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Serial Story वसीयत- आखिर सीमा और जेम्स वारन के बीच क्या रिश्ता था

Serial Story वसीयत- आखिर सीमा और जेम्स वारन के बीच क्या रिश्ता था : भाग 2

‘यह सबकुछ सुन कर मैं धम्म से सोफे पर धंस गया तो विलियम मेरा आशय समझ मुसकरा कर कहने लगा, कि ‘डैडी, आप अकेले हो जाएंगे, इसलिए हम दोनों यह प्रस्ताव अस्वीकार कर देते हैं. वैसे तो यहां भी सबकुछ है.

‘मैं ने अपनेआप को संभाला और कहा कि वाह, मेरा बेटा और बहू इतने बड़े पद पर जा रहे हैं तो मेरे लिए यह गर्व की बात है. सच, मुझे इस से बड़ी खुशी क्या होगी?

‘जाने की तैयारियां होने लगीं. दिन तो बीत जाता पर रात में नींद न आती. कभी विलियम और जैनी तो कभी जार्ज के स्वास्थ्य की चिंता बनी रहती.

‘वह दिन भी आ गया जब लंदन एअरपोर्ट पर विलियम, जैनी और जार्ज को विदा कर भीगे मन से घर वापस लौटना पड़ा. विलियम और जैनी ने जातेजाते भी अपने वादे की पुष्टि की कि वे हर सप्ताह फोन करते रहेंगे और मुझ से आग्रह किया कि मैं उन से मिलने के लिए आस्टे्रलिया अवश्य आऊं. वे टिकट भेज देंगे.

‘मन में उमड़ते हुए उद्गार मेरे आंसुओं को संभाल न पाए. जार्ज को बारबार चूमा. एअरपोर्ट से बाहर आने के बाद वापस घर लौटने के लिए दिल ही नहीं करता था. कार को दिन भर दिशाहीन घुमाता रहा. शाम को घर लौटना ही पड़ा. सामने जार्ज की दूध की बोतल पड़ी थी. उठा कर सीने से चिपका ली और ऐथल की तसवीर के सामने फूटफूट कर रोया.

‘चार दिन बाद फोन की घंटी बजी तो दौड़ कर रिसीवर उठाया, ‘हैलो डैडी,’ यह स्वर सुनने के लिए कब से बेचैन था. मैं भर्राए स्वर में बोला, ‘तुम सब ठीक हो न, जार्ज अपने दादा को याद करता है कि नहीं?’ जैनी से भी बात की और यह जान कर दिल को बड़ा सुकून हुआ कि वे सब स्वस्थ और कुशलपूर्वक हैं.

‘विलियम ने टेलीफोन को जार्ज के मुंह के आगे कर दिया तो उस की ‘आउं आउं’ की आवाज ने कानों में अमृत सा घोल दिया. थोड़ी देर बाद फोन पर आवाजें बंद हो गईं.

‘3 महीने तक उन के टेलीफोन लगातार आते रहे, फिर यह गति धीमी हो गई. मैं फोन करता तो कभी विलियम कह देता कि दरवाजे पर कोई घंटी दे रहा है और फोन काट देता. बातचीत शीघ्र ही समाप्त हो जाती. 6 महीने इसी तरह बीत गए. कोई फोन नहीं आया तो घबराहट होने लगी.

‘एक दिन मैं ने फोन किया तो पता लगा कि वे लोग अब सिडनी चले गए हैं. यह भी कहने पर कि मैं उस का पिता हूं, नए किराएदार ने उस का पता नहीं दिया. उस की कंपनी को फोन किया तो पता चला कि उस ने कंपनी की नौकरी छोड़ दी थी. यह जान कर तो मेरी चिंता और भी बढ़ गई थी.

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‘मेरा एक मित्र आर्थर छुट्टियां मनाने 3 सप्ताह के लिए आस्ट्रेलिया जा रहा था. मैं ने अपनी समस्या उसे बताई तो बोला कि वह 2 दिन सिडनी में रहेगा और यदि विलियम का पता कहीं मिल गया तो मुझे फोन कर के बता देगा. पर आर्थर का फोन नहीं आया. 3 सप्ताह की अंधेरी रातें अंधेरी ही रहीं.

‘3 सप्ताह के बाद जब आर्थर आस्टे्रलिया से वापस आया तो आशा दुख भरी निराशा में बदल गई. विलियम और जैनी उसे एक रेस्तरां में मिले थे किंतु वे किसी आवश्यक कार्य के कारण जल्दी में उसे अपना पता, टेलीफोन नंबर यह कह कर नहीं दे पाए कि शाम को डैडी को फोन कर के नया पता आदि बता देंगे.

‘उस के फोन की आस में अब हर शाम टेलीफोन के पास बैठ कर ही गुजरती है. जिस घंटी की आवाज सुनने के लिए इन 6 सालों से बेजार हूं वह घंटी कभी नहीं सुनी. हो सकता है कि उसे डर लगता हो कि कहीं बाप आस्टे्रलिया न धमक जाए.’

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जेम्स ने एक लंबी सांस ली. मुझ से पता पूछा तो मैं ने जेब से अपना विजिटिंग कार्ड निकाल कर दे दिया और बोला, ‘मिस्टर जेम्स, किसी भी समय मेरी जरूरत हो तो अब बिना किसी झिझक के मुझे फोन कर देना. आइए, मैं आप को आप के घर छोड़ देता हूं. मेरी कार बराबर की गली में खड़ी है.’

‘धन्यवाद, मैं पैदल ही जाऊंगा क्योंकि इस प्रकार मेरा व्यायाम भी हो जाता है.’

घर आने पर देखा तो डाक में कुछ चिट्ठियां पड़ी थीं. मैं ने कोर्बी टाउन के एक स्कूल में गणित विभाग के अध्यक्ष पद के लिए साक्षात्कार दिया था. पत्र खोला तो पता चला कि मुझे नियुक्त कर लिया गया है.

नए स्कूल के लिए मैं ने अपनी स्वीकृति भेज दी. जाने में केवल एक सप्ताह शेष था. जाते हुए जेम्स से विदा लेने के लिए उस के मकान पर गया पर वह वहां नहीं था. पड़ोसी से पता लगा कि वह अस्पताल में भरती है. इतना समय नहीं था कि अस्पताल जा कर उस का हाल देख लूं.

एक दिन की मुलाकात मस्तिष्क की चेतना पर अधिक समय नहीं टिकी. समय के साथ मैं जेम्स को बिलकुल भूल गया.

वकील के पत्रानुसार नियत समय पर जेम्स के घर पर पहुंच गया. उसी दरवाजे पर घंटी का बटन दबाया जहां से 30 साल पहले जेम्स से मिले बिना ही लौटना पड़ा था. आज बड़ा विचित्र सा लग रहा था. लगभग 45 वर्षीय एक व्यक्ति ने दरवाजा खोला.

Serial Story वसीयत- आखिर सीमा और जेम्स वारन के बीच क्या रिश्ता था : भाग 3

मैं ने अपना और सीमा का परिचय दिया तो वकील ने भी अपना परिचय दे कर हमें अंदर ले जा कर एक सोफे पर बैठा दिया. वहां 3 पुरुष और 1 महिला पहले ही मौजूद थे. तीनों ही अंगरेज थे.

मार्टिन ने हम सब का परिचय कराया. एक सज्जन आर.एस.पी.सी.ए. (दि रायल सोसाइटी फार दि प्रिवेंशन आफ क्रूएल्टी टु ऐनिमल्स) का प्रतिनिधित्व कर रहे थे. अन्य 3, विलियम वारन (जेम्स वारन का पुत्र), उस की पत्नी जैनी वारन तथा जेम्स का पौत्र जार्ज वारन थे, जो आस्टे्रलिया से आए थे.

बाईं ओर छोटे से नर्म गद्दीदार गोल बिस्तर में एक बड़ी प्यारी सी काली और सफेद रंग की बिल्ली कुंडली के आकार में सोई पड़ी थी, जिस का नाम ‘विलमा’ बताया गया.

