‘सीवर पॉइंट’ को उत्तर प्रदेश सरकार ने बना दिया ‘सेल्फी पॉइंट’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा शुरू किए गए नमामि गंगे का अभियान आजादी के बाद भारत की नदी संस्कृति को पुनर्जीवित करने की महत्वपूर्ण योजना बनी. ये बातें रविवार को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक कार्यक्रम में कहीं. गंगा यात्रा कार्यक्रम में पहुंचे सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा कि 25 सौ किलोमीटर के अपने लंबे प्रवाह में पांच राज्य में से यूपी में यमुना और गंगा मां का सबसे ज्यादा आशीर्वाद है. मां गंगा से जुड़ी योजनाएं पहले भी बनती थी 1986 में गंगा एक्शन प्लान कार्य शुरू भी हुआ. केंद्र व राज्य सरकारों को मिलकर इस योजना से जुड़कर कार्य करना था इस एक्शन प्लान में बिहार, बंगाल उत्तर प्रदेश तीन राज्य थे. लेकिन नमामि गंगे योजना के पहले हमने जब गंगा नदी का मूल्यांकन किया तो पता चला की गंगा सर्वाधिक प्रदूषित है.

उन्होंने कहा कि मुझे इस बात की खुशी है कि नमामि गंगे का ये अभियान यूपी में सफल हुआ. उत्तर प्रदेश के कानपुर में गंगा की स्थिति पीड़ादायक थी. इसके जल में जीव नष्ट हो जाते थे. लगातार 100 साल से सीसामऊ से रोज 14 करोड़ लीटर सीवर इसमें गिरता था.  लेकिन हमारी सरकार ने इस सीवर पॉइंट को सेल्फी पॉइंट में बदला. आज एक बूंद भी सीवर गंगा में नहीं गिरता है और जल के साथ जीव भी यहां सुरक्षित हैं. प्रयागराज के 2019 में आयोजित हुए कुंभ की सफलता की कहानी भी स्वच्छता और अविरल निर्मल गंगा की गाथा को कहती है. हमारी सरकार ने न सिर्फ गंगा मां पर बल्कि उसकी सहायक 10 नदियों पर भी अपना ध्यान केंद्रित किया. प्रयागराज के कुंभ में करोड़ों श्रद्धालुओं ने भाग लिया और गंगा के निर्मल अविरल से आचमन भी किया. उन्होंने कहा कि कोई भी योजना तब सफल होती है जब सरकार के साथ समाज भी उसमें बढ़ चढ़कर हिस्सा लेता है. और इस योजना की सफलता भी हमें तभी मिली जब समाज ने हमारा साथ दिया.

गंगाजल आचमन और पूजा करने योग्य-सीएम

काशी में गंगा निर्मल दिखती है आज गंगाजल आचमन और पूजा करने योग्य हो गया है. यहां डॉल्फिन भी दिखाई देती है. राज्य सरकार ने केंद्र सरकार की योजना को ध्यान में रखते हुए नदियों में कचरे के प्रवाह को रोकने का कार्य किया. जिसमें से अब तक 46 में से 25 का काम पूरा हो चुका है, 19 में काम चल रहा है और दो कार्य प्रगति पर है. आज हमारी सरकार इस योजना को आगे बढ़ा रही है. शवदाह गृह को आधुनिक किया जा रहा है. तकनीक को अपनाकर निर्मल गंगा को बनाने का काम किया जा रहा है. मुझे लगता है कोई भारतीय ऐसा नहीं होगा जो गांव का नाम लेकर आचमन न करता हो. आज सरकार के साथ समाज को भी एकजुट होकर काम करने की आवश्यकता है. उन्होंने कहा कि सिर्फ गंगा ही नहीं गंगा के साथ उसकी 10 सहयोगी नदियों को भी ध्यान में रखकर अपना योगदान देना चाहिए. उन्होंने कहा कि हम सबको नदियों में कूड़ा कचरा डालने से बचना होगा आज नमामि गंगे की सफलता के पीछे लोगों का बहुत बड़ा सहयोग रहा है. हमारी सरकार लगातार इन नदियों के उत्थान पर कार्य कर रही है. जो ड्रेनेज व सीवर के लिए अलग से व्यवस्था की जा रही है. साल 2019 में गंगा परिषद बैठक में हमने गंगा यात्रा निकाली, जो बिजनौर से कानपुर और कानपुर से बिजनौर तक निकली.

जनपद और राज्य स्तर पर किया गंगा समिति का गठन-सीएम

गंगा के उत्थान के साथ हम प्राकृतिक खेती और किसानों की मदद कर रहे हैं. आज गंगा के दोनों तटों पर बागवानी, गंगा नर्सरी, गंगा घाट, गंगा पार्क स्थापित हो चुके हैं. उन्होंने कहा कि सर्वाधिक प्रवाह यूपी में होने के कारण आज हमारी सरकार ने दोनों तटों पर वृक्षारोपण, किसानों को फ्री में पौधा और 3 साल की सब्सिडी देने के कार्यक्रम को तेजी से चल रहे हैं. जिसको हम निरंतर युद्ध स्तर पर बढ़ाने का कार्य कर रहे हैं. मेरी सभी से अपील है कि समाज गंगा की धारा को निर्मल और अविरल बनाने में आगे आए. हमारी सरकार ने गंगा समिति का गठन जनपद और राज्य स्तर पर किया है जिसके तहत लगातार कार्यक्रमों का आयोजन हो रहा है.

गहरी पैठ: गांवों की जमीनों को हथियाने की साजिश

देश के सब से पिछड़े राज्य बिहार ने हाल में दावा किया है कि उस ने जमीनों की मिल्कीयत का डिजिटल नक्शा एक सौफ्टवेयर के जरीए बना लिया है और जब भी कोई बदलाव मालिक का होगा, यह नक्शा अपनेआप बदल जाएगा और कोई भी विवाद खड़ा न होगा. फरवरी, 2021 में बिहार विधानसभा ने इस बारे में कानून पास किया था और केंचुए की स्पीड से चलने वाली नौकरशाही का दावा है कि अब यह लोगों के लिए लगभग तैयार है.

बिहार में सरकार के हिसाब से कोई 37,000 मामले जमीन की मिल्कीयत को ले कर चल रहे हैं. हर जना जो मेहनत से कमाए पैसे से जमीन खरीदना चाहता है, डरता रहता है कि कहीं उस का मालिक या दावेदार और कोई नहीं निकल आए. वर्षों बाद भी किसी पुराने दस्तावेज को चुनौती दे दी जाती है.

यह काम लोगों के भले के लिए किया जा रहा है, इस में पूरा शक है. असल में शहरों में रहने वालों की नजर अब गांवों की जमीनों पर फिर जा रही है जो पहले कोडि़यों के भावों में बिका करती थीं. अब इन के दाम लाखोंकरोड़ों में होने लगे हैं. रिश्वत या ऊपरी कमाई वाले शहरी बाबू, नेता, माफियाई और पैसे के भंडार वाली कंपनियां अब गांवों की जमीनों पर कब्जा चाहती हैं और उन्होंने कंप्यूटर टैक्नोलौजी को हथियार बनाया है.

बिहार का यह डिजिटल नक्शा करोड़ों की लागत में बना है. 20 जिलों के एरियल ड्रोनों और हवाईजहाजों से फोटो लिए गए, हर खसरे के कागज निकाल कर मिलान किए गए, 5,000 लोग इस काम में लगे ताकि 5,127 गांवों की जमीनों के 22,000 नक्शे तैयार हो सकें. यह सब काम जनता और किसानों के लिए किया गया हो, यह नामुमकिन है.

यह तो कंप्यूटर की मारफत पढ़ेलिखों की साजिश है जो कंप्यूटर नक्शों में हेरफेर आसानी से कर सकेंगे. बैंक उन के आधार पर कर्जदार की जमीन पर कब्जा जमा सकेंगे. बड़ी कंपनियां हजारों एकड़ जमीन खरीद कर इन के आधार पर कर्जदार की जमीन पर कब्जा जमा सकेंगे. बड़ी कंपनियां हजारों एकड़ जमीन खरीद कर अपना हक सुरक्षित रख सकेंगी. दलितों, अधपढ़ों, पिछड़ों को जिन्हें कंप्यूटर सम?ा नहीं आता बरगलाना और आसान हो जाएगा.

कंप्यूटर के रिकौर्डों का फायदा यह भी है कि कोई भी कंप्यूटर जानकार सौफ्टवेयर में हैकिंग कर के रिकौर्ड बदल दे और एक बार बदला गया रिकौर्ड पत्थर की लकीर बन जाता है. शहरी बाबू, शहरी कंप्यूटर ऐक्सपर्ट, शहरी पैसे वाले मनचाहा फैसला कंप्यूटर के हिसाब से ले सकते हैं.

जीएसटी और इनकम टैक्स में ऐसा होने लगा है कि लाखोंकरोड़ों की डिमांड निकल आती है. वर्षों पहले अगर सरकारी अफसरों ने अपने खाते ठीक नहीं किए तो जो गलती रह गई वह कंप्यूटर सौफ्टवेयर बनाने वाले जनता के सिर पर मढ़ देते हैं क्योंकि सरकारी दफ्तर से तो उन्हें मोटी कमाई प्रोग्राम बनाने से हो रही है.

बिहार का कंप्यूटरी नक्शा एक अच्छा कदम है पर इस का जो नुकसान आम लोग सहेंगे यह अंदाजा नहीं लगाया जा सकता.

