खुदकुशी- भाग 4: सोनी का आखिर क्या दोष था

रात होतेहोते जब वह किसी तरह घर पहुंची तो उस की मां बहुत चिंतित नजर आ रही थीं. सोनी के पापा अभी तक औफिस से लौटे नहीं थे. सोनी की मां ने जब सोनी को देखा तो वह डर गईं. सोचने लगीं कि उस की मासूम सी बच्ची के साथ न जाने कौन सा हादसा हो गया. सोनी को वे उस के कमरे में ले गईं, उसे पानी पीने को दिया, फिर उस के सिर को सहलाते हुए पूछा कि क्या बात है, क्या हुआ, सबकुछ सचसच बताओ बेटी. सोनी समझ नहीं पा रही थी कि उस के साथ जो हुआ वह क्या था. ऐसा उस ने कभी कल्पना में भी नहीं सोचा था कि उस के साथ जो हुआ वह सब उसे अपनी मां और पापा को बताना पड़ेगा. हालांकि दर्द से वह लगभग कराह रही थी. उस ने अपनी मां को बाथरूम में जा कर दिखाया, देखते ही उस की मां बेहोश हो गईं. सोनी ने हिम्मत कर अपनी मां के सिर पर पानी के छींटें दिए, सिर सहलाया, तब जा कर कहीं उस की मां होश में आई और होश में आते ही रोने लगीं, पूरा वृत्तांत सुनने के बाद सोनी की मां तो लगभग अर्द्धमूर्छित अवस्था में पहुंच चुकी थीं.

किसी तरह सोनी को फर्स्टऐड दे कर, उसे आराम करने को कह, दूसरे कमरे में निढाल सी पड़ गई थीं सोनी की मां. डाक्टर को दिखाने की खबर सोनी के भविष्य को बदनुमा न बना दे, यही सोच रही थीं सोनी की मां. अगर इस बात की जरा भी भनक किसी को लगी तो कौन करेगा सोनी से ब्याह? इसी तरह के खयाल सोनी की मां के मन में चल रहे थे कि कौल बेल बजी. सोनी की मां की तंद्रा टूटी. सोनी की मां ने जा कर दरवाजा खोला, सोनी के पापा आ गए थे, आते ही सोनी के बारे में पूछा, सोनी की मां ने कहा कि वह अपने कमरे में सो गई है. सोनी की मां ने सोनी के साथ हुए हादसे को छिपा लिया था. बेटी के साथ हुए गैंगरेप को शायद बरदाश्त नहीं कर पाएंगे सोनी

के पिता. रात को अपनी मां से हुई बातचीत से सोनी इतना तो समझ चुकी थी कि उस ने पूजा और सीमा के साथ मिल कर अनजाने में ही सही ऐसा गलत कदम उठाया है कि जिस की भरपाई इस जन्म में तो संभव नहीं. सोनी सोच रही थी कि उस के साथ जो कुछ हुआ और उस की मां ने जो कुछ बताया, इस से तो यही नतीजा निकलता है कि मैं बहुत बुरी लड़की हूं, मेरी सभी सहेलियां बुरी हैं, उन लोगों से मुझे दूरी बना कर रखनी चाहिए थी, पर ऐसा करने पर मेरी पढ़ाई, कहीं जाना, ऐग्जाम देना सब बंद हो जाता. पागल की तरह सोचे जा रही थी सोनी.

दूसरे दिन घर पर सन्नाटा छाया रहा, न जाने सोनी की मां ने सोनी के पिता को क्या कह दिया था इस संबंध में कि वे सिर्फ सोनी के कमरे के बाहर ही एक मिनट रुक कर औफिस चले गए. सोनी घर से दोपहर के वक्त चुपचाप, बिना कुछ बोले निकल कर चल दी और पास ही के थाने में जा कर थानेदार को पूरा वृत्तांत सुना दिया. हालांकि सोनी की कहानी उस की जबानी सुनते हुए थानेदार के साथसाथ अन्य पुलिसकर्मी भी मजा ले रहे थे.

पूरी बात सुनने के बाद थानेदार ने पूछा कि जब घटना हुई उस वक्त तुम ने थाने में आ कर रिपोर्ट क्यों नहीं लिखवाई. जवाब में सोनी कुछ न बोल सकी सिर्फ इतना ही कहा कि मैं आने की हालत में नहीं थी. थानेदार ने उसे जाने को कहा और कार्यवाही करने की बात कही. सोनी घर चली गई. पूजा और सीमा ने उसे इन दोचार दिनों में कभी कौंटैक्ट करने की कोशिश नहीं की. वीरेंद्र और उस के साथियों ने हालांकि एक बार सोनी को थाने से निकलते देखा था.

वीरेंद्र एक अमीरजादा था, ऐयाशी के साथसाथ वह शराब और शबाब का भी आदी था. अपनी पहुंच लगा कर वह साफ बच निकला. लिहाजा, मुकदमा क्षेत्राधिकार के बिंदु पर दर्ज नहीं किया गया और सोनी को थानेदार ने बतलाया कि घटना जहां हुई थी उसी इलाके के थाने में मुकदमा दर्ज हो सकता है और इतने विलंब से तो उस इलाके के भी थाने में मुकदमा अब दर्ज नहीं होगा. सोनी बिना घर में बताए इस थाने से उस थाने के चक्कर लगाती रही परंतु जैसा पुलिस का हाल है कि रसूख वालों की ही वह सुनती है औरों की नहीं इसलिए सोनी कोई मुकदमा दर्ज नहीं करवा पाई बल्कि थानेदार ने उसे ही भलाबुरा कहा और यह साबित करने की कोशिश करते रहे कि वह एक मनगढ़ंत घटना बयान कर रही है जैसा उस ने बताया वैसा कुछ हुआ ही नहीं. जबकि सोनी की मां चाहती थीं कि वह फिर से सामान्य जिंदगी के लिए खुद को तैयार करे और इस के लिए वे अपनी बेटी को समझाती रहती थीं कि वह घर से निकले. कहीं अगर जाना भी हो तो उसे साथ ले ले. परंतु सोनी पर इस का कोई असर नहीं पड़ रहा था, वह सजा दिलवाना चाहती थी वीरेंद्र और उस के साथियों को और साथ में पूजा और सीमा को भी. न्याय न पाने का सदमा उसे अपने साथ हुए हादसे से भी ज्यादा लगा. उस ने उस रात एक कागज पर लिखा, ‘मैं बहुत बुरी लड़की हूं. वीरेंद्र और उस के साथी हर सीमा को लांघ चुके थे. मेरे मां और पापा मुझ से बहुत प्यार करते हैं. मैं नहीं जानती थी कि मेरे लिए क्या बुरा और क्या अच्छा है.

मुझे पूजा और सीमा ने कई गलत रास्ते दिखाए लेकिन मैं ने उन्हें नहीं अपनाया पर न जाने उस दिन पूजा और सीमा ने ऐसा क्या कह दिया वीरेंद्र और उस के साथियों को कि मैं उस दिन के हादसे के बाद वैसी नहीं हूं जैसी मैं थी अगर उन लोगों को पुलिस सजा देती तो शायद मुझे जीने की कोई वजह मिल जाती. तब मैं यह साबित कर सकती कि मैं निर्दोष हूं पर ऐसा नहीं हुआ. अब जीने की कोई वजह मेरे पास नहीं है, मैं अपने मांपापा को समाज में शर्मिंदा होते नहीं देख सकती. इसलिए मैं हमेशा के लिए जा रही हूं… सोनी.’ सोनी की लाश उस के कमरे के पंखे से झूल रही थी. पहले तो पुलिस ने खोजबीन में सक्रिय होने की तत्परता दिखाई पर सुसाइड नोट पढ़ने के बाद सोनी के मातापिता ने कोई उत्सुकता नहीं दिखाई हत्यारों को पकड़वाने में. हत्यारे तो अभी भी खुले घूम रहे थे. सोनी के मातापिता अपनी इज्जत को सरेआम नीलाम होते नहीं देखना चाहते थे. पत्थर रख लिया था दोनों ने अपने सीने पर और खून का घूंट पी कर भी चुप थे. पुलिस अपने कर्तव्य के प्रति सचेत नहीं थी कि अनुसंधान करे कि सोनी ने क्यों खुदकुशी की और सोनी को खुदकुशी करने के लिए मजबूर करने वाले हत्यारों को खोज निकाले और सजा दे.

शायद सोनी के मातापिता परिवार की इज्जतप्रतिष्ठा को दावं पर नहीं लगाना चाहते थे इसलिए वे भी खामोश थे अपनी बेटी की तरह, जो खामोश हो चुकी थी हमेशा के लिए

सपनों की राख तले : भाग 2

कई बार निवेदिता खुद से पूछती कि उस में उस का कुसूर क्या था कि वह सुंदर थी, स्मार्ट थी. लोगों के बीच जल्द ही आकर्षण का केंद्र बन जाती थी या उस की मित्रता सब से हो जाती थी. वरना पत्नी के प्रति दुराव की क्षुद्र मानसिकता के मूल कारण क्या हो सकते थे? शरीर के रोगों को दूर करने वाले तेजेश्वर यह क्यों नहीं समझ पाए कि इनसान अपने मृदु और सरल स्वभाव से ही तो लोगों के बीच आकर्षण का केंद्र बनता है.

दिनरात की नोकझोंक और चिड़- चिड़ाहट से दुखी हो उठी थी निवेदिता. सोचा, क्या रखा है इन घरगृहस्थी के झमेलों में?

एक दिन अपनी डिगरियां और सर्टिफिकेट निकाल कर तेज से बोली, ‘घर में बैठेबैठे मन नहीं लगता, क्यों न मैं कोई नौकरी कर लूं?’

‘और यह घरगृहस्थी कौन संभालेगा?’ तेज ने आंखें तरेरीं.

‘घर के काम तो चलतेफिरते हो जाते हैं,’ दृढ़ता से निवेदिता ने कहा तो तेजेश्वर का स्वर धीमा पड़ गया.

‘निवेदिता, घर से बाहर निकलोगी तो मुझे अच्छा नहीं लगेगा.’

‘क्यों…’ लापरवाही से पूछा था उस ने.

‘लोग न जाने तुम्हें कैसीकैसी निगाहों से घूरेंगे.’

कितना प्यार करते हैं तेज उस से? यह सोच कर निवेदिता इतरा गई थी. पति की नजरों में, सर्वश्रेष्ठ बनने की धुन में वह तेजेश्वर की हर कही बात को पूरा करती चली गई थी, पर जब टांग पर टांग चढ़ा कर बैठने में, खिड़की से बाहर झांक कर देखने में, यहां तक कि किसी से हंसनेबोलने पर भी तेज को आपत्ति होने लगी तो निवेदिता को अपनी शुरुआती भावुकता पर अफसोस होने लगा था.

निरी भावुकता में अपने निजत्व को पूर्ण रूप से समाप्त कर, जितनी साधना और तप किया उतनी ही चतुराई से लासा डाल कर तेजेश्वर उस की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को ही बाधित करते चले गए.

दर्द का गुबार सा उठा तो निवेदिता ने करवट बदल ली. यादों के साए पीछा कहां छोड़ रहे थे. विवाह की पहली सालगिरह पर मम्मीपापा 2 दिन पहले ही आ गए थे. मित्र, संबंधी और परिचितों को आमंत्रित कर उस का मन पुलक से भर उठा था लेकिन तेजेश्वर की भवें तनी हुई थीं. निवेदिता के लिए पति का यह रूप नया था. उस ने तो कल्पना भी नहीं की थी कि इस खुशी के अवसर को तेज अंधकार में डुबो देंगे और जरा सी बात को ले कर भड़क जाएंगे.

‘मटरमशरूम क्यों बनाया? शाही पनीर क्यों नहीं बनाया?’

छोटी सी बात को टाला भी जा सकता था पर तेजेश्वर ने महाभारत छेड़ दिया था. अकसर किसी एक बात की भड़ास दूसरी बात पर ही उतरती है. तेज का स्वभाव ही ऐसा था. दोस्ती किसी से करते नहीं थे, इसीलिए लोग उन से दूर ही छिटके रहते थे. आमंत्रित अतिथियों से सभ्यता और शिष्टता से पेश आने के बजाय, लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिए ही उन्होंने वह हंगामा खड़ा किया था. यह सबकुछ निवेदिता को अब समझ में आता है.

2 दिन तक मम्मीपापा और रहे थे. तेज इस बीच खूब हंसते रहे थे. निवेदिता इसी मुगालते में थी कि मम्मीपापा ने कुछ सुना नहीं था पर अनुभवी मां की नजरों से कुछ भी नहीं छिपा था.

घर लौटते समय तेज का अच्छा मूड देख कर उन्होंने मशविरा दिया था, ‘जिंदगी बहुत छोटी है. हंसतेखेलते बीत जाए तो अच्छा है. ज्यादा ‘वर्कोहोलिक’ होने से शरीर में कई बीमारियां घर कर लेती हैं. कुछ दिन कहीं बाहर जा कर तुम दोनों घूम आओ.’

इतना सुनते ही वह जोर से हंस दी थी और उस के मुंह से निकल गया था, ‘मां, कभी सोना लेक या बटकल लेक तक तो गए नहीं, आउट आफ स्टेशन ये क्या जाएंगे?’

