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प्यार का मोहरा- भाग 3

सौजन्य- सत्यकथा

‘‘तुम्हें जो कुछ बताना है, वह यहां खुली सड़क पर नहीं, मेरे घर चल कर बताना.’’ अनीता ने प्यार से उस के चेहरे को आगे घुमाया तो सनी को कुछ और समझने की जरूरत नहीं रह गई थी.

अनीता सनी को ले कर घर पहुंच गई. उस ने कमरा बंद किया तो वह अनीता का हाथ पकड़ कर शरारत से बोला, ‘‘अब बता दूं, क्या हो रहा था?’’

‘‘मुझे पता है तुम कांप रहे थे,’’ अनीता ने अपना हाथ उस के सीने पर रख दिया, ‘‘और तुम्हारा दिल भी तेजतेज धड़क रहा है.’’

‘‘जब तुम सब कुछ जानती हो तो तरसा क्यों रही हो, मेरी धड़कनों को समझा दो न.’’ कहते हुए सनी ने उस की कमर में बांहें डाल कर उसे खुद से चिपका लिया.

‘‘मैं कैसे समझाऊं?’’ अनीता ने हया से सिर झुका लिया.

‘‘ऐसे.’’ अनीता की चिबुक उठा कर उस के लरजते होंठ अपने सामने कर लिए. फिर अपने दहकते होंठों से चूमा तो अनीता के बदन में चिंगारियां सी उठने लगीं. इस के बाद जो दोनों उन के बीच हुआ, वह दुनिया की नजर में नाजायज रिश्ता कहलाता है.

हवस की जो आग उस दिन दोनों के जिस्म में उतरी थी, उसे बुझाने के लिए अब दोनों प्राय: दिन में एकदूसरे के जिस्म में खुशियां ढूंढने लगे.

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12 सितंबर, 2020 को तड़के 4 बजे नगला सोहनलाल गांव के कुछ लोगों ने गांव के पास ही एनएच-2 के सामने निर्माणाधीन पुल के नीचे किसी युवक की लाश पड़ी देखी. पास जा कर गांव वालों ने देखा तो वह लाश गांव की ही रहने वाली अनीता के पति गुलाब सिंह की निकली.

गांव के लोगों ने घटना की सूचना पत्नी अनीता के अलावा गुलाब सिंह के भाई बच्चू सिंह को दी जोकि गुलाब सिंह के घर के पास में ही रहता था. बच्चू सिंह अपने पिता मवासीराम के साथ मौके पर पहुंच गया.

अनीता भी वहां पहुंच गई. गुलाब सिंह की लाश देख कर सभी बिलखबिलख कर रोने लगे. किसी ने 112 नंबर पर काल कर के घटना की सूचना दे दी थी. घटनास्थल सिकंदरा थाने के अंतर्गत आता था.

सिकंदरा थाने के इंसपेक्टर अरविंद कुमार पुलिस टीम के साथ तत्काल मौके पर पहुंच गए. उन्होंने लाश का निरीक्षण किया. मृतक के सिर पर चोट के निशान थे, साथ में पैरों में भी चोट थी. देखने से मामला एक्सीडेंट का लग रहा था. किसी तेज वाहन से टकरा कर मृतक गंभीर रूप से घायल हुआ और उस की मौत हो गई.

इंसपेक्टर अरविंद कुमार ने मृतक गुलाब सिंह के पिता मवासीराम से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि गुलाब कल रात में 8 बजे फैक्ट्री से आया था. रात 9 बजे खाना खाने के बाद सो गया था. रात में या सुबह कहीं जाने का सवाल ही नहीं उठता.

बेटे का रोड एक्सीडेंट नहीं हुआ, बल्कि उस की हत्या उस की पत्नी अनीता ने कराई है. उस का किसी युवक से प्रेम संबंध है. अनीता ने अपने ससुरालीजनों पर हत्या का शक जताया. पुलिस द्वारा पूछताछ करने पर अनीता ने खुद को बेकुसूर बताया.

फिलहाल मामला फौरी तौर पर एक्सीडेंट का लग रहा था. इसलिए इंसपेक्टर अरविंद कुमार ने लाश पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भिजवा दी. थाने आ कर उन्होंने एक्सीडेंट का मुकदमा दर्ज करा दिया.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सिर में लगी गंभीर चोट से मौत होना बताया गया. एसएसपी बबलू कुमार ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर विशेषज्ञों की राय ली. उन की राय के बाद उन्होंने इंसपेक्टर अरविंद कुमार को मामले की जांच के आदेश दिए.

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इंसपेक्टर कुमार ने गुलाब सिंह के घर आनेजाने वालों के बारे में पता किया तो बाहरी लोगों में सनी का नाम था. वह पड़ोस में किराए पर रहता था. इंसपेक्टर कुमार ने सनी का मोबाइल नंबर पता किया और उस की काल डिटेल्स निकलवाई तो घटना की रात सनी की अनीता के नंबर पर बात करने की पुष्टि हो गई.

17 सितंबर को इंसपेक्टर कुमार ने सनी को हिरासत में ले कर कड़ाई से पूछताछ की तो उस ने अपना गुनाह कुबूल कर लिया. उस से पूछताछ के बाद अनीता को भी उस के घर से गिरफ्तार कर लिया गया.

गुलाब सिंह शराब का शौकीन था. फैक्ट्री से जब भी रात में लौटता तो अपनी थकान उतारने के लिए शराब पी कर आता था और घर आ कर अनीता से झगड़ा करता था. उसे मारतापीटता था.

इसी बीच जब सनी से अनीता की मुलाकात हुई तो वह उस की ओर खिंचने लगी. सनी अनीता से 8 साल छोटा था और काफी खूबसूरत था. अनीता ने कुंवारे जवान युवक का अपने से लगाव देखा तो वह भी उस की ओर खिंचती चली गई.

दिनप्रतिदिन वह सनी में खोती चली गई. सनी से संबंध बने तो वह जीजान से उसे चाहने लगी. सनी ने भी गुलाब से दोस्ती गांठ ली. गुलाब की अनुपस्थिति में वह अकसर अनीता से मिलने आता था. उन की चाहत इस कदर बढ़ गई कि एक साथ जिंदगी जीने का सपने देखने लगे. यह सपना हकीकत में तभी बदल सकता था, जब गुलाब कोई अड़चन न डाले. इसलिए दोनों ने गुलाब सिंह को रास्ते से हटाने का फैसला कर लिया और इस के लिए योजना भी बना ली.

11/12 सितंबर, 2020 की रात गुलाब सिंह शराब पी कर घर आया था. खाना खाने के बाद वह सो गया. योजनानुसार रात में अनीता ने सनी को फोन कर के बुला लिया.

रात डेढ़ बजे के करीब सनी अनीता के घर आया तो अनीता ने चुपके से मेन गेट खोल दिया. सनी अंदर आ गया. दोनों कमरे में सो रहे गुलाब सिंह के पास पहुंचे. अनीता ने पति के पैर पकड़े तो सनी ने हाथों से उस का गला दबा दिया, जिस से वह बेहोश हो गया.

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दोनों उसे उठा कर घर से कुछ दूरी पर निर्माणाधीन पुल के नीचे ले गए. वहां पत्थर से गुलाब के सिर पर कई प्रहार किए. उस की मौत हो जाने के बाद पत्थर से उस के पैरों को भी कुचल दिया, जिस से मामला रोड एक्सीडेंट का लगे. इस के बाद दोनों अपने घर लौट गए.

लेकिन तमाम चालाकियों के बाद भी उन दोनों का गुनाह छिप न सका और पकड़े गए. सनी की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त पत्थर बरामद कर लिया. कानूनी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद दोनों को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया गया.

कथा पुलिस सूत्रें पर आधारित

प्रोजैक्ट-भाग 3: समीर के साथ शादी की दूसरी सालगिरह वाले दिन क्या हुआ

2-3 पैग पीने के बाद रंजीत ने कहा, ‘इस शहर में किसी चीज की जरूरत हो, तो मुझे बताइएगा. आप की हर ख्वाहिश पूरी होगी. और फिर उसी ने हमें बताया कि समीर की पत्नी शालिनी का चालचलन कुछ ठीक नहीं है. काम के बोझ के चलते वह अपनी बीवी को पूरा वक्त नहीं दे पाता, औफिस में भी ओवरटाइम करता है. और उधर इस के घर में हर रोज नएनए लोगों का आनाजाना लगा रहता है. इस बारे में समीर को जरा भी खबर नहीं है. एकदो बार तो मैं भी जा चुका हूं. आप का भी अगर मूड हो तो बताइएगा.‘

फिर दूसरा अफसर अपनी सफाई में बोला, ‘हम उस की बातों में आ गए और अगले दिन औफिस में समीर का प्रोजैक्ट सलैक्ट करने के बाद जब हम अपने रूम में आए, तो हमारे पीछेपीछे रंजीत भी 2 व्हिस्की की बोतल ले कर रूम में आ गया. और जब हम पीने बैठे तो उस ने बातोंबातों में कहा, ‘समीर दोपहर 3 बजे की ट्रेन से नोएडा जा रहा है, इस से अच्छा मौका फिर कभी नहीं मिलेगा, मैं तुम दोनों को उस के घर तक छोड़ दूंगा. और समीर के जाने के बाद शालिनी को भी तो अपने घर आने वाले खास मेहमानों का इंतजार रहेगा ही न,‘ कहते हुए उसी ने हमें समीर के घर तक अपनी गाड़ी से छोड़ा.

