मौत का कारण- भाग 1: क्यों दम तोड़ रहा था वरुण का बचपन

मेरा 5 वर्षीय बेटा वरुण उन दिनों बहुत गुमसुम रहने लगा था. जब से उस की दादी की मृत्यु हुई तभी से उस का यह हाल था. मांजी की अचानक मृत्यु ने हमें भी हतप्रभ कर दिया था, पर वरुण पर तो यह दुख मानो पहाड़ बन कर टूट पड़ा था. मुझे आज भी याद है, हमें रोते देख कर किस तरह वरुण भी अपनी दादी की मृतदेह पर गिर कर पछाड़ें खाखा कर रो रहा था. उस की हालत देख कर मैं ने अपनेआप को संभाला और उसे वहां से उठा कर भीतर वाले कमरे में ले गई थी. मेरे साथ मेरा देवर प्रवीर भी भीतर आ गया था.

‘दादी हिलडुल क्यों नहीं रहीं?’ उस ने सिसकियों के बीच पूछा.

‘वे अब इस दुनिया में नहीं हैं,’ प्रवीर बोला.

‘पर वे तो यहीं हैं. बाहर लेटी हैं. आप लोगों ने उन्हें जमीन पर क्यों लिटा रखा है?’

‘उन की मृत्यु हो चुकी है,’ प्रवीर दुखी स्वर में बोला.

‘मृत्यु, क्या मतलब?’

उस ने पूछा तो मैं एक क्षण के लिए चुप हो गई फिर उसे डांटते हुए कहा, ‘बेकार सवाल नहीं पूछते.’ मगर वह मेरी डांट से अप्रभावित फिर अपना सवाल दोहराने लगा. इस बार प्रवीर ने शांत स्वर में उसे समझाया कि उस की दादी अब उसे कभी नजर नहीं आएंगी. न वे उसे कहानियां सुनाएंगी, न उस से स्कूल की बातें सुनेंगी.

‘ये सब तुम क्यों बता रहे हो उस नन्ही जान को?’ मैं ने भर्राए कंठ से पूछा.

‘बताना जरूरी है भाभी, आजकल के बच्चों को बहलाया नहीं जा सकता. सचसच बता देना ही ठीक रहता है,’ प्रवीर की आवाज नम हो आई थी.

इधर वरुण यह सुन कर जोर से रो पड़ा. उस का करुण रुदन सन्नाटे को चीर कर हर एक के हृदय में उतर गया. वरुण अपनी दादी से बेहद प्यार करता था और वे भी अपने इस इकलौते पोते पर अपना सर्वस्व लुटाती थीं. सुबह जैसे ही वरुण की नींद खुलती, वे उस समय बिस्तर पर बैठी माला फेर रही होती थीं. वरुण धम से उन की गोद में बैठ जाता और दादीपोत का वार्त्तालाप शुरू हो जाता.

‘दादी, आप कितने साल की हैं?’

‘65 साल की.’

‘यानी मेरे पिताजी से भी बड़ीं,’ वरुण अपनी दोनों बांहें फैला कर आश्चर्य प्रकट करता.

‘हां, तेरे पिताजी से भी बड़ी,’ मांजी उस के भोलेपन पर हंस पड़तीं.

‘पर आप तो पिताजी से छोटी हैं?’ वरुण का इशारा उन के लंबे कद की ओर होता.

कद से छोटे होने पर भी उम्र में बड़ा हुआ जा सकता है, यह बात मांजी उसे उदाहरण सहित समझातीं कि उस की बूआ उस के पिताजी से उम्र में बड़ी हैं इसलिए उस के पिताजी उन्हें दीदी कहते हैं लेकिन कद में वे उन से छोटी हैं. इस बात को सुन कर वरुण कुछ क्षण सोच में डूब जाता, फिर कुछ समझने की मुद्रा में आंखें झपका कर कहता, ‘इस का मतलब यह हुआ कि मां भी पिताजी से बड़ी हैं.’ उस की नादानी पर मांजी हंसतेहंसते दोहरी हो जातीं. हर 2-3 दिन बाद इस तरह के संवाद दोनों दादीपोते के बीच अवश्य होते. फिर उस की अविराम चलती बातों पर रोक लगाती हुई वे कहतीं, ‘अब बस भी कर. मैं तुझे गरमागरम हलवा बना कर खिलाती हूं.’ ‘सुबह का नाश्ता ताकत देने वाला होना चाहिए, हलवा या मक्खन व परांठा, फुसफुसी डबलरोटी नहीं,’ वे कहतीं. लेकिन अपने मतों को वे हम पर कभी थोपती नहीं थीं. मेरी समझ से यही गुण उन्हें उन की उम्र के अन्य बुजुर्गों से अलग करता था. मनुष्य की दूसरों पर शासन करने की इच्छा सदा से रही है. रिश्तों के दायरे में बड़ों द्वारा छोटों पर शासन करने की छूट ने ही हमारे पारिवारिक संबंधों में कड़वाहट घोल दी है. वरुण की दादी में यह बात नहीं थी. सास होने के नाते वे मुझ पर अधिकार जताने के बजाय स्नेह लुटाती थीं. यह उन्हीं के व्यवहार की विशेषता थी कि वे मुझे सदा मां से भी अधिक अपनी लगीं.

उन की मृत्यु को 15 दिन हो गए थे. एकएक कर के सभी रिश्तेदार विदा हो गए. प्रवीर भी कलकत्ता लौट गया. उस की नईनई नौकरी थी, ज्यादा छुट्टी लेना संभव नहीं था. जब व्यस्तता से उबरने का मौका मिला तब मेरा ध्यान अचानक वरुण की

अस्वाभाविक गंभीरता पर गया. निरंतर बोलते रहने वाला वरुण एकदम गुमसुम  हो गया था. उस का जबतब मांजी की तसवीर को एकटक देखते रहना, उन की अलमारी खोल कर  उन की साडि़यों पर हाथ फेरना, सब कुछ बड़ा अजीब लग रहा था. ‘‘कल से तुम्हें स्कूल जाना है, पुस्तकें बैग में ठीक से रख लो,’’ मैं ने वरुण को  याद दिलाते हुए कहा मगर वह वैसे ही भावमुद्रा लिए बैठा रहा, जैसे मैं ने  उस से नहीं, किसी और से कहा हो.

‘‘कल स्केचपैन भी ले जाना बैग में रख कर,’’ मुझे उम्मीद थी कि स्केचपैन  स्कूल में ले जाने के मेरे प्रस्ताव से वह अवश्य खुश होगा, मगर इस बार भी वह उसी तरह निर्लिप्त बैठा रहा. मुझे उस की चुप्पी से अब भय लगने लगा. मगर कुछ क्षण बाद वह स्वयं ही अपनी चुप्पी तोड़ कर बोला, ‘‘मां, दादी की मौत कैसे हुई? उन्हें किस ने मारा?’’ उस का यह सवाल मुझे उस की चुप्पी से भी डरावना लगा. मैं अवाक् रह गई.

वन स्‍टॉप सेंटर और महिला शक्ति केन्‍द्र समन्‍वय स्‍थापित कर करेंगी काम

प्रदेश की महिलाओं और बेटियों को बेहतर सुविधाएं देने और उनकी समस्‍याओं का तेजी से निराकरण करने के लिए अब वन स्‍टॉप सेंटर और महिला शक्ति केन्‍द्र समन्‍वय के साथ काम करेंगे. ऐसे में योगी सरकार की ओर से प्रदेश की महिलाओं और बेटियों की सुरक्षा, स्‍वावलंबन और सम्‍मान के लिए जो संकल्‍प लिया गया है वो सभी वादे समय सीमा से पहले पूरे हो सकेंगे.  वन स्टॉप सेन्टरों का महिलाओं से संबंधित विभिन्न गतिविधियों के हब के रूप में विकास किया जाएगा. उनको सुरक्षा व सशक्तिकरण के लिए एक ही छत के नीचे समस्त सेवाएं मिलेंगी. महिलाओं और बेटियों को आर्थिक सहायता, रोजगार/स्वरोजगार, कौशल प्रशिक्षण से जुड़ी समस्त योजनाओं की जानकारी दी जाएगी. योजनाओं का लाभ दिलाने के लिए सम्बन्धित विभाग और अधिकारी से समन्वय स्‍थापित कर काम करेंगे.

महिला कल्‍याण विभाग की ओर से 100 दिवसों की कार्ययोजना को तैयार किया गया है. जिसके तहत हर 15 दिवसों में ब्लॉक स्तर पर भव्य स्वावलंबन कैम्पों का आयोजन कर सरकार द्वारा संचालित योजनाओं जैसे मुख्यमंत्री कन्या सुमंगला योजना, उप्र मुख्यमंत्री बाल सेवा योजना, पति की मृत्युपरांत निराश्रित महिला पेंशन योजना आदि के फार्म भरवाएं और स्वीकृत कराए जाएंगे. इसके साथ ही मानसिक मंदित महिलाओं के लिए गृह की स्‍थापना की जाएगी. जिसके तहत स्वयंसेवी संस्थाओं के जरिए लखनऊ में 100-100 बेड की क्षमता के 02 गृहों का संचालन किया जाएगा. जिसकी कुल लागत 4.57 करोड़ है. बता दें कि सामान्य महिलाओं के लिए संचालित विभागीय संस्थाओं में 203 मानसिक मंदित महिलाओं को आश्रय दिया गया है.

महिलाओं को दिया जाएगा कौशल विकास प्रशिक्षण

विभाग की ओर से आने वाले 06 माह की कार्ययोजना को तैयार कर लिया गया है. महिला संरक्षण तथा बाल देखरेख संस्थाओं में निवासित बच्चों व महिलाओं का कौशल विकास प्रशिक्षण दिया जाएगा. संस्थाओं में आवासित महिलाओं और 16 वर्ष से अधिक आयु के बच्चों को उनकी अभिरूचि के अनुरूप कौशल विकास प्रशिक्षण से जोड़ने हेतु उनकी अभिरूचि की मैपिंग व मैपिंग उपरांत प्रशिक्षण दिया जाएगा. इसके साथ ही संविदा तथा सेवा प्रदाता के जरिए से भरे जाने वाले पदों में से रिक्त पदों पर कार्मिकों का चयन किया जाएगा. जिसमें मिशन वात्सल्य के तहत कुल 136 रिक्त पद और वन स्टॉप सेंटर के तहत 26 जिलों में कुल 252 रिक्त पदों को भरा जाएगा.

