नो प्रौब्लम: क्या बेटी के लिए विधवा नीरजा ने ठुकरा दिया रोहित का प्यार?

समस्या: औनलाइन ज्ञान से जिंदगी के साथ खिलवाड़

आजकल यूट्यूब पर वीडियो देख कर घर पर ही कुछ भी करने का चलन बढ़ा है, लेकिन यह खतरनाक भी हो सकता है.

हाल ही में महाराष्ट्र के नागपुर शहर में 25 साल की एक लड़की ने यूट्यूब पर एक वीडियो देख कर घर पर ही अपना भ्रूण (पेट का बच्चा) निकालने की कोशिश की. नतीजतन, उस की हालत बिगड़ गई और उसे अस्पताल ले जाना पड़ा. समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, उस लड़की को ऐसी सलाह उस के प्रेमी ने दी थी.

उस लड़की ने पुलिस को बताया कि उस का प्रेमी साल 2016 से उस के साथ रेप कर रहा था और शादी का ?ांसा दे रहा था. अब जब वह पेट से हुई, तब उस के प्रेमी ने सलाह दी कि वह यूट्यूब से वीडियो देख कर बच्चा गिरा ले और उस की बताई हुई दवाएं खा ले.

जब लड़की ने ऐसा करने की कोशिश की, तब उस की हालत बिगड़ गई और उस के बाद उसे अस्पताल में भरती कराया गया.

यूट्यूब वीडियो देख कर खुद पर तजरबा करने का एक ऐसा ही मामला केरल की राजधानी तिरुअनंतपुरम के वेंगानूर इलाके में भी देखने को मिला.

7वीं जमात का एक छात्र शिवनारायण सोशल मीडिया या यूट्यूब वीडियो देखने का आदी था. यूट्यूब पर बालों को स्ट्रेट यानी सीधा करने का वीडियो देख कर उस ने खुद पर उस तरीके को आजमाने की कोशिश की.

जब घर में कोई नहीं था, तब उस छात्र ने अपने बालों में मिट्टी का तेल लगा दिया और जलती हुई माचिस की तीली से बालों को सीधा करने की कोशिश करने लगा. इस दौरान वह आग की चपेट में आ गया.

तब वह छात्र अपने घर के बाथरूम में था और घर में सिर्फ उस की दादी थीं. आग की चपेट में आने के बाद वह रोनेचिल्लाने लगा. दादी ने आसपास के लोगों को बुलाया. लोगों ने जैसेतैसे आग बु?ाई और उसे तुरंत अस्पताल ले गए, लेकिन वह छात्र बच नहीं सका.

हम ने देखा है कि आजकल अगर कोई कुछ नया करना चाहता है या कुछ नया सीखना चाहता है, तो यूट्यूब पर उस के बारे में जरूर खोजबीन करता है. यूट्यूब पर कई लोग अलगअलग मुद्दों पर अपने खुद के वीडियो या ट्यूटोरियल पोस्ट करते रहते हैं.

यह सच है कि यूट्यूब और दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफार्म आज हमारी जिंदगी में काफी मददगार साबित हो रहे हैं. उन के कई अच्छे नतीजे भी हम सब के सामने आते रहते हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या हम औनलाइन वीडियो से लिए गए उपायों को इतना जीने लगे हैं कि हम अपनी जान तक जोखिम में डाल रहे हैं?

यह सच है कि दुनिया पूरी तरह से डिजिटल हो रही है और यकीनी तौर पर लोगों को इस से काफी फायदा हो रहा है. औनलाइन साधनों के सही इस्तेमाल का हमें तब पता चला, जब दुनिया कोरोना के चलते लगे लौकडाउन में फंस गई थी, लेकिन औनलाइन काम की सहूलियत होने के चलते न केवल लोगों का कारोबार चलता रहा, बल्कि बच्चों की पढ़ाईलिखाई में कोई बड़ी दिक्कत नहीं आई.

पर इस का मतलब यह नहीं है कि हमें हर उस काम के लिए औनलाइन जरीए का सहारा लेना चाहिए, जिस के लिए फिजिकल होना जरूरी है.

दरअसल, इंटरनैट या यूट्यूब पर दी गई जानकारी के कई मकसद हो सकते हैं. मसलन, मशहूर होना, कारोबार करना, चैनल चलाना, सब्सक्राइबर बढ़ाना या किसी सब्जैक्ट पर थोड़ी जानकारी देना.

ध्यान रहे कि कोई भी चैनल पूरी जानकारी देने को तैयार नहीं है और न ही सारी जानकारी दी जा सकती है.

आमतौर पर यूट्यूब के वीडियो लोगों को जागरूक करने के लिए होते हैं. वे हमें देश और दुनिया की जानकारी देने के लिए होते हैं, लेकिन इस का यह कतई मतलब नहीं है कि हम इन वीडियो को देख कर खुद को किसी खास फील्ड का मास्टर मान बैठें.

बच्चा गिराने से जुड़ा जो काम एक माहिर डाक्टर का है, वह कैसे यूट्यूब के जरीए खुद घर पर हो सकता है? अगर ऐसा ही होता तो सालों तक पढ़ने और रिसर्च करने वाले डाक्टरों की जरूरत ही क्या है?

अगर आधीअधूरी जानकारी के साथ खुद पर तजरबा करेंगे तो इस से आप का नुकसान ही होगा. क्या यूट्यूब वीडियो देख कर हम किसी भी सब्जैक्ट के माहिर बन सकते हैं?

कतई नहीं, क्योंकि किसी सब्जैक्ट को सीखना केवल उसे जानना नहीं होता है, बल्कि उसे होते हुए देखना और खुद करना भी पड़ता है.

आप किसी डाक्टर या माहिर की बराबरी नहीं कर सकते हैं. किसी भी काम में ज्ञान के साथसाथ माहिर के सधे हाथ और तजरबे बेहद खास होते हैं. उन्हें सब्जैक्ट के हर पहलू का बारीकी से पता होता है.

अगर हालात बिगड़ें या कोई मुश्किल आ जाए, तो उन के पास इस से निबटने के तरीके और साधन होते हैं. इसलिए बेहतर होगा कि सेहत से जुड़े हर मामले में यूट्यूब वीडियो पर भरोसा न करें और डाक्टर या माहिर की सलाह लें.

हमें न केवल इसे सम?ाना है, बल्कि अपनी नई पीढ़ी को यह भी सम?ाना है कि यूट्यूब या सोशल साइटों पर मौजूद सामग्री की संजीदगी को सम?ों और यह तय करना भी सीखें कि जिंदगी में उस की कहां और कितनी अहमियत है.   द्य

मेरे पति रोज सहवास करते हैं, मैं जानना चाहती हूं कि मेरे पति सैक्स ऐडिक्ट तो नहीं हैं?

सवाल
मैं 19 वर्षीय विवाहिता हूं. मेरे विवाह को साल भर होने वाला है. मेरे पति रोज सहवास करते हैं. मैं जानना चाहती हूं कि मेरे पति सैक्स ऐडिक्ट तो नहीं हैं? कहीं इस से हमें कोई स्वास्थ्य संबंधी हानि जैसे कमजोरी वगैरह तो नहीं हो जाएगी?

जवाब
आप की शादी को अभी साल भर हुआ है और बच्चे की जिम्मेदारी भी नहीं है, इसलिए यदि आप के पति सहवास में रुचि लेते हैं तो इस में कोई बुराई नहीं है. उन के बारे में किसी प्रकार का पूर्वाग्रह न पालें.