अब तक उन दोनों की बातों से सबकुछ स्पष्ट हो गया. उन की बातें सुन कर समीर का खून खौलने लगा था, तभी बौस बोले, ‘रंजीत ने समीर के साथ ऐसा क्यों किया? वह तो औफिस में इस का सीनियर है.‘

‘असली प्रोब्लम ही यही है सर कि वह मेरा सीनियर है, फिर भी पिछले 3 सालों से हर साल कंपनी से आने वाले अफसरों ने आज तक उस का कोई प्रोजैक्ट सलैक्ट नहीं किया. और इस बार आप ने यह काम मुझे सौंप दिया, तो उस ने इसे अपनी तौहीन समझते हुए मुझ से बदला लेने के लिए यह सब खेल खेला,‘ बौस की बात काटते हुए समीर ने अपना पक्ष रखा, तो बौस की आंखों के आगे जो भी धुंधला था सब साफ हो गया.

बौस ने पुलिस को रंजीत पर कड़ी कार्यवाही करने के निर्देश दिए और उन दोनों अफसरों की शिकायत कंपनी के हैड औफिस में कर दी, जिस के बाद उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया.

अपने आसपास के लोगों से भी हमें उतना ही सचेत रहने की आवश्यकता है, जितना अनजान अजनबियों से. शायद, यह बात अब शालिनी और समीर दोनों की समझ आ चुकी थी.

प्रोजैक्ट-भाग 2: समीर के साथ शादी की दूसरी सालगिरह वाले दिन क्या हुआ

लेखक-पुखराज सोलंकी

शाम 4 बजे के आसपास शालिनी किचन में चाय बना रही थी कि डोरबेल बजी. दरवाजा खोल कर देखा, तो वह भौचक्की रह गई. सामने वही 2 अफसर खड़े थे, जो थिएटर में समीर के बौस के साथ मौजूद थे. उन्हें हिलते हुए देख शालिनी को यह समझने में जरा भी देर नहीं लगी कि वे दोनों शराब के नशे में हैं. वह तो उन्हें बाहर से ही रवाना करने वाली थी, लेकिन वे अंदर आ गए तो उस ने उन्हें अनमने मन से बैठने की कह कर खुद किचन में चली गई.

जब शालिनी चाय ले कर आई, तो उन्हें चाय का कप पकड़ाते हुए पूछा, ‘समीर ने बताया नहीं कि आप आने वाले हो, और आप ने घर कैसे पहचान लिया? आप तो किसी दूसरे शहर ‘दरअसल, उस दिन हम लोग थिएटर से लौटते समय इसी रास्ते से हो कर गए थे, तो बौस ने ही हमें बताया था कि यह समीर का घर है. बस इसीलिए इधर से गुजरते हुए सोचा कि आप को बधाई देते चलें,‘ एक अफसर बोला.

‘वैसे, आप का बहुतबहुत धन्यवाद, जो आप ने समीर के प्रोजैक्ट को सलैक्ट किया. बहुत मेहनत की है उस ने इस पर,‘ शालिनी उन का अहसान जताते हुए बोली.‘अजी सलैक्ट तो उसी दिन कर लिया था जब आप को थिएटर में पहली दफा देखा था,‘ दूसरा अफसर बोला.

‘क्या मतलब…?‘ शालिनी तपाक से बोली‘जी, सच कहा है. जिसे ले कर वह गया है, वह तो कंपनी का प्रोजैक्ट है, लेकिन हमारा प्रोजैक्ट तो आप ही हो न भाभीजी,‘ कहते हुए उस ने शालिनी के हाथ पर झपट्टा मारा.

अब तक शालिनी उन की मंशा अच्छी तरह समझ चुकी थी. उस ने झटक कर अपना हाथ छुड़ाया और सीधे बाहर की ओर भागी. वे लड़खड़ाते हुए दरवाजे तक पहुंचे, तब तक शालिनी ने बाहर की कुंडी लगा कर उन्हें घर में बंद कर दिया.

बाहर निकल कर शालिनी ने मदद के लिए दाएंबाएं देखा, लेकिन कोई नजर नहीं आया. मोबाइल भी घर के अंदर छूट गया. तभी उसे सामने से एक आटोरिकशा आता दिखा, वह उस ओर दौड़ी. आटोरिकशा जब उस के पास आ कर रुका, तो वह भौंचक्की रह गई. उसे अपनी आंखों पर यकीन नहीं हुआ, लेकिन ये सच था.

उस आटोरिकशा में समीर ही बैठा हुआ था. शालिनी को इस हालत में देख समीर कुछ समझ नहीं पाया कि आखिर माजरा क्या है. शालिनी ने उसे सारी बात बताई और उस के वापस लौट आने की वजह भी पूछी, तो समीर ने कहा, ‘स्टेशन पहुंचने पर मुझे मालूम चला कि गाड़ी 3 घंटे देरी से चल रही है, इसीलिए सोचा कि यहां भीड़भाड़ में रहने से अच्छा है, घर पर ही आराम किया जाए. खैर, जो होता है अच्छे के लिए होता है,‘ कह कर उस ने मोबाइल निकाला और अपने बौस को फोन लगा कर इस पूरे घटनाक्रम के बारे में बताया.

‘तुम लोग बाहर ही रुके रहो समीर, मैं जल्दी ही वहां पहुंचता हूं,’ कह कर बौस ने फोन रखा. उधर वे दोनों अफसर भद्दी गालियां देते हुए अंदर से लगातार दरवाजा पीट रहे थे. कुछ देर बाद सामने से बौस की कार आती दिखाई दी. पीछेपीछे पुलिस की जीप भी आ रही थी.

जब कार पास आ कर रुकी, तो बाहर निकल कर बौस ने कहा, ‘घबराओ मत समीर. ऐसे लोगों की अक्ल ठिकाने लगाना मुझे अच्छे से आता है. ये लोग समझते हैं कि अनजान शहर में हम कुछ भी कर सकते हैं, लेकिन ऐसे लोगों के पर मुझे अच्छे से काटने आते हैं. पुलिस को मैं ने ही फोन किया है.’

पुलिस की जीप आ कर रुकी, तो झट से 4-5 पुलिस वाले बाहर निकले. समीर ने अपने घर की ओर इशारा किया, जिस में से उन दोनों अफसरों की भद्दी गालियों की आवाज आ रही थी. पुलिस ने दरवाजा खोला और उन दोनों को वहीं पर ही दबोच लिया और ले जा कर जीप में बिठाया.

बौस ने समीर से कहा, ‘शालिनी बेटी ने एक काम तो अच्छा किया कि इन्हें घर में बंद कर दिया, वरना आज अगर ये भाग जाते तो इन को पकड़ पाना थोड़ा मुश्किल होता, क्योंकि आज रात 9 बजे की फ्लाइट से ये दोनों मुंबई जाने वाले थे.‘

बौस ने आगे कहा, ‘दरअसल, गलती मेरी ही है, उस दिन थिएटर से लौटते  वक्त हम लोग इधर से गुजर रहे थे, तो मैं ने यों ही इन्हें कह दिया था कि हमारे औफिस में आप के सामने जो अपना प्रोजैक्ट पेश करेगा, उस समीर का घर यही है. लेकिन मुझे क्या पता था कि ये लोग शराब के नशे में अपना विवेक भूल कर ऐसी नीच हरकत कर बैठेंगे. इन्हें सिर्फ पुलिस को सौंपने से कुछ नहीं होगा. जब तक दोनों को नौकरी से न निकलवा दूं, मैं चैन की सांस नहीं लेने वाला. खैर, जो होता है अच्छे के लिए होता है.

‘तुम लोग आओ, मेरी गाड़ी में बैठो. थाने चल कर शालिनी के बयान दर्ज करवाने हैं.‘

शालिनी और समीर दोनों कार में बैठे. बौस ने कार स्टार्ट कर आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘इन का तो अभी काम हो जाएगा, रही बात तुम्हारे प्रोजैक्ट की तो उस पर की गई तुम्हारी मेहनत मैं बेकार नहीं जाने दूंगा. उस के लिए मैं कंपनी से बात कर लूंगा. तुम थोड़ा धैर्य रखो. इन दोनों की तो शिकायत कर कंपनी से निकलवाऊंगा. साथ ही, इस प्रोजैक्ट के लिए अगले महीने की तारीख तय करने की कोशिश करूंगा.

‘और इस बार जाते वक्त शालिनी को भी साथ लेते जाना. यह भी घूम आएगी तुम्हारे साथ. वहां मीटिंग में बस 2-3 घंटे का ही काम होता है. फिर ऐश करना तुम लोग,‘ बौस ने यह कहा, तो शालिनी और समीर दोनों के चेहरे एक लंबी सी मुसकान ने दस्तक दे दी.

बौस ने गाड़ी को ब्रेक लगाया. पुलिस स्टेशन आ चुका था और पीछेपीछे पुलिस की वह जीप भी आ गई थी, जिस में वे दोनों अफसर मौजूद थे जो कि लाख मना करने के बावजूद शराब के नशे में ऊलजलूल बके जा रहे थे. उन की हरकत और मामले की गंभीरता को देखते हुए उन्हें सलाखों के पीछे धकेल दिया गया.

‘फिलहाल तो ये दोनों अभी नशे में हैं. कल सुबह इन का नशा उतरते ही पूछताछ की जाएगी. उस के बाद ही स्थिति साफ हो पाएगी.

‘और हां.. इस दौरान अगर आप में से किसी की जरूरत पड़ी, तो आप को फोन कर दिया जाएगा. अभी आप लोग जा सकते हैं,‘ पुलिस ने शालिनी और समीर के बयान दर्ज कर के कहा. और फिर तीनों वहां से निकल गए.

