खुदकुशी- भाग 2: सोनी का आखिर क्या दोष था

पूजा और सीमा जब भी कालेज जातीं तो उन की निगाहें वीरेंद्र, गोपी या राजू को ढूंढ़ती रहतीं और जैसे ही क्लास खत्म होती दोनों अपनेअपने साझा बौयफ्रैंड्स को ले कर किसी गुप्त ठिकाने पर पहुंच जातीं. विवाह के बाद भी कोई इतने नियमित यौन संबंध नहीं बनाता जितने ये लड़कियां बिन ब्याहे बनाने की आदी हो गई थीं. हर दिन जैसे खाना, पीना, पढ़ना होता था उसी तरह पूजा और सीमा के लिए शारीरिक संबंध बनाना था. पर उन की समस्या तब शुरू होती थी जब कालेज में छुट्टियां रहती थीं और तब वे अपनी सहेली सोनी के सहारे अपने अनैतिक यौन संबंधों को अंजाम देती थीं. पूजा और सीमा बहुत कुछ करने की महत्त्वाकांक्षी थीं. अपने कमरे में सनी लियोन, मर्लिन मुनरो, पूनम पांडे की लेटैस्ट नैट पर पोस्ट हुई तसवीरों का प्रिंटआउट लेतीं और दीवारों पर चिपकाती थीं. यौन संबंध बनाने के बाद से पूजा और सीमा ने दीवारों पर नंगधड़ंग मर्दों के भी पोस्टर लगा छोड़े थे. सोनी जब भी उन के होस्टल के कमरे में जाती थी तो उस का सिर घूम जाता था, वह पूछती भी थी कि ऐसी तसवीरें क्यों लगा रखी हैं, तो पूजा और सीमा कहतीं कि ये कमरा तो प्रयोगशाला है यहां भावना को परखनली में डाल कर सैक्सी बनाया जाता है और परिणाम होटल के कमरे में वीरेंद्र के साथ प्राप्त किया जाता है. सोनी की समझ से बाहर थीं ये सब बातें, वह सुन कर भी कुछ समझ नहीं पाती इसलिए बहुत गंभीरता से इन बातों को लेती भी नहीं थी.

खेलने का शौक पूजा को कुछ ज्यादा ही था, वह फुटबौल और बौलीबौल की कालेज टीम की कप्तान थी और कालेज की तरफ से खेल प्रतियोगिताओं में भाग लेने, दूसरे शहरों में आयाजाया करती थी. शारीरिक खेल की लत भी उसे इन खेल प्रतियोगिताओं में भाग लेने के दौरान ही लगी. सीमा पूजा की तरह कप्तान तो नहीं थी पर खेल में वह भी रुचि रखती थी और पूजा के साथ दोस्ती गांठ कर कई फायदे उठाती थी. सीमा पूजा की अच्छी प्रशंसक थी और पूजा का अनुकरण भी करती थी. शौर्ट्स और टीशर्ट्स पहन कर खेलने वाली लड़कियों को तो मेल टीचर्स तक खा जाने वाली निगाहों से देखा करते हैं तो उन हमउम्र लड़कों का क्या जो कालेज की खेल प्रतियोगिताओं में भाग लेने सिर्फ इसलिए जाते हैं कि उन्हें लड़कियों का संसर्ग प्राप्त हो सके. नतीजतन, छोटे शहरों की परंपरानुसार विवाह के पहले शारीरिक संबंध बनाने वाली लड़कियों का जो होता है वही हुआ. पूजा धीरेधीरे बदनाम होने लगी और यही बदनामी की बात सोनी को समझ में नहीं आती थी. पूछने पर उसे कुछ बताया भी नहीं जाता था. लिहाजा, वह चुप रहती थी.

सोनी की समस्या तब शुरू हुई जब वह इंतजार करना छोड़ कर एक दिन अचानक उस कमरे में घुस गई जहां पूजा अपने प्रेमी के साथ हमबिस्तर थी. उस दिन सीमा के एक दूर के रिश्तेदार के खाली पड़े घर में 3 लड़के थे, जिन में वीरेंद्र भी एक था जो एकएक कर अपना काम निबटाने में लगे थे. सोनी भी वहीं थी, एक आता, दूसरा जाता, यद्यपि सोनी अनजान थी परंतु जिज्ञासा उसे हो ही रही थी कि आखिर एकएक कर लड़के अंदर जाते हैं जहां पूजा है और थोड़ी देर बाद बाहर आ जाते हैं. सीमा का उस दिन देह सुख का प्रोगाम नहीं था इसलिए वह घर के बगीचे में चली गई थी और पेड़ों के साए में आहिस्ताआहिस्ता चहलकदमी कर रही थी. सोनी से रहा नहीं गया, तीसरा लड़का जब कमरे में दाखिल हुआ तो सोनी ने सोचा कि इस बार वह जा कर उन लोगों की बातें सुनेगी. लौट कर आए 2 लड़के उतनी मुस्तैदी से उस की निगरानी कर भी नहीं रहे थे और ऐसा करना स्वाभाविक भी था, क्योंकि वे लोग निबट चुके थे. बस, फिर क्या था सोनी निढाल पड़े दोनों लड़कों की आंख बचा कर कमरे में अचानक घुस गई और जो देखा उस के लिए बिलकुल अचंभित करने वाला था. इस से पहले न सोनी ने ऐसा कुछ देखा था और न ही ऐसा कुछ सोच सकी थी लेकिन निर्वस्त्र तो वह खुद को भी नहीं देख सकती थी, तो फिर अपनी सहेली पूजा को. वह बाहर भागी लेकिन उस की आंखों में एक खौफ था, नंगेपन का खौफ, बाहर कमरे में लड़के उसे दबोच चुके थे और इस से पहले कि वह कुछ कहती या करती, पूजा कपड़े पहन कर आ गई थी और बिना कुछ कहे उस का हाथ पकड़ कर बाहर की ओर चल दी थी.

पूजा थकी हुई जरूर लग रही थी लेकिन लंबे, कसरती, खिलाड़ी बदन से अभी भी एकदो लड़कों से वह बिस्तर पर निबट सकती थी. लंबे समय के अभ्यास से उस ने अच्छा स्टैमिना प्राप्त कर लिया था. रास्ते में सोनी कुछ बोल नहीं रही थी और न ही पूजा से आंखें मिला पा रही थी. गलती पूजा ने की थी, शर्म सोनी को आ रही थी. न जाने सोनी में कैसे यह एहसास जाग गया था कि वह कुछ ऐसा देख चुकी है जो उसे नहीं देखना चाहिए था. नहीं जानते हुए भी वह उतने बेबाक ढंग से अपनी सहेली पूजा की ओर नहीं देख पा रही थी. जैसी उस की आदत थी लेकिन पूजा के पास वक्त कम था, थोड़ी ही देर में सोनी का घर आ जाता और न जाने सोनी अपने पापामम्मी के सामने अपनी कैसी प्रतिक्रिया व्यक्त करती इसलिए उसे रास्ते में ही समझा देना जरूरी था. बात की शुरुआत करते हुए पूजा ने कहा, ‘‘तुम ने जो भी देखा वह किसी को बताना, नहीं क्योंकि कोई इस बात को सही ढंग से समझेगा नहीं और हम लोगों का होस्टल से निकलना बंद हो जाएगा. जो लड़के मेरे साथ थे उन में से कोई भी कुछ नहीं पूछेगा लेकिन अगर तुम ने मुंह खोला, तो प्रश्नों की बौछार लगा दी जाएगी. चरित्र पर प्रश्न उठेगा, समाज की मर्यादा का प्रश्न उठेगा, घरपरिवार की इज्जत का प्रश्न उठेगा. इन सभी प्रश्नों के उत्तर सिर्फ हम लोगों को ही देने हैं, वीरेंद्र, गोपी व राजू को नहीं. उन से कोई कुछ नहीं पूछेगा,’’ सोनी सिर्फ सुने जा रही थी, कुछ बोल नहीं रही थी.

सोनी घर पर भी चुप ही रही परंतु पूरे वाकये में कुछ न कुछ गलत होते उस ने देखा था, ऐसा उसे लग रहा था. दिन बीतने के साथसाथ अब पूजा के लिए एक नई मुसीबत शुरू हो गई थी कि सोनी उस किस्से के बारे में बारबार पूछती रहती थी और नहीं बताने की सूरत में उसे एक दबी हुई धमकी दे डालती थी कि वह अपने मातापिता से कह कर इसे समझने की कोशिश करेगी.

योगी सरकार 2.0 ने अपने पहले बजट में महिलाओं और बेटियों को दी प्राथमिकता

योगी आदित्‍यनाथ सरकार 2.0 का बजट विधानसभा में गुरूवार को पेश किया गया. वित्‍त मंत्री सुरेश खन्‍ना ने अब तक का सबसे बड़ा और पेपरलेस बजट पेश किया. यह बजट प्रदेश की महिलाओं, बेटियों और बच्‍चों के लिए बेहद खास है. प्रदेश की महिलाओं और बेटियों के उत्‍थान के लिए योगी सरकार ने साल 2017 से ही जमीनी स्‍तर पर योजनाओं को लागू कर सीधे तौर पर उनको लाभ पहुंचाने का काम किया. ऐसे में एक बार फिर से सरकार बनने के बाद योगी सरकार ने अपने पहले बजट में महिलाओं और बेटियों को प्राथमिकता दी है. बजट में इस बार महिलाओं व बेटियों की सुरक्षा, रोजगार, शिक्षा, स्‍वावलंबन पर जोर दिया है. जिसके तहत लखनऊ, गोरखपुर और बदायूं में 03 महिला पीएसी बटालियन का गठन किया जा रहा है. बजट में महिला सामर्थ्य योजना के लिए 72 करोड़ 50 लाख रूपये की धनराशि प्रस्तावित की गई है. इस योजना के तहत राज्य की महिलाओं को रोजगार के लिए प्रेरित किया जाएगा. इससे महिलाओ में उत्साह बढ़ेगा और वह सशक्त और आत्मनिर्भर रहेंगी.