मार्टिन ने अपनी फाइल से वसीयत के कागज निकाल कर पढ़ने शुरू किए. अपनी संपत्ति के वितरण के बारे में कुछ कहने से पहले जेम्स ने अपनी सिसकती वेदना का चित्रण इन शब्दों में किया था:

‘लगभग 4 दशक पहले मेरे अपने बेटे विलियम और उस की पत्नी जैनी ने लंदन छोड़ कर मुझे मेरे हाल पर छोड़ दिया. मैं फोन पर अपने पोते और इन दोनों की आवाज सुनने को तरस गया. मैं फोन करता तो शीघ्र ही किसी बहाने से काट देते और एक दिन इस फोन ने मौन धारण कर यह सहारा भी छीन लिया. किसी कारण स्थानांतरण होने पर बेटे ने मुझे अपने नए पते या टेलीफोन नंबर की सूचना तक नहीं दी. मैं इस अकेलेपन के कारण तड़पता रहा. कोई बात करने वाला नहीं था. कौन बात करेगा, जिस का अपना ही खून सफेद हो गया हो.

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‘6 साल जीभ बिना हिले पड़ीपड़ी बेजान हो गई थी कि एक दिन एक भारतीय सज्जन राकेश वर्मा ने पार्क में मेरी इस मौन व्यथा को देखा और समझा. मेरे उमड़ते हुए उद्गारों को इस अनजान आदमी ने पहचाना. विडंबना यह रही कि वह भी व्यक्तिगत कारणों से लंदन से दूर चले गए.

‘राकेश वर्मा के साथ एक दिन की भेंट मेरे सारे जीवन की धरोहर बन यादों में सुकून देती रही. फिर इस भयावह अकेलेपन ने धीरेधीरे भयानक रूप ले लिया. आयु और शारीरिक रोगों के अलावा मानसिक अवसाद ने भी मुझे घेर लिया.

‘इस अभिशप्त जीवन में आशा की एक लहर मेरे मकान के बाग में न जाने कहां से एक बिल्ली के रूप में आ गई. कौन जाने इस का मालिक भी देश छोड़ गया हो और इसे भी इस के भाग्य पर मेरी तरह ही अकेला छोड़ गया हो. बिल्ली को मैं ने एक नाम दिया ‘विलमा.’

‘2-3 दिनों में विलमा और मैं ऐसे घुलमिल गए जैसे बचपन से हम दोनों साथ रहे हों. मैं उसे अपनी कहानी सुनाता और वह ‘मियाऊंमियाऊं’ की भाषा में हर बात का उत्तर देती. मुझे ऐसा लगता जैसे मैं नन्हें जार्ज से बात कर रहा हूं.

‘एक दिन वह जब बाहर गई और रात को वापस नहीं लौटी तो मैं बहुत रोया, ठीक उसी तरह जैसे जार्ज, विलियम और जैनी को छोड़ने के बाद दिल की पीड़ा को मिटाने के लिए रोया था. मैं रात भर विलमा की राह देखता रहा. अगले दिन वह वापस आ गई. बस, यही अंतर था विलमा और विलियम में जो वापस नहीं लौटा.

‘विलमा के संग रहने से मेरे मानसिक अवसाद में इतना सुधार हुआ जो अच्छी से अच्छी दवाओं से नहीं हो पाया था. उस ने मुझे एक नया जीवन दिया. वह कब क्या चाहती है, मैं हर बात समझ लेता था. यह सब वर्णन से बाहर है, केवल अनुभूति ही हो सकती है.’

विलियम, जैनी और जार्ज, तीनों के चेहरों पर उतारचढ़ाव कभी रोष तो कभी पश्चात्ताप के लक्षणों का स्पष्टीकरण कर रहे थे.

जेम्स ने अपनी वसीयत में मुख्य रूप से कहा था कि मेरी सारी चल और अचल संपत्ति में से समस्त टैक्स तथा हर प्रकार के वैध खर्च, बिल आदि देने के बाद शेष बची रकम का इस प्रकार वितरण किया जाए :

‘मिस्टर राकेश वर्मा, जिन का पुराना पता था : 23 रैले ड्राइव, वैटस्टोन, लंदन एन 20, को 2 हजार पौंड दिए जाएं और उन से मेरी ओर से विनम्रतापूर्वक कहा जाए कि यह राशि उन के उस एक दिन का मूल्य न समझा जाए जिस के कारण मेरे जीवन के मापदंड ही बदल गए थे. उन अमूल्य क्षणों का मूल्य तो चुकाने की सामर्थ्य किसी के भी पास न होगी. यह क्षुद्र रकम तो मेरे उद्गारों का केवल टोकन भर है.

‘मेरे उक्त वक्तव्य से, स्पष्ट है कि विलियम वारन, जैनी वारन या जार्ज वारन इस संपत्ति के उत्तराधिकारी होने के अयोग्य हैं.’

वकील कहतेकहते कुछ क्षणों के लिए रुक गया. विलियम, जैनी और जार्ज की मुखाकृति पर एक के बाद एक भाव आजा रहे थे. वे कभी आंखें नीची करते हुए दांत पीसते तो कभी अपने कठोर व्यवहार का पश्चात्ताप करते.

विलियम अपने क्रोध को वश में न रख सका और खड़े हो कर सामने रखी मेज पर जोर से हाथ मार कर जाने को खड़ा हो गया तो जैनी ने उसे समझाबुझा कर बैठा लिया.

वकील ने पुन: वसीयत पढ़नी शुरू की तो यह जान कर सभी आश्चर्यचकित हो गए कि शेष समस्त संपत्ति ‘विलमा’ बिल्ली के नाम कर दी गई थी और साथ ही कहा गया था कि आर.एस.पी.सी.ए. को ‘विलमा’ के शेष जीवन के पालनपोषण का अधिकार दिया जाए और इसी संस्था को प्रबंधक नियुक्त किया जाए. साथ ही एक सूची थी जिस में ‘विलमा’ को जेम्स किस प्रकार रखता था, उस का पूरा वर्णन था. आगे लिखा था, ‘विलमा के निधन पर उस का एक स्मारक बनाया जाए. उस के बाद शेष धन को राह भटके हुए, प्रताडि़त पशुओं की दशा सुधारने पर व्यय किया जाए.’

मैं ने मार्टिन से कहा, ‘‘यदि आप अनुमति दें तो ये 2 हजार पौंड, जो वसीयत के अनुसार जेम्स वारन मुझे दे रहे हैं, इस राशि को भी ‘विलमा’ की वसीयत की राशि में ही मिला दें तो मुझे हार्दिक सुख मिलेगा.’’

वकील ने कहा, ‘‘इस को विधिवत बनाने में थोड़ी अड़चन आ सकती है. हां, इसी राशि का एक चैकआर.एस.पी.सी.ए. को अपनी इच्छानुसार देना अधिक सुगम होगा.’’

अंत में औपचारिक शब्दों के साथ मार्टिन ने वसीयत बंद कर बैग में रख ली. बिल्ली, जो अभी भी सारी काररवाई से अनजान सोई हुई थी, आर.एस.पी.सी.ए. के प्रतिनिधि को सौंप दी गई. इस प्रकार वकील का भी प्रतिदिन ‘विलमा’ की देखरेख का भार समाप्त हो गया. सब मकान से बाहर आ गए.

मैं ने सीमा से कहा कि मैं तुम्हें उस मकान पर ले चलता हूं जहां लंदन में विवाह से पहले मैं रहता था. कार 10 मिनट में 23 रैले ड्राइव के सामने पहुंच गई. कार एक ओर खड़ी की और न जाने क्यों बिना सोचेसमझे ही उंगली उस मकान की घंटी के बटन पर दबा दी.

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एक अंगरेज वृद्ध ने छोटे से कुत्ते के साथ दरवाजा खोला. कुत्ते ने भौंकना शुरू कर दिया. मैं ने उस वृद्ध को बताया कि लगभग 30 वर्ष पहले मैं इस मकान में किराएदार था. बस, इधर से गुजर रहा था तो पुरानी याद आ गई…इस से पहले कि मैं आगे कुछ कहता, बूढ़े ने बड़े रूखेपन से कहना शुरू कर दिया.

‘‘यदि तुम इस मकान को खरीदने के विचार से आए हो तो वापस चले जाओ. इन दीवारों में केरी और चार्ल्स की यादें बसी हुई हैं. चार्ल्स की मां, मेरी पत्नी तो मुझे कब की छोड़ गई…चार्ल्स अमेरिका से एक दिन अवश्य आएगा… हां, कहीं उस का फोन न आ जाए?’’

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इतना कहतेकहते उस ने दरवाजा बंद कर लिया. अंदर से कुत्ता अभी भी भौंक रहा था. सीमा की नजर दरवाजे पर अटकी हुई थी. कह रही थी.