देशभर में अगर कंप्यूटरों की बिक्री हो रही है तो उस के पीछे सरकारी वरदहस्त है. आज कमाई करने वाली कंपनियों में कंप्यूटर सौफ्टवेयर कंपनियां हैं जो बिहार जैसे गरीब राज्य से 100-200 करोड़ छोटेछोटे कंप्यूटर प्रोग्रामों के ले जाती हैं. जनता वहीं रह रही है. उस की न बिजली ठीक है, न पानी, न सड़क, न रंगदारी, न रिश्वतखोरी कम. डिजिटल नक्शेबाजी पढ़ों और अधपढ़ों के बीच एक और खाई पैदा करेगी और जमीनों को हड़प करने का एक कदम बनेगी.

हकीकत: जाति और धर्म की देन बेरोजगारी

पौराणिक समय में शूद्रों को पढ़नेलिखने का हक नहीं था. अगर शूद्र पढ़ालिखा हो जाता था तो उस को इस बात का दंड दिया जाता था. पौराणिक समय की यही सोच आज भी दलितों को पढ़ाईलिखाई और रोजीरोजगार से दूर रखना चाहती है. उन के मन में यह भरा जाता है कि कौन सा तुम को पढ़लिख कर कलक्टर बनना है? समय से पहले स्कूल छोड़ने वालों में सब से बड़ा हिस्सा दलितों का ही है.

एकलव्य की कहानी महाभारत काल की है. महाभारत काल में प्रयागराज में एक श्रृंगवेरपुर राज्य था. हिरण्यधनु इस आदिवासी राज्य के राजा थे. गंगा के तट पर श्रृंगवेरपुर उन की राजधानी थी. श्रृंगवेरपुर राज्य की शक्ति मगध, हस्तिनापुर, मथुरा, चेदि, चंदेरी जैसे बड़े राज्यों जैसी ही थी.

निषादराज हिरण्यधनु और रानी सुलेखा के बेटे का नाम अभिद्युम्न था. अस्त्रशस्त्र विद्या में निपुण होने के चलते अभिद्युम्न को ‘एकलव्य’ के नाम से पहचान मिली.

एकलव्य अपनी धनुर्विद्या से संतुष्ट न थे. ऊंची पढ़ाईलिखाई हासिल करने के लिए वे गुरु द्रोणाचार्य के पास गए, पर एकलव्य के निषाद होने के चलते गुरु द्रोणाचार्य ने उसे धनुर्विद्या देने से इनकार कर दिया.

इस के बाद एकलव्य ने जंगल में रह कर धनुर्विद्या हासिल करने के लिए द्रोणाचार्य की एक मूर्ति बनाई और उन्हीं का ध्यान कर धनुर्विद्या में महारत हासिल कर ली.

एक दिन आचार्य द्रोण अपने शिष्यों और एक कुत्ते के साथ आखेट के लिए उसी वन में पहुंच गए, जहां एकलव्य रहते थे. उन का कुत्ता राह भटक कर एकलव्य के आश्रम पहुंच गया और भूंकने लगा. एकलव्य उस समय धनुर्विद्या का अभ्यास कर रहे थे.

कुत्ते के भूंकने की आवाज से एकलव्य की साधना में बाधा पड़ रही थी. उन्होंने ऐसे बाण चलाए कि कुत्ते को जरा सी खरोंच भी नहीं आई और उस का मुंह भी बंद हो गया.

कुत्ता असहाय हो कर गुरु द्रोण के पास जा पहुंचा. द्रोण और उन के शिष्य ऐसी श्रेष्ठ धनुर्विद्या देख कर हैरत में पड़ गए. वे सब एकलव्य के आश्रम पहुंचे और वहां एकलव्य की धनुर्विद्या को देख कर अचरज में पड़ गए.

द्रोणाचार्य ने जब एकलव्य से उस के गुरु के बारे में जानने की बात कही, तो एकलव्य ने उन्हें द्रोणाचार्य की ही प्रतिमा दिखा दी. इस के बाद द्रोणाचार्य ने कहा, ‘अगर तुम मु?ो अपना गुरु मानते हो तो मु?ो गुरु दक्षिणा दो.’

एकलव्य ने हां कर दी, तो गुरु दक्षिणा में द्रोणाचार्य ने उन के अंगूठे की मांग कर दी. इस के पीछे की वजह यह थी कि कहीं एकलव्य सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर न बन जाए.

एकलव्य ने बिना हिचकिचाहट अपना अंगूठा गुरु द्रोणाचार्य को अर्पित कर दिया.

यह पौराणिक कथा बताती है कि जाति और धर्म हमेशा से ही पढ़ाईलिखाई और रोजगार में ऊंची जातियों को अहमियत देते रहे हैं. इसी गैरबराबरी को दूर करने के लिए देश की आजादी के बाद एससी, एसटी और ओबीसी जातियों को सरकारी नौकरियों में रिजर्वेशन देने का कानून बनाया गया. पर उस कानून को दरकिनार करते हुए आजादी के बाद भी सरकारों ने रिजर्वेशन को सही तरह से लागू नहीं किया.

धीरेधीरे सरकारों ने सरकारी नौकरियों को बंद करने के तमाम उपाय किए. करार पर नौकरियों में रिजर्वेशन का कोई कानून नहीं है. इस के अलावा निजी क्षेत्रों की नौकरियों में रिजर्वेशन नहीं है, जिस की वजह से एससी, एसटी और ओबीसी जातियां नौकरियों के मामले में पिछड़ रही हैं. ऊंची पढ़ाईलिखाई महंगी होने के चलते भी ये गरीब जातियां उस से दूर होती जा रही हैं.

लिहाजा, गरीब लोग अपने बच्चों को ऊंची पढ़ाईलिखाई दिलाने की जगह यह कोशिश करते हैं कि वे जैसे भी हो, कोई छोटामोटा रोजगार कर के कमाई करने लगें. इस वजह से वे केवल मजदूर बने रहते हैं.

ऊंची पढ़ाईलिखाई से मोह भंग

बिहार में तकरीबन सवा करोड़ पढ़ेलिखे बेरोजगार हैं. इन में से 50 लाख ऐसे हैं, जो 10वीं जमात पास है. 12वीं जमात पास 35 लाख बेरोजगार हैं और ग्रेजुएट बेरोजगारों की तादाद तकरीबन 25 लाख है.

ये आंकड़े बेरोजगारी के हैं, पर इस से यह भी पता चलता है कि ऊंची पढ़ाईलिखाई में जाने वालों की तादाद लगातार कम होती जाती है. ऐसा क्यों है? इस सवाल का सीधा और आसान सा जवाब यह है कि ज्यादा पढ़ने के बाद भी रोजगार तो मिलता नहीं है.

रोजगार का मतलब सरकारी नौकरी है. बाकी नौकरी को रोजगार नहीं माना जाता है. कम काम, भविष्य की सुरक्षा और ऊपरी कमाई सरकारी नौकरी के प्रति मोह की सब से बड़ी वजह है.

नौकरी न मिलने के चलते मांबाप अपने बच्चों को ऊंची पढ़ाईलिखाई दिलाने से कतराते रहते हैं. वे लड़कों को एक बार कर्ज ले कर पढ़ा भी दें, पर लड़कियों को पढ़ाने के बजाय उन की शादी में पैसा खर्च करना बेहतर सम?ाते हैं.

इस की ठोस वजह है. देश में ग्रेजुएट होने यानी ऊंची पढ़ाईलिखाई हासिल करने के बाद भी नौजवान बड़ी तादाद में बेरोजगार हैं. सैंटर फौर मौनिटरिंग इंडियन इकोनौमी यानी सीएमआईई के आंकड़े इस के गवाह हैं. ये आंकड़े बताते हैं कि देश के ज्यादातर प्रदेशों में हर दूसरा या तीसरा ग्रेजुएट बेरोजगार है.

बढ़ रही ग्रेजुएट बेरोजगारों की तादाद

प्रदेशवार कुछ आंकड़ों को देखते हैं. पिछले 4 सालों में यानी दिसंबर, 2017 से दिसंबर, 2021 के बीच यह तुलना की गई है. इस के मुताबिक, राजस्थान की हालत सब से ज्यादा खराब है. वहां कुल 65 लाख बेरोजगार हैं. इन में से ग्रेजुएट बेरोजगारों की तादाद 21 लाख के आसपास है. दूसरे नंबर पर हिमाचल प्रदेश है, जिस में 2 लाख, 55 हजार बेरोजगारों में से ग्रेजुएट की तादाद तकरीबन एक लाख, 39 हजार है.

इस के अलावा बिहार में 38 लाख, 84 हजार बेरोजगारों में से ग्रेजुएट बेरोजगारों की तादाद 10 लाख, 6 हजार है. ?ारखंड में कुल 18 लाख, 19 हजार बेरोजगारों में से 3 लाख, 82 हजार ग्रेजुएट हैं. हरियाणा में 24 लाख, 80 हजार बेरोजगारों में से 6 लाख, 2 हजार ग्रेजुएट बेरोजगार हैं.

पंजाब में 8 लाख, 2 हजार बेरोजगारों में से ग्रेजुएट बेरोजगारों की तादाद 2 लाख, 56 हजार है. उत्तर प्रदेश में 28 लाख, 41 हजार बेरोजगारों में से 13 लाख, 89 हजार ग्रेजुएट बेरोजगार हैं.

छत्तीसगढ के 2 लाख, 85 हजार बेरोजगारों में से एक लाख, 48 हजार ग्रेजुएट बेरोजगार हैं. दिल्ली में 7 लाख, 26 हजार बेरोजगारों में से 3 लाख,

56 हजार ग्रेजुएट बेरोजगार हैं. महाराष्ट्र में 19 लाख, 12 हजार बेरोजगारों में से 7 लाख, 85 हजार ग्रेजुएट बेरोजगार हैं.