बजट में बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ

कार्यक्रम के तहत यूपीएसईई-2018 की 100 टॉपर छात्राओं को लैपटॉप और 100 टॉपर एससी व एसटी छात्राओं को लैपटॉप का वितरण किया जाएगा. प्रदेश में चल रहे वृहद मिशन शक्ति अभियान के लिए 20 करोड़ रूपये की धनराशि प्रस्तावित की गई है. इसके साथ ही मुख्यमंत्री कन्या सुमंगला योजना के तहत पात्र बालिकाओं को 06 विभिन्न श्रेणियों में 15000 रूपये की सहायता पीएफएमएस के जरिए से प्रदान की जा रही है. इस वित्तीय वर्ष 2022-2023 के बजट में योजना हेतु 1200 करोड़ रूपये की व्यवस्था प्रस्तावित की गई है. पुष्टाहार कार्यक्रम के तहत समन्वित बाल विकास योजना के तहत राज्य सरकार द्वारा दिए जाने वाले पोषाहार के लिए 1675 करोड़ 29 लाख रूपये की व्यवस्था प्रस्तावित की गई है.

योगी सरकार का बच्चों के मुद्दों पर विशेष ध्यान

उत्तर प्रदेश सरकार ने बच्चों के मुद्दों पर विशेष ध्यान दिया है. इसके ही परिणाम है कि पिछले कुछ वर्षों में एक ओर शिशु मृत्यु दर में तेजी से गिरावट आई है वहीं दूसरी ओर दस्तक कार्यक्रम के परिणामस्वरूप एईएस व जेई से प्रभावित सभी क्षेत्रों में बच्चों की मृत्यु में बड़ी कमी दर्ज की गई है. योगी सरकार के इस पहले बजट में बाल कल्याण पर विशेष ध्‍यान दिया गया है. जिसके तहत कुपोषण पुनर्वास केन्द्रों को जिलों से ब्लॉक तक ले जाने के लिए बजटीय प्रावधान किया गया है. उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री बाल सेवा योजना के तहत पात्र बच्चों को 4000 रूपए प्रतिमाह की आर्थिक सहायता दी जाएगी. उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री बाल सेवा योजना (सामान्य) के तहत पात्र लाभार्थियों को 2500 रूपये प्रतिमाह की आर्थिक सहायता स्‍वीकृत है. इसके साथ ही ऑपरेशन विद्यालय कायाकल्प कार्यक्रम के तहत सरकारी स्कूलों में बच्चों के नामांकन में वृद्धि की जाएगी.

Aashram 3: तीन जून से MX Player पर होगी निराला बाबा की वापसी

हमारे देश में हर जगह बाबाओं का ही मायाजाल फैला हुआ है. आम जनता इन बाबाओं द्वारा ठगी जाने पर भी इनका गुणगान करती रहती है. ऐसे ही बाबाओ में आसाराम बापू या राम रहीम भी रहे हैं. कुछ इसी तरह के बाबाओं के सच को लोगों के सामने लाने के लिए करोना काल के दौरान फिल्मकार प्रकाश झा वेब सीरीज ‘‘आश्रम’’ लेकर आए थे,जिसमें विस्तार से इन बाबाओं के कारनामों का चित्रण था.

‘एम एक्स प्लेअर’ पर स्ट्रीम हुई इस सीरीज को काफी पसंद किया गया. फिर इसका दूसरा सीजन भी आया. अब इसका तीसरा सीजन ‘‘एक बदनाम आश्रम..3’’ तीन जून से ‘एम एक्स प्लेअर पर ही आने जा रहा है.

एक बार फिर काशीपुर वाले बाबा का साम्राज्य नजर आएगा. एक बार फिर से बाबा की अंधेर नगरी में जुल्म का हाहाकार मचेएगा. लेकिन इस बार लोग देख सकेंगे कि ‘काशीपुर वाले बाबा’ के आगे किस तरह राज्य का मुख्यमंत्री नतमस्तक होकर जनता को त्रस्त करने पर आमादा हो जाता है.

जी हां! अब राज्य के मुख्यमंत्री हुकुम सिंह ने एक पूर्व राजा की हवेली का अधिग्रहण कर उसे काशीपुर वाले बाबा का आश्रम ‘निराला धाम’ बनाकर 999 वर्ष के लिए लीज पर दे दिया है. जब सरकार आपके इशारे पर नाच रही हो तो स्वाभाविक तौर पर बाबा निराला ज्यादा शक्तिशाली और चतुर बन गए हैं.

इस बार सिर्फ बाबा का चोला ओढ़े नहीं बल्कि कलयुग का भगवान बनकर खुल्लम खुल्ला भक्तों के आस्था से खिलवाड़ करते नजर आएंगे. वैसे भी अब यह ‘एक बदनाम आश्रम’ हो गया है. इसके ट्रेलर को डेढ़ करोड़ से अधिक लोग देख चुके हैं. इस बार दर्शक देखेंगे कि अब यह बदनाम आश्रम किस तरह महापाप का अड्डा बन चुका है. किस तरह बाबा अपने अनुकूल हर नियम को मोड़ते रहते हैं.

ट्रेलर में पिछले सीजन की बात भी है, जहां बाबा निराला ‘निडर बनो’ की बात करते हैं. फिर सत्ता के लिए उसकी लालसा तेज हो गई है, जिससे वह अजेय हो गया. वह विश्वास करता है सब से ऊपर होना और सोचता है कि वही भगवान है.

आश्रम की शक्ति चरम पर है. इस ‘बदनाम‘ आश्रम में महिलाओं का शोषण जारी है, नशीली दवाओं के व्यापार में लिप्त हैं और ये शहर की राजनीति को नियंत्रित करते हैं. बाबा निराला की अपनी सेना के अलावा सरकार का पुलिस तंत्र पम्मी को दबोचने पर आमादा है तो वहीं भगवान निराला से बदला लेने के लिए पम्मी की रातों की नींद उड़ी हुई है. उजागर सिंह, पम्मी को न्याय दिलाकर ‘बदनाम‘ आश्रम का पर्दाफाश करना चाहता है. अब क्या होगा यह तो सीरीज देखने पर ही पता चलेगा.

प्रकाश झा अपने बेखौफ और बेबाक विषयों से समाज को सच्चाई का आइना दिखाते रहे हैं. सत्ता की राजनीति हो या आस्था के नाम पर धर्म गुरुओं की राजनीति, बिना किसी भय के सच्ची कहानियों को बड़े पर्दे पर वह लाते रहे हैं.

जी हां! बेखौफ और निडरता से हर कहानी को बड़ी ही बारीकी से कह देने वाले निर्देशक प्रकाश झा ने हाल ही में ‘आश्रम 3’ की प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्वीकार किया कि उन्हें भी डर लगता हैं.जब उन्हें किसी अनचाही हलचल या विरोध का सामना करना पड़ता है.

इस सीरीज की चर्चा करते हुए निर्देशक प्रकाश झा कहते हैं- ‘‘ फिल्मे बनाना मेरा एक जुनून हैं. मैने ‘अपहरण’ व ‘गंगाजल’ जैसी कई फिल्में बनायी हैं. यह मेरा सौभाग्य हैं कि मुझे उतने ही उत्साही और जोशीले कलाकार और तकनीशियन के साथ काम करने का मौका मिला, जिन्होंने मुझ पर अपना विश्वास जताया और कहानी को हुबहू वैसा ही दिखाया जैसा कि मैं चाहता था.

आश्रम के साथ भी हमने उसी जुनून, भाव और रोमांच को जिया हैं. साथ ही एम एक्स प्लेअर का बेहतरीन साथ मिला, जिसकी वजह से दर्शकों ने भी इसे पसंद किया. ’’

इस प्रेस क्राफ्रेंस में जब प्रकाश झा से सवाल किया गया कि ‘आश्रम’ के पहले सीजन में उनके खिलाफ एफ. आई.आर दर्ज की गई और इस बार के सीजन में उन पर स्याही फेकी गई. ऐसे में लगातार हो रहे हंगामों से उन्हें डर लगता होगा?

तब प्रकाश झा ने कहा- ‘‘आश्रम के बारे में ऐसा हैं कि कही कुछ भी हो सकता हैं. कोई कुछ भी कर सकता हैं. क्योंकि हमने विषय ही ऐसा चुना हैं, जो समाज के हर इंसान से जुड़ा विषय हैं. लोगो से संबंध रखता है. लेकिन यह किसी एक व्यक्ति या कल्पना की कहानी नहीं हैं. यह पब्लिक डोमेन में मौजूद जानकारी को काल्पनिक कहानी के तौर पर पेश करने का प्रयास है.

