प्रेम का निजी स्वाद: महिमा की जिंदगी में क्यों थी प्यार की कमी

Romantic Story In Hindi

मनोहर कहानियां: अय्याशी में गई जान

27 फरवरी, 2022 को सुबह ही भाई सोनू कुमार का नंबर देखते ही सोनिया चहक उठी. उस ने फोन उठाया तो सोनू ने कहा, ‘‘आज रात मैं ने नीशू और उस की मां जयंती की हत्या कर दी. उन दोनों की लाशें घर में पड़ी हुई हैं. मैं बच्चों को साथ ले कर तेरे पास आ रहा हूं.’’

भाई का फोन रिसीव करते ही उस की खुशियां काफूर हो गईं. इस से पहले कि सोनिया उस से कुछ बात कर पाती, सोनू ने फोन काट दिया.

भाई की बात सुनते ही उस का माथा घूम गया. उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उस का भाई जो कह रहा था, वह सच था या वह मजाक कर रहा था.

भाई की बात सुनते ही सोनिया सदमे में पहुंच गई. उस ने उस के बाद कई बार भाई के मोबाइल पर काल लगाने की कोशिश की, लेकिन उस ने रिसीव नहीं की. उस के बाद सच्चाई जानने के लिए उस ने अपने ममेरे भाई रामपाल को फोन कर भाई सोनू के घर की स्थिति जानने के लिए भेजा.

ममेरा भाई रामपाल उस के घर पहुंचा तो घर पर बाहर से ताला लगा हुआ था. उस ने उस के पड़ोसियों से सोनू के बारे में जानकारी लेनी चाही तो किसी से भी कुछ जानकारी नहीं मिल पाई. उस के बाद रामपाल सिंह सीधे जसपुर कोतवाली पहुंचा.

कोतवाली पहुंचते ही उस ने कोतवाल जे.एस. देऊपा के सामने सारी हकीकत रख दी.

एक घर में दोहरे हत्याकांड की बात सुनते ही कोतवाल देऊपा पुलिस टीम के साथ जसपुर कस्बे में मोहल्ला नत्था सिंह पंडों वाले कुएं के पास स्थित सोनू के घर पहुंचे और उन्होंने उस के बंद घर का ताला तुड़वाया.

पुलिस जैसे ही घर के अंदर घुसी, वहां का दृश्य दिल को दहलाने वाला था. एक कमरे में सोनू की 35 वर्षीय पत्नी नीशू की खून से लथपथ लाश पड़ी हुई थी. लाश के पास ही रक्तरंजित पाटल (गंडासा) पड़ा हुआ था.

दूसरे कमरे में उस की 55 वर्षीय सास जयंती की चारपाई पर लाश पड़ी हुई थी. जयंती का शव रजाई से ढंका हुआ था. दोनों की एक ही तरह पाटल से काट कर हत्या की गई थी. दोनों के गरदन और शरीर पर पाटल के कई निशान मौजूद थे.

दोनों को मौत की नींद सुलाने के बाद सोनू घर से फरार हो गया था. इस दोहरे हत्याकांड की जानकारी लगते ही पूरे शहर में सनसनी फैल गई. जिस ने भी सुना, वह घटना की जानकारी लेने के लिए सोनू के घर पहुंचने लगा.

देखते ही देखते वहां पर लोगों का हूजूम उमड़ पड़ा. इस घटना की सूचना पर एसपी चंद्रमोहन सिंह, सीओ वीर सिंह भी जानकारी लेने के लिए घटनास्थल पर पहुंचे.

पुलिस ने ही इस घटना की जानकारी सोनू की ससुराल जिला मुरादाबाद, गांव टांडा अफजल ठाकुरद्वारा निवासी वीरसिंह की दी. अपनी पत्नी और बेटी की हत्या की सूचना पाते ही वीर सिंह ऊधमसिंह नगर के कस्बा जसपुर पहुंच गए.

पुलिस ने घटनास्थल की बारीकी से जांचपड़ताल करने के बाद सोनू के बारे में जानकारी ली. इस से पहले कि पुलिस सोनू के पास पहुंच पाती, वह अपने तीनों बच्चों को अपनी बहन सोनिया के पास छोड़ कर फरार हो गया था.

पुलिस पूछताछ के दौरान पता चला कि सोनू की नीशू के साथ दूसरी शादी हुई थी. उस की पहली पत्नी उसे छोड़ कर चली गई थी. सोनू नेटवर्किंग करता था. जिस में वह युवकयुवतियों को भी अपने साथ जोड़ता था. उसी काम के चलते उस ने कई युवतियों से अवैध संबंध बना रखे थे.

सोनू की बीवी नीशू उस की इन हरकतों से परेशान थी. जिस के कारण वह अपनी पत्नी से नफरत करने लगा था. उसी नफरत के चलते उस ने अपनी पत्नी नीशू और सास की हत्या कर दी होगी.

सोनू कुमार के बारे में विस्तृत जानकारी जुटा कर पुलिस ने सासबहू दोनों की लाशों का पंचनामा भर कर उन्हें पोस्टमार्टम हेतु भिजवा दिया था. इस डबल मर्डर मामले के जल्दी खुलासे के लिए काशीपुर एसपी चंद्रमोहन सिंह ने एसओजी टीम को भी लगा दिया.

आरोपी सोनू की गिरफ्तारी के लिए एसओजी की कई टीमें गठित की गईं. एसओजी प्रभारी कमलेश भट्ट ने सोनू के मोबाइल नंबर को सर्विलांस पर लगाया तो उस का मोबाइल स्विच्ड औफ मिला.

उसी दौरान पता चला कि सोनू बिजनौर के धामपुर कस्बे में देखा गया था. लेकिन मोबाइल बंद होने के कारण पुलिस उस की लोकेशन का पता नहीं कर पा रही थी.

पुलिस जांचपड़ताल के दौरान सोनू की बहन सोनिया ने पुलिस को बताया कि सोनू ने उस से बात करते वक्त कहा था कि उस ने अपनी पत्नी और सास को खत्म कर दिया है, अब वह स्वयं भी आत्महत्या करने जा रहा है. उस के बाद से ही उस का मोबाइल बंद आ रहा है.

इस जानकारी के मिलते ही पुलिस ने सोचा कि कहीं सोनू ने कुछ जहरीला पदार्थ खा कर आत्महत्या तो नहीं कर ली. उस के बाद पुलिस ने उसे हरसंभव स्थान पर खोजा, लेकिन उस का कहीं भी अतापता नहीं लग सका.

पुलिस को जानकारी मिली थी कि सोनू अपनी बीवी और सास की हत्या कर अपने बच्चों को एक कार में बैठा कर अमरोहा पहुंचा था. लेकिन वह कार किस की थी, इस बात की जानकारी किसी को नहीं थी. पुलिस ने हरसंभव स्थान पर उस की तलाश की, लेकिन उस का कहीं भी अतापता नहीं चल सका.

रेलवे ट्रैक पर मिली लाश

उसी दौरान 28 फरवरी, 2022 को मृतका नीशू के भाई सौरभ कुमार ने सोनू कुमार के खिलाफ जसपुर कोतवाली में रिपोर्ट दर्ज करा दी.

सोनू के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज होते ही एसओजी टीम एक्शन में आ गई. पुलिस की कई टीमें जिला बिजनौर, मुरादाबाद, अमरोहा आदि क्षेत्रों में रवाना हुईं, लेकिन कहीं से भी उस की लोकेशन ट्रेस नहीं हो पाई.

पुलिस सोनू की तलाश में इधरउधर भटक रही थी, उसी दौरान पहली मार्च को गाजियाबाद रेलवे स्टेशन के नजदीक रेलवे ट्रैक पर रेलवे पुलिस फोर्स (आरपीएफ) के जवानों को एक व्यक्ति की लाश पड़ी मिली. आरपीएफ के जवानों ने उस की सूचना कविनगर थानाप्रभारी आनंद प्रकाश मिश्र को दी.

लाश की सूचना पर कवि नगर थाना पुलिस घटनास्थल पर पहुंची. पुलिस ने पहुंचते ही मृतक की जेब की तलाशी ली तो उस में एक पौकेट डायरी और आधार कार्ड मिला. उस की जेब से एक सुसाइड नोट भी मिला, जिस में लिखा था, ‘मैं सोनू कुमार नीशू की मौत का जिम्मेदार हूं.’

आधार कार्ड के माध्यम से मृतक की पहचान जसपुर, उत्तराखंड निवासी सोनू के रूप में हुई.

कविनगर थानाप्रभारी आनंद प्रकाश मिश्र ने उत्तराखंड एसओजी प्रभारी कमलेश भट्ट को फोन पर मामले की जानकारी दी.

इस जानकारी के मिलते ही जसपुर कोतवाल जे.एस. देऊपा ने मृतक सोनू के घर वालों को इस की सूचना दी. सोनू के आत्महत्या करने की जानकारी मिलते ही उस के घर वाले और जसपुर पुलिस तुरंत ही गाजियाबाद पहुंची, जहां पर पुलिस ने अपनी काररवाई करते हुए उस की लाश उस की बहनों को सौंप दी.

सोनू के खत्म होते ही एक परिवार पूरी तरह से खत्म हो गया. मृतक सोनू के तीनों बच्चे उस की बहन के पास अमरोहा में थे. सोनू ने अपने सुसाइड नोट में लिखा, ‘नीशू, मैं तुझे बहुत ही प्यार करता था.’

फिर ऐसा क्या हुआ कि अचानक दोनों के बीच की डोर इतनी कमजोर पड़ गई कि सोनू को इतना बड़ा कदम उठाने को मजबूर होना पड़ा.

इस की जो हकीकत सामने आई, वह इस प्रकार थी.

उत्तराखंड के जिला ऊधमसिंह नगर का एक कस्बा है जसपुर. इसी कस्बे में ठाकुर मंदिर के ठीक पीछे स्थित मोहल्ले में रहता था कैलाशनाथ का परिवार.

कैलाशनाथ के 5 बच्चे थे. 4 बेटियां और इकलौता बेटा निखिल उर्फ सोनू कुमार. कैलाशनाथ ने समय से ही सभी बच्चों की शादी कर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली थी.

बच्चों की शादी होने के बाद ही कैलाशनाथ और उन की पत्नी की मौत हो गई थी. मांबाप की मौत के बाद सोनू अपनी बीवी राजवती के साथ रह रहा था.

सोनू की शादी अब से लगभग 10 साल पहले जिला बिजनौर के गांव झालू निवासी राजवती से हुई थी. सोनू शुरू से ही तेजतर्रार था. राजवती के साथ शादी करने के कुछ समय तक तो उन दोनों के बीच सब कुछ सही रहा था. लेकिन फिर सोनू उसे परेशान करने लगा था.

सोनू शुरू से ही आवारा किस्म का युवक था. वह कामधंधा कुछ नहीं करता था. शादी के बाद उस के खर्चे बढ़े तो वह परेशान रहने लगा. घर की आर्थिक स्थिति को देखते हुए राजवती ने कई बार उस से कुछ काम तलाशने को कहा. लेकिन उसे कहीं भी कोई काम नहीं मिला. उस के बाद वह राजवती के पास रखे पैसे भी अपने खर्च के लिए ले लेता था.

उसी बीच राजवती एक बच्ची स्पर्श की मां भी बन गई थी. बच्ची के घर में आने के बाद आए दिन दोनों के बीच में खटपट रहने लगी थी. मियांबीवी में मनमुटाव के चलते ही कई बार राजवती अपने मायके भी चली गई थी.

घर में विवाद ज्यादा बढ़ा तो जल्दी ही दोनों के बीच तलाक की नौबत आ गई थी. उसी सब के चलते राजवती एक दिन अपने मायके चली गई, फिर वापस नहीं आई.

