Crime Story: जुर्म- वजह छोटी, अपराध बड़े- मकसद से भटकती कमउम्र पीढ़ी

Crime Story: दक्षिण भारत की सुपरहिट फिल्म ‘केजीएफ चैप्टर वन’ के एक सीन में जब बच्चा रौकी दिनदहाड़े एक पुलिस वाले के सिर पर बोतल फोड़ कर भागताभागता रुक जाता है, तो उस का साथी बच्चा पूछता है कि रुक क्यों गया? इस पर रौकी बोलता है कि उस पुलिस वाले को अपना नाम तो बताया ही नहीं. वह फिर उस घायल पुलिस वाले के पास जाता है और दोबारा उस का सिर फोड़ कर अपना नाम बताता है.

यह तो महज एक फिल्मी सीन था, जिस पर सिनेमाघरों में खूब सीटियां और तालियां बजी थीं, पर असली जिंदगी में अपराध इतना ग्लैमरस नहीं होता है और न ही किसी अपराधी का भविष्य सुनहरा होता है.

इस के बावजूद बहुत से नौजवान अपनी छोटीमोटी जरूरतों को पूरा करने के लिए अपराध की दुनिया में उतर जाते हैं, पर जब वे पुलिस के हत्थे चढ़ते हैं, तो अपनी जरूरतों का रोना रोने लगते हैं.

मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले का एक मामला देखते हैं. वहां 2 लड़के लूट के एक मामले में पकड़े गए थे. इस सिलसिले में पुलिस ने 19 साल के शुभम उर्फ अर्पण और 18 साल के अभिषेक शुक्ला उर्फ बच्ची को गिरफ्तार किया था. वे दोनों रीवां जिले के मिसिरिहा गांव के रहने वाले थे.

इन दोनों आरोपियों ने 13 जुलाई, 2022 को गांव बुढ़ाकर में लूट की वारदात को अंजाम देने से पहले बैंक की रेकी की थी. एक पतिपत्नी प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत अपने खाते में जमा 40,000 रुपए बैंक से निकाल कर बाहर फल विक्रेता के पास खड़े थे.

उसी दौरान दोनों आरोपी मोटरसाइकिल से आए और उन्होंने औरत से नकदी भरा बैग छीन लिया. बाद में पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज की मदद से आरोपियों को पकड़ा था.

अर्पण ने इस कांड की वजह के तौर पर पुलिस को बताया कि उस के परिवार में पैसे की बेहद तंगी थी और उस के पास जबलपुर में प्रतियोगी परीक्षा की अपनी कोचिंग फीस और मकान का किराया देने के लिए पैसे नहीं थे.

अर्पण का दोस्त अभिषेक भी प्रयागराज, उत्तर प्रदेश में प्रतियोगी परीक्षा की कोचिंग ले रहा था और वह भी पैसे की तंगी का सामना कर रहा था.

अर्पण ने पुलिस को यह भी बताया कि पैसे के लिए किसी को लूटने का प्लान अभिषेक ने बनाया था. उन दोनों ने कई दिनों तक कई बैंकों की रेकी की थी और 40,000 रुपए निकालने वाले इन पतिपत्नी का पता लगाया था.

चलो, यहां तो पैसे की तंगी के चलते अपराध हुआ था, पर आजकल के कमउम्र नौजवान तो इश्क के चक्कर में क्याक्या नहीं कर बैठते हैं, इस की एक बानगी देखिए.

प्रेमिका की चाहत पूरी करने के लिए गोंडा, उत्तर प्रदेश में कुछ नौजवानों ने अपराध की सारी हदें पार कर दीं और लुटेरे बन गए. हैरत की बात तो यह है कि इन में से कोई इंजीनियरिंग, तो कोई डाक्टर बनने का सपना लिए घर से निकला था, पर उन्हें माशूका के नखरे उठाने का ऐसा चसका लगा कि वे लुटेरे बन बैठे.

दरअसल, गिरफ्तार किए गए ये पांचों नौजवान आदतन अपराधी नहीं थे, पर जब अचानक उन की जिंदगी में माशूका आ गई तो मुहब्बत की अंधी राह ने उन्हें अपराध की दुनिया में धकेल दिया. ये आरोपी गोंडा और आसपास के जनपदों में मोबाइल की लूट और छीनाझपटी की वारदात को अंजाम दे रहे थे.

पुलिस ने केस दर्ज कर जब इस मामले की छानबीन शुरू की, तो एक रैकेट इस के पीछे काम करता हुआ मिला. पुलिस ने एक नौजवान को गिरफ्तार कर के पूछताछ की तो एकएक कर 5 लोगों के नाम सामने आए.

जब पुलिस ने सख्ती से पूछताछ की, तो पता चला कि गोंडा जिले के तरबगंज थाना क्षेत्र के रहने वाले ये लड़के लखनऊ, दिल्ली और पंजाब में रह रही अपनी गर्लफ्रैंड की ख्वाहिशों को पूरा करने के लिए लूट की वारदात को अंजाम देने लगे थे.

देहात कोतवाली पुलिस और एसओजी की टीम ने गिरफ्तार नौजवानों के कब्जे से चोरी के 9 मोबाइल फोन, वारदात में इस्तेमाल की जाने वाली 2 मोटरसाइकिल, नकदी के अलावा दूसरा सामान भी बरामद किया.

बालिग तो बालिग, नाबालिग भी अपराध के दलदल में काफी अंदर तक धंसे हुए हैं. नैशनल ज्यूडिशियल डाटा ग्रिड और नैशनल क्राइम रिकौर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2020 में हत्या, अपहरण, लूट, डकैती, चोरी जैसी 29,768 आपराधिक वारदात ऐसी थीं, जिन में 74,124 नाबालिग शामिल थे.

बच्चों द्वारा की गई आपराधिक वारदात की बात करें तो इस में नंबर एक पर मध्य प्रदेश रहा था, जहां 4,819 वारदात में बच्चे शामिल थे. 4,079 ऐसी वारदात के साथ महाराष्ट्र दूसरे नंबर पर, 3,394 वारदात के साथ तमिलनाडु तीसरे नंबर पर और 2,455 वारदात के साथ दिल्ली चौथे नंबर पर रही थी.

5वें नंबर पर राजस्थान (2,386 वारदात), 6ठे नंबर पर छत्तीसगढ़ (2,090 वारदात) और 7वें नंबर पर गुजरात (1,812 वारदात) जैसे राज्य थे.

ऐसे अपराधों की जड़ में पैसे की कमी और सामाजिक वजह बताई जाती हैं. यह कड़वी हकीकत है कि आज बड़ी तादाद में नौजवान बेरोजगार हैं. ऐसे में वे जब अपराध की तरफ खिंचते हैं, तो उन का पहला पड़ाव झपटमारी होता है. इस में मिली कामयाबी के बाद वे लूट और डकैती की तरफ चले जाते हैं. जेल में जा कर उन में से कुछ तो सुधर जाते हैं, पर बहुत से जेल में सजा काट रहे दूसरे बड़े अपराधियों की संगत में पूरी तरह से अपराधी बन जाते हैं.