मैं यह कहूं कि मुझे डर नहीं लगता, तो यह भी गलत बात है. लेकिन डर कर जीना भी अच्छा नहीं लगता, तो उसके साथ जीता हूं. हमेशा से मन करता हैं कि जो कहना है वह तो कहना ही हैं. किसी व्यक्ति को अगर व्यक्तिगत रूप से चोट पहुंचाए बिना कुछ कह सकूं, तो मैं कोशिश करता हूं कि उसे कहा जाए. अब चाहे वह राजनीतिक हो चाहे हो धार्मिक हो या चाहे वह व्यावसायिक हो. बाकी पत्थर फेंके जाते हैं, गालियां पड़ती हैं, एफ आई आर दर्ज होती हैं.. ठीक है.. इससे कुछ लोगों के हाथ मजबूत होंगे. हां! यदि यह लोग सामने आकर बात करते,तो ज्यादा बेहतर होता.‘‘

बाबा निराला का किरदार निभाने वाले अभिनेता बॉबी देओल कहते हैं- ‘‘मैं एक बार फिर से प्रकाश झा और एम एक्स प्लेअर के साथ काम करने के लिए रोमांचित हूं. प्रकाशजी के आश्रम की कहानी ने मुझे इसे करने के लिए प्रेरित किया और मैं हमेशा इसका आभारी रहूंगा. हर अध्याय में बाबा का चरित्र और गहरा दिखाई देगा. सीजन 3 में इसका ऐसा रंग हैं जो दर्शकों को उनकी सीट पर बांधे रखेगा. आश्रम एक शक्तिशाली और मनोरंजक सीरीज है, जिसने मुझे जीवन भर का अनुभव दिया है.‘‘

प्रकाश झा द्वारा निर्मित और निर्देशित, एमएक्स ओरिजिनल सीरीज में बॉबी देओल, अदिति पोहनकर, चंदन रॉय सान्याल, दर्शन कुमार, अनुप्रिया गोयनका, ईशा गुप्ता, सचिन श्रॉफ, अध्ययन सुमन, त्रिधा चैधरी, विक्रम कोचर, अनुरिता के झा, रुशाद राणा, तन्मय रंजन, प्रीति सूद, राजीव सिद्धार्थ और जया सील घोष हैं.

उत्पीड़न: आजाद देश में आज भी है गुलाम

सभ्यता के विकास के पहले ही इनसान ने बैल, गाय, घोड़े की तरह दूसरे इनसानों को भी अपना गुलाम बनाना शुरू कर दिया था.

रोम में जनता के मनोरंजन के लिए गुलामों को बिना कपड़ों और बगैर सुरक्षा उपकरण के ग्लैडिएटर की तरह लड़ाया जाता था और उन का खून निकलते देख कर जनता खुशी के मारे तालियां पीटती थी.

यूरोपियन इन गुलामों को ‘हब्शी’ कहते थे. उन्होंने इन लोगों का खरीदनाबेचना शुरू कर दिया था. दासों को ‘स्लेव’ कहा जाता था.

पुर्तगाली आबादी बढ़ाने के लिए सुंदर दिखने वाले गुलाम मर्दों व औरतों का इस्तेमाल अपनी हवस मिटाने के लिए करने लगे.

पुर्तगाली मर्द गुलाम औरतों और पुर्तगाली औरतें गुलाम मर्दों को अपने घर में कैद कर के उन से अपनी हवस को शांत करते थे.

इस तरह गुलाम औरत से पैदा हुई औलाद को भी गुलामों की तरह इस्तेमाल किया जाता था, पर पुर्तगाली औरत और गुलाम मर्द से पैदा हुई औलाद को अच्छा माना जाता था.

एथेंस में एक समय गुलामों की तादाद आजाद नागरिकों से भी ज्यादा हो गई थी, लेकिन नेतृत्व की कमी में वे कुछ न कर सके.

भारत में दलितों की हालत अफ्रीका के दास, यूरोप के गुलाम और अमेरिका के ब्लैक के समान ही चिंतनीय है. भारत में आज भी गांवों में दलितों से बंधुआ मजदूर की तरह काम कराया जाता है और हर तरह से इन का शोषण किया जाता है. शारीरिक, मानसिक और आर्थिक उत्पीड़न के साथ ही साथ इन के मालिक इन की बोटी नोच लेने को तैयार रहते हैं. जरूरत पड़ने पर इन के शरीर के किसी हिस्से को निकाल कर बेचने के लिए तैयार रहते हैं.

सरला एक दलित बस्ती में बीड़ी बना कर जिंदगी गुजार रही है. बीड़ी बनाने के लिए उसे एक सेठ से कच्चा माल खरीदना पड़ता है. सेठ का बेटा मुनाफा तो उठाता ही है, साथ में उस पर बुरी नीयत भी रखता है. कच्चा माल देने के बहाने वह सरला को जानबूझ कर ऐसे समय पर बुलाता, जब उस के सारे नौकर और पिताजी घर जा चुके होते.

सेठ का बेटा कभी सरला से सिर की मालिश कराता, तो कभी पैर दबाने का हुक्म देता. कच्चे माल के अलावा सरला पर 5,000 रुपए की उधारी थी और न चाहते हुए भी उसे सेठ के बेटे की नाजायज मांग पूरी करनी पड़ती थी.

सरकार ने दलित उत्पीडि़त और औरतों के स्वावलंबन के लिए सोसाइटी बनाई थी. सरला की योजना थी कि इस बार वह सोसाइटी से एडवांस रुपए ले कर सेठ की उधारी चुका देगी और फैक्टरी से सीधा माल खरीदेगी. इस से उस की कमाई बढ़ जाएगी और सेठ की बुरी नीयत और रोजरोज की छेड़खानी से भी वह बच जाएगी.

सोसाइटी के चुनाव के पहले सरला का बच्चा बीमार पड़ गया. महल्ले के सस्ते डाक्टर से इलाज के चक्कर में उस के बच्चे की हालत बिगड़ गई तो डाक्टर ने अपना पल्ला झाड़ने के लिए इसे देवीदेवताओं का प्रकोप बता दिया.

शहर के मैडिकल कालेज के इलाज से सरला का बच्चा ठीक हो गया, लेकिन मंदिर के पंडेपुजारियों ने उसे देवी प्रकोप से बचाने के बहाने अपने प्रभाव में ले लिया.

पंडेपुजारी किसी दलित को मंदिर में घुसने भी नहीं देते. कभी किसी मजबूरी में दलित मजदूर से मंदिर का काम कराना पड़ जाए तो मंदिर को गंगाजल से धोते हैं. उन्होंने एक हफ्ते तक देवी प्रकोप के बहाने सरला से खूब सेवा और खुशामद कराई.

पंडे की सिफारिश पर सरला ने सोसाइटी के चुनाव में अपना कीमती वोट बड़े घर की दीपशिखा को दे दिया. दीपशिखा ने चुनाव जीतने के बाद दलित बस्तियों में झांकना भी उचित न समझा.

दीपशिखा ने सोसाइटी का सारा फंड अपने समाज की औरतों में बांट दिया और सरला की अर्जी को रद्दी की टोकरी में डाल दिया.

सरला अपने बच्चे के ठीक हो जाने से संतुष्ट है.

आज शाम को उसे फिर से सेठ के बेटे ने अपने बंगले के पीछे भैंस के तबेले में बुलाया है. उस ने सरला को ठीक तरह से नहाने और इत्र छिड़क कर आने के लिए कहा है, क्योंकि उस के जिस्म से मरे हुए जानवर की बदबू आती है.

‘लुनाना : ए याक इन द क्लासरूम’- पढ़ाई का पाठ पढ़ाती एक कहानी

अगर कोई टीचर बच्चों को अंगरेजी के कायदे से ‘सी फोर कार’ पढ़ाए और अगर उन बच्चों ने कभी कार देखी ही न हो तो. अगर कोई टीचर किसी बच्चे से यह सवाल पूछे कि वह बड़ा हो कर क्या बनना चाहता है और बच्चा कहे कि टीचर, क्योंकि उस के हाथ में भविष्य की चाबी होती है. इस पर टीचर अचंभित हो कर कहे… अच्छा? क्या आप ने कभी ऐसी जगह के बारे में सुना है, जहां कागज जलाना पैसे जलाने के बराबर समझा जाता हो?

ऐसे ही कुछ दिलचस्प सवालों के जवाब पाने के लिए आप को भारत के पड़ोसी देश भूटान चलना होगा, जहां की राजधानी थिंपू में एक नौजवान सरकारी टीचर अपनी बूढ़ी दादी के साथ रहता है. पर उस टीचर की एक बड़ी समस्या भी है, जो उस के भविष्य से जुड़ी है.

दरअसल, उग्येन दोर्जी नाम के इस नौजवान में अपनी टीचरी को ले कर कोई जोश नहीं है. हालांकि वह एक सरकारी टीचर है, पर वह टीचर बनना ही नहीं चाहता है, क्योंकि वह तो भूटान छोड़ कर आस्ट्रेलिया में बसने का सपना देख रहा है, जहां अपने सिंगिंग टैलेंट से लोगों का दिल जीत सके.

