News Story: ‘जी राम जी’ का बवाल

News Story: शनिवार का दिन था. शाम के 6 बज रहे थे. विजय घर पर अकेला था. इतने में दरवाजे की घंटी बजी. विजय ने दरवाजा खोला. बाहर अनामिका खड़ी थी. वह दनदनाती हुई भीतर आई. उस का मुंह गुस्से से तमतमा रहा था.‘‘क्या हुआ? घायल शेरनी क्यों बनी हुई हो? सब ठीक है ? तुम तो अपनी सहेली के घर गई थी,’’ विजय ने पूछा. ‘‘सत्यानाश हो गया. और तुम तो अपना मुंह खोलो ही मत. सब तुम्हारा ही कियाधरा है,’’ अनामिका ने कहा. ‘‘मैं ने क्या किया? सुबह तो तुम्हारा मूड एकदम ठीक था,’’ विजय बोला.
इतने में अनामिका ने अपने बैग से एक प्रैग्नेंसी टैस्ट स्ट्रिप निकाली और विजय के सामने रख दी. ‘‘यह क्या है?’’ विजय ने पूछा.


‘‘तुम्हारी करतूत…’’ अनामिका बोली, ‘‘मैं प्रैग्नेंट हूं. कहा था कि प्रोटैक्शन लगा लेना, पर तुम्हें तो अपने मजे से मतलब है.’’ वह स्ट्रिप देख कर विजय के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. उस ने कांपते हाथ से वह स्ट्रिप उठाई और अपना माथा पकड़ लिया. ‘‘अब मुंह से कुछ बोलोगे या ऐसेही माथा पकड़े इसे घूरते रहोगे?’’ अनामिका बोली तुम  ही क्यों कोस रही हो? सारी गलती क्या मेरी है? तुम्हें भी तो ध्यान रखना चाहिए था. सब तुम्हारी लापरवाही का नतीजा है,’’ विजय बोला. तुम सही कह रहे हो. यहां मैं तुम्हारी जीहुजूरी करती रहूं और वहां केंद्र सरकार चाहती है कि दुनियाजय राम जीबोलती रहे,’’ अनामिका बोली. ‘‘अब यहां केंद्र सरकार कहां से गई?’’ विजय ने पूछा.


‘‘तुम और केंद्र सरकार एकजैसे हो. सारी गलती सामने वाले की. अब बताओ कि मनरेगा का नाम बदल करजी राम जीकरने की क्या तुक थी?’’ ‘‘तुम किस बारे में कह रही हो?’’ विजय ने कहा. अनामिका ने कहा, ‘‘मनरेगा यानी महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के बारे में, जो भारत की गांवदेहात से जुड़ी सब से बड़ी ग्रामीण रोजगार योजना रही है. यह साल 2005 में कांग्रेस सरकार के समय में लागू हुई थी. यह योजना गांवदेहात में 100 दिनों का गारंटेड रोजगार देती थी, जिस से गरीबों, किसानों और मजदूरों को पैसे के तौर पर ताकत मिलती थी. ‘‘पर अब केंद्र की मोदी सरकार ने चूंकि इस योजना से जुड़ा नया बिल पास किया है और इस काविकसित भारत गारंटी फौर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)’ यानीवीबीजी राम जीनाम दिया है, तो इस पर विपक्ष ने बवाल मचाया है.’’


‘‘इस बारे में किस ने क्या कहा है?’’ विजय ने पूछा. ‘‘कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इस पर गहरा एतराज जताया है. ‘ हिंदूअखबार में एक लेख के जरीए मोदी सरकार पर आरोप लगाया कि मनरेगा को बुल्डोज कर दिया गया है. ‘‘सोनिया गांधी ने आगे कहा कि सरकार ने पिछले 11 सालों में इसे कमजोर किया और अबवीबीजी राम जीबिल से इसे पूरी तरह बदल दिया है, जो एक काला कानून है. वजह, केंद्र सरकार द्वारा यह बिल बिना बहस, राज्यों से सलाह या विपक्ष की सहमति के बिना पास किया गया. नया कानून केंद्र सरकार को रोजगार तय करने का हक देता है, जो जमीनी हकीकत से दूर है.


‘‘सोनिया गांधी ने इसे करोड़ों किसानों, मजदूरों और गरीबों के हितों पर हमला बताया और कांग्रेस द्वारा इस का विरोध करने का वादा किया. उन्होंने मनरेगा को महात्मा गांधी के सर्वोदय (सभी का कल्याण) का प्रतीक बताया और इस के ध्वस्त होने को नैतिक नाकामी कहा, जो सालों तक माली और इनसानी नुकसान पहुंचाएगा,’’ अनामिका ने कहा. यह सुन कर विजय ने कहा, ‘‘लेकिन क्या तुम जानती हो कि मनरेगा से पहले इस योजना का नाम नरेगा था. मई, 2004 में तब की संप्रग सरकार ने गांवदेहात के इलाकों के लिए एक रोजगार योजना को अपने न्यूनतम सा? कार्यक्रम में शामिल किया था. ‘‘भारत में 11वीं पंचवर्षीय योजना (साल 2007-12) पर काम शुरू होने से पहले ही इस पर काम करने वाले वर्किंग ग्रुप ने उस समय देश में मौजूद करीब 36 फीसदी गरीब आबादी पर खास चिंता जताई थी. उसी समय से गांवदेहात के इलाकों के लिए एक योजना बनाने पर काम शुरू हो गया था.


‘‘हालांकि, इस से पहले ही वीपी सिंह वाली केंद्र सरकार ने ऐसी योजना पर विचार किया था, लेकिन वह योजना कामयाब नहीं हो पाई थी. दिसंबर, 2004 में नैशनल रूरल गारंटी स्कीम (नरेगा) का विधेयक पेश किया गया था. ‘‘यह योजना मूल रूप से महाराष्ट्र राज्य में चल रही एक रोजगार योजना से प्रेरित थी. उस के बाद यह विधेयक उस समय ग्रामीण विकास मंत्रालयकी संसद की स्थायी समिति के पास भेजा गया था. जून, 2005 में समिति के अध्यक्ष कल्याण सिंह ने इसे आजादी के बाद का सब से खास बिल बताया था.
‘‘अब केंद्र सरकार ने नए अधिनियम कोविकसित भारत गारंटी फौर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)’ यानीवीबीजी राम जीनाम दिया है. केंद्र सरकार के इस नए अधिनियम में नाम के अलावा भी कई बदलाव किए गए हैं, जैसे नए अधिनियम में साल में 125 दिन रोजगार देने का प्रस्ताव है.


‘‘मजदूरों को उन की मजदूरी का भुगतान साप्ताहिक आधार पर या अधिकतम 15 दिनों के भीतर करना अनिवार्य होगा. इस योजना के तहत होने वाले कामों को 4 मुख्य क्षेत्रों में बांटा गया है, जैसे जल सुरक्षा, ग्रामीण सड़कें, बाजार और भंडारण जैसे आजीविका इन्फ्रास्ट्रक्चर और जलवायु में बदलाव से निबटने वाले काम. ‘‘इन सभी का रिकौर्डविकसित भारत नैशनल रूरल इन्फ्रास्ट्रक्चर स्टैकनाम के नैशनल डाटाबेस में रखा जाएगा. भ्रष्टाचार रोकने के लिए बायोमैट्रिक हाजिरी, जियोटैगिंग और जीपीएस आधारित रियलटाइम मौनिटरिंग को अनिवार्य बनाया गया है. ‘‘सब से बड़ा रणनीतिक बदलाव योजना की फंडिंग में हुआ है. अब तक मनरेगा पूरी तरह केंद्र प्रायोजित थी, लेकिन अब यह 60:40 के अनुपात (केंद्र:राज्य) पर आधारित होगी, जबकि पूर्वोत्तर राज्यों के लिए यह अनुपात 90:10 होगा. इस के अलावा, यह अब पूरी तरहडिमांड ड्रिवननहीं रहेगी.


‘‘केंद्र सरकार हर साल राज्यों के लिए एक निश्चित बजट तय करेगी. अगर राज्य उस बजट से ज्यादा खर्च करते हैं, तो अतिरिक्त बो? उन्हें खुद उठाना होगा. इस पूरी योजना का सालाना बजट तकरीबन डेढ़ लाख करोड़ रुपए आंका गया है.’’ ‘‘दूर के ढोल सुहावने. तुम तो इस बिल का कागजी करतब बता रहे हो, जमीनी हकीकत से इस का दूरदूर तक कोई नाता नहीं है,’’ अनामिका बोली.  तुम कहना क्या चाहती हो?’’ विजय ने कहा. ‘‘यही कि किसी बिल में अगर सुधार करना भी है, तो उस के लिए योजना का नाम बदलने की क्या जरूरत है? पहले यह योजना महात्मा गांधी के नाम पर थी, तो अब इसेजी राम जीक्यों बना दिया गया है?’’ अनामिका बोली.


‘‘अरे, ‘जी राम जीबोलने में क्या हर्ज है? अब सनातनी भारत मेंजी राम जीही बोला जाएगा ?’’ विजय ने कहा. ‘‘बस, यहीं पर मु? सरकार की नीयत में खोट नजर आता है. भारत जैसे सैकुलर देश में जहां कई धर्मों के लोग रहते हैं, वहां धर्म विशेष और उस में भीरामका नाम जोड़ने की क्या वजह थी? ‘‘फिर प्रियंका गांधी की कही बात भी तो सच ही लगती है. उन्होंने कहा, ‘मु? नाम बदलने की यह सनक सम? नहीं आती. इस में खर्चा बहुत होता है, इसलिए मु? सम? नहीं आता कि वे बेवजह ऐसा क्यों कर रहे हैं. मनरेगा ने गरीब लोगों को 100 दिन के रोजगार का अधिकार दिया था. यह बिल उस अधिकार को कमजोर करेगा…’


‘‘इस के आगे प्रियंका गांधी बोलीं, ‘उन्होंने दिनों की संख्या तो बढ़ा दी है, लेकिन मजदूरी नहीं बढ़ाई है. पहले ग्राम पंचायत तय करती थी कि मनरेगा का काम कहां और किस तरह का होगा, लेकिन यह बिल कहता है कि केंद्र सरकार तय करेगी कि फंड कहां और कब देना है, इसलिए ग्राम पंचायत का अधिकार छीना जा रहा है. हमें यह बिल हर तरह से गलत लगता है.’ ‘‘जहां तक सैकुलर होने की बात है तोजी राम जीजैसे नाम वाली सरकारी योजनाओं से हर केंद्र सरकार को परहेज करना चाहिए. हमारे देश में 75 फीसदी लोग ऐसे हैं, जो गरीब हैं और उन में से ऐसे हैं जो सालभर दिहाड़ी मजदूरी नहीं कर पाते हैं. वे सभीराम भक्ततो नहीं हैं. इस तरह की योजना से देश के गैरहिंदुओं को लगेगा कि सरकार जानबू? कर चाहती है कि धर्म विशेष के लोग सिर्फ योजना के नाम से ही इस का फायदा लें पाएं.