मध्य प्रदेश में 6 लाख, 27 हजार बेरोजगारों में से ग्रेजुएट बेरोजगारों की तादाद 3 लाख, 23 हजार है. गुजरात में  4 लाख, 92 हजार बेरोजगारों में से एक लाख, 90 हजार ग्रेजुएट बेरोजगार हैं.

इस की वजह देखें, तो पता चलता है कि देश में नई नौकरियां नहीं पैदा हो रही हैं. इस की सब से ज्यादा कीमत पढ़ेलिखे नौजवानों को चुकानी पड़ रही है.

लड़कियों की हालत और भी खराब

अगर इन आंकड़ों में लड़कियों की हालत देखें, तो पता चलता है कि देश की हर 5वीं शहरी लड़की बेरोजगार है. गांवदेहात में हर दूसरी लड़की बेरोजगार है. लड़कियों की पढ़ाईलिखाई के मामले में समाज जागरूक नहीं है.

कई मामलों में देखें, तो लड़कियां खुद भी यह मान लेती हैं कि शादी कर के बच्चे पैदा करना और परिवार की देखभाल करना ही सब से जरूरी काम है. ऐेसे में जो मौके मिलते हैं, ज्यादातर लड़कियां उन का फायदा नहीं उठाती हैं.

धर्म, जाति और पौराणिक व्यवस्था ऐसी है, जो लड़कियों को बहुत ज्यादा आजादी देने या पढ़लिख कर समाज में लड़कों से बराबरी करने की सोच बनने नहीं देती है. लड़कियों को यही सिखाया जाता है कि परदा करना उन के लिए जरूरी है.

बहुत सारी लड़कियों को शहर में अकेले रह कर पढ़ाई करने के मौके नहीं दिए जाते हैं. मांबाप लड़कियों को पढ़ाने से अच्छा उन का घर बसाना सम?ाते हैं. जो लड़कियां पढ़लिख कर नौकरी कर लेती हैं, उन्हें समाज में अच्छी नजर से नहीं देखा जाता है.

कई बार उम्र ज्यादा होने से लड़कियों की अच्छी जगह शादी भी नहीं होती है. यह मान लिया जाता है कि नौकरी करने वाली लड़कियां परिवार के दबाव में नहीं रहती हैं.

लड़कियों की उम्र बढ़ने से अच्छे रिश्ते नहीं मिलते हैं और दहेज भी ज्यादा देना पड़ता है. इस के चलते बहुत से मांबाप कम उम्र में ही अपनी लड़कियों की शादी करने को बेहतर सम?ाते हैं. सरकारी नौकरी करने वाली लड़कियों के हालात थोड़े बेहतर होते हैं. पर परेशानी की बात यह है कि देश में सरकारी नौकरियां कम होती जा रही हैं.

बेरोजगारी की अहम वजह

पढ़ाईलिखाई में जाति और धर्म का बड़ा योगदान होता है. पौराणिक समय में पढ़नेलिखने का हक केवल ऊंची जातियों को ही था. तब ब्राह्मण और साधुसंत पढ़ाने का काम करते थे.

ब्राह्मणों और क्षत्रियों को ही गुरुकुल में पढ़ाया जाता था. वहां कमजोर और निचली जातियों को पढ़ने का हक नहीं था. पौराणिक किताबों में इस के तमाम उदाहरण मिलते हैं. उन में ऐसी तमाम कहानियां दर्ज हैं.

आज के दौर में पढ़ाईलिखाई महंगी हो गई है. सरकारी स्कूलों में जहां पढ़ाईलिखाई सस्ती है, वहां उस का वह लैवल नहीं है कि आगे चल कर गरीब घरों के बच्चे सरकारी नौकरी लायक कंपीटिशन में हिस्सा ले कर उन को हासिल कर सकें.

रिजर्वेशन का फायदा भी वही एससी, एसटी और ओबीसी ले पा रहे हैं, जो पैसे से मजबूत हैं. यह एक तरह से समाज में अलग तरह की ऊंची जातियों का तबका तैयार हो गया है. इस फायदा लेने के लिए एससी, एसटी और ओबीसी का जाति प्रमाणपत्र लगाता है, पर खुद को ऊंचा ही सम?ाता है. यह तबका अपनी जाति के लोगों से उसी तरह से भेदभाव करता है, जिस तरह से ऊंची जातियां करती हैं.

इस तरह से देखें, तो ऊंची जातियों के पास ही पढ़नेलिखने की ताकत रह गई है. निचली और गरीब जातियों के लिए महंगी और ऊंची पढ़ाईलिखाई नहीं रह गई है. जहां सस्ती पढ़ाईलिखाई है, वहां उस की क्वालिटी खराब हो गई है.

‘मनुस्मृति’ में नहीं था यह हक

‘मनुस्मृति’ के पहले अध्याय में प्रकृति के निर्माण, 4 युगों, 4 वर्णों, उन के पेशों, ब्राह्मणों की महानता जैसे विषय शामिल हैं. दूसरा अध्याय ब्रह्मचर्य और अपने मालिक की सेवा पर आधारित है. तीसरे अध्याय में शादियों की किस्मों, विवाहों के रीतिरिवाजों और श्राद्ध यानी पूर्वजों को याद करने का वर्णन है. चौथे अध्याय में गृहस्थ धर्म के कर्तव्य, खाने या न खाने के नियमों और 21 तरह के नरकों का जिक्र है. 5वें अध्याय में महिलाओं के कर्तव्यों, शुद्धता और अशुद्धता आदि का जिक्र है. छठे अध्याय में एक संत और 7वें अध्याय में एक राजा के कर्तव्यों का जिक्र है. 8वां अध्याय अपराध, न्याय, वचन और राजनीतिक मामलों आदि पर बात करता है. 9वें अध्याय में पैतृक संपत्ति, 10वें अध्याय में वर्णों के मिश्रण, 11वें अध्याय में पापकर्म और 12वें अध्याय में 3 गुणों व वेदों की प्रशंसा है.

हिंदू धर्म ‘मनुस्मृति’ के हिसाब से चलता है. ‘मनुस्मृति’ ने पूरे समाज को 6,000 जातियों में विभाजित किया था. शूद्रों को पढ़नेलिखने का हक नहीं था. उस समय तालीम देने की विधि मौखिक हुआ करती थी. ऐसे में कुछ ब्राह्मणों को छोड़ कर कोई यह नहीं जानता था कि ‘मनुस्मृति’ में आखिर क्या है?

ब्रिटिश राज के दौरान यह किताब कानूनी मामलों में इस्तेमाल होने की वजह से खासा चर्चित हो गई थी. विलियम जोनास ने ‘मनुस्मृति’ का अंगरेजी में अनुवाद किया है. इस की वजह से लोगों को यह पता चल सका कि इस किताब में क्या लिखा गया है.

महात्मा ज्योतिबा फुले ‘मनुस्मृति’ को चुनौती देने वाले पहले आदमी थे. खेतिहर मजदूरों, सीमांत किसानों और समाज के दूसरे वंचित और शोषित तबकों की बदहाली देख कर उन्होंने ब्राह्मणों व व्यापारियों की आलोचना की और शूद्रों के पढ़ने पर जोर दिया.

‘मनुस्मृति’ का मतलब ‘मनु’ द्वारा लिखा गया ‘धर्मशास्त्र’ है. इस में कुल 12 अध्याय हैं, जिन में 2,684 श्लोक हैं. कुछ संस्करणों में श्लोकों की संख्या 2,964 है.

तमाम दलित महापुरुषों ने समयसमय पर अपने विचारों में साफतौर पर यह माना कि ‘मनुस्मृति’ उन की राह को मुश्किल बनाती है. इस के चलते ही धार्मिक और जातीय आधार पर उन से भेदभाव किया गया था.

हिंदू राष्ट्र की सोच की मूल में ‘मनुस्मृति’ ही है, जो हमें वापस जाति और धर्म के खांचे में बांटने में दिलचस्पी रखती है. धार्मिक आधार पर यह दूसरों से भेदभाव की तरफ ले जाना चाहती है. दलितपिछड़ों को पढ़ाईलिखाई के हक से कैसे दूर रखा जा सके, इस के लिए आधुनिक उपाय किए जा रहे हैं. इस वजह से सरकारी तालीम को खत्म और बेमतलब का कर दिया गया है.

सरकारी स्कूल देख कर आप समझ सकते हैं कि वे पूरी तरह से खानापूरी भर हैं, जिस से गरीब पढ़लिख कर रोजगार न पा सके. महंगी होती तालीम में उसे अपनी पढ़ाई अधूरी छोड़नी पड़ जाए.

तालीम को ले कर अगर सर्वे हो, तो यह बात सच निकलेगी कि पढ़ाई अधूरी छोड़ने वालों में सब से ज्यादा तादाद दलितों की है. ग्रेजुएशन करने के बाद भी नौकरियों के मौके सब से कम उन के ही पास हैं.

आपदा को अवसर नहीं, बल्कि सेवा बनाया- नीरज शर्मा, विधायक- फरीदाबाद

किसी गरीब परिवार से उठा आदमी, जिस ने बचपन में झुग्गियों में अपनी जिंदगी बिताई हो, झोटाबुग्गी चलाई हो, किराए की साइकिल पर घूमा हो, गलीमहल्ले में कंचे और फोटो खेले हों, यहां तक कि पड़ोसियों के घर जा कर टैलीविजन देखा हो, अगर आज उसे अपने हलके में शानदार काम करने के लिए ‘बैस्ट एमएलए’ का खिताब दिया जाए, तो यकीनन इसे एक शानदार कामयाबी कहा जाएगा. यह उपलब्धि तब और ज्यादा बड़ी हो जाती है, अगर वह विधायक विपक्षी दल का हो.