उग्येन दोर्जी की आवाज बड़ी मीठी है और वह गाता भी सुर में है. थिंपू में वह एक बार टाइप रैस्टौरैंट में अंगरेजी गाने गाता है, लिहाजा जब उसे दुनिया के सब से रिमोट स्कूल, जो गांव लुनाना में है, बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी दी जाती है, तो वह सरकारी नुमाइंदे के सामने साफ कह देता है कि उसे पढ़ाने में कोई दिलचस्पी नहीं है

पर उग्येन दोर्जी सरकारी नियमों से बंधा होता है और न चाहते हुए भी लुनाना गांव में जाने को मजबूर होता है. यहां से शुरू होती है उस भूटानी फिल्म ‘लुनाना : ए याक इन द क्लासरूम’ की  रोचक कहानी, जो इस बार औस्कर अवार्ड में बैस्ट इंटरनैशनल फिल्म के लिए नौमिनेट की गई थी.

कहानी में आगे बढ़ते हैं. थिंपू शहर से लुनाना गांव के तकरीबन एक हफ्ते के हद से ज्यादा थका देने वाले सफर में उग्येन दोर्जी की वहां रहने में कोई दिलचस्पी नहीं होती है और पढ़ाने में तो बिलकुल भी नहीं. पर जब वह गांव की सीमा के पास पहुंचता है और वहां जमा हुए सभी गांव वालों की मेहमाननवाजी देखता है कि वे अपने गांव में टीचर के आने से कितने खुश हैं, तो मन ही मन सोचता है कि कितने बेवकूफ लोग हैं, जो उस इनसान से उम्मीद बांधे हुए हैं, जो कुछ ही दिनों में इस गांव से वापस हो लेगा.

बहरहाल, उग्येन दोर्जी गांव पहुंचता है और वहां के हालात देखते ही गांव के मुखिया को सारी असलियत बता देता है, तो मुखिया बहुत मायूस होता है और फिर वह बुझे मन से कहता है कि अभी तो खच्चर इतने दिनों के सफर से थके हुए हैं, जब वे थोड़ा आराम कर लेंगे तो उसे वापस भेज दिया जाएगा, तब तक तो वह इसी गांव में रह ले.

यहां से उग्येन दोर्जी की जिंदगी में बदलाव आता है. 9-10 बच्चे उस के छात्र होते हैं, जिन में महज एक ही लड़का होता है, बाकी सब लड़कियां. वह धीरेधीरे उन बच्चों में दिलचस्पी लेने लगता है और वहीं खुद भी सीखता है कि ऊपर पहाड़ पर लोग जलावन के लिए याक के गोबर से बने उपले इस्तेमाल करते हैं और किस तरह याक उन सब के लिए उपयोगी पशु है.

गांव में एक लड़की, जो याक चराती है और मीठी धुन पर भूटानी लोकगीत गाती है, उग्येन दोर्जी की क्लास में एक बूढ़ा याक बांध देती है, ताकि उग्येन को गोबर की तलाश में यहांवहां न भटकना पड़े.

इसी बीच उग्येन दोर्जी अपना कार्यकाल पूरा करने की बात कहता है और शहर से अपने दोस्त के जरीए कुछ किताबें और खेल का सामान मंगवा लेता है. दोस्त उस का गिटार भी भिजवा देता है.

पर जब लुनाना में सर्दियों का प्रकोप शुरू होने लगता है, तो प्रधान उग्येन दोर्जी को वापस थिंपू जाने की सलाह देता है, ताकि अगले वसंत के शुरू होने पर वह दोबारा गांव आ सके, पर उग्येन दोर्जी कह देता है कि वह अब दोबारा नहीं आएगा और ऐसा होता भी है.

यह फिल्म तो यहीं खत्म हो जाती है, पर कुछ ऐसी सीख दे जाती है, जिन पर हम ज्यादा ध्यान नहीं देते हैं. पहली सीख तो यह कि पढ़ाईलिखाई जिंदगी में बहुत ज्यादा जरूरी है. लेकिन ऐसी पढ़ाईलिखाई, जो आप को न सिर्फ रोजगार दे, बल्कि आगे बढ़ने की भी सही राह दिखाए.

दुनिया के सब से रिमोट स्कूल (गांव लुनाना) के वे 50-60 लोग इसी पढ़ाईलिखाई की अहमियत को समझते हैं, तभी तो उन के लिए टीचर आदरणीय हैं और वे अपने बच्चों को भी तालीम दिलाने में अपनी खुशनसीबी समझते हैं.

इसे लुनाना गांव के प्रधान के एक डायलौग से भी समझा जा सकता है. वह यह बात जान चुका होता है कि अब उग्येन दोर्जी गांव में नहीं रुकेगा. वह बड़ा ही निराश हो कर बोलता है, ‘‘मैं ने सुना है कि कुछ लोग दावा करते हैं कि हमारा देश दुनिया का सब से खुशहाल देश है, फिर भी आप जैसे लोग, जो शिक्षित हैं, जो इस देश की सेवा कर सकते हैं, जिन का अपने देश में अच्छा भविष्य है, वे खुशी की तलाश में कहीं और जाना चाहते हैं…’’

यहां पर फिल्म उस प्रतिभा पलायन पर कटाक्ष करती है कि एक सरकारी टीचर को अपना देश छोड़ने की क्या जरूरत है, जबकि उस के हाथ में तो भविष्य की चाबी होती है?

यह समस्या अकेले भूटान की नहीं है, बल्कि भारत में भी ऐसा खूब चलन में है. यहां के पहाड़ी गांवों के स्कूल भी बदहाल हैं. अव्वल तो पहाड़ी प्रदेशों के सुदूरवर्ती गांव या तो खाली हो चुके हैं और अगर कहीं आबादी है भी तो स्कूल में पढ़ाने के लिए टीचर नहीं हैं.

एक रिपोर्ट की मानें, तो अकेले उत्तराखंड राज्य में 1,200 गांव और उस के भी अकेले अल्मोड़ा जिले में 274 गांव खाली हो चुके हैं.

पर उग्येन दोर्जी के साथ तो ऐसी कोई समस्या नहीं थी. वह सरकारी टीचर है और अपनी दादी के साथ थिंपू में रहता है. पर न जाने क्यों टीचरी उसे समझ नहीं आती है और हमेशा यही लगता है कि वह कभी अच्छा टीचर नहीं बन पाएगा. पर उस की यह गलतफहमी लुनाना गांव में तब दूर होती है, जब लोकगीत गाने वाली लड़की उस से कहती है, ‘‘तुम्हें कभी पता नहीं चलेगा कि तुम एक अच्छे टीचर हो या नहीं, यह बात सिर्फ पेमा जैसे बच्चे ही बता सकते हैं.’’

एक अच्छे टीचर की यही निशानी होती है कि वह सीमित संसाधनों का अच्छे से इस्तेमाल कर सके. वह बच्चों को स्कूली किताबों की पढ़ाई के साथसाथ ऐसी जानकारी दे, जो उन्हें अच्छा इनसान बनने में मददगार साबित हो.

देशदुनिया में ऐसे ही टीचरों की जरूरत है, जिन के हाथ में भविष्य संवारने की चाबी हो, भविष्य का संहार करने की नहीं.

लिहाजा, पढ़नेपढ़ाने की इस लौ को जलाए रखें, फिर वह दुनिया का कोई सब से रिमोट स्कूल ही क्यों न हो, क्योंकि जिस तरह वहां कुदरत अपने खालिस रूप में होती है, वैसे ही पढ़ाईलिखाई के पेशे पर भी कोई काला धब्बा नहीं लगा होता है.

इश्क का खेल: क्या हुआ था निहारिका के साथ

crime story in hindi

खुदकुशी- भाग 1: सोनी का आखिर क्या दोष था

आज के समाज में लड़की समय के बीतने से जवान नहीं होती बल्कि उसे घूरघूर कर जवान कर दिया जाता है. सोनी, पूजा, सीमा इन्हीं लड़कियों में से हैं जिन्हें लोगों ने समय से पहले जवान कर दिया था. अभी ये तीनों टीनएजर्स हैं और छोटे शहर के तथाकथित आधुनिक समाज की आधुनिक लड़कियां हैं जो बौयफ्रैंड बनाना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझती हैं. सोनी नहीं समझ सकी थी कि उस के जानेपहचाने लड़के जिन्हें वह अपना बौयफ्रैंड समझती थी, उसे इतना तंग और अपमानित कर देंगे कि एक दिन उसे दुनिया छोड़नी पड़ेगी. वह जिन्हें अपने आसपास हर वक्त देखती थी, जिन के साथ प्राय: घूमने, ट्यूशन पढ़ने व कालेज जाती थी वही उसे अपनी जान देने को मजबूर कर देंगे. वह सोच रही थी कि आखिर ये सभी लड़के पूजा के साथ भी तो इधरउधर घूमते नजर आते थे. पूजा ही तो उसे भेजा करती थी उन लड़कों में से कभी एक के पास और कभी दूसरे के पास. उस वक्त तो वे लड़के उस के साथ बड़े रहमदिल की तरह पेश आते थे, उस की किताबें ले लेते थे, उसे बाइक पर कहीं दूर लंबे सफर पर भी ले जाते थे. ये लोग उस का कुछ नहीं बिगाड़ सकते, मजाक कर रहे हैं, फिर छोड़ देंगे, वह समझती थी. लेकिन उन लड़कों के उस के साथ शारीरिक रोमांस को वह समझ नहीं पाई थी. वह खुश होती थी. जब दोएक सहेलियों के साथ वह होटल या रेस्तरां में जाती थी तो कभी बिलविल के चक्कर में वह नहीं पड़ी. बस चाट खाई, आइसक्रीम खाई, चाइनीज फूड लिया, इतने से ही उसे मतलब रहता था. यह तो वह जानती थी कि उस की सहेली पूजा होटल के अंदर किसी कमरे में अपने किसी बौयफ्रैंड से मिलने गई है, बातें करती होगी ऐसा सोचती थी वह. वह यह नहीं सोचती थी कि बातों के अलावा भी कोई और संबंध एक जवान होती लड़की एक लड़के से बना सकती है.