‘‘गैरहिंदू ही क्यों, एससी और एसटी तबके के बहुत से लोग हिंदू देवीदेवताओं की पूजा नहीं करते हैं खासकर अंबेडकरवादी सोच के लोग भी इस योजना से कन्नी काट सकते हैं या फिर उन्हें उकसाया जा सकता है. तो क्या यह मान लिया जाए कि सरकार सिर्फ रामभक्तों के लिए यह योजना लाई है? ‘‘मेरा ऐसा कहने की एक वजह यह है कि हिंदुओं के भी हजारों देवीदेवता हैं. शैव भक्त क्या राम भक्त हो सकते हैं, क्योंकि उन का पूजा करने का अपनाअपना तरीका है.’’ ‘‘तुम मामले को बेवजह धार्मिक रंग दे रही हो. सरकार की ऐसी कोई मंशा नहीं है,’’ विजय ने कहा. ‘‘मेरी मंशा सही है, पर सरकार के इन सांसद की भी सुन लो. जब इस बिल पर चर्चा हो रही थी, तब उस में भाग लेते हुए भाजपा सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने कहा था कि प्रभु राम चाहते थे तो मंदिर बन गया और अब वे चाहते हैं कि विकसित गांव बनें.

यह विधेयक रामराज्य लाने के लिए लाया गया है, गांधीजी के सपनों को पूरा करने के लिए लाया गया है.
‘‘बृजमोहन अग्रवाल ने कहा था किजी राम जीसे ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और गांवों का चौतरफा विकास होगा भ्रष्टाचार रुकेगा. इस विधेयक से हिंदुत्व और सनातन की भावना उभर कर सामने आई है.’’ ‘‘तो तुम्हारा यह मानना है कि इस से देश को रफ्तार नहीं मिलेगी?’’ विजय ने कहा. ‘‘रफ्तार तो मनरेगा से ही मिल रही थी. अगर बिल में कुछ अच्छे बदलाव होते तो बात सम? में आती, पर यहां तोजी राम जीका खेल चल रहा है. कहीं ऐसा हो कि इस योजना का हीराम नाम सत्यहो जाए और साथ ही ऐसे करोड़ों लोगों के सपने बिखर जाएं जो साल के 365 दिनों में इज्जत से 100 दिन की मजदूरी पा कर अपने घरों में चूल्हा जलाते हैं,’’ अनामिका ने कहा.


‘‘तुम्हें तो हर बात में कमी निकालनी है और कुसूर मोदी सरकार पर मढ़ना है. कभी तारीफ भी तो कर दिया करो,’’ विजय ने कहा. ‘‘जैसे तुम ने सारा कुसूर मु? पर मढ़ दिया कि मेरी गलती से मैं प्रैग्नेंट हुई
हूं. क्यों सही कहा ?’’ अनामिका ने ताना कसा. और नहीं तो क्याजब तुम्हें पता है कि अभी हम शादी नहीं कर सकते हैं, तो क्यों यह बवाल खड़ा किया. अब कहीं इसे साफ कराओ,’’ विजय बोला. ‘‘यार, तुम तो बड़े दब्बू निकले. जैसे ही जिम्मेदारी निभाने की बात आई तो मु? पर भड़ास निकाल दी,’’ अनामिका ने कहा, ‘‘तुम सत्ता पक्ष के हिमायती लोगों को यही बीमारी है कि जब मामला हाथ से निकल जाए, तो सामने वाले को ही कोस दो. ‘‘पर डरो मत. यह प्रैग्नेंसी टैस्ट स्ट्रिप मेरी नहीं है. यह तो मेरी सहेली की बड़ी बहन की है, जिस की शादी को 2 साल हो गए हैं और अब उस के घर यह खुशखबरी आई है. मैं खुद अभी जल्दबाजी में शादी नहीं करना चाहती. अभी तो हमें और ज्यादा एकदूसरे को सम?ाना है,’’ कह कर अनामिका ने अपनी बात खत्म की. यह सुन कर विजय की सांस में सांस आई और उस ने अनामिका को गले से लगा लिया. News Story: 
          

Feature Story: “ज़िंदगी झंडवा, फिर भी घमंडवा में जीने वाले रवि किशन की फर्श से अर्श तक की कहानी

Feature Story: भोजपुरी सिनेमा को आसमान की ऊंचाइयों पर ले जाने और खुद माटी से जुड़े रहने वाले, भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री का अमिताभ बच्चन कहे जाने वाले रवि किशन का जीवन सोने की तरह आग में तपकर चमका है. चंद रुपए अपनी जेब में लेकर सपनों की नगरी में पहुंचे रवि किशन अपनी मेहनत के बलबूते आज करोड़ों की संपत्ति के मालिक हैं.

उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले में जन्मे रवि किशन को बचपन से ही अभिनय में दिलचस्पी थी. उनका असली नाम रविंद्र नाथ शुक्ला है. गांव में होने वाली रामलीलाओं में वे सीता का किरदार निभाया करते थे. उनके पिता एक पुजारी थे. रवि किशन का एक्टिंग की तरफ झुकाव उन्हें बिलकुल पसंद नहीं था, लेकिन मां ने हमेशा उन का साथ दिया और उनका हौसला बढ़ाया.

रवि किशन की मां ही थीं जिन्होंने उनके सपनों को पंख दिए. अभिनय के सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने रवि किशन को अपनी जमा पूंजी देकर मुंबई भेजा. लेकिन वहां काम ढूंढ़ना बिलकुल आसान नहीं था. संघर्ष के दिनों में वे एक छोटे से 10×12 के कमरे में 12 लोगों के साथ रहते थे और अक्सर एक ही थाली में पानी वाली खिचड़ी खाकर दिन गुजारते थे. अभिनय के मौके तलाशने के साथसाथ अपना खर्च चलाने के लिए कई छोटेमोटे काम भी किए.

‘जिंदगी झंडवा, फिर भी घमंडवा, डायलॉग को असल मायनों में जीने वाले रवि किशन ने फिल्म ‘लापता लेडीज’ में भी जबरदस्त एक्टिंग से फिल्म में चार चांद लगाए थे. अपने दमदार अभिनय के दम पर उन्होंने केवल हिंदी और भोजपुरी ही नहीं, बल्कि तमिल, तेलुगु और कन्नड़ फिल्मों में भी अपना लोहा मनवाया.

रवि किशन ने 600 से ज्यादा फिल्मों में काम किया है. इसके अलावा वे रियलिटी शो ‘बिग बॉस’ और ‘झलक दिखला जा’ में भी हिस्सा ले चुके हैं, जिनकी बदौलत उन्हें छोटे पर्द पर जबरदस्त लोकप्रियता मिली.

रवि किशन आज न केवल फिल्मों में, बल्कि राजनीति में भी अपनी भूमिका दमदार तरीके से निभा रहे हैं. उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत 2014 के आम चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर अपने गृह जिले जौनपुर (उत्तर प्रदेश) से की थी. हालांकि, उस समय उन्हें हार का सामना करना पड़ा. 2017 में उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी और भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल हो गए. मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी के साथ उनकी खट्टीमीठी नोकझोंक अकसर सोशल मीडिया पर खूब वायरल होती है. भाजपा के साथ उनका तालमेल सफल रहा और आज वे गोरखपुर से एक प्रभावशाली सांसद हैं.Feature Story

Hindi Story: सच्चे प्यार की पहचान

Hindi Story: बनसारी नदी उफान पर थी. परसेहरा गांव पर बाढ़ का खतरा मंडरा रहा था. ऊंची जाति की विधवा सरिता ने अपना सामान बांध लिया था. पर वह बाढ़ में फंस गई. इतने में जोखू मछुआरा नाव ले कर आया. क्या वह सरिता को बचा पाया?

पूरे इलाके में हल्ला मचा हुआ था कि बनसारी नदी बढ़ी चली रही है. ननका बांध से और भी ज्यादा पानी छोड़ दिया गया है. इस के बाद अभी और भी पानी छोड़ा जाने वाला है. परसेहरा गांव के लोगों में एक अजीब सी बेचैनी और दहशत फैल रही थी, क्योंकि बाढ़ का पानी तो कर चला जाता है, पर अपने पीछे तबाही और भुखमरी के निशान छोड़ जाता है, जिस का असर महीनों तक देखने को मिलता रहता है और बाढ़ में जाने कितनों की जानें भी चली जाती हैं.
इस गांव के लोगों को आज भी याद है कि 3 साल पहले भी बाढ़ आई थी और अपने साथ सबकुछ बहा ले गई थी.

तब लोगों के घरों और फसलों का नामोनिशान तक नहीं मिला था.
सरकार द्वारा मुआवजा देने का ऐलान तो कर दिया गया था, पर सरकारी काम में घालमेल के चलते वह मुआवजा किस को मिला, यह आज तक कोई नहीं जान सका. गांव में बाढ़ के आने पर लोग अगर समय रहते ऊंची जगह पर पहुच जाते तो जान बच सकती थी, पर इस गांव में एक ही ऊंची जगह थी, जहां पर बाढ़ का पानी नहीं जा सकता था और वह जगह थी ठाकुर नाथ सिंह की तीमंजिला हवेली, पर पिछली बार बाढ़ आने पर जब गांव के लोगों ने नाथ सिंह से शरण मांगी थी, तो ठाकुर ने अपनी हवेली का गेट ही नहीं खोला था.


ठाकुर गांव के गरीब और छोटी जाति के लोगों को अपनी हवेली में घुसने नहीं देना चाहता था, क्योंकि छोटी जाति के लोगों के अंदर जाने से उस की हवेली गंदी हो जाती और वैसे भी नीची जाति के लोगों का हवेली में आना ठाकुर नाथ सिंह की शान के खिलाफ था. गांव के बहुत से लोग हवेली के ऊंचे दरवाजे को बड़ी उम्मीद के साथ पकड़े रहे थे और फिर अचानक से आई पानी की तेज धार उन्हें अपने साथ बहा ले
गई थी.