सबको साथ चाहिए- भाग 2: क्या सही था माधुरी का फैसला

साल भर में ही वह काफी कुछ स्थिर हो गई थी. जीवन आगे बढ़ रहा था. मधुर मैडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रहा था. प्रिया भी पढ़ने में तेज थी. स्कूल में अव्वल आती, लेकिन माधुरी की सूनी मांग और माथा देख कर उस की मां के कलेजे में मरोड़ उठती, इतना लंबा जीवन अकेले वह कैसे काट पाएगी?

‘अकेली कहां हूं मां, आप दोनों हो, बच्चे हैं,’ माधुरी जवाब देती.

‘हम कहां सारी उम्र तुम्हारा साथ दे पाएंगे बेटा. बेटी शादी कर के अपने घर चली जाएगी और मधुर पढ़ाई और फिर नौकरी के सिलसिले में न जाने कौन से शहर में रहेगा. फिर उस की भी अपनी दुनिया बस जाएगी. तब तुम्हें किसी के साथ की सब से ज्यादा जरूरत पड़ेगी. यह बात तो मैं अपने अनुभव से कह रही हूं. अपने निजी सुखदुख बांटनेसमझने वाला एक हमउम्र साथी तो सब को चाहिए होता है, बेटी,’ मां उदास आवाज में कहतीं.  माधुरी उस से भी गहरी उदास आवाज में कहती, ‘मेरी जिंदगी में वह साथ लिखा ही नहीं है, मां.’

माधुरी का जवाब सुन कर मां सोच में पड़ जातीं. माधुरी को तो पता ही नहीं था कि उस के मातापिता इस उम्र में उस की शादी फिर से करवाने की सोच रहे हैं. 3 महीने पहले ही उन्हें सुधीर के बारे में पता चला था. सुधीर की उम्र 45 वर्ष थी. 2 वर्ष पूर्व ही ब्रेन ट्यूमर की वजह से उन की पत्नी की मृत्यु हो गई थी. 2 बच्चे 19 वर्ष का बेटा और 15 वर्ष की बेटी है. घर में सुधीर की वृद्ध मां भी है. नौकरचाकरों की मदद से पिछले 2 वर्षों से वह 68 साल की उम्र में जैसेतैसे बेटे की गृहस्थी चला रही थीं.

माधुरी की मां ने सुधीर की मां को माधुरी के बारे में बता कर विवाह का प्रस्ताव रखा. सुधीर की मां ने सहर्ष उसे स्वीकार कर लिया. वयस्क होती बेटी को मां की जरूरत का हवाला दे कर और अपने बुढ़ापे का खयाल करने को उन्होंने सुधीर को विवाह के लिए मना लिया.

‘मैं बूढ़ी आखिर कब तक तेरी गृहस्थी की गाड़ी खींच पाऊंगी. और फिर कुछ सालों बाद तेरे बच्चों का ब्याह होगा. कौन करेगा वह सब भागदौड़ और उन के जाने के बाद तेरा ध्यान रखने को और सुखदुख बांटने को भी तो कोई चाहिए न. अपनी मां की इस बात पर सुधीर निरुत्तर हो गए और वही सब बातें दोहरा कर माधुरी की मां ने जैसेतैसे उसे विवाह के लिए तैयार करवा लिया.

‘बेटी अकेलापन बांटने कोई नहीं आता. यह मत सोच कि लोग क्या कहेंगे? लोग तो अच्छेबुरे समय में बस बोलने आते हैं. साथ देने के लिए आगे कोई नहीं आता. अपना बोझ आदमी को खुद ही ढोना पड़ता है. सुधीर अच्छा इंसान है. वह भी अपने जीवन में एक त्रासदी सह चुका है. मुझे पूरा विश्वास है कि वह तेरा दुख समझ कर तुझे संभाल लेगा. तुम दोनों एकदूसरे का सहारा बन सकोगे.’

माधुरी ने भी मां के तर्कों के आगे निरुत्तर हो कर पुनर्विवाह के लिए मौन स्वीकृति दे दी. वैसे भी वह अब अपनी वजह से मांपिताजी को और अधिक दुख नहीं देना चाहती थी.

लेकिन तब से वह मन ही मन ऊहापोह में जी रही थी. सवाल उस के या सुधीर के आपस में सामंजस्य निभाने का नहीं था. सवाल उन 4 वयस्क होते बच्चों के आपस में तालमेल बिठाने का है. वे आपस में एकदूसरे को अपने परिवार का अंश मान कर एक घर में मिलजुल कर रह पाएंगे? सुधीर और माधुरी को अपना मान पाएंगे?

यही सारे सवाल कई दिनों से माधुरी के मन में चौबीसों घंटे उमड़तेघुमड़ते रहते. जैसेजैसे विवाह के लिए नियत दिन पास आता जा रहा था ये सवाल उस के मन में विकराल रूप धारण करते जा रहे थे.

माधुरी अभी इन सवालों में उलझी बैठी थी कि मां ने उस के कमरे में आ कर सुधीर की मां के आने की खबर दी. माधुरी पलंग से उठ कर बाहर जाने के लिए खड़ी ही हुई थी कि सुधीर की मां स्वयं ही उस के कमरे में चली आईं. उन के साथ 14-15 साल की एक प्यारी सी लड़की भी थी. माधुरी को समझते देर नहीं लगी कि यह सुधीर की बेटी स्नेहा है. माधुरी ने उठ कर सुधीर की मां को प्रणाम किया. उन्होंने प्यार से उस के सिर पर हाथ फेरा और कहा, ‘मैं समझती हूं माधुरी बेटा, इस समय तुम्हारी मनोस्थिति कैसी होगी? मन में अनेक सवाल घुमड़ रहे होंगे. स्वाभाविक भी है.

‘मैं बस इतना ही कहना चाहूंगी कि अपने मन से सारे संशय दूर कर के नए विश्वास और पूर्ण सहजता से नए जीवन में प्रवेश करो. हम सब अपनीअपनी जगह परिस्थिति और नियति के हाथों मजबूर हो कर अधूरे रह गए हैं. अब हमें एकदसूरे को पूरा कर के एक संपूर्ण परिवार का गठन करना है. इस के लिए हम सब को ही प्रयत्न करना है. मेरा विश्वास है कि इस में हम सफल जरूर होंगे. आज मैं अपनी ओर से पहली कड़ी जोड़ने आई हूं. एक बेटी को उस की मां से मिलाने लाई हूं. आओ स्नेहा, मिलो अपनी मां से,’ कह कर उन्होंने स्नेहा का हाथ माधुरी के हाथ में दे दिया.

स्नेहा सकुचा कर सहमी हुई सी माधुरी की बगल में बैठ गई तो माधुरी ने खींच कर उसे गले से लगा लिया. मां के स्नेह को तरस रही स्नेहा ने माधुरी के सीने में मुंह छिपा लिया. दोनों के प्रेम की ऊष्मा ने संशय और सवालों को बहुत कुछ धोपोंछ दिया.

‘बस, अब आगे की कडि़यां हम मां- बेटी मिल कर जोड़ लेंगी,’ सुधीर की मां ने कहा तो पहली बार माधुरी को लगा कि उस के मन पर पड़े हुए बोझ को मांजी ने कितनी आसानी से उतार दिया.

जल्द ही एक सादे समारोह में माधुरी और सुधीर का विवाह हो गया. माधुरी के मन का बचाखुचा भय और संशय तब पूरी तरह से दूर हो गया, जब सुधीर से मिलने वाले पितृवत स्नेह की छत्रछाया में उस ने प्रिया को प्रशांत के जाने के बाद पहली बार खुल कर हंसते देखा. अपने बच्चों को ले कर माधुरी थोड़ी असहज रहती, मगर सुधीर ने पहले दिन से ही मधुर और प्रिया के साथ एकदम सहज पितृवत व स्नेहपूर्ण व्यवहार किया. सुधीर बहुत परिपक्व और सुलझे हुए इंसान थे और मांजी भी. घर में उन दोनों ने इतना सहज और अनौपचारिक अपनेपन का वातावरण बनाए रखा कि माधुरी को लगा ही नहीं कि वह बाहर से आई है. सुधीर का बेटा सुकेश और मधुर भी जल्दी ही आपस में घुलमिल गए. कुछ ही महीनों में माधुरी को लगने लगा कि जैसे यह उस का जन्मजन्मांतर का परिवार है.

दोस्ती के जरिए प्यार में सेंध: भाग 2

संजय ने भट्ठे पर काम करने की योजना महेश के सामने रखी तो वह तुरंत ही तैयार हो गया. संजय महेश को ले कर सीधा पाकबड़ा के भट्ठे पर पहुंचा. वह उसी भट्ठे पर काम करता था. महेश ने वहां पर काम करना शुरू किया तो वहां पर उसे अच्छी आमदनी होने लगी. भट्ठे का काम भी पंसद आ गया था.

संजय भट्ठे पर बने एक कच्चे कमरे में ही रहता था. भट्ठा मालिक ने पहले ही मजदूरों के लिए कई कमरे बना रखे थे. महेश को काम पसंद आते ही संजय ने उसे अपने बगल वाला कमरा दिला दिया था.

भट्ठे पर काम करने में महेश का मन लग गया था. आमदनी भी अच्छी थी. लेकिन सारा दिन काम करने के बाद जब उसे शाम को खाना बनाना पड़ता था, उस से वह तंग आ गया था. इसी परेशानी को देखते हुए महेश ने सरस्वती को लाने का प्लान बनाया और एक दिन जा कर उसे साथ बुला लाया.