सोनू की हरकतों से आजिज आ कर राजवती के मायके वालों ने सोनू पर मुकदमा डाल दिया था, जिस के कारण उसे जेल की हवा भी खानी पड़ी थी.

जेल से आने के बाद वह कुछ ज्यादा ही परेशान रहने लगा था. उस का सब से बड़ा कारण था उस की बेटी स्पर्श, जो राजवती के मायके जाने के बाद उसी के पास रह रही थी. राजवती के मायके वालों ने काफी कोशिश की कि किसी भी तरह से दोनों के संबंध बने रहें. लेकिन सोनू अपनी हरकतों से बाज नहीं आया.

उस की हरकतों से परेशान हो कर राजवती ने कोर्ट के माध्यम से उस से तलाक ले लिया. बीवी से तलाक लेने के बाद वह अकेला पड़ गया था. उस की सभी बहनों की शादी हो चुकी थी. उस की बेटी स्पर्श उसी के साथ थी, जिस की परवरिश करना उस के लिए टेढ़ी खीर हो रही थी.

उसी मुसीबत के दौर में सोनू की मुलाकात बिजनौर निवासी पंकज राजपूत से हुई. पंकज राजपूत एक मार्केटिंग कंपनी में एरिया मैनेजर था. पंकज के संपर्क में आते ही उसे उसी कंपनी में सेल्स एग्जीक्यूटिव की नौकरी मिल गई. लेकिन उस की नौकरी ऐसी नहीं थी, जिस से उसे हर माह बंधाबंधाया वेतन मिल सके. वह एक मार्केटिंग कंपनी थी, जिस में कंपनी में टिके रहने के लिए एक टारगेट पूरा करना होता था.

उस मार्केटिंग कंपनी का औनलाइन काम था, जिस में कंपनी का काम करते हुए खुद अपना भविष्य बनाना होता था. अपना कैरियर बनाने के लिए सोनू को युवकयुवतियों से संपर्क करने के लिए दिनरात एक करना पड़ा.

सोनू हर रोज घर से निकलता और नएनए ग्राहकों की तलाश करता. कुछ ही दिनों में उस की मेहनत रंग लाई. जल्दी ही उस के कई युवकयुवतियों से संपर्क बन गए थे.

सोनू शुरू से ही ऐशोआराम की जिंदगी जीने वाला शख्स था. वह इस से पहले कई जगह काम कर चुका था. लेकिन वह कहीं पर भी ज्यादा दिन नहीं टिक पाता था.

मार्केटिंग का काम चालू होते ही उस के घर पर युवकयुवतियों का आनाजाना शुरू हो गया था. उसी नेटवर्किंग के काम के चलते वह महिलाओं के करीब हो जाता. उसी काम के चलते उस की मुलाकात नीशू से हुई.

सोनू की प्रेम दीवानी हो गई नीशू

नीशू देखनेभालने में सुंदर थी. नीशू ने इंटरमीडिएट पास कर लिया था. उस के बाद वह भी किसी जौब की तलाश में थी.

कुछ अनौपचारिक मुलाकातों के बाद ही सोनू ने नीशू को नौकरी दिलाने का झांसा दे कर अपने जाल में फंसा लिया था. फिर धीरेधीरे अपने दिल की पीड़ा उस के सामने रखते हुए उस के दिल में भी अपने प्रति प्यार जगा दिया था.

सोनू के संपर्क में आने के बाद नीशू उस की प्रेम दीवानी हो गई. सोनू ने नीशू के सामने अपनी पिछली जिंदगी पर परदा डालते हुए बताया कि वह अभी कुंवारा ही है. जिस के बाद नीशू पूरी तरह से अपनी जिंदगी की बागडोर उस के हाथ में थमाने पर मजबूर हो गई थी.

नीशू के संपर्क में आने के बाद सोनू भी उस के साथ अपनी जिंदगी गुजारने के सपने संजोने लगा. दोनों के बीच प्रेम प्रसंग चालू होते ही सोनू कई बार नीशू को अपने साथ अपने घर पर भी ले जाता था.

उस दौरान कई बार नीशू ने सोनू से उस की नौकरी लगाने की बात कही तो उस ने साफ शब्दों में कहा कि अब उसे नौकरी की चिंता करने की जरूरत नहीं. वह जल्दी ही उस के साथ शादी कर के अपना घर बसाते ही उसे नौकरी भी दिला देगा.

इस के बाद नीशू पूरी तरह से निश्चिंत हो गई थी. सोनू ने नीशू से प्रेम जताते हुए उस के साथ अवैध संबंध भी स्थापित कर लिए थे.

कुछ समय तक तो दोनों के बीच प्रेम प्रसंग चोरीछिपे चलता रहा. लेकिन समय के गुजरते उन दोनों की हकीकत नीशू के घर वालों के सामने आ गई.

नीशू की हकीकत सामने आते ही उस के घर वालों को बहुत ही बुरा लगा. लेकिन नीशू ने अपने घर वालों को समझा दिया कि वह अब बालिग हो चुकी है, अपनी जिंदगी का फैसला स्वयं ले सकती है. उस ने घर वालों से साफ कह दिया कि सोनू उस से शादी करने को तैयार है.

नीशू की यह बात उस के पिता वीर सिंह को बहुत बुरी लगी. लेकिन वह भी अपनी बेटी को बहुत प्यार करते थे. उन्हें पता था कि अगर उन्होंने अपनी बेटी के अरमानों का गला घोटने की कोशिश की तो वह कुछ भी कर सकती है. यही सोच कर उन्होंने सोनू के साथ शादी करने की हामी भर ली.

सोनू लंगोट का था कच्चा

उस के बाद वीर सिंह ने 10 अप्रैल, 2014 को आर्यसमाज रीतिरिवाज के अनुसार सोनू कुमार के साथ अपनी बेटी नीशू की शादी कर दी. नीशू और सोनू शादी कर के खुश थे. कुछ समय तक दोनों के बीच सब कुछ ठीकठाक चला. समय के साथ नीशू 2 बच्चों की मां भी बन गई.

उस की नौकरी तो नहीं लग पाई. लेकिन वह अपने 2 बच्चों स्तुति और ओम सिंह के साथसाथ सोनू की पहली बीवी की बेटी स्पर्श का भी ठीक प्रकार से लालनपालन कर रही थी.

सोनू का नेटवर्किंग का काम था. उस की कमाई अपने ग्रुप में सदस्य जोड़ने के बाद ही हो पाती थी. इसी कारण वह हर वक्त नए सदस्यों की तलाश में जुटा रहता था.

वह अपने संपर्क में आने वाले युवकयुवतियों को कंपनी में काम दिलाने का झांसा दे कर फंसा लेता, फिर उन पर काफी खर्च भी करता था. जिस से युवकयुवतियां उस के रहनसहन और ठाटबाट को देख कर जल्दी ही उस से प्रभावित हो जाते थे.

सोनू लंगोट का बहुत ही कच्चा था. कोई भी सुंदर युवती उस के संपर्क में आती तो उसे देख कर उसे पाने की लालसा जाग जाती थी. नौकरी का लालच दिखा कर वह हर युवती के साथ यौन संबंध बनाने की लालसा करने लगता था. जिस के कारण कमाई से ज्यादा वह खर्च करने लगा था.

यही कारण रहा कि जल्दी ही उसे आर्थिक तंगी से गुजरना पड़ा. वह पैसों के लिए तरसने लगा. उस के बाद वह नीशू से पैसों की मांग करने लगा था. यह बात नीशू के पिता वीर सिंह के सामने पहुंची तो उन्होंने भी उसे समझाने की कोशिश की.

उस की आर्थिक स्थिति खराब होने के बाद वीर सिंह ने गांव से ही अपने मिलने वाले से ब्याज पर एक लाख रुपए उसे दिला दिए, जो कुछ ही दिनों में उस ने खर्च कर दिए. उस के बाद वह फिर से नीशू पर और रुपयों की मांग करने लगा था.

वीर सिंह आर्थिक रूप से इतना मजबूत नहीं था कि वह बारबार उस की सहायता करता. वीर सिंह ने सोनू को रुपए देने से इनकार किया तो उस ने नीशू के साथ मारपीट करनी शुरू कर दी.

सोनू की हरकतें देख वीर सिंह का परिवार परेशान हो उठा. उस के बाद वीर सिंह ने अपनी बेटी का भविष्य देखते हुए अपनी जुतासे की जमीन बेच कर सोनू को 5 लाख रुपए दिए. लेकिन सोनू फिर भी सीधे रास्ते पर नहीं आया था.

उस ने वह रुपए भी शीघ्र ही अय्याशी में उड़ा दिए. उस पैसे के बल पर उस ने कई युवतियों के साथ अवैध संबंध बना लिए थे. दूसरी युवतियों पर रुपए खर्च करने को ले कर उस के ससुराल वाले खफा हो गए. उस के बाद वह अपनी बीवी को एक नजर तक नहीं देखना चाहता था. उस के बावजूद वह हर रोज नईनई युवतियों को घर लाने लगा था. एक दिन नीशू किसी काम से बाजार गई हुई थी. घर आई तो सोनू के साथ एक युवती भी थी, जिसे देखते ही नीशू के तनबदन में आग लग गई.

उस युवती को ले कर दोनों में काफी विवाद भी हुआ. उस की हरकतों से आजिज आ कर नीशू ने अपनी मां जयंती से शिकायत की तो उस की मां जयंती उसे बच्चों सहित अपने साथ ले गई.

कुछ दिन गुजरने के बाद सोनू फिर से अपनी ससुराल गया और भविष्य में नीशू को तंग न करने की बात कहते हुए फिर से बुला लाया. इस बार नीशू की मां जयंती भी उस के साथ आ गई थी. घर आते ही सोनू के तेवर फिर से बदल गए.

पत्नी और सास की कर दी हत्या

वह जल्दी ही अपनी हरकतों पर आ गया. अय्याशी में आड़े आने पर सोनू ने अपनी पत्नी को रास्ते से हटाने के लिए पहले ही योजना बना ली थी. जिस की नीशू को भनक तक नहीं लगी.

26 फरवरी, 2022 की रात को खाना खाने के बाद सोते वक्त मांबेटी का सोनू से किसी बात पर झगड़ा हो गया. सोनू ने उसी समय मांबेटी को मौत की नींद सुलाने का मन बना लिया था.

27 फरवरी, 2022 की सुबह 5 बजे उस ने अपने बच्चों को एक कमरे में सुला दिया. उस के बाद गहरी नींद में सो रही सास जयंती और पत्नी नीशू की पाटल से काट कर हत्या कर दी.

हत्या करने के बाद उस ने बच्चों को साथ लिया और कार में बिठा कर सीधा अमरोहा निवासी अपनी बहन सोनिया के पास चल दिया. उस ने रास्ते में ही फोन कर के जानकारी दी कि उस ने अपनी पत्नी नीशू और उस की मां जयंती की हत्या कर दी है.

अमरोहा पहुंचते ही अपने तीनों बच्चों को बहन के पास छोड़ कर कार से फरार हो गया. उसी दौरान उसे पता चला कि पुलिस उस की तलाश में आई थी. यह सुनते ही उस ने अपना मोबाइल स्विच्ड औफ कर लिया.

अमरोहा से सोनू कार ले कर सीधा अपने दोस्त पंकज के पास पहुंचा. पंकज को गंगा जल लाने हरिद्वार जाना था. वह उस के साथ ही हरिद्वार भी गया.

हरिद्वार से वापसी में उस ने अपने दोस्त को सास और पत्नी की हत्या वाली बात बता दी. जिस से पंकज नाराज हो गया और उस ने सोनू को भलाबुरा कहते हुए रास्ते में ही उतार दिया. जिस के बाद सोनू सीधा गाजियाबाद पहुंच गया.