3 साल पहले के जख्म अभी भर भी नहीं पाए थे कि अब फिर से गांव पर बाढ़ का खतरा मंडरा रहा था. सभी लोग खौफजदा थे और अपने घरों का सामान बांध कर उसे ऊंची दीवारों पर या किसी और महफूज जगह रखने की कोशिश कर रहे थे. इस अफरातफरी में सरिता नाम की एक औरत भी थी, जो बिलकुल भी नहीं घबरा रही थी. ‘‘मैं ने इतने उतारचढ़ाव और दुख देख लिए हैं कि अब किसी बाढ़ या तूफान से मुझे डर नहीं लगता,’’ अपनेआप में ही बुदबुदा रही थी सरिता, जो 35 साल की एक विधवा थी और गांव के स्कूल में टीचर थी. उस का पति भी इसी गांव में ठाकुर के यहां काम करता था, पर एक सड़क हादसे में उस की जान चली गई थी.


सरिता अकेली रह गई थी, पर उस ने साहस नहीं छोड़ा था और खुद नौकरी कर के अपनी गुजरबसर शुरू कर दी थी. भले ही सरिता ने अपनेआप को बिजी कर लिया था, पर उस का शरीर तो अभी भरपूर जवान ही था और जवानी की अपनी कुछ मांगें होती हैं. सरिता का शरीर भी ऐसी ही मांग करता था. सरिता जब रात में बिस्तर पर लेटती थी तो उस का मन करता था कि कोई उसे अपनी बांहों में भींच ले और उस के पूरे शरीर को तब तक सहलाए जब तक कि वह मदहोश हो जाए. पर एक विधवा होने के नाते वह लोकलाज के डर से ऐसे खयाल आते ही अपने विचारों को  देती थी और ठंडे पानी से हाथमुंह धो कर सोने की कोशिश करती थी.


ऐसा नहीं था कि विधवा सरिता से कोई शादी करने को तैयार नहीं था, कई रिश्ते भी आए पर सरिता इन आए रिश्तों के पीछे लोगों की मंशा और कमाऊ पत्नी के पैसे पर मजे करने की नीयत को सम? गई थी और हर आए रिश्ते को वह ठुकरा देती थी. गांव में ही जोखू नाम का गरीब मछुआरा था, जो सरिता को दूर से खूब घूरघूर कर देखता था. ‘‘क्या जोखू, काहे मास्टरनी को इतना घूरे जाते हो…’’ सत्तू ने पूछा तो सकुचाते हुए जोखू ने बताया था कि सरिता उसे बहुत अच्छी लगती है. ‘‘पर वह तो एक विधवा है,’’ सत्तू
ने कहा.


‘‘तो क्या हुआ, विधवा भी औरत ही होती है. उस के भी जी होता है,’’ जोखू ने कहा पर साथ ही साथ वह अच्छी तरह से जानता था कि गोरे रंग की सरिता कभी भी एक मछली पकड़ने वाले और शक्ल से काले से दिखने वाले आदमी से शादी नहीं करेगी. वैसे भी सरिता एक ऊंची जाति की औरत थी और जोखू एक मछुआरा, इसीलिए तो जोखू ने कभी सरिता से अपने प्यार का इजहार नहीं किया था. वह तो सरिता को दूर से ही आतेजाते देखता और खुश हो लेता था.


गांव में स्थानीय नेता राजेश कुमार के गुरगे जीप दौड़ा कर ऐलान कर रहे थे कि लोग घबराए नहीं, नेताजी की तरफ से आप लोगों को महफूज रखने की पूरी कोशिश की जाएगी और आप लोगों को इस बार बाढ़ आने पर बिलकुल भी परेशानी नहीं होगी. इस के लिए गांव के स्कूल की छत पर ही एक राहत शिविर लगाया जा रहा है, जहां पर आप लोगों को जरूरत की सारी चीजें मिलेंगी. राजेश कुमार बाढ़ जैसी आपदा के समय इस तरह के हथकंडों से अपना वोटबैंक पक्का करना चाहता था.


सरिता ने अपना कुछ सामान 2 बक्सों में समेट कर चारपाई पर रख दिया और फिर पाए के नीचे 4-4 ईंटें लगा कर चारपाई को ऊंचा कर दिया. हालांकि, इतने से वह सामान महफूज नहीं रहने वाला था, क्योंकि बाढ़ के पानी का लैवल काफी ऊंचा रहता था. फिर भी सरिता ने राहत की सांस ली थी. पानी अभी गांव में नहीं घुसा था और रात हो चली थी. सरिता ने दाल और चावल  बनाए और खा लिए. बाकी का खाना एक बरतन में रख दिया, फिर चारपाई के किनारे बैठ गई.


सभी को डर था कि बाढ़ का पानी रातबिरात गांव में घुस सकता है, इसलिए सब लोग सावधान रहे.
दिनभर के काम से थकीहारी सरिता की आंख लग जाती थी. वह बारबार आंख खोल कर देख लेती थी कि पानी गांव में तो नहीं गया, पर देर रात तक तो पानी गांव की सरहद के बाहर ही था. सरिता अचानक से हड़बड़ा कर जागी थी. उस ने देखा कि पानी उस के कमरे के अंदर गया था. चारपाई के पाए के निचले हिस्सों को पानी छूने लगा था. गांव में अलग तरह का शोर फैला हुआ था. लोगों के पानी में निकलने की आवाजें रही थीं और जानवर रंभा रहे थे. सरिता समझ गई थी कि उस ने देर कर दी है.

समय रहते उसे राहत शिविर में चले जाना चाहिए था, पर मन में यकीन था कि हो सकता है इस बार बाढ़ गांव के अंदर कर बाहर से ही चली जाए, तभी तो वह अपनी चारपाई पर ही बैठी रही थी, लेकिन अब तो खतरा सामने ही गया था. अब उसे इसी गंदे पानी में से निकल कर राहत शिविर या और किसी महफूज जगह जाना होगा. सरिता ने अपनी साड़ी को घुटनों तक किया और पानी में पहला कदम रखा, फिर धीरेधीरे कमरे के बाहर तक आई. बाहर का सीन डरावना था. चारों ओर पानी ही पानी था. सरिता का मन पानी देख कर घबरा उठा था. इतने पानी में वह कैसे चल पाएगी? पर हौसला कर के वह तकरीबन 500 मीटर ही चल पाई थी कि उस की हिम्मत जवाब दे गई थी.


पानी के हलके वेग की लहरों से सरिता के पैर टक्कर नहीं ले पा रहे थे और सरिता को लगा कि अब वह गिर जाएगी, पर ठीक तभी जोखू एक नाव ले कर गया. उस नाव पर गांव के छोटे बच्चे, 2-4 औरतें और कुछ बुजुर्ग पहले से ही बैठे हुए थे. जोखू ने सरिता को इशारे से नाव में बैठ जाने को कहा. सरिता जैसेतैसे कर के नाव में बैठ गई थी. जोखू ने नाव को स्कूल की तरफ मोड़ दिया, जहां पर राहत शिविर लगाया गया था. स्कूल पहुंच कर जोखू ने नेता राजेश कुमार के गुरगों और सरकार के लोगों से उन्हें शरण देने की बात कही, पर उन में से एक आदमी ने जोखू को धक्का देते हुए कहा, ‘‘यह राहत शिविर गांव के ऊंची जाति के लोगों के लिए है, छोटी जाति के लोग कहीं दूसरी जगह जा कर अपना जुगाड़ करें.’’ जोखू को बहुत गुस्सा आया, पर वह कुछ  नहीं कर सका.


जोखू ने सरिता से कहा, ‘‘मास्टरनीजी, आप यहां उतर जाओ, क्योंकि आप ऊंची जाति की हो. आप
को ये लोग रख लेंगे. हम लोग देखते हैं कि हमें क्या करना है.’’ सरिता ने भी सरकारी लोगों का बरताव देखा था और उसे भी अच्छा नहीं लगा था. उस ने जोखू की आंखों में देखा और कुछ सोच कर नाव से उतरने से मना कर दिया. सरिता नाव से नहीं उतरी तो जोखू को भी अच्छा महसूस हुआ और उस का जोश दोगुना हो गया. वह तेजी से नाव खेने लगा. नाव गांव में भरे पानी में इधरउधर जा रही थी, पर उन लोगों को अब एक ऐसी जगह की तलाश थी, जहां पर वे खानापीना बना कर खा सकें और आने वाले कुछ दिन वहां पर रह भी सकें.


नाव पर बैठे लोग अपनीअपनी राय दे रहे थे, पर जोखू को पता था कि ऐसी जगह तो पूरे गांव में एक ही है और वह जगह थी ठाकुर नाथ सिंह की हवेली. जोखू ने बिना कुछ कहे हवेली की तरफ नाव मोड़ दी थी और हवेली के गेट के बाहर पहुंच कर ही दम लिया था. नाव पर बैठे लोगों की आंखों में कोई चमक नहीं उभरी थी, क्योंकि वे सब जानते थे कि ठाकुर नाथ सिंह अपनी हवेली का गेट ही नहीं खोलेगा और ही किसी तरह की कोई मदद करेगा. ‘‘यह हिम्मत और एकता दिखाने का समय है. जैसा हम कहते हैं वैसा ही करना, नहीं तो बाढ़ में हम सब मारे जाएंगे,’’ यह कहने के साथ ही जोखू ने अपनी योजना सब को बता दी थी.


नाव पर बैठे लोग पानी में उतर कर हवेली के गेट तक गए और फिर उसे खटखटाने लगे. शोर सुन कर हवेली के गार्ड गांव वालों को डांटने लगे. इसी बीच ठाकुर नाथ सिंह भी अपनी छत पर पानी का जायजा लेने पहुंच गया था. इधर, जोखू अपना मछली पकड़ने का जाल ले कर पानी में तैरते हुए हवेली के पीछे छोटे गेट के पास पहुंच गया. उस ने मछली पकड़ने के जाल को दीवार पर फंसाया और उस के सहारे दीवार पर चढ़ गया, फिर आसानी से हवेली के अंदर उतर गया. जोखू एक योजना के तहत काम कर रहा था. हवेली के एक कमरे में उस ने देखा कि ठाकुर की 14 साल की बेटी मोबाइल चला रही है.


कालेकलूटे जोखू को देख कर वह घबरा उठी थी, पर जोखू ने उसे चुप रहने का इशारा किया और उस के मुंह पर हाथ रख कर उस के कान में कहा कि वह उन लोगों की मदद करे, नहीं तो गांव के सारे लोग मारे जाएंगे. लड़की को कुछ सम? नहीं आया. जोखू तकरीबन धकेलते हुए उस लड़की को ले कर छत पर ठाकुर के सामने पहुंच गया और ठाकुर से हवेली का गेट खोल कर गांव वालों को हवेली के अंदर पनाह देने की बात कही और ऐसा नहीं करने पर अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहने को भी कहा. ठाकुर नाथ सिंह अपनी बेटी की हिफाजत के प्रति संजीदा था.