Serial Story वसीयत- आखिर सीमा और जेम्स वारन के बीच क्या रिश्ता था : भाग 1

दरवाजा खोला तो पोस्टमैन ने सीमा के हाथ में चिट्ठी दे कर दस्तखत करने को कहा.

‘‘किस की चिट्ठी है?’’ मैं ने बैठेबैठे ही पूछा.

चिट्ठी देख कर सीमा ठिठक गई और आश्चर्य से बोली, ‘‘किसी सौलिसिटर की है. लिफाफे पर भेजने वाले का नाम ‘जौन मार्र्टिन-सौलिसिटर्स’ लिखा है.’’

यह सुनते ही मैं ने चाय का प्याला होंठों तक पहुंचने से पहले ही मेज पर रख दिया. इंगलैंड में मैं वैध रूप से आया था और 65 वर्ष की आयु में वकील का पत्र देख कर दिल को कुछ घबराहट सी होने लगी थी. उत्सुकता और भय का भाव लिए पत्र खोला तो लिखा था.

‘‘जेम्स वारन, 30 डार्बी एवेन्यू, लंदन निवासी का 85 वर्ष की आयु में 28 नवंबर, 2004 को देहांत हो गया. उस की वसीयत में अन्य लोगों के साथ आप का भी नाम है. जेम्स की वसीयत 15 दिसंबर, 2004 को 3 बजे जेम्स वारन के निवास पर पढ़ी जाएगी. आप से अनुरोध है कि आप निर्धारित तिथि पर वहां पधारें या आफिस के पते पर टेलीफोन द्वारा सूचित करें.’’

‘‘यह जेम्स वारन कौन है?’’ सीमा ने उत्सुकता से कहा, ‘‘मेरे सामने तो आप ने कभी भी इस व्यक्ति का कोई जिक्र नहीं किया.’’

मैं जैसे किसी पुराने टाइमजोन में पहुंच गया. चाय का एक घूंट पीते हुए मैं ने सीमा को बताना शुरू किया.

उस समय मैं अविवाहित था और लंदन में रहता था. मैं कभीकभी 2 मील की दूरी पर स्थित एवेन्यू पार्क में जाता था. वहां एक अंगरेज वृद्ध जिस की उम्र लगभग 55-60 की होगी, बैंच पर अकेला बैठा रहता और वहां से गुजरने वाले हर व्यक्ति को हंस कर ‘गुडमार्निंग’ या ‘गुड डे’ इस अंदाज में कह कर अभिवादन करता, मानो कुछ कहना चाहता हो.

इंगलैंड में धूप खिलीखिली हो तो कौन उस बूढ़े की ऊलजलूल बातों में समय गंवाए? यह सोच कर लोग उसे नजरअंदाज कर चले जाते और वह बैंच पर अकेला बैठा होता था. मैं भी औरों की तरह अकसर आंखें नीची किए कतरा कर चला जाता था.

हर रोज अंधेरा शुरू होने से पहले बूढ़ा अपनी जगह से उठता और धीरेधीरे चल देता. मैं कभी अनायास ही पीछे मुड़ कर देखता तो हाथ हिला कर वह ‘हैलो’  कह कर मुसकरा देता. मैं भी उसी प्रकार उत्तर दे कर चला जाता.

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यह क्रम चलता रहा. एक दिन रात को ठीक से नींद नहीं आई तो विचारों के क्रम में बारबार बूढे़ की आकृति सामने आती रही, फिर नींद लगी तो देर से सो कर उठा. सामान्य कार्यों के बाद कुछ भोजन कर कपड़े बदले और पार्क जा पहुंचा.

देखा तो बूढ़ा उसी बैंच पर मुंह नीचे किए बैठा हुआ था. इस बार कतराने के बजाय मैं ने उस से कहा, ‘हैलो, जेंटिलमैन.’

बूढ़े ने मुंह ऊपर उठाया. उस की नजरें कुछ क्षणों के लिए मेरे चेहरे पर अटक गईं. फिर एकदम से उस की आंखों में चमक सी आ गई. वह बड़े उल्लास- पूर्वक बोला, ‘हैलो, सर. आप मेरे पास बैठेंगे क्या?’

मैं उसी बैंच पर उस के पास बैठ गया. बूढ़े ने मुझ से हाथ मिलाया, जैसे कई वर्षों के बाद कोई अपना मिला हो. मैं ने पूछा, ‘आप कैसे हैं?’

जब भी 2 व्यक्ति मिलते हैं तो यह एक ऐसा वाक्य है जो स्वत: ही मुख से निकल जाता है. कुछ देर मौन ने हम को अलग रखा था पर मैं ने ही फिर पूछा, ‘आसपास में ही रहते हैं?’

मेरे इस सवाल पर ही उस ने बिना झिझक के कहना शुरू कर दिया, ‘मेरा नाम जेम्स वारन है. 30 डार्बी एवेन्यू, फिंचले में अकेला ही रहता हूं.’

मैं ने कहा, ‘मिस्टर वारन…नहीं, नहीं…जेम्स.’

‘आप मुझे जेम्स कह कर ही पुकारें तो मुझे अच्छा लगेगा,’ जेम्स ने मेरी बात पूरी होने से पहले ही कह दिया.

मैं जानता था कि जेम्स वारन के पास कहने को बहुत कुछ है, जिसे उस ने अपने अंदर दबा कर रखा है क्योंकि कोई सुनने वाला नहीं है. उस के अचेतन मन में पड़ी हुई पुरानी यादें चेतना पर आने के लिए जाने कब से संघर्ष कर रही होंगी किंतु किस के पास इस बूढ़े की दास्तान सुनने के लिए समय है?

जेम्स ने एक आह सी भरी और कहना शुरू किया.

‘मैं अकेला हूं और 4 बेडरूम के मकान की भांयभांय करती दीवारों से पागलों की तरह बातें करता रहता हूं.’

इतना कह कर जेम्स ने चश्मे को उतारा और उसे साफ कर के दोबारा बोलना शुरू किया.

‘ऐथल, यानी मेरी पत्नी, केवल सुंदर ही नहीं, स्वभाव से भी बहुत अच्छी थी. हम दोनों एकदूसरे की सुनते थे. उस के साथ दुख का आभास ही नहीं होता था तो दुख की पहचान कैसे होती?

‘एक दिन पत्नी ने मुझे जो बताया उसे सुन कर मैं फूला न समाया. पिता बनने की खबर ने मुझे ऐसे हवाई सिंहासन पर बैठा दिया जैसे एक बड़ा साम्राज्य मेरे अधीन हो. मेरी मां ने दादी बनने की खुशी में घर पर परिचितों को बुला कर पार्टी दे डाली. इसी तरह 8 महीने आनंद से बीत गए. ऐथल ने अपने आफिस से अवकाश ले लिया था. मैं सारे दिन बच्चे और ऐथल के बारे में सोचता रहता.

‘एक रात मूसलाधार वर्षा हो रही थी. ऐथल को ऐसा तेज दर्द हुआ जो उस के लिए सहना कठिन था. मैं ने एंबुलेंस मंगाई और ऐथल की कराहटों व अपनी घबराहट के साथ अस्पताल पहुंच गया.

‘नर्सों ने एंबुलेंस से ऐथल को उतारा और तेजी से आई.सी.यू. में ले गईं. डाक्टर ने ऐथल की हालत जांच कर कहा कि शीघ्र ही आपरेशन करना पड़ेगा. अंदर डाक्टर और नर्सें ऐथल और बच्चे के जीवन और मौत के बीच अपने औजारों से लड़ते रहे, बाहर मैं अपने से लड़ता रहा. काफी देर बाद एक नर्स ने आ कर बताया कि तुम एक लड़के के पिता बन गए हो. खुशी में एक उन्माद सा छा गया. नर्स को पकड़ कर मैं नाचने लगा था. नर्स ने मुझे जोर से झंझोड़ सा दिया पर मेरा हाथ जोर से दबाए रही. कहने लगी कि मिस्टर वारन, मुझे बहुत ही दुख से कहना पड़ रहा है कि डाक्टरों की हर कोशिश के बाद भी आप की पत्नी नहीं बच सकी.