गाजियाबाद पहुंचने के बाद ही उसे अपने किए पर पश्ताचाप होने लगा था. उसे यह भी पता था कि वह चाहे कितनी भी भागदौड़ कर ले, पुलिस एक दिन उसे गिरफ्तार कर ही लेगी. उस के बाद उसे उम्र भर के लिए जेल में ही रहना पड़ेगा.

यही सोच कर उस ने अपनी जिंदगी का आखिरी रास्ता देखते हुए खुद भी सुसाइड करने का फैसला लिया. उसी फैसले के तहत उस ने चलती ट्रेन के आगे कूद कर अपनी जान दे दी.

सोनू के आत्महत्या करने के साथ ही एक हंसताखेलता परिवार पूरी तरह से बिखर गया. उसी के साथ एक गृहस्थी पूरी तरह से खत्म हो गई थी. फिलहाल मृतक के तीनों बच्चे उस की बहन के पास रह रहे थे.

वैसे तो सोनू ने जो जघन्य अपराध किया था, उस की कड़ी सजा थी. लेकिन उस ने मरने से पहले पौकेट डायरी के 7 पन्नों में अपने दिल की जो व्यथा लिखी थी, क्या वह उसे माफ करने लायक थी.

उस ने लिखा कि उस की मृत्यु के बाद यह डायरी जिस किसी भी भाई को मिले, कृपया इस में लिखे नंबरों पर फोन मिला कर मेरे रिश्तेदारों को सूचित कर देना.

‘नीशू, तू मेरी पत्नी थी, मैं तुझे बहुत ही प्यार करता था. लेकिन तूने अपनी बहन पिंकी के कहने में आ कर मुझे यह सब कुछ करने पर मजबूर कर दिया. मुझे पता था कि तुझे और तेरी मां को पिंकी ही चढ़ाती थी, जिस के कारण बारबार समझाने के बाद भी तेरी मां मेरी एक भी बात मानने को तैयार न थी.

‘अगर पिंकी तुम लोगों को बारबार न उकसाती तो हमारे बीच बारबार लड़ाई नहीं होती. मैं सोनू तेरी मौत का जिम्मेदार हूं. मैं मजबूर हो गया था. नीशू तू मेरी पत्नी थी. मैं तुझे बहुत ही प्यार करता था, फिर भी मैं ने तुझे मार दिया. मैं माफी के काबिल नहीं. मैं तेरे पास ही आ रहा हूं. हो सके तो मुझे माफ कर देना.’

सुसाइड नोट में सोनू ने जो लिखा था, उस में कितनी सच्चाई थी, यह तो पता नहीं लेकिन परिवार के खत्म होते ही सब खत्म हो गया.

मेरी बीवी को महीने में 2-3 बार पीरीयड्स होते है, इस कारण वो संबंध बनाने से इनकार करती है, मैं क्या करूं?

सवाल
मेरी बीवी को महीने में 2-3 बार माहवारी होती है और वह संबंध बनाने से इनकार करती है. मैं क्या करूं?

जवाब
हारमोनों की गड़बड़ी से माहवारी सही तरीके से नहीं हो पाती. इस के लिए आप माहिर महिला डाक्टर से अपनी बीवी की जांच कराएं. जहां तक संबंध बनाने की बात है, तो इस के लिए बीवी को प्यार से तैयार किया जा सकता है.

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अनियमित माहवारी

औरतों को हर माह पीरियड से दोचार होना पड़ता है, इस दौरान कुछ परेशानियां भी आती हैं. मसलन, फ्लो इतना ज्यादा क्यों है? महीने में 2 बार पीरियड क्यों हो रहे हैं? हालांकि अनियमित पीरियड कोई असामान्य घटना नहीं है, किंतु यह समझना आवश्यक है कि ऐसा क्यों होता है.

हर स्त्री की मासिकधर्म की अवधि और रक्तस्राव का स्तर अलगअलग है. किंतु ज्यादातर महिलाओं का मैंस्ट्रुअल साइकिल 24 से 34 दिनों का होता है. रक्तस्राव औसतन 4-5 दिनों तक होता है, जिस में 40 सीसी (3 चम्मच) रक्त की हानि होती है.

कुछ महिलाओं को भारी रक्तस्राव होता है (हर महीने 12 चम्मच तक खून बह सकता है) तो कुछ को न के बराबर रक्तस्राव होता है.

अनियमित पीरियड वह माना जाता है जिस में किसी को पिछले कुछ मासिक चक्रों की तुलना में रक्तस्राव असामान्य हो. इस में कुछ भी शामिल हो सकता है जैसे पीरियड देर से होना, समय से पहले रक्तस्राव होना, कम से कम रक्तस्राव से ले कर भारी मात्रा में खून बहने तक. यदि आप को प्रीमैंस्ट्रुल सिंड्रोम की समस्या नहीं है तो आप उस पीरियड को अनियमित मान सकती हैं, जिस में अचानक मरोड़ उठने लगे या फिर सिरदर्द होने लगे.

असामान्य पीरियड के कई कारण होते हैं जैसे तनाव, चिकित्सीय स्थिति, अतीत में सेहत का खराब रहना आदि. इन के अलावा आप की जीवनशैली भी मासिकधर्म पर खासा असर कर सकती है.

कई मामलों में अनियमित पीरियड ऐसी स्थिति से जुड़े होते हैं जिसे ऐनोवुलेशन कहते हैं. इस का मतलब यह है कि माहवारी के दौरान डिंबोत्सर्ग नहीं हुआ है. ऐसा आमतौर पर हारमोन के असंतुलन की वजह से होता है. यदि ऐनोवुलेशन का कारण पता चल जाए, तो ज्यादातर मामलों में दवा के जरीए इस का इलाज किया जा सकता है.

इलाज संभव

जिन वजहों से माहवारी अनियमित हो सकती है या पीरियड मिस हो सकते हैं वे हैं: अत्यधिक व्यायाम या डाइटिंग, तनाव, गर्भनिरोधक गोलियों का सेवन, पोलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम, युटरिन पोलिप्स या फाइब्रौयड्स, पैल्विक इनफ्लैमेटरी डिजीज, ऐंडोमिट्रिओसिस और प्रीमैच्योर ओवरी फेल्योर.

कुछ थायराइड विकार भी अनियमित पीरियड का कारण बन सकते हैं. थायराइड एक ग्रंथि होती है, जो वृद्धि, मैटाबोलिज्म और ऊर्जा को नियंत्रित करती है. किसी स्त्री में आवश्यकता से अधिक सक्रिय थायराइड है, इस का रक्तपरीक्षण से आसानी से पता किया जा सकता है. फिर रोजाना दवा खा कर इस का इलाज किया जा सकता है. हारमोन प्रोलैक्टिन का उच्च स्तर भी इस समस्या का कारण हो सकता है.

यदि किसी महिला को पीरियड के दौरान बहुत दर्द हो, भारी रक्तस्राव हो, दुर्गंधयुक्त तरल निकले, 7 दिनों से ज्यादा पीरियड चले, योनि में रक्तस्राव हो या पीरियड के बीच स्पौटिंग, नियमित मैंस्ट्रुअल साइकिल के बाद पीरियड अनियमित हो जाए, पीरियड के दौरान उलटियां हों, गर्भाधान के बगैर लगातार 3 पीरियड न हों तो अच्छा यही होगा कि तुरंत चिकित्सीय परामर्श लिया जाए. अगर किसी लड़की को 16 वर्ष की आयु तक भी पीरियड शुरू न हो तो तुरंत डाक्टर से मिलना चाहिए.

– डा. मालविका सभरवाल
स्त्रीरोग विशेषज्ञा, नोवा स्पैशलिटी हौस्पिटल्स

मैं अपनी दूर की भतीजी से 2 साल से प्यार करता हूं, क्या हम दोनों का विवाह संभव नहीं है?

सवाल
मैं 28 वर्षीय युवक हूं. एक लड़की से 2 साल से प्यार करता हूं. वह भी मुझे चाहती है. हम दोनों शादी करना चाहते हैं. लड़की के घर वालों को एतराज नहीं है, परंतु मेरे घर वाले इस शादी का विरोध कर रहे हैं. कारण लड़की दूर के रिश्ते में मेरी भतीजी लगती है. क्या हम दोनों का विवाह संभव नहीं है? यदि है तो मैं अपने घर वालों को कैसे मनाऊं?

जवाब
लड़की से चूंकि आप की दूर की रिश्तेदारी है, इसलिए यह आप के रिश्ते में आड़े नहीं आएगी. खासकर तब जब लड़की वालों को इस रिश्ते से कोई एतराज नहीं है. आप को अपने घर वालों पर दबाव बनाना होगा. यदि आप की बात वे नहीं सुन रहे तो किसी सगेसंबंधी या पारिवारिक मित्र से मदद ले सकते हैं. वे उन्हें समझा सकते हैं कि इतनी दूर की रिश्तेदारी माने नहीं रखती. यदि लड़की आप के लिए उपयुक्त जीवनसंगिनी है और विवाह के लिए गंभीर है, तो घर वाले देरसवेर मान ही जाएंगे. लड़की के घर वाले भी उन्हें मना सकते हैं.

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जब बेटी को विवाहित से प्रेम हो जाए

युवाओं में प्रेम होना एक आम बात है. अब समाज धीरेधीरे इसे स्वीकार भी कर रहा है. माता- पिता भी अब इतना होहल्ला नहीं मचाते, जब उन के बच्चे कहते हैं कि उन्हें अमुक लड़की/लड़के से ही शादी करनी है, लेकिन अगर कोई बेटी अपनी मां से आ कर यह कहे कि वह जिस व्यक्ति को प्यार करती है, वह शादीशुदा है तो मां इसे स्वीकार नहीं कर पाती.

ऐसे में बेटी से बहस का जो सिलसिला चलता है, उस का कहीं अंत ही नहीं होता लेकिन बेटी अपनी जिद पर अड़ी रहती है. मां समझ नहीं पाती कि वह ऐसा क्या करे, जिस से बेटी के दिमाग से इश्क का भूत उतर जाए.

ऐसे संबंध प्राय: तबाही का कारण बनते हैं. इस से पहले कि बेटी का जीवन बरबाद हो, उसे उबारने का प्रयास करें.

कारण खोजें : मौलाना आजाद मेडिकल कालिज में मनोचिकित्सा विभाग के निदेशक, डा. आर.सी. जिलोहा का कहना है कि इस तरह के मामले में मां एक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती हैं.

मां के लिए पहले यह जानना जरूरी है कि बेटी का किसी अन्य व्यक्ति की ओर आकर्षण का कारण घरेलू वातावरण तो नहीं है. कहीं यह तो नहीं कि जिस प्यार व अपनेपन की बेटी को जरूरत है, वह उसे घर में नहीं मिलता हो और ऐसे में वह बाहर प्यार ढूंढ़ती है और हालात उसे किसी विवाहित पुरुष से मिलवा देते हैं.

यह भी संभव है कि वह व्यक्ति अपने वैवाहिक जीवन से संतुष्ट न हो. चूंकि दोनों के हालात एक जैसे हैं, सो वे भावुक हो एकदूसरे के साथ न जुड़ गए हों. यह भी संभव है कि अपनी पत्नी की बुराइयां कर के और खुद को बेचारा बना कर लड़कियों की सहानुभूति हासिल करना उस व्यक्ति की सोचीसमझी साजिश का एक हिस्सा है.

सो, बेटी से एक दोस्त की तरह व्यवहार करें व बातोंबातों में कारण जानने का प्रयास करें, तभी आप अगला कदम उठा पाएंगी.

