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गहरी पैठ

अच्छे दिनों की तरह प्रधानमंत्री का एक और वादा आखिर टूट ही गया. 24 मार्च, 2020 को उन्होंने वादा किया था कि लौकडाउन के 21 दिनों में वे कोरोना वायरस को हरा देंगे और महाभारत को याद दिलाते हुए कहा था कि 18 दिन के युद्ध की तरह कोरोना की लड़ाई भी जीती जाएगी.

अंधभक्तों ने यह बात उसी तरह मान ली थी जैसे उन्होंने नोटबंदी, जीएसटी, धारा 370 से कश्मीर में बदलाव, राष्ट्रभक्ति, 3 तलाक के कानून में बदलाव, नागरिक कानून में बदलाव मान लिया था. महाभारत के युद्ध की चाहे जितनी वाहवाही कर लो असलियत तो यही?है न कि युद्ध के बाद पांडवों की पूरी जमात में सिर्फ 5 पांडव और कृष्ण बचे थे, बाकी सब तो मारे गए थे.

पिछले 6 सालों से हम हर युद्ध में खुद को मरता देख रहे हैं. कोरोना के युद्ध में भी अब 15 लाख से ज्यादा मरीज हो चुके हैं और 35,000 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं. कहां है महाभारत का सा वादा?

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कोरोना की लड़ाई में हम उसी तरह हारे हैं जैसे दूसरी झड़पों में हारे. नोटबंदी के बाद करोड़ों देशवासियों को कतारों में खड़ा होना पड़ा पर काला धन वहीं का वहीं है. जीएसटी के बाद भी न तो सरकार को टैक्स ज्यादा मिला, न नकद लेनदेन बंद हुआ.

कश्मीर में धारा 370 को बदलने के बाद पूरा कश्मीर जेल की तरह बंद है. जो लोग वहां प्लौट खरीदने की आस लगा रहे थे या वादा जगा रहे थे अब भी मुंह छिपा नहीं रहे क्योंकि जो लोग रोज झूठे वादे करते हैं उन्हें वादों के झूठ के पकड़े जाने पर कोई गिला नहीं होता.

कोरोना के बारे में हमारी सरकार ने पहले जो भी कहा था वह इस भरोसे पर था कि हम तो महान हैं, विश्वगुरु हैं. हमें तो भगवान की कृपा मिली है. पर कोरोना हो या कोई और आफत वह धर्म और पूजा नहीं देखती. उलटे जो धर्म में भरोसा रखता है वह कमजोर हो जाता है. वह तैयारी नहीं करता. हम ने सतही तैयारी की थी.

हमारा देश अमेरिका और ब्राजील की तरह निकला जहां भगवान पर भरोसा करने वाले बहुत हैं. दोनों जगह पूजापाठ हुए. अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के कट्टर समर्थक गौडगौड करते फिरते हैं. कई महीनों तक ट्रंप ने मास्क नहीं पहना. नरेंद्र मोदी भी मास्क न पहन कर अंगोछा पहने रहे जो उतना ही कारगर है जितना मास्क, इस पर संदेह है. देश की बड़ी जनता उन की देखादेखी मास्क की जगह टेढ़ासीधा कपड़ा बांधे घूम रही है.

इस देश में बकबकिए भी बहुत हैं. यहां बोले बिना चैन नहीं पड़ता और बोलने वाले को सांस लेने के लिए मास्क या अंगोछा टेढ़ा करना पड़ता है. यह अनुशासन को ढीला कर रहा है. नतीजा है 15 लाख लोग चपेट में आ चुके हैं और 5 लाख अभी भी अस्पतालों में हैं. जहां साफसफाई हो ही नहीं सकती क्योंकि साफसफाई करने वाले जिन घरों में गायों के दड़बों में रहते हैं वहां गंद और बदबू हर समय पसरी रहती है.

कोरोना की वजह से गरीबों की नौकरियां चली गईं. करोड़ों को अपने गांवों को लौटना पड़ा. जमापूंजी लौटने में ही खर्च हो गई. अब वे सरकारी खैरात पर जैसेतैसे जी रहे हैं. यह जीत नहीं हार है पर हमेशा की तरह हम घरघर पर भी जीत का सा जश्न मनाएंगे जैसे महाभारत पढ़ कर या रामायण पढ़ कर मनाते हैं.

देश में नौकरियों का अकाल बड़े दिनों तक बना रहेगा. पहले भी सरकारी फैसलों की वजह से देश के कारखाने ढीलेढाले हो रहे थे और कई तरह के काम नुकसान के कगार पर थे, अब कोरोना के लौकडाउनों की वजह से बिलकुल ही सफाया होने वाला है. रैस्टोरैंटों का काम एक ऐसा काम था जिस में लाखों नए नौजवानों को रोजगार मिल जाता था. इस में ज्यादा हुनर की जरूरत नहीं होती. गांव से आए लोगों को सफाई, बरतन धोने जैसा काम मिल जाता है. दिल्ली में अकेले 1,600 रैस्टोरैंट तो लाइसैंस वाले थे जो अब बंद हैं और उन में काम करने वाले घर लौट चुके हैं. थोड़े से रैस्टोरैंटों ने ही अपना लाइसैंस बनवाया है क्योंकि उन्हें नहीं मालूम कि कब तक बंदिशें जारी रहेंगी.

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ऐसा नहीं है कि लोग अपनी एहतियात की वजह से रैस्टोरैंटों में नहीं जाना चाहते. लाखों तो खाने के लिए इन पर ही भरोसा रखते हैं. ये सस्ता और महंगा दोनों तरह का खाना देते हैं. जो अकेले रहते हैं उन के लिए अपना खाना खुद बनाना एक मुश्किल काम है. अब सरकारी हठधर्मी की वजह से न काम करने वाले को नौकरी मिल रही है, न खाना खाने वाले को खाना मिल रहा है. यह हाल पूरे देश में है. मकान बनाने का काम भी रुक गया. दर्जियों का काम बंद हो गया क्योंकि सिलेसिलाए कपड़ों की बिक्री कम हो गई. ब्यूटीपार्लर बंद हैं, जहां लाखों लड़कियों को काम मिला हुआ था. अमीर घरों में काम करने वाली नौकरानियों का काम खत्म हो गया.

बसअड्डे बंद हैं. लोकल ट्रेनें बंद हैं. मैट्रो ट्रेनें बंद हैं. इन के इर्दगिर्द सामान बेचने वालों की दुकानें भी बंद हैं और इन में वे लोेग काम पा जाते हैं जिन के पास खास हुनर नहीं होता था. ये सब बीमार नहीं बेकार हो गए हैं और गांवों में अब जैसेतैसे टाइम बिता रहे हैं.

दिक्कत यह है कि नरेंद्र मोदी से ले कर पास के सरकारी दफ्तर के चपरासी तक सब की सोच है कि अपनी सुध लो. नेताओं को कुरसियों की पड़ी है, चपरासियों को ऊपरी कमाई की. ये जनता के फायदेनुकसान को अपने फायदेनुकसान से आंकते हैं. ये सब अच्छे घरों में पैदा हुए और सरकारी दया पर फलफूल कर मनमानी करने के आदी हो चुके हैं. इन्हें आम जनता के दुखदर्द का जरा सा भी खयाल नहीं है. ये गरीबों की सुध लेने को तैयार नहीं हैं. इन के फैसले बकबक करने वाले होते हैं, नारों की तरह होते हैं और 100 में से 95 खराब और गलत होते हैं. अगर देश चल रहा है तो उन लोगों की वजह से जो सरकार की परवाह किए बिना काम किए जा रहे हैं, जो कानून नहीं मानते, जो सड़कों पर घर बना सकते हैं, सड़कों पर व्यापार कर सकते हैं.

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आज अगर भुखमरी नहीं है तो उन किसानों की वजह से जो बिना सरकार के सहारे काम कर रहे हैं. उन कारीगरों की वजह से जो छोटेमोटे कारखानों में काम कर रहे हैं. आज देश गरीबों की मेहनत पर चल रहा है, अमीरों की सूझबूझ और सरकार के फैसलों पर नहीं.

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अगर लद्दाख की सीमा पर शांति हो जाती है तो यह बहुत ज्यादा राहत की बात होगी. चीन और भारत का असली सीमा का जो भी दावा है, वह लड़ाई से तय हो ही नहीं सकता तो उस बारे में लड़ने से फायदा क्या है? अब भारत और चीन फिलहाल अपनीअपनी जगह से 1.8 किलोमीटर पीछे हटने को तैयार हो गए हैं और अपने इलाकों में कम सैनिक रखने को भी राजी हो गए हैं ताकि 6 जून वाली झड़प फिर से नहीं हो जाए.

सीमा पर आज इसी इलाके में दोनों ने 25,000 के करीब सैनिक तैनात कर रखे हैं और दोनों ने टैंकों, तोपों, हवाईजहाजों को तैयार कर रखा है. जरा सी चिनगारी से पूरी तरह आग भड़क सकती है. सीमा पर तैनात सेनाओं के कमांडरों की आपसी सहमति से यह तय हुआ है कि दोनों के सैनिक बेबात आपस में न उलझें.

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चीन के लिए यह युद्ध इतना महंगा नहीं है क्योंकि जो भी टैंक, तोपें, हवाईजहाज चीन ने सीमा पर लगाए हैं ज्यादातर उस के अपने बनाए हैं. भारत को हर चीज खरीदनी पड़ रही है. हमें तो बुलैटप्रूफ जैकेट भी खरीदनी पड़ती है और उन पर मोटा मुनाफा विदेशी सैनिक सामान बनाने वाले कमाते हैं. हमारी हालत ऐसी नहीं है कि हम मनचाहा पैसा सैनिक विवाद में हंस कर खर्च कर सकें. कुरबानी देने को देश की तैयारी है पर बेमतलब की झड़पों की वजह से करोड़ोंअरबों खर्च करना सही नहीं होगा.

