Serial Story : अजनबी मुहाफिज- भाग 2

लेखक: शकीला एस हुसैन

उसी वक्त एएसआई लोहे का रेंच और पाना उठा लाया. उस पर खून और कुछ बाल चिपके हुए थे. यही आलाएकत्ल था, जिस की मार ने चौधरी का काम तमाम कर दिया. यह रेंच पाना पलंग के नीचे से बरामद हुआ था.

उसे ऐहतियात से रखने के बाद मैं ने राशिद से कहा, ‘‘जल्दी ही चौधरी की लाश को अस्पताल ले जाने का बंदोबस्त करो.’’

इस डेरे पर 3 कमरे थे. दूसरे कमरे में कादिर का मुकाम था. तीसरा कमरा स्टोर की तरह काम में आता था. कहीं से कोई भी काम की चीज बरामद नहीं हुई. मैं चौधरी सिकंदर के पास पहुंच गया. वह अपाहिज था. फालिज ने उसे बिस्तर से लगा दिया था. जवान बेटे की मौत ने उसे हिला कर रख दिया था.

मैं ने उसे तसल्ली दी और वादा किया कि मैं बहुत जल्द कातिल को गिरफ्तार कर लूंगा. वह रोते हुए बोला, ‘‘रुस्तम मेरा एकलौता बेटा था. मेरी तो नस्ल ही खत्म हो गई. उस की शादी का अरमान भी दिल में रह गया. उस से छोटी तीनों बहनों की शादियां हो गईं. बस यही रह गया था. मेरी बीवी का भी इंतकाल हो गया है. अब मैं बिलकुल तनहा रह गया.’’

मैं ने उसे तसल्ली दे कर डेरे के हाल सुनाए और पूछा, ‘‘आप को किसी पर शक है क्या?’’

‘‘नहीं जनाब. मुझे कुछ अंदाजा नहीं है.’’

‘‘कादिर को गरदन का मनका तोड़ कर ठिकाने लगाया गया था और लाश नहर में बहा दी गई थी, जबकि रुस्तम को खोपड़ी पर वार कर के खत्म किया गया था. यह किसी ऐसे इंसान का काम है जो दोनों से नफरत करता था. क्या आप फरीदपुर की तमाम औरतों को हवेली में जमा कर सकते हैं, साथ ही अगर आप के गांव में कोई पहलवान हो या कबड्डी का खिलाड़ी हो तो उसे भी बुलवाइए.’’

‘‘मैं अभी इंतजाम करता हूं. हमारे गांव में एक ही पहलवान है सादिक, जो गांव की शान और हमारा मान है. बड़ा ही भला आदमी है.’’

थोड़ी देर में गांव की सभी औरतें हवेली में पहुंच गईं. मैं ने चौधरी को बताया, ‘‘मुझे उस औरत की तलाश है जो रात को चौधरी रुस्तम के साथ डेरे पर मौजूद थी. उस की चूडि़यां टूटी थीं. उस के हाथ पर खरोंच या जख्म जरूर होगा.’’

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मैंने चौधरी को चूड़ी के टुकड़े भी दिखाए. मेरी बात सुन कर चौधरी सारा मामला समझ गया. मैं ने हवेली में बुलाई जाने वाली तमाम औरतों की कलाइयां बारीकी से चैक कीं पर किसी की कलाई पर ऐसा कोई निशान नहीं मिला. मुझे बताया गया बस एक औरत इस परेड में शामिल नहीं है, क्योंकि उसे बुखार है.

मैं ने उस औरत से मिलना जरूरी समझा. उसे सब नूरी मौसी कहते थे. मैं उस के घर पहुंचा. नूरी कोई 50 साल की मामूली शक्ल की औरत थी. उसे देख कर मेरी उम्मीद खत्म हो गई पर उस से बात करना जरूरी समझा. मैं ने उसे सारी बात बताई. उस ने अपनी कलाई आगे की.

मैं ने जल्दी से कहा, ‘‘नहीं नूरी मौसी, तुम्हारी कलाई चैक करने की जरूरत नहीं है. अगर तुम मुझे यह बता सकती हो कि रात चौधरी के डेरे पर कौन औरत थी, जिस ने चौधरी की जान ली तो बड़ी मेहरबानी होगी. वैसे मुझे एक मर्द की भी तलाश है जिस ने कादिर को मौत के घाट उतारा है.’’

नूरी बहुत समझदार औरत थी. सारी बात समझ गई. कहने लगी, ‘‘सरकार, मेरा अंदाजा है चौधरी के साथ जो औरत डेरे पर थी, वह जरूर बाहर की होगी. फरीदपुर की नहीं हो सकती. क्योंकि यहां आप ने सभी को चैक कर लिया है.’’

‘‘तुम्हारे इस अंदाजे की कोई वजह है?’’

‘‘जी सरकार, मैं ने कल दिन में 2 अजनबी औरतों को कादिर से बात करते देखा था.’’

नूरी की बात सुन कर आशा की एक किरण जगी. मैं ने जल्दी से पूछा, ‘‘तुम ने उन औरतों को कहां देखा था?’’

‘‘डेरे के करीब, नहर के किनारे.’’ उस ने जवाब दिया.

‘‘ओह. क्या तुम बता सकती हो कि वे क्या बातें कर रहे थे?’’

‘‘नहीं जनाब, मैं जरा फासले पर थी. बात नहीं सुन सकी. पर यह पक्का है वे फरीदपुर की नहीं थीं.’’

‘‘नूरी, तुम ने बड़े काम की बात बताई. मैं तुम्हारा शुक्रगुजार हूं. बस एक काम और करो, उन के हुलिए और कद के बारे में तफसील से बताओ जिस से उन्हें ढूंढने में आसानी हो जाए. तुम ने उन की शक्लें तो गौर से देखी होंगी?’’

‘‘जी देखी थीं. साहब वे 2 औरतें थीं. उस में से एक जवान 19-20 की होगी. लंबा कद, गोरा रंग, बड़ीबड़ी आंखें बहुत खूबसूरत थी. उस ने फूलदार सलवार कुरते पर काली शौल ओढ़ रखी थी. उस के साथ वाली औरत अधेड़ थी. काफी मोटी, कद छोटा, रंग सांवला बिलकुल फुटबाल जैसे लगती थी. उस की नाक पर एक मस्सा था. उस ने भूरे रंग का जोड़ा और नीला स्वेटर पहन रखा था.’’

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शुक्रिया कह कर मैं उस के घर से निकल आया. फरीदपुर में मेरा काम करीबकरीब खत्म हो गया था. पहलवान सादिक से आज मुलाकात मुमकिन न थी. क्योंकि वह बाहर गया हुआ था.

अगले दिन सुबह मैं ने सरकारी फोटोग्राफर और आर्टिस्ट को थाने बुलवाया और उन दोनों औरतों का हुलिया बता कर स्केच बनाने को कहा. स्केच तैयार होने पर मैं ने उस स्केच के 10-12 प्रिंट बनवाए. साथ ही बताने वालों को भी जता दिया कि ये दोनों औरतें अगर कहीं भी दिखाई दें तो मुझे फौरन खबर करें.

फिर उन तसवीरों के आने पर मैं ने उन्हें जरूरी जगहों पर तलाश करने के लिए सिपाहियों की ड्यूटी लगा दी. शाम को दोनों पोस्टमार्टम शुदा लाशें थाने पहुंच गईं. दोनों की मौत का वक्त 10 और 11 बजे के बीच का था.

रुस्तम की मौत खोपड़ी पर लगने वाली करारी चोट से हुई थी, जब वह शराब के नशे में धुत था. रेंच पाने पर उसी का खून और बाल थे और कादिर की गरदन का मनका एक खास टैक्निक से तोड़ा गया था और फिर उसे नहर में डाल दिया गया था. मैं ने लाशें कफनदफन के लिए चौधरी साहब के यहां भिजवा दीं.

अब मुझे उन दोनों औरतों की तलाश थी. फोटो बन कर आ गए थे. सिपाही उन की तलाश में भटक रहे थे. दूसरे दिन शाम को एक सिपाही खबर ले कर आया कि इन दोनों औरतों को रेलवे प्लेटफार्म पर देखा गया है.

मैं फौरन रेलवे स्टेशन रवाना हो गया. स्टेशन मास्टर ने बड़ी गर्मजोशी से मेरा स्वागत किया. मैं ने उन दोनों औरतों के बारे में पूछताछ शुरू कर दी. उस ने बताया, ‘‘वह लड़की गलती से इस स्टेशन पर उतर गई थी. वह बहुत परेशान थी. उसी दौरान यह मोटी औरत उसे मिल गई. दोनों काफी देर तक एक बेंच पर बैठ कर बातें करती रहीं. उस के बाद मोटी औरत उस का हाथ पकड़ कर स्टेशन से बाहर ले गई. हो सकता है, वे एकदूसरे को जानती हों पर पक्का नहीं है.’’

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मैं ने पूछा, ‘‘आप ने कहा वह लड़की गलती से उतर गई थी. वह जा कहां रही थी?’’

‘‘जिस गाड़ी से वह उतरी थी, वह रावलपिंडी से लाहौर जा रही थी. मुझे यह नहीं पता वह कहां जा रही थी क्योंकि मेरी उस से कोई बातचीत नहीं हुई थी. फिर वह मोटी औरत के साथ बाहर चली गई थी.’’