जेम्स ने आंखों से चश्मा उतार कर फिर साफ किया. उस की आंखें आंसुओं के भार को संभाल नहीं पाईं.  उस ने एक लंबी सांस छोड़ी और अपनी इस वेदना भरी कहानी को जारी करते हुए बोला, ‘मां पोते की खुशी और ऐथल की मृत्यु की पीड़ा में समझौता कर जीवन को सामान्य बनाने की कोशिश करने लगीं. मेरी मां बड़ी साहसी थीं. उन्होंने बच्चे का नाम विलियम वारन रखा क्योंकि विलियम ब्लेक, ऐथल का मनपसंद लेखक था.’

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‘इसी तरह 8 साल बीत गए. मां बहुत बूढ़ी हो चुकी थीं. एक दिन वह भी विलियम को मुझे सौंप कर इस संसार से विदा ले कर चली गईं. उस दिन से विलियम के लिए मैं ही मां, दादी और पिता के कर्तव्यों को पूरी जिम्मेदारी से निभाता. उसे सुबह नाश्ता दे कर स्कूल छोड़ कर अपने दफ्तर जाता. वहां से भी दिन के समय स्कूल में फोन पर उस की टीचर से उस का हाल पूछता रहता. विलियम की उंगली में यदि जरा सी भी चोट लग जाती तो मुझे ऐसा लगता जैसे मेरे सारे शरीर में दर्द फैल गया हो.

‘इतने लाड़प्यार में पलते हुए वह 18 वर्ष का हो गया. ए लेवल की परीक्षा में ए ग्रेड में पास होने की खबर सुन कर मैं बेहद खुश हुआ था. जब उस ने आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से आनर्स की डिगरी पास की तो मेरे आनंद का पारावार न था.

‘विलियम की गर्लफ्रेंड जैनी जब भी उस के साथ घर आती तो मैं खुशी से नाच पड़ता. जैनी और विलियम का विवाह उसी चर्च में संपन्न हुआ जहां मेरा और ऐथल का विवाह हुआ था. एक साल के बाद ही विलियम और जैनी ने मुझे दादा बना दिया. उस दिन मुझे मां और ऐथल की बड़ी याद आई. मेरी आंखें भर आईं. पोते का नाम जार्ज वारन रखा.

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‘हंसतेखेलते एक साल बीत गया. इतनी कशमकश भरे जीवन में अब आयु ने भी शरीर से खिलवाड़ करना शुरू कर दिया था.

‘डैडी, जैनी और मुझे, कंपनी एक बहुत बड़ा पद दे कर आस्टे्रलिया भेज रही है. वेतन भी बहुत बढ़ा दिया है. मकान, गाड़ी, हवाई जहाज की यात्रा के साथसाथ कंपनी जार्ज के स्कूल का प्रबंध आदि की सुविधाएं भी दे रही है, विलियम ने बताया तो मेरी आंखें खुली की खुली ही रह गईं.

Serial Story – मुसकान : क्या टूट गए उन दोनों के सपने

Serial Story मुसकान : क्या टूट गए उन दोनों के सपने- भाग 2

‘‘बेटा, मैं जानता हूं और तुम डाक्टर हो, जानते हो कि देह व्यापार और नशेबाजों के मुकाबले में डाक्टर को एड्स से अधिक खतरा है. खुदगर्ज, निकम्मे व भ्रष्ट लोगों की वजह से अनजाने में ही मेडिकल स्टाफ इस बीमारी की गिरफ्त में आ जाता है. सिरिंजों, दस्तानों की रिसाइक्ंिलग, हमारी लापरवाही, अस्पतालों में आवश्यक साधनों की कमी जैसे कितने ही कारण हैं. लोग ब्लड डोनेट करते हैं, समाज सेवा के लिए मगर उसी सेट और सूई को दोबारा इस्तेमाल किया जाए तो क्या होगा? शायद वही सूई पहले किसी एड्स के मरीज को लगी हो.’’

‘‘सर, मुझे अपनी चिंता नहीं है. मैं मुसकान से क्या कहूंगा? वह तो जीते जी मर जाएगी,’’ सुनील की आवाज कहीं दूर से आती लगी.

‘‘बेटा, हौसला रखो. अभी किसी से कुछ मत कहो. आज पापा का आपरेशन हो जाने दो. 15 दिन तो अभी यहीं लग जाएंगे. घर जा कर मांबाप की सलाह से अगला कदम उठाना. जीवन को एक चुनौती की तरह लो. सकारात्मक सोच से हर समस्या का हल मिल जाता है. मुसकान से मैं बात करूंगा पर अभी नहीं.’’

‘‘सर, उसे अभी कुछ मत बताइए, मुझे सोचने दीजिए,’’ कह कर सुनील अपने कमरे में आ गया था.

पर वह क्या सोच सकता है? एड्स. क्या मुसकान सुन सकेगी? नहीं, वह सह नहीं सकेगी. मैं उसे तलाक दे दूंगा, कहीं दूर चला जाऊंगा, नहीं…नहीं…वह तो अपनी जान दे देगी…नहीं…इस से अच्छा वह मर जाएगा पर मांबाप सह नहीं पाएंगे. नहीं…विपदा का हल मौत नहीं. सर ने ठीक कहा था कि सब को एक न एक दिन मरना है पर मरने से पहले जीना सीखना चाहिए.

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अचानक उसे ध्यान आया, आपरेशन का टाइम होने वाला है. मुसकान परेशान हो रही होगी…कम से कम जब तक पापा ठीक नहीं होते, मैं उस का ध्यान रख सकता हूं…इतने दिन कुछ सोच भी सकूंगा.

वह जल्दी कमरा बंद कर के वार्ड में आ गया.

‘‘अब कैसी तबीयत है?’’ उसे देखते ही मुसकान पूछ बैठी.

‘‘मैं ठीक हूं. मुसकान, तुम थोड़ी स्ट्रांग बनो. मैं तुम्हें परेशान देख कर बीमार हो जाता हूं.’’

12 बजे राजकुमार को आपरेशन के लिए ले गए. वह तीनों आपरेशन थियेटर के बाहर बैठ गए. मुसकान को सुनील की खामोशी खल रही थी पर समय की नजाकत को देखते हुए चुप थी. शायद पापा के कारण ही सुनील परेशान हों.

आपरेशन सफल रहा. अगले दिन घर से भी सब लोग आ गए थे. मां ने दोनों को गेस्ट रूम में आराम करने को भेज दिया.

कमरे में जाते ही सुनील लेट गया.

‘‘मुसकान, तुम भी थोेड़ी देर सो लो, रात भर जागती रही हो. मुझे भी नींद आ रही है,’’ कहते हुए वह मुंह फेर कर लेट गया. मुसकान भी लेट गई.

शादी के बाद पहली बार दोनों अकेले एक ही कमरे में थे. इस घड़ी में सुनील का दिल जैसे अंदर से कोई चीर रहा हो. उस का जी चाह रहा था कि मुसकान को बांहों में भर ले पर नहीं, वह उसे और सपने नहीं दिखाएगा. वह उस की जिंदगी बरबाद नहीं होने देगा.

मुसकान मायूस सी किसी हसरत के इंतजार में लेट गई. कुछ कहना चाह कर भी कह नहीं पा रही थी. सुनील पास हो कर भी दूर क्यों है? शायद कई दिनों से भागदौड़ में ढंग से सो नहीं पाया. पर दिल इस पर यकीन करने को तैयार नहीं था. उस ने सोचा, सुनील थोड़ी देर सो ले तब तक मैं वार्ड में चलती हूं. जैसे ही वह दरवाजा बंद करने लगी कि सुनील उस का नाम ले कर चीख सा पड़ा.

‘‘क्या हुआ,’’ वह घबराई सी आई तो देखा कि सुनील का माथा पसीने से भीगा हुआ था.

‘‘एक गिलास पानी देना.’’

उस ने पानी दिया और उसे बेड पर लिटा दिया.

‘‘कहीं मत जाओ, मुसकान. मैं ने अभीअभी सपना देखा है. एक लालपरी बारबार मुझे दिखाई देती है. मैं उसे छूने के लिए आगे बढ़ता हूं पर छू नहीं पाता, एक पहाड़ आगे आ जाता है. वह उस के पीछे चली जाती है. मैं उस पहाड़ पर चढ़ने की कोशिश करता हूं तो नीचे गिर जाता हूं,’’ इतना कह कर सुनील मुसकान का हाथ जोर से पकड़ लेता है.