बौस ने उन दोनों को घर छोड़ते हुए कहा, ‘पुलिस स्टेशन से फोन आए, तो मुझे भी इत्तिला कर देना. मैं भी साथ चलूंगा.‘

अगले दिन सुबह फोन की घंटी के साथ ही समीर की आंख खुली. फोन पुलिस स्टेशन से था. बात कर के समीर ने शालिनी को जगाते हुए कहा, ‘सुनो डियर, पुलिस स्टेशन से फोन आया है. पुलिस ने उन दोनों से पूछताछ कर ली. सुबह साढे़ 10 बजे हमें पुलिस स्टेशन बुलाया है. तुम जल्दी से उठ कर तैयारी करो. मैं बौस को फोन मिलाता हूं,‘ शालिनी को जगा कर समीर ने अपने बौस को इस बारे में जानकारी दी. और फिर साढे़ 10 बजे तीनों पुलिस स्टेशन पहुंच गए.

उन तीनों को देख थानाधिकारी ने कुरसी की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘आइए.. आइए.. बैठिए, आप लोग किसी रंजीत नाम के शख्स को जानते हैं, जो कि आप ही के औफिस में काम करता है.’

‘हां… हां, बिलकुल, औफिस में वह मेरा सीनियर है,‘ समीर बोला.‘लेकिन, रंजीत का इस केस से क्या ताल्लुक…?‘ बौस ने आश्चर्यमिश्रित भाव से कहा.

‘‘आप लोग मुझे उस का पूरा पता और मोबाइल नंबर दीजिए. अभी पता चल जाएगा कि इस केस से उस का क्या ताल्लुक है,’ थानाधिकारी ने प्रतिउत्तर में कहा. और फिर आवाज लगाई, ‘हवलदार, उन दोनों नशेड़ियों को बाहर लाओ जरा.’

अब दोनों अफसर अपनी झुकी गरदन के साथ उन सब के सामने थे. उन दोनों को अपनी आंखों के सामनेपा कर बौस ने कहा, ‘तुम जैसे अफसरों को पहचानने में मुझ से चूक कैसे हो गई. मैं ने अपने 22 साल के कैरियर में अब तक इतने बेशर्म और घटिया किस्म के अफसर नहीं देखे.‘‘इस में हमारी कोई गलती नहीं है, हमें माफ कर दीजिए,‘ एक अफसर बौस की बात काटते हुए बोला.

‘गलती तुम्हारी नहीं, गलती तो मेरी है, जो तुम्हें उस दिन फिल्म देख कर लौटते समय रास्ते में पड़ने वाले समीर के घर के बारे में बताया,‘ बौस ने अपनी भड़ास निकालते हुए कहा.

‘ऐसा बिलकुल नहीं है सर, दरअसल, उस दिन फिल्म देखने के बाद आप ने तो हमें होटल के गेट तक ही छोड़ा था, लेकिन जब हम अंदर गए तो आप के औफिस में काम करने वाला रंजीत रूम के आगे खड़ा हमारा इंतजार कर रहा था. रूम में जा कर हम ने कुछ देर बात की और फिर उस ने अपने बैग में से व्हिस्की की बोतल निकाल कर हमारी मानमनौव्वल की, तो हम ने भी हामी भर दी.

प्रोजैक्ट-भाग 1: समीर की शादी की दूसरी सालगिरह वाले दिन क्या हुआ

लेखक-पुखराज सोलंकी

शनिवार को ओवर टाइम करने के बावजूद भी समीर का काम पूरा नहीं हो पाया था. रविवार को छुट्टी थी और सोमवार को औफिस की मीटिंग में किसी भी हाल में उसे प्रोजैक्ट पेश करना था, इसलिए वह औफिस का काम घर पर ले आया था, ताकि कैसे भी कर के प्रोजैक्ट समय पर पूरा हो जाए.

लेकिन, घर पहुंचते ही उसे याद आया कि रविवार को वह अपनी पत्नी शालिनी के साथ फिल्म देखने जाने वाला है. और इस बार वह मना भी नहीं कर सकता था, क्योंकि अब की मैरिज एनिवर्सरी भी तो इसी रविवार को पड़ रही है.

पिछली बार की तरह इस बार वह अपने काम की वजह से शालिनी का मूड औफ नहीं करना चाहता था. रात के खाने के बाद वह शालिनी से यह कह कर अपने काम में जुट गया, ‘सौरी डियर.. आज थोड़ा काम निबटा लूं, कल पूरा दिन ऐंजौए करेंगे.‘

समीर के चेहरे पर काम का तनाव साफ झलक रहा था, जिसे चाह कर भी वह शालिनी से छुपा न सका. शालिनी उस की ओर करवट ले कर लेटी उसे देखती रही और लेटेलेटे कब उस की आंख लग गई, उसे पता ही नहीं चला.

अगले दिन सुबह जब शालिनी तैयार हो कर समीर के सामने आई, तो वह उस की तारीफ किए बिना नही रह सका. अभी उस की तारीफ खत्म भी नहीं हुई थी कि शालिनी ने अपनी बंद मुट्ठी समीर की ओर बढ़ाई. समीर ने उस का हाथ थाम कर बंद मुट्ठी की एकएक कर उंगली खोली और मुट्ठी में बंद चमकीली सिंदूरदानी अपने हाथ में ले कर शालिनी की मांग भरी और उसे अपनी बांहों में भर लिया.

इस दौरान शालिनी को भी न जाने क्या शरारत सूझी, वह उस की पीठ पर अपनी उंगली फिराते हुए बोली, ‘बताओ, मैं ने क्या लिखा है?‘

‘तुम्हारा नाम,‘ शालिनी को अपनी बांहों में कसते हुए समीर ने कहा.‘बिलकुल गलत. अच्छा चलो, दोबारा लिखती हूं, अब ठीक से बताना.‘शालिनी  फिर से समीर की पीठ पर उंगली से कुछ लिखने लगी. अपनी पीठ पर घूमती शालिनी की उंगली के साथसाथ समीर ने अपना दिमाग भी घुमाना शुरू किया और फिर तपाक से बोला, ‘आई लव यू.‘

सही जवाब पा कर शालिनी के चेहरे पर मुसकान फैल गई, ‘आई लव यू टू मेरी जान, चलो, अब जल्दी से तैयार हो जाओ. याद है न, आज हम लोग फिल्म देखने जाने वाले थे,‘ समीर को याद दिला कर शालिनी अपने काम में बिजी हो गई.

शालिनी चाहती तो आज फिल्म देखने का प्रोग्राम कैंसिल भी कर सकती थी. उस की कोई खास इच्छा नहीं थी फिल्म देखने की और न ही थिएटर में उस के पसंद की कोई मूवी लगी थी. उसे तो बस कैसे भी कर के इस बार यह खास दिन समीर के साथ बिताना था.

हालांकि शालिनी अच्छी तरह से जानती थी कि इस बार समीर के लिए यह प्रोजैक्ट कितना माने रखता है. लेकिन फिर भी उस ने समीर की मरजी देखनी चाही और चुप रही.

शालिनी यह सब सोच ही रही थी कि समीर तैयार हो कर उस के सामने आ खड़ा हुआ. वह समीर को अपलक देखती रही, समीर नीचे से ऊपर तक बिलकुल टिपटौप था. बस चेहरा थोड़ा उतरा हुआ था. तैयार होने बावजूद वह अपने चेहरे से काम का तनाव नहीं छुपा सका. अनमना सा समीर शालिनी को साथ ले कर चल पड़ा.

वहां थिएटर में पहुंच कर वे गाड़ी पार्क कर के अंदर की ओर जाने लगे कि वहां पार्किंग में पहले से खड़ी एक ब्लैक कार को देख कर समीर चैंक गया और बोला, ‘अरे, बौस की गाड़ी, मतलब, बौस भी फिल्म देखने आए हुए हैं.‘

‘इतना बड़ा शहर है, इस कंपनी और इस कलर की गाड़ी किसी और की भी तो हो सकती है, क्या नंबर याद है तुम्हें बौस की गाड़ी का?‘ शालिनी ने पूछा.

नंबर को सुनते ही समीर बोला, ‘खैर, छोड़ो जो होगा देखा जाएगा. दोनों आगे बढे़ और थिएटर में अपनी सीट पर जा कर बैठ गए. फिल्म शुरू हो चुकी थी. फिल्म का शुरुआती सीन ही इतना सस्पैंस भरा था कि समीर की उत्सुकता बढ़ गई और उस के चेहरे से काम का तनाव जाता रहा.

इंटरवल में जब वह स्नैक्स लेने कैंटीन पहुंचा, तो भीड़ में अपने कंधे पर अचानक किसी का हाथ पाया. उस ने पीछे मुड़ कर देखा तो वही हुआ जिस बात का अंदेशा था. उस का बौस सोमवार की मीटिंग में आने वाले उन दोनों अफसरों के साथ फिल्म देखने पहुंचा हुआ था.

‘क्या बात है समीर अकेलेअकेले, पहले पता होता तो तुम्हें भी साथ ले आते हम लोग,‘ बौस ने मुसकराते हुए कहा.‘नहीं सर, मैं अकेला नहीं शालिनी भी साथ में है, वह वहां बैठी है. वैसे, आज हमारी शादी की दूसरी सालगिरह है. बस इसीलिए फिल्म दिखाने ले आया.‘

‘ओहो… कांग्रेचुलेशन समीर. और हां, मैडम कहां है भई, आज तो उन्हें भी बधाई देनी बनती है,‘ बौस ने ठहाका लगाते हुए कहा.समीर अपने बौस और उस के साथ आए दोनों अफसरों को शालिनी के पास ले आया. सब ने शालिनी को बधाई दी.

‘क्या लेंगे सर आप लोग ठंडा या गरम?‘ समीर ने पूछा.‘भई, तुम्हारी शादी की सालगिरह है, सिर्फ इतने से काम नहीं चलने वाला पूरी पार्टी देनी होगी.’समीर ने पार्टी के लिए हां भरी, तभी फिल्म शुरू हो गई, तो सभी अपनीअपनी सीटों पर जा कर बैठ गए.

