सोच से आगे- भाग 3: आखिर कौन था हत्यारा

मुझे अचानक याद आया तो मैं ने कहा, ‘‘आप को सिगार पिए काफी देर हो चुकी है. आप सिगार पी लीजिए.’’

वह मुसकरा कर बोला, ‘‘ओ हां, लेकिन आप के सामने?’’

‘‘कोई बात नहीं, आप को इजाजत है. आप पी लीजिए.’’ उस ने अपनी जेब से सिगार का एक पैकेट निकाला. मैं ने देखा वह वही सिगार का ब्रांड था, जिस का टुकड़ा डा. समर के कमरे से मिला था.

मैं ने इकबाल से कहा, ‘‘आप एक इज्जतदार आदमी हैं और मुझे उम्मीद है कि आप झूठ नहीं बोलेंगे. आप यह बताइए कि हत्या वाली रात 9 बजे से रात 3 बजे तक आप कहां थे?’’

‘‘ओह यह बात है. उस रात मैं 10 बजे से 12 बजे तक समर के पास रहा. फिर अपनी कार से लौट गया.’’

‘‘आप दोनों में तो अनबन थी फिर आप उस के पास कैसे गए?’’

‘‘बात यह है सर, मुझे उस से बहुत मोहब्बत थी. मैं न चाह कर भी उस के क्वार्टर पर चला गया. मैं ने दरवाजा थपथपाया, तो उस ने दरवाजा खोला और हंस कर मेरा स्वागत किया. उस ने मुझे चाय भी पिलाई. मैं ने उस से माफी मांगनी चाही तो वह उखड़ गई. बोली कि मैं ने आप को इसलिए अंदर नहीं बुलाया बल्कि मैं चाहती हूं कि आप मुझे तलाक दे दें.

‘‘उस की बात से मुझे दुख तो बहुत हुआ लेकिन मैं बिना कुछ कहे ही वहां से चला आया. इस के बाद मैं अपने एक मित्र के पास चला गया. अभी मेरा वहां से आने का इरादा नहीं था लेकिन कल अचानक मैनेजर का फोन गया और उस ने मुझे यहां के हालात बताए तो तुरंत आ गया.’’

 

मुझे इकबाल की बात पर यकीन होने लगा था. मैं ने उस से आखिरी सवाल यह किया कि उस ने अपनी मां और बहन को यह  क्यों बताया कि मिल घाटे में चल रही है, जबकि ऐसा कुछ नहीं था.

‘‘सर, कभीकभी इंसान पर ऐसा समय आता है कि वह अपने आप से भी झूठ बोलता है. मैं ने मां और बहन से जानबूझ कर झूठ बोला था. अगर मैं उन से यह कहता कि मैं समर के कारण परेशान हूं तो मुझे उन की ओर से और भी कुछ बुरा सुनने को मिलता. हां, मुझे एक शक और है.’’ वह बोला.

‘‘कौन सा शक?’’ मैं ने पूछा.

‘‘एक साल पहले मैं ने परवेज नाम के युवक को मिल से मैदा चुराने के आरोप में नौकरी से निकाल दिया था. वह यह काम बहुत सालों से कर रहा था, लेकिन बाद में पकड़ा गया था.’’

मैं ने इकबाल से परवेज का हुलिया पूछा तो उस ने जो बताया, सुन कर मैं उछल पड़ा. यह तो वही युवक था, जिस की मुझे तलाश थी. मैं ने उस से पूछा, ‘‘कैसा शक?’’

उस ने बताया कि मैं ने उस रात अस्पताल में परवेज को देखा था और उसी रात समर की हत्या हो गई. मैं ने परवेज का पता पूछ कर इकबाल को जाने दिया.

इकबाल के जाने के बाद मैं ने एएसआई को बुला कर कहा कि 2 सिपाहियों को ले जा कर वह परवेज को पकड़ लाएं. 2 घंटे बाद वे आए और बताया कि वह घर पर नहीं है.

मैं ने चारों ओर मुखबिरों का जाल बिछा दिया. अगले दिन शाम के समय एक मुखबिर ने हमें बताया कि परवेज को कुछ दोस्तों के साथ साबराबाद गांव के बाहर एक डेरे पर देखा गया है. मैं ने एएसआई के नेतृत्व में एक पुलिस टीम रात में ही परवेज को पकड़ने के लिए साबराबाद गांव के डेरे पर भेज दी.

ऐसा लगा कि उन्हें छापामार पार्टी का पहले से ही पता लग गया था इसलिए सारे लोग वहां से भाग गए. केवल शराब के नशे में धुत परवेज हाथ लगा. उसे थाने ला कर हवालात में बंद कर दिया गया. सर्दियों का मौसम था, हवालात का ठंडा फर्श उस का दिमाग ठंडा करने के लिए काफी था.

अगले दिन परवेज को मेरे सामने लाया गया. एएसआई असलम ने बताया कि इस ने बिना छतरोल के ही अपना अपराध स्वीकार कर लिया है. काम इतनी जल्दी हो गया कि हमें इस का रिमांड लेने की भी जरूरत नहीं पड़ी.

इस हत्या के पीछे की जो कहानी थी, वह यह थी कि परवेज के दिमाग में बहुत पहले से एक लावा पक रहा था जो हत्या की रात फट गया. परवेज की कहानी कुछ इस तरह थी कि उस की मां के मरने के बाद पिता ने दूसरी शादी कर ली.

सौतेली मां ने उस के साथ गंदा व्यवहार किया. पिता ने भी उस की ओर ध्यान नहीं दिया. वह बुरी संगत में पड़ गया और शादे नाम के एक व्यक्ति के डेरे पर जाना शुरू कर दिया.

शादे के डेरे पर ऐसे ही जवान लड़के आते थे, जिन्हें परिवार का प्यार न मिला हो. शादे अपराधी प्रवृत्ति का एक धूर्त व्यक्ति था. उस ने परवेज को चोरियों के काम पर लगा दिया. परवेज का समय शादे के डेरे पर ही गुजरता था.

परवेज अपने एक रिश्तेदार की बेटी से प्रेम करता था, वह लड़की भी उसे चाहती थी. दोनों चोरीछिपे मिलते थे. फिर एक दिन लड़की के मांबाप को उन के प्रेम प्रसंग का पता चला तो लड़की वालों ने उस का रिश्ता दूसरी जगह कर के उस की शादी भी कर दी.

परवेज के लिए यह बहुत बड़ा दुख था. अब वह अधिकतर शादे के डेरे पर रहने लगा. कुछ समय बाद उस की प्रेमिका गर्भवती हो गई और वह बच्चे की डिलिवरी के लिए अस्पताल गई, जिस का औपरेशन डा. समर ने ही किया था. उस औपरेशन के दौरान उस की प्रेमिका की मौत हो गई.

परवेज को यह यकीन हो गया था कि प्रेमिका की मौत डा. समर की लापरवाही से हुई है. उसे डा. समर के इकबाल के संबंधों का भी पता था, इसलिए उस ने समर की हत्या करने का फैसला कर लिया. इस से उस के 2 निशाने पूरे हो जाते.

एक ओर तो उस की प्रेमिका की मौत का बदला पूरा हो जाता. दूसरी ओर वह इकबाल को भी सबक सिखाना चाहता था, क्योंकि उस ने उसे चोरी के इलजाम में नौकरी से निकाला था.

परवेज की कहानी सुनने के बाद केस बिलकुल साफ था. मैं ने उस का इकबालिया बयान लिया. फिर उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. इस केस की जांच मैं ने ही पूरी की.

केस अदालत में चला. गवाहों आदि के बयान हुए. बचाव में परवेज की तरफ से कोई नहीं आया. सेशन कोर्ट ने सबूतों को देखते हुए उसे फांसी की सजा सुनाई. सजा के खिलाफ कोई अपील नहीं हुई लिहाजा उसे फांसी पर लटका दिया गया. यहां यह बात बता दूं कि परवेज को थाने की हवालात से फरार कराने वाला शादे ही था.

Father’s Day Special- मुट्ठीभर स्वाभिमान: भाग 3

सहसा सुकांत को फाइलों के नीचे एक किताब सी नजर आई. खींच कर निकाला तो देखा कि यह तो वही डायरी है जो उस ने बाबूजी को वहां से आते समय दी थी. सुकांत अपनी उत्सुकता न रोक पाया. फाइलें बंद कर दी और डायरी हाथ में लिए नीचे आ गया. लगभग आधी डायरी भरी हुई थी, जिसे वह आराम से पढ़ना चाहता था. डायरी का पहला पृष्ठ बाबूजी ने हवाई जहाज में ही लिखा था:

19 जनवरी : बेटे, सुकांत, मैं जानता हूं, तुम नहीं चाहते थे कि मैं अकेले रहने के लिए भारत वापस जाऊं. लेकिन मेरे लिए तुम्हारा सुखी जीवन अधिक महत्त्वपूर्ण है. मैं तो बीता समय हूं, आने वाला कल तुम हो. मेरे यहां होने से तुम्हारी गृहस्थी में जो दरार पड़ती जा रही थी, वह मेरे लिए शर्म की बात थी. क्या मैं इतना अक्षम हूं कि अपने इस अकेले जीवन का बोझ भी नहीं उठा सकता?

22 जनवरी : वापस तो आ गया हूं, सुकांत, लेकिन घर मानो काटने को दौड़ रहा है. तुम्हारी मां के बिना कुछ भी अच्छा नहीं लगता यहां. पड़ोस के योगेश साहब ने अपना नौकर भेज कर साफसफाई तो करवा दी है, खाना भी भिजवाया है, किंतु जीवन की आवश्यकताएं क्या केवल यही हैं?

25 जनवरी : सुकांत, बहुत याद आ रही है तुम्हारी. इस तरह अकेले रहना कितना कठिन है, यह रह कर ही जान सका हूं. इच्छा होती है कि वापस लौट जाऊं, किंतु शांता को मेरा वहां रहना पसंद नहीं. क्या करूं? कुछ सोच नहीं पाता. बहू में अपनी एक बेटी पाने का सपना था मेरा, जो नियति ने पूरा नहीं होने दिया.

26 जनवरी : आज सारा दिन योगेश साहब के साथ बैठ कर टीवी देखता रहा. 3 दिनों बाद उन के बेटे की शादी है, बड़े खुश थे. पत्नी के निधन के बाद आज पहली बार उन्हें दिल खोल कर हंसते देखा.

2 फरवरी : यह सप्ताह योगेश साहब के बेटे की शादी के हंगामे में कैसे बीत गया, पता भी न चला. पड़ोसी होने के नाते मेरा कर्तव्य भी था कि उन के कार्यों में हाथ बंटाऊं. वे भी तो हर समय मेरा ध्यान रखते हैं. लेकिन अब बड़ी थकान हो रही है. आज कहीं नहीं जाऊंगा.