सही तरीका अपनाएं : डा. जिलोहा का कहना है कि बेटी ने किसी शादीशुदा से प्यार किया तो अकसर माताएं उन को डांटतीफटकारती हैं और उसे उस व्यक्ति को छोड़ने के लिए कहती हैं, पर ऐसा करने से बेटी मां को अपना दुश्मन मानने लगती है. बेहतर होगा कि प्यार से उसे इस के परिणाम बताएं. बेटी को बताएं कि ऐसे रिश्तों का कोई वजूद नहीं होता. व्यावहारिक तौर पर उसे समझाएं कि उस के संबंधों के कारण बहुत सी जिंदगियां तबाह हो सकती हैं.

फिर जो व्यक्ति उस के लिए अपनी पत्नी व बच्चों को छोड़ सकता है, वह किसी और के लिए कभी उसे भी छोड़ सकता है, फिर वह क्या करेगी?

मदद लें : आप चाहें तो उस व्यक्ति की पत्नी से मिल कर समस्या का हल ढूंढ़ सकती हैं. अकसर पति के अफेयर की खबर सुनते ही कुछ पत्नियां भड़क जाती हैं और घर छोड़ कर मायके चली जाती हैं. उसे समझाएं कि वह ऐसा हरगिज न करे. बातोंबातों में उस से यह जानने का प्रयास करें कि कहीं उस के पति के आप की बेटी की ओर झुकाव का कारण वह स्वयं तो नहीं. ऐसा लगे तो एक दोस्त की तरह उसे समझाएं कि वह पति के प्रति अपने व्यवहार को बदल कर उसे वापस ला सकती है.      द्य

प्लान बनाएं

आप की सभी तरकीबें नाकामयाब हो जाएं तो उस की पत्नी से मिल कर एक योजना तैयार करें, जिस के तहत पत्नी आप की बेटी को बिना अपनी पहचान बताए उस की सहेली बन जाए. उसे जताएं कि वह अपने पति से बहुत प्यार करती है. उस के सामने पति की तारीफों के पुल बांधें. अगर वह व्यक्ति अपनी पत्नी की बुराई करता है तो एक दिन सचाई पता चलने पर आप की बेटी जान जाएगी कि वह अब तक उसे धोखा देता रहा है. ऐसे में उसे उस व्यक्ति से घृणा हो जाएगी और वह उस का साथ छोड़ देगी. यह भी हो सकता है कि उन का शादी का इरादा न हो और अपने संबंधों को यों ही बनाए रखना चाहते हों. ऐसे में बेटी को बारबार समझाने या टोकने से वह आप से और भी दूर हो जाएगी. उस को दोस्त बना कर उसे समझाएं और प्रैक्टिकली उसे कुछ उदाहरण दें तो शायद वह समझ जाए.

बीसी सखियों को वर्दी के रूप में मिलेगी निफ्ट की डिजाइन की साड़ियां

महिलाओं को सशक्त बनाने और राज्य में हथकरघा बुनकरों के लिए रोजगार के व्यापक अवसर पैदा करने के दोहरे उद्देश्य को पूरा करते हुए, योगी सरकार बीसी-सखियों को निफ्ट रायबरेली द्वारा डिजाइन की गई एक लाख से अधिक साड़ियां देगी.

हथकरघा उद्योग को बढ़ावा देने के लिए यूपी सरकार बीसी सखी योजना के तहत काम करने वाली महिलाओं को वर्दी के रूप में दो हैंडलूम साड़ियां उपलब्ध कराएगी. इसके लिए सरकार हैंडलूम बुनकरों द्वारा बनाई गई साड़ियों को खरीदेगी.

काम में शामिल बुनकरों को डीबीटी के जरिए 750 रुपये प्रति साड़ी मजदूरी दी जाएगी.

यूपी हैंडलूम के एमडी केपी वर्मा ने बताया कि बीसी-सखी के रूप में काम करने वाली 58,000 महिलाओं में से प्रत्येक को सरकार द्वारा दो साड़ियां दी जाएंगी.

निफ्ट द्वारा भेजे गए डिजाइनों को मुख्यमंत्री ने पहले ही मंजूरी दे दी है और साड़ियों की बुनाई का काम प्रगति पर है. प्रत्येक साड़ी की कीमत 1934.15 रुपये और विभाग को 1.16 लाख साड़ी और ड्रेस सामग्री के लिए 22,43,61,400 रुपये की राशि जारी की गई है.

यूपी हथकरघा विभाग ने इस संबंध में पांच उत्पादक कंपनियों को साड़ियां बनाने का काम सौंपा है जिनमें से 3 वाराणसी जिले से और एक-एक मऊ और आजमगढ़ से हैं.

यूपी हथकरघा पहले ही लगभग 537 बुनकरों को 1.20 करोड़ रुपये का भुगतान कर चुका है और 12,837 से अधिक साड़ियां तैयार हैं.

केपी वर्मा के अनुसार “कोविड-19 के कारण प्रतिकूल आर्थिक परिस्थितियों के कारण बुनकरों के लिए रोजगार का संकट उत्पन्न हो गया था. इस योजना के माध्यम से बुनकर को रोजगार प्रदान किया गया है. साथ ही इस योजना ने बिचौलियों की भूमिका को समाप्त कर दिया है और पैसा सीधे उनके बैंक खाते में स्थानांतरित किया जा रहा है. योजना के अंतर्गत आने वाले बुनकरों को अधिक से अधिक लाभ मिल रहा है और इसके परिणामस्वरूप अन्य हथकरघा बुनकर भी इस योजना की ओर आकर्षित हो रहे हैं और उत्पादक कंपनियों में अपना नामांकन करा रहे हैं.

उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रत्येक मौजूदा ग्राम पंचायत के लिए 21 मई 2020 को 58,000 बीसी सखियों को शामिल करने की घोषणा की थी. बीसी सखियों गांव में लोगों की बैंकिंग जरूरतों को पूरा करने के लिए वन-स्टॉप समाधान उपलब्ध कराती हैं, वह भी घर पर.

महिला स्वयं सहायता समूह की सदस्यों को बीसी सखियों के रूप में शामिल करने से वित्तीय समावेशन, समय पर पूंजीकरण, एसएचजी लेनदेन के डिजिटलीकरण और समुदाय के समग्र विकास को सुनिश्चित करने में मदद मिलती है. यह महिलाओं की उद्यमशीलता क्षमताओं के निर्माण के उद्देश्य को और मजबूत करता है.

देवघर रोपवे हादसा: धार्मिक पर्यटन के बढ़ावे का नतीजा 

झारखंड भारत का एक ऐसा राज्य है, जहां आदिवासी समाज की बहुलता है. यहां तकरीबन 26 फीसदी आबादी आदिवासी समाज की बताई जाती है और अमूमन यह माना जाता है कि यह समाज धार्मिक कुरीतियों से बचा हुआ है, पर अगर एक खबर पर ध्यान दें तो राज्य सरकार की अनदेखी और जानकारी की कमी में आदिवासी समाज बिखरता जा रहा है. हालात ये हैं कि झारखंड में आदिवासियों का एक धर्म कोड नहीं मिलने से उन्हें 47 धर्मों में बांट दिया गया है.

जनगणना 2001 के आंकड़ों के मुताबिक, खडि़या और हो जनजाति में धर्म का बिखराव कम है. झारखंड में खडि़या के 12 धर्म और हो के 15 धर्म हैं. मुंडा जनजाति के 16 धर्म और उरांव जनजाति के 17 धर्म हैं.

सब से ज्यादा धर्म का बिखराव संथालों में है. संथालों के 36 धर्म हैं. हो जनजाति को 2001 की जनगणना में हिंदू, मुसलिम, सिख, ईसाई, मानवता, सिंहबोंगा, मरंगबुरु, दिउरी, संसार, बौध, जैन, आदिवासी, गोंड, हो, मुंडा, उरांव, सरना, सनार आदि धर्मों में गिना गया है. तकरीबन सभी आदिवासी समूहों का यही हाल है.

यह सब बताने की सब से बड़ी वजह यह है कि एक ओर इस राज्य से आदिवासी भाग रहे हैं, तो वहीं दूसरी ओर वे उन धर्मों की तरफ खिंच रहे हैं, जो उन्हें अंधविश्वासी बनाने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ रहे हैं.

जब से भारतीय जनता पार्टी की सरकार केंद्र में आई है, हर जगह धर्म के नाम की दुहाई पर लोगों के मन में यह भरा जा रहा है कि धर्म ही आप को मुक्ति के रास्ते पर ले जा सकता है. इसी मुक्ति को पाने के लिए लोग धार्मिक पर्यटन के घेरे में घूमते जा रहे हैं कि अपनी जान को दांव पर लगाने से भी नहीं चूक रहे हैं.

रविवार, 10 अप्रैल, 2022 को रामनवमी के दिन शाम के तकरीबन साढ़े 4 बजे त्रिकूट धाम के रोपवे पर एक बड़ा हादसा हो गया था. दरअसल, त्रिकूट पर्वत रोपवे की तार हुक से उतर गई थी, जिस से रोपवे की ट्रौलियां नीचे की ओर झुक गई थीं. इन में से नीचे की 2 ट्रौलियां पत्थर से टकरा गई थीं, जिस से एक औरत की मौत हो गई थी.

इस के बाद स्थानीय प्रशासन, भारतीय तिब्बत सीमा पुलिस और भारतीय वायु सेना की मदद से बचाव अभियान शुरू हुआ था, जो मंगलवार 12 अप्रैल, 2022 की दोपहर को पूरा हुआ था.

इस में ज्यादातर लोगों को बचा लिया गया था, फिर भी इस बचाव अभियान के दौरान 2 और लोगों की मौत हो गई थी.

चूक किस की

सवाल उठता है कि इस हादसे में चूक किस की थी? जैसा कि हर बार होता है, कोई भी सीधेसीधे ऐसे हादसों की जिम्मेदारी नहीं लेता है. विपक्ष सत्ता पक्ष को कोसता है और सत्ता पक्ष जांच समिति बैठाने की बात कह कर अपना पल्ला झाड़ लेता है. ज्यादा से ज्यादा पीडि़तों को मुआवजा दे दिया जाता है, जो इस मामले में भी हुआ.

पर क्या इस से भविष्य में ऐसे हादसे होने पर रोक लग जाएगी? हैरत की बात तो यह है कि पहले भी इसी रोपवे पर ऐसे हादसे हो चुके हैं. साल 2009 में उद्घाटन के दिन ही इस रोपवे की ट्रौलियां 4 घंटे तक हवा में अटक गई थीं. उस समय श्रावणी मेला चल रहा था. तकरीबन 80 पर्यटक इस में फंस गए थे. इस के बाद साल 2014 में भी डेढ़ घंटे तक ट्रौलियां हवा में लटकी रही थीं.

वैसे तो पहले सरकार इस रोपवे की देखरेख करती थी, पर अब इस का संचालन दामोदर रोपवे इंफ्रा लिमिटेड कंपनी करती है. शुरूशुरू में सरकारी मुलाजिमों के अलावा लोकल स्टाफ भी काम करता था, पर बाद में कंपनी ने सभी को हटा दिया.

कंपनी ने नए लोगों को बाहर से ला कर बहाल किया. नए मुलाजिमों को इस काम का अनुभव नहीं था. इधर कोरोना काल में रोपवे बंद रहा और कंपनी ने इन 2 सालों में रोपवे का रखरखाव भी नहीं कराया था.

