गिरफ्त: भाग 3- क्या सुशांत को आजाद करा पाई शोभा

Writer- Dr. Kshama Chaturvedi

‘‘मनीषा, यह है शोभा, बहुत खयाल रखती है मेरा, बेंगलुरु जैसे शहर में एक तरह से इस पर ही निर्भर हो गया हूं मैं.’’

‘‘हांहां, अंदर तो चलो,’’ शोभा कह रही थी. अंदर सीधे वह डाइनिंग टेबल पर ही ले गई. कौफीनाश्ता तैयार था. शोभा ने बातचीत भी शुरू की, ‘‘मनीषा, असल में सुशांत काफी परेशान थे कि तुम्हें कैसे मना करें शादी के लिए, क्योंकि तैयारी तो सब हो चुकी होगी, पर अभी शादी के लिए सुशांत खुद को तैयार नहीं कर पा रहे थे. तो मैं ने ही इन से कहा कि तुम मनीषा से बात कर लो, वह सुलझी हुई लड़की है. तुम्हारी प्रौब्लम जरूर समझेगी. असल में ये तुम्हारी सारी बातें मुझे बताते रहते थे तो मैं भी तुम्हारे बारे में बहुत कुछ जान गई थी,’’ कह कर शोभा थोड़ी मुसकराई.

मनीषा समझ नहीं पा रही थी कि क्या करे, बड़ी मुश्किल से उस ने खुद को संभाला और फिर बोली, ‘‘शोभाजी, मैं बस 2 दिनों के लिए आई हूं और अपनी एक फ्रैंड के यहां रुकी हूं. मैं चाहती हूं कि मैं और सुशांत बाहर जा कर कुछ बात कर लें, अगर आप चाहें तो.’’

‘‘हांहां, क्यों नहीं, खाना खा कर जाना, खाना तैयार है.’’ फिर शोभा ने सुशांत की तरफ देखा था, ‘‘तुम्हारी पसंद की चिकनबिरयानी बनाई है, अगर मनीषा को नौनवेज से परहेज हो तो कुछ और…’’

‘‘नहींनहीं, हम लोग बाहर ही खा लेंगे, चलते हैं,’’ कह कर मनीषा उठ गई तो सुशांत को भी खड़ा होना पड़ा. उधर, मनीषा सोच रही थी कि सुशांत तो कहता था कि वह तो नौनवेज खाता ही नहीं है, फिर… पर हां, यह तो समझ में आ ही गया कि अच्छा खाना खिला कर सुशांत को फुसलाया जा रहा है.

शोभा का मुंह उतर गया था, पर मनीषा सुशांत को ले कर बाहर आ गई. ‘‘कहां चलें?’’ सुशांत ने मनीषा से पूछा.

‘‘कहीं भी, तुम तो इतने समय से बेंगलुरु में रह रहे हो, तुम्हें तो पता ही होगा कि कहां अच्छे रैस्तरां हैं. वैसे, अभी मुझे खाने की कोई इच्छा नहीं है, इसलिए पहले कहीं गार्डन में बैठते हैं.’’

कुछ देर पास में बगीचे में पड़ी बैंच पर ही दोनों बैठ गए.

मनीषा ने ही बात शुरू की, ‘‘हां, अब बताओ, क्या कह रहे थे तुम शोभाजी के बारे में.’’

फिर सुशांत ने जो कुछ बताया, मनीषा चुपचाप सुनती रही. पता चला कि शोभा के पति विदेश में हैं. यहां वह अपने 2 बच्चों के साथ रह रही है. बच्चे पढ़ रहे हैं. सुशांत से शोभाजी को बहुत सहारा है. सुशांत उस की आर्थिक मदद भी कर रहा है. बातों ही बातों में मनीषा समझ गई थी कि सुशांत से काफी पैसा शोभाजी ने उधार भी ले रखा है. इसलिए सोच रही होगी कि ऐसे मुरगे को आसानी से कैसे जाने दें.

‘‘बहुत खयाल रखती है शोभा मेरा,’’ सुशांत बारबार यही कह रहा था.

‘‘देखो सुशांत, हो सकता कि शोभाजी जैसा बढि़या खाना मैं तुम्हें बना कर न खिला सकूं, पर फिर भी कोशिश करूंगी.’’  मनीषा ने मजाक किया तो सुशांत चौंक गया, ‘‘नहीं, यह बात नहीं है,’’ सुशांत ने सकुचाते हुए कहा, ‘‘पुणे वाली जौब के लिए अप्लाई कर दिया था न तुम ने?’’

‘‘वह…मैं कर ही रहा था पर शोभा ने मना कर दिया कि अभी रहने दो.’’

‘‘हां, क्योंकि अभी शोभाजी को तुम्हारी जरूरत है,’’ न चाहते हुए भी मनीषा के मुंह से निकल ही गया. सुशांत अवाक था.

उधर, मनीषा कहे जा रही थी, ‘‘ठीक है, जैसी तुम्हारी इच्छा, पर एक बात जरूर कहूंगी कि शोभाजी कभी भी तुम्हें बेंगलुरु से बाहर नहीं जाने देंगी, क्योंकि तुम जरूरत हो उन की. तुम्हारा इतना पैसा उन के बच्चों की पढ़ाई पर लगा है. अब तुम्हें जो करना है करो. अगर सोच सको तो शोभाजी के बारे में न सोच कर अपना हित सोचो. शोभाजी क्या, उन्हें और पेइंगगैस्ट मिल जाएंगे. बेंगलुरु में तो ऐसे बहुत लोग होंगे.’’

सुशांत एकदम चुप था.

‘‘चलो, अब खाना खाते हैं, फिर मुझे मेरी फ्रैंड के यहां छोड़ देना,’’ मनीषा ने बात खत्म की.

‘‘अभी तो तुम रुकोगी?’’

‘‘हां, कल शाम को मिलते हैं, फिर रात को मेरी फ्लाइट है, बस जो कुछ मैं ने कहा है, उस पर विचार करना. अब तक मनीषा ने अपनेआप को काफी संयत कर लिया था. उसे जो कहना था कह दिया. अब सुशांत जो चाहे करे पर वह इतना कमजोर इंसान होगा, इस की उस ने कल्पना नहीं की थी.’’

दूसरे दिन सुशांत सुबह ही उसे लेने आ गया था, ‘‘मैं तो रातभर सो ही नहीं पाया मनीषा, और आज औफिस से मैं ने छुट्टी ले ली है. आज पूरा दिन मैं तुम्हारे साथ ही बिताऊंगा और हां, रात को ही पुणे की पोस्ट के लिए भी मैं ने अप्लाई कर दिया है.’’

उस की बातें सुन कर मनीषा भी आश्चर्यचकित थी.

फिर रास्ते में ही सुशांत ने कहा, ‘‘मैं रातभर तुम्हारी बातों पर ही विचार करता रहा. शायद तुम ठीक ही कह रही हो. मैं आज मां से भी बात करता हूं. शादी की तारीख वही रहने दो…’’

‘‘नहीं सुशांत,’’ मनीषा ने उसे रोक दिया.