रोज शारीरिक संबंध से स्वास्थ्य पर किसी भी प्रकार का दुष्प्रभाव नहीं पड़ता है वरन कई माने में तो सहवास मानसिक रूप से भी फिट रखता है. अत: आप बेफिक्र हो कर शारीरिक सुख का आनंद उठाएं.

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रोज करें सेक्स

एक शोध के मुताबिक, प्रतिदिन ऑर्गज्म करने से एक आदमी 20 प्रतिक्षत तक प्रोस्टेट कैंसर का रिस्क कम कर सकता है. शोध के मुताबिक जो मर्द नियमित रुप से वीर्यपात करते हैं उन्हें मुश्किल से ही इस तरह का कैंसर होता है.

हालांकि हारवर्ड मेडीकल स्कूल के शोधकर्ताओं ने कोई साफ वजह नहीं दी है कि ऐसा करने से  कैंसर का रिस्क कैसे कम होता है लेकिन पहले दी गई थ्योरी में ये बताया गया है कि लगातार ऑर्गज्म करने से प्रोस्टेट में कैंसर पैदा करने वाले कैमिकल्स बाहर निकल जाते है.

वहीं दूसरी थ्योरी में ये बताया गया है कि लगातार ऑर्गेज्म करने से पुराने सेल्स, जिनसे कैंसर का खतरा रहता है, वो बाहर निकल जाते है और नए सेल्स को पनपने में आसानी होती है.

प्रोस्टेट एक छोटे आकार की ग्रंथी होती हो जो आदमी के लिंग और मूत्राशय के बीच पाई जाती है. इसका काम गाड़ा सफेद तरल पदार्थ पैदा करना होता है जो अंडकोष से पैदा किए गए शुक्राणु से मिलकर वीर्य बनाता है.

शोधकर्ताओं के मुताबिक 40-49 की उम्र के मर्द अगर प्रति माह 21 या इससे ज्यादा बार वीर्यपात करते है तो उनमें प्रोस्टेट कैंसर का रिस्क 22 प्रतीक्षत कम होता है.

इसकी तुलना उन मर्दो से की गई थी जो एक महीने में 4 से 7 बार वीर्यपात करते है.

भारत की प्राचीन नगरी अयोध्या वायु सेवा से जोड़ा जा रहा है: मुख्यमंत्री

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी की उपस्थिति में आज यहां उनके सरकारी आवास पर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम इण्टरनेशनल एयरपोर्ट, अयोध्या के प्रथम चरण के विकास हेतु राज्य सरकार द्वारा क्रय की गयी 317.855 एकड़ भूमि भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण को हस्तांतरित की गयी. इसके लिए प्रदेश के नागरिक उड्डयन विभाग एवं भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण के मध्य लीज एग्रीमेण्ट का निष्पादन किया गया. मुख्यमंत्री जी की उपस्थिति में अपर मुख्य सचिव नागरिक उड्डयन एवं भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण के अध्यक्ष के मध्य लीज एग्रीमेण्ट दस्तावेजों का आदान-प्रदान किया गया.

इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए मुख्यमंत्री जी ने कहा कि अयोध्या में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की पावन स्मृतियों को समर्पित होने वाले अन्तर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट के निर्माण की प्रक्रिया की आज शुरुआत हुई है. इस शुरुआत के अवसर पर प्रदेश सरकार के नागरिक उड्डयन विभाग व भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण के मध्य भूमि लीज एग्रीमेंट की कार्यवाही सम्पन्न होना अत्यन्त अभिनन्दनीय पहल है. उन्होंने भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण को राज्य सरकार के साथ समयबद्ध ढंग से इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए हृदय से धन्यवाद दिया.

मुख्यमंत्री जी ने कहा कि आज बासन्तिक नवरात्रि की पावन तिथि है. नवरात्रि की पावन तिथि भारत की सनातन परम्परा में ऊर्जा के संचार की तिथि के रूप में मानी जाती है. ऊर्जा एक सकारात्मक विकास का प्रतीक भी है. विकास का यह प्रतीक अयोध्या जैसी पावन नगरी के साथ जुड़ा हो, तो देश व दुनिया को प्रफुल्लित करता है. उन्होंने कहा कि आज हमारे लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण दिन है. जब भारत की एक प्रमुख प्राचीन नगरी अयोध्या, जिसे भारत के आस्थावान नागरिक एक पवित्र नगरी के रूप में देखते हैं, उसे वायु सेवा से जोड़ा जा रहा है.

मुख्यमंत्री जी ने कहा कि अयोध्या में वर्ष 2023 में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का भव्य मन्दिर का निर्माण कार्य पूरा हो चुका होगा. रामलला अपने स्वयं के मन्दिर में विराजमान होंगे. रामलला के भव्य मन्दिर निर्माण के साथ ही हमें इस एयरपोर्ट को क्रियाशील करने की तैयारी भी करनी चाहिए.

मुख्यमंत्री जी ने कहा कि देश में विगत 05 वर्ष के अन्दर उत्तर प्रदेश ने बेहतरीन वायुसेवा की कनेक्टिविटी के लिए अच्छी प्रगति की है. प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के मार्गदर्शन व प्रेरणा से ही यह सम्भव हो पाया है. प्रधानमंत्री जी ने वायुसेवा को विकास के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण माना है. प्रधानमंत्री जी का कहना है कि वायुसेवा केवल एक विशेष तबके तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि हवाई चप्पल पहनने वाला कॉमन मैन भी हवाई जहाज की यात्रा कर सके, ऐसी वायुसेवा उपलब्ध करानी होगी.

मुख्यमंत्री जी ने कहा कि वर्ष 2017 तक प्रदेश में सिर्फ 02 एयरपोर्ट पूरी तरह क्रियाशील थे. पहला देश की राजधानी लखनऊ का तथा दूसरा प्राचीनतम नगरी काशी का. गोरखपुर व आगरा में मात्र एक वायुसेवा थी, जो कभी-कभी चल पाती थी. उन्होंने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि वर्तमान में प्रदेश में 09 एयरपोर्ट पूरी तरह से क्रियाशील हैं. वर्ष 2017 तक राज्य वायुसेवा के माध्यम से सिर्फ 25 गंतव्य स्थानों से जुड़ा था, उसमें भी निरन्तरता का अभाव था. आज 75 से अधिक गंतव्य स्थानों के लिए प्रदेश से हवाई सेवाएं उपलब्ध हैं.

मुख्यमंत्री जी ने कहा कि प्रदेश में 10 नये एयरपोर्ट के निर्माण की कार्यवाही चल रही है. प्रदेश में वर्तमान में 03 अन्तर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट क्रियाशील हैं. एशिया के सबसे बड़े जेवर एयरपोर्ट का निर्माण कार्य राज्य सरकार द्वारा युद्धस्तर पर कराया जा रहा है. अयोध्या में आज से अन्तर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट बनाने की कार्यवाही प्रारम्भ हो रही है. जब यह दोनों अन्तर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट क्रियाशील हो जाएंगे तो किसी भी राज्य की तुलना में प्रदेश के पास सर्वाधिक एयरपोर्ट होंगे. तब उत्तर प्रदेश 05 अन्तर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट वाला राज्य होगा, जो अपनी बेहतरीन वायु कनेक्टिविटी के माध्यम से प्रत्येक नागरिक को बेहतरीन वायुसेवा की सुविधा उपलब्ध करवाने के बड़े कार्यक्रम को आगे बढ़ाने में सफल होगा.