दीनदुनिया से बेखबर सोनी ऐसे परिवार में पलीबढ़ी थी जहां सिर्फ प्यार ही था. मातापिता का प्यार, भाई का प्यार, चाचाचाची का प्यार, दादादादी का प्यार. कला की छात्रा रही सोनी सैक्स के बारे में सिर्फ इतना ही जानती थी जितना एक सभ्य युवती जानती है. शादी के पहले सैक्स की कोई जरूरत ही नहीं होती ऐसी युवतियों को. सोनी वैसी लड़कियों में से थी जो शादी के बाद अपनी सुहागरात में सैक्स के टिप्स अपनी भाभियों, बड़ी बहनों या फिर कामसूत्र की पुस्तकों से लिया करती हैं. गहराई तक जाने वाला सैक्स जो हमारे समाज में शादी के बाद ही जाना जाता है या यों कहिए जानना चाहिए, सोनी नहीं जानती थी. अगर सोनी गलत संगत में नहीं पड़ी होती तो शायद जिंदगी का भरपूर आनंद उठा रही होती. सोनी को यह नहीं मालूम था कि लड़के तो लड़के, मर्द किसी भी उम्र की लड़कियों के वक्ष और नितंबों को किस कारण से घूरते हैं. सोनी को यह भी नहीं मालूम था कि उस के साथ रहने वाले लड़के उसे अपनी तीसरी आंख से पूर्ण नंगा कर कई बार देख चुके हैं. सोनी कभीकभी अपनी सहेलियों से पूछती थी कि वे क्यों उसे मना करती हैं होटल और रेस्तरां में घटने वाली तमाम बातों को मम्मीपापा को न बताने को, जिस पर उस की सहेलियां उत्तर देने के बजाय उसे धमकी देती थीं कि वे कभी उसे कहीं भी नहीं ले जाएंगी. बाइक पर घूमने का मौका फिर कभी नहीं मिलेगा. सोनी चुप हो जाया करती थी और घर पर भी कुछ नहीं कहती या पूछती थी. फिर भी सयानी होती लड़की थी, कालेज में, महल्ले में अपनी सहेलियों और उन के बौयफ्रैंड्स के बारे में कई उलटीसीधी बातें सुनती थी तो उस का जिक्र वह अपनी सहेली पूजा से अवश्य करती, लेकिन वह उसे टाल जाती.

पूजा और सीमा होस्टल में अपने घर से दूर रह कर पढ़ाई कर रही थीं. खुले व विद्रोही विचारों वाली पूजा और सीमा में खूब पटती थी, वे लड़कों से मजा लेने की हिमायती थीं और लड़कों से खूब खर्च भी करवाती थीं और उन के साथ हमबिस्तर भी होती थीं. पूजा और सीमा का मानना था कि जब उन के बौयफ्रैंड्स वीरेंद्र, गोपी और राजू को उन के साथ शारीरिक संबंध बनाने में कोई रोकटोक नहीं है तो उन लोगों को भी समाज या आसपास के लोग कैसे रोक सकते हैं. पूजा को फुरसत ही नहीं थी कि वह अपने बौयफ्रैंड के साथ हुए शारीरिक संबंधों के बारे में सोचे कि उस की इन हरकतों से उस के सामाजिक जीवन पर क्या प्रभाव पड़ रहा है या उस के परिवार को इस का क्या खमियाजा भुगतना पड़ सकता है. समाज उस के प्रति क्या धारणा बना रहा है, उस के अनैतिक संबंध के प्रति, तो फिर वह सोनी के दिलोदिमाग में क्या चल रहा है, इस की चिंता क्यों करती. देह सुख की लत लग गई थी पूजा और सीमा को. यही देह सुख सोनी को भी प्रदान करना चाहती थीं पूजा और सीमा इसलिए धीरेधीरे सोनी को भी देह सुख हासिल करने की प्रक्रिया में डाल रही थीं. पूजा और सीमा के लिए देह सुख दुनिया का सब से बड़ा सुख था उसे वे किसी भी कीमत पर हासिल करने की चाहत रखती थीं. पूजा और सीमा कहा करती थीं कि देह सुख दुनिया का सब से बड़ा सुख है. तख्त ओ ताज पलट गए इसी देह सुख प्राप्ति में.

देशविदेश के कई नामीगिरामी साहित्यकार, कवि, वैज्ञानिक जिन के लिए हमारे मन में बड़ी इज्जत हो सकती है जैसे फ्रांस के चर्चित लेखक वाल्जाक ने अपनी उम्र से बड़ी महिला डी बर्नी के साथ वर्षों यौनाचार किया, टैलीफोन के आविष्कारक अलैक्जेंडर ग्राहम बेल अपनी छात्रा मैविल हार्वर्ड के साथसाथ उस की मदद से कई अन्य छात्राओं के साथ भी लगातार यौनाचार करते रहे. अंगरेज कवि लौर्ड वायरन जिन की कविताएं हम अंगरेजी साहित्य में पढ़ते हैं अपने मित्र कैरो की सास के साथ यौनाचार करते रहे, प्रसिद्ध वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टाइन ने अपनी पत्नी को धोखा दे कर नर्स एल्सा लोवेंथल से जीवनभर यौनाचार किया, साम्यवाद के जनक कार्ल मार्क्स ने अपनी नौकरानी के साथ न सिर्फ यौनाचार किया बल्कि उसे गर्भवती भी बना दिया था. यौनाचार से पूरा इतिहास भरा पड़ा है अगर लिखने बैठ जाऊं तो इन साहित्यकारों, कवियों, वैज्ञानिकों के यौनाचार पर पुस्तक लिख सकती हूं, पूजा ने अपनी जानकारी पर गर्व करते हुए कहा था, सीमा ने भी हामी भर दी थी.

मनोहर कहानियां: सूटकेस में बंद हुई प्यार की दास्तान

बात 24 मार्च, 2022 की है. रात के 8 बज गए थे. हरिद्वार के पीरान कलियर में स्थित दून साबरी गेस्टहाउस का मैनेजर कमरेज उस रोज दोपहर बाद ठहरे लोगों की डिटेल रजिस्टर में एंट्री कर रहा था. तभी अचानक उस की नजर एक नीले रंग के बड़े सूटकेस पर पड़ी, जिसे एक युवक लगभग घसीटते हुए ला रहा था. युवक की बौडी लैंग्वेज से सूटकेस के भारीपन का अंदाजा लगाया जा सकता था. वह युवक बड़ी मुश्किल से उसे ला रहा था.

सूटकेस को देख कर कमरेज को याद आया कि करीब 4-5 घंटे पहले ही यह युवक इस सूटकेस और एक युवती के साथ गेस्टहाउस में आया था. दोनों स्कूटी से आए थे. युवती एक हाथ से सूटकेस को सहारा देते हुए पकड़े थी, जबकि दूसरे हाथ में केक का एक छोटा डिब्बा था. दोनों को मुश्किल से संभाले थी.

संयोग से रजिस्टर में 6 एंट्री के पहले ही कमरेज ने दोनों के नाम लिखे थे. युवक ने अपना नाम गुलबेज और युवती का नाम काजल लिखवाया था. उन्होंने पता हरिद्वार के ज्वालापुर का दिया था.

इस पर मैनेजर कमरेज को आश्चर्य हुआ था कि कोई व्यक्ति उसी शहर का हो और गेस्टहाउस में ठहरे. किंतु उस के स्कूटी से आने के कारण समझा कोई लोकल होगा. कई बार घरेलू आयोजनों की वजह से कुछ लोग कुछ घंटे के लिए होटल या गेस्टहाउस का कमरा बुक करवा लेते हैं.

खैर, उस वक्त कमरेज को युवक पर संदेह हुआ, क्योंकि उस ने तब तक गेस्टहाउस नहीं छोड़ा था और अपना सामान ले कर जा रहा था. उस के दिमाग में सवाल कौंध गया, ‘आखिर वह सूटकेस ले कर कहां जा रहा है? वह भी अकेले और उस की स्कूटी कहां गई, जिस पर वह आया था?’

संदेह का एक कारण और भी था कि पहले गुलबेज गेस्टहाउस में युवती के साथ आया था. वह सूटकेस लिए थे, जिस के उठाने या ले जाने से हलका प्रतीत हो रहा था. युवती उसे बड़ी आसानी से एक सहारे से स्कूटी पर पकड़ कर लाई थी.

कमरे तक सूटकेस को युवक बड़ी आसानी से खुद ले गया था. किंतु जब वह वापस जा रहा था, तब सूटकेस काफी भारी भी लग रहा था और साथ में युवती भी नहीं थी.

