई. अरुण की दिनचर्या पहले जैसी हो गई.

एक दिन आभा का फोन आया. उस ने कहा, ‘‘मेरे पति गुड़गांव की एक गारमैंट फैक्टरी में डिस्पैच सैक्शन में हैं. फैक्टरी से मामूली डिफैक्टिव कपड़े सस्ते दामों में मिल जाते हैं. तुम चाहो, तो इन्हें बेच कर अच्छाखासा मुनाफा कमा सकते हो.’’

अरुण बोला, ‘नेकी और पूछपूछ… मैं गुड़गांव आ रहा हूं.’

इधर अरुण उस पापड़ वाले लड़के का स्थायी ग्राहक हो गया था. उस का नाम रामू था. हर हफ्ते एक पैकेट पापड़ और अचार की शीशी उस से लिया करता था. अब अरुण महीने 2 महीने में एक बार दिल्ली जा कर कपड़े लाता और उन्हें अच्छे दाम पर बेचता.

धीरेधीरे अरुण का कारोबार बढ़ता गया. उस ने कंकड़बाग में एक छोटी सी दुकान किराए पर ले ली थी. बीचबीच में कोलकाता से भी थोक में कपड़े लाया करता. कारोबार बढ़ने पर उस ने एक बड़ी दुकान ले ली.

अरुण की शादी थी. उस ने आभा को भी बुलाया. वह भी पति के साथ आई थी. अरुण ने उस पापड़ वाले लड़के को भी अपनी शादी में बुलाया था.

शादी हो जाने के बाद जब अरुण अपनी मां के साथ मेहमानों को विदा कर रहा था, अरुण ने आभा को उस की मदद के लिए थैंक्स कहा.

आभा ने कहा, ‘‘अरे यार, नो मोर थैंक्स. हिसाब बराबर. हम दोस्त  हैं.’’

फिर अरुण ने रामू को बुला कर सब से परिचय कराते हुए कहा, ‘‘आज मैं जोकुछ भी हूं, इस लड़के की वजह से हूं. मैं तो जिंदगी से निराश हो चुका था. मेरे अंदर जीने की इच्छा को इस स्वाभिमानी मेहनती रामू ने जगाया.’’

तब अरुण रामू से बोला, ‘‘मुझे अपनी दुकान में एक सेल्समैन की जरूरत है. क्या तुम मेरी मदद करोगे?’’

रामू ने हामी भर कर सिर झुका कर अरुण को नमस्कार किया.

अरुण बोला, ‘‘अब तुम्हें घूमघूम कर सामान बेचने की जरूरत नहीं है. मैं ने यहां के विधायक को अर्जी दी है तुम्हें अपने फंड से एक तिपहिया रिकशा देने की. तुम उसे आसानी से चला सकते हो और आजा सकते हो.’’

अरुण, आभा, रामू और बाकी सभी की आंखें खुशी से नम थीं. तीनों एकदूसरे के मददगार जो बने थे.

ममा मेरा घर यही है

बेटी पारुल से फोन पर बात खत्म होते ही मेरे मस्तिष्क में अतीत के पन्ने फड़फड़ाने लगे. पति के औफिस से लौटने का समय हो रहा था, इसलिए डिनर भी तैयार करना आवश्यक था. किचन में यंत्रचालित हाथों से खाना बनाने में व्यस्त हो गई. लेकिन दिमाग हाथों का साथ नहीं दे रहा था.

बचपन से ही पारुल स्वतंत्र विचारों वाली, जिद्दी लड़की रही है. एक बार जो सोच लिया, सो सोच लिया. होस्टल में रहते हुए उस ने कभी मुझे अपनी छोटीबड़ी समस्याओं में नहीं उलझाया, उन को मुझे बिना बताए ही स्वयं सुलझा लेती थी. इस के विपरीत, मैं अपने परिचितों को देखती थी कि जबतब उन के बच्चों के फोन आते ही, उन की समस्याओं का समाधान करने के लिए उन के होस्टल पहुंच जाया करते थे.