मुख्यमंत्री जी ने कहा कि अयोध्या इण्टरनेशनल एयरपोर्ट के पहले फेज के कार्य के लिए भूमि की जितनी आवश्यकता थी, अयोध्या के जिला प्रशासन ने इस कार्य को समयबद्ध ढंग से आगे बढ़ाया है. इससे सम्बन्धित पूरी धनराशि राज्य सरकार द्वारा स्वीकृत करके पहले ही जिला प्रशासन को उपलब्ध करवायी जा चुकी है. इस अन्तर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट के लिए जितनी भूमि की आवश्यकता है, उसमें से मात्र 86 एकड़ भूमि ही बाकी है. उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि जिला प्रशासन तीव्र गति से शेष 86 एकड़ भूमि उपलब्ध कराने का कार्य करेगा. इस एयरपोर्ट के तीनों फेजों के निर्माण के लिए जितनी भूमि की आवश्यकता पड़ेगी, उतनी भूमि प्रदेश सरकार द्वारा उपलब्ध करवायी जाएगी. उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि समयबद्ध ढंग से इस एयरपोर्ट के विकास को आगे बढ़ाकर अयोध्या नगरी को दुनिया की सुन्दरतम नगरी के रूप में स्थापित करने के साथ ही हम बेहतरीन कनेक्टिविटी को उपलब्ध कराने में सफल होंगे.

मुख्यमंत्री जी ने कहा कि राज्य सरकार इस एयरपोर्ट के निर्माण के लिए सकारात्मक सहयोग देने के लिए पूरी तरह तैयार है. वायुसेवा की बेहतरीन कनेक्टिविटी विकास के अनेक द्वार खोलती है. उन्होंने कहा कि जनपद गोरखपुर के वायुसेवा से जुड़ते ही वहां विकास की गतिविधियां तेज हुई हैं. वर्ष 2017 तक गोरखपुर मात्र एक वायुसेवा से जुड़ा था. आज यह 12 से 13 वायुसेवा से जुड़ा हुआ है. जैसे हवाई जहाज की यात्रा एक नई उड़ान होती है, वैसे ही विकास की नई उड़ान के साथ गोरखपुर तेजी के साथ आगे बढ़ रहा है.

मुख्यमंत्री जी ने कहा कि प्रदेश के विभिन्न शहरों-वाराणसी, लखनऊ, कानपुर, बरेली, प्रयागराज, गाजियाबाद (हिण्डन) इत्यादि में हवाई सेवाएं उपलब्ध हैं. जनप्रतिनिधियों सहित समाज के विभिन्न वर्गाें के नागरिकों की हमेशा मांग रहती है कि उनके क्षेत्र को वायुसेवा से जोड़ा जाए. जहां वायुसेवा के लिए बड़े एयरपोर्ट बनाना कठिन होता है, वहां पर लोग हेलीकॉप्टर सेवा से जुड़ने की मांग करते हैं, जिससे वे भी विकास की प्रक्रिया का हिस्सा बन सकें.

मुख्यमंत्री जी ने कहा कि यह एक सकारात्मक एप्रोच है. उस सकारात्मक एप्रोच को तेजी से आगे बढ़ाना चाहिए. प्रदेश सरकार की सकारात्मक सोच ने प्रत्येक क्षेत्र में प्रधानमंत्री जी के विजन को जमीनी धरातल पर उतारने का कार्य किया है. उसी का परिणाम है कि प्रदेश अगले वर्ष तक 05 अन्तर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट देश को देने की स्थिति में होगा. उन्होंने कहा कि प्रदेश में युद्धस्तर पर निर्मित हो रहे 10 नये एयरपोर्ट जब क्रियाशील होंगे, तब प्रदेश 19 एयरपोर्ट के साथ देश में वायुसेवा के साथ जुड़ने वाला सबसे बड़ा राज्य होगा.

मुख्यमंत्री जी ने कहा कि प्रदेश सरकार बेहतरीन कनेक्टिविटी के माध्यम से नागरिकों के जीवन को और भी सरल करने और विकास की सभी सम्भावनाओं को आगे बढ़ाने का कार्य करेगी, जो अपेक्षाएं आजादी के बाद से उत्तर प्रदेश वासियों ने की थीं. उन्होंने कहा कि वायुसेवा लोगों के जीवन को आसान बनाने, अधिक से अधिक युवाओं को रोजगार प्रदान करने और विकास की सभी सम्भावनाओं को तेजी से आगे बढ़ाने का माध्यम है. नागरिकों की यात्रा को और सहज, सरल, सुलभ बनाने का भी वायु सेवा बेहतर माध्यम है. राज्य सरकार इस दिशा में भरपूर सहयोग करेगी.

इस अवसर पर मुख्य सचिव श्री दुर्गा शंकर मिश्र ने धन्यवाद ज्ञापित किया. अपर मुख्य सचिव नागरिक उड्डयन श्री एसपी गोयल ने स्वागत सम्बोधन किया. भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण के अध्यक्ष श्री संजीव कुमार ने भी अपने विचार व्यक्त किये.

ज्ञातव्य है कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम अन्तर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट, अयोध्या के विकास हेतु 821 एकड़ भूमि चिन्हित की गयी है. प्रथम चरण के विकास हेतु 317.8 एकड़ भूमि भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण को लीज पर दी जा रही है. राज्य सरकार द्वारा इसके विकास हेतु 1008.77 करोड़ रुपये की धनराशि स्वीकृत की गयी है. इस एयरपोर्ट का विकास तीन चरणों में होगा. प्रथम चरण में वायुयानों हेतु 2200 मीटर ग 45 मीटर रनवे सहित अन्य सुविधाओं का निर्माण होगा.

इस अवसर पर अपर मुख्य सचिव सूचना एवं एमएसएमई श्री नवनीत सहगल, मेम्बर प्लानिंग भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण श्री एके पाठक, सूचना निदेशक श्री शिशिर सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे.

हकीकत: गरीब घरों में बूढ़ों की हालत

अच्छन मियां का पूरा परिवार पहले साथ में एक छत के नीचे रहता था. अच्छन मियां के 2 भाई और उन का परिवार और अच्छन मियां के अपने 4 बेटे औ 3 बेटियां सब मिलजुल कर रहते थे.

अच्छन मियां की चाबीताले की एक दुकान थी. बाद में दुकान उन का बड़ा लड़का चलाने लगा. अच्छन मियां जब तक दुकान पर बैठते थे, उन की और उन की बेगम सायरा बी की पूरा घर इज्जत करता था और प्यार करता था. बड़े 2 बेटों की शादियां हुईं और उन के बच्चे हुए तो अच्छन मियां और सायरा बी दादादादी की पदवी पा कर और भी ज्यादा प्यार और इज्जत के पात्र हो गए.

लेकिन तीनों बेटियों की शादी के बाद घर की खुशियों में कमी आ गई. अच्छन मियां और सायरा बी भी बुढ़ापे की ओर तेजी से बढ़ने लगे. आंख से दिखाई देना भी कम हो गया. अब चाबी बनाने का हुनर भी किसी काम का नहीं बचा. ऐसे में अच्छन मियां ने दुकान पूरी तरह बड़े बेटे को सौंप दी. उन का छोटा लड़का एक कंपनी में चपरासी लग गया.

अच्छन मियां के दोनों भाइयों के परिवार भी जब बढ़े तो उन लोगों ने गांव वाली अपनी जमीन पर मकान बनवा लिया. अच्छन मियां के दोनों छोटे लड़के अपने बीवीबच्चों को ले कर दूसरे शहर में नौकरी के लिए चले गए.