सरस्वती के वहां आते ही संजय की बांछें खिल गईं. उस की मन की सारी मुरादें पूरी हो गई थीं. महेश को भट्ठे पर लाने का उस का जो प्लान था, वह पूरा हो गया था.

 

सरस्वती भट्ठे पर आ कर अपने परिवार के साथसाथ संजय के लिए भी खाना बनाने लगी थी. खाना बनाने के साथसाथ वह महेश के काम में भी हाथ बंटा देती थी, जिस के कारण संजय का सारा दिन हंसीखुशी से गुजरता था. भले ही महेश को सारा दिन काम करने के बाद थकान हो जाती थी, लेकिन सरस्वती के सामने होते संजय की एनर्जी भी बढ़ जाती थी.

एक दिन महेश को किसी काम से अपने गांव जोगीपुर जाना पड़ा. वह सरस्वती और बच्चों को भट्ठे पर ही छोड़ गया था. उस दिन संजय को बहुत ही खुशी हुई थी. सारा दिन उस ने काम किया, लेकिन दिन कब निकला और कब छिप गया, उसे पता ही नहीं चला.

शाम हुई तो सरस्वती के अकेला होने की खुशी में उस के दिल में हलचल बढ़ती ही जा रही थी. शाम होने से पहले ही सरस्वती ने खाना भी बना लिया था. उस के बाद उस ने जल्दी ही बच्चों को खाना खिला कर सुला दिया था. बच्चों के सोते ही सरस्वती और संजय ने एक साथ खाना खाया.

सामने सरस्वती को अकेला देख कर संजय के सब्र का बांध टूटने को आतुर था. उस के चेहरे की आभा उस के दिलोदिमाग पर इस कदर हावी थी कि उस का मन बारबार कह रहा कि वह खानापीना छोड़ कर पहले उस के अधरों का रसपान करे.

सरस्वती को अकेला देखते ही उस की भूख उड़ गई थी. फिर उस ने जल्दीजल्दी थोड़ा खाना खाया. फिर बोला, ‘‘भाभी, आज मुझे भूख नहीं लग रही. मैं सोने जा रहा हूं. आज महेश तो है नहीं, इसलिए बच्चों को सावधानी के साथ ही सुलाना. अगर फिर भी कोई परेशानी हो तो मुझे उठा लेना.’’

‘‘ठीक है देवरजी, वैसे जब आप पास में हो तो मुझे क्या परेशानी होने वाली है.’’ सरस्वती ने जबाव दिया.

इस के बाद संजय अपने कमरे में

चला गया.

संजय के जाते ही सरस्वती ने फटाफट  अपना काम निपटाया. उस के बाद वह बच्चों के पास गई. दोनों बच्चे गहरी नींद में सोए पड़े थे. बच्चों को सोता देख उस ने गहरी सांस ली. फिर उस के मन में भी उथलपुथल मचने लगी थी.

उस दिन जितनी कामुकता की आग संजय के शरीर में लगी थी, उस से कई गुना तपिश सरस्वती के शरीर में पैदा हो गई थी. बच्चों को सोता छोड़ कर वह दबे पांव महेश के कमरे में पहुंची.

महेश के कमरे पर लगा टेंपरेरी दरवाजा खुला हुआ था. सरस्वती को संजय से यही उम्मीद थी. किवाड़ की आहट सुन कर संजय सोने का नाटक करते हुए खर्राटे भरने लगा. उस के बाद सरस्वती उस की पीठ के पीछे ही लेट गई. जैसे ही सरस्वती ने संजय के शरीर का स्पर्श किया, उस के शरीर के तार झनझना उठे. उस ने पल भर में ही पलटी मारी और सरस्वती को बांहों में भर लिया.

संजय अभी कुंवारा ही था. पहली बार सरस्वती को आलिंगन किया तो उस की काम वासना उस पर बुरी तरह से हावी हो गई. उसी दिन पहली बार संजय किसी औरत के संपर्क में आया था. वहीं सरस्वती भी काफी समय से इसी दिन का इंतजार कर रही थी.

उस रात संजय ने खुल कर सरस्वती के साथ मौजमस्ती की. साथ ही उस के शरीर के अंगअंग को अपने मोबाइल में कैद कर लिया था. उस वक्त सरस्वती ने भी अपने शरीर का वीडियो बनाने का विरोध नहीं किया था. संजय के साथ अपनी रात गुजारने के बाद उसे पहली बार अहसास हुआ कि वाकई महेश उस के लायक नहीं रहा.

सरस्वती ने एक बार संजय के सामने समर्पण किया तो वह हर रोज उस की आदी हो गई थी. उस के 2 दिन बाद महेश गांव से वापस आया तो सरस्वती को ज्यादा खुशी नहीं हुई.

उस दिन दोनों के बीच अवैध संबंध बनते ही प्यार भी बढ़ गया था. संजय के सामने महेश का प्यार उसे फीका महसूस होने लगा था. उस वक्त सरस्वती भले ही 2 बच्चों की मां बन चुकी थी, लेकिन उस की देह पहले के मुकाबले और भी ज्यादा खिल उठी थी. यही कारण था कि संजय उसे अपनी बीवी के रूप में देखने लगा था.

उस के बाद वह जो भी कमाई करता अधिकांश सरस्वती पर ही लुटाने लगा था. दोनों के बीच अवैध संबंधों का सिलसिला काफी समय तक चलता रहा.

संजय ने कई बार सरस्वती के सामने बात रखते हुए कहा, ‘‘हम दोनों इस तरह से कब तक छिपछिप कर मिलते रहेंगे. क्यों न हम यहां से भाग कर शादी

कर लें.’’

पहली बार तो सरस्वती ने उस से साफ कह दिया,‘‘महेश को छोड़ कर मैं तुम से शादी नहीं कर सकती. अगर तुम्हें मेरे साथ यूं ही दोस्ती निभानी है तो ठीक है, वरना तुम अपना दूसरा रास्ता देख लो.’’

दोस्ती के जरिए प्यार में सेंध: भाग 1

2 बच्चों की मां होने के बाद भी सरस्वती पति महेश के दोस्त संजय से अवैध संबंध बना कर जिंदगी के मजे ले रही थी. इसी दौरान संजय ने मोबाइल फोन से अंतरंग क्षणों की वीडियो भी बना ली. यही वीडियो बाद में ऐसा जलजला बनी कि…

2अगस्त, 2022 की रात के कोई डेढ़ बजे का वक्त रहा होगा. गांव के सभी लोग गहरी नींद में सोए हुए थे.

सरस्वती अपने घर के आंगन में अकेली ही सो रही थी. उसे अकेला सोता देख एक व्यक्ति घर में घुस आया और उस पर चाकू से हमला बोल दिया.

सरस्वती की चीखपुकार सुन कर घर के अंदर सो रहे उस के भाईबहन जाग गए. उन्होंने बाहर आ कर देखा तो वहां पर एक व्यक्ति सरस्वती पर चाकू से वार कर रहा था.

यह सब देखते ही घर में चीखपुकार मच गई. फिर भी उस के भाईबहनों ने हिम्मत जुटा कर चारों ओर से घेराबंदी करते हुए युवक को दबोच लिया. तब तक गांव के लोग भी वहां पर इकट्ठा हो गए थे. उस युवक का नाम संजय था, जो पास के गांव शादीनगर हजीरा का रहने वाला था और सरस्वती के पति महेश के साथ ही काम करता था.

घर वालों ने सरस्वती की हालत देखी तो उन का गुस्सा फूट पड़ा. उन्होंने आरोपी संजय की खूब पिटाई की, जिस के कारण वह भी गंभीर रूप से घायल हो गया.

उसी समय मिलक थाने में फोन कर के घटना की जानकारी दे दी गई. वारदात की सूचना पा कर तुरंत ही थानाप्रभारी सत्येंद्र कुमार सिंह पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए.

पुलिस ने सरस्वती और हमलावर दोनों की हालत बिगड़ती देख उन्हें मिलक के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र इलाज के लिए भेज दिया, जहां पर डाक्टरों ने चैकअप करने के बाद दोनों की नाजुक हालत देख जिला अस्पताल, रामपुर के लिए रेफर कर दिया था.

रास्ते में ही सरस्वती की हालत बिगड़ती जा रही थी और अस्पताल पहुंचने से पहले ही उस की मौत हो गई. जिला अस्पताल में सरस्वती को देखते ही डाक्टरों ने मृत घोषित कर दिया था. जबकि आरोपी व्यक्ति को इलाज के लिए भरती कर लिया था. इस घटना की सूचना मिलते ही रामपुर के एडिशनल एसपी डा. संसार सिंह व सीओ धर्म सिंह मर्छाल भी घटनास्थल पर पहुंच गए.

मौकामुआयना करने के बाद वह जिला अस्पताल पहुंच गए. उन्होंने मृतका के घर वालों से इस बारे में जानकारी ली.

संजय ने सरस्वती की हत्या क्यों की? यह तो केवल संजय जानता था या फिर मृतका सरस्वती. जबकि आरोपी संजय की उस समय नाजुक हालत बनी हुई थी. पुलिस इस केस की हकीकत जानने के लिए संजय के सही होने का इंतजार करने लगी थी.

5 अगस्त, 2022 को संजय की हालत में कुछ सुधार हुआ तो पुलिस उसे पूछताछ के लिए मिलक थाने ले आई थी. थाने लाने के बाद पुलिस ने उस से पूछताछ की तो उस ने जो जानकारी पुलिस को दी. उस से एक जुनूनी प्रेम कहानी उभर कर सामने आई.

उत्तर प्रदेश के जिला रामपुर के थाना मिलक अंतर्गत एक गांव है खाता चिंतामन. इसी गांव में रहता था नत्थूलाल का परिवार. नत्थूलाल के परिवार की आजीविका का साधन मात्र मेहनतमजदूरी करना था. उस के परिवार में उस की बीवी और बच्चों को मिला कर कुल 8 सदस्य थे, जिन में 3 बेटे और 3 ही बेटियां थीं.