मजाक में कही बात मजाक में ही रहने देते तो क्या बिगड़ जाता? लेकिन तेज का तो ऐसा ईगो हर्ट हुआ कि मारपीट पर ही उतर आए.

हतप्रभ रह गई थी वह तेज के उस व्यवहार को देख कर. उस दिन के बाद से हंसनाबोलना तो दूर, उन के पास बैठने तक से घबराने लगी थी निवेदिता. कई दिनों तक अबोला ठहर जाता उन दोनों के बीच.

सपनों की राख तले : भाग 1

दौड़भाग, उठापटक करते समय कब आंखों के सामने अंधेरा छा गया और वह गश खा कर गिर पड़ी, याद नहीं.

आंख खुली तो देखा कि श्वेता अपने दूसरे डाक्टर सहकर्मियों के साथ उस का निरीक्षण कर रही थी. तभी द्वार पर किसी ने दस्तक दी. श्वेता ने पलट कर देखा तो डा. तेजेश्वर का सहायक मधुसूदन था.

‘‘मैडम, आप के लिए दवा लाया हूं. वैसे डा. तेजेश्वर खुद चेक कर लेते तो ठीक रहता.’’

आंखों की झिरी से झांक कर निवेदिता ने देखा तो लगा कि पूरा कमरा ही घूम रहा है. श्वेता ने कुछ देर पहले ही उसे नींद का इंजेक्शन दिया था. पर डा. तेज का नाम सुन कर उस का मन, अंतर, झंकृत हो उठा था. सोचनेविचारने की जैसे सारी शक्ति ही चुक गई थी. ढलती आयु में भी मन आंदोलित हो उठा था. मन में विचार आया कि पूछे, आए क्यों नहीं? पर श्वेता के चेहरे पर उभरी आड़ीतिरछी रेखाओं को देख कर निवेदिता कुछ कह नहीं पाई थी.

‘‘तकदीर को आप कितना भी दोष दे लो, मां, पर सचाई यह है कि आप की इस दशा के लिए दोषी डा. तेज खुद हैं,’’ आज सुबह ही तो मांबेटी में बहस छिड़ गई थी.

‘‘वह तेरे पिता हैं.’’

‘‘मां, जिस के पास संतुलित आचरण का अपार संग्रह न हो, जो झूठ और सच, न्यायअन्याय में अंतर न कर सके वह व्यक्ति समाज में रह कर समाज का अंग नहीं बन सकता और न ही सम्माननीय बन सकता है,’’ क्रोधित श्वेता कुछ ही देर में कमरा छोड़ कर बाहर चली गई थी.

बेटी के जाने के बाद से उपजा एकांत और अकेलापन निवेदिता को उतना असहनीय नहीं लगा जितना हमेशा लगता था. एकांत में मौन पड़े रहना उन्हें सुविधाजनक लग रहा था.

खयालों में बरसों पुरानी वही तसवीर साकार हो उठी जिस के प्यार और सम्मोहन से बंधी, वह पिता की देहरी लांघ उस के साथ चली आई थी.

उन दिनों वह बी.ए. फाइनल में थी. कालिज का सालाना आयोजन था. म्यूजिकल चेयर प्रतियोगिता में निवेदिता और तेजेश्वर आखिरी 2 खिलाड़ी बचे थे. कुरसी 1 उम्मीदवार 2. कभी निवेदिता की हथेली पर तेजेश्वर का हाथ पड़ जाता, कभी उस की पीठ से तेज का चौड़ा वक्षस्थल टकरा जाता. जीत, तेजेश्वर की ही हुई थी लेकिन उस दिन के बाद से वे दोनों हर दिन मिलने लगे थे. इस मिलनेमिलाने के सिलसिले में दोनों अच्छे मित्र बन गए. धीरेधीरे प्रेम का बीज अंकुरित हुआ तो प्यार के आलोक ने दोनों के जीवन को उजास से भर दिया.

अंतर्जातीय विवाह के मुद्दे को ले कर परिवार में अच्छाखासा विवाद छिड़ गया था. लेकिन बिना अपना नफानुकसान सोचे निवेदिता भी अपनी ही जिद पर अड़ी रही. कोर्ट में रजिस्टर पर दस्तखत करते समय, सिर्फ मांपापा, तेजेश्वर और निवेदिता ही थे. इकलौती बेटी के ब्याह पर न बाजे बजे न शहनाई, न बंदनवार सजे न ही गीत गाए गए. विदाई की बेला में मां ने रुंधे गले से इतना भर कहा था, ‘सपने देखना बुरा नहीं होता पर उन सपनों की सच के धरातल पर कोई भूमिका नहीं होती, बेटी. तेरे भावी जीवन के लिए बस, यही दुआ कर सकती हूं कि जमीन की जिस सतह पर तू ने कदम रखा है वह ठोस साबित हो.’

विवाह के शुरुआती दिनों में सुंदर घर, सुंदर परिवार, प्रिय के मीठे बोल, यही पतिपत्नी की कामना थी और यही प्राप्ति. शुरू में तेज का साथ और उस के मीठे बोल अच्छे लगते थे. बाद में यही बोल किस्सा बन गए. निवि को बात करने का ढंग नहीं है, पहननाओढ़ना तो उसे आता ही नहीं है. सीनेपिरोने का सलीका नहीं. 2 कमरों के उस छोटे से फ्लैट को सजातेसंवारते समय मन हर पल पति के कदमों की आहट को सुनने के लिए तरसता. कुछ पकातेपरोसते समय पति के मुख से 1-2 प्रशंसा के शब्द सुनने के लिए मन मचलता, लेकिन तेजेश्वर बातबात पर खीजते, झल्लाते ही रहते थे.

निवेदिता आज तक समझ नहीं पाई कि ब्याह के तुरंत बाद ही तेज का व्यवहार उस के प्रति इतना शुष्क और कठोर क्यों हो गया. उस ने तो तेज को मन, वचन, कर्म से अपनाया था. तेज के प्रति निवेदिता को कोई गिलाशिकवा भी नहीं था.

‘हर परिवार एक रोजगार’ के लक्ष्य को साधेगी यूपी सरकार

लखनऊ. “हर परिवार एक रोजगार ” प्रदेश की भाजपा सरकार का संकल्प है. विधानसभा चुनाव-2022 के पहले पार्टी की ओर से जारी लोक कल्याण संकल्पपत्र-2022 में भी इसका जिक्र है.

योगी-2.0 में इस लक्ष्य के प्रति सरकार मजबूती से कदम भी बढ़ा रही है. हर परिवार के एक युवा सदस्य को रोजगार मिले यह सुनिश्चित कराने के लिए सरकार परिवार कार्ड भी बनाने जा रही है.

बजट में भी एमएसएमई सेक्टर पर खास फोकस है. युवा स्थानीय स्तर पर लगने वाली इकाइयों के लिए दक्ष हों इसके लिए विश्वकर्मा श्रम सम्मान के बजट में करीब 6 गुना की वृद्धि की गई है. 2021-2022 में इस मद में 2040 लाख रुपये का प्रावधान था जबकि मौजूदा बजट में 11250 लाख रुपये का प्रावधान किया गया है. कलस्टर में औद्योगिक इकाइयों की स्थापना से इनकी संभावना बढ़ जाती है. चूंकि ऐसी जगहों पर बल्क में उत्पादन होता है.

लिहाजा खरीदने वाले आसानी के चलते खुद यहां आते हैं. सरकार ने लघु उद्योग क्लस्टर विकास योजना के मद में बजट बढ़ाकर 3200 लाख रुपए से 6500 लाख रुपये कर दिया है. जिला स्तर पर स्थापित इंडस्ट्रियल स्टेट में बेहतर बुनियादी सुविधाएं और परिवेश हों इसके लिए इस बजट में पिछले बजट की तुलना में करीब दोगुने 500 लाख का प्रावधान किया गया है.

औद्योगिक क्षेत्रों में महिलाओं एवं लड़कियों की सुरक्षा एवं सशक्तिकरण के लिए बजट में 1200 लाख रुपये का प्रावधान किया गया है.यही नहीं बजट में छह जिलों में नए इंडस्ट्रियल स्टेट की स्थापना का भी बजट में प्रावधान है. इसके लिए बजट में 5000 लाख रुपये का प्रावधान किया गया है. इंडस्ट्रियल स्टेट में अवस्थापना सुविधाओं के उच्चीकरण के लिए बजट को 560 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 2000 लाख रुपए कर दिया गया है. अयोध्या में सीपेट केंद्र के लिए 3000 लाख और वाराणसी के सीपेट केंद्र में वोकेशनल ट्रेनिंग के लिए 1000 लाख रुपए का प्रावधान किया गया है.

उल्लेखनीय है कि एमएसएमइ स्थानीय स्तर पर रोजगार और स्वरोजगार के लिहाज से असीम संभावनाओं का क्षेत्र है. वैश्विक महामारी कोरोना के दौरान भी इस सेक्टर ने इसे साबित किया है. पिछले वित्तीय वर्ष की तुलना में एमएसएमई सेक्टर के निर्यात में 30 फीसद की वृद्धि इसका सबूत है. इस निर्यात में भी 70 फीसद से अधिक  योगदान ओडीओपी का है. योगी-1.0 में अकेले ओडीओपी से 25 लाख लोगों को रोजगार और स्वरोजगार मिला था. सरकार का लक्ष्य ओडीओपी के जरिए अगले पांच साल में निर्यात एवं रोजगार को दोगुना करने का लक्ष्य रखा गया है. इन्हीं संभावनाओं के मद्देनजर बजट 2022-2023 में सरकार ने एमएसएमई सेक्टर के लिए उदारता से बजट का प्राविधान भी किया है.

परवीन बौबी: जिनकी आखिरी ख्वाहिश अधूरी रह गई

दिल मिला है कहांकहां तनहा.बुझ गई आस, छुप गया तारा, थरथराता रहा धुआं तनहा.

जिंदगी क्या इसी को कहते हैं जिस्म तनहा है और जां तनहा.

हमसफर कोई गर मिले भी कहीं दोनों चलते रहे यहां तनहा.

अचांद तनहा है, आसमां तनहा,

अपने दौर की मशहूर और प्रतिभाशाली अभिनेत्री मीना कुमारी उम्दा शायरा भी थीं, जिन की लिखी गजलें आज भी शिद्दत से पढ़ी और सुनी जाती हैं. क्योंकि वे हर किसी की जिंदगी पर कभी न कभी फिट बैठती हैं.

परवीन बौबी की जिंदगी पर नजर डालें तो लगता है कि वे मीना कुमारी की गजलों से निकली कोई किरदार हैं, जो जिंदगी भर दुनिया के मेले में तनहा रहीं और आखिरकार एक दिन इसी तन्हाई में चल बसीं.

किसी भी जिंदगी की कहानी इतनी छोटी भी नहीं होती कि उसे चंद लफ्जों में समेट कर पेश या खत्म किया जा सके. बकौल फिल्म इंडस्ट्री के सब से बड़े शोमैन राजकपूर, ‘हरेक कहानी का अंत एक नई कहानी का प्रारंभ होता है.’

परवीन बौबी की जिंदगी एक तरह से मीना कुमारी की जिंदगी का रीप्ले थी, जिसे जिस ने भी गहराई से समझा, उस ने दुनिया के कई रिवाजों और उसूलों को समझ लिया कि वह तन्हाई ही है, जो पूरी वफा और ईमानदारी से साथ देती है वरना तो सब झूठ है.

70 के दशक में हिंदी फिल्मों की अभिनेत्रियां आमतौर पर परंपरागत परिधान में ही नजर आती थीं. इसी वक्त में बौलीवुड में परवीन बौबी की एंट्री हुई थी, जो निहायत ही स्टाइलिश, ग्लैमरस, खूबसूरत व सैक्सी भी थीं और ऐक्टिंग में भी किसी से उन्नीस नहीं थीं.

परवीन ने फिल्मी नायिका की नई इमेज गढ़ी, जिस में उस का सारा शरीर साड़ीब्लाउज से ढंके रहना जरूरत या मजबूरी नहीं रह गई थी. हालांकि समाज और सोच में भी तब्दीलियां आ रही थीं, लेकिन उन्हें मजबूत करने के लिए फिल्मों का सहयोग और योगदान जरूरी था, जो परवीन जैसी खुले दिल और दिमाग वाली अभिनेत्री ही दे सकती थीं.

किसी भी कलाकार पर उस की पहली फिल्म के किरदार का असर लंबे समय तक रहता है, यही परवीन के साथ हुआ. साल 1972 में आई ‘चरित्र’ उन की पहली फिल्म थी, जिस में उन के अपोजिट क्रिकेटर से एक्टर बने सलीम दुर्रानी थे. बी.आर. इशारा की इस फिल्म में भी मध्यमवर्गीय युवतियों की मजबूरी दिखाई गई थी, जिस के चलते वे शारीरिक शोषण का शिकार अपनी सहमति से होती हैं. लेकिन फिल्म की खूबी उस का फलसफा था, जो चरित्र की विभिन्न परिभाषाओं के इर्दगिर्द घूमता रहता है.

फिल्म फ्लौप रही और चिकनेचुपड़े चेहरे वाले सलीम दुर्रानी को दर्शकों ने नकार दिया पर परवीन को स्वीकार लिया.