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‘‘कैसी बहकीबहकी बातें कर रहे हो? सपने भी क्या सच होते हैं? चलो, चुपचाप सो जाओ. तुम्हारी लालपरी तुम्हारे पास बैठी है.’’

वह धीरेधीरे उस के माथे को सहलाने लगी. सुनील ने आंखें बंद कर लीं. थोड़ी देर बाद मुसकान ने सोचा, वह सो गया है. वह चुपके से उठी और वार्ड की तरफ चल पड़ी. वह उसे डिस्टर्ब नहीं करना चाहती थी.

वार्ड में पहुंचते ही उस का सामना

डा. परमिंदर से हो गया, ‘‘गुडमार्निंग, सर.’’

‘‘गुडमार्निंग, बेटा. कैसी हो?’’

‘‘फाइन, सर.’’

‘‘अच्छा, 10 मिनट बाद मेरे आफिस में आना,’’ कह कर डाक्टर परमिंदर सिंह चले गए.

10 मिनट बाद वह डा. परमिंदर के सामने थी.

‘‘बैठो बेटा. सुनील कहां है?’’

Serial Story मुसकान : क्या टूट गए उन दोनों के सपने- भाग 3

‘‘सर, वह कमरे में सो रहे हैं. उन की तबीयत ठीक नहीं. मैं ने सोचा कुछ सो लें तो मैं इधर आ गई. पता नहीं क्यों खामोश से, परेशान से हैं.’’

‘‘तुम ने पूछा नहीं?’’

‘‘पूछा था. कहते हैं, कुछ नहीं…पर कुछ अजीब सी दहशत में कोई सपना देखा है, बता रहे थे.’’

‘‘बेटा, तुम सुनील से कितना प्यार करती हो?’’

‘‘अपनी जान से बढ़ कर. सर, आप तो जानते हैं कि हम बचपन से ही एकदूसरे को कितना चाहते हैं.’’

‘‘कल हम यही बातें कर रहे थे. कल उस ने एक अपाहिज को देखा. एक्सीडेंट की वजह से उस की दोनों टांगें काटनी पड़ीं. उस की पत्नी का रुदन देखा नहीं जा रहा था, तभी एकदम वह बोल उठा था कि कल को अगर उसे ऐसा कुछ हो जाए तो मुसकान कैसे जी पाएगी. बेटी, वह तुम्हें दुखी नहीं देख सकता.’’

‘‘सर, इस का मतलब वह मुझे प्यार नहीं करते या वह मुसकान को जान ही नहीं पाए. अगर कल मैं अपाहिज हो जाऊं तो वह क्या करेंगे? जब हम किसी से प्यार करते हैं तो उस का एक ही अर्थ होता है कि हम उस को मन और आत्मा से प्यार करते हैं. उस की हर अच्छाईबुराई अपनाते हैं.’’

‘‘पर मन और आत्मा की भी कई जरूरतें होती हैं जिन का संबंध इस शरीर से होता है,’’ डा. परमिंदर ने टोका.

‘‘सर, मैं सोचती हूं कि प्यार ही दुनिया में एक ऐसी शक्ति है जो मन और आत्मा को सही दिशा देती है. इसी शक्ति से हम जरूरतों के अधीन नहीं रहते बल्कि जरूरतों को अपने अधीन कर सकते हैं.’’

‘‘वाह बेटा, मुझे नहीं पता था कि मुसकान इतनी समझदार और साहसी है. मुझे लगता है तुम मेरे बेटे को जीवन दान दे सकती हो.’’

‘‘मैं समझी नहीं सर, आप किस की बात कर रहे हैं?’’

कुछ देर के लिए वहां खामोशी छा गई. फिर डा. परमिंदर इस खामोशी को तोड़ते हुए बोले, ‘‘आजकल तुम्हें पता है, डाक्टर लोग ही नहीं सारा मेडिकल स्टाफ जिन हालात में काम कर रहा है ऐसे में हम कभी भी किसी खतरनाक बीमारी का शिकार हो सकते हैं. आज सुनील के साथ ऐसी ही अनहोनी हो गई है. मुझ से वादा करो तुम सब की खातिर जो कदम उठाओगी सोचसमझ कर उठाओगी. कल सुनील का खून तुम्हारे पापा से मैच करने के लिए लिया तो वह एच.आई.वी. पाजिटिव है.’’

‘‘सर…’’ वह जोर से चीख उठी.

‘‘बेटे, हौसला रखो. अगर तुम से उस की शादी न हुई होती तो उस के पास कई विकल्प थे. वह कहीं भी कैसे भी जी लेता. मगर आज वह तुम्हें क्या जवाब दे. इसलिए मुझे डर है कहीं वह कुछ ऐसावैसा कदम न उठा ले. वह तुम्हारी जिंदगी बरबाद नहीं होने देगा.’’

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‘‘सर, मैं उस के बचपन से ले कर अब तक के हर पल की गवाह हूं. उस ने कभी कोई गलत काम नहीं किया. फिर उस के साथ ऐसा क्यों हुआ?’’ मुसकान का दिल फटने को था.

‘‘तुम्हें पता है, हमारे पेशे में किसी के साथ भी ऐसा हो सकता है. मैं यह नहीं कहता कि तुम उस के साथ अपनी जिंदगी बरबाद करो. मगर यह सोच कर कि अगर तुम्हारे साथ ऐसा हुआ होता तो सुनील को क्या करना चाहिए था. फिर तुम लोग डाक्टर हो, जानते हो क्याक्या परहेज कर के एक आम आदमी जैसा जीवन जीया जा सकता है. अब तुम चलो. उस ने अभी तुम्हें बताने के लिए मना किया था पर मुझे दोनों की चिंता है इसलिए तुम्हें बताना जरूरी था.’’

वह उठी पर उस के कदम आगे बढ़ने से इनकार कर रहे थे. यह क्या हो गया सुनील? अकेले इतना बड़ा दुख सह रहे हो? वह लालपरी वाला सपना नहीं बल्कि उस के दिल की बात थी, तभी तो मुझ से दूरदूर था. क्या बीत रही होगी उस के दिल पर. वह मुझ से प्यार करता है तभी तो मुझे छूने से डरता है…कहीं मुसकान को भी एड्स न हो जाए. कितना संघर्ष करना पड़ा होगा दिल से…अपने अरमानों का खून करते हुए पर वह मुसकान को नहीं जानता…मैं उसे टूटने नहीं दूंगी…उसे ध्यान आया वह अकेला है…उसे अब अकेला नहीं छोड़ना चाहिए. उस के कदमों में कुछ तेजी आ गई.

मुसकान ने धीरे से दरवाजा खोला. सुनील सो रहा था. वह कितनी देर उसे सोता हुआ देखती रही. फिर चुपके से पास बैठ गई और उस के माथे को चूमा तो आंखों से आंसू टपक कर सुनील के माथे पर पड़े. वह हड़बड़ा कर उठा, ‘‘मुसकान, क्या हुआ? पापा ठीक हैं न?’’

‘‘हां.’’

‘‘अच्छा चलो, पापा के पास चलते हैं,’’ उस ने उठने की कोशिश की पर मुसकान ने उसे जबरदस्ती लिटा दिया.

‘‘सुनील, बताओ तुम मुझे कितना प्यार करते हो?’’

‘‘अपनी जान से भी ज्यादा.’’

‘‘झूठ, अच्छा मान लो मैं अपाहिज हो जाऊं, तुम्हारे काम की न रहूं तो?’’

‘‘मुसकान,’’ वह चीख सा पड़ा, ‘‘ऐसी बात भूल कर भी न कहना. मैं तुम से प्यार करता हूं तुम्हारे शरीर से नहीं.’’

‘‘झूठ.’’ वह रो पड़ी, ‘‘अगर मुझ से प्यार करते होते तो मुझे अपने दुख में शरीक न करते? क्या मुझे इतना स्वार्थी समझ लिया कि मैं तुम से घृणा करने लगूंगी? क्या सोच कर तुम अकेले इतना बड़ा बोझ लिए अपने से लड़ रहे हो?’’

‘‘मुसकान, यह क्या तुम बहकी- बहकी बातें कर रही हो?’’

‘‘अभीअभी मैं डा. परमिंदर सिंह से मिल कर आ रही हूं. मेरे होते, मांबाप के होते, तुम ने कैसे सोच लिया कि अपनी जिंदगी का फैसला तुम्हें अकेले करना है.’’