नत्थूलाल ने अपने बच्चों के जवान होते ही 2 बेटों सोनू और शीशपाल की पहले ही शादी कर दी थी. शीशपाल की शादी के बाद सरस्वती का ही नंबर था. सरस्वती ने जैसे ही जवानी की दहलीज पर कदम रखा, नत्थूलाल को उस की शादी की चिंता भी सताने लगी थी.

सरस्वती देखनेभालने में सुंदर थी. जैसेजैसे जवानी उस पर हावी होती गई, उस के रंगरूप में निखार बढ़ता ही जा रहा था. जिस के कारण उस के गांव के कई लड़कों की उस पर ललचाई नजर जमी रहती थी. नत्थूलाल अपने गांव का माहौल ठीक से जानता था, इसलिए गांव के हालात देखते हुए ही उस ने समय से पहले अपनी बेटी की शादी करने की ठानी और उस के योग्य वर की तलाश भी शुरू कर दी.

उसी दौरान एक दिन उस की मुलाकात बाजपुर थाने के जोगीपुर निवासी कपिल से हुई. बातों ही बातों में शादी की बात चली तो कपिल ने उस की बेटी सरस्वती के लिए एक लड़का बताया. वह लड़का उस के गांव के ही रहने वाले रमेशलाल का बेटा महेश था.

कपिल ने उस के परिवार की तारीफ करते हुए बताया कि उन की बेटी उस परिवार में जा कर खुश रहेगी. रमेशलाल कपिल के पड़ोसी थे और वह उस के परिवार के बारे में ठीक से जानते थे. हालांकि रमेशलाल के पास अपनी जुतासे की जमीन नहीं थी. लेकिन उन का

परिवार मेहनतमजदूरी करने के बाद भी खुशहाल था.

शादी की बात चलते ही नत्थूलाल ने कपिल के गांव जा कर महेश पर नजर डाली. नजर डालते ही उन्होंने महेश को सरस्वती के लिए चुन लिया. फिर शादी की बात पक्की होते ही दोनों परिवार वालों ने शादी की तैयारियां भी शुरू कर दी थीं.

शादी का दिन रखा गया 9 मार्च, 2015. दोनों तरफ से शादी की तैयारियां पूरी होते ही विधिविधान से उन की शादी भी हो गई. महेश के साथ सात फेरे ले कर सरस्वती दुलहन बन कर उस के घर चली आई थी.

सरस्वती के साथ शादी करने के बाद महेश तो खुश था ही, साथ ही उस के घर वाले भी उस की तारीफ करते नहीं थकते थे. सरस्वती जितना ध्यान महेश का रखती थी, उस से कहीं ज्यादा उस के परिवार का भी रखती थी. इसी वजह से वह जल्दी ही अपने ससुराल वालों की चहेती बन गई थी.

महेश भले ही मजदूरी करता था, लेकिन कभी भी सरस्वती के खर्च में उस ने कमी नहीं आने दी थी. वह उस के हर शौक पूरे करता था. सरस्वती को अच्छा पहननेओढ़ने का बड़ा शौक था, जिस का महेश हमेशा ध्यान रखता था.

समय के साथ सरस्वती 2 बेटों की मां बन गई थी. जिस से उस के परिवार में और भी खुशहाली आ गई थी. उसी समय महेश में एक बुरी लत लग गई. उसे शराब पीने का चस्का लग गया.

इस के बाद वह अपनी कमाई का आधे से ज्यादा हिस्सा शराब पीने में खर्च करने लगा था, जिस के कारण उस

के घर की आर्थिक स्थिति गड़बड़ाने

लगी थी.

उस की बुरी लत को देखते हुए उस के मातापिता ने उसे समझाने की कोशिश की. लेकिन महेश को उन की नसीहत काट खाने को दौड़ने लगी थी. उस की हरकतों से आजिज आ कर आखिर उस के परिवार वालों ने उसे अलग कर दिया. परिवार वालों से अलग हो कर वह एक कमरे में ही रहने लगा. उस का खानापीना भी अलग ही बनने लगा था.

महेश के घर में सब कुछ सामान्य चल रहा था. लेकिन उस की थोड़ी सी गलती के कारण सरस्वती को परिवार वालों ने अलग कर दिया था. उस की उसी कमी के कारण पतिपत्नी में अनबन रहने लगी थी.

कपिल ने ही सरस्वती की शादी कराई थी. इसलिए उस ने कई बार कपिल से महेश की शिकायत की. लेकिन वह उस की बात भी मानने को तैयार न था.

उसी दौरान एक दिन थाना मिलकखानम क्षेत्र के शादीपुर हजीरा निवासी कपिल का साला संजय आया हुआ था. उस समय सरस्वती भी कपिल के घर गई हुई थी. उसी दौरान संजय को पता चला कि वह उसी के थाना क्षेत्र की रहने वाली है. यह बात संजय ने सरस्वती को बताई तो बह बहुत ही खुश हुई.

संजय अभी कुंवारा था. सरस्वती जब तक उस के पास रही, उसी के साथ बतियाती रही. उस के बाद जब वह जाने लगी तो संजय को बुला कर अपने घर ले गई. उस वक्त महेश घर से बाहर था. सरस्वती को अकेला पा कर संजय ने उस दिन महेश और सरस्वती के बीच चल रही सारी बातें खंगाल ली थीं. उस के बाद महेश ने उस का मोबाइल नंबर भी ले लिया था.

संजय जब तक कपिल के घर रहा, वह उस से मिलता रहा. लेकिन वहां से चले जाने के बाद भी वह अकसर उस से मोबाइल पर बात करता रहता था. सरस्वती देखने में सुंदर और बोलनेचालने में तेजतर्रार थी. संजय ने पहली मुलाकात में ही उसे अपने दिल में जगह दे दी थी.

संजय भी महेश की तरह ही मजदूर था. लेकिन अंतर इतना था कि महेश अनपढ़ सीधासादा और दारूबाज था. उस की बीवी हर वक्त बनठन कर रहती थी. लेकिन कभी भी उस ने उस के हुस्न की तारीफ नहीं की थी.

हालांकि शादी से 2 बच्चे होने तक वह उस के साथ खुश थी. लेकिन जब से उस की मुलाकात संजय से हुई थी, तब से महेश के प्रति उस के दिल में कुछ तीखापन आ गया था. उसे बाहर की हवा लगी तो उस का मन संजय के साथ हवाई उड़ान भरने लगा था.

 

संजय मुरादाबाद के पास कस्बा पाकबड़ा में ईंटभट्ठे पर काम करता था. वहां पर उसे अच्छी मजदूरी मिल जाती थी. लेकिन सरस्वती से मिलने के बाद उस का मन भी वहां से उचट गया था. फिर वह कुछ दिन काम करने के बाद सीधा अमरोहा जिले में स्थित जोगीपुरा गांव में अपनी बहन संतोष देवी के पास चला जाता था.

जोगीपुरा जाने के बाद वह अपनी बहन के घर कम सरस्वती के पास ज्यादा रहता था. उस का मन करता कि सरस्वती हर वक्त उस की आंखों के सामने ही रहे. संजय महेश की हर समय नशे में रहने वाली कमजोरी जान चुका था.

संजय ने उस की उसी कमी का लाभ उठाते हुए उस पर भी अपना विश्वास जमा लिया था. वह हर वक्त उस के साथ ही रहने लगा. धीरेधीरे दोनों के बीच पक्की दोस्ती हो गई. संजय अपनी मंजिल की ओर आसानी से जाने के लिए उसे शराब भी पिलाने लगा था.

महेश के साथ दोस्ती करने के बाद संजय ने एक योजना बनाई. उस ने सोचा कि किसी तरह से महेश उस के साथ ईंट भट्ठे पर काम करने के लिए तैयार हो जाए तो उसे सरस्वती को ले जाने में कोई परेशानी नहीं होगी.

टैस्टेड ओके: क्या कैरेक्टर टेस्ट में पास हुए विशाल और संजय

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बुराई: नुकसानदेह है ढाबा सैक्स

देश के छोटे से छोटे ढाबे के मैन्यू कार्ड में खानेपीने के हर आइटम के दाम दर्ज रहते हैं, लेकिन एक आइटम जो ढाबों पर इफरात से मिलता है, उस का नाम और दाम मैन्यू कार्ड में नहीं लिखा रहता. उसे आम बोलचाल की जबान में ‘गरम गोश्त’ कहते हैं. मैलीकुचैली सी कालगर्ल इन ढाबों की शान और जान होती हैं, जो  सस्ती भी होती हैं

28 फरवरी, 2022 को पुलिस ने इंदौर, मध्य प्रदेश के नजदीक एक ढाबे पर छापा मारते हुए 7 धंधे वालियों और 8 ग्राहकों को पकड़ा था तो किसी को हैरानी नहीं हुई थी, उलटे इसे छापा कम, बल्कि ढाबों पर देह के फलतेफूलते धंधे का इश्तिहार ज्यादा समझा गया था.

बाणगंगा इंदौर का पौश इलाका है, जहां के राजपूताना ढाबे पर पुलिस ने छापामारी करते हुए बताया था कि इस ढाबे के सामने की तरफ तो खानेपीने का इंतजाम है, लेकिन पीछे की तरफ छोटेछोटे कमरे बने हैं, जिन में धंधे वालियां और ग्राहक अपनीअपनी जरूरतें पूरी कर रहे थे. लड़कियों को पैसे की दरकार थी, तो मर्दों को सैक्स सुख चाहिए था.

इस खेल में कोई बात नई नहीं है, सिवा इस के कि छोटे लैवल पर भी जिस्मफरोशी का धंधा होता है. इस ढाबे पर कमरे का किराया 300 से 500 रुपए प्रति घंटा वसूला जाता था और कालगर्ल भी अपनी देह की कसावट और उम्र के मुताबिक इतनी ही रकम ग्राहक से वसूलती थीं.