चरित्र में परवीन ने एक मिडिल क्लास और कामकाजी लड़की शिखा की भूमिका अदा की थी, जो आधुनिक है और शराबसिगरेट पीने में उसे किसी तरह की शर्मिंदगी महसूस नहीं होती. पिता द्वारा गिरवी रखा घर बचाने के लिए शिखा को अपने बौस का बिस्तर गर्म करना पड़ता है.

इस सौदे पर जरूर उसे गिल्ट फील होता है और वह आत्महत्या की कोशिश भी करती है. एक तरह से वह बौस की रखैल बन कर रह जाती है, जो उस के अंदर की औरत को कभीकभी खटकता भी है.

हालांकि वह इसे चरित्रहीनता नहीं मानतीं. फिल्म के टाइटल में बैकग्राउंड से परवीन बौबी की ही आवाज में गूंजता यह डायलौग ‘सोचना बहुत बड़ी बीमारी है. लोग सोचते बहुत हैं, इसलिए परेशान भी रहते हैं’ फिल्म की जान है.

चरित्र की बोल्ड भूमिका निभाने के बाद परवीन ने फिर कभी मुड़ कर नहीं देखा और एक से एक हिट फिल्में दीं. इन में मजबूर, कालिया, शान, नमक हलाल, महान, देशप्रेमी, खुद्दार, अर्पण, द बर्निंग ट्रेन, सुहाग, काला पत्थर और 36 घंटे जैसी हिट फिल्में शामिल हैं.

लेकिन एक परफेक्ट ऐक्ट्रेस की मान्यता उन्हें अपने दौर की सुपरहिट फिल्म 1975 में प्रदर्शित ‘दीवार’ से मिली थी, जिस में उन के नायक अमिताभ बच्चन थे. अमिताभ के साथ परवीन ने सब से ज्यादा 8 फिल्में की थीं, जो सभी हिट रही थीं.

‘दीवार’ में भी उन का रोल एक रखैल सरीखा ही था, जो बुद्धिजीवी है. इस फिल्म में भी वह अमिताभ के साथ सिगरेट और शराब पीती नजर आई थीं. यह भूमिका सभ्य और आधुनिक समाज की आवारा औरत की थी.

रियल और रील लाइफ

यह महज इत्तफाक की बात है कि कुछ नहीं, बल्कि कई मायनों में परवीन की रील और रियल लाइफ में काफी समानताएं थीं. फिल्म इंडस्ट्री में अब बहुत कम लोग बचे हैं, जो अधिकारपूर्वक उन्हें याद करें. हां, वह अगर जिंदा होतीं तो जरूर बीती 3 अप्रैल को अपना 68वां जन्मदिन समारोहपूर्वक मनाती दिखतीं.

51 साल की अपनी छोटी सी जिंदगी में परवीन ने कई जिंदगियों को जिया. गुजरात के जूनागढ़ के रईस मुसलिम परिवार में जन्मी इस अभिनेत्री ने जिंदगी में जो कुछ भी देखा और भुगता वह किसी ट्रेजेडी फिल्म से कम नहीं है.

उन के पिता वली मोहम्मद बौबी राजघराने के नवाब जूनागढ़ के खास कारिंदे हुआ करते थे, जो उन दिनों फख्र की बात हुआ करती थी. परवीन अपने मांबाप की शादी के 14 साल बाद पैदा हुई थीं. जाहिर है, काफी लाड़प्यार में उन की परवरिश हुई थी.

लेकिन इस पर दुखद बात यह रही कि पिता का सुख उन्हें ज्यादा नहीं मिला. परवीन जब 5 साल की थीं, तभी मोहम्मद बौबी चल बसे थे. इस हादसे का उन के नाजुक और भावुक मन पर पड़ा गहरा असर उम्र भर दिखता रहा.

माउंट कार्मल हाईस्कूल से स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद अहमदाबाद के ही सेंट जेवियर्स कालेज से इंग्लिश लिटरेचर से एमए करने वाली परवीन अपने दौर की अभिनेत्रियों में सब से ज्यादा शिक्षित थीं. पढ़ाई पूरी करने के बाद वह मौडलिंग के लिए मुंबई आ गईं और फिल्मों के लिए भी हाथपांव मारने लगीं.

एक खास किस्म की फिल्में बनाने के लिए बदनाम निर्मातानिर्देशक बी.आर. इशारा ने उन्हें स्टाइल से सिगरेट पीते देखा तो तुरंत ‘चरित्र’ फिल्म की शिखा के लिए चुन लिया. 1974 में उन्हें ‘मजबूर’ फिल्म में अमिताभ के अपोजिट काम करने का मौका मिला.

यह फिल्म हिट रही थी. इस के बाद तो उन पर दौलत और शोहरत बरस पड़ी. लेकिन यह सिर्फ किस्मत या सैक्सी और ग्लैमरस होने की वजह से नहीं था, बल्कि उन की जबरदस्त अभिनय प्रतिभा के चलते ऐसा हुआ था.

यह वह दौर था, जब बौलीवुड में हेमामालिनी, रेखा, राखी, रीना राय, जयाभादुरी और मुमताज जैसी अभिनेत्रियों का सिक्का चलता था. इन के रहते इंडस्ट्री में अपना नाम और मुकाम हासिल कर पाना जीनत अमान के बाद अगर किसी के लिए मुमकिन था तो वह परवीन बौबी थीं.

1972 से ले कर 1982 तक परवीन का जादू इंडस्ट्री में सिर चढ़ कर बोला करता था. अपनी जिंदगी की तरह फिल्मी भूमिकाओं के प्रति भी वह कभी गंभीर नहीं रहीं. कामयाबी के दिनों में उन्होंने वही जिंदगी जी, जो मीना कुमारी जिया करती थीं.

डैनी से चला लंबा अफेयर

परवीन के आसपास सिगरेट के धुएं के छल्लों और शराब के प्यालों के अलावा कुछ और नहीं होता था. अपनी शर्तों पर जीना कतई ऐतराज या हर्ज की बात नहीं, लेकिन यह भी सच है कि जब आप दूसरों की शर्तों पर जीने लगते हैं तो जिंदगी इतनी दुश्वार हो जाती है कि उसे सलीके से जीना दूभर हो जाता है.

यही परवीन के साथ हुआ, जिन्होंने शादी का बंधन पसंद नहीं किया और एक बार किसी की भी पत्नी बनने के बजाय हर बार प्रेमिका बनना पसंद किया.

उभरते अभिनेता और खलनायक डैनी डेंजोंग्पा से उन क ा लंबा अफेयर रहा और स्टाइलिश हीरो कबीर बेदी से भी, जिन के लिए वह अपना करिअर तक कुरबान करने को तैयार हो गई थीं. कबीर शादीशुदा थे, इसलिए इस रिश्ते को अंजाम तक पहुंचाने की हिम्मत नहीं जुटा पाए.

उसी दौर में फिल्मों में जमने के लिए हाथपैर मार रहे निर्देशक महेश भट्ट को वह सचमुच दिल दे बैठी थीं, जिन का नाम इंडस्ट्री के कामयाब निर्देशकों में शुमार होता है.

महेश भट््ट और परवीन बौबी की लव स्टोरी वाकई अजीब थी, जिसे आज भी चर्चित प्रेम कथाओं की लिस्ट में सब से ऊपर रखा जाता है. महेश भट्ट की पहली शादी अपने स्कूल की सहपाठी लारेन ब्राइट से हुई थी, जिन्होंने अपना नाम किरण रख लिया था.

पूजा भट्ट और राहुल भट्ट इन्हीं दोनों की संतानें हैं. ‘आशिकी’ फिल्म महेश ने अपने पहले प्यार को ले कर ही बनाई थी. इस के बाद भी उन की तमाम फिल्मों में उन की व्यक्तिगत जिंदगी दिखी, जब 70 के उत्तरार्द्ध में महेश और परवीन के रोमांस के किस्से आम होने लगे तो लारेन ने स्वाभाविक ऐतराज जताया, जिस के चलते यह शादी टूट गई.

महेश भट्ट को एक खब्त और सनकी डायरेक्टर कहा जाता है, लेकिन उन के टैलेंट का कायल हर कोई रहता है.

पागलों की तरह करने लगी थीं व्यवहार

एक वक्त में यह लगभग तय हो गया था कि परवीन बौबी और महेश भट्ट शादी कर लेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. क्यों नहीं हुआ, यह तो शायद अब महेश भी न बता पाएं. लेकिन इस की बड़ी वजह खुद परवीन बौबी का असामान्य होता व्यवहार और ऊटपटांग हरकतें थीं.

परवीन को लगता था कि कोई उन की जान लेना चाहता है. वह शूटिंग के दौरान भी काफी भयभीत दिखने लगी थीं. यह दरअसल पैरानायड सिजोफ्रेनिया नाम की दिमागी बीमारी थी, जिस का अनजाने में ही वह शिकार हो गई थीं.

इंडस्ट्री में हर कोई कहता है कि डैनी और कबीर के बाद महेश ने भी परवीन का शोषण किया, उन का इस्तेमाल किया, ठगा और धोखा दिया. लेकिन यह पूरा सच नहीं लगता, क्योंकि महेश उन्हें ले कर काफी संजीदा थे और इलाज के लिए अमेरिका तक ले गए थे.

शायद महेश और किरण के अलगाव की वजह परवीन खुद को मानने लगी थीं, क्योंकि वह पत्नी और बच्चों को छोड़ उन्हीं के साथ रहने लगे थे. इस पर परवीन इतना गिल्ट फील करने लगी थीं कि अर्धविक्षिप्त हो गई थीं.

‘चरित्र’ फिल्म की शिखा उन के भीतर कहीं रह गई थी, जो रखैल शब्द सुनते ही डिप्रेशन में आ जाती थीं. इस के बाद परवीन शराब के नशे में धुत रहते अपना गम भुलाने की वही गलती भी करने लगी थीं, जो कभी मीना कुमारी ने की थी.

1984 में परवीन को न्यूयार्क एयरपोर्ट पर हथकड़ी पहने देखा गया था, लेकिन यह किसी फिल्म की शूटिंग नहीं थी बल्कि उन की दिमागी हालत की वजह से था. एयरपोर्ट पर वह अजीबोगरीब व्यवहार कर रही थीं और सिक्योरिटी स्टाफ को अपनी पहचान तक नहीं बता पा रही थीं.

पागलों सी हरकतें करते देख पुलिस ने उन्हें पागलखाने में पागलों के साथ बंद कर दिया था. जब एक भारतीय एजेंसी के अधिकारियों ने उन्हें छुड़ाया, तब वह हंस रही थीं. मानो कुछ हुआ ही न हो.

साल 1982 में महेश ने समानांतर फिल्म ‘अर्थ’ बनाई थी, जो अनधिकृत तौर पर हकीकत में उन्हीं की जिंदगी पर आधारित थी. फिल्म के हीरो कुलभूषण खरबंदा थे, जो पत्नी शबाना आजमी को छोड़ कर प्रेमिका स्मिता पाटिल के साथ रहने लगते हैं.

स्मिता पाटिल को सिजोफ्रेनिया का मरीज ‘अर्थ’ में बताया गया है जिसे हर वक्त यह महसूस होता रहता है कि कोई खासतौर से शबाना आजमी उन्हें मार देना चाहती हैं क्योंकि उन्होंने उस का पति उन से छीन रखा है.

परवीन की जिंदगी पर भी बनी फिल्म

फिल्म में जब भी स्मिता का सामना शबाना से होता है तो उन के हाथपैर कांपने लगते हैं और दौरे से पड़ने लगते हैं. एक दृश्य में जब दोनों का सामना होता है तो शबाना स्मिता पर ताना कसते हुए कहती हैं कि किताबों में लिखा है कि पत्नी को बिस्तर में वेश्या होना चाहिए जो तुम हो.

वास्तविकता पर आधारित इस फिल्म ने ऊपर के दर्शकों को झकझोर दिया था. स्मिता पाटिल और शबाना आजमी ने जो शानदार जानदार अभिनय किया था, अब शायद ही कोई कर पाए. कुलभूषण खरबंदा भी महेश भट्ट के रोल में प्रभावी अभिनय कर गए थे कि कैसे कोई एक मर्द 2 औरतों के बीच चक्की के पाटों सा पिसता रहता है. वह न तो पत्नी को छोड़ सकता है और न ही प्रेमिका को.

फिल्म चली और खूब चली. जिसे कई पुरस्कार भी मिले थे. परवीन बौबी की जिंदगी पर ‘वो लम्हे’ शीर्षक से फिल्म भी बनी थी, जो उतनी ही फ्लौप रही थी, जितनी इसी साल इसी थीम पर बनी वेब सीरीज ‘रंजिश ही सही’ रही थी.

‘अर्थ’ के प्रदर्शन से 2 साल पहले रमेश सिप्पी की सब से महंगी और शोले की तरह मल्टी स्टारर फिल्म ‘शान’ की शूटिंग के दौरान परवीन बौबी का पागलपन सार्वजनिक हुआ था, जब एक लटकते झूमर को देख कर वह चिल्ला पड़ी थीं कि अमिताभ बच्चन उन्हें इस के जरिए मार देना चाहते हैं. परवीन को शक था कि यह झूमर उन के सिर पर गिरा दिया जाएगा.

इस के बाद वे शूटिंग छोड़ घर चली गईं. पूरी यूनिट हैरानी से परवीन को देखती और पूछती रह गई थी कि यह इन्हें क्या हो गया. इस सवाल का जबाब सालों बाद लोगों को मिल भी गया था.