अब घर में 2 बेटों का परिवार बचा. बहुओं के आगे सायरा बी के फैसले कमजोर पड़ने लगे. उन की रसोई पर अब पूरी तरह बहुओं का कब्जा हो गया. वे अपनी मनमरजी की चीजें पकातीं और खिलातीं. कुछ कहो तो सुनने को मिलता, ‘यहां क्या होटल खुला है कि सब की फरमाइश का अलगअलग खाना बनेगा?’

कई बार ऐसा खाना सामने आता है, जो दांत न होने की वजह से चबाया ही नहीं जाता है. ऐसे में दोनों सत्तू घोल कर पी लेते हैं. दूधदही कभी खाने में दिखता ही नहीं है. एक रोटी और थोड़ी सी दाल देना ही दोनों बहुओं को भारी लगता है.

यही हाल गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश की शारदा रानी का है. शारदा रानी की उम्र 76 साल की है. पति जवानी में ही नहीं  रहे थे. 2 लड़के थे. छोटा लड़का अपना परिवार ले कर शुरू से ही अलग रहता था.

बड़ा लड़का मां को अपने साथ रखता था, मगर उस की पत्नी को हर काम में सास की दखलअंदाजी बरदाश्त नहीं थी, तो उस ने कुछ पैसा लोन ले कर और कुछ जमापूंजी जुटा कर एक अलग घर खरीद लिया. उस में उस के चारों भाइयों ने भी पैसे की मदद की थी.

नए घर में उस ने सास के आने पर बैन लगा दिया. अब बूढ़ी शारदा रानी अपने घर में अकेले रहती हैं. बेटा 2 दिन में एक बार चक्कर लगा लेता है और जरूरत का सामान खरीद कर रख जाता है.

इस उम्र में शारदा रानी जैसेतैसे अपने लिए रोटीदाल बनाती हैं. खुद सुबह सोसाइटी के नल से पानी लाती हैं. दिनभर अकेले पड़े बीते दिनों को याद कर के आंसू बहाती हैं. कोई नहीं है, जो उन से बात करे या उन का हाल जाने.

कोरोना काल में वे एक हफ्ते तक बुखार में तपती रहीं. बेटा बुखार की गोली का पत्ता पकड़ा गया और कोरोना के डर से कई हफ्ते तक मां को देखने भी नहीं आया.

शारदा रानी बुखार की हालत में खुद ही थोड़ाबहुत खाने को बनातीं और माथे पर पानी की पट्टियां रखरख कर बुखार कम करतीं. किसी तरह कोरोना को मात दी और जान बच गई, मगर बेटे के रूखे बरताव ने मां का दिल छलनी कर दिया.

दिल्ली के मोती नगर मैट्रो स्टेशन के नीचे सीढि़यों पर आप हर दिन एक बेहद बुजुर्ग आदमी को कंबल में लिपटा बैठा देखेंगे. वे बुजुर्ग भिखारी नहीं हैं, मगर सालों से वहां बैठे दिख रहे हैं. कभीकभी वे वहीं सीढि़यों पर सोए हुए दिखते हैं.

वे बुजुर्ग साथ में एक कपड़े का बैग रखते हैं, जिस में एक चादर और कुछ कपड़े रहते हैं. इन का मोती नगर में ही अपना घर है. घर में बेटाबहू और पोतेपोतियां हैं, मगर वे अब घर नहीं जाते हैं.

घर में बहू ने उन का बहुत तिरस्कार किया था. बेटा भी लड़ता?ागड़ता था, इसलिए उन्होंने घर छोड़ दिया. अब बेटा सुबहशाम यहीं सीढि़यों पर उन्हें खाने का पैकेट पकड़ा जाता है, जिसे कई बार वे खा लेते हैं या कई बार आसपास के कुत्तों को खिला देते हैं. नहानेधोने के लिए वे मैट्रो स्टेशन के नीचे बने सुलभ शौचालय में चले जाते हैं.

शौचालय का चौकीदार भला आदमी है. वह उन से कोई पैसा नहीं लेता है. आसपास के दुकानदारों को भी उन से हमदर्दी है. कभी कोई चायसमोसा भी खिला देता है. वे लोग उन बुजुर्ग को सम?ाते हैं कि अपने घर चले जाओ, मगर अपनों के तानों से दिल ऐसा फटा है कि वे घर जाने से मना कर देते हैं.

भारत में बुजुर्गों के साथ बहुत ही शर्मनाक बरताव होने लगा है, खासतौर पर गरीब परिवारों में तो इन्हें अब बो?ा सम?ा जाने लगा है. गरीब परिवार के बुजुर्गों को तिरस्कार, माली परेशानी के अलावा दिमागी और जिस्मानी जोरजुल्म का सामना भी करना पड़ता है.

भारत में संयुक्त परिवार का चरमराना बुजुर्गों के लिए नुकसानदायक साबित हुआ है. ज्यादा उम्र या सुस्त होने की वजह से लोग उन से रूखेपन से बात करते हैं. उन की भावनात्मक कमी को पूरा करने के लिए नई पीढ़ी के पास समय नहीं है.

‘एजवेल फाउंडेशन’ नामक संस्था के एक सर्वे में सामने आया है कि कोरोना काल में बुजुर्गों के प्रति हिंसात्मक बरताव में बढ़ोतरी हुई है. तकरीबन हर तीसरे बुजुर्ग (35.1 फीसदी) ने दावा किया कि लोग बुढ़ापे में घरेलू हिंसा (शारीरिक या मौखिक) का सामना करते हैं.

इस फाउंडेशन के अध्यक्ष हिमांशु रथ का कहना है कि कोविड-19 और संबंधित लौकडाउन और प्रतिबंधों ने तकरीबन हर इनसान को प्रभावित किया है, लेकिन बुजुर्ग अब तक सब से ज्यादा प्रभावित रहे हैं. सब से बुरी तरह प्रभावित बुजुर्ग औरतें हैं.

बड़ों के साथ होने वाले गलत बरताव के ज्यादातर मामले पैसे से जुड़े होते हैं. कभी बच्चों का जमीनजायदाद अपने नाम करवाने का दबाव, तो कभी छोटीछोटी जरूरतों के लिए भी बच्चों से गुजारिश करते रहने के हालात ज्यादातर परिवारों में देखने को मिलते हैं.

भारत में साढ़े 7 करोड़ बुजुर्ग या 60 साल से ज्यादा उम्र के हर 2 में एक इनसान किसी लंबी और पुरानी बीमारी से पीडि़त है. ज्यादातर बुजुर्गों में शारीरिक कमजोरी की परेशानी है.

20 फीसदी से ज्यादा बुजुर्ग मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी बीमारी से जू?ा रहे हैं. साथ ही, 27 फीसदी बुजुर्ग कई दूसरी तरह की बीमारियों से घिरे हुए हैं, जिन की तादाद साढ़े 3 करोड़ के आसपास है.

ऐसे में पहले से ही पीड़ा और परेशानियों के पहाड़ तले दबे बूढ़ों के लिए कोरोना की मुसीबत ने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं.

अगर अपनों का साथ व सहयोग मिले, तो जिंदगी की हर जद्दोजेहद आसान हो जाती है. अपनेपन का भाव और अपनों का लगाव उम्र के हर मोड़ पर मन को ऊर्जा देता है, पर अफसोस कि थके शरीर व कमजोर होती सोच के चलते बुजुर्गों को अपनों का साथ नहीं, बल्कि शोषण का व्यवहार मिलता है.