वह जानता था कि मछुआरा जोखू आज पूरी तैयारी कर के आया है. हो सकता है कि उस के पास कुछ हथियार भी हो और वह आज कुछ भी कर सकता है. नाथ सिंह ने मौके की नजाकत  समझकर फैसला कर लिया था. ठाकुर इस इस समय निहत्था और लाचार था, इसलिए उस ने हवेली का गेट खोल कर सिर्फ 15-20 गांव वालों को अंदर आने की छूट दे दी, पर साथ में यह शर्त भी रख दी कि ये लोग हवेली की छत के एक कोने में रहेंगे और शोरशराबा भी नही करेंगे. जोखू ने तुरंत ही ठाकुर की हर बात मान ली थी.
लोग हवेली के अंदर रहे थे. बुजुर्गों को तो अपनी आंखों पर भरोसा ही नहीं हो रहा था कि उन्होंने ठाकुर की हवेली के अंदर पैर रखा है. वे डरेसहमे हुए से बढ़े चले जा रहे थे.


बुजुर्गों और औरतों को छत पर छोड़ने के बाद जोखू फिर से बाहर की ओर जाने लगा, तो सरिता अनायास ही बोल पड़ी, ‘‘अरे जोखू, अब कहां जा रहे हो. थोड़ा दम तो ले लो, पानी तो पीते जाओ.’’ जोखू से पहली बार किसी औरत ने इतने प्यार से कुछ पूछा था. उसके मन में सरिता के प्रति दबा हुआ प्यार दस गुना हो चला था. जोखू कुछ देर तक सरिता द्वारा खुद का नाम पुकारे जाने के रस में डूबा रहा, फिर कुछ देर बाद जोखू ने उसे बताया कि वह नाव ले कर गांव के और लोगों की मदद और उन्हें महफूज जगह पर ले कर जाने के लिए जा रहा है. जाखू की यह बात सुन कर सरिता भी जबरन उस के साथ हो ली.


सरिता के कपड़े भीगे हुए थे. वह नाव पर जोखू के पास ही सिमट कर बैठ गई थी. सरिता ने देखा कि कैसे जोखू लोगों के घरघर जा कर उन की मदद करने में लगा हुआ था. 3 साल पहले आई बाढ़ के बाद गांव वालों ने बालू और मिट्टी से कुछ टीले बना लिए थे, ताकि फिर से कभी बाढ़ के आने पर काम सकें. आज वही समय गया था. कुछ लोगों को जोखू ने उन ऊंचे टीलों पर पहुंचाया, तो कुछ को पंचायत भवन की छत पर. शाम तक जोखू भले ही थक कर चूर हो गया था, पर उसे संतोष था कि कम से कम गांव के लोग बाढ़ के पानी से महफूज तो हैं.


शाम ढली तो हवेली की छत पर बैठे गांव के लोगों ने छत पर ही अलगअलग हिस्सों में खाना बनाना शुरू कर दिया. आज किसी का हिस्सा बंटा नहीं था. कोई किसी से तेल मांग रहा था, तो कोई किसी से नमक और लोग एकदूसरे के पास जाजा कर खाने का मजा भी ले रहे थे. आज हवेली की छत पर बैठे गांव के अलगअलग घरों के लोग एक परिवार जैसे बन गए थे. सरिता ने भी खाना बना कर जोखू को खिलाया और खुद उस के बाद खाया. सरिता और जोखू के लिए छत पर लेटने के लिए जगह नहीं थी, तो सरिता नीचे के बरामदे के एक कोने में चादर डाल कर लेट गई, जबकि जोखू पास में ही बैठ गया. शायद उसे लेटने में ?ि?ाक लग रही थी. बाढ़ के चलते बिजली तो पहले ही जा चुकी थी और अब ठाकुर की हवेली भी अंधेरे में नहा रही थी.


सरिता को रात में ठंड लगने लगी, तो उस की आंख खुली और उस ने घोर अंधेरे में कोशिश कर के देखा कि जोखू भी नंगी फर्श पर सिकुड़ा हुआ लेटा है. सरिता को जोखू पर दया भी आई और प्यार भी उमड़ पड़ा. वह रात के अंधेरे में भूल गई थी कि वह एक विधवा है. इस समय वह केवल एक औरत थी. उसे जाने क्या सू? कि वह भी जोखू के पास लेट गई और अपना एक हाथ जोखू के मजबूत सीने पर रख दिया. इस समय भी जोखू के बदन से मछलियों जैसी महक रही थी, पर जोखू के प्यार में पगी हुई सरिता को आज यह सब अच्छा लग रहा था.


अचानक जोखू ने करवट ली और सरिता को अपनी मजबूत बांहों में कस  लिया था. सरिता ने भी कोई विरोध नहीं किया, बल्कि वह भी हर एक छुअन से और भी मचल जाती थी. वे दोनों एकदूसरे के बदन को सहलाते और चूमते रहे थे. जब जोखू को लगा कि सरिता ने पूरी तरह समर्पण कर दिया है, तो वह उस के शरीर में प्रवेश कर गया और सरिता के मुलायम अंगों पर अपनी हथेली घुमाता रहा. तपती धरती पर जाने कितने सालों के बाद आज पानी बरसा था और यह बरसात पूरी रात में कई बार होती रही थी.
सुबह हो चुकी थी. सरिता और जोखू एकदूसरे से आंखें नहीं मिला पा रहे थे. ‘‘हम तुम से ब्याह करना चाहते हैं. क्या तुम भी हम से ब्याह करोगी?’’ जोखू ने सकुचाते हुए पूछा, तो सरिता कुछ नहीं बोल सकी. उस की चुप्पी में ही उस की हां छिपी हुई थी.


गांव से पानी उतर कर निकल जाने में पूरे 2 दिन लग गए थे. बाढ़ का पानी अपने साथ सबकुछ बहा ले गया था. बाढ़ के जाने के बाद फसल का काफी नुकसान तो हुआ ही था, पर इस बार की बाढ़ ने ठाकुर की अकड़ खत्म कर दी थी. बाढ़ ने ठाकुर नाथ सिंह को यह संदेश भी दिया था कि ऊंट चाहे जितना भी ऊंचा क्यों हो एक दिन तो पहाड़ के नीचे आता ही है. अगर गांव के लोगों ने एकता नहीं दिखाई होती, तो इस बार भी लोग बाढ़ में बह गए होते. हालांकि, इस बाढ़ ने भी लोगों से फिर से काफीकुछ छीन लिया था, पर बाढ़ खत्म होने के बाद सरिता और जोखू ने शादी कर ली थी और दोनों खुशी से रहने लगे थे. सच्चे प्यार की यही तो पहचान होती है. Hindi Story

Film: ओ रोमियो – क्या गुस्सैल ‘कबीर सिंह’ को भी मात देगा शाहिद कपूर का नया किरदार ‘हुसैन उस्तरा’

Film: शाहिद कपूर एक बार फिर अपने इंटेंस अवतार में नजर आने वाले हैं. विशाल भारद्वाज की फिल्म ‘ओ रोमियो’ का पहला लुक टीजर रिलीज होते ही चर्चा में आ गया है. टीजर में शाहिद का उग्र और रॉ अंदाज दर्शकों को उनके किरदार ‘कबीर सिंह’ की याद दिला रहा है. इस दमदार टीजर ने फिल्म को लेकर फैंस की उत्सुकता और भी बढ़ा दी है.

फिल्म मेकर्स का कहना है कि यह फिल्म ‘वास्तविक घटनाओं पर आधारित है. इस दावे के सामने आते ही इंटरनेट मीडिया पर अटकलें शुरू हो गई हैं. दर्शक कयास लगा रहे हैं कि फिल्म की कहानी मुंबई के गैंगस्टर हुसैन उस्तरा, बदले की आग में जलती सपना दीदी और अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम की असल गैंगवार से जुड़ी हो सकती है. टीजर देखने के बाद से ही लोग हुसैन उस्तरा की असली कहानी जानने को बेताब हैं.

हुसैन उस्तरा (फिल्म में शाहिद कपूर) : यह मुंबई का कुख्यात गैंगस्टर था जो अंडरवर्ल्ड में दाऊद इब्राहिम गैंग से जुड़ा था. वह कॉन्ट्रैक्ट किलर था. कई हत्याओं में उसका नाम भी आया था. हुसैन बेहद बेरहम और हिंसक अपराधी था. अंडरवर्ल्ड की दुनिया में उसका नाम डर का पर्याय बन गया था.

मशहूर क्राइम जर्नलिस्ट एस. हुसैन जैदी की किताबों ‘डोंगरी टू दुबई’ और ‘माफिया क्वीन्स ऑफ मुंबई’ में बताया गया है कि हुसैन उस्तरा पहले दाऊद गैंग के लिए काम करता था, बाद में मतभेद और सत्ता की लड़ाई के चलते अलग हो गया.

हुसैन उस्तरा की हत्या दाऊद के गुर्गों द्वारा ही की गई थी. वे दाऊद को सीधी चुनौती दे रहे थे और सपना दीदी की मदद कर रहे थे, इसलिए दाऊद की डी कंपनी ने उन्हें रास्ते से हटा दिया. हुसैन उस्तरा की कहानी मुंबई के अंडरवर्ल्ड इतिहास का चर्चित अध्याय मानी जाती है.

सपना दीदी (फिल्म में तृप्ति डिमरी) : अशरफ खान उर्फ ‘सपना दीदी’ के पति, महमूद कालिया, की हत्या दाऊद इब्राहिम ने मुंबई एयरपोर्ट पर पुलिस एनकाउंटर (कथिततौर पर सेटअप) के जरिए करवाई थी. पति की मौत का बदला लेने के लिए अशरफ खान ने अपराध की दुनिया में कदम रखा और ‘सपना दीदी’ बनीं.

‘उस्तरा’ नाम की वजह : हिंसक लड़ाई करने और अपने दुश्मन के शरीर पर उस्तरे से एक लंबा घाव करने की वजह से उसे ‘उस्तरा’ नाम दिया गया था.