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एक दिन अचानक जब पारुल ने अपना निर्णय सुनाया कि एक लड़का रितेश उसे पसंद करता है और वह भी उस को चाहती है, दोनों विवाह करना चाहते हैं तो मैं सकते में आ गई और सोच में पड़ गई कि जमाना खराब है, किसी ने अपने जाल में उसे फंसा तो नहीं लिया. देखने में सुंदर तो वह है ही, उम्र भी अभी अपरिपक्व है, पूरी 22 वर्ष की तो हुई है अभी. ये सब सोच कर मैं बहुत चिंतित हो गई कि यदि उस ने सही लड़के का चयन नहीं किया होगा और जिद की तो वह पक्की है ही, तो फिर क्या होगा.

कुछ दिनों के सोचविचार के बाद तय हुआ कि रितेश से मिला जाए. पारुल के जन्मदिन पर उस को आमंत्रित किया गया और वह आ भी गया. वह सुदर्शन था, एमबीए की पढ़ाई पूरी कर के किसी नामी कंपनी में सीनियर पोस्ट पर कार्यरत था. पढ़ाई में आरंभ से ही अव्वल रहा. वह हम सब को बहुत भा गया था. केवल विजातीय होने के कारण विरोध करने का कोई औचित्य नहीं लगा. हम ने विवाह की स्वीकृति दे दी. लेकिन रितेश के  मातापिता ने आरंभ में तो रिश्ता करने से साफ इनकार कर दिया था, लेकिन इकलौते बेटे की जिद के कारण उन्हें घुटने टेकने पड़े और विवाह धूमधाम से हो गया. पारुल अनचाही बहू बन कर ससुराल चली गई.

पारुल अपने मधुर स्वभाव के कारण ससुराल में सब की चहेती बन गई. सब के दिल में स्थान बनाने के लिए उसे बहुत संघर्ष करना पड़ा क्योंकि ऐसा करने में उसे रितेश का सहयोग प्राप्त नहीं हुआ. उस ने पाया कि रितेश का अपने परिवार से तालमेल ही नहीं था. बिना लिहाज के अपने मातापिता को कभी भी कुछ भी बोल देता था. पारुल हैरान होती थी कि कोईर् अपने जन्मदाता से ऐसा व्यवहार कैसे कर सकता था. उसे समझाने की कोशिश करती तो वह और भड़क जाता था.

धीरेधीरे उस को एहसास हुआ कि दोष उस में नहीं, उस की परवरिश में है. उस के अपने मातापिता के विपरीत, रितेश के मातापिता उस की भावनाओं की कभी भी कद्र नहीं करते थे. अब इतना बड़ा हो गया था, फिर भी उस की बात को महत्त्व नहीं देते थे, जिस का परिणाम होता था कि वह आक्रोश में कुछ भी बोल देता था. कभीकभी पारुल असमंजस की स्थिति में आ जाती थी कि किस का साथ दे, मातापिता की गलती देखते हुए भी बड़े होने का लिहाज कर के उन को कुछ भी नहीं बोल पाती थी.

एक दिन मांबेटे में विवाद इतना बढ़ गया कि रितेश ने तुरंत अलग घर लेने का निर्णय ले डाला. पारुल ने उसे बहुत समझाया, लेकिन वह अपने इरादे से टस से मस नहीं हुआ. वह क्या करती, मां ने भी अपने अहं के कारण उसे नहीं रोका. वह दोनों के बीच पिस गई. अंत में उसे पतिधर्म निभाना ही पड़ा.

अपने परिवार से अलग होने के बाद तो रितेश और भी मनमाना हो गया. जो लड़का विवाह के पहले कभी अपनी मां से ही नहीं जुड़ा, वह अपनी पत्नी से क्या जुड़ेगा. विवाह जैसे प्यारभरे बंधन के रेशमी धागे उसे लोहे की जंजीरें लगने लगीं. आरंभ से ही होस्टल में स्वच्छंद रहने वाले रितेश को विवाह एक कैद लगने लगा.

एक दिन अचानक रितेश का फोन मेरे पास आया, बोला, ‘अपनी बेटी को समझाओ, बच्ची नहीं है अब…’ इस से पहले कि वह अपनी बात पूरी करे, पारुल ने उस के हाथ से फोन ले लिया और कहा, ‘ममा, आप बिलकुल परेशान मत होना. ऐसे ही इस ने बिना सोचेसमझे आप को फोन घुमा लिया. छोटेमोटे झगड़े तो होते ही रहते हैं.’ लेकिन रितेश को पहली बार इतनी अशिष्टता से बात करते हुए सुन कर मैं सकते में आ गई, सोचने लगी कि उन की अपनी पसंद का विवाह है, फिर क्या समस्या हो सकती है.