गाइनिकोमेस्टिया: मैन बूब्स होने के क्या है कारण, जानें

मेन बुब्स या गाइनिकोमेस्टिया एक ऐसी समस्या है जो आज कल काफी पुरुषों में देखी जाने लगी हैं इस समस्या का मुख्य कारण एस्ट्रोजन और टेस्टासिटरौन हार्मोन के असन्तुलन से होता हैं. समय रहते अगर आप डाक्टर से सलाह ले लेते है तो इस समस्या से निजाद मिल जाता हैं. पुरुषों में स्तन के टिशु बहुत कम मात्रा में होते हैं, जबकि स्त्रियों में किशोरावस्था ये हार्मोन के प्रभाव से अच्छी तरह विकसित होते हैं. लोग इस समस्या को मेडिकली ना लेकर इसे किसी दूसरी चीजों से जोड़ देते हैं. जिससे ना चाहते हुए भी हम शर्मिंदगी महसूस करते हैं. हालांकि ये स्त्रियों जैसे बड़े नहीं होते नहीं होते लेकिन फिर भी आकार में परिवर्तन होने के कारण ये सभी की नजरों में आले लगते हैं. कुछ ऐसी चीजें जिसे आप अनुबव कर सकते है- छाती फूलना, स्तन ग्रन्थि के टिशुओं में सूजन, स्तन टिशू में चमड़ी फैलने से दर्द हो सकता है जोकि इंटर्नल इन्फेक्शन को भी दर्शाता हैं.

क्या है कारण गाइनिकोमेस्टिया के

स्त्री और पुरुषों में टेस्टोस्टिरोन और इस्ट्रोजन हार्मोन की वजह से ही यौनांगों का विकास और रखरखाव होता है. पुरुषों टेस्टास्टिरोन से पुरुषत्व जैसे, पेशिय घनता, शरीर के बालों और स्त्रियों में एस्ट्रोजन के अधीन स्त्रीत्व जैसे, स्तन विकास, होते हैं. पुरुषों में एस्ट्रोजन की अपेक्षा टेस्टास्टिरोन के स्तर में  कमी होने से गाइनिकोमेस्टिया होता है. हार्मोन का सन्तुलन कई कारणों से बिगड़ सकता है. ये कारण प्राकृतिक हार्मोन का परिवर्तन, औषधियां या कुछ शारीरिक अवस्थाएं हो सकते हैं. कुछ रोगियों में कई बार गाइनिकोमेस्टिया के कारण का पता नहीं भी लग पता है.

गाइनिकोमेस्टिया होने पर करें एक्सरसाइज

कुछ एक्सरसाइजों का नियमित अभ्यास करने से पुरुषों में बढ़े हुए स्तनों की समस्या से निपटा जा सकता है. ये एक्सरसाइज हैं सीने को हष्ट-पुष्ट आकार देने वाली पुश अप एक्सरसाइज, शरीर को ताकत देने वाली और सीने व कंधे को बेहतरीन शेप देने वाली चिन अप एक्सरसाइज, सीने की चौड़ाई को बढ़ा वाली डंबल फ्लाइज एक्सरसाइज और बेंच प्रेस एक्सरसाइज.

पुरुष स्तनों के लिए लिपोसक्शन 

सामान्य ग्रंथियों होने और फैट की वृद्धि ही गाइनिकोमेस्टिया होती है. लिपोसक्शन की मदद से स्तनों को पुरुषों जैसा सामान्य आकार दिया जा सकता है. ऐसे करने के लिये अतिरिक्त फैट को इस स्थान से निकाल दिया जाता है. ज्यादातर मामलों में लिपोसक्शन की मदद से परिवेश घेरे के रंजित (पिमेंटिड) भाग के किनारों पर चीरे लगाकर अतिरिक्त ग्रंथियों के ऊतकों को हटाने का काम किया जाता है. जब पुरुषों में स्तन वृद्धि के कारण त्वचा खींच जाती है तो अतिरिक्त त्वचा को हटाना जरूरी हो जाता है. इसके अलावा पुरुष स्तनों के आकार को कम करने के लिए तुमेसेन्ट (Tumescent) लिपोसक्शन को भी लोकल ऐनिस्थीश़िया की मदद से किया जाता है.

तो अगर आप भी इस समस्या से परेशान हो तो घवराईएं नहीं. शर्मिंदा होने के बजाएं आप डाक्टर से सलाह ले और अपना इलाज शुरु कराएं.

मैं हस्तमैथुन का आदी हूं क्या इससे सैक्स संबंधी बीमारियां होती हैं, कृप्या बताएं?

सवाल

मैं एक 18 वर्षीय युवक हूं और हस्तमैथुन का आदी हूं. दोस्त कहते हैं कि यह गलत आदत है, इस से सैक्स संबंधी बीमारियां होती हैं. आप से अनुरोध है कि इस बारे में डिटेल से बताएं. आज बहुत से युवा इस के आदी हैं. इस के साइड इफैक्ट क्या हैं?

जवाब

सब से पहले तो आप को बता दें कि यह हानिकारक नहीं है बल्कि युवावस्था में आम समस्या है. युवावस्था में कदम रखते ही युवकों के मन में सैक्स के प्रति जिज्ञासा के साथसाथ विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण होता है, जिस से उत्तेजना की अवस्था में हस्तमैथुन द्वारा यौन आनंद प्राप्त करना सहज लगता है और युवा इस के आदी हो जाते हैं. आज डाक्टरों ने यह साबित कर दिया है कि यह कोई बीमारी नहीं है.

युवाओं में हस्तमैथुन स्वाभाविक है और इसे नौर्मल व स्वस्थ हैबिट के रूप में लिया जाता है, लेकिन सैक्स की अधूरी जानकारी के कारण इस के आदी युवाओं में निराशा, हताशा और डिप्रैशन हो जाता है, इस से बचना चाहिए.

हां, अति हर चीज की बुरी होती है और हस्तमैथुन भी उस से अलग नहीं. यह आदत तब खतरनाक व हानिकारक है जब इस से आप की पढ़ाई व अन्य कार्यों पर असर पड़े. अत: चिंता न करें. इसे स्वाभाविक क्रिया मान कर अपने अन्य कामों पर हावी न होने दें.

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डिजिटल सैक्स का मकड़जाल

आजकल सबकुछ डिजिटल हो रहा है. स्कूलकालेज, औफिस, पुलिस स्टेशन, अदालत सबकुछ डिजिटल हो रहे हैं, ठीक इसी प्रकार संबंध भी डिजिटल हो रहे हैं. शादीब्याह के न्योते हों या कोई अन्य खुशखबरी या फिर शोक समाचार सबकुछ ईमेल, व्हाट्सऐप, एसएमएस, ट्विटर या फेसबुक के जरिए दोस्तों और सगेसंबंधियों तक पहुंचाया जा रहा है. मिठाई का डब्बा या खुद कार्ड ले कर पहुंचने की परंपरा धीरेधीरे लुप्त हो रही है.