यह कारनामा फरीदाबाद के युवा नेता नीरज शर्मा ने किया है, जिन्हें मौजूदा भारतीय जनता पार्टी के राज में बिना किसी विरोध के यह अवार्ड मिला है. इस अवार्ड को देने वाली विशेष चयन समिति में विधानसभा के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष के अलावा मुख्यमंत्री मनोहर लाल, उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला, नेता प्रतिपक्ष भूपेंद्र सिंह हुड्डा और संसदीय कार्य मंत्री कंवरपाल गुर्जर भी शामिल हैं.

पेश हैं, एनआईटी-86, फरीदाबाद के विधायक नीरज शर्मा से हुई लंबी बातचीत के खास अंश :

आप ने अपने विधानसभा हलके में ऐसे कौन से काम कराए हैं, जिन की वजह से आप को ‘बैस्ट एमएलए’ का अवार्ड मिला है?

जहां तक बैस्ट की बात है, तो वह मेरी जनता है, जिस ने मुझे चुना है. हो सकता है कि चयन समिति में से कुछ को मेरा स्कूटी पर चलना पसंद आया हो, कुछ को हरियाणा रोडवेज ट्रांसपोर्ट की बस में चंडीगढ़ आनाजाना पसंद आया हो, हो सकता है कि किसी को मेरा सुरक्षा छोड़ना पसंद आया हो, कुछ को मेरा 100 रुपए महीने के किराए का चंडीगढ़ का बड़ा 5-6 कमरों का सरकारी आवास सरैंडर करना पसंद आया हो, क्योंकि मैं ने एक कमरा एमएलए होस्टल में ले रखा है. जब मेरा परिवार ही वहां नहीं रहता है, तो क्यों बेवजह मैं सरकार पर बोझ बनूं.

हो सकता है कि किसी को मेरा बेबाकी से बात कहना पसंद आया हो, क्योंकि मैं ने विधानसभा में अभी तक कोई भी बात बिना तथ्य के नहीं रखी है. मैं ने दो चावल का पापड़ कभी नहीं पकाया, बल्कि अपनी हर बात पर रिसर्च की. विधानसभा की हर बैठक में  हिस्सा लिया. मैं नगरनिगम की बैठक में भी जाता हूं. भ्रष्टाचार पर बेबाकी से बोलता हूं.

मैं ने कोरोना काल में आपदा को अवसर नहीं, बल्कि आपदा को सेवा बनाया. कोरोना की पहली लहर में ‘खिचड़ी प्रसाद’ का प्रोजैक्ट चलाया था, जिस में हम ने और प्रशासन ने रोजाना 20 से 25 हजार लोगों के लिए खिचड़ी बंटवाई थी. मुझे तो यही वजहे लगती हैं यह अवार्ड मिलने की.

मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने जब अपना पहला बजट पेश किया था, तब उन्होंने जिक्र किया था कि आप ने उन्हें कुछ सुझाव दिए थे, जिन पर काम भी हुआ था. क्या थे वे सुझाव?

यह सच है कि मुख्यमंत्री मनोहर लाल राजनीति में नएनए प्रयोग करते रहते हैं. मैं खुद झारखंड के मुख्यमंत्री रहे शिबू सोरेन का ओएसडी रह चुका हूं. मैं ने मुख्यमंत्री कार्यालय देखा हुआ है और वहां के कामकाज के तरीके को बड़ी बारीकी से जानता हूं.

जब मुख्यमंत्री मनोहर लाल को बतौर वित्त मंत्री अपना पहला बजट पेश करना था, तब उन्होंने 3 दिन का एक स्पैशल सैशन लगाया था, सिर्फ सुझावों के लिए. तब मैं ने उन्हें 3 सुझाव दिए थे. पहला, सीवर के ढक्कन टूटने से खुले मेनहोल में हादसे हो जाते हैं. हमारे इलाके में (पूरे फरीदाबाद में) कई बच्चों की मौत हो गई थी. ये ढक्कन समयसमय पर बदलने चाहिए. इसे राइट टू सर्विस में शामिल किया जाना चाहिए.

दूसरा, एक सोर्बिट्रेट की गोली होती है, जो हार्ट अटैक में जान बचाने में बड़ी मददगार साबित हो सकती है, उसे हर सार्वजनिक जगह पर उपलब्ध कराया जाना चाहिए.

तीसरा, मैं ने कहा था कि जो बच्चे स्कूल जाते हैं, उन का स्कूल जाने का रास्ता साफसुथरा हो. मुख्यमंत्री को मेरे ये सुझाव पसंद आए थे. पर स्कूली रास्तों का मामला सरकारी स्कूलों तक ही सिमट कर रह गया.

आप कांग्रेस दल से जुड़े हैं, जो हरियाणा में विपक्ष की भूमिका निभा रहा है. जब आप को यह अवार्ड मिला, तो केंद्र्रीय नेतृत्व से क्या प्रतिक्रिया आई?

हमारे जो जनरल सैक्रेटरी इंचार्ज हैं, वे खुद चुनाव लड़ रहे थे. उन का नतीजा 10 मार्च को आया था, जबकि मुझे 2 मार्च को यह अवार्ड मिल चुका था. उन का 12 दिन बाद ‘बधाई’ का मैसेज आया था.

हमारे केंद्रीय नेतृत्व में जो अपने कार्यकर्ता का सम्मान होना चाहिए, वह नहीं है. अगर हमारा हाईकमान अपने कार्यकर्ताओं के प्रति सजग होता और उन्हें मानसम्मान देता तो हमारी पार्टी के ऐसे हालात न होते.

हमारी पार्टी इंदिरा गांधी वाला दौर भूलती जा रही है. तब कार्यकर्ता जब मरजी घर से चल देता था और उन से मिल लेता था. आज एआईसीसी के अंदर बहुत कचरा इकट्ठा हो गया है. हमारे हाईकमान की आंखों पर ऐसी पट्टी बांध दी गई है, जिसे वह देख नहीं पा रहा है. जो लोग अपनी गली के आदमियों को नहीं जानते होंगे, उन को सैक्रेटरी बना रखा है. वे पार्षद का चुनाव नहीं जीत सकते, सरपंच का चुनाव नहीं जीत सकते.

अरे, संगठन में कुछ ऐसे लोग भी तो शामिल हों, जिन का कोई वजूद हो. जिन को जनता की नब्ज की पकड़ हो. वे जनता से मिलें, उन की बातें सुनें, तभी तो उन्हें पता चलेगा कि जनता किस चीज से परेशान है.

हर बात पर तो सोनिया, राहुल और प्रियंका नजर नहीं रखेंगे न, तभी तो जनरल सैक्रेटरी बनाए हुए हैं. जब वे लोग अपने कार्यकर्ताओं की, जनता की इज्जत नहीं करेंगे, तो फिर पार्टी कैसे आगे बढ़ेगी?

ऐसे कौन से उपाय हैं, जो केंद्र और राज्यों में कांग्रेस को दोबारा मजबूत कर सकते हैं?

सब से पहले तो पार्टी को अपना संगठन बनाना चाहिए. जिस को भी पावर दो पूरी दो. आज 8 साल हो गए, हमारे हरियाणा में संगठन ही नहीं है. अनुशासन सब से पहले होना चाहिए. अब सोचविचार नहीं फैसले करने होंगे. जिस राज्य में कई गुट बने हुए हैं, वहां हाईकमान कहे कि यह नेता चुन लिया गया है, अगर पसंद नहीं है तो बाहर का रास्ता खुला है.

पंजाब में देख लो. लोगों को पता ही नहीं था कि असली नेता कौन है. नवजोत सिंह सिद्धू ने राहुल और प्रियंका गांधी के आगे क्याक्या नहीं कह दिया. उन्हें अध्यक्ष बना दिया था. उन के कहने पर कैप्टन अमरिंदर सिंह जैसे नेता को हटवा दिया, फिर चन्नी को मुख्यमंत्री बना दिया तो उन से भी संतुष्ट नहीं हुए. इस से लोगों में क्या मैसेज गया. अगर हाईकमान को इतनी ही नवजोत सिंह सिद्धू की बात माननी थी, तो फिर सबकुछ उन्हीं को सौंप देना चाहिए था.

अब कांग्रेस की इस हालत से राजनीति में जो वैक्यूम आया है, उसे आम आदमी पार्टी भरने की जुगत में है. पहले दिल्ली कांग्रेस से छीना और अब पंजाब पर कब्जा जमा लिया है. इस पर आप के क्या विचार हैं?

इंदिरा गांधी जैसा बुरा दौर किसी ने नहीं देखा होगा, पर वे दोबारा सत्ता में आई थीं न. ऐसी क्या खासीयत थी उन में कि लोग उन्हें दिल से पसंद करते थे? आज हम तरसते हैं कि हमारा नेता हम से मिल ले. इंदिरा गांधी अपने कार्यकर्ता की थाली में से निवाला खा लेती थीं. वे लोगों, कार्यकर्ताओं से बिना किसी अपौइंटमैंट के मिलती थीं. जिस का मन किया उठ कर चल दिया दिल्ली की तरफ. वे भी उन का हालचाल लेती थीं.

आज भी तमाम कार्यकर्ता अपने आलाकमान से कोई जमीनजायदाद नहीं मांग रहे हैं, बल्कि प्यार और मानसम्मान चाहते हैं. हमें उसी दौर को वापस लाना होगा. वर्कर को वर्कर समझें, नौकर न समझें.

आप अपने हलके में और क्या सुधार करना चाहते हैं?