4 फरवरी : अभीअभी मिठाई का डब्बा पकड़ा गए योगेश साहब. कहने लगे कि बहू के घर से आई है. बड़े ही खुश, खिलेखिले से दिखते हैं वे आजकल. पत्नी की मृत्यु उन्हें भी मेरी ही तरह अकेला कर गई थी. अब बहू ने आ कर घर में रौनक कर दी है. सचमुच, सुशील लड़की है, सगे पिता जैसा प्यार देती है योगेशजी को.

5 फरवरी : अब मैं होटल का खाना खा कर ऊब गया हूं. घर का बना खाना खाने की इच्छा होती है. कहा तो है कई लोगों से, शायद कोई नौकर मिल जाए. कोई छोटा सा लड़का भी मिल जाए तो मैं सब संभाल लूंगा. कभी सोचा भी न था कि यों अकेले रहना पड़ेगा मुझे. अनुभा के बिना यह घर कितना बेरौनक है.

8 फरवरी : अभीअभी सुकांत ने फोन पर बताया कि मैं दादा बन गया हूं. अकेले संभाल ही नहीं पा रहा इतनी खुशी. काश, आज अनुभा जीवित होती तो दादी बनने पर कितनी खुश होती. सुकांत के बच्चों को गोद में खिलाने की अदम्य लालसा मन में लिए ही इस दुनिया से चली गई. प्रकृति की इच्छा के आगे हम कितने विवश हैं. अब मुझे ही देखो, मैं तो जीवित हूं, फिर भी कितनी दूर हूं अपनी पोती से. तड़प रहा हूं उस नन्हीं गुडि़या को एक नजर देखने के लिए. किंतु नहीं, जब तक शांता स्वयं अपने मुंह से आने को न कहे, मुझे वहां नहीं जाना चाहिए. सबकुछ तो चला गया, केवल मुट्ठीभर स्वाभिमान ही तो शेष है. कैसे छोड़ दूं इसे भी?

11 फरवरी : अब रहा नहीं जाता, सुकांत की बच्ची को देखे बिना. कैसी होगी वह गुडि़या. जाने किस पर गई होगी. अनुभा का भी कोई गुण होगा उस में या नहीं? आज ही खत लिखता हूं सुकांत को कि आने के लिए छुट्टी का प्रबंध करे. मैं नहीं जा सकता वहां, लेकिन वे तो यहां आ कर रह सकते हैं न?

13 फरवरी : कल से लिफाफा ला कर रखा है, लेकिन सोच नहीं पा रहा कि क्या सुकांत को आने के लिए कहना ठीक होगा? इतने छोटे बच्चे के साथ सफर करना क्या कोई समझदारी होगी भला? अनुभा भी सदा यही कहती थी कि मैं हर काम में जल्दबाजी करता हूं. उस की कही सब बातें, सारी नसीहतें याद आती रहती हैं. नहीं, मुझे सब्र करना ही होगा. अभी सुकांत को आने के लिए खत लिखना ठीक नहीं.

16 फरवरी : अनुभा, तुम नहीं हो, इसलिए इस डायरी का सहारा लेना पड़ता है. इस बार के अमेरिका प्रवास ने मेरे हृदय पर जो मुहर लगाई, वह अमिट है. किंतु किस से कहूं यह सब? कैसे अपना मन हलका करूं? जो कुछ किसी से भी नहीं कह सकता, उसे कागज के इन कोरे पन्नों पर उतार कर मन को बड़ा चैन मिलता है. तुम होती तो…

अब सुकांत से और अधिक न पढ़ा गया. आंखों में आंसुओं की बाढ़ सी आ गई थी. अपने बड़ों के प्रति किया गया अपनी पीढ़ी का यह अन्याय उस के समक्ष एक चुनौती बन कर खड़ा हो गया कि क्या हक है उसे या उस की पीढ़ी को इस तरह अपने बुजुर्गों को बेसहारा छोड़ने का, उन के स्वाभिमान को ललकारने का, जिन के प्यार का खजाना अभी भी चुका नहीं है, जो बेचैन हैं किसी पर अपना प्यार लुटाने को.

क्यों इस सच को उस की पीढ़ी स्वीकार करने से कतराती है कि वे लोग नहीं जी सकते अकेले? किसी छांह की तलाश अब इन्हें भी है, थके कदमों को किसी बांह का सहारा इन्हें भी चाहिए. कहां गए वे दिन जब बच्चे अपने मातापिता की लंबी आयु की दुआएं मांगा करते थे?

और सहसा सुकांत को लगने लगा कि किसी को तो उदाहरण बनना ही है, तो फिर वही क्यों नहीं? क्या कमी है यहां उस के लिए? इस घर में रह कर तो उसे सदा यही लगेगा कि मां और बाबूजी अभी भी उस के साथ हैं, उन की निश्छल सांसों से महक रहा है सारा घर. आज तक वह कर ही क्या पाया है मां व बाबूजी के लिए?

अब यदि वह उन के यत्न से बसाए इस घर को आ कर संभाल लेगा तो क्या उन के मन को शांति नहीं मिलेगी? मराणोपरांत भी बाबूजी उस के लिए इतना पैसा बैंक में छोड़ गए हैं कि थोड़ी सी लगन व मेहनत से वह यहां दोबारा जम सकता है, अपना नया कारोबार शुरू कर सकता है. अच्छाभला घर है, पैसा भी है. फिर सोचना कैसा?

इन विचारों से प्रभावित होते ही विदेश की उस मिट्टी से सुकांत को न जाने कैसी वितृष्णा हो उठी. उसे लगा अपनी नन्हीं बच्ची को जल्दी से जल्दी अपनी धरती पर ले आए. नहीं तो संबंधों की यह मधुरिमा उस के रक्त में घुल नहीं सकेगी. उस पराए देश में पलबढ़ कर शायद वह भी सुकांत के साथ कल यही करेगी, जो सुकांत ने अपने मातापिता के साथ किया. सुकांत कांप उठा कि नहीं, ऐसा अनर्थ नहीं होने देगा वह.

ऊपर जा कर सुकांत ने अलमारी खोली और बड़े यत्न से बाबूजी की डायरी संभाल कर वापस उस में रख दी. यह उस के लिए अब बाबूजी की दी हुई वह अनमोल निशानी थी जिस ने उस का सही मार्गदर्शन किया.

कल को उस की अपनी बेटी बड़ी हो कर अगर उस से यह सवाल करेगी कि वह अमेरिका छोड़ कर भारत में रहने के लिए वापस क्यों आया, तो वह डायरी उसे पढ़ने के लिए देगा. तब अपने दादादादी को खो कर उस का बचपन अधूरा रह गया, यह दुख उसे भी सालेगा और तब शायद सुकांत अपनी बेटी की बांहों में मुंह छिपा कर रो सकेगा. अपने हृदय पर सालोंसाल चढ़ती दुख की परतों को एकएक कर उतार फेंकेगा.

सुकांत जानता था कि उस के इस फैसले को शांता आसानी से स्वीकार नहीं करेगी, अपनी ताकत से पूरा विरोध करेगी. किंतु सुकांत का निश्चय अब अटल था कि नहीं, वह नहीं बेचेगा इस मकान को, यहीं वापस आएगा वह, जल्दी से जल्दी हमेशाहमेशा के लिए. यही सच्चा आदरसम्मान होगा उस का अपने मातापिता के प्रति.

शेष चिह्न: भाग 3 – कैसा था निधि का ससुराल

‘‘ठहरो, निधि, तुम कभी शौपिंग को नहीं जाती हो? भई, रुपएपैसे मेरी अलमारी में पड़े रहते हैं. जेवर, कपड़े जो चाहिए खरीद लाया करो. कोई रोक नहीं है. आजकल तो महिलाएं नएनए डिजाइन के गहनेकपड़े पहन कर घूमती हैं. मैं चाहता हूं कि तुम भी वैसी ही घूमो, क्लब ज्वाइन कर लो, इस से परिचय बढ़ेगा. पढ़ीलिखी हो, सुंदर हो, थोड़ा स्मार्ट बनो.’’

दूसरे दिन दोनों बहनें बैंक जा कर सारे जेवर बैंक लाकर में रख आईं और चाबी अपने पास रख ली.

निधि कई बार मायके हो आई थी. कभी सोचा था कि दोनों छोटी बहनों को वह अपने पास रख कर पढ़ाएगी पर वह सब जैसे स्वप्न हो गया. हां, रुपए ले जा कर वह सब को कपड़े आदि अवश्य खरीद देती. हर बार जरूरत की कुछ न कुछ महंगी चीज खरीद कर रख जाती. रंगीन टेलीविजन, पंखे, छोटा सा फ्रिज आदि. इस से ज्यादा रुपए लेने की उस की हिम्मत नहीं थी. जब तक निधि मायके रहती कुछ दिन को अच्छा भोजन पूरे घर को मिल जाता, बाद में फिर वही पुराना क्रम चल पड़ता.

अभी मायके से आए निधि को केवल 15 दिन ही हुए थे कि अचानक जैसे परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा. वह बीमार थी. कई दिनों से खांसी से पीडि़त थी. दोनों बहनें खापी कर अपने कमरे में बैठी टेलीविजन देख रही थीं.

तभी जोर से दरवाजे की घंटी बजी. उस ने आ कर दरवाजा खोला तो कुछ अनजाने चेहरों को देख कर चौंक गई.

‘‘आप लोग कौन हैं. साहब घर पर नहीं हैं,’’ उन्हें भीतर घुसते देख कर निधि घबरा गई, ‘‘अरे, अंदर कैसे घुस रहे हैं आप लोग?’’ वह चिल्ला कर बोली ताकि दोनों बहनें सुन लें लेकिन  टेलीविजन के तेज स्वर के कारण उस की आवाज वहां तक नहीं पहुंची. खिड़की से झांक कर दोबारा निधि चिल्ला कर बोली, ‘‘मधु, देखो ये लोग कौन हैं और घर में घुसे जा रहे हैं.’’

‘‘मैडम, हम विजिलेंस आफीसर हैं और आप के यहां छापा मारने आए हैं. यह देखिए मेरा आई कार्ड.’’

दोनों बहनें बाहर दौड़ कर आईं और चिल्ला कर बोलीं, ‘‘पापा घर पर नहीं हैं. जब वह आएं तब आप लोग आइए.’’

‘‘पापा आप के अभी नहीं आ पाएंगे, क्योंकि वह पुलिस हिरासत में हैं.’’

‘‘क्यों, क्या किया है उन्होंने?’’

‘‘शायद आप को पता नहीं कि आप के पापा रिश्वत लेते रंगेहाथों पकड़े गए हैं. अब तो बेल होने पर ही घर आ पाएंगे,’’ यह सुन कर निधि को चक्कर आ गया और वह अपना सिर पकड़ कर बैठ गई.

‘‘पापा से फोन कर के हम बात कर लें तब आप को अंदर घुसने देंगे,’’ यह कहते हुए मधु ने फोन लगाया तो पापा का भर्राया स्वर गूंजा, ‘‘कानून में बाधा मत डालो, मधु. लेने दो तलाशी.’’