इस के अलावा बहुत से नौजवान खराब परवरिश, महंगी जरूरतों, अपनी बढ़ती इच्छाओं, स्कूलकालेज के कैंपस की गुंडागर्दी, अकेलेपन और अपने गुस्सैल स्वभाव के चलते अपराध की ओर बढ़ने लगते हैं.

इस बुराई में समाज के साथसाथ सरकार भी बराबर की जिम्मेदार है. आज की नौजवान पीढ़ी नारों पर नहीं, बल्कि नतीजों पर यकीन करती है, जबकि केंद्र सरकार ने उसे रोजगार देने के नाम पर सिर्फ सपने दिखाए हैं.

हकीकत तो यह है कि दिसंबर, 2021 तक भारत में बेरोजगार लोगों की तादाद 5.3 करोड़ रही थी. देश की आजादी की 75वीं सालगिरह पर इस तरह के आंकड़े चिंता और शर्म की बात हैं. Crime Story

Hindi Story: मजाक – ट्यूशन का चोखा धंधा

भाजपा सरकार को बहुत धन्यवाद, शुक्रिया, थैंक्यू. क्यूट यानी कौमन ऐंट्रैंस टैस्ट चालू कर के उन्होंने बहुत लोगों को एक नया रास्ता दिखा दिया है. क्यूट का सिलेबस क्या होगा और कबकब बदलेगा, यह उसी तरह का है, जैसे आप के ग्रहों को पंडितजी कुंडली में देख कर बताते हैं. इस के लिए आप को बहुत सारे शब्द सीखने पड़ेंगे, जो वैबसाइटों पर हैं.

क्यूट की तैयारी अब 6ठी, 7वीं, 8वीं, 9वीं, 10वीं, 11वीं के छात्र करेंगे और इसलिए सब से पहले 6ठी क्लास के बच्चों के मांबापों को पकड़ें. हम सभी जानते हैं कि हर उद्योग को शुरू करने से पहले उस में पूंजी लगाई जाती है. जैसे, कपड़ा उद्योग के लिए कच्चा सूत, मशीन आदि की जरूरत पड़ती है. लेकिन ट्यूशन उद्योग उन सब से अलग एक ऐसा उद्योग है, जिस में आप को पूंजी लगाने की कोई जरूरत नहीं है.

इस धंधे की शुरुआत में न तो किसी इमारत की नींव खोदनी पड़ती है और न ही तैयार इमारत की सफेदी आदि करवानी पड़ती है. इस के लिए कुछ बातें तय कर लीजिए. जैसे, अगर आप सुबह की पाली  8 बजे शुरू करते हैं, तो साढ़े 7 बजे तक तैयार हो लें. वैसे भी छात्र सवा 8 बजे से पहले तो आएंगे नहीं.

आप इसी धंधे को सही तरीके से खोल कर किसी को द्रव के गुण, किसी को न्यूटन का नियम, किसी को हिसाब के सूत्र आदि लिखने या याद करने का आदेश दे सकते हैं. हां, आप के पास एक कंप्यूटर जरूर होना चाहिए. यही एक पूंजी है, जिस के बल पर आप सैकड़ोंहजारों बना सकते हैं. हां, पहले अपने पड़ोस के 2-4 छात्रों को फुसला कर या धमकी दे कर इस धंधे की शुरुआत आप कर सकते हैं.

यह धंधा आमदनी में बढ़ोतरी लाता है, इसलिए दिए गए इन गुरों को जरूर सीख लीजिए :

  • कक्षा में देर से पहुंचें. जाते ही कोई न कोई बहाना बना लें. जैसे, आज मूड ठीक नहीं है आदि.
  • अगर कोई छात्र सवाल पूछे, तो यह कह कर टाल दें कि आज इंटरनैट सही नहीं चल रहा या कल बताएंगे या शाम को आना तब बताएंगे.
  • बारबार कहें कि हर सैमेस्टर की तैयारी पूरे करें.
  • यह कहना न भूलें कि आप यह ट्यूशन नैशनल टैस्टिंग एजेंसी के एक बड़े अफसर के कहने पर चला रहे हैं, जो साल के आखिर में पूरे सवालजवाब पहले दे देगा.

इन गुरों की मदद से आप अवश्य इस धंधे में सफल हो जाएंगे.

आजकल धंधे के संविधान के अनुच्छेदों में फिर सुधार कर के नया रूप दिया गया है. जैसे रोजमर्रा और पारिवारिक काम को निबटा लेना इस धंधे में प्रमुख है. कई पालियों में पढ़ाते समय बीचबीच में छात्रों को कुछकुछ हुक्म देते रहिए. जैसे, प्रमोद, तुम समुच्चय के सवाल हल करो और राजू, तुम क्षेत्रफल वाली प्रश्नावली हल कर लो. फिर पूजा में मगन हो जाइए.

इस प्रकार आम के आम और गुठलियों के दाम, समय की भारी बचत भी. वैसे भी देश में पैट्रोल, डीजल, कैरोसिन, बिजली वगैरह की बचत के इश्तिहार अखबारों में निकलते हैं. इस धंधे से आप समय की बचत कर के देश की तरक्की में सरकार की मदद कर सकते हैं.

इस उद्योग में आप को फायदे ही फायदे हैं. जैसे, कक्षा की चिल्लपों, भीड़भाड़ आदि से आप को छुटकारा मिल सकता है. स्कूल जा कर हाजिरी रजिस्टर में आप अपनी हाजिरी बना दें और घर आ कर स्वतंत्र रूप से धंधा चलाएं.

इस धंधे को शुरू करने वाले सभी कारोबारियों (शिक्षकों) से मेरा यह अनुरोध है कि सरकार को ज्ञापन दे कर देश के सारे शिक्षा संस्थान बंद करवा दें, ताकि सारे बच्चे आप से या आप ही जैसे दूसरे लोगों से ट्यूशन पढ़ने के लिए मजबूर हो जाएं.

सरकार को भी भवन निर्माण, फर्नीचर, वेतन आदि के खर्चों से छुटकारा मिलेगा यानी रुपए बचेंगे और देश की दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की होगी. तब केरल की तरह सारा देश पढ़ाकू हो जाएगा. इस से आप का यह धंधा और भी फूलेगाफलेगा.

वैसे, सरकार भी आप को जरूरत के मुताबिक अनुदान देगी. हर भारतीय को तनमनधन से इस उद्योग को आगे बढ़ाना चाहिए. मेरी तो यही कामना है कि यह धंधा भलीभांति फूलेफले और देश खूब आगे बढ़े.