यह अफसोस की बात है कि हम जिस चीन को मनाने में इतनी कोशिश कर रहे थे, कभी चीनी राष्ट्रपति को झूला झुलाने तो कभी प्राचीन धरोहरों की सैर कराने की कवायद हुई, उस चीन ने हमारी एक न सुनी और अपने सैनिकों को सीमा पर जमा ही नहीं कर दिया बल्कि उन्हें उस जमीन पर भेज दिया जो हम कहते हैं हमारी ही है.

अब हमें भी बराबरी की तैयारी करने में लगना पड़ रहा है. देशभर के गरम इलाकों के आदी सैनिक इस बार पूरी सर्दी कंपकंपाती, खून जमा देने वाली बर्फ में बिताएंगे, यह पक्का है. हिमालय की चोटियों पर देश की रक्षा बहुत जोखिम का काम है और जानलेवा है. रूस की सर्दी ने उसे कई बार अपने दुश्मनों से बचाया था. नेपोलियन और हिटलर ने रूस पर हमला किया था और उसे हरा सा दिया था कि सर्दी आ गई जिस में फ्रांस और जरमनी के सैनिक जम गए. अगले 5-6 महीने हिमालय के इन इलाकों को बर्फ से ढक कर रखेंगे और हमारे गरमी के आदी जवान चीनी दुश्मन के साथ बर्फ के दुश्मन से भी लड़ेंगे. इस समय यह समझौता जो कमांडरों ने किया है और आज जहां हैं वहां से पीछे जाना मंजूर किया है, एक तरह से अच्छा है. पर दूसरी नजर में यह भारत के लिए सही नहीं साबित होगा क्योंकि अब एक नई लाइन औफ एक्चुअल कंट्रोल बन गई है जो चीनी मनसूबों पर बनी है.

गनीमत यही है कि देश में होहल्ला नहीं मचाया जा रहा है क्योंकि सारा देश तो कोविड 19 से ज्यादा परेशान है. सीमा पर सहीगलत कदम उठाने की छूट तो एक जने को दे रखी है.

कोरोना के कारण हुए लौकडाउन ने गरीबों की सवारी साइकिल को एक नई जान दी है. दिल्ली में साइकिल की बिक्री बढ़ती नजर आ रही है. यह कुछ दिन का फैशन है या लंबे समय तक चलेगा, अभी पता नहीं है, पर लोगों और शहरों, गांवों की सेहत के लिए अच्छा है.

कोरोना के डर से शासन ने पब्लिक वाहनों पर सवारियों को आधा या एकतिहाई कर दिया है. लोग खुद भी अब भरे हुए वाहन में सटसट कर बैठने से कतरा रहे हैं. ऐसे में 2-3 किलोमीटर का सफर या तो बाइक पर करो या साइकिल पर. साइकिल ज्यादा अच्छी है क्योंकि बाइक का खर्च पैट्रोल के दाम बढ़ने से और ज्यादा भी हो गया है और उसे पार्क करने की जगह भी नहीं मिलती.

साइकिल का चलन गरीब और अमीर की बराबरी का एक बढि़या कदम है. हमारे देश में हर कोशिश की जाती है कि किसी तरह ऊंचेनीचे का भेदभाव बना रहे. जब गरीब लोग पैदल चलने को ही मजबूर थे, जब साहब लोग ठाठ से साइकिल पर सिर ऊंचा कर चलते थे. तब घोड़ों की जगह साइकिलों ने ली थी. फिर साइकिलें बहुत लोग खरीदने लगे तो ऊंचे लोगों ने बसें या मोटरकार अपना लीं. बाद में स्कूटर आ गए तो साइकिल और मोटरकार के बीच वालों की मौज आ गई. तब मिलने वाली मोटरसाइकिलों से स्कूटर काफी अच्छे थे.

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अब साइकिल का फिर चलन दिल्ली, मुंबई, कोलकाता जैसे शहरों में बढ़ जाए तो बड़ी खुशी होगी. अगर साइकिलों पर फैसले लेने वाले चलेंगे तो सड़कें भी ठीक होंगी, पेड़ भी लगेंगे, पानी का इंतजाम भी होगा. साइकिलों में भी नईनई तकनीक आएगी. दुनियाभर में साइकिल किराए पर देने जाने वाली बड़ी कंपनियां भी बनी हैं पर ज्यादातर दिवालिया हो गई हैं फिर भी नए तरीकों से नई कंपनियां आ रही हैं. अब कोशिश यह है कि आप साइकिल खरीदें नहीं, किराए की साइकिल एक जगह लें दूसरी जगह छोड़ दें, टैक्सी की तरह चालक बिना वाहन.

दिल्ली में भी इस के प्रयोग हो रहे हैं पर नाक ऊंची रखने वाले दिल्ली वाले अब तक तो उसे अपना नहीं पाए हैं. कोरोना की मार शायद दिल्ली वालों को सुधार दे.

साइकिलों का फायदा है कि इन्हें दूसरीतीसरी मंजिलों पर भी लिफ्टों से ले जाया जा सकता है. यूरोप में कई होटलों तक ने साइकिल स्टैंड कार पार्किंग में बना रखे हैं. गरीबअमीर में बराबरी की निशानी इस से ज्यादा क्या होगी.

सरकार को चाहिए कि साइकिल को बढ़ावा देने के लिए इस पर सारे टैक्स माफ कर दे. यह सामाजिक बराबरी के लिए भी जरूरी है, आबोहवा बचाने के लिए भी. बोनस में साइकिल पर चलने वाले ज्यादा तंदुरुस्त रहते हैं. साइकिल सिर्फ सवारी हो, अमीर या गरीब की नहीं.

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मोबाइल रिपेयर शौप खुली रखने पर खड़े हुए झगड़े में तमिलनाडु के थूथुकुड़ी शहर के एक थाने में 2 जनों, बापबेटे दुकानदारों, की पुलिस थाने में बेहद पिटाई की गई. उन्हें लिटा कर उन के घुटनों पर लाठियां मारी गईं. उन के गुदा स्थल में डंडा डाल दिया गया. उन को घंटों पीटा गया और पुलिस वालों ने बारीबारी कर के पीटा. पुलिस को अपनी हरकतों पर इतना भरोसा था कि अगले दिन उन की झलक भर दिखा कर मजिस्ट्रेट से रिमांड ले कर फिर पीटा गया और उस दिन दोनों की पुलिस कस्टडी में मौत हो गई.

पुलिस अत्याचार इस देश में तो क्या दुनियाभर में कहीं भी नई बात नहीं है. अमेरिका आजकल मिनियापोलिस नाम के शहर में 20 डौलर के विवाद में फंसे एक काले युवक की गोरे पुलिसमैन के घुटनों के नीचे गरदन दबाने से हुई मौत पर उबल रहा है. हमारे यहां भी पुलिस का वहशीपन वैसा ही है जैसा तानाशाही देशों में या पुलिस को ज्यादा भाव देने वाले देशों में होता है. पुलिस में भरती होने के बाद जो पहला पाठ पढ़ाया जाता है वह बेदर्दी से पीटने का है और उस में न बच्चों को छोड़ा जाता है, न बूढ़ों को और न औरतों को.

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हमारे यहां सोशल मीडिया में तमिलनाडु से बढ़ कर वहशीपन के साथ सड़कों पर हो रही पुलिस के हाथों पिटाई के वीडियो भरे हैं पर कहीं किसी पुलिस वाले के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया जाता. सरकार ही नहीं अदालतें भी पुलिस वालों से डरती हैं और उन्हें खुली छूट देती रहती हैं.

जो बरताव अमेरिका में गोरे पुलिस वाले कालों से करते हैं वैसा ही हमारे यहां ऊंची जातियों के पुलिस वाले निचली जातियों के साथ करते हैं. हर देश का कानून पुलिस के हाथ बांधता है पर लगभग हर देश में चलती है पुलिस की मनमानी ही. पुलिस गरीब या कमजोर को ही नहीं बुरी तरह मारतीपीटती है, वह अपने खिलाफ खड़े हुए किसी के साथ भी बहुत बुरी तरह पेश आ सकती है. थूथुकुड़ी शहर में बापबेटे ने पुलिस वालों पर कुछ कमैंट कस दिया था जिस का बदला लेने के लिए नाडर जाति के इन दुकानदारों को सही सबक सिखाने के लिए पुलिस ने उन की हड्डीपसली इस तरह तोड़ी कि उन की जान ही चली गई.

2019 में कम से कम 1,731 लोग तो पुलिस हिरासत में पिटाई की वजह से मौत के घाट उतारे गए थे. ज्यादा से ज्यादा पुलिस वालों को सस्पैंड किया जाता है या ट्रांसफर किया जाता है. आम जनता आमतौर पर हर देश में पुलिस के वहशीपन पर चुप रहती है कि यही पुलिस उस की सुरक्षा की गारंटी है और यही तरीका है किसी से अपराध उगलवाने का. वैसे भी आम जनता भी अपने झगड़े मारपीट से निबटाने की कला जानती है. बचपन में ही मांबाप पिटाई का सहारा लेने लगते हैं. गलियों में खेल के दौरान और स्कूलों में डीलडौल वालों को धमका कर मारपीट कर के अपनी चलाने की क्लासें लगा दी जाती हैं. घरों में मारपीट आम है, चाहे उस में पुलिस वाला वहशीपन न हो.