शाम को जब वह हारेथके घर आए तो लग रहा था महीनों से बीमार हों. पैर लड़खड़ा रहे थे. उन्होंने पहले निधि को फिर मधु व विधु की ओर देखा. बरामदे में पूरी शक्ति लगा कर वह अपने भारी- भरकम शरीर को चढ़ा पाए पर संभल नहीं पाए और धड़ाम से गिर पड़े. होंठों से झाग बह चला. तीनों के मुंह से चीखें निकल गईं. डाक्टर आया तो उन्होंने तुरंत अस्पताल में भरती करने की सलाह दी. तीनों उन्हें एंबुलेंस में लाद कर अस्पताल ले गईं. डाक्टरों ने हृदयाघात बताया.

निधि सारी रात पति के सिरहाने बैठी रही. दोनों बहनें कुछ देर को घर लौटीं, क्योंकि चपरासी ने बताया था कि मांजी की हालत बहुत खराब हो गई है.

उन्हें होश आया तो वह बोले, ‘‘निधि, मुझे बहुत दुख है कि अभी अपने विवाह को केवल 10 माह ही हुए हैं और मैं इस प्रकार झूठे मामले में फंसा दिया गया. तुम यह मकान बेच कर मां को ले कर मायके चली जाना. मधु के मामा संपन्न हैं. वे उन्हें जरूर इलाहाबाद ले जाएंगे. यदि मां को ले जाना चाहें तो ले जाने देना. मैं ने कुछ रुपए कबाड़खाने के टूटे बाक्स में पुराने कागजों के नीचे दबा रखे हैं. वहां कोई न ढूंढ़ पाएगा. तुम अपने कब्जे में कर लेना. बचे रहे तो मुकदमा लड़ने के काम आएंगे.’’

निधि फूटफूट कर रो पड़ी फिर बोली, ‘‘पर वहां तो सील लग गई है. पुलिस का पहरा है,’’ निधि के मुंह से यह सुन कर उन की आंखों से ढेरों आंसू लुढ़क पड़े. फिर पता नहीं कब दवा के नशे में सोतेसोते ही उन्हें दूसरा दौरा पड़ा, 3 हिचकियां आईं और उन के प्राण निकल गए.

निधि की तो अब दुनिया ही उजड़ गई. जिस धन की इच्छा में उस ने अधेड़ विधुर को अपनाया था वह उसे मंझधार में ही छोड़ कर चला गया.

मातापिता सब आए. मधु के नाना, मामा आदि पूरा परिवार जुड़ आया. सब उस के अशुभ चरणों को कोस रहे थे. चारों ओर के व्यंग्य व लांछनों से वह घबरा गई. पुलिस ने उस के मायके तक को खंगाल डाला था.

मांजी तो जीवित लाश सी हो गई थीं. निधि की हालत देख कर उन्होंने उसे अपने पास बुलाया और पूजागृह से अपनी संदूक खींच कर उसे यह कहते हुए सौंप दी, ‘‘बेटी, इस में जो कुछ है तेरा है. मैं तो अपनी बेटी के पास शेष जीवन काट लूंगी. यह लोग तुझे जीने नहीं देंगे. मकान बिकेगा तो तुझे भी हिस्सा मिलेगा. मेरे दामाद व बेटी तुझे अवश्य हिस्सा दिलवाएंगे. तू अपने नंगे गले में मेरा यह लाकेट डाल ले और ये चूडि़यां, शेष तो सब सरकारी हो गया. बेटी, 1 साल बाद जहां चाहे दूसरा विवाह कर लेना… अभी तेरी उम्र ही क्या है.’’

वह चुपचाप रोती रही. फिर उसे ध्यान आया और जहां पति ने बताया था वहां ढूंढ़ा तो 10 लाख की गड्डियां प्राप्त हुईं. तलाशी तो पहले ही हो चुकी थी इस से वह सब ले कर मांबाप के साथ मायके आ गई. बस, वह पेंशन की हकदार रह गई थी. वह भी तब तक जब तक कि वह पति की विधवा बन कर रहे.

निधि ने रुपए किसी बैंक में नहीं डाले बल्कि उन से कंप्यूटर खरीद कर बहनों के साथ अपनी कंप्यूटर क्लास खोल ली. उस ने बैंक से लोन भी लिया था, जिस से कभी पकड़ी न जाए. अच्छी पेंशन मिली वह भी केस निबटने के कई वर्ष बाद.

मैं निधि के घर तुरंत गई थी. उस का वैधव्य रूप, शिथिल काया, कांतिहीन चेहरा देख कर खूब रोई.

‘‘मीनू, देख, कैसा राजसुख भोग कर लौटी हूं. रही बात अनुकंपा के आधार पर नौकरी मिलने की तो वह 2 राज्यों के चलते कभी न मिल पाएगी. मैं उत्तर प्रदेश में रह नहीं सकती और मध्य प्रदेश में नौकरी मिल नहीं सकती. हर माह पेंशन के लिए मुझे लखनऊ जाना पड़ेगा. गनीमत है कि मैं बाप पर भार नहीं हूं. पति सुख नहीं केवल धन सुख भोग पाऊंगी. इसी रूप की तू सराहना करती थी पर वहां तो सब मनहूस की पदवी दे गए.

‘‘वे क्या जानें कि मैं ने आधी रात को नशे में चूर डगमगाए पति की भारीभरकम देह को कैसे संभाला है. मद में चूर, कामातुर असफल पुरुष की मर्दानगी को गरम रेत पर पड़ी मछली सी तड़प कर लोटलोट कर काटी हैं ये पूरे 10 माह की रातें. मेरा कुआंरा अनजाना तनमन जैसे लाज भरी उत्तेजना से उद्भासित हो उठता.’’

‘‘निधि, संभाल अपनेआप को. तू जानती है न कि मैं अभी इस अनुभव से सर्वथा अनजान हूं.’’

‘‘ओह, सच में मीना. मैं अपनी रौ में सब भूल गई कि तू यह सब क्या जाने. मुझे क्षमा करेगी न?’’

‘‘कोई बात नहीं निधि, तेरी सखी हूं न, जो समझ पाई वह ठीक, नहीं समझी वह भी ठीक. तेरा मन हलका हुआ. शायद विवाह के बाद मैं तेरी ये बातें समझ पाऊंगी, तब तेरी यह व्यथा बांटूंगी.’’

‘‘तब तक ये ज्वाला भी शीतल पड़ जाएगी. मैं अपने पर अवश्य विजय पा लूंगी. अभी तो नया घाव है न जैसे आवां से तप कर बरतन निकलता है तो वह बहुत देर तक गरम रहता है.’’

‘‘अच्छा, अब चलूंगी. बहुत देर हो गई.

मेरी बीवी की सैक्स करने की इच्छा बहुत कम होती है, क्या इस की कोई दवा है?

सवाल
मेरी बीवी की सैक्स करने की इच्छा बहुत कम होती है. क्या इस की कोई दवा है?

जवाब
आप अपनी बीवी को रोमांटिक किताबें पढ़ने को दें और नियमित रूप से रोमांटिक व सैक्सी फिल्में भी दिखाएं. इस से बीवी की फितरत पर फर्क पड़ेगा. हमबिस्तरी से पहले उसे देर तक फोरप्ले कर के जोश में लाएं.

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सुरेंद्र सुखिया की जवानी पर फिदा था. उस के भरे उभारों, मांसल जिस्म और तीखे नैननक्श को देख कर दूसरे लोगों की तरह ही कई बार सुरेंद्र की नीयत भी बिगड़ गई थी. पिछले दिनों सुखिया के पति की ट्रक की टक्कर से मौत हो गई थी. जमींदार के बिगड़े बेटे सुरेंद्र के लिए तो यह सोने पे सुहागा हो गया था, इसलिए कई बार वह सुखिया से अपने दिल की बात कह चुका था.

इस बीच सुखिया लोगों के घर बरतन मांज कर कुछ पैसे कमा लेती थी. एक वकील ने उस से मिल कर उस के पति के बीमे के पैसे के लिए उसे तैयार किया और केस लगा दिया था.

एक दिन सुरेंद्र ने सुखिया से कहा, ‘‘तू कोर्टकचहरी के चक्कर में कहां पड़ी है. जितना तुझे बीमा से मिलेगा, उस से दोगुना मैं तुझे देता हूं. बस, तू एक बार राजी हो जा.’’

सुखिया उस की बात को अनसुना कर देती. सुखिया की गरीबी और जवानी का हर कोई फायदा उठाना चाहता था, इसलिए एक दिन वकील ने कहा, ‘‘सुखिया, तेरा केस लड़तेलड़ते मैं थक गया हूं. अब एक दिन घर आ जा, तो थकान मिट जाए.’’

सुखिया एक दिन कचहरी आ रही थी, तभी उस का केस देखने वाला जज सामने टकरा गया और बोला, ‘‘सुखिया, तेरा केस तो एक ही बार में खत्म कर दूंगा और पैसा भी बहुत दिलवा दूंगा. बस, तू मुझ से मिलने आ जा.’’

लेकिन सुखिया किसी की बात पर कोई ध्यान नहीं देती. बस, अपने चेहरे पर दिलफेंक मुसकराहट ला देती. आखिरकार जज साहब ने 2 लाख रुपए के मुआवजे का फैसला ले लिया. जज और वकील की मिलीभगत थी, इसलिए और्डर की कौपी वकील ने ले ली और हिसाब पूरा करने के बाद उसे सुखिया को देने के लिए राजी हो गया.

कचहरी में चैक बनाने वाले बाबू ने जब सुखिया को देखा, तो उस का भी ईमान डोल गया. वह सुखिया को चैक देने के बहाने बुलाने लगा और सामने बैठा कर उस के उभारों पर नजर गड़ाए रखता.

एक दिन बाबू ने कहा, ‘‘तेरी फाइल और चैक के ऊपर सभी के दस्तखत होंगे, तभी मिलेगा.’’ सुखिया ने परेशान हो कर कहा, ‘‘बाबू, कुछ पैसा चाहिए तो ले लो, क्यों रोजरोज परेशान करते हो?’’

इस पर बाबू उसे अपनी बातों में बहला लेता था. एक दिन जब सुखिया आई, तब बाबू ने कहा, ‘‘मैं फाइल और चैक तैयार रखूंगा. तुम आ जाना, फिर वहीं सब के दस्तखत करा कर चैक दे देंगे.’’ सुखिया इस के लिए तैयार हो गई.

यह खबर जब दारोगा को मिली, तो वह भी इस में शामिल हो गया. इस से यह डर भी खत्म हो गया कि अगर सुखिया ने कहीं शिकायत वगैरह की, तो कुछ नहीं होगा. बाबू की पत्नी मायके गई थी, इसलिए सुखिया को उसी के कमरे में बुलाया.

सुखिया ने वहां पहुंच कर परेशान होते हुए कहा, ‘‘अब तो चैक पर दस्तखत कर के दे दो, क्यों इतना परेशान कर रहे हो?’’ कचहरी के बाबू ने कुटिल हंसी हंसते हुए कहा, ‘‘सुखिया, ऐसी भी क्या जल्दी है, थोड़ा रुको तो.’’