रैडलाइट इलाकों के साथसाथ देह धंधा हर कहीं होता है, फर्क इतना है कि बड़े और नामी होटलों में यह बेहद महंगा होता है, जिस का खर्च अमीर लोग ही उठा पाते हैं. उलट इस के ढाबों पर कम बजट वाले लोग और ट्रक ड्राइवर जाते हैं, जो घंटे 2 घंटे में फारिग हो जाते हैं.

अभी तक सड़क किनारे और हाईवे पर बने ढाबों पर पुलिसिया छापे कम ही पड़ते थे, क्योंकि ये शहर से बाहर होते हैं और पुलिस वालों को इन से खास आमदनी भी नहीं होती.

लौकडाउन के बाद अब जब ढाबों का कारोबार भी पटरी पर लौट रहा है, तब वहां के दिन गुलजार और रातें रंगीन होने लगी हैं.

छोटे ढाबों पर सस्ता सैक्स

जो इंदौर में हुआ, वह हर कहीं होता है, फिर इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वहां आवाजाही कम है या ज्यादा है. भोपालइंदौर रोड के बीच कोई सौ बड़ेछोटे ढाबे हैं, जिन में से ज्यादातर पर ‘गरम गोश्त’ मिलता है.

इस संवाददाता ने जब कुछ ढाबे वालों को भरोसे में ले कर बातचीत की, तो उन्होंने कई दिलचस्प खुलासे किए. मसलन, शहर से सटे ढाबों में यह कारोबार कम होता है, क्योंकि वहां पुलिस की नजर भी रहती है और फैमिली वाले लोग भी ज्यादा आते हैं.

जैसेजैसे शहर पीछे छूटता जाता है और पुलिस का डर कम होता जाता है, वैसेवैसे यह कारोबार रफ्तार पकड़ने लगता है और हैरत की बात यह है कि दिन में भी यह धंधा चलता है.

आमतौर पर ग्राहक ट्रक ड्राइवर ही होते हैं, लेकिन अब शहरी लोग भी ढाबों का रुख करने लगे हैं. इन में भी पढ़नेलिखने वालों नौजवान और नौकरीपेशा कुंआरों की तादाद ज्यादा होती है. उन्हें अपनी जरूरत पूरी करने और पहचान छिपाने के लिए छोटे ढाबे बड़े महफूज लगते हैं, जो हकीकत भी है.

ये नौजवान लड़की अपने साथ लाते हैं या यहीं मिल जाती हैं? इस सवाल के जवाब में एक ढाबे के मालिक ने बताया, ‘‘दोनों तरह के ग्राहक आते हैं. दिन में ज्यादातर कार या मोटरसाइकिल वाले ग्राहक लड़की साथ लाते हैं. उन्हें बस कुछ देर के लिए जगह चाहिए होती है, जो उन्हें यहां 500 रुपए में मिल जाती है.’’

कहने पर उस ढाबा मालिक ने ढाबे के पीछे की तरफ कोई 200 कदम की दूरी पर बना एक छोटा सा कच्चा कमरा दिखाया, जिस में निवाड़ का एक पलंग भर था. एक कोने में ढाबे के कुछ बरतन और अनाज सहित मसालों के पैकेट पड़े हुए थे.

जाहिर है, इसलिए कि कभी अगर पुलिस वालों की दबिश हो तो इसे स्टोररूम बता कर पल्ला झाड़ा जा सके.

कभीकभार बिना लड़की वाले ग्राहक भी आते हैं. उन के लिए आसपास के गांवों से देह धंधा करने वाली बुला ली जाती हैं.

ढाबा मालिक ने बताया, ‘‘ऐसे ग्राहक लंबी दूरी पर चलने वाले ट्रक ड्राइवर ज्यादा होते हैं, जो आराम करने की गरज से यहां एकाध दिन रुकते हैं. ढाबे के पास के गांव की 3 लड़कियां बुलावे पर आ जाती हैं, जो ग्राहक से मोलभाव खुद कर लेती हैं. अकसर यह एक हजार रुपए से ज्यादा नहीं होता.’’

ढाबा मालिक को जगह मुहैया कराने के एवज में 500 रुपए मिलते हैं. उस का दूसरा लालच यह रहता है कि ट्रक ड्राइवर 3-4 वक्त का खाना खाएगा और शराब भी पिएगा. इस से भी बड़ी आमदनी हो जाती है.

ये लड़कियां किस तरह की हैं, यह भी इस ढाबा मालिक ने बताया कि तीनों लड़कियां गरीब घरों की हैं और खेतों में मेहनतमजदूरी कर के अपना पेट पालती हैं. एक की उम्र 30 साल है, जिस का पति नासिक के बगीचों में मजदूरी करता है.

एक बच्चे की मां का रोना यह है कि वह पैसे नहीं भेजता और न ही साथ ले जाता. साल में एक दफा दीवाली पर आता है और 8-10 दिन रुक कर चला जाता है.

दूसरी लड़की के घर बूढ़े मांबाप हैं, जिन की जिम्मेदारी उस के कंधों पर है. वह शादीब्याह में रोटीपूरी बेलने और बनाने जाती है.

तीसरी लड़की को उस के पति ने छोड़ रखा है. गांव के कुछ नौजवानों से उस के संबंध हैं, पर उन से हमेशा पैसा मिलने की गारंटी नहीं रहती, इसलिए वह ट्रक ड्राइवरों को खुश करने ढाबे पर आ जाती है.

इस धंधे में तीनों को बहुत ज्यादा पैसा नहीं मिलता है. ये औरतें महीने में 5,000 रुपए से ज्यादा नहीं कमा पाती हैं. और भी ढाबे वालों के पास इन के मोबाइल नंबर हैं.

महंगा ठिकाना, महंगा सैक्स

ढाबा अब सिर्फ खानेपीने की वह जगह नहीं है, जहां बाहर 4-6 खाट पड़ी होती हैं और जिन पर ट्रक ड्राइवर आराम फरमा रहे होते हैं या पेट पूजा कर रहे होते हैं. इस के आसपास गंदगी होती है और मच्छरमक्खियां भिनभिना रही होती हैं.

नए दौर के ढाबे अब बहुत हाईटैक और आलीशान भी होने लगे हैं. इंदौरमुंबई हाईवे के ढाबे देख कर हर किसी की आंखें खुली की खुली रह जाती हैं, जिन के कैंपस में ही एक बाजार सा लगा होता है. उन दुकानों पर जरूरत की हर चीज मिलती है. ऐसे फाइवस्टार ढाबे हर हाईवे पर हैं, जिन की पार्किंग में ही सैकड़ों कारें खड़ी दिख जाती हैं.

इन ढाबों पर देशदुनिया की सभी डिश मिलती हैं. इन में से एक डिश कालगर्ल भी है, जो इन ढाबों के इर्दगिर्द मिल जाती हैं, पर इन्हें आसानी से नहीं पहचाना जा सकता.

असल में इन ढाबों में लाइसैंसी शराब के अलावा ठहरने के लिए कमरे भी किराए पर मिलते हैं, जिन का एक दिन का किराया हजारों रुपयों में होता है. इन कमरों में भी देह धंधा होता है, लेकिन इन पर छोटे ढाबों जैसे छापे न के बराबर पड़ते हैं, क्योंकि यहां रसूख और पहुंच और पैसे वाले लोग ठहरते हैं, जो छोटे ढाबे की तरह लड़की साथ भी लाते हैं और यहां के इंतजाम से भी काम चलाते हैं.

हाईवे के इन ढाबों पर देह सुख की भारी कीमत अदा करनी पड़ती है, क्योंकि यहां की कालगर्ल का रेट ही 3,000 रुपए से शुरू होता है.

मैन्यू की डिश के हिसाब से देखें, तो छोटे ढाबों पर जो तंदूर की रोटी 5 रुपए में मिलती है, वह इन ढाबों पर 50 रुपए की मिलती है. यही कालगर्ल के मामले में होता है, जो सलीके वाली, हाईटैक और अच्छीखासी पढ़ीलिखी भी होती हैं.

जुलाई, 2020 में आगरा के टूंडला इलाके के एक ढाबे के कमरों से ऐसी ही कुछ कालगर्लों को ग्राहकों के साथ गिरफ्तार किया गया था. इन में कालेज जाने वाली लड़कियां भी शामिल थीं.

सोनीपत इलाके के मुरथल के ढाबे परांठों के लिए मशहूर हैं, लेकिन यह इलाका भी जिस्मफरोशी से बचा नहीं है. पिछले साल जुलाई महीने में पुलिस ने 6 ढाबों पर छापा मारते हुए 12 लड़कियों और उन के 3 ग्राहकों को पकड़ा था, जिन में से 3 लड़कियां विदेशों की थीं. एक रूस, दूसरी तुर्की और तीसरी उज्बेकिस्तान की थी. बाकी 9 लड़कियां दिल्ली से देह धंधे के लिए बुलाई गई थीं.

मुरथल की छापामारी भी इंदौर की तरह इश्तिहारी साबित हुई थी और यह चर्चा भी रही थी कि ढाबों पर यह धंधा बड़े पैमाने पर होने लगा है, जिस की जानकारी पुलिस को रहती है और कोई कार्यवाही न करने के एवज में उसे तगड़ा नजराना हफ्ते और महीने की शक्ल में मिलता है.

गंदगी से लबरेज छोटे ढाबों से ले कर चमकतेदमकते साफसुथरे ढाबों में एक बात तो समान है कि दोनों में ही ‘गरम गोश्त’ नाम की डिश भी जरूर मिलती है, फर्क ग्राहक की हैसियत और कालगर्ल के रेट का होता है.

देह धंधे की दूसरी जगहों के मुकाबले ढाबों पर सहूलियत भी रहती है और खतरा भी कम होता है. साथ ही साथ पहचान भी छिपी रहती है. लेकिन, अब पुलिस के बढ़ते दखल से ढाबे वाले संभल कर काम करने लगे हैं.

