कैसे करें बगीचे पर ऊंचे तापमान के असर का बचाव

आमतौर पर उत्तर भारत में गरमी के मौसम में लू व ऊंचे तापमान से बगीचों में काफी नुकसान होता है. फल उत्पादक यदि गरमी में अपने बाग का रखरखाव वैज्ञानिक ढंग से करें, तो पौधों को ऊंचे तापामन से बचा कर वे माली नुकसान से बच सकते हैं.

फलों के पेड़ों को ज्यादा तापक्रम के कारण सनबर्न व सन स्काल्ड नाम के नुकसान होते हैं. पौधों की बढ़वार के समय तापक्रम अधिक होने पर धूप के सीधे संपर्क में आने वाली पत्तियों, तनों व फलों को नुकसान होता है.

जब वायुमंडल में आर्द्रता कम हो व हवाएं तेज चलें, तब ज्यादा तापमान के प्रभाव से पौधों को बहुत ज्यादा नुकसान होता है. इस समय पौधों से ज्यादा भाप निकलती है, जिस से पौधों की पत्तियां व टहनियां सूख जाती हैं.

बाग की दक्षिण पश्चिम दिशा में सूर्य की किरणें अन्य दिशाओं की तुलना में दिन में ज्यादा समय तक सीधी पड़ती हैं, जिस के कारण पौधों में सन स्काल्ड होता है. सूर्यास्त के  बाद तापक्रम अचानक गिर जाता है, जिस से पौधों को नुकसान पहुंचता है. नीबू प्रजाति के पेड़ों को यह नुकसान ज्यादा होता है.

ऊंचे तापमान से पेड़ों का बचाव : गरमी के मौसम में जब तापक्रम 40 डिगरी सेंटीग्रेड से ऊपर पहुंचने लगता है, उस समय पौधों को गरमी से बचाने के लिए निम्नलिखित सावधानियां अपनानी चाहिए:

छाया करना : छोटे पौधों (नए रोपित) को कांस, मूंज, कड़वी आदि की टटियां बना कर ढक देना चाहिए. गमलों में लगे पौधों को बड़े पौधों की छाया में रख कर गरमी से बचाया जा सकता है.

पौधों को ढकना : यदि मुमकिन हो तो पौधों के तनों को ऊपर से नीचे तक अखबार लपेट कर ढक देना चाहिए, ताकि पौधों की ऊंचे तापमान से रक्षा की जा सके.

नियमित सिंचाई : पौधों को ऊंचे तापमान से बचाने के लिए मिट्टी की किस्म व तापमान को ध्यान में रखते हुए सिंचाई का अंतराल कम कर देना चाहिए. नियमित सिंचाई कर के हलकी नमी बनाए रखनी चाहिए.

सिंचाई के समय में बदलाव : गरमी में सिंचाई के शाम के समय में बदलाव कर देना चाहिए, क्योंकि दिन की गरमी के बाद अचानक पानी देने से पौधे मर जाते हैं. गरमी में रात 2 बजे से सुबह 9 बजे तक सिंचाई करनी चाहिए.

विंड ब्रेक लगाना : बाग लगाते समय पश्चिम दिशा में लंबे सदाबहार पेड़ों की 2-3 पट्टियां जरूर लगाएं. सदाबहार पेड़ों में जामुन, कटहल, बांस, सफेदा, सूलबूल, पोपलर, महुआ व टीक आदि का चयन स्थानीय हालात के मुताबिक करना चाहिए. किसी कारण यह विंड ब्रेक सफल न हो, तो अगला विंड ब्रेक तैयार होने तक कच्ची या पक्की दीवार बना कर पौधों की रक्षा की जा सकती है.

सफेदी कर के : पेड़ों पर सफेदी कर के भी उन्हें गरमी से बचाया जा सकता है. जाड़े के मौसम के बाद पौधों पर बसंत के मौसम में सफेदी की दोहरी कोटिंग कर देनी चाहिए. सफेदी की कोटिंग करने से पौधों की गरमी के साथसाथ कीड़ों से भी सुरक्षा हो जाती है.

नर्सरी के पौधों की ग्रीन हाउस में सुरक्षा : नर्सरी के पौधों की ग्रीन हाउस में ऊंचे तापमान से सुरक्षा की जा सकती है. इस के लिए सस्ती सामग्री का इस्तेमाल कर के ग्रीन हाउस बना सकते हैं.

महंगे खिलौनों से खेल खेल में पढ़ना सीखेंगे उत्तर प्रदेश में आंगनबाड़ी केंद्रों पर बच्चे

यूपी के आंगनबाड़ी केन्द्र बहुत जल्द प्ले स्कूलों के रूप में नजर आएंगे। यहां 03 से 06 वर्ष के बच्चों को खेल-खेल में पढ़ना-लिखना सिखाया जाएगा। खेलने के लिए खिलौने दिये जाएंगे जिससे केंद्र की तरफ बच्चों का आकर्षण बढेगा और उनकी संख्या में भी बढ़ोत्तरी होगी। संस्कार डालने के साथ उनके संर्वांगीण विकास के कार्यक्रम भी चालू किये जाएंगे। इसके लिए प्रदेश सरकार 16 करोड़ रुपये की लागत से ग्राम पंचायतों और शहरों में स्थित लाखों आंगनबाड़ी केन्द्रों में नन्हे-मुन्हों को प्री-स्कूल किट बांटेगी। इस प्री-स्कूल किट में खिलौने ओर शिक्षा प्रदान करने वाली लर्निंग ऐड होगी।

सरकार की योजना से आंगनबाड़ी केन्द्रों पर आने वाले 03-06 वर्ष के बच्चों को प्री-स्कूल किट के माध्यम से गतिविधि और खेल आधारित पूर्व शिक्षा प्रदान करने में मदद मिलेगी। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता बच्चों के बौद्धिक विकास के लिए उन्हें चार्टर, टेबल और वॉल पेंटिंग पर बनाई हिंदी और अंग्रेजी की वर्णमाला, गिनती आदि सिखाएंगी। इसके साथ ही प्रदेश के 31 जनपदों के 6 करोड़ की लागत से आंगनबाड़ी केन्द्रों में बच्चों को ईसीसीई सामग्रियां (एक्टीविटी बुक, पहल, गतिविधि कैलेण्डर) भी वितरित की जाएंगी। बाल विकास पुष्टाहार विभाग को इन कार्यक्रमों को तेजी से आंगनबाड़ी केन्द्रों पर लागू कराने की जिम्मेदारी गई है।

आंगनबाड़ी केन्द्रों के निर्माण से लाभार्थियों को एक अच्छे वातावरण में सुविधाएं उपलब्ध कराने के प्रयास भी सरकार कर रही है। इसके लिए वो आने वाले समय में 175 करोड़ रुपये से 199 आंगनबाड़ी केन्द्र भवनों का शिलान्यास करेगी। जिसकी तैयारी के लिए विभाग तेजी से जुटा है। बता दें कि सरकार ने आंगनबाड़ी केन्द्रों को सुंदर बनाने के प्रयास किये हैं। आंगनबाड़ी केन्द्रों पर फर्नीचर, पुस्तकें, खिलौने और दीवार पर पेंटिंग के कार्य कराए हैं। सरकार की योजना को सफल बनाने में सामाजिक संस्थाएं भी सहयोग में जुटी हैं। खासकर ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों को बुनियादी शिक्षा प्राप्त करनें में काफी लाभ मिला है।

‘मैं नही मानती कि हम भारतीय संगीत को खो रहे हैं’- तुलसी कुमार

बौलीवुड की चर्चित गायिका तुलसी कुमार की परवरिश संगीत के माहौल में ही हुई है. उनके पिता स्व. गुलशन कुमार मशहूर म्यूजिक कंपनी ‘‘टी सीरीज’’ के मालिक थे और अब उनका भाई भूषण कुमार टी सीरीज के कर्ताधर्ता हैं. तुलसी कुमार जब छह वर्ष की थी, तभी से उनके पिता ने उन्हें संगीत की तालीम दिलानी शुरू कर दी थी. जब वह 12 वर्ष की थी, तब उनके पिता गुलशन कुमार इस दुनिया से चले गए. पर उसके बाद उनकी मां व भाई उनके साथ खड़े रहे.

तुलसी कुमार ने 2006 में फिल्म ‘‘चुप चुप के’’ में हिमेश रेशमियां के संगीत निर्देशन में सोनू निगम के साथ ‘मौसम है बड़ा कातिल’ गाकर पाश्र्वसंगीत के क्षेत्र मंे कदम रखा था. तब से अब तक ‘हमको दीवाना कर गए’, ‘कर्ज’, ‘जय वीरू’, ‘पाठषाला’,‘रेडी’,‘दबंग 2’, ‘आशिकी 2’,,‘साहो’ व ‘बागी 3’ सहित कई फिल्मों में पाश्र्वगायन कर चुकी हैं. तो वहीं ‘राधे श्याम’,‘मैनूं इश्क दा लागा रोग’,‘तेरे नाल’,‘मैं जिस दिन भुला दूं’ सहित कई रोमांटिक सिंगल गीत भी गाए हैं.

इन दिनों वह सिंगल गीत ‘जो मुझे दीवाना कर दे’’ को लेकर चर्चा में हैं, जिसके म्यूजिक वीडियो में तुलसी कुमार ने पहली बार डांस किया है.

आपको संगीत की अच्छी समझ है. संगीत की समझ के लिए कुछ लोग ट्रेनिंग, कुछ लोग घर के माहौल और कुछ लोग ईश्वर की देन मानते हैं. आप खुद क्या मानती हैं?

-मेरी राय में संगीत में पारंगत होने के लिए ट्रेनिंग, घर का माहौल और ईश्वर की देन तीनों का होना आवश्यक है. इंसान को संगीत ईश्वर की देन हो, उसके साथ ही सही ट्रेनिंग मिल जाए और इंसान सही माहौल में अपने आपको रखता है. यह सब एक कलाकार के निर्माण में काफी मददगार होता है. मेरे घर पर संगीत का माहौल सदा से रहा है. मैने बचपन से संगीत सुना है. मेरे पापा घर पर संगीत सुना करते थे. फिर चाहे वह फिल्म ‘आशिकी,‘ दिल है कि मानता नही’ हो. बचपन से संगीत सुनती आ रही हॅूं.