‘‘अब जब तुम जान ही गई हो तो मुझे समझने की कोशिश करो, मुसकान. यह ठीक है मैं तुम्हें जान से भी अधिक चाहता हूं मगर इतना भी स्वार्थी नहीं कि तुम्हारा जीवन बरबाद करूं,’’ सुनील ने समझाने की कोशिश की.

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‘‘मैं सोचसमझ कर ही कह रही हूं. देखो, जो मुसीबत हम पर आई है उस में न तुम्हारा दोष है न मेरा, न ही हमारे मांबाप का. यह मुसीबत तो हम सब पर आई है और तुम्हें यह हक कदापि नहीं है कि तुम अकेले कोई फैसला करो. अगर तुम मुझ से प्यार करते हो, मांबाप को प्यार करते हो तो हम दोनों मिल कर सोचेंगे. मैं तुम्हारी पत्नी हूं. मेरा भी हर फैसले पर उतना ही हक है जितना तुम्हारा. फिर अगर हमें अभी पता न चलता तो क्या करते.’’

‘‘मैं क्या फैसला ले सकता हूं? मेरे पास बचा ही क्या है? मुसकान, मैं बरबाद हो गया,’’ सुनील के आंसू नहीं थम रहे थे.

‘‘अच्छा, अगर मुझे एड्स हो गया होता तो तुम क्या करते? क्या मुझे छोड़ देते या मरने देते?’’

‘‘नहीं…नहीं, ऐसा मत कहो. मैं कैसे तुम्हें छोड़ सकता था?’’

‘‘हम दोनों डाक्टर हैं, सुनील. इस बीमारी के बारे में हम जानते हैं और यह भी जानते हैं कि क्या परहेज कर के हम आम इनसान की तरह जी सकते हैं. हम अपना बच्चा ही पैदा नहीं कर सकते न और तो कुछ समस्या नहीं है…तो देश में कितने अनाथ बच्चे हैं, कोई भी गोद ले लेंगे. साथसाथ दुखसुख बांट लेंगे, मेरे लिए नहीं तो कम से कम दोनों के मांबाप की तो सोचो. वह सह सकेंगे? मुझ से वादा करो कि मुझ से दूर जाने की नहीं सोचोगे. मैं जी नहीं पाऊंगी,’’ यह कहते समय मुसकान सुनील की छाती पर सिर रख कर रोए जा रही थी.

‘‘मुसकान, मैं तो यों ही टूट रहा था, तड़प रहा था अपनी लालपरी को छूने के लिए, मुझे पता ही नहीं चला वह तो मेरे दिल में बैठी है… उस परी ने मुझे नई जिंदगी दी है,’’

राजस्थान : राजनीति की आड़ में लड़कियों का शोषण- भाग 1

सौजन्य- सत्यकथा

राजस्थान में बलात्कार के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं. मासूम बच्चियों से ले कर विवाहित महिलाएं तक शिकार बन रही हैं.

बढ़ती वारदातों से ऐसा लगता है जैसे अपराधियों को न तो खाकी वर्दी का डर है और न ही सरकार का. घटना के बाद विपक्षी पार्टियों के लोग हायतौबा मचाते हैं और फिर थोड़े दिन बाद मामला शांत हो जाता है.

पिछले दिनों राजस्थान के सवाई माधोपुर शहर में एक ऐसा मामला सामने आया जो राजस्थान में ही नहीं, बल्कि पूरे देश में चर्चित हो गया. ताज्जुब की बात यह कि इस सनसनीखेज अपराध में सत्तापक्ष और विपक्ष की जिलास्तर की महिला नेता शामिल थीं.

जिन महिलाओं की हम बात कर रहे हैं, वे दोनों सवाई माधोपुर में रहती थीं. उन में सुनीता वर्मा भारतीय जनता पार्टी (महिला मोर्चा) की जिलाध्यक्ष थी तो दूसरी पूजा उर्फ पूनम चौधरी कांग्रेस सेवा दल (महिला प्रकोष्ठ) की पूर्व जिलाध्यक्ष थी. चूंकि दोनों ही जिला स्तर की नेता थीं, इसलिए उन की क्षेत्र में अच्छी साख थी.

पूजा और सुनीता वर्मा लोगों के सरकारी काम कराने में मदद करती थीं. लोग उन पर भरोसा करते थे और दोनों को गरीबों की मसीहा मानते थे.

अलगअलग राष्ट्रीय पार्टियों की जिलाध्यक्ष थीं, इसलिए जिले के सरकारी महकमों में उन की अच्छी जानपहचान थी. एक दिन कांग्रेस सेवादल (महिला प्रकोष्ठ) की पूर्व जिलाध्यक्ष पूनम चौधरी नेम सिंह के घर पहुंची.

दरअसल, नेम सिंह पूनम से कई बार कह चुका था कि उसे किसी बैंक से लोन दिला देंगी तो वह कोई व्यवसाय शुरू कर देगा. पूनम ने नेम सिंह को भरोसा दिया था कि वह उस का लोन करा देगी.

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नेम सिंह की एक 16 वर्षीय बेटी थी उर्मिला. वह गरीब परिवार में जन्मी जरूर थी, लेकिन थी गोरीचिट्टी और खूबसूरत.

पूनम ने नेम सिंह से कहा, ‘‘तुम्हारी बेटी उर्मिला दिन भर घर में पड़ी क्या करती है. इसे हमारे साथ भेज दो. साथ रहने पर दुनियादारी सीख जाएगी. देखना, इस की जिंदगी ही बदल जाएगी.’’

नेम सिंह पूनम को बड़ी नेता समझता था. उस ने सोचा कि संभव है अपनी ऊंची पहुंच के चलते पूनम उर्मिला की कहीं नौकरी लगवा दें. इसलिए उस ने बिना किसी झिझक के उर्मिला को पूनम के साथ भेज दिया.

पूनम उर्मिला को भाजपा की नेता सुनीता वर्मा के पास ले कर पहुंची और कहा कि इस लड़की का नाम उर्मिला है. यह बहुत अच्छी लड़की है. आप इसे अपने पास रखो और इस की जिंदगी बना दो.

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उर्मिला को देख कर सुनीता की आंखों में चमक आ गई क्योंकि वह खूबसूरत थी. सुनीता वर्मा ने मन ही मन सोचा कि लड़की काम की है. सुनीता उसे प्यार से रखने लगी. शहर में वह जहां भी जाती, उर्मिला साथ होती थी. जिला उद्योग केंद्र, कलेक्ट्रेट और बैंक वगैरह भी सुनीता उर्मिला को साथ ले जाती थी.

सुनीता वर्मा के घर पर एफसीआई का कर्मचारी हीरालाल मीणा आता रहता था. वह उस का जानकार था. साल 2013 में सुनीता वर्मा ने बतौर निर्दलीय विधानसभा का चुनाव लड़ा था. हीरालाल ने उस वक्त उस का तनमनधन से साथ दिया था.

सुनीता वर्मा वह चुनाव तो नहीं जीत पाई, मगर उस की जानपहचान का दायरा बढ़ गया था. चुनाव हारने के बाद भी हीरालाल का सुनीता के घर बदस्तूर आनाजाना जारी रहा.

हीरालाल ने जब सुनीता के साथ एक किशोर युवती को देखा तो उस के बारे में पूछा. तब सुनीता ने बताया कि इस का नाम उर्मिला है और अब यह उस के साथ ही रहेगी. हीरालाल का अधेड़ मन उर्मिला का सामीप्य पाने को लालायित हो उठा. अपने मन की बात उस ने सुनीता को बता दी. साथ ही यह भी कहा कि वह इस के लिए कुछ भी करने को तैयार है.

लालची सुनीता तैयार हो गई और उस ने एक दिन उर्मिला को हीरालाल मीणा के साथ एक कमरे में बंद कर दिया. हीरालाल ने उस मासूम से बलात्कार किया. सुनीता ने उस का वीडियो बना लिया और फोटो भी खींच लिए.

इज्जत लुटने के बाद उर्मिला रोने लगी. तब सुनीता ने उसे वीडियो एवं अश्लील फोटो दिखा कर कहा, ‘‘अगर किसी से इस घटना की चर्चा की तो यह वीडियो और फोटो सोशल मीडिया पर वायरल कर दूंगी. तब तुम किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहोगी. रोनाधोना बंद कर और भूल जा इस घटना को. यही तेरे लिए बेहतर होगा.’’