फिल्म के खत्म होने पर समीर ने शालिनी को कुछ शौपिंग कराई. शहर की कई फेमस जगहों पर घुमाया, वहां सेल्फियां लीं और घर लौटते हुए खाना उसी होटल में खाया, जहां वे शादी से पहले कई बार एकसाथ गए थे.

रात गहराने लगी थी. घर पहुंच कर समीर सीधे अपने काम में जुट गया. फिर से उस के चेहरे पर वही काम का तनाव देख शालिनी समझ गई. कपड़े चेंज कर वह भी उस की मदद करने की मंशा से पास आ कर बैठ गई. उस ने भी कुछ हाथ बंटाया और देर रात तक समीर के उस महत्वाकांक्षी प्रोजैक्ट को अंजाम तक पहुंचा ही दिया.

समीर अब काफी हलका महसूस कर रह था. उसे उम्मीद नहीं थी कि दिनभर की मौजमस्ती के बाद देर रात तक प्रोजैक्ट तैयार हो जाएगा. वह खुशी से उछल पड़ा. मदद के लिए शालिनी का शुक्रिया अदा करते हुए उसे अपनी बांहों में भर लिया.

शालिनी भी तो यही चाहती थी. उसे मालूम था कि जब तक काम पूरा नहीं होगा, समीर उस के पास नहीं आने वाला इसीलिए उस ने साथ लग कर उस के काम को अंजाम तक पहुंचाया.

‘थैंक यू सो मच डियर, तुम न होती तो सुबह हो जाती,‘ कहते हुए समीर ने शालिनी के गले पर नौनस्टोप एक बाद एक किस करने लगा.

शालिनी की सांसों की रफ्तार बढ़ने लगी. वह भी उस का साथ देते हुए बोली, ‘अब सुबह एकदूसरे की बांहों में ही होगी.‘ और समीर को कस कर अपनी बांहों में जकड़ लिया.

अगले दिन सुबह किचन में खटपट की आवाज से शालिनी की आंख खुली, तो चैंक गई. किचन में जा कर देखा तो हमेशा देर से उठने वाला समीर आज नहाधो कर नाश्ता बनाने लगा है.

‘क्यों मैडम पूरे 3 घंटे लेट उठी हो. लगता है, कल रात कुछ ज्यादा ही मेहनत कर ली थी,‘ शालिनी को देख कर समीर बोला.‘मेहनत न करती तो तुम्हारा प्रोजैक्ट कैसे पूरा होता.‘

‘मैं इस मेहनत की नहीं उस मेहनत की बात कर रहा हूं,‘ यह सुन कर शालिनी शरमा कर बाथरूम की ओर चल दी.जब तक वह बाहर निकली, तब तक समीर नाश्ता कर चुका था. और आज शाम थोड़ी देर से आने की कह कर वह औफिस के लिए निकल गया.

औफिस पहुंच कर जब उस ने मीटिंग में बौस के सामने अपना प्रोजैक्ट पेश किया, तो बौस ने बाहर से आए उन अफसरों के सामने उस प्रोजैक्ट को रखा.

कुछ देर की बातचीत, जांचपरख और नफानुकसान देखने के बाद समीर के उस महत्वाकांक्षी प्रोजैक्ट को सलैक्ट करने का डिसीजन ले लिया गया.

बौस ने उसे अगले ही दिन लखनऊ से नोएडा जाने का टिकट थमाते हुए कहा, ‘2 दिन बाद कंपनी के हैड औफिस नोएडा में एक मीटिंग है, जिस में तुम्हें देशविदेश से आए लोगों के सामने इसी प्रोजैक्ट को एक बार फिर से पेश करना होगा. यह लो टिकट. कल दोपहर 3 बजे की ट्रेन है. अब तो दोदो पार्टियां बनती हैं.‘

‘जी सर जरूर, लौट के आने पर 2 नहीं 4 पार्टियां दे दूंगा एकसाथ,‘ समीर खुशीखुशी बोला.घर पहुंच कर समीर ने शालिनी को यह खुशखबरी दी. इस प्रोजैक्ट में उस ने भी तो अपना सहयोग दिया था. यह सुन कर वह भी बहुत खुश हुई. समीर ने जब बताया कि कल वह 2 दिन के लिए दोपहर 3 बजे की ट्रेन से कंपनी के काम से नोएडा जा रहा है, इसलिए पैकिंग कर देना. तब से शालिनी पैकिंग में जुट गई.

अगले दिन समीर शालिनी को काम खत्म होते ही जल्द लौट आने का वादा कर के निश्चित समय पर स्टेशन की ओर घर से निकल गया.

अंतत -भाग 1: जीत किस की हुई

बैठक में तनावभरी खामोशी छा गई थी. हम सब की नजरें पिताजी के चेहरे पर कुछ टटोल रही थीं, लेकिन उन का चेहरा सपाट और भावहीन था. तपन उन के सामने चेहरा झुकाए बैठा था. शायद वह समझ नहीं पा रहा था कि अब क्या कहे. पिताजी के दृढ़ इनकार ने उस की हर अनुनयविनय को ठुकरा दिया था.

सहसा वह भर्राए स्वर में बोला, ‘‘मैं जानता हूं, मामाजी, आप हम से बहुत नाराज हैं. इस के लिए मुझे जो चाहे सजा दे लें, किंतु मेरे साथ चलने से इनकार न करें. आप नहीं चलेंगे तो दीदी का कन्यादान कौन करेगा?’’

पिताजी दूसरी तरफ देखते हुए बोले, ‘‘देखो, यहां यह सब नाटक करने की जरूरत नहीं है. मेरा फैसला तुम ने सुन लिया है, जा कर अपनी मां से कह देना कि मेरा उन से हर रिश्ता बहुत पहले ही खत्म हो गया था. टूटे हुए रिश्ते की डोर को जोड़ने का प्रयास व्यर्थ है. रही बात कन्यादान की, यह काम कोई पड़ोसी भी कर सकता है.’’

‘‘रघुवीर, तुझे क्या हो गया है,’’ दादी ने सहसा पिताजी को डपट दिया.

मां और भैया के साथ मैं भी वहां उपस्थित थी. लेकिन पिताजी का मिजाज देख कर उन्हें टोकने या कुछ कहने का साहस हम लोगों में नहीं था. उन के गुस्से से सभी डरते थे, यहां तक कि उन्हें जन्म देने वाली दादी भी.

मगर इस समय उन के लिए चुप रहना कठिन हो गया था. आखिर तपन भी तो उन का नाती था. उसे दुत्कारा जाना वे बरदाश्त न कर सकीं और बोलीं, ‘‘तपन जब इतना कह रहा है तो तू मान क्यों नहीं जाता. आखिर तान्या तेरी भांजी है.’’

‘‘मां, तुम चुप रहो,’’ दादी के हस्तक्षेप से पिताजी बौखला उठे, ‘‘तुम्हें जाना हो तो जाओ, मैं ने तुम्हें तो कभी वहां जाने से मना नहीं किया. लेकिन मैं नहीं जाऊंगा. मेरी कोई बहन नहीं, कोई भांजी नहीं.’’

‘‘अब चुप भी कर,’’ दादी ने झिड़क कर कहा, ‘‘खून के रिश्ते इस तरह तोड़ने से टूट नहीं जाते और फिर मैं अभी जिंदा हूं, तुझे और माधवी को मैं ने अपनी कोख से जना है. तुम दोनों मेरे लिए एकसमान हो. तुझे भांजी का कन्यादान करने जाना होगा.’’

‘‘मैं नहीं जाऊंगा,’’ पिताजी बोले, ‘‘मेरी समझ में नहीं आता कि सबकुछ जानने के बाद भी तुम ऐसा क्यों कह रही हो.’’

‘‘मैं तो सिर्फ इतना जानती हूं कि माधवी मेरी बेटी है और तेरी बहन और तुझे उस ने अपनी बेटी का कन्यादान करने के लिए बुलाया है,’’ दादी के स्वर में आवेश और खिन्नता थी, ‘‘तू कैसा भाई है. क्या तेरे सीने में दिल नहीं. एक जरा सी बात को बरसों से सीने से लगाए बैठा है.’’

‘‘जरा सी बात?’’ पिताजी चिढ़ गए थे, ‘‘जाने दो, मां, क्यों मेरा मुंह खुलवाना चाहती हो. तुम्हें जो करना है करो, पर मुझे मजबूर मत करो,’’ कह कर वे झटके से बाहर चले गए.

दादी एक ठंडी सांस भर कर मौन हो गईं. तपन का चेहरा यों हो गया जैसे वह अभी रो देगा. दादी उसे दिलासा देने लगीं तो वह सचमुच ही उन के कंधे पर सिर रख कर फूट पड़ा, ‘‘नानीजी, ऐसा क्यों हो रहा है. क्या मामाजी हमें कभी माफ नहीं करेंगे. अब लौट कर मां को क्या मुंह दिखाऊंगा. उन्होंने तो पहले ही शंका व्यक्त की थी, पर मैं ने कहा कि मामाजी को ले कर ही लौटूंगा.’’

‘‘धैर्य रख, बेटा, मैं तेरे मन की व्यथा समझती हूं. क्या कहूं, इस रघुवीर को. इस की अक्ल पर तो पत्थर पड़ गए हैं. अपनी ही बहन को अपना दुश्मन समझ बैठा है,’’ दादी ने तपन के सिर पर हाथ फेरा, ‘‘खैर, तू चिंता मत कर, अपनी मां से कहना वह निश्चिंत हो कर विवाह की तैयारी करे, सब ठीक हो जाएगा.’’

मैं धीरे से तपन के पास जा बैठी और बोली, ‘‘बूआ से कहना, दीदी की शादी में मैं और समीर भैया भी दादी के साथ आएंगे.’’