‘‘इतनी जल्दी भी नहीं है. तुम खूब सोचो और पुणे जा कर फिर मुझ से बात करना, अभी तो मैं भी शादी की डेट आगे बढ़ा रही हूं. जब तुम अपने भविष्य के बारे में सुनिश्चित हो जाओ, तभी हम बात करेंगे शादी की.’’

‘‘पर मनीषा…मैं…’’

‘‘हां, हम बात तो करते रहेंगे न, आखिर दोस्त तो हम हैं ही. कुछ जरूरत हो तो पूछ लेना मुझ से.’’

पूरा दिन सुशांत के साथ ही गुजरा, एअरपोर्ट पहुंच कर फिर उस ने कहा था, ‘‘तुम मेरा इंतजार तो करोगी न…’’

‘‘हां, क्यों नहीं…’’ कह कर मनीषा हंस पड़ी थी.

प्लेन के टेकऔफ करते ही वह अपनेआप को हलका महसूस कर रही थी. भविष्य में जो भी हो, पर फिलहाल शोभाजी की गिरफ्त से तो उस ने सुशांत को आजाद करा ही दिया.

फिल्म ‘जयेशभाई जोरदार’ का ट्रेलर हुआ रिलीज

बौलीवुड में अपने अतरंगी अंदाज के लिए एक अलग पहचान रखने वाले अभिनेता रणवीर सिंह अपने कैरियर की पहली फिल्म ‘‘बेंड बाजा बारात’’ से लेकर अब तक विविध विषयों पर फिल्में करते आए हैं. उनकी हर फिल्म में समाज से जुड़ा कोई न कोई मुद्दा भी अंडर करंट में रहा है.

लेकिन पहली बार रणवीर सिंह गुजरात की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म ‘‘जयेश भाई जोरदार ’’में लिंग भेद व पितृसत्तात्मक सोच के विपरीत संदेश देते नजर आने वाले हैं. जिसका बहुप्रतीक्षित ट्रेलर ‘‘यशराज स्टूडियो’’ के ही स्टेज नंबर तीन पर रिलीज किया गया.

 

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क्या है ट्रेलर में…

ट्रेलर की शुरुआत गांव के सरपंच (बेामन ईरानी) से होती है जहां पर एक बच्ची सरपंच से गुहार लगा रही होती है. बच्ची सरपंच से कहती है, स्कूल के सामने लड़के शराब पीकर लड़कियों को परेशान करते है, तो आप शराब बंद कर दीजिए, इस पर सरपंच (बोमन ईरानी) कहते है- ‘‘प्रतिबंध तो साबुन पर लगना चाहिए. लड़कियां खुश्बूदार साबुन लगाकर लड़कों को भ्रष्ट करती हैं.

फिल्म के ट्रेलर से जो कहानी समझ में आती है, उसके अनुसार जयेशभाई के पिता (बोमन ईरानी) गांव के सरपंच हैं और उनके पिता के बाद जयेशभाई ही सरंपच बनने वाले हैं. मगर जयेशभाई के पिता को चिंता इस बात की है कि जयेशभाई के बाद सरंपच कौन बनेगा? वारिस कौन होगा? क्योकि जयेश भाई और उनकी पत्नी (शालिनी पांडे) की एक बेटी है. पर उनका अपना बेटा नही है और वारिस या सरपंच बेटी नहीं बेटा ही बनेगा.

बेटी लगभग नौ दस साल की हो चुकी है और अब जब पुनः जयेशभाई की पत्नी गर्भवती हुई है, तो जयेशभाई के पिता व मां (रत्ना पाठक शाह) को इस बार लड़का ही चाहिए. लेकिन गर्भ धारण करते ही जयेश के पिता लिंग परीक्षण करवाने का आदेश देते हैं. जैसे ही डाक्टर बताते हैं कि इस बार भी गर्भ में लड़की ही है, तो जयेश के पिता उसकी भ्रूण हत्या यानी कि गर्भपात कराने का आदेश देते हैं. ऐसा करने की बनिस्बत जयेश अपनी पत्नी व बेटी के साथ घर छोड़कर भागते हैं और उनके पीछे सरपंच के गुंडे पड़े हुए हैं. बाकी तो फिल्म देखने पर ही पता चलेगा.

फिल्म ‘जयेशभाई जोरदार’ का ट्रेलर इस बात की ओर इशारा करती है कि यह फिल्म लोगों को जहां हंसी के ठहाके लगाने पर मजबूर करेगी, वहीं रूलाएगी भी.

13 मई को प्रदर्शन के लिए तैयार फिल्म ‘‘जयेशभाई जोरदार’’ का निर्माण ‘यशराज फिल्मस’’के बैनर तले आदित्य चोपड़ा व मनीष शर्मा ने किया है. फिल्म के लेखक व निर्देशक दिव्यांग ठक्कर हैं. जबकि इसके कलाकार हैं- रणवीर सिंह, शालिनी पांडे, बोमन इरानी, रत्ना पाठक शाह व अन्य.

सत्यकथा: लव सेक्स और धोखे का खिलाड़ी- एक दिलचस्प क्राइम केस

लेखक-मुकेश तिवारी

पुलिस ने भी नहीं सोचा था कि मारपीट और धोखाधड़ी का मामला सीरियल मर्डर तक पहुंचेगा. जो हकीकत सामने आई, वह हैरान करने वाली थी, क्योंकि यह मामला एक दशक पहले हुई 4 हत्याओं का निकला.

कहते हैं कि अपराधी कितना भी शातिर क्यों न हो, एक न एक दिन कानून की गिरफ्त में आता जरूर है, हालांकि हत्या जैसा जघन्य अपराध जब भी कोई अपराधी करता है, तो निश्चित ही वह यही सोचता है कि उस ने जो अपराध किया है, उसे करते किसी ने देखा नहीं है, अत: वह साफ बच निकलेगा.

इस कहानी में आरोपी का अगला शिकार बनने वाली उस की दूसरी पत्नी के साहस ने उस की असलियत पुलिस के सामने ला दी. गजब के चतुर आरोपी ने इस सनसनीखेज हत्याकांड को कैसे अंजाम दिया, इस में कौनकौन शामिल रहा? उस का इरादा क्या था? इतने लंबे समय तक वह कैसे पुलिस को छकाता रहा? ऐसे तमाम सवालों के जवाब सिलसिलेवार विस्तार से जानते हैं.

इस की शुरुआत मारपीट की शिकायत से हुई. 14 मार्च, 2022 की दोपहर अनामिका नाम की एक महिला बदहवास हालत में ग्वालियर शहर के झांसी रोड थाने पहुंची. वह काफी घबराई हुई थी. थाने के गेट पर राइफल ले कर खड़े संतरी से जब उस ने थानाप्रभारी के बारे में पूछा तो संतरी ने उन के कक्ष की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘साहब अंदर बैठे हैं, आप चली जाइए.’’