एक बार मैं ने और मेरे पति ने मन बनाया कि पारुल के यहां जा कर उस का घर देखा जाए. उस ने कईर् बार बुलाया भी था. विचार आते ही हम दोनों पुणे पहुंच गए. वे दोनों स्टेशन लेने आए थे. सालभर बाद हम उन से मिल रहे थे. मिलते ही मेरी दृष्टि पारुल के चेहरे पर टिक गई. उस का चेहरा पहले से अधिक कांतिमय लग रहा था. सुंदर तो वह पहले से ही थी, अब अधिक लावण्यमयी लग रही थी. मुझे याद आया कि जब रितेश के मातापिता ने विवाह से इनकार कर दिया था तो उस का चेहरा कितना सूखा और निस्तेज लगता था, तब हम कितना घबरा गए थे. आज उस को देख कर बहुतबहुत तसल्ली हुई थी.

10 किलोमीटर की दूरी पर उन का घर था. वहां पहुंच कर मैं ने पाया कि वह 2 बैडरूम का घर था. पारुल ने अपने घर को बहुत व्यवस्थित ढंग से सजा रखा था. घर के रखरखाव में तो उसे बचपन से ही बहुत रुचि थी. यह देख कर बहुत संतोष हुआ कि सासससुर के साथ रहते हुए, रितेश का उन से तालमेल न होने के कारण रातदिन  जो विवाद होते थे, वे समाप्त हो गए हैं और वे दोनों आपस में बहुत प्रसन्न हैं.

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लेकिन मेरा यह भ्रम शीघ्र ही टूट गया. अगले दिन ही सुबह मैं ने देखा कि रितेश पारुल को छोटीछोटी बातों में नीचा दिखाने से नहीं चूकता था, चाहे उस के खाने का, कपड़े पहनने का या खाना बनाने का ढंग हो. वह उस के किसी भी कार्यकलाप से खुश नहीं रहता था. बातबात में उसे ताने देता रहता था कि उस को कुछ नहीं आता, वह कुछ नहीं कर सकती.

पारुल चुपचाप सुनती रहती थी. रितेश की उस से इतनी अधिक अपेक्षाएं रहती थीं कि उन को पूरा करना उस के वश की बात नहीं थी. उस के जिन गुणों, उस का मासूम लुक देता चेहरा, उस की नाजुकता, उस की मीठी आवाज, के कारण विवाह से पहले उस पर रीझा था, वे सब उस के लिए बेमानी हो गए थे.

हम दोनों अवाक उस की बेसिरपैर की बातें सुनते थे. मैं मन ही मन सोचती रहती थी कि क्या यही प्रेमविवाह की परिणति होती है. रितेश ने जिस से विवाह करने के लिए एक बार अपने मातापिता का गृह तक त्याग कर दिया था, आज उसी का व्यंग्यबाणों से कलेजा छलनी कर रहा था. दामाद था इसलिए उसे क्या कहते, लेकिन, आखिर कब तक?

एक दिन मेरे सब्र का बांध टूट गया और मैं पारुल से बोली, ‘चल, अभी हमारे साथ वापस चल. हम ने देख लिया और बहुत झेल लिया तुम लोगों का तमाशा.’ मेरे बोलते ही रितेश उठ कर घर से चला गया.

पारुल बोली, ‘ममा, मुझे उस की तो आदत पड़ गई है. मेरा उस को छोड़ कर आप के साथ जाना ठीक है क्या? ऐसी बातें तो होती रहती हैं. देखना थोड़ी देर में वह सबकुछ भूल जाएगा और सामान्य हो जाएगा.’ मैं अपनी बेटी पारुल की बात सुन कर दंग रह गई. इतनी सहनशील तो वह कभी नहीं थी पर आत्मसम्मान भी तो कोई चीज होती है. मैं ने कहा, ‘बेटा, तूने उस के इस बरताव के बारे में हमें कभी कुछ बताया नहीं.’