रिलीज और बॉक्स ऑफिस क्लैश

विशाल भारद्वाज की यह रोमांटिकथ्रिलर फिल्म 13 फरवरी, 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली है. बॉक्स ऑफिस पर इसकी सीधी टक्कर शनाया कपूर और आदर्श गौरव की रोमांटिक और एडवेंचर मूवी ‘तू या मैं’ से होगी. Film

Politics: तेजप्रताप यादव की ‘घर वापसी’ की अटकलें तेज

Politics:  राजद ने हाल ही बिहार विधानसभा चुनाव में मुंह की खाई है. इस की एक बड़ी वजह लालू  यादव के परिवार में टूट होना भी थी. पर अब उन के बड़े बेटे तेजप्रताप यादव ने पार्टी और परिवार से निकाले जाने के 8 महीने बाद  दिल्ली में अपने पिता लालू प्रसाद यादव से मुलाकात की. यह मुलाकात तेजप्रताप यादव की बड़ी बहन और सांसद मीसा भारती के आवास पर हुई. उन्होंने अपने पिता और बहन को भोज में आने का निमंत्रण भी दिया था.

इस दौरान तेजप्रताप यादव का सामना अपने छोटे भाई तेजस्वी यादव से भी हुआ था. दरअसल, तेजस्वी यादव और तेजप्रताप यादव दोनों रेलवे में नौकरी के बदले जमीन घोटाले मामले में हो रही सुनवाई के दौरान दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट पहुंचे थे, लेकिन दोनों के बीच कोई बातचीत नहीं हुई.

आप को बता दें कि तेजप्रताप यादव ने 1 जनवरी, 2026 को अपनी माता राबड़ी देवी के 67वें जन्मदिन पर 10, सर्कुलर रोड स्थित राबड़ी निवास पहुंच कर सब को चौंका दिया था.

तेजप्रताप यादव ने अपने सोशल मीडिया पर 2 तसवीरें शेयर की थीं. पहली पोस्ट में वे अपनी मां के साथ केक काटते दिखे और दूसरी तस् वीर पुरानी है जिस में पूरा परिवार एकसाथ दिख रहा है. उन्होंने इस के साथ एक बहुत ही भावुक करने वाला पोस्ट लिखा था.

तेजप्रताप यादव ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा, ‘मां, आप मेरी सब से बड़ी प्रेरणा हैं. जन्मदिन की बधाई. मां, आप हमारे परिवार की आत्मा हैं. हर हंसी, हर प्रार्थना, हर उस पल के पीछे आप ही हैं जो घर जैसा लगता है. यह जिंदगी जो हम जीते हैं – गर्मजोशी भरी, अधूरी, प्यार से भरी हुई, यह सब आप की वजह से है. आप ने इसे तब संभाला जब हमें पता भी नहीं था कि संभालना क्या होता है. आप मेरी सब से बड़ी प्रेरणा हैं. आप ने बिना कुछ गिने दिया, बिना किसी शर्त के प्यार किया, और तब भी मजबूत बनी रहीं जब किसी ने नहीं देखा कि यह कितना मुश्किल था…’

इन तमाम घटनाक्रमों से राजनीतिक गलियारों में तेजप्रताप यादव की ‘घर वापसी’ की सरगर्मियां तेज हो गई हैं. बता दें कि पिछले साल से ही तेजप्रताप यादव का परिवार से अलगाव जगजाहिर है. 2025 में कथित प्रेमिका अनुष्का यादव के साथ की तसवीर वायरल हुई तो लालू प्रसाद यादव ने उन्हें पार्टी और परिवार से बेदखल कर दिया था. लालू प्रसाद यादव ने अपने छोटे बेटे तेजस्वी यादव को कथिततौर पर पार्टी और परिवार का मुखिया चुन लिया है. इस से राजनीतिक मतभेद बढ़े और व्यक्तिगत मुद्दों ने परिवार को बांट दिया. सियासी विरासत की लड़ाई भी सार्वजनिक तौर पर दिखी, मगर अब इन नई तसवीरों ने फिर से नई चर्चा छेड़ दी है कि क्या लालू परिवार एक होने जा रहा है.Politics

Geo Politics: गहरी पैठ

Geo Politics. अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप सरकार की गैरकानूनी घुसपैठियों की धरपकड़ और कानूनी ढंग से आए छोटे से गुनाहगारों को वापस भेजने की पौलिसी ने अब देश के बेरोजगार युवाओं का अमेरिकी ड्रीम खत्म कर दिया है. खेत और मकान बेच कर लाखों रुपए लगा कर असलीनकली वीजा ले कर अमेरिका या कई देशों में घूमनेघामने के लिए घुसना अब बेकार है. हालांकि अभी भी लाखों भारतीय लड़के वहां हैं और कम से कम भारत से ज्यादा कमा रहे हैं.


अमेरिका में कमाई इसलिए हो रही है क्योंकि गोरे अमेरिका ने अपना कुछ खास सामान जैम मोबाइल की तकनीक, इंटरनैट, यूट्यूब, फेसबुक, व्हाट्सएप, एक्स दुनियाभर को खरीदने की लत डाल दी है. कुछ अमेरिकी युवाओं की देन जिस पर बाहर के अक्लमंद लोगों ने दिमाग लगाया, ने अमेरिका को मालामाल कर दिया है और वहां के गोरे समझ रहे हैं कि उन के पास दुनिया की चाबी है.


अमेरिकी ड्रीम अभी फिलहाल ठंडा हुआ है पर बंद नहीं हुआ है क्योंकि अब गोरे अमेरिकी उसी तरह मौजमस्ती के आदी हो गए हैं जैसे हमारे यहां के पंडेपुजारी और उन के पौलिटिकल सरकारी नौकर बिजनैसमैन भक्त. अमेरिकियों से अब काम नहीं हो पाएगा. अमेरिका में सैकड़ों पंजाबी युवा बड़ेबड़े ट्रक चला रहे हैं क्योंकि गोरे हट्टेकट्टे भी उस तरह की मुसीबत वाला मेहनती काम नहीं करना चाहते. खेतों में ट्रैक्टरों, थ्रैशरों को चलाना, लोडिंगअनलोडिंग करना, टैक्सियां चलाना, सफाई करना जैसा काम या तो वहां के कालों के हाथों में है या भारत जैसे देशों से गए लोगों के हाथों में.

पंजाब से गए लड़कों को  कर के भी इतनी अंगरेजी जाती है कि वे दूसरे देशों के भगोड़ों से ज्यादा अच्छा काम पा लेते हैं. इस के बावजूद डंकी रूट अब ठंडा तो रहेगा. दूसरे देशों में भाषा की दिक्कत रहेगी. यूरोप के देशों में अब भारतीय मूल के लोग दिख जाएंगे पर उन्हें यूरोप में सैटल होने में वक्त लगता है. यूरोप के देश छोटेछोटे हैं, लोग छोटेसंकरे मकानों में रहते हैं, जहां छिपने की जगहें कम हैं. यूरोपीय दूसरे लोगों को आसानी से मिलाते भी नहीं हैं.


जरमनी, नार्वे, स्वीडन, फ्रांस सब देशों में अब बाहरी लोगों को आने से रोकने की मांग बढ़ने लगी है. जब से मुसलिम कट्टरपंथी गोलियों की बरसात करने लगे हैं और हिंदू कट्टरपंथी हर गोल पत्थर को पूजने लगे हैं हर पेड़ की जड़ को पानदान समझने लगे हैं, साफसुधरा, डिसिप्लिन वाले यूरोपीयन बाहरी लोगों को सिरदर्द समझने लगे हैं.


भारत के युवा वर्ग के पास अब एक ही काम है, किसी मंदिर, मसजिद, गुरुद्वारे से चिपक जाओ और मुफ्त की खाओ. जब तक इस देश में बेवकूफ भक्त हैं, बहुत से अपनी मेहनत का एकचौथाई तक निठल्लों के खिला देंगे. डोनाल्ड ट्रंप की पुलिस के डर में रहने से यहां रहो और दूसरों को डरा कर रहो. हाथ में एक लाठी और अपने जैसे 6-7 का साथ होना वसूली के लिए काफी है.

कांग्रेस को केरल में कौर्पोरेशनों, नगर निकायों, जिला पंचायतों के चुनावों में अपनी ही तरह के भाजपा विरोधी लैफ्ट फ्रंट के मुकाबले अच्छी बढ़त मिली है. हालांकि भाजपा को भी कुछ फायदा हुआ है पर यदि भाजपा की अलगाववादी हिंदूमुसलिम पौलिसियां चलती रहीं और वहां भी हर चर्च और मसजिद के नीचे हिंदू मंदिर निकलने लगे तो वह लैफ्ट और कांग्रेस दोनों को हरा देगी.


भाजपा की खासीयत है कि उस की पुरोहितों की जमात पिछले 50 सालों से रातदिन एक कर के लोगों को पौराणिक हिंदू धर्म का पाठ बड़ी तेजी से पढ़ा रही है. चूंकि पौराणिक हिंदू धर्म के शिकार के लोगों के पास लिखने की कलम है, पढ़ने की समझने वे बहकावे में कर अपनी रोजीरोटी की जगह राम, शिव और किसी और देवीदेवता को बचाने में जुट जाते हैं.


अगर एक को सिर्फ 5 लोग 500 लोगों  को हर रोज बारबार सुनाते रहें तो कुछ दिनों में 500 में से
200-250 उस को सच मानने लगते हैं. भाजपा ने ऐसे लोगों की फौज तैयार कर ली है जो ?ाठ को फैलाने की ही नौकरी करते हैं. उन्हें पैसे भी मिलते हैं, साधन भी मिलते हैं और चूंकि उन के पास केंद्र सरकार है, वे सैकड़ों के फंसे काम भी करवा सकते हैं.


जब अपना काम निकलवाना होता है तो  सच मानने में हर्ज नहीं होता. हर राज्य हमेशा यही करता रहा है. आखिर यह देश यों ही 2,000 साल उन लोगों का गुलाम नहीं बना जो यहां सिर्फ व्यापार करने या इसे लूट कर लौट जाना चाहते थे. इन लुटेरों और व्यापारियों को जल्दी ही पता चल गया था कि यहां के लोग आसानी से ?ाठ का शिकार बन जाते हैं. उन्होंने पहले यहीं के  बोलने को साथ मिला लिया, उन को उन का हिस्सा दिया पर खुद बड़ा हिस्सा खाने लगे, यहीं रह कर.


