Hindi Short Story : बाबा की महिमा

Hindi Short Story. भक्तों की भीड़ बढ़ती जा रही थी. आखिर 3 महीने के मौनव्रत के बाद आज बाबा मुक्तानंद महाराज भक्तों को आशीर्वाद जो देंगे.

जैसे ही यह खबर सूबे में पहुंची, सुबह से ही बाबा के आश्रम के बाहर भक्तों की भीड़ लगने लगी. बाबा ने अपने भक्तों को आशीर्वाद देने का समय दोपहर 2 बजे तय किया था.

आश्रम में भरपूर भीड़ हो जाने के बाद बाबा के स्वयंसेवक बड़े से पंडाल में भक्तों को बैठाने में लगे हुए थे और ठीक 2 बजे बाबा के सचिव पंडित चतुरनाथ चौबे पंडाल में बैठे सभी भक्तों से बोले, ‘‘तबीयत ठीक न होने के बावजूद बाबा आप सभी से मिलने को बेकरार हैं, लेकिन आज पहले दिन पंडाल में आए भक्तों में से केवल गंभीर समस्याओं वाले भक्त ही यहां रहें और जो भक्त आज बाबा के दर्शन करने आए हैं, वे कल दोपहर में आने की कृपा करें.’’

सचिव के इस ऐलान के बाद तकरीबन आधा पंडाल खाली होने लगा. भक्त बाबा की गद्दी के पास रखे दानपात्र में कीमती सामान व नकदी डालते हुए आश्रम के बड़े दरवाजे से बाहर निकलते गए.

अब पंडाल में केवल 100-150 भक्त ही रह गए थे. बाबा के सचिव पंडित चतुरनाथ चौबे ने बारीबारी से बाकी बचे भक्तों से उन की समस्या को सुना और उन्हें बाबा की कुटिया के बाहर बने 5 गेटों के बाहर अलगअलग लाइनों में खड़ा करवा दिया. साथ ही, सभी भक्तों को यह हिदायत भी दे दी गई कि बाबा हर 5 औरतों के बाद 2 मर्दों की समस्या सुनेंगे और हल बताएंगे.

सभी भक्तों को 5 लाइनों में तरीके से खड़ा करने के बाद बाबा के सचिव ने बाबा की कुटिया के भीतर जा कर थोड़ी देर बाद बड़ा दरवाजा खोल दिया और वहीं लाउडस्पीकर से अलगअलग लाइनों में खड़ी औरतों को एकएक कर के बाबा के सामने आने को कहा.

पहली औरत के आते ही बाबा ने जोर से कहा, ‘‘ऐ देवी, तुम्हें अभी तक औलाद का सुख नहीं मिला है.’’

बाबा के इतना कहते ही वह औरत  उन के पैरों में गिर गई और फल, नकदी व दूसरी चीजें उन के चरणों में रख दीं. साथ ही, अपने हाथ की सोने की अंगूठी भी उतार कर बाबा को दे दी.

बाबा ने उस औरत को भभूत और एक सेब देते हुए कहा, ‘‘अब तुम 6 महीने बाद शाम ढले आना.’’

इस के बाद दूसरी लाइन की एक औरत भीतर आई, तो बाबा ने उस के परिवार में कारोबारी घाटे की बात कही. उस औरत की आंखें खुली की खुली रह गईं और बाबा को सामान दे कर वह भी भभूत और सेब ले कर चलती बनी.

तीसरी औरत को बाबा ने उस के पति के साथ मनमुटाव की जानकारी दी. बाबा की यह बात सुन कर वह औरत भी हैरान रह गई.

अगली औरत के आने पर बाबा ने उस के बेटे की नौकरी न लगने की बात की. इसी तरह आखिरी लाइन की औरत के आने पर बाबा ने उसे बताया कि उस के पूरे परिवार को बीमारियों ने घेर रखा है.

इस तरह बारीबारी से औरत व मर्द आते रहे और बाबा उन से पूछे बिना ही उन की समस्या बता कर उन्हें अपना आशीर्वाद, भभूत, फल वगैरह प्रसाद में देते रहे. इस के एवज में तमाम भक्त नकदी, पूजा का सामान, सोने व चांदी के जेवर, कपड़े, साड़ी और दूसरी कीमती चीजें बाबा को देते रहे.

दोपहर के 2 बजे से यह सिलसिला शाम के 7 बजे तक चलता रहा. जो भी भक्त बाबा की कुटिया से बाहर आता, वह पंडाल में बैठे बाकी भक्तों को बाबा के चमत्कार के किस्से सुनाता हुआ आश्रम से बाहर निकल जाता.

जब सभी भक्त बाबा के आश्रम से चले गए, तो बाबा मुक्तानंद महाराज के सचिव पंडित चतुरनाथ चौबे कुटिया के भीतर गए और भक्तों द्वारा चढ़ाए गए चढ़ावे का हिसाबकिताब करने लगे.

सारा चढ़ावा अलगअलग छांट कर और भारी मात्रा में आए जेवरात व नकदी की गिनती वगैरह कर लेने के बाद बाबा ने कुल दान का 25 फीसदी अलग कर के एक पोटली में बांध कर सचिव को सौंप दिया.

आखिर सचिव 25 फीसदी हिस्से का हकदार तो था ही. उसी ने तो पंडाल में बैठे तमाम भक्तों को उन की परेशानियों के हिसाब से ही बाबा की कुटिया के बाहर बनी पांचों लाइनों में अलगअलग खड़ा कर दिया था.

पहली लाइन में खड़े भक्तों को औलाद सुख नहीं था, तो दूसरी लाइन में भक्त बीमारी से परेशान थे. इसी तरह चौथी लाइन के भक्तों के परिवार में नौकरी न लगने जैसी समस्याएं थीं.

लाइन के हिसाब से ही बाबा भक्तोें की समस्या का अंदाजा लगा लेते थे.

दान का एकचौथाई हिस्सा ले कर सचिव पंडित चतुरनाथ चौबे महीने की 14 तारीख को फिर से आने का वादा कर के लंबेलंबे कदमों से आश्रम से बाहर निकल गया.    Hindi Short Story

Workplace Harassment : दलाल

Workplace Harassment . ‘‘मैडम, आप को साहब बुला रहे हैं,’’ चपरासी गणेशी ने यह कहा, तो मीनाक्षी को लगा कि जरूर किसी काम में फिर गलती हो गई है.

मीनाक्षी जब साहब के केबिन में गई, तो वे उसे खा जाने वाली निगाहों से देख रहे थे. वे गुस्से से बोले, ‘‘मीनाक्षी…’’   ‘‘जी सर,’’ उस ने गरदन नीची रखते हुए कहा.

‘‘तुम्हें कितने महीने हो गए काम करते हुए?’’ ‘‘4 महीने,’’ उस ने कहा.

‘‘4 महीने में लोग बहुतकुछ सीख लेते हैं, मगर अभी तक तुम ने कुछ भी नहीं सीखा है,’’ साहब की आंखों में गुस्सा था.

मीनाक्षी ने कोई जवाब नहीं दिया. वह एक अपराधी की तरह खड़ी रही.

साहब झल्ला कर बोले, ‘‘तुम ने जवाब नहीं दिया मिस मीनाक्षी.’’ ‘‘सर, गलती हो गई. आगे से नहीं होगी,’’ वह बोली.

‘‘क्या खाक नहीं होगी. जिसे काम सीखना ही नहीं, वह क्या अच्छा काम करेगा. अरे, तुम्हें तो विरासत में नौकरी मिली है, इस का मतलब यह नहीं है कि काम ढंग से न करो.’’

‘‘सर, अब गलती नहीं होगी,’’ वह दयनीय लहजे में बोली. ‘‘लो, यह फाइल अभी सुधार कर लाओ,’’ कह कर साहब ने उस के सामने वह फाइल फेंक दी.

मीनाक्षी फाइल उठा कर अपनी सीट पर आ कर बैठ गई.

वह उस फाइल में गलतियां ढूंढ़ने लगी. उस का ध्यान फाइल पर जरूर था, मगर मन यादों में भटक रहा था.

मीनाक्षी 3 बहिनों में सब से बड़ी थी. उस के बाबूजी एकाउंटैंट के पद पर थे. परिवार खुशहाल था. जब मीनाक्षी ने जवानी की दहलीज पर कदम रखा, तब बाबूजी ने उस के लिए लड़का देखना शुरू कर दिया था. मगर इसी बीच बाबूजी हार्टअटैक से मर गए और हंसताखिलखिलाता घर बरबाद हो गया.

जब मीनाक्षी को अपने बाबूजी की जगह नौकरी मिल गई, तब परिवार को थोड़ा सहारा मिला.

मीनाक्षी यादों के दायरे से बाहर निकल आई. वह गलती को नहीं पकड़ पाई. वह फाइल ले कर मिसेज चौधरी के पास जा कर बोली, ‘‘मैडम, आप मुझे  बताइए, इस फाइल में कहां गलती है?’’

मिसेज चौधरी थोड़ी देर तक फाइल को टटोलती रहीं, फिर बोलीं, ‘‘मीनाक्षी, मेरी जानकारी में इस फाइल में कोई गलती नहीं है.’’ ‘‘फिर साहब ने गलती बता कर यह फाइल क्यों लौटाई?’’

‘‘फाइल में नहीं, साहब की नीयत में खोट है,’’ मिसेज चौधरी बोलीं. ‘‘आप कहना क्या चाहती हैं?’’ मीनाक्षी जरा गुस्से से बोली.

‘‘यों सीधी बन कर मत रहो. जमाने के साथ चलना सीखो…’’ फिर मीनाक्षी के कान में वे धीरे से बोलीं, ‘‘तुम तो अभी जवान हो, खूबसूरत हो. एक बार साहब के साथ हमबिस्तर हो जाओ, फिर वे तुम्हारे गुलाम हो जाएंगे. इस के बाद वे फाइलों में कभी भी गलती नहीं निकालेंगे… न कभी डांट पडे़गी.’’

मीनाक्षी नाराजगी से बोली, ‘‘मिसेज चौधरी, ऐसी बातें करते हुए आप को शर्म नहीं आती.’’ ‘‘औरतें जब नौकरी करने लगती हैं, तब उन्हें शर्म छोड़नी पड़ती है…’’ मिसेज चौधरी समझाती हुई बोलीं, ‘‘मेरी बात का तुम्हें बुरा जरूर लगा होगा, मगर यह आज का कड़वा सच है. आजकल औरतें कहीं महफूज नहीं हैं.’’

मीनाक्षी अपनी सीट पर आ कर बैठ गई और पुरानी बातें सोचने लगी.

मीनाक्षी कालेज के दिनों में बोल्ड रहा करती थी. कई लड़के उसे छेड़ने की कोशिश करते थे, तब वह पलट कर उन की बोलती बंद कर देती थी. मगर आज वह कालेज वाला जमाना नहीं है. अब वह मामूली मुलाजिम है. उस की भी इज्जत है. नौकरी करेगी, तो अपनी इज्जत बेच कर नहीं, चाहे इस के लिए उसे कितना ही संघर्ष क्यों न करना पड़े.

एक दिन वह मां से बोली थी, ‘निशा को देखने आने वाले थे न… क्या हुआ?’

‘बेटी, निशा को जो देखने आने वाले थे, उन का कार्यक्रम एक हफ्ता और आगे बढ़ गया. मगर तेरे लिए उन लोगों ने फिर संदेश भिजवाया है, जहां तेरे बाबूजी सगाई तय कर गए थे. वे तेरा फैसला सुनना चाहते हैं.’’

‘मां, उन से कह दो कि मैं शादी करने के लिए तैयार हूं,’ उस ने जब यह बात कही, तब मां का चेहरा खुशियों से भर उठा. फिर वह आगे बोली, ‘मां, उन से कह देना कि जब तक निशा का रिश्ता तय नहीं हो जाता, तब तक मेरी शादी नहीं होगी. हम दोनों की शादी एकसाथ होगी.’

‘हां बेटी, यह कह कर तू ने मेरा रास्ता आसान कर दिया,’ मां की आंखों से खुशी के आंसू छलक आए.

कुछ सोच कर मीनाक्षी फाइल ले कर बेधड़क साहब के केबिन में जा कर बोली, ‘‘सर, इस फाइल में कहीं कोई गलती नहीं है.’’

‘‘तुम्हें यकीन है कि इस फाइल में कोई गलती नहीं है?’’ ‘‘हां सर, मैं पूरे यकीन के साथ कह रही हूं,’’ मीनाक्षी ने कहा.

‘‘यानी मैं गलत कह रहा हूं.’’ ‘‘नहीं सर, आप मुझ  से ज्यादा जानते हैं, इसलिए आप से तो गलती हो ही नहीं सकती है…’’ मीनाक्षी बोली, ‘‘आप से तो मुझे  बहुत कुछ सीखना है. इस फाइल में कहां गलती है, बता दीजिए.’’

‘‘आखिर मैं कब तक तुम्हें बताता रहूंगा?’’ ‘‘सर, कोई भी मां के पेट से सीख कर नहीं आता है.’’

‘‘बस, बहस करना जानती हो. कभी काम सीखने की कोशिश नहीं करती हो.’’ ‘‘नहीं सर, ऐसी बात नहीं है. अभी तो मेरी सीखने की उम्र है.’’

‘‘तब ठीक है. मिसेज चौधरी से जा कर पूछो कि इस फाइल में क्या गलती है?’’ ‘‘सर, उन्होंने फाइल देख ली है. उन्होंने इसे सही बताया है.’’

‘‘और भी कुछ बताया होगा,’’ वासना भरी नजर से साहब ने उस की ओर देखा. ‘‘नहीं सर, कुछ नहीं बताया.’’