‘क्या बताती ममा, शादी भी तो मेरी मरजी से हुई थी, आप सुन कर करतीं भी क्या? लेकिन इस में रितेश की भी गलती नहीं है, ममा. आप को पता है उस की मां ने बचपन में ही उसे होस्टल में डाल दिया था. उस ने कभी जाना ही नहीं परिवार क्या होता है और उस का सुख क्या होता है. कभी उस की इच्छाओं को प्राथमिकता दी ही नहीं गई, न ही कभी कोई कार्य करने पर उसे प्रोत्साहन के दो बोल ही सुनने को मिले. इसलिए ही ऐसा है. वह दिल का बुरा नहीं है. आज उस की बदौलत ही इतनी अच्छी जिंदगी जी रही हूं. धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा. आप चिंता न करें.’

लेकिन मुझ पर उस के तर्क का कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा था. पारुल ने मेरे चेहरे के भाव पढ़ कर रितेश को फोन कर के घर आने के लिए कहा. और वह आ भी गया. दोनों ने एक ओर जा कर कोईर् बात की. उस के बाद रितेश हमारे पास आया और बोला, ‘सौरी ममापापा.’ हम दोनों का मन यह सुन कर थोड़ा हलका हुआ. हमारे लौटने का दिन करीब होने पर हम पारुल के सासससुर से मिलने गए. उस की सास ने कहा, ‘मेरी बहू पारुल तो बहुत स्वीट नेचर की है. मुझे उस से कोई शिकायत नहीं है.’ हमें यह सोच कर बहुत संतोष हुआ कि कम से कम उस की सास तो उस से बहुत प्रसन्न रहती है.

एक दिन पारुल ने जब मुझे मेरे नानी बनने का समाचार दे कर हमें चौंका दिया तो हम खुशी से फूले नहीं समाए. उस का कहना था कि उस की डिलीवरी के समय मुझे ही उस के पास रहना होगा, नहीं तो रितेश और अपनी सास के विवादों से उस समय वह परेशान हो जाएगी.

नियत समय पर मैं उस के पास पहुंच गई. उस ने चांद सी बेटी को जन्म दिया. दोनों ओर के परिवार वालों के साथ रितेश भी बहुत प्रसन्न हुआ. मैं ने मन में सोचा, पारुल के मां बनने के बाद शायद उस का बरताव उस के प्रति बदल जाए, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. मैं जब भी पारुल से उस के स्वभाव के बारे में जिक्र करती, उस का कहना होता, ‘ममा, आप उस की अच्छाइयां भी तो देखो, कितना स्वावलंबी और मेहनती है, मेरा कितना खयाल रखता है. थोड़ा जबान का वह कड़वा है, तो होने दो. अब उस की आदत पड़ गई है, जो मुश्किल से ही छूटेगी.’

मैं मां थी, मुझे तो रितेश के रवैये से तकलीफ होनी स्वाभाविक थी. 2 महीने किसी तरह निकाल कर मैं भारी मन से वापस लौट आई.

प्रिशा के जन्म के बाद पारुल ने नौकरी छोड़ दी और उस के लालनपालन में मग्न रहने लगी. लेकिन रितेश उस के इस निर्णय से बहुत क्षुब्ध रहता था. उस का कहना था कि प्रिशा को क्रैच में छोड़ कर भी तो वह नौकरी जारी रख सकती थी. उस के विचारानुसार उस के लिए सुखसुविधाओं के साधन जुटाने मात्र से उन का उस के प्रति कर्तव्यों की पूर्ति हो सकती है.

इस के विपरीत, पारुल सोचती थी कि कोई भी संस्था बच्चे के पालनपोषण में मां का विकल्प हो ही नहीं सकती. वह नहीं चाहती थी कि उस से दूर रहने के कारण वह भी अपने पापा का पर्याय बने. ऐसा कोई आर्थिक कारण भी नहीं था कि उसे मजबूरी में नौकरी करनी पड़े.

पारुल अपनी बेटी प्रिशा की बढ़ती हुई उम्र की एकएक गतिविधि का आनंद उठाना चाहती थी. उस के लालनपालन में वह किसी प्रकार का समझौता नहीं करना चाहती थी. उस की तो पूरी दुनिया ही बेटी में सिमट कर आ गई थी. जो भी देखता, उस के पालने के ढंग को देख कर प्रशंसा किए बिना नहीं रहता था. इस का परिणाम बहुत जल्दी प्रिशा की गतिविधियों में झलकने लगा था. प्रिशा अपने हावभाव से सब का मन मोह लेती थी. मुझे भी यह देख कर पारुल पर गर्व होता था. लेकिन रितेश ने तो उस के विरोध में बोलने का जैसे प्रण ले रखा था.