यह सब कुछ अचानक नहीं हुआ था, बल्कि धीरेधीरे हुआ था, जिस का अहसास परवीन को भी नहीं था कि वे एक भयानक दिमागी बीमारी की चपेट में आती जा रही हैं, जिस में मरीज डर और आशंकाओं के साए में रहता है.

वह कल्पनाएं करता है और उन्हें ही सच मानने लगता है. फिर हकीकत से कोई वास्ता उस का नहीं रह जाता. पहले परवीन को सिर्फ अमिताभ पर शक था कि वह उन की हत्या की साजिश रच रहे हैं लेकिन फिर इस लिस्ट में प्रिंस चार्ल्स, अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन सहित भाजपा सरकार तक का नाम शामिल हो गया था.

सिजोफ्रेनिया का मरीज अपने वहमों के प्रति कितना आत्मविश्वासी होता है, यह परवीन की हरकतों से भी उजागर हुआ था जब उन्होंने अपने संभावित हत्यारों के खिलाफ कानूनी काररवाई तक कर डाली थी. उम्मीद के मुताबिक अदालत से ये मुकदमे खारिज हो गए थे.

कोई बात न बनते देख महेश भट्ट ने 1986 में अभिनेत्री सोनी राजदान से शादी कर ली. आलिया भट्ट इन्हीं दोनों की संतान हैं.

‘शान’ के रिलीज होने के 2 साल बाद परवीन बौबी रहस्मय ढंग से गायब हो गईं तो उन के प्रशसंकों सहित फिल्म इंडस्ट्री सकते में आ गई थी. कहा यह गया था कि अंडरवर्ल्ड के सरगनाओं ने उन्हें किडनैप कर लिया है. क्योंकि तब परवीन के पास बेशुमार पैसा था और वे सुकून शांति और स्थायित्व के लिए अकेली भटक रही थीं.

अपने कंधों पर अपनी मजार

1983 में गायब हुईं परवीन कोई 6 साल बाद मुंबई में प्रगट हुईं. उन्होंने लोगों को बताया कि दरअसल आध्यात्मिक शांति के लिए चह एक आश्रम में चली गई थीं. अधिकतर लोगों का अंदाजा था कि यह ओशो रजनीश का आश्रम हो सकता है, जहां शांति की तलाश में अपने दौर के दिग्गज अभिनेता विनोद खन्ना भी गए थे और वहां सेवादारों की तरह झाड़ू भी लगाते थे.

सच जो भी हो, इस के बाद परवीन के खाते में कोई उल्लेखनीय फिल्म नहीं आई. 1983 में उन की 2 फिल्में ही चलीं. पहली थी ‘अर्पण’ और दूसरी थी धर्मेंद्र हेमामालिनी अभिनीत ऐतिहासिक फिल्म ‘रजिया सुलतान’, जिस में वह एक छोटे से रोल में थीं.

परवीन आखिरी बार 1988 में प्रदर्शित ‘आकर्षण’ फिल्म में नजर आई थीं, जोकि उन की पहली फिल्म ‘चरित्र’ से भी ज्यादा फ्लौप रही थी. इस के बाद वे दक्षिण मुंबई के एक रिहायशी इलाके में फ्लैट ले कर रहने लगी थीं.

अकेली, तनहा और गुमनाम, जहां उन का सहारा वही शराब और सिगरेटें थीं, जो ‘चरित्र’ की शिखा पीती थी और ‘दीवार’ की अनीता भी. लोग उन्हें भूलने लगे थे.

कभी उन के घर निर्मातानिर्देशकों की लाइन लगी रहती थी, लेकिन अब कोई अजनबी भी भूले से उन के फ्लैट की कालबेल नहीं बजाता था. अपने पड़ोसियों से भी वह कोई वास्ता नहीं रखती थीं. फिर एक दिन 22 जनवरी, 2005 को फिर से सनसनी मची, जब अपने दौर की बोल्ड ऐक्ट्रेस परवीन बौबी की सड़ीगली लाश फ्लैट में मिली.

आखिरी ख्वाहिश रह गई अधूरी

उन के फ्लैट के दरवाजे के आगे दूध के पैकेट और अखबार 3 दिन तक पड़े देख सोसायटी वालों ने पुलिस को इस की सूचना दी तो उजागर हुआ कि वे भूखी मरी थीं लेकिन प्यासी नहीं. क्योंकि शराब की बोतलें उन के पास से मिली थीं. पलंग के पास एक व्हील चेयर भी मिली थी, जिस से अंदाजा लगाया गया कि वे चलनेफिरने से भी मोहताज हो गई थीं.

इस के बाद परवीन बौबी और उन की संदिग्ध मौत को ले कर तरहतरह की अफवाहें उड़ती रहीं, जिन के कोई खास मायने नहीं थे. परवीन की यह आखिरी ख्वाहिश भी पूरी नहीं हो पाई कि उन का अंतिम संस्कार क्रिश्चियन रीतिरिवाजों से किया जाए, क्योंकि कुछ साल पहले वे ईसाई धर्म अपना चुकी थीं.

उन के घर वालों ने लाश क्लेम कर मुंबई की सांताकु्रज कब्रिस्तान में उन्हें इस्लामिक रीतिरिवाजों के मुताबिक दफना दिया.

परवीन का जिस्म दफनाया जा सकता है, उन का वो फलसफा नहीं जिस के तहत एक आजादखयाल औरत वैसे भी रह और जी सकती है जैसे वह रही थीं. उन की जिंदगी और मौत दोनों सबक हैं कि दुनिया और समाज में उस के तौरतरीकों से रहना ही बेहतर होता है, नहीं तो अंत कैसा होता है सब ने देखा.

उन की दुखद मौत पर भी मीना कुमारी की गजल का यह शेर मौजू है—

यूं तेरी रहगुजर से दीवानावार गुजरे

कांधे पे अपने रख के अपना मजार गुजरे

बैठे हैं रास्ते में दिल का खंडहर सजा कर

शायद इसी तरफ से एक दिन बहार गुजरे

IAS और पत्रकार की दिलचस्प प्रेम कहानी: प्यार का मोल नहीं

मध्य प्रदेश के 57 वर्षीय वरिष्ठ पत्रकार राकेश पाठक अपने फेसबुक वाल पर अकसर कुछ न कुछ करंट न्यूज से संबंधित जानकारियां, टिप्पणियां, तसवीरें आदि पोस्ट किया करते रहे हैं.

कई बार सामयिक, राजनीतिक और सामाजिक घटनाओं पर अपने विचार भी लिख डालते हैं. साथ ही उन में पारिवारिक जिंदगी पर भी कुछ बातें होती हैं. जैसे बेटी की शादी, आयोजनों में भागीदारी, दिवंगत पत्नी से जुड़ी यादें, दोस्तों के साथ तसवीरें, साहित्य और देशदुनिया की बातें भी होती हैं.

इसी सिलसिले में पहली अप्रैल को उन्होंने हैशटैग के ‘सुखदुख’ का इस्तेमाल करते हुए एक भावुक पोस्ट लिखी थी.

दरअसल, चौंकाने वाली उस पोस्ट में उन्होंने अपने दिल की बात लिख डाली थी, जो एक तरह से उन की व्यक्तिगत सूचना भी थी. उस के जरिए उन्होंने अपनी जिंदगी की नई शुरुआत के बारे जानकारी दी थी. उसी के साथ एक अन्य हैशटैग के साथ भोपाल की एक 56 वर्षीया आईएएस आधिकारी शैलबाला मार्टिन का भी जिक्र किया था. उन का विशेष परिचय दिया था, जो एकदम से निजी था.

बात 2 साल पहले की है. एक टेलीविजन डिबेट पर राकेश पाठक और शैलबाला मार्टिन आमंत्रित किए गए थे. उन्हें एक ऐसे टौपिक पर बहस में हिस्सा लेने के लिए बुलाया गया था, जो सरकार की नीतियों को लागू करने में आड़े आने वाले ब्यूरोक्रेट की मंशा को ले कर थी. उस में भ्रष्टाचार ही मुख्य मुद्दा था. उस डिबेट में काफी गरमागरम बहस हुई.

बतौर ब्यूरोक्रेट मार्टिन ने अपना दमदार पक्ष रखा, जबकि एक पत्रकार के नजरिए से पाठक ने भ्रष्टाचार की वजहों का संतुलित विश्लेषण किया. उस डिबेट में राजनीतिक दलों से शामिल राजनेताओं ने भी अपनी बातें बड़ी साफगोई से रखते हुए अपने दामन पाकसाफ होने की दलीलें पेश की थीं.

डिबेट खत्म होने के बाद पत्रकार राकेश पाठक ने शैलबाला की तारीफ में सिर्फ इतना कहा, ‘‘आप के विचारों से मैं व्यक्तिगत तौर पर सहमत हूं.’’

शैलबाला ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘आप ने भी सटीक तर्क दिए.’’

‘‘इसी बात पर एकएक कप कौफी हो जाए,’’ पाठक तुरंत बोल पड़े.

‘‘हांहां, क्यों नहीं. पेमेंट आप को करनी होगी.’’ हंसती हुई बोली, ‘‘इस बीच आप के साथ कुछ और बातें शेयर करने का मौका मिल जाएगा. मुझे भी लिखने का शौक है.’’

कुछ मिनटों में दोनों एक छोटे से राउंड टेबल पर आमनेसामने बैठे थे. कौफी का प्याला आ चुका था. पाठक ने कौफी का प्याला हाथ में लेते हुए पूछा, ‘‘आप की नजर में भ्रष्टाचार की जड़ कहां है?’’

‘‘जनता में,’’ शैलबाला तुरंत बोल पड़ीं.

‘‘वह कैसे?’’ पाठक ने दूसरा सवाल किया.

‘‘जनता हड़बड़ी में रहती है. हर काम शार्टकट में चाहती है. जन प्रतिनिधि पर आंखें मूंद कर भरोसा कर लेती है. नियमकानून से दूरी बनाए रखती है. जाति के जरिए रास्ते बनाती है. केवल अधिकार की बात करती है. अपना कर्तव्य कुछ नहीं समझती है. जुझारूपन की बहुत कमी है.’’

शैलबाला बोलती चली जा रही थीं और पाठक हाथ में कौफी का प्याला पकड़े उन्हें एकटक निहार रहे थे. शैलबाला ने भी अचानक महसूस किया कि डिबेट तो कब की खत्म हो चुकी है और वह उसी रौ में बह रही हैं. सौरी बोलते हुए कौफी का अपना प्याला हाथ में उठा लिया.

‘‘इस में सौरी की क्या बात है, आप ने बिलकुल सही कहा. जनता में जागरूकता की कमी है,’’ पाठक बोले.

‘‘जिस दिन जनता जागरूक हो जाएगी, उस दिन ला एंड और्डर उन के कदमों में होगा,’’ शैलबाला ने कहा.

उन की बातों से एक विश्वास झलक रहा था.

‘‘लेकिन जनता को जागरूक करेगा कौन?’’ पाठक ने फिर सवाल किया.

‘‘कम से कम वैसे जनप्रतिनिधि तो नहीं, जो वोट बैंक बनाने का दिमाग लगाते हैं. मेरे पास इस के उदाहरण भरे पड़े हैं. शायद ही कोई चुना हुआ जनप्रतिनिधि हो, जिस ने कौमन समस्या के समाधान की बातें की हों.’’

‘‘इस के लिए क्या किया जाना चाहिए?’’ पाठक ने पूछा.

‘‘आप पत्रकार हैं, आप ही बताइए क्या होना चाहिए, जिस से भ्रष्टाचार की बुनियाद पर जोरदार हथौड़ा लगाया जा सके,’’ शैलबाला ने पाठक के प्रश्न का उत्तर उन से ही जानना चाहा.

‘‘मेरा तो एक ही बात पर हमेशा जोर रहा है, ब्यूरोक्रेट को भी जनता के बीच जाना चाहिए,’’ पाठक बोले.

‘‘अरे, आप ने तो मेरे मन की बात कह दी. मेरे विचार आप से मिलते हैं. मैं भी ऐसा ही काफी पहले से सोचती थी,’’ शैलबाला चहकती हुई बोलीं.

‘‘तो फिर इस का इंतजार क्यों?’’ पाठक बोले.

‘‘आप इस में मेरा साथ देंगे तो बोलिए. मैं इस की कार्ययोजना बना सकती हूं. इस बारे में मेरी एक प्लानिंग है. उस पर फिर कभी विस्तार से चर्चा करूंगी,’’ शैलबाला बोलीं.

‘‘क्यों आज क्यों नहीं? कौफी खत्म हो गई इसलिए तो नहीं?’’ पाठक हंसते हुए बोले.

‘‘उम्मीद करती हूं, आप से अगली मुलाकात इसी विषय को ले कर होगी,’’ शैलबाला बोलीं.

तभी मोबाइल पर एक नंबर फ्लैश हुआ और वह चलने को उठ खड़ी हुईं. पाठक समझ गए कि स्टूडियो के बाहर शैलबाला की गाड़ी तैयार है. उन्होंने फटाफट उन का निजी मोबाइल नंबर भी ले लिया. सोशल मीडिया पर दोनों दोस्त बन गए.