“तीन गुना रुपया” मिलने का लालच में…

आमतौर पर हमने स्वयं को एक ऐसा लालची, लोभी और आलसी बना लिया है कि जरा भी लाभ हमें कहीं दिखाई देता है तो हम फिसल जाते हैं. हम यह भूल जाते हैं कि बिना श्रम और अथक परिश्रम के कुछ भी नहीं मिलता. और अगर मिलता है तो वह ठगी के मायाजाल के अलावा कुछ नहीं.

शायद यही कारण है कि आए दिन लोगों को लोग लालच देकर कुछ चतुर सुजान लोग सामने वाले की जमा पूंजी और तिजोरी खाली कर देते हैं. ऐसा ही एक बड़ा अपराध छत्तीसगढ़ के आदिवासी बाहुल्य जिला रायगढ़ में घटित हुआ जहां बड़े ही शातिर तरीके से छह वर्ष में तीन गुना राशि मिलने के लालच में किसान 12 लाख रुपए के ठगी का शिकार बनाया गया. यही नहीं जाने कितने ग्रामीण और किसान लालच और फंदे बाजी के शिकार हो गए.

एडीवी के्रेडिट को ऑपरेटिव सोसायटी लिमिटेड में जमा राशि की जानकारी लेने के लिए किसान जब तीन साल बाद पहुंचा तो पता चला कि कंपनी में ताला लगा हुआ है. जिसकी शिकायत कलेक्टर व एसपी से करते हुए इस मामले में जांच कर जमा राशि वापस दिलाने की मांग की गई .

सहदेवपाली रायगढ़ निवासी भोकलो निषाद ने जिलाधीश तक अपनी फरियाद पहुंचाई बताया कि स्वयं की करीब 3 एकड़ जमीन को करीब 4 साल पहले विक्रय किया था जिसके एवज में उसको १२ लाख रुपए मिला था जिसे वह आंध्रा बैंक में जमा कर रखा था लेकिन इसी बीच डभरा के ससुराल के कुंजबिहारी पटेल डोमनपुर वाले आए और 6 साल में तीन गुना राशि दिलाने का प्रलोभन दे मुझे आंध्रा बैंक ले जाकर जमा राशि का आहरण करा लिए.

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और कुछ इस तरह ‘”शिकार” बनाया!

आहरण राशि 12 लाख रुपए को एडीवी क्रेडिट को आपरेटिव सोसायटी लिमिटेड कंपनी में जमा कराने कहा गया. और मुझे बड़ी-बड़ी बातें ख्वाब दिखा कर लालच देकर राशि ले ली गई. लेकिन अब जब पैसे की जरूरत पड़ी तो मैं एजेंट कुंजबिहारी पटेल के पास गया और राशि निकलवाने की बात कही जिस पर कुंजबिहारी ने कह दिया कि कंपनी बंद हो गई है राशि कहां से दिलाऊं. पीड़ित शख्स ने
जब कृष्णा कॉम्प्लेक्स स्थित कंपनी के कार्यालय में पता साजी किया गया तो पता चला कि पिछले लंबे समय से वह बंद है. किसान ने उक्त बातों से जिला प्रशासन को अवगत कराते हुए एजेंट व कंपनी के डायरेक्टर के खिलाफ जांच कराते हुए एफआईआर दर्ज करने व राशि वापस दिलाने की मांग की. हमारे संवाददाता ने जब इस संदर्भ में खोजबीन की और पुलिस अधिकारियों से चर्चा की तो यह तथ्य सामने आया कि रायगढ़ जिला में अनेक किसानों को इस तरह अलग-अलग दलालों द्वारा ठगा गया है.
पुलिस अधिकारी बताते हैं कि लगभग 15 करोड़ के ठगी की आशंका जिले में है. उक्त किसान ने बताया कि जिले में उक्त कंपनी करीब चार-पांच साल से लगातार काम करती रही . इस बीच सैकड़ों लोगों से करीब 10 से 15 करोड़ रुपए ठगी होने की संभावना है. कंपनी के खिलाफ सख्ती से जांच होने पर इसका खुलासा होने की बात कही जा रही है. वही यह सच भी सामने आ गया है कि पहले भी इस कथित कंपनी के खिलाफ ग्रामीणों ने शिकायत की थी मगर प्रशासन ने कोई कार्रवाई नहीं की. तथ्य बताते हैं कि कंपनी जब शुरू में रायगढ़ शहर के ईतवारी बाजार में चालू हुई तो कुछ लोगों ने कंपनी के खिलाफ शिकायत की थी, जिस पर पुलिस व अल्प बचत अधिकारी ने कंपनी के दस्तावेजों की जांच की थी. इसके बाद भी इतने लंबे समय तक कंपनी चलती रही और अब ऐसी शिकायत सामन आ रही है. कुल मिलाकर संभावना यह है कि कंपनी के दलालों ने शासन प्रशासन को भी अपनी गिरफ्त में ले लिया था और इस तरह जिला में दोनों हाथों से किसानों ग्रामीणों को भ्रमित करके करोड़ों रुपए लूट लिए गए.

अपना बनकर अपनों को बनाते हैं उल्लू!

दरअसल, इस तरह की कंपनियां लोगों को बहुत अधिक बोनस कमीशन आदि का लालच देकर अपना एजेंट बना लेते हैं और एजेंट अपने आसपास के लोगों को अपने पहचान के रिश्तेदारों को भी उल्लू बनाने लगते हैं. क्योंकि उनकी नजर मोटे कमीशन और बोनस पर रहती है वह यह नहीं समझ पाते हैं कि जब 25 प्रतिशत का कमीशन उन्हें मिल रहा है, अच्छा खासा बोनस मिल रहा है तो कंपनी आखिर किस तरह लंबे समय तक चल सकती है.

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ऐसी ही एक घटना जिला रायगढ़ में घटित हुई जिसमें रायगढ़ स्टेशन चौक स्थित हाेटल संचालक ने अपने दाे खास परिचितों के खिलाफ फायनेंस कंपनी से दाे गुना लाभ कमाने के नाम पर लाखाें रुपए की धाेखाधड़ी करने का मामला दर्ज कराया . पुलिस ने ठगी करने वाले लाेगाें के खिलाफ जांच शुरू की है.काेतवाली पुलिस थाने में दराेगापारा निवासी विधानचंद्र गांधी ने बताया कि उसका स्टेशन चौक पर हाेटल स्थित है. 2018 में पड़ाेस में रहने वाले राजेश मिश्रा अपने साथ लक्ष्मेशवर ठाकुर काे उसके हाेटल पर ठहराने के लिए लाए थे. पड़ोसी राजेश ने लक्ष्मेश्वर से उसकी जान पहचान कराई.कुछ दिन रुकने के बाद वह वापस दिल्ली चला गया. राजेश ने बताया कि वह किसी बड़ी फायनेंस कंपनी काे संभाल रहा है.इसमें पैसा लगाने पर दाे गुना लाभ मिलने का भरोसा दिलाया. विधानचंद्र पड़ाेसी की बात में आ गया और उसने कई किस्तों में 12 लाख 50 हजार रुपए फाइनेंस कंपनी में लगाने के नाम पर लक्ष्मेश्वर काे दिए। आराेप है कि दिसंबर दाे 2019 तक दाेनाें अच्छे से बात कर लाभ पहुंचाने के बात कहते रहे, पर जनवरी 2020 में जब फाइनेंस कंपनी में लगाई गई रकम मांगने तथा दाे गुना लाभ दिलाने की बात कही जाने लगी ताे लक्ष्मेशवर ठाकुर टाल मटाेल करने लगा.

अच्छा हो हमें यह समझ ले कि कभी भी अनजानी कंपनियों में अपना बेशकीमती मेहनत का पैसा जमा ना करें दुगना पैसे का लालच हमें बर्बाद कर देता है. अंचल के प्रसिद्ध समाजसेवी इंजीनियर रमाकांत के मुताबिक लोग लोभ लालच में ना आएं, और अपनी जमा पूंजी को राष्ट्रीय कृत बैंकों में ही अथवा पोस्ट औफिस में ही जमा करें.

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Serial Story : मेरी मां का नया प्रेमी

Serial Story : मेरी मां का नया प्रेमी – भाग 2

कुछकुछ आभास श्वेता को उन की डायरी से ही हुआ था. एक बार उन की डायरी में कुछ कविताओं के अंश नोट किए हुए मिले थे.

‘तुम चले जाओगे पर थोड़ा सा यहां भी रह जाओगे, जैसे रह जाती है पहली बारिश के बाद हवा में धरती की सोंधी सी गंध.’

एक पृष्ठ पर लिखी ये पंक्तियां पढ़ कर तो श्वेता भौचक ही रह गई थी…सब कुछ बीत जाने के बाद भी बचा रह गया है प्रेम, प्रेम करने की भूख, केलि के बाद शैया में पड़ गई सलवटों सा… सबकुछ नष्ट हो जाने के बाद भी बचा रहेगा प्रेम, …दीपशिखा ही नहीं, उस की तो पूरी देह ही बन गई है दीपक, प्रेम में जलती हुई अविराम…

मम्मी अचानक ही आ गई थीं और डायरी पढ़ते देख एक क्षण को सिटपिटा गई थीं. बात को टालने और स्थिति को बिगड़ने से बचाने के लिए श्वेता खिसियायी सी हंस दी थी, ‘‘यह कवि आप को बहुत पसंद आने लगे हैं क्या, मम्मी?’’