उर्मिला अपनी ब्लू फिल्म व अश्लील फोटो देख कर अंदर तक कांप गई. वह इतनी नादान नहीं थी कि कुछ समझती न हो. वह समझ गई कि अगर उस ने घर पर किसी को बताया तो यह अश्लील वीडियो और फोटो वायरल कर देगी. तब वह और उस का परिवार किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे.

सुनीता वर्मा अब उर्मिला का भरपूर लाभ उठाना चाहती थी. लिहाजा उस ने डराधमका कर उसे और भी कई सरकारी मुलाजिमों के सामने पेश कर उन से अपने काम निकलवाए. उर्मिला उस के हाथ की ऐसी कठपुतली बन गई थी, जो चाह कर भी कुछ नहीं कर सकती थी.

एक दिन सुनीता ने डराधमका कर उर्मिला को घर भेज दिया. वह डरीसहमी घर चली गई. उस का मन तो कर रहा था कि अपनी मम्मी को सब कुछ बता दे. मगर वीडियो और फोटो वायरल होने की बात ध्यान में आते ही उस ने चुप रहने में ही भलाई समझी.

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उर्मिला चुप रहने लगी. एक दिन उस की मम्मी ने वजह पूछा तो कह दिया, ‘‘दिन भर इधरउधर घूमने से थक गई हूं. थोड़ी कमजोरी है, ठीक हो जाएगी.’’

‘‘ठीक है बेटी, अगर लोन मिल जाएगा तो हमारे दिन फिर जाएंगे. तुम सुनीता दीदी के साथ रहो. वह काम करवा देंगी, अच्छी इंसान हैं?’’ मम्मी ने कहा तो उर्मिला मन ही मन सोचने लगी कि सुनीता औरत के नाम पर वह कलंक है जो अपनी बेटी की उम्र की लड़की को लोगों के साथ सोने को मजबूर करती है, अश्लील वीडियो, फोटो बनवा कर ब्लैकमेल करती है. धमकाती है.

सुनीता वर्मा ने अगले रोज उर्मिला को अपने घर बुला कर एकांत में कहा, ‘‘तूने अपने साथ घटी घटना के बारे में घर पर किसी को बताया तो नहीं है?’’

राजस्थान: राजनीति की आड़ में लड़कियों का शोषण – भाग 2

सौजन्य- सत्यकथा

‘‘नहीं, मैं ने किसी को नहीं बताया.’’ उर्मिला ने कांपते स्वर में कहा.

‘‘वेरी गुड. मुझे तुम से यही उम्मीद थी. कभी भूल कर भी किसी को नहीं बताना. वरना यह वीडियो और फोटो…’’ सुनीता ने धमकाया.

‘‘मैं किसी से नहीं कहूंगी.’’ उर्मिला बोली.

‘‘जब तक तुम मेरा कहना मानोगी तब तक इन्हें वायरल नहीं करूंगी. ठीक है. तुम चिंता न करो?’’ सुनीता ने कहा तो उर्मिला की जान में जान आई.

सुनीता वर्मा के पास कई लड़कियां आती थीं. वे सब भी उर्मिला की तरह सुनीता के इशारों पर नाचती थीं. हीरालाल ने उर्मिला को कई लोगों के साथ भेजा. जिन्होंने उस के साथ बलात्कार किया.

सुनीता वर्मा के घर पर राजूराम रेगर नाम का इलैक्ट्रिशियन आता था. उस ने सुनीता के घर बिजली का काम किया था, जिस का सुनीता को 5 हजार का भुगतान करना था. मगर सुनीता ने उसे रुपए नहीं दिए. कह दिया कि दोचार दिन में दे दूंगी.

राजू अपने पैसे मांगने सुनीता के घर आने लगा. तब सुनीता ने राजू रेगर से कहा कि मेरे साथ जो लड़की रहती है उस के तन का स्वाद चखा देती हूं 5 हजार रुपए वसूल हो जाएंगे.

राजू रेगर ने उर्मिला को देखा था. वह सुंदर, खिलती कली थी. सुनीता ने उर्मिला को धमका कर राजू के साथ भेज दिया. राजू उर्मिला को होटल स्वागत में ले गया और उस के साथ मौजमस्ती की. सुनीता वर्मा की तरह पूनम उर्फ पूजा चौधरी भी नाबालिग उर्मिला को डराधमका कर अपने साथ ले गई और एक व्यक्ति के आगे परोस दिया. उस व्यक्ति ने पीडि़ता से रेप किया.

कई ऐसे सरकारी कर्मचारी थे, जो सुनीता और पूनम का काम करते थे. कुछ ऐसे लोग भी थे, जिन से पैसा ले कर सुनीता व पूनम पीडि़ता को उन के हवाले कर देती थीं. वे लोग उर्मिला को किसी होटल या कमरे पर ले जा कर उस के साथ यौन संबंध बनाते और फिर उसे सुनीता या पूनम चौधरी के पास छोड़ देते थे. उर्मिला करीब 8-10 लोगों के साथ भेजी गई थी.

उर्मिला पिछले काफी महीनों से यह सब सह रही थी. मगर हर चीज की एक हद होती है. जब वह नाबालिग लड़की थक गई तो घर पर मां के पास रोने लगी. मां ने पूछा तो उस ने सुनीता व पूनम की काली करतूत के बारे में सारी बातें बता दीं. मां ने बेटी की पीड़ा सुनी तो उस का दिल दहल गया.

बेटी के साथ इतना कुछ घटित हो गया और उसे पता तक नहीं चला. इस के बाद मां ने तय कर लिया कि उस की नाबालिग बेटी की जिंदगी को नरक बनाने वालों को सजा दिला कर रहेगी.

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उर्मिला की मां ने अपने पति को सारी बात बताई. इस के बाद घर वाले 22 सितंबर, 2020 को नाबालिग उर्मिला को ले कर महिला थाना सवाई माधोपुर गए और सुनीता वर्मा उर्फ संपति बाई, हीरालाल मीणा, पूनम उर्फ पूजा चौधरी और अन्य लोगों के खिलाफ यौनशोषण की रिपोर्ट दर्ज करा दी.

मुकदमा दर्ज होने के बाद पुलिस ने जांच शुरू की. सवाई माधोपुर के एसपी ओम प्रकाश सोलंकी ने महिला थाने में दर्ज रिपोर्ट का अध्ययन किया और अपने नेतृत्व में एक टीम गठित कर जांच शुरू की. पुलिस ने साक्ष्य एकत्रित किए, पीडि़ता द्वारा बताए गए होटल में जा कर रिकौर्ड चैक किया.

इस के बाद भाजपा महिला मोर्चा अध्यक्ष सुनीता वर्मा उर्फ संपति बाई, सहयोगी हीरालाल मीणा को गिरफ्तार कर लिया. इन दोनों को कोर्ट में पेश कर रिमांड पर ले कर पूछताछ की गई.

पूछताछ में सामने आया कि राजू रेगर निवासी खड्डा कालोनी, सवाई माधोपुर ने सुनीता से बिजली फिटिंग के रुपए मांगने पर नाबालिग लड़की को साथ भेज दिया था,जिसे होटल में ले जा कर उस ने रेप किया था.

पुलिस ने राजू रेगर को भी गिरफ्तार कर लिया. सुनीता और हीरालाल ने 2 सरकारी कर्मचारियों के नाम भी बताए. उन में से एक जिला उद्योग केंद्र का क्लर्क संदीप शर्मा और दूसरा कलेक्टर कार्यालय का चपरासी श्योराज मीणा था. पुलिस ने इन दोनों को भी गिरफ्तार कर लिया.

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पूनम उर्फ पूजा चौधरी को अपने खिलाफ मुकदमा दर्ज होने की जानकारी मिली तो वह घर से फरार हो गई. पुलिस को पता चला कि पूनम चौधरी बिहार की रहने वाली है. इसलिए अनुमान लगाया गया कि शायद वह बिहार भाग गई है.

लोगों ने 30 सितंबर, 2020 तक पूनम चौधरी को सवाई माधोपुर में देखा था. तब पुलिस ने उसे क्यों नहीं गिरफ्तार किया? लोगों में इस बात की चर्चा होने लगी कि कहीं पुलिस के ऊपर सत्तासीन लोगों का दबाब तो नहीं था?