हमारे शहर का सब से बड़ा दुश्मन है करप्शन और आउट औफ कैडर के अफसर. जब से यह नई सरकार है, तब से यह कोई न कोई अफसर आउट औफ कैडर का देती है, जो बंद होना चाहिए और करप्ट अफसरों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए.

पूरे शहर में आलम यह है कि अगर कोई एमएलए किसी के घर का बल्ब भी बदलवा देता है, तो अपने सोशल मीडिया पर प्रचार करता है कि आज फलां मकान नंबर की ट्यूबलाइट ठीक कराई. मेरी विधानसभा में मुख्यमंत्री सीवर साफ कराते हैं, तो उस का प्रैस नोट बनता है.

पर क्या यह काम मुख्यमंत्री के लैवल का है? मुख्यमंत्री और विधायकों का काम तो अपने राज्य के लिए बड़ेबड़े प्रोजैक्ट लाने का होता है, जबकि प्रचार छोटेछोटे कामों का हो रहा है. इस की वजह है कि सारा पैसा तो भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहा है.

पिछले 5 साल में नगरनिगम में साढ़े 13 हजार करोड़ का बजट पास हुआ है और इस शहर में डेढ़ हजार करोड़ भी लगता नजर नहीं आया.

इतनी बिजी जिंदगी में आप अपने परिवार को कैसे समय देते हैं?

सच कहूं तो सब नाराज रहते हैं. एमएलए बनने के बाद मैं ने पिछले ढाई साल में अपनी पत्नी के साथ सिर्फ एक बार खाना खाया है. इस के लिए मैं किसी को दोष भी नहीं दे सकता, क्योंकि यह जिंदगी मैं ने खुद चुनी है. हां, कभी समय मिलता है तो पार्क में सैर जरूर करता हूं. शाम को मेरा मन जरूर करता है कि अपनी गाड़ी से शहर की गलियों के चक्कर जरूर लगाऊं. इसे आप तनाव भगाने का जरीया भी कह सकते हैं.

पिछले 8-10 साल में आप ने सामाजिक तौर पर भारत में क्या बदलाव महसूस किया है?

जो पहले प्यार था, वह अब खत्म हो गया है. आज पड़ोसी को पड़ोसी से मतलब नहीं है. अभी होली गई है. पहले इस त्योहार पर घर में पापड़, अचार, मिठाई आदि बनते थे और पूरे महल्ले में बंटते थे, आज कोई अपने घर के लिए भी बनाने को राजी नहीं है. औनलाइन और्डर कर दो, सब घर आ जाएगा. फूड कंपनियां त्योहार पर खूब नई स्कीम चलाती हैं, क्योंकि उन का धंधा बढ़ रहा है.

दिलमार: ड्राइवर की नौकरी करते-करते फिल्मी हीरो बने राम गौड़ा

सिनेमा में आ रहे बदलाव के चलते अब गरीब किसान परिवार से जुड़े लोग भी फिल्मों में अभिनय कर रहे हैं. भले ही इसके लिए उन्हे लंबा संघर्ष ही क्यो न करना पड़ रहा हो. बैंग्लोर के नजदीक एक गांव के किसान परिवार में जन्में बहुमुखी प्रतिभा के धनी राम गौड़ा ने भी अभिनेता बनने का सपना देखा था. पर उन्हे मजबूर आज से 15 वर्ष पहले ड्राइवर के रूप में नौकरी करनी पड़ी थी. लेकिन उन्होने हिम्मत हारने की बजाय अपना संघर्ष जारी रखा. उनकी मेहनत  रंग लायी.

एक दिन वह सहायक निर्देशक बन गए. फिर उन्होंने कन्नड़, तमिल, तेलगु व बंगाली आदि सभी भाषाओं की फिल्मों में लगभग फिल्म के हर विभाग में काम किया. लेकिन अब उनकी मेहनत और तकदीर के चमत्कार के चलते बतौर हीरो पहली फिल्म ‘‘दिलमार‘‘ मिली है. इसे कन्नड़, तमिल, तेलगु व हिंदी में एक साथ प्रदर्शित किया जाएगा. इस फिल्म का निर्देशन ‘केजीएफ’, ‘केजीएफ 2’ जैसी सफलतम फिल्म व आने वाली फिल्म ‘‘सालार’’ के संवाद लेखक एम. चंद्रमौली ने किया है.

राम गौड़ा की बतौर हीरो अपनी पहली फिल्म ‘‘दिलमार‘‘ के बारे में बात करते हुए कहते हैं-‘‘ यह एक एक्शन, रोमांस से भरपूर मसाला फिल्म है. इसमें मेरा किरदार थोड़ा टप्पोरी टाइप का है. जो कि अनाथ है यानी कि माँ बाप नहीं है. इसमें मेरे साथ तेलगु फिल्मों की लोकप्रिय अदाकारा डिम्पल हयाथी ने काम किया है. फिल्म जल्द ही रिलीज होने वाली है.‘‘

ड्राइवर की नौकरी करने से लेकर फिल्म के हीरो बनने की अपनी यात्रा के बारे में अभिनेता राम गौड़ा कहते है,‘‘ मैं हमेशा काम में व्यस्त रहना पसंद करता हूँ.मेरे लिए कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं है. इसलिए मैंने हर तरह का काम किया और तकदीर ने साथ दिया कि मैं आज हीरो बन गया.जीवम में मेहनत के साथ लक का होना जरुरी है. मैं सभी को धन्यवाद देता हूँ, जिन्होंने यहाँ तक पहुंचने में मेरी मदद की.‘‘

‘‘दिलमार’’ के अलावा राम गौड़ा ने कुछ फिल्में साइन की हैं.जिनमें ‘फ्रीडम एट मिड नाइट‘ (निर्देशक चंद्र मौली) और ‘ऑपरेशन खिलाड़ी‘ (निर्देशक संजीव कृष्णमूर्ति) फिल्मों का निर्माण टाइम फिल्म्स, एनएस स्टूडियो, ट्रिफ्लिक्स, निंजूर पिक्चर्स द्वारा किया जा रहा है. इन फिल्मों को हिंदी, कन्नड़, तमिल और तेलुगू भाषाओं में बनाया जाएगा.

राम गौड़ा आगे कहते है,‘‘ मैं चीता यज्ञनेश शेट्टी का धन्यवाद अदा करता हूँ, जिनके द्वारा यह फिल्में मिली और बॉलीवुड में भी इंट्री मिल गयी. इसके अलावा मैं प्रवीण शाह, सगुन वाघ, श्रीदेवी, रजत बेदी और टाइम वीडियो की पूरी टीम का आभारी हूं.’’

‘भारत में औरतों के काम करने पर कई तरह की पाबंदियां लगा दी जाती हैं’- ईशा कोप्पीकर‘

कॉलेज के दिनों में पॉकेट मनी के लिए मॉडलिंग की शुरूआत करने वाली ईशा कोप्पीकर आज की तारीख में मशहूर मॉडल, अभिनेत्री, बिजनेस वुमन व पोलीटीशियन हैं. वह सिर्फ हिंदी फिल्मों तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि दक्षिण भारत की फिल्मों में भी व्यस्त हैं. इतना ही नहीं ईशा कोप्पीकर की दक्षिण भाषी कई फिल्मों का बाद में हिंदी में रीमेके हुआ, जिसमें दूसरे कलाकारों ने अभिनय किया.

प्रस्तुत है ईशा कोप्पीकर से हुई बातचीत के खास अंश….

आप अभिनेत्री, मॉडल, पोलीटीशियन, अंत्रापन्योर, पत्नी व एक बेटी की मां हैं. इन सभी रूपों का निर्वाह आप कैसे करती हैं?

-मुझे कई बार लगता है कि एक दिन में सिर्फ 24 घंटे ही क्यों होते हैं. यदि कुछ ज्यादा घंटे होते तो मैं कुछ और भी कर लेती. लेकिन हर वक्त हर काम नही किया जाता. आपने मेरे कई रोल गिना दिए. मगर हर वक्त की अपनी प्राथमिकता होती है. मेरी राय में हर औरत का मां बनना जरुरी होता है. फिर काम को प्राथमिकता दी जानी चाहिए. जब काम आपके दरवाजे पर दस्तक देता है, तब वह महत्वपूर्ण हो जाता है.

जहां तक राजनीति से जुड़ने का सवाल हे तो बचपन से मेरे माता पिता ने मेरे अंदर लोगों की मदद करने की आदत डाली है. तो चाहूं या न चाहूं, जब भी कोई मदद मांगने आता है, तो उसकी मदद करने की हम पूरी कोशिश करते हैं.

मदद सिर्फ आर्थिक ही नहीं होती? कई तरह की मदद होती है.इसके लिए मुझे अथॉरिटी से संपर्क करने व उनसे लोगों का काम करवाने के लिए एक राह चाहिए थी. मेरी समझ में आया कि राजनीति से जुड़कर काम करें, तो आसान हो जाता है. अथॉरिटी हर जगह मायने रखती है. इसीलिए राजनीति से जुड़ी अन्यथा राजनीति का हिस्सा न बनती. तो फिलहाल मैं भारतीय जनता पार्टी की ट्रांसपोर्ट विंग की अध्यक्ष हूं.