पाठक की सास ने कान में फूंका मंत्र

दरअसल, दोनों की वह पहली मुलाकात नहीं थी. उन की अकसर न्यूज और सरकार के प्रोजेक्ट के सिलसिले में औपचारिक मुलाकातें होती रहती थीं, लेकिन उस रोज की मुलाकात खास बन गई थी. उन्होंने एकदूसरे के मन को छू लिया था.

सामाजिक सरोकार की बातें करते हुए एक लक्ष्य पर निशाना साधने की पहल की थी. चेहरे पर प्रसन्नता और आत्मविश्वास के भाव थे. उन्होंने हाथ हिला कर अभिवादन के साथ एकदूसरे से विदा लिया था.

इस क्रम में दोनों की मुलाकातों का सिलसिला भी बढ़ गया. उन के बीच समाज और देशदुनिया की बातों के साथसाथ पारिवारिक बातें भी होने लगीं.

एक बार पाठक ने घर में छोटे से आयोजन के सिलसिले में शैलबाला को आमंत्रित कर दिया था. आयोजन काफी छोटा था, लेकिन उस मौके पर एक बड़ा निर्णय लिया जाना था. इस की जानकारी शैलबाला को तब हुई, जब वह पाठक परिवार के सदस्यों से मिलीं. पाठक ने बेटी के लिए एक रिश्ते की तलाश की थी. उस बारे में जब पाठक और उन की दिवंगत पत्नी की मां ने उन से राय मांगी, तब शैलबाला हतप्रभ रह गईं. यह बात उन के दिल को छू गई. परिवार में उन की अहमियत का एहसास हुआ.

इसी के साथ जब पाठक की बेटी ने निर्णय सुनाया कि वह भी उन की तरह आईएएस बनना चाहती है और वह उन की आदर्श हैं, तब शैलबाला और भी पाठक के परिवार के प्रति भावुक हो गईं. लौटते समय पाठक की सास ने उन के कान में धीमे से कहा था, ‘‘बेटी, जब फुरसत मिले, यहां आ जाया करो.’’

कहने को तो वह अपने राज्य मंत्रालय के दफ्तर और सरकारी बंगले के रहनसहन समेत रोजमर्रा के औपचारिक कामकाज में व्यस्त हो गई थीं, लेकिन अच्छा दोस्त बन चुके पाठक की सासूमां की बात दिमाग में रहरह कर आ ही जाती थी.

उन्हें अनायास लगने लगा था कि कोई है, जो उन्हें चाहता है. उन की बातों को महत्त्व देता है. एक परिवार है, जिस से जुड़ाव बन चुका है. कुछ लोग हैं, जिन से वह खुल कर बातें कर सकती हैं.

उन दिनों कोरोना काल के दूसरे फेज का दौर चल रहा था. महामारी के कारण प्रशासनिक कामकाज की व्यस्तताएं बढ़ी हुई थीं. इस दौरान अपने मातापिता, दोनों भाइयों का हालसमाचार लेती रहती थीं. साथ ही पाठक के परिवार वालों से भी फोन पर उन का समाचार ले लिया करती थीं.

यह कहें कि इस दौरान शैलबाला की पाठक समेत उन के परिवार के लोगों से निकटता और भी बढ़ गई थी.

शादी का प्रपोजल 

शैलबाला पाठक के घर गई हुई थीं. घर में उस दिन भी उन की मुलाकात पाठक की सासूमां से हुई. उन से पारिवारिक बातें होने लगीं. बातों का सिलसिला जब शुरू हुआ, तब ऐसा लगा कि बातें खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थीं.

तभी शैलबाला को मालूम हुआ कि पाठक की पत्नी प्रतिभा की 2015 में कैंसर से देहांत होने के बाद वह किस तरह से अपने आप को अकेला महसूस करने लगे थे.

बातोंबातों में पाठक की सास ने उन से पूछ लिया कि उन्होंने अभी तक शादी क्यों नहीं की? इस पर शैलबाला पहले तो थोड़ी देर चुप हो गईं, फिर उन्होंने बताया कि उन की शादी जब एक बार टल गई, तब टलती ही चली गई. कभी परिवार के लोगों को उन के योग्य लड़का नहीं मिला तो कभी कोई पसंद आया तो उस का धर्म आड़े आ कर दीवार बन गया.

पापा बहुत से रिश्ते बताते थे, लेकिन मुझे पसंद नहीं आया था. सच कहूं तो नौकरी के बाद मेरे पापा ने शादी को ले कर बात की थी. कई रिश्ते भी बताए, लेकिन मैं तब शादी के लिए तैयार नहीं थी.

कई बार कुछ लोगों ने मेरे मातापिता से बात किए बिना मुझ से संपर्क भी किया, लेकिन वे मुझे पसंद नहीं करते थे.

नौकरी के दौरान कई लड़कों से दोस्ती तो हो गई थी, लेकिन प्यार करने वाला कोई नहीं मिला था. कभी किसी को प्यार के लायक नहीं पाया. यह भी हो सकता है कि मैं ईसाई समुदाय से आती हूं, शायद इसलिए किसी ने मुझे प्रपोज नहीं किया.

मैं थोड़ी गुस्सैल स्वभाव की हूं, हालांकि दिल से नरम हूं. शायद मुझे लगता था कि कोई ऐसा इंसान मेरी जिंदगी में आए जो मेरे गुस्से को कम कर सके. मुझे अच्छी तरह समझ सके. जब से पाठक से दोस्ती हुई है, तब से मेरा गुस्सा कुछ कम हुआ है.

जहां तक शादी की बात है, तब मुझे लगता था कि शादी की कोई उम्र नहीं होती. महिलाओं को अपने जीवन के फैसले खुद लेने की आजादी होनी चाहिए. मैं ने भी अपनी जिंदगी खुद तय की है. इस में मेरा परिवार भी मेरे साथ है.

शैलबाला की बातें सुनने के बाद पाठक की सास ने कह दिया, ‘‘तुम एकदूसरे को जानते हो. तुम्हारे विचार आपस में काफी मिलते हैं. फिर तुम लोग शादी क्यों नहीं कर लेते? कहो तो मैं दामाद से बात कर लूं.’’

‘‘लेकिन..’’

‘‘लेकिन उन की बेटियों को ले कर है न! दोनों बेटियां भी चाहती हैं कि तुम उन की मां की जगह ले लो. उन्होंने ही मुझे प्रपोज करने के लिए कहा है.’’

‘‘फिर भी मुझे सोचने का कुछ वक्त चाहिए,’’ शैलबाला बोलीं.

उस रोज शैलबाला ने अपनी पुरानी जिंदगी के पन्ने खोल दिए थे. उन्होंने बताया कि 11वीं कक्षा के बाद उन्होंने कभी भी अपने मातापिता से पढ़ाई के लिए पैसे नहीं मांगे. ट्यूशन पढ़ा कर अपना खर्चा उठाया. डाक्टर बनना चाहती थी, लेकिन पीएमटी में 2 कोशिशों के बाद भी सेलेक्शन नहीं हो पाया.

फिर बी.एससी. में एडमिशन ले लिया. ग्रैजुएशन के बाद दोस्तों ने कहा कि वह पीएससी की तैयारी क्यों नहीं करती? लेकिन विज्ञान विषय से पीएससी कठिन था. फिर इतिहास में एमए किया.

इतिहास और लोक प्रशासन विषय के साथ पीएससी में शामिल हुई. मुख्य परीक्षा से पहले पापा की तबीयत बिगड़ गई, लेकिन मेंस क्लियर हो गया. फिर इंटरव्यू में भी सफलता मिल गई. पहले ही प्रयास में चयन हो गया. सफर यूं ही चलता रहा.

शैलबाला मार्टिन 9 अप्रैल को 57 साल की हो गईं. राकेश पाठक उन से उम्र में महज एक साल बड़े हैं. दोनों की अपनी अलग पहचान है. इंदौर की रहने वाली शैलबाला मूलत: झाबुआ इलाके से हैं. वह ईसाई समाज की हैं. उन के परिवार में मातापिता के अलावा 2 भाई हैं. शालीन, संभ्रांत, संवेदनशील, सुंदर व्यक्तित्व की धनी और सुलझी हुई 2009 बैच की आईएएस अधिकारी हैं.

एक अविवाहित, दूसरे विधुर

इन दिनों वह मध्य प्रदेश के राज्य मंत्रालय, वल्लभ भवन, भोपाल में अतिरिक्त सचिव (सामान्य प्रशासन विभाग) के पद की जिम्मेदारी संभाल रही हैं. इस से पहले वह निवाड़ी जिले की कलेक्टर और बुरहानपुर की नगर आयुक्त भी रह चुकी हैं.

दूसरी तरफ डा. राकेश पाठक मूलरूप से ग्वालियर के रहने वाले हैं. वह नवभारत, नईदुनिया, नवप्रभात, स्टेट टुडे अखबार के संपादक रह चुके हैं. इन दिनों कर्मवीर समाचार पत्र के मुख्य संपादक हैं.

जैसेजैसे समय बीतता रहा, वैसेवैसे पाठक और शैलबाला की दोस्ती प्रगाढ़ होती चली गई. उन के परिवार के सदस्यों का शादी को ले कर दबाव बनने लगा. पाठक की बेटियों ने भी पाठक और शैलबाला पर शादी करने की प्लानिंग तक कर डाली.

अंतत: वह दिन भी आ गया, जब पाठक ने न केवल शैलबाला को विवाह प्रपोजल दिया, बल्कि इसे अपने फेसबुक वाल पर सार्वजनिक भी कर दिया.

एक नजर पाठक के उस पोस्ट पर डालें, जो इस प्रकार है—

अब सुख दु:ख की साथी हैं शैलबाला मार्टिन आत्मीय स्वजनो,

आज हम आप से अपने सुखदु:ख की साथी मिस शैलबाला मार्टिन का परिचय करवा रहे हैं. शैलजी इंदौर की निवासी हैं. मध्य प्रदेश काडर की आईएएस अधिकारी हैं. कलेक्टर, निगम कमिश्नर रही हैं. मध्य प्रदेश सरकार में अनेक अहम पदों का दायित्व निभा चुकी हैं.

इन दिनों राज्य मंत्रालय, वल्लभ भवन भोपाल में एडिशनल सेक्रेटरी (सामान्य प्रशासन विभाग) के पद पर पदस्थ हैं. एक कर्मठ और संवेदनशील प्रशासक होने के साथ शैल यदाकदा लिखती भी हैं. उन की सीरीज ‘अमी एक जाजाबोर’ (मैं एक यायावर) उन की फेसबुक वाल पर पढ़ी जा सकती है.

इस में वह अपने आसपास की दुनिया को एक अलग नजर से देखती और दर्ज करती हैं. अगर ऐसे ही लिखती रहीं तो भविष्य में इसी शीर्षक से उन की किताब आएगी. जाहिर है लिखेंगी ही.

हम बीते लगभग 2 बरस से मित्र हैं. इस संगसाथ में हम ने जाना कि शैल हमारी हमखयाल होने के साथसाथ एक बेहतरीन इंसान हैं. अब हम जीवनसाथी होने जा रहे हैं.

बाबा कबीर कह गए हैं—

ये तो घर है प्रेम का खाला का घर नाय

सीस उतारे भूंय धरे तब बैठे घर माय.

…सो हम दोनों अपनाअपना शीश उतार कर प्रेम के घर में बस रहे हैं.

पिछले दिनों एक पारिवारिक आयोजन में दोनों बेटियों सौम्या और शची ने शैल का पूरे परिवार के साथ परिचय करवाया. बेटियों की नानी मां सहित पूरे कुटुंब ने शैल का पाठक परिवार में स्नेहसिक्त स्वागत किया.

शैल के बड़े भाइयों विनयजी और विनोदजी सहित पूरे परिवार का आशीर्वाद भी हम दोनों को मिला है.

मेरी धर्मपत्नी प्रतिमा प्रकृतिप्रदत्त आयु को पूर्ण कर सन 2015 में अनंत की यात्रा पर प्रस्थान कर गई थीं. अपनी अदम्य जिजीविषा से उन्होंने 5 साल ब्लड कैंसर से मोर्चा लिया था. अब आगे की यात्रा शैल के साथ तय होगी. आप की शुभकामनाएं हमारा मार्ग प्रशस्त करेंगी. इसी पोस्ट के साथ उन्होंने नई जिंदगी की महत्त्वाकांक्षाओं का जिक्र करते हुए ईस्टर के बाद विवाह बंधन में बंधने की घोषणा भी कर दी थी.

दिल को मिल गया मुकाम

इस पोस्ट के आते ही कुछ मिनटों में एक आईएएस और पत्रकार की शादी की खबर सोशल साइट पर वायरल हो गई. देखते ही देखते यूट्यूब, प्रिंट, इलेक्ट्रौनिक और डिजिटल मीडिया के लिए दोनों की लव स्टोरी अहम खबर बन गई.

मीडिया से ले कर ब्यूरोक्रेट जगत तक में दोनों चर्चा का विषय बन गए. उन के चाहने वालों के मन में जिज्ञासा जागी कि

आखिर उन के बीच प्रेम के बीज कब, कैसे अंकुरित हुए?

इस का जवाब जानने तक सोशल साइटों पर ही उन्हें अग्रिम बधाई देने वालों का तांता लग गया. शायद ही कोई हो, जिस ने नए रिश्ते को नजरंदाज किया हो. हालांकि अधिकतर उन के बीच की नजदीकियों से भी वाकिफ थे.