अनामिका तेज कदमों से सीधे थानाप्रभारी के कक्ष में दाखिल हुई. उस वक्त थानाप्रभारी अपने मातहतों के साथ किसी अहम मसले पर चर्चा कर रहे थे. अनजान महिला को अपने कक्ष में आया देख कर उन्होंने उस से पूछा, ‘‘कहिए क्या काम है?’’

घबराई हुई अनामिका ने कहा, ‘‘साहब, मुझे अपने पति राजेंद्र यादव के जुर्म के संबंध में कुछ महत्त्वपूर्ण जानकारी मय दस्तावेज और फोटो के आप को देनी है और उस के खिलाफ रिपोर्ट भी दर्ज करवानी है.’’

थानाप्रभारी ने महिला को कुरसी पर बैठने का इशारा करते हुए कहा, ‘‘आप आराम से बैठ कर पूरी बात बताइए. आखिरकार आप के साथ क्या हुआ?’’

थानाप्रभारी के कहने पर अनामिका कुरसी पर बैठ गई, लेकिन पता नहीं क्यों, उस के मुंह से आवाज नहीं निकल रही थी. उस की जुबान सूख गई थी. उस की हालत देख कर थानाप्रभारी ने उसे पानी पिलवाया तो उस ने कहा, ‘‘साहब, मेरा नाम अनामिका है.’’

तसल्ली देते हुए थानाप्रभारी ने कहा, ‘‘आप के साथ क्या और कैसे हुआ, विस्तार से बताइए. मैं आप को भरोसा दिलाता हूं कि पुलिस आप की हरसंभव मदद करेगी.’’

थानाप्रभारी के भरोसा देने पर अनामिका के अंदर थोड़ी हिम्मत आई. उस ने उन से कहा, मेरे पति राजेश मेहरा (36) द्वारा मेरे साथ मारपीट और गालीगलौज करने की शिकायत दर्ज कराने के साथ ही उस की असलियत से भी आप को अवगत कराना है.

अनामिका ने बताया कि उस के पिता ग्वालियर के बड़े ट्रांसपोर्टर हैं. उन्होंने बड़ी शानोशौकत से उस की शादी राजेश के साथ की थी.

इस के बाद अनामिका के साथ जो हुआ, उस की कहानी इस तरह सामने आई. समय अपनी गति से गुजरता रहा. शादी के कुछ दिनों बाद ही पति उसे परेशान करने लगा था. पति के व्यवहार में काफी बदलाव आ गया था, वह बातबात में उस से झगड़ा करने लगा था. यही नहीं, उस के साथ मारपीट भी करने लगा था.

अनामिका पति के बदले व्यवहार से काफी खफा रहती थी. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. अनामिका जब भी कभी उस के बदले व्यवहार की शिकायत करती तो वह कोई न कोई बहाना बना देता.

यही नहीं, इस के बाद जब देखो तब राजेश मेहरा अनामिका की पिटाई कर उसे घर से निकल जाने को भी कहता. यहां तक कि उस ने घर खर्च के लिए पैसे देने भी बंद कर दिए थे. जब राजेश के अत्याचारों की हद हो गई, तब अनामिका ने अपने पिता को सारी बातें बता दीं.

राजेश ने अनामिका के सामने इस तरह के हालात खड़े कर दिए कि अनामिका परेशान हो कर खुदबखुद अपने पति का घर छोड़ कर अपने मायके में आ कर रहने लगी. 6 महीने पहल॒े पति की सच्चाई सामने आने के बाद वह अपने पति से अलग हो गई.

दरअसल, 6 महीने पहले इत्तफाक से कुछ कागजात अनामिका के हाथ लगे, जिस से उसे पता चला कि उस के पति का असली नाम राजेश मेहरा नहीं बल्कि राजेंद्र कमरिया है, राजेश मेहरा तो उस का बोगस नाम है. वह धोखाधड़ी और हत्या जैसे अपराधों में शामिल होने की वजह से फरार चल रहा है.

इस के बाद ही अनामिका पति से अलग हो कर अपने पिता के पास चेतकपुरी में रहने लगी थी. पति राजेश मेहरा उर्फ राजेंद्र कमरिया ने उसे फोन कर उस के पास लौटने को कहा. अनामिका ने जब लौटने को मना कर दिया तो राजेंद्र अनामिका को फोन पर जान से मारने की धमकी देने लगा,

एक दिन तो हद ही हो गई. 12 मार्च, 2022 को अनामिका अपने पिता से थोड़ी देर में आने को कह कर घर से निकली ही थी कि रास्ते में राजेंद्र अपने साथियों निक्की, प्रमोद और राजा के साथ खड़ा मिल गया.

वह अनामिका को जबरन अपनी गाड़ी में डाल कर सुनसान स्थान पर ले गया और उस के साथ जम कर मारपीट की.

इस मारपीट में अनामिका की आंख पर भी चोट लगी. अनामिका ने बताया कि उस दिन पति राजेंद्र उसे जान से मारने की फिराक में था, लेकिन वह जैसेतैसे उस के चंगुल से छूट कर भाग आई.

इस के बाद अनामिका सीधी ग्वालियर के झांसी रोड थाने पहुंची और पुलिस को अपने पति की असलियत बताने के साथ ही कई अहम दस्तावेज भी सौंपे.

जैसेजैसे जांच आगे बढ़ रही थी, पुलिस को नित नईनई जानकारी मिल रही थी. पुलिस ने अपना रिकौर्ड खंगाला तो इसी थाने में राजेंद्र मारपीट के एक मामले में फरार निकला. राजेंद्र को दबोचने के लिए बिलौआ पुलिस से संपर्क किया गया तो पता चला कि 2014 में हुई 36 लाख रुपए की धोखाधड़ी और मारपीट के मामले में वह वहां से भी फरार चल रहा है.

राजेंद्र यादव को गिरफ्तार करने के लिए एक पुलिस टीम बनाई गई. टीम में क्राइम ब्रांच के टीआई दामोदर गुप्ता, थानाप्रभारी (बिलौआ) रमेश साख्य, क्राइम ब्रांच के एएसआई राजीव सोलंकी, हैडकांस्टेबल रामबाबू सिंह, कांस्टेबल आशीष शर्मा व सोनू परिहार तथा बिलौआ थाने में पदस्थ एएसआई जीत बहादुर, कांस्टेबल सुशांत पांडे, धरमवीर और महेश आदि को शामिल किया गया.

इस के बाद मुखबिर की सूचना पर 16 मार्च, 2022 को पुलिस ने उसे बिलौआ क्षेत्र स्थित उस के फार्महाउस से हिरासत में लिया.

पुलिस ने थाने ला कर उस से पूछताछ की तो उस ने एक ऐसे सनसनीखेज अपराध का खुलासा कर दिया, जिस के बारे में सुनते ही पुलिस वालों के पैरों तले से जैसे जमीन खिसक गई.