जनता भी जिम्मेदार

पिछले कुछ सालों से भारत में धार्मिक पर्यटन की जो सूनामी आई है, उस से यह हुआ है कि अब लोग ऐसी जगहों पर ज्यादा जाने लगे हैं, जहां तफरीह के साथसाथ जन्म भी सुधर जाए. सरकारों ने भी धर्म की दानपेटियों के मुंह बड़े कर दिए हैं. नतीजतन, लोग परिवार समेत ऐसी जगहों पर ज्यादा जाने लगे हैं, जहां पहले बहुत कम लोग जाते थे. रामनवमी पर इस पहाड़ पर जाने की यही खास वजह थी. रोमांच और भक्ति का दोहरा फायदा.

और जब से हाथ में मोबाइल फोन और उस में कैमरे की सुविधा हुई है, तब से लोग जानबूझ कर ऐसी जगहों पर भी फोटो लेने या वीडियो बनाने से नहीं चूकते हैं, जहां हिदायत दी गई होती है कि ऐसा करने से बचें.

हादसे के दिन ट्रौली में बैठे लोग खूब ऐसा कर रहे थे, जबकि चलती ट्रौली में ज्यादा हिलनेडुलने के लिए भी मना किया जाता है. वहां पर उन का दोहरा नुकसान हुआ. जान तो गले में अटकी ही, भक्ति का फल भी नहीं मिल पाया.

यक्ष प्रश्न- भाग 4: निमी को क्यों बचाना चाहती थी अनुभा

वरुण अपने दोस्तों की तरह कठोर नहीं था. उस के अंदर सहज मानवीय भाव थे. वह काफी संवेदनशील था और निमी के प्रति दयाभाव भी रखता था, परंतु उस के लिए वह अपना भविष्य दांव पर नहीं लगा सकता था. अत. कुछ सोच कर बोला, ‘‘तुम प्राइवेट नौकरी कर सकती हो?’’

‘‘हां, मेरे पास और चारा भी क्या है?’’

‘‘तो फिर ठीक है, तुम इसी फ्लैट में रहो. इस का किराया मैं दे दिया करूंगा. मैं अपने पिता से बात कर के तुम्हें किसी कंपनी में काम दिलवा दूंगा, जिस से तुम्हारा गुजारा चल सके.’’

‘‘मैं तुम्हारा एहसान कभी नहीं भूलूंगी.’’

वरुण ने कुछ सोचते हुए कहा, ‘‘या तुम अपने घर चली जाओ.’’

निमी ने आश्चर्य से उसे देखा. फिर बोली, ‘‘कौन सा मुंह ले कर जाऊं उन के पास? क्या बताऊंगी उन्हें कि मैं ने इतने दिन क्या किया है? नहीं वरुण, मैं उन के पास जा कर उन्हें और परेशान नहीं करना चाहती.’’

वरुण के पिता सरकारी विभाग में अच्छे पद थे. उस ने पिता से कह कर निमी को एक प्राइवेट कंपनी में लगवा दिया. क्व20 हजार महीने पर. निमी का जो लाइफस्टाइल था, उस के हिसाब से उस की यह सैलरी ऊंट के मुंह में जीरे के बराबर थी, परंतु मुसीबत की घड़ी में मनुष्य को तिनके का सहारा भी बहुत होता है.

निमी ने उन्मुक्त यौन संबंधों से तो छुटकारा पा लिया, परंतु वह शराब और सिगरेट से छुटकारा नहीं पा सकी. एकांत उसे परेशान करता, पुरानी यादें उसे कचोटतीं, मांबाप की याद आती, तो वह पीने बैठ जाती.

वरुण जब भी उस से मिलने आता, वह उस की बांहों में गिर कर रोने लगती. वह समझाता, ‘‘मत पीया करो इतना, बीमार हो जाओगी.’’

‘‘वरुण, एकाकी जीवन मुझे बहुत डराता है,’’ वह उस से चिपक जाती.

‘‘मातापिता के पास वापस चली जाओ. वे तुम्हें माफ कर देंगे,’’

वह कई बार निमी से यह बात कह चुका था, पर हर बार निमी का यही जवाब होता, ‘‘कौन सा मुंह ले कर जाऊं उन के पास? वे मुझे क्या बनाना चाहते थे और मैं क्या बन बैठी… माफ तो कर देंगे, परंतु समाज को क्या जवाब देंगे.’’

‘‘वही, जो अभी दे रहे होंगे.’’

‘‘अभी वे मुझे मरा समझ कर माफ कर देंगे, परंतु उन के पास रह कर मैं उन्हें बहुत दुख दूंगी.’’

‘‘एक बार जा कर तो देखो.’’

‘‘नहीं वरुण, तुम मेरे मांबाप को नहीं जानते. वे मुझे माफ नहीं करेंगे. अगर उन्हें माफ करना होता, तो अब तक मुझे ढूंढ़ लिया होता. यह बहुत मुश्किल नहीं था. उन्होंने पुलिस में रिपोर्ट भी नहीं की होगी,’’ वरुण के समझाने का उस पर कोई प्रभाव न पड़ता.

यथास्थिति बनी रही. बस वरुण सिविल सर्विसेज की तैयारी में निरंतर जुटा रहा. इस का परिणाम यह रहा कि वह यूपीएससी परीक्षा पास कर गया.

जब वरुण ट्रेनिंग के लिए जाने लगा तो निमी ने कहा, ‘‘अब तुम पूरी तरह से मुझ से दूर चले जाओगे.’’

‘‘वह तो जाना ही था,’’ वरुण ने उसे समझाते हुए कहा. निमी के मन में बहुत कुछ टूट गया. वह जानती थी, वरुण उस का नहीं हो सकता है,

फिर भी उस के दिल में कसक सी उठी. वह खोईखोई आंखों से वरुण को देख रही थी. वरुण ने उस के सिर को सहलाते हुए कहा, ‘‘देखो, निमी, मेरा कहना मानो, अब भटकने से कोई फायदा नहीं. तुम ने अपने जीवन को जितना गिराना था, गिरा लिया. अब सावधानी से उठने की कोशिश करो. तुम्हारी तनख्वाह बढ़ गई है. कुछ बचा कर पैसे जोड़ लो और किसी लड़के से शादी कर के घर बसा लो. मेरी तरफ से जो हो सकेगा मैं मदद करूंगा.’’

निमी ने जवाब नहीं दिया. अगले कुछ दिनों में वरुण मसूरी चला गया. निमी पूरी तरह टूट गई. उस ने अपनी सोच पर ताले लगा लिए. जैसे वह सुधरना ही नहीं चाहती थी.

1 साल की ट्रेनिंग के दौरान वरुण उस से मिलने केवल एक बार आया और रातभर उस के साथ रुका. तब भी उस ने निमी को घर बसाने की सलाह दी. परंतु वह चुप ही रही.

कई साल बीत गए. वरुण की पोस्टिंग हो गई थी. वह एक जिले का कलैक्टर बन गया था. उसे छुट्टी नहीं मिलती थी या दिल्ली आ कर भी वह उस से मिलना नहीं चाहता था, परंतु हर माह वह एक अच्छी राशि निमी के खाते में जमा करा देता था.

निमी ने तय कर लिया था कि वह शादी नहीं करेगी. वरुण उस का नहीं है, फिर भी उस का इंतजार करती थी. इंतजार जितना लंबा हो रहा था, उस के शराब पीने की मात्रा भी उतनी ही बढ़ती जा रही थी. फिर पता चला कि वरुण की शादी किसी चीफ सैक्रेटरी की आईएएस बेटी से हो गई है. निमी के अंदर जो थोड़ी सी आस बची थी, वह पूर्णरूप से टूट गई. उस की शराब की मात्रा इतनी ज्यादा हो गई कि अब वह दफ्तर भी नहीं जा पाती थी.

वरुण से उस का कोई सीधा संपर्क नहीं था. कभीकभी वरुण के पिता का नौकर उस के हालचाल पूछ जाता था. वही वरुण के बारे में बताता था और उस के बारे में वही वरुण को खबर करता होगा.

अत्यधिक शराब के सेवन से उस की तबीयत खराब रहने लगी. वरुण के पिता का नौकर लगभग रोज उस के पास आने लगा था. एक दिन उसी के सामने निमी को खून की उलटी हुई. उसे आननफानन में अस्पताल में भरती करवाया गया.

मैडिकल रिपोर्ट से यह साबित हो गया था कि अत्यधिक शराब के सेवन से उस के सारे अंदरूनी अंग खराब हो गए हैं. वरुण ने अपने नौकर के माध्यम से उसे सेमी प्राइवेट वार्ड में भरती करवा दिया था. इलाज का सारा खर्च वह भेज रहा था, परंतु कभी मिलने नहीं आया.

उस के इलाज में कोई कमी नहीं थी, परंतु उस का दुख उसे खाए जा रहा था जैसे वह किसी बीमारी से नहीं, अपने दुख से ही मरेगी, परंतु इसी बीच संयोग से अस्पताल में अनुभा प्रकट हुई और उस के जीवन में अभूतपूर्व परिवर्तन आ गया. अब वह ठीक हो कर घर आ गई थी. घर तो आ गई थी, परंतु किस के  घर? उस का अपना घर, संसार कहां था?

यक्ष प्रश्न अभी भी उस के सामने खड़ा था. अब आगे क्या? 35 वर्ष की अवस्था में अब वह कोई युवती नहीं थी. बीमारी ने उस की सुंदरता को काफी हद तक क्षीण कर दिया था. नौकरी हाथ से जा चुकी थी, वरुण से भी व्यक्तिगत संपर्क टूट चुका था.

हिमांशु केंद्र सरकार में उच्च अधिकारी थे. उन्होंने अपने प्रयासों से निमी को एक संस्था से जोड़ दिया. यह संस्था अनाथ बच्चों की देखभाल और उन्हें शिक्षा प्रदान करती थी. कुछ दिन तक निमी अनुभा के घर पर रही. फिर उस की संस्था ने उसे एक घर लीज पर दिलवा दिया. साफसफाई के बाद जिस दिन निमी ने अपने घर में प्रवेश किया, तब अनुभा और उस के पति के कुछ दोस्त मौजूद थे. छोटी सी पार्टी रखी गई थी.

शाम को पार्टी के बाद जब अनुभा निमी को छोड़ कर जाने लगी, तो निमी ने कहा, ‘‘मैं फिर अकेली हो जाऊंगी.’’

‘‘नहीं, तुम अकेली नहीं हो. हम सब तुम्हारे साथ हैं. पहले जो लोग तुम से जुड़े थे, वे स्वार्थवश जुड़े थे. इसीलिए तुम पतन की राह पर चल पड़ी थी. अब तुम्हारे सामने एक लक्ष्य है, बच्चों का भविष्य सुधारने का. इस लक्ष्य को ध्यान में रखोगी और अपनी पिछली जिंदगी के बारे में विचार करोगी, तो तुम एकाकी जीवन जीते हुए भी कभी गलत रास्ते पर नहीं चलोगी.’’

निमी ने शरमा कर सिर झुका लिया. अनुभा ने उस का चेहरा ऊपर उठाया. उस की आंखों में आंसू थे. कई वर्षों बाद उस की आंखों में खुशी के आंसू आए थे.

पराकाष्ठा- भाग 1: एक विज्ञापन ने कैसे बदली साक्षी की जिंदगी

आज भी मुखपृष्ठ की सुर्खियों पर नजर दौड़ाने के पश्चात वह भीतरी पृष्ठों को देखने लगी. लघु विज्ञापन तथा वर/वधू चाहिए, पढ़ने में साक्षी को सदा से ही आनंद आता है.

कालिज के जमाने में वह ऐसे विज्ञापन पढ़ने के बाद अखबार में से उन्हें काट कर अपनी सहेलियों को दिखाती थी और हंसीठट्ठा करती थी.