पुलिस के वहशीपन के खिलाफ आवाज बड़ी दबी हुई सी उठती है क्योंकि आम जनता और पुलिस के बीच खड़ी अदालतों का रुख पुलिस वालों के बारे में हमेशा नरम ही रहा?है. जमानत तक आमतौर पर आसानी से नहीं मिलती. समाज ने अपने बचाव के लिए पुलिस बनाई थी, पर असल में यह केवल सत्ता को बचाने और खुद को बनाए रखने का काम करती है. इस से छुटकारा मिलना नामुमकिन है.

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चीन के साथ अब चाहे पूरी तरह लड़ाई न हो, झड़पें जरूर होती रहेंगी. हमारी सेना को 24 घंटे मुस्तैदी से बर्फीले तूफानों वाली सीमा पर लगे रहना होगा, जहां पहुंचना भी मुश्किल है और एक रात काटना भी. यह देश के बहादुर जवानों की बदौलत है कि आज देश चीन के साथ आंख से आंख मिला रहा है और हालात कतई 1962 वाले नहीं हैं जब माओ त्से तुंग की भेजी फौजों ने बड़े इलाके पर कब्जा कर लिया था.

तब से अब तक सरकारों ने लगातार चीन से अपनी सुरक्षा की तैयारी की है. ऊंचे पहाड़ों में सड़कें बनाई गई हैं, पुल बने हैं, सुरंगें बनी हैं, हवाई पट्टियां बनी हैं, बैरकें बनी हैं. दिल्ली में बैठे नेता चीन को मनाने में भी लगे रहे कि वह कभी कोई गलत हरकत न करे और लगातार बदलती राजनीति के बावजूद पिछले 2-3 साल से पहले कभी ज्यादा कुछ नहीं हुआ.

चीन का कहना है कि वह कश्मीर के कानूनी ढांचे में संविधान के अनुच्छेद 370 के बदलाव से चिंतित है. उस का यह भी कहना है कि भारतीय फौजों ने कोविड 19 की आड़ में कुछ ज्यादा करना चाहा, पर हकीकत है कि भारत अपनी ही जमीन पर था. हालांकि दूसरे बड़े दलों के साथ हुई एक बैठक में प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत की जमीन पर कोई घुसपैठ नहीं हुई है, पर यह भी सही नहीं लगता. सैटेलाइट पिक्चरों से साफ है कि जो जमीन अब तक हम अपनी कहते रहे हैं वह शायद हमारे कब्जे में नहीं है. मामला इतना जरूर है कि अब यह ठंडा पड़ने वाला मसला नहीं है.

लड़ाई हमेशा महंगी होती?है. जानें भी जाती हैं, पैसा भी जाता है. हमारे 20 जवान अपनी जान खो चुके हैं, कितने ही घायल हैं. हमें तुरंत सारी दुनिया से फौजी सामान खरीदना पड़ रहा है. चीन से घरेलू सामान, जो सस्ता होता था, अब नहीं आ सकेगा. बहुत सी मशीनें नहीं आ पाएंगी. दवाओं की भारी कमी हो जाएगी.

अगर भारत और चीन के नेता समझदारी से काम लेते तो 260 करोड़ जनता इस बेकार के झगड़े से बच सकती थी. चीन की 130 करोड़ जनता का तो मालूम नहीं, पर हमारी 130 करोड़ जनता को देश की सरहद को बचाने के लिए कुरबानी को तैयार रहना होगा.

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जो 20 जवान अभी शहीद हुए हैं, वे बिहार रैजिमैंट के हैं और उन्होंने चाहे जान दी पर बहादुरी से मुकाबला करा. उम्मीद की जाए कि बिहार रैजिमैंट और देश की कुरबानियों को देश के नेता चुनावों के लिए या जनता का ध्यान भटकाने का जरीया नहीं बनाएंगे. पूरा देश आज सेना के साथ है पर देश के कुरसी पर बैठे नेता देश की सोच रहे हैं, यह भी पक्का होना चाहिए. जिस तरह से इन नेताओं ने बिहार और उत्तर प्रदेश के मजदूरों से लौकडाउन के दौरान बरताव किया है, उस से तो कुछ और ही नजर आता है. नेता राजधानियों में मौज करते रहे, अपनी कोठियों में दुबके रहे और मजदूर भूखेप्यासे दरदर भटकते रहे. यही हाल चीन से 2-2 हाथ में न हो.

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देशभर से करोड़ों मजदूर जो दूसरे शहरों में काम कर रहे थे कोरोना की वजह से पैदल, बसों, ट्रकों, ट्रैक्टरों, साइकिलों, ट्रेनों में सैकड़ों से हजारों किलोमीटर चल कर अपने घर पहुंचे हैं. इन में ज्यादातर बीसीएससी हैं जो इस समाज में धर्म की वजह से हमेशा दुत्कारेफटकारे जाते रहे हैं. इस देश की ऊंची जातियां इन्हीं के बल पर चलती हैं. इस का नमूना इन के लौटने के तुरंत बाद दिखने लगा, जब कुछ लोग बसों को भेज कर इन्हें वापस बुलाने लगे और लौटने पर हार से स्वागत करते दिखे.

देश का बीसीएससी समाज जाति व्यवस्था का शिकार रहा है. बारबार उन्हें समझाया गया है कि वे पिछले जन्मों के पापों की वजह से नीची जाति में पैदा हुए हैं और अगर ऊंचों की सेवा करेंगे तो उन्हें अगले जन्म में फल मिलेगा. ऊंची जातियां जो धर्म के पाखंड को मानने का नाटक करती हैं उस का मतलब सिर्फ यह समझाना होता है कि देखो हम तो ऊंचे जन्म में पैदा हो कर भगवान का पूजापाठ कर सकते हैं और इसीलिए सुख पा रहे हैं.

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अब कोरोना ने बताया है कि यह सेवा भी न भगवान की दी हुई है, न जाति का सुख. यह तो धार्मिक चालबाजी है. ऐसा ही यूएन व अमेरिका के गोरों ने किया था. उन्होंने बाइबिल का सहारा ले कर गुलामों को मन से गोरों का हुक्म मानने को तैयार कर लिया था. जैसे हमारे बीसीएससी अपने गांव तक नहीं छोड़ सकते थे वैसे ही काले भी यूरोप, अमेरिका में बिना मालिक के अकेले नहीं घूम सकते थे. अगर अमेरिका में कालों पर और भारत में बीसीएससी पर आज भी जुल्म ढाए जाते हैं तो इस तरह के बिना लिखे कानूनों की वजह से. हमारे देश की पुलिस इन के साथ उसी वहशीपन के साथ बरताव करती है जैसी अमेरिका की गोरी पुलिस कालों के साथ करती है.

कोरोना ने मौका दिया है कि ऊंची जातियों को अपने काम खुद करने का पूरा एहसास हो. आज बहुत से वे काम जो पहले बीसीएससी ही करते थे, ऊंची जातियां कर रही हैं. अगर बीसीएससी अपने काम का सही मुआवजा और समाज में सही इज्जत और बराबरी चाहते हैं तो उन्हें कोरोना के मौके को हाथ से नहीं निकलने देना चाहिए.

कोरोना की वजह से आज करोड़ों थोड़ा पढ़ेलिखे, थोड़ा हुनर वाले लोग, थोड़ी शहरी समझ वाले बीसीएससी लोग गांवों में पहुंच गए हैं. ये चाहें तो गांवों में सदियों से चल रहे भेदभाव के बरताव को खत्म कर सकते हैं. इस के लिए किसी जुलूस, नारों की जरूरत नहीं. इस के लिए बस जो सही है वही मांगने की जरूरत है. इस के लिए उन्हें उतना ही समझदार होना होगा जितना वे तब होते हैं जब बाजार में कुछ सामान खरीदते या बेचते हैं. उन्हें बस यह तय करना होगा कि वे हांके न जाएं, न ऊंची जातियों के नाम पर, न धर्म के नाम पर, न पूजापाठ के नाम पर, न ‘हम एक हैं’ के नारों के नाम पर.

आज कोई भी देश तभी असल में आगे बढ़ सकता है जब सब को अपने हक मिलें. सरकार ने अपनी मंशा दिखा दी है. यह सरकार खासतौर पर दिल्ली, उत्तर प्रदेश और बिहार व केंद्र की सरकार इन मजदूरों को गाय से भी कम समझती हैं. इतनी गाएं अगर इधर से उधर जातीं तो ये सरकारें रास्ते में खाना खिलातीं, पानी देतीं. मजदूरों को तो इन्होंने टिड्डी दल समझा जिन पर डंडे बरसाए जा सकते हैं. विषैला कैमिकल डाला जा सकता है.

जैसे देश के मुसलमानों को कई बार भगवा अंधभक्त पाकिस्तानी, बंगलादेशी कह कर भलाबुरा कहते हैं, डर है कि कल को नेपाली से दिखने वालों को भी भक्त गालियां बकने लगें. हमारे भक्तों को गालियां कहना पहले ही दिन से सिखा दिया जाता है. कोई लंगड़ा है, कोई चिकना है, कोई लूला है, कोई काला है, कोई भूरा है. हमारे अंधभक्तों की बोली जो अब तक गलियों और चौराहों तक ही रहती थी, अब सोशल मीडिया की वजह से मोबाइलों के जरीए घरघर पहुंचने लगी है.

सदियों से नेपाल के लोग भारतीय समाज का हिस्सा रहे हैं. उस का अलग राजा होते हुए भी नेपाल एक तरह से भारत का हिस्सा था, बस शासन दूसरे के हाथ में था जिस पर दिल्ली का लंबाचौड़ा कंट्रोल न था. अभी हाल तक भारतीय नागरिक नेपाल ऐसे ही घूमनेफिरने जा सकते थे. आतंकवाद की वजह से कुछ रोकटोक हुई थी.