इधर सुखिया कसमसाती रही, उधर फाइलचैक पर दस्तखत होते रहे.

गांव की गोरी ऐसे बनें शहर की स्मार्ट छोरी

लंबे कुरते, सलवार और दुपट्टे के साथ जब 2 चोटियों वाली नैना इंगलिश सीखने की क्लास में दाखिल हुए तो अचानक सब की नजरें उस की तरफ उठ गईं. उस की 2 चोटियां, ढीली सलवार और फ्लैट चप्पल के साथ कंधे पर कपड़े का बैग टांगने का अंदाज देख कर शहरी लड़केलड़कियों में कानाफूसी शुरू हो गई, लेकिन एक स्टूडैंट नीरजा को यह सब अच्छा नहीं लगा.

नैना यह भांप गई और उस ने नीरजा के आगे दोस्ती का हाथ बढ़ाते हुए कहा, ‘मैं नैना हूं. मुझे गांव से आए एक महीने से ज्यादा नहीं हुआ है और मैं यहां अपना इंगलिश ठीक करने आई हूं. पर ऐसा लग रहा है जैसे सब मुझे ही देख कर हंस रहे हैं. क्या सचमुच इतनी अजीब लग रही हूं मैं?’

नीरजा ने बड़े प्यार से कहा, ‘ऐसा कुछ नहीं है नैना. तुम्हारा लुक कुछ अलग है न, इसलिए इन लोगों ने इस तरह से तुम्हें देखा है. तुम घबराओ नहीं. मैं तुम्हें यहां का रहनसहन और जीने का तरीका बता दूंगी.’

नैना ने मुसकरा कर सहमति दे दी और अगले ही दिन नीरजा नैना को ब्यूटी पार्लर ले गई. उस ने सब से पहले नैना की लंबी चोटियों को कटवा कर बाल कंधे तक करवा दिए. स्टाइलिश कटिंग के साथसाथ उसे जुल्फों को खुला रखना सिखाया. उस के आइब्रोज वगैरह बनवाए. उस की वैक्सिंग करवाई. मैनीक्योर, पैडीक्योर करवाया. इस के बाद वह नैना को एक शोरूम में ले कर गई और वहां से कुछ स्टाइलिश कपड़े और फुटवियर भी दिलवाए और कुछ दिनों तक उसे बातचीत का तरीका भी सम?ाया.

10 दिनों के अंदर वाकई नैना के अंदर इतने ज्यादा बदलवाव आ गए कि अब लड़के उस की तरफ देख कर मजाक में हंसते नहीं थे, बल्कि आहें भरने लगे थे.

जाहिर सी बात है कि जब एक सीधीसादी लड़की कुछ सपने ले कर गांव से शहर आती है तो इस के लिए उसे पहले तो अपने परिवार वालों, समाज और आसपड़ोस वालों से जंग जीतनी होती है. उसे लोगों को सम?ाना होता है कि वह भी आगे बढ़ना चाहती है, कुछ करना चाहती है. शहर में उस का कोई रिश्तेदार या जानने वाला होता है तो मांबाप किसी तरह दिल पर पत्थर रख कर और उस लड़की पर भरोसा कर बड़ी मुश्किल से उसे शहर भेजते हैं. कई बार जब ससुराल शहर में हो तो शादी के बाद भी लड़की शहर आ जाती है.

जब वह शहर में पढ़ने, नौकरी करने और अपने सपनों को पूरा करने के लिए आती है तो इस माहौल में एकदम से घुलमिल नहीं पाती. उसे एडजस्ट करने में थोड़ा समय लगता है. यहां के स्टाइलिश लड़केलड़कियों को देख कर वह थोड़ी सहम सी जाती है. उसे लगता है पता नहीं वह यहां रह भी पाएगी या नहीं. ऐसे में जरूरी है कि उसे किसी का मानसिक सपोर्ट मिले.

साल 1986 में आई एक फिल्म ‘नसीब अपनाअपना’ में एक गांव की बदसूरत गंवार सी लड़की चंदो को खूबसूरत रूपरंग देने की दास्तान काफी रोचक थी. इस में ऋषि कपूर हीरो थे. उन्होंने किशन का किरदार निभाया था.

पिता के कहने पर जबरन गांव की लड़की से शादी करने के बाद किशन शहर आ जाता है. यहां एक खूबसूरत शहरी लड़की से शादी कर लेता है. बाद में गांव वाली पत्नी शहर आती है और पति के घर में ही नौकरानी बन कर रहने लगती है वह पति की दूसरी पत्नी (राधा) को बहन का दर्जा देती है. धीरेधीरे राधा चंदो को शहरी सलीके सिखाती है और उस का रंगरूप बदल कर उसे इतना खूबसूरत बना देती है कि उस का पति भी दंग रह जाता है.

आइए जानते हैं कि एक सीधीसादी लड़की किस तरह अपना रूप बदल सकती है:

कपड़ों का कमाल

अपने कपड़े बदल कर आप खुद को काफी हद तक बदल सकती हैं. गांव की वेशभूषा गांव में ही शोभा देती है. शहरों में आप कुछ अलग तरह के कपड़े ट्राई करें. पहले आप ट्रेडिशनल सलवारकुरते के बजाय अनारकली सूट, स्ट्रेट लोंग कुरती और लैगिंग्स, पैरलल या जींस ट्राई करें. समय के साथ आप जींस और शर्ट वगैरह ट्राई कर सकती हैं. आप सलवार के बजाय पटियाला भी ट्राई कर सकती हैं. यह आप की पुरानी कुरती को भी नया लुक देती है.

जुल्फों से संवरता लुक

आप खुद को स्मार्ट दिखाना चाहती हैं तो अपना हेयरस्टाइल जरूर चेंज करें. गांव में आप भले ही 2 चोटियां बनाती हों, पर शहर आ कर आप को अपने बालों को एक अच्छी कटिंग देनी चाहिए. अगर आप को लगता है कि अपने बाल स्ट्रेट या कर्ली करवा कर आप उन्हें संभाल सकती हैं, तो जरूर ट्राई करें.

इन सब के अलावा जरूरी है कि आप अपने आइब्रोज बनवाएं. अपनी स्किन को ग्लो करने के लिए फेशियल करवाएं.

पेडीक्योर, मैनीक्योर और वैक्सिंग करवाएं, ताकि दूसरों के आगे अलग सा या हीन महसूस न करें, बल्कि सब के बीच निखर कर सामने आएं.

फुटवियर पर दें ध्यान

कपड़ों और बालों के बाद आप को अपनी फुटवियर पर भी ध्यान देना होगा. गांव में फ्लैट चप्पल या फ्लैट सैंडल पहन कर आप कहीं भी निकल सकती हैं. ज्यादा हुआ तो जूती पहन ली, लेकिन शहरों में लोग आप के फुटवियर पर भी ध्यान देते हैं. कुछ स्टाइलिश सैंडल्स ट्राई कीजिए जो आप के कपड़ों से मैच करते हुए होने चाहिए.

मेकअप भी है जरूरी

गांव में लड़कियां ज्यादातर काजल, बिंदी और लिपस्टिक के अलावा कोई खास मेकअप नहीं करतीं, पर शहरों में लड़कियों की चौइस थोड़ी अलग होती है. शहरों में आप काजल के साथसाथ बहुत कुछ लगा सकती हैं जैसे आई मेकअप, मसकारा, आई लाइनर, आई शैडोज जैसी चीजें इस्तेमाल कर सकती हैं. इस के अलावा होंठों पर आप हलके रंग के मैचिंग लिपस्टिक या लिप बाम जो कलरफुल होते हैं, का इस्तेमाल कर सकती है. शहरों में आप के पास चौइस बहुत ज्यादा हैं. आप कम चटकमटक वाले सोबर कलर चुन सकती हैं. शहर की लड़कियों से आप मेकअप करना सीख सकती हैं. कैसे पाउडर, फाउंडेशन, ब्लशर या कंसीलर आदि का इस्तेमाल कर चेहरे की कमियों को छिपाया जाता है. मेकअप ऐसा न हो जो पोता हुआ लगे, बल्कि लाइट मेकअप करना सीखना होगा. इस के लिए किसी दोस्त या ब्यूटी पार्लर की मदद भी ली जा सकती है.

आभूषण भी हों कुछ अलग

गांव में अकसर लड़कियां जितने भारी गहनें पहनती हैं उतना अच्छा माना जाता है. गहने काफी कलरफुल भी होते हैं. वे सोनेचांदी के गहने ज्यादा पहनती हैं और शहरों में ये चीजें इतनी पसंद नहीं की जाती. शहरी लड़कियों को आप देखेंगी कि वे बहुत लाइट वेट आभूषण पहनती हैं. एक पतली सी चेन या रिंग या फिर ?ामके. ?ामके भले ही बड़ेबड़े भी पहने जाते हैं, पर वे सोनेचांदी के नहीं बल्कि डायमंड या प्लैटिनम वगैरह के होते हैं और थोड़े स्टाइलिश होते हैं. कपड़ों के साथ मैच करने वाले होते हैं.

इंगलिश भी जरूरी

शहर आ कर लुक बदलना है और आत्मवविश्वास पैदा करना है तो आप को इंगलिश सीखनी पड़ेगी. बहुत ज्यादा नहीं तो भी कामचलाऊ इंगलिश तो आनी ही चाहिए और इस के लिए आप इंगलिश सीखने की क्लास में जा सकती हैं. इस के अलावा ग्रूमिंग क्लासेज जौइन कर सकती हैं जहां आप को उठनेबैठने, बात करने और खानेपीने का सलीका बताया जाता है. ऐसा नहीं कि गांव में सलीका नहीं है. लेकिन गांव में काम चल जाता है मतलब आप किसी भी तरह रह सकती हैं. मगर शहर में आ कर आप को बहुत कुछ सीखना होगा. अपने बोलने, खानेपीने घूमनेफिरने के अंदाज थोड़े बदलने होंगे. सीधीसादी बने रहने के बजाय स्मार्ट बनना होगा, दिमाग से भी और शरीर से भी.

लहजे में लाएं बदलाव

इंगलिश जरूरी है पर न जानने पर हीन भावना नहीं पालें. शब्दों का सही उच्चारण सीखें. गांव में बोलने का लहजा कुछ अलग होता है और शहरों का अलग होता है. उस लहजे को सुधारना बहुत जरूरी है. अकसर गांव में जिन शब्दों का हम इस्तेमाल करते हैं जैसे, नमस्कार, कैसे हो, सब ठीक तो है, खाना खा लिया आदि शहरों में ज्यादा नहीं चलते. नमस्कार के बजाय हैलोहाय या गुड मौर्र्निंग कहें. इसी तरह कैसे हो की जगह हाउ आर यू, आल फाइन, सब सही की जगह आल गुड और इसी तरह व्हाट्सअप, हाउ इट इज, फाइन, सौरी, थैंक्स, वैलकम जैसे शब्द आप की जबान पर होने चाहिए.