पाठक की दोनों बेटियों ने पिता के फैसले का दिल से स्वागत किया और सार्वजनिक रूप से शैलबाला मार्टिन को बधाई भी दी. बेटी सौम्या ने लिखा कि हमारे परिवार में आप का स्वागत है. इस नए खूबसूरत सफर के लिए आप को और पापा को ढेर सारा प्यार.

फिर भी एक बहस का हिस्सा बन गए. क्योंकि राकेश पाठक जहां ग्वालियर जिले के रहने वाले हिंदू ब्राह्मण परिवार से हैं, वहीं शैलबाला मार्टिन इंदौर की मूल निवासी ईसाई फैमिली से.

बहरहाल, कथा लिखे जाने तक उन की शादी की तारीख तय नहीं हुई थी. लेकिन ईस्टर के बाद होनी तय है. बताया जाता है कि उन की प्लानिंग कोर्ट मैरिज करने की है. उस के बाद रीतिरिवाजों के मुताबिक शादी होगी. विवाह की रस्मों में धर्म का कोई बंधन नहीं होगा.

शैलबाला के अनुसार उन्हें किसी तरह की कोई आपत्ति नहीं है. दोनों के दिलों में एकदूसरे के प्रति गहरा सम्मान है. इस में धर्म का कोई बंधन है ही नहीं.

(कहानी का नाटकीय रूपांतरण किया गया है)

देसी पोर्न फिल्मों की अनदेखी सच्चाई

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक छोटे से कस्बे में रहने वाले इंटरमीडिएट के छात्र सुनील के मोबाइल का डेटा खत्म हो गया था. वह परेशान हो गया था. रात के 9 बज चुके थे. कहां रीचार्ज करवाए, किस से कहे, औनलाइन पढ़ाई भी करनी थी.

तभी ध्यान आया उस की बुआ का मोबाइल. वह तुरंत उन के पास जा पहुंचा. उस वक्त वह अपने कमरे में नहीं थीं. रसोई में उस की मां के साथ हाथ बंटा रही थीं. मोबाइल उन के बिस्तर पर पड़ा था.

उस ने झट मोबाइल उठाया और अपने कमरे में चला आया. औन करते ही उस का दिमाग सन्न से रह गया. उस पर एक वीडियो चल पड़ी थी. वह किसी हीरोहीरोइन की फिल्म नहीं, बल्कि एक पोर्न वीडियो थी. वह डर गया. तुरंत मोबाइल बंद किया और वापस बुआ के कमरे में रखने के लिए जाने लगा. करीब 10 साल बड़ी बुआ भागती हुई आईं और उस के हाथ से मोबाइल छीन कर डांट लगाई, ‘‘बदतमीज, किसी दूसरे का मोबाइल नहीं छूते, तमीज नहीं है.’’

‘‘जी…जी बुआ, मेरा डेटा खत्म हो गया था, इसलिए आप का लाया,’’ सुनील झिझकते हुए बोला.

‘‘औन तो नहीं किया था?’’ बुआ बोलीं.

‘‘जी किया था, थोड़ी देर… फिर बंद भी कर दिया था. वापस कमरे में रखने ही जा रहा था,’’ सिर झुकाए बोला.

इस छोटी सी घरेलू बात के बाद सुनील से उस की बुआ नजरें चुराने लगी थीं. उसे ऐसा महसूस होने लगा था कि उस ने कोई गलत काम किया हो और भतीजे की नजरों में गिर गई हों. दूसरी तरफ सुनील भी उस के बाद इतना तो समझ ही गया था कि वह देर रात तक मोबाइल से चिपकी क्यों रहती है.

दरअसल, सुनील की तलाकशुदा बुआ को पोर्न फिल्में देखने की लत लगी हुई थी. हर रोज देर रात तक फिल्में देखा करती थी. एडल्ट फिल्में तो सुनील भी देखता था, इस कारण उस का डेटा जल्द खत्म हो जाता था, लेकिन इस तरह की पोर्न वीडियो की झलक उस ने पहली बार देखी थी. यह सोच कर वह भी बुआ के सामने झेंप गया था और नजरें चुराने लगा था.

इस से इतना साफ है कि पोर्न फिल्में मोबाइल पर देखना बहुत ही आसान हो गया है. वैसे तो 80 के दशक में वीसीपी और वीसीआर आने के साथ ही पोर्न यानी ब्लू फिल्मों का आगमन हो गया था.

तब उसे लोग शौर्ट में धीमी आवाज में बीएफ कहते थे. लेकिन सीडी और पेनड्राइव आने पर इस का और विस्तार हुआ. दिल्ली में पालिका केंद्र इस के बिजनैस का बड़ा केंद्र बन गया.

डिजिटल दौर में इंटरनेट, स्मार्टफोन,  डेटा की उपलब्धता और सूचना तकनीक की क्रांति के आने पर इस में और भी तेजी आ गई है. पोर्न कंटेंट की वेबसाइटें भरी पड़ी हैं.

कानूनी पाबंदियों और सरकारी प्रतिबंधों के बावजूद यह फलताफूलता धंधा बन चुका है. इन में देसी पोर्न फिल्मों का बाजार ठीक वैसे ही उफान पर है, जैसा उफान देती महिलाएं इन फिल्मों में देखी जाती हैं.

नतीजा सामने है. भारत में कहीं सहमति से तो कहीं जबरदस्ती छोटीछोटी पोर्न फिल्में धड़ल्ले से बनने लगी हैं. कुछ सेकेंड की क्लिपिंग्स के अलावा वेब सीरीज के रूप में इन फिल्मों का बाजार फैल चुका है. इस की जड़ें कस्बे और गांव तक जा पहुंची हैं. इस में छिपे तौर पर लाखों लोग एक्टिव हैं.

उन में कलाकार, मेकअप मैन, क्रू मेंबर, कैमरामैन, कंटेंट राइटर, तकनीशियन और डिजिटल मार्केटिंग के लोग शामिल हैं.

यह अलग बात है कि इसे बौलीवुड, टौलीवुड, साउथ, बांग्ला, मराठी, पंजाबी या भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री की तरह एक इंडस्ट्री जैसी पहचान और सम्मान नहीं मिल पाया है. हौलीवुड की तरह भारत में इसे जगह मिलना भले ही नामुमकिन हो, लेकिन इस के प्रवाह को रोकना मुश्किल नहीं है.

पोर्न साइटों पर इन दिनों छोटीछोटी कहानियों के साथ ब्लू फिल्में बनने लगी हैं. उस के पात्र रिश्तेदारों की तरह होते हैं. जैसे देवरभाभी, साली, आंटी, सिस्टर, स्टेप सिस्टर आदि. इस के अलावा लवर, फ्रैंड्स, स्टूडेंट आदि भी होते हैं.

इन शोज के जरिए यहां की देसी एडल्ट नायिकाएं अपनी कामुकता बेच कर कमाई कर रही हैं. इसे दूसरे रूप में कह सकते हैं कि वे मर्द की सैक्स की चाहत पूर्ति के लिए कामोत्तेजना और यौन संबंध को दिखा कर पैसा बना रही हैं.

पोर्न वेब सीरीज के लिए बाकायदा सेट लगा कर शूटिंग की जाती है. वहां कैमरे के सामने पात्रों को रोमांस, सैक्स और संभोग की गतिविधियों का अभिनय करना होता है. बदले में उन्हें कुछ रुपए मिल जाते हैं. इस का एक उदाहरण देखिए.

शूटिंग स्थल कहीं किसी भी महानगर के फ्लैट का कमरा हो सकता है. सामान्यत: वैसे मकान प्रौपर्टी डीलर से किराए पर ले लिए जाते हैं. काल्पनिक कहानी के पात्र देवर और भाभी हो सकते हैं.

फर्श और बिस्तर फूलों की पंखुडि़यों से सजा दिया जाता है. कमरे में मद्धिम रोशनी लगी होती है. सेट पर मादकता और उन्माद को दर्शाने वाली कुछ तसवीरें लगा दी गई हैं.

इस के लिए नाममात्र के स्क्रिप्ट और डायलौग्स होते हैं. सब कुछ कैमरामैन और किरदार पर निर्भर करता है. किरदारों को कैमरे के सामने सहज दिखने को कहा जाता है. चेहरे पर रोमांस और कामुकता के भाव लाने होते हैं. इस के डायरेक्टर दोहरी जिम्मेदारी निभाते हैं.

किरदारों से एक्शन बोलते ही सैक्स सीन की शूटिंग शुरू हो जाती है. शूट पूरा होने पर मर्द किरदार को 2000 रुपए और महिला किरदार को 10,000 रुपए मिल जाते हैं. यहां महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले अधिक पैसे मिलते हैं. महिला किरदार हाउसवाइफ रजनी है. उस के लिए यह बहुत बड़ी रकम नहीं है, लेकिन उसे अपने बेटे के स्कूल की फीस भरनी है. यही मजबूरी उसे पेशे में खींच लाई है.

32 साल की रजनी के यहां तक पहुंचने की कहानी भी काफी रोमांचक और उथलपुथल की रही है. उस के लिए साल 2019 में जिंदगी काफी मुश्किल से भरी हुई थी.

तब वह लखनऊ के एक अस्पताल में अपने बेटे के इलाज के लिए पैसा जुटाने की कोशिश में थी. उस का बेटा रसोई में एक दुर्घटना का शिकार हो गया था. थर्ड डिग्री तक झुलस गया था. उन दिनों पति भी बेरोजगार चल रहा था. किसी से मदद नहीं मिल पाई थी. परिवार वाले और दोस्तों ने भी उस दंपति से मुंह मोड़ लिया था.

रजनी की शादी सिर्फ 16 साल की उम्र में हो गई थी. उस के पास गृह विज्ञान में मास्टर डिग्री है. वह पीएचडी करने वाली ही थी कि उस के बेटे के साथ हादसा हो गया. वह उत्तर प्रदेश शिक्षक योग्यता परीक्षा देने वाली थी. लेकिन पेपर लीक होने की वजह से परीक्षा रद्द कर दी गई थी. उस के सपने पर पानी फिर गया था.

हार कर रजनी लखनऊ के एक स्पा पार्लर में काम करने लगी थी. उस का काम नए ग्राहक बनाने का था. उस के लिए वह नएनए  लोगों को काल कर उन्हें स्पा की सुविधाएं और औफर के बारे में बताती थी. कोशिश करती थी कि ग्राहक पार्लर तक आ जाएं. जल्द ही यही उस के लिए सैक्स वर्कर बनने की पहली सीढ़ी थी.

ग्राहक बनातेबनाते उसे पता चल गया था कि मसाज देने के बहाने से ‘अलग’ सैक्स सेवाएं देने वाली औरतों को अधिक पैसे मिलते हैं. उन दिनों रजनी को पैसे की काफी तंगी थी. उस ने देखा कि ग्राहक वह बनाती है, जबकि उसे सर्विस देने वाली लड़कियां दोगुना, तिगुना कमा लेती हैं.

अलगअलग शिफ्ट में काम कर के भी उसे ज्यादा से ज्यादा 15 हजार ही मिल पाते थे. इस पैसे से वह अपने बच्चों की फीस नहीं भर सकती थी. रजनी पैसा कमा कर अपना मसाज और मेकअप सैलून खोलना चाहती थी.

आखिरकार फोन करने के साथसाथ वह मसाज का काम भी करने लगी. बाद में उस ने सैक्स सर्विस के अलावा खुद का नेटवर्क बना लिया. जल्द ही अपने नेटवर्क में असंगठित सैक्स व्यापार के एजेंटों को भी शामिल कर लिया. एजेंट उस के लिए ग्राहक ढूंढ़ कर लाते थे. बाद में उस ने कमीशन बचाने के लिए कुछ खास एजेंटों से संपर्क बनाए रखा.

इसी बीच कोरोना महामारी में सैक्स वर्कर्स का काम बंद हो गया. उसी दौरान उसे एक एजेंट ने इंटरनेट पर पोर्नोग्राफिक क्लिप के लिए एक्टिंग करने के बारे मे बताया. यह कमाई का नया जरिया था.

सैक्स वर्कर की तुलना में इस में पैसा कम था, लेकिन उस से कहीं अधिक सुरक्षित लगा. हालांकि कैमरे पर दिखने के लिए थोड़ा अधिक काम करना पड़ा. शूट के लिए अपने रंगरूप को मेंटेन रखना पड़ा.

रजनी ने इस बारे में बताया कि उसे सैक्स की क्वालिटी को ध्यान में रखते हुए देह को आकर्षक बनाए रखने के साथ सजनासंवारना भी पड़ता है. उस ने बताया कि इस फिल्म में अब कई मौडल्स और एक्स्ट्रा कलाकार भी आ गई हैं. वह खुद को इस पेशे से जुड़ी उन लड़कियों से अलग मानती हैं, जो कालेज जाने वाली लड़कियां हैं और महंगे शौक और ड्रेस के लिए यह काम करती हैं.

रजनी की तरह ही 24 साल की सुनैना है. सुंदर नैननक्श और सैक्स अपील वाली काया, लोचदार कमर. उन्नत उभार वाले कटाव किसी भी ड्रेस में ग्लैमर को बढ़ा देने के काबिल.