कमरेज ने तुरंत पास बैठे लड़के से कहा, ‘‘सोनू जा, भाग कर देख तो थर्ड फ्लोर के कोने वाला कस्टमर कमरा खाली कर गया क्या?’’

सोनू कस्टमर के कमरे की तरफ भागा. कमरा खुला मिला. कमरेज ने इधरउधर नजर दौड़ाई, लेकिन युवती कमरे में कहीं नजर नहीं आई.

मैनेजर भी काउंटर छोड़ कर मेन गेट तक आ गया. सोनू भी जल्द भागता आ कर बताया, ‘‘कमरे में तो कोई नहीं है. कमरे का दरवाजा भी पूरा खुला है.’’

यह सुन कर कमरेज को दाल में कुछ काला नजर आया. लपक कर युवक के पास जा पहुंचा. मैनेजर ने युवक से कड़कती आवाज में पूछा, ‘‘अरे भाई, बगैर बताए सूटकेस ले कर कहां जा रहे हो?’’

‘‘जी…जी…’’ युवक सकपका गया. कुछ ज्यादा नहीं बोल पाया.

‘‘जी, जी क्या करते हो? तुम्हारे साथ जो लड़की आई थी वह कहां है? तुम ने गेस्टहाउस चैक आउट किया? सूटकेस में क्या रखा है, जो इतना भारी हो गया?’’ कमरेज ने लगातार कई सवाल दाग दिए.

युवक कोई जवाब दिए बिना कमरेज को देखने लगा.

‘‘मुझे क्या देखते हो? मैं जो पूछ रहा हूं उस का जवाब दो और इस सूटकेस में क्या है? इतना भारी क्यों है?’’

‘‘जी..जी कुछ नहीं, मेरा कुछ सामान है?’’ युवक घबराहट के साथ बोला.

‘‘सामान! कैसा सामान? चलो खोल कर दिखाओ,’’ कमरेज बोला.

‘‘कुछ नहीं, मेरा ही सामान है.’’ बोलते हुए युवक ने हाथ से सूटकेस छोड़ दिया. सीधा खड़ा सूटकेस वहीं जमीन पर घप्प की आवाज के साथ गिर पड़ा. युवक भागने के लिए ज्यों ही मुड़ा, कमरेज ने लपक कर उस की पीठ पर टंगा बैग पकड़ लिया.

अपनी ओर खींचते हुए बोला, ‘‘अरे बदमाश कहीं का, भागता कहां है? चल पहले तू सूटकेस खोल कर दिखा वरना… अभी पुलिस को फोन करता हूं.’’

युवक की गरदन पर कमरेज ने पकड़ मजबूत बना ली. वहीं से सोनू को आवाज लगाई, ‘‘अरे सोनू, पुलिस को जल्दी फोन मिला, बोलना अर्जेंट है.’’

गुलबेज से युवती के बारे में पूछा तो वह सकपका गया और उस के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. कमरेज का शक गुलबेज पर और गहरा हो गया. उस ने गुलबेज को डांटते हुए सूटकेस खोलने को कहा.

सूटकेस में निकली लाश

डरतेडरते गुलबेज ने कांपते हाथों से सूटकेस के लौक में चाबी लगाई. जब सूटकेस खुला, तब उस के अंदर का हाल देख कर कमरेज की आंखें फैल गईं. सूटकेस में उस के साथ आई युवती काजल की ठूंसी हुई लाश थी.

कमरेज ने गुलबेज का कालर पकड़ कर कड़कती आवाज में पूछा, ‘‘यह तूने क्या कर दिया? यह लड़की तेरी क्या लगती थी?’’

‘‘जीजी पुलिस को मत बुलाना, मैं बताता हूं. सब कुछ बताता हूं. हमारे आप के बीच बात रहे तो अच्छा है.’’ गुलबेज दोनों हाथ जोड़ कर कमरेज से मिन्नतें करने लगा.

‘‘बता यह लड़की कौन है?’’

‘‘यह मेरी प्रेमिका थी. घर वाले इस की मेरे साथ शादी करने के खिलाफ थे, हम लोग यहां जन्मदिन मनाने आए थे, लेकिन दुखी प्रेमिका ने जहर खा कर आत्महत्या कर ली. मैं भी इसे गंगनहर में फेंक कर आत्महत्या कर लूंगा…’’ युवक बोला.

गुलबेज की बातें सुन कर कमरेज को और भी आश्चर्य हुआ. वह सोच में पड़ गया एक की जान जा चुकी है और दूसरा अपनी जान लेने को तुला है. गंगनहर में कूद कर आत्महत्या की योजना बनाए हुए है.

तब तक सूटकेस में युवती की लाश मिलने की सूचना आसपास फैल गई थी. कुछ लोगों की भीड़ लग गयी थी.

यह घटना उत्तराखंड के हरिद्वार जिले के थाना पीरान कलियर क्षेत्र की थी. मशहूर दरगाह पीरान कलियर में देशविदेश से हजारों जायरीन प्रतिदिन जियारत करने पहुंचते हैं. कलियर दरगाह का क्षेत्र मुसलिम बाहुल्य है. कलियर पुलिस को सूटकेस में युवती का शव मिलने की सूचना मिल चुकी थी.

थानाप्रभारी धर्मेंद्र राठी उस वक्त थाने में मौजूद थे. वह सूचना पाते ही सक्रिय हो गए. वह एसआई गिरीश चंद्र, शिवानी नेगी, देवेंद्र चौहान, कांस्टेबल सोनू कुमार और इलियास के साथ 10 मिनट में ही गेस्टहाउस पहुंच गए. साथ ही राठी ने इस की सूचना सीओ (रुड़की) विवेक कुमार और एसपी (देहात) प्रमेंद्र डोवाल को भी दे दी.

राठी ने सब से पहले गेस्टहाउस के मैनेजर कमरेज से जानकारी ली. सूटकेस में पड़ी लाश पर एक नजर डाली और अपने सहयोगियों से इस की बारीकी से तहकीकात करने को कहा. कमरेज ने राठी को बताया कि उसी रोज दोपहर 3 बजे गुलबेज एक युवती काजल के साथ स्कूटी से गेस्टहाउस आया था.

पुलिस ने की छानबीन

तब गुलबेज के पास एक बड़ा सूटकेस और एक केक का डिब्बा भी था. गुलबेज ने कमरा लेते समय बताया था कि वह अपनी प्रेमिका काजल के साथ जन्मदिन मनाने आया है. काजल को ज्वालापुर (हरिद्वार) की निवासी बताया था. उन्हें थर्ड फ्लोर के किनारे का कमरा अलौट कर दिया गया था. उस ने बताया था कि जन्मदिन मनाने के लिए उस के कुछ गेस्ट भी आएंगे.

इसी के साथ कमरेज ने राठी को गुलबेज द्वारा सूटकेस ले कर जाने, संदेह होने पर उसे जबरन खुलवाने और उस में रखी काजल की लाश होने के बारे में बताया.

अब बारी थी गुलबेज से पूछताछ करने की. राठी ने उस से लाश के बारे में पूछताछ शुरू की. गुलबेज ने पुलिस को बताया कि पिछले 8 सालों से काजल के साथ उस के प्रेम संबंध थे. वे काफी अरसे से शादी करना चाहते थे, मगर काजल के घर वाले विरोध कर रहे थे. काजल इस कारण दुखी थी. दोनों यहां जहर खा कर आत्महत्या करने के लिए गेस्टहाउस में आए थे.

काजल ने जहर खाने में जल्दबाजी कर दी थी, जबकि हम दोनों को एक साथ ही जहर खाना था. उस के जहर खाने से पहले ही काजल ने जहर खा लिया और वह मर गई.

गुलबेज ने बताया कि उस के बाद ही उस ने पहले लाश को सूटकेस में भर कर गंगनहर में फेंकने की योजना बनाई. लाश सहित सूटकेस को गंगनहर में फेंकने के बाद वह खुद गंगनहर में छलांग लगा कर आत्महत्या करने वाला था.

थानाप्रभारी धर्मेंद्र राठी द्वारा गुलबेज से पूछताछ के दरम्यान ही सीओ विवेक कुमार और एसपी प्रमेंद्र डोवाल भी आ गए. दोनों अधिकारियों ने भी मौके का निरीक्षण किया. कमरेज, सोनू और गुलबेज से मामले की जानकारी ली.

मौके की काररवाई करने के बाद पुलिस ने लाश पोस्टमार्टम के लिए राजकीय अस्पताल रुड़की भेज दी. उस के बाद डोबाल ने गुलबेज को थाना कलियर ले जा कर उस से गहन पूछताछ की जिम्मेदारी थानेदार गिरीश चंद को दे दी.

रमसा गुलबेज से नहीं करना चाहती थी शादी

रात के 12 बजे गुलबेज से काजल की मौत के बारे में नए सिरे से पूछताछ की जाने लगी. वहां भी उस ने वही पहले वाली साथसाथ जहर खा कर आत्महत्या करने की कहानी दोहराई.

काफी देर तक गुलबेज ने पुलिस को झांसा देने की कोशिश की. तभी थानाप्रभारी ने सख्ती दिखाते हुए उस से पूछा, ‘‘जब तुम दोनों को जहर खा कर ही मरना था, तब बड़ा सूटकेस क्यों ले कर आया था?’’

इस सवाल का जवाब वह नहीं दे पाया.