ये खतरे हैं ज्यादा

ढाबों पर सैक्स बस एक ही लिहाज से ज्यादा खतरनाक और नुकसानदेह है कि यहां की कालगर्ल बहुत ज्यादा भरोसेमंद नहीं होती हैं. कई बार तो वे गिरोह बना कर भी काम करती हैं.

मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले में तैनात रह चुके एक पुलिस इंस्पैक्टर की मानें, तो सस्ते किस्म की लड़कियां ग्राहक से लूटखसोट भी करती हैं. ग्राहक अगर सीधे से अपनी जेब उन के मुताबिक ढीली न करे तो इन के साथी मर्द आ कर हल्ला मचाने लगते हैं. अकसर लोग इज्जत जाने के डर से रिपोर्ट नहीं लिखाते हैं, जिस से इन्हें शह मिलती है.

दूसरा बड़ा खतरा एड्स समेत दूसरी सैक्स बीमारियों का रहता है. ज्यादातर ढाबों पर देहात कस्बे की लड़कियां सर्विस देती हैं, जो सेहत के मामले में जागरूक नहीं रहती हैं. आम ग्राहक और ट्रक ड्राइवर इन से बीमारियां ले जा कर अपनी बीवियों और पार्टनर को अनजाने में दे देते हैं और जिंदगीभर पछताते रहते हैं, इसलिए ढाबों पर सैक्स करते समय कंडोम जरूर इस्तेमाल करना चाहिए और साफसफाई का भी ध्यान रखना चाहिए, नहीं तो मजा सजा में भी तबदील हो सकता है.

लिव इन रिलेशन : कमजोर पड़ रही है डोर

कुछ दिन पहले नोएडा में घटी एक घटना में लिव इन पार्टनर ने अपनी प्रेमिका श्वेता की इमारत की 8वीं मंजिल से फेंक कर हत्या कर दी. प्रेमिका द्वारा बारबार शादी के लिए दबाव बनाने की वजह से आरोपी युवक ने इस हत्याकांड को अंजाम दिया. दिल्ली के सुल्तानपुरी में रहने वाले सुदामा उर्फ राजेश ने अपनी प्रेमिका मंजू का इसलिए कत्ल कर दिया, क्योंकि वह उस से एक बच्चा चाहता था. दूसरी ओर मंगोलपुरी में एक महिला ने अपने पार्टनर के रोजरोज शराब पी कर मारपीट करने से तंग आ कर खुदकुशी कर ली.

लिव इन रिलेशन में रह रहे पार्टनर की हत्या और खुदकुशी के नएनए मामले रोज सामने आ रहे हैं. ऐसे में इन रिश्तों को ले कर फिर से उंगलियां उठनी शुरू हो गई हैं. अहम सवाल यह है कि पश्चिम की इस परंपरा को तो हम ने स्वीकार कर लिया, लेकिन क्या हम अपनी पारंपरिक और दकियानूसी सोच से बाहर निकल पाए हैं.

इन तमाम मामलों पर गौर करें तो यही बात सामने आती है कि हम इस नए मौडल के साथ खुद को एडजस्ट करने में नाकाम साबित हुए हैं. यहां हम लिव इन सिस्टम पर कोई सवाल खड़े नहीं कर रहे हैं. इस की अपनी खूबियां और खामियां हैं, लेकिन जो भी मामले सामने आ रहे हैं उस से यही पता चलता है कि या तो हम पूरी तरह से इस सिस्टम को समझ ही नहीं पाए हैं या फिर इस के हिसाब से खुद को ढाल नहीं पाए हैं.

बढ़ रहा है रिश्ते का ग्राफ

एक स्त्री और पुरुष का बिना विवाह किए आपसी रजामंदी से एकसाथ रहने के रिश्ते को लिव इन रिलेशन कहते हैं. इस में एकसाथ रहने की कोई सामाजिक या आर्थिक मजबूरी नहीं होती और न ही कोई दबाव.

युवकयुवतियां सोचसमझ कर साथसाथ रहते हैं और जब चाहें अलग हो सकते हैं. कुछ समय पहले तक सोसायटी के लिए यह एक बड़ा सवाल था, लेकिन आज एक तरह से इस रिश्ते को कुछ हद तक शहरी समाज स्वीकार कर चुका है. महानगरों में यूथ ने लिव इन कल्चर को तेजी से अपना लिया है.

युवाओं ने अपनी सहूलत को ध्यान में रख ऐसे रिश्तों की ओर तेजी से कदम बढ़ाया. इस तेज रफ्तार जिंदगी में संतुलन बनाए रखने और कैरियर में आगे बढ़ने के लिए युवाओं को लिव इन रिलेशनशिप बिना बंधन के आसान रास्ता नजर आता है. यही वजह है कि ऐसे रिश्तों का ग्राफ लगातार बढ़ता जा रहा है.

चौराहे पर रिश्ता

आएदिन पार्टनर की हत्या और खुदकुशी के मामलों ने इस रिश्ते को चौराहे पर ला कर खड़ा कर दिया है. जिस स्वतंत्रता की चाहत में युवकयुवती एकदूसरे के करीब आए थे, वहां अब एक नए तरह का बंधन उन्हें नजर आने लगा है.

नोएडा में हुई ब्यूटीशियन श्वेता की मौत ने तरक्की पसंद शहरों में बदलते रिश्ते को ले कर कई सवाल खड़े कर दिए हैं. पति और ससुराल वालों के अत्याचार से परेशान श्वेता ने बागपत से नोएडा आ कर अपना काम शुरू किया था.

करीब डेढ़ साल पहले उस की जिंदगी में मुकेश आया. वह उस का बचपन का साथी था. दोनों आपसी रजामंदी के साथ रहने लगे. श्वेता की इतनी ही ख्वाहिश थी कि मुकेश उस से शादी कर ले, लेकिन शादी के इसी दबाव ने उस की जान ले ली. आरोप है कि मुकेश ने बिल्डिंग की 8वीं मंजिल से उसे नीचे फेंक दिया, जिस के कारण उस की मौत हो गई. पुलिस ने श्वेता की 10 साल की बेटी के बयान पर आरोपी मुकेश को गिरफ्तार कर लिया.

दिल्ली के सुल्तानपुरी में भी कुछ दिन पहले ऐसी ही कहानी दोहराई गई, लेकिन यहां मामला कुछ अलग था. यहां एक महिला मंजू के साथ सुदामा उर्फ राजेश लिव इन रिलेशन में रहता था.

करीब 11 साल पहले दोनों के बीच दोस्ती हुई थी. दोनों 7 साल से एकसाथ रह रहे थे. राजेश को कई साल से बच्चे की चाह थी, लेकिन मंजू इस के लिए तैयार नहीं थी. इसी बात को ले कर दोनों के बीच अकसर लड़ाई होती थी. मंजू का कहना था कि जब बच्चे की चाह थी तो शादी करनी चाहिए थी, फिर लिव इन रिलेशन में रहने का इतने सालों तक बहाना क्यों बनाया. मंजू की यह बात राजेश को नागवार गुजरी और आखिर इसी बात को ले कर उस ने मंजू की हत्या कर दी.

नहीं बदली है सोच

दरअसल, पश्चिम की इस परंपरा को हम ने अपनी सुविधा के हिसाब से आत्मसात तो कर लिया, लेकिन हमारी सोच वैसी ही पुरातनपंथी बनी हुई है. सवाल यह है कि जब इस रिलेशनशिप में कोई भी पार्टनर कभी भी अलग हो सकता है तो यहां दबाव बनाने जैसी कोई बात होनी ही नहीं चाहिए थी.

राजेश को यह सोचना चाहिए था कि मंजू उस की पत्नी नहीं थी, इसलिए उस पर बच्चे के लिए दबाव बनाना सरासर गलत था. वहीं श्वेता का मुकेश पर शादी के लिए दबाव बनाना लिव इन रिलेशनशिप की कसौटी पर खरा नहीं कहा जा सकता है.

इस रिलेशन में अलग होने की सुविधा है. यह पारंपरिक शादी की तरह जटिल बंधन नहीं है. अलग होने के लिए लोगों को किसी की सहमति की जरूरत नहीं होती.

लिव इन रिलेशनशिप में अगर पार्टनर के साथ संबंध ठीक है, तो ठीक, नहीं तो उस रिलेशनशिप को वहीं पर खत्म कर दिया जाना चाहिए. इसे आगे बढ़ाने का मतलब है मौत को दावत देना. इस रिलेशनशिप में कंप्रोमाइज के लिए कोई जगह नहीं होती. वैस्टर्न कल्चर में यह ‘वाकइन, वाकआउट’ रिलेशनशिप मानी जाती है.

दोनों पार्टनर में से जो भी जब चाहे, इस से बाहर आ सकता है और दूसरे के खिलाफ नैतिक जिम्मेदारी, बदचलनी का आरोप नहीं लगाता है. दरअसल, पश्चिम के इस मौडल को हम ने अपना तो लिया है, लेकिन हमारी सोच जस की तस बनी हुई है. पुरुष लिव इन पार्टनर को अपनी प्रौपर्टी समझने की भूल कर बैठता है. वह अपनी पार्टनर के साथ आम पति की तरह व्यवहार करने लगता है वहीं युवती भी शादी की जिद करने लग जाती है, जोकि सही नहीं है.

एकदूसरे के साथ ज्यादा वक्त गुजारने पर युवक या युवती भावुक होने लगते हैं, जोकि इस रिलेशनशिप के लिए फिट नहीं बैठता. इसलिए कुछ भी गलत होने से पहले ही इस रिश्ते पर विराम लगा देना चाहिए.

भरोसे की कमी

अब मंगोलपुरी की ही वारदात को लीजिए. यहां लिव इन में रह रही युवती ने इसलिए खुदकुशी कर ली, क्योंकि उस का पार्टनर शराब पी कर आएदिन उसे पीटता था.