पोर्न फिल्म की शूट के लिए पीले रंग का क्रौप टौप और गुलाबी जींस और पैरों में हलके नीले रंग के स्नीकर्स पहन कर उस ने खुद को खूब सजा लिया है, हालांकि वह साधारण मेकअप में भी बहुत सुंदर दिखती है.

कौमर्स ग्रैजुएट सुनैना ने इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट में भी प्रोफेशनल कोर्स किया है. यहां तक कि एक नामी औटोमोबाइल कंपनी में इंटर्न भी रह चुकी है. वह एडल्ट इंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में क्यों काम कर रही है, इस से वह वाकिफ है. इस बारे में उस का कहना है कि अगर आप को पैसे और शोहरत चाहिए तो आप को झिझक खत्म करनी पड़ेगी.

आप को कैमरे के सामने शरमाना छोड़ना होगा. ऐक्टिंग के लिए किसी भी हीरोइन की नकल कर ले वही अच्छा है. उस में सन्नी लियोनी या पूनम पांडे भी हो सकती है.

सुनैना 19 साल की उम्र से पोर्न फिल्म का हिस्सा बनी हुई है, लेकिन खुद को पोर्न एक्ट्रैस नहीं कहलाना चाहती. क्योंकि अब तक उस पर सैक्स के सीन नहीं फिल्माए गए हैं. इस तरह की फिल्म में काम करना चाहती है. लेकिन सही पैसा और मौका नहीं मिला है.

इस बारे में उस ने बताया कि दिल्ली की एक एजेंसी ने पोर्न वीडियो के लिए संपर्क किया था. क्लाइंट की कंपनी अमेरिका की है. उस ने 11 महीने का एग्रीमेंट औफर किया गया था. शूट देश के बाहर होना था. कंपनी ने 20 मिनट के वीडियो के लिए 5 से 6 लाख रुपए औफर किया थे.

यह डील नहीं हो पाई थी, क्योंकि कंपनी ने उस से अपने ‘औडिशन’ के लिए न्यूड वीडियो मांगे थे. इस पर सुनैना ने सवाल किया था कि क्या गारंटी है कि वे इसे नहीं बेचेंगे और उसे कमाई का कोई हिस्सा मिलगा?

सुनैना डिजिटल प्लैटफौर्म पर मौजूद एडल्ट कंटेंट के बारे में बताती है कि उस में कई अलगअलग भाग हैं. जिसे दर्शक के लिए एक्स, टूएक्स और थ्रीएक्स की श्रेणी में बांटा गया है.

जबकि शूटिंग के तौर पर उस के विविध टैक्निकल टर्म होते हैं, जैसे ‘बोल्ड कंटेंट’ में गले मिलना और चुंबन के दृश्य होते हैं. साथ ही कुछ कामुक तसवीरें हो सकती हैं.

इस के अतिरिक्त ‘अनकट क्लिप’ में टौपलैस सीन होने हैं. यह लंबे सैक्स वीडियो का एक हिस्सा होता है. वैसे असल पौर्न की कोई सीमा नहीं होती. सुनैना ने पहली बार जिस सीरीज में काम किया था, उस में ‘बोल्ड’ कंटेंट थे. उस में गले मिलना, किसिंग और स्मूचिंग था, लेकिन कोई नग्नता नहीं थी.

सुनैना ने ओटीटी एप्लिकेशन लौलीपौप की वेब सीरीज ‘चकोर’ में काम किया. इस में उन के टौपलैस दृश्य थे. वह कहती हैं, तीसरे तरह के अनकट में नग्न दृश्य होते हैं. सैक्स होता है, जिसे कई एंगल से फिल्माया जाता है. इस की कोई सीमा नहीं होती है.

प्राइवेट पार्ट दिखाए जाते हैं. उस के साथ छेड़छाड़ से रोमांस की कामुकता जगाई जाती है. यह सब कैमरामैन की योग्यता पर निर्भर करता है कि उसे कितनी कलात्मकता के साथ फिल्माता है.

ब्लू फिल्में देखने वाले यह नहीं जानते हैं कि उस में काम करने वाले महिलाएं और दूसरे लोगों की हकीकत क्या है? उन के साथ पौर्न फिल्मों की शूटिंग शूट करना कितना कठिन होता है?

यह बात सही है कि इन की शूटिंग बेहद गुप्त तरीके से की जाती है. सार्वजनिक जगहों पर एकदम ही नहीं. हां, कुछ फार्महाउस या होटलों के स्विमिंग पूल आदि में फिल्माए जाते हैं, वह भी रात के वक्त.

सब से अहम सवाल लोगों के मन में यह उठता है कि महिला किसी तीसरे व्यक्ति के सामने सैक्स करने में कैसे सहज हो पाती है. कारण कई बार शूट के वक्त 2-3 लोग भी हो सकते हैं और दिमाग में खलबली भी मची रहती है. यानी ऐसी शूटिंग के लिए अहम किरदार निभाने वाले पुरुष और महिला को फिल्म का डायरेक्टर किस तरह सैक्स के लिए सहज बनाता है.

इस तरह की फिल्मों को आउटडोर लोकेशन के बजाय इनडोर शूट ही ज्यादा किए जाते हैं. बजट के हिसाब से जरूरत के मुताबिक सेट तैयार किए जाते हैं.

पोर्न फिल्मों के सेट कुछ खास और रंगीन किस्म के होते हैं. ज्यादातर में एक सजा हुआ बैडरूम होता है. सोफासेट या फिर बाथरूम हो सकता है.

जोड़े को बैड पर भेजने से पहले उसे स्क्रिप्ट दे दी जाती है. उस के मुताबिक वे खुद को तैयार कर लेते हैं. सीन के एंगल समझाए जाते हैं. बिस्तर पर सीन के मुताबिक मूवमेंट बताए जाते हैं.

कैमरा फेस करने के वक्त चेहरे के भाव समझाए जाते हैं. कपल को प्राइवेट पार्ट तक अपने या पार्टनर के हाथों की पहुंच की बारीकियां समझाई जाती हैं.

भींचना, चूमना, सहलाना या फिर उत्तेजित होने का प्रदर्शन करने के क्रम बताए जाते हैं. इन सब के बीच जोड़े को सैक्स के चरमोत्कर्ष और कामुकता का भी ध्यान रखना होता है.

उन्हें इस बात की हिदायत दी जाती है कि उन के शौट ज्यादा नहीं लिए जाएं तो उतना ही अच्छा होगा. फिर भी 2-3 शौट से अधिक लेने ही पड़ते हैं. इस के साथ 3-4 घंटे या एक शिफ्ट की शूटिंग के दौरान उन्हें 3-4 शौर्ट फिल्मों के लिए ऐक्टिंग करनी होती है.

पोर्न फिल्मों में लाइटिंग पर सब से ज्यादा ध्यान दिया जाता है. लाइटिंग से सीन को प्रभावशाली और स्पष्ट बनाया जाता है. यही लाइटिंग जोड़े को सहज होने में बाधक बनती है. फिर भी उन्हें इस की आदत डालनी होती है. यानी तेज रोशनी में सैक्स करना काफी असहजता भरा हो सकता है.

इस तरह पोर्न फिल्मों की शूटिंग करना बहुत तजुरबे का काम माना गया है. पोर्न देखने वाले फिल्मांकन संबंधी तकनीकी बातों पर ध्यान नहीं देते हैं, लेकिन उन की शूटिंग में भी वैसी ही सावधानी बरती जाती है जैसी अन्य फिल्मों में होती है.

इस के अलावा विजुअल इफेक्ट्स के द्वारा सीन को प्रभावशाली बनाया जाता है. शूट करने से पहले जोड़े को एक साथ या फिर अलग पोजीशन में सीन के हर एक एंगल को जांचा जाता.

उसी के मुताबिक शूटिंग के वक्त सीन करने को कहा जाता है. जैसे सीन से पहले ही महिला किरदार गाउन पहन कर या फिर स्क्रिप्ट के मुताबिक ड्रैस की तैयारी करती हैं, जिसे शूट के दौरान डायरेक्टर और कैमरामैन के हिसाब से ढाल लेती हैं.

जोड़े के सामने सब से बड़ी समस्या शूट के समय सेट पर एक से अधिक व्यक्तियों के होने पर आती है. उन के लिए उफनते यौवन के शौट देना आसान नहीं होता. जबकि कैमरामैन लौंग शौट के साथसाथ क्लोज शौट भी फिल्माते हैं.

कई बार सिर्फ फोटो शूट ही किया जाता है, जिस में सिर्फ एक व्यक्ति ही महिला ऐक्टर के साथ मौजूद होता है. वह केवल एक कैमरापर्सन होता है, जो कोई महिला भी हो सकती है.

एडल्ट इंडस्ट्री के डाइरेक्टर के अनुसार पोर्न फिल्म की शूट के दौरान कैमरामैन, मेकअपमैन, लाइटमैन के अलावा करीब एक दरजन लोग वहां मौजूद होते हैं. और उन सभी के सामने ये पूरी फिल्म शूट होती है. इस कारण पोर्न स्टार सभी के सामने से शर्म से भी जूझ रहे होते हैं.

इन एडल्ट स्टार्स को देखते हुए लोगों को लगता है कि उन की जिंदगी मौजमस्ती भरी होगी. साथ में पैसे भी कमाते हैं. ऐशोआराम का जीवन भी है. उन के काम बेहद ही मजेदार हैं. वे सैक्स के मजे उठाने के लिए आजाद हैं. लेकिन यह सच नहीं है. कैमरे के सामने सहमति से सैक्स करने वाली अधिकतर लड़कियों की असली जिंदगी अच्छी नहीं होती है.

कैमरे के सामने अलगअलग लोगों के साथ सैक्स संबंध बनाना उन के लिए अगर शर्म को खत्म करने जैसा है, जबकि उन के मन में अपनी गलत पहचान होने का भी भय बना रहता है.

उन की फिल्में कहीं भी कभी भी किसी परिचित द्वारा देखी जा सकती हैं. उन में उन के परिवार के सदस्य या दोस्त भी हो सकते हैं.

दूसरी समस्या सेहत को ले कर भी बनी रहती है. शूट को जानदार बनाने के लिए उन्हें ड्रग के डोज भी दिए जाते हैं. कामोत्तेजक दवाएं खिलाई जाती हैं. देह को मांसल दिखाने के लिए हारमोन के इंजेक्शन तक लगाए जाते हैं. यहां तक कि नैचुरल सैक्स सीन के लिए कंडोम इस्तेमाल करने नहीं दिया जाता है. कुछ पोर्न स्टार के एचआईवी टेस्ट पौजिटिव आते हैं.

यदि किसी पोर्न स्टार को कोई बीमारी हो या फीमेल स्टार को पीरियड हो तो भी उन को ऐसे में घंटों तक पोज करने होते हैं, जिस में वह असहज होती हैं. बारबार हस्तमैथुन के सीन से वे मानसिक तनाव में आ जाती हैं. चाहे घर में कोई परेशानी हो, या संडे को छुट्टी के दिन भी उन को यह काम लगातार करना होता है. क्योंकि उन्हें काम के हिसाब से पैसे मिलते हैं.

पोर्न फिल्मों की शूटिंग घंटों चलती हैं, इस दौरान इन्हें भूखे भी रहना पड़ता है. शूटिंग में डंटे रहना होता है. इस दौरान समस्या तब खड़ी हो जाती है जब फीमेल पोर्न स्टार को मेल पोर्न स्टार इंप्रैस नहीं कर पाता है. या दोनों के बीच तालमेल नहीं बैठ पाता है. उस दौरान उन्हें सैक्स करने में काफी परेशानी का सामना करना होता है. लगातार फिल्म की शूटिंग करने से उन के अंग भी जख्मी हो जाते हैं.

बहरहाल, एडल्ट फिल्म इंडस्ट्री महिलाओं से बनी है.  इस में महिला किरदार ही असली स्टार होती हैं. उन्हें पैसा भी मर्द ऐक्टर से अधिक मिलता है. हालांकि उन की लाइफ काफी कम साल की होती है. नयापन लाने के लिए इंडस्ट्री में नई लड़कियों की एंट्री होती रहती है और पुरानी छंटती रहती हैं. इस दरम्यान उन्हें कई तरह के अनुभवों से गुजरना पड़ता है और जल्द से जल्द पैसा कमा लेने को बेताब रहती हैं.

इन दिनों इंडियन पोर्न ऐक्टर की भरमार हो गई है. उन में एक हैं 27 साल की स्वाति.  पढ़ीलिखी कानून में स्नातक हैं. पिछले साल लौकडाउन की वजह से साइड इनकम की तलाश करते हुए उन्होंने अपने ही उत्तेजक वीडियो बेचने का मन बना लिया था. खुद को डिजिटल प्लेटफौर्म पर दिखाना शुरू कर दिया था.

यहां से उन्हें हर महीने 5 से 20 डालर तक मिलने लगे थे. इस वेबसाइट पर यूजर कई तरह के कामुक कंटेंट देख सकते हैं और अपनी पसंद के कंटेंट के लिए ‘टिप’ भी देते हैं. यह वेबसाइट सिर्फ सब्सक्राइबर को सेवा देती है. स्वाति ने इसे ही फुलटाइम जौब बना लिया है. इस चक्कर में कोई दूसरा काम नहीं तलाश पाई.

वैसे वह इस काम को ले कर सहज और संतुष्ट हैं. उन के चैनल के सब्सक्राइबर लगातार नए कंटेंट की मांग करते हैं, जो ज्यादातर इंडिया के ही हैं. कुछ एनआरआई भी हैं.