उपहारों का लेनदेन

पैसे बरबाद न करते हुए भी सब के साथ बराबर का खर्च करें. उपहार देनालेना सीखें. कहीं घूमने जाएं तो दूसरों के लिए कुछ लेना न भूलें. इस से दोस्ती भी गहरी होती है और एक तरह की मानसिक खुशी भी मिलती है. उपहार ऐसे खरीदें जो सामने वाले के काम के तो हों ही साथ ही साथ आप की नई सोच दिखाने वाले भी हों.

खुशबू भी जरूरी

अपने शरीर से आ रही महक बदलने के लिए परफ्यूम का इस्तेमाल करें. आजकल मार्किट में 100-200 रुपए की रेंज में भी अच्छे परफ्यूम और डिओडिरैंट मुहैया हैं. गांव के कुछ खानों से बदन में अलग महक आती है, उन्हें छोड़ें.

अच्छी किताबें पढ़ें

भरपूर किताबें पढ़ें. मार्किट या लाइब्रेरी में हर विषय पर किताबें मिल जाएंगी. कुछ महिला पत्रिकाएं ऐसी होती हैं जिन में एक ही जगह आप को हर विषय के ज्ञान जैसे फैशन, कुकरी, मेकअप के साथसाथ राजनीति, समाज और घरपरिवार से जुड़ी भी हर तरह की जानकारी और तर्कशील सोच बढ़ाने वाले लेख भी मिल जाएंगे. इन्हें पड़े सम?ों और जिंदगी में उतारने की कोशिश करें.

किसने सोचा था सुहाग पर भारी पड़ेगा प्यार

उस महिला की शक्ल देख कर ही उत्तर प्रदेश के जिला इलाहाबाद के थाना झूंसी के थानाप्रभारी विजय प्रताप सिंह को लगा कि यह किसी भारी मुसीबत में है. उन्होंने उसे बैठा कर उस की परेशानी पूछी तो उस ने रोते हुए कहा, ‘‘साहब, कल रात से मेरे पति का कुछ पता नहीं है.’’

‘‘क्या नाम है तुम्हारा, तुम रहती कहां हो?’’ विजय प्रताप सिंह ने पूछा तो महिला ने रोते हुए कहा, ‘‘साहब, मेरा नाम आरती है और मैं यहीं पड़ोस में शिवगंगा विहार कालोनी में रहती हूं.’’

‘‘अपने पति के बारे में पूरी बात बताओ. वह कब घर से गए, कहां गए और कब तक रोज घर आते थे? वह करते क्या हैं, उन का नाम क्या है?’’

‘‘साहब, उन का नाम विजयशंकर पांडेय है. वह कल दोपहर बाद घर से निकले थे. शाम तक घर नहीं आए तो मैं ने उन के मोबाइल पर फोन किया. लेकिन बात नहीं हो सकी, क्योंकि उन का फोन बंद था. एक तो पानी बरस रहा था, दूसरे बात नहीं हो पा रही थी, इसलिए मुझे चिंता हो रही थी. घर के पिछले हिस्से में बाढ़ का पानी भी भरा था, ऐसे में उन का न आना परेशान कर रहा था. बरसात की वजह से मैं उन्हें कहीं खोजने भी नहीं जा सकी. जब वह सवेरे भी नहीं आए और बात भी नहीं हो सकी तो मैं थाने आ गई.’’

‘‘ठीक है, मैं तुम्हारे पति की गुमशुदगी दर्ज करा कर आगे की काररवाई करता हूं.’’ विजय प्रताप सिंह ने कहा और विजयशंकर पांडेय की गुमशुदगी दर्ज करा दी.

लेकिन जब उन्होंने आरती से आगे पूछताछ की तो उन्हें उस की विरोधाभासी बातों से उसी पर ही संदेह हुआ, क्योंकि उस ने उन के तमाम सवालों के जवाब इस तरह दिए थे, जो पहले दिए जवाबों से मेल नहीं खा रहे थे. इस से उन्हें लगा कि यह कुछ छिपा रही है.

कुछ दिशानिर्देश दे कर विजयप्रताप सिंह ने इस मामले की जांच की जिम्मेदारी एसआई काशीप्रसाद कुशवाहा को सौंप दी. उन्होंने कहा था कि पहले वह आरती के बारे में पता करें कि उस का चरित्र कैसा है? काशीप्रसाद कुशवाहा सिपाहियों को ले कर शिवगंगा विहार कालोनी जाने की तैयारी कर रहे थे कि उन्हें फोन द्वारा सूचना मिली पति की गुमशुदगी दर्ज कराने वाली आरती के घर से थोड़ी दूरी पर बाढ़ के पानी में एक लाश तैर रही है.

काशीप्रसाद ने तुरंत यह जानकारी थानाप्रभारी को दी और खुद मोटरवोट तथा गोताखोरों की व्यवस्था कर के घटनास्थल पर पहुंच गए. लाश को निकलवा कर बाहर लाया गया तो पता चला कि वह लाश आरती के पति विजयशंकर पांडेय की थी, जिस की कुछ देर पहले ही उस ने गुमशुदगी दर्ज कराई थी.

लाश मिलने की सूचना पा कर कालोनी वाले तो इकट्ठा थे ही, आरती भी अपने तीनों बच्चों और कुछ शुभचिंतकों के साथ वहां पहुंच गई थी. सूचना पा कर विजय प्रताप सिंह भी आ गए थे.

लाश की शिनाख्त हो ही चुकी थी. पुलिस लाश का निरीक्षण करने लगी तो मृतक के सिर में एक बड़ा सा घाव दिखाई दिया. इस का मतलब था कि मृतक पानी में डूब कर नहीं मरा था, उस के सिर पर किसी भारी चीज से वार कर के उसे मारा गया था. उस के गले पर भी कसने के निशान थे.

इन बातों से साफ हो गया था कि यह हत्या का मामला था. घटनास्थल की सारी काररवाई निपटा कर पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए मैडिकल कालेज भिजवा दिया.

अगले दिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिली तो पता चला कि विजयशंकर की कनपटी और सिर के पिछले हिस्से पर किसी भारी चीज से कई वार किए गए थे, इस के अलावा उस के गले में कोई चीज लपेट कर कसा गया था.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट से साफ हो गया था कि यह हत्या का मामला था. इस के बाद विजय प्रताप सिंह ने विजयशंकर की गुमशुदगी को हत्या में तब्दील कर आगे की जांच शुरू कर दी. चूंकि उन्हें मृतक की पत्नी आरती पर संदेह था, इसलिए उन्होंने पूछताछ के लिए उसे थाने बुला लिया.

आरती से पूछताछ की जाने लगी, लेकिन वह कुछ भी बताने को राजी नहीं थी. वह अपने पहले वाले बयान को ही बारबार दोहराती रही. जबकि पुलिस को पूरा विश्वास था कि हत्या उसी ने कराई है या खुद ही की है, इसलिए पुलिस ने उस के पिछले बयान पर विश्वास न कर के जब उस के साथ थोड़ी सख्ती की तो उस ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए बताया कि प्रेमी रामेंद्र सिंह उर्फ मिंटू और उस के दोस्त चंद्रमा सिंह उर्फ चंदन के साथ मिल कर उसी ने पति विजयशंकर पांडेय की हत्या की थी. इस के बाद उस ने पति की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी—

कौशांबी का रहने वाला विजयशंकर पांडेय 8-10 साल पहले परिवार सहित इलाहाबाद आ कर वाराणसी की ओर जाने वाले रोड पर स्थित झूंसी में इलाहाबाद प्राधिकरण द्वारा बनवाई गई शिवगंगा विहार कालोनी में रहने लगा था. उस के परिवार में पत्नी आरती के अलावा 3 बच्चे थे.

गुजरबसर के लिए विजयशंकर ने मकान में ही किराए पर फिल्मों की सीडी देने की दुकान खोल ली थी. इस के अलावा वह थोड़ाबहुत प्रौपर्टी डीलिंग का भी काम कर लेता था. जब कभी वह बाहर चला जाता था, दुकान पर उस की पत्नी आरती बैठ जाती थी.

विजयशंकर दुकान पर अश्लील फिल्मों की भी सीडी रखता था. इस बात की जानकारी आरती को भी थी. मनचले उन्हें लेने आते थे तो वह उन्हें देती भी थी. जो महिलाएं इस का शौक रखती थीं, वे आरती से ही ऐसी फिल्मों की सीडी ले जाती थीं.

विजयशंकर का पड़ोसी रामेंद्र सिंह उर्फ मिंटू भी अश्लील फिल्मों का शौकीन था. चूंकि वह आरती को भाभी कहता था, इसलिए दोनों में हंसीमजाक भी होता रहता था. इसलिए रामेंद्र को आरती से अश्लील सीडी मांगने में संकोच भी नहीं होता था. एक दिन रामेंद्र सीडी लेने आया तो आरती ने कहा, ‘‘देवरजी, कब तक इस तरह की फिल्में देख कर दिन काटोगे? अरे कहीं से घर वाली ले आओ.’’

‘‘भाभी, घरवाली मिलती तो जरूर ले आता. जब तक कोई नहीं मिल रही, फिल्में देख कर ही संतोष करना पड़ रहा है.’’ रामेंद्र ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘जब तक घरवाली नहीं मिल रही, इधरउधर से व्यवस्था कर लो.’’ आरती ने रामेंद्र की आंखों में आंखें डाल कर कहा.

‘‘कौन पूछता है भाभी. भूखे को कोई भोजन नहीं देता. जिस का पेट भरा रहता है, उसी को सब पूछते हैं.’’ रामेंद्र ने सकुचाते हुए कहा.

‘‘कभी किसी से अपनी परेशानी कही है?’’

‘‘कोई फायदा नहीं भाभी, लोग हंसी ही उड़ाएंगे.’’

‘‘जब तक कहोगे नहीं, कोई तुम्हारी मदद कैसे करेगा?’’ आरती ने कहा.

‘‘आप से कहूं तो क्या आप मेरी मदद करेंगी? 4 गालियां जरूर दे देंगी.’’ रामेंद्र ने आरती के चेहरे पर नजरें गड़ा कर कहा.

आरती ने चेहरे पर रहस्यमयी मुसकान ला कर कहा, ‘‘एक बार कह कर तो देखो. अरे मैं तुम्हारी पड़ोसन हूं. पड़ोसी पड़ोसी की मदद नहीं करेगा तो क्या दूर वाला मदद करने आएगा.’’

अब इस से ज्यादा आरती क्या कहती. रामेंद्र भी बेवकूफ नहीं था. वह उस की बात का मतलब समझ गया. उस समय न विजयशंकर घर में था और न बच्चे. रामेंद्र आरती के घर में घुस गया. उस के बाद निकला तो बहुत खुश था. पत्नी की मौत के कई सालों बाद उस दिन उसे स्त्रीसुख मिला था.