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पारुल की सास तो मेरे सामने उस की प्रशंसा करते हुए नहीं थकती थीं. पोती होने के बाद तो वे अकसर पारुल के पास जाती रहती थीं. अपने बेटे के पारुल के प्रति उग्र स्वभाव से वे भी बहुत दुखी रहती थीं. उन्होंने कई बार पारुल से कहा कि वह उन के साथ आ कर रहे, लेकिन उस ने मना कर दिया. उसे लगा कि रितेश के अकेले की गलती तो है नहीं.

मुझे पारुल पर गुस्सा भी आता था कि आखिर स्वाभिमान भी तो कुछ होता है, पढ़ीलिखी है, अकेले रह कर भी नौकरी कर के प्रिशा को पाल सकती है. पहले वाला जमाना तो है नहीं कि विवश हो कर लड़कियां पति के अत्याचार सहते हुए भी उन के साथ रहें. मैं ने उसे कई बार समझाया, ‘वह सुधरने वाला नहीं है. आदमी दिल का कितना भी अच्छा हो, उसे अपनी जबान पर भी तो कंट्रोल होना चाहिए. तू उस से अलग हो जा, हम तुझे पूरा सहयोग देंगे. मैं रितेश से बात करूं क्या?’ तो उस ने आज जो फोन पर उत्तर दिया, उस ने तो मेरी सोच पर पूर्णविराम लगा दिया था.

‘ममा, शादी का निर्णय मेरा था. आप मेरी चिंता बिलकुल न करें. आगे मेरे भविष्य के लिए मुझे ही सोचने दीजिए. मेरे ही जीवन का प्रश्न नहीं है, मुझे प्रिशा के भविष्य के बारे में भी सोचना है. बच्चे की अच्छी परवरिश के लिए मांबाप दोनों का उस के साथ होना आवश्यक है. फिर रितेश उसे कितना प्यार करता है और उस के पालनपोषण में किसी प्रकार की कमी नहीं छोड़ता है.

‘आप जानती हैं, मेरी ससुराल वाले भी मुझे और प्रिशा दोनों को कितना प्यार करते हैं. रितेश से रिश्ता टूटने पर हम दोनों का उन से भी रिश्ता टूट जाएगा. आखिर उन का क्या कुसूर है? प्रिशा को उस के पापा और दादादादी के प्यार से वंचित रखने का मुझे क्या अधिकार है? प्रिशा को थोड़ा बड़ा हो जाने दो. 3 साल की हो गई है. आज के बच्चे पहले की तरह दब्बू नहीं हैं. देखना, वही अपने पापा का सुधार करेगी.

‘शादी एक समझौता है. यह 2 व्यक्तियों का ही नहीं, 2 परिवारों का बंधन है. इस के टूटने से बहुत सारे लोग प्र्रभावित हो सकते हैं. अभी ऐसी स्थिति नहीं है कि मैं रितेश से संबंध तोड़ लूं. आखिर मैं ने उस से प्यार किया है. उस को आदत पड़ गई है छोटीछोटी बातों पर रिऐक्ट करने की, जो, हालांकि, अर्थहीन होती हैं. कभी न कभी उसे समझ आएगी ही, ऐसा मुझे विश्वास है.’

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पारुल ने धाराप्रवाह बोल कर मुझे बोलने का मौका ही नहीं दिया. एक बार तो यह लगा कि मैं उस की मां नहीं, वह मेरी मां है. विवाह के बाद कितनी समझदार हो गई है वह. यह तो मैं ने सोचा ही नहीं कभी कि पति से रिश्ता तोड़ने पर पूरे परिवार से संबंध टूट जाते हैं. मुझे अपनी बेटी पर गर्व होने लगा था.

मेरी गर्लफ्रेंड बहुत शक्की है और उसकी बातों से रोमांस का मूड भी खराब हो जाता है, मैं क्या करूं?

सवाल
मैं 21 वर्षीय युवक हूं और एक युवती से प्यार करता हूं. वह युवती बहुत शक्की किस्म की है. एक दिन उस ने मेरे व्हाट्सऐप पर मेरी एक कलीग का मैसेज देख लिया. तभी से वह मुझ पर शक करती है. कहती है मेरा उस से भी अफेयर है. कभी उस से न मिल पाऊं तो कहेगी उसी के साथ गए होंगे. मेरी क्या जरूरत है. इन बातों से अच्छाभला रोमांस का मूड भी खराब हो जाता है. मैं क्या करूं?