आज दौर बदला है. आज कल लो विविध प्रकार के जॉनर के संगीत को सुन रहे हैं. लेकिन गाने की मैलोडी में कभी बदलाव नहीं आया. यदि आपके गीत संगीत में मजबूत मैलोडी हो, तो फिर वह हर दौर में सफल है.

मैं मानती हॅूं कि सब कुछ बदल रहा है. पिछले कुछ वर्षों से सोशल मीडिया पर हम इस बदलाव को देख पा रहे हैं. मगर अच्छी मैलोडी वाला संगीत सभी को पसंद आता है.

आपके 15 वर्ष के कैरियर के दौरान संगीत में बहुत कुछ बदला है. पहले छह से आठ गाने की एक सीडी आती थी. अब तो सिंगल गाने का चलन है?

-देखिए, संगीत अलबम तो आज भी आ रहे हैं. मगर अब सिंगल गाने आ रहे हैं. जहां पूरा अलबम एक थीम पर न होकर, हर गाना अलग थीम पर है. मैंने पिछले दो तीन वर्षों में हर दो माह में एक सिंगल गाना लेकर अती रही हूं. इन सभी गीतों को मैं एक साथ जोड़कर उसे अलबम का नाम दे सकती हॅूं. लेकिन मैने हर बार सिंगल रिलीज का नाम दिया. अलबम है या सिंगल है, यह तो सिर्फ एक काॅसेप्ट है. मुख्य बात यह है कि आप गाना अलबम के रूप में लाएं या सिंगल के रूप में लाए, उसका दर्शकों द्वारा पसंद किया जाना जरुरी है. दूसरी बात अमूमन हर अलबम में आठ से नौ गाने हुआ करते थे, जिनमें से सिर्फ दो या तीन गीतों के ही म्यूजिक वीडियो बनते थे. जबकि हम तो हर सिंगल गाने का वीडियो बना रहे हैं. तो मेरी समझ से काॅसेप्ट बदला है.पर अंततः लोगों तक अच्छा गाना पहुॅच रहा है.

पिछले दो वर्ष के दौरान कोरोना की वजह से सभी अपने घर पर बैठे हुए थे. कोई कुछ नहीं कर रहा था. पर उस वक्त भी आप अपने सिंगल गाने लेकर आ रही थीं. आपको कहां से प्रेरणा मिल रही थी?

-जी हाॅ!लेकिन लाॅक डाउन के वक्त मैं और कुछ म्यूजीशियन इस प्रयास में लगे हुए थे कि कुछ करते रहे. जिससे घर पर बैठे लोगों का मनोरंजन होता रहे. हमारे पास सोशल मीडिया काम माध्यम था.हम इंस्टाग्राम वगैरह के माॅर्फत लोगों तक नए गाने ,नया ंसंगीत पहुॅचाते हुए उनका मनोरंजन कर रहे थे,जिससे लोग डिप्रेशन वगैरह में न जाने पाए.हमने कुछ गीतों को एक रेडियो चैनल के साथ मिलकर लोगों तक पहुॅचाया.फंड इकट्ठा किए हैं.आॅन लाइन लाइव म्यूजिक कंसर्ट किए.कई गानों को रिकार्ड और उनके वीडियो भी फिल्माए हैं.मैने लाॅक डाउन में पहला गाना ‘‘तेरे नाल..’’ को अपने घर से रिकार्ड करने के अलावा अपने घर पर ही फिल्माया भी था.इस गाने को अब तक नब्बे मिलियन लोग देख चुके हैं.हमने काम करना बंद नही किया.जब हमने कलाकार के तौर पर लोगों का मनोरंजन करने का जिम्मा ले रखा है,तो जब हर इंसान अपने घर के अंदर कैद थे,तब भी हमने उनका मनोरंजन करने का बीड़ा उठाया.

किसी भी गाने को गाने के लिए आप कैसे चुनती हैं?

-मेरी समझ के अनुसार गाना खुद गायक को चुनता है.फिल्म के गाने अगर आपके स्पेस और आपके जाॅनर में बैठते हैं,तो सोने पे सुहागा.जैसे कि मुझे पता है कि मेरा रोमांटिक जोन है,जो कि काफी सशक्त है.लोग मेरे द्वारा स्वर बद्ध रोमांटिक गीत सुनना चाहते हैं.फिर चाहे वह ‘तेरी बन जाउं’ हो अथवा ‘ जो आए सोच न सके…’ इसके अलावा जब मैं इंडीपेंडेंट गाना यानी कि इंडीपेंडेंट म्यूजिक बानती हॅूं,तो मुझे अलग जाॅनर, अलग स्पेस चाहिए.मैं हमेशा कुछ नया करने का प्रयास करती हॅूं.अब यह गाना ‘‘जो मुझे दीवाना कर दे’’ लेकर आयी हॅूं,इसमें मैलोडी के साथ ही कुछ फास्ट बीट्स हैं.यह अलग स्पेस वाला गाना है.इसके संगीतकार मनन भारद्वाज हैं,जिन्होने मेरे साथ इस गीत की कुछ पंक्तियां भी गायी हैं.जबकि म्यूजिक वीडियो नृत्य निर्देशक गणेष हेगड़े ने निर्देशित किया है.हम मैलोडियस गीत के माध्यम से ही कहानी बताते हैंइसमे मैने कुछ विज्युअल के स्तर पर प्रयोग किया है.पहली बार मैने इस म्यूजिक वीडियो में नृत्य भी किया है.इसके लिए मैने ख्ुाद डांस की ट्ेनिंग भी ली.

आपने नृत्य की ट्रेनिंग किससे ली?

-मुझे डांस का बहुत शौक है.डांस मेरे अंदर है.मैं बचपन से ही संगीत व नृत्य कंपटीशन का हिस्सा हुआ करती थी .कई पुरस्कार बटोरे हैं.इसलिए डांस की बीट्स पकड़ना मेरे लिए आसान रहा है.मैने नृत्य निर्देशक गणेश हेगड़े के साथ छह दिन तक इसकी रिहर्सल की.वैसे स्कूल दिनों में हर कम्पटी ान मेें मेरी टीचर मुझे सबसे आगे खड़ा किया करती थी.पर मैने प्रोफेशनली कभी भी डांस नही सीखा.क्यांेकि मैं सारा वक्त संगीत सीखने को देती थी.पर अब मैं अपने डांस को पाॅलिश कर रही हॅूं.अब रील्स का जमाना आ गया है तो मैं डांस के वीडियो बनाकर रील्स पर डाल रही हॅूं.

इंडो-वेस्टर्न म्यूजिक ट्रेंड का चलन बढ़ता जा रहा है?

-जी हाॅ!मुझे लगता है कि इन दिनों सब कुछ बहुत इंडो वेस्टर्न हो गया है.हर संगीत का अपना स्थान है.मुझे भारतीय और पारंपरिक संगीत बहुत पसंद है.लेकिन दर्शकों की पसंद के अनुरूप हमारे जीवन के हर क्षेत्र में बहुत सारे इंडो-वेस्टर्न स्वाद देर से आए हैं.संगीत ही क्यों अब तो पहनावे में भी ‘इंडो-वेस्टर्न’ का चलन बढ़ गया है.युवा पीढ़ी इससे ज्यादा जुड़ रही है.मसलन-यदि आप एक क्लासिक गाना उठाकर उसकी बीट बदलते हैं,गाने के अलग-अलग नजरिए के साथ उसके बोल में थोड़ा बदलाव करते हैं, तो आप पाते हैं कि युवा उस गीत को जल्दी स्वीकार कर रहा है.मुझे लगता है कि यह प्रवृत्ति यहाँ रहने के लिए है.मगर इसके मायने यह नही है कि युवा पीढ़ी हमारे भारतीय संगीत से प्यार नही करती.कई विशुद्ध रूप से भारतीय गाने भी काफी लोकप्रिय हैं.लेकिन हां दर्शकों और बाजार के स्वाद के अनुरूप, हर चीज जो स्वाद को आकर्षित करती है,उसे पूरा किया जाना चाहिए.

लोग मानते हैं कि संगीत जगत में आ रहे बदलाव के चलते हम अपने भारतीय शास्त्रीय संगीत को खो रहे हैं?
-जैसा कि मैने पहले ही कहा कि कुछ लोग नए स्वाद को चख रहे हैं.पर मैं यह नही मानती कि हम अपने भारतीय शास्त्रीय संगीत को खो रहे हैं.क्योंकि उस तरह के संगीत के लिए भी श्रोता मौजूद हैं.मनोरंजक संगीत के लिए एक दर्शक वर्ग है.तो वहीं प्यार और रोमांटिक गाने गजल, भक्ति संगीत आदि के लिए दर्शक हैं.आप इस सच से इंकार नही कर सकते कि आज भी बॉलीवुड पर भारतीय संगीत ही हावी है.लेकिन शास्त्रीय संगीत पसंद करने वाले लोग शास्त्रीय संगीत ही सुनते हैं.

आपके अनुसार भारतीय संगीत जगत में किस तरह के बदलाव की जरुरत है?

-आप इस बात से इंकार नही कर सकते कि संगीत उद्योग अभी भी पुरुष प्रधान ही है.पुरुष प्रधान गीत ज्यादा बनते हैं.युगल गीतों में भी महिलाओं के हिस्से कम ही पंक्तियां आती हैं.माना कि कुछ फिल्में नारीप्रधान बन रही हैं.धीरे धीरे महिला कलाकारों की उपस्थिति बढ़ भी रही है.मुझे लगता है कि महिलाएं बड़े पैमाने पर सामने आई हैं और उनसे जुड़ी हर चीज के लिए स्वीकार्यता भी बढ़ी है.संगीत जगत में महिला गायको,संगीतकारों व म्यूजीषियन की संख्या बढ़े,इस दिषा में कदम उठाने की आवष्यकता है.