पकड़े गए युवक का असली नाम राजेंद्र यादव था. राजेंद्र ने पूछताछ में जो कुछ बताया, उसे सुन कर पुलिस असमंजस में पड़ गई. वजह यह थी कि वह एक संगीन अपराध था और वह आज जिन 4 हत्याओं के बारे में पुलिस को बता रहा था, उस से ग्वालियर पुलिस अभी तक पूरी तरह अनभिज्ञ थी.

पूछताछ में राजेश मेहरा उर्फ राजेंद्र मेहरा उर्फ राजेंद्र यादव उर्फ राजेंद्र कमरिया से पता चला कि वह सिर्फ 12वीं कक्षा तक ही पढ़ा है. ग्वालियर के बालाबाई के बाजार में उस का एक दोस्त मनोज गहलोत परिवार के साथ रहता था.

राजेंद्र यादव भी उस के पड़ोस में ही रहता था. दोनों में गहरी दोस्ती थी. राजेंद्र ने अपने से 10 साल बड़ी मनोज की पत्नी गीता को अपने प्रेम जाल में फांस लिया था. दोनों के बीच अवैध संबंध हो गए थे.

31 दिसंबर, 2011 को राजेंद्र ने अपनी प्रेमिका गीता के साथ मिल कर उस के पति मनोज गहलोत को बियर में नशे की गोली मिला कर पिला दी.

इस के बाद उस का गला दबा कर मौत के घाट उतार दिया और फिर मनोज की लाश झांसी के पास बेतवा नदी में फेंक दी थी. उधर मनोज के परिवार वालों ने कोतवाली थाने में मनोज की गुमशुदगी दर्ज करा दी थी.

मनोज की हत्या के बाद राजेंद्र और गीता ने शादी कर ली थी. शादी के बाद गीता और राजेंद्र मऊरानीपुर रहने चले गए, यहां पर गीता का मकान था.

तकरीबन 2 साल बाद जब गीता से राजेंद्र का मन ऊब गया तो सन 2013 में राजेंद्र ने बड़े ही सुनियोजित ढंग से गीता का मकान हड़प लिया. उस के बाद राजेंद्र ने रहस्यों से भरी किसी फिल्म की तरह गीता, उस के बेटे निक्की और भतीजे सूरज को भी चाकू से गोद कर मार डाला.

उस के इस अपराध में राजेंद्र के भाई कालू और उस के जीजा के भाई राहुल ने भी उस की मदद की थी. इस वारदात के बाद राजेंद्र मऊरानीपुर से फरार हो गया.

तिहरे हत्याकांड से मऊरानीपुर क्षेत्र में सनसनी फैल गई थी. इस के बाद पुलिस किसी तरह इस हत्याकांड के आरोपियों का पता लगाने में सफल हो गई.

इतना ही नहीं, पुलिस ने हत्याकांड में शामिल रहे कालू और राहुल को गिरफ्तार करने में सफलता हासिल कर ली. लेकिन राजेंद्र यादव नाम और हुलिया बदल कर इधरउधर छिपता रहा. पुलिस ने उस के ऊपर ईनाम तक घोषित कर दिया.

खुद को कुंवारा बता कर राजेश उर्फ राजेंद्र ने अनामिका को सन 2014 में अपने प्रेम जाल में फांस लिया. अनामिका ने पुलिस को बताया कि राजेश से उस की दोस्ती सन 2014 में ट्रेन के सफर में हुई थी.

दोस्ती बढ़ने पर राजेश ने दिल्ली में अनामिका की नौकरी लगवाने में काफी मदद की थी, इस वजह से दोनों के बीच गहरी दोस्ती हो गई, जो बाद में प्यार में बदल गई. बाद में दोनों ने आपसी सहमति से शादी कर ली थी.

शादी के वक्त राजेश उर्फ राजेंद्र ने अपने को कुंवारा बताया था. राजेंद्र ने अनामिका से एक नहीं, बल्कि कई झूठ बोले थे.

उन में सब से बड़ा तो यही था कि उस ने अपनी पत्नी से मकान मालिक कुलदीप मेहरा का परिचय अपने पिता के रूप में करवाया था. राजेंद्र ने अपना नाम भी अनामिका को राजेश मेहरा बताया था. बाद में अनामिका को पता चला कि कुलदीप मेहरा राजेश उर्फ राजेंद्र का पिता नहीं बल्कि मकान मालिक है.

बाद में पता चला कि राजेश ने कुलदीप मेहरा की तकरीबन 5 करोड़ रुपए की जमीन भी ठग ली थी. शादी के बाद राजेंद्र ने अपनी पत्नी को बहन के घर रखा था. राजेंद्र और अनामिका के एक बेटा भी है.

पिछले 10 सालों से राजेंद्र अपना नाम और भेष बदल कर रहता रहा. कभी पगड़ी लगा लेता तो कभी क्लीन शेव रहता. कभी दाढ़ी बढ़ा लेता था, कभी राजेंद्र यादव बन जाता तो कभी राजेश मेहरा. वह लग्जरी कारों का भी शौकीन है. साथ ही वह अय्याश प्रवृत्ति का तो है ही.

पहले वह लड़की से दोस्ती करता है, उस के बाद उन की प्रौपर्टी पर सुनियोजित ढंग से कब्जा कर खुर्दबुर्द कर देता. बात करने में हाजिरजवाब राजेंद्र यादव के अपराधों का कच्चा चिट्ठा खोलते हुए ग्वालियर के एसपी अमित सांघी, एडिशनल एसपी (क्राइम) राजेश दंडोतिया ने संयुक्त रूप से पत्रकार सम्मेलन में पत्रकारों को जानकारी दी.

2011 में खास दोस्त मनोज गहलोत की हत्या, 2012 में ग्वालियर में पीडब्ल्यूडी के इंजीनियर के मकान में भाड़े पर रहा. उस की पत्नी को फांस कर 60 लाख की ठगी की. चैक बाउंस मामले में गिरफ्तारी वारंट 18 जून, 2013 में धारा 420, 467, 468, 471, 120 भादंवि का केस उस के खिलाफ दर्ज हुआ.

2013 में अपने भाई और जीजा के छोटे भाई के साथ मिल कर अपनी प्रेमिका गीता और उस के बेटे और भतीजे की निर्मम हत्या कर दी.

कड़वा सच तो यह है कि अनामिका का कई मर्तबा मन हुआ कि वह अपने पति के बारे में पुलिस को सब कुछ सचसच बता दे, लेकिन राजेंद्र के खिलाफ मुंह खोलने का साहस नहीं जुटा पाई.

जब अति हो गई तो वह पति के खिलाफ पक्के सबूतों के साथ थाने में जा कर खड़ी हो गई, वैसे भी पति के खिलाफ खड़ी होने में ही अनामिका की भलाई थी.