‘‘तब जाओ, पूछ कर आओ.’’ ‘‘माफ करें सर, आप मेरे अफसर हैं. अगर मैं काम में गलती करूं या काम नहीं करूं, तब आप को डांटने का पूरा हक है. मेरे काम में कोई गलती न होने पर भी आप मुझे परेशान करते हैं. मिसेज चौधरी आप की दलाल हैं. मगर सर, मैं उन लड़कियों में से नहीं हूं. मुझ  से आप किसी नाजायज काम की उम्मीद न करें.’’

‘‘मीनाक्षी, आप जानती हैं कि किस पर आरोप लगा रही हैं.’’ ‘‘हां सर, मुझे  मालूम है. आप मेरे अफसर हैं. मिसेज चौधरी ने जो कुछ मुझे  बताया है, सब समझती हूं. वे आप की दलाल हैं. आप को काम नहीं दलाली पसंद है. आप को वे औरतें अच्छी लगती हैं, जो आप को जिस्म सौंप दें या फिर वे मर्द अच्छे लगते हैं, जो नोटों से भरा लिफाफा दें.’’

‘‘मीनाक्षी…’’ ‘‘मुझे  बोलने दीजिए सर…’’ बीच में ही साहब की बात काट कर मीनाक्षी बोली, ‘‘आप मेरे लिए पिता के समान हैं… मेरी भावनाओं से कभी खेलने की कोशिश न कीजिएगा. इस के बावजूद अगर आप मुझे परेशान करेंगे, तब मुझे  और कोई रास्ता अपनाना पड़ेगा.

‘‘और हां, यह फाइल बिलकुल सही है. आप ने मुझे  परेशान करने के लिए यह हथकंडा अपनाया… आप इस फाइल पर दस्तखत कर दीजिएगा. यहां तो औरत ही औरत की दलाल बनी हुई है,’’ कह कर मीनाक्षी केबिन से बाहर निकल गई. Workplace Harassment

Romantic Hindi Story : वो भूली दास्तां – बारिश में मिले दो अजनबी

Romantic Hindi Story. कभीकभी जिंदगी में कुछ घटनाएं ऐसी भी घटती हैं, जो अपनेआप में अजीब होती हैं. ऐसा ही वाकिआ एक बार मेरे साथ घटा था, जब मैं दिल्ली से हैदराबाद जा रहा था. उस दिन बारिश हो रही थी, जिस की वजह से मुझे एयरपोर्ट पहुंचने में 10 मिनट की देरी हो गई थी और काउंटर बंद हो चुका था.

आज पूरे 2 साल बाद जब मैं दिल्ली एयरपोर्ट पर उतरा और बारिश को उसी दिन की तरह मदमस्त बरसते देखा, तो अचानक से वह भूला हुआ किस्सा न जाने कैसे मेरे जेहन में ताजा हो गया.

मैं खुद हैरान था, क्योंकि पिछले 2 सालों में शायद ही मैं ने इस किस्से को कभी याद किया होगा.

एक बड़ी कंपनी में ऊंचे पद पर होने के चलते काम की जिम्मेदारियां इतनी ज्यादा हैं कि कब सुबह से शाम और शाम से रात हो जाती है, इस का हिसाब रखने की फुरसत नहीं मिलती. यहां तक कि मैं इनसान हूं रोबोट नहीं, यह भी खुद को याद दिलाना पड़ता है.

लेकिन आज हवाईजहाज से उतरते ही उस दिन की एकएक बात आंखों के सामने ऐसे आ गई, जैसे किसी ने मेरी जिंदगी को पीछे कर उस दिन के उसी वक्त पर आ कर रोक दिया हो.

चैकआउट करने के बाद भी मैं एयरपोर्ट से बाहर नहीं निकला या यों कहें कि मैं जा ही नहीं पाया और वहीं उसी जगह पर जा कर बैठ गया, जहां 2 साल पहले बैठा था.

मेरी नजरें भीड़ में उसे ही तलाशने लगीं, यह जानते हुए भी कि यह सिर्फ मेरा पागलपन है. मेन गेट की तरफ देखतेदेखते मैं हर एक बात फिर से याद करने लगा.

टिकट काउंटर बंद होने की वजह से उस दिन मेरे टिकट को 6 घंटे बाद वाली फ्लाइट में ट्रांसफर कर दिया गया था. मेरा उसी दिन हैदराबाद पहुंचना बहुत जरूरी था. कोई और औप्शन मौजूद न होने की वजह से मैं वहीं इंतजार करने लगा.

बारिश इतनी तेज थी कि कहीं बाहर भी नहीं जा सकता था. बोर्डिंग पास था नहीं, तो अंदर जाने की भी इजाजत नहीं थी और बाहर ज्यादा कुछ था नहीं देखने को, तो मैं अपने आईपैड पर किताब पढ़ने लगा.

अभी 5 मिनट ही बीते होंगे कि एक लड़की मेन गेट से भागती हुई आई और सीधा टिकट काउंटर पर आ कर रुकी. उस की सांसें बहुत जोरों से चल रही थीं. उसे देख कर लग रहा था कि वह बहुत दूर से भागती हुई आ रही है, शायद बारिश से बचने के लिए. लेकिन अगर ऐसा ही था तो भी उस की कोशिश कहीं से भी कामयाब होती नजर नहीं आ रही थी. वह सिर से पैर तक भीगी हुई थी.

यों तो देखने में वह बहुत खूबसूरत नहीं थी, लेकिन उस के बाल कमर से 2 इंच नीचे तक पहुंच रहे थे और बड़ीबड़ी आंखें उस के सांवले रंग को संवारते हुए उस की शख्सीयत को आकर्षक बना रही थीं.

तेज बारिश की वजह से उस लड़की की फ्लाइट लेट हो गई थी और वह भी मेरी तरह मायूस हो कर सामने वाली कुरसी पर आ कर बैठ गई. मैं कब किताब छोड़ उसे पढ़ने लगा था, इस का एहसास मुझे तब हुआ, जब मेरे मोबाइल फोन की घंटी बजी.

ठीक उसी वक्त उस ने मेरी तरफ देखा और तब तक मैं भी उसे ही देख रहा था. उस के चेहरे पर कोई भाव नहीं था. मैं सकपका गया और उस पल की नजर से बचते हुए फोन को उठा लिया.

फोन मेरी मंगेतर का था. मैं अभी उसे अपनी फ्लाइट मिस होने की कहानी बता ही रहा था कि मेरी नजर मेरे सामने बैठी उस लड़की पर फिर से पड़ी. वह थोड़ी घबराई हुई सी लग रही थी. वह बारबार अपने मोबाइल फोन पर कुछ चैक करती, तो कभी अपने बैग में.

मैं जल्दीजल्दी फोन पर बात खत्म कर उसे देखने लगा. उस ने भी मेरी ओर देखा और इशारे में खीज कर पूछा कि क्या बात है?

मैं ने अपनी हरकत पर शर्मिंदा होते हुए उसे इशारे में ही जवाब दिया कि कुछ नहीं.

उस के बाद वह उठ कर टहलने लगी. मैं ने फिर से अपनी किताब पढ़ने में ध्यान लगाने की कोशिश की, पर न चाहते हुए भी मेरा मन उस को पढ़ना चाहता था. पता नहीं, उस लड़की के बारे में जानने की इच्छा हो रही थी.

कुछ मिनट ही बीते होंगे कि वह लड़की मेरे पास आई और बोली, ‘सुनिए, क्या आप कुछ देर मेरे बैग का ध्यान रखेंगे? मैं अभी 5 मिनट में चेंज कर के वापस आ जाऊंगी.’

‘जी जरूर. आप जाइए, मैं ध्यान रख लूंगा,’ मैं ने मुसकराते हुए कहा.

‘थैंक यू. सिर्फ 5 मिनट… इस से ज्यादा टाइम नहीं लूंगी आप का,’ यह कह कर वह बिना मेरे जवाब का इंतजार किए वाशरूम की ओर चली गई.

10-15 मिनट बीतने के बाद भी जब वह नहीं आई, तो मुझे उस की चिंता होने लगी. सोचा जा कर देख आऊं, पर यह सोच कर कि कहीं वह मुझे गलत न समझ ले. मैं रुक गया. वैसे भी मैं जानता ही कितना था उसे. और 10 मिनट बीते. पर वह नहीं आई.

अब मुझे सच में घबराहट होनेल लगी थी कि कहीं उसे कुछ हो तो नहीं गया. वैसे, वह थोड़ी बेचैन सी लग रही थी. मैं उसे देखने जाने के लिए उठने ही वाला था कि वह मुझे सामने से आती हुई नजर आई.

उसे देख कर मेरी जान में जान आई. वह ब्लैक जींस और ह्वाइट टौप में बहुत अच्छी लग रही थी. उस के खुले बाल, जो शायद उस ने सुखाने के लिए खोले थे, किसी को भी उस की तरफ खींचने के लिए काफी थे.

वह अपना बैग उठाते हुए एक फीकी सी हंसी के साथ मुझ से बोली, ‘सौरी, मुझे कुछ ज्यादा ही टाइम लग गया. थैंक यू सो मच.’

मैं ने उस की तरफ देखा. उस की आंखें लाल लग रही थीं, जैसे रोने के बाद हो जाती हैं. आंखों की उदासी छिपाने के लिए उस ने मेकअप का सहारा लिया था, लेकिन उस की आंखों पर बेतरतीबी से लगा काजल बता रहा था कि उसे लगाते वक्त वह अपने आपे में नहीं थी. शायद उस समय भी वह रो रही हो.

यह सोच कर पता नहीं क्यों मुझे दर्द हुआ. मैं जानने को और ज्यादा बेचैन हो गया कि आखिर बात क्या है.

मैं ने अपनी उलझन को छिपाते हुए उस से सिर्फ इतना कहा, ‘यू आर वैलकम’.

कुछ देर बाद देखा तो वह अपने बैग में कुछ ढूंढ़ रही थी और उस की आंखों से आंसू बह रहे थे. शायद उसे अपना रूमाल नहीं मिल रहा था.

उस के पास जा कर मैं ने अपना रूमाल उस के सामने कर दिया. उस ने बिना मेरी तरफ देखे मुझ से रूमाल लिया और उस में अपना चेहरा छिपा कर जोरजोर से रोने लगी.

वह कुरसी पर बैठी थी. मैं उस के सामने खड़ा था. उसे रोते देख जैसे ही मैं ने उस के कंधे पर हाथ रखा, वह मुझ से चिपक गई और जोरजोर से रोने लगी. मैं ने भी उसे रोने दिया और वे कुछ पल खामोश अफसानों की तरह गुजर गए.

कुछ देर बाद जब उस के आंसू थमे, तो उस ने खुद को मुझ से अलग कर लिया, लेकिन कुछ बोली नहीं. मैं ने उसे पीने को पानी दिया, जो उस ने बिना किसी झिझक के ले लिया.

फिर मैं ने हिम्मत कर के उस से सवाल किया, ‘अगर आप को बुरा न लगे, तो एक सवाल पूछं?’

उस ने हां में अपना सिर हिला कर अपनी सहमति दी.

‘आप की परेशानी का सबब पूछ सकता हूं? सब ठीक है न?’ मैं ने डरतेडरते पूछा.

‘सब सोचते हैं कि मैं ने गलत किया, पर कोई यह समझाने की कोशिश नहीं करता कि मैं ने वह क्यों किया?’ यह कहतेकहते उस की आंखों में फिर से आंसू आ गए.

‘क्या तुम्हें लगता है कि तुम से गलती हुई, फिर चाहे उस के पीछे की वजह कोई भी रही हो?’ मैं ने उस की आंखों में आंखें डालते हुए पूछा.

‘मुझे नहीं पता कि क्या सही है और क्या गलत. बस, जो मन में आया वह किया?’ यह कह कर वह मुझ से अपनी नजरें चुराने लगी.

‘अगर खुद जब समझ न आए, तो किसी ऐसे बंदे से बात कर लेनी चाहिए, जो आप को नहीं जानता हो, क्योंकि वह आप को बिना जज किए समझाने की कोशिश करेगा?’ मैं ने भी हलकी मुसकराहट के साथ कहा.

‘तुम भी यही कहोगे कि मैं ने गलत किया?’

‘नहीं, मैं यह समझाने की कोशिश करूंगा कि तुम ने जो किया, वह क्यों किया?’

मेरे ऐसा कहते ही उस की नजरें मेरे चेहरे पर आ कर ठहर गईं. उन में शक तो नहीं था, पर उलझन के बादलजरूर थे कि क्या इस आदमी पर यकीन किया जा सकता है? फिर उस ने अपनी नजरें हटा लीं और कुछ पल सोचने के बाद फिर मुझे देखा.

मैं समझ गया कि मैं ने उस का यकीन जीत लिया है. फिर उस ने अपनी परेशानी की वजह बतानी शुरू की.

दरअसल, वह एक मल्टीनैशनल कंपनी में बड़ी अफसर थी. वहां उस के 2 खास दोस्त थे रवीश और अमित. रवीश से वह प्यार करती थी. तीनों एकसाथ बहुत मजे करते. साथ ही, आउटस्टेशन ट्रिप पर भी जाते. वे दोनों इस का बहुत खयाल रखते थे.

एक दिन उस ने रवीश से अपने प्यार का इजहार कर दिया. उस ने यह कह कर मना कर दिया कि उस ने कभी उसे दोस्त से ज्यादा कुछ नहीं माना.

रवीश ने उसे यह भी बताया कि अमित उस से बहुत प्यार करता है और उसे उस के बारे में एक बार सोच लेना चाहिए.