जवाब
देखिए, शक का कोई इलाज नहीं होता. आप की प्रेमिका आप पर शक करती है साथ ही न मिल पाने पर कहती है कि उस से मिलने गए होंगे, तो कहीं न कहीं वह आप को मिस करती है. इसी वजह से उस के मन में ये बातें आती हैं. आप अपनी प्रेमिका को ज्यादा समय दें, उस की हर शंका को उस का प्यार समझें और समझाएं कि तुम्हारे सिवा दुनिया में कौन है जिसे आप चाहेंगे. प्यार के दो बोल ही ऐसा शक दूर कर सकते हैं.

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अपने व्हाट्सऐप से जुड़ी उस कलीग से भी उसे मिलवाइए औैर बताइए कि यह है आप की महबूबा. जब वह उस से मिल कर समझ जाएगी कि इन का रिश्ता सिर्फ कलीग तक ही है, औफिस के काम से संबद्ध है, तो यकीन मानिए आप पर अपना प्यार उढेलने में वह वक्त न लगाएगी. आखिर आप की प्रेमिका अपना प्यार बंटते हुए नहीं न देख सकती. सो उस की भावना समझ शक दूर कीजिए. समस्या अपनेआप हल हो जाएगी.

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दांपत्य की डोर न होने दें कमजोर

पतिपत्नी का रिश्ता विश्वास की डोरी से बंधा होता है. अगर इस रिश्ते में विश्वास की गाड़ी जरा सी भी डगमगाई, तो फिर रिश्ते के टूटने में देर नहीं लगती. पूरा परिवार ताश के पत्तों की तरह बिखर जाता है. अत: एकदूसरे पर संदेह करना मतलब घर की बरबादी को न्योता देना है. फिर चाहे संदेह पति करे या पत्नी. ज्यादातर मामलों में जब पत्नी नौकरीपेशा होती है तब यह संदेह उत्पन्न होता है, जिस का कारण औफिस के लोगों से बातचीत, दोस्ती होती है. संदेह करने वाला पति यह नहीं समझता कि उस की भी औफिस में महिला दोस्त हैं. वह भी उन से हंसहंस कर बातें करता है. अगर औरत किसी से हंसतेबोलते दिख जाए तो हजारों लोगों की उंगलियां उठने लगती हैं. समाज के ठेकेदार पता नहीं उसे क्याक्या नाम देने लगते हैं.

एक सच्ची दास्तां से रूबरू कराना चाहता हूं. पतिपत्नी दोनों नौकरीपेशा हैं. उन के परिवार में 4 लड़के भी हैं. बड़े लड़के की उम्र करीब 27 साल होगी. काफी सालों तक सब ठीक चलता रहा. फिर अचानक पति के स्वभाव में बदलाव आने लगा. वह बदलाव परिवार को बरबाद करने के लिए काफी था. पति सरकारी नौकरी करता है. पत्नी प्राइवेट जौब करती है. कुछ साल पहले पतिपत्नी के बीच मतभेद शुरू हो गए थे. मतभेद की वजह शक था. पतिपत्नी में रोज लड़ाई होती थी. पति पत्नी को गंदी गालियां देता. बेचारी पत्नी सहन करती रही.

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पति को पत्नी के औफिस के एक आदमी पर शक था. पत्नी आखिर अपनी बेगुनाही को कैसे साबित करे, यह उस के लिए बड़ी मुसीबत बन चुकी थी. महल्ले में, रिश्तेदारों में परिवार की बदनामी हो रही थी. लेकिन पति को इस से क्या मतलब? उस पर तो धुन सवार थी. पति सुबह से शाम तक गायब रहे तो कुछ नहीं. लेकिन पत्नी के पास किसी का फोन भी आ जाए तो वह क्यों आया है? किस का है? कौन है? हजारों सवाल खड़े हो जाते हैं. ऐसा ही कुछ उस परिवार में चल रहा था. दरअसल, पत्नी एक दिन अपने सहकर्मी की गाड़ी में बैठ कर औफिस तक गई थी. बस पति को यही बात खाए जा रही थी. हर रोज इस बात पर ताना देता. यहां तक कि वेश्या तक कहा. पूरे घर में तनाव का माहौल बना रहता था.