दूसरी ओर आरती भी खुश थी. रामेंद्र ने उसे पूरी तरह खुश कर दिया था. एक बार दूरी मिटी तो सिलसिला चल निकला. जब भी उन्हें मौका मिलता, इच्छा पूरी कर लेते. दोनों अगलबगल रहते थे, इसलिए उन्हें मिलने में परेशानी भी नहीं होती थी.

आरती और रामेंद्र के बीच अवैध संबंध बने तो उन के बातचीत और हंसीमजाक का लहजा बदल गया. अब आरती उस का खयाल भी खूब रखने लगी, इसलिए आसपड़ोस वालों को संदेह होने लगा तो लोग इस बात को ले कर चर्चा करने लगे. नतीता यह निकला कि इस बात की जानकारी विजयशंकर को भी हो गई.

विजयशंकर को पत्नी पर पूरा विश्वास था, इसलिए उस ने चर्चा पर विश्वास न कर के खुद सच्चाई का पता लगाने का निश्चय किया. वह जानता था कि अगर वह इस बारे में पत्नी से पूछेगा तो वह सच्चाई बताएगी नहीं, बल्कि उस के पूछने से होशियार हो जाएगी. सच्चाई का पता लगाने के लिए वह बाहर जाने के बहाने घर से निकलता और छिप कर पत्नी तथा रामेंद्र पर नजर रखता.

उस की इस मेहनत का उसे जल्दी ही फल मिल गया. एक दिन दोपहर को उस ने आरती और रामेंद्र को रंगेहाथों पकड़ लिया. गुस्से में आरती को वह लातघूंसों से पीटने लगा. आरती के पास सफाई देने को कुछ नहीं था, इसलिए वह गलती के लिए माफी मांगते हुए भविष्य में फ

Father’s Day Special:अपनाअपना क्षितिज- भाग 3 : एक बच्चे के लिए तड़पते सत्यव्रत

प्रभावती खुश रहने लगीं. देर से ही, पर सत्यव्रत प्रशांत की सड़ीगली किताबों के ढेर से प्रीत तो कर सके. कभीकभी मन करता कि सत्यव्रत से पूछ लें, ‘लिख दूं प्रशांत को, यहीं आ जाए. कितना सूना लगता है मेरा घर. बच्चों के आने से रौनक हो जाएगी. सुशांत की चिट्ठियां आती हैं तो उन से यही लगता है कि शेर के मुंह खून लग गया है. वह उस पराए देश का गुणगान ही करता रहता है. ऐसा लगता है जैसे वह वहीं बस जाएगा.’

पर कह कहां पातीं. डर लगता कि सत्यव्रत बुरा न मान जाएं. ऐसा न समझें कि वह उन्हें प्रशांत से पराजित करना चाहती है. शायद किसी दिन स्वयं ही कह दें, ‘प्रभा, प्रशांत को बुला लो. वह भी तो हमारा बेटा है. मैं ने उसे बहुत उपेक्षित किया. अब उस का प्रायश्चित्त करूंगा.’

पर सत्यव्रत खुद कभी न बोले. अंदर से कई बार वह उबलतेउफनते प्रशांत से मिलने के लिए उतावले हो उठते पर उसे बुला लेने की बात होंठों पर न लाते.

साल भर तो जैसेतैसे निकला. पर इस के बाद सत्यव्रत के अंदर का तनाव रोग बन कर फूट पड़ा. वह रक्तचाप के साथसाथ दमे की भी गिरफ्त में आ गए.

डाक्टरों ने उन से बहुत अधिक न सोचने, व्यर्थ परेशान न होने की ताकीद कर दी. बारबार प्रभावती को भी हिदायतें मिलीं कि वह अपने पति को व्यस्त रखें और दिमागी तौर पर प्रसन्न रखें. तब प्रभावती स्वयं को रोक न पाईं. वह समझ गईं कि बुढ़ापे के इस अकेलेपन में वह प्रशांत के लिए परेशान हैं. पुत्र को देखनेमिलने के लिए वह तड़प रहे हैं. पर अंदर के संकोच व पिता होने के अभिमान ने उन का मुंह सी रखा है.

तब प्रभावती ने प्रशांत को सब समझा कर पत्र लिख ही दिया. पत्र मिलने में 4-5 दिन लगे होंगे और अब प्रशांत उन की सेवा में वैसे ही उपस्थित हो गया, जैसे आज से पहले कुछ हुआ ही न हो. दमे से खांसते सत्यव्रत से प्रशांत ने उन का हालचाल पूछा तो उन की हालत देखने लायक हो गई. आंखों के दोनों कोर भीग गए. कैसे सिसकी भर कर रो पड़े.

प्रशांत ने उन्हें सहारा दे कर उठाया, ‘‘छि:, पिताजी, रोते नहीं. लीजिए, अपने पोते से मिलिए.’’

सत्यव्रत ने प्रकाश को बड़ी जोर से अपनी छाती से भींच कर आंखें मूंद लीं. थोड़ी देर बाद रजनी ने उन के पैरों का स्पर्श किया तो वह स्वयं को संभाल कर आंखें पोंछने लगे. कुछ मुसकरा कर उसे आशीर्वाद दिया. प्रभावती सत्यव्रत की ओर बढ़ीं और वह प्रकाश को दुलार कर पूछने लगे, ‘‘कौन सी कक्षा में पढ़ते हो?’’

प्रकाश ने हंस कर बताया, ‘‘तीसरी में.’’

‘‘खूब, और क्याक्या करते हो?’’

‘‘मन लगा कर सितार बजाता हूं. मैं बहुत अच्छा सितारवादक बनूंगा, दादाजी.’’

प्रभावती सन्न रह गईं, कहीं सत्यव्रत बिदक न पड़ें. अभी प्रशांत के प्रति जो थोड़ाबहुत पिघलाव शुरू हुआ है वह फिर हिम न हो जाए. ऐसा हुआ तो वह कभी प्रशांत के साथ रहना पसंद नहीं करेंगे. वह कुछ कहतीं, उस से पहले ही प्रशांत ने थोड़ा झेंप कर सफाई दी, ‘‘क्या कहूं, पिताजी, बहुत चाहता हूं कि यह पढ़ाई ज्यादा करे और शौक कम पूरे करे, पर यह मानता ही नहीं. सोचता हूं कि इसे डाक्टर बना कर अपने डाक्टर न होने की आप की शिकायत दूर कर दूंगा.’’

‘‘कोईर् बात नहीं,’’ सत्यव्रत ने सब की इच्छा के विपरीत प्रभावती से कहा, ‘‘तुम तो अच्छा सितार बजाती हो, प्रभा, तुम इस की मदद करना. यह भी प्रशांत की तरह हमारा नाम रोशन करेगा.’’

प्रभावती की आंखें भर आईं. प्रशांत ने चकित हो कर पूछा, ‘‘मगर सितार बजाने भर से यह क्या कर लेगा, पिताजी?’’

सत्यव्रत ने बहुत दृढ़ स्वर में कहा, ‘‘यह सोचना तुम्हारा काम नहीं है. इस के पंख काट कर इस की उड़ान मत रोको. प्रशांत, जो गलती कल मैं करता रहा, उसे आज तुम मत दोहराओ. मन के सुर जिस प्रकार बजना चाहते हैं उन्हें उसी प्रकार बजने दो. यह मत समझो कि यह डाक्टर- इंजीनियर नहीं बन सका तो इस की उड़ान खत्म हो गई. नहीं बेटे, नहीं. यह सोचना बड़ी भूल है.

‘‘मुझे अफसोस है कि मैं तुम्हारी कला को कोई विकास नहीं दे सका. अगर मैं ने तुम्हारी कोई मदद की होती तो आज तुम वहां होते, जहां 20 साल बाद होगे. हम अपनी इच्छा मनवाने के चक्कर में भूल जाते हैं कि जिसे ऊपर उठना होता है, वह अपना क्षितिज स्वयं ही ढूंढ़ लेता है. तुम्हीं बोलो, सूरज को आकाश में कौन चढ़ाता है? कोई भी तो नहीं. वह खुद ही ऊंचाइयों की तरफ उठता चला जाता है

गलती का एहसास : 2 जिस्मों की प्यास

सौरभ दफ्तर के काम में बिजी था कि अचानक मोबाइल फोन की घंटी बजी. मोबाइल की स्क्रीन पर कावेरी का नाम देख कर उस का दिल खुशी से उछल पड़ा.

कावेरी सौरभ की प्रेमिका थी. उस ने मोबाइल फोन पर ‘हैलो’ कहा, तो उधर से कावेरी की आवाज आई, ‘तुम्हारा प्यार पाने के लिए मेरा मन आज बहुत बेकरार है. जल्दी से घर आ जाओ.’

‘‘तुम्हारा पति घर पर नहीं है क्या?’’ सौरभ ने पूछा.

‘नही,’ उधर से आवाज आई.

‘‘वह आज दफ्तर नहीं आया, तो मुझे लगा कि वह छुट्टी ले कर तुम्हारे साथ मौजमस्ती कर रहा है,’’ सौरभ मुसकराते हुए बोला.

‘ऐसी बात नहीं है. वह कुछ जरूरी काम से अपने एक रिश्तेदार के घर आसनसोल गया है. रात के 10 बजे से पहले लौट कर नहीं आएगा, इसीलिए मैं तुम्हें बुला रही हूं. तनमन की प्यास बुझाने के लिए हमारे पास अच्छा मौका है. जल्दी से यहां आ जाओ.’

‘‘मैं शाम के साढ़े 4 बजे तक जरूर आ जाऊंगा. जिस तरह तुम मेरा प्यार पाने के लिए हर समय बेकरार रहती हो, उसी तरह मैं भी तुम्हारा प्यार पाने के लिए बेकरार रहता हूं.

‘‘तुम्हारे साथ मु?ो जो खुशी मिलती है, वैसी खुशी अपनी पत्नी से भी नहीं मिलती है. हमबिस्तरी के समय वह एक लाश की तरह चुपचाप पड़ी रहती है, जबकि तुम प्यार के हर लमहे में खरगोश की तरह कुलांचें मारती हो. तुम्हारी इसी अदा पर तो मैं फिदा हूं.’’

थोड़ी देर तक कुछ और बातें करने के बाद सौरभ ने मोबाइल फोन काट दिया और अपने काम में लग गया.

4 बजे तक उस ने अपना काम निबटा लिया और दफ्तर से निकल गया.

सौरभ कावेरी के घर पहुंचा. उस समय शाम के साढ़े 4 बज गए थे. कावेरी उस का इंतजार कर रही थी.

जैसे ही सौरभ ने दरवाजे की घंटी बजाई, कावेरी ने ?ाट से दरवाजा खोल दिया. मानो वह पहले से ही दरवाजे पर खड़ी हो.

वे दोनों वासना की आग से इस तरह झलस रहे थे कि फ्लैट का मेन दरवाजा बंद करना भूल गए और झट से बैडरूम में चले गए.

कावेरी को बिस्तर पर लिटा कर सौरभ ने उस के होंठों को चूमा, तो वह भी बेकरार हो गई और सौरभ के बदन से मनमानी करने लगी.