उसे लगता था कि रवीश अमित की वजह से उस के प्यार को स्वीकार नहीं कर रहा, क्योंकि रवीश और अमित में बहुत गहरी दोस्ती थी. वह अमित से जा कर लड़ पड़ी कि उस की वजह से ही रवीश ने उसे ठुकरा दिया है और साथ में यह भी इलजाम लगाया कि कैसा दोस्त है वह, अपने ही दोस्त की गर्लफ्रैंड पर नजर रखे हुए है.

इस बात पर अमित को गुस्सा आ गया और उस के मुंह से गाली निकल गई. बात इतनी बढ़ गई कि वह किसी और के कहने पर, जो इन तीनों की दोस्ती से जला करता था, उस ने अमित के औफिस में शिकायत कर दी कि उस ने मुझे परेशान किया. इस वजह से अमित की नौकरी भी खतरे में पड़ गई.

इस बात से रवीश बहुत नाराज हुआ और अपनी दोस्ती तोड़ ली. यह बात उस से सही नहीं गई और वह शहर से कुछ दिन दूर चले जाने का मन बना लेती है, जिस की वजह से वह आज यहां है.

यह सब बता कर उस ने मुझ से पूछा, ‘अब बताओ, मैं ने क्या गलत किया?’

‘गलत तो अमित और रवीश भी नहीं थे. वह थे क्या?’ मैं ने उस के सवाल के बदले सवाल किया.

‘लेकिन, रवीश मुझ से प्यार करता था. जिस तरह से वह मेरी केयर करता था और हर रात पार्टी के बाद मुझे महफूज घर पहुंचाता था, उस से तो यही लगता था कि वह भी मेरी तरह प्यार में है.’

‘क्या उस ने कभी तुम से कहा कि वह तुम से प्यार करता है?’

‘नहीं.’

‘क्या उस ने कभी अकेले में तुम से बाहर चलने को कहा?’

‘नहीं. पर उस की हर हरकत से मुझे यही लगता था कि वह मुझे प्यार करता है.’

‘ऐसा तुम्हें लगता था. वह सिर्फ तुम्हें अच्छा दोस्त समझ कर तुम्हारा खयाल रखता था.’

‘मुझे पता था कि तुम भी मुझे ही गलत कहोगे,’ उस ने थोड़ा गुस्से से बोला.

‘नहीं, मैं सिर्फ यही कह रहा हूं कि अकसर हम से भूल हो जाती है यह समझाने में कि जिसे हम प्यार कह रहे हैं, वो असल में दोस्ती है, क्योंकि प्यार और दोस्ती में ज्यादा फर्क नहीं होता.’

‘लेकिन, उस की न की वजह अमित भी तो सकता है न?’

‘हो सकता है, लेकिन तुम ने यह जानने की कोशिश ही कहां की. अच्छा, यह बताओ कि तुम ने अमित की शिकायत क्यों की?’

‘उस ने मुझे गाली दी थी.’

‘क्या सिर्फ यही वजह थी? तुम ने सिर्फ एक गाली की वजह से अपने दोस्त का कैरियर दांव पर लगा दिया?’

‘मुझे नहीं पता था कि बात इतनी बढ़ जाएगी. मैं सिर्फ उस से माफी मंगवाना चाहती थी?

‘बस, इतनी सी ही बात थी?’ मैं ने उस की आंखों में झांक कर पूछा.

‘नहीं, मैं अमित को हर्ट कर के रवीश से बदला लेना चाहती थी, क्योंकि उस की वजह से ही रवीश ने मुझे इनकार किया था.’

‘क्या तुम सचमुच रवीश से प्यार करती हो?’

मेरे इस सवाल से वह चिढ़ गई और गुस्से में खड़ी हो गई.

‘यह कैसा सवाल है? हां, मैं उस से प्यार करती हूं, तभी तो उस के यह कहने पर कि मैं उस के प्यार के तो क्या दोस्ती के भी लायक नहीं. यह सुन कर मुझे बहुत हर्ट हुआ और मैं घर क्या अपना शहर छोड़ कर जा रही हूं.’

‘पर जिस समय तुम ने रवीश से अपना बदला लेने की सोची, प्यार तो तुम्हारा उसी वक्त खत्म हो गया था, प्यार में सिर्फ प्यार किया जाता है, बदले नहीं लिए जाते और वह दोनों तो तुम्हारे सब से अच्छे दोस्त थे?’

मेरी बात सुन कर वह सोचती हुई फिर से कुरसी पर बैठ गई. कुछ देर तक तो हम दोनों में से कोई कुछ नहीं बोला. कुछ देर बाद उस ने ही चुप्पी तोड़ी और बोली, ‘मुझ में क्या कमी थी, जो उसे मुझ से प्यार नहीं हुआ?’ और यह कहतेकहते वह मेरे कंधे पर सिर रख कर रोने लगी.

‘हर बार इनकार करने की वजह किसी कमी का होना नहीं होता. हमारे लाख चाहने पर भी हम खुद को किसी से प्यार करने के लिए मना नहीं सकते. अगर ऐसा होता तो रवीश जरूर ऐसा करता,’ मैं ने भी उस के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा.

‘सब मुझे बुरा समझाते हैं,’ उस ने बच्चे की तरह रोते हुए कहा.

‘नहीं, तुम बुरी नहीं हो. बस टाइम थोड़ा खराब है. तुम अपनी शिकायत वापस क्यों नहीं ले लेतीं?’

‘इस से मेरी औफिस में बहुत बदनामी होगी. कोई भी मुझ से बात तक नहीं करेगा?’

‘हो सकता है कि ऐसा करने से तुम अपनी दोस्ती को बचा लो और क्या पता, रवीश तुम से सचमुच प्यार करता हो और वह तुम्हें माफ कर के अपने प्यार का इजहार कर दे,’ मैं ने उस का मूड ठीक करने के लिए हंसते हुए कहा.

यह सुन कर वह हंस पड़ी. बातों ही बातों में वक्त कब गुजर गया, पता ही नहीं चला. मेरी फ्लाइट जाने में अभी 2 घंटे बाकी थे और उस की में एक घंटा.

मैं ने उस से कहा, ‘बहुत भूख लगी है. मैं कुछ खाने को लाता हूं,’ कह कर मैं वहां से चला गया.

थोड़ी देर बाद मैं जब वापस आया, तो वह वहां नहीं थी. लेकिन मेरी सीट पर मेरे बैग के नीचे एक लैटर था, जो उस ने लिखा था:

‘डियर,

‘आज तुम ने मुझे दूसरी गलती करने से बचा लिया, नहीं तो मैं सबकुछ छोड़ कर चली जाती और फिर कभी कुछ ठीक नहीं हो पाता. अब मुझे पता है कि मुझे क्या करना है. तुम अजनबी नहीं होते, तो शायद मैं कभी तुम्हारी बात नहीं सुनती और मुझे अपनी गलती का कभी एहसास नहीं होता. अजनबी ही रहो, इसलिए अपनी पहचान बताए बिना जा रही हूं. शुक्रिया, सहीगलत का फर्क समझाने के लिए. जिंदगी ने चाहा, तो फिर कभी तुम से मुलाकात होगी.’

मैं खत पढ़ कर मुसकरा दिया. कितना अजीब था यह सब. हम ने घंटों बातें कीं, लेकिन एकदूसरे का नाम तक नहीं पूछा. उस ने भी मुझ अजनबी को अपने दिल का पूरा हाल बता दिया. बात करते हुए ऐसा कुछ लगा ही नहीं कि हम एकदूसरे को नहीं जानते और मैं बर्गर खाते हुए यही सोचने लगा कि वह वापस जा कर करेगी क्या?

फोन की घंटी ने मुझे मेरे अतीत से जगाया. मैं अपना बैग उठा कर एयरपोर्ट से बाहर निकल गया. लेकिन निकलने से पहले मैं ने एक बार फिर चारों तरफ इस उम्मीद से देखा कि शायद वह मुझे नजर आ जाए. मुझे लगा कि शायद जिंदगी चाहती हो मेरी उस से फिर मुलाकात हो. यह सोच कर मैं पागलपन पर खुद ही हंस दिया और अपने रास्ते निकल पड़ा.

अच्छा ही हुआ, जो उस दिन हम ने अपने फोन नंबर ऐक्सचेंज नहीं किए और एकदूसरे का नाम नहीं पूछा. एकदूसरे को जान जाते, तो वह याद आम हो जाती या वह याद ही नहीं रहती.

अकसर ऐसा होता है कि हम जब किसी को अच्छी तरह जानने लगते हैं, तो वो लोग याद आना बंद हो जाते हैं. कुछ रिश्ते अजनबी भी तो रहने चाहिए, बिना कोई नाम के.Romantic Hindi Story

Social Story : जाग उठा स्वाभिमान

Social Story.

आगेआगे बैंडबाजे वाले थे और पीछेपीछे जुलूस की शक्ल में भीड़ चल रही थी. ठाकुर विजय सिंह गले में फूलों के हार डाले बड़ी अकड़ से आगे बढ़ते जा रहे थे.

विजय सिंह पुराने जमींदार थे. वे शहर से सरपंच के चुनाव का नामांकनपत्र भर कर लौटे थे. पंचायत के चुनाव में हर बार ऐसा ही होता था.

ठाकुर विजय सिंह के विरोध में कोई भी खड़ा होने की हिम्मत नहीं करता था और वे बिना मुकाबले के चुन लिए जाते थे.

कभी कोई हिम्मत करता भी, तो वे साम, दाम, दंड, भेद सभी नीतियां अपना कर उसे अपने हक में बैठा लेते थे.

जुलूस पूरे गांव से गुजर कर जब ठाकुर विजय सिंह की खंडहरनुमा हवेली पर पहुंचा, तो उन्होंने एक छोटा सा भाषण दिया, जिस में गांव के लोगों को धन्यवाद देते हुए उन की भलाई और तरक्की के कई वादे किए.

शाम को ठाकुर विजय सिंह गांव के ही अपने कुछ खास लोगों के साथ बैठे शराब पी रहे थे. अचानक उन्हें कुछ याद आया, तो वे हैरानी से बोले, ‘‘दलितों और मुसलिमों के टोले में से किसी ने भी हमारा स्वागत क्यों नहीं किया?’’

‘‘सरकार… वह क्या है… चींटी के पर निकल आए हैं,’’ एक आदमी ने जवाब दिया.

‘‘क्या मतलब?’’ विजय सिंह ने माथे पर बल डालते हुए पूछा.

दूसरे आदमी ने कहा, ‘‘सरकार… दलितों को सरपंची सू  झ रही है. आप जब फार्म भर कर कमरे से बाहर आए थे, तब मैं ने देखा कि मंगलू का लड़का तेजू फार्म भरने अंदर गया था.’’

इतना सुनते ही विजय सिंह ने ऊंची आवाज में कहा, ‘‘बुलाओ उस मंगलू को…अभी उतारता हूं सरपंची.’’

ठाकुर विजय सिंह के पास खड़े मुनीम ने उन्हें शांत करते हुए कहा, ‘‘हुजूर… अभी तो आप जश्न मनाइए, उसे सुबह बुला लेंगे… सारी सरपंची भूल जाएगा.’’

विजय सिंह ने भी अपने गुस्से को दबाते हुए कहा, ‘‘ठीक है मुनीमजी.’’

दूसरे दिन सुबह तकरीबन 10 बजे विजय सिंह का एक नौकर मंगलू को बुला लाया था. उसे देखते ही ठाकुर ने गुस्से से पूछा, ‘‘क्यों रे… तुम लोगों को ज्यादा खाने को मिल रहा है क्या? लगता है कि चरबी ज्यादा ही चढ़ गई है, तभी मेरे खिलाफ खड़े होना चाहते हो?’’

मंगलू ने कांपती आवाज में जवाब दिया, ‘‘सरकार, मेरे लड़के को लोगों ने भड़का दिया है. वे कहते हैं कि जनता का राज है. चुनाव में सब को खड़े होने का हक है… वह नालायक लोगों के बहकावे में आ कर आप के खिलाफ खड़ा हो गया… मैं उसे सम  झा दूंगा.’’

घर पहुंच कर मंगलू ने तेजू को सम  झाया, ‘‘शाम को विजय सिंह ने तु  झे पंचायत भवन में बुलाया है. मेरा कहना मान, तू शहर चला जा. वहीं कोई छोटीमोटी नौकरी कर ले… गांव की राजनीति में मत पड़.’’

पिता की बात सुन कर तेजू ने जवाब दिया, ‘‘बापू, आप बेकार ही चिंता कर रहे हैं. आखिर आप ने मु  झे शहर में पढ़ायालिखाया है… ऐसा कुछ भी नहीं होगा.’’

तेजू पढ़ालिखा और सम  झदार था. पढ़ाई पूरी करने के बाद उसे नौकरी की तलाश थी. कई जगह वह अर्जी भी दे चुका था. शाम को वह कई लोगों को पढ़ाता भी था.

बहरहाल, पूरे गांव में यह बात फैल गई थी. शाम को बहुत से लोग पंचायत भवन में पहुंच गए थे. वे देखना चाहते थे कि विजय सिंह तेजू की क्या हालत करते हैं.

विजय सिंह के आते ही सभी लोग खड़े हो गए. उन्होंने कुरसी पर बैठते हुए कहा, ‘‘मंगलू का लड़का तेजू आया है क्या?’’

तेजू ने आगे बढ़ कर उन्हें नमस्कार किया, तो वे ताना कसते हुए बोले, ‘‘आइए… तेजराम सरपंचजी, आइए… आप की हिम्मत कैसे हो गई हमारे खिलाफ खड़े होने की? जरा हम भी तो देखें कि कौन हैं आप के हिमायती?’’

तेजू ने जवाब दिया, ‘‘ठाकुर साहब, मेरे साथ कोई भी नहीं है और इस पूरे गांव में आप के खिलाफ खड़े होने की किसी में हिम्मत भी नहीं है.’’