पति की कारगुजारियों से अनामिका को गहरा झटका लगा है. इस से उबरने में फिलहाल उसे वक्त लगेगा.

पूछताछ के बाद राजेंद्र को न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

फैसला: पागल बलात्कारी और मासूम लड़कियां

लेखक- डा. बसंतीलाल बाबेल

बहुत छोटी बच्चियों के साथ बलात्कार एक आम बात है. स्कूल जाने वाली लड़कियां, भेड़बकरियां चराने वाली और मजदूरी पर जाने वाली लड़कियां अकसर बलात्कार की शिकार होती रहती हैं.

बलात्कार के बाद बलात्कारी अपने बचाव के उपाय सोचता है. आमतौर पर बलात्कार के समय शिकारी अपनेआप को आधा पागल या गरमी में होने का बचाव लेता है. एक किस्सा दशकों पहले ?ालावाड़ (राजस्थान) का है. मैं उन दिनों वहां एडिशनल सैशन जज था. मेरे समय ऐसा ही एक मामला आया था.

एक 15 साल की छोटी लड़की एक खेत में भेड़बकरियां चरा रही थी. तभी वहां शिकारी आता है और उस लड़की को एक दूसरे खेत में यह कह कर ले जाता है कि वहां एक तरह के फल, बेर हैं, साथसाथ बेर खाएंगे.

लड़की उस आदमी के साथ उस खेत में चली जाती है. शिकारी उस के मुंह पर पट्टी बांध देता है, उसे जमीन पर गिरा देता है और नंगा कर देता है. बेरहमी से उस की छातियों को नोचता है और उस के साथ बलात्कार करता है.

जबरदस्ती करने की वजह से उस लड़की के अंग से खून बहने लगता है और वह बेहोश हो जाती है. वह अपराधी उसे वहीं छोड़ कर भाग जाता है. पर वह लड़की की निशानदेही पर पकड़ा जाता है.

जब अपराधी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता 1860 की धारा 376 के तहत रेप का मुकदमा चलता है, तो शिकारी बलात्कार के समय अपनेआप के पागल होने का दावा करता है, ताकि वह छूट जाए.

वह एक मनोरोग चिकित्सालय से अपने पागल होने का सर्टिफिकेट भी कुछ पैसे दे कर ले आता है. मुलजिम को भरोसा था कि उसे आरोप से मुक्ति मिल जाएगी, लेकिन मेरे यह बात गले नहीं उतर रही थी. प्रोसीक्यूशन की चार्जशीट से बलात्कार साबित हो रहा था. खुद अपराधी भी इस तथ्य को तो स्वीकार कर रहा था कि उस के द्वारा बलात्कार तो हुआ है, पर बलात्कार के समय वह पागल था. वह उस समय क्या कर रहा था और उस का नतीजा क्या होगा, यह सम?ाने में नाकाम था. वह भारतीय दंड संहिता की धारा 84 का फायदा पाने का हकदार है.

लेकिन मैं उसे आरोप से मुक्त करने को तैयार नहीं था. मेरे मन में बारबार यह विचार आ रहा था कि मुलजिम अगर पागल था, तो वह उस अबोध बालिका को बेर खाने का बहाना बना कर दूसरे खेत में क्यों ले गया? पागल होता तो उसी खेत में बलात्कार कर लेता, जहां वह भेड़बकरियां चरा रही थी, पर उसे खतरा था कि वहां कोई देख लेगा. मतलब यह हुआ कि मुलजिम में पूरी सोच व सम?ा थी. वह पागल नहीं था. मनोरोग चिकित्सालय का प्रमाणपत्र था. मैं ने उसे कुसूरवार ठहराते हुए 10 साल की कठोर कारावास की सजा दी.

ऐसे बलात्कारी आज एक नहीं, अनेक हैं, जो अबोध बालिकाओं की इज्जत से खेल रहे हैं. ऐसे बलात्कारियों को सजा मिलनी ही चाहिए.

दलित लड़कियों के रेप आजकल बहुत बढ़ गए हैं, क्योंकि दबंग पिछड़ी जाति के सिरफिरे जवान कोई शिकार ढूंढ़ते रहते हैं.

खाली बैठे बेरोजगार, जिन की शादी भी नहीं हुई होती और जिन को कोई प्रेमिका नहीं मिलती है जो साथ सो सके, वे जबरदस्ती किसी को भोगने की ताक में रहते हैं.

लड़कियां अब घरों में बंद कर के नहीं रखी जा सकतीं और उन्हें बाहर घूमने की छूट रहती है. मांबाप दोनों काम पर गए हों, तो अकसर 10-15 साल की लड़कियां अकेले ही बाहर निकल जाती हैं और इस तरह के बिगड़े हुए लड़कों के हत्थे चढ़ जाती हैं.

बाद में मांबाप पैसा जुटा कर वकील करते हैं. डाक्टरों को पैसा दे कर नकली मैडिकल रिपोर्ट बनाने की कोशिश करते हैं. पुलिस भी पैसा खा लेती है. दलितों को यह सम?ा दिया गया है कि यह सब कर्मों का फल है, इसलिए वे चुप ही रह जाते हैं. अगर मामला पता चल जाए, तो पागलपन का दौरा चढ़ गया था का बचाव वकील सु?ा देते हैं.

इस से अच्छा है कि लड़कियां अपना साथी चुन लें, जो उन का साथ तो दें.

फैशन में पीछे नहीं देसी छोरे

कई साल पुरानी बात है. जब हिंदी फिल्मों में गोविंदा का जलवा था. डेविड धवन की फिल्मों में तो वे एक अलग ही अंदाज में नजर आते थे. उन की अदाकारी और नाच के साथसाथ एक और चीज जो उन्हें दूसरे हीरो से अलग करती थी, वह था उन के हर रंग के कपड़े पहनने का स्टाइल. जो रंग लड़कों के लिए बेकार माने जाते थे, गोविंदा उन्हीं रंगों के कपड़ों जैसे पीली कमीज के नीचे बैंगनी रंग की पैंट या गुलाबी रंग का सूट बड़े परदे पर बड़ी शान से पहनते थे.

स्टाइल आइकन थे गोविंदा

गोविंदा की इस अजीबोगरीब ड्रेसिंग सेंस पर खूब चुटकियां ली जाती थीं. उसी दौर में किसी उभरते सिख फैशन डिजाइनर से जब बोल्ड ड्रेसिंग सेंस वाले फिल्म हीरो का नाम बताने के लिए कहा गया था तब उन्होंने बेझिझक गोविंदा का नाम लिया था. इस की वजह बताते हुए उन्होंने कहा था कि गोविंदा ने उन रंगों के कपड़ों का बाजार भी गरमा दिया है जो दुकानों पर धूल खाता था, लेकिन अब छोटे शहरों या गांवकस्बों के नौजवान धड़ल्ले से उन रंगों के कपड़ों से कमीज या पैंट बनवाते हैं.