तपन हौले से मुसकरा दिया. उसे इस बात से खुशी हुई थी. वह उसी समय वापस जाने की तैयारी करने लगा. हम सब ने उसे एक दिन रुक जाने के लिए कहा, आखिर वह हमारे यहां पहली बार आया था. पर तपन ने यह कह इनकार कर दिया कि वहां बहुत से काम पड़े हैं. आखिर उसे ही तो मां के साथ विवाह की सारी तैयारियां पूरी करनी हैं.

तपन का कहना सही था. फिर उस से रुकने का आग्रह किसी ने नहीं किया और वह चला गया.

तपन के अचानक आगमन से घर में एक अव्यक्त तनाव सा छा गया था. उस के जाने के बाद सबकुछ फिर सहज हो गया. पर मैं तपन के विषय में ही सोचती रही. वह मुझ से 2 वर्ष छोटा था, मगर परिस्थितियों ने उसे उम्र से बहुत बड़ा बना दिया था. कितनी उम्मीदें ले कर वह यहां आया था और किस तरह नाउम्मीद हो कर गया. दादी ने उसे एक आस तो बंधा दी पर क्या वे पिताजी के इनकार को इकरार में बदल पाएंगी?

मुझे यह सवाल भीतर तक मथ रहा था. पिताजी के हठी स्वभाव से सभी भलीभांति परिचित थे. मैं खुल कर उन से कुछ कहने का साहस तो नहीं जुटा सकी, लेकिन उन के फैसले के सख्त खिलाफ थी.

दादी ने ठीक ही तो कहा था कि खून के रिश्ते तोड़ने से टूट नहीं जाते. क्या पिताजी इस बात को नहीं समझते. वे खूब समझते हैं. तब क्या यह उन के भीतर का अहंकार है या अब तक वर्षों पूर्व हुए हादसे से उबर नहीं सके हैं? शायद दोनों ही बातें थीं. पिताजी के साथ जो कुछ भी हुआ, उसे भूल पाना इतना सहज भी तो नहीं था. हां, वे हृदय की विशालता का परिचय दे कर सबकुछ बिसरा तो सकते थे, किंतु यह न हो सका.

मैं नहीं जानती कि वास्तव में हुआ क्या था और दोष किस का था. यह घटना मेरे जन्म से भी पहले की है. मैं 20 की होने को आई हूं. मैं ने तो जो कुछ जानासुना, दादी के मुंह से ही सुना. एक बार नहीं, बल्कि कईकई बार दादी ने मुझे वह कहानी सुनाई. कहानी नहीं, बल्कि यथार्थ, दादी, पिताजी, बूआ और फूफा का भोगा हुआ यथार्थ.

दादी कहतीं कि फूफा बेकुसूर थे. लेकिन पिताजी कहते, सारा दोष उन्हीं का था. उन्होंने ही फर्म से गबन किया था. मैं अब तक समझ नहीं पाई, किसे सच मानूं? हां, इतना अवश्य जानती हूं, दोष चाहे किसी का भी रहा हो, सजा दोनों ने ही पाई. इधर पिताजी ने बहन और जीजा का साथ खोया तो उधर बूआ ने भाई का साथ छोड़ा और पति को हमेशा के लिए खो दिया. निर्दोष बूआ दोनों ही तरफ से छली गईं.

मेरा मन उस अतीत की ओर लौटने लगा, जो अपने भीतर दुख के अनेक प्रसंग समेटे हुए था. दादी के कुल 3 बच्चे थे, सब से बड़े ताऊजी, फिर बूआ और उस के बाद पिताजी. तीनों पढ़ेपलेबढ़े, शादियां हुईं.

उन दिनों ताऊजी और पिताजी ने मिल कर एक फर्म खोली थी. लेकिन अर्थाभाव के कारण अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था. उसी समय फूफाजी ने अपना कुछ पैसा फर्म में लगाने की इच्छा व्यक्त की. ताऊजी और पिताजी को और क्या चाहिए था, उन्होंने फूफाजी को हाथोंहाथ लिया. इस तरह साझे में शुरू हुआ व्यवसाय कुछ ही समय में चमक उठा और फलनेफूलने लगा. काम फैल जाने से तीनों साझेदारों की व्यस्तता काफी बढ़ गई थी.

औफिस का अधिकतर काम फूफाजी संभालते थे. पिताजी और ताऊजी बाहर का काम देखते थे. कुल मिला कर सबकुछ बहुत ठीकठाक चल रहा था. मगर अचानक ऐसा हुआ कि सब गड़बड़ा गया. ऐसी किसी घटना की, किसी ने कल्पना भी नहीं की थी.

अंतत -भाग 2: जीत किस की हुई

अचानक ही फर्म में लाखों की हेराफेरी का मामला प्रकाश में आया, जिस ने न केवल तीनों साझेदारों के होश उड़ा दिए बल्कि फर्म की बुनियाद तक हिल गई. तात्कालिक छानबीन से एक बात स्पष्ट हो गई कि गबन किसी साझेदार ने किया है, और वह जो भी है, बड़ी सफाई से सब की आंखों में धूल झोंकता रहा है.

तमाम हेराफेरी औफिस की फाइलों में हुई थी और वे सब फाइलें यानी कि सभी दस्तावेज फूफाजी के अधिकार में थे. आखिरकार शक की पहली उंगली उन पर ही उठी. हालांकि फूफाजी ने इस बात से अनभिज्ञता प्रकट की थी और अपनेआप को निर्दोष ठहराया था. पर चूंकि फाइलें उन्हीं की निगरानी में थीं, तो बिना उन की अनुमति या जानकारी के कोई उन दस्तावेजों में हेराफेरी नहीं कर सकता था.

लेकिन जाली दस्तावेजों और फर्जी बिलों ने फूफाजी को पूरी तरह संदेह के घेरे में ला खड़ा किया था. सवाल यह था कि यदि उन्होंने हेराफेरी नहीं की तो किस ने की? जहां तक पिताजी और ताऊजी का सवाल था, वे इस मामले से कहीं भी जुड़े हुए नहीं थे और न ही उन के खिलाफ कोई प्रमाण था. प्रमाण तो कोई फूफाजी के खिलाफ भी नहीं मिला था, लेकिन वे यह बताने की स्थिति में नहीं थे कि अगर फर्म का रुपया उन्होंने नहीं लिया तो फिर कहां गया? ऐसी ही दलीलों ने फूफाजी को परास्त कर दिया था. फिर भी वे सब को यही विश्वास दिलाने की कोशिश करते रहे कि वे निर्दोष हैं और जो कुछ भी हुआ, कब हुआ, कैसे हुआ नहीं जानते.

इन घटनाओं ने जहां एक ओर पिताजी को स्तब्ध और गुमसुम बना दिया था, वहीं ताऊजी उत्तेजित थे और फूफाजी से बेहद चिढ़े थे. जबतब वे भड़क उठते, ‘यह धीरेंद्र तो हमें ही बदनाम करने पर तुला हुआ है. अगर इस पर विश्वास न होता तो हम सबकुछ इसे कैसे सौंप देते. अब जब सचाई सामने आ गई है तो दुहाई देता फिर रहा है कि निर्दोष है. क्या हम दोषी हैं? क्या यह हेराफेरी हम ने किया है?

‘मुझे तो इस आदमी पर शुरू से ही शक था, इस ने सबकुछ पहले ही सोचा हुआ था. हम इस की मीठीमीठी बातों में आ गए. इस ने अपने पैसे लगा कर हमें एहसान के नीचे दबा देना चाहा. सोचा होगा कि पकड़ा भी गया तो बहन का लिहाज कर के हम चुप कर जाएंगे. मगर उस की सोची सारी बातें उलटी हो गईं, इसलिए अब अनापशनाप बकता फिर रहा है.’

एक बार तो ताऊजी ने यहां तक कह दिया था, ‘हमें इस आदमी को पुलिस के हवाले कर देना चाहिए.’

लेकिन दादी ने कड़ा विरोध किया था. पिताजी को भी यह बात पसंद नहीं आई कि यदि मामला पुलिस में चला गया तो पूरे परिवार की बदनामी होगी.

बात घर से बाहर न जाने पाई, लेकिन इस घटना ने चारदीवारी के भीतर भारी उथलपुथल मचा दी थी. घर का हरेक प्राणी त्रस्त व पीडि़त था. पिताजी के मन को ऐसा आघात लगा कि वे हर ओर से विरक्त हो गए. उन्हें फर्म के नुकसान और बदनामी की उतनी चिंता नहीं थी, जितना कि विश्वास के टूट जाने का दुख था. रुपया तो फिर से कमाया जा सकता था. मगर विश्वास? उन्होंने फूफाजी पर बड़े भाई से भी अधिक विश्वास किया था. बड़ा भाई ऐसा करता तो शायद उन्हें इतनी पीड़ा न होती, मगर फूफाजी ऐसा करेंगे, यह तो उन्होंने ख्वाब में भी न सोचा था.

उधर फूफाजी भी कम निराश नहीं थे. वे किसी को भी अपनी नेकनीयती का विश्वास नहीं दिला पाए थे. दुखी हो कर उन्होंने यह जगह, यह शहर ही छोड़ देने का फैसला कर लिया. यहां बदनामी के सिवा अब धरा ही क्या था. अपने, पराए सभी तो उन के विरुद्ध हो गए थे. वे बूआ को लेकर अपने एक मित्र के पास अहमदाबाद चले गए.

दादी बतातीं कि जाने से पूर्व फूफाजी उन के पास आए थे और रोरो कहा था, ‘सब लोग मुझे चोर समझते हैं, लेकिन मैं ने गबन नहीं किया. परिस्थितियों ने मेरे विरुद्ध षड्यंत्र रचा है. मैं चाह कर भी इस कलंक को धो नहीं पाया. मैं भी तो आप का बेटा ही हूं. मैं ने उन्हें हमेशा अपना भाई ही समझा है. क्या मैं भाइयों के साथ ऐसा कर सकता हूं. क्या आप भी मुझ पर विश्वास नहीं करतीं?’