स्वाति भी इसे  मुश्किल और थका देने वाला बताती हैं. वह पोर्न वीडियो के लिए नग्नता और सैक्स गतिविधियों  को असीमित बताती हैं. स्वाति विवादित ओनलीफैंस जैसे एप्लिकेशन की चर्चित स्टार हैं, जिस पर उत्तेजक वीडियो और तसवीरों की भरमार है.

खुदकुशी- भाग 3: सोनी का आखिर क्या दोष था

एक दिन पूजा ने झल्ला कर पूछ डाला, ‘‘क्या समझने की कोशिश करेगी अपने मांबाप से,’’ पूजा ने थप्पड़ उठाया था मारने को पर रुक गई. सोनी सहम गई थी परंतु उस ने कहा, ‘‘पूछूंगी कि तुम्हारे ऊपर वह लड़का क्यों सोया हुआ था और एक भी कपड़ा नहीं था तुम दोनों के बदन पर.’’

पूजा कांप गई थी यह सोच कर कि सोनी अपने मातापिता से अगर ऐसी बातें पूछेगी तो वे लोग फिर हमारे मातापिता से इस संबंध में बात करेंगे. फिर सीमा के मातापिता तक भी बात पहुंचेगी. इतना सब सोच कर पूजा का गुस्सा ठंडा हो गया. उस ने सोनी को समझाया और रेस्तरां ले गई. सोनी को इतना तो समझ में आ गया कि इस तरह के सवाल पूजा से पूछने पर वह उसे होटल या रेस्तरां जरूर ले जाएगी. सोनी के लिए यह वाकेआ एक खेल बनता जा रहा था पर वह नहीं समझ रही थी कि यह खेल कितना खतरनाक हो सकता है. अब सोनी के दिमाग में यह बात आने लगी कि जब पूजा नहीं चाहती कि उस ने जो देखा है, किसी से कहे, तो सीमा और वे लड़के जो उस दिन कमरे में थे, भी नहीं चाहेंगे कि उस ने जो देखा है वह किसी से कहे. इस बात को आजमाने के लिए सोनी कभी सीमा से और कभी उन लड़कों से यही कहती और बदले में रेस्तरां या होटल जाती, बाइक पर घूमती. अनजाने में सोनी ब्लैकमेलिंग का खतरनाक खेल खेलने लगी थी.

पूजा और सीमा अब सोनी की धमकियों से तंग आ चुकी थीं. इस बीच उस दृश्य से भी ज्यादा रोमांचक दृश्यों को अंजाम दे चुकी थीं पूजा और सीमा अनेक कमरों में. फिर उसी एक खास दृश्य का उन लोगों के लिए क्या अर्थ रह जाता था, लेकिन सोनी ने तो सिर्फ एक ही दृश्य देखा था इसलिए वह उसी से चिपकी थी. पूजा से ज्यादा नजदीक थी सोनी, सीमा के साथ बातचीत हुआ करती थी सोनी की पर सीमा पूजा की सहेली थी. पूजा सोचती थी, कोई अन्य इस तरह उसे ब्लैकमेल कर रहा होता तो उसे समझाती पर अपनी सहेली सोनी का वह क्या करे. अपने तथाकथित प्रेमियों से भी इस का जिक्र उस ने किया था और एक दिन वह हादसा हुआ जो उस ने सपने में भी नहीं सोचा था. पूजा ने अपने तथाकथित प्रेमियों से कहा कि वे लोग सोनी को किसी भी तरह से मनवा लें कि वह अब कभी भी इस बात का जिक्र नहीं करेगी परंतु सोनी इस बात को उतनी गंभीरता से नहीं ले रही थी. पूजा को इस बात के लीक होने से डर था कि उसे मिली हुई आजादी छिन जाएगी जो उसे कतई मंजूर नही था. वह स्वच्छंद रहना चाहती थी, साधारण लड़की की तरह जिंदगी जीना उसे पसंद नहीं था. सोनी को पूजा इसलिए एक असाधारण लड़की में तबदील कर देना चाहती थी. बस क्या था पूजा के प्रेमियों ने मतलब यही निकाला कि सोनी को सबक सिखाना है किसी भी कीमत पर.

एक दिन शाम को वह लड़के सोनी को चौकलेटस्नैक्स वगैरा दे कर समझाने की कोशिश करते रहे परंतु सोनी न समझी. उसे समझ में नहीं आया कि जिन लड़कों के साथ वह बाइक पर घूमती है, वे उस को किसी भी तरह से नुकसान पहुंचा सकते हैं. पूजा के प्रेमियों को किसी नासमझ लड़की को सैक्स संबंधों के बारे में समझाने, समाज पर उस का असर, मांबाप पर उस का प्रभाव, को तफसील से समझाने की सलाह तो थी नहीं, उजड्ड गंवार की तरह उन का व्यवहार था. सोनी बारबार यह जानना चाहती थी कि पूजा और सीमा के साथ उन्होंने होटल के बंद कमरे में ऐसा क्या किया कि आज उसे यहां सुनसान जगह पर बुला कर इतना समझायाबुझाया जा रहा है. बहुत मुमकिन था कि अगर पूजा और सीमा उन लड़कों के साथ जो जिस्मानी रिश्ता कायम करती थीं, उसे सोनी को खुल कर समझा दिया जाता तो शायद सोनी को बहुत कुछ खुदबखुद समझ आ जाता और वह इतनी भी नासमझ नहीं थी, आखिर सयानी हो चुकी थी. एक मनोवैज्ञानिक तरीका होना चाहिए सैक्स से अनभिज्ञ ऐसी लड़कियों को समझाने का और खासकर ऐसी स्थिति में तो बहुत ही सावधानी की जरूरत होती है परंतु वे मूढ़मगज लड़के क्या जानें, बस, एक ही भाषा वे जानते थे, शक्ति प्रदर्शन और डराने की भाषा.

इधर सोनी जो उन लोगों से हिलीमिली हुई थी उन लोगों की बात को गंभीरता से नहीं ले रही थी और साथ ही साथ सोनी जैसे यह नहीं समझ पाई थी कि 2 नंगे जिस्म एकदूसरे से लिपटे हुए क्यों थे, उसी तरह यह भी नहीं समझ पाई थी कि उसे भी नंगा किया जा सकता है और पूजा और सीमा के साथ जो वे लड़के करते आ रहे हैं वह उस के साथ भी हो सकता है. इसी तरह वह यह भी नहीं समझ पा रही थी कि सैक्स अगर गहराई तक उतर जाए तो फर्क पड़ता है, लड़के और लड़की दोनों को. लड़कों को बहुत ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी सोनी से, वह तो चूंकि पूजा ने कहा था कि सोनी को सबक सिखा दें इसलिए इतनी मशक्कत की जा रही थी. कितना दर्दनाक रहा होगा वह पल जब एकएक कर लड़के सोनी को सैक्स की गहराई समझाते रहे वह भी वहशियों की तरह. पहले तो सोनी के मुंह को जबरन बंद कर दिया गया. उस के बाद सोनी के जिस्म से एकएक कर कपड़े उतार दिए गए और उसे जमीन पर लिटा कर वीरेंद्र के 2 रंगरूटों ने उस के हाथों और पांवों को पकड़ लिया. अब सोनी बोल नहीं पा रही थी, बोल रही थी सिर्फ उस की आंखें, जो आंसुओं से डबडबाई हुई थीं, पहले वीरेंद्र ने उसे सैक्स की गहराई को समझाया. फिर उस ने सोनी के पैरों को दबोच कर रखा. दूसरे ने भी वही किया और तीसरे ने.

सोनी की आंखें भी बंद हो चुकी थीं, खून से लथपथ जांघों के बीच सोनी ने असहनीय दर्द महसूस किया था और बेहोश हो गई थी, लड़के उस के मुंह की पट्टी खोल कर उसे अकेला छोड़ चले गए थे. लड़के बताए गए रेस्तरां पहुंच गए, जहां पूजा और सीमा उन का इंतजार कर रही थीं. पूजा ने पूछा था कि क्यों इतनी देर हो गई उन लोगों को तो वीरेंद्र ने घमंड से पूजा और सीमा को कहा कि अब सोनी कभी भी उन बातों को नहीं दोहराएगी, उसे सबक सिखा चुके हैं हम. सोनी को जब होश आया तो वह खुद को क्षतविक्षत महसूस कर रही थी. नंगा शरीर, जांघों के बीच से रिसता खून, उसे समझ नहीं आ रहा था कि पूजा और सीमा ने इतनी बड़ी साजिश क्यों की, उस के साथ. क्यों उस के शरीर को लड़कों से नुचवा दिया. सिर घूम रहा था सोनी का, ये सब सोच कर. किसी तरह उस ने पास रखे कपड़े पहने और बहुत आहिस्ताआहिस्ता चलने की कोशिश करने लगी.

प्यार में कंजूसी: क्या थी शुभा की कहानी

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मेरे संबंध मेरी विधवा भाभी से हो गए हैं जो 2 बच्चों की मां भी है, क्या ऐसा करना ठीक रहेगा?

सवाल
मैं 23 साल का बीए फाइनल का छात्र हूं. इस बीच मेरे संबंध मुझ से 7-8 साल बड़ी मेरी विधवा भाभी से हो गए हैं, जो 2 बच्चों की मां है. घर वाले इस बात से खुश नहीं हैं. भाभी पहले बदमिजाज थीं, पर अब वे सुधर गई हैं. क्या ठीक रहेगा?

जवाब
यह किस्सा गलत है, आपको इस तरह के संबंध बनाने से बचना चाहिए. आप अपनी पढ़ाई में ध्यान लगाइये.

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जानिए आखिर महिलाएं सेक्स क्यों करती हैं

महिलाएं किसी पुरुष को आखिर क्‍यों पसंद करती हैं? और ऐसी कौन सी खास बात है जिससे प्रभावित होकर वह किसी पुरुष के साथ सेक्‍सुअल संबंध बनाने के लिए अपने आप को राजी करती हैं? इस तथ्‍य पर रिसर्च करने के बाद टैक्‍सास विवि के मनोविज्ञान विभाग के प्रोफेसर्स सिंडी मेस्टन और डेविड बस ने एक किताब लिखी है. इस किताब का नाम है वौय वुमन हैव सेक्‍स. किताब सेक्‍स संबंधों को लेकर महिलाएं क्‍या सोचती हैं? इस सवाल पर कई रोचक खुलासे करती है, किताब में इस बात के 200 कारण बताए गए है, जिनके चलते महिलाएं किसी पुरुष के साथ सेक्‍सुअल संबंध बनाती हैं या उसे पसंद करती हैं.

टेक्सस यूनिवर्सिटी में साइकौलजी के प्रोफेसर्स सिंडी मेस्टन और डेविड बस की लिखी किताब – वाय वुमेन हेव सेक्स ( महिलाएं सेक्स क्यों करती हैं ) में करीब 200 कारणों को बताया गया है.

रिसर्च के दौरान देखा गया कि ज्यादातर पुरुषों को महिलाएं सेक्सुअली अट्रैक्टिव लगती हैं , जबकि महिलाओं को पुरुषों में ऐसी कोई बात नज़र नहीं आती. रिसर्च के दौरान 1000 महिलाओं का इंटरव्यू किया , जिसमें महिलाओं ने पुरुषों के साथ सोने के अपने कारण बताए.

एक महिला ने बताया – वह सेक्स इसलिए करती है ताकि बोरियत दूर कर सके क्योंकि सेक्स करना लड़ने से कहीं आसान है. जबकि कुछ दूसरी महिलाओं के लिए यह माइग्रेन और सिरदर्द दूर भगाने का उपचार है.

रिसर्च में कुछ महिलाओं ने ऐसी बातें भी कहीं जिन्हें सुनकर हैरानी हो सकती है. कुछ महिलाएं महज दया की वजह से पुरुषों के साथ सोती हैं जबकि कुछ महिलाएं अपने स्वार्थ के लिए सेक्स का इस्तेमाल करती हैं जैसे रुपये – पैसों के लिए और दूसरी कीमतों चीजों को हासिल करने के लिए.

कुछ ने कहा – मैंने किसी पुरुष के साथ इसलिए संबंध बनाए क्योंकि उसने मेरे लिए एक शानदार डिनर का आयोजन किया या उसने मुझ पर काफी रुपये खर्च किए.

यूनिवर्सिटी के विद्यार्थियों पर किए गए इस सर्वे में 10 में से 6 ने माना कि वह आमतौर पर ऐसे पुरुष के साथ सो चुकी हैं जो उनका बौयफ्रेंड नहीं हैं. कुछ ने कहा – वह सेक्स इसलिए करती हैं ताकि अपनी सेक्सुअल परफौर्मंस को इंप्रूव कर सकें. यही बताते हुए एक विद्यार्थी ने कहा – मैंने अपने बौयफ्रेंड के साथ इसलिए सेक्स किया ताकि मैं अपने सेक्सुअल स्किल्स को और बेहतर बना सकूं.

इस रिसर्च में यह भी पता चला कि महिलाएं ऐसे पुरुषों पर ज्यादा आकर्षित होती हैं जो लंबे हों, जिनकी आवाज़ रौबदार हो और जिनके शरीर से मदहोश कर देने वाली महक आती हो.

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