‘‘नहीं, तुम गलत समझ रही हो,’’ मम्मी ने व्यर्थ हंसने का प्रयत्न किया था, ‘‘एक छात्रा को शोध करा रही हूं नए कवियों पर…उन में इस कवि की कविताएं भी हैं. उन की कुछ अच्छी पंक्तियां नोट कर ली हैं डायरी में. कभी कहीं भाषण देने या क्लास में पढ़ाने में काम आती हैं ऐसी उजली और दो टूक बात कहने वाली पंक्तियां.’’ फिर मां ने स्वयं एक पृष्ठ खोल कर दिखा दिया था, ‘‘यह देखो, एक और कवि की पंक्तियां भी नोट की हैं मैं ने…’’ वह बोली थीं.

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उस पृष्ठ को वह एक सांस में पढ़ गई थी, ‘‘धीरेधीरे जाना प्यार की बहुत सी भाषाएं होती हैं दुनिया में, देश में और विदेश में भी लेकिन कितनी विचित्र बात है प्यार की भाषा सब जगह एक ही है और यह भी जाना कि वर्जनाओं की भी भाषा एक ही होती है…प्यार की भाषा में शब्द नहीं होते सिर्फ अक्षर होते हैं और होती हैं कुछ अस्फुट ध्वनियां और उन्हीं को जोड़ कर बनती है प्यार की भाषा…’’

मां के उत्तर से वह न सहमत हुई थी, न संतुष्ट पर वह व्यर्थ उन से और इस मसले पर उलझना नहीं चाहती थी. शायद यह सोच कर चुप लगा गई थी कि मां भी आखिर हैं तो एक स्त्री ही और स्त्री में प्रेम पाने की भूख और आकांक्षा अगर आजीवन बनी रह जाए तो इस में आश्चर्य क्या है?

पिता के साथ मां ने एक लंबा वैवाहिक जीवन जिया था. उस दुर्घटना में वह अचानक मां को अकेला छोड़ कर चले गए थे. शरीर की कामनाएंइच्छाएं तो अतृप्त रह ही गई होंगी…55-56 साल की उम्र थी तब मम्मी की. इस उम्र में शरीर पूरी तरह मुरझाता नहीं है. फिर पिता महीने 2 महीने में ही घर आ पाते थे. पूरा जीवन तो मां ने एक अतृप्ति के साथ बियाबान रेगिस्तान में प्यासी हिरणी की तरह मृगतृष्णा में काटा होगा…आगे और आगे जल की तलाश में भटकी होंगी…और वह जल उन्हें मिला होगा अमन अंकल में या हो सकता है मिल रहा हो प्रभु अंकल में.

एक शहर के महाविद्यालय में किसी व्याख्यान माला में भाषण देने गई थीं मम्मी. उन के परिचय में जब वहां बताया गया कि साहित्य में उन का दखल एक डायरी लेखिका के रूप में भी है तो उन के भाषण के बाद एक सज्जन उन से मिलने उन के निकट आ गए, ‘‘आप ही

डा. कुमुदजी हैं जिन की डायरियों के कई अंश…’’ मम्मी उठ कर खड़ी हो गई थीं, ‘‘आप का परिचय?’’

‘‘यहां निकट ही एक नेशनल पार्क है… मैं उस में एक छोटामोटा अधिकारी हूं.’’ इसी बीच महाविद्यालय के एक प्राध्यापकजी टपक पड़े थे, ‘‘हां, कुमुदजी यह छोटे नहीं मोटे अधिकारी हैं. वन्य जीवों पर इन्होंने अनेक शोध कार्य किए हैं. हमारे जंतु विज्ञान विभाग में यह व्याख्यान देने आते रहते हैं. यह विद्यार्थियों को जानवरों से संबंधित बड़ी रोचक जानकारियां देते हैं. अगर आप के पास समय हो तो आप इन का नेशनल पार्क अवश्य देखने जाएं… आप को वहां कई नए अनुभव होंगे.’’

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श्वेता को मां ने बताया था, ‘‘यह महाशय ही प्रभुनाथ हैं.’’

मां की डायरी में बाद में श्वेता ने पढ़ा था.

‘किसीकिसी आदमी का साथ कितना अपनत्व भरा होता है और उस के साथ कैसे एक औरत अपने को भीतर बाहर से भरीभरी अनुभव करती है. क्या सचमुच आदमी की उपस्थिति जीवन में इतनी जरूरी होती है? क्या इसी जरूरीपन के कारण ही औरत आदमी को आजीवन दुखों, परेशानियों के बावजूद सहती नहीं रहती?’

खालीपन और अकेलेपन, भीतर के रीतेपन को भरने के लिए जीवन में क्या सचमुच किसी पुरुष का होना नितांत आवश्यक नहीं है…कहीं कोई आदमी आप के जीवन में होता है तो आप को लगता रहता है कि कहीं कोई है जिसे आप की जरूरत है, जो आप की प्रतीक्षा करता है, जो आप को प्यार करता है…चाहता है, तन से भी, मन से भी और शायद आत्मा से भी…

प्रभुनाथ के साथ पूरे 7 दिन तक नेशनल पार्क के भीतर जंगल के बीच में बने आरामदेय शानदार हट में रही… तरहतरह के जंगली जंतु तो प्रभुनाथ ने अपनी जीप में बैठा कर दिखाए ही, थारू जनजाति के गांवों में भी ले गए और उन के बारे में अनेक रोचक और विचित्र जानकारियां दीं, जिन से अब तक मैं परिचित नहीं थी.

‘दुनिया में कितना कुछ है जिसे हम नहीं जानते. दुनिया तो बहुत बड़ी है, हम अपने देश को ही ठीक से नहीं जानते. इस से पहले हम ने कभी सपने में भी कल्पना नहीं की थी कि यह नेशनल पार्क…यह मनोरम जंगल, जंगल में जानवरों, पेड़पौधों की एक भरीपूरी विचित्र और अद्भुत आनंद देने वाली एक दुनिया भी होती है, जिसे हर आदमी को जीवन में जरूर देखना और समझना चाहिए.’

प्रभुनाथ ने चपरासी को मोटर- साइकिल से भेज कर भोजन वहीं उसी आलीशान हट में मंगा लिया था. साथ बैठ कर खाया. खाने के बाद प्रभुनाथ उठे और बोले, ‘‘तो ठीक है मैडम…आप यहां रातभर आराम करें. हम अपने क्वार्टर में जा कर रहेंगे.’’

‘‘नहीं. मैं अकेली हरगिज इस जंगल में नहीं रहूंगी,’’ मैं हड़बड़ा गई थी, ‘‘रात हो आई है और जानवरों की कैसी डरावनीभयावह आवाजें रहरह कर आ रही हैं. कहीं कोई आदमखोर यहां आ गया और उस ने इस हट के दरवाजे को तोड़ कर मुझ पर हमला कर दिया तो?’’

‘‘क्या आप को इस हट का कोई दरवाजा टूटा या कमजोर नजर आता है? हर तरह से इसे सुरक्षित बनाया गया है. इस में देश और प्रदेश के मंत्री, सचिव और आला अफसर, उन के परिवार आ कर रहते हैं. मैडम, आप चिंता न करें. बस रात को कोई जानवर या आदमी दरवाजे को धक्का दे, पंजों से खरोंचे तो आप दरवाजा न खोलें. यहां आप को पीने के लिए पानी बाथरूम में मिलेगा. चाय-कौफी बनाना चाहेंगी तो उस के लिए गैसस्टोव और सारी जरूरी क्राकरी व सामग्री किचन में मिलेगी. बिस्तर आरामदेय है. हां, रात में सर्दी जरूर लगेगी तो उस के लिए 2 कंबल रखे हुए हैं.’’

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‘‘वह सब ठीक है प्रभु…पर मैं यहां अकेली नहीं रहूंगी या तो आप साथ रहें या फिर हमें भी अपने क्वार्टर की तरफ के किसी क्वार्टर में रखें.’’

‘‘नहीं मैडम,’’ वह मुसकराए, ‘‘आप डायरी लेखिका हैं. हिंदी की अच्छी वक्ता और प्रवक्ता हैं. हम चाहते हैं कि आप यहां के वातावरण को अपने भीतर तक अनुभव करें. देखें कि कैसा लगता है. बिलकुल नया सुख, नया थ्रिल, नया अनुभव होगा…और वह नया थ्रिल आप अकेले ही महसूस कर पाएंगी…किसी के साथ होने पर नहीं.

‘‘आप देखेंगी, जीवन जब खतरों से घिरा होता है…तो कैसाकैसा अनुभव होता है…जान बचे, इस के लिए ऐसेऐसे देवता आप को मनाने पड़ते हैं जिन की याद भी शायद आप को अब तक कभी न आई हो…बहुत से लेखक इस अनुभव के लिए ही यहां इस हट में आ कर रहना पसंद करते हैं.’’