जब आप फिल्म के लिए और जब सिंगल गाना गाती है,तो किस तरह का ध्यान रखती हैं?

-देखिए,फिल्म में तो हम किसी न किसी एक किरदार के लिए गाते हैं.तो फिल्म के लिए गाना रिकार्ड करने से पहले मैं फिल्म की कहानी ,गाने की सिच्युएषन आदि की जानकारी लेती हॅूं.फिर गाना किस अभिनेत्री पर फिल्माया जाएगा,यह भी जानकारी लेती हॅूं.तो फिल्म के गाने की जरुरत अलग है.मगर जब हम इंडीपेंडेंटली किसी सिंगल गाने को गाते हैं,तो वह बहुत ही अलग मसला होता है.सिंगल करते समय यह देखती हॅूं कि दो वर्ष पहले जो सिंगल गाना किया था,उससे यह अलग है या नही.मैं हर बार काफी सोच समझकर ही कदम बढ़ती हॅूं.मुझे फिल्म के लिए गाना गाना हो अथवा अपने लिए सिंगल गाना गाना हो,मैं अपनी तरफ से पूरी मेहनत करती हूंू और दोनों ही जगह इंज्वाॅय करती हॅूं.सिंगल गाने में हम ख्ुाद वह किरदार होते हैं.सिंगल गाने में जमीनी जुड़ाव ज्यादा होता है.इतना ही नही सह गायक,निर्देशक, कैमरामैन से लेकर हर किसी के साथ एक जुड़ाव हो जाता है.गायक के लिए सिंगल गाना चार मिनट की फिल्म होती है.फिल्म गीत संगीत की बनिस्बत सिंगल गाने मुझे एक गायक के रूप में बहुत संतुष्टि और रचनात्मक स्वतंत्रता देते हैं.

Crime: मर्द से औरत बनने का अधूरा ख्वाब

अरुण शारीरिक रूप से तो लड़का था, लेकिन उस की आदतें और स्वभाव लड़कियों की तरह थे. इसलिए उस ने अपना नाम मीशा रख लिया. मीशा के दोस्त जस्सी ने उस का औपरेशन करा कर उस की लड़की बनने की ख्वाहिश पूरी करने का वादा किया.

30अगस्त, 2021 को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का त्यौहार होने के कारण पुलिस स्टाफ ने सुबह

भोर होने तक सुरक्षा इंतजामों में ड्यूटी दी थी. इसीलिए तरुण मन्ना 31 अगस्त की सुबह 9 बजे जब साउथईस्ट दिल्ली के सरिता विहार थाने में अपने भाई अरुण की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवाने गया तो उसे थानाप्रभारी अनंत गुंजन से मिलने के लिए थोड़ा इंतजार करना पड़ा. जब थानाप्रभारी अपने रेस्टरूम से तैयार हो कर औफिस में आए तो तरुण ने उन्हें अपने भाई के गायब होने की जानकारी दी. तब अनंत गुंजन ने तरुण से पूछा, ‘‘क्या हुआ तुम्हारे भाई को क्या घर में किसी से झगड़ा हो गया था.’’

‘‘नहीं सर, कोई झगड़ा नहीं हुआ था कल शाम को 5 बजे वह यह कह कर घर से बाहर गया था कि 10 मिनट में वापस लौट आएगा अपने दोस्त जस्सी से मिलने जा रहा है.

‘‘जब करीब एक घंटा हो गया और वह लौट कर नहीं आया तो हमें चिंता होने लगी. हम ने उस का फोन भी मिलाया लेकिन वह स्विच्ड औफ था. इसी दौरान उस के दोस्त जस्सी का फोन मेरी मां शांति देवी के फोन पर आया और उस ने कहा मीशा से बात करा दो.’’

तरुण मन्ना ने जब यह बताया कि अरुण के दोस्त जस्सी ने उस की मां शांति देवी से मीशा से बात कराने के लिए कहा था तो थानाप्रभारी अनंत गुंजन चौंक पड़े. क्योंकि बात तो अरुण के बारे में हो रही थी, लेकिन अचानक बीच में मीशा का जिक्र कहां से आ गया.

इसलिए उन्होंने तरुण को रोक कर पूछा, ‘‘एक मिनट ये मीशा कौन है? क्या यह तुम्हारे घर की कोई सदस्य है?’’

‘‘नहीं सर, अरुण ने ही अपना नाम बदल कर मीशा रख लिया था, इसलिए अब उसे मीशा कहते हैं.’’

एसएचओ अनंत गुंजन का दिमाग घूम गया. भला कोई लड़का लड़कियों वाला नाम क्यों रखेगा. अचानक पूरे मामले में उन की दिलचस्पी बढ़ गई.

तरुण मन्ना ने अरुण के मीशा बनने की जो कहानी बताई, वह भी दिलचस्प थी. लेकिन इस समय उन के लिए यह जानना जरूरी था कि अरुण उर्फ मीशा आखिर क्यों और कैसे लापता हो गया. तरुण ने बताया कि जस्सी का फोन आने के बाद उस की मां चौंक पड़ीं. क्योंकि मीशा तो उन से यह कह कर गई थी कि वह जस्सी से मिलने जा रही है और जस्सी पूछ रहा था कि मीशा कहां है?

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तरुण के मुताबिक उस की मां ने जस्सी को बता दिया मीशा तो उस से मिलने की बात कह कर करीब एक घंटा पहले घर से निकली थी और अभी तक घर नहीं लौटी है.

यह बात सुन कर जस्सी भी हैरान रह गया क्योंकि मीशा तो उस से मिलने आई ही नहीं. फिर उस ने अपने परिवार वालों से झूठ क्यों बोला.

इसी तरह कई घंटे बीत गए, लेकिन मीशा घर नहीं लौटी. जैसेजैसे वक्त गुजरता रहा, घर वालों की चिंता बढ़ती गई. परिवार वालों को यह भी समझ नहीं आ रहा था कि कभी झूठ न बोलने वाला अरुण उर्फ मीशा ने घर से बाहर जाने के लिए जस्सी का नाम क्यों लिया था.

हैरानी वाली बात यह भी थी कि मीशा का फोन भी लगातार बंद आ रहा था. इस वजह से घर वालों को लग रहा था कि कहीं उस के साथ कोई अप्रिय घटना तो नहीं हो गई.

तरुण मन्ना, उस की मां और पिताजी ने एक के बाद एक शाम से रात तक अरुण उर्फ मीशा के सभी दोस्तों को फोन किए, लेकिन उस का कहीं कोई सुराग नहीं लगा.

पूरी रात उन की आंखों में ही बीत गई. मीशा पूरी रात घर नहीं लौटी. तरुण मन्ना और उस के पिता ने आसपड़ोस के लोगों से भी मीशा के लापता होने का जिक्र किया तो सब ने सलाह दी कि उस की थाने में रिपोर्ट दर्ज करा दी जाए.

इसी सलाह को मान कर तरुण मन्ना अपने एकदो पड़ोसियों को ले कर दक्षिणपूर्वी दिल्ली के सरिता विहार थाने पहुंचा था. सारी बात सुन कर थानाप्रभारी अनंत गुंजन ने तत्काल ड्यूटी अफसर को बुला कर अरुण उर्फ मीशा (26) के लापता होने की सूचना दर्ज करवा दी और उस की जांच का जिम्मा तेजतर्रार एएसआई सत्येंद्र सिंह को सौंप दिया.

उन्होंने तरुण मन्ना को भरोसा दिया कि पुलिस इस मामले में अरुण उर्फ मीशा के दोस्त जस्सी की भी जांच करेगी कि कहीं इस मामले में उस की तो कोई मिलीभगत नहीं है.

जांच का काम हाथ में लेते ही एएसआई सत्येंद्र ने गुमशुदगी के मामलों में की जाने वाली सारी औपचारिकताएं करनी शुरू कर दीं. उन्होंने दिल्ली के सभी थानों और पड़ोसी राज्यों को मीशा का हुलिया और उस की फोटो भेज कर लापता होने की सूचना दे दी. साथ ही उन्होंने गुमशुदगी के लिए बने नैशनल पोर्टल पर भी जानकारी डाल दी.

एएसआई सत्येंद्र सिंह ने मीशा की गुमशुदगी से जुड़े पैंफ्लेट और पोस्टर छपवा कर सभी थानों में भिजवा दिए. उन्होंने अरुण उर्फ मीशा के भाई तरुण व परिवार के दूसरे सदस्यों से भी पूछताछ की. मसलन, उस की किनकिन लोगों से दोस्ती थी, वह कहां नौकरी करता था, किन लोगों के साथ उस का मिलनाजुलना था और किसी से उस की दुश्मनी या कोई विवाद तो नहीं था, आदि.

जांच की इस काररवाई व पूछताछ में 2-3 दिन का वक्त गुजर गया. चूंकि घर वाले बारबार मीशा के लापता होने में जस्सी का हाथ होने की बात कह रहे थे. लिहाजा एएसआई सत्येंद्र ने मीशा के फोन की काल डिटेल्स निकलवाने के साथ जस्सी का फोन नंबर ले कर उस के फोन की भी काल डिटेल्स निकलवा ली.

उन्होंने तरुण मन्ना से जस्सी का पता ले कर जस्सी को पूछताछ के लिए सरिता विहार थाने बुलवा लिया.

एएसआई सत्येंद्र ने जब जस्सी से पूछताछ शुरू की तो उस ने बिना लागलपेट के बता दिया कि जिस शाम मीशा अपने घर से लापता हुई, उस ने उसी समय मीशा को फोन जरूर किया था. उस वक्त वह घर पर ही थी.

जस्सी ने बताया, ‘‘सर उस वक्त मैं सरिता विहार इलाके में था. मैं ने मीशा को फोन कर के पूछा था कि अगर वह फ्री है और घर में कोई जरूरी काम नहीं है तो वह आली बसस्टैंड पर आ कर मिल ले. क्योंकि उस दिन जन्माष्टमी थी और मैं उस के साथ मंदिर घूमना चाहता था.’’