शहर के समाचार देखने के बाद साक्षी की नजर वैवाहिक विज्ञापन पर पड़ी जिसे बाक्स में मोटे अक्षरों के साथ प्रकाशित किया गया था, ‘30 वर्षीय नौकरीपेशा, तलाकशुदा, 1 वर्षीय बेटे के पिता के लिए आवश्यकता है सुघड़, सुशील, पढ़ीलिखी कन्या की. गृहकार्य में दक्ष, पति की भावनाओं, संवेदनाओं के प्रति आदर रखने वाली, समझौतावादी व उदार दृष्टिकोण वाली को प्राथमिकता. शीघ्र संपर्र्ककरें…’

साक्षी के पूरे शरीर में झुरझुरी सी होने लगी, ‘कहीं यह विज्ञापन सुदीप ने ही तो नहीं दिया? मजमून पढ़ कर तो यही लगता है. लेकिन वह तलाकशुदा कहां है? अभी तो उन के बीच तलाक हुआ ही नहीं है. हां, तलाक की बात 2-4 बार उठी जरूर है.

शादी के पश्चात हनीमून के दौरान सुदीप ने महसूस किया कि अंतरंग क्षणोें में भी वह उस की भावनाओं का मखौल उड़ा देती है और अपनी ही बात को सही ठहराती है. सुदीप को बुरा तो लगा लेकिन तब उस ने चुप रहना ही उचित समझा.

शादी के 2 महीने ही बीते होंगे, छुट्टी का दिन था. शाम के समय अचानक साक्षी बोली, ‘सुदीप अब हमें अपना अलग घर बसा लेना चाहिए, यहां मेरा दम घुटता है.’

सुदीप जैसे आसमान से नीचे गिरा, ‘यह क्या कह रही हो, साक्षी? अभी तो हमारी शादी को 2 महीने ही हुए हैं और फिर मैं इकलौता लड़का हूं. पिताजी नहीं हैं इसलिए मां की और कविता की जिम्मेदारी भी मुझ पर ही है. तुम ने कैसे सोच लिया कि हम अलग घर बसा लेंगे.’

साक्षी तुनक कर बोली, ‘क्या तुम्हारी जिम्मेदारी सिर्फ तुम्हारी मां और बहन हैं? मेरे प्रति तुम्हारी कोई जिम्मेदारी नहीं?’

‘तुम्हारे प्रति कौन सी जिम्मेदारी मैं नहीं निभा रहा? घर में कोई रोकटोक, प्रतिबंध नहीं. और क्या चाहिए तुम्हें?’ सुदीप भी कुछ आवेश में आ गया.

‘मुझे आजादी चाहिए, अपने ढंग से जीने की आजादी, मैं जो चाहूं पहनूं, खाऊं, करूं. मुझे किसी की भी, किसी तरह की टोकाटाकी पसंद नहीं.’

‘अभी भी तो तुम अपने ढंग से जी रही हो. सवेरे 9 बजे से पहले बिस्तर नहीं छोड़तीं फिर भी मां चुप रहती हैं, भले ही उन्हें बुरा लगता हो. मां को तुम से प्यार है. वह तुम्हें सुंदर कपड़े, आभूषण पहने देख कर अपनी चाह, लालसा पूरी करना चाहती हैं. रसोई के काम तुम्हें नहीं आते तो तुम्हें सिखा कर सुघड़ बनाना चाहती हैं. इस में नाराजगी की क्या बात है?’

‘बस, अपनी मां की तारीफों के कसीदे मत काढ़ो. मैं ने कह दिया सो कह दिया. मैं उस घर में असहज महसूस करती हूं, मुझे वहां नहीं रहना?’

‘चलो, आज खाना बाहर ही खा लेते हैं. इस विषय पर बाद में बात करेंगे,’ सुदीप ने बात खत्म करने के उद्देश्य से कहा.

‘बाद में क्यों? अभी क्यों नहीं? मुझे अभी जवाब चाहिए कि तुम्हें मेरे साथ रहना है या अपनी मां और बहन के  साथ?’

सुदीप सन्न रह गया. साक्षी के इस रूप की तो उस ने कल्पना भी नहीं की थी. फिर किसी तरह स्वयं को संयत कर के उस ने कहा, ‘ठीक है, घर चल कर बात करते हैं.’

‘मुझे नहीं जाना उस घर में,’ साक्षी ने अकड़ कर कहा. सुदीप ने उस का हाथ खींच कर गाड़़ी में बैठाया और गाड़ी स्टार्ट की.

‘तुम ने मुझ पर हाथ उठाया. यह देखो मेरी बांह पर नीले निशान छप गए हैं. मैं अभी अपने मम्मीपापा को फोन कर के बताती हूं.’

साक्षी के चीखने पर सुदीप हक्काबक्का रह गया. किसी तरह स्वयं पर नियंत्रण रख कर गाड़ी चलाता रहा.

घर पहुंचते ही साक्षी दनदनाती हुई अपने कमरे की ओर चल पड़ी. मां तथा कविता संशय से भर उठीं.

‘सुदीप बेटा, क्या बात है. साक्षी कुछ नाराज लग रही है?’ मां ने पूछा.

‘कुछ नहीं मां, छोटीमोटी बहसें तो चलती ही रहती हैं. आप लोग सो जाइए. हम बाहर से खाना खा कर आए हैं.’

साक्षी को समझाने की गरज से सुदीप ने कहा, ‘साक्षी, शादी के बाद लड़की को अपनी ससुराल में तालमेल बैठाना पड़ता है, तभी तो शादी को समझौता भी कहा जाता है. शादी के पहले की जिंदगी की तरह बेफिक्र, स्वच्छंद नहीं रहा जा सकता. पति, परिवार के सदस्यों के साथ मिल कर रहना ही अच्छा होता है. आपस में आदर, प्रेम, विश्वास हो तो संबंधों की डोर मजबूत बनती है. अब तुम बच्ची नहीं हो, परिपक्व हो, छोटीछोटी बातों पर बहस करना, रूठना ठीक नहीं…’

‘तुम्हारे उपदेश हो गए खत्म या अभी बाकी हैं? मैं सिर्फ एक बात जानती हूं, मुझे यहां इस घर में नहीं रहना. अगर तुम्हें मंजूर नहीं तो मैं मायके चली जाऊंगी. जब अलग घर लोगे तभी आऊंगी,’ साक्षी ने सपाट शब्दों में धमकी दे डाली.

अमावस की काली रात उस रोज और अधिक गहरी और लंबी हो गई थी. सुदीप को अपने जीवन में अंधेरे के आने की आहट सुनाई पड़ने लगी. किस से अपनी परेशानियां कहे? जब लोगों को पता लगेगा कि शादी के 2-3 महीनों में ही साक्षी सासननद को लाचार, अकेले छोड़ कर पति के साथ अलग रहना चाहती है तो कितनी छीछालेदर होगी.

सुदीप रात भर इन्हीं तनावों के सागर में गोते लगाता रहा. इस के बाद भी अनेक रातें इन्हीं तनावों के बीच गुजरती रहीं.

मां की अनुभवी आंखों से कब तक सुदीप आंखें चुराता. उस दिन साक्षी पड़ोस की किसी सहेली के यहां गई थी. मां ने पूछ ही लिया, ‘सुदीप बेटा, तुम दोनों के बीच कुछ गलत चल रहा है? मुझ से छिपाओगे तो समस्या कम नहीं होगी, हो सकता है मैं तुम्हारी मदद कर सकूं?’

सुदीप की आंखें नम हो आईं. मां के प्रेम, आश्वासन, ढाढ़स ने हिम्मत बंधाई तो उस ने सारी बातें कह डालीं. मां के पैरों तले जमीन खिसक गई. वह तो साक्षी को बेटी से भी अधिक प्रेम, स्नेह दे रही थीं और उस के दिल में उन के प्रति अनादर, नफरत की भावना. कहां चूक हो गई?

एक दिन मां ने दिल कड़ा कर के फैसला सुना दिया, ‘सुदीप, मैं ने इसी कालोनी में तुम्हारे लिए किराए का मकान देख लिया है. अगले हफ्ते तुम लोग वहां शिफ्ट हो जाओ.’ सुदीप अवाक् सा मां के उदास चेहरे को देखता रह गया. हां, साक्षी के चेहरे पर राहत के भाव स्पष्ट नजर आ रहे थे.

‘लेकिन मां, यहां आप और कविता अकेली कैसे रहेंगी?’ सुदीप का स्वर भर्रा गया.

‘हमारी फिक्र मत करो. हो सकता है कि अलग रह कर साक्षी खुश रहे तथा हमारे प्रति उस के दिल में प्यार, आदर, इज्जत की भावना बढ़े.’

विदाई के समय मां, कविता के साथसाथ सुदीप की भी रुलाई फूट पड़ी थी. साक्षी मूकदर्शक सी चुपचाप खड़ी थी. कदाचित परिवार के प्रगाढ़ संबंधों में दरार डालने की कोशिश की पहली सफलता पर वह मन ही मन पुलकित हो रही थी.

अलग घर बसाने के कुछ ही दिनों बाद साक्षी ने 2-3 महिला क्लबों की सदस्यता प्राप्त कर ली. आएदिन महिलाओं का जमघट उस के घर लगने लगा. गप्पबाजी, निंदा पुराण, खानेपीने में समय बीतने लगा. साक्षी यही तो चाहती थी.

उस दिन सुदीप मां और बहन से मिलने गया तो प्यार से मां ने खाने का आग्रह किया. वह टाल न सका. घर लौटा तो साक्षी ने तूफान खड़ा कर दिया, ‘मैं यहां तुम्हारा इंतजार करती भूखी बैठी हूं और तुम मां के घर मजे से पेट भर कर आ रहे हो. मुझे भी अब खाना नहीं खाना.’

सुदीप ने खुशामद कर के उसे खाना खिलाया और उस के जोर देने पर थोड़ा सा स्वयं भी खाया.

हिंदू मुसलिम दंगे, समाज पर चोट

हिंदू मुसलिम झगड़ों में जानें ही नहीं जातीं, जो बचे होते हैं उन की जानों पर भी बहुत सी आफतें आ जाती हैं. जिस भी इलाके में दंगे होते हैं, वहां के घरों के रहने वाले, चाहे मुसलिम हों या हिंदू, समाज से कट जाते हैं. समाज अब उन्हें बचाने नहीं आता, उन्हें हिकारत की नजर से देखता है.

पिछले महीने जब खरगौन में दंगे हुए तो एक सब्जी बेचने वाले राहुल कुमावत की बहन की शादी 3 मई को होनी थी पर टाल दी गई क्योंकि लड़के वाले ऐसी जगह शादी नहींकरना चाहते जहां दंगे होते हों, कर्फ्यू लगता हो. इस दंगे में गंभीर रूप से घायल हुए संजीव शुक्ला की बहन की शादी टाल दी गई. होटलों, बैंक्वेट हालों, कैटरर्स ने अपने और्डर कैंसिल होने की सूचना दी है कि दंगों के कारण लोग इस इलाके में आने से कतरा रहे हैं.

हर दंगे में पार्टी की वोटें बढ़ती हैं पर लोगों की जिंदगी घटती है. लोग डरेसहमे से रहते हैं. औरतें घरों से नहीं निकलतीं. स्कूल बंद हो जाते हैं. अगर गलीमहल्ला ?ागड़े का सैंटर हो तो खानापीना तक मुश्किल हो जाता है.