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‘‘वह तो सब ठीक है…पर आप को मैं यहां से जाने नहीं दूंगी.’’ फिर कुछ सोच कर पूछ बैठीं, ‘‘बाहर गेट के क्वार्टरों में आप की प्रतीक्षा पत्नीबच्चे भी तो कर रहे होंगे? अगर ऐसा है तो आप जाएं पर हमें भी वहीं किसी क्वार्टर में रखें.’’

गंभीर बने रहे काफी देर तक प्रभुनाथ. फिर एक लंबी सांस छोड़ते हुए बोले, ‘‘अपने बारे में किसी को मैं कम ही बताता हूं. यहां बाईं तरफ जो छोटा कक्ष है उस में एक अलमारी में जहां वन्य जीवजंतुओं से संबंधित पुस्तकें हैं वहीं मेरे द्वारा लिखी गई और शोध के रूप में तैयार पुस्तक भी है. अकसर यहां मंत्री लोग और अफसर अपनी किसी न किसी महिला मित्र को ले कर आते हैं और 2-3 दिन तक उस का जम कर देह सुख लेते हैं. उन के लिए हम लोग यहां हर सुविधा जुटा कर रखते हैं. क्या करें, नौकरी करनी है तो यह सब भी इंतजाम करने पड़ते हैं…’’

झेंप गईं डा. कुमुद, ‘‘खैर, वह सब छोडि़ए. आप अपने परिवार के बारे में बताइए.’’

‘‘एक बार हम पिकनिक मनाने यहां इसी हट पर अपने परिवार के साथ आए हुए थे. अधिक रात होने पर पता नहीं पत्नी को क्या महसूस हुआ कि बोली, ‘यहां से चलिए, बाहर के क्वार्टरों में ही रहेंगे. यहां न जाने क्यों आज अजीब सा भय लग रहा है.’ हम जीप में बैठ कर वापस बाहर की तरफ चल दिए. पत्नी, लड़की और लड़का. हमारे 2 ही बच्चे थे. अभी कुछ ही दूर चले होंगे कि खतरे का आभास हो गया. एक शेर बेतहाशा घबराया हुआ भागता हमारे सामने से गुजरा. पीछे कुछ बदमाश, जिन्हें हम लोग पोचर्स कहते हैं. जंगली जानवरों का चोरीछिपे शिकार करने वाले उन पोचरों से हमारा सामना हो गया.’’

‘‘निहत्थे नहीं थे हम. एक बंदूक साथ थी और साहसी तो मैं शुरू से रहा हूं इसीलिए यह नौकरी कर रहा हूं. बदमाशों को ललकारा कि अगर किसी जानवर को तुम लोगों ने गोली मारी तो हम आप को गोली मार देंगे. जीप को चारों ओर घुमा कर हम ने उस की रोशनी में बदमाशों की पोजीशन जाननी चाही कि तभी उन्होंने हम पर अपने आधुनिक हथियारों से हमला बोल दिया. हम संभल तक नहीं पाए… पत्नी और बेटी की मौत गोली लगने से हो गई. लड़का बच गया क्योंकि वह जीप के नीचे घुस गया था.

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‘‘मैं उन्हें ललकारता हुआ अपनी बंदूक से फायर करने लगा. गोलियों की आवाज ने गार्डों को सावधान कर दिया और वे बड़ीबड़ी टार्चों और दूसरी गाडि़यों को ले कर तेजी से इधर की तरफ हल्ला बोलते आए तो बदमाश नदी में उतर कर अंधेरे का लाभ उठा कर भाग गए.’’

‘‘फिर दूसरी शादी नहीं की,’’ उन्होंने पूछा.

‘‘लड़के को हमारी ससुराल वालों ने इस खतरे से दूर अपने पास रख कर पाला…साली से मेरी शादी उन लोगों ने तय की पर एकांत में साली ने मुझ से कहा कि वह किसी और को चाहती है और उसी से शादी भी करना चाहती है. मैं बीच में न आऊं तो ही अच्छा है. मैं ने शादी से इनकार कर दिया…’’

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‘‘लड़का कहां है आजकल?’’

डा. कुमुद ने पूछा.

‘‘बस्तर के जंगलों में अफसर है. उस की शादी कर दी है. अपनी पत्नी के साथ वहीं रहता है.’’

‘‘मैं ने तो सुना है कि बस्तर में अफसर अपनी पत्नी को ले कर नहीं जाते. एक तो नक्सलियों का खतरा, दूसरे आदिवासियों की तीरंदाजी का डर… तीसरे वहां आदमी को बहुत कम पैसों में औरत रात भर के लिए मिल जाती है.’’ इतना कह कर डा. कुमुद मुसकरा दीं.

‘‘जेब में पैसा हो तो औरत सब जगह उपलब्ध है…यहां भी और कहीं भी… इसलिए मैं ने शादी नहीं की. जरूरत पड़ने पर कहीं भी चला जाता हूं.’’ प्रभु मुसकराए.

‘‘हां, पुरुष होने के ये फायदे तो हैं ही कि आप लोग बेखटके, बिना किसी शर्म के, बिना लोकलाज की परवा किए, कहीं भी देहसुख के लिए जा सकते हैं…पैसों की कमी होती नहीं है आप जैसे बड़े अफसरों को…अच्छी से अच्छी देह आप प्राप्त कर सकते हैं. मुश्किल तो हम संकोचशील औरतों की है. हमें अगर देह- सुख की जरूरत पड़े तो हम बेशर्मी लाद कर कहां जाएं? किस से कहें?’’

‘‘वक्त बहुत बदल गया है कुमुदजी…अब औरतें भी कम नहीं हैं. वह बशीर बद्र का शेर है न… ‘जी तो बहुत चाहता है कि सच बोलें पर क्या करें हौसला नहीं होता, रात का इंतजार कौन करे आजकल दिन में क्या नहीं होता.’’’

मुसकराती रहीं कुमुद देर तक, ‘‘बड़े दिलचस्प इनसान हैं आप भी, प्रभुनाथजी.’’

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श्वेता डायरी के अगले पृष्ठ को पढ़ कर अपने धड़कते दिल को मुश्किल से काबू में कर पाई थी…

मां ने लिख रखा था… ‘7 दिन रही उस नेशनल पार्क में और जो देहसुख उन 7 दिनों में प्राप्त किया शायद अगले 7 जन्मों में प्राप्त न हो सके. आदमी का सुख वास्तव में अवर्णनीय, अव्याख्य और अव्यक्त होता है…इस सुख को सिर्फ देह ही महसूस कर सकती है…उम्र और पदप्रतिष्ठा से बहुत दूर और बहुत अलग…’.

Serial Story : मेरी मां का नया प्रेमी – भाग 1

श्वेता ने मां को फोन लगाया तो फोन पर किसी पुरुष की आवाज सुन कर वह चौंक गई…कौन हो सकता है? एक क्षण को उस के दिमाग में सवाल कौंधा. अमन अंकल तो होने से रहे. मां ने ही एक दिन बताया था, ‘तुम्हारे अमन अंकल को बे्रन स्ट्रोक हुआ था. अचानक ब्लडप्रेशर बहुत बढ़ गया था. आधे धड़ को लकवा मार गया. उन के लड़के आए थे, अपने साथ उन्हें हैदराबाद लिवा ले गए.’

‘‘हैलो…बोलिए, किस से बात करनी है आप को?’’ सहसा वह अपनी चेतना में वापस लौटी. संयत आवाज में पूछा, ‘‘आप…आप कौन? मां से बात करनी है. मैं उन की बेटी श्वेता बोल रही हूं.’’ स्थिति स्पष्ट कर दी.

‘‘पास के जनरल स्टोर तक गई हैं. कुछ जरूरी सामान लाना होगा. रोका था मैं ने…कहा भी कि लिख कर हमें दे दो, ले आएंगे. पर वह कोई स्पेशल डिश बनाना चाहती हैं शाम को. तुम्हें तो पता होगा, पास में ही सब्जी की दुकान है. वहां वह अपनी स्पेशल डिश के लिए कुछ सब्जियां लेने गई हैं…पर यह सब मैं तुम से बेकार कह रहा हूं. तुम मुझे जानती नहीं होगी. इस बीच कभी आई नहीं तुम जो मुझे देखतीं और हमारा परिचय होता… बस, इतना जान लो…मेरा नाम प्रभुनाथ है और तुम्हारी मां मुझे प्रभु कहती हैं. तुम चाहो तो प्रभु अंकल कह सकती हो.’’

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‘‘प्रभु अंकल…जब मां आ जाएं, बता दीजिएगा…श्वेता का फोन था.’’ और इतना कह कर उस ने फोन काट दिया. न स्वयं कुछ और कहा, न उन्हें कहने का अवसर दिया.

श्वेता की बेचैनी उस फोन के बाद बहुत बढ़ गई. कौन हो सकते हैं यह महाशय? क्या अमन अंकल की तरह मां ने किसी नए…आगे सोचने से खुद हिचक गई श्वेता. कैसे सोचे? मां आखिर मां होती है. उन के बारे में हमेशा, हर बार, हर पुरुष को ले कर हर ऐसीवैसी बात कैसे सोची जा सकती है?