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‘‘मीशा कितनी देर बाद आई?’’ एएसआई सत्येंद्र ने पूछा.

‘‘नहीं आई सर, मैं करीब एक घंटे तक वहां खड़ा रहा लेकिन मीशा नहीं आई. फिर मैं ने सोचा चलो घर तो पास में ही है, वहीं जा कर मीशा से मिल लेता हूं.’’

एक क्षण के लिए सांस लेने के लिए रुक कर जस्सी ने बताना शुरू किया, ‘‘सर, इसीलिए मैं ने मीशा का फोन लगा कर पूछना चाहा कि अगर वह नहीं आ सकती तो मैं खुद उस से मिलने के लिए घर आ जाता हूं. लेकिन सर उस का फोन भी स्विच्ड औफ मिला.

‘‘मैं ने कई बार फोन लगाया, लेकिन हर बार स्विच्ड औफ मिला तो हार कर मैं ने मीशा की मम्मी को फोन कर लिया और उन से पूछा कि मीशा कहां है. लेकिन सर, मुझे यह जान कर हैरानी हुई कि मीशा घर पर नहीं थी. पता चला कि वह मेरा फोन आने के कुछ देर बाद ही घर में यह बता कर कहीं चली गई थी कि वह जस्सी से यानी मुझ से मिलने जा रही है.’’

जस्सी ने पूरी कहानी साफ कर दी. और फिर एएसआई की तरफ सवालिया नजरों से देखते हुए कहने लगा, ‘‘सर, आप ही बताइए कि जब मीशा मेरी इतनी अच्छी दोस्त थी, हमारे बीच किसी तरह का कोई विवाद भी नहीं था. 2-4 दिन से नहीं करीब डेढ़दो साल से हम एकदूसरे के दोस्त हैं. मैं उस के घर भी आताजाता था. उस का मेरा कोई पैसे का लेनदेन भी नहीं था. कारोबारी दुश्मनी भी नहीं थी. तो फिर भला मैं उसे लापता या किडनैप क्यों करूंगा. और उस का किडनैप कर के क्या करूंगा. मैं तो खुद ही उस के लापता होने के बाद से बहुत परेशान हूं.’’ कहते हुए जस्सी की आंखें भर आईं.

पूछताछ करते हुए एएसआई सत्येंद्र लगातार जस्सी की आंखों को पढ़ रहे थे. उन्हें कहीं भी उस की बातों में झूठ नजर नहीं आया.

एएसआई सत्येंद्र ने जस्सी से मीशा के बारे में और भी कई तरह की जानकारी ली. मसलन दोनों की दोस्ती कब हुई. दोनों के बीच में किस तरह के रिश्ते थे.

जस्सी ने एएसआई सत्येंद्र को अपने और मीशा के बारे में सब कुछ बता दिया. कुल मिला कर एएसआई सत्येंद्र जस्सी से पूछताछ में संतुष्ट नजर आए.

एएसआई सत्येंद्र ने जस्सी को थानाप्रभारी अनंत गुंजन तथा अतिरिक्त थानाप्रभारी दिनेश कुमार तेजवान के सामने भी पेश किया. उन्होंने भी जस्सी से पूछताछ की, जिस में उस ने वही जवाब दिया जो उस ने एएसआई सत्येंद्र को दिया था.

इस दौरान एएसआई सत्येंद्र ने मीशा के फोन की काल डिटेल्स निकाल कर उस की जांचपड़ताल शुरू कर दी थी. जिस में एक बात की पुष्टि तो हो गई कि शाम के वक्त जस्सी ने मीशा को फोन किया था. फिर उस के आधा घंटे बाद मीशा का फोन बंद हो गया था.

अब तक की जांच में जस्सी के ऊपर शक करने की कोई वजह सामने नहीं आ रही थी.॒ लेकिन मीशा को फोन करने वाला आखिरी शख्स जस्सी ही था, इसलिए उसे आसानी से शक के दायरे से बाहर नहीं किया जा सकता था.

एएसआई सत्येंद्र ने मीशा के फोन की काल डिटेल्स में उस के फोन की आखिरी लोकेशन देखनी शुरू की तो पता चला कि फोन की लोकेशन करीब आधे घंटे बाद फरीदाबाद के सराय अमीन इलाके में थी. इस के बाद मीशा के फोन की लोकेशन बंद हो गई थी.

मतलब साफ था कि फरीदाबाद के सराय अमीन में मीशा के फोन को या तो तोड़ दिया गया या कहीं फेंक दिया गया.

मीशा के फोन की काल डिटेल्स के बाद एएसआई सत्येंद्र ने जस्सी के फोन की काल डिटेल्स की पड़ताल शुरू तो वह यह देख कर दंग रह गए कि जस्सी के फोन की लोकेशन भी वहांवहां थी, जहां मीशा के फोन की लोकेशन थी.

जिस वक्त मीशा के फोन की आखिरी लोकेशन फरीदाबाद के सराय अमीन में थी, ठीक उसी वक्त जस्सी के फोन की लोकेशन भी वहीं थी.

एएसआई सत्येंद्र को न जाने क्यों अचानक मीशा के साथ अनर्थ की आशंका होने लगी. वह समझ गए कि जस्सी पुलिस के साथ खेल खेल रहा है.

मीशा के परिवार वालों ने उस के खिलाफ जो शक जाहिर किया था, वह एकदम सही था. एएसआई सत्येंद्र ने अब तक हुई विवेचना के बारे में तत्काल थानाप्रभारी अनंत गुंजन को बताया तो वह भी समझ गए कि मीशा के परिजनों ने जस्सी पर अपहरण का जो शक जाहिर किया था एकदम सही था.

किडनैपिंग की पुष्टि हो चुकी थी. लिहाजा अनंत गुंजन ने मीशा के भाई तरुण मन्ना को थाने बुलवा लिया और उस की शिकायत के आधार पर उसी दिन यानी 5 सितंबर को सरिता विहार थाने में अपहरण 365 आईपीसी का मामला दर्ज कर लिया.

अब इस मामले की जांच एडीशनल एसएचओ दिनेश कुमार तेजवान को सौंपी गई. अपराध की गंभीरता को समझते हुए अनंत गुंजन ने दक्षिणपूर्वी जिले के डीसीपी आर.पी. मीणा और सरिता विहार के एसीपी बिजेंद्र सिंह को पूरे मामले से अवगत करा दिया.

थानाप्रभारी अनंत गुंजन ने जांच अधिकारी इंसपेक्टर तेजवान के सहयोग के लिए एएसआई सत्येंद्र के साथ हैडकांस्टेबल मनोज और अनिल को भी टीम में शामिल कर लिया.

जांच अधिकारी इंसपेक्टर तेजवान ने एएसआई सत्येंद्र से पूरे मामले की एकएक जानकारी ली और एक टीम को जस्सी को पकड़ने के लिए फरीदाबाद की शिव कालोनी रवाना किया, जहां वह रहता था.

लेकिन जस्सी को शायद तब तक इस बात का अहसास हो चुका था कि पुलिस उसे कभी भी गिरफ्तार कर सकती है. इसलिए जब पुलिस वहां पहुंची तो वह नहीं मिला. इंसपेक्टर तेजवान ने एएसआई सत्येंद्र को जस्सी की गिरफ्तारी के काम पर लगा दिया और खुद यह पता लगाने में जुट गए कि मीशा आखिर कहां है. वैसे अब तक पुलिस को यकीन हो चुका था कि हो न हो जस्सी ने शायद उस की हत्या कर दी है.

चूंकि मीशा के फोन की लास्ट लोकेशन फरीदाबाद के सराय अमीन इलाके की थी, इसलिए उन्होंने वहीं पर अपना सारा ध्यान केंद्रित कर दिया.

दिल्ली से लगते फरीदाबाद के सभी थानों में इस बात की जांचपड़ताल शुरू कर दी कि कहीं 30 तारीख से अब तक किसी लड़की का शव बरामद तो नहीं हुआ है. एनसीआर के सभी शहरों को जोड़ कर दिल्ली पुलिस के कुछ वाट्सऐप ग्रुप हैं, जिस में पुलिस अपराधियों से संबंधित किसी भी तरह की सूचना लेनेदेने का काम करती है.

इंसपेक्टर तेजवान ने इसी वाट्सऐप ग्रुप पर अरुण उर्फ मीशा की गुमशुदगी की जानकारी डाल कर फरीदाबाद पुलिस से जब जानकारी एकत्र करनी शुरू की तो पता चला की फरीदाबाद के सेक्टर-17 थाना क्षेत्र में पुलिस को एक नाले से 4 सितंबर, 2021 की सुबह एक लाश मिली थी.

वह लाश पूरी तरह सड़ चुकी थी. हालांकि वह लाश तो किसी पुरुष की थी, लेकिन उस के शरीर पर जो कपड़े थे वह महिलाओं वाले थे. तेजवान समझ गए कि हो न हो, ये लाश मीशा की ही होगी. उन्होंने मीशा के परिजनों को बुलवा लिया और उन्हें ले कर फरीदाबाद के सेक्टर-17 थाने पहुंच गए.

वहां सेक्टर-17 पुलिस ने उन्हें बताया कि 4 सितंबर को नाले से जो अज्ञात लाश मिली थी, उस को अभी अस्पताल में प्रिजर्व कर के रखा गया है. सेक्टर-17 थाना पुलिस के साथ इंसपेक्टर तेजवान और मीशा के परिजन जब सिटी हौस्पिटल पहुंचे तो वहां पोस्टमार्टम के बाद मुर्दाघर में जो लाश रखी थी, वह इतनी सड़गल चुकी थी कि उस की पहचान करना मुश्किल था.

लेकिन लाश के पहने हुए कपड़े देख कर मीशा की मां ने पहचान कर ली कि वह लाश मीशा की ही थी. इस के बाद पुलिस ने लाश की शिनाख्त की औपचारिकता पूरी कर ली.

फरीदाबाद पुलिस ने मीशा का शव उस के परिजनों को सौंप दिया, जिस का उन्होंने अंतिम संस्कार कर दिया गया.