इसी के साथ उन्होंने उस से कहा कि लड़की की मौत का कारण तो पोस्टमार्टम रिपोर्ट से जल्द ही पता चल जाएगा. इस से पहले उस के खिलाफ आत्महत्या करने, लाश को ठिकाने लगाने, सबूत मिटाने आदि की कानूनी धाराओं से वह नहीं बच पाएगा. तब भी उसे जेल तो जाना ही पड़ेगा.

यह सुन कर वह थानाप्रभारी राठी के आगे गिड़गिड़ाने लगा. फिर अपना जुर्म कुबूलते हुए गुलबेज ने जो कुछ बताया, वह पहले वाली कहानी से बिलकुल अलग था. इस पूछताछ में पता चला कि मृतका काजल नहीं, बल्कि रमसा थी. वह थाना मंगलौर के मोहल्ला लालबाड़ा की रहने वाली थी. उस ने दून साबरी गेस्टहाउस में कमरा नं 301 लेते समय मैनेजर को काजल नाम की फरजी आईडी दी थी.

यह सच था कि गत 8 सालों से रमसा से उस के प्रेम संबंध चल रहे थे. रमसा के घर वाले उस के साथ शादी नहीं करना चाहते थे. रमसा स्थानीय कालेज की बीकौम की छात्रा थी.  घटना के दिन दोपहर 3 बजे वह रमसा को स्कूटी पर बैठा कर कलियर के गेस्टहाउस में मंगलौर से लाया था. रमसा गुलबेज की दूर की रिश्तेदार भी थी.

आरोपी गुलबेज की ज्वालापुर में मोबाइल रिचार्ज की दुकान है. उस के पिता सनव्वर ज्वालापुर में ही कौस्मेटिक सामान की दुकान चलाते हैं. परिवार में अपने 3 भाइयों व एक बहन में गुलबेज सब से बड़ा है. दूसरी ओर रमसा भी अपने घर में 2 बहनों व 2 भाइयों में सब से बड़ी थी.

गेस्टहाउस के कमरे में गुलबेज ने केक काट कर रमसा का जन्मदिन मनाया था. उस के बाद रमसा के सामने शादी करने का प्रस्ताव रखा था. शादी करने से रमसा ने साफ इनकार कर दिया था.

काफी मनाने पर भी जब रमसा नहीं मानी थी, तब गुलबेज को गुस्सा आ गया था. उस के बाद ही उस ने गुस्से में वहां रखे तकिए से उस का मुंह दबा कर मार डाला था.

रमसा की कुछ मिनटों में ही दम घुटने से मौत हो गई थी. गुलबेज ने यह भी स्वीकार कर लिया कि उस ने जहर खा कर आत्महत्या करने की झूठी कहानी बताई थी. रमसा मातापिता के शादी में बाधा बनने की कहानी भी मनगढ़ंत थी. दरअसल रमसा का ही उस से शादी करने का मन नहीं था.

हत्या करने की पहले से बना ली थी योजना

गुलबेज ने बताया कि उसे रमसा द्वारा शादी से इनकार किए जाने की आशंका पहले से थी. इस कारण ही वह पूरी योजना बना कर गेस्टहाउस में ठहरा था.

उस की हत्या गेस्टहाउस में करने के बाद उस का शव ले जाने के लिए नीले रंग का सूटकेस पहले से ही ले कर आया था. काजल के नाम से रमसा की फरजी आईडी भी तैयार की थी.

इस के बाद थानाप्रभारी राठी ने गुलबेज के बयान दर्ज कर लिए. मृतका रमसा की हत्या की सूचना पुलिस ने तत्काल उस के पिता राशिद निवासी लालबाड़ा, मंगलौर को दे दी.

बेटी की नृशंस हत्या की सूचना पा कर राशिद परिजनों सहित रोतेबिलखते थाना कलियर पहुंचे. राशिद ने थानाप्रभारी को बताया कि रमसा अपने पड़ोस में हो रही एक शादी में शामिल होने के लिए घर से निकली थी.

देर रात तक जब वह घर वापस नहीं लौटी थी, तब उन्होंने रमसा के लापता होने की सूचना मंगलौर कोतवाली में लिखवाई थी.

इस के बाद कलियर पुलिस ने राशिद की ओर से रमसा की हत्या का मुकदमा गुलबेज ज्वालापुर हरिद्वार के खिलाफ दर्ज कर लिया था. अगले दिन एसपी (देहात) प्रमेंद्र डोवाल ने मीडिया को रमसा की हत्या का खुलासा किया.

25 मार्च, 2022 को कलियर पुलिस ने आरोपी गुलबेज पुत्र सनव्वर को अदालत में पेश कर दिया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. रमसा की पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, उस की मौत का कारण दम घुटना बताया गया. कथा लिखे जाने तक आरोपी गुलबेज जेल में बंद था. रमसा की हत्या के मामले की विवेचना थानाप्रभारी धर्मेंद्र राठी कर रहे थे.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

जगदीश प्रसाद शर्मा ‘देशप्रेमी’

मेरे बौयफ्रेंड का व्यवहार काफी बदल गया है और मिलने के लिए भी हफ्तों इंतजार करना पड़ता है, क्या करूं?

सवाल
मैं 24 वर्षीय युवती हूं. एक लड़के से पिछले 4 वर्षों से बहुत प्यार करती हूं. कुछ समय पहले तक सब कुछ सही था. वह भी मुझ से पूरी शिद्दत से प्यार करता था. हम ने जीवनभर साथ रहने के सपने देखे थे. हम हर रोज मिलते थे. फोन पर ढेरों बातें करते थे. पर कुछ महीनों से उस के व्यवहार में काफी बदलाव आया है. मिलने के लिए हफ्तों इंतजार करना पड़ता है और आने के बाद उसे लौटने की जल्दी रहती है. इतना ही नहीं, अब पहले की तरह वह खुद फोन भी नहीं करता. पूछने पर अनापशनाप बहाने बनाता है. कहीं व किसी और से तो प्यार नहीं करने लगा? यदि ऐसा हुआ तो क्या होगा? मैं उस के बिना जी नहीं सकती. कृपया बताएं मैं क्या करूं?

जवाब
4 वर्षों का लंबा अरसा काफी होता है. यदि आप को लगता है कि आप का बौयफ्रैंड आप के प्रति कुछ ज्यादा ही बेरुखी दिखा रहा है, आप से मिलने से कतराता है, फोन नहीं करता, तो आप को उस से खुल कर बात करनी चाहिए और यह जानना चाहिए कि उस की उदासीनता की वजह क्या है? हो सकता है कि वह आहत हुआ हो या उस का परिवार इस संबंध को नहीं चाहता हो. आप को मिलबैठ कर बात करनी चाहिए. यदि कोई उलझन है तो उसे आप से साझा करनी चाहिए. वजह जानने के बाद समाधान भी मिल जाएगा. अगर वह छोड़ना चाहे तो तैयार रहना चाहिए.

प्यार में कंजूसी- भाग 4: क्या थी शुभा की कहानी

मेरा स्वर अचकचा सा गया. मैं दिल का मरीज हूं. आधे से ज्यादा हिस्सा काम ही नहीं कर रहा. कब धड़कना बंद कर दे क्या पता. मैं दोनों बच्चों से बहुत प्यार करता हूं. चाहता हूं उन की नईनई बसी गृहस्थी देख लूं. उन बच्चियों का क्या कुसूर. उन्हें मेरे बारे में क्या पता कि मैं कौन हूं. उन के ताऊताई उन से कितनाममत्व रखते हैं, उन्हें तभी पता चलेगा जब वे देखेंगी हमें और हमारा आशीर्वाद पाएंगी.

‘‘बस, मैं जाना चाहता हूं. वह मेरे भाई का घर है. वहीं रात काट कर सुबह वापस आ जाऊंगा. नहीं रहूंगा वहां अगर उस ने नहीं चाहा तो…फुजूल मानअपमान का सवाल मत उठाओ. मुझे जाने दो. इस उम्र में यह कैसा व्यर्थ का अहं.’’

‘‘रात में सोएंगे कहां. 3 बैडरूम का उन का घर है. 2 में बच्चे और 1 में देवरदेवरानी सो जाएंगे.’’

‘‘शादी में सब लोग नीचे जमीन पर गद्दे बिछा कर सोते हैं. जरूरी नहीं सब को बिस्तर मिलें ही. नीचे कालीन पर सो जाऊंगा. अपने घर में जब शादी थी तो सब कहां सोए थे. हम ने नीचे गद्दे बिछा कर सब को नहीं सुलाया था.’’

‘‘हमारे घर में कितने मेहमान थे. 30-40 लोग थे. वहां सिर्फ उन्हीं का परिवार है. वे नहीं चाहते वहां कोई जाए… तो क्यों जाएं हम वहां.’’

‘‘उन की चाहत से मुझे कुछ लेनादेना नहीं है. मेरी खुशी है, मैं जाना चाहता हूं, बस. अब कोई बहस नहीं.’’

चुप हो गई थी शुभा. फिर मांबेटे में पता नहीं क्या सुलह हुई कि सुबह तक फैसला मेरे हक में था. बैंगलूरु से पानीपत की दूरी लंबी तो है ही सो तत्काल में 2 सीटों का आरक्षण अजय ने करवा दिया.