होता क्या है कि जब भी फैशन के बारे में बात की जाती है तो पढ़ेलिखे शहरी नौजवानों की पसंद या नापसंद को ही ध्यान में रखा जाता है जबकि आज भी भारत की ज्यादातर आबादी गांवों में रहती है और वह फैशन के मामले में किसी से कम नहीं है.

गांव में भी छाया शहरी फैशन

हरियाणा के जींद जिले के रत्ता खेड़ा गांव के शक्ति वशिष्ठ का आज के फैशन को ले कर मानना है, “अब गांवदेहात में भी शहरी फैशन घुस चुका है. नई उम्र के लड़के जींस और टीशर्ट पहनते हैं. खेतों में भी अब लड़के काम करते हैं तो वे कुरतापाजामा के अलावा जींस के साथ टीशर्ट या कमीज पहन लेते हैं.
”किसी खास मौके के लिए थोड़ा महंगा कपड़ा खरीदा जाता है. चूंकि फिल्मों का असर फैशन पर सब से ज्यादा रहता है इसलिए गांव के पास के कस्बों या थोड़े बड़े शहरों में कपड़ों की खूब दुकानें खुलने लगी हैं. एक्सपोर्ट के कपड़े भी खूब बिकते हैं.

”चूंकि गांव में अब पढाई का जोर बहुत ज्यादा हो गया इसलिए खुद को फैशन के मुताबिक रखने में अब नौजवान झिझकते नहीं हैं. कपड़ों के अलावा वे अपने जूतेचप्पलों को भी नए चलन के हिसाब से खरीदते हैं.”

बात भी सही है क्योंकि हमारे देश में हर तरह का फैशन फिल्मी दुनिया से होता हुआ देशभर में अपना सिक्का जमाता है इसलिए ऐसे तबके की अनदेखी नहीं करनी चाहिए जो शहरों में नहीं रहता है या जो खुद के बनाव सिंगार पर ज्यादा पैसे नहीं खर्च कर सकता है.

 देशी छोरों हेयर स्टाइल

2 फिल्मों के हीरो से इस बात को जोड़ते हैं. यहां कपडे की नहीं हेयर स्टाइल की बात हो रही है. हिंदी फिल्म ‘आशिकी’ और ‘तेरे नाम’ में राहुल रॉय और सलमान खान के कपड़ों को तो पसंद किया ही गया था, उन के हेयर स्टाइल ने तो कहर मचा दिया था. हर तीसरा लड़का उस हेयर स्टाइल को अपना चुका था.
आज ही देख लो. रणवीर सिंह के कपड़े और उन का स्टाइल भी बहुत बोल्ड है जिसे हर नौजवान अपनाने की कोशिश करता है फिर वह चाहे सोशल मीडिया पर ट्रोल ही क्यों न हो जाए. वैसे भी अब लड़का देहाती हो या शहरी, फैशन को ले कर सब एकसुर में यह कहने की हिम्मत तो रखते ही हैं कि अपना टाइम आएगा…

Edited By – Neelesh Singh Sisodia 

ईद हो या रामनवमी: देश चौराहे पर

केंद्र में नरेंद्र दामोदरदास मोदी सरकार के गठन के बाद सामाजिक समरसता में जो कमी आई है उसका समाज विज्ञानियों द्वारा अध्ययन करना अभी बाकी है. मगर जो दिखाई दे रहा है उसे साफ साफ कहा जा सकता है कि जिस देश में सभी समुदाय के लोग मिलकर प्रेम से रहते थे आज वहां जहर घोला जा रहा है.

जिस देश यह सूत्र वाक्य था- “अनेकता में एकता”  जहां देश में प्राथमिक शालाओं में देश के बच्चे बच्चे को यह पढ़ाया जाता था घुट्टी में पिलाया जाता था. वहां आज समाजिक विभेद पैदा हो चुका है और यह चौड़ा होते जा रहा है, जो चंद नेताओं के लिए तो अच्छा हो सकता है, मगर आम जनता के लिए यह किसी भी स्थिति में अच्छा नहीं कहा जा सकता. क्योंकि सामाजिक समरसता को खत्म करके विभिन्न समुदायों के बीच लगातार बढ़ती खाई खंदक देश को हर एक दृष्टि से पतन की ओर ले जाएगा.

अभी रामनवमी का जुलूस देशभर में निकला जिसका उद्देश्य निसंदेह राम प्रभु के संदेश का प्रसारण करना था मगर गंदी राजनीति के कारण देश के 4 राज्यों में स्थितियां बेकाबू हो गई. कई लोग हताहत हो गए मारे गए पुलिस को स्थितियां कंट्रोल करने में पसीना निकालना पड़ा कुल मिलाकर जो संदेश है वह भयावह है.

राम की मर्यादा कर रहे तार तार

हमारे देश के चंद नेता भगवान राम की सद्गुणों को भी इस तरीके से प्रसारित कर रहे हैं जो स्थितियां बिगाड़ने में सहायक है.

सवाल देश की केंद्र सरकार से यह है कि क्या रामनवमी के जुलूस पर पहले कभी ऐसा होता था क्या कभी प्रभु राम के जन्मोत्सव का जुलूस निकला और स्थितियां ऐसी बदतर हुई थी.

अगर ऐसा नहीं था तो फिर आज ऐसा हो रहा है तो दोषी कौन है. यह समझना आसान है रामनवमी के जुलूस में नेताओं द्वारा कठपुतलियां नचाई जा रही हैं परिणाम स्वरूप देशभर में कई जगहों पर हिंसा हुई.

यह चिंता का सबब है कि रामनवमी के जुलूस पर पथराव और कुछ घरों और वाहनों में आगजनी की घटनाओं के बाद पुलिस को आंसू गैस के छोड़ने पड़े. इसी तरह की पथराव की घटना मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले के सेंधवा कस्बे में सामने आई. यहां स्थिति इतनी बिगड़ गई कि एक थाना प्रभारी और पांच अन्य घायल हो गए. इधर विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने सोमवार को आरोप लगाया कि अल्पसंख्यक समुदाय के नेताओं और वामपंथी उदारवादियों को शहर  में रामनवमी मनाने वाले लोगों पर हमले’ के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए.

एक अन्य वीडियो संदेश में विश्व हिंदू परिषद के संयुक्त महासचिव सुरेंद्र जैन के मुताबिक  मध्य प्रदेश, गुजरात, झारखंड और जेएनयू में हुई हिंसा को ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ है.

दूसरी तरफ मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के मुताबिक  दंगाइयों की पहचान कर ली गई है और उन्हें बख्शा नहीं जाएगा.