यहां भी युवक पुरातन पुरुषवादी मानसिकता का शिकार नजर आता है. युवती भी पुरानी फिल्मों की अभिनेत्री की तरह धोखा खाने की हालत में खुदकुशी कर लेती है. वह युवती पुलिस के पास जा सकती थी. उस युवक के खिलाफ केस दर्ज करा सकती थी और उस युवक का साथ छोड़ सकती थी, लेकिन उस ने तंग आ कर खुदकुशी का खतरनाक रास्ता चुन लिया.

कुछ दिन पहले दिल्ली की एक अदालत ने मिजोरम की एक युवती को अपने पार्टनर की हत्या के जुर्म में 7 साल की सजा और 7 लाख रुपए का जुर्माना सुनाया था. इस युवती ने 2008 में अपने नाईजीरियाई पार्टनर विक्टर ओकोन की इसलिए हत्या कर दी थी कि उस ने युवती को बिना बताए उस के अकाउंट से 49 हजार रुपए निकाल लिए थे.

इस से पता चलता है कि साथ रहने के बावजूद पार्टनर के बीच वह विश्वास कायम नहीं हो पाता है जो एक पतिपत्नी के बीच रहता है. अब सवाल यह है कि अगर विक्टर भरोसे के काबिल नहीं था तो वह युवती उस के साथ क्यों रह रही थी? वह उस से अलग हो कर अपने लिए नए पार्टनर की तलाश कर सकती थी, लेकिन बजाय अलग होने के उस ने इस जघन्य वारदात को अंजाम दिया.

चलन बढ़ने की वजह

कैरियर की दौड़ में आज शादी एक बंधन जैसी लगने लगी है. युवा पार्टनर एकदूसरे के करीब तो आते हैं, लेकिन उज्ज्वल भविष्य बनाने की वजह से  वे शादी की जिम्मेदारी उठाने को तैयार नहीं होते. वे शादी को एक अड़ंगा मानते हैं लेकिन पार्टनर से वही सब चाहते हैं जो एक शादीशुदा पतिपत्नी का ही अधिकार है.

सैक्स शरीर की नैचुरल डिमांड है. साथ ही एक शख्स अपने इमोशंस को भी शेयर करना चाहता है, ऐसे में लिव इन रिलेशनशिप उन्हें बेहतर औप्शन नजर आता है.

इस दौरान वे पतिपत्नी की तरह एक ही छत के नीचे रहते हैं और फिजिकल रिलेशन भी बनाते हैं. इस से दोनों को न सिर्फ मैंटल सिक्युरिटी मिलती है, बल्कि दोनों का अलगअलग रहने का खर्च भी बच जाता है.

ज्यादातर लिविंग रिलेशन उन युवाओं में पाए गए हैं जो घर से दूर रह रहे हैं. उन के परिवार वालों को ऐसे रिश्ते की कोई खबर नहीं होती. लिविंग रिलेशन में रह रहे युवकयुवतियां अपने मांबाप या घर वालों से अपने रिश्ते को छिपा कर उन्हें अंधेरे में रखते हैं. ऐसे में बिना जवाबदेही के यह रिश्ता युवाओं को शुरुआती दौर में तो खूब रास आता है, लेकिन दिक्कत यह है कि लंबे समय बाद पार्टनर आम पतिपत्नी की तरह व्यवहार करने लग जाते हैं.

शादी और लिव इन रिलेशन

शादी महज एक बालिग युवकयुवती का मेल नहीं है. इस में 2 परिवारों का मिलन होता है. शादी से युवकयुवती को सामाजिक तौर पर एकसूत्र में बंधने की मान्यता हासिल होती है.

शादी से दोनों को सामाजिक प्रतिष्ठा मिलती है, लेकिन इस के उलट लिव इन अपनी जरूरतों के हिसाब से 2 युवाओं का मिलन है. शादी जहां एक तरह का स्थायी संबंध माना जाता है, वहीं लिव इन रिलेशनशिप में दोनों पार्टनर असुरक्षा की भावना के शिकार होते हैं.

दोनों के मन में डर रहता है कि न जाने उस का पार्टनर कब साथ छोड़ कर चला जाए. इस तरह के संबंधों में हमेशा तनाव की स्थिति बनी रहती है. यह रिश्ता समाज के दायरे से हट कर नितांत निजी रिश्ता है.

वहीं शादी इतनी जटिल प्रक्रिया है कि वहां दोनों युवकयुवती का अलग होना इतना आसान नहीं है. समाज उन्हें इस कीइजाजत नहीं देता. इस तरह से दोनों रिश्तों की अपनी खूबियां और खामियां हैं.

दरअसल, सवाल हमारी सोच का है. ग्लोबलाइजेशन के बाद से सभी मुल्कों के बीच परंपराओं का तेजी से आदानप्रदान बढ़ा है, लेकिन कईर् मामलों में हमारी स्थिति दो नावों पर सवारी करने जैसी होती है.

हम नई परंपराओं को स्वीकार तो कर लेते हैं, लेकिन अपनी पारंपरिक सोच नहीं  बदलना चाहते और यही वजह है कि हम उस में पूरी तरह से फिट नहीं हो पाते. लिव इन रिलेशन से जुड़े तमाम मामलों के पीछे यह एक महत्त्वपूर्ण कारण है.

युवतियों पर पड़ता है सब से अधिक असर

समाज सेविका आरती सिंह का कहना है कि ज्यादातर मामलों में ऐसे संबंध प्रेम पर नहीं, शारीरिक आकर्षण पर निर्भर होते हैं. शरीर का आकर्षण खत्म होते ही रिश्तों में दरार आनी शुरू हो जाती है. कपल के बीच झगड़े शुरू हो जाते हैं.

ऐसे संबंधों के टूटने का सब से ज्यादा असर युवतियों पर पड़ता है. पुरातन सोच रखने वाला हमारा समाज एक ऐसी युवती को कभी सम्मान नहीं देना चाहता है जो शादी से पहले किसी युवक के साथ एक ही घर में रह चुकी हो.

ऐसे में युवतियों को अपना भविष्य अंधकारमय नजर आने लगता है. आज भी इस पुरुष प्रधान समाज में पुरुष की गलती को नजरअंदाज किया जाता है. ऐसे में युवतियां अवसाद की शिकार हो जाती हैं और खुदकुशी जैसा खतरनाक कदम उठा लेती हैं.

कुछ दिन पहले पूर्व फ्लाइंग औफिसर अंजली गुप्ता और आईआईएम जैसे प्रतिष्ठित संस्थान की छात्रा मालिनी मुर्मू ने अपने पार्टनर के हाथों धोखा खाने के बाद खुदकुशी कर ली थी. यही हमारे समाज की कड़वी सचाई है. अधिकतर मामलों में युवतियों को ही सब से अधिक नुकसान उठाना पड़ता है.

जब कोई युवती पहली बार संबंध बनाती है तो उसे बहुत दर्द होता है, क्या यह सच है?

सवाल
मैं 24 वर्षीय अविवाहित युवती हूं. मुझे यौन संबंधों के विषय में बिलकुल भी जानकारी नहीं है. मुझे अपनी सहेलियों से पता चला है कि जब भी कोई युवक किसी युवती से पहली बार शारीरिक संबंध बनाता है तो बहुत दर्द होता है. क्या यह सच है? ऐसा क्यों होता है?

जवाब
जब भी कोई युवती किसी युवक के साथ पहली बार शारीरिक संबंध बनाती है तो थोड़ा दर्द होता है. कारण, समागम के दौरान स्त्री की कौमार्य झिल्ली फटती है, जिस से हलका सा रक्तस्राव भी होता है. यह स्वाभाविक प्रक्रिया है.

पर यह कोई जरूरी नहीं है कि प्रथम समागम में रक्तस्राव हो ही. साइकिल चलाने, रस्सीकूद, कामकाज के दौरान कभीकभी यह झिल्ली अपनेआप फट जाती है, जिस से प्रथम समागम के दौरान रक्तस्राव नहीं होता.

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प्यार के बदले सैक्स नहीं

प्यार एक गहरा और खुशनुमा एहसास है. जब किसी से प्यार होने लगता है तो हम शुरुआत में अकसर उस की सकारात्मक चीजें ही देखते हैं. उस समय हमें अपना अच्छाबुरा कुछ समझ नहीं आता और यही वह खुमारी होती है जब हम प्रेमी के प्यार के बदले में उस की हर जायजनाजायज मांग भी पूरी करने लगते हैं. लेकिन कुछ पल ठहर कर एक बार सोच लें कि कहीं आप प्रेमी को प्यार के बदले अपना शरीर तो नहीं सौंप रही हैं. अगर ऐसा है तो संभल जाइए, क्योंकि यह सही नहीं है. यह वक्त सिर्फ प्यार करने का है, सैक्स तो शादी के बाद भी हो सकता है. इस में आखिर इतना उतावलापन और जल्दबाजी क्यों?

प्यार को प्यार ही रहने दें

प्यार एक खूबसूरत एहसास है, इसे दिल से महसूस करें न कि शरीर से. एकदूसरे के साथ समय बिताएं, एकदूसरे को समझें, प्यारभरी बातें करें, भविष्य के सपने बुनें, एकदूसरे की केयर करें, अपनेपन का एहसास साथी के मन में जगाएं, उसे विश्वास दिलाएं कि आप उस के लिए एकदम सही जीवनसाथी साबित होंगे. अपने कैरियर पर ध्यान दें. खुद खुश रहें और साथी को भी खुश रखें. यह वक्त बस यही करने का है बाकी जो भावनाएं हैं उन्हें शादी के बाद के लिए बचा कर रखें.

प्यार में आकर्षण बना रहेगा

अगर आप किसी से प्यार करती हैं और सैक्स नहीं किया है तो सैक्स को ले कर चाह और एक आकर्षण बना रहने के कारण साथी के प्रति खिंचाव हमेशा बना रहेगा, लेकिन एक बार सैक्स हो जाने के बाद कोई नयापन नहीं रहेगा और वह आकर्षण जो आप को एकदूसरे के प्रति खींचता था, खत्म हो जाएगा.