‘मुझे विश्वास है, बेटा, मुझे विश्वास है कि तुम वैसे नहीं हो, जैसा सब समझते हैं. पर मैं भी तुम्हारी ही तरह असहाय हूं. मगर इतना जानती हूं, झूठ के पैर नहीं होते. सचाई एक न एक दिन जरूर सामने आएगी. और तब ये ही लोग पछताएंगे,’ दादी ने विश्वासपूर्ण ढंग से घोषणा की थी.

व्यवसाय से पिताजी का मन उचट गया था, उन्होंने फर्म बेच देने का प्रस्ताव रखा. ताऊजी भी इस के लिए राजी हो गए. गबन और बदनामी के कारण फर्म की जो आधीपौनी कीमत मिली, उसे ही स्वीकार कर लेना पड़ा.

पिताजी ने एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी कर ली, जबकि ताऊजी का मन अभी तक व्यवसाय में ही रमा हुआ था. वे पिताजी के साथ कोई नया काम शुरू करना चाहते थे. किंतु उन के इनकार के बाद उन्होंने अकेले ही काम शुरू करने का निश्चय कर लिया.

फर्म के बिकने के बाद जो पैसा मिला, उस का एक हिस्सा पिताजी ने फूफाजी को भिजवा दिया. हालांकि यह बात ताऊजी को पसंद नहीं आई, मगर पिताजी का कहना था, ‘उस ने हमारे साथ जो कुछ किया, उस का हिस्सा ले कर वही कुछ हम उस के साथ करेंगे तो हम में और उस में अंतर कहां रहा. नहीं, ये पैसे मेरे लिए हराम हैं.’

किंतु लौटती डाक से वह ड्राफ्ट वापस आ गया था और साथ में थी, फूफाजी द्वारा लिखी एक छोटी सी चिट…

‘पैसे मैं वापस भेज रहा हूं इस आशा से कि आप इसे स्वीकार कर लेंगे. अब इस पैसे पर मेरा कोई अधिकार नहीं है. फर्म में जो कुछ भी हुआ, उस की नैतिक जिम्मेदारी से मैं मुक्त नहीं हो सकता. यदि इन पैसों से उस नुकसान की थोड़ी सी भी भरपाई हो जाए तो मुझे बेहद खुशी होगी. वक्त ने साथ दिया तो मैं पाईपाई चुका दूंगा, क्योंकि जो नुकसान हुआ है, वह आप का ही नहीं, मेरा, हम सब का हुआ है.’

चाइल्ड पोर्नोग्राफी: यौनशोषण की सच्ची दास्तान

तुम्हारा नाम रामभवन है ?’ रामभवन के बांदा स्थित उसके घर पर आने वाले आदमी ने कहा.
‘जी सही जगह आये है आप. किस सिलसिले में हमसे मिलने आये है.‘ रामभवन ने उसको देखते हुये जवाब दिया.
‘मैं सीबीआई की टीम में हॅू. हमारे टीम के लोग बांदा के सरकारी गेस्ट हाउस में रूके है. आपको वहां बयान दर्ज कराने आना है.‘ सीबीआई का सदस्य बताने वाले आदमी ने जब यह कहा तो रामभवन के चेहरे की हवाईयां उडने लगी.
‘बयान…किस तरह का बयान हमें दर्ज कराना है.‘
‘चाइल्ड पोर्नोग्राफी को लेकर एक मुकदमें के सिलसिलें में जांच चल रही है. जिसमें आपके उपर भी आरोप है.‘
‘मेरे उपर आरोप है. पर मैने तो कुछ किया नहीं.‘
‘रामभवन बहुत नासमझ मत बनो. तुम्हारी पेन ड्राइव में बहुत सारी वीडियो क्लिप और फोटो मिली है.‘ बांदा में सिचाई विभाग में कार्यरत जूनियर इंजीनियर रामभवन को इस बात का कोई अंदाजा लग चुका था कि सीबीआई उसके चारों तरफ मकडजाल बुन चुकी है. सीबीआई से आये हुये अफसर के साथ चलने के लिये खडा हुआ. घर के बाहर खडी गाडी में बैठ गया वहां से यह लोग सरकारी गेस्ट हाउस पहंुच गये. रामभवन की निगाह वहां पर अपने ड्राइवर अभय को देखकर रामभवन के दिल की धडकने बढ चुकी थी.
‘यह पेन ड्राइव तुम्हारी ही है‘. सीबीआई के एक अफसर ने रामभवन से पूछा. तो उसने देखा पर कोई जवाब नहीं दिया.
‘…….रामभवन चुप रहने का कोई लाभ नहीं है. एक माह से अधिक का समय हो गया है. सीबीआई की टीम सारे सबूत एकत्र कर चुकी है. विदेशी कई वेबसाइटों पर वह फोटो और वीडियो हमें दिखी जो तुम्हारी पेन ड्राइव में भी मौजूद है. तुम जिस तरह से बच्चों को मोबाइल खेलने के लिये देते हो, उनको उपहार और पैसे देते हो वह भी जानकारी हमारे पास है. तुम्हारे ड्राइवर अभय से हमने पूछताछ कर ली है. यही नहीं सोनभद्र के इंजीनियर नीरज यादव के बेवसाइट पर भी तुम्हारे द्वारा भेजी गई फोटो और वीडियों मिल गये है. अब तुमको पूछतांछ के लिये गिरफ्तार किया जाता है.‘

Ram bhawan

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45 साल के रामभवन को सीबीआई ने अपनी हिरासत में ले लिया. सीबीआई रामभवन को बांदा से आगे की तहकीकात के लिये चित्रकूट लेकर गई. बाद में वापस बांदा की अदालत में रामभवन को पेश किया गया. वहां उसकी पत्नी भी पहंुच चुकी थी. रामभवन तो अपने को बेकसूर बता ही रहा था उसकी पत्नी प्रियावती भी अपने पति को निर्दोष बता रही थी.
सीबीआई ने इसकी पडताल अगस्त-सितम्बर माह से शुरू की थी. सीबीआई टीम को बेल्जियम की एक साइट पर भारतीय बच्चों के पोर्नोग्राफी वीडियों देखने को मिले. इसकी जांच करते करते सीबीआई उत्तर प्रदेश के सोनभद्र और बांदा जिलों तक पहंुच गये. उत्तर प्रदेश के बुन्देलखंड के इस इलाके में गरीबी बहुत है. गरीबी को दूर करने के लिये सरकार ने यहां तमाम योजनाएं भी चला रखी है. इनमें कई विदेशियों की मदद से भी चलते है. कई एनजीओ का यहां आना जाना होता है. पूरे उत्तर प्रदेश में मदद के नाम पर सबसे अधिक पैसा यहां ही आता है.
गरीब लोगों की हालत का लाभ उठाकर उनसे मनचाहा काम भी यहंा करवाया जाता है. कई बार ऐसी खबरे यहां के अखबारों में सुखर््िायां बनती रही है. सीबीआई ने एक माह तक यहां गहरी विवेचना की. इस जांच में सीबीआई को सोनभद्र में रहने वाले इंजीनियर नीरज यादव का पता चला. सबसे पहले सीबीआई ने नीरज यादव को पकडा. यहां पर बांदा में रहने वाले सिचाई विभाग के इंजीनियर राम भवन का भी पता लगा.

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सीबीआई ने रामभवन के करीबी रहने वाले दिनेश को अपने भरोसे में लिया. दिनेश की पहचान छिपाकर सीबीआई ने रामभवन के बारें में पूछताछ की. इस मामले में सीबीआई की सबसे बडी परेशानी यह थी कि यहां कोई वादी मुकदमा नहीं था. सीबीआई अपनी पहल पर ही मुकदमा लिख चुकी थी. रामभवन के करीबी दिनेश की आजकल आपस में बनती नहीं थी. सीबीआई को इसका लाभ मिला और सीबीआई ने दिनेश से कई राज उगलवा लिये. रामभवन के 3 मोबाइल नम्बर, एक पेन ड्राइव सीबीआई को मिल गये. जिसमंे रामभवन के खिलाफ सारा काला चिटठा था. रामभवन के सभी फोन नम्बर उसके अपने पते पर लिये गये थे. रामभवन के खिलाफ पुख्ता सबूत इकठ्ठा करने के बाद सीबीआई ने रामभवन को गिरफ्तार कर लिया.
सीबीआई ने रामभवन को अपर जिला और सत्र न्यायाधीश (पंचम) की अदालत में पेश किया. शासकीय अधिवक्ता मनोज कुमार ने बताया कि रामभवन को रिमांड पर लेकर पूरी जांच की जायेगी. आरोप है कि वह कमजोर वर्ग के बच्चों को अपना निशाना बनाता था. इसमें दिहाडी मजदूरी करने वाले, फुटपाथ पर सामान बेचने वाले और ठेके पर काम करने वाले बच्चे शामिल होते थे. वह उन बच्चों को निशाना बनाता था जिनको कुछ लाभ देकर आसानी से फंसाया जा सके. लडकियों को बुलाने पर लोगों के संदेह का खतरा ज्यादा होता है इस कारण लडको का प्रयोग भी इस धंधे में किया जा रहा था.
देश में बच्चों का यौन शोषण कोई नई बात नहीं है. राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरों (एनसीआरबी) के आंकडे बताते है कि साल 2020 में जारी आंकडों में बताया कि हर रोज 100 से अधिक बच्चों के यौन शोषण मामलों की शिकायत आती है. बच्चों के यौन शोषण में तमाम सख्ती के बाद भी इसमें 22 फीसदी की बृद्वि देखी गई है. कई बार पुलिस को इस बात का पता भी नहीं चलता था कि किस जगह से यह धंधा पनप रहा है.
इसमें शामिल बच्चे बेहद गरीब और दूरदराज के जगहों के होते थे कि उनकी पहचान भी नहीं हो पाती थी. ऐसे में अपराधियों की जड तक पहंुच पाना मुश्किल काम होता था. इस अपराध की जड तक पहंुचने के लिये केन्द्रीय अपराध ब्यूरो यानि सीबीआई ने दिल्ली ‘औनलाइन चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज एंड एक्सप्लायटेशन प्रीवेंशन इंवेस्टीगेशन‘ इकाई का गठन किया. इसका काम चाइल्ड पोर्नोग्राफी के पूरे धंधे को बेनकाब करना था.