चूंकि मीशा की लाश बरामद हो चुकी थी, अत: अब ये मामला हत्या का बन चुका था. इसलिए उन्होंने मुकदमे में हत्या की धारा 302 जोड़ दी.

अब पुलिस सरगरमी से जस्सी की तलाश कर रही थी, क्योंकि उसी के बाद साफ हो सकता था कि मीशा की हत्या क्यों और कैसे की गई.

पुलिस टीम लगातार जस्सी के फोन को सर्विलांस पर लगा कर यह पता लगा रही थी कि उस की लोकेशन कहां है.

आखिर पुलिस को सफलता मिल ही गई. 12 सितंबर को पुलिस टीम ने जस्सी को फरीदाबाद के पलवल शहर से गिरफ्तार कर लिया, वहां वह अपने एक रिश्तेदार के घर छिपा था.

पुलिस ने जब जस्सी से पूछताछ की तो मीशा हत्याकांड की चौंकाने वाली कहानी सामने आई.

जस्सी (24) का पूरा नाम सुमित पाठक है. बिहार के रहने वाले जस्सी के परिवार में मातापिता और एक बड़ा भाई और एक छोटी बहन है. पिता और भाई दोनों प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते हैं.

साधारण परिवार का जस्सी शुरू से एक खास तरह की आदत का शिकार था. उसे बचपन से ही लड़कियों के बजाय लड़कों में दिलचस्पी थी. उस का सैक्स करने का तो मन करता, लेकिन लड़कियों के साथ नहीं बल्कि लड़कों के साथ. यही कारण था कि कई ट्रांसजेंडर से उस की दोस्ती हो गई थी. 12वीं तक पढ़ाई के बाद जस्सी ने फैशन डिजाइनिंग में डिप्लोमा कर के फरीदाबाद के एक फैशन से जुड़े एनजीओ में नौकरी कर ली.

एनजीओ में नौकरी के कारण जस्सी को अकसर कई फैशन शो और प्रोग्राम में एनजीओ की तरफ से जाना पड़ता था. करीब 2 साल पहले जस्सी की मुलाकात अरुण से हुई. उम्र में अरुण उस से 2 साल बड़ा था. पहली बार हुई मुलाकात में ही जस्सी को पता चल गया कि अरुण जन्म से लड़का जरूर है, लेकिन हारमोंस से वह पूरी तरह लड़की है.

लड़कियों जैसे हावभाव, चलनेफिरने और बात करने में लड़कियों की तरह अदाएं दिखाना. पहनावा और मेकअप भी अरुण ऐसा करता कि देखने वाला पहली नजर में लड़की समझने की भूल कर लेता.

अरुण के परिवार में मातापिता और एक छोटे भाई तरुण के अलावा कोई नहीं था. पिता आली गांव में ही पान का खोखा लगाते थे, जबकि मां और भाई बदरपुर स्थित प्राइवेट कंपनियों में नौकरी करते थे.

अरुण के बचपन से ही लड़कियों की तरह व्यवहार करने और बदलते हारमोन को ले कर परिवार वाले भी परेशान थे. उन्होंने कई जगह उस का इलाज भी कराया, लेकिन जवान होते होते डाक्टरों ने जवाब दे दिया कि उस के हारमोन पूरी तरह बदल चुके हैं.

अरुण ने बड़े होने के बाद अपना नाम मीशा रख लिया और वह फरीदाबाद की ‘पहल’ एनजीओ में नौकरी करने लगा. मीशा और जस्सी की मुलाकात हुई तो जल्दी ही दोनों की दोस्ती घनिष्ठता में बदल गई.

क्योंकि जस्सी को तो लड़कों में ही अधिक रुचि थी. वहीं मीशा को भी किसी ऐसे दोस्त की तलाश थी, जिस को लड़की में नहीं बल्कि लड़कों या लड़की के भेष में छिपी आधीअधूरी लड़की में रुचि हो.

दोनों में जल्द ही जिस्मानी संबध भी बन गए. मीशा की ख्वाहिश थी कि वह अपना सैक्स परिवर्तन करवा कर पूरी तरह लड़की बन जाए. एक दिन उस ने अपनी यह ख्वाहिश अपने पार्टनर जस्सी से बताई तो जस्सी ने मेहनत से जो पैसे जोड़े थे, उस में से 50 हजार रुपए खर्च कर के अरुण के ऊपरी भाग यानी ब्रेस्ट का औपरेशन करवा दिया.

औपरेशन के बाद सीने पर लड़कियों जैसे उभार निकलते ही मीशा की खूबसूरती में चारचांद लग गए. इस के बाद तो अरुण ने खुद को सार्वजनिक रूप से मीशा के रूप में परिचित कराना शुरू कर दिया. मीशा और और जस्सी के सबंध इस के बाद और भी प्रणाढ़ हो गए. दोनों साथ घूमते, साथ फिल्में देखते. इतना ही नहीं, जस्सी का मीशा के घर पर भी बेरोकटोक आनाजाना शुरू हो गया था. मीशा के परिवार वालों ने भी इसे नियति मान लिया था. मीशा अब अपने लिंग का औपरेशन करवा कर पूरी तरह लड़की बनना चाहती थी.

हालांकि औपरेशन के बाद लड़कियों जैसे यौनांग तो एकदम तैयार नहीं हो पाते, लेकिन लिंग का औपरेशन करवा कर उस से अपने पुरुष होने की सजा से मुक्ति मिल जाती.

मीशा जस्सी से जिद करने लगी कि वह अपने निचले हिस्से का भी औपरेशन करवा कर पूरी तरह एक लड़की बनना चाहती है. वैसे जस्सी को उस के औपरेशन में कोई दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन मीशा की जिद और खुशी के लिए जस्सी ने हां कर दी.

जस्सी ने उस से कहा कि अगले कुछ महीनों में जब उस के पास पैसे इकट्ठा हो जाएंगे तो वह औपरेशन करवा देगा. क्योंकि इस में करीब एक लाख रुपए का खर्च डाक्टरों ने बताया था.

जस्सी मीशा के ऊपर दिल खोल कर पैसा खर्च करता था. जस्सी के परिवार को भी यह बात पता थी कि वह एक ऐसी लड़की से प्यार करता है जो न तो पूरी तरह लड़का है और न ही लड़की.

परिवार वालों ने ऐसा रिश्ता जोड़ने के लिए उसे मना भी किया, लेकिन उस ने परिवार की एक नहीं सुनी.

इसी दौरान पिछले कुछ महीनों से धीरेधीरे मीशा के व्यवहार में परिवर्तन आने लगा. वह क्लबों में जाने लगी. ट्रांसजेंडर कम्युनिटी के बहुत सारे लोगों से उस की दोस्ती हो गई. वह उन के साथ नाइट पार्टियों में जाती. कुछ लोगों के साथ उस के घनिष्ठ संबध भी बन गए.

जब जस्सी को इस बात का अहसास होने लगा और उसे भनक लगी तो उस ने मीशा को रोकनाटोकना चाहा. लेकिन मीशा जिंदगी के जिस रास्ते पर चल पड़ी थी, वहां उस की मंजिल जस्सी नहीं था.

लिहाजा उस ने जस्सी से साफ कह दिया कि वह उसे अपनी प्रौपर्टी न समझे. वह किस के साथ घूमेगी, किस के साथ जाएगी, ये वह खुद तय करेगी.

जस्सी ने भी उस से एकदो बार कहा कि उस ने अपनी मेहनत की कमाई उस के औपरेशन और खर्चों पर इसलिए लुटाई थी ताकि वह उस की बन कर रहे. जस्सी ने उस से एक दिन गुस्से में यह तक कह दिया कि अगर वह उस की नहीं रहेगी तो किसी की नहीं रहेगी. लेकिन मीशा ने उस की बात हवा में उड़ा दी.

लेकिन यह बात मीशा ने अपनी मां को जरूर बता दी थी. जब जस्सी ने देखा कि मीशा पूरी तरह काबू से बाहर हो चुकी है. ट्रांसजेंडर कम्युनिटी के लोगों से मिलना देर रात तक उन के साथ पार्टी करना और मस्ती करना उस की आदत बन चुकी है तो उस ने तय कर लिया कि वह उस की हत्या कर देगा. इस के लिए उस ने पूरी साजिश रची. 30 अगस्त, 2021 को उस ने 4 बजे मीशा को फोन कर के उसे 10 मिनट के लिए घर के पास ही मिलने के लिए बुलाया.

मीशा जब उस से मिलने पहुंची तो वह उसे तुरंत मोटरसाइकिल पर बैठा कर यह कह कर अपने साथ ले गया कि अभी आधे घंटे में आते हैं. तुम्हारी किसी दोस्त से मुलाकात करानी है, जो तुम्हारे जैसा ही है. इसी उत्सुकता में मीशा विरोध न कर सकी.

वह 15 मिनट में ही मीशा को मोटरसाइकिल से दिल्ली से सटे फरीदाबाद के सराय अमीन इलाके में नाले के किनारे एक सुनसान जगह ले गया. वहां उस ने मीशा की गोली मार कर हत्या कर दी. मीशा का मोबाइल उस ने अपने हाथ में ले कर पहले ही बंद कर दिया था. हत्या करने के बाद उस ने शव को नाले में फेंक दिया. इस के बाद उस ने मीशा के मोबाइल का सिम निकाल कर तोड़ दिया और फोन तोड़ कर नाले में फेंक दिया. मीशा का शव नाले में बहते हुए 5 किलोमीटर दूर सेक्टर-17 थाने की सीमा में पहुंच गया, जिसे 5 सितंबर को वहां की पुलिस ने बरामद कर लिया.

मीशा की हत्या करने के बाद जस्सी फिर से मोटरसाइकिल से आली गांव पहुंचा, जहां से उस ने मीशा की मां को फोन कर के मीशा से बात कराने के लिए कहा. फिर वह घर चला गया. पुलिस ने पूछताछ के बाद जस्सी की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त तमंचा और मोटरसाइकिल बरामद कर ली. पुलिस ने मीशा का मोबाइल बरामद करने की कोशिश की लेकिन वह नहीं मिला.