जल्दी ही उन दोनों ने अपने सारे कपड़े उतारे और धीरेधीरे हवस की मंजिल की तरफ बढ़ते चले गए.

अभी वे दोनों मंजिल पर पहुंच भी नहीं पाए थे कि किसी की आवाज सुनाई पड़ी, ‘‘यह सब क्या हो रहा है?’’

वे दोनों घबरा गए और ?ाट से एकदूसरे से अलग हो गए.

सौरभ ने दरवाजे की तरफ देखा, तो बौखला गया. दरवाजे पर कावेरी का पति जयदेव खड़ा था. उस की आंखों से अंगारे बरस रहे थे.

उन दोनों को इस बात का एहसास हुआ कि उन्होंने मेन दरवाजा बंद नहीं किया था.

कावेरी ने ?ाट से पलंग के किनारे रखे अपने कपड़े उठा लिए. सौरभ ने भी अपने कपड़े उठाए, मगर जयदेव ने उन्हें पहनने नहीं दिया.

जयदेव उन को गंदीगंदी गालियां देते हुए बोला, ‘‘मैं चुप रहने वालों में से नहीं हूं. अभी मैं आसपड़ोस के लोगों को बुलाता हूं.’’

कावेरी ने जयदेव के पैर पकड़ लिए. उस ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘प्लीज, मु?ो माफ कर दीजिए. अब ऐसी गलती कभी नहीं करूंगी.’’

‘‘मैं तुम्हें हरगिज माफ नहीं कर सकता. तुम तो कहती थीं कि मैं कभी किसी पराए मर्द को अपना बदन छूने नहीं दूंगी. फिर अभी सौरभ के साथ क्या कर रही थीं?’’

कावेरी कुछ कहती, उस से पहले जयदेव ने सौरभ से कहा, ‘‘तुम तो अपनेआप को मेरा अच्छा दोस्त बताते थे. यही है तुम्हारी दोस्ती? दोस्त की पत्नी के साथ रंगरलियां मनाते हो और दोस्ती का दम भरते हो. मैं तुम्हें भी कभी माफ नहीं करूंगा.

‘‘फोन कर के मैं तुम्हारी पत्नी को बुलाता हूं. उसे भी तो पता चले कि उस का पति कितना घटिया है. दूसरे की पत्नी के साथ हमबिस्तरी करता है.’’

‘‘प्लीज, मुझे माफ कर दो. मेरी पत्नी को कावेरी के बारे में पता चल जाएगा, तो वह मुझे छोड़ कर चली जाएगी.

‘‘मैं कसम खाता हूं कि अब कभी कावेरी से संबंध नहीं बनाऊंगा,’’ सौरभ ने गिड़गिड़ाते हुए कहा.

सौरभ के गिड़गिडाने का जयदेव पर कोई असर नहीं हुआ. उस ने सौरभ से कहा, ‘‘मैं तुम दोनों को कभी माफ नहीं कर सकता. तुम दोनों की करतूत जगजाहिर करने के बाद आज ही कावेरी को घर से निकाल दूंगा. उस के बाद तुम्हारी जो मरजी हो, वह करना. कावेरी से संबंध रखना या न रखना, उस से मु?ो कोई लेनादेना नहीं.’’

जयदेव चुप हो गया, तो कावेरी फिर गिड़गिड़ा कर उस से माफी मांगने लगी. सौरभ ने भी ऐसा ही किया. जयदेव के पैर पकड़ कर उस से माफी मांगते हुए कहा कि अगर वह उसे माफ नहीं करेगा, तो उस के पास खुदकुशी करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं रह जाएगा, क्योंकि वह अपनी पत्नी की नजरों में गिर कर नहीं जी पाएगा.

आखिरकार जयदेव पिघल गया. उस ने सौरभ से कहा, ‘‘मैं तुम्हें माफ तो नहीं कर सकता, मगर जबान बंद रखने के लिए तुम्हें 3 लाख रुपए देने होंगे.’’

‘‘3 लाख रुपए…’’ यह सुन कर सौरभ की घिग्घी बंध गई. उस का सिर भी घूमने लगा.

बात यह थी कि सौरभ की माली हालत ऐसी नहीं थी कि वह जयदेव को 3 लाख रुपए दे सके. उसे जितनी तनख्वाह मिलती थी, उस से परिवार का गुजारा तो चल जाता था, मगर बचत नहीं हो पाती थी.

सौरभ ने अपनी माली हालत के बारे में जयदेव को बताया, मगर वह नहीं माना. उस ने कहा, ‘‘तुम्हारी माली हालत से मुझे कुछ लेनादेना नहीं है. अगर तुम मेरा मुंह बंद रखना चाहते हो, तो रुपए देने ही होंगे.’’

सौरभ को सम?ा नहीं आ रहा था कि वह इस मुसीबत से कैसे निबटे?

सौरभ को चिंता में पड़ा देख कावेरी उस के पास आ कर बोली, ‘‘तुम इतना सोच क्यों रहे हो? रुपए बचाने की सोचोगे, तो हमारी इज्जत चली जाएगी. लोग हमारी असलियत जान जाएंगे.

‘‘तुम खुद सोचो कि अगर तुम्हारी पत्नी को सबकुछ मालूम हो जाएगा, तो क्या वह तुम्हें माफ कर पाएगी?

‘‘वह तुम्हें छोड़ कर चली जाएगी, तो तुम्हारी जिंदगी क्या बरबाद नहीं हो जाएगी? मेरी तो कोई औलाद नहीं है. तुम्हारी तो औलाद है, वह भी बेटी. अभी उस की उम्र भले ही 6 साल है, मगर बड़ी होने के बाद जब उसे तुम्हारी सचाई का पता चलेगा, तो सोचो कि उस के दिल पर क्या गुजरेगी. तुम से वह इतनी ज्यादा नफरत करने लगेगी कि जिंदगीभर तुम्हारा मुंह नहीं देखेगी.’’

सौरभ पर कावेरी के सम?ाने का तुरंत असर हुआ. वह जयदेव को

3 लाख रुपए देने के लिए राजी हो गया, मगर इस के लिए उस ने जयदेव से एक महीने का समय मांगा.

कुछ सोचते हुए जयदेव ने कहा, ‘‘मैं तुम्हें एक महीने की मुहलत दे सकता

हूं, मगर इस के लिए तुम्हें कोई गारंटी देनी होगी.’’

‘‘कैसी गारंटी?’’ सौरभ ने जयदेव से पूछा.

‘‘मैं कावेरी के साथ तुम्हारा फोटो खींच कर अपने मोबाइल फोन में

रखूंगा. बाद में अगर तुम अपनी जबान से मुकर जाओगे, तो फोटो सब को

दिखा दूंगा.’’

मजबूर हो कर सौरभ ने जयदेव की बात मान ली. जयदेव ने कावेरी के साथ सौरभ का बिना कपड़ों वाला फोटो खींच कर अपने मोबाइल में सेव कर लिया.

शाम के 7 बजे जब सौरभ कावेरी के फ्लैट से बाहर आया, तो बहुत परेशान था. वह लगातार यही सोच रहा था कि 3 लाख रुपए कहां से लाएगा?

सौरभ कोलकाता का रहने वाला था. उलटाडांगा में उस का पुश्तैनी मकान

था. उस की शादी अनीता से तकरीबन

8 साल पहले हुई थी.

सौरभ की पत्नी अनीता भी कोलकाता की थी. अनीता जब बीए के दूसरे साल में थी, तभी उस के मातापिता ने उस की शादी सौरभ से कर दी थी. सौरभ ने उस की पढ़ाई छुड़ा कर उसे घर के कामों में लगा दिया. अनीता भी आगे नहीं पढ़ना चाहती थी, इसलिए तनमन से घर संभालने में जुट गई थी.

शादी के समय सौरभ के मातापिता जिंदा थे, मगर 2 साल के भीतर उन दोनों की मौत हो गई थी. तब से अनीता ने घर की पूरी जिम्मेदारी संभाल ली थी.

मगर शादी के 5 साल बाद अचानक सौरभ ने अपना मन अनीता से हटा लिया था और वह मनचाही लड़की की तलाश में लग गया था.

बात यह थी कि एक दिन सौरभ ने अपने दोस्त के घर ब्लू फिल्म देखी थी. उस के बाद उस का मन बहक गया था. ब्लू फिल्म की तरह उस ने भी मजा लेने की सोची थी.

उसी दिन दोस्त से ब्लू फिल्म की सीडी ले कर सौरभ घर आया. बेटी जब सो गई, तो टैलीविजन पर उस ने अनीता को फिल्म दिखाना शुरू किया.

कुछ देर बाद अनीता सम?ा गई कि यह कितनी गंदी फिल्म है. फिल्म बंद कर के वह सौरभ से बोली, ‘‘आप को ऐसी गंदी फिल्म देखने की लत किस ने लगाई?’’

‘‘मैं ने यह फिल्म आज पहली बार देखी है. मुझे अच्छी लगी, इसलिए तुम्हें दिखाई है कि फिल्म में लड़की ने अपने मर्द साथी के साथ जिस तरह की हरकतें की हैं, उसी तरह की हरकतें तुम मेरे साथ करो.’’

‘‘मु?ा से ऐसा नहीं होगा. मैं ऐसा करने से पहले ही शर्म से मर जाऊंगी.’’

‘‘तुम एक बार कर के तो देखो, शर्म अपनेआप भाग जाएगी.’’

‘‘मु?ो शर्म को भगाना नहीं, अपने साथ रखना है. आप जानते नहीं कि शर्म के बिना औरतें कितनी अधूरी रहती हैं. मेरा मानना है कि हर औरत को शर्म

के दायरे में रह कर ही हमबिस्तरी

करनी चाहिए.

‘‘आप अपने दिमाग से गंदी बातें निकाल दीजिए. हमबिस्तरी में अब तक जैसा चलता रहा है, वैसा ही चलने दीजिए. सच्चा मजा उसी में है. अगर मुझ पर दबाव बनाएंगे, तो मैं मायके चली जाऊंगी.’’

उस समय तो सौरभ की बोलती बंद हो गई, मगर उस ने अपनी चाहत को दफनाया नहीं. उस ने मन ही मन ठान लिया कि पत्नी न सही, कोई और सही, मगर वह मन की इच्छा जरूर पूरी कर के रहेगा.

उस के बाद सौरभ मनचाही लड़की की तलाश में लग गया. इस के लिए एक दिन उस ने अपने दोस्त रमेश से बात भी की. रमेश उसी कंपनी में था, जिस में वह काम करता था.

रमेश ने सौरभ को सु?ाव दिया, ‘‘तुम्हारी इच्छा शायद ही कोई घरेलू औरत पूरी कर सके, इसलिए तुम्हें किसी कालगर्ल से संबंध बनाना चाहिए.’’

सौरभ को रमेश की बात जंच गई. कुछ दिन बाद उसे एक कालगर्ल मिल भी गई.