जहां तलक देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी के गृह राज्य गुजरात  की जमीनी हकीकत यह है कि  आणंद जिले के खंभात में रामनवमी के जुलूस के दौरान हुई हिंसा और पथराव में एक व्यक्ति की मौत हो गई.पुलिस ने हिंसा में संलिप्तता के आरोप में नौ लोगों को गिरफ्तार किया है. पुलिस सूत्रों के अनुसार गिरफ्तार किए गए लोगों में कुछ स्थानीय मौलवी भी शामिल हैं. जबकि इसी तरह की घटना के बाद साबरकांठा के हिम्मतनगर कस्बे में भड़की हिंसा को नियंत्रित करने के लिए धारा 144 लागू कर दी गई .

सवाल यह है कि देश के इंटेलीजेंस और पुलिस को यह जानकारी है रामनवमी का जुलूस निकलेगा तो फिर व्यवस्था चाक-चौबंद क्यों नहीं की जाती क्यों बेगुनाह लोग मारे जाते हैं और फिर खानापूर्ति की जाती है. क्या यह सब राजनीति नहीं है अपनी कुर्सी बनाए रखने के लिए यह नेताओं का खेल नहीं है.

नेहरू बनाम नरेंद्र: छाया युद्ध जारी

एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं जो सीधे-सीधे आजादी के संघर्ष का भी नेताओं को श्रद्धांजलि है दूसरी तरफ आजादी के महानायक यथा मोहनदास करमचंद गांधी, जवाहरलाल नेहरू जैसी विभूतियों की विरासत से छेड़छाड़ का अपराध भी.

अभी तो नरेंद्र दामोदरदास मोदी की देश में सरकार है. मगर आने वाले समय में नरेंद्र मोदी, भाजपा और आर एस एस को निश्चित रूप से इसका जवाब देना पड़ सकता है. क्योंकि हमारे देश की सहिष्णु आवाम यह सब शायद बर्दाश्त नहीं कर पाएगी.

आज केंद्र सरकार नरेंद्र मोदी के हाथों में है और आप महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू जैसी देश की महान विभूतियों के संग्रहालय, विरासत को लगातार छिन्न-भिन्न करने में लगे हुए हैं. ठीक है आज आप के हाथों में सत्ता है मगर जब कल यह सत्ता हाथों से फिसल जाएगी और इतिहास के कटघरे में आपसे सवाल किए जाएंगे तो आप क्या जवाब देंगे.

ताजा तरीन मामला देश की राजधानी में स्थित नेहरू संग्रहालय का है जहां नेहरू जी को देश चाचा नेहरू के रूप में प्यार करता है, प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में जिनका सम्मान है आजादी की लड़ाई में जिस व्यक्ति ने अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया और एक महानायक बन करके अपने 17 वर्षों के कार्यकाल में देश को राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और अंतरराष्ट्रीय स्थिति में स्वावलंबी बनाने का भरसक प्रयास किया. उस विभूति के सम्मान में बने नेहरू संग्रहालय का नाम बदला और उसे प्रधानमंत्री संग्रहालय कर दिया गया. क्या यह देश के प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू का, आजादी का अवमान नहीं है.

यहां याद रखने वाली बात यह है कि नरेंद्र मोदी बड़ी संजीदगी के साथ जब भी देश को संबोधित करते हैं तो नाटकीय तरीके से यह प्रदर्शित करते हैं कि वह बहुत ही संवेदनशील है और देश प्रेम तो उनमें कूट-कूट कर भरा हुआ है. देशभक्ति के सामने तो उनसे बड़ा कोई देशभक्त है ही नहीं फिर देश के प्रथम प्रधानमंत्री नेहरु हो या फिर राष्ट्रपिता के रूप में महात्मा गांधी उनकी विरासत संग्रहालय के साथ मोदी सरकार यह धतकरम क्यों कर रही है यह सवाल का जवाब नरेंद्र दामोदरदास मोदी और उनकी सरकार कभी नहीं देगी मगर सच्चाई देश जानता है कि इस सब के पीछे का रहस्य क्या है.

नेहरू बनाम नरेंद्र

देश अभी यह भुला नहीं है कि गुजरात में सबसे बड़े स्टेडियम का नाम नरेंद्र मोदी ने अपने नाम करवा लिया और प्रोटोकॉल को खत्म करवा राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के हाथों उसका उद्घाटन करवाया था.

ऐसे नरेंद्र दामोदरदास मोदी ने नेहरू स्मारक संग्रहालय को अब आधिकारिक रूप से प्रधानमंत्री संग्रहालय बनवा दिया  है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने  तीन मूर्ति भवन परिसर में  प्रधानमंत्री संग्रहालय का उद्घाटन किया. इसे नरेंद्र मोदी ने  हर सरकार की साझा विरासत का जीवंत प्रतिबिंब बताते हुए उम्मीद जताई कि यह संग्रहालय भारत के भविष्य के निर्माण का एक ऊर्जा केंद्र भी बनेगा.

प्रधानमंत्री ने इस मौके पर देश के सभी प्रधानमंत्रियों के योगदान को याद किया. नरेंद्र मोदी ने भारत को लोकतंत्र की जननी बताते हुए कहा कि एक दो अपवादों को छोड़ दिया जाए तो देश में लोकतंत्र को लोकतांत्रिक तरीके से मजबूत करने की गौरवशाली परंपरा रही है.

तीन मूर्ति परिसर में अब प्रधानमंत्री संग्रहालय में देश के 14 पूर्व प्रधानमंत्रियों के जीवन की झलक के साथ साथ देश के निर्माण में उनके योगदान को दिखाया गया है.  प्रधानमंत्री ने कहा कि भारतवासियों के लिए बहुत गौरव की बात है कि देश के ज्यादातर प्रधानमंत्री बहुत ही साधारण परिवार से रहे हैं और सुदूर देहात, एकदम गरीब परिवार, किसान परिवार से आकर भी प्रधानमंत्री पद पर पहुंचना भारतीय लोकतंत्र की महान परंपराओं के प्रति विश्वास को मजबूत करता है. प्रधानमंत्री ने कहा कि देश आज जिस ऊंचाई पर है वहां तक उसे पहुंचाने में स्वतंत्र भारत के बाद बनी सभी सरकारों का योगदान है. यह संग्रहालय भी हर सरकार की साझा विरासत का जीवंत प्रतिबिंब बन गया है.

मगर नरेंद्र मोदी यह भूल गए कि नेहरू संग्रहालय का अपना एक महत्व था जहां देश भर से और दुनिया से जब पर्यटक आते तो नेहरू संग्रहालय को देख समझकर के उन्हें आजादी की लड़ाई संघर्ष से प्रेरणा मिलती थी. हमारा यहां आदरणीय नरेंद्र मोदी से यही सवाल है की आजादी की लड़ाई के नायकों  और अन्य प्रधानमंत्रियों में क्या कोई अंतर नहीं है. क्या -“सभी धान 22 पसेरी” की कहावत यहां चरितार्थ नहीं हो रही है.

अगर वे भी यही करते तो क्या होता

हम यहां इस आलेख में प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी, भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयं संघ से यह पूछते हैं कि अगर कांग्रेस भी अगर ऐसा ही करने लगे तो आपको कैसा लगेगा.