1947 में हम आजाद हुए पर नाकाम करने वाले  से छुटकारा मिला. वे अलगअलग शक्ल में आते रहे हैं. कभी एक पार्टी और ?ांडे के नाम पर तो कभी दूसरी के नाम पर. जो सुधार दिखता है वह साइंस की बदौलत है. यह सुधार अफ्रीका में भी हुआ, तिब्बत में भी हुआ, सहारा के रेगिस्तान में भी हुआ. आज देश में फिर मंदिर ज्यादा बन रहे हैं, फैक्टरियां कम. धर्म की दुकानें ज्यादा बन रही हैं, स्कूलकालेज कम.
लोगों को बहकाने और बरगलाने की कीमत देश ने पहले भी दी है, आज भी दे रहा है और आगे भी देगा. केरल एक कोना बचा था जहां लोग समझदार, पढ़ेलिखे थे. अब वह भी अनपढ़ों का राज्य बनता जा रहा है, उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान की तरह का. Geo Politics                                  

Film Story: परदे की दुनिया, ‘डौन 3’ में कौन होगा हीरो

डौन 3’ में कौन होगा हीरो
Film Story.‘ कुछ समय पहले तक एक अदद हिट फिल्म तलाश रहे रणवीर सिंह की फिल्मधुरंधरकमाई के मामले में सब से आगे निकल चुकी है और अब लग रहा है कि उन के नए प्रोजैक्ट जल्दी ही पूरे होंगे, पर फरहान अख्तर की फिल्मडौन 3’ पर मुसीबत के बादल मंडराते दिख रहे हैं, क्योंकि खबर यह उछल रही है कि रणवीर सिंह इस फिल्म से पीछे हट गए हैं. तो क्या इस फिल्म के मेकर्स को नए हीरो की तलाश है?
सुना है कि रणवीर सिंह अब जय मेहता से फिल्मप्रलयकी शूटिंग शुरू करने के लिए कह रहे हैं, जो दर्शकों को जौंबी की डरावनी दुनिया में ले जाएगी.



लिवइन की हिमायती कृति खरबंदा


फुकरेके हीरो पुलकित सम्राट ने हीरोइन कृति खरबंदा से शादी की थी और इस शादी से पहले वे दोनों रिलेशनशिप में थे. अभी हाल में करन जौहर को दिए एक इंटरव्यू में कृति खरबंदा ने अपनी शादीशुदा जिंदगी और पुलकित सम्राट के बारे में बताया, ‘‘यह बहुत खूबसूरत है. शादीशुदा जिंदगी से भी ज्यादा, मु? लगता है कि हम सब से अच्छे दोस्त और सब से अच्छे रूममेट हैं. मु? लगता है कि यही हमारे रिश्ते को जिंदा रखता है


‘‘मैं लिवइन रिलेशनशिप की पूरी तरह से सिफारिश करती हूं, सौ फीसदी. मैं इस बात की सपोर्टर हूं कि जब आप को प्यार मिल जाए, तो उसे अपनी जिंदगी में बनाए रखने के लिए हर मुमकिन कोशिश करनी चाहिए.’’
कृति खरबंदा को आखिरी बार वैब सीरीजराणा नायडूमें देखा गया था और फिलहाल वे अबीर सेनगुप्ता की फिल्मरिस्की रोमियोमें काम कर रही हैं.




आ रहा है ‘फ्री का दूल्हा’


आजकल भोजपुरी फिल्मों के दर्शक दोबारा बढ़ने लगे हैं. पवन सिंह, खेसारीलाल यादव का तो जलवा है ही, नए कलाकार भी दर्शकों को लुभा रहे हैं. जल्दी ही एक भोजपुरी फिल्मफ्री का दूल्हा रही है, जिस के ट्रेलर में दिखाया गया है कि दूल्हों की सेल लगी हुई है और वे ठेले पर बिक रहे हैं. एक मां अपने बेटे का मोल लगाने के लिए ज्यादा पैसे ऐंठने की फिराक में है और बेटे को एक लड़की से प्यार हो जाता है, जिसे बिना दहेज के शादी करनी है.
इस फिल्म के हीरो हैं ऋषभ कश्यप. उन के साथ रक्षा गुप्ता और अनीता रावत जैसी हीरोइनें हैं.



‘हैप्पी पटेल : खतरनाक जासूस’ में आमिर का तड़का


स्टैंडअप कौमेडियन वीर दास एक नई फिल्महैप्पी पटेल : खतरनाक जासूसले कर रहे हैं, जिस में आमिर खान और उन के भांजे इमरान खान भी दिखाई देंगे. इस फिल्म में वीर दास एक ऐसे जासूस बने हैं जो दुश्मनों को पीटता कम है, पिटता जाता है. जैसेजैसे कहानी आगे बढ़ती है, मुसीबत उस के पल्ले जाती है और उस से हर जगह अफरातफरी मचती है.


हैप्पी पटेल : खतरनाक जासूसका डायरैक्शन वीर दास और कवि शास्त्री ने किया है, जिस में वीर दास के साथ मिथलि पालकर, मोना सिंह, शारिब हाशमी, सृष्टी तावड़े, इमरान खान और आमिर खान खास किरदारों में दिखाई देंगे. इस फिल्म को आमिर खान खुद प्रोड्यूस कर रहे हैं.  Film Story 

Hindi Story: आर्या धोखेबाज दुलहन

Hindi Story: हाथों में मिठाई का डब्बा और शादी का कार्ड थामे विनय को सामने देखना चौंकाने वाला था. ‘‘तुम यहां…’’ मेघना ने हैरान हो कर विनय से पूछा. ‘‘मैं आप से अपनी खुशी बांटने आया हूं मैम,’’ विनय ने कहा. विनय सचमुच खुश था या नहीं, यह तो पता नहीं, मगर पहली मुलाकात की बजाय शांत दिख रहा था. उसे देखा तो 2 साल पहले की मुलाकात मेघना की आंखों में घूम गई.


अक्तूबर, 2023 की बात थी, जब मेघना मीडिया महोत्सव में भाग लेने मुंबई पहुंची थी. मुंबई के बारे में जितना सुना था, वैसा बिलकुल नहीं पाया. कोई भागमभाग नहीं थी और लोग बहुत अच्छे लगे. कोई तो वजह रही होगी, जो इस शहर ने आजादी के पहले ही खुद को मौडर्न कर लिया था. कार्यक्रम मराठा संघ में था और दिन का तीनचौथाई बिता लेने के बाद आराम करने के मकसद से मेघना होटल वापस आना चाहती थी. कैब बुक की तो खुशी का ठिकाना रहा. कैब चालक का नाम विनय था. उस की रेटिंग अच्छी थी.


कैब का किराया कोलकाता से ज्यादा पर हैदराबाद से आधा था. शायद इसी खुशी ने चेहरे पर मुसकान चिपका दी, तो कैब ड्राइवर ने टोका, ‘‘हैलो मैम.’’
‘‘हाय,’’ मेघना ने जवाब दिया.
‘‘कुछ खास है क्यामैं सुबह से कई लोगों को स्टेशन से मराठा संघ ला चुका हूं?’’
‘‘हां, 3 दिनों का मीडिया महोत्सव है,’’ मेघना ने बताया.
‘‘अच्छाऔर इस में क्या होता
है मैम?’’
‘‘सहित्य और मीडिया की एकदूसरे पर निर्भरता और समाज के लिए इन की उपयोगिता पर चर्चा होती है.’’
‘‘अच्छाहमें क्या पता मैमहम तो रोज की रोटीदाल की जद्दोजेहद में जीते हैं. वैसे, आप क्या करती हैं?’’
‘‘मैं कहानीकार हूं.’’
इस से ज्यादा वह सम?ाता नहीं, सो बात खत्म करने के मकसद से मेघना ने कह दिया, मगर यहीं उसे राह मिल गई थी, ‘‘अरे वाह, आप कहानियां लिखती हैं. आप को देख कर कुछ ऐसा ही लग रहा था…’’ उस की बात पर मेघना को हंसी गई, तो मौका पा कर पूछ बैठा, ‘‘क्या आप मेरे मन की बात भी लिख सकती हैं?’’


‘‘बिलकुलबताओ क्या है तुम्हारी कहानी?’’
मेघना ने अपने अनुभव से जो सीखा वही बयां करती आई थी. उसे लगा कि वह भी प्यार की कोई आधीअधूरी दास्तान छेड़ेगा और वह हमेशा की तरह उसे पाठकों तक पहुंचाएगी, मगर उस ने जो कहा वह पूरे 2 साल तक उस के मन में घूमता रहा और अब जबकि उस की कहानी अपने अंजाम तक पहुंची है, तो मेघना ने लिखा
सब से पहले उस ने कैब राजीव गांधी सी लिंक पर चढ़ा दी. रास्ता
लंबा हुआ, तो विनय मन को खोलता चला गया.
‘‘हम 2 भाई हैं. बचपन में ही मातापिता को खो दिया था. छोटे भाई को मौसी साथ ले गईं और पढ़ाने लगीं. मैं ने छोटेछोटे होटलों में बहुत दिनों तक काम किया. खानासोना मुफ्त था, तो तनख्वाह बचा कर भाई को भेजने लगा. फिर कुछ अच्छे लोग मिले तो बेहतर होटल में नौकरी लग गई.
‘‘वहीं मेरी आनंद मेहरोत्रा सर से पहचान हुई. बेचारे बड़े भले आदमी हैं. मु? अपने होटल में हाउसकीपिंग मैनेजर बना दिया. तनख्वाह भी दोगुनी कर दी, तो मैं ने गोवा में एक कमरे का फ्लैट खरीद लिया.


‘‘होटल समुद्र के किनारे होने से हाई क्लास टूरिस्ट ज्यादा आते तो टिप भी अच्छीखासी मिल जाती. तनख्वाह पूरी की पूरी बचने लगी. जेबखर्च ऊपरी कमाई से पूरा हो जाता था.
‘‘सबकुछ बहुत अच्छा जा रहा था कि एक दिन उन के होटल के बैंकवैट हाल में मेरी नजर जिस गोरी पर जा अटकी वह भी जाने क्यों मु? ही देखे जा रही थी. वह आनंदजी के दूर के रिश्ते के बहन की बेटी थी. जिस तरह से उस ने मु? देखा, एक अनाम सा रिश्ता कायम कर लिया था. इस बात की खबर लगते ही आनंदजी ने मेरी खूब तारीफें कर हमारा रिश्ता तय करा दिया.’’
‘‘यह तो बढि़या हुआ. वे सचमुच भले इनसान हैं.’’
‘‘यही सोच कर मैं आंखें मूंदे आगे बढ़ता चला गया, मगर.’’
‘‘मगर क्या?’’ अब मेघना का कौतुहल जाग गया.