जिस दिन रात का भोज था उसी दोपहर हम वहां पहुंच गए. नरेनमहेन को तो पहचान ही नहीं पाया मैं. दोनों बच्चे बड़े प्यारे और सुंदर लग रहे थे. चेहरे पर आत्मविश्वास था जो पहले कभी नजर नहीं आता था. बच्चे कमाने लगें तो रंगत में जमीनआसमान का अंतर आ ही जाता है. दोनों बहुएं भी बहुत अपनीअपनी सी लगीं मुझे, मानो पुरानी जानपहचान हो.

एक ही मंडप में दोनों बहनों को   ब्याह लाया था मेरा भाई. न कोई  नातेरिश्तेदार, न कोई धूमधाम. ‘‘भाईसाहब, मैं फुजूलखर्ची में जरा भी विश्वास नहीं करता. बरात में सिर्फ वही थे जो ज्यादा करीबी थे.’’

‘‘करीबी लोगों में क्या तुम हमें नहीं गिनते?’’

मेरा सवाल सीधा था. भाई जवाब नहीं दे पाया. क्योंकि इतना सीधा नहीं था न मेरे सवाल का जवाब. उस की पत्नी भी मेरा मुंह देखने लगी.

‘‘क्यों छोटी, क्या तुम भी हमारी गिनती ज्यादा करीबी रिश्तेदारों में नहीं करतीं? 6 साल बच्चे हमारे पास रहे. बीमार होते थे तो हम रातरात भर जागते थे. तब हम क्या दूर के रिश्तेदार थे? बच्चों की परीक्षा होती थी तो अजय की पत्नी अपनी नईनई गृहस्थी को अनदेखा कर अपने इन देवरों की सेवाटहल किया करती थी, वह भी क्या दूर की रिश्तेदार थी? वह बेचारी तो इन की शादी देखने की इच्छा ही संजोती रह गई और तुम ने कह दिया…’’

‘‘लेकिन मेरे बच्चे तो होस्टल में रहते थे. मैं ने कभी उन्हें आप पर बोझ नहीं बनने दिया.’’

‘‘अच्छा?’’

अवाक् रह गई शुभा अपनी देवरानी के शब्दों पर. भौचक्की सी. हिसाबकिताब तो बराबर ही था न उन के बहीखाते में. हमारे ममत्व और अनुराग का क्या मोल लगाते वे क्योंकि उस का तो कोई मोल था ही नहीं न उन की नजर में.  नरेनमहेन दोनों वहीं थे. हमारी बातें सुन कर सहसा अपने हाथ का काम छोड़ कर वे पास आ गए. ‘‘मैं ने कहा था न आप से…’’  नरेन ने टोका अपनी मां को. क्षण भर को सब थम गया. महेन ने दरवाजा बंद कर दिया था ताकि हमारी बातें बाहर न जाएं. नईनवेली दुलहनें सब न सुन पाएं.

‘‘कहा था न कि ताऊजीताईजी के बिना हम शादी नहीं करेंगे. हम ने सारे इंतजाम के लिए रुपए भी भेजे थे. लेकिन इन का एक ही जवाब था कि इन्हें तामझाम नहीं चाहिए. ऐसा भी क्या रूखापन. हमारा एक भी शौक आप लोगों ने पूरा नहीं किया. क्या करेंगे आप इतने रुपएपैसे का? गरीब से गरीब आदमी भी अपनी सामर्थ्य के अनुसार बच्चों के चाव पूरे करते हैं. हमारी शादी इस तरह से कर दी कि पड़ोसी तक नहीं जानता इस घर में 2-2 बच्चों का ब्याह हो गया है…सादगी भी हद में अच्छी लगती है. ऐसी भी क्या सादगी कि पता ही न चले शादी हो रही है या किसी का दाहसंस्कार…’’

‘‘बस करो, नरेन.’’

‘‘ताऊजी, आप नहीं जानते…हमें कितनी शर्म आ रही थी, आप लोगों से.’’

‘‘शर्म आ रही थी तभी लंदन जाते हुए भी बताया नहीं और आ कर एक फोन भी नहीं किया. क्या सारे काम अपने बाप से पूछ कर करते हो, जो हम से बात करना भी मुश्किल था? तुम्हारी मां कह रही हैं तुम होस्टल में रहते थे. क्या सचमुच तुम होस्टल में रहते थे? वह लड़की तुम्हारी क्या लगती थी जो दिनरात भैयाभैया करती तुम्हारी सेवा करती थी…भाभी है या दूर की रिश्तेदार…तुम्हारा खून भी उतना ही सफेद है बेटे, बाप को दोष क्यों दे रहे हो?’’  मैं इतना सब कहना नहीं चाहता था फिर भी कह गया.

‘‘चलो छोड़ो, हमारी अटैची अंदर रख दो. कल शाम की वापसी है हमारी. जरा बच्चियों को बुलाना. कम से कम उन से तो मिल लूं. ऐसा न हो कि वे भी हमें दूर के रिश्तेदार ही समझती रहें.’’

चारों चुप रह गए. चुप न रह जाते तो क्या करते, जिस अधिकार की डोर पकड़ कर मैं उन्हें सुना रहा था उसी अधिकार की ओट में पूरे 6 साल हमारे स्नेह का पूरापूरा लाभ इन लोगों ने उठाया था. सवाल यह नहीं है कि हम बच्चों पर खर्चा करते रहे. खर्चा ही मुद्दा होता तो आज खर्चा कर के मैं बैंगलूरु से पानीपत कभी नहीं आता और पुत्रवधुओं के लिए महंगे उपहार भी नहीं लाता.  छोटेछोटे सोने के टौप्स और साडि़यां उन की गोद में रख कर शुभा ने दोनों बहनों का माथा चूम लिया.

‘‘बेटा, क्या पहचानती हो, हम लोग कौन हैं?’’ चुप थीं वे दोनों. पराए खून को अपना बनाने के लिए बड़ी मेहनत करनी पड़ती है. इस नई पीढ़ी को अपना बनाने और समझाने की कोशिश में ही तो मैं इतनी दूर चला आया था.

‘‘हम नरेनमहेन के ताईजी और ताऊजी हैं. हम ने एक ही संतान को जन्म दिया है लेकिन सदा अपने को 3 बच्चों की मां समझा है. तुम्हारा एक ससुराल यहां पानीपत में है तो दूसरा बैंगलूरु में भी है. हम तुम्हारे अपने हैं, बेटा. एक सासससुर यहां हैं तो दूसरे वहां भी हैं.’’  दोनों प्यारी सी बच्चियां हमारे सामने झुक गईं, तब सहसा गले से लगा कर दोनों को चूम लिया हम ने. पता चला ये दोनों बहनें भी एमबीए हैं और अच्छी कंपनियों में काम कर रही हैं.

‘‘बेटे, जिस कुशलता से आप अपना औफिस संभालती हो उसी कुशलता से अपने रिश्तों को भी मानसम्मान देना. जीवन में एक संतुलन सदा बनाए रखना. रुपया कमाना अति आवश्यक है लेकिन अपनी खुशियों के लिए उसे खर्च ही न किया तो कमाने का क्या फायदा… रिश्तेदारी में छोटीमोटी रस्में तामझाम नहीं होतीं बल्कि सुख देती हैं. आज किस के पास इतना समय है जो किसी से मिला जाए. बच्चों के पास अपने लिए ही समय नहीं है. फिर भी जब समय मिले और उचित अवसर आए तो खुशी को जीना अवश्य चाहिए.

‘‘लंदन में दोनों भाई सदा पासपास रहना. सुखदुख में साथसाथ रहना. एकदूसरे का सहारा बनना. सदा खुश रहना, बेटा, यही मेरा आशीर्वाद है. रिश्तों को सहेज कर रखना, बहुत बड़ी नेमत है यह हमारे जीवन के लिए.’’

शुभा और मैं देर तक उन से बातें  करते रहे. उन पर अपना स्नेह, अपना प्यार लुटाते रहे. मुझे क्या लेना था अपने भाई या उस की पत्नी से जिन्हें जीवन को जीना ही नहीं आया. मरने के बाद लाखों छोड़ भी जाएंगे तो क्या होगा जबकि जीतेजी वे मात्र कंगाली ओढ़े रहे.  भोज के बाद बच्चों ने हमें अपने कमरों में सुलाया. नरेनमहेन की बहुओं के साथ हम ने अच्छा समय बिताया. दूसरी शाम हमारी वापसी थी. बहुएं हमें स्टेशन तक छोड़ने आईं. घुलमिल गई थीं हम से.

‘‘ताऊजी, हम लंदन जाने से पहले भाभी व भैया से मिलने जरूर आएंगे. आप हमारा इंतजार कीजिएगा.’’

बच्चों के आश्वासन पर मन भीगभीग गया. इस उम्र में मुझे अब और क्या चाहिए. इतना ही बहुत है कि कभीकभार एकदूसरे का हालचाल पूछ कर इंसान आपस में जुड़ा रहे. रोटी तो सब को अपने घर पर खानी है. पता नहीं शब्दों की जरा सी डोर से भी मनुष्य कटने क्यों लगता है आज. शब्द ही तो हैं, मिल पाओ या न मिल पाओ, आ पाओ या न आ पाओ लेकिन होंठों से कहो तो सही. आखिर, इतनी कंजूसी भी किसलिए?

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