आजकल भड़काऊ टीवी की वजह से हर दंगे का नाम हफ्तों तक सुर्खियों में रहता है और दूरदूर तक खबर पहुंच जाती है. लोग शादियां करने से भी कतराने लगे हैं अगर कोई घर दंगाग्रस्त इलाके में हो. इन इलाकों के लड़केलड़की को लंबी सफाई देनी पड़ती है कि उन के परिवार का कोई लेनादेना इन दंगाइयों से नहीं है. जिन घरों के दंगाई धर्म और कपड़े के हिसाब से पकड़े गए और जेलों में ठूंस दिए गए वे तो इस बात को खुदा का हुक्म मान कर सहने की आदत डाल चुके हैं पर वे पूजापाठी जो सबक सिखाने वाली सोच रखते हैं पर दंगाई इलाकों में रहते हैं, फंस जाते हैं. पूरी कालोनी की चाहे एक गली में दंगा हुआ हो बदनाम पूरी कालोनी वाले हो जाते हैं.

वे लोग जो धर्म के उकसाने पर जोश में आ जाते हैं और आगे बढ़चढ़ कर नारेबाजी करने लगते हैं, उन से उन के घर वाले भी डरने लगते हैं क्योंकि ये लोग अपनी दंगाई आदत घर में घुसते समय चप्पल की तरह बाहर उतार कर नहीं आते, यह दंगाई आदत उन के दिमाग और खाल दोनों में घुस जाती है. धर्म को बचाने के लिए जो लोग ?ांडे और तलवारें लहरा रहे हैं, वे जिंदगीभर एक तरह की बीमारी पाले रखते हैं. उन्हें न शादी में सुख मिलता है, न काम में. धर्म के सैनिक बने रहना ही अकेला काम रह जाता है.

जिन्हें दंगाग्रस्त इलाकों में रहना पड़ता है उन्हें नौकरियां भी नहीं मिलतीं क्योंकि नौकरी देने वाला डरता है कि यह दंगा करने वालों से मिला तो नहीं हुआ. जो उस इलाके में रहते हैं उन का काम में मन नहीं लगता, वे नागाएं भी बहुत करते हैं चाहे हिंदू ही क्यों न हों. कोई देवीदेवता उन्हें नौकरी देने नहीं आता.

हर दंगे पर उन लोगों का पैसा भी खर्च होता है जिन्होंने न दंगे में हिस्सा लिया, न दंगे के शिकार हुए. पूरे इलाके के बंद हो जाने पर काम कम हो जाता है, पढ़ाई कम हो जाती है, बातचीत दंगों के बारे में ज्यादा होती है. ‘देख लेंगे’,

‘मार देंगे’ जैसे बोल जबान पर चढ़ जाते हैं, नारे सुनसुन कर कुछ को डर लगता है तो कुछ कानून को भूल कर निकम्मे हो जाते हैं.

दिल्ली में जहांगीरपुरी में हनुमान यात्रा के दौरान दंगों में पुलिस एक हिंदू परिवार के 6 लोगों को पकड़ कर ले गई. विश्व हिंदू परिषद ने उन्हें खाना तो पहुंचाया पर कितने दिन पहुंचाएंगे? हर धर्म भक्तों से वसूलता है, कोई भी धर्म हफ्तों और महीनों तक किसी परेशान को नहीं संभालता, अपने धर्म के शहीद को कोई पैंशन नहीं देता. उस के पास तो एक ही जबान होती है, सबकुछ ईश्वरअल्लाह के हाथ में है.

धर्म के दुकानदार अब राज करने वाले भी बन गए हैं और वे जानते हैं कि भक्त तो मूर्ख होते हैं. पाकिस्तान में बुरा हाल धर्म की वजह से है. श्रीलंका में बौद्ध सिंहलियों की वजह से आज बुरी हालत है. रूस के व्लादिमीर पुतिन ने भी यूक्रेन पर हमला अपने धर्मगुरु के कहने पर किया और यूक्रेनी भी मर रहे हैं और रूसी भी मर रहे हैं और पैसेपैसे को मोहताज हो रहे हैं.

मुझे एक शादीशुदा औरत से प्यार हो गया है और हम एकदूसरे के बगैर नहीं रह सकते, मैं क्या करूं?

सवाल
मैं 21 साल का हूं. मुझे एक शादीशुदा औरत से प्यार हो गया है. हम एकदूसरे के बगैर नहीं रह सकते, लेकिन घर वाले इस बात के खिलाफ हैं. मैं क्या करूं?

जवाब
आप के घर वाले सही हैं. शादीशुदा औरत के चक्कर में आप अपनी जिंदगी तो बरबाद कर ही रहे हैं, साथ ही उसे भी तबाह कर रहे हैं. उस के पति को पता चलेगा तो वह कहीं की न रहेगी. उस औरत से दूर रहने में ही सब की भलाई है.

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छत्तीसगढ़ के जिला रायपुर की कोतवाली के अंतर्गत आने वाले मोहल्ला रिसाईपारा की रहने वाली 20 साल की खूबसूरत नगमा परवीन 18 जनवरी, 2017 की रात ब्यूटीपार्लर से लौट कर नहीं आई तो घर वालों को चिंता हुई. उस के अब्बू मोहम्मद असलम ने उस के मोबाइल पर फोन किया तो पता चला कि मोबाइल घर पर ही रखा है. उस से संपर्क का एकमात्र साधन फोन था, जो घर पर ही रखा था. ब्यूटीपार्लर ज्यादा दूर नहीं था. वहां जा कर पता किया तो पता चला कि उस दिन वह ब्यूटीपार्लर पर गई ही नहीं थी. यह जान कर घर वाले परेशान हो उठे. उन की समझ में यह नहीं आ रहा था कि नगमा ब्यूटीपार्लर पर नहीं गई तो बिना बताए कहां चली गई. जबकि उसे कहीं बाहर जाना होता था तो वह घर वालों को बता कर जाती थी.

ऐसा पहली बार हुआ था, जब नगमा घर वालों को बिना बताए न जाने कहां चली गई थी. अपने हिसाब से मोहम्मद असलम ने बेटी को हर तरह से खोजा, लेकिन उस का कुछ पता नहीं चला. वह कोई छोटी बच्ची नहीं थी कि कोई उसे बहलाफुसला कर उठा ले जाता. वह जहां भी गई थी, अपनी मरजी से गई थी. अगर उस के साथ जबरदस्ती की गई होती तो पता चल जाता.

मोहम्मद असलम और उन के घर वालों ने किसी तरह रात बिताई. सवेरा होते ही वह कुछ लोगों के साथ कोतवाली पहुंच गए और बेटी की गुमशुदगी दर्ज करा दी. गुमशुदगी दर्ज होने के बाद इंसपेक्टर श्रीप्रकाश सिंह ने इस मामले में जांच शुरू की तो पता चला कि नगमा सुबह तेजप्रकाश सेन की मोटरसाइकिल पर बैठ कर कहीं गई थी.

उसे तेजप्रकाश की मोटरसाइकिल पर बैठ कर जाते किसी और ने नहीं, नगमा की 8 साल की छोटी बहन ने देखा था. लेकिन यह बात उस ने घर वालों को नहीं बताई थी. जब पुलिस ने उस से पूछा, तभी उस ने बताया था.

श्रीप्रकाश सिंह को जब पता चला कि नगमा तेजप्रकाश के साथ गई है तो उन्होंने उस के बारे में मोहम्मद असलम से पूछा. पता चला कि तेजप्रकाश मोहल्ला आमातालाब में अपने परिवार के साथ रहता था. वह शादीशुदा था और 2 बच्चों का बाप था, इस के बावजूद उस ने खुद को कुंवारा बता  कर नगमा से कोर्टमैरिज कर ली थी.

नगमा को जब उस के शादीशुदा और 2 बच्चों का बाप होने का पता चला था तो वह अदालत चली गई, जहां से उसे ढाई लाख रुपए गुजाराभत्ता देने का आदेश हुआ था. ये रुपए तेजप्रकाश को 27 हजार रुपए हर महीने की किस्त के रूप में देने थे. लेकिन तेजप्रकाश ने 27 हजार रुपए की मात्र एक किस्म ही दी थी. उस के बाद उस ने एक पैसा नहीं दिया था.

नगमा और तेजप्रकाश की इस कहानी को जान कर श्रीप्रकाश सिंह को समझते देर नहीं लगी कि मामला क्या हो सकता है.  उन्होंने तुरंत तेजप्रकाश सेन के घर छापा मारा तो वह घर पर ही मिल गया. पूछताछ के लिए उसे कोतवाली लाया गया, लेकिन पुलिस हिरासत में होने के बावजूद उस के चेहरे पर जरा भी भय नहीं था.

एसएसपी राजीव टंडन और सीओ ए.सी. द्विवेदी की उपस्थिति में उस से पूछताछ शुरू हुई. श्रीप्रकाश सिंह ने पूछा, ‘‘तुम नगमा परवीन को जानते हो?’’

‘‘जी जानता हूं. लेकिन आप उस के बारे में मुझ से क्यों पूछ रहे हैं?’’ तेजप्रकाश ने कहा.

‘‘इसलिए कि वह 4 दिनों से गायब है.’’

‘‘क्या?’’ उस ने चौंक कर कहा, ‘‘वह 4 दिनों से गायब है?’’

‘‘हां, वह 4 दिनों से गायब है. काफी प्रयास के बाद भी उस का कुछ पता नहीं चल रहा है. घर से ब्यूटीपार्लर जाने के लिए वह निकली थी, लेकिन वह ब्यूटीपार्लर पहुंच नहीं पाई. बीच से ही वह गायब हो गई.’’

‘‘ब्यूटीपार्लर नहीं गई तो फिर वह कहां गई?’’

‘‘यही पता करने के लिए तो तुम्हें यहां लाया गया है.’’ श्रीप्रकाश सिंह ने कहा.

‘‘लेकिन मुझे क्या पता कि वह ब्यूटीपार्लर नहीं गई तो कहां गई? वह जहां भी गई है, मुझे बता कर थोड़े ही गई है. वह कहां जाती है, किस से मिलती है, क्या करती है, मुझे बता कर थोड़े ही करती है?’’ सफाई देते हुए तेजप्रकाश ने कहा, ‘‘अगर उस के बारे में कुछ पूछना है तो उस के घर वालों से जा कर पूछें. वही बता सकते हैं कि वह कहां है?’’

‘‘ठीक है, घर वालों से पूछ लेंगे. लेकिन तुम एक बात यह बताओ, क्या तुम नगमा की छोटी बहन को जानते हो?’’

‘‘जी, बिलकुल जानता हूं.’’

‘‘वह कह रही थी कि जिस दिन नगमा गायब हुई है, उस दिन उस ने तुम्हें नगमा को मोटरसाइकिल पर बैठा कर ले जाते हुए देखा था.’’

‘‘वह झूठ बोल रही है.’’ तेजप्रकाश ने एकदम से कहा. लेकिन इस बात से वह घबरा गया, जो उस के चेहरे पर स्पष्ट नजर आ रहा था. पुलिस अधिकारियों ने उसे भांप भी लिया था. इस के बाद तो पुलिस अधिकारियों ने उसे अपने सवालों से इस तरह घेरा कि बिना सख्ती किए ही उस ने एसएसपी के पैर पकड़ लिए.

वह गिड़गिड़ाते हुए बोला, ‘‘सर, मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई. नगमा को मैं ने मार दिया है. उसे मारता न तो क्या करता. मैं ने उस से प्यार किया, पत्नीबच्चों को छोड़ कर शादी की, इस के बावजूद उस ने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा. उस की वजह से मेरे परिवार ने मुझे छोड़ दिया. इस के बावजूद वह मुझे छोड़ कर चली ही नहीं गई, मेरे ऊपर मुकदमा भी कर दिया था.’’