पी. कुमार       

Romantic Story: मजाक – वैलेंटाइन डे

फरवरी का महीना आते ही दद्दन चचा का फेफड़ा फड़फड़ाने लगता है. उन पर वसंत का खुमार फूटती जवानी से तब हावी हो गया था, जब हलकीहलकी मूंछों ने उन के सवा सौ ग्राम वाले कुपोषित चेहरे पर अपनी पिच तैयार की थी.

किंतु दद्दन चचा के लव प्लांट पर लवेरियासिस नामक ऐसा फंगस लगा कि प्यार की पंखुड़ी कभी खिल ही नहीं

पाई. ‘पलभर के लिए कोई हमें प्यार कर ले, झूठा ही सही…’ देवानंद की इन फिल्मी सूक्तियों में घोर आस्था रखने वाले दद्दन चचा को ताउम्र प्यार में नाकामी ही मिली.

साल 1995 की घटना है, जब फरवरी महीने में बोर्ड ऐग्जाम और वैलेंटाइन डे दोनों साथसाथ आए थे. दद्दन चचा मैट्रिक के बजाय मुहब्बत को ले कर ज्यादा नर्वस थे. बोर्ड ऐग्जाम के दौरान घुसपैठ कर चुके वैलेंटाइन डे वाले दिन दद्दन चचा ने काफी हिम्मत कर के अपनी सहपाठी शकुंतला को फूल दे डाला. फिर शकुंतला के भाई और पूज्य पिताजी ने फूल के बदले जो इन का पिछवाड़ा फुलाया कि बैठ कर बोर्ड के बाकी पेपर देने की हालत में नहीं रहे.

मैट्रिक और मुहब्बत दोनों में फेल दद्दन चचा को कभी महबूबा नहीं मिली और कभी वैलेंटाइन डे पर इजहार करने की हिमाकत की तो कभी लड़की के घर वालों, कभी संस्कृति बचाने वालों, तो कभी बजरंग दल वालों ने प्यार का पोस्टमार्टम और पंचनामा साथसाथ कर दिया.

समय बीतता गया. दद्दन चचा परिणय सूत्र में बंध गए, लेकिन प्रेम सूत्र को अब तक गांठ नहीं लग पाई थी. फिर एक दिन किसी ने दद्दन चचा को सोशल मीडिया की असीम ऊर्जा का बोध कराया कि कैसे फेसबुक पर होने वाले प्यार की वजह से सात समंदर पार की सुंदरी भारत आ जाती है. कैसे भिखारी का गाना रातोंरात वायरल हो जाता है. कैसे सोशल मीडिया के चलते फिल्में हिट और पिट जाती हैं.

फिर क्या था, दद्दन चचा ने आननफानन ही कर्ज ले कर फरवरी के पहले हफ्ते एक धांसू स्मार्टफोन खरीद लिया. दारू और चखना के प्रौमिस पर महल्ले के लौंडों की मदद से ‘डैशिंग डेविड’ नाम से अपना फेसबुक अकाउंट बनवा लिया.

यों तो दद्दन चचा उदार दिल वाले खर्चीले इनसान हैं, पर उस दिन न जाने क्या हुआ कि एफबी एकाउंट बनाने के बाद लड़कों को बीड़ी तक का पैसा दिए बिना दुत्कार कर भगा दिया.

प्रोफाइल पिक्चर में अपने पिचके गाल और झुर्रियों वाली त्वचा वाले थोबड़े के बजाय ब्यूटी एप पर मोडिफाइड अपना 20 साल पहले का फोटो चिपका डाला. फिर थोक के भाव में महिला फेसबुक उपभोक्ताओं को फ्रैंड रिक्वैस्ट भेजना शुरू कर दिया.

48 घंटे के घोर इंतजार के बाद एक दिन पड़ोसी शहर की ‘कमसिन काव्या’ ने उन की दोस्ती एक्सैप्ट कर ली. दद्दन चचा ने खुश हो कर मैसेंजर में ‘हाय’ भेज कर चैटिंग का आगाज किया. जवाब में ‘कमसिन काव्या’ की ओर से हिलता हुआ हाथ वाला इमोजी प्रकट हुआ. फिर तो दोनों ओर से संदेशों का आयातनिर्यात दिनरात बेरोकटोक होने लगा.

तथाकथित 35 साल के ‘डैशिंग डेविड’ और 22 साल की ‘कमसिन काव्या’ की औनलाइन मैत्री वाली नौका प्रेम सागर में डूबने को उतावली थी.

दद्दन चचा ने 11 फरवरी (प्रौमिस डे) पर मां की कसम खा कर अपनी अंतरात्मा से प्रौमिस किया कि चाहे सरकार गिर जाए या संस्कार, इस बार वैलेंटाइन डे पर ‘कमसिन काव्या’ को प्रपोज कर के ही मानेंगे.

13 फरवरी (हग डे) को संताबंता की भरतमिलाप वाली इमोजी भेज कर दद्दन चचा ने ‘कमसिन काव्या’ को होटल ‘मूनलाइट’ में मिलने का न्योता  दे डाला.

‘कमसिन काव्या’ भी इश्क के उड़ते हुए तीर से मानो अपने दिल को छलनी करवाने के लिए तैयार बैठी थी. झट से न्योता स्वीकार कर 14 फरवरी को सुबह 9 बजे गुलाबी सूट में होटल ‘मूनलाइट’ में मिलने को तैयार हो गई.

मारे खुशी के दद्दन चचा को सारी रात नींद नहीं आई. खुली आंखों से करवटें बदल कर किसी तरह वे उस रात की कैद से आजाद हुए.

ब्रह्म मुहूर्त में बालों को डाई किया. उस के बाद गुलाबजल मिले पानी और डव साबुन से शरीर के अंगअंग को रगड़ कर चमकाने की नाकाम कोशिश की. जींस और बुशर्ट से किसी तरह अपनी अधेड़ उम्र को ढका.

फेस टू फेस प्यार का इजहार और वैलेंटाइन डे को यादगार बनाने के लिए डेरी मिल्क और बुके ले कर सुबह 7 बजे ही दद्दन चचा होटल ‘मूनलाइट’ पहुंच गए.

2 घंटे के इंतजार के बाद होटल खुला. दद्दन चचा ने मनचाहा केबिन और टेबल पर कब्जा जमा लिया. वेटर को कुछ पैसे दे कर काव्या नाम की तख्ती के साथ मेन गेट पर खड़ा कर दिया.

आखिरकार 3 घंटे के इंतजार के बाद गुलाबी सूट में भारीभरकम शरीर वाली एक औरत के साथ तख्ती वाला वेटर दद्दन चचा के केबिन में आया.

उस औरत का चेहरा दुपट्टे से ढका हुआ था. ओवरवेट शरीर को देख कर दद्दन चचा को रौंग नंबर का आभास हुआ. वे वेटर से कुछ कहते, इस से पहले दुपट्टे के पीछे मोटेमोटे होंठों में हलकी सी हरकत हुई, ‘माई सैल्फ कमसिन काव्या… आर यू डेविड?’