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फिलहाल मैंने चुनाव लड़ने के बारे में नहीं सोचा है. मगर आने वाले वक्त में क्या होगा, कह नहीं सकती. जहां तक अंत्राप्रिन्योर का सवाल है, तो मैने अपना स्टार्टअप’ शुरू किया है और अपने बचपन के मित्र के साथ मिलकर ‘क्लाउड किचन‘ खोला है. हम भोजन की होम डिलीवरी भी करते हैं. इसे खोलने की मुख्य वजह यह है कि मुझे खाना बहुत पसंद है. मगर अभिनेत्री होने के नाते मुझे अपने आप पर काफी कंट्ोल करना पड़ता है. तो मैने सोचा कि मैं खुद नहीं खा सकती, तो कम से कम दूसरों को तो खिलाउं. इसी सोच के साथ ‘क्लाउड किचन’ की शुरूआत की, जहां बहुत बेहतरीन खाना मिलता है.

जब मैं शूटिंग करती हूं, उस वक्त मेरे मित्र सरदार जी ही ‘क्लाउड किचन’ का सारा काम संभालते हैं. मैं संयुक्त परिवार मे रहती हूं, इसके चलते मुझे घर पर काफी अच्छी मदद मिल जाती है. मेरे पति टिम्मी नारंग भी काफी सपोर्टिब हैं. वह होटेलियर हैं. जब मुझे षूटिंग के सिलसिले में या फिल्म व वेब सीरीज के प्रमोषन के लिए घर से बाहर जाना होता है, तब मेरे पति अपने आफिस से जल्दी घर आकर घर संभालते हैं. वह कई बार अपने आफिस का काम घर से भी करते हैं. तो ईष्वर सब कुछ मैनेज कर ही देता है. तो मैं यह सारे रोल निभा लेती हूं.

क्या आप खुद को मल्टीटास्किंग वुमनमानती हैं?

-मुझे लगता है कि हर औरत मल्टी टास्किंग होती है. आपने देखा होगा कि हर देवी के दस हाथ होते हैं, उसी तरह हर औरत एक साथ दस तरह की जिम्मेदारियां बड़ी कुशलता से निभा लेती है. हर औरत खुद को पूरी पारिवारिक जिम्मेदारी व काम को निभाते हुए अच्छे से मैनेज करना जानती है. औरतें घर को सुचारू रूप से चलाते हुए काम भी कर लेती हैं.

लेकिन भारत देश में परिवार की जिम्मेदारी निभाते हुए काम करने वाली औरतों की संख्या काफी कम है?

-ऐसा नही है.हमारे देष में ढेर सारी औरतें ऐसी हैं, जो कि घर से निकलकर काम करना चाहती हैं, पर उन्हें मौके नहीं दिए जाते.उन पर रोक लगायी जाती है. कुछ औरतें पारिवारिक जिम्मेदारी के चलते नही कर पाती हैं. परिवार के सदस्यों या पति से उन्हे इजाजत नहीं मिलती. मैं तमाम औरतों को जानती हूं जो कि काम करना चाहती हैं, पर उन पर कई तरह की पाबंदियां लगा दी गयी हैं. हां! कुछ ऐसी औरतें भी हैं, जो खुद को घर तक ही सीमित रखना चाहती हैं. वह कोई काम नहीं करना चाहती. तो जो नहीं करना चाहती, उनकी अपनी मर्जी है. मैं उनके लिए क्या कह सकती हूं.

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आप ऐसी औरतों को काम करने के लिए प्रेरित कर सकती हैं?

-मेरा मानना है कि जिन्हें कुछ काम करना है, उन्हें प्रेरणा की जरुरत नहीं पड़ती. लगभग सभी काम करने वाली औरतें सेल्फ मोटीवेटेड होती हैं. जो सेल्फ मोटीवेटेड नहीं होती, जिन्हे कहने की जरुरत पड़ती है, वह ज्यादा समय तक टिक नहीं पाती. बहुत जल्दी उनका धैर्य जवाब दे देता है. इसलिए हर औरत का सेल्फ मोटीवेटेड होना जरुरी है. अगर आपके अंदर कुछ करने का जुनून है, तो जरुर करेंगे. यहां तक पहुंचने के लिए मुझे किसी ने भी मोटीवेट नहीं किया था. मैं खुद ही मोटीवेट हुई और यहां तक पहुंची हूं. मेरे लिए तो स्काय इज लिमिट.

आप सेल्फ मोटीवेट कैसे हुई थीं?

-मैं बचपन से ही अभिनेत्री स्व.श्री देवी जी की बहुत बड़ी फैन रही हूं. मैं स्कूल के दिनों से ही फिल्मी थी. काफी फिल्में देखती थी. स्कूल में हर तरह की सांस्कृतिक गतिविधि में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेती थी. फिर एक दिन पॉकेट मनी के लिए मैने मॉडलिंग करनी शुरू की. उन दिनों माना जाता था कि एक सफल मॉडल अच्छा कलाकार नहीं हो सकता. मगर मेरे बारे में लोगों ने कहना शुरू किया कि यह मॉडल तो अभिनय भी करती है. तो मैने धीरे धीरे म्यूजिक वीडियो करने शुरू किए. फिर 1998 में दक्षिण भारत में ‘चंद्रलेखा’ तेलगू फिल्म में अभिनय किया.

उसी वर्ष मुझे हिंदी फिल्म ‘एक था दिल एक थी धड़कन’ में अभिनय करने का अवसर मिला, जिसके लिए मुझे फिल्मफेअर पुरस्कार का नोमीनेशन भी मिला था. इस तरह अभिनय का कैरियर आगे बढ़ा. आज भी अभिनय कर रही हूं. फिर धीरे धीरे दूसरे कामों से भी जुड़ी.

इन दिनों लगभग हर कलाकार म्यूजिक वीडियो कर रहा है, पर आपने म्यूजिक वीडियो उस दौर में किए थे, जब कलाकार म्यूजिक वीडियो से दूरी बनाकर रखते थे. उस वक्त किस तरह की प्रतिक्रियाएं मिली थीं?

-मुझे गाइड करने वाला कोई नहीं था. मैं लोगों की प्रतिक्रियाओं पर ध्यान देने की बनिस्बत सिर्फ काम करती गयी. मेरे दिल ने जो सही कहा, वह कर लिया. मैंने कभी यह नहीं सोचा कि लोग क्या कहेंगे? मैंने कभी यह नहीं सोचा कि इसे करने से क्या फायदा या क्या नुकसान होगा? मैं आज भी नहीं जानती कि मैंने क्या सही किया या क्या गलत किया.

मेरे परिवार में व आस पास सभी डाक्टर, सीए, इंजीनियर आदि ही हैं. मैं अपने परिवार व रिष्तेदारों में अकेली ऐसी हूं, जो कि इस अभिनय जगत से जुड़ी हूं. फिल्म इंडस्ट्ी में कदम रखने वाली अपने परिवार की पहली लड़की हूं. मेरे घर में ऐसा कोई था ही नहीं, जो मुझे गाइड करता. मैने सिर्फ अपने दिल की सुनी.

मेरे माता पिता कहते थे कि अगर हमने तुम्हे गाइड किया और निशाना गलत लग गया, तब? इसलिए अपनी गलतियों, अपने अनुभवों से खुद ही सीखो. सारे निर्णय खुद ही लो.

वेब सीरीज ‘दहानम’ क्या है?

-काफी रोचक कहानी है.इसमें कई रिष्ते आपस में गुंथे हुए हैं. ढेर सरा खून खराबा है. राजनीति है. मजबूरी में विष्वासघात भी है. रोंगटे खड़े कर देने वाले दृष्य भी हैं. जिसमें मैने पुलिस अफसर का किरदार निभाया है.

यह हिंदी व तेलगू में हैं. मैने हिंदी में अपने संवाद डब किए हैं. दूसरी भाषा में दूसरे कलाकार ने मेरे संवाद डब किए हैं. इतना ही नहीं तेलगू में यह मेरी पहली वेब सीरीज है. इसके पहले सीजन में मेरा सिर्फ इंट्रोडक्शन है.

दूसरे सीजन में लोग मुझे सही रूप में देख सकेंगें. वैसे शुरू से अंत तक में इस सीरीज की सूत्रधार हूं. इसके हर एपिसोड का एक किरदार हीरो है.

आप अब तक कई बार पुलिस अफसर बन चुकी हैं. दहानमकी पुलिस अफसर किस तरह अलग है?

-अब तक लोगों ने मुझे पुलिस अफसर के किरदार में जितना देखा है, वह सभी कॉमेडी वाले पुलिस अफसर थे. सिच्युएशनल कॉमेडी फिल्म ‘क्या कूल हैं हम’ में मेरा सिच्युएशन कॉमिक किरदार था. वेब सीरीज ‘फिक्सर’ में भी कॉमेडी की थी. मगर ‘दहानम’ में कॉमेडी के लिए कोई जगह नहीं है. इसमें काफी खून खराबा व एक्शन है.

इसमे मेरा किरदार बहुत शांत स्वभाव का है. पुलिस अफसर के रूप में उसका फ्रस्ट्रेशन है कि राजनीतिक दबाव के चलते वह जो कुछ करना चाहती है, वह सब कर नहीं पा रही है.

तो कोई दूसरी फिल्म भी कर रही हैं?

-जी हां! मैंने तमिल भाषा में एक साइंस फिक्शन फिल्म ‘अयालान’ की है, जो कि हिंदी के अलावा तेलगू , मलयालम, कन्नड़ व अंग्रेजी में डब की गयी है. यह एलियन पर है. बहुत ही बेहतरीन वेब सीरीज है. इसमें मेरे साथ रकुल प्रीत सिंह, शरद केलकर हैं. यह बहुत बड़े बजट की है. हिंदी में ‘‘अस्सी नब्बे पूरे सौ’’ की है. इसके अलावा दो वेब सीरीज कर रही हूं.