पूछताछ के बाद पुलिस ने जस्सी को 13 सितंबर, 2021 को अदालत में

पेश कर दिया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस की जांच, पीडि़त परिवार के कथन और आरोपी के बयान पर आधारित

मोटी लड़कियां: खूबसूरती में अव्वल

Writer-  किरण बाला

माना कि हर लड़की छरहरा बदन चाहती है, लेकिन कई बार न चाहते हुए भी शरीर मोटा या भारी हो जाता है. तमाम कोशिशों के बावजूद मोटापा घटने का नाम नहीं लेता. ऐसे में आप क्या करें? क्या अपने को असुंदर या भद्दी मान कर अपने ही शरीर से नफरत करने लगें या शर्मिंदगी की वजह से घर से बाहर निकलना छोड़ दें? क्या इस का संताप पाल कर बैठ जाएं? ऐसा कुछ भी न करें. आप जैसी भी हैं, अच्छी हैं और उसी रूप में अपने को स्वीकारें.

मोटी युवतियां भी कम आकर्षक नहीं होतीं. भरा हुआ शरीर भी सुंदर लगता है. फिल्मी दुनिया में भी ऐसी कई अभिनेत्रियां हुई हैं जो मोटी होने के बावजूद लोकप्रिय रहीं. टीवी के रिऐलिटी शो में भी अनेक मोटी युवतियां और महिलाएं हैं जो अपनी विशिष्ट अदाओं से दर्शकों का मनोरंजन करती हैं या उन्हें लुभाती हैं.

शरीर से आप भले ही भारी हों लेकिन स्वभाव से हंसमुख हों तो मोटापे के बावजूद आप खूबसूरत लगेंगी. आप की मधुर मुसकान और मीठी वाणी सुंदरता को बढ़ाती ही है और व्यक्तित्व को आकर्षक भी बनाती है. आप अपनी व्यहारकुशलता से लोगों को अपनी तरफ खींच सकती हैं.

ऐसी बात नहीं है कि मोटी लड़कियों को प्यार करने वाले लड़के नहीं मिलते. प्यार किसी के मोटेपन या दुबलेपन को देख कर नहीं किया जाता. प्यार दिल से होता है. उन लड़कों की भी कमी नहीं है जिन की प्रेमिकाएं उन से कहीं अधिक भारी हैं. ऐसे शादीशुदा जोड़े भी कम नहीं हैं. मोटी लड़कियों की विवाहित जिंदगी भी सामान्य और सुखद होती है, इसलिए उन्हें किसी तरह की हीनभावना नहीं पालनी चाहिए.

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सुंदरता की कोई परिभाषा नहीं होती. जिस को जो भा जाए वही सुंदर है. यानी हर व्यक्ति के लिए सुंदरता की परिभाषा भिन्न होती है. कोई किसी के चेहरे से प्रभावित होता है तो कोई उस की कदकाठी से. इसी प्रकार कुछ वैयक्तिक गुणों को अहमियत देते हैं तो कुछ उस के रंगरूप को. कुछ की नजर में मोटी लड़कियां अधिक खूबसूरत होती हैं तो कुछ छरहरी लड़कियां पसंद करते हैं. इसलिए आप को चाहने वालों की कमी नहीं है.

यदि आप का कद 5 फुट से कम है तो थोड़ा सा भी बढ़ता वजन आप को मोटी दिखा सकता है. यदि आप लंबे कद की हैं, तो उतना ही वजन बढ़ने पर भी आप मोटी नजर नहीं आएंगी. लेकिन कद को बढ़ाना अपने हाथ में नहीं है, इसलिए छोटे कद की लड़कियों को अपने वजन के प्रति सतर्क रहना चाहिए.

मोटापा आनुवंशिक भी हो सकता है. यदि ऐसा है तो इस में आप का कोई दोष नहीं. आप लाख कोशिश कर लें, मोटापा कम नहीं होगा. इसी प्रकार, हार्मोन की गड़बड़ी की वजह से भी मोटापा बढ़ सकता है.

कुछ युवतियों में डायबिटीज या थायराइड की वजह से भी मोटापा बढ़ जाता है. इस के अलावा भी कई कारण होते हैं मोटापे के. इन में सब से आम कारण है खानपान, जैसे खाने में अधिक तेल, घी, मक्खन आदि का सेवन करना, फास्ट फूड का शौकीन होना आदि.

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यदि आप आरामतलबी जिंदगी जीना पसंद करती हैं, शारीरिक गतिविधियां और व्यायाम से दूर रहती हैं तो भी आप के शरीर पर चरबी चढ़ती जाएगी.

हो सकता है कि कुछ लोग मोटापे की वजह से आप का मजाक उड़ाते हों लेकिन इस पर गुस्सा करने या नाराज होने के बजाय हंस कर टाल देने में समझदारी है.

मोटी युवतियों को अपने पहनावे पर विशेष ध्यान देना चाहिए. उन के स्तनों का आकार काफी बड़ा या भारी होता है, सो उन्हें अच्छी कंपनी की ब्रा पहननी चाहिए ताकि वे कसे हुए रहें. अन्यथा चलतेफिरते, दौड़भाग करते समय वे भद्दे लगते हैं. वैसे, ऐसी दवा नहीं है जिस से इन के आकार को घटाया जा सके.

आप को अपनी चालढाल पर भी ध्यान देना चाहिए. कई बार इस वजह से भी आप हंसी या उपहास का पात्र बनती हैं. यदि आप के नितंब काफी फैले हुए या बाहर की ओर निकले हुए हैं तो ऐसा पहनावा रखें जिस से उन के उभार नजर न आएं. यही बात पेट और कमर के बारे में है. आप अपने पहनावे से इन्हें छिपा सकती हैं. यदि आप मोटी हैं तो आप को अपना सालाना मैडिकल चैकअप यानी स्वास्थ्य परीक्षण कराना चाहिए तथा हर माह अपना वजन चैक करना चाहिए. आप को अपने डाक्टर और डाइटीशियन के निर्देशों का पालन करना चाहिए.

आप का मोटापा और न बढ़े, इस के लिए नियमित रूप से व्यायाम आदि करना चाहिए. चाहे तो इस के लिए जिम या व्यायामशाला जौइन कर सकती हैं.

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मोटापा घटाने के लिए डाइटिंग करने की नहीं, सही डाइट का चुनाव करने की जरूरत है. डाइटिंग करने से शरीर कुपोषण का शिकार हो जाता है. शरीर सुस्त और बेजान सा लगने लगता है. डाइटिंग का असर चेहरे पर भी देखा जा सकता है. चेहरे का नूर समाप्त हो जाता है तथा वह बुझाबुझा सा दिखाई देने लगता है. इसलिए संतुलित आहार लें, इस से आप आकर्षक तो दिखेंगी ही, चेहरे का तेज भी बना रहेगा.

उन लड़कियों की भी कमी नहीं है जो कि शादी के पूर्व सामान्य थीं, लेकिन शादी के बाद, खासतौर से एकदो बच्चे होने और औपरेशन करा लेने के बाद, वे मोटी हो जाती हैं. डिलीवरी के बाद उन का शरीर सामान्य अवस्था में नहीं आ पाता और पेट, कमर या नितंब बढ़े हुए ही रह जाते हैं. इसलिए इस बारे में सोचना छोड़ दें. पति के लिए पहले भी आप खूबसूरत थीं और आज भी हैं. उस के प्यार में कमी नहीं आएगी.

मोटापे को एक अभिशाप न मानें. अन्यथा जी नहीं पाएंगी. जो है, सो है. उसे वरदान या अभिशाप बनाना आप के हाथ में है. जैसा सोचेंगी, वैसा महसूस करेंगी. जिंदादिली से जिएं जिंदगी.

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बगावत: भाग 2- क्या प्रेम के लिए तरस रही उषा को प्यार मिल पाया?

यौवनावस्था आतेआते वह भली प्रकार समझ चुकी थी कि उस के सभी भाई केवल स्नेह का दिखावा करते हैं. सच्चे दिल से कोई स्नेह नहीं करता, बल्कि वे ईर्ष्या भी करते हैं. हां, अवसर पड़ने पर गिरगिट की तरह रंग बदलना भी वे खूब जानते हैं.

‘‘उषा, मेरी बहन, जरा मेरी पैंट तो इस्तिरी कर दे. मुझे बाहर जाना है. मैं दूसरे काम में व्यस्त हूं,’’ खुशामद करता छोटा भाई कहता.

‘‘उषा, तेरी लिखाई बड़ी सुंदर है. कृपया मेरे ये थोड़े से प्रश्नोत्तर लिख दे न. सिर्फ उस कापी में से देख कर इस में लिखने हैं,’’ कापीकलम थमाते हुए बड़ा कहता.

भाइयों की मीठीमीठी बातों से वह कुछ देर के लिए उन के व्यंग्य, उलाहने, डांट भूल जाती और झटपट उन के कार्य कर देती. अगर कभी नानुकर करती तो मां कहतीं, ‘‘बेटी, ये छोटेमोटे झगड़े तो सभी भाईबहनों में होते हैं. तू उन की अकेली बहन है. इसलिए तुझे चिढ़ाने में उन्हें आनंद आता है.’’

भाइयों में से किसी को भी तकनीकी शिक्षा में दाखिला नहीं मिला था. बड़ा बी.काम. कर के दुकान पर जाने लगा और छोटा बी.ए. में प्रवेश ले कर समय काटने के साथसाथ पढ़ाई की खानापूर्ति करने लगा. इस बीच उषा ने हायर सेकंडरी प्रथम श्रेणी में विशेष योग्यता सहित उत्तीर्ण कर ली. कालिज में उस ने विज्ञान विषय ही लिया क्योंकि उस की महत्त्वाकांक्षा डाक्टर बनने की थी.

‘‘मां, इसे डाक्टर बना कर हमें क्या फायदा होगा? यह तो अपने घर चली जाएगी. बेकार इस की पढ़ाई पर इतना खर्च क्यों करें,’’ बड़े भाई ने अपनी राय दी.