दद्दन चचा ने काव्या की काया की जो छवि अपने मन में बनाई थी, पलभर में ही वह भरभरा गई. फिर खुद को दिलासा देते हुए सोचा, ‘आखिर शरीर में क्या रखा है. खूबसूरती तो चांद से चेहरे में होती है और चांद तो अभी दुपट्टे रूपी बादल के पीछे छिपा हुआ है…’

‘‘या… आई एम डेविड. प्लीज सीट…’’ और मुसकराते हुए काव्या को बैठने का इशारा किया.

कैपेचीनो नाम की कौफी और्डर कर दद्दन चचा ने दुपट्टे के पीछे छिपे चेहरे को आंखों के लैंस से ताड़ने की कई बार नाकाम कोशिश की.

‘‘क्या आप बैचलर हैं?’’ खामोशी भंग करते हुए काव्या ने पूछा.

‘‘जी, बिलकुल. सौ फीसदी खालिस,’’ दद्दन चचा ने मुसकराते हुए जवाब दिया.

‘‘तो बताइए क्यों बुलाया मुझे?’’

‘‘वह… आज वैलेंटाइन डे है…’’

‘‘तो…’’ काव्या भोली बनते हुए बोली.

तब तक वेटर कैपेचीनो ले आया.

जैसे ही वेटर बाहर निकला, चचा ने कांपते हुए हाथों से काव्या को बुके थमाते हुए ‘आई लव यू’ बक दिया.

‘‘सच में…’’ काव्या बोली.

‘‘स्वर्गवासी मां की कसम खा कर कह रहा हूं… आई लव यू…’’ दद्दन चचा ने अपना लव कंफर्म किया.

‘‘तो फिर दमयंती और टिल्लू का क्या…’’ काव्या ने पूछा.

‘‘क… क… कौन दमयंती?’’ दद्दन चचा ने घिघियाते हुए पूछा.

‘‘वही जो आप के सामने खड़ी है…’’ कहते हुए काव्या ने अपने चेहरे का दुपट्टा हटा लिया. फिर तो मानो दद्दन चचा के प्राण ही सूख गए.

‘‘द… द… दमयंती… त… त… तुम यहां? तुम तो मायके गई थी, फिर…’’ दद्दन चचा के हलक में शब्द अटक गए.

गुस्से में गरम कैपेचीनो को दद्दन चचा की खोपड़ी पर उड़ेलते हुए दमयंती चाची ने बताया, ‘‘तुम्हारी हरकतों के बारे में मुझे महल्ले के लड़कों ने बता दिया था, फिर उन्होंने ही ‘कमसिन काव्या’ नाम से मेरी फेक फेसबुक प्रोफाइल बनाई थी.

‘‘अगले ही दिन तुम्हारी फ्रैंड रिक्वैस्ट आ गई. अब आगे की कहानी तुम्हारी सेहत के लिए हानिकारक है,’’ फिर होटल ‘मूनलाइट’ में चाची की सैंडल और चचा के सिर का भरतनाट्यम शुरू हो गया. वादाखिलाफी की इतनी बड़ी सजा जनता कभी भी विधायक और सांसद को नहीं देती, जितनी दारू और चखना न मिलने से आहत महल्ले के लौंडों ने दद्दन चचा को दी थी.

वैलेंटाइन डे पर हुई जम कर सुताई के चलते घायल दद्दन चचा को अगले कुछ महीनों तक चाची के बैडरूम से क्वांरटीन रहना पड़ा.

Crime Story: पुलिस को गुमराह करने के लिए लाश पर लगाया गोबर

Crime Story: आ नेमुल्लमाशब्द तो सुना ही होगा. किसी धातु पर सोने या चांदी की पतली परत चढ़ाना, जिस से वह चमकने लगे और कीमती दिखे, जैसेकलईयागिलट’. पर क्या आप ने यह सुना है कि एक मांबाप ने अपनी ही बेटी को मार कर उस की लाश को वहां रखा, जहां वे अपने पालतू पशु बांधते थे और पकड़े जाने की सूरत में पुलिस को गुमराह करने के लिए उस लाश पर जानवरों का गोबर लगा दिया गया था?


इज्जत की खातिर अपनी औलाद को मारने का यह सनसनीखेज मामला उत्तर प्रदेश के मैनपुरी इलाके का है. औनर किलिंग की भेंट चढ़ी उस लड़की का नाम ज्योति था, जिस की लाश 20 जनवरी, 2023 को गांव के चौकीदार मनोज कठेरिया ने बरामद की थी. उस का परिवार भोगांव के मौजेपुर गांव में अपने घर से गायब था.


दरअसल, अशोक यादव नाम के एक शख्स की 24 साल की बेटी ज्योति के पास ही के एक गांव के रहने वाले नौजवान से प्रेम संबंध थे और वह उसी से शादी करना चाहती थी, पर परिवार वाले इस बात पर राजी नहीं थे. इसी तनातनी के चलते अशोक यादव ने अपनी पत्नी और बेटों की मदद से 19 जनवरी, 2023 की रात के 12 बजे ज्योति की गला दबा कर हत्या कर दी और पास ही बने अहाते में गड्ढा खोद कर लाश को दबा दिया था.


इस घटना के दूसरे दिन अशोक यादव के घर में ताला लगा देख कर गांव वालों ने इस की सूचना पुलिस को दी. घटना की एफआईआर गांव के ही चौकीदार मनोज कठेरिया ने अशोक यादव, उन की पत्नी रामा देवी, बेटे अमित, अनुज और अवनीश के खिलाफ दर्ज कराई थी. लेकिन ट्रायल के दौरान ज्योति के मांबाप ने दावा किया था कि उस ने खुदकुशी की थी. उन्होंने आरोप लगाया कि मनोज कठेरिया ने सिंचाई को ले कर हुए एक झगड़े के चलते एफआईआर दर्ज कराई थी, क्योंकि उस की खेती की जमीन उन की जमीन से सटी हुई थी.


पर सुबूतों और गवाहियों के बाद अब उत्तर प्रदेश की मैनपुरी कोर्ट के एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज जहेंद्र पाल सिंह ने ज्योति के मांबाप को उस की गला घोंट कर हत्या करने और लाश को खेत में दफनाने के जुर्म में उम्रकैद की सजा सुना दी. इतना ही नहीं, कोर्ट ने सुबूतों की कमी के चलते ज्योति के तीनों भाइयों को बरी कर दिया और हर कुसूरवार पर 60,000 रुपए का जुर्माना भी लगाया. Crime Story   

Akhilesh Yadav Family : प्रतीक यादव और अपर्णा यादव के रिश्ते में आयी दरार

Akhilesh Yadav Family :  उत्तर प्रदेश राज्य महिला आयोग की उपाध्यक्ष और मुलायम सिंह यादव व साधना यादव की बहू अपर्णा यादव और उन के पति प्रतीक यादव का रिश्ता अब खत्म होने के कगार पर दिखाई दे रहा है.