फिर भी यह सवाल तो है ही कि प्रभुनाथ अंकल कौन हैं? कैसे होंगे? कितनी उम्र होगी? मां से कब, कहां, कैसे, किन हालात में मिले होंगे और उन का संबंध मां से इतना गहरा कैसे बन गया कि मां अपना पूरा घर उन के भरोसे छोड़ कर पास के जनरल स्टोर तक चली गईं… सामान और स्पेशल डिश के लिए सब्जियां लेने…

इस का मतलब हुआ प्रभु अंकल मां के लिए कोई स्पेशल व्यक्ति हैं…लेकिन यह नाम पहले तो कभी मां से सुना नहीं. अचानक कहां से प्रकट हो गए यह अंकल? और इन का मां से क्या संबंध होगा…जिन के लिए मां स्पेशल डिश बनाती हैं…कह रहे थे कि जब वह आते हैं तो मां जरूर कोई न कोई स्पेशल डिश बनाती हैं…इस का मतलब हुआ यह महाशय वहां नहीं, कहीं और रहते हैं और कभीकभार ही मां के पास आते हैं.

अड़ोसपड़ोस के लोग अगर देखते होंगे तो मां के बारे में क्या सोचते होंगे? कसबाई शहर में इस तरह की बातें पड़ोसियों से कहां छिपती हैं? मां ने क्या कह कर उन का परिचय पड़ोसियों को दिया होगा? और उस परिचय पर क्या सब ने यकीन कर लिया होगा?

स्थिति पर श्वेता जितना सोचती जाती, उतने ही सवालों के घेरे में उलझती जाती. पिछली बार जब वह मां से मिलने गई थी तो उन की लिखनेपढ़ने की मेज पर एक नई डायरी रखी देखी थी. मां को डायरी लिखने का शौक है और महिला होने के नाते उन की वह डायरी अकसर पत्रपत्रिकाओं में छपती भी रहती है, अखबारों के साहित्य संस्करणों से ले कर साहित्यिक पत्रिकाओं तक में उन के अंश छपते हैं. चर्चा भी होती है. शहर में सब इसलिए भी उन्हें जानते हैं कि वहां के महाविद्यालय में हिंदी की प्रवक्ता थीं. लंबी नौकरी के बाद वहीं से रिटायर हुईं. मकान पिता ही बना गए थे. अवकाश प्राप्त जिंदगी आराम से वहीं गुजार रही हैं. भाई विदेश में है. श्वेता के पास आ कर वह रहना नहीं चाहतीं. बेटीदामाद के पास आ कर रहना उन्हें अपनी स्वतंत्रता में बाधक ही नहीं लगता बल्कि अनुचित भी लगता है.

इंतजार करती रही श्वेता कि मां अपनी तरफ से फोन करेंगी पर उन का फोन नहीं आया. मां की डायरी में एक अंगरेजी कवि का वाक्य शुरू में ही लिखा हुआ पढ़ा था ‘इन यू ऐट एव्री मोमेंट, लाइफ इज अबाउट टू हैपन.’ यानी आप के भीतर हर क्षण, जीवन का कुछ न कुछ घटता ही है…जीवन घटनाविहीन नहीं होता.

महाविद्यालय में पढ़ते समय भी श्वेता अपनी सहेलियों से मां की प्रशंसा सुनती थी. बहुत अच्छा बोलती हैं. उन की स्मृति गजब की है. ढेरों कविताओं के उदाहरण वह पढ़ाते समय देती चली जाती हैं. भाषा पर जबरदस्त अधिकार है. कालिज में शायद ही कोई उन जैसे शब्दों का चयन अपने व्याख्यान में करता है. पुरुष अध्यापक प्रशंसा में कह जाते हैं कि प्रो. कुमुदजी पता नहीं कहां से इतना वक्त निकाल लेती हैं यह सब पढ़नेलिखने का?

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कुछ मुंहफट जड़ देते कि पति रेलवे में स्टेशन मास्टर हैं. अकसर इस स्टेशन से उस स्टेशन पर फेंके जाते रहते हैं. बाहर रहते हैं और महीने में दोचार दिन के लिए ही आते हैं. इसलिए पति को ले कर उन्हें कोई व्यस्तता नहीं है. रहे बच्चे तो वे अब बड़े हो गए हैं. बेटा आई.आई.टी. में पढ़ने बाहर चला गया है. कल को वहां से निकलेगा तो विदेश के दरवाजे उसे खुले मिलेंगे. लड़की पढ़ रही है. योग्य वर मिलते ही उस की शादी कर देंगी. फुरसत ही फुरसत है उन्हें…पढ़ेंगीलिखेंगी नहीं तो क्या करेंगी?

श्वेता एम.ए. के बाद शोधकार्य करना चाहती थी पर पिता को अपने एक मित्र का उपयुक्त लड़का जंच गया. रिश्ता तय कर दिया और श्वेता की शादी कर दी. बी.एड. उस ने शादी के बाद किया और पति की कोशिशों से उसे दिल्ली में एक अच्छे पब्लिक स्कूल में नौकरी मिल गई. पति एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में उच्च पद पर थे. व्यस्तता के बावजूद श्वेता अपने संबंध और कार्य से खुश थी. छुट्टियों में जबतब मां के पास हो आती, कभी अकेली, कभी बच्चों के साथ, तो कभी पति भी साथ होते.

आई.आई.टी. के तुरंत बाद भाई अमेरिका चला गया था. इधर मंदी के चलते अमेरिका से भारत आना उस के लिए अब संभव न था. कहता है अगर नौकरी से महीने भर बाहर रहा तो कंपनी समझ लेगी कि बिना इस आदमी के काम चल सकता है तो क्यों व्यर्थ में एक आदमी की तनख्वाह दी जाए. वैसे भी अमेरिका में जौब की बहुत मारामारी चल रही है.

फिर भी भाई को पिता की एक हादसे में हुई मृत्यु के बाद आना पड़ा था और बहुत जल्दी क्रियाकर्म कर के वापस चला गया था. पिता उस दिन अपने नियुक्ति वाले स्टेशन से घर आ रहे थे लेकिन टे्रन को एक छोटे स्टेशन पर भीड़ ने आंदोलन के चलते रोक लिया था. टे्रन पर पत्थर फेंके गए तो कुछ दंगाइयों ने टे्रन में आग लगा दी. जिस डब्बे में पिताजी थे उस डब्बे को लोगों ने आग लगा दी थी. सवारियां उतर कर भागीं तो उन पर दंगाइयों ने ईंटपत्थर बरसाए.

पत्थर का एक बड़ा टुकड़ा पिता के सिर में आ कर लगा तो वह वहीं गिर पड़े. साथ चल रहे अमन अंकल ने उन्हें उठाया. सिर से खून बहुत तेजी से बह रहा था. लोगों ने उन्हें ले कर अस्पताल तक नहीं जाने दिया. रास्ता रोके रहे. हाथपांव जोड़ कर अमन अंकल ने किसी तरह पिताजी को कहीं सुरक्षित जगह ले जाने का प्रयास किया पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी और उन की मृत्यु हो गई थी.

भाई ने पिता के फंड, पेंशन आदि की सारी जिम्मेदारी अमन अंकल को ही सौंप दी थी, ‘‘अंकल आप ही निबटाइए ये सरकारी झमेले. आप तो जानते हैं, इन कामों को निबटाने में महीनों लगेंगे, अगर मैं यहां रुक कर यह सब करता रहा तो मेरी नौकरी चली जाएगी.’’

‘‘तुम चिंता न करो. अपनी नौकरी पर जाओ. यहां मैं सब संभाल लूंगा. इसी रेलवे विभाग में हूं. जानता हूं. ऊपर से नीचे तक लेटलतीफी का राज कायम है.’’

अमन अंकल ने ही फिर सब संभाला था. बाद में उन का ट्रांसफर वहीं हो गया तो काम को निबटाने में और अधिक सुविधा रही. तब से अमन अंकल का हमारे परिवार से संबंध जुड़ा. वह अरसे तक जारी रहा. उन का एक ही लड़का था जो आई.टी. इंजीनियर था. पहले बंगलौर में नौकरी पर लगा था. बाद में ऊंचे वेतन पर हैदराबाद चला गया.

अमन अंकल की पत्नी की मृत्यु कैंसर से हो गई थी. नौकरी शेष थी तो अमन अंकल वहीं रह कर नौकरी निभाते रहे. इस बीच उन का हमारे परिवार में आनाजाना जारी रहा. मां की उन्होंने बहुत देखरेख की. पिता की मृत्यु का सदमा वह उन्हीं के कारण सह सकीं. यह उन का हमारे परिवार पर उपकार ही रहा. बाकी मां से उन के क्या और कैसे संबंध रहे, वह अधिक नहीं जानती.

मैट्रीमोनियल साइट्स ठगी से ऐसे बचें

डिजिटल तकनीक के इस दौर में हर काम औनलाइन करने का चलन बढ़ रहा है. शादीब्याह जैसे कामों के लिए बाकायदा कई मैरिज ब्यूरो और इंटरनैट पर मैट्रिमोनियल वैबसाइट हैं, जिन पर वरवधू के प्रोफाइल आसानी से मिल जाते हैं. इन वैबसाइटों पर दी गई जानकारी को सच मान कर बिना जांचपड़ताल किए रिश्ते तय करने का खमियाजा भी लोगों को उठाना पड़ रहा है.