राजस्थान: राजनीति की आड़ में लड़कियों का शोषण – भाग 3

सौजन्य- सत्यकथा

इस के बाद भाजपा महिला मोर्चा अध्यक्ष सुनीता वर्मा उर्फ संपति बाई, सहयोगी हीरालाल मीणा को गिरफ्तार कर लिया. इन दोनों को कोर्ट में पेश कर रिमांड पर ले कर पूछताछ की गई.

पूछताछ में सामने आया कि राजू रेगर निवासी खड्डा कालोनी, सवाई माधोपुर ने सुनीता से बिजली फिटिंग के रुपए मांगने पर नाबालिग लड़की को साथ भेज दिया था,जिसे होटल में ले जा कर उस ने रेप किया था.

पुलिस ने राजू रेगर को भी गिरफ्तार कर लिया. सुनीता और हीरालाल ने 2 सरकारी कर्मचारियों के नाम भी बताए. उन में से एक जिला उद्योग केंद्र का क्लर्क संदीप शर्मा और दूसरा कलेक्टर कार्यालय का चपरासी श्योराज मीणा था. पुलिस ने इन दोनों को भी गिरफ्तार कर लिया.

पूनम उर्फ पूजा चौधरी को अपने खिलाफ मुकदमा दर्ज होने की जानकारी मिली तो वह घर से फरार हो गई. पुलिस को पता चला कि पूनम चौधरी बिहार की रहने वाली है. इसलिए अनुमान लगाया गया कि शायद वह बिहार भाग गई है.

लोगों ने 30 सितंबर, 2020 तक पूनम चौधरी को सवाई माधोपुर में देखा था. तब पुलिस ने उसे क्यों नहीं गिरफ्तार किया? लोगों में इस बात की चर्चा होने लगी कि कहीं पुलिस के ऊपर सत्तासीन लोगों का दबाब तो नहीं था?

जांच में पुलिस को यह भी पता चला कि पूनम चौधरी को अप्रैल, 2020 में उस की निष्क्रियता को देख कर पार्टी हाईकमान ने जिलाध्यक्ष के पद से हटा दिया था. पूनम की सवाई माधोपुर में सीमेंट की फैक्ट्री भी है. पूनम ने उर्मिला को उस फैक्ट्री के पास ले जा कर अपनी पहचान के आदमी के साथ भेज कर दुष्कर्म कराया था.

सरकारी कर्मचारियों संदीप शर्मा और श्योराज मीणा ने पुलिस को बताया कि सुनीता वर्मा उन के पास कामकाज के लिए आती रहती थी. इसी से उन की जानपहचान थी. वह जिला उद्योग केंद्र व श्रम विभाग में लोन, सब्सिडी, श्रम डायरी सहित विभिन्न योजनाओं का लाभ दिलाने का काम करती थी. आरोपी संदीप शर्मा ने इसी का फायदा उठा कर राज नगर स्थित नर्सिंग होम के पास अपने मकान में उर्मिला के साथ दुष्कर्म की घटना को अंजाम दिया था.

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सुनीता वर्मा कलेक्टर कार्यालय में ज्ञापन वगैरह देने जाती रहती थी. चपरासी श्योराज मीणा सुनीता वर्मा को कलेक्टर से मुलाकात के लिए भेजता था. इसी दौरान दोनों की जानपहचान हो गई थी. श्योराज मीणा लौकडाउन के दौरान सुनीता वर्मा के साथ लोगों को मास्क व सेनेटाइजर भी वितरित करता था. श्योराज मीणा ने लौकडाउन के समय सुनीता वर्मा के औफिस में ही नाबालिग के साथ दुष्कर्म किया था.

पीडि़त उर्मिला ने दूसरे कई लोगों द्वारा भी देह शोषण के आरोप लगाए. लेकिन मुकदमा दर्ज होने के बाद जब यह खबर मीडिया की हाईलाइट बनी तो वे लोग फरार हो गए.

अगर पीडि़त के घर से रुपए गायब नहीं हुए होते तो शायद यह मामला अभी प्रकाश में नहीं आता. दरअसल, हुआ यह कि नेमसिंह के घर से कुछ रुपए गायब हो गए थे. इस बारे में उन्होंने बेटी उर्मिला से पूछताछ की तो उस ने बताया कि रुपए उस ने चोरी किए थे.

उर्मिला ने पिता से कहा कि ये रुपए सुनीता वर्मा ने मंगाए थे. रुपए क्यों मंगाए थे, यह पूछने पर बालिका ने सारा राज फाश कर दिया कि किस तरह उसे जिंदगी बनाने और अच्छे घर में शादी का प्रलोभन दे कर कई लोगों के साथ सोने पर मजबूर किया गया.

ब्लैकमेलिंग के लिए उन्होंने उस की अश्लील वीडियो बना ली थी और उसे आधार बना कर उसे ब्लैकमेल कर रही थीं. सुनीता ने ही उसे घर से पैसे लाने के लिए मजबूर किया था.

पीडि़त बालिका और उस की मां ने बताया कि सुनीता और पूनम के पास करीब 30-35 लड़कियां हैं, जो उन के इशारों पर शहर से बाहर भी जाती हैं. इन लड़कियों को सरकारी कर्मचारी, अधिकारी और सफेदपोश लोगों के पास भेजा जाता है, जहां उन का देह शोषण किया जाता है.

पीडि़ता ने दावा किया कि कई बड़े सफेदपोश राजनेता और अधिकारी भी इस सैक्स रैकेट में शामिल हैं. सूत्रों के मुताबिक यह धंधा सुनीता वर्मा और पूनम चौधरी मिल कर करती थीं. चर्चा तो यह भी रही कि लड़कियों के साथ गलत काम करने वाले पुरुषों को भी ये दोनों महिला नेता अश्लील वीडियो व फोटो के माध्यम से ब्लैकमेल करती थीं.

बदनामी के डर से वे लोग रुपए दे कर पीछा छुड़ाते थे, क्योंकि पुलिस के पास जा कर बेइज्जती के अलावा कुछ नहीं मिलना था.

दोनों ब्लैकमेलर नेत्रियां मौज की जिंदगी जीती थीं. उन्होंने अच्छीखासी प्रौपर्टी बना ली थी. जब इस घटना की खबरें अखबारों में प्रकाशित हुई तो लोग हैरान रह गए. 2 राजनैतिक पार्टियों की जिलाध्यक्ष वह भी महिलाएं ऐसा काम कर रही थीं, जिस के बारे में किसी ने कभी सोचा तक नहीं था.

पूछताछ पूरी होने के बाद पुलिस ने सुनीता वर्मा, हीरालाल मीणा, संदीप शर्मा, श्योराज मीणा और राजूलाल रेगर को कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया. पूजा उर्फ पूनम चौधरी और अन्य आरोपी भी पकड़े जाएंगे.

पीडि़ता के परिवार का कहना है कि उन्होंने सभी दुष्कर्मियों के बारे में पुलिस को बता दिया था, इस के बावजूद पुलिस ने सिर्फ 5 लोगों को गिरफ्तार किया. इस घटना के प्रकाश में आने के बाद कयास लगाया जा रहा है कि अन्य पीडि़त युवतियां रिपोर्ट दर्ज करा कर अपने परिवार की रहीबची इज्जत दांव पर नहीं लगाना चाहतीं, इसलिए चुप हैं.

सैक्स रैकेट की पड़ताल में जुटी पुलिस को पता चला कि अब तक वह जिस पूजा को खोज रही थी, हकीकत में वह कांगे्रस सेवादल महिला प्रकोष्ठ की पूर्व जिलाध्यक्ष पूनम चौधरी है. पूनम ने इस खेल को पूजा के रूप में अपनी छद्म पहचान बना कर अंजाम दिया था.

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पुलिस को यह जानकारी भी मिली कि इस सैक्स रैकेट गिरोह ने नाबालिग उर्मिला को जयपुर में बेचने का सौदा कर लिया था. इस के लिए उसे जयपुर भेजने की तैयारी थी.

हीरालाल उसे सवाई माधोपुर बस स्टैंड तक छोड़ने गया, लेकिन पीडि़ता जैसेतैसे उस से बच निकली. पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि बालिका का सौदा जयपुर में किन लोगों से किया गया था.

पीडि़त उर्मिला कक्षा 9 में पढ़ती थी. कोराना काल में स्कूल बंद थे. ऐसे में वह अपनी जिंदगी बनाने इन के लिए महिला नेत्रियों की शरण में गई थी. लेकिन उन्होंने उस की जिंदगी तबाह कर डाली.

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