कुछ ऐसा ही प्रयोग युवकयुवतियों के संबंधों में भी हो रहा है. ऐसे युवकों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जो यौन सुख के लिए वास्तविक सैक्स संबंधों के बजाय डिजिटल सैक्स और औनलाइन पोर्नोग्राफी पर ज्यादा निर्भर हैं. ऐसे युवकों को वास्तविक दुनिया के बजाय आभासी दुनिया के सैक्स में ज्यादा आनंद आता है और ज्यादा आसानी महसूस होती है. इन्हें युवतियों को टैकल करना और उन से भावनात्मक व शारीरिक संबंधों का निर्वाह करना बेहद मुश्किल लगता है, इसलिए ये उन से कन्नी काटते हैं. पढ़ेलिखे और शहरी लोगों में डिजिटल सैक्स की आदत ज्यादा देखी जाती है. मनोवैज्ञानिक इन्हें ‘हौलो मैन’ यानी खोखला आदमी कहते हैं. ऐसे लोगों को वास्तविक यौन सुख या इमोशनल सपोर्ट तो मिल नहीं पाता नतीजतन ये ऐंग्जायटी और डिप्रैशन का शिकार होने लगते हैं और भावनात्मक रूप से टूट जाते हैं.

मुंबई की काउंसलर शेफाली, जो ‘टीन मैटर्स’ पुस्तक की लेखिका भी हैं, हफ्ते में कम से कम एक ऐसे युवक से जरूर मिलती हैं, जो पोर्न देखने का अभ्यस्त होता है और वास्तविक सैक्स से कतराता है. दरअसल, युवावस्था में लगभग हर युवक डिजिटल सैक्स का शौकीन होता है. कुछ युवक इस के इतने अभ्यस्त हो जाते हैं कि उन्हें इस का नशा हो जाता है और वे सामाजिक जीवन से कतराने लगते हैं. उन्हें जो युवतियां मिलती भी हैं उन में वे आकर्षण नहीं ढूंढ़ पाते, क्योंकि उन की ब्रैस्ट या अन्य अंग पोर्न ऐक्ट्रैस जैसे नहीं होते. कई बार घर वालों के कहने या सामाजिक दबाव में आ कर ये शादी तो कर लेते हैं, लेकिन अपनी बीवी से इन की ज्यादा दिन तक पटरी नहीं बैठती, क्योंकि ये अपनी बीवी के साथ सैक्स संबंध बनाते वक्त उस से पोर्न जैसी ऊटपटांग हरकतें और वैसी ही सैक्सुअल पोजिशंस चाहते हैं. कोई भी बीवी यह सब कब तक बरदाश्त कर सकती है? नतीजतन या तो बीवी इन्हें छोड़ देती है या फिर ये खुद ही ऊब कर अलग हो जाते हैं.

व्यवहार विशेषज्ञों के मुताबिक इंटरनैट पर पोर्न साइट्स की बाढ़, थ्रीडी सैक्स गेम, कार्टून सैक्स गेम, वर्चुअल रिएलिटी सैक्स गेम और अन्य तरहतरह की पोर्न फिल्में जिन में एक युवती या युवक को 3-4 लोगों के साथ सैक्स संबंध बनाते हुए दिखाया जाता है, ने युवाओं के दिमाग को बुरी तरह डिस्टर्ब कर के रख दिया है. स्मार्टफोन पर आसानी से इन की उपलब्धता ने स्थिति ज्यादा बिगाड़ दी है. यह स्थिति सिर्फ भारत की नहीं बल्कि पूरी दुनिया की है. ‘मेन (डिस) कनैक्टेड : हाउ टैक्नोलौजी हैज सबोटेज्ड व्हाट इट मीन्स टू बी मेल’ में मनोविज्ञानी फिलिप जिम्वार्डो ने लिखा है, ‘औनलाइन पोर्नोग्राफी और गेमिंग टैक्नोलौजी पौरुष को नष्ट कर रही है. अलगअलग देशों के 20 हजार से ज्यादा युवाओं पर किए गए सर्वे में हम ने पाया कि आसानी से उपलब्ध पोर्न से हर देश में पोर्न एडिक्टों की भरमार हो गई. यूथ्स को युवतियों के साथ यौन संबंध बनाने के बजाय पोर्न देखते हुए हस्तमैथुन करने में ज्यादा आनंद आता है.’

मेन (डिस) कनैक्टेड की सह लेखिका निकिता कूलोंबे कहती हैं, ‘इंटरनैट युवाओं को अंतहीन नौवेल्टी और वर्चुअल हरमखाने की सुविधा देता है. 10 मिनट में ये यूथ इतनी निर्वस्त्र और सैक्सरत युवतियों को देख लेते हैं, जितनी इन के पुरखों ने ताउम्र नहीं देखी होंगी.’

व्यवहार विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल युग में कई यूथ ऐसे मिलेंगे जो स्क्रीन पर चिपके रहेंगे और सोशल साइट्स पर तो युवतियों से खूब गुफ्तगू करेंगे, लेकिन वास्तविक दुनिया में उन्हें युवतियों के सामने जाने पर घबराहट होती है और ये अपनी भावनाएं उन के साथ शेयर करने का सही तरीका नहीं ढूंढ़ पाते.

ये युवा फेस टू फेस बात करने के बजाय फेसबुक, व्हाट्सऐप, टैक्स्ट मैसेज या मोबाइल फोन का सहारा लेते हैं. जाहिर सी बात है कि ये युवतियों के सामने नर्वस हो जाते हैं और उन से संबंध बनाने से कतराते हैं. पोर्न से उन्हें तत्काल आनंद और संतुष्टि मिलती है, जबकि वास्तविक दुनिया में सैक्स संबंध बनाने से पहले मित्रता, प्रेम, आत्मीयता या शादीविवाह जरूरी होता है.

डिजिटल सैक्स का यह एडिक्शन युवतियों की तुलना में युवकों को अधिक प्रभावित करता है. इस की वजह यह है कि इंटरनैट पोर्न में यौन संबंधों का आनंद उठाते हुए युवकों को ही अधिक दिखाया जाता है.

मनोवैज्ञानिक कहते हैं, ‘‘हमारे देश में सैक्स के बारे में बात करना एक प्रकार से गुनाह माना जाता है. ऐेसे में यूथ्स के लिए अपनी सैक्सुअल जिज्ञासाओं को शांत करने का सब से आसान जरिया इंटरनैट पोर्न ही है. इस का एक दुष्प्रभाव यह है कि ये युवक इन पोर्न क्लिपिंग्स या फिल्मों के जरिए सैक्स ज्ञान प्राप्त करने के बजाय मन में ऊटपटांग ग्रंथियां पाल लेते हैं.’’

पोर्न नायक के अतिरंजित मैथुन और उस के यौनांग के अटपटे साइज को ले कर ये युवा अपने मन में हीनभावना पाल लेते हैं और खुद को नाकाबिल या कमजोर मान कर युवतियों का सामना करने से कतराते हैं. ये युवक अपने छोटे लिंग और कथित शीघ्रपतन की समस्या को ले कर अकसर मनोवैज्ञानिक या सैक्स विशेषज्ञों के चक्कर काटते नजर आते हैं. कुछ युवा तो झोलाछाप डाक्टरों या तंत्रमंत्र के चंगुल में भी फंस जाते हैं.

‘इंडिया इन लव’ की लेखिका इरा त्रिवेदी के मुताबिक डिजिटल सैक्स के मकड़जाल में फंस कर कई यूथ्स तो अपनी बसीबसाई गृहस्थी को भी तबाह कर बैठते हैं. दरअसल, पोर्न फिल्मों में हिंसक यौन संबंध दिखाए जाते हैं, जिन में युवतियों को जानवरों की तरह ट्रीट किया जाता है और उन के चीखनेचिल्लाने के बावजूद उन के साथ जबरन सैक्स करते दिखाया जाता है.