सत्यकथा: गुनाह बन गया भूला-बिसरा प्यार

12 जनवरी, 2022 सुबह के करीब 11 बजे का वक्त था. जबलपुर जिले के चरगवां पुलिस थाने के टीआई विनोद पाठक बाहर धूप में बैठे टेबल पर रखी कुछ फाइलें उलटपलट कर देख रहे थे, तभी उन के मोबाइल पर बजी घंटी ने उन का ध्यान फाइलों से हटा दिया. जैसे ही काल रिसीव की, दूसरी तरफ से आवाज आई, ‘‘सर मैं घुघरी गांव का सरपंच राजाराम करपेती बोल रहा हूं.‘‘

‘‘हां सरपंचजी, बोलिए आज कैसे फोन किया?’’ टीआई ने कहा.

‘‘सर सुबह गांव के कुछ लोगों ने घुघरी कैनाल में एक लाश तैरती देखी है. आप पुलिस टीम ले कर जल्दी गांव आ जाइए, गांव में दहशत का माहौल है.’’

‘‘ठीक है सरपंचजी, चिंता मत कीजिए, मैं जल्द ही वहां पहुंच रहा हूं.’’ टीआई विनोद पाठक ने सरपंच से कहा और घटना की जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों को देने के बाद पुलिस टीम के साथ वे घटनास्थल की ओर रवाना हो गए.

जबलपुर जिले का चरगवां पुलिस थाना क्षेत्र नरसिंहपुर जिले की सीमा से लगा हुआ है. पूरे इलाके में नर्मदा नदी पर बने वरगी डैम का पानी नहर (कैनाल) के माध्यम से खेतों में जाता है, जिस से सिंचाई का काम होता है.

चरगवां से करीब 10 किलोमीटर दूर घुघरी गांव में कुछ ही देर में पुलिस टीम घटनास्थल पर पहुंच चुकी थी. घुघरी कैनाल में जहां लाश तैर रही थी, वहां नहर के दूसरी तरफ सोमती गांव है.

नहर पार करने के लिए एक पुल बना हुआ था, जिस पर रैलिंग नहीं थी. पुलिस का अंदाजा था कि हो सकता है कि किसी दुर्घटना की वजह से कोई नहर में गिर गया होगा.

सरपंच और गांव वालों की मदद से काफी मशक्कत के बाद पानी में तैरती लाश रस्सी से बांध कर बाहर निकाला गया. तब तक बरगी जबलपुर की सीएसपी अपूर्वा किलेदार और फोरैंसिक टीम की डा. नीता जैन भी वहां पर पहुंच चुकी थीं. लाश काफी फूल चुकी थी.

मृतक के गले में एक मफलर लिपटा मिला था. मृतक काली पैंट, चैक वाली शर्ट और नीले रंग की जरकिन और पांव में जूते पहने हुए था. गले में लिपटे मफलर को हटाने पर मफलर के निशान साफ दिखाई दे रहे थे.

वहां मौजूद लोगों में से कोई भी लाश की शिनाख्त नहीं कर पाया था. तब पुलिस ने मृतक की शिनाख्त के लिए सोशल मीडिया पर उस की फोटो प्रचारित कर दी. वायरल हुई फोटो के आधार पर ही कुछ ही घंटों में पुलिस को पता चल गया कि नहर में मिली लाश जबलपुर के गोरखपुर थाना क्षेत्र के कैलाशपुरी में रहने वाले 41 साल के संदीप वगारे की है.

पुलिस की जांच में पता चला कि संदीप 9 जनवरी, 2022 की शाम करीब 7 बजे से अपने घर से निकला था, जिस की तलाश उस के घर के लोगों द्वारा की जा रही थी.

सूचना पा कर संदीप वगारे के घर वाले मौके पर पहुंच गए और उन्होंने लाश की शिनाख्त संदीप वगारे के रूप में कर ली. उस के बाद पुलिस ने लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी.

2 दिन बाद आई पोस्टमार्टम रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ कि संदीप की गला घोट कर हत्या कर उसे नहर में फेंका गया था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिलने के बाद पुलिस ने अज्ञात के खिलाफ संदीप वगारे की हत्या कर लाश छिपाने का मामला दर्ज कर लिया.

जबलपुर जिले के एसपी सिद्धार्थ बहुगुणा, एडीशनल एसपी शिवेश सिंह बघेल और सीएसपी अपूर्वा किलेदार के निर्देश पर टीआई विनोद पाठक के नेतृत्व में थाना पुलिस और क्राइम ब्रांच की संयुक्त टीम गठित की गई.

टीम में एएसआई एस.आर. पटेल, उषा गुप्ता, हैडकांस्टेबल प्रदीप पटेल, कांस्टेबल रोशनलाल, लेडी कांस्टेबल भारती, क्राइम ब्रांच के एसआई राम सनेही शर्मा, हैडकांस्टेबल अरविंद श्रीवास्तव, साइबर सेल के अमित पटेल आदि को शामिल किया गया.

पुलिस के लिए संदीप वगारे की हत्या की गुत्थी सुलझाना किसी चुनौती से कम नहीं था. संदीप के घर वालों से पूछताछ में पता चला कि वह शराब पीने का आदी था. इसी वजह से कुछ महीने पहले उस की पत्नी उसे छोड़ कर मायके चली गई थी.

संदीप का मोबाइल भी घटनास्थल पर नहीं मिला था. पुलिस टीम ने उस के घर वालों से उस का मोबाइल नंबर ले कर काल डिटेल्स निकलवाई. काल डिटेल्स में पता चला कि उस की आखिरी बात 9 जनवरी, 2022 को शाम करीब 6 बजे किसी लक्ष्मी शिवहरे से हुई थी.

पुलिस लक्ष्मी शिवहरे तक पहुंच गई. 44 साल की लक्ष्मी शिवहरे नाम की महिला मूलरूप से मध्यप्रदेश के सिवनी जिले के धूमा की रहने वाली थी, जो अपने पति शरद शिवहरे के साथ जबलपुर की हाथीताल कालोनी में रहती थी.

पुलिस ने जब लक्ष्मी से संदीप वगारे के संबंध में पूछताछ की तो पहले तो वह पूरे घटनाक्रम से अंजान बनी रही. बाद में महिला पुलिसकर्मियों ने उस से सख्ती से पूछताछ की तो संदीप के मर्डर की गुत्थी सुलझती चली गई.

लक्ष्मी ने पुलिस को बताया कि उस ने अपनी बहन के बेटे कपिल राय के द्वारा संदीप की हत्या कराई थी.

अब पुलिस टीम कपिल राय की खोज में जी जान से जुट गई. लक्ष्मी की बड़ी बहन का विवाह कंदेली नरसिंहपुर के संतोष राय से हुआ था. कपिल राय उन्हीं का बेटा था. पुलिस ने कपिल को भी हिरासत में ले लिया. उस ने पूछताछ में बताया कि मौसी लक्ष्मी के कहने पर ही उस ने वारदात को अंजाम दिया था.

कपिल राय और लक्ष्मी के इकबालिया बयान के आधार पर संदीप वगारे की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह शादी के पहले के प्रेम प्रसंग से जुड़ी निकली, जो इस प्रकार है—

लक्ष्मी शिवहरे का परिवार मध्य प्रदेश के शहर जबलपुर के गुप्तेश्वर इलाके में रहता था. 2 बहनों में सब से छोटी लक्ष्मी तीखे नाकनक्श की खूबसूरत लड़की थी. स्कूल की पढ़ाई के दौरान ही लक्ष्मी अपने मोहलले में रहने वाले संदीप वागरे को दिल दे बैठी.

संदीप के पिता उस समय जबलपुर कलेक्ट्रेट में सरकारी मुलाजिम थे. संदीप और लक्ष्मी का प्यार परवान चढ़ रहा था. वह अकसर स्कूल की क्लास बंक कर के शहर के पार्क में घूमने निकल जाते. दोनों शादी करना चाहते थे, मगर जाति की दीवार उन की शादी के रास्ते में सब से बड़ी रुकावट थी.

एक दिन जबलपुर के रौक गार्डन में दोनों भविष्य के सपने बुन रहे थे. संदीप की बाहों में बाहें डाले लक्ष्मी बोली, ‘‘मेरे घर वाले शादी के लिए लड़का देखने लगे हैं, मगर मैं तो तुम्हें चाहती हूं.’’

‘‘लक्ष्मी, मैं भी तुम्हारे बिना जी नहीं सकता. यदि घर वाले हमारी शादी के लिए राजी नहीं हुए तो हम दोनों घर से भाग कर शादी कर लेंगे.’’ प्यार के रंग में डूबे संदीप ने लक्ष्मी से कहा.

‘‘नहीं संदीप, इस से परिवार की बदनामी होगी, थोड़ा इंतजार करो हो सकता है हम घर वालों को राजी कर लें.’’ लक्ष्मी ने दिलासा दी.

संदीप और लक्ष्मी को जब भी मौका मिलता, वे एकांत में घूमतेफिरते. उन्होंने शहर के फोटो स्टूडियो जा कर एकदूसरे की बाहों में बाहें डाल कर जो फोटो खिंचवाई थी, वह संदीप के पर्स में हमेशा रहती थी.

जब लक्ष्मी के घर वालों को दोनों के प्रेम प्रसंग का पता चला तो समाज में बदनामी के डर से उन्होंने जुलाई 2006 में लक्ष्मी की शादी मध्य प्रदेश के सिवनी जिले के धूमा में शरद शिवहरे से कर दी.

शरद ने उस समय धूमा में ठेकेदारी का काम शुरू किया था. लक्ष्मी की शादी होते ही वह ससुराल में रहने लगी, मगर संदीप जुदाई के गम में शराब पीने लगा. संदीप पेशे से पेंटर था. वह शहर में बनने वाले मकानों में पुट्टी और पुताई करने का काम करता था. अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा वह शराबखोरी में खर्च कर देता था.