मैट्रिमोनियल वैबसाइट पर ठगी का शिकार अकेली लड़कियां ही नहीं  होतीं, बल्कि लड़के भी होते हैं. अगस्त, 2020 में मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर में एक जवान लड़की से जीवनसाथी डौटकौम पर फर्जी प्रोफाइल बना कर एक लाख, 92 हजार रुपए ऐंठने का एक ऐसा ही मामला सामने आया.

फर्राटेदार इंगलिश बोलने वाले और खुद को एनआरआई डाक्टर बता कर जवान लड़कियों को शादी के  झांसे में फंसा कर पैसे ऐंठने वाले एक 46 साल के शातिर ठग को स्टेट साइबर सैल ने गिरफ्तार किया.

स्टेट साइबर सैल के एसपी अंकित शुक्ला ने बताया कि पुणे की एक नामचीन कंपनी में काम कर रही जबलपुर की रहने वाली एक लड़की ने मामले की शिकायत कर बताया था कि जीवनसाथी डौटकौम पर डाक्टर ब्रुशाल कर्वे नाम से एक जालसाज ने खुद का प्रोफाइल बना रखा है. इस्तांबुल, तुर्की में डाक्टर होने का हवाला दे कर उस ने पीडि़त लड़की को भारत में मिलने की इच्छा जताई और फिर कस्टम में फंसने का  झांसा दिया और अपने अकाउंट में औनलाइन एक लाख, 92 हजार रुपए ट्रांसफर करवा लिए.

पीडि़त लड़की की शिकायत पर जिस आरोपी को जबलपुर स्टेशन के पास से गिरफ्तार किया गया, वह मुंबई का रहने वाला वैभव सतीश कपले है.

वैभव मूल रूप से नागपुर का रहने वाला है. उस के मांबाप की बचपन में ही मौत हो चुकी है. मुंबई में होस्टल में रह कर पढ़ाई कर के वह लंदन में डैंटिस्ट असिस्टैंट का डिप्लोमा कर चुका है. इस के पहले वह मुंबई में डाटा एंट्री औपरेटर का काम करता था. इस वजह से वह फर्राटेदार इंगलिश, मराठी और हिंदी बोलता है.

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खुद की शादी के लिए उस ने मैरिज ब्यूरो साइट पर अपना फर्जी प्रोफाइल बनाया. एक लड़की ने उसे 5,000 रुपए की मदद कर दी, तभी से उसे ठगी का आइडिया आया और उस ने अलगअलग मैरिज ब्यूरो पर अलगअलग नाम, फोटो और देश से प्रोफाइल बना कर जवान लड़कियों को शादी के  झांसे फंसाने का काम शुरू कर दिया.

जबलपुर की लड़की को ठगने के लिए ने वैभव ने खुद को महाराष्ट्र यूनिवर्सिटी औफ हैल्थ साइंस, नासिक का ग्रेजुएट बताया. लंदन में सर्जन के काम का अनुभव होने के साथ ही उस ने बताया कि उस की सालाना आमदनी डेढ़ लाख डौलर है. इस से पहले वह मुंबई, पुणे, जलगांव, खंडवा, इंदौर व देवास में रह कर ठगी की वारदातों को अंजाम दे चुका है. पुलिस को इन जगहों पर उस के बैंक खाते भी मिले हैं.

मैट्रिमोनियल साइट्स के जरीए ठगी का यह अकेला मामला नहीं है. इसी तरह के एक और मामले में पंजाब की मोगाअकालसर रोड की रहने वाली केवल कौर ने 13 अक्तूबर, 2017 को पुलिस को शिकायत में बताया कि उस की शादी  12 मार्च, 2015 को चूड़चक्क के मूल बाशिंदे और वर्तमान में कनाडा में रह रहे कमलदीप सिंह के साथ हुई थी.

शादी से पहले दोनों परिवारों के बीच 33 लाख रुपए में शादी की डील हुई थी, जिस के मुताबिक शादी के समय  29 लाख रुपए नकद दिए गए थे और  4 लाख रुपए शादी में खर्च किए गए थे.

केवल कौर ट्रिपल एमए थी और उस की 5 बहनें थीं. वह शादी कर विदेश जाने के चक्कर में ठगी की शिकार हुई थी. शादी के 2 महीनों के बाद पति कमलदीप अपने परिवार के साथ विदेश लौट गए. उस के बाद न तो वे वापस लौटे और न ही उसे विदेश बुलाया.

पहले तो कुछ दिन तक पति व उस के घर वालों के फोन आते रहे, फिर धीरेधीरे फोन आने बंद हो गए.

केवल कौर ने बताया कि उसे उम्मीद थी कि शायद विदेश से वीजा व दूसरे दस्तावेज पूरे करने में समय लग रहा होगा, मगर समय बीतने के बाद उसे अहसास हो गया कि वह शादी के नाम पर ठगी की शिकार हुई है.

एक तीसरे मामले की बात करें, तो छत्तीसगढ़ के रायपुर में रहने वाले शख्स मुकेश ने मैट्रिमोनियल साइट्स पर शादी के लिए अपना अकाउंट बनाया और एक लड़की अस्मिता से मेलजोल किया. अस्मिता ने खुद को विदेश में रहना बताया. इस दौरान दोनों के बीच शादी की बातें भी होने लगीं.

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बातचीत के दौरान मुकेश ने अस्मिता को विदेश से कुछ उपहार भेजने की बात कही, इस के बाद मुकेश अस्मिता द्वारा तैयार किए जा रहे चक्रव्यूह में फंस गया.

मुकेश के पास कई बार विदेश से खुद को सरकारी अफसर बता कर और फिर कभी खुद को पार्सल औफिस से बता कर कई लोगों ने फोन कर के कहा कि आप का उपहार काफी महंगा है, इसे भेजने के लिए आप को पैसे देने होंगे. ऐसा करते हुए मुकेश से साढ़े 9 लाख रुपए जमा करवा लिए.

जब अस्मिता की मुकेश से लगातार पैसों की मांग जारी रही, तो मुकेश और उस के परिवार वालों को सम झ आया कि वे ठगी के शिकार हो गए हैं और उन्होंने क्राइम ब्रांच में शिकायत दर्ज कराई.

ये तीनों ही मामले बताते हैं कि किस तरह शादी के नाम पर ठगी के नएनए तरीके ईजाद किए जा रहे हैं. ऐसे में जरूरी है कि केवल वैबसाइट पर प्रोफाइल में दर्ज जानकारी को सच मान कर शादी के फेर में न पड़ कर सामने वाले के बारे में सही जानकारी हासिल कर ली जाए.

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सावधानी है जरूरी

* आंख बंद कर किसी भी वैबसाइट पर रजिस्ट्रेशन न करें. पहले तो वैबसाइट के बारे में पूरी जानकारी ले कर उस के जरीए तय हुए रिश्तों के रिव्यू देखें. रजिस्ट्रेशन करते समय नई ईमेल आईडी का इस्तेमाल कर डाटा की सेंधमारी से बच सकते हैं.

* मैट्रिमोनियल साइट के जरीए रिश्ते तय करते समय संबंधित लड़केलड़की के प्रोफाइल में बताई गई जानकारी के अलावा सभी सोशल मीडिया अकाउंट्स की जानकारी जरूर हासिल कर लें. इस के साथ ही पारिवारिक बैकग्राउंड, पढ़ाईलिखाई और नौकरी की जांच के लिए उन के रिश्तेदारों या उन के पड़ोसियों से संपर्क कर हकीकत जानना बेहद जरूरी है. दोस्तों से भी जानकारी निकाली जा सकती है.

* शादी तय करते समय अगर पैसों की मांग की जा रही है, तो सावधान हो जाएं. मैट्रिमोनियल साइट्स के जरीए पैसों की मांग होने पर तुरंत साइबर पुलिस को इस की सूचना दे कर ठगी से बच सकते हैं.

* शादी से पहले अपने बैंक खाते की जानकारी सा झा न करें.

* शादी से पहले किसी भी तरह के पारिवारिक या खुद के फोटो व वीडियो सा झा न करें.

* मैट्रिमोनियल साइट्स पर संपर्क में आए शख्स से किसी भी तरह का उपहार व पैसे स्वीकार न करें, क्योंकि पहले ये आप को उपहार या तोहफा दे कर विश्वास हासिल करते हैं, बाद में परेशानियों का जिक्र कर पैसों की मांग कर के ठगी करते हैं.

* विदेशों में रह रहे लोगों से वैवाहिक रिश्ते बनाने से पहले सावधानी बरतना जरूरी है. केवल वैबसाइट की जानकारी पर भरोसा न करें. उस देश में रह रहे किसी दूसरे शख्स से संबंधित के बारे में जानकारी जुटा लें और वीजा, पासपोर्ट की प्रक्रिया शादी के पहले ही निबटा लें.

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नाईजीरियन ने मैट्रिमोनियल साइट बनाई

शादी के न्योते की फर्जी साइट बना कर सोशल मीडिया के जरीए देशभर की लड़कियों और उन के परिवार वालों के लाखों रुपए ठगने का काम बड़े ही शातिराना अंदाज में जारी था. छत्तीसगढ़ के बिलासपुर, जांजगीर, सरगुजा जैसे अनेक शहरों में तमाम लड़कियां इस जाल में फंस कर ठगी की शिकार हो गईं.