‘‘फिर तुम ने यह गुस्ताखी किस बूते पर की?’’ विजय सिंह गुस्से में दहाड़े.

‘‘आप की जीत को बल देने के लिए ही मैं ने यह कदम उठाया है.’’ ‘‘क्या मतलब?’’

‘‘आप हर बार बिना मुकाबले के जीत जाते हैं और आप का विजय जुलूस निकलता है…’’ तेजू ने उन के अहंकार को सहलाया, ‘‘भला उस जीत व जुलूस में क्या दम, क्या मजा, जिस के मुकाबले में ही कोई खड़ा न हुआ हो. आप मु  झे हरा कर विजय जुलूस निकालिए, तब लगेगा कि आप की सही जीत हुई?है.’’

तेजू की बात सुन कर विजय सिंह के चेहरे पर बल पड़ गए. पूरे गांव के सामने उन्हें नंगा कर दिया था. वे अपने गुस्से को दबाते हुए बोले, ‘‘बात तो तुम सम  झदारी की कर रहे हो, पर मुकाबला हमेशा टक्कर का होता है. तुम्हारी औकात क्या है? कौनकौन हैं तुम्हारे साथ? सुन बच्चे, कल जा कर अपना नाम वापस ले लेना… इसी में तुम्हारी भलाई है.’’

तेजू ने फिर उन के अहंकार पर चोट की, ‘‘सरकार, मैं अपना नाम तो वापस ले लूंगा, पर क्या यह मान लूं कि आप मु  झ जैसे अदने से आदमी से भी मुकाबला नहीं कर सकते? वैसे, मैं आप को चुनौती नहीं दे रहा हूं, बल्कि आप की जीत में चार चांद लगाने की कोशिश कर रहा हूं… आगे आप की मरजी.’’

विजय सिंह ने लापरवाही से कहा, ‘‘ठीक है, जाओ और लगा लो अपना दमखम. जब तुम ने अपनी जमानत जब्त कराने का फैसला कर ही लिया है, तो यही सही.’’

दलित और मुसलिम टोले ने बैठक कर के तेजू को अपनी एक दिन की मजदूरी देने का फैसला किया.

विजय सिंह अपनी हवेली में बैठ कर ही अपने प्रचार की अगुआई करने लगे.

एक दिन उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं से पूछा, ‘‘तेजू गांव में ही है या भाग गया?’’

एक कार्यकर्ता ने जवाब दिया, ‘‘है तो वह गांव में ही… और जम कर प्रचार भी कर रहा है. हुजूर, आसार अच्छे नजर नहीं आ रहे हैं.’’

विजय सिंह उस की बात सुन कर सोचने लगे, फिर बोले, ‘‘जाओ, जरा मुनीमजी को भेजो.’’

कुछ देर बाद मुनीमजी उन के सामने हाजिर हो गए, तो उन्होंने कहा, ‘‘तेजू को चुपचाप जा कर बोलो कि हम उस से मिलना चाहते हैं. वह अकेला ही हवेली में आए.’’

जब मुनीम ने तेजू को बताया कि विजय सिंह उस से अकेले में मिलना चाहते हैं, तो उस के साथियों ने मना कर दिया कि वह अकेला न जाए. पर तेजू ने कहा, ‘‘चिंता मत करो, विजय सिंह मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता.’’

तेजू हवेली में पहुंचा, तो विजय सिंह ने उठ कर उस का स्वागत किया और अपने पास बैठाया, फिर मुनीम से बोले, ‘‘जरा वे कागजात देना.’’

मुनीम ने पहले से अपने पास रखे कागजात उन्हें थमा दिए.

विजय सिंह ने वे कागजात तेजू को देते हुए कहा, ‘‘ये कागजात तुम्हारी जमीन के हैं, हमारे पास गिरवी रखे थे… हम तुम्हारा कर्ज माफ करते हैं… बस, अब हमारे हक में बैठ जाओ.’’

तेजू ने कागजात लेते हुए जवाब दिया, ‘‘सरकार… ये कागजात तो मेरी जमीन के हैं. बाकी गांव वालों के भी जो कागजात आप के पास हैं वे सब भी मु  झे दे दें… मैं आप के हक में बैठ जाऊंगा.’’

‘‘तुम अपनी देखो, औरों की छोड़ो. कामयाब राजनीतिबाज वही होता है, जो सब से पहले अपना भला देखता है.’’

‘‘पर अब देर हो गई है. गांव के लोगों ने मु  झ में अपना विश्वास जताया है. अपनी जमीन की खातिर मैं उन के साथ विश्वासघात नहीं कर सकता…’’ तेजू कागजात वापस करते हुए बोला, ‘‘अगर देने हैं तो सभी के कागजात दे दो, वरना ये कागजात भी अपने पास रखो,’’ इतना कह कर वह चला गया.

मुनीम ने कहा, ‘‘हुजूर, आप ने उसे ऐसे ही जाने दिया.’’

‘‘मुनीमजी, वह नहीं बिका तो कोई बात नहीं, गांव के लोगों को खरीदना मुझे आता है.’’

चुनाव प्रचार के आखिरी दिन विजय सिंह ने अपने कार्यकर्ताओं से कह कर शराब की दुकान से कई बोतलें मंगवा लीं, फिर नशे में   झूमते हुए बोले, ‘‘जाओ, ये बोतलें दलित टोले में पहुंचा दो… और रात ही रात में हर घर की छत पर हमारे   झंडे लग जाने चाहिए.’’

दूसरे दिन सुबह विजय सिंह ने अपनी हवेली से देखा कि गांव के तकरीबन हर घर की छत पर उन के   झंडे लग चुके थे. वह मन ही मन खुश हुए, ‘अब देखता हूं तेजू के बच्चे, तू कैसे जीतता है?’

गांव के सभी लोगों ने मतदान में बढ़बढ़ कर हिस्सा लिया. हवेली में जीत के जश्न की तैयारी होने लगी.

दूसरे दिन चुनाव का नतीजा आने वाला था. विजय सिंह नतीजा जानने के लिए शहर जाने की तैयारी कर रहे थे कि अचानक मुनीम ने आ कर बताया, ‘‘सरकार, दलितों के टोले से एक बैलगाड़ी आई है… और साथ में यह चिट्ठी भी…’’

‘‘क्या लिखा है चिट्ठी में, जरा पढ़ कर बताओ?’’ विजय सिंह ने कहा.

मुनीम चिट्ठी पढ़ने लगा :

‘ठाकुर साहब,

‘आप की शराब की बोतलें हम वापस भेज रहे हैं. इन्हें हम ने छुआ भी नहीं है. हम जानते हैं कि आप ने तेजू को खरीदने की काफी कोशिश की थी, पर वह हमारी खातिर नहीं बिका और हम भी आप की बोतलों से बिकने वाले नहीं हैं. तेजू ने हमारा स्वाभिमान जगा दिया है…’

इतना सुनते ही विजय सिंह पास रखी कुरसी पर बैठ गए. वह जान चुके थे कि उन की हार तय है.          Social Story

Hindi Short Story : बेइज्जती पाने की होड़

Hindi Short Story. पहले मैं इस भरम में जीता था कि हर इनसान इज्जत के साथ अपनी जिंदगी बिताना चाहता है लेकिन बाद में मेरी इस सोच में बदलाव तब आया जब मुझे अपनी खुद की आंखों से बेइज्जती के साथ जीनेमरने की कसमें खाने वाले धुरंधरों के दर्शन करने का मौका मिला.

भारत की खोज बड़े ही मौज के साथ वास्को डी गामा ने की थी, लेकिन बेइज्जती के बोझ की खोज किस रोज और किस ने की थी, यह बता पाना उतना ही मुश्किल है जितना मुश्किल आम आदमी के लिए बिना रीचार्ज किए स्मार्ट फोन की बैटरी को पूरा दिन चलाना है.

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कुछ लोग बेइज्जत होने को अपना बुनियादी हक मानते हैं और इसे पाने के लिए वे लगातार अपनी इज्जत को तारतार करते हुए इसी जद्दोजेहद में लगे रहते हैं. ‘बेइज्जती पिपासु’ लोगों को अपनी पूरी उम्र इज्जत की प्राणवायु हजम नहीं होती है. इज्जत भरी जिंदगी की इच्छा से ही ‘बेइज्जती प्रिय’ लोग सहम जाते हैं और इज्जत जैसी नुकसान पहुंचाने वाली और मारक चीज से उचित दूरी बना कर चलते हैं. बेइज्जत होना इन के लिए रोटी, कपड़ा और मकान जैसी बुनियादी जरूरतों में शुमार होता है.

बेइज्जती के नशेड़ी उलट हालात में भी बेइज्जती का हरण कर उस का वरण करने में कामयाब हो जाते हैं. आम का सीजन हो या केले का, ये लोग हमेशा से ही सरेआम बेइज्जती से गले मिलना पसंद करते हैं ताकि सार्वजनिक जिंदगी में ट्रांसपेरैंसी बनी रहे.

इसी ट्रांसपेरैंसी और ईमानदारी के चलते ये जल्द ही बेइज्जती के वामन रूप से विराट रूप धर लेते हैं. हर देश, काल और हालात में ‘बेइज्जती उपासक’ अपनी निष्ठा और निष्ठुरता से बेइज्जती हासिल कर ही लेते हैं.

बेइज्जती के इस धंधे में कभी मंदी नहीं आती है क्योंकि बेइज्जती में हमेशा नकद से ही आप का कद बढ़ता रहता है और उधार से बेइज्जती की धार कुंद होती चली जाती है.

विजय माल्या और नीरव मोदी ने भले ही बैंक से कर्ज ले कर बैंक को चूना लगा दिया हो, लेकिन देश से भाग कर, बेइज्जत होने की दौड़ में सब को पछाड़ कर ‘बेइज्जती उद्योग’ को चार चांद लगा दिए हैं.

कुछ लोगों में बेइज्जत होने का जुनून ही उन के सुकून की वजह होता है. बेइज्जती का घूंट वे कहीं से भी लूट लेते हैं. गलती से मिली इज्जत की वाह, इन की धमनियों में होने वाली बेइज्जती के नियमित बहाव को नहीं रोक पाती है.

बेइज्जती प्रदेश के मूल निवासी, चाहे अपने निवास पर हों या दूसरी किसी जगह के प्रवास पर, वे बेइज्जती की लौजिंग बोर्डिंग हमेशा अपने शरीर पर धारण किए रहते हैं.

इस प्रदेश के मूल निवासी हमेशा बेइज्जत होने के नएनए मौके और तरीके खोजने की कोशिश करते रहते हैं ताकि बेइज्जती की बोरियत से बचा कर इसे समाज की मुख्यधारा में लाया जा सके.

लगातार बेइज्जत होना भी एक ऐसी कला है जिसे आम आदमी के लिए अंजाम देना मुश्किल होता है. बेइज्जती के फील्ड में पेशेवर फील्डिंग करने वालों की कमी महसूस की जाती रही है.

डिमांड के मुकाबले सप्लाई न होने से बैलैंस गड़बड़ा रहा?है. लेकिन फिर भी देख कर संतोष और कुछकुछ होता है कि कुछ लोगों ने बेइज्जत होने को अपनी जिंदगी का मिशन और सहारा बना लिया है और वे बेइज्जती के सामने मुसाफिर की तरह ट्रैफिक के नियमों का पालनपोषण कर, इस रास्ते पर दांडी मार्च रहे हैं.

इन्हीं लोगों द्वारा उपजी क्वालिटी के चलते क्वांटिटी की कमी महसूस नहीं हो पाती है और क्वांटिटी की कमी के खिलाफ उठने वाली संगठित आवाज बेइज्जती के बोझ के नीचे दब जाती है.

बेइज्जती उद्योग में अभी भी बहुत उम्मीदें हैं जिन पर बेइज्जत हो कर गंभीरता से विचार करना जरूरी है. समाज के फायदे के लिए इस क्षेत्र में लोगों को बढ़ावा देने की जरूरत है क्योंकि आज की गलाकाट होड़ में जहां लोगों को इज्जत और नाम के लिए दरदर भटकने के बाद भी बेइज्जती ही हाथ लगती है, वहीं अगर उन्हें सीधे ही बेइज्जत होने के लिए बढ़ावा दिया जाए तो उन का यह भटकाव काफी हद तक कम होगा और नतीजतन समाज में इज्जत पाने की अंधी दौड़ में भागने वाले, उसेन बोल्ट जैसे धावक की आवक भी कम हो जाएगी. Hindi Short Story

Hindi Story : हवेली का सन्नाटा

Hindi Story. पिछले 2 साल से अपने पति से दूर याशिका सिंह गांव की हवेली संभाल रही थी. साथ था उन का नौकर अंशु. एक रात याशिका ने अंशु को अपने कमरे में बुलाया और…

पूर्वांचल के ईश्वरपुर गांव में फैली 100 बरस पुरानी हवेली दूर से ही अपनी पहचान दर्ज कराती थी. ऊंची मेहराबें, चौड़े बरामदे, पार्क में खिले रंगबिरंगे फूल सब मिल कर हवेली की खूबसूरती में चार चांद लगा रहे थे.

इस हवेली के मालिक थे जमींदार शिवकांत सिंह, जो अब बूढ़े हो चले थे और उन का एकलौता बेटा डाक्टर आर्यवर्त सिंह पिछले 2 साल से इंगलैंड में था.

गांव में इस विशाल हवेली को जिंदा रखने वाले केवल 2 लोग थे, डाक्टर आर्यवर्त सिंह की पत्नी याशिका सिंह और हवेली की देखभाल में लगा 25 साल का बांका जवान अंशु.

याशिका सिंह पढ़ीलिखी और खूबसूरत औरत थी. शादी के बाद कुछ ही दिनों में उस का पति विदेश चला गया था. धीरेधीरे 2 साल बीत गए… संदेश आते, वीडियो काल कभीकभार होती, पर दूरी का सन्नाटा कहीं ज्यादा अखरता था.