अब नरेंद्र मोदी सरकार जो हरेक को नाराज करने में महारत हासिल कर चुकी है, नेपाल से भी झगड़ने लगी है. नेपाल ने बदले में भारत के कुछ इलाके को नेपाली बता कर एक नक्शा जारी कर दिया है. इन में कालापानी, लिपुलेख और लिंपियाधुरा शामिल हैं जो हमारे उत्तराखंड में हैं.

नेपाल चीन की शह पर कर रहा है, यह साफ दिखता है, पर यह तो हमारी सरकार का काम था, न कि वह नेपाल की सरकार को मना कर रखती. नेपाल की कम्यूनिस्ट पार्टी हमारी भारतीय जनता पार्टी की तरह अपनी संसद का इस्तेमाल दूसरे देशों को नीचा दिखाने के लिए कर रही है.

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दिल्ली और काठमांडू लड़तेभिड़ते रहें, फर्क नहीं पड़ता, पर डर यह है कि सरकार की जान तो उस की भक्त मंडली में है जो न जाने किस दिन नेपाली बोलने वालों या उस जैसे दिखने वालों के खिलाफ मोरचा खोल ले. ये कभी पाकिस्तान के नाम पर मुसलमानों के खिलाफ भड़काऊ बातें करते रहते हैं, कभी उत्तरपूर्व के लोगों को चिंकी कह कर चिढ़ाते हैं, कभी कश्मीरियों को अपनी जायदाद बताने लगते हैं, कभी पत्रकारों के पीछे अपने कपड़े उतार कर पड़ जाते हैं. ये नेपाली लोगों को बैरी मान लें तो बड़ी बात नहीं.

आज देश में बदले का राज चल रहा है. बदला लेने के लिए सरकार भी तैयार है, आम भक्त भी और बदला गुनाहगार से लिया जाए, यह जरूरी नहीं. कश्मीरी आतंकवादी जम्मू में बम फोड़ेंगे तो भक्त दिल्ली में कश्मीरी की दुकान जला सकते हैं. चीन की बीजिंग सरकार लद्दाख में घुसेगी तो चीन की फैक्टरी में बने सामान को बेचने वाली दुकान पर हमला कर सकते हैं.

इन पर न मुकदमे चलते हैं, न ये गिरफ्तार होते हैं. उलटे इन भक्त शैतानी वीरों को पुलिस वाले बचाव के लिए दे दिए जाते हैं. कल यही सब एक और तरह के लोगों के साथ होने लगे तो मुंह न खोलें कि यह क्या हो रहा है!

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अपने घर को अपनों ने गिराया है. इस देश की आज जो हालत कोरोना की वजह से हो रही है उस के लिए हमारी सरकार ही नहीं, वे लोग भी जिम्मेदार हैं जिन्होंने धर्म और जाति को देश की पहली जरूरत समझा और फैसले उसी पर लेने के लिए उकसाया. आज अगर कोरोना के कारण पूरे देश में बेकारी फैल रही है तो इस की जड़ों में ?वे फैसले हैं जो सरकार ने नोटबंदी और जीएसटी के लिए ही नहीं, बहुत तरीके से छोटेछोटे फैसले भी लिए जिन में धर्म के हुक्म सब से ऊपर थे.

लोगों ने 2014 में अगर सत्ता पलटी तो यह सोच कर कि जो हिंदू की बात करेगा वही राज करेगा तो ही देश सोने की चिडि़या बनेगा. यह देश सोने की चिडि़या केवल तब था जब देश पर कट्टरपंथी हिंदू राज ही नहीं कर रहे थे. 1947 से पहले देश में अंगरेजों का राज था. उस से पहले मुगलों का था. उस से पहले शकों, हूणों, बौद्धों का राज था. हां, घरों पर राज हिंदू सोचसमझ का था और वही देश को आगे बढ़ने से रोकता रहा. 2014 में सोचा गया था कि हिंदू राज मनमाफिक होगा, पर इस ने न केवल सारे मुसलमानों को कठघरे में खड़ा कर दिया, दलित, पिछड़े, औरतें चाहे सवर्णों की क्यों न हों, कमजोर कर दिए गए.

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कोरोना ने तो न सिर्फ जख्मों पर लात मारी है, उन को इस तरह खोल दिया है कि आज सारा देश लहूलुहान है. करीब 6 करोड़ मजदूर शहरों से गांवों की ओर जाने लगे हैं. जो लोग 24 मार्च, 2020 को चल दिए थे उन की छठी इंद्री पहले जग गई थी. उन्होंने देख लिया था कि जिस हिंदू कहर से बचने के लिए वे गांवों से भागे थे वह शहरों में पहुंच गया है. महाराष्ट्र में जो मराठी मानुष का नाम ले कर शिव सेना बिहारियों को बाहर खदेड़ना चाहती थी, वह मराठी लोगों के ऊंचे होने के जिद की वजह से था.

आजादी से पहले भी, पर आजादी के बाद, ज्यादा ऊंची जातियों ने शहरों में डेरे जमाने शुरू किए और अपनी बस्तियां अलग बनानी शुरू कीं. गांवों से तब तक दलितों को निकलने ही नहीं दिया था. काफी राजाओं ने तो दलितों पर इस तरह के टैक्स लगा रखे थे कि एक भी जना भाग जाए तो बाकी सब पर जुर्माना लग जाता था. अब ये लोग गांवों से आजादी पाने के लिए शहरों में आए तो शहरों में मौजूद ऊंची जातियों के लोगों ने इन्हें न रहने की जगह दी, न पानी, न पखाने का इंतजाम किया. ये लोग नालों के पास रहे, पहाडि़यों में रहे, बंजर जमीन पर रहे.

1947 से 2014 तक राजनीति में इन की धमक थी क्योंकि ये पार्टियों के वोट बैंक थे. फिर धार्मिक सोच वालों ने मीडिया, सोशल मीडिया, अखबारों, पुलिस पर कब्जा कर लिया. इन्हीं दलितों, पिछड़ों और इन की औरतों को धार्मिक रंग में रंग दिया और इन्हें लगने लगा कि भगवान के सहारे इन का भाग्य बदलेगा. मुसलमानों को डरा दिया गया और हिंदू दलितों को बहका दिया गया कि उन की नौकरियां उन्हें मिल जाएंगी.

पर हमेशा की तरह सरकारी फैसले गलत हुए. 1947 के बाद भारी टैक्स लगा कर सरकारी कारखाने लगाए गए जिन में पनाह मिली निकम्मे ऊंची जातियों के अफसरों, क्लर्कों, मजदूरों को. वे अमीर होने लगे. सरकारी कारखाने चलाने के लिए टैक्स लगे जो गांवों में भूखे किसानों और उन के मजदूरों के पेट काट कर भरे गए. मरते क्या न करते वे शहरों को भागे.

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शहरों में उन्हें बस जीनेभर लायक पैसे मिले. वे कभी उस तरह अमीर नहीं हो पाए जैसे चीन से गए मजदूर अमेरिका में हुए. जाति का चंगुल ऐसा था कि वह शहरों तक गलीगली में पहुंच गया. गरीबों की झुग्गी बस्तियों में शराब, जुए, बीमारी की वजह से गरीबों की जो थोड़ी बचत थी, लूट ली गई. महाजन शहरों में भी पहुंच गए.

कोरोना ने तो बस अहसास दिलाया है कि शहर उन के काम का नहीं. अगर गांवों में ठाकुरों, उन के कारिंदों की लाठियां थीं तो शहरों में माफियाओं और पुलिस का कहर पनपने लगा. जब नौकरी भी न हो, घर भी न हो, इज्जत भी न हो, आंधीतूफान से बचाव भी न हो तो शहर में रह कर क्या करेंगे?

कोरोना ने तो यही अहसास दिलाया है कि धर्म का ओढ़ना उन्हें इस बीमारी से नहीं बचाएगा क्योंकि वे अमीर जो रातदिन पूजापाठ में लगे रहते हैं, कोरोना से नहीं बच पाए हैं. कोरोना की वजह से धर्म की दुकानें बंद हो गई हैं. चाहे छोटामोटा धर्म का व्यापार घरों में चलता रहे. कोरोना की वजह से ऊंची जातियों की धौंस खत्म हो गई है. शायद इतिहास में पहली बार ऊंची जातियों के लोग निचलों की गुलामी को नकारने को मजबूर हुए हैं कि कहीं वे एक अमीर से दूसरे अमीर तक कोरोना वायरस न ले जाएं. कोरोना इन गरीबों को छू रहा है पर ये उसे ऐसे ही ले जा रहे हैं जैसे कांवडि़ए गंगा जल ले जाते हैं जिसे छूने की मनाही है. कोरोना अमीरों में ही ज्यादा फैल रहा है.

कोरोना ने देश की निचलीपिछड़ी जातियों और ऊंची जातियों की औरतों के काम अब ऊंची जाति वालों को खुद करने को मजबूर किया है. अगर देश में हिंदूहिंदू या हिंदूमुसलिम या आरक्षण खत्म करो, एससीएसटी ऐक्ट खत्म करो की आवाजें जोरजोर से नहीं उठ रही होतीं तो लाखोंकरोड़ों मजदूर अपने गांवों की ओर न भागते. इस शोर ने उन्हें समझा दिया था कि वे शहरों में भी अब बचे हुए नहीं हैं. पुलिस डंडों की मार ये ही लोग खाते रहते हैं. 1,500 किलोमीटर चल रहे इन लोगों को ऊंची जातियों के आदेशों पर किस तरह पुलिस ने रास्ते में पीटा है यह साफ दिखाता है कि देश में अभी ऊंची जातियों का दबदबा कम नहीं हुआ है. गिनती में चाहें ऊंची जातियां कम हों पर उन के पास पैसा है, अक्ल है, लाठियां हैं, बंदूकें हैं, जेलें हैं. जब अंगरेज भारत में थे वे कभी भी 20,000 से ज्यादा गोरी फौज नहीं रख पाए थे, उन्हें जरूरत ही नहीं थी. उन के 1,500 आदमी हिंदुस्तान के 50,000 आदमियों पर भारी पड़ते थे.