57 साल की उम्र में पति का इस तरह से व्यवहार करना पत्नी और बच्चों को तनिक भी अच्छा नहीं लगता था. पूरे महल्ले में वह परिवार चर्चा का विषय बना हुआ था. पत्नी पर शक करने से कितना नुकसान परिवार झेल रहा था, पति को इस बात से कोई लेनादेना नहीं था. कहते हैं बेटा हो जब आप बराबर, तो समझो उसे बाप बराबर. लेकिन उस परिवार में पति को न अपने बच्चों का लिहाज था और न ही पत्नी का. पतिपत्नी का रिश्ता आपसी विश्वास पर टिका होता है. लेकिन उस परिवार में यह विश्वास डगमगा गया था, जिस से पूरा परिवार तबाह हो रहा था.

रिश्ते पर भरोसा

पतिपत्नी के रिश्ते की डोर भरोसे पर टिकी होती है. भरोसा टूटा कि रिश्ता टूटा. घरपरिवार में एक बार कलह ने दस्तक दे दी तो फिर बाहर जाने वाली नहीं. धीरेधीरे लड़ाईझगड़े इतने बढ़ जाते हैं कि तलाक तक की नौबत आ जाती है, जिस से पूरा परिवार तबाह हो जाता है. जिंदगी भर इस रिश्ते की गाड़ी को चलाने के लिए एकदूसरे पर पूरा भरोसा करना जरूरी है.

सुनीसुनाई बातों को अनसुना करें

अकसर पति को पत्नी की बातें दूसरों से सुनने को मिलती हैं. अधिकतर मामलों में जब लोग कोई बात किसी से कहते हैं तो उस में कुछ बातें मिर्चमसाले के साथ खुद से भी जोड़ देते हैं. ऐसे में ये बातें आहत करती हैं. शक की गुंजाइश पैदा कर देती हैं. अत: इस रिश्ते में दूसरे की बातों को ज्यादा महत्त्व न दें जब तक कि आप अपनी आंखों से न देख लें.

भावनाओं की कद्र करें

पतिपत्नी के रिश्ते में एकदूसरे की भावनाओं की कद्र करना बहुत जरूरी है. कभीकभी छोटी सी बात भी काफी बड़ी बन जाती है. औफिस से लौट कर आने के बाद जो समय मिलता है, उसे एकदूसरे के साथ व्यतीत करें ताकि दिलों की बातें एकदूसरे से कह सकें. पतिपत्नी के रिश्ते में सैक्स का बहुत महत्त्व है. अधिकतर रिश्ते इस वजह से टूट जाते हैं कि इस क्रिया के लिए समय नहीं निकाल पाते. इस से संदेह की स्थिति उत्पन्न होती है.

बच्चों के भविष्य की चिंता

पतिपत्नी के रिश्ते से जब आप मातापिता के रिश्ते में पहुंचते हैं तब आप एक अच्छा जोड़ा कहलाने के साथसाथ अच्छे मातापिता भी कहलाना पसंद करते हैं. जब आप बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के बारे में सोचेंगे तो फालतू बातों की ओर आप का ध्यान ही नहीं जाएगा.

अफेयर से बचें

शादी के पहले आप का किस से क्या संबंध था, किस से अफेयर था, इस बात को भूलते हुए शादी के बाद अफेयर से बचें. कुछ मामलों में ऐसा होता है कि एकदूसरे से प्यार करने वालों की जब शादी दूसरी जगह हो जाती है और जब यह बात पत्नी या पति को पता चलती है तो संदेह की स्थिति उत्पन्न हो जाती है. लेकिन कई बार शादी के बाद भी किसी के साथ अफेयर की बातें सामने आती हैं, जिस से पूरा परिवार बिखरने लगता है. अत: जब एक बार शादी के बंधन में बंध जाते हैं, तो फिर अपने जीवनसाथी और परिवार के विषय में ही सोचना चाहिए.

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बालिका वधू को छोड़कर खतरों के खिलाडी के नए सीज़न का हिस्सा बनेंगी टीवी एक्ट्रेस शिवांगी जोशी !