पुलिस ने तेजप्रकाश को अदालत में पेश कर के 5 दिनों के रिमांड पर ले लिया. रिमांड अवधि के दौरान उस ने नगमा परवीन की हत्या का अपना अपराध तो स्वीकार कर ही लिया, मोटरसाइकिल और उस की डिक्की में रखा चाकू, बोरी, रस्सी आदि भी बरामद करवा दी. पूछताछ में उस ने नगमा की हत्या की जो कहानी पुलिस अधिकारियों को सुनाई, वह इस प्रकर थी—

नगमा परवीन मोहम्मद असलम की बड़ी बेटी थी. प्राइवेट नौकरी करने वाले मोहम्मद असलम की जिंदगी मजे से कट रही थी. वह जमाने से कदम मिला कर चलने वालों में थे, इसलिए उन्होंने अपने सभी बच्चों को पढ़ायालिखाया. नगमा ने भी बीए किया. पढ़ाई पूरी करने के बाद उस ने नौकरी करने के बजाए ब्यूटीपार्लर का काम सीखा और घर से थोड़ी दूरी पर अपना ब्यूटीपार्लर खोल लिया. उस का ब्यूटीपार्लर चल भी निकला.

खूबसूरत नगमा परवीन पर मर मिटने वालों की कमी नहीं थी. उन्हीं में आमातालाब का रहने वाला तेजप्रकाश सेन भी था. वह किसी प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता था. उस के पिता सरकारी नौकरी में थे. बापबेटे को ठीकठाक तनख्वाह मिलती थी, इसलिए परिवार सुखी और संपन्न था.

तेजप्रकाश मांबाप की एकलौती संतान था. उस की शादी ही नहीं हो चुकी थी, बल्कि वह एक बेटे और एक बेटी का बाप भी था. इस के बावजूद वह पहली ही नजर में नगमा पर मर मिटा था. नगमा पर दिल आते ही वह उस की एक झलक पाने के लिए उस के घर और ब्यूटीपार्लर के चक्कर ही नहीं लगाने लगा था, बल्कि घंटों उस के ब्यूटीपार्लर के सामने खड़ा हसरतभरी नजरों से ताका करता था.

उस की इस हरकत को देख कर नगमा को समझते देर नहीं लगी कि वह क्या चाहता है. फिर तो वह उसे देख कर अनायास ही मुसकराने लगी. इसी मुसकान ने दोनों को एकदूसरे के करीब ला दिया. उस समय नगमा 18 साल की थी तो तेजप्रकाश 29 साल का. देनों के बीच उम्र में 10 साल का लंबा फासला था. लेकिन तेजप्रकाश की कदकाठी ऐसी थी कि वह इतनी उम्र का लगता नहीं था.

जल्दी ही नगमा के घर वालों को उस के और तेजप्रकाश के प्रेमसंबंधों का पता चल गया था. लेकिन उन्होंने किसी तरह का ऐतराज नहीं किया. नगमा ने तेजप्रकाश को दिल का राजकुमार बनाया तो उसी से शादी करने का फैसला कर लिया. इस की वजह यह थी कि दोहरी जिंदगी जी रहे शातिर तेजप्रकाश सेन ने अपनी शादी के बारे में न तो नगमा को पता चलने दिया और न ही उस के घर वालों को.

जल्दी ही दोनों ने कोर्टमैरिज कर ली. चूंकि नगमा बालिग हो चुकी थी, इसलिए घर वाले चाह कर भी विरोध नहीं कर सकते थे. अदालत से पतिपत्नी की तरह रहने की इजाजत ले कर तेजप्रकाश ने किराए का कमरा लिया और उसी में नगमा परवीन के साथ रहने लगा.

तेजप्रकाश ने जो कुछ छिपा कर नगमा से शादी की थी, जल्दी ही उस सब की जानकारी नगमा को हो गई. जब तेजप्रकाश की सच्चाई नगमा के सामने आई तो वह सन्न रह गई. उस के सपने चूरचूर हो गए थे. उस ने तेजप्रकाश से ऐसी उम्मीद कतई नहीं की थी कि वह उस के साथ इतना बड़ा धोखा कर सकता है. इसलिए उस की सच्चाई जान कर उसे उस से नफरत हो गई.

नगमा परवीन की समझ में नहीं आ रहा था कि उस ने जो गलती की है, उसे मांबाप को कैसे बताए, क्योंकि एक तरह से उस ने मांबाप के भरोसे को तोड़ा था. उस ने मांबाप को बताए बिना तेजप्रकाश से शादी की थी. आखिर में मजबूर हो कर उस ने सारी बातें अपने अब्बू को बताई तो बेटी की परेशानी को देखते हुए वह उस की मदद के लिए तैयार हो गए. क्योंकि बेटी की जिंदगी का सवाल था.

तेजप्रकाश को सबक सिखाने के लिए मोहम्मद असलम ने अदालत में उस के खिलाफ धोखा दे कर शादी करने का मुकदमा दायर कर दिया. मुकदमा दायर होने के बाद तेजप्रकाश के घर वालों को जब उस की इस करतूत का पता चला तो मांबाप ने उस की मदद करने के बजाए उसे उस के हाल पर छोड़ दिया.

पत्नी भी बच्चों को ले कर मायके चली गई. तेजप्रकाश की स्थिति धोबी के कुत्ते की जैसी हो गई. वह न घर का रहा न घाट का. अदालत ने नगमा परवीन के हक में फैसला सुनाया. उस ने तेजप्रकाश को ढाई लाख रुपए देने का आदेश दिया, जिसे उसे 27 हजार रुपए महीने की किस्त के रूप में देना था. उस ने 27 हजार रुपए की पहली किस्त तो नगमा परवीन को दे दी, लेकिन उस के बाद उस ने उसे एक भी रुपया नहीं दिया. धीरेधीरे 3 साल बीत गए. मजबूर हो कर नगमा ने एक बार फिर अदालत का दरवाजा खटखटाया.

नगमा द्वारा दोबारा मुकदमा करने पर तेजप्रकाश परेशान हो उठा. अब उसे अपने किए का पश्चाताप हो रहा था. क्योंकि अब वह कहीं का नहीं रह गया था. पत्नी पहले ही उसे छोड़ कर चली गई थी. मांबाप ने भी मुंह मोड़ लिया था. पत्नी और मांबाप को मनाने की उस ने बहुत कोशिश की, लेकिन उन्होंने उसे साथ रखने से साफ मना कर दिया. जिस की वजह से यह सब हुआ था, वह भी साथ रहने को तैयार नहीं थी. बल्कि वह उसे परेशान कर रही थी.

तेजप्रकाश की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? नगमा द्वारा दोबारा मुकदमा करने से वह काफी परेशान था. इस परेशानी में उस ने नगमा नाम की इस बला से निजात पाने के लिए सोचाविचारा तो उसे लगा कि वह इस बला से हमेशा के लिए तभी छुटकारा पा सकता है, जब उसे खत्म कर दे.

लेकिन इस में खतरा बहुत था. पकड़े जाने पर उस की पूरी जिंदगी जेल में बीतती. इसलिए वह हत्या इस तरह करना चाहता था कि पकड़ा न जाए. उसे पता था कि वह पकड़ा तभी नहीं जाएगा, जब पुलिस की हत्या का कोई सबूत न मिले. इस के लिए तेजप्रकाश टीवी पर आने वाले आपराधिक धारावाहिक देखने लगा. इन्हीं धारावाहिकों को देख कर उस ने नगमा की हत्या की योजना बना डाली. योजना के अनुसार उस ने पहले नगमा पर विश्वास जमाया. तेजप्रकाश नगमा का पहला प्यार था, इसलिए उस ने भले ही उसे धोखा दिया था, लेकिन वह उसे अपने दिल से निकाल नहीं पाई थी.

इसलिए जब भी तेजप्रकाश उसे फोन करता था, वह फोन उठा लेती थी. यही वजह थी कि वह नगमा को यकीन दिलाने में सफल रहा कि वह उसे फिर से अपना लेगा, दोनों पतिपत्नी की तरह रहेंगे. विश्वास दिलाने के लिए उस ने कहा था कि पत्नी से उस ने संबंध तोड़ लिए हैं. उस की इसी बात पर नगमा झांसे में आ गई.

नगमा को पूरी तरह विश्वास में ले कर 17 जनवरी, 2017 की रात 9 बजे के करीब तेजप्रकाश ने उसे फोन कर के कहा कि अगले दिन वह उसे ले कर घूमने जाना चाहता है. नगमा उस के साथ चलने को तैयार हो गई. उस ने यह बात मांबाप को भी नहीं बताई. इस की वजह यह थी कि शायद वे उसे उस के साथ जाने न देते.

18 जनवरी की सुबह 9 बजे तेजप्रकाश ने फोन कर के नगमा से कहा कि वह उस के घर से थोड़ी दूरी पर सड़क पर मोटरसाइकिल लिए खड़ा है. इस के बाद उस ने कहा था कि वह अपना फोन घर में ही छोड़ कर आए, क्योंकि वह उसे नया फोन गिफ्ट में दिलाना चाहता है.

बात नए फोन की थी, इसलिए नगमा ने वैसा ही किया, जैसा तेजप्रकाश ने कहा था. उस ने अपना फोन घर में ही छोड़ दिया. इस के बाद घर वालों से ब्यूटीपार्लर जाने की बात कह कर वह तेजप्रकाश के साथ उस की मोटरसाइकिल से चली गई. नगमा ने भले ही घर वालों को नहीं बताया था कि वह कहां जा रही है, लेकिन उस की छोटी बहन ने उसे तेजप्रकाश के साथ मोटरसाइकिल से जाते देख लिया था.

तेजप्रकाश उसे ले कर पड़ोसी जिले बालोद के सियादेई मंदिर पर पहुंचा. दर्शन करने के बाद उस ने सुनसान जगह पर मोटरसाइकिल रोक कर नगमा को धक्का दे कर जमीन पर गिरा दिया और फुरती से गले में पड़े दुपट्टे से उस का गला घोंट दिया. जब वह बेहोश हो गई तो उस ने डिक्की में रखे चाकू और पेंचकस से उस के गले पर कई वार किए.

जब उसे लगा कि नगमा मर गई है तो उस ने साथ लाए बोरे में उस की लाश भरी और उसे पीछे बांध कर वहां से 40 किलोमीटर दूर रुद्री घाट पर ले गया. वहां से उस ने धमतरी के एक लकड़ी व्यवसाई से फोन पर बात कर के अंतिम संस्कार के बहाने घाट पर लकडि़यां मंगवा लीं. उस समय तक शाम हो चुकी थी. उस ने मोटरसाइकिल से पैट्रोल निकाल कर लकडि़यों पर लाश रखी और पैट्रोल डाल कर आग लगा दी. उस समय घाट सूना पड़ा था. इसलिए उसे लाश जलाते हुए किसी ने नहीं देखा.

लाश जल गई तो उस ने राख ठंडी कर के नदी में फेंक दी, जिस से पुलिस को कोई साक्ष्य न मिले. इस के बाद नहाधो कर साफ कपड़े पहने और रात 11 बजे के करीब दुर्ग जिला के उतई गांव स्थित अपनी ससुराल पहुंच गया. रात उस ने वहीं बिताई और अगले दिन अपने घर आ गया.

रिमांड अवधि खत्म होने पर कोतवाली पुलिस ने उसे दोबारा अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

कथा लिखे जाने तक वह जेल में बंद था. पुलिस उस के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल करने की तैयारी कर रही थी. तेजप्रकाश ने चालाकी तो बहुत दिखाई, पर कानून के लंबे हाथों से बच नहीं सका. सोचने वाली बात यह है कि आखिर तेजप्रकाश को मिला क्या? अगर वह अपनी पत्नी में ही संतोष किए रहता तो न उस का घर बरबाद होता और न जिंदगी?

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