देश के दलितों, पिछड़ों, गरीब मजदूरों ने कैसे एकसाथ फैसला कर लिया कि उन की जान तो अब गांवों में बच सकती है, यह अजूबा है. यह असल में एक अच्छी बात है. यह पूरे देश को नया पाठ पढ़ा सकता है. अब शहरों में महंगे मजदूर मिलेंगे तो उन्हें ढंग से ट्रेनिंग दी जाएगी. गांवों में जो शहरी काम करते मजदूर पहुंचे हैं, वे जम कर मेहनत से काम भी करेंगे और अपने को लूटे जाने से भी बचा सकेंगे. गांवों में ऊंची दबंग जातियां तो अब न के बराबर बची हैं. वे काम करेंगी तो इन के साथ.

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कोरोना वायरस दोस्त साबित हो सकता है. शर्त है कि हम धर्म की दुकानों को बंद ही रहने दें. कारखाने खुलें, लूट की पेटियां नहीं.

गहरी पैठ

देश में कोरोना की वजह से जहां 10 से 15 करोड़ लोग बेकार हो जाएंगे वहीं हजारों कारखाने और धंधे बरबादी के कगार पर पहुंच जाएंगे, क्योंकि मजदूर नहीं मिलेंगे. कोरोना से पहले शहरियों ने अपने ही देश के मजदूरों को बुरी तरह दुहा था और इसीलिए पहला ही बड़ा झटका लगते, ये मजदूर अपनी लगीबंधी नौकरी या छोटामोटा धंधा बंद कर के गांवों की ओर भाग लिए.

अगर 24 मार्च को अचानक 4 घंटे का नोटिस दे कर देश को बंद नहीं किया जाता और

10 दिन लोगों को घरों को लौटने की इजाजत दी जाती तो लौकडाउन में वे लोग शहरों में बने रहते, जिन के पास किराए की छत तो थी. इस अचानक लौकडाउन ने मजदूरों को यह भरोसा दिला दिया कि यह सरकार भरोसे के लायक है ही नहीं.

सरकार ने अगर थोड़ी सी अक्ल लगाई होती और इन मजदूरों को भरोसा दिलाया होता कि वे जातिप्रथा के गुलाम नहीं हैं, बराबर के नागरिक हैं तो बात दूसरी होती. ये मजदूर गांवों से भाग कर इसलिए नहीं आए थे कि वहां भूख सता रही थी. भूख से ज्यादा ये जाति के कहर से परेशान थे. इन का मालमत्ता तो छीन ही लिया जाता था और इन से बेगार तो कराई ही जाती थी, इन की लड़कियों और औरतों को भी जब मरजी उठा लिया जाता था. ये लोग शहरों में हिंदू धर्म की जाति की मार से बचने के लिए आए थे.

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शहरों में इन्हें सीधेसीधे चाहे अछूत न समझा गया हो, पर ऊंचे से ले कर नीचे तक सभी इन से रोजाना वही बरताव करते थे जो गांवों में होता था. इन्हें गांवों की तरह शहरों की गंद में रहने को मजबूर किया गया. ये लोग गंदे पानी के नाले के किनारे झुग्गियां बना कर रहे, खुले में खायाबनाया, सैक्स भी सब के सामने किया. हां, शहरों में इन की औरतेंलड़कियां बच जाती रहीं जो अपनेआप में कम नियामत नहीं थी.

पैसा तो शहरों में भी ज्यादा नहीं मिला. वे लोग कपड़ेलत्ते के अलावा गांव में बस अपने बूढ़े मांबाप के लायक कमा सके. फैक्टरियों ने लालच में मजदूरों के रहने की जगह बनानी बंद कर दीं. सरकारों ने मजदूरों की कालोनियों को जगह देना बंद कर दिया. सड़क पर दुकानें लगाने को भी मजबूर किया, रहने को भी. फिर भी जिस आजादी के सपने उन्होंने देखे थे, उन में से कुछ सही होते रहे और इसलिए लोग आते रहे. अब कोरोना और उस से पहले नोटबंदी ने साबित कर दिया कि यह सरकार तो सिर्फ तिलकधारियों का खयाल रखेगी, दबंगों का, पुलिस का.

मजदूरों की कोई जगह इन के पास नहीं है. वे गुलामों की तरह रहें. अब लौटने में भला है चाहे 1,000 किलोमीटर चलना क्यों न पड़े. ये गांवों में खुश रहेंगे इतना पक्का है. शहरों ने इन्हें हकों का इस्तेमाल करना सिखा दिया है, यही काफी है या कहिए कि बस यही कमाई ले कर ये गांव लौट रहे हैं.

यह माना जा सकता है कि सरकार का खजाना खाली है और उस के पास अपने वेतनभत्ते देने का पैसा भी टैक्सों से जमा नहीं हो पा रहा. हालात तो कोरोना से पहले ही खराब होने शुरू हो गए थे, क्योंकि एक साल से गाडि़यों की बिक्री कम हो रही थी, मकान बिक नहीं रहे थे. व्यापारी बैंकों और जमाकर्ताओं का पैसा ले कर भाग रहे थे. देश छातियां तो पीट रहा था और बड़ी 56 इंची बातें कर रहा था, पर सरकार की जेब में पैसा लगातार सिकुड़ रहा था.

अब जब 50 दिन पूरी तरह सब कामधंधे बंद हो जाने से जो झटका लगा है, वह तब तक ठीक न होगा जब तक सरकार कारखानों और मिलों को धंधा चलाने के लिए मोटा पैसा न देगी. यह पैसा सरकार को वेतन काट कर देना होगा. जैसे हर व्यापारी, कारखानेदार, हर मजदूर आधे पैसों में काम करेगा वैसे ही हर सरकारी अफसर, कर्मचारी, सिपाही, जज, ठेकेदार को आधे पैसों में काम करने को तैयार होना होगा.

देश की बचत का एक बड़ा हिस्सा सरकारी नौकरशाही बेकार में उड़ा देती है. बड़ेबड़े दफ्तर बचे हुए हैं जो करते कम हैं, करने से रोकते ज्यादा हैं. जनता को दुरुस्त करने के नाम पर वे अड़चनें डालते हैं. सारे किएधरे को रोकते रहते हैं. अगर कहीं भी कुछ भी अधूरा बना पड़ा दिखे तो समझ लें कि इस के पीछे सरकार है. कहीं भी कोई रुका हो, बंद हो तो समझ लें कि इस के पीछे सरकार है.

राजाओं ने हमेशा महल बनाए हैं, आम लोगों के घर नहीं. उन्होंने खेतों से लगान वसूला है, खेती नहीं की. कारखानों पर टैक्स लगाए हैं, कारखाने नहीं चलाए. अगर सरकारी नौकरशाही का वेतनभत्ता आधा हो जाए तो देश की जनता को पूरी बरकत होगी. अगर हमेशा के लिए नहीं तो 5-6 महीने की कुरबानी तो देनी ही चाहिए.

जब कोरोना के मरीजों को ठीक करने में डाक्टर अपनी जान पर खेल रहे हैं तो नौकरशाही का फर्ज है कि वह अपना हिस्सा वेतन कटौती से दे और 5-6 महीने केवल आधा वेतन ले. वैसे भी लौकडाउन और घरों में बंद रहने से बहुत से खर्च कट रहे हैं.

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यह तो पक्का है कि सरकार या उस की 30 लाख करोड़ की नौकरशाही अपने खर्च, वेतन, तामझाम कम नहीं करेगी, क्योंकि 1947 में भी आजादी का मकसद यही था कि राज मुट्ठीभर सरकारी लोगों का हो और उस के बाद की हर सरकार का चाहे वह गरीबी हटाओ की बात कर रही थी या हिंदू धर्म की दोबारा जड़ें जमाने की. यहां जनता से देने को कहा जाता है, लेने को नहीं. पुराणों को उठा कर देख लें, एक भी ऐसी कहानी नहीं मिलेगी जिस में किसी राजा ने आम लोगों के लिए कुछ किया हो. 2020 में कुछ अलग नहीं होने वाला.

गहरी पैठ

कोरोना के कहर में तबलीगी जमात की नासमझी से जो समस्याएं बढ़ी हैं, उन्होंने केंद्र सरकार को फिर से हिंदू मुसलिम करने का कट्टर कार्ड थमा दिया है. देखा जाए तो देश की जनता को आराम से जीने का मौका देने का वादा दे कर जीतने वाली भारतीय जनता पार्टी सरकार ने अपना एक और दांव, दंगे चला कर अब घरघर में दहशत का माहौल खड़ा कर दिया है. किसी को भी देश का गद्दार कहने का हक खुद ब खुद लेने के बाद अब उन्होंने जगहजगह गोली मारो गद्दारों को नारा गुंजाना शुरू कर दिया है. बिना सुबूत, बिना गवाह, बिना अदालत, बिना दलील, बिना वकील के किसी को भी गद्दार कह कर उसे मार डालने का हक बड़ा खतरनाक है.

न सिर्फ मुसलमानों को डराया जा सकता है, इस नारे से हर उस को डराया जा सकता है, जिस ने अपनी अक्ल लगा कर भगवा भीड़ की मांग को पूरी करने से इनकार कर दिया हो.