आप क्या यह भूल जाते हैं कि महाराष्ट्र में जहां कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस , शिवसेना की संयुक्त सरकार है. आपके नागपुर स्थित आर एस एस भवन का अधिग्रहण करके उसे और बहुत अच्छा बनाने का प्रयास करे और उसकी आड़ में उसकी मूल भावना के साथ छेड़छाड़ की जाए तब क्या होगा. आपको कैसे लगेगा.

आर एस एस की भावना मूल मंत्र को हम और विस्तार दे रहे हैं कह कर के अगर महाराष्ट्र की सरकार आर एस एस के भवन में बड़ी चतुराई के साथ बदलाव लाने का प्रयास करें तो आपको कैसा लगेगा.

दुनिया में नरेंद्र मोदी एक क्षमता वान प्रधानमंत्री के रूप में धीरे-धीरे स्थापित हो रहे हैं मगर वे अपनी शक्ति और ऊर्जा जिस तरीके से कांग्रेस की विरासत को नष्ट  करने में लगाते हैं उससे उनकी छवि पर प्रश्न चिन्ह खड़ा हो रहा है. यह जो देश में राजनीति चल रही है यह जो छाया युद्ध चल रहा है यह किसी भी हालात में अच्छा नहीं कहा जा सकता.

नेटफ्लिक्स फिल्म ‘थार’’का ट्रेलर लांचः अनिल कपूर के बेटे को वेस्टर्न नोयर का सहारा

हाल ही में नेटफ्लिक्स की अपकमिंग फिल्म थार का ट्रेलर मीडिया की मौजूदगी में रिलीज किया गया. इस अवसर पर मीडिया से बात करते हुए अनिल कपूर ने कहा- ‘‘हमने ‘थार’ के साथ जो हासिल किया है, उस पर मुझे बहुत गर्व है और कई कारणों से फिल्म को लेकर बहुत उत्साहित हूं.

मेरे बेटे हर्षवर्धन ने इस फिल्म की योजना बनायी और मुझसे इसका हिस्सा बनने के लिए कहा. दूसरी बात यह राजस्थान में स्थापित एक नोयर थ्रिलर है, जो क्लासिक वेस्टर्न शैली की है, जो भारतीय सिनेमा और दर्शकों के लिए पहली बार पेश की गई है.

परदे पर दर्शकों को हर्षवर्धन कपूर और फातिमा सना शेख की ताजा जोड़ी नजर आएगी. निर्देशक राज सिंह चैधरी महत्वाकांक्षी, जोखिम लेने वाले नवोदित कलाकारों की एक टीम के साथ जादू बिखेरा है.’’

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क्या है फिल्म की कहानी

पश्चिमी नोयर शैलियों से प्रेरित फिल्म ‘थार‘ अस्सी के दशक की बदले की कहानी है. यह कहानी सिद्धार्थ (हर्षवर्धन कपूर) की है. जो कि अपनी नौकरी में पुष्कर,राजस्थान में तबादला होने के बाद अपने अतीत का बदला लेने की यात्रा पर निकल चुका है. वह लोगों के सामने खुद को एंटिक डीलर के रूप में पेश करता है.

इस बदले वाली नोयर रोमांचक फिल्म में सुरेखा सिंह (अनिल कपूर) पुलिस इंस्पेक्टर बने हैं, जो कि राजस्थान के दूर दराज गांव में हो रही हत्याओं की जांच कर रहे हैं. एक मोड़ पर वह सिद्धार्थ को संदिग्ध पाते हैं. फिर शुरू होता है चूहे बिल्ली का खेल. बीच में एक प्रेम कहानी भी है.

नेटफ्लिक्स की तरफ से प्रतीक्षा राव ने कहा- ‘नेटफ्लिक्स में, हम अपने सबस्क्राइबर्स की तरह ही फिल्मों के बहुत बड़े फैन हैं. हम अनूठी कहानी के लिए राज की दृष्टि की ओर आकर्षित हुए थे, और एकेएफसी के साथ सहयोग करने के लिए उत्साहित थे.‘’

फिल्म के निर्माता व अभिनेता हर्षवर्धन कपूर ने कहा- “इंतजार लगभग खत्म हो गया है और हम दुनिया भर के दर्शकों को अपनी फिल्म दिखाने के लिए बहुत उत्साहित हैं. हमने छोटे विवरणों पर ध्यान दिया है और उन्होंने एक ऐसी दुनिया और एक कथा बनाने के लिए जोड़ा है जो अद्वितीय है. नेटफ्लिक्स ‘थार‘ के लिए विश्व स्तर पर दर्शकों तक पहुंचने के लिए एक आदर्श मंच है जो फिल्म से जुड़ेंगे.’’

बेटे के साथ काम करने को लेकर ये बोले अनिल कपूर

अनिल कपूर ने ‘एके बनाम एके‘ के बाद अपने बेटे के साथ फिर से काम करने के संदर्भ में कहा-‘‘मुझे युवा और नई प्रतिभाओं के साथ काम करना पसंद है और ‘थार‘ के साथ युवा अभिनेताओं और फिल्म निर्माताओं को लाने से मुझे फिल्मों पर एक पूरी तरह से अलग दृष्टिकोण मिलता है. हर्षवर्धन निर्भीक व बेहतरीन कलाकार है. उसने ‘एके बनाम एके’ में जिस किरदार को निभाया, कम से कम मैं उसे न निभाता.‘‘

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सतीश कौशिक अलग अंदाज

इस अवसर पर सतीश कौशिक ने कहा-‘‘ मैं तो 1980 और 1990 के दशक में अनिल कपूर के साथ कई सफल फिल्में कर चुका हूं. अब इसमें लोग मुझे एक अलग रूप में देखेंगे. जब मुझे इस किरदार की पेशकश की गई, तो मैंने सोचा कि यह भूमिका निभाने का एक शानदार मौका होगा क्योंकि यह कुछ ऐसा है जो मैंने अपने अभिनय करियर में पहले नहीं किया था.”

 

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काफी अलग है रोल- फातिमा सना शेख

फातिमा सना शेख ने कहा- ‘‘मुझे एक बहुत ही अलग चरित्र पर काम करने का अवसर मिला है जिसे मैंने अतीत में नहीं निभाया है.‘‘

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इस रहस्य, रोमांच व एक्शन प्रधान फिल्म ‘‘थार’’ का निर्माण हर्षवर्धन कपूर ने ‘अनिल कपूर फिल्म्स’’ के बैनर तले किया है. जबकि इसके लेखक व निर्देशक राजसिंह चैधरी हैं, जो कि पहली बार निर्देशक बने हैं. फिल्म में अनिल कपूर, हर्षवर्धन कपूर, फातिमा सना शेख, जीतेंद्र जोषी और सतीश कौशिक जैसे कलाकार हैं.

एडिट बाय- निशा राय

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