अपराधबोध नहीं होगा

एक बार संभोग करने के बाद उसे बदला नहीं जा सकता. कई बार बाद में पता चलता है कि प्रेमी आप के लिए सही नहीं है तब वक्त से पहले संबंध बना लेने का अपराधबोध होता है. इसलिए जरूरी है कि जब तक पूरी तरह से आश्वस्त न हो जाएं तब तक संबंध न बनाएं.

उत्सुकता बनी रहेगी

जब कोई भी काम समय पर करते हैं तो उस का आनंद ही अलग होता है, लेकिन जब आप सैक्स शादी से पहले ही कर लेते हैं तो इसे ले कर कोई उत्सुकता नहीं रहती. यदि सैक्स न करने से आप की उत्सुकता बनी रहती है तो बेहतर है इसे शादी तक न किया जाए.

यौन रोगों से बचे रहेंगे

सैक्स के प्रति लापरवाही यौन रोग होने का खतरा काफी हद तक बढ़ा देती है. उस समय आप की प्राथमिकताएं शारीरिक आकांक्षाओं को पूरा करना होता है, लेकिन सैक्स करते समय किनकिन सावधानियों का खयाल रखना चाहिए यह बात आप सोचते नहीं हैं और गंभीर बीमारी की गिरफ्त में आ जाते हैं.

सच्चे प्यार में सैक्स का कोई मतलब नहीं

सच्चा प्यार किसी को देखते ही नहीं हो जाता, यह एकदूसरे को जानने और समझने के बाद होता है. सच्चे प्यार में कोई जल्दबाजी नहीं होती, इस में ठहराव होता है. एकदूसरे की आपसी अंडरस्टैंडिंग होती है, एकदूसरे पर भरोसा होता है, एकदूसरे की कद्र होती है. सच्चा प्यार हमेशा के लिए होता है. इस में प्रेमी एकदूसरे से दिल की गहराइयों से जुड़े होते हैं. एकदूसरे के प्रति अपनीअपनी जिम्मेदारियों का एहसास होता है इसलिए उन्हें पता होता है कि सैक्स का सही समय शादी के बाद ही है और ऐसा करने के लिए वे एकदूसरे पर जोर भी नहीं डालते, क्योंकि इस के लिए इंतजार करना भी उन के इसी सच्चे प्यार का एक अहम हिस्सा होता है.

प्रेमी की पहचान करने का सही वक्त

यदि प्रेमी बारबार आप से शारीरिक संबंध बनाने पर जोर दे रहा है तो इस का मतलब उसे आप से ज्यादा इंट्रस्ट संबंध बनाने में है. उसे आप की भावनाओं का खयाल रखते हुए शादी तक इस चीज के लिए सब्र रखना चाहिए, लेकिन अगर वह ऐसा नहीं कर पा रहा है तो या तो उस की नीयत में खोट है या फिर वह आप का साथ निभाने के काबिल ही नहीं है.

सैक्स के नुकसान

बोरियत हो जाएगी

कुछ लोगों के लिए सैक्स ही सबकुछ होता है और जब उन्हें उस की पूर्ति हो जाती है तो उन की सारी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं और फिर उन्हें प्रेमिका में कोई रुचि नहीं रहती. उन्हें उस के साथ समय बिताने, घूमने, हंसीमजाक करने में बोरियत लगने लगती है. ऐसे में रिश्ते का लंबे समय तक खिंच पाना मुश्किल हो जाता है.

प्रैग्नैंट हो गईं तो मुश्किल

बाजार में कई तरह के गर्भनिरोधक उपलब्ध हैं, लेकिन कई बार वे भी पूरी तरह से सक्षम नहीं होते. कई बार आप को पता भी नहीं चलता कि आप गर्भवती हैं और जब पता चलता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है. इस के बाद मानसिक परेशानी का ऐसा दौर शुरू होता है जो आप को अंदर तक तोड़ कर रख देता है.

शादी न हुई तो दिक्कत

आज सारी परिस्थितियां आप के पक्ष में हैं और आप को लग रहा है कि आप के प्रेमी से ही आप की शादी होगी, लेकिन समय बदलते देर नहीं लगती, हो सकता है कल परिस्थितियां कुछ और हों. आप दोनों की किन्हीं कारणों से शादी न हो पाए, तो फिर क्या करेंगी?

जिस के साथ आप की शादी होगी अगर उस को आप के शादी से पहले के संबंधों के बारे में पता चल गया तो जिंदगी दूभर हो जाएगी या फिर हमेशा आप डरती रहेंगी कि कहीं यह बात खुल गई तो? ऐसे में आप शादी के बाद के खूबसूरत पलों को ढंग से ऐंजौय नहीं कर पाएंगी.

रिश्ते से बाहर आना मुश्किल

अगर आप अपने बौयफ्रैंड के साथ बिना संबंध बनाए डेट कर रहे हैं और आप को लगता है कि आप दोनों इस रिश्ते को आगे बढ़ाने में सहमत नहीं हैं तो रिश्ता खत्म करना आप के लिए काफी आसान होता है, लेकिन एक बार शारीरिक संबंध बन जाने के बाद उस रिश्ते से बाहर आना भावनात्मक और सामाजिक स्तर पर बहुत कठिन हो जाता है.

मलाल न हो

आप जिस व्यक्ति के साथ संबंध बना रही हैं वह आप के लिए काफी महत्त्वपूर्ण होना चाहिए. केवल शारीरिक जरूरतें पूरी करने के लिए संबंध बनाना सही नहीं है.

ब्लैकमेलिंग का शिकार न हों

कई बार देखने में आता है कि जिस पर हम सब से ज्यादा भरोसा करते हैं वही हमारा विश्वास तोड़ता है. आएदिन अखबार ऐसी सुर्खियों से भरे रहते हैं कि प्यार करने के बाद सैक्स किया, फिर धोखा दिया. अकसर प्रेमी इस तरह की वारदात को अंजाम देते हैं इसलिए अगर बौयफ्रैंड धोखेबाज निकला और उस ने आप का कोई वीडियो बना लिया और फिर इस के जरिए आप को ब्लैकमेल करने लगा तो फिर क्या होगा?

माना कि आप का बौयफ्रैंड ऐसा नहीं है पर यह काम उस का कोई दोस्त या कोई अनजान भी तो कर सकता है, तब क्या करेंगी? किस से मदद मांगेंगी? इसलिए ऐसा काम करना ही क्यों, जिसे करने के बाद परेशानी भुगतनी पड़े. इसलिए तमाम बातों को ध्यान में रख कर ही आगे कदम बढ़ाएं अन्यथा ताउम्र इस का दंश झेलना पड़ेगा.    

महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने में मददगार गुलाबी मीनाकारी

गुलाबी मीनाकारी अपनी खूबसूरत कारीगरी से जहां पूरी दुनिया में धूम मचा रही है. वही महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने में भी मददगार साबित हो रही है. सरकार की “समर्थ “योजना के अंतर्गत महिलाओं को गुलाबी मीनाकारी का हुनर सिखाया जा रहे है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विदेश यात्रा के दौरान अपने ख़ास मेहमानों को अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी में बनी ग़ुलाबी मीनाकारी के उत्पादों को उपहार स्वरुप देते है. जिससे इस जीआई उत्पाद की मांग देश और विदेश में बढ़ती जा रही है. ग़ुलाबी मीनाकारी से दूर हो रहे शिल्पी अब प्रशिक्षण लेकर एक बार फिर इस प्राचीन कला से जुड़ रहे है.

जी.आई.उत्पाद और वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट में शामिल गुलाबी मीनाकारी की ख़ूबसूरती कायल पूरी दुनिया होती जा रही. सहायक निदेशक हस्तशिल्प अब्दुल्ला ने बताया कि  सरकार गुलाबी मीनाकारी का हुनर  सिखाने के लिए “समर्थ”नाम से  प्रशिक्षण कार्यक्रम चला रही है. जिससे महिलाएं आत्मनिर्भर बन रही है. समर्थ नाम से चल रहे प्रशिक्षण कार्यक्रम 65 दिनों का होता है. जिसमें सरकार प्रशिक्षुओं को 300 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से प्रोत्साहन राशि भी देती है. ये प्रशिक्षण कार्यक्रम वस्त्र मंत्रालय द्वारा कराया जा रहा है.

सहायक निदेशक ने बताया कि 2 अक्टूबर 2021 से प्रशिक्षण का कार्यक्रम चल रहा है. प्रशिक्षण कार्यक्रम में महिलाएं शामिल हो रही है. अभी तक 60 महिलाएं  प्रशिक्षण ले चुकी है. जिसमें सीधे तौर पर करीब 70 प्रतिशत महिला काम करके आत्मनिर्भर बन रही है. जबकि बाकी पार्ट टाइम काम करके कमाई कर रही है. प्रशिक्षण कार्यक्रम की सफलता इसी बात से लगाई जा सकती है की इसमें वेटिंग लिस्ट चल रही है. प्रशिक्षण कार्यक्रम को पुख्ता बनाने के लिए के बायोमेट्रिक अटेंडेंस ,वीडियो ग्राफ़ी कराइ जाती है. जिसमे 80 प्रतिशत अटेंडेंस अनिवार्य है.  टीम प्रशिक्षुओं का असेसमेंट करने के बाद पास करती है तभी  प्रोत्साहन राशि और सर्टिफिकेट  दिया जाता है.

प्रशिक्षण दे रहे नेशनल अवार्डी कुंज बिहारी ने बताया  कि प्रधानमंत्री अपने विदेशी मेहमानों को ग़ुलाबी मीनाकारी का  नायब तोहफ़ा जरूर देते और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा लोगों  को उपहार देने और लोगों से जी आई और ओडीओपी को उपहार स्वरूप देने की अपील करने से हस्त शिल्पियों के हुनर की मांग बढ़ी है. और गुलाबी मीनाकारी को  संजीवनी मिली है.

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