ऐसे ही एक नाईजीरियन नौजवान ने बड़ी ही चालाकी और शातिराना अंदाज का परिचय देते हुए एक मैट्रिमोनियल साइट बनाई और लड़कियों को विदेशों में बसे अमीर लड़कों के फोटो और सपने दिखा कर ब्याह कराने का  झूठ फैला कर उन्हें ठगना और भारी रकम लेना शुरू कर दिया.

पुलिस ने बताया कि फर्जी नाम से प्रोफाइल बना कर देश के कई हिस्सों में लड़कियों को शादी का  झांसा दे कर लाखों रुपए की ठगी करने वाले एक विदेशी नौजवान को छत्तीसगढ़ की कोरिया पुलिस ने गिरफ्तार करने में कामयाबी हासिल कर ली.

ठगी के इस मामले का खुलासा करते हुए कोरिया पुलिस अधीक्षक चंद्र मोहन सिंह ने बताया कि तलवापारा बैकुंठपुर के सुदामा प्रसाद साहू के बेटे उपेंद्र साहू की लिखित शिकायत पर थाना बैकुंठपुर में मुकदमा कायम किया गया.

उपेंद्र साहू ने अपनी शिकायत में बताया कि जनवरी, 2020 को उस की छोटी बहन के साथ उक्त आरोपी ने रोहन मिश्रा के नाम से फर्जी वैबसाइट बनाई और शादी करने का  झांसा दे कर व भारत में सैटल होने के नाम पर पीडि़ता से 24,07,500 रुपए की ठगी की है.

मामला दर्ज कर अज्ञात आरोपी को पकड़ने के लिए पुलिस महानिरीक्षक रतन लाल डांगी, सरगुजा रेंज के मार्गदर्शन में पुलिस अधीक्षक कोरिया चंद्र मोहन सिंह की अगुआई में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक डाक्टर पंकज शुक्ला व उपपुलिस अधीक्षक धीरेंद्र पटेल के साथ साइबर टीम कोरिया द्वारा मामले की जांचपड़ताल की जाने लगी.

नाईजीरियन आरोपी गिरफ्तार

पुलिस ने जब जांच शुरू की, तो पता चला कि तथाकथित आरोपी द्वारा ह्वाट्सएप का इस्तेमाल किया गया. साइबर टीम द्वारा मामले के सभी पहलुओं की जांच की, तो आरोपी की पहचान करने में कामयाबी मिल गई.

30 साल के आरोपी का नाम एजिडे पीटर चिनाका है. उस के पिता का नाम एजिडे ओबिना है. वैसे तो एजिडे पीटर चिनाका नाईजीरिया का है, पर फिलहाल वह उत्तर प्रदेश के नोएडा में रहता था. वह रोहन मिश्रा, अरुण राय जैसे कई नाम से धोखाधड़ी किया करता था.

इस अपराध की विवेचना के दौरान विशेष टीम को दिल्ली और नोएडा रवाना किया गया था. टीम द्वारा आरोपी के ठिकाने पर दबिश दे कर उसे गिरफ्तार कर पूछताछ की गई. आरोपी द्वारा तेलंगाना, आंध्र प्रदेश,  झारखंड, ओडिशा, हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में भी खुद को डाक्टर, इंजीनियर, कारोबारी बताते हुए लाखों रुपए की ठगी की गई.

उस के पास से 2 पासपोर्ट, 2 नाईजीरियन डैबिट कार्ड, एक एसबीआई डैबिट कार्ड, 4 मोबाइल फोन, 14 सिमकार्ड, एक वाईफाई डिवाइस, एक लैपटौप जब्त किया गया. आरोपी के पासपोर्ट और वीजा की मीआद खत्म हो चुकी है.

यहां यह भी अहम बात है कि सोशल मीडिया द्वारा ठगी किए जाने के चलते ज्यादातर मामलों में आरोपी पुलिस के शिकंजे से बच जाते हैं. ऐसे में यह पहली जरूरत होनी चाहिए कि हम ठगों के फरेब में न फंसें.

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‘यह सबकुछ सुन कर मैं धम्म से सोफे पर धंस गया तो विलियम मेरा आशय समझ मुसकरा कर कहने लगा, कि ‘डैडी, आप अकेले हो जाएंगे, इसलिए हम दोनों यह प्रस्ताव अस्वीकार कर देते हैं. वैसे तो यहां भी सबकुछ है.

‘मैं ने अपनेआप को संभाला और कहा कि वाह, मेरा बेटा और बहू इतने बड़े पद पर जा रहे हैं तो मेरे लिए यह गर्व की बात है. सच, मुझे इस से बड़ी खुशी क्या होगी?

‘जाने की तैयारियां होने लगीं. दिन तो बीत जाता पर रात में नींद न आती. कभी विलियम और जैनी तो कभी जार्ज के स्वास्थ्य की चिंता बनी रहती.

‘वह दिन भी आ गया जब लंदन एअरपोर्ट पर विलियम, जैनी और जार्ज को विदा कर भीगे मन से घर वापस लौटना पड़ा. विलियम और जैनी ने जातेजाते भी अपने वादे की पुष्टि की कि वे हर सप्ताह फोन करते रहेंगे और मुझ से आग्रह किया कि मैं उन से मिलने के लिए आस्टे्रलिया अवश्य आऊं. वे टिकट भेज देंगे.

‘मन में उमड़ते हुए उद्गार मेरे आंसुओं को संभाल न पाए. जार्ज को बारबार चूमा. एअरपोर्ट से बाहर आने के बाद वापस घर लौटने के लिए दिल ही नहीं करता था. कार को दिन भर दिशाहीन घुमाता रहा. शाम को घर लौटना ही पड़ा. सामने जार्ज की दूध की बोतल पड़ी थी. उठा कर सीने से चिपका ली और ऐथल की तसवीर के सामने फूटफूट कर रोया.

‘चार दिन बाद फोन की घंटी बजी तो दौड़ कर रिसीवर उठाया, ‘हैलो डैडी,’ यह स्वर सुनने के लिए कब से बेचैन था. मैं भर्राए स्वर में बोला, ‘तुम सब ठीक हो न, जार्ज अपने दादा को याद करता है कि नहीं?’ जैनी से भी बात की और यह जान कर दिल को बड़ा सुकून हुआ कि वे सब स्वस्थ और कुशलपूर्वक हैं.

‘विलियम ने टेलीफोन को जार्ज के मुंह के आगे कर दिया तो उस की ‘आउं आउं’ की आवाज ने कानों में अमृत सा घोल दिया. थोड़ी देर बाद फोन पर आवाजें बंद हो गईं.

‘3 महीने तक उन के टेलीफोन लगातार आते रहे, फिर यह गति धीमी हो गई. मैं फोन करता तो कभी विलियम कह देता कि दरवाजे पर कोई घंटी दे रहा है और फोन काट देता. बातचीत शीघ्र ही समाप्त हो जाती. 6 महीने इसी तरह बीत गए. कोई फोन नहीं आया तो घबराहट होने लगी.

‘एक दिन मैं ने फोन किया तो पता लगा कि वे लोग अब सिडनी चले गए हैं. यह भी कहने पर कि मैं उस का पिता हूं, नए किराएदार ने उस का पता नहीं दिया. उस की कंपनी को फोन किया तो पता चला कि उस ने कंपनी की नौकरी छोड़ दी थी. यह जान कर तो मेरी चिंता और भी बढ़ गई थी.

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‘मेरा एक मित्र आर्थर छुट्टियां मनाने 3 सप्ताह के लिए आस्ट्रेलिया जा रहा था. मैं ने अपनी समस्या उसे बताई तो बोला कि वह 2 दिन सिडनी में रहेगा और यदि विलियम का पता कहीं मिल गया तो मुझे फोन कर के बता देगा. पर आर्थर का फोन नहीं आया. 3 सप्ताह की अंधेरी रातें अंधेरी ही रहीं.

‘3 सप्ताह के बाद जब आर्थर आस्टे्रलिया से वापस आया तो आशा दुख भरी निराशा में बदल गई. विलियम और जैनी उसे एक रेस्तरां में मिले थे किंतु वे किसी आवश्यक कार्य के कारण जल्दी में उसे अपना पता, टेलीफोन नंबर यह कह कर नहीं दे पाए कि शाम को डैडी को फोन कर के नया पता आदि बता देंगे.

‘उस के फोन की आस में अब हर शाम टेलीफोन के पास बैठ कर ही गुजरती है. जिस घंटी की आवाज सुनने के लिए इन 6 सालों से बेजार हूं वह घंटी कभी नहीं सुनी. हो सकता है कि उसे डर लगता हो कि कहीं बाप आस्टे्रलिया न धमक जाए.’

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जेम्स ने एक लंबी सांस ली. मुझ से पता पूछा तो मैं ने जेब से अपना विजिटिंग कार्ड निकाल कर दे दिया और बोला, ‘मिस्टर जेम्स, किसी भी समय मेरी जरूरत हो तो अब बिना किसी झिझक के मुझे फोन कर देना. आइए, मैं आप को आप के घर छोड़ देता हूं. मेरी कार बराबर की गली में खड़ी है.’