हवेली जितनी विशाल थी, उतनी ही अकेली. लंबे बरामदे, खाली कमरे, भोर का धीमा उजाला और रात का गहरा अंधेरा, सब मिल कर याशिका सिंह के भीतर एक गहरी चुप्पी उतारते जा रहे थे.

याशिका सिंह अकसर सोचती, ‘क्या सचमुच शादी केवल एक रिश्ता है या एक ऐसा साथ जिसे दूरी खा जाती है?’

इधर अंशु अपना काम ईमानदारी से करता था. उस की हर हरकत में एक सादगी थी. वह बोलता कम, काम ज्यादा करता. जब वह आंगन में झाड़ू लगाता, तो जैसे हवेली भी किसी पुराने दिन को याद कर के मुसकराने लगती.

याशिका सिंह ने कई बार खुद को उसे देखते हुए पाया और हर बार खुद को झिड़क दिया. पर हवेलियों की चुप दीवारें मन पर भी अपना असर डालती हैं. जो बात मन टालना चाहे, वही बात आंखें ढूंढ़ने लगती हैं.

दिन बीतते गए. याशिका सिंह को लगा कि अंशु का होना हवेली के सन्नाटे को थोड़ा हलका कर देता है. वह कभी जरूरत पड़ने पर आंगन से आवाज लगाती और अंशु झट से हाजिर हो जाता. उस की आवाज में, चाल में, बरताव में एक ऐसी विनम्रता थी, जो किसी के भी मन को छू ले.

लेकिन वही विनम्रता अंशु के भीतर डर भी जगाती थी. वह अकसर सोचता, ‘मालकिन की नजरों में कहीं मैं गलत न समझ लिया जाऊं. थोड़ सी भी चूक हुई, तो बरबादी पक्की है.’

पर मन को कौन रोक पाता है? इनसान चाहे कितना भी सावधान हो, भीतर कहीं एक कोना रहता है, जो चुपचाप किसी की ओर खिंचना सीख जाता है, बिना इजाजत के, बिना ऐलान के.

एक रात को हलकी ठंड हवेली में सरक रही थी. बरामदे की लालटेन कांपती लौ के साथ डोल रही थी. अंशु गौशाला से लौट कर कमरे में ही पहुंचा था कि ऊपर से याशिका सिंह ने पुकारा, ‘‘अंशु, सुनो.’’

अंशु एकदम से चौंका. रात के इस समय मालकिन का पुकारना असाधारण था. वह धीमे कदमों से ऊपर चढ़ा. कमरे का दरवाजा आधा खुला था. अंदर पीतल का दीपक जल रहा था, जिस की नरम रोशनी कमरे के कोनों में गिर रही थी.

याशिका सिंह पलंग पर बैठी थी. चेहरे पर थकान थी, आवाज में विनती, ‘‘मेरा पैर बहुत दर्द कर रहा है. प्लीज, जरा दबा दो.’’

अंशु झिझक गया, ‘‘मालकिन यह काम तो.’’

याशिका सिंह ने बीच में ही धीमी पर मजबूत आवाज में कहा, ‘‘यह आदेश नहीं, एक आग्रह है.’’

अंशु ने सिर झुकाया और सावधानी से मालकिन के पैर दबाने लगा. पर कमरे में कुछ बदल रहा था, दीया टिमटिमा रहा था, हवा भारी हो गई थी और हवेली का पुराना सन्नाटा जैसे अचानक करीब आ कर खड़ा हो गया था.

अंशु के हाथ कांप रहे थे, क्योंकि उसे डर था… अपने हाथों से कम अपने धड़कते दिल से ज्यादा. उधर याशिका सिंह अपने भीतर की उस तनहाई से लड़ रही थी, जो इतने महीनों से जमा होतीहोती भारी हो गई थी.

अचानक, बिना चेतावनी, याशिका सिंह ने अंशु की कलाई पकड़ ली. अंशु एकदम कठोर हो गया, जैसे अचानक किसी ने उसे बर्फ में धकेल दिया हो. उस की सांसें अटक गईं.

‘‘अंशु…’’ याशिका सिंह की आवाज धीमी, भारी और अनसुनी सी थी, ‘‘हम तुम्हें चाहते हैं.’’

यह सुनते ही अंशु का चेहरा सफेद पड़ गया. वह कांपती आवाज में बोला, ‘‘मालकिन, अगर मालिक को मालूम हो गया, तो वे मुझे जिंदा नहीं छोड़ेंगे.’’

याशिका सिंह ने अंशु के डर को अपने हाथों में समेटने जैसा कहा, ‘‘तुम डरो मत. हम हैं न.’’

उस पल उन दोनों के बीच खामोशी उतर आई… एक ऐसी खामोशी जिस में हवेली का सन्नाटा भी अपनी सांस रोक ले.

अंशु अपनी सारी हिचक और डर भूल बैठा. उस रात का सन्नाटा हवेली की दीवारों में हमेशा के लिए दर्ज हो गया. बिना शोर के, बिना शब्द के, पर गहरा.

उन दोनों ने उस रात को खूब भोगा.

अगली सुबह अंशु आंगन में बैठा था. चेहरा बुझा  हुआ, आंखों में बेचैनी. उसे खुद से डर लग रहा था. वह डर और उलझन से भरा था.

याशिका सिंह ने बरामदे से उतरते हुए कहा, ‘‘अंशु, कल जो हुआ उस से डरने की कोई जरूरत नहीं.’’

पर अंशु के भीतर का तूफान किसी भी आश्वासन से शांत नहीं हो सकता था, ‘‘मालकिन, हम से पाप हुआ है. हम इस हवेली में मुंह दिखाने लायक नहीं रहे.’’

याशिका ने उसे स्थिर नजरों से देखा और कहा, ‘‘पाप वही है जिसे मन स्वीकार न करे. हम दोनों अकेले थे हालात ने हमें मजबूर किया.’’

लेकिन अंशु जानता था कि समाज हालात नहीं देखता, वह केवल सीमाएं देखता है.

Family Story in Hindi – बेटी के लिए : पिता की इच्छा का संसार

Family Story in Hindi. शिवचरण अग्रवाल बाजार से लौटते ही कुरसी पर पसर गए. मलीन चेहरा, शिथिल शरीर देख पत्नी माया ने घबरा कर माथा छुआ, ‘‘क्या हुआ… क्या तबीयत खराब लग रही है. भलेचंगे बाजार गए थे…अचानक से यों…’’

कुछ देर मौन रख वह बोले, ‘‘लौटते हुए अजय की दुकान पर उस का हालचाल पूछने चला गया था. वहां उस ने जो बताया उसे सुन कर मन खट्टा हो गया.’’

‘‘ऐसा क्या बता दिया अजय ने जो आप की यह हालत हो गई?’’ माया ने पंखा झलते हुए पूछा.

‘‘वह बता रहा था कि कुछ दिन पहले उस की दुकान पर समधीजी का एक रिश्तेदार आया था…उसे यह पता नहीं था कि अजय मेरा भांजा है. बातोंबातों में मेरा जिक्र आ गया तो वह कहने लगा, ‘अरे, उन्हें तो मैं जानता हूं…बड़े चालाक और घटिया किस्म के इनसान हैं… दरअसल, मेरे एक दूर के जीजाजी के घर उन की लड़की ब्याही है…जीजाजी बता रहे थे कि शादी में जो तय हुआ था उसे तो दबा ही लिया, साथ ही बाद में लड़की के गहनेकपडे़ भी दाब लेने की पूरी कोशिश की…क्या जमाना आ गया है लड़की वाले भी चालू हो गए…’ रिश्तेदारी का मामला था सो अजय कुछ नहीं बोला मगर वह बेहद दुखी था…उसे तो पता ही है कि मैं ने मीनू की शादी में कैसे दिल खोल कर खर्च किया है, जो कुछ तय था उस से बढ़चढ़ कर ही दिया, फिर भी मीनू के ससुर मेरे बारे में ऐसी बातें उड़ाते फिरते हैं… लानत है….’’

तभी उन की छोटी बेटी मधु कालिज से वापस आ गई. उन की उतरी सूरत देख उस का मूड खराब न हो अत: दोनों ने खुद को संयत कर किसी दूसरे काम में उलझा लिया.

आज का मामला कोई नया नहीं था. साल भर ही हुआ था मीनू की शादी को मगर आएदिन कुछ न कुछ फेरबदल के साथ ऐसे मामले दोहराए जाते पर शिवचरण चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रहे थे…इन हालात के लिए वह स्वयं को ही दोषी मानते थे.

आज शिवचरण की आंखों के सामने बारबार वह दृश्य घूम रहा था जब कपूर साहब ने उन से अपने बड़े बेटे के लिए मीनू का हाथ मांगा था.

रजत कपूर उन के नजदीकी दोस्त एवं पड़ोसी दीनदयाल गुप्ता के बिजनेस पार्टनर थे. बेहद सरल, सहृदय और जिंदादिल. दीनदयाल के घर शिवचरण की उन से आएदिन मुलाकातें होती रहीं. जैसे वह थे वैसा ही उन का परिवार था. 2 बेटों में बड़ा बेटा कंप्यूटर इंजीनियर था और छोटा एम.बी.ए. पूरा कर अपने पिता का बिजनेस में हाथ बंटा रहा था. एक ऐसा हंसताखेलता परिवार था जिस में अपनी लड़की दे कर कोई भी पिता अपनी जिंदगी को सफल मानता. ऐसे परिवार से खुद रिश्ता आया था मीनू के लिए.

कपूर साहब भी अपने बड़े बेटे के लिए देखेभाले परिवार की लड़की चाह रहे थे और उन की नजर मीनू पर जा पड़ी. उन्होंने बड़ी विनम्रता से निवेदन किया था, ‘शिवचरण भाईसाहब, बेटी जैसे अब तक आप के घर रह रही है वैसे ही आगे हमारे घर रहेगी. बस, तन के कपड़ों में विदा कर दीजिए, मेरे घर में बेटी नहीं है, उसे ही बेटी समझ कर दुलार करूंगा.’

इतना अपनापन से भरा निवेदन सुन कर शिवचरण गद्गद हो उठे थे. कितनी धुकधुक रहती है पिता के मन में जब वह अपनी प्यारी बेटी को पराए हाथों में सौंपता है. मन आशंकाओं से भरा रहता है. रातदिन यही चिंता लगी रहती है कि पता नहीं बेटी सुखी रहेगी या नहीं, मानसम्मान मिलेगा या नहीं…मगर इस आग्रह में सबकुछ कितना पारदर्शी… शीशे की तरह साफ था.

शिवचरण ने जब इस बात पर अपनी पत्नी के साथ बैठ कर विचार किया तो धीरेधीरे कुछ प्रश्न मुखरित हो उठे. मसलन, ‘परिवार और लड़का तो वाकई लाखों में एक है मगर… हम वैश्य और वह पंजाबी…घर वालों को कैसे राजी करेंगे…’

यह सचमुच एक गंभीर समस्या थी. शिवचरण का भरापूरा कुटुंब था जिस में इस रिश्ते का जिक्र करने का मतलब था सांप की पूंछ पर पैर रखना. वैसे तो सभी तथाकथित पढे़लिखे समकालीन भद्रजन थे मगर जब किसी के शादीब्याह की बात आती तो एकएक पुरातन रीतिरिवाज खोजखोज कर निकाले जाते. मसलन, जाति, गोत्र, जन्मपत्री, मांगलिक-अमांगलिक…और यहां तो बात विजातीय रिश्ते की थी.

बेटी के सुखद भविष्य के लिए शिवचरण ने तो एक बार सब को दरकिनार करने की सोच भी ली थी मगर माया नहीं मानी.

‘शादीब्याह के मसले पर घरपरिवार को साथ ले कर चलना ही पड़ता है. अगर अभी नजरअंदाज कर दिया तो सारी उम्र ताने सुनते रहेंगे…तुम्हें कोई कुछ न बोले मगर मैं तो घर की बड़ी बहू हूं. तुम्हारी अम्मां मुझे नहीं बख्शेंगी.’

और अम्मां से पूछने पर जो कुछ सुनने को मिला वह अप्रत्याशित नहीं था.

‘क्या हमारी बिरादरी में कोई अच्छा लड़का नहीं मिला जो दूसरी बिरादरी का देखने चल दिया.’

‘नहीं, अम्मां, खुद ही रिश्ता आया था. बेहद भले लोग हैं. कोई दानदहेज भी नहीं लेंगे.’

‘तो क्या पैसे बचाने को ब्याह रहा है वहां? तेरे पास न हों तो मुझ से ले लेना…अरे, बेटी के ब्याह पर तो खर्च होता ही है…और मीनू घर की बड़ी लड़की है, अगर उसे वहां ब्याह दिया तो सब यही समझेंगे कि लड़की तेज होगी, खुद से पसंद कर ब्याह कर बैठी. फिर छोटी को कहीं ब्याहना भी मुश्किल हो जाएगा.’

अम्मां ने तिवारीजी को भी बुलवा लिया. लंबा तिलक लगाए वह आए तो अम्मां ने खुद ही उन के पांव नहीं छुए, सब से छुआए. 4 कचौड़ी, 6 पूरी और 2 रसगुल्लों का नाश्ता करने के बाद समस्या पर विचार कर के वह बोले, ‘यजमान, यह आप की मरजी है कि आप विवाह कहां करें पर आप ने जाति के बाहर विवाह किया तो मैं आप के घर में पैर नहीं रखूंगा. आखिर सनातन प्रथा है यह जाति की. आप जैसे नए लोग तोड़ते हैं तभी तो तलाक होते हैं. न कुंडली मिली, न अपनी जाति का, न घर के रीतिरिवाज का पता. आप सोच भी कैसे सकते हैं.’