इन दिनों रोहित शेट्टी के अच अवेटेड शो खतरों के खिलाड़ी 12 की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं. टीवी के चर्चित रिएलिटी शो का नया सीजन अभी प्री-प्रोडक्शन स्टेज पर है. मेकर्स टीवी और फिल्मी दुनिया से जुड़े सितारों को इस शो के लिए लगातार अप्रोच कर रहे हैं. बीते दिनों ही इस शो से कई लोगों के नाम भी जुड़े हैं. इसी बीच टीवी एक्ट्रेस शिवांगी जोशी का नाम लगातार सामने आ रहा है. रिपोर्ट्स के मुताबिक खतरों के खिलाड़ी 12 के मेकर्स ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ से पॉपुलर हुई इस हसीना को अपने शो का हिस्सा बनाना चाहते हैं.

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शिवांगी जोशी इस समय कलर्स चैनल के डेली सोप ‘बालिका वधू 2’ (Balika Vadhu 2) में नजर आती हैं. अगर सब कुछ ठीक हुआ तो जल्द ही टीवी की ये बहू खतरों से खेलती हुई नजर आएगी. बता दें कि इससे पहले शिवांगी जोशी ने किसी भी रिएलिटी शो में हिस्सा नहीं लिया है. ऐसे में हो सकता है कि यह शो उनके करियर के लिए टर्निंग प्वाइंट भी साबित हो. हाल ही में बालिका वधू के 2 के बंद होने की ख़बरें सामने आईं थी. हालाकिं प्रोडक्शन की तरफ से अभी तक इस खबर को लेकर कोई रिएक्शन सामने नहीं आया है. अब देखना होगा कि यह शो खतरों के खिलाड़ी 12 के आने से पहले बंद हो जाएगा या फिर शिवांगी खुद ही इस शो को अलविदा कहने वाली हैं?

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शो से जुड़े रहे हैं इन लोगों के नाम

रोहित शेट्टी के शो से अभी तक बिग बॉस 15 फेम सिम्बा नागपाल, प्रतीक सहजपाल, उमर रियाज और रुबीना दिलैक जैसे तमाम कलाकारों के नाम जु़ड़ रहे हैं.

‘कच्चा बादाम’ सिंगर ‘भुबन बड्याकर’ हुए कार हादसे का शिकार, हॉस्पिटल में हुए भर्ती

कच्चा बादाम गाने से मशहूर हुए भुबन बड्याकर (Bhuban Badyakar) सड़क हादसे के दौरान घायल हो गए हैं. भुबन ने हाल ही में सेकंड हैंड कार खरीदी है. बीते सोमवार को ही भुबन बड्याकर कार चलाना सीख रहे थे और उसी वक्त यह हादसा हुआ. आनन-फानन में भुबन को नजदीक के ही सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में भर्ती करवाया गया है. रिपोर्ट्स की मानें तो भुबन बड्याकर को सीने के अलावा शरीर के कई हिस्सों में चोट लगी है.

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रातों रात सोशल मीडिया पर छाए भुबन

सोशल मीडिया में कितनी ताकत होती है इस बात का अंदाज़ा भुबन बड्याकर को देखकर लगाया जा सकता है. अपने छोटे से गांव में भुबन मूंगफली बेचने के लिए कच्चा बादाम गाना गाते थे ताकि ज्यादा से ज्यादा ग्राहक उनके पास आए. एक दिन उनके गाने का वीडियो सोशल मीडिया पर आया और कुछ ही दिन में देखते ही देखते यह वायरल भी हो गया. इस गाने के लिए एक म्यूजिक कम्पनी ने भुबन बड्याकर को लाखों रुपये भी दिए और उनका एक वीडियो भी रिलीज किया.

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पश्चिम बंगाल के एक गांव में मूंगफली बेचने वाले भुबन बड्याकर अपने गाने कच्चा बादाम (Kacha Badam) की वजह से सुर्खियों में आए थे. सेलेब्स से लेकर आम जनता तक इस गाने पर सोशल मीडिया पर जमकर रील्स बनाते हैं.

नाइटक्लब में किया था परफॉर्म

बता दें कि कच्चा बादाम गाना सामने आने के बाद से भुबन बड्याकर को इस वक्त कई ऑफर्स मिल रहे हैं. हाल ही में उन्होंने कोलकाता के जाने-माने नाइटक्लब में भी परफॉर्म किया था. इस दौरान की कई तस्वीरें सोशल मीडिया पर खूब वायरल भी हुई थी.

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