प्रतीक यादव ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर अपर्णा यादव  को ‘फैमिली डिस्ट्रॉयर’ (घर तोड़ने वाली) तक कह दिया और कहा कि उनकी मानसिक स्थिति इस समय बहुत खराब है. उन्होंने अपर्णा पर कई गंभीर आरोप भी लगाए हैं. अंदाजा लगाया जा रहा है कि एक बेहद खूबसूरत प्रेम कहानी अब अंत की ओर बढ़ रही है. वह रिश्ता, जो कभी ईमेल के जरिए शुरू हुआ था, अब इंस्टा पोस्ट से खत्म होता दिख रहा है.

अपर्णा और प्रतीक की प्रेम कहानी. स्कूल के दिनों से शुरू हो गई थी. अपर्णा और प्रतीक की मुलाकात एक दोस्त की जन्मदिन पार्टी में हुई. पार्टी के दौरान बात बढ़ी और दोनों ने ईमेल आईडी शेयर की. यह साल 2001 की बात है. उस समय अपर्णा हर रोज ईमेल चेक नहीं कर पाती थीं, लेकिन प्रतीक ने उनके लिए अपने प्रेम को शब्दों में पिरोना शुरू कर दिया. जब अपर्णा ने अपनी मेल आईडी चेक की, तो उनके इनबॉक्स में प्रतीक के प्रेम भरे मेल्स की भरमार थी. इसके बाद अपर्णा ने जवाब दिया और दोनों का प्यार बढ़ता गया.

शुरुआत में अपर्णा को प्रतीक के मुलायम सिंह यादव का बेटा होने की जानकारी नही थी. 2001 में शुरू हुई इस प्रेम कहानी ने करीब 10 साल तक साथ निभाया. इस दौरान दोनों ने एक-दूसरे को जाना और परिवारों के बारे में जानकारी हासिल की. इसके बाद दोनों ने परिवार की सहमति से शादी करने का फैसला किया और 4 दिसंबर, 2011 को प्रतीक और अपर्णा परिणय सूत्र में बंध गए.

इस शादी में अमिताभ बच्चन, जया बच्चन, अनिल अंबानी जैसे वीवीआईपी शामिल हुए. लखनऊ से सैफई तक इस शादी का भव्य जश्न मनाया गया.

प्रतीक यादव फिटनेस फ्रीक और बॉडी बिल्डिंग एक्सपर्ट हैं. उन्होंने रियल एस्टेट में भी कदम रखा. वहीं, अपर्णा यादव प्रशिक्षित क्लासिकल सिंगर हैं और उन्होंने मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी से इंटरनेशनल रिलेशन और पॉलिटिक्स में डिप्लोमा प्राप्त किया है. शादी के बाद उन्होंने राजनीति में रुचि दिखाई. दोनों के दो बच्चे भी हैं.

अपर्णा यादव की राजनीति में रुचि थी. मुलायम सिंह यादव ने उन्हें 2017 में समाजवादी पार्टी के टिकट पर लखनऊ कैंट से चुनाव लड़ाया, लेकिन वे भाजपा की रीता बहुगुणा जोशी से हार गईं. इसके बाद उन्होंने भाजपा का रुख किया और 2022 से पहले सपा छोड़कर भाजपा में शामिल हो गईं. कहा जाता है कि इस बदलाव से मुलायम परिवार में मतभेद बने. राजनीति, महत्वाकांक्षा और निजी मतभेदों के चलते जन्मजनमांतर का वादा अब टूटता दिखाई दे रहा है. Akhilesh Yadav Family

Feature Story: दो बहनों सी सगी आम्रपाली और अक्षरा की दोस्ती में दरार, पावर स्टार पवन सिंह बने वजह

Feature Story: अक्षरा और आम्रपाली दुबे बहुत ही अच्छी सहेलिया थीं, बिल्कुल सगी बहनों जैसी, पर अब इनके रिश्ते में खटास आ गई. यह सब हुआ पवन सिंह की शादी के कारण. दरअसल, पवन सिंह और अक्षरा सिंह रिलेशनशिप में थे. पर पवन सिंह ने अक्षरा के साथ रिश्ते में रहते हुए किसी और से शादी करने का फैसला किया और उनकी शादी अचानक हुई. सबको अचानक पता चला कि पवन बलिया जा रहे हैं और शादी कर रहे हैं. यह सुनकर अक्षरा बहुत टूट गई थीं.

आम्रपाली दुबे ने मीडिया को बताया जब मुझे पता चला कि पवन सिंह शादी कर रहे हैं तो मैंने तुरंत अक्षरा को फोन करना शुरू कर दिया. मैं उससे पूछना चाहती थी कि क्या हुआ था. एक दिन उसने मेरा फोन उठाया और मुझे बताया कि पवनजी की शादी हो रही है और उनकी हालत बिल्कुल ठीक नहीं थी.

मैंने पवन को फोन किया. मैंने उनसे पूछा कि आप जो कर रहे हैं वह सही है? आप ऐसा क्यों कर रहे हैं?

आम्रपाली ने बताया कि वे काफी देर तक पवन को डांटती रहीं, उन्हें किसी और से शादी करने से रोकने की कोशिश की क्योंकि अक्षरा उनसे बेहद प्यार करती थीं. लेकिन वे चुपचाप उनकी बात सुनते रहे और बाद में उन्हें बताया कि वे किसी और से शादी क्यों कर रहे हैं.

पवन सिंह ने कहा मेरे लिए मेरी मां की खुशी से बढ़कर कुछ नहीं है. मेरी मां की इज्जत से बढ़कर कुछ नहीं है. वो जो कहेंगी, मैं वही करूंगा. पवन सिंह ने वही करने का फैसला किया जो उनकी मां चाहती थीं.

दूसरी तरफ अक्षरा सिंह ने मीडिया में कहा कि मुश्किल समय में फिल्म जगत से कोई मेरे साथ नहीं था, किसी ने मेरे साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ कुछ नहीं कहा तो आम्रपाली दुबे को बहुत बुरा लगा, क्योंकि उन्होंने अक्षरा सिंह का साथ दिया था. वे उन्हें बाहर ले जाती थीं, घूमाती थीं जिससे उनका मन बहला रहे. अक्षरा की बातों से उनका दिल टुटा जिससे उन दोनो के रिश्तों में दूरी आ गई. भले ही कोई सीधी लड़ाई नहीं हुई लेकिन रिश्ते में खटास आ गई. कभी-कभी शूटिंग के दौरान मिलने पर मुस्कुरा देती हैं, लेकिन रिश्ता पहले जैसा नहीं है.Feature Story

Hindi Story: वो हो गया नाचने वाली का दीवाना

Hindi Story: ‘‘कितना ही कीमती हो… कितना भी खूबसूरत हो… बाजार के सामान से घर सजाया जाता है, घर नहीं बसाया जाता. मौजमस्ती करो… बड़े बाप की औलाद हो… पैसा खर्च करो, मनोरंजन करो और घर आ जाओ.