अम्मां और तिवारीजी के आगे शिवचरण के सभी तर्क विफल हो गए और उन्हें इस रिश्ते को भारी मन से मना करना पड़ा. दीनदयाल ने यह बात विफल होती देख वहां अपनी भतीजी की बात चला दी और आज वह कपूर साहब के घर बेहद सुखी थी.

जब शिवचरण मीनू के लिए सजातीय वर खोजने निकले तो उन्हें एहसास हुआ कि दूल्हामंडी में से एक अदद दूल्हा खरीदना कितना कठिन कार्य था. जो लड़का अच्छा लगता उस के दाम आसमान को छूते और जिस का दाम कम था वह मीनू के लायक नहीं था. कपूर साहब के रिश्ते पर चर्चा के समय जिन सगेसंबंधियों ने मीनू के लिए सुयोग्य वर खोज लाने और हर तरह का सहयोग देने की बात की थी इस

समय वे सभी पल्ला झाड़ कहीं गायब हो गए थे.

भागदौड़ कर के अंत में एक जगह बात पक्की हुई. रिश्ता तय होते समय लड़के के मातापिता का रवैया ऐसा था जैसे लड़की पसंद कर उन्होंने लड़की वालों पर एहसान किया है. उस समय शिवचरण को कपूर साहब का नम्र निवेदन बहुत याद आ रहा था. उस दिन जो उन के कंधे झुके तो आज तक सीधे नहीं हुए थे.

अतीत की यादों में खोए शिवचरण को तब झटका लगा जब पत्नी ने आ कर कहा कि दीनदयाल भाई साहब आए थे और आप के लिए एक निमंत्रण कार्ड दे गए हैं.

उस दिन दीनदयाल के घर एक पारिवारिक समारोह में शिवचरण की मुलाकात उन के बड़े भाई से हो गई जो अब कपूर साहब के समधी थे. उन की बात चलने पर वह गद्गद हो कर बोले, ‘‘बस, क्या कहें, हमारी बिटिया को तो बहुत अच्छा घरवर मिल गया. ऐसे सज्जन लोग कहां मिलते हैं आजकल…उसे हाथों पर उठा कर रखते हैं…बेटी ससुराल में खुश हो, एक बाप को और क्या चाहिए भला…’’ शिवचरण के चेहरे पर एक दर्द भरी मुसकान तैर आई.

घर आ कर मन और अधिक अपराधबोध से ग्रसित हो गया. वह खुद पर बेहद नाराज थे. बारबार स्वयं को कोस रहे थे कि क्यों मैं उस समय जातिवाद की ओछी मानसिकता से उबर नहीं पाया…क्यों सगेसंबंधियों और बिरादरी की कहावत से डर गया…अपनी बेटी का भला देखना मेरी अपनी जिम्मेदारी थी, बिरादरी की नहीं. दीनदयाल भी तो हमारी जाति के ही हैं. उन्हें तो कोई फर्क नहीं पड़ा वहां रिश्ता करने से…उन का मानसम्मान उसी तरह बरकरार है…सच तो यह है कि आज के भागदौड़ भरे जीवन में किसी के पास इतना समय नहीं कि रुक कर किसी दूसरे के बारे में सोचे…‘लोग क्या कहेंगे’ जैसी बातें पुरानी हो चुकी हैं. जो इन्हें छोड़ आगे नहीं बढ़ते, आगे चल कर वे मेरी ही तरह रोते हैं.

शिवचरण अखबार पढ़ रहे थे तभी दीनदयाल उन से मिलने आए तो बातोंबातों में वह अपनी व्यथा कह बैठे, ‘‘क्या बताऊं भाईजी, कपूर साहब जैसा समधी खोने का दर्द अभी तक दिल में है…एक विचार आया है मन में…अगर उन के छोटे बेटे के लिए मधु का रिश्ता ले कर जाऊं तो…जब वह आए थे तो मैं ने इनकार कर दिया था, न जाने अब मेरे जाने पर कैसा बरताव करेंगे, यही सोच कर दिल घबरा रहा है.’’

‘‘नहीं, भाई साहब, उन्हें मैं अच्छी तरह जानता हूं, दिल में किसी के लिए मैल नहीं रखते…वह तो खुशीखुशी आप का रिश्ता स्वीकारते मगर आप ने यह फैसला लेने में जरा सी देर कर दी. अभी 2 दिन पहले ही उन के छोटे बेटे का रिश्ता तय हुआ है.’’

एक बार फिर शिवचरण खुद को पराजित महसूस कर रहे थे.

वह अपनी गलती का प्रायश्चित्त करना चाह रहे थे मगर उन्हें मौका न मिला. सच ही है, कुछ भूलें ऐसी होती हैं जिन को भुगतना ही पड़ता है.

‘‘फोन की घंटी बज रही थी. शिवचरण ने फोन उठाया, ‘‘हैलो.’’

‘‘नमस्ते, मामाजी,’’ दूसरी ओर से अजय की आवाज आई, ‘‘वह जो आप ने मधु के लिए वैवाहिक विज्ञापन देने को कहा था, उसी का मैटर कनफर्म करने को फोन किया है…पढ़ता हूं…कोई सुधार करना हो तो बताइए :

‘‘अग्रवाल, उच्च शिक्षित, 23, 5 फुट 4 इंच, गृहकार्य दक्ष, संस्कारी कन्या हेतु सजातीय वर चाहिए.’’

‘‘बाकी सब ठीक है, अजय. बस, ‘अग्रवाल’ लिखना जरूरी नहीं और ‘सजातीय’ शब्द की जगह लिखो, ‘जातिधर्म बंधन नहीं.’’’

‘‘मगर मामाजी, क्या आप ने सगेसंबंधियों से इस बारे में…’’

‘‘सगेसंबंधी जाएं भाड़ में….’’ शिवचरण फोन पर चीख पडे़.

‘‘और मामीजी…’’

‘‘तेरी मामी जाए चूल्हे में…अब मैं वही करूंगा जो मेरी बेटी के लिए सही होगा.’’

शिवचरण ने फोन रख दिया…फोन रख कर उन्हें लगा जैसे आज वह खुल कर सांस ले पा रहे हैं और अपने चारों तरफ लिपटे धूल भरे मकड़जाल को उन्होंने उतार फेंक. Family Story in Hindi

Story in Hindi : नया सवेरा

Story in Hindi. बात उन दिनों की है, जब मैं डाक्टरी के पेशे में नयानया आया था. शाम के 5 बजे एक खूबसूरत लड़की एक अधेड़ उम्र की औरत के साथ मेरे क्लिनिक में आई. उस औरत की गोद में एक छोटा बच्चा भी था.

बातचीत के दौरान उस अधेड़ औरत से पता चला कि वह हमारे महल्ले में रहने वाली किसी औरत की बहिन है, जिसे मैं जानता था, पर उस से मेरी बातें नहीं होती थीं.

लड़की का रंग बहुत गोरा तो नहीं था, लेकिन चेहरे की बनावट, नाक में छोटी सी नथ, बांह पर चांदी का कड़ा, कपड़े और लिपस्टिक तो उस पर ऐसे फब रहे थे, मानो उसे किसी फिल्म के मेकअप आर्टिस्ट ने सजाया हो. उसे देख कर किसी भी नौजवान का दिल फिसल सकता था. मैं ने उसे देखा तो देखता ही रह गया.

वह लड़की झेंपते हुए बोली, ‘‘डाक्टर साहब, आप इस तरह क्या देख रहे हैं?’’

उस की सवालिया नजरों से मैं सहम गया और हड़बड़ाहट में कहा, ‘‘कुछ… कुछ नहीं… हां, आप की नथ आप पर खूब जंच रही है.’’

यह सुन कर वह लड़की मुसकराने लगी. मैं ने डाक्टरी अंदाज में पूछा, ‘‘कहिए, क्या हुआ है आप को?’’

अभी वह लड़की कुछ कह पाती, इस से पहले ही मैं ने उसे अपने पास वाली कुरसी पर बैठने का इशारा किया.

मैं ने उस की परेशानी सुनी और कुछ देर तक उस का चैकअप किया. इस के बाद कुछ दवाएं लिख दीं, साथ में कुछ परहेज भी बता कर 5 दिन बाद आने को कहा.

वह लड़की 5 दिन बाद आई. उस के चेहरे से गुलाब जैसी ताजगी झलक रही थी. आज उस के साथ वह अधेड़ औरत नहीं आई थी. लेकिन यह क्या, उस की गोद में वही बच्चा खेल रहा था.

मैं ने पूछा, ‘‘आप का नाम क्या है? क्या यह आप का बच्चा है?’’

उस लड़की ने कहा, ‘‘मेरा नाम नाहिदा है. अभी मेरी शादी को कुछ दिन ही हुए हैं. यह मेरा पहला बच्चा है.’’

यह सुन कर मुझे ऐसा लगा, मानो किसी ने मेरे अरमानों पर पानी फेर दिया हो. मैं थोड़ा संभला और कहा, ‘‘आइए, आप का चैकअप कर लूं.’’

मैं ने चैकअप करने के बाद कहा, ‘‘अब आप बिलकुल ठीक हैं. थोड़ा परहेज करना, तलीभुनी चीजें व मिर्चमसाले का ज्यादा इस्तेमाल नहीं करना और जब कभी आप को कोई तकलीफ हो, तो आ जाना.’’

‘जी अच्छा’ कह कर नाहिदा उठी और मैं दूसरे मरीजों को देखने लगा.

एक महीना गुजर जाने के बाद अचानक नाहिदा मेरे पास आई और बोली, ‘‘सलाम डाक्टर भैया.’’

यह सुन कर मैं सकते में रह गया. फिर मैं ने कहा, ‘‘कहो नाहिदा, कैसे आना हुआ? सब खैरियत तो है न?’’

उस ने मुसकरा कर कहा, ‘‘वैसे तो सब ठीक ही है, पर देखिए न भैया, ये हमें भद्दी और बदसूरत कहते हैं. क्या हमारा फिगर बोल्ड और खूबसूरत नहीं हो सकता?’’

नाहिदा की बातें सुन कर मैं मुसकराने लगा और दिलासा देते हुए बोला, ‘‘घबराओ नहीं. तुम्हारी परेशानी का हल है मेरे पास.’’

मेरा इतना कहना था कि नाहिदा को मानो दुनिया की सब से बेशकीमती चीज मिल गई हो.

देखते ही देखते कुछ महीनों में ही नाहिदा और भी खूबसूरत लगने लगी. इस दौरान वह मेरे दिल के और भी करीब आ गई.

वह जब भी मेरे सामने आती, मैं उसे ललचाई नजरों से देखता. मन कहता, ‘काश, यह मेरी दुलहन बन कर हमारे घर आती, तो कितना अच्छा होता.’

लेकिन मैं कैसे अपनी मुहब्बत का इजहार करता, अब तो हमारा रिश्ता भी भाईबहिन का था.

नाहिदा का शौहर भी कई बार मुझ  से मिल चुका था. मैं उस के घर भी जा चुका था.

वक्त गुजरता गया. हमारी मुलाकात को 4 साल हो चुके थे. इस बीच उस ने अपनी और अपने शौहर की बहुत सी अच्छीबुरी बातें मुझे  बताईं, जो आज भी मेरे सीने में दफन हैं.

मैं सोचता हूं कि पढ़ीलिखी होने के बावजूद नाहिदा ने लफंगे मंसूर मियां से कैसे शादी कर ली? लेकिन यह बात भी मुझ से छिपी नहीं थी. शायद जवानी के जोश में हर लड़केलड़की को कहीं न कहीं एक बार ठोकर खानी ही पड़ती है.

नाहिदा भी उसी ठोकर की मारी थी. लेकिन उस का शौहर औरों के लिए जैसा भी हो, नाहिदा और अपने बच्चे को अपनी जान से भी ज्यादा चाहता था.

समय के साथ सबकुछ ठीकठाक चल रहा था. नाहिदा को जब मेरी जरूरत होती, एक बार फोन की घंटी घनघना देती थी. मैं फोन पर ही दवा लिखवा देता था.

नाहिदा जब भी मुझ  से मिलने आती, काफी सजधज कर आती. बाहर निकलते समय सजनासंवरना उस की आदतों में शुमार था. बाली, चूडि़यां, बिंदी और चप्पलों के रंग देख कर तो मैं दंग ही रह जाता था.

आज सुबह से ही मेरे मन में अजीब सी बेचैनी थी. मैं ने आखिरकार यह फैसला ले लिया कि आज नाहिदा से अपने मन की बातें कह दूंगा. फिर चाहे रिश्ता रहे या न रहे, परवाह नहीं.

दोपहर की तेज धूप में मैं जिस्म को तपाता, पसीने से तरबतर अचानक उस के घर जा पहुंचा और अपनी आदत के मुताबिक बिना संकोच किए जैसे ही दरवाजे को धक्का दिया, वह खुल गया और मैं नाहिदा के बैडरूम में जा कर खड़ा हो गया.

पर यह क्या? वहां जो नजारा मुझे  देखने को मिला, शायद मैं सपने में भी नहीं सोच सकता था.

नाहिदा एक जालीदार नाइटी पहने हुए बैठी थी. उस के साथ चिपक कर एक नौजवान ठीक ऐसे बैठा था, मानो मंसूर मियां हो.

मेरे अचानक वहां पहुंच जाने पर नाहिदा के होश उड़ गए. उस ने हकलाते हुए कहा, ‘‘भैया आप? अचानक? क्या दरवाजा खुला था?’’

मैं ने कहा, ‘‘हां, तभी तो मैं अंदर आया.’’