‘‘मैं ने शादी के लिए उलटी गिनती शुरू कर दी थी मगर उसे कोई जल्दी नहीं थी. वह स्कूल में पढ़ाती थी तो बच्चों के एग्जाम, रिजल्ट, पीटीएम निबटा कर जब गरमियों की छुट्टियां हुईं तब जा कर मैं घोड़ी चढ़ा.’’
‘‘अंत भला तो सब भला.’’
‘‘नहीनहीं. असली कहानी यहीं से तो शुरु हुई.’’
‘‘क्या मतलब?’’
‘‘आप बड़ी हैं. मेरा मां समान हैं, इसलिए बोल देता हूं. शादी के बाद वह हनीमून के लिए राजी ही नहीं हो रही थी, जबकि मैं ने हनीमून के लिए अलग से पैसे जमा कर रखे थे. मैं नहीं चाहता था कि कल को उस के मन में कोई मलाल रह जाए, उस का कोई अरमान अधूरा
रह जाए.
‘‘इस शादी से मैं जितना खुश था वह उतनी ही ठंडी थी. कभी मां की बीमारी, कभी व्रत, कभी पूजापाठ, कभी मेहमानों की आवभगत, तो कभी थकान इसी तरह किसी किसी बहाने से मु? से दूरदूर रहती थी.’’
‘‘शादी उस की मरजी से हुई थी ? मतलब कोई अफेयर वगैरह?’’
‘‘नहीं, ऐसा कुछ नहीं था.’’
‘‘फिर बेरुखी क्यों?’’


‘‘यहीक्यों?’ एक दिन मेरे सिर पर भी सवार हो गया. आजकल करते
40 दिन निकल गए तो मैं ने उसे भींच कर सीने से लगा लिया, पर वह फिर से मु? टालने लगी, तब मेरे अंदर का मर्द जाग गया. पहले तो प्यार से डाक्टर के पास चलने के लिए कहा, तो उस ने माहवारी का बहाना बनाया, मगर इस नाम पर पहले ही 7 दिनों तक इंतजार किया था.
‘‘आखिर में गुस्से में मैं ने वह कर डाला जो उस ने सोचा ही नहीं था…’’ यह कहते हुए विनय की नजरें ?ाकी तो मेघना ने भी कुछ पूछा, तो वह खुद कहता चला गया, ‘‘पैड खींचते ही पोल खुल गईवह औरत थी ही नहीं और मर्दमेरे साथ धोखा हुआ.


‘‘पुलिस में शिकायत की बात की तो वह पैरों पर गिर कर मिन्नत करने लगी. उसे अपनी मां की बीमारी बढ़ने की चिंता थी. वह खुद ही उन के साथ रहने चली गई, तो मैं ने पुलिस की मदद ली
‘‘आप पढ़ीलिखी हैं. आप ही बताएं कि मैं ने कहां गलती की और मेरे साथ इतनी बड़ी नाइंसाफी क्यों हुई?’’
‘‘इस बारे में पुलिस क्या कहती है?’’


‘‘वह तो आपसी सहमति से मामला सुलटाने को कहती है.’’ ‘‘मिस्टर आनंद को पकड़ो, क्या पता तनख्वाह बढ़ाने और शादी कराने में उन की ही मिलीभगत हो…’’
‘‘वे तो यह कह कर बच निकले कि उन्हें इस बात की कोई जानकारी नहीं थी.’’
‘‘तुम क्या चाहते हो?’’
‘‘मैं क्या चाहूंगापरिवार के लिए तरसता रहा तो शादी की.. शादी में हुए खर्चों की किस्त भर रहा हूं और दुलहन भी मेरी नहीं हुई.’’
‘‘क्या लड़की तुम्हारे साथ रहने को तैयार है?’’
‘‘हां…’’ विनय ने कहा.
‘‘तो रख लो…’’ मेघना ने कहा.
‘‘धोखे का क्या? उस ने मु? से खुद कुछ नहीं बताया शादी के पहले, ही बाद में…’’
‘‘कैसे बताती? तुम स्वीकार कर लेते?’’
‘‘तो अब एक धोखेबाज को क्यों स्वीकार करूं?’’
‘‘अगर तुम्हें प्यार है तो निभाओ.’’


‘‘मैम, प्यार तो है और उसे भी है यह जानता हूं, पर ऐसे साथी से सुख की कोई गुंजाइश नहीं.’’
‘‘प्यार के लिए ज्यादा दुखी हो तुम. साथी की जरूरत सभी को होती है. तुम्हें सच पता नहीं था. माना उस के नजदीकी रिश्तेदारों को भी पता नहीं था, मगर वह तो जानती थी, तभी उसे ब्याह की जल्दी नहीं थी. फिर भी शादी करने में और तुम से हकीकत छिपाने में उस का कुसूर तो है और लालच भीहो सकता है कि वह तुम जैसा साथी खोना नहीं चाहती हो. उस की चुप्पी को खोने का डर जानो रुपएपैसों के नुकसान का मत सोचोचोरी हो जाते, लुट जाते तो तुम क्या कर लेते? पैसे तो खर्चने के लिए होते हैं
‘‘मेरी सलाह है कि उसे वापस घर लाओ. कुछ समय साथ में गुजारो.


दूल्हे को दुलहन मिली है यह क्या
कम है. स्नेह का सुख भी कितनों को मिलता है…’’
‘‘मगर शादी का सुख? वंश का सुख?’’
‘‘शारीरिक सुख हासिल करने के परिवार बढ़ाने के कई आर्टिफिशियल तरीके भी हैं.’’
‘‘आप से बात कर मन हलका
हुआ. आप का शुक्रिया किन शब्दों में अदा करूं…’’
‘‘मु? मेरे होटल तक छोड़ कर…’’ मेघना बोली.
और विनय हंस पड़ा था. आज इतने समय बाद उस का ऐसे अचानक सामने आना बिलकुल हैरान करने वाला था. उस ने ही बताया, ‘‘मैम, जब मैं आप से मिला था गहरे डिप्रैशन में था. आप की बातों ने नई दिशा दी तो उसे लेने उस के घर गया, मगर वह मेरे सामने आई ही नहीं. कई बार गया.
‘‘उसे मनाने की कोशिश की तो उस ने रोते हुए कहा कि उसे पहली ही बार में मु? से प्यार हुआ. वह पूरा सच सामने रखना चाहती थी, पर अपनी मां की खुशी के लिए शादी कर ली और अब धोखेबाज दुलहन के रूप में वह मेरा सामना करने के लिए मजबूर है


‘‘मैं यह सब सुन कर रो पड़ा. मैं
उसे किसी हाल में खोना नहीं चाहता था. उसे ले कर किसी काउंसलर के पास जाना चाहता था. मगर वह किसी तरह
भी तैयार हुई तो मैं ने भी सम?ाता कर लिया.
‘‘मैं ने आनंद सर से भी बीचबचाव की बात की. कहा भी कि हमारा प्यार हम दोनो के लिए काफि है मगर उसे मेरा घर बसाने की जिद है. मेरी दूसरी शादी कराने पर आमदा है. उस ने अपनी अनाथ सहेली से मेरा ब्याह तय कर दिया है. मेरी ओर से दिए गए सारे जेवर से मेरी दूसरी दुल्हन को तैयार करेगी और इस के बदले में उसे हमारे बच्चों की बड़ी मां बनना स्वीकार है. आप को यही खुशखबरी देनी थी तो पता लेने मराठा संघ पहुंचा. मेरे सिर पर कोई बड़ा तो है नहीं. आप का आशीर्वाद ले कर मैं नई जिंदगी की शुरुआत करना चाहता हूं.’’


विनय की बातों से उस की धोखेबाज दुलहन के बारे में मेघना ने जितना कुछ सुना, उस के प्रति इज्जत से मन भर आया. सचमुच बदलते समय ने सब बदल डाला है सिवा मुहब्बत के. एक मुहब्बत ही तो है, जो आज भी लोग एकदूसरे की खुशी के लिए क्या कुछ कर गुजरते हैं. कभी एक छत के नीचे तो कभी दूर रह कर जिंदगी में रंग भरते हैं वरना मतलबपरस्त दुनिया में कौन सा रिश्ता सच्चा रह गया है. Hindi Story

Hindi Story: सफेद दाग

Hindi Story: शादी के 3 साल गुजर जाने के बाद भी रमतिया की गोद सूनी थी. रमरतिया का पति जागेश्वर उस से दूर भागता था, जबकि रमरतिया अपनी जोबन की आग में झुलस रही थी. पर इस सब की वजह क्या थी?

गां का हाल्ट रेलवे स्टेशन तुलसीपुर था, जहां सिर्फ पैसेंजर ट्रेनें ही रुकती थीं. रमरतिया अपने घर के दरवाजे पर ताला लगा कर शाम के साढ़े 6 बजे वाली पूरब दिशा की ओर जाने वाली पैसेंजर ट्रेन पकड़ने स्टेशन आई थी. वह अपने मायके जा रही थी. उस के भाई की शादी जो थी. रमरतिया के मायके से उसे लेने के लिए 2-3 बार छोटा भाई आया था, लेकिन उस के पति जागेश्वर ने उसे यह कह कर वापस भेज दिया था कि शादी का दिन नजदीक आने पर एक दिन वह खुद रमरतिया को छोड़ देगा.


पर आजकल करतेकरते शादी को जब 3 दिन रह गए, तो जागेश्वर ने कहा, ‘‘रमरतिया, मु झे तुम्हें मायके छोड़ने की फुरसत नहीं है. तू 10 बजे वाली पैसेंजर ट्रेन से अकेले ही चली जाना. हां, शाम वाली पैसेंजर से मैं भी जाऊंगा, फिर 3-4 दिन ससुराल में ऐश करूंगा,’’ यह कह कर जागेश्वर पश्चिम दिशा की ओर जाने वाली सुबह 7 बजे की पैसेंजर ट्रेन से अपनी ड्यूटी पर चला गया था. जागेश्वर गांव के उस हाल्ट रेलवे स्टेशन तुलसीपुर से 5 स्टेशन पश्चिम दिशा उतर कर एक गांव के स्कूल में क्लर्क की नौकरी करता था, जबकि रमरतिया का मायके गांव के हाल्ट रेलवे स्टेशन तुलसीपुर से 5 स्टेशन पूर्व दिशा की ओर था.


रमरतिया की शादी को 3 साल गुजर गए हैं, पर अभी तक उस की गोद सूनी थी. इस की वजह यह थी कि जागेश्वर उसे बिलकुल पसंद नहीं करता था, क्योंकि उस के शरीर पर जगहजगह सफेद दाग थे. इस वजह से वह उस के पास आने में घिन महसूस करता था. जागेश्वर घर पर केवल भोजन से मतलब रखता था, फिर बिस्तर लपेट कर बगल में दाबे हुए बाहर चला जाता था और मड़ैया में बिछी खाट पर सो जाता था या जब खलिहान में फसल होती, तब खलिहान में सोता था.