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आज देश का दलित, किसान, मजदूर, बेरोजगार युवा, बलात्कारों से परेशान लड़कियां, छोटे व्यापारी सरकारी फैसलों से परेशान हैं. दलितों के घोड़ी पर चढ़ कर शादी करने पर मारपीट ही नहीं हत्या कर दी जाती है और जिस ने भी उस के खिलाफ आवाज उठाई, उसे गद्दार कह कर गोली मारने का हक ले लिया गया है. अगर किसान कर्ज माफ करने के लिए सरकार के खिलाफ मोरचा खोलें तो उन्हें गद्दार कहा जा सकता है. अगर व्यापारी नोटबंदी, जीएसटी और बैंकों के फेल होने पर होने वाले नुकसान की बात करें तो उन्हें गद्दार कहा जा सकता है. नागरिकता कानून ?की फुजूल की बात करने वाले को गद्दार कहने का हक है. छोटीबड़ी अदालतों में वकीलों के झुंड मौजूद हैं जो अपने हकों को मांगने वालों को गद्दार कह कर जज के सामने तक नहीं जाने दे रहे. जजों को गद्दार कह कर उन का रातोंरात तबादला कर दिया जा रहा है.

सारे देश में सरकार डिटैंशन सैंटर बनवा रही है जो आधी जेल की तरह हैं जहां नाममात्र का खाना मिलेगा, नाममात्र के कपड़े मिलेंगे, पर बरसों रहना पड़ सकता है. उन को गुलाम बना कर उन से काम कराया जा सकता है. लड़कियों को बदन बेचने पर मजबूर किया जा सकता है. यह हिटलर ने जरमनी में किया था. स्टालिन ने रूस में किया था. माओ ने चीन में किया था. कंबोडिया में पोलपौट ने किया था.

गद्दार कह कर कैसे सिर फोड़े जा सकते हैं. घरों को जला कर सजा दी जा सकती है. इस का नमूना दिल्ली में दिखा दिया गया. जिन्होंने किया वे आजाद घूम रहे हैं. जो शांति के लिए जिम्मेदार हैं, वे भड़काऊ भाषण देने में लगे हैं.

इस सब से मुसलमानों को तो लूटा जा ही रहा है, दलित और पिछड़े भी लपेटे में आ गए हैं. आज सरकारी नौकरियों में केवल ऊंचों को पद देने का हक एक बार फिर मिल गया है, क्योंकि या तो सरकारी काम ठेके पर दे दिए गए हैं या बंद कर दिए गए हैं. दहशत के माहौल की वजह से कोई बोल नहीं पा रहा. कन्हैया कुमार जो बिहार में भारी भीड़ जमा कर रहा था को अब दिल्ली की अदालतों में बुला कर परेशान करने की साजिश की जा रही है. चंद्रशेखर आजाद को बारबार लंबी जेल में भेज दिया जाता है. हार्दिक पटेल का मुंह बंद कर दिया गया है.

देश को अमन चाहिए, क्योंकि अगर पेट में आधा खाना ही हो, कपड़े फटे हुए हों तो भी अगर चैन हो तो जिंदगी कट जाती है. अब यह चैन भी गद्दार के नारे के नीचे दब रहा है.

पूरी दुनिया कोरोना की महामारी से जूझ रही है. लौकडाउन के बाद जरूरी कीमती सामान से लदे ट्रक जहां थे वहीं खड़े हैं. पहले भी हालात ट्रक ड्राइवरों के पक्ष में कहां थे. देखें तो देश के ट्रक ड्राइवरों की जिंदगी वैसे ही उबाऊ और खानाबदोशी होती है, उस पर हर नाके पर, हर सड़क पर बैठे खूंख्वारों से निबटना एक आफत होती है. सेव लाइफ फाउंडेशन का अंदाजा है कि ट्रक ड्राइवर हर साल तकरीबन 50,000 करोड़ रुपए रिश्वत में देते हैं. रिश्वत ट्रैफिक पुलिस वाले, टैक्स वाले, नाके वाले, चुंगी वाले, पोल्यूशन वाले तो लेते ही हैं, अब धार्मिक धंधे करने वाले भी जम कर लेने लगे हैं. धार्मिक धंधे वाले ट्रकों और टैक्सियों को रोक कर ड्राइवरों से उगाही करते हैं.

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कोई कह सकता है कि यह रिश्वत तो मालिक की जेब से जाती होगी, पर यह गलत है. बहुत से ट्रकों को लगभग ठेके पर दे दिया जाता है कि ट्रक पहुंचाओ, रास्ते में जो हो, भुगतो और एकमुश्त पैसा ले लो. ड्राइवर को ऐसे में अपने मुनाफे में कटौती नजर आती है. वह कानूनी, गैरकानूनी दोनों रोकटोक पर रिश्वत देने में हिचकिचाता है और अकसर झगड़ा हो जाता है और मारपीट तक हो जाती है तो नुकसान ट्रक ड्राइवर का ही होता है.

ड्राइवरों की जिंदगी वैसे ही बड़ी दुखद है. उन्हें 12 घंटे ट्रक चलाना होता है, इसलिए अकसर वे शराब और दवाओं का नशा करते हैं. देश की सड़कें बेहद खराब हैं जो ट्रक चलाने में ड्राइवर की हड्डीपसली दुखा देती हैं. आमतौर पर सड़कों पर लाइट नहीं होती. अंधेरे में चलाना मुश्किल होता है. भारत में अब तक सुरक्षित ट्रक नहीं बनने शुरू हुए हैं. ड्राइवरों के केबिन एयरकंडीशंड नहीं होते, उन ट्रकों के भी नहीं जिन में खाने के सामान या दवाओं के लिए रेफ्रीजरेटर लगे होते हैं, इसलिए बेहद गरमीसर्दी का मुकाबला करना पड़ता है. बहुत से ड्राइवरों को बदलते साथियों के साथ चलना होता है.

हमारे यहां ड्राइवरों को रास्ते में सोने के लिए ढाबों पर पड़ी चारपाइयां ही होती हैं, जिन पर न गद्दे होते हैं, न पंखे तक.

घरों से दूर रहने की वजह से ड्राइवर राह चलती बाजारू औरतों को पकड़ते हैं, पर वे लूटने की फिराक में रहती हैं. उन के गैंग अलग बने होते हैं जो परेशान करते हैं. ड्राइवरों को बीवियों की चिंता भी रहती है कि उन के पीछे वे औरों के साथ तो नहीं आंखें लड़ा रहीं.

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यही वजह है कि आज 1000 ट्रकों पर 400-500 ड्राइवर ही मिल रहे हैं. ट्रांसपोर्ट उद्योग को ड्राइवरों की कमी की वजह से भारी नुकसान होने लगा है. एक तरफ बेरोजगारी है, पर दूसरी तरफ ट्रेनिंग न मिलने की वजह से ड्राइवरों की कमी है. ट्रेनिंग तो आज सिर्फ जय श्रीराम कह कर मंदिर के धंधे कैसे चलाए जाएं की दी जा रही है.

गहरी पैठ

कुछ माह पहले 2 बैंकों के बंद हो जाने का सदमा अभी कम हुआ नहीं था कि अब एक बड़ा बैंक यस बैंक लगभग दिवालिया हो गया है. इस में जमा खातेदारों का हजारों करोड़ अब खतरे में है और साथ ही यह डर है कि यह बैंक दूसरे कई बैंकों को न ले डूबे.

जिन का पैसा डूबेगा उस में अगर लखपति व करोड़पति हैं तो गरीब भी हैं, जिन्होंने कुछ हजार रुपए जमा कर रखे थे. अगर अमीर किसी तरह बचे पैसे से काम चला भी लें तो हजारों गरीबों की पूरी बचत स्वाहा हो चुकी होगी.

इन गरीबों को अब फिर साहूकारों के पास जाना होगा जो अगर कर्ज देते हैं तो मोटा ब्याज लेते हैं और अगर बचत रखते हैं तो ब्याज देना तो दूर मूल भी ले कर भाग जाते हैं. देशभर में चिटफंड कंपनियों के कारनामे जगजाहिर हैं. इसी तरह की और कंपनियां भी देशभर में कुकुरमुत्तों की तरह खुली हुई हैं, जो पैसा जमा कर लूट रही हैं. बैंकों से जो थोड़ीबहुत आस थी वह भी एकएक कर के बैंकों के ठप होने से खत्म होती जा रही है.

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यह देश के गरीब और आम आदमी के साथ सब से बड़ा जुल्म है. बैंकों ने पहले तो हर गांवकसबे में पांव पसार कर लोगों को यह भरोसा दिला दिया कि साहूकार से वे अच्छे हैं. अच्छेभले साहूकर खत्म हो गए और सिर्फ शातिर ठग बचे हैं जो मोटे ब्याज के लालच में गांवगांव से पैसा जमा करते हैं और फिर गायब हो जाते हैं. बीसियों चिटफंड व डिपोजिट कंपनियां लोगों का पैसा खा चुकी हैं. अब तो जेवर भी खा कर बैठने लगी हैं.

यस बैंक के फेल हो जाने का मतलब है कि अब बैंकों में पैसा जमा करने में खतरा है. यदि यही चला तो लोग तो कंगाल हो ही जाएंगे, देश भी कंगाल हो जाएगा, क्योंकि बैंक लोगों का पैसा जमा नहीं करेंगे तो कर्ज कैसे देंगे, कैसे नए कारखाने चलेंगे, कैसे व्यापार होगा, कैसे पैसा इधर से उधर जाएगा.