यह सुनते ही नाहिदा की जबान से निकल पड़ा, ‘‘लगता है कि मैं कुंडी लगाना भूल गई थी.’’

मुझे देख कर वह नौजवान दूसरे कमरे में चला गया, जो ठीक नाहिदा के बैडरूम के सामने था.

मैं ने नाहिदा से पूछा, ‘‘क्या मंसूर मियां यहां नहीं हैं?’’

वह बोली, ‘‘नहीं, वे किसी काम से कोलकाता गए हुए हैं.’’

अब मुझे यह साफ समझ आ रहा था कि नाहिदा कितनी गिरी हुई औरत है, जो अपने शौहर की गैरमौजूदगी में जम कर फायदा उठाना जानती है.

मैं ने पलंग पर पड़ी चादर उस के ऊपर फेंकते हुए जिस्म को ढकने का इशारा किया और उस के बैडरूम से बाहर निकल आया.

वह कहने लगी, ‘‘बैठिए न भैया, अभी तो आप आए हैं.’’

यह सुन कर मानो मेरे खून में उबाल आ गया. मैं ने उसे एक तमाचा जड़ दिया. वह खड़ी मेरा मुंह देखती रह गई.

नाहिदा अपनी सफाई में कुछ कह पाती, उस से पहले ही मैं उस पर बरस पड़ा, ‘‘नाहिदा, तुम इतना गिर सकती हो, यह मैं सोच भी नहीं सकता था. जो औरत अपने शौहर के साथ इतना बड़ा धोखा कर सकती है, वह दूसरे के चलतेफिरते जमीनी रिश्ते को क्या समझेगी? मैं तो फिर भी तुम्हारा मुंहबोला भाई ठहरा. खैर, आइंदा तुम मुझ  से मिलने की कोशिश मत करना,’’ ऐसा कह कर मैं वहां से निकल पड़ा.

अब मुझे  एहसास हो रहा था कि मैं रंगरंगीली दुनिया के पीछे भाग रहा था. नाहिदा के बारे में सोचतेसोचते मैं कब सो गया, पता ही नहीं चला.

अगले दिन जब मेरी आंख खुली, तो सुबह के 6 बज चुके थे. सूरज की किरणें रोशनी बिखेर चुकी थीं. मेरी जिंदगी का ‘नया सवेरा’ हो चुका था. Story in Hindi

-डा. एसएम अजहर हुसैन

Hindi Story : गदूली

Hindi Story. जब 51 साल का कुंदन पहाड़ से 21 साल की हसीन गदूली को शादी कर के लाया, तो आसपास के सभी लोग दांतों तले उंगली दबा कर रह गए.

सभी एकदूसरे से पूछ रहे थे कि आखिर कुंदन जैसे खूसट चपरासी के साथ किस बेरहम मांबाप ने अपनी बेटी को बरबाद होने के लिए ब्याह दिया.

कुंदन महज 5वीं जमात तक पढ़ा था. वह देहरादून के करणपुर महल्ले में एक रईस की कोठी के आउटहाउस में किराए पर रहता था.

मांबाप के गुजर जाने के बाद कुंदन अकेला हो गया था. जवानी में उसे कभी अपनी शादी करने की ख्वाहिश नहीं हुई, लेकिन ढलती उम्र में उस को एक साथी की जरूरत महसूस होने लगी, तो उस ने पहाड़ से एक औरत ब्याह कर लाने का मन बना लिया.

कुंदन ने अपने खिचड़ी बालों में खिजाब भी लगवा लिया. मूंछें मुंड़वा दीं. एक सस्ता सा सफारी सूट पहना. हाथ में घड़ी वगैरह भी.

छलकपट वाला वेश अपनाते हुए वह काफी कम उम्र का छैला बना और जा पहुंचा अपने एक जानपहचान वाले के पहाड़ी गांव में. वहां उस ने अपने को क्लर्क बताया और एक गरीब अकेली विधवा मां से उस की बेटी गदूली का हाथ मांगा.

गदूली की मां ने लोगों के घरों और खेतों में काम कर के उसे हाई स्कूल पास करा दिया था. अपनी गरीबी से मजबूर गदूली भी दुलहन बनने को तैयार हो गई, ताकि उस की बूढ़ी होती मां के सीने से जवान बेटी का बो?ा उतर जाए.

एक पुरोहित ने गांव के मंदिर में मामूली रस्मअदायगी कर के कुंदन और गदूली की शादी करा दी. वे दोनों मां से विदा ले कर देहरादून आ गए.

2-3 दिनों तक वे दोनों गृहस्थी बसाने के कामों में लगे रहे. बाद में जब भी गदूली कुंदन से प्यार करने की कोशिश करती, तो वह किसी न किसी बहाने कन्नी काटता इधरउधर हो लेता.

एक बार गदूली ने कुंदन को बिस्तर मेें अपनी बांहों में जकड़ना भी चाहा, लेकिन वह कोई पहल किए बिना मुंह छिपाए और दफ्तर में ज्यादा काम से थका होने के चलते गहरी नींद आने की बात कह कर पलटी मारते ही खर्राटे भरने लगा.

मिलन की चाह में उफनती गदूली तब अचानक उबलते दूध पर पानी के छींटें पड़ जाने की तरह मन मसोस कर देर तक रोतीसिसकती रही. वह भांप गई कि कुंदन एक उम्रदराज अधेड़ है और साथ ही नामर्द भी. बस, तभी से रंगीन सपनों से भरा उस का दिल टूट गया और जिंदगी के आगे आने वाले दिन किसी तरह कटने लगे.

एक दिन अचानक कोठी के गेट पर उसी अहाते में रहने वाले 24 साल के नौजवान मोहन से कुंदन का सामना हो गया.

‘‘नमस्ते भैया. ठीक हैं न आप?’’ कहने के बाद मोहन के मुंह से निकल पड़ा, ‘‘भाभीजी कैसी हैं?’’

‘‘ठीक ही हैं,’’ जवाब देने के साथ ही कुंदन चौंक पड़ा था. उस को यह शक हो गया कि जरूर मोहन उस की गैरहाजिरी में गदूली से मिलता होगा.

दिन गुजरते गए. शादी के चौथे महीने जब एक सुबह कुंदन अपने दफ्तर जाने वाला था, उसी समय उस ने देखा कि गदूली नाली के पास बैठी उबकाई कर रही थी.

कुंदन सोच में पड़ गया, ‘मैं तो कभी भी गदूली के साथ हमबिस्तरी नहीं कर सका, फिर उस के पेट में कहीं उसी मोहन का बच्चा तो नहीं पल रहा है?’

शाम को कुंदन दफ्तर से सीधे घंटाघर चौराहे के छोर पर पंडित मेघदूतानंद के पास जा पहुंचा और बोला, ‘‘नमस्ते पंडितजी.’’

‘‘पधारो जजमान, बेहिचक अपनी समस्या बताओ,’’ खुश हो कर पंडित बोला.

‘‘क्या कहूं पंडितजी, कहते हुए भी शर्म आ रही है. बात ही कुछ ऐसी है,’’ कुंदन हकलाता हुआ बोला.

‘‘देखो जजमान, डाक्टर और पंडित से कुछ भी छिपाने से नुकसान ही रहता है, इसलिए मु?ो पूरी बात बताओ,’’ मेघदूतानंद ने कहा.

‘‘पंडितजी, मेरी बीवी पेट से हो गई है. आज सुबह ही मैं ने उसे उबकाई करते खुद देखा, पर वह बच्चा मेरा नहीं है, क्योंकि पिछले 4 महीने में वह कभी भी मेरे साथ हमबिस्तर नहीं हुई…’’ कुंदन ने कहा, ‘‘आप ज्योतिष विद्या से पता लगा दीजिए कि वह बच्चा किस का हो सकता है.’’

मेघदूतानंद सम?ा गया कि कुंदन बेवकूफ है. कुछ मंत्र सा बड़बड़ाने के बाद स्लेट पर खडि़या से 4-5 आड़ीतिरछी रेखाएं खींच कर उस ने कुंदन को किसी एक रेखा पर अपनी उंगली छुआने को कहा.

ऐसा होने के बाद पंडित बोला, ‘‘तुम्हारे अगलबगल पड़ोस में जरूर कोई नौजवान है, जिसे तुम्हारी बीवी ने अपना सबकुछ सौंप दिया और वह पेट से हो गई है. जरा सख्ती से पूछना, तो तुम्हारी मनचली बीवी जरूर सबकुछ उगल देगी.’’

‘‘समझ गया पंडितजी,’’ कहते हुए कुंदन ने 21 रुपए मेघदूतानंद के आसन पर बतौर दक्षिणा रख दिए.

घर पहुंचते ही कुंदन गुस्से से कमरे में घुसा और खाट पर आराम कर रही गदूली को ?ाक?ोरते हुए बोला, ‘‘सवेरे मैं ने तुम्हें उलटी करते देख लिया था. अब सचसच बता दे कि मु?ा से दगा कर के तू ने किस यार से अपना सबकुछ लुटवाया है.’’

‘‘मैं तुम्हारी बंदर घुड़कियों से नहीं डरने वाली,’’ गदूली कुंदन की पकड़ से छिटक कर दूर होते हुए बोली, ‘‘अब कान खोल कर सुन ले. दगा मैं ने नहीं, तुम ने मु?ा से की है. नकली जवानी का ढोंग रचा कर तुम ने मु?ा को छलकपट से अपनी बीवी बनाया है. फिर भी मैं तुम से प्यार करने लगी थी.

‘‘लेकिन जिंदगी का असली धोखा जो तुम ने मेरे साथ किया, उस का तो मु?ो तभी पता चला, जब मैं ब्याहता होते हुए भी तुम्हारी एक कुंआरी नौकरानी बन कर रह गई.

‘‘अब तुम चाहे लाख कोशिश कर के देख लो, मैं तुम्हें कुछ भी नहीं बताने वाली कि मेरे पेट में पल रहे इस बच्चे का बाप कौन है.’’

‘‘अच्छा, तो फिर ठीक है…’’ कुंदन बौखलाते हुए बोला, ‘‘मैं तु?ो धक्के मार कर घर से निकाल दूंगा. जब दरदर फिरती भीख मांगती रहेगी, तब तेरी इज्जत लूटने वाला तेरा यार भी तु?ो पनाह नहीं देगा… सम?ा?’’

‘‘अरे, पनाह मांगते तो अब तुम ही भटकने वाले हो,’’ गदूली बोली, ‘‘2-3 दिनों में ही अदालत से तुम को पेशी पर बुलाए जाने का हुक्म मिलेगा. मेरी तरफ से तुम पर नामर्द होते हुए भी धोखाधड़ी से मेरे साथ शादी करने के जुर्म की वजह से अदालत में तुम से तलाक चाहने बाबत केस दाखिल हो चुका है.

‘‘तुम से तलाक हो जाने और तुम्हारे जेल चले जाने के बाद मैं अपने होने वाले बच्चे के बाप के साथ शादी कर लूंगी.’’

यह सुन कर कुंदन की हालत ‘काटो तो खून नहीं’ जैसी हो गई. तभी वह गिड़गिड़ाता हुआ बोला, ‘‘गदूली, मुझ से भारी पाप हो गया. मैं हर हाल में तुम्हारा गुनाहगार हूं और अपने किए की माफी मांगता हूं. तुम अदालत वाली कार्यवाही मत कराओ.

‘‘तुम चाहो तो मैं खुद ही तुम को तुम्हारे होने वाले बच्चे के बाप से ब्याह करने के लिए खुशी से आजाद कर दूंगा.

‘‘बस, तुम इतना बता दो कि वह कौन भला मर्द है, जिस ने तुम्हें सच्चा प्यार दिया और तुम से शादी करना चाहता है?’’

गदूली का दिल भर आया. वह बोली, ‘‘जब हम पहाड़ से आए थे, तभी कोठी से लगी बिल्डिंग में किराएदार खुफिया इंस्पैक्टर वेणुगोपाल को शक हुआ कि कहीं तुम मु?ा को बहलाफुसला कर तो नहीं लाए हो?

‘‘दूसरे ही दिन तुम्हारी गैरहाजिरी में उन्होंने मु?ा को बुला कर पूछताछ की. पहली मुलाकात में ही हम एकदूसरे को दिल दे बैठे. बाद में हमारे जिस्मानी संबंध न बना सकने वाली बात भी मैं ने वेणुगोपाल को बता दी. उन्होंने तुम पर मेरी तरफ से अदालत में केस चलाने की ठान ली.

‘‘उसी दरमियान एक बार तुम्हारे दफ्तर चले जाने के बाद मैं खुद उन के पास चली गई और तभी से उन का प्यार मेरे पेट में पल रहा है.’’

इंस्पैक्टर वेणुगोपाल की मदद से पहली ही सुनवाई में अदालत से गदूली को कुंदन से तलाक मिल गया. धोखे से शादी करने व असलियत को छिपाने के अपराध के लिए कुंदन को 18 महीने की कैद और 2 हजार रुपए का जुर्माना बतौर सजा सुनाए गए.

वेणुगोपाल ने कुंदन की गरीबी पर तरस खाते हुए रुपए अदालत में जमा करा दिए थे.

कुछ दिनों बाद इंस्पैक्टर वेणुगोपाल ने गदूली से अदालत में शादी कर ली और उसे अपने घर ले जाने की तैयारी करने लगा. Hindi Story

Hindi Story : अध्यात्म से अकड़ तक – जब तक मूर्ख हैं तब तक धूर्त हैं

Hindi Story. कौर्पोरेट गुरु डबल श्री ने फरमाया है कि हिंसक नक्सली इलाकों के सरकारी स्कूल बंद कर वहां निजी स्कूल खोले जाएं क्योंकि इन इलाकों के सरकारी स्कूलों से आतंकी पैदा होते हैं.