‘‘मैं ने भी जवानी देखी है, इसलिए नहीं पूछता कि इतनी रात गए घर क्यों आते हो? लेकिन बाजार को घर में लाने की भूल मत करना. धर्म, समाज, जाति, अपने खानदान की इज्जत का ध्यान रखना,’’ ये शब्द एक अरबपति पिता के थे… अपने जवान बेटे के लिए. नसीहत थी. चेतावनी थी.

लेकिन पिछले एक हफ्ते से वह लगातार बाजार की उस नचनिया का नाच देखतेदेखते उस का दीवाना हो चुका था.

वह जानता था कि उस के नाच पर लोग सीटियां बजाते थे, गंदे इशारे करते थे. वह अपनी अदाओं से महफिल की रौनक बढ़ा देती थी. लोग दिल खोल कर पैसे लुटाते थे उस के नाच पर. उस के हावभाव में वह कसक थी, वह लचक थी कि लोग ‘हायहाय’ करते उस के आसपास मंडराते, नाचतेगाते और पैसे फेंकते थे.

वह अच्छी तरह से जानता था कि जवानी से भरपूर उस नचनिया का नाचनागाना पेशा था. लोग मौजमस्ती करते और लौट जाते. लौटा वह भी, लेकिन उस के दिलोदिमाग पर उस नचनिया का जादू चढ़ चुका था. वह लौटा, लेकिन अपने मन में उसे साथ ले कर. उफ, बला की खूबसूरती उस की गजब की अदाएं. लहराती जुल्फें, मस्ती भरी आंखें. गुलाब जैसे होंठ.वह बलखाती कमर, वह बाली उमर. वह दूधिया गोरापन, वह मचलती कमर. हंसती तो लगता चांद निकल आया हो.

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वह नशीला, कातिलाना संगमरमर सा तराशा जिस्म. वह चाल, वह ढाल, वह बनावट. खरा सोना भी लगे फीका. मोतियों से दांत, हीरे सी नाक, कमल से कान, वे उभार और गहराइयां. जैसे अंगूठी में नगीने जड़े हों.

अगले दिन उस ने पूछा, ‘‘कीमत क्या है तुम्हारी?’’

नचनिया ने कहा, ‘‘कीमत मेरे नाच की है. जिस्म की है. तुम महंगे खरीदार लगते हो. खरीद सकते हो मेरी रातें, मेरी जवानी. लेकिन प्यार करने लायक तुम्हारे पास दिल नहीं. और मेरे प्यार के लायक तुम नहीं. जिस्म की कीमत है, मेरे मन की नहीं. कहो, कितने समय के लिए? कितनी रातों के लिए? जब तक मन न भर जाए, रुपए फेंकते रहो और खरीदते रहो.’’

उस ने कहा, ‘‘अकेले तन का मैं क्या करूंगा? मन बेच सकती हो? चंद रातों के लिए नहीं, हमेशा के लिए?’’

नचनिया जोर से हंसते हुए बोली, ‘‘दीवाने लगते हो. घर जाओ. नशा उतर जाए, तो कल फिर आ जाना महफिल सजने पर. ज्यादा पागलपन ठीक नहीं. समाज को, धर्म के ठेकेदारों को मत उकसाओ कि हमारी रोजीरोटी बंद हो जाए. यह महफिल उजाड़ दी जाए. जाओ यहां से मजनू, मैं लैला नहीं नचनिया हूं.’’

पिता को बेटे के पागलपन का पता लगा, तो उन्होंने फिर कहा, ‘‘बेटे, मेले में सैकड़ों दुकानें हैं. वहां एक से बढ़ कर एक खूबसूरत परियां हैं. तुम तो एक ही दुकान में उलझ गए. आगे बढ़ो. और भी रंगीनियां हैं. बहारें ही बहारें हैं. बाजार जाओ. जो पसंद आए खरीदो. लेकिन बाजार में लुटना बेवकूफों का काम है.

‘‘अभी तो तुम ने दुनिया देखनी शुरू की है मेरे बेटे. एक दिल होता है हर आदमी के पास. इसे संभाल कर रखो किसी ऊंचे घराने की लड़की के लिए.’’

लेकिन बेटा क्या करे. नाम ही प्रेम था. प्रेम कर बैठा. वह नचनिया की कातिल निगाहों का शिकार हो चुका था. उस की आंखों की गहराई में प्रेम का दिल डूब चुका था. अगर दिल एक है, तो जान भी तो एक ही है और उसकी जान नचनिया के दिल में कैद हो चुकी थी.

पिता ने अपने दीवान से कहा, ‘‘जाओ, उस नचनिया की कुछ रातें खरीद कर उसे मेरे बेटे को सौंप दो. जिस्म की गरमी उतरते ही खिंचाव खत्म हो जाएगा. दीवानगी का काला साया उतर जाएगा.’’

नचनिया सेठ के फार्महाउस पर थी और प्रेम के सामने थी. तन पर एक भी कपड़ा नहीं था. प्रेम ने उसे सिर से पैर तक देखा.

नचनिया उस के सीने से लग कर बोली, ‘‘रईसजादे, बुझा लो अपनी प्यास. जब तक मन न भर जाए इस खिलौने से, खेलते रहो.’’

प्रेम के जिस्म की गरमी उफान न मार सकी. नचनिया को देख कर उस की रगों का खून ठंडा पड़ चुका था.

उस ने कहा, ‘‘हे नाचने वाली, तुम ने तन को बेपरदा कर दिया है, अब रूह का भी परदा हटा दो. यह जिस्म तो रूह ने ओढ़ा हुआ है… इस जिस्म को हटा दो, ताकि उस रूह को देख सकूं.’’

नचनिया बोली, ‘‘यह पागलपन… यह दीवानगी है. तन का सौदा था, लेकिन तुम्हारा प्यार देख कर मन ही मन, मन से मन को सौसौ सलाम.

‘‘पर खता माफ सरकार, दासी अपनी औकात जानती है. आप भी हद में रहें, तो अच्छा है.’’

प्रेम ने कहा, ‘‘एक रात के लिए जिस्म पाने का नहीं है जुनून. तुम सदासदा के लिए हो सको मेरी ऐसा कोई मोल हो तो कहो?’’

नचनिया ने कहा, ‘‘मेरे शहजादे, यह इश्क मौत है. आग का दरिया पार भी कर जाते, जल कर मर जाते या बच भी जाते. पर मेरे मातापिता, जाति के लोग, सब का खाना खराब होगा. तुम्हारी दीवानगी से जीना हराम होगा.’’