यह कहर किसान, मजदूर, व्यापारी, ठेकेदार सब को लील सकता है. यस बैंक अकेला ही गलत कर रहा होता तो बात दूसरी थी, हर दूसरे सभी बैंकों में कमोबेश यही सा हाल है चाहे वे सरकारी हों या प्राइवेट. यस बैंक में उस को शुरू करने वाले राणा कपूर, उस की पत्नी, उस की बेटियों ने मनमाना खर्च करने की छूट पाने के लिए ऐसे बहुतों को कर्ज दिया जिन का धंधा लड़खड़ा रहा था जिन में मुकेश अंबानी के छोटे भाई अनिल अंबानी शामिल हैं. जिन की कंपनी को राफेल लड़ाकू हवाईजहाज बनाने का ठेका मिला है. जीटीवी जिस पर प्रधानमंत्री की तरफदारी ले कर रातदिन खतरें जारी होती हैं, ने भी यस बैंक से कर्ज लिया और लौटाया नहीं.

यस बैंक ने देश को जो नुकसान पहुंचाया है उस के लिए सरकार जिम्मेदार है जिस ने सैकड़ों नियमकानून बैंकों के लिए बना रखे हैं.

देश के सभी शहरों, कसबों और यहां तक कि गांवों में भी आम लोगों की जमीन, सड़क, पटरी, बाग पर दुकानें बन जाना आम और आसान है. इस में कुछ ज्यादा नहीं करना पड़ता. पहले दिन एक जना कहीं भी चादर बिछा कर या बक्से पर रख कर सामान बेचना शुरू कर देता है और 4-5 दिनों में ही यह उस का हक बन जाता है. इस आम आदमी की घुसपैठ देश की जनता पर बंगलादेश के लोगों की घुसपैठ से ज्यादा खतरनाक है, पर रातदिन पनप रही है. इस में गलती और अपराधी असल में आम आदमी ही हैं, सरकार जिस में पुलिस, म्यूनिसिपल कारपोरेशनें, राज्य सरकारें कम हैं.

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दिक्कत है कि लोग इतने आलसी और बेवकूफ हैं कि वे सड़क पर राह चलती दुकान से कुछ भी खरीदने को तैयार हो जाते हैं जहां न दुकानदार का नाम है, न पता. वे क्या खरीद रहे हैं, यह भी नहीं मालूम. खाने की चीजों की दुकान है तो वहां नकली जहर हो चुका सामान तो नहीं बिक रहा, इस की परेशानी नहीं है. सामान चोरी का हो तो कोई डर नहीं. क्वालिटी बेहद खराब हो तो फर्क नहीं पड़ता. खरीदारों की यह आदत इन दुकानों के लिए जिम्मेदार है.

कोई भी दुकान तभी लगाएगा और चलाएगा जब वहां बिक्री होगी. खरीदार हैं तो दुकान हैं. पहले सामान खरीद कर आम जनता दुकानदार को पाले और फिर सरकार को कोसे कि देखो कहीं भी दुकान लगाने देती है, कहां से सही बात हो सकती है.

इन दुकानों के ग्राहक असल में अपने को लुटवाते हैं और दुकानदारों का कल भी खराब करते हैं. सड़क पर बनी नाजायज दुकान से पुलिस वाला, म्यूनिसिपल कारपोरेशन वाला, कोई माफिया हफ्तावसूली करने लगता है. जिस सड़क पर बैठे हों, वहां का अफसर हटाता तो नहीं पर वसूली में हिचकिचाता नहीं. अगर ग्राहक न हों तो कोई 4 दिन दुकान न चलाए. इन दुकानों को पनपने की वजह सिर्फ और सिर्फ ग्राहक हैं.

यह कहना गलत है कि पक्की दुकानों में सामान महंगा मिलता है. यह गलतफहमी है. पटरी दुकानदार को मोटे ब्याज पर सामान लाना होता है, क्योंकि वह कोई चीज गिरवी या किसी तरह की जमानत नहीं देता. रोज की कमाई में से तिहाई से आधा हिस्सा तो पैसा लगाने वाले खा जाते हैं. पटरी दुकानदार को लगता है कि उस की दिहाड़ी निकल गई, काफी है, पर यह उस को कल को पक्की दुकान में जाने से रोकता है. उसे हुनर सीखने से रोकता है.

यही नहीं, कईकई पटरी दुकानदार एकजैसा सा सामान बराबर बेचते रहते हैं. आधे समय खाली रहते हैं. उन्हें अपनी दिहाड़ी निकालने के लिए खाली समय का पैसा भी कीमत में जोड़ना होता है. वे सस्ता, अच्छा सामान दे ही नहीं सकते. हां दलितों, अछूतों को जरूर थोड़ा फायदा होता है, क्योंकि उन्हें पक्की दुकान में घुसने में आज भी डर लगता है. पर क्या इसी वजह से देश की सारी पटरियां, सारे बाग, सारी खुली जगहें, सड़कें संकरी, मैली करने दी जाएं? ग्राहक, आम जनता मामला हाथ में ले, सरकार पर न छोड़े.

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गहरी पैठ

देश में अच्छे दिन आने वाले हैं या देश सताए गए लोगों (केवल हिंदू) की पनाह की जगह बनने वाला है, यह अब सपना ही रह गया है. पाकिस्तान, बंगलादेश या अफगानिस्तान से धर्म के नाम पर सताए जाने वाले भारत तो तब आएंगे न जब यहां उन्हें कुछ भविष्य दिखेगा. अगर 1947 से 2020 तक, 73 सालों से, वे वहां रह रहे हैं और जिंदा हैं तो इस का मतलब है कि अपनी रोजीरोटी तो कमा पा रहे हैं. भारत में तो भारतीयों के लिए रोजीरोटी के लाले पड़ रहे हैं. भाजपा की जबान में आने वाले 4 करोड़ हिंदुओं को हम खिलाएंगे क्या?

इंजीनियरिंग आज देश की हालत सुधारने की पहली जरूरत है. कुछ भी बनाना हो, सड़क, स्कूल, अस्पताल, जेल, डिटैंशन सैंटर, मंदिर, मूर्ति सब से पहले इंजीनियर की जरूरत होती है. अगर इंजीनियरों की जरूरत ही नहीं तो मतलब साफ है कि कुछ बन नहीं रहा. वैसे, कुछ बड़ा बनता दिख भी नहीं रहा सिवा मंदिरों के.

इंजीनियरिंग कालेजों को इजाजत देने वाली संस्था आल इंडिया काउंसिल औफ टैक्निकल ऐजूकेशन ने फैसला किया है कि अब 2 साल तक कोई नया इंजीनियरिंग कालेज नहीं खोला जाएगा. देश में 27 लाख सीटों वाले कालेज पहले से मौजूद हैं और 3-4 सालों से उन में दाखिला लेने वालों में कमी होती जा रही है. 2019 में 13 लाख ने ही इस महंगी पढ़ाई में अपनी पूंजी लगाने की इच्छा दिखाई, क्योंकि शायद उन्हें पता है कि नौकरी तो मिलनी नहीं.

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यह बेहद शर्म की बात है कि जो सरकार बड़ेबड़े सपने दिखा रही हो, 5 ट्रिलियन डौलर (जो भी इस का मतलब हो) के उत्पादन वाला देश बना डालेगी का दावा कर रही हो, जगद्गुरु होने का घमंड कर रही हो, रोज भाषणों पर भाषण लाद रही हो, वहां आगे बढ़ने की पहली जरूरत इंजीनियरों को नौकरी तक नहीं दे पा रही है.

यह कमी प्लानिंग की नहीं गिरते कौंफिडैंस की है. गांवकसबों सब जगह यह बात फैल चुकी है कि इंजीनियरिंग की महंगी पढ़ाई के बाद नौकरियां तो मिलेंगी नहीं. सरकार खुद अब कुछ बनाएगी नहीं. रिजर्वेशन प्राइवेट नौकरियों में है नहीं. तो फिर कोई क्यों खेतमकान बेच कर लड़कों को इंजीनियरिंग पढ़ाने में पैसा लगाए? अगर पिछड़ों और शैड्यूल कास्टों का रिजर्वेशन रखा तो बहुत से लड़के किसी भी तरह का जुगाड़ कर के इंजीनियरिंग करते ताकि सरकारी नौकरी मिल सके.

अब जब पक्का है कि सरकारी नौकरी तो है ही नहीं और यह भी पक्का है कि प्राइवेट नौकरियां तो ऊंची जमातों के लोग खा जाएंगे, तो गांवकसबों में थोड़े पैसे वाले घरों के लड़के भी इंजीनियरिंग में 5-7 साल लगाने का रिस्क लेने को तैयार नहीं. आज की सरकार तो कह रही है अच्छी नौकरी तो गौरक्षक गैंग का मैंबर बनना है और उस के लिए डिगरी की जरूरत नहीं.

आजकल सीसीटीवी कैमरे पुलिस से ज्यादा जरूरी हो गए हैं. जरूरत है कि हर गांवकसबे में भी ये लगाए जाएं, क्योंकि जनता की देखभाल अब पुलिस के बस की नहीं रह गई है. लोगों को डर पुलिस या कानून से नहीं, बल्कि सीसीटीवी कैमरों से है.

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दिल्ली में एक ईरिकशा ड्राइवर, उस की बीवी और 3 बच्चों की सनसनीखेज मौत का राज सीसीटीवी कैमरों से ही खुला. पता चला कि कत्ल करने वाला चचेरा भाई ही था, जिस ने 30 हजार रुपए उधार ले रखे थे. कई बार रुपए वापस मांगने पर वह इतना गुस्सा हो गया कि उस ने एकएक कर के 3 घंटों में पांचों की हत्या कर डाली और फरार हो गया. शुरू में लगा था कि यह खुदकुशी का मामला है, पर धीरेधीरे सीसीटीवी कैमरों से राज खुल गए. अभी हर घर में सीसीटीवी कैमरे चाहे न लगे हों, पर जहां लगे हैं, वहां उन कैमरों की रिकौर्डिंग चैक कर के पूरी कहानी का पता चल जाता है.