हाल ही में कोलकाता में एक महिला ने तलाक की अपील करते हुए शिकायत की कि उस का पति पोर्न फिल्मों के ऐक्शन उस पर दोहराना चाहता है. अजीबोगरीब आसनों में सैक्स करना चाहता है, जिसे सहन करना उस के बस की बात नहीं. पति के साथ यौन संबंध बनाने में उसे न तो रोमांस का अनुभव होता है, न ही आनंद आता है बल्कि सैक्स संबंध उस के लिए टौर्चर बन चुके हैं.

कुछ हद तक डिजिटल सैक्स की इस आधुनिक बीमारी का शिकार कई महिलाएं बन चुकी हैं. गायनोकोलौजिस्ट बताती हैं कि उन के पास कुछ महिलाएं वैजाइनल ब्यूटीफिकेशन के उपाय पूछने भी आती हैं, तो कुछ महिलाएं ऐसी भी हैं जो अपने पति से संतान तो चाहती हैं मगर सैक्स नहीं करना चाहतीं. संतान की उत्पत्ति के लिए वे कृत्रिम रूप से गर्भाधान करना चाहती हैं.

82 वर्षीय जिंबारडो कहते हैं कि युवाओं को डिजिटल सैक्स के इस मकड़जाल से निकालने के लिए वास्तविक दुनिया में इन्वौल्व होने के लिए प्रेरित करना पड़ेगा. उन्हें डिजिटल दुनिया से दूर रहने और अपने जैसे हाड़मांस के दूसरे लोगों से मिलनेजुलने और खासकर युवतियों से मिलनेजुलने के लिए प्रेरित करना पड़ेगा.

पोर्न फैक्ट, जो चौंकाते हैं

–  आमतौर पर हम पोर्न की खपत विदेश में ज्यादा मानते हैं, लेकिन 2014 में हुए एक औनलाइन सर्वे में ‘पोर्नहब’ ने पाया कि भारत पोर्न कंटैंट का सब से बड़ा उपभोक्ता है.

–  भारतीय डैस्कटौप के बजाय स्मार्टफोन पर पोर्न ज्यादा देखते हैं.

–  देशभर में आंध्र प्रदेश के लोग पोर्न हब पर सब से कम समय 6 मिनट 40 सैकंड बिताते हैं जबकि पश्चिम बंगाल में रोज 9 मिनट 5 सैकंड और असम में यह आंकड़ा 9 मिनट 55 सैकंड का है.

– सनी लियोनी अब तक की सब से फेवरिट पोर्न स्टार है.

– दुनिया के ज्यादातर देशों में पोर्न फिल्म सोमवार को देखी जाती है जबकि भारत में शनिवार को.

डेथ रेप ड्रग्स: लड़कियों को मिली आजादी पर अंकुश

आमतौर पर हमारे यहां रेप का कुसूर पिछड़ी जातियों के उद्दंड बेरोजगार और कट्टर बन रहे नौजवानों पर डाला जाता हैजो दलित लड़कियों को रेप कर के जला तक डालते हैं. पर समस्याएं ऊंची जातियों में भी हैं और ओबीसी जातियों की लड़कियों में भीजो पैसे और पढ़ाईलिखाई के चलते अब मेनस्ट्रीम में आने लगी हैं. इन में एक समस्या डेट रेप की है.

एक मल्टीनैशनल कंपनी में काम करने वाली अनामिका मुंबई के अंधेरी इलाके के एक पेइंग गैस्टहाउस में रहती थी. वह एक पिछड़े समाज की खातेपीते घर की लड़की थीजो शहर में पढ़ने व काम करने आई थी. उस ने पंखे से लटक कर खुदकुशी कर ली.

सुसाइड नोट में उस ने लिखा, ‘एक दिन जब मैं औफिस में थीतब मेरे ह्वाट्सएप में वीडियो मैसेज आया. वह जिस नंबर से आया थावह भारत का नहीं था. मेरे मन में उत्सुकता पैदा हुई कि आखिर यह किस बारे में है और किस ने भेजा है. मैं ने इंटरनैट से मालूम किया तो पता चला कि नंबर सिंगापुर से आपरेट किया जा रहा था.

मैं स्टाफरूम में गई और चुपचाप  मैसेज देखा. देख कर मेरे पैरों तले से जमीन खिसक गईक्योंकि वह मु?ा से ही संबंधित था. वह एक पोर्न फिल्म थी. मैं डर के मारे सिहर उठी.

घर आ कर मैं ने कई बार वीडियो मैसेज देखा. मैं हैरान थी कि उस में कई लड़कों को मेरे साथ जिस्मानी संबंध बनाते हुए दिखाया गया था. मु?ो यह तक याद न था कि यह कब व कैसे हुआ. उस में न मेरी तरफ से विरोध था और न ही मैं नशे की हालत में थी. बिना हीलहुज्जतपूरी सहमति से दिखाए गए इतने सारे सैक्स संबंध मु?ो डरा रहे थे. हर दृश्य में मैं तो साफतौर पर दिख रही थीपर सैक्स करने वालों के चेहरे छिपे हुए थे. अंत में धमकी भरी सूचना थी कि अमुक जगह व समय पर मिलोनहीं तो इसे सार्वजनिक कर दिया जाएगा.

मु?ो सम?ा नहीं आ रहा था कि यह हादसा कब व कैसे घटित हुआजबकि मैसेज तनिक भी फर्जी नहीं लग रहा था.

मैं ने दिमाग पर बहुत जोर डालातब याद आया कि पिछली बार जब बौयफ्रैंड डेट’ पर ले गया थातब कान व गले में यही तो पहने थेजो उस वीडियो में नजर आ रहे हैं. ड्रिंक्स के बाद मैं असामान्य हो गई थी. इस वजह से रात वहीं गुजारनी पड़ी. मगर वहां रहते हुए ऐसा हुआयह सोच कर मैं हैरान थी.

ऐसा एमएमएस कबकहां व कैसे बना और बनाने व भेजने वाला कौन है का जवाब नहीं मिल रहा था. सब से बड़ी उल?ान यह थी कि वीडियो में मैं पूरे होशोहवास में सहयोग करती नजर आ रही थी. अगर बौयफ्रैंड को बताती या पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवाने जातीतो कैसे साबित करती कि जो हुआवह मेरी इच्छा के खिलाफ था.

इस के बाद मैं हथियार डालने को मजबूर हो गई. मेरी बोल्डनैस पलभर में छूमंतर हो गई. निश्चित समय व तय जगह पर पहुंचना मेरी मजबूरी थी. फिर तो मैं पतन के गर्त में समाती चली गई. मैं उन लोगों के हाथों की कठपुतली बन गई और गैंग रेप’ की शिकार होने लगी. बाद में पता चला कि मेरा बौयफ्रैंड फ्रौड था. वह उसी गैंग के लिए काम करता था. मेरी जैसी अनेक लड़कियां वहां पोर्न फिल्मों’ की हीरोइनें बनी हुई थीं. इस दलदल से निकलने के लिए खुदकुशी करने के अलावा मेरे पास और कोई रास्ता न था.

अफसोस तो मु?ो इस बात का है कि मैं ने बिना परखे बौयफ्रैंड बनाया और बाद में समय रहते पुलिस के पास नहीं जा पाईवरना मु?ो यह जलालत तो नहीं सहनी पड़ती.

रोहित शेट्टी की फिल्म संडे’ में सेहर नाम की लड़की लाख कोशिश करने पर भी एक संडे को याद नहीं कर पातीजबकि उस के लिए वह संडे खास थाक्योंकि जांच एजेंसियां उस संडे के बारे में उस से जानना चाहती थीं.