प्रेम ने कहा, ‘‘क्या बाधा है प्रेम में, तुम को पाने में? तुम में खो जाने में? मैं सबकुछ छोड़ने को राजी हूं. अपनी जाति, अपना धर्म, अपना खानदान और दौलत. तुम हां तो कहो. दुनिया बहुत बड़ी है. कहीं भी बसर कर लेंगे.’’

नचनिया ने अपने कपड़े पहनते हुए कहा, ‘‘ये दौलत वाले कहीं भी तलाश कर लेंगे. मैं तन से, मन से तुम्हारी हूं, लेकिन कोई रिश्ता, कोई संबंध हम पर भारी है. मैं लैला तुम मजनू, लेकिन शादी ही क्यों? क्या लाचारी है? यह बगावत होगी. इस की शिकायत होगी. और सजा बेरहम हमारी होगी. क्यों चैनसुकून खोते हो अपना. हकीकत नहीं होता हर सपना. यह कैसी तुम्हारी खुमारी है. भूल जाओ तुम्हें कसम हमारी है.’’

अरबपति पिता को पता चला, तो उन्होंने एकांत में नचनिया को बुलवा कर कहा, ‘‘वह नादान है. नासमझ है. पर तुम तो बाजारू हो. उसे धिक्कारो. समझाओ. न माने तो बेवफाईबेहयाई दिखाओ. कीमत बोलो और अपना बाजार किसी अनजान शहर में लगाओ. अभी दाम दे रहा हूं. मान जाओ.

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‘‘दौलत और ताकत से उलझने की कोशिश करोगी, तो न तुम्हारा बाजार सजेगा, न तुम्हारा घर बचेगा… क्या तुम्हें अपने मातापिता, भाईबहन और अपने समुदाय के लोगों की जिंदगी प्यारी नहीं? क्या तुम्हें उस की जान प्यारी नहीं? कोई कानून की जंजीरों में जकड़ा होगा. कैद में रहेगा जिंदगीभर. कोई पुलिस की मुठभेड़ में मारा जाएगा. कोई गुंडेबदमाशों के कहर का शिकार होगा. क्यों बरबादी की ओर कदम बढ़ा रही हो? तुम्हारा प्रेम सत्ता और दौलत की ताकत से बड़ा तो नहीं है.

‘‘मेरा एक ही बेटा है. उस की एक खता उस की जिंदगी पर कलंक लगा देगी. अगर तुम्हें सच में उस से प्रेम

है, तो उस की जिंदगी की कसम… तुम ही कोई उपाय करो. उसे अपनेआप से दूर हटाओ. मैं जिंदगीभर तुम्हारा कर्जदार रहूंगा.’’

नचनिया ने उदास लहजे में कहा, ‘‘एकांत में यौवन से भरे जिस्म को जिस के कदमों में डाला, उस ने न पीया शबाब का प्याला. उसे तन नहीं मन चाहिए. उसे बाजार नहीं घर चाहिए.

उसे हसीन जिस्म के अंदर छिपा मन का मंदिर चाहिए. उपाय आप करें. मैं खुद रोगी हूं. मैं आप के साथ हूं प्रेम को संवारने के लिए,’’ यह कह कर नचनिया वहां से चली गई.

दौलतमंद पिता ने अपने दीवान से कहा, ‘‘बताओ कुछ ऐसा उपाय, जिस का कोई तोड़ न हो. उफनती नदी पर बांध बनाना है. एक ही झटके में दिल की डोर टूट जाए. कोई और रास्ता न बचे उस नचनिया तक पहुंचने का. उसे बेवफा, दौलत की दीवानी समझ कर वह भूल जाए प्रेमराग और नफरत के बीज उग आए प्रेम की जमीन पर.’’

दीवान ने कहा, ‘‘नौकर हूं आप का. बाकी सारे उपाय नाकाम हो सकते हैं, प्रेम की धार बहुत कंटीली होती है. सब से बड़ा पाप कर रहा हूं बता कर. नमक का हक अदा कर रहा हूं. आप उसे अपनी दासी बना लें. आप की दौलत से आप की रखैल बन कर ही प्रेम उस से मुंह मोड़ सकता है.

‘‘फिर अमीरों का रखैल रखना तो शौक रहा है. कहां किस को पता चलना है. जो चल भी जाए पता, तो आप की अमीरी में चार चांद ही लगेंगे.’’

नचनिया को बुला कर बताया गया. प्रस्ताव सुन कर उसे दौलत भरे दिमाग की नीचता पर गुस्सा भी आया. लेकिन यदि प्रेम को बचाने की यही एक शर्त है, तो उसे सब के हित के लिए स्वीकारना था. उस ने रोरो कर खुद को बारबार चुप कराया. तो वह बन गई अपने दीवाने की नाजायज मां.

प्रेम तक यह खबर पहुंची कि बाजारू थी बिक गई दौलत के लालच में. जिसे तुम्हारी प्रेमिका से पत्नी बनना था, वह रुपए की हवस में तुम्हारे पिता की रखैल बन गई.

प्रेम ने सुना, तो पहली चोट से रो पड़ा वह. पिंजरे में बंद पंछी की तरह फड़फड़ाया, लड़खड़ाया, लड़खड़ा कर गिरा और ऐसा गिरा कि संभल न सका.

वह किस से क्या कहता? क्या पिता से कहता कि मेरी प्रेमिका तुम्हारी हो गई? क्या जमाने से कहता कि पिता

ने मेरे प्रेम को अपना प्रेम बना लिया? क्या समझाता खुद को कि अब वह मेरी प्रेमिका नहीं मेरी नाजायज सौतेली मां है.

वह बोल न सका, तो बोलना बंद कर दिया उस ने. हमेशाहमेशा के लिए खुद को गूंगा बना लिया उस ने.

पिता यह सोच कर हैरान था कि जिंदगीभर पैसा कमाया औलाद की खुशी के लिए. उसी औलाद की जान छीन ली दौलत की धमक से. क्या पता दीवानगी. क्या जाने दिल की दुनिया. प्यार की अहमियत. वह दौलत को ही सबकुछ समझता रहा.