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विदेशो में भारतीय पोर्न की डिमांड ज्यादा होती है. असल में विदेशो की पोर्न इंडस्ट्री फिल्मी दुनिया की तरह होती है. जबकि भारत में ऐसे वीडियो चोरी चुपके और लोगों को बहकाकर बनाये जाते है. जो फिल्मी कहानी से नहीं दिखते है. ऐसे में यह सच्चे वीडियों मानकर सबसे ज्यादा पसंद किये जाते है. सीबीआई ने जिस रामभवन को पकडा उसे देखकर कोई नहीं कह सकता कि इतना भोला और सरल दिखने वाला इंसान ऐसी घिनौनी हरकतें भी कर सकता है.
45 साल के रामभवन को उसके आसपास रहने वाले बच्चे ‘जेई अंकल’ के नाम से जानते है. जेई का मतलब जूनियर इंजीनियर होता है. रामभवन बच्चों को अपने घर पर बुलाता था. वो बच्चों को खेलने के लिये मोबाइल फोन दे देता था. बच्चे घंटोघंटो उनके घर पर मोबाइल पर वीडियो गेम्स खेलते रहते थे. ‘जेई अंकल’ के अपना कोई बच्चा नहीं था. पडोसियों को लगता था कि अपने बच्चे ना होने के कारण वह दूसरे बच्चों को लाडप्यार करते थे. रामभवन अपने घर आने वाले बच्चों को उपहार और नकद पैसे भी देते थे. बच्चों के परिजनों को रामभवन बताते थे ‘बच्चे औनलाइन गेम्स खेलते है इसमें जो पैसा मिलता है वह आपको सबको दे देता हॅू.‘ यह बच्चे गरीब परिवारों के होते थे. उनके लिये यह छोटीछोटी मदद भी बडी होती थी.

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‘ंजेई अंकल’ का राज सीबीआई ने खोला और बताया कि वह बच्चों की अश्लील फोटो यानि चाइल्ड पोनोग्राफी का औन लाइन बिजनेस करते थे. इसके बाद भी बच्चों के परिवार यह बात मानने को तैयार नहीं है. बच्चों से जब इस तरह के ‘गंदे काम’ के बारे में पूछा गया तो उन सबने कुछ भी बोलने से इंकार कर दिया. सीबीआई कहती है कि बच्चे और उनके परिवार के लोग पैसे पाने की वजह से खामोश है. इसके अलावा उनको लगता है कि बयान देने के बाद कानूनी दांवपेंच में फंसने से अच्छा है कि पूरे मामले से दूर रहा जाये. रामभवन के आसपास रहने वाले लोग मानते है कि वो सीधे आदमी है उनके फंसाया जा रहा है. रामभवन भी खुद को निर्दोष मानते है. वह कहते है हमें सीबीआई जांच से कोई डर नहीं. सच्चाई सामने आ जायेगी.
रामभवन मूलरूप से खरौंच गांव के देविना का पुरवा का रहने वाला है. उसके पिता चुन्ना कारीगर थे. घर बनाने का काम करते थे. उन्होने अपनी मेहनत ने अपने 3 बेटो का पालन पोषण करके बडा किया और उनको अपने पैरों पर खडा किया. रामभवन होनहार था तो उसकी सरकारी नौकरी लग गई. 2004 में रामभवन की शादी प्रियावती से हुई थी. रामभवन के अपनी कोई औलाद नहीं है. 3 साल पहले हार्ट अटैक से रामभवन के पिता चुन्ना कारीगर की मौत हो गई थी. इसके बाद से रामभवन अपनी पत्नी को साथ रखने लगा. तब से गांव में रहना छूट गया. रामभवन के दोनो भाई राजा और रामप्रकाश बांदा जिले के ही नरैनी-अतर्रा रोड पर अपने परिवारों के साथ रहते है.
रामभवन का काम सिचाई विभाग में जूनियर इंजीनियर के रूप में अर्जुन सहायक परियोजना महोबा और रसिन बांध परियोजना चित्रकूट की देखभाल करने का था. बांदा, महोबा और हमीरपुर के जिलों में ही उसकी नौकरी का ज्यादातर समय बीता था. इस कारण पूरे इलाके में उसकी मजबूत पकड थी. 2009-10 में रामभवन की तैनाती कर्वी में हुई थी. रामभवन काफी मिलनसार और सरल स्वभाव का दिखता था. उसका अपने साथ काम करने वालों और पडोसियों से अच्छा व्यवहार था. रामभवन करीब 10 साल से चित्रकूट में तैनात था.

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सिचाई विभाग कार्यालय के सामने ही कपसेठी गांव में किराये का मकान लेकर वह रहता था. रामभवन को नौकरी के षुरूआती दिनों में सिचाई विभाग कालोनी में ही रहने के लिये सरकारी आवास मिल गया था. इसके बाद भी वह कभी कालोनी के मकान में नहीं रहा. चित्रकूट में नौकरी के दिनों में सिकरी गांव के रहने वाले कुक्कू सिंह के यहां किराये का मकान लेकर रहता था. कुछ ही दिनों के बाद पडोसियों ने कुक्कू सिंह से षिकायत की थी कि रामभवन के घर में अनजान लोगों को आना जाना होता है. रामभवन ने खाना बनाने के लिये एक महिला को नौकरानी की तरह से रखा था. उसकी दो बेटियां भी यहां आतीजाती रहती थी. इस शिकायत के कुछ दिन बाद रामभवन ने यह मकान खाली कर दिया था.
दोबारा इसके खिलाफ 2012 में शिकायत हुई थी जब उसके पास रहने वाली एक किशोर उम्र की लडकी ने आत्महत्या कर ली थी. आरोप था कि रामभवन ने लडकी का यौन शोषण किया था. जिसके कारण लडकी ने आत्महत्या कर ली थी. चित्रकूट के लोग बताते है कि रामभवन उस मामले में बच गया क्योकि लडकी के घर परिवार वाले गरीब थे. रामभवन ने पानी की तरह से पैसा बहाकर अपने का बचाने में सफलता हासिल कर ली थी. रामभवन के कारनामों पर पर्दा पडा रहा. 2 नवंबर 2020 को रामभवन का नाम चर्चा में आया.
सीबीआई ने अनपरा सोनभद्र निवासी इंजीनियर नीरज यादव को पकडा. नीरज बीटेक करने के बाद दिल्ली की एक कंपनी में नौकरी करता था. लौकडाउन के दौरान नीरज की नौकरी छूट गई थी. त बवह सोनभद्र आकर रहने लगा. सोषल मीडिया पर उसने पोनोग्राफी के कुछ वीडियो लोड किये थे. वहां से सीबीआई को रामभवन का नाम मिला. सीबीआई ने 25 सितंबर 2020 को सबसे पहले नीरज यादव को पकडा उसके बाद 15 नवम्बर 2020 को रामभवन को पकडा. सिचाई विभाग के जूनियर इजीनियर का नाम यौन शोषण मामले में आने के बाद उत्तर प्रदेश सरकार के सिचाई और जल मंत्री डाक्टर महेन्द्र सिंह ने उनको निलंबित कर कठोरतम कारवाई करने के निर्देष दिये.
सीबीआई को रामभवन के पास से बच्चों के साथ यौन षोषण के 66 वीडियो, 600 से अधिक फोटो, सेक्स टाॅय, बच्चों से संबंधित अश्लील सामाग्री और 8 लाख रूपये बरामद हुये. बरामद हुये. इसमें 50 बच्चों का शामिल होना बताया जाता है. इन बच्चों की उम्र 5 से 15 साल के आसपास मानी जा रही है. यह सभी बच्चे हमीरपुर, चित्रकूट और बांदा के आसपास के रहने वाले माने जा रहे है. रामभवन इनके साथ अश्लील वीडियो बनाकर विदेशो मेे रहने वालों को बेच देता था. सीबीआई ने पाया कि रामभवन ‘डार्कवेब’ नामक वेबसाइट के जरीये यह काम करता था.
‘डार्कवेब’ इंटरनेट का बेहद जटिल स्वरूप है. डेनमार्क, कनाडा, स्वीडन और आयरलैंड जैसे देषों में इसकी जडे पाई गई है. यहां के इंटरनेट सर्वर के जरीये ‘डार्कवेब’ का संचालन होता है. यहां के आईपी एड्रेस का पता भी जल्दी नहीं लग पाता है. ‘डार्कवेब’ के जरीये केवल पोर्नोग्राफी ही नहीं मादक पदार्थो और अवैध असलहों की भी खरीद फरोख्त होती है. ‘डार्कवेब’ का सर्च इंजन कहीं नजर नहीं आता है. इस कारण ही इसको डीपनेट भी कहा जाता है. रामभवन को इसके संचालन की जानकारी कैसे हुई यह बडा सवाल है ?