सावनभादों की रातें हों या वसंत की चांदनी रातें, रमरतिया अपने जोबन की आग पर काबू कर के किसी तरह अकेली समय काट लेती. वह सोचा करती कि औरत का जन्म पा कर जिस को खूबसूरत शरीर नहीं मिला उस की जिंदगी बेकार है और उन्हीं बेकार औरतों की श्रेणी में एक वह भी है. कभीकभी जब वह अपने पति जागेश्वर को चायपानी देते समय उंगलियों से छू देती या फिर मुसकरा देती, तब वह उसे डांटते हुए बोल उठता, ‘‘मुसे तू अपनी जवानी की प्यास बु झाना चाहती हैमैं तेरी जैसी बदसूरत औरत को भला क्यों भोगूं, मु झे तो खूबसूरत औरतें मिलती रहती हैं. तू जवानी की आग में जल मरे , मैं तब भी तु झे हाथ तक नहीं लगाने वाला.’’


यह सुन कर रमरतिया की आंखों में आंसू छलक आते. वह मन ही मन  जागेश्वर को कोसती हुई बुदबुदाती रहती, ‘‘बाजारू औरतों के चक्कर में पड़ना ठीक तो नहीं होता राजा, लेकिन मैं सम झाऊं भी तो कैसे…’’
प्लेटफार्म पर बनी सीमेंट की लंबी कुरसी पर बैठी रमरतिया अपनी प्लास्टिक की डोलची हाथ में थामे यह सब सोच ही रही थी कि पैसेंजर ट्रेन आने की सूचना हो गई. मुसाफिर अपनी जगह से उठ कर पश्चिम दिशा की ओर  झुक झुक कर रेल की पटरियों को देखने लगे. जागेश्वर के कहे मुताबिक रमरतिया तो सुबह 10 बजे वाली पैसेंजर ट्रेन ही पकड़ने वाली थी, पर बाल संवारने, नाखून रंगने और पांव को आलता से रंग कर सजनेसंवरने में उसे देर हो गई थी.


सजसंवर कर जब रमरतिया आईने के सामने खड़ी होती, तो किसी अप्सरा से कम थोड़ी लगती, पर उस का आदमी तो उस के शरीर के सफेद दाग से बिदका हुआ रहता. सांचे में ढले उस के बदन के कसाव और उभार पर तो कभी उस की नजर ही नहीं गई. सुहागरात को ही लालटेन की रोशनी में रमरतिया के शरीर के सफेद दाग देख कर जागेश्वर ऐसा बिदका था कि फिर रात में कभी नहीं पास आया. हर समय कहता रहता, ‘‘बेकार लड़की से शादी करा दी. जब जवानी की आग में तड़पेगी तब पता चलेगा कि किसी भोलेभाले लड़के से सफेद दाग वाली बात छिपा कर शादी करने का नतीजा क्या होता है.’’


जागेश्वर शाम को स्कूल से छुट्टी होने पर सीधे स्टेशन आया और अपनी ससुराल तक के स्टेशन का टिकट ले कर शाम वाली पैसेंजर ट्रेन में सवार हो गया. उसे पूरी तरह भरोसा था कि रमरतिया सुबह 10 बजे वाली पैसेंजर ट्रेन से अपने मायके पहुंच कर घरपरिवार के माहौल में घुलमिल गई होगी. चलो, रात के 10 बजे तक तो वह भी पहुंच ही जाएगा वहां. शादीब्याह वाले घरों में वैसे भी 10-11 बजे तक चहलपहल रहती ही है. ट्रेन में बैठा हुआ जागेश्वर यह सब सोचतेसोचते कभीकभी  झपकी लेने लगता. बीच के स्टेशनों पर लोग चढ़तेउतरते रहे. उस ने खिड़की से बाहर  झांका, तो पता लगा सूरज डूब चुका था और अंधेरा हो गया था.


अरे, यह तो उस के गांव का स्टेशन तुलसीपुर है. यहां तक आतेआते ट्रेन पूरे डेढ़ घंटे लेट हो गई थी. अब पूरे 8 बज   रहे थे. उसे प्यास लगती महसूस हुई. अगले ही पल वह तुलसीपुर स्टेशन पर हैंडपंप से पानी पीने ट्रेन से नीचे उतर पड़ा, यह सोच कर कि वहां कुछ देर तक तो ट्रेन रुकती ही है. गुलमोहर के पेड़ तले वाला हैंडपंप पास ही तो था. जागेश्वर ने हैंडपंप के हत्थे पर जोर डाल कर चलाया और जल्दी से 8-10 अंजुलि पानी पी डाला. तब तक ट्रेन खुल गई, तो वह दौड़ कर एक बोगी में चढ़ गया. इस बोगी में तो घुप अंधेरा है, कोई बल्ब नहीं जल रहा, शायद इस बोगी में बिजली का कनैक्शन किसी तरह से हट गया है, इसीलिए उस में कोई मुसाफिर भी नहीं चढ़ा था. जागेश्वर अंधेरे में ही बीच की एक लंबी वाली बर्थ पर बैठ गया. ट्रेन तेज रफ्तार से भागी जा रही थी.


एकाएक जागेश्वर को लगा कि उस के सामने वाली लंबी सीट पर कोई औरत लेटी है, क्योंकि उस ने शायद करवट बदली थी, तो चूडि़यों की खनकने की आवाज आई थी. वह सोचने लगा, ‘इस अंधेरी बोगी में जहां हाथ को हाथ नहीं सू रहा और यहां औरतजरूर कोई पागल औरत होगी…’ पर जागेश्वर के मन का शैतान अगले ही पल उछलकूद करने लगा. वह सोचने लगा कि काश, यह औरत उस के मन की मुरादनहींनहींऐसी पागल औरत से जिस्मानी रिश्ता बनाना खतरे से खाली नहीं, एड्स का शिकार हो जाएगा.
मन में यह सम तो जागेश्वर को आई पर अगले ही पल हवस के भेडि़ए ने उस के मन पर कालिख पोत दी और उस की हथेलियां सीट पर कुछ टटोलने लग गईं. अगले ही पल उस औरत के पांव की पायल छू गई, साथ ही चिकनी नरम चमड़ी.


अरे, यह औरत तो कुछ भी नहीं एतराज कर रही, शायद इस का मन भी…’ जागेश्वर का हौसला बढ़ गया. उस ने दोबारा अपनी हथेलियां उस की पिंडलियों तक पहुंचा दीं. वह औरत अभी भी खामोश थी. जागेश्वर को अब पूरा यकीन हो गया कि यह औरत उसे मना नहीं करेगी. जागेश्वर का हौसला बढ़ता गया और उस की हथेलियां एकएक बित्ता ऊपर बढ़ती गईं. औरत खामोश रही. हवस का भेडि़या अगले ही पल मांसपिंड पर टूट पड़ा और स्वाद चख कर शांत हो गया. पैसेंजर ट्रेन बीच के कई स्टेशनों को पार करती जागेश्वर की ससुराल वाले रेलवे स्टेशन पर जा लगी. इस बीच में उस बोगी में अंधेरा देख कर कोई भी मुसाफिर नहीं चढ़ सका था. ट्रेन रुकते ही जागेश्वर स्टेशन पर उतर पड़ा. अभी वह नीचे उतर कर खड़ा ही हुआ था कि वह औरत भी  झटपट उतर पड़ी.


स्टेशन के उजाले में जागेश्वर ने उस औरत को देखा, तो जैसे वह उस से नजरें नहीं मिला पा रहा था. वह हकलाता हुआ बोल पड़ा, ‘‘रेरमरतियातूइस अंधेरी बोगी में…’’ ‘‘हां, मैं रमरतिया ही हूं, सुबह वाली पैसेंजर ट्रेन छूट गई थी. जल्दी में स्टेशन पर इस शाम वाली ट्रेन में चढ़ी तो अंधेरी बोगी मिल गई. ट्रेन जब खुल गई तो मैं ने देखा कि तुम स्टेशन के हैंडपंप से पानी पी कर दौड़ कर इसी बोगी में चढ़ गए थे. ‘‘मैं चुपचाप बोगी के बीच में पहुंच कर एक सीट पर लेट गई. मैं जानती थी कि तुम इसी तरह ट्रेनों में, बाजारों में, गलीकूचों में औरतों की तलाश करते रहते हो और अपनी जवानी की प्यास बु झाते फिरते हो.


‘‘यही सोच कर मैं एक लावारिस औरत की तरह पड़ी रही, ताकि आज इस ट्रेन में तुम से मेल कर के यह एहसास करा सकूं कि शरीर तो एक ही होता है, चाहे वह काला हो, गोरा हो या सफेद दाग से भरा हो.
‘‘अगर मन स्वीकार कर ले तो सारी कमियां दूर हो जाती हैं, क्योंकि हर औरतआदमी के मिलन का सुख एक सा हुआ करता है,’’ यह कह कर रमरतिया खामोश हो गई. जागेश्वर को आज रमरतिया की यह बात बहुत गहरे तक जा लगी. उस ने जो कुछ कहा, आदमी औरत के मिलन की सचाई यही तो है. इतना सुख देने वाली सेहतमंद, कसे बदन वाली पत्नी को मात्र सफेद दाग की वजह से छोड़ कर जागेश्वर इधरउधर भटकते हुए बाजारू औरतों से अपने जिस्म की प्यास बु झाता रहा.


सचमुच, जागेश्वर का मन एक औरत के प्रति क्यों इतनी गलत सोच वाला हो गया. हकीकत तो यही है कि उस की पत्नी दिलदिमाग और बरताव में किसी दूसरी औरत से कमतर तो नहीं. उसे अब बहुत पछतावा होने लगा था. शादी के कई साल बीत गए, पर वे दोनों एक घर में रह कर भी अलगअलग थे. जागेश्वर ने रमरतिया के शरीर के सफेद दाग का इलाज करवाने के लिए भी कभी नहीं सोचा. अब तो कोई भी बीमारी लाइलाज नहीं रही, देश का मैडिकल क्षेत्र बहुत विकसित हो चुका है. वह अपनी चांद सी पत्नी के सफेद दाग का इलाज जरूर कराएगा.


अगले ही पल जागेश्वर ने अंधेरे में खेत की पगडंडी पर अपनी ससुराल वाले गांव की ओर कदम बढ़ाते हुए रमरतिया को अपनी बांहों में जकड़ लिया और उस के गाल पर एक गहरा चुंबन जड़ दिया. रमरतिया मुसकरा उठी. जागेश्वर के मुंह से अनायास ही निकल पड़ा, ‘‘मैं ने बहुत बड़ी भूल की है. तुम ने मेरी आंखें खोल दी हैं रमरतिया. मैं अब तुम्हें छोड़ किसी दूसरी औरत की ओर ताकूंगा भी नहीं.’’ Hindi Story

लेखक -कमलेश पांडेय ‘पुष्प’

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