हवाई सफर करने वाले, एयरकंडीशंड कमरे में बैठ कर दुखी जनता को जीने की राह दिखाने वाले फाइवस्टार संत ने यह कह कर गरीबों की देशभक्ति पर वार किया है. यदि उन की बात पर विश्वास किया जाए तो इन इलाकों के सरकारी स्कूल हर साल आतंकी ही उगल रहे हैं और यदि डबल श्री की राय नहीं मानी गई तो देश का आधा हिस्सा आतंकियों के हाथों में जाने वाला है.

डबल श्री का स्तर रामदेव और आसाराम जैसे बाबाओं से भी ऊंचा है. जहां रामदेव और आसाराम के भक्त कमजोर वर्ग और कमजोर दिमाग के हैं वहीं डबल श्री के भक्त मोटी जेब वाले हैं. दिमाग के बारे में कहा नहीं जा सकता क्योंकि अकसर ये आईआईटी या आईआईएमशुदा होते हैं, जिन्हें जमीन से ऊपर माना जाता है. इन की सनक को देश के शिक्षा जगत का बंटाधार करने को कमर कस कर तैयारी में लगी सरकारें इज्जत देती हैं. आखिरकार इन के अध्यात्म गुरु ने ही बिचौलिया बन कर कई बार उन की नाक कटने से बचाई है.

डबल श्री का सरकारी स्कूल बंद करवाने की सनक के पीछे एक कारण यह भी हो सकता है कि वे जताना चाहते हों कि सरकारी स्कूलों से सरकार को मिलता क्या है? उलट, अपनी जेब से मास्टरों को वेतन देना पड़ता है. उधर, निजी स्कूल कमाई का सब से फायदेमंद धंधा है. पाठ्यक्रम के बाहर ढेर सारी गैरजरूरी किताबें रखवाने और हर सप्ताह तीसरी कक्षा के बच्चों से प्रोजैक्ट रिपोर्ट तैयार करवाने से किताब माफिया और स्टेशनरी माफिया की रोटीरोजी चल रही है. इस बहाने शिक्षाविदों और अफसरों की भी कमाई हो जाती है.

सरकारी स्कूलों के अध्यापक महज मास्टर होते हैं, गुरु नहीं. सालभर वे या तो जानवर गिनते हैं या फिर गटरें और शौचालय. 10 साल में एक बार वे इंसान भी गिन लेते हैं. मतदाता सूची बनाने के काम में भी ये ही जोत दिए जाते हैं. बारबार होने वाले चुनावों में वे ड्यूटी भी दे आते हैं. बचाखुचा समय शिक्षा में जरा भी दिलचस्पी न लेने वालों को पढ़ाने में लगाते हैं. और पढ़ाना भी ऐसा कि सभी ढक्कन छात्रोंछात्राओं का उत्तीर्ण होना जरूरी है वरना इंक्रीमैंट को लाल झंडी.

अब तो अंगरेज आकाओं की देखादेखी सरकारें भी अध्यापकों को ठेके पर रखने लगी हैं. यानी, सूखा वेतन. भविष्य निधि या ग्रैच्युटी भूल जाओ. पक्की नौकरी की कोई गारंटी नहीं. बेइज्जती न हो, इसलिए इन्हें संविदा शिक्षक कहा जाता है. यानी, सम्मानित हम्माल. ऐसे में बेचारे मास्टर से ही देश का भविष्य संवारने की उम्मीद की जाती है, जो सरासर अनुचित है.

सरकारी स्कूलों के भवनों की हालत तो ऐसी है कि पुरातत्त्व विभाग वाले इन्हें आसानी से धरोहर की श्रेणी में रख लें. पुताई की बात तो जाने ही दीजिए, कई स्कूलों में दरवाजेखिड़कियां तक नहीं हैं. रात को शराबखोरी होती है. नशीली दवाओं और शरीर का व्यापार होता है. फर्श उखड़ा होता है. लड़कियों के लिए पेशाबघर नहीं होते.

नेताओं के जन्मदिन और विवाह की पार्टियां होती हैं. बरातें ठहराई जाती हैं. ऐसा नहीं कि हमारे शिक्षा शिकारी इस सब से अनजान हैं. अखबारों के पृष्ठ कई बार रंगे जा चुके हैं. लेकिन अध्यापकों को गधाहम्माली में जोते रखने वाले ये फाइवस्टार विद्वान इसे कोई मुद्दा नहीं मानते. डबल श्री ने शिक्षा के अधिकार को शायद शिक्षा की दुक?ान का अधिकार समझ लिया हो. उन जैसे लोगों को स्कूलों में पढ़ाने के लिए अच्छा वेतन मिलता है. क्यों न मिले? फीस जो जबरदस्त होती है.

घोषणा करते समय अध्यात्म गुरु भूल गए कि आतंकी इलाकों के मातापिता के पास क्या इतनी फीस देने की हैसियत है? क्या प्राणायाम से उन की गरीबी दूर हो जाएगी? क्या सुदर्शन क्रिया उन्हें अच्छा जीवन देगी? क्या ओउम उच्चारने से उन की सेहत ठीक हो जाएगी? डबल श्री का कहना है कि सदैव मुसकराते रहना चाहिए. फिर ये गिनती कर बताते हैं कि बचपन में हम इतनी बार मुसकराते हैं, जवानी में उस से कम और बुढ़ापे में उस से भी कम. लगता है उन्होंने मुसकराहट गिनने में पीएचडी की है.

यदि कोई इन का कहना मान कर किसी की मैयत में मुसकराता रहे तो उस के साथ क्या होगा, यह डबल श्री के अलावा सभी को मालूम है. अध्यात्म की दुकानें लगाने वालों से पूछा जाना चाहिए कि ये फाइवस्टार स्कूल खोलने के अलावा कितना सामाजिक काम करते हैं. उस में भी बच्चे भिश्तियों की तरह पीने का पानी अपने घर से ले जाते हैं. सिर्फ गरमी के दिनों में रेलवेस्टेशनों पर प्याऊ चालू कर देने से ही समाजसेवा नहीं होती.

भजन में तालियां पीटने से किसी की हालत नहीं सुधरती. उस के लिए कर्म करना होता है. जो भारत में भाग्य के सामने ओछा माना जाता है. देश को पुराने काल में बांधे रखने वालों को देख कर ही स्टीव जौब घबरा कर स्वदेश चला गया था. उस ने सूचना क्षेत्र में जो क्रांति की, क्या वह धार्मिक कर्मकांड के कीचड़ में रह कर हो पाती? उस का भाग जाना दुनिया के लिए फायदेमंद रहा. यहां रहता तो वह क्या कर पाता, सिवा भभूत रमा कर, बाबा बन कर उपदेश पिलाने के.

आज महंगी शिक्षा ही बेहतर शिक्षा का पैमाना मानी जाती है. यदि ऐसा है तो इन फाइवस्टार स्कूलों में पढ़ने वाले अब तक तो भारत की तसवीर बदल चुके होते. इन का हर विद्यार्थी आईटी के ख्वाब देखता है. हर साल कितने ही आईआईटियंस निकलते रहते हैं. डिगरी मिली नहीं, कि वीजा के लिए भटकते रहते हैं. पासपोर्ट पर ठप्पा लगवाने के लिए बेताब हो उठते हैं. इस से तो सरकारी स्कूलों से निकले विद्यार्थी ही अच्छे जो देश के लिए कुछ करने को तैयार रहते हैं.

फौज में देखिए, पुलिस में देखिए, ज्यादातर जवान सरकारी स्कूल वाले ही मिलेंगे. फाइवस्टार स्कूलों के विद्यार्थियों को देश से कोई मतलब नहीं होता. वास्तविकता का सामना करने की उन में हिम्मत नहीं होती. देश में शिक्षा के अड्डे दिनोंदिन बढ़ते जा रहे हैं और सरकारी स्कूल बंद होते जा रहे हैं. सरकार भी तो यही चाहती है कि गरीबों के बच्चे पढ़ें नहीं. यदि वे पढ़लिख कर आगे आ गए तो उन के कभी पूरे न किए जाने वाले वादों का क्या होगा?

निजी स्कूलों में विशेष अतिथि बन कर भाषण पिलाने वाले हमारे नेतामंत्री कभी सरकारी स्कूलों के बारे में चिंता नहीं करते. हां, मास्टरजी का स्थानांतर करवाने या रुकवाने में जरूर दिलचस्पी लेते हैं. छोटे शहरों में दो सौ से भी ज्यादा बड़ी निजी शिक्षण संस्थाएं… माफ कीजिए इंस्टिट्यूट हैं. उन्हें सस्ती जमीन मिल जाती है. नैपोलियन के शब्दकोष में असंभव शब्द नहीं है तो इन के पाठ्यक्रम में अनुत्तीर्ण शब्द नहीं है. सब के सब पास होते हैं. क्यों न हों जब लक्ष्मी ने सरस्वती को खरीद लिया है तो फिर किस में हिम्मत है कि रोक ले?

अब राष्ट्रीय संत की बात करें. वैसे तो हर तिलकधारी खुद को राष्ट्रीय संत कहलवाने की इच्छा रखता है. ये लोग अमीरों को बताते हैं कि जिंदगी कैसे जिएं. ज्ञान देने की बाकायदा तगड़ी फीस लेते हैं, देने वाले की जेब जो भरी हुई है. हमारे यहां विद्यादान को महादान कहा जाता है. लेकिन अब यह महाव्यापार बन गया है. बाप की अथाह कमाई वाले अमीरजादों के पास फुरसत ही फुरसत है.

मनोरंजन और जनसंपर्क बढ़ाने के लिए सत्संग से बढ़ कर और क्या विकल्प हो सकता है. सभी संत कहे जाने वाले महाव्यापारी हैं. इन का सारा कामकाज इंग्लिश में चलता है. यानी, देश से वे वैसे ही कटे हुए हैं. वे कभी गंदी बस्तियों में नहीं जाते. न ही उन के शिष्य जाते हैं. ध्यान का कैंप लगाते हैं लेकिन मलिन बस्तियों में सफाई कैंप नहीं लगाते. जगहजगह शिक्षा के अड्डे तो खोलते हैं लेकिन गरीब बच्चों की फीस का इंतजाम नहीं करते. जो कभी पैदल नहीं चलते, हमेशा एसी गाडि़यों या हवाई जहाज में उड़ते फिरते हैं, उन्हें जमीनी हकीकत कैसे मालूम हो सकती है?

जहां भी जाना हो तो दस दिन पहले ही शहर की दीवारें इन के शुभागमन के पोस्टरों से रंग दी जाती हैं. फिर ये महाराजा की तरह अपने लावलशकर के साथ पधारते हैं. हवाई अड्डे पर इन का शानदार स्वागत होता है. इन के प्रवचनों से फायदा होता किस को है? शिक्षा के नएनए अड्डे खोलने के लिए ये शहर से दूर सस्ते में जमीन लेते हैं. कुछ साल चलाया, फिर ऊंचे दाम पर बेच देते हैं. झाडि़यां और पेड़ शिक्षा के नाम पर बलिदान कर दिए जाते हैं. गांवों में शौचालय नहीं हैं. पहले बेचारी महिलाएं झाडि़यों की आड़ में निबट लेती थीं लेकिन शिक्षा माफिया उन का लाज का यह परदा भी छीन लेते हैं.

कितने संतों ने अपने अड्डे बनाने की जगह महिला शौचालय बनाने की समझ दिखाई है? इन्हें जगहजगह आश्रम बनाने की क्या जरूरत है. यह साफ जाहिर है कि ये सस्ते में जमीन खरीदना चाहते हैं ताकि वे अपना धंधा आगे बढ़ा सकें. ये धर्म के व्यापारी अपनी पत्रिका भी निकालते हैं और विज्ञापन बटोरते हैं. पत्रिका की सामग्री एकदूसरे से ली हुई होती है. नया लाएंगे कहां से? लगे हाथों दवाएं भी बनाने लगते हैं. आयुर्वेद और हर्बल के नाम पर पता नहीं क्याक्या बनातेबेचते हैं.

ये अध्यात्म गुरु अपनी मार्केटिंग के लिए महंगी मार्केटिंग एजेंसी हायर करते हैं. जिस शिविर में इन के त्याग, ईमानदारी, अपरिग्रह के डोज दिए जाते हैं, वहां इन के चित्र, प्रवचनों की सीडी, मालाएं, अंगूठियां, झोले, बटुए, किताबें, दवाएं वगैरा भी बेची जाती हैं. इन पर न तो बिक्रीकर लगाया जाता है और न ही सेवाकर. कमाई का तो हिसाब ही नहीं. निर्मल बाबा ने तो अपने बटुए का नाम तक बरकत का बटुआ रख दिया था.

बटुआ खरीदने वाले की बरकत हो या न हो, पर बाबा की जेब जरूर भर जाती है. टीवी चैनलों पर खरीदे हुए भक्त प्रायोजित सवाल पूछते हैं और बाबा उन के जवाब देते हैं. सालभर में ऐसे कई हंगामे होते हैं और जनता अपनी गाढ़ी कमाई इन ठगों के हवाले कर देती है. झबरैले साईं बाबा की पोल उस की मौत के बाद खुल गई कि उसे तरहतरह के विदेशी परफ्यूम लगाने का शौक था, वह सोने के पलंग पर सोता था, उस

के शयनकक्ष से करोड़ों का बेहिसाब धन मिला. नित्यानंद के पुरुषनापुरुष होने के किस्से कई दिनों तक जबान पर चढ़े रहे. कई संत शराबकबाब और शबाब के आशिक हैं. धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक धाक जमाने के लिए संत बनने से अच्छा और सस्ता कोई दूसरा रास्ता नहीं है. सही है, जब तक मूर्ख हैं तब तक धूर्त हैं. Hindi Story

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