तड़प उठी थी उषा, जैसे किसी बिच्छू ने डंक मार दिया हो. भाई अपनी असफलता की खीज अपनी छोटी बहन पर उतार रहा था. ‘आखिर उसे क्या अधिकार है उस की जिंदगी के फैसलों में हस्तक्षेप करने का? अभी तो मांबाप सहीसलामत हैं तो ये इतना रोब जमा रहे हैं. उन के न होने पर तो…’ सोच कर के ही वह सिहर उठी.

पिताजी ने अकसर उषा का ही पक्ष लिया था. इस बार भी वही हुआ. अगले वर्ष उसे मेडिकल कालिज में दाखिला मिल गया.

डाक्टरी की पढ़ाई कोई मजाक नहीं. दिनरात किताबों में सिर खपाना पड़ता. एक आशंका भी मन में आ बैठी थी कि अगर कहीं पहले साल में अच्छे अंक नहीं आ सके तो भाइयों को उसे चिढ़ाने, अपनी कुढ़न निकालने और अपनी कुंठित मनोवृत्ति दर्शाने का एक और अवसर मिल जाएगा. वे तो इसी फिराक में रहते थे कि कब उस से थोड़ी सी चूक हो और उन्हें उसे डांटने- फटकारने, रोब जमाने का अवसर प्राप्त हो. अत: अधिकांश वक्त वह अपनी पढ़ाई में ही गुजार देती.

कालिज के प्रांगण के बाहर अमरूद, बेर तथा भुट्टे लिए ठेले वाले खड़े रहते थे. वे जानते थे कि कच्चेपक्के बेर, अमरूद तथा ताजे भुट्टों के लोभ का संवरण करना कालिज के विद्यार्थियों के लिए असंभव नहीं तो कम से कम मुश्किल तो है ही. उन का खयाल बेबुनियाद नहीं था क्योंकि शाम तक लगभग सभी ठेले खाली हो जाते थे.

अपनी सहेलियों के संग भुट्टों का आनंद लेती उषा उस दिन प्रांगण के बाहर गपशप में मशगूल थी. पीरियड खाली था. अत: हंसीमजाक के साथसाथ चहल- कदमी जारी थी. छोटा भाई उसी तरफ से कहीं जा रहा था. पूरा नजारा उस ने देखा. उषा के घर लौटते ही उस पर बरस पड़ा, ‘‘तुम कालिज पढ़ने जाती हो या मटरगश्ती करने?’’

उषा कुछ समझी नहीं. विस्मय से उस की ओर देखते हुए बोली, ‘‘क्यों, क्या हुआ? कैसी मटरगश्ती की मैं ने?’’

तब तक मां भी वहां आ चुकी थीं, ‘‘मां, तुम्हारी लाड़ली तो सहेलियों के साथ कालिज में भी पिकनिक मनाती है. मैं ने आज स्वयं देखा है इन सब को सड़कों पर मटरगश्ती करते हुए.’’

‘‘मां, इन से कहो, चुप हो जाएं वरना…’’ क्रोध से चीख पड़ी उषा, ‘‘हर समय मुझ पर झूठी तोहमत लगाते रहते हैं. शर्म नहीं आती इन को…पता नहीं क्यों मुझ से इतनी खार खाते हैं…’’ कहतेकहते उषा रो पड़ी.

‘‘चुप करो. क्या तमाशा बना रखा है. पता नहीं कब तुम लोगों को समझ आएगी? इतने बड़े हो गए हो पर लड़ते बच्चों की तरह हो. और तू भी तो उषा, छोटीछोटी बातों पर रोने लगती है,’’ मां खीज रही थीं.

तभी पिताजी ने घर में प्रवेश किया. भाई झट से अंदर खिसक गया. उषा की रोनी सूरत और पत्नी की क्रोधित मुखमुद्रा देख उन्हें आभास हो गया कि भाईबहन में खींचातानी हुई है. अकसर ऐसे मौकों पर उषा रो देती थी. फिर दोचार दिन उस भाई से कटीकटी रहती, बोलचाल बंद रहती. फिर धीरेधीरे सब सामान्य दिखने लगता, लेकिन अंदर ही अंदर उसे अपने तीनों भाइयों से स्नेह होने के बावजूद चिढ़ थी. उन्होंने उसे स्नेह के स्थान पर सदा व्यंग्य, रोब, डांटडपट और जलीकटी बातें ही सुनाई थीं. शायद पिताजी उस का पक्ष ले कर बेटों को नालायक की पदवी भी दे चुके थे. इस के प्रतिक्रियास्वरूप वे उषा को ही आड़े हाथों लेते थे.

‘‘क्या हुआ हमारी बेटी को? जरूर किसी नालायक से झगड़ा हुआ है,’’ पिताजी ने लाड़ दिखाना चाहा.

‘‘कुछ नहीं. आप बीच में मत बोलिए. मैं जो हूं देखने के लिए. बच्चों के झगड़ों में आप क्यों दिलचस्पी लेते हैं?’’ मां बात को बीच में ही खत्म करते हुए बोलीं.

असहाय सी उषा मां का मुंह देखती रह गई. मां भी तो आखिर बेटों का ही पक्ष लेंगी न. जब कभी भी पिताजी ने उस का पक्ष लिया, बेटों को डांटाफटकारा तो मां को अच्छा नहीं लगा. उस समय तो वह कुछ नहीं कहतीं लेकिन मन के भाव तो चेहरे पर आ ही जाते हैं. बाद में मौका मिलने पर टोकतीं, ‘‘क्यों अपने बड़े भाइयों से उलझती रहती है?’’

उषा पूछती, ‘‘मां, मैं तो सदा उन का आदर करती हूं, उन के भले की कामना करती हूं लेकिन वे ही हमेशा मेरे पीछे पड़े रहते हैं. अगर मैं पढ़ाई में अच्छी हूं तो उन्हें ईर्ष्या क्यों होती है?’’

मां कहतीं, ‘‘चुप कर, ज्यादा नहीं बोलते बड़ों के सामने.’’

दोनों बड़े भाइयों का?स्नातक होने के बाद विवाह कर दिया गया. दोनों बहुओं ने भी घर के हालात देखे, समझे और अपना आधिपत्य जमा लिया. उषा तो भाइयों की ओर से पहले ही उपेक्षित थी. भाभियों के आने के बाद उन की ओर से भी वार होने लगे. इस बीच हृदय के जबरदस्त आघात से पिताजी चल बसे. घर का पूरा नियंत्रण बहुओं के हाथ में आ गया. मां तो पहले से ही बेटों की हमदर्द थीं, अब तो उन की गुलामी तक करने को तैयार थीं. पूरी तरह से बहूबेटों के अधीन हो गईं.

उषा का डाक्टरी का अंतिम वर्ष था. घर के उबाऊ व तनावग्रस्त माहौल से जितनी देर वह दूर रहती, उसे राहत का एहसास होता. अत: अधिक से अधिक वक्त वह पुस्तकालय में, सहेली के घर या कैंटीन में गुजार देती. सच्चे प्रेम, विश्वास, उचित मार्गदर्शन पर ही तो जिंदगी की नींव टिकी है, चाहे वह मांबाप, भाईबहन, पतिपत्नी किसी से भी प्राप्त हो. लेकिन उषा को बीते जीवन में किसी से कुछ भी प्राप्त नहीं हो रहा था. प्रेम, स्नेह के लिए वह तरस उठती थी. पिताजी से जो स्नेह, प्यार मिल रहा था वह भी अब छिन चुका था.

बगावत: भाग 3- क्या प्रेम के लिए तरस रही उषा को प्यार मिल पाया?

मेडिकल कालिज की कैंटीन शहर भर में दहीबड़े के लिए प्रसिद्ध थी. अचानक जरूरत पड़ने पर या मेहमानों के लिए विशेषतौर पर लोग वहां से दहीबड़े खरीदने आते थे. बाहर के लोगों के लिए भी कैंटीन में आना मना नहीं था. स्वयंसेवा की व्यवस्था थी. लोगों को स्वयं अपना नाश्ता, चाय, कौफी वगैरह अंदर के काउंटर से उठा कर लाना होता था. कालिज के साथ ही सरकारी अस्पताल होता था. रोगियों के संबंधी भी अकसर कालिज की कैंटीन से चायनाश्ता खरीद कर ले जाते थे.

कैंटीन में अकेली बैठी उषा चाय पी रही थी. सामने की सीट खाली थी. अचानक एक नौजवान चाय का कप ले कर वहां आया, ‘‘मैं यहां बैठ सकता हूं?’’ उस की बातों व व्यवहार से शालीनता टपक रही थी.

‘‘हां, हां, क्यों नहीं,’’ कह कर उषा ने अपनी कुरसी थोड़ी पीछे खिसका ली.

‘‘मेरी मां अस्पताल में दाखिल हैं,’’ बातचीत शुरू करने के लहजे में वह नौजवान बोला.

‘‘अच्छा, क्या हुआ उन को? किस वार्ड में हैं?’’ सहज ही पूछ बैठी थी उषा.

‘‘5 नंबर में हैं. गुरदे में पथरी हो गई थी. आपरेशन हुआ है,’’ धीरे से युवक बोला.

शाम को घर लौटने से पहले उषा अपनी सहेली के साथ वार्ड नंबर 5 में गई तो वहां वही युवक अपनी मां के सिरहाने बैठा हुआ था. उषा को देखते ही उठ खड़ा हुआ, ‘‘आइए, डाक्टर साहब.’’

‘‘अभी तो मुझे डाक्टर बनने में 6 महीने बाकी हैं,’’ कहते हुए उषा के चेहरे पर मुसकान तैर गई.

उस युवक की मां ने पूछा, ‘‘शैलेंद्र, कौन है यह?’’

‘‘मेरा नाम उषा है. आज कैंटीन में इन से मुलाकात हुई तो आप की तबीयत पूछने आ गई. कैसी हैं आप?’’ शैलेंद्र को असमंजस में पड़ा देख कर उषा ने ही जवाब दे दिया.