जब भी लक्ष्मी अपने मायके जबलपुर आती, संदीप उस से मिलने की कोशिश करता तो लक्ष्मी उसे समझा कर कहती, ‘‘देखो संदीप, शादी के पहले जो भी हुआ उसे भूल कर तुम भी शादी कर के अपना घर बसा लो.’’

मगर संदीप तो लक्ष्मी को भूलने तैयार नहीं था. संदीप के सिर पर तो प्यार का नशा चढ़ कर बोल रहा था. संदीप के मातापिता ने यह सोच कर उस की शादी बालाघाट जिले में कर दी कि धीरेधीरे वह लक्ष्मी को भूल कर अपनी नई जिंदगी शुरू कर देगा.

संदीप की शादी के बाद भी उस की शराब पीने की आदत नहीं छूटी, जिस का नतीजा यह हुआ कि उस की पत्नी उसे छोड़ कर मायके चली गई.

वक्त गुजरने के साथ लक्ष्मी एक बेटे और एक बेटी की मां बन चुकी थी. अपनी मेहनत के बलबूते लक्ष्मी का पति अब माइनिंग क्षेत्र का नामी ठेकेदार बन चुका था. लक्ष्मी के पति शरद शिवहरे के पास हाईक्लास एक्सप्लोजन का लाइसैंस था. वह बड़ीबड़ी पहाडि़यों पर विस्फोटक लगा कर ब्लास्टिंग कर के अच्छीखासी आमदनी कर लेता था.

2020 में शरद अपनी पत्नी लक्ष्मी और बच्चों के साथ धूमा से आ कर जबलपुर के हाथीताल इलाके में रहने लगा था. उन का जीवन खुशहाल चल रहा था, लेकिन इस बीच लक्ष्मी के पूर्वप्रेमी संदीप वगारे को लक्ष्मी के जबलपुर आने की भनक लग गई.

हाथीताल में संदीप वगारे उस के घर के आसपास मंडराने लगा. वह अकसर पति की गैरमौजूदगी में आ कर लक्ष्मी से मिलनेजुलने लगा. पहले प्यार का नशा संदीप पर इस कदर छाया हुआ था कि आज भी वह लक्ष्मी की एक झलक पाने बेताब था.

संदीप जब भी लक्ष्मी से मिलता एक ही बात की रट लगा कर कहता, ‘‘लक्ष्मी, मैं 16 साल के बाद भी तुम्हें भुला नहीं पाया हूं.’’

इस बात को ले कर लक्ष्मी परेशान रहने लगी. लक्ष्मी भी उसे झूठमूठ की दिलासा दे कर कहती, ‘‘मेरे मनमंदिर में तो तुम्हारे नाम का ही दीया जल रहा है. मगर अपने बच्चों की खातिर अब मैं अपना परिवार नहीं छोड़ सकती.’’

संदीप उस से नजदीकियां बनाने की कोशिश करता, मगर लक्ष्मी उस से दूरी बनाने में ही अपनी भलाई समझती. संदीप अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा था. लक्ष्मी से मिल कर उस का पुराना प्रेम फिर से कुलांचे भरने लगा था.

एक दिन संदीप ने एक फोटो दिखा कर धमकी देते हुए कहा, ‘‘अगर तुम ने मेरी बात नहीं मानी तो ये फोटो मैं सोशल मीडिया पर वायरल कर तुम्हें बदनाम कर दूंगा.’’

लक्ष्मी ने गौर से उस फोटो को देखा तो उसे याद आ गया कि यह वही फोटो है जिसे शादी के पहले उस ने संदीप के गले में हाथ डाल कर जबलपुर के फोटो स्टूडियो में खिंचाया था.

फोटो देख कर लक्ष्मी बुरी तरह डर गई थी. उस ने संदीप से मिन्नतें करते हुए कहा, ‘‘प्लीज संदीप तुम्हें मेरे प्यार का वास्ता, ये फोटो तुम किसी को नहीं दिखाना.’’

संदीप के हाथ जब से लक्ष्मी ने अपने प्यार की फोटो देखी थी, तभी से उस का हर लम्हा डर और दहशत के साए में बीतने लगा था. लक्ष्मी को लगा कि यदि उस के पति शरद को पता चल गया तो उस की तो बसीबसाई गृहस्थी पलभर में ही रेत के महल की तरह बरबाद हो जाएगी.

उस ने कई बार संदीप को समझाने की कोशिश भी की, मगर संदीप उस का पीछा छोड़ने तैयार नहीं था.

चूंकि संदीप की पत्नी उसे छोड़ कर चली गई थी, वह अकसर लक्ष्मी का पीछा करता. उस के घर के सामने खड़ा हो जाता. उस के घर में घुसने का प्रयास करता था. जब लक्ष्मी संदीप की हरकतों से परेशान हो गई तो इस बात की जानकारी उस ने नरसिंहपुर में रहने वाली अपनी बड़ी बहन को दे दी.

लक्ष्मी की समस्या हल करने के लिए बड़ी बहन ने यह सोच कर अपने बेटे कपिल को लक्ष्मी के पास भेज दिया कि कपिल संदीप को डराधमका कर मामले को शांत करा देगा.

नरसिंहपुर के गांधी वार्ड कंदेली में रहने वाला 25 साल का कपिल ड्राइवर होने के साथसाथ शातिर बदमाश था.

7 जनवरी, 2022 को कपिल जैसे ही अपनी मौसी के घर हाथीताल, जबलपुर पहुंचा तो लक्ष्मी ने संदीप की हरकतों से परेशान रहने की दास्तान सुनाते कहा, ‘‘कपिल, संदीप ने मेरा जीना मुश्किल कर दिया है. किसी भी तरह इसे मेरे रास्ते से हटा दो. यदि तुम्हारे मौसाजी को ये सब पता चल गया तो मैं किसी को मुंह दिखाने के काबिल नहीं रहूंगी.’’

‘‘मौसी तुम चिंता मत करो, मैं हूं न. मैं उसे हमेशा के लिए आप के रास्ते से हटा दूंगा.’’ कपिल ने मौसी को भरोसा दिलाते हुए कहा.

पति शरद अपने काम के सिलसिले में घर से बाहर फील्ड पर रहता तो रात 9 बजे के बाद ही घर आता था. इसी समय मौसी के साथ मिल कर कपिल राय संदीप की हत्या की प्लानिंग बनाता.

कपिल राय भी अपने नाना के घर गुप्तेश्वर, जबलपुर आताजाता रहता था, इसलिए संदीप को वह अच्छी तरह से जानता था. कपिल उसे मामा कह कर बुलाता था. उसे पता था कि संदीप शराब का शौकीन है. कपिल ने मौसी को बताया कि उसे शराब पिला कर ही ठिकाने लगाना बेहतर होगा.

योजना के मुताबिक, 9 जनवरी को कपिल ने मौसी लक्ष्मी के मोबाइल से संदीप को काल कर के कहा, ‘‘हैलो मामा मैं कपिल बोल रहा हूं, नरसिंहपुर से आज ही मौसी के पास जबलपुर आया हूं. सोचा आज मामा के साथ महफिल जमा लूं.’’

इस तरह शराब पीने का न्यौता मिलने से संदीप की बांछे खिल उठीं. उस ने कपिल को सहमति देते हुए पूछा, ‘‘कहां पर आना है कपिल.’’

‘‘मामा कृपाल चौक आ जाओ. मैं स्कूटी ले कर आता हूं,’’ कपिल बोला.

शराब संदीप की बहुत बड़ी कमजोरी थी, वह शाम 7 बजे कपिल के बताए स्थान कृपाल चौक चला आया. कपिल अपनी मौसी की स्कूटी ले कर उसी का इंतजार कर रहा था. कपिल वहां से संदीप को ले कर तिलवारा के रास्ते चरगवां ले गया.

तब तक रात का अंधेरा हो चुका था, रास्ते में दोनों ने शराब पी कर इधरउधर की बातें की. कपिल ने बड़ी चालाकी से संदीप वगारे को अधिक शराब पिला दी.

जब वह नशे में धुत हो गया तो उसे बरगी कैनाल पर बने घुघरी सोमती पुल के ऊपर ले जा कर अपने मफलर से

संदीप का गला घोट दिया. थोड़ी ही देर में नशे में धुत संदीप की मौत हो गई.

कपिल शातिरदिमाग था, उस ने पहचान छिपाने के उद्देश्य से संदीप की जेब से उस का मोबाइल फोन और पर्स निकाल कर अपने पास रख लिया और अंधेरे का फायदा उठा कर संदीप को पुल के ऊपर से नहर में फेंक दिया.

घटना को अंजाम दे कर वह स्कूटी ले कर लक्ष्मी मौसी के घर आ गया. मौसी को पूरे घटनाक्रम की जानकारी दे कर वह अपने घर नरसिंहपुर चला गया.

एडीशनल एसपी शिवेश सिंह बघेल ने प्रैस कौन्फ्रैंस कर मामले का खुलासा कर मीडिया को जानकारी दी. संदीप की हत्या के आरोप में लक्ष्मी और कपिल को गिरफ्तार कर उन्हें कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

पुलिस ने संदीप व लक्ष्मी की निशानदेही पर संदीप का मोबाइल फोन, पर्स और वारदात में प्रयुक्त उस की स्कूटी को जब्त कर ली.

केस की जांच टीआई विनोद पाठक कर रहे थे.

—कथा पुलिस सूत्रों और मीडिया रिपोर्ट पर आधारित

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