इस मामले में 7 दिनों तक किसी को कुछ पता न चला. जब घर से लाशों के सड़ने की बदबू आने लगी तो पता चला कि मामला क्या है.

पैसे की तंगी और चौपट होते धंधों की वजह से खुदकुशी अब सिर्फ किसान ही नहीं कर रहे, शहरों में व्यापारी, ड्राइवर, मजदूर भी कर रहे हैं और ऐसे माहौल में किसी को दिए 30 हजार रुपए बहुत हो जाते हैं. उधार देने वाला जब रुपए वापस मांगता है तो उधार लेने वाले के लिए आफत सी हो जाती है और नतीजतन उधार देने वालों की हत्या तक कर दी जाती है. जब तक लोगों को भरोसा था कि आज नहीं तो कल पैसा आ ही जाएगा, मामला चल रहा था और लोग गरीबी में भी गुजारा कर लेते थे, पर अब कल का भी भरोसा नहीं है, क्योंकि माहौल बहुत खराब हो गया है और बुरे से बुरा हो रहा है.

धर्म का ढिंढोरा पीट कर पिछले 6 सालों में वैसे भी लोगों को बहुत मारपीट के लिए तैयार किया गया है. देशभर में दलितों और मुसलिमों को मारनेपीटने को पुलिस अनदेखा कर देती है. उत्तर प्रदेश में ही नहीं और कई राज्यों, जिन में दिल्ली शामिल है, में पुलिस ने खुद तोड़फोड़ की है, बेहरमी से पिटाई की है, जो सीसीटीवी कैमरों में रिकौर्ड हो गई है. जामिया और जेएनयू में पुलिस की मौजूदगी में गोलियां चलीं, होस्टल में घुस कर पिटाई की गई.

बिहार में कन्हैया कुमार के काफिले पर 7 बार हमले हुए. उत्तर प्रदेश, दिल्ली और बिहार के महान मुखिया थाने से भाषण बघारते रहे. दिल्ली में पुलिस अमित शाह के कंट्रोल में है और दिल्ली के चुनावों में एक बार भी उन्होंने उन लोगों के लिए हमदर्दी का एक बोल न बोला, जिन की पिटाई हुई.

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ऐसे माहौल में 30 हजार रुपए के लिए 5 हत्याएं हो जाएं, तो क्या बड़ी बात है. पुलिस तो जब आएगी, तब आएगी, पहला बचाव और सुबूत तो भई सीसीटीवी कैमरे ही हैं. यह धंधा आज जम कर पनप रहा है. पता नहीं सरकार की कितनी पत्ती है इस में.

बेरोजगारी का आलम

देश में बेरोजगारी का हाल यह है कि महाराष्ट्र में 8,000 कौंस्टेबलों की भरती के लिए 12,00,000 अर्जियां आई हैं. सरकार तो चाहती थी कि उन का एग्जाम भी औनलाइन हो जिस में इन अधपढ़े नौजवानों को किसी साइबर कैफे में जा कर सैकड़ों घंटे और सैकड़ों रुपए बरबाद करने ही थे और सरकार के पास मनमाने ढंग से फैसले करने का हक रहता. हो सकता है अब कागजपैन पर ही कौंस्टेबलों का एग्जाम हो.

कौंस्टेबलों का वेतन कोई ज्यादा नहीं होता. काम के घंटे बहुत ज्यादा होते हैं. वर्षों तक अफसरों की चाकरी करनी पड़ती है. रहने की सुविधा बहुत ही घटिया होती है, पर फिर भी नौकरी लग जाने पर रोब भी रहता है और ऊपरी कमाई भी होती है, इसीलिए 12 लाख दांव लगा रहे हैं.

इस तरह की भरतियों में सरकारी आदमियों की खूब मौज होती है. अर्जी देने वालों को लूटने का सिलसिला चालू हो जाता है. तरहतरह के सर्टिफिकेट औनलाइन एप्लीकेशन के साथ लगवाए जाते हैं जिन्हें जमा करने में खर्च होता है. जो रिजर्व कोटों से होते हैं उन्हें एससी, ओबीसी का सर्टिफिकेट बनवा कर लाने के लिए चक्कर काटने पड़ते हैं.

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अर्जी ढंग से गई या नहीं, यह पता करना भी मुश्किल होता है. उस के बाद एकदम चुप्पी छा जाती है. महीनों पता ही नहीं चलता कि इन भरतियों का क्या हुआ. जिस ने अर्जी दी, वह आराम से बैठ कर सपने देखने लगता है जबकि उसे यह मालूम ही नहीं होता कि औनलाइन गड़बडि़यों का धंधा अलग चालू हो गया है.

अगर गलती से इंटरव्यू और फिजिकल का बुलावा आ जाए तो खुशी तो होती है पर लाखों की रिश्वत की मांग आने लगती है. देश में कानून बनाए रखने के लिए जो बेईमानी भरती

में हाती है वह अपनेआप में एक अचंभा है. इस बेईमानी पर वे मंत्री चुप रहते हैं जो दिन में 10 बार में सच बोलने की कसम खाते हैं. उन्हीं कौंस्टेबलों के बल पर देश में हिंदूहिंदू, मुसलिममुसलिम किया जाता है. सरकार अगर उछलती है तो उन कौंस्टेबलों के बल पर जिन के वीडियो जामिया और उत्तर प्रदेश में गाडि़यों, स्कूटरों को तोड़ते हुए खूब वायरल हुए हैं. यही कौंस्टेबल सड़क चलतों से मारपीट कर सकते हैं, ये सरकार के असल हाथ हैं पर इन की भरती बेहद घिनौनी है.

महाराष्ट्र में औनलाइन एग्जाम को न करने की जो अपील की जा रही है वह सही है, क्योंकि चाहे औनलाइन में स्काइप से फोटो चालू रहे, बेईमानी की गुंजाइश कई गुना है. कौंस्टेबलों की भरती साफसुथरी हो, यह देश की जनता की आजादी के लिए जरूरी है. उन्हें निचले पद पर तैनात अदना आदमी न सम झें, असल में वही सरकार की आंख व हाथ हैं. अगर दलितों, पिछड़ों, मुसलिमों को अपनी जगह बनानी है तो जम कर इस भरती में हिस्सा लेना चाहिए और पुलिस फोर्स को भर देना चाहिए, ताकि उन पर जुल्म न हों.

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किसान हुए बेहाल

आम आदमी की जरूरत की चीजों जैसे प्याज, आलू, दूध के दाम बढ़ने पर सरकार लगातार मौसम को दोष दे रही है. कभी कहते हैं कि सूखा पड़ गया है तो कभी कहते हैं कि बेमौसम की बारिश हो गई. पर जिस भी किसान को जिस आलू से 5 रुपए किलो न मिलते हों और प्याज से 2 रुपए किलो न मिलते हों वह आलू बाजार में 30 रुपए से 50 रुपए और प्याज 75 से 125 रुपए तक हो जाए, एक बड़ी बेवकूफी और साजिश का नतीजा होने के अलावा कुछ और नहीं.

बेवकूफी यह है कि पिछले 2 सालों में भारतीय जनता पार्टी ने किसानों के युवा बच्चों को बड़ी गिनती में भगवा दुपट्टे पहना कर सड़कों पर दंगे करवाने के लिए उतार दिया है. किसानी दोस्तों के साथ नहीं की जाती. यह उबाऊ होती है. मेहनत का काम होती है. जिन लड़कों के पास पहले बाप के साथ खेत पर काम करने के अलावा कुछ और नहीं होता था, उन्हें चौराहे पर खड़ा कर के हिंदू राष्ट्र बनाने के भाषण देने पर लगा दिया है. वे ट्रकों में बैठ कर सैकड़ों मीलों दूर मंदिरों में घंटे बजाने भी जाने लगे और भगवा आंदोलन में भी.

बाप बेचारा बेटे को पाले भी, जेबखर्च का पैसा भी दे और खेत पर काम भी करे. पहले जब 12-13 साल के लड़के किसान का हाथ बंटाने आ जाते थे, आज खेतों में सफेद बालों वाले कमर तोड़ते आदमीऔरत नजर आते हैं.

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साजिश यह है कि जरा सी फसल कम होने पर दाम 4-5 गुना तक बढ़ सकते हैं. किसान से हमेशा की तरह पुराने दामों पर माल खरीद कर गांवों, कसबों और शहरों के गोदामों में भरा जाने लगा है. व्यापारीआढ़ती जानते हैं कि किसान निकम्मा होने लगा है और न वह कम फसल होने पर फसल जमा कर के रख सकता है, न उस के पास फसल बढ़ाने का तरीका है. वह यह भी जानता है कि उस का थोड़ा पढ़ालिखा बेटा तो हिंदू धर्म को बचाने में लगा है, खेत की फसल से उसे क्या लेनादेना?

व्यापारीआढ़ती का बेटा पढ़ कर बाप को कंप्यूटर चलाना सिखाता है, किसान का बेटा बाप को मुसलमान और दलित से नफरत का पाठ पढ़ाने लगा है या गांव में अपनी जाति का मंदिर बनाने के लिए उकसाने लगा है.

देश की उपजाऊ जमीन पर अब पूजापाठी नारों की फसल लहलहा रही है. भला आलूप्याज की क्या औकात कि वे मुकाबला कर सकें.

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