एक दिन सौरभ रात के 9 बजे कालगर्ल के साथ होटल में गया. वह कालगर्ल के साथ मनचाहा करता, उस से पहले ही होटल पर पुलिस का छापा पड़ गया. सौरभ गिरफ्तारी से बच न सका.

अंतहीन- भाग 3: क्यों गुंजन ने अपने पिता को छोड़ दिया?

रामदयाल के कानों में प्रभव की बात गूंज रही थी, ‘शादी अभी तो मुमकिन नहीं है, गुंजन की मजबूरियों के कारण. विधुर पिता के प्रति इकलौते बेटे की जिम्मेदारियां और लगाव कुछ ज्यादा ही होता है.’ लगाव वाली बात से तो इनकार नहीं किया जा सकता था लेकिन प्रेमा की मृत्यु के बाद जब प्राय: सभी ने उस से कहा था कि पिता और घर की देखभाल अब उस की जिम्मेदारी है, इसलिए उसे शादी कर लेनी चाहिए तो गुंजन ने बड़ी दृढ़ता से कहा था कि घर संभालने के लिए तो मां से काम सीखे पुराने नौकर हैं ही और फिलहाल शादी करना पापा के साथ ज्यादती होगी क्योंकि फुरसत के चंद घंटे जो अभी सिर्फ पापा के लिए हैं फिर पत्नी के साथ बांटने पड़ेंगे और पापा बिलकुल अकेले पड़ जाएंगे. गुंजन का तर्क सब को समझ में आया था और सब ने उस से शादी करने के लिए कहना छोड़ दिया था. तभी प्रभव और राघव आ गए.

‘‘अंकल, गुंजन को आपरेशन के लिए ले गए हैं,’’ राघव ने बताया. ‘‘आपरेशन में काफी समय लगेगा और मरीज को होश आने में कई घंटे. हम सब को आदेश है कि अस्पताल में भीड़ न लगाएं और घर जाएं, आपरेशन की सफलता की सूचना आप को फोन पर दे दी जाएगी.’’

‘‘तो फिर अंकल घर ही चलिए, आप को भी आराम की जरूरत है,’’ प्रभव बोला.

‘‘हां, चलो,’’ रामदयाल विवश भाव से उठ खड़े हुए, ‘‘तुम्हें कहां छोड़ना होगा, राघव?’’

‘‘अभी तो आप के साथ ही चल रहे हैं हम दोनों.’’

‘‘नहीं बेटे, अभी तो आस की किरण चमक रही है, उस के सहारे रात कट जाएगी. तुम दोनों भी अपनेअपने घर जा कर आराम करो,’’ रामदयाल ने राघव का कंधा थपथपाया.

हालांकि गुंजन हमेशा उन के लौटने के बाद ही घर आता था लेकिन न जाने क्यों आज घर में एक अजीब मनहूस सा सन्नाटा फैला हुआ था. वह गुंजन के कमरे में आए. वहां उन्हें कुछ अजीब सी राहत और सुकून महसूस हुआ. वह वहीं पलंग पर लेट गए.

तकिये के नीचे कुछ सख्त सा था, उन्होंने तकिया हटा कर देखा तो एक सुंदर सी डायरी थी. उत्सुकतावश रामदयाल ने पहला पन्ना पलट कर देखा तो लिखा था, ‘वह सब जो चाह कर भी कहा नहीं जाता.’ गुंजन की लिखावट वह पहचानते थे. उन्हें जानने की जिज्ञासा हुई कि ऐसा क्या है जो गुंजन जैसा वाचाल भी नहीं कह सकता?

किसी अन्य की डायरी पढ़ना उन की मान्यताआें में नहीं था लेकिन हो सकता है गुंजन ने इस में वह सब लिखा हो यानी उस मजबूरी के बारे में जिस का जिक्र प्रभव कर रहा था. उन्होंने डायरी के पन्ने पलटे. शुरू में तो तनूजा से मुलाकात और फिर उस की ओर अपने झुकाव का जिक्र था. उन्होंने वह सब पढ़ना मुनासिब नहीं समझा और सरसरी निगाह डालते हुए पन्ने पलटते रहे. एक जगह ‘मां’ शब्द देख कर वह चौंके. रामदयाल को गुंजन की मां यानी अपनी पत्नी प्रेमा के बारे में पढ़ना उचित लगा.

‘वैसे तो मुझे कभी मां के जीवन में कोई अभाव या तनाव नहीं लगा, हमेशा खुश व संतुष्ट रहती थीं. मालूम नहीं मां के जीवनकाल में पापा उन की कितनी इच्छाआें को सर्वाधिक महत्त्व देते थे लेकिन उन की मृत्यु के बाद तो वही करते हैं जो मां को पसंद था. जैसे बगीचे में सिर्फ सफेद फूलों के पौधे लगाना, कालीन को हर सप्ताह धूप दिखाना, सूर्यास्त होते ही कुछ देर को पूरे घर में बिजली जलाना आदि.

‘मुझे यकीन है कि मां की इच्छा की दुहाई दे कर पापा सर्वगुण संपन्न और मेरे रोमरोम में बसी तनु को नकार देंगे. उन से इस बारे में बात करना बेकार ही नहीं खतरनाक भी है. मेरा शादी का इरादा सुनते ही वह उत्तर प्रदेश की किसी अनजान लड़की को मेरे गले बांध देंगे. तनु मेरी परेशानी समझती है मगर मेरे साथ अधिक से अधिक समय गुजारना चाहती है. उस के लिए समय निकालना कोई समस्या नहीं है लेकिन लोग हमें एकसाथ देख कर उस पर छींटाकशी करें यह मुझे गवारा नहीं है.’ 

रामदयाल को याद आया कि जब उन्होंने लखनऊ की जायदाद बेच कर यह कोठी बनवानी चाही थी तो प्रेमा ने कहा था कि यह शहर उसे भी बहुत पसंद है मगर वह उत्तर प्रदेश से नाता तोड़ना नहीं चाहती. इसलिए वह गुंजन की शादी उत्तर प्रदेश की किसी लड़की से ही करेगी. उन्होंने प्रेमा को आश्वासन दिया था कि ऐसा करना भी चाहिए क्योंकि उन के परिवार की संस्कृति और मान्यताएं तो उन की अपनी तरफ की लड़की ही समझ सकती है.

गुंजन का सोचना भी सही था, तनु से शादी की इजाजत वह आसानी से देने वाले तो नहीं थे. लेकिन अब सब जानने के बाद वह गुंजन के होश में आते ही उस से कहेंगे कि वह जल्दीजल्दी ठीक हो ताकि उस की शादी तनु से हो सके.

अगली सुबह अखबार में घायलों में गुंजन का नाम पढ़ कर सभी रिश्तेदार और दोस्त आने शुरू हो गए थे. अस्पताल से आपरेशन सफल होने की सूचना भी आ गई थी फिर वह अस्पताल जा कर वरिष्ठ डाक्टर से मिले थे.

‘‘मस्तिष्क में जितनी भी गांठें थीं वह सफलता के साथ निकाल दी गई हैं और खून का संचार सुचारुरूप से हो रहा है लेकिन गुंजन की पसलियां भी टूटी हुई हैं और उन्हें जोड़ना बेहद जरूरी है लेकिन दूसरा आपरेशन मरीज के होश में आने के बाद करेंगे. गुंजन को आज रात तक होश आ जाएगा,’’ डाक्टर ने कहा, ‘‘आप फिक्र मत कीजिए, जब हम ने दिमाग का जटिल आपरेशन सफलतापूर्वक कर लिया है तो पसलियों को भी जोड़ देंगे.’’

शाम को अपने अन्य सहकर्मियों के साथ तनुजा भी आई थी. बेहद विचलित और त्रस्त लग रही थी. रामदयाल ने चाहा कि वह अपने पास बुला कर उसे दिलासा और आश्वासन दें कि सब ठीक हो जाएगा लेकिन रिश्तेदारों की मौजूदगी में यह मुनासिब नहीं था.

पसलियों के टूटने के कारण गुंजन के फेफड़ों से खून रिसना शुरू हो गया था जिस के कारण उस की संभली हुई हालत फिर बिगड़ गई और होश में आ कर आंखें खोलने से पहले ही उस ने सदा के लिए आंखें मूंद लीं.

अंत्येष्टि के दिन रामदयाल को आएगए को देखने की सुध नहीं थी लेकिन उठावनी के रोज तनु को देख कर वह सिहर उठे. वह तो उन से भी ज्यादा व्यथित और टूटी हुई लग रही थी. गुंजन के अन्य सहकर्मी और दोस्त भी विह्वल थे, उन्होंने सब को दिलासा दिया. जनममरण की अनिवार्यता पर सुनीसुनाई बातें दोहरा दीं.

सीमा के साथ खड़ी लगातार आंसू पोंछती तनु को उन्होंने चाहा था पास बुला कर गले से लगाएं और फूटफूट कर रोएं. उन की तरह उस का भी तो सबकुछ लुट गया था. वह उस की ओर बढ़े भी लेकिन फिर न जाने क्या सोच कर दूसरी ओर मुड़ गए.

कुछ दिनों के बाद एक इतवार की सुबह राघव गुंजन का कोट ले कर आया.

‘‘इस की जेब में गुंजन की घड़ी और पर्स वगैरा हैं. अंकल, संभाल लीजिए,’’ कहते हुए राघव का स्वर रुंध गया.

कुछ देर के बाद संयत होने पर उन्होंने पूछा, ‘‘यह तुम्हें कहां मिला, राघव?’’

‘‘तनु ने दिया है.’’

‘‘तनु कैसी है?’’

‘‘कल ही उस की बहन उसे अपने साथ पुणे ले गई है, जगह और माहौल बदलने के लिए. यहां तो बम होने की अफवाहों को सुन कर वह बारबार उन्हीं यादों में चली जाती थी और यह सिलसिला यहां रुकने वाला नहीं है. तनु के बहनोई उस के लिए पुणे में ही नौकरी तलाश कर रहे हैं.’’

‘‘नौकरी ही नहीं कोई अच्छा सा लड़का भी उस के लिए तलाश करें. अभी उम्र नहीं है उस की गुुंजन के नाम पर रोने की?’’

राघव चौंक पड़ा.

‘‘आप को तनु और गुंजन के बारे में मालूम है, अंकल?’’

‘‘हां राघव, मैं उस के दुख को शिद्दत से महसूस कर रहा था, उसे गले लगा कर रोना भी चाहता था लेकिन…’’

‘‘लेकिन क्या, अंकल? क्यों नहीं किया आप ने ऐसा? इस से तनु को अपने और गुंजन के रिश्ते की स्वीकृति का एहसास तो हो जाता.’’

‘‘मगर मेरे ऐसा करने से वह जरूर मुझ से कहीं न कहीं जुड़ जाती और मैं नहीं चाहता था कि मेरे जरिए गुंजन की यादों से जुड़ कर वह जीवन भर एक अंतहीन दुख में जीए.’’

अंकल शायद ठीक कहते हैं.

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