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अब दौलत की कैद में वह अरबपति पिता भटक रहा है अपने पापों का प्रायश्चित्त करते हुए हर रोज. Hindi Story

News Story: एसआईआर चेतावनी और जानकारी

News Story: देशभर में चल रहा एसआईआर यानी स्पैशल इंटैसिव रिविजन अभियान हर नागरिक के लोकतांत्रिक वजूद से जुड़ा सवाल बन चुका है. इस प्रोसैस को हलके में लेना यादेखा जाएगासोच कर टाल देना आने वाले सालों में भारी पड़ सकता है.
 इस कदम का असली इरादा तो सिर्फ सरकार समर्थक लोगों का नाम लिस्ट में रखने का था, पर विरोधी दलों और खासकर राहुल गांधी ने जोरदार बहस छेड़ दी, जिस से चुनाव आयोग भारतीय जनता पार्टी की मनचाही लिस्टें नहीं बनवा पाया. अब लगता है कि भाजपा ने लिस्टों के जरीए चुनाव जीतने का इरादा छोड़ दिया है, क्योंकि बिहार में वोटर लिस्टों में बड़ी गड़बड़ी नहीं कर पाने के बावजूद वह भारी बहुमत से जीत गई.
देश के दूसरे राज्यों में एसआईआर में किस का नाम बना रहे या नहीं रहे, इस से भारतीय जनता पार्टी को फर्क नहीं पड़ता. सब से पहले यह साफ सम? लें कि वोटर लिस्ट से नाम कटने का मतलब क्या है?
अगर आप का नाम वोटर लिस्ट से कट गया, तो इस का मतलब सिर्फ यह नहीं है कि आप वोट नहीं डाल पाएंगे, बल्कि इस के असर बहुत दूरगामी होंगे.
नाम कटने के बाद
होने वाली मुश्किलें
* आप किसी भी चुनाव में वोटिंग नहीं कर पाएंगे.
* दोबारा नाम जुड़वाने का प्रोसैस लंबा और थकाऊ होगा.
* कई बार महीनों या 1-2 साल तक नाम नहीं जुड़ता.
* सरकारी योजनाओं में पहचान कमजोर पड़ती है.
* राजनीतिक या प्रशासनिक लैवल पर आप कीआवाजजीरो हो जाती है.
* कई जगह वोटर आइडैंटिटी कार्ड पहचान दस्तावेज के रूप में मांगा जाता है.
* स्थानीय निकाय चुनाव, पंचायत चुनाव सब से बाहर हो सकते हैं.
* यही नहीं, यह भी मुमकिन है कि कल को नौकरी, जमीन खरीदने, किसी चीज का लाइसैंस लेने, बैंक अकाउंट खुलवाने के लिए लिस्ट की कौपी सरकार मांगने लगे.
* सरकारी अफसर रिश्वत लेने का इसे बढि़या तरीका बना सकते हैं.
* भाजपा लिस्ट से बाहर कट्टर हिंदुओं के अलावा सब को विदेशी मान ले. आधारकार्ड के मामले में सरकार ऐसा कर चुकी है.


एसआईआर में सब से खतरनाक गलतफहमी बहुत से लोग यह मान रहे हैं कि मेरा आधारकार्ड है, कुछ नहीं होगा. यह सब से बड़ी भूल है, क्योंकि आधारकार्ड नागरिकता या वोटर होने का सुबूत नहीं है. एसआईआर में आधारकार्ड केवल सहायक दस्तावेज है, निर्णायक नहीं. अगर बीएलओ या सत्यापन अधिकारी पूछे, तो आप को क्या बताना है :
* सब से पहले यह कहें (साफ और शांत शब्दों में), ‘‘मैं इस पते पर नियमित रूप से रह रहा हूं या रह रही
हूं और मेरा नाम वोटिंग लिस्ट में बना रहना चाहिए.’’
अगर पूछा जाए कि क्या आप का नाम साल 2003 की लिस्ट में शामिल है? तो घबराएं नहीं, यह जवाब दें, ‘‘मुझे जानकारी नहीं है, लेकिन मैं एसआईआर फार्म भर रहा हूं या भर रही हूं और जरूरी दस्तावेज दे रहा हूं या दे रही हूं.’’ याद रखें कि साल 2003 की लिस्ट में नाम होना या होना अकेला आधार नहीं है, लेकिन फार्म भरना सब से बड़ा जोखिम है.


आप को क्याक्या करना जरूरी है
* एसआईआर फार्म भरना ही सब से जरूरी कदम है, चाहे :
* आप का नाम पहले से वोटर लिस्ट में हो.
* आप सालों से वोट डालते रहे हों.
* आप के मातापिता वोटर रहे हों.
* अगर फार्म नहीं भरा, तो नाम कटने का खतरा बना रहता है.
दस्तावेज के बारे में साफ सम?
अगर अधिकारी दस्तावेज मांगे, तो इन में से जो उपलब्ध है, दें :
* जन्म प्रमाणपत्र.
* स्कूल/शैक्षिक प्रमाणपत्र.
* परिवार रजिस्टर की नकल.
* निवास प्रमाणपत्र.
* पासपोर्ट (अगर हो).
* जाति प्रमाणपत्र
* पुराना वोटर आईडी
एकसाथ सब जरूरी नहीं, लेकिन कम से कम एक मजबूत दस्तावेज
जरूर दें.
अगर अधिकारी आप से सवाल करे, तो कैसे बात करें :
* बहस करें.
* ऊंची आवाज में बात करें.
आप मेरा नाम काट रहे होजैसे आरोप लगाएं.
* शांत, तथ्य से भरपूर और लिखित प्रोसैस पर जोर दें.
याद रखें कि आप का बरताव आप की फाइल पर असर डाल सकता है.
सब से खतरनाक गलती जो लोग कर रहे हैं कि अभी नहीं मिला बीएलओ, बाद में देखेंगे. यहबाद मेंही नाम कटने की वजह बनता है.
अगर घर बंद मिला, आप बाहर थे, फार्म वापस नहीं दिया तो रिकौर्ड में लिखा जा सकता है कि नौट ट्रेसेबल (पता नहीं चल रहा) या फिर इनएक्टिव वोटर (निष्क्रिय मतदाता). और यही शब्द नाम कटने का आधार बन जाता है.


अगर नाम कट गया है तो क्या तुरंत ठीक हो जाएगा? नहीं. वजह :
* दावा या एतराज का प्रोसैस लंबा होता है.
* कई बार अधिकारी उपलब्ध नहीं होते.
* बारबार दफ्तर के चक्कर लग सकते हैं.
* अगला चुनाव निकल सकता है, इसलिए इलाज से बेहतर बचाव ही सम?ादारी है.
एक सीधा और कड़वा सच


लोकतंत्र में आप का वजूद तब तक है जब तक आप का नाम वोटिंग लिस्ट में है. अगर नाम कटा तो आप नागरिक तो रहेंगे, लेकिन फैसला लेने के प्रोसैस से बाहर हो जाएंगे. यह सिर्फ फार्म नहीं, बल्कि आप का अधिकार है.
एसआईआर अभियान को हलके में लेना आत्मघाती है, लोकतांत्रिक माने में. सरकार, आयोग, प्रशासन सब अपनी जगह हैं, लेकिन वोटर लिस्ट में आप का नाम होने की जिम्मेदारी आखिरकार आप की है.
आज फार्म भरना, दस्तावेज देना और सही जानकारी देना कल की लंबी लड़ाई से आप को बचा सकता है.
वोटर लिस्ट में आप का नाम होना जरूरी है

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