‘‘अच्छी हूं, बेटी. तू तो डाक्टर है, सब जानती होगी. यह देखना जरा,’’ कहते हुए एक्सरे व अन्य रिपोर्टें शैलेंद्र की मां ने उषा के हाथ में दे दीं. शैलेंद्र हैरान सा मां को देखता रह गया. एक नितांत अनजान व्यक्ति पर इतना विश्वास?

बड़े ध्यान से उषा ने सारे कागजात, एक्सरे देखे और बोली, ‘‘अब आप बिलकुल ठीक हो जाएंगी. आप की सेहत का सुधार संतोषजनक रूप से हो रहा है.’’

मां के चेहरे पर तृप्ति के भाव आ गए. अगले सप्ताह उषा की शैलेंद्र के साथ अस्पताल में कई बार मुलाकात हुई. जब भी मां की तबीयत देखने वह गई, न जाने क्यों उन की बातों, व्यवहार से उसे एक सुकून सा मिलता था. शैलेंद्र के नम्र व्यवहार का भी अपना आकर्षण था.

शैलेंद्र टेलीफोन विभाग में आपरेटर था. मां की अस्पताल से छुट्टी होने के बाद भी वह अकसर कैंटीन आने लगा और उषा से मुलाकातें होती रहीं. दोनों ही एकदूसरे की ओर आकर्षित होते चले गए और आखिर यह आकर्षण प्रेम में बदल गया. अपने घर के सदस्यों द्वारा उपेक्षित, प्रेम, स्नेह को तरस रही, अपनेपन को लालायित उषा शैलेंद्र के प्रेम को किसी कीमत पर खोना नहीं चाहती थी. वह सोचती, मां और भाई तो इस रिश्ते के लिए कदापि तैयार नहीं होंगे…अब वह क्या करे?

आखिर बात भाइयों तक पहुंच ही गई.

‘‘डाक्टर हो कर उस टुटपुंजिए टेलीफोन आपरेटर से शादी करेगी? तेरा दिमाग तो नहीं फिर गया?’’ सभी भाइयों के साथसाथ मां ने भी लताड़ा था.

‘‘हां, मुझे उस में इनसानियत नजर आई है. केवल पैसा ही सबकुछ नहीं होता,’’ उषा ने हिम्मत कर के जवाब दिया.

‘‘देख लिया अपनी लाड़ली बहन को? तुम्हें ही इनसानियत सिखा रही है.’’ भाभियों ने भी तीर छोड़ने में कोई कसर नहीं रखी.

‘‘अगर तू ने उस के साथ शादी की तो तेरे साथ हमारा संबंध हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा. अच्छी तरह सोच ले,’’ भाइयों ने चेतावनी दी.

जिंदगी में पहली बार किसी का सच्चा प्रेम, विश्वास, सहानुभूति प्राप्त हुई थी, उषा उसे खोना नहीं चाहती थी. पूरी वस्तुस्थिति उस ने शैलेंद्र के सामने स्पष्ट कर दी.

‘‘उषा, यह ठीक है कि मैं संपन्न परिवार से नहीं हूं. मेरी नौकरी भी मामूली सी है, आय भी अधिक नहीं. तुम मेरे मुकाबले काफी ऊंची हो. पद में भी, संपन्नता में भी. लेकिन इतना विश्वास दिलाता हूं कि मेरा प्रेम, विश्वास बहुत ऊंचा है. इस में तुम्हें कभी कंजूसी, धोखा, फरेब नहीं मिलेगा. जो तुम्हारी मरजी हो, चुन लो. तुम पद, प्रतिष्ठा, धन को अधिक महत्त्व देती हो या इनसानियत, सच्चे प्रेम, स्नेह, विश्वास को. यह निर्णय लेने का तुम्हें अधिकार है,’’ शैलेंद्र बोला.

‘‘और फिर परीक्षाएं होने के बाद हम ने कचहरी में जा कर शादी कर ली. मेरी मां, भाई, भाभी कोई भी शादी में हाजिर नहीं हुए. हां, शैलेंद्र के घर से काफी सदस्य शामिल हुए. तुझ से सच कहूं?’’ मेरी आंखों में झांकते हुए उषा आगे बोली, ‘‘मुझे अपने निर्णय पर गर्व है. सच मानो, मुझे अपने पति से इतना प्रेम, स्नेह, विश्वास प्राप्त हुआ है, जिस की मैं ने कल्पना भी नहीं की थी. अपनी मां, भाई, भाभियों से स्नेह, प्यार के लिए तरस रही मुझ बदनसीब को पति व उस के परिवार से इतना प्रेम स्नेह मिला है कि मैं अपना अतीत भूल सी गई हूं.

‘‘अगर मैं किसी बड़े डाक्टर या बड़े व्यवसायी से शादी करती तो धनदौलत व अपार वैभव पाने के साथसाथ मुझे पति का इतना प्रेम, स्नेह मिल पाता, मुझे इस में संदेह है. धनदौलत का तो मांबाप के घर में भी अभाव नहीं था लेकिन प्रेम व स्नेह से मैं वंचित रह गई थी.

‘‘धनदौलत की तुलना में प्रेम का स्थान ऊंचा है. व्यक्ति रूखीसूखी खा कर संतोष से रह सकता है, बशर्ते उसे अपनों का स्नेह, विश्वास, आत्मीयता, प्राप्त हो. लेकिन अत्यधिक संपन्नता और वैभव के बीच अगर प्रेम, सहिष्णुता, आपसी विश्वास न हो तो जिंदगी बोझिल हो जाती है. मैं बहुत खुश हूं, मुझे जीवन की असली मंजिल मिल गई है.

‘‘अब मैं अपना दवाखाना खोल लूंगी. पति के साथ मेरी आय मिल जाने से हमें आर्थिक तंगी नहीं हो पाएगी.’’

‘‘उषा, तू तो बड़ी साहसी निकली. हम तो यही समझते रहे कि 3-3 भाइयों की अकेली बहन कितनी लाड़ली व सुखी होगी, लेकिन तू ने तो अपनी व्यथा का भान ही नहीं होने दिया,’’ सारी कहानी सुन कर मैं ने कहा.

‘‘अपने दुखडे़ किसी के आगे रोने से क्या लाभ? फिर वैसे भी मेरा मेडिकल में दाखिला होने के बाद तुम से मुलाकातें भी तो कम हो गई थीं.’’

मुझे याद आया, उषा मेडिकल कालिज चली गई तो महीने में ही मुलाकात हो पाती थी. विज्ञान में स्नातक होने के पश्चात मेरी शादी हो गई और मैं यहां आ गई. कभीकभार उषा की चिट्ठी आ जाती थी, लेकिन उस ने कभी अपनी व्यथा के बारे में एक शब्द भी नहीं लिखा.

मायके जाने पर जब भी मैं उस से मिली, तब मैं यह अंदाज नहीं लगा सकती थी कि उषा अपने हृदय में तनावों, मानसिक पीड़ा का समंदर समेटे हुए है.

दूसरे दिन आने का वादा कर के वह चली गई. मैं बड़ी बेसब्री से दूसरे दिन का इंतजार कर रही थी ताकि उस व्यक्ति से मिलने का अवसर मिले जिस ने अपने साधारण से पद के बावजूद अपनी शख्सियत, अपने व्यवहार, मृदुस्वभाव व इनसानियत के गुणों के चुंबकीय आकर्षण से एक डाक्टर को जीवन भर के लिए अपनी जिंदगी की गांठ से बांध लिया था.

रणबीर-आलिया की शादी को लेकर फोटोग्राफर्स पर भड़की तेजस्वी !

टीवी की हॉट ‘नागिन’ तेजस्वी प्रकाश का एक वीडियो इंटरनेट पर आग की तरह वायरल हो रहा है, जिसमें वो फोटोग्राफर्स से नाराज होती दिख रही हैं. वीडियो में तेजस्वी प्रकाश कह रही हैं कि फोटोग्राफर्स रणबीर-आलिया की शादी को लेकर नीतू कपूर से इतने सवाल पूछते हैं, जो गलत है. तेजस्वी प्रकाश ने कहा है कि फोटोग्राफर्स को नीतू कपूर को इतना परेशान नहीं करना चाहिए क्योंकि ये सही नहीं है. तेजा ने फोटोग्राफर्स से आगे कहा कि ‘मैं सब वीडियो देखती हूं… तुम लोग नीतू मैम और नोरा को कितना परेशान करते हो कि रणबीर-आलिया की शादी कब है? तुम लोग बंद करो ये…’

हाल ही में डांस दीवाने जूनियर के सेट पर जब नीतू कपूर ,और नोरा फतेही पहुंची तो फोटोग्राफर्स नीतू कपूर से रणवीर -आलिया की शादी को लेकर ढेरों सवाल करने लगे तो नीतू कपूर काफी परेशान होती दिखी. इतना ही नहीं नीतू कपूर ने फोटोग्राफर्स से शादी की डेट के सवाल के जवाब में कहा “मैं क्यों बताऊँ” कलर्स चैनल पर डांस दीवाने जूनियर शो में नीतू कपूर ,नोरा फतेही और  मर्जी पेस्तोंजी जज बनाकर नजर आने वाले हैं.

बता दें कि रणबीर -आलिया जल्द ही शादी के बंधन में बंधने वाले हैं. ऐसी ख़बरें आ रही हैं कि दोनों की शादी 14-17 अप्रैल के बीच में है.
रणबीर और आलिया की शादी को लेकर मीडिया में काफी उथलपुथल दिखाई दे रही है. दोनों स्टार्स ने अभी तक अपने रिलेशन के बारे में खुलकर बात भी नहीं की थी लेकिन अचानक से शादी की खबर ने सभी को हैरान कर दिया. बता दें कि रणबीर -आलिया ने गुपचुप शादी का प्लान किया है ,लेकिन मीडिया से कुछ भी नहीं छुप सकता. फोटोग्राफर्स भी अपने फेवरेट कलाकारों को अपने कैमरे में कैद करना चाहते हैं इसलिए वो एक भी मौका नहीं छोड़ते.

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