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सीबीआई के सूत्र मानते है कि अनपरा के रहने वाले इंजीनियर नीरज यादव से रामभवन को यह जानकारी मिली हो. वीडियों बनाने का काम रामभवन करता हो और इसको ‘डार्कवेब’ तक ले जाने का काम नीरज यादव करता हो. नीरज यादव दिल्ली में रहने के दौरान किसी ऐसे चाइल्ड पोनोग्राफी रैकेट के संपर्क में आया होगा. जिसके बाद वह और रामभवन मिलकर यह काम करने लगे हो. सीबीआई रामभवन को रिमांड पर लेकर इन सवालों के जबाव तलाशने काम कर रही है. सीबीआई कां जाच में यह पता चला कि रामभवन 5 साल से 15 साल आयु वर्ग के बच्चों को अपने जाल में फंसा उनकी अश्लील वीडियों बना लेता था. इसके आधार पर बच्चों का यौन शोषण करता था.
‘डार्कवेब’ नामक वेबसाइट के संपर्क में आने के बाद रामभवन इन वीडियो को विदेशो में बेचने का काम भी करने लगा था. उसको जो पैसे मिलते थे वह बच्चों को भी देता था. बच्चों के घर वालों को बताता था कि बच्चे औनलाइन गेम्स में यह पैसा जीतते है. बच्चों को पैसे और उपहार देने से उसके खिलाफ कोई बोलने को तैयार नहीं है. रामभवन बच्चांे की इसी मजबूरी का लाभ उठाकर वीडियों बनाता था. रामभवन को पता नहीं था कि बुरे काम का बुरा नतीजा होता है. कभी न कभी अपराध सामने खुलकर आ ही जाता है.
भारत में इन्टरनेट पर अश्लील और आपत्तिजनक तस्वीर या कोई अश्लील फिल्म देखना और बनाना दोनों ही अपराध माने जाते है. इसके बाद भी यहां पर बडी संख्या में अवैध तरीके से ऐसे फोटो और वीडियों तैयार होते है. विदेषों में इनकी डिमांड ज्यादा है. साइबर क्राइम में सबसे अधिक मामले अष्लीलता के दर्ज हो रहे है. कई अपराधिक मामलों में ऐसे वीडियो अपराधियों के गले की फांस भी बन जाते है. भारत में देषी और विदेषी दोनो ही तरह के सेक्सी वीडियो सबसे अधिक देखी जाती है. भारत में 49 प्रतिशत लोग चोरी से पोर्न देखते है. 17 प्रतिषत लोग इस तरह की विडियो नियमित देखते है. भारत में 70 प्रतिषत पोर्न इंटरनेट मीडिया से आता है. भारत में सबसे ज्यादा पोर्न मोबाइल फोन पर देखी जाती है. भारत में अब तेजी से ऐसे वीडियो बनने लगे है. कुछ दिन पहले दिल्ली के स्कूल में पढने वाली लड़की का लगभग 2 मिनट की अश्लील वीडियो चर्चा में आया था. दिल्ली के चैक मेट्रो स्टेशन पर एलसीडी में इस तरह की सेक्स विडियो दिखने लगी थी.
बहुत सारे ऐसे मामले भी आये जिसमें लडके अपने साथियों के वीडियों और फोटो लेते पकडे गये थे. कई बार परेशन लडके लडकियों ने आत्महत्या जैसे कदम भी उठाये थे. कई मशहूर हस्तियों के वीडियो एडिट करके भी बनाने की घटनायें भी सामने आई. इंटरनेट कुछ ही सालों में पोर्न साईट देखने का सबसे बडा साधन बन गया. इसका व्यापार दिन पर दिन बढ़ रहा है. सेक्स से जुडी तमाम तरह की देशी और विदेशी वीडियो इंटरनेट पर मिलने लगी है. ऐसे में वीडियों बनाने का धंधा भी तेजी से फैल रहा है. देह का धंधा करने वाले गिरोह इंटरनेट पर अश्लील चैटिंग और सेक्स वीडियो का कारोबार कर रहे है. इनके जरीये देह धंधे के ग्राहक भी तलाशे जाते है. कई इंटरनेट साइड इस काम में लगी है. इसकी आड में तमाम तरह के फ्राड भी होते है.

“प्रेमिका” को प्रताड़ना, “प्रेमी” की क्रूरता!

छत्तीसगढ़ के जिला कोरिया की पुलिस ने को 8 वर्षीय बालक के अपहरण व हत्या की गुत्थी को सुलझाते हुए मासूम के शव को बरामद कर 23 वर्षीय आरोपी सहित उसके सहयोगी तीन नाबालिग साथियों को भी गिरफ्तार कर लिया है.

कोरिया पुलिस अधीक्षक चन्द्र मोहन सिंह ने हमारे संवाददाता को बताया कि प्रार्थी राकेश चौधरी ने रिपोर्ट दर्ज कराई कि उसका नाबालिक पुत्र ऋषि चौधरी उर्फ चरका उम्र 8 वर्ष 13 नवम्बर की शाम 6 बजे से लापता है और उसे शंका है कि उसके नाबालिक पुत्र को किसी व्यक्ति के द्वारा उसके घर से अपहृत कर ले जाया गया है.

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प्रार्थी की रिपोर्ट पर थाना झगराखाण्ड में अपराध पंजीबद्ध कर विवेचना में लिया गया. पुलिस अधीक्षक कोरिया चंद्रमोहन सिंह के द्वारा मामले की गभीरता को देखते हुए एवं अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक कोरिया डॉ . पंकज शुक्ला के दिशा निर्देशन व पुलिस अनुविभागीय अधिकारी मनेन्द्रगढ़ कर्ण उईके के नेतृत्व में थाना प्रभारी विजय सिंह , थाना प्रभारी मनेन्द्रगढ़ सचिन सिंह , खोगापानी प्रभारी तथा चौकी प्रभारी कोड़ा का अलग – अलग टीम का गठन कर स्वयं पुलिस अधीक्षक चंद्रमोहन सिंह द्वारा घटना स्थल पहुंच घटना स्थल का निरीक्षण किया जाकर पता साजी हेतु निर्देशित किया. पुलिस ने जब विवेचना प्रारंभ की तो आगे चलकर जो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए वह अपने आप में दर्दनाक कहानी को समेटे हुए है.
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लीलावती को पाने किया अपराध
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खोजबीन के पश्चात कोरिया पुलिस के हाथ लगे आरोपी बबलू यादव ने बताया कि मृतक बालक की मां लीलावती से उसका प्रेम संबंध था. लीलावती को अपने साथ भगाकर ले गया था , वह उसे बहुत प्यार करने लगा था लेकिन बाद में लीलावती उसके साथ रहने से मना करने लगी.वह उसे छोड़कर अपने पति एवं बच्चे के पास जाना चाहती थी. कुछ समय से उसे छोड़ कर वापस मायके में रह रही थी और पति से उसके समझौते के आसार थे ,जो आरोपी बबलू यादव को नागवार गुजर रहा था। परेशान प्रेमी बबलू ने ऐसे में यह योजना बनाई की क्यों ना उसके मासूम पुत्र को अपहरण करके उसे प्रताड़ित किया जाए. मासूम ऋषि का अपहरण करके प्रेमी बबलू यादव एक तीर से दो निशाने लगाने की कोशिश कर रहा था. वह यह मान रहा था कि अपहरण करके कुछ दिनों में ऋषि को लौटा देगा, जिससे प्रेमिका उस पर प्रसन्न हो कर उसकी हो जाएगी. मगर परिस्थितियां कुछ ऐसी बनी की अपहरण के बाद उसे लगने लगा कि ऋषि को मार देने से उसका काम और आसान बन सकता है.

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इस बीच लीलावती के पति तक वह चालाकी पूर्वक यह खबर भेजवा रहा था कि उसकी पत्नि बबलू से बात करती है मगर उसकी चालाकी नहीं चल रही थी. लीलावती का पति समझौता करके पत्नि को घर लाने के लिए तैयार हो गया था. परिणाम स्वरूप बबलू यादव ने प्रेमिका के परिवार से बदला लेने का मन बना लिया और मासूम बालक एवं उसके भाई को अपने पास मोबाईल दिखाने के लिए बुलाता रहा. मृतक के चाचा के लड़के नाबालिक बालक को पैसे का लालच देकर उसको अपने पास बुलाता रहा एवं अपचारी बालक को अपहृत बालक को लाने के प्रेरित किया. नाबालिक के द्वारा ऋषि को लाया गया तब आरोपी उसे अपनी मोटर साईकल से बैठाकर अपने ईटा भट्ठा ले गया और नाबालिक बालक के साथ मिल कर पानी में डाल कर उसकी डूबा कर हत्या कर दी. यही नहीं वहां बने नाली में लाश को डाल कर घास एवं मिट्टी से ढक दिया. परंतु बाद में आरोपी बबलू यादव को यह भय सताने लगा था कि नाबालिक बालक किसी को बता देगा. इस डर से दूसरे दिन 14 नवंबर को दो नाबालिग दोस्तों को बुलाया और मृत ऋषि की लाश को सीमेंट के बोरे में ले, सहवानी टोला मशकूर के तलाब के पास नीम पेड़ के नीचे, तीनों ने मिल कर गड्डा खोद, बोरा सहित शव को दफन कर दिया.

पुलिस ने आरोपी की निशानदेही पर कार्यपालिक दण्डाधिकारी की उपस्थिति में शव को बरामद कर पंचनामा कार्यवाही की. आरोपी बबलू यादव आ.अजय यादव उर्फ मुन्ना उम्र 23 एवं अन्य तीनो नाबालिको को भी गिरफ्तार किया गया है . आरोपी बबलू ने मासूम मृतक के शव को जहां पहले दफनाया था, किसी को शक न हो सोच कर वहां एक सुअर मार कर फेंक दिया था जिससे कि पुलिस को गुमराह किया जा सकें . मगर पुलिस की सतर्कता से अंततः आरोपी पकड़ा गया मगर एक बार फिर यह सच्चाई बता गया कि जर जोरू और जमीन का मामला कब कैसा विभत्स रूप लेगा, यह कोई नहीं जानता.

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