देखा जाएतो सेहर के गुम संडे और अनामिका के साथ घटे हादसे का राज समान ही नजर आता है और वह यह कि वे दोनों अनजाने में किसी की साजिश का शिकार बन गई थीं.

आमतौर पर ऐसे मामलों में लड़कियां ऐसी दवा की शिकार बन जाती हैंजिस के सेवन से शारीरिक व मानसिक रूप से वे इतनी कमजोर हो जाती हैं कि ठीक तरह से विरोध भी नहीं कर पातीं. इन दवाओं में ऐसी चीजें मिली होती हैंजिन से यौन उत्तेजना बढ़ जाती है.

जाहिर हैऐसी हालत में पीडि़ता खिलाफत के बजाय सहयोगी बन कर सैक्स की भूख शांत करती नजर आती हैक्योंकि बढ़ी हुई यौन उत्तेजना के चलते जाहिर होने वाला विरोध भी दब कर रह जाता है और यही उस के पक्ष को कमजोर बना देता है. नतीजतनऐसे रेप या साजिश साबित नहीं हो पाती और वह ब्लैकमेल’ होने को मजबूर हो जाती है.

यह उन लड़कियों के लिए गंभीर चेतावनी हैजो पार्टियोंक्लबों या पबों में जाती हैं व खुद को बोल्ड’ साबित करने की धुन में नशे की आदी हो गई हैं.

ऐसी लड़कियां मर्द साथियों के साथ ड्रिंक्स से परहेज नहीं करतींकिंतु बोल्डनैस के चलते सैक्स के लिए समर्पित भी नहीं होतीं. ऐसी लड़कियों से निबटने के लिए गलत मर्द साथी ड्रिंक्स में यह दवा मिला देते हैंजिन्हें डेट रेप ड्रग्स’ के नाम से जाना जाता है. इस के बाद वे बेखौफ उन्हें जिस्मानी शोषण का शिकार बना लेते हैं और ब्लैकमेल’ करते रहने के लिए पुख्ता सुबूत भी जुटा लेते हैं. गामा हाईड्रौक्सीब्यूट्रिक एसिड के नाम से जानी जाने वाली एक ड्रग्स इन्हीं में से है.

जयपुर के जगतपुरा क्षेत्र में डेट रेप ड्रग्स’ की खेपें जाती रहती हैंक्योंकि इस का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने लगा है. इन में से एक केटामाइन प्रतिबंधित दवा भी हैजो मानसिक मरीजों के लिए इस्तेमाल होती हैपर इस का सब से ज्यादा इस्तेमाल नाइट क्लबोंरेव पार्टियों में होने लगा है. इन्हें लेने वाला तकरीबन होश खो देता है और होश में आने पर अपराध में शरीक रहे अपराधियों तक को नहीं पहचान पाता.

फोरैंसिक माहिरों का कहना है कि आमतौर पर पार्टी के दौरान लड़कियों को कैटामाइन इंजैक्शन या ड्रिंक्स के रूप में दिया जाता है. इस के बाद वे सपने जैसी हालत में पहुंच जाती हैं. होश में आने पर उन्हें कुछ भी याद नहीं रहता. इस तरह वे बेहोश तो नहीं होतींपर सोचनेसम?ाने व पहचानने तक की ताकत खो बैठती हैं.

यहां तक कि वे बौयफ्रैंड और दूसरे में फर्क नहीं कर पातीं. तभी तो ऐसी क्लब पार्टियों में पार्टनरों के बदलते रहने के चलते वे गैंग रेप’ की शिकार बन जाती हैं और होश में आने के बाद न अपने बरताव को याद कर पाती हैं और न ही बलात्कारी पार्टनरों को पहचान पाती हैं.

गांवों व छोटे कसबों से आने वाली लड़कियां आमतौर पर शहरी बनने के चक्कर में बहुत से जोखिम भी लेती हैंइसलिए वे हर न्योते को स्वीकार कर लेती हैं. उन्हें अपने शारीरिक दम पर भरोसा होता हैपर ये ड्रग्स दिमाग पर काम करती हैंशरीर के मसल्स पर नहीं.

जहां तक इन दवाओं से सावधान रहने की बात हैयह भी तकरीबन नामुमकिन सा ही हैक्योंकि ऐसी दवाएं रंगगंध व स्वादहीन होती हैंइसीलिए इन्हें आसानी से बिना जानकारी के किसी भी पेय पदार्थ में मिला कर पिलाया जा सकता है. इसे पानी के साथ भी दिया जा सकता है. पीने वालों को तनिक भी पता नहीं चलता और वे सहज विश्वास से उसे पी जाते हैं.

इस के कुछ समय बाद ही दवा अपना असर दिखाने लगती है. साजिश रचने वाला इंतजार में रहता है. उस का तनिक सा आमंत्रण सभी दूरियां मिटा देता है और वह हालात का फायदा उठाने से नहीं चूकता.

डाक्टरों का कहना है कि ऐसी

ड्रग्स का बेसिक कंपोनैंट है हाईड्रौक्सीब्यूट्रिक एसिड’. इस का असर तकरीबन 6 से 8 घंटे तक बना रहता है. यह दवा शरीर में तकरीबन

12 घंटे तक रहती है. 8 से 12 घंटे की अवधि तक उसे लेने वाली लड़की ढुलमुल व मतिभ्रम की शिकार बनी रहती है. अगर 12 घंटे में उस की पैथोलौजिकल जांच हो जाएतब तो दवा दिए जाने के सुबूत मिल सकते हैंवरना वे पता नहीं चल पाते. जाहिर है कि इतने समय में पीडि़त के सामान्य न होने से मामले का पता नहीं चल पाता और अपराधी के कांड पर परदा पड़ा रह जाता है.

पश्चिमी देशों में इस तरह की घटनाएं घटित होना आम बात है. अकेले ब्रिटेन में हर हफ्ते तकरीबन 30 से ज्यादा महिलाएं ऐसे हादसों की शिकार बनती हैं.

ये आंकड़े उन महिलाओं के हैंजो पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवा पाती हैं. जाहिर हैअनेक महिलाएं ऐसी भी होंगीजिन्हें अपराधियों द्वारा समयसमय पर उपयोग तो किया जाता हैकिंतु उन्हें उस का ज्ञान तक नहीं होता. यह भी मुमकिन है कि उन्हें पता तो चल गयापर उलट हालात को देखते हुए ब्लैकमेल होना नियति मान बैठी हों और पुलिस के पास जाना उन्हें फुजूल लग रहा हो.

जरूरी है कि लड़कियां ऐसे मामलों से बच कर रहेंखासकर वे जो पार्टियोंक्लबोंपबों या बार में जाती हैं और मर्द साथियों के साथ ड्रिंक्स लेने की आदी हैं. न जाने कौनकब उन के ड्रिंक्स में कुछ मिला दे और अपना शिकार बना ले. इसी तरह जो लड़कियां दोस्त या मंगेतर के साथ डेट’ पर जाती हैंवे भी आसानी से विश्वासघात की शिकार बन सकती हैं.

दिल्ली में द्वारका में एक लड़कीजो 12वीं क्लास की छात्रा थीमहीनों तक इसी तरह की डेट रेप ड्रग्स की शिकार रही. उसे बारबार पेटीएम से पैसे भेजने को कहा जाता रहा. आखिर में उसे मातापिता को विश्वास में ले कर पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज करानी पड़ी.

चाहे अपराधी पकड़ में आ जाएपर करीब के सब लोग लड़की के कारनामोें को जान जाते हैं और नाम बताए जाने के बाद वह बदनाम हो जाती है.        

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