‘धन्यवाद, मैं पैदल ही जाऊंगा क्योंकि इस प्रकार मेरा व्यायाम भी हो जाता है.’

घर आने पर देखा तो डाक में कुछ चिट्ठियां पड़ी थीं. मैं ने कोर्बी टाउन के एक स्कूल में गणित विभाग के अध्यक्ष पद के लिए साक्षात्कार दिया था. पत्र खोला तो पता चला कि मुझे नियुक्त कर लिया गया है.

नए स्कूल के लिए मैं ने अपनी स्वीकृति भेज दी. जाने में केवल एक सप्ताह शेष था. जाते हुए जेम्स से विदा लेने के लिए उस के मकान पर गया पर वह वहां नहीं था. पड़ोसी से पता लगा कि वह अस्पताल में भरती है. इतना समय नहीं था कि अस्पताल जा कर उस का हाल देख लूं.

एक दिन की मुलाकात मस्तिष्क की चेतना पर अधिक समय नहीं टिकी. समय के साथ मैं जेम्स को बिलकुल भूल गया.

वकील के पत्रानुसार नियत समय पर जेम्स के घर पर पहुंच गया. उसी दरवाजे पर घंटी का बटन दबाया जहां से 30 साल पहले जेम्स से मिले बिना ही लौटना पड़ा था. आज बड़ा विचित्र सा लग रहा था. लगभग 45 वर्षीय एक व्यक्ति ने दरवाजा खोला.

Serial Story वसीयत- आखिर सीमा और जेम्स वारन के बीच क्या रिश्ता था : भाग 3

मैं ने अपना और सीमा का परिचय दिया तो वकील ने भी अपना परिचय दे कर हमें अंदर ले जा कर एक सोफे पर बैठा दिया. वहां 3 पुरुष और 1 महिला पहले ही मौजूद थे. तीनों ही अंगरेज थे.

मार्टिन ने हम सब का परिचय कराया. एक सज्जन आर.एस.पी.सी.ए. (दि रायल सोसाइटी फार दि प्रिवेंशन आफ क्रूएल्टी टु ऐनिमल्स) का प्रतिनिधित्व कर रहे थे. अन्य 3, विलियम वारन (जेम्स वारन का पुत्र), उस की पत्नी जैनी वारन तथा जेम्स का पौत्र जार्ज वारन थे, जो आस्टे्रलिया से आए थे.

बाईं ओर छोटे से नर्म गद्दीदार गोल बिस्तर में एक बड़ी प्यारी सी काली और सफेद रंग की बिल्ली कुंडली के आकार में सोई पड़ी थी, जिस का नाम ‘विलमा’ बताया गया.

मार्टिन ने अपनी फाइल से वसीयत के कागज निकाल कर पढ़ने शुरू किए. अपनी संपत्ति के वितरण के बारे में कुछ कहने से पहले जेम्स ने अपनी सिसकती वेदना का चित्रण इन शब्दों में किया था:

‘लगभग 4 दशक पहले मेरे अपने बेटे विलियम और उस की पत्नी जैनी ने लंदन छोड़ कर मुझे मेरे हाल पर छोड़ दिया. मैं फोन पर अपने पोते और इन दोनों की आवाज सुनने को तरस गया. मैं फोन करता तो शीघ्र ही किसी बहाने से काट देते और एक दिन इस फोन ने मौन धारण कर यह सहारा भी छीन लिया. किसी कारण स्थानांतरण होने पर बेटे ने मुझे अपने नए पते या टेलीफोन नंबर की सूचना तक नहीं दी. मैं इस अकेलेपन के कारण तड़पता रहा. कोई बात करने वाला नहीं था. कौन बात करेगा, जिस का अपना ही खून सफेद हो गया हो.

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‘6 साल जीभ बिना हिले पड़ीपड़ी बेजान हो गई थी कि एक दिन एक भारतीय सज्जन राकेश वर्मा ने पार्क में मेरी इस मौन व्यथा को देखा और समझा. मेरे उमड़ते हुए उद्गारों को इस अनजान आदमी ने पहचाना. विडंबना यह रही कि वह भी व्यक्तिगत कारणों से लंदन से दूर चले गए.

‘राकेश वर्मा के साथ एक दिन की भेंट मेरे सारे जीवन की धरोहर बन यादों में सुकून देती रही. फिर इस भयावह अकेलेपन ने धीरेधीरे भयानक रूप ले लिया. आयु और शारीरिक रोगों के अलावा मानसिक अवसाद ने भी मुझे घेर लिया.

‘इस अभिशप्त जीवन में आशा की एक लहर मेरे मकान के बाग में न जाने कहां से एक बिल्ली के रूप में आ गई. कौन जाने इस का मालिक भी देश छोड़ गया हो और इसे भी इस के भाग्य पर मेरी तरह ही अकेला छोड़ गया हो. बिल्ली को मैं ने एक नाम दिया ‘विलमा.’

‘2-3 दिनों में विलमा और मैं ऐसे घुलमिल गए जैसे बचपन से हम दोनों साथ रहे हों. मैं उसे अपनी कहानी सुनाता और वह ‘मियाऊंमियाऊं’ की भाषा में हर बात का उत्तर देती. मुझे ऐसा लगता जैसे मैं नन्हें जार्ज से बात कर रहा हूं.

‘एक दिन वह जब बाहर गई और रात को वापस नहीं लौटी तो मैं बहुत रोया, ठीक उसी तरह जैसे जार्ज, विलियम और जैनी को छोड़ने के बाद दिल की पीड़ा को मिटाने के लिए रोया था. मैं रात भर विलमा की राह देखता रहा. अगले दिन वह वापस आ गई. बस, यही अंतर था विलमा और विलियम में जो वापस नहीं लौटा.

‘विलमा के संग रहने से मेरे मानसिक अवसाद में इतना सुधार हुआ जो अच्छी से अच्छी दवाओं से नहीं हो पाया था. उस ने मुझे एक नया जीवन दिया. वह कब क्या चाहती है, मैं हर बात समझ लेता था. यह सब वर्णन से बाहर है, केवल अनुभूति ही हो सकती है.’

विलियम, जैनी और जार्ज, तीनों के चेहरों पर उतारचढ़ाव कभी रोष तो कभी पश्चात्ताप के लक्षणों का स्पष्टीकरण कर रहे थे.

जेम्स ने अपनी वसीयत में मुख्य रूप से कहा था कि मेरी सारी चल और अचल संपत्ति में से समस्त टैक्स तथा हर प्रकार के वैध खर्च, बिल आदि देने के बाद शेष बची रकम का इस प्रकार वितरण किया जाए :

‘मिस्टर राकेश वर्मा, जिन का पुराना पता था : 23 रैले ड्राइव, वैटस्टोन, लंदन एन 20, को 2 हजार पौंड दिए जाएं और उन से मेरी ओर से विनम्रतापूर्वक कहा जाए कि यह राशि उन के उस एक दिन का मूल्य न समझा जाए जिस के कारण मेरे जीवन के मापदंड ही बदल गए थे. उन अमूल्य क्षणों का मूल्य तो चुकाने की सामर्थ्य किसी के भी पास न होगी. यह क्षुद्र रकम तो मेरे उद्गारों का केवल टोकन भर है.

‘मेरे उक्त वक्तव्य से, स्पष्ट है कि विलियम वारन, जैनी वारन या जार्ज वारन इस संपत्ति के उत्तराधिकारी होने के अयोग्य हैं.’

वकील कहतेकहते कुछ क्षणों के लिए रुक गया. विलियम, जैनी और जार्ज की मुखाकृति पर एक के बाद एक भाव आजा रहे थे. वे कभी आंखें नीची करते हुए दांत पीसते तो कभी अपने कठोर व्यवहार का पश्चात्ताप करते.

विलियम अपने क्रोध को वश में न रख सका और खड़े हो कर सामने रखी मेज पर जोर से हाथ मार कर जाने को खड़ा हो गया तो जैनी ने उसे समझाबुझा कर बैठा लिया.

वकील ने पुन: वसीयत पढ़नी शुरू की तो यह जान कर सभी आश्चर्यचकित हो गए कि शेष समस्त संपत्ति ‘विलमा’ बिल्ली के नाम कर दी गई थी और साथ ही कहा गया था कि आर.एस.पी.सी.ए. को ‘विलमा’ के शेष जीवन के पालनपोषण का अधिकार दिया जाए और इसी संस्था को प्रबंधक नियुक्त किया जाए. साथ ही एक सूची थी जिस में ‘विलमा’ को जेम्स किस प्रकार रखता था, उस का पूरा वर्णन था. आगे लिखा था, ‘विलमा के निधन पर उस का एक स्मारक बनाया जाए. उस के बाद शेष धन को राह भटके हुए, प्रताडि़त पशुओं की दशा सुधारने पर व्यय किया जाए.’

मैं ने मार्टिन से कहा, ‘‘यदि आप अनुमति दें तो ये 2 हजार पौंड, जो वसीयत के अनुसार जेम्स वारन मुझे दे रहे हैं, इस राशि को भी ‘विलमा’ की वसीयत की राशि में ही मिला दें तो मुझे हार्दिक सुख मिलेगा.’’

वकील ने कहा, ‘‘इस को विधिवत बनाने में थोड़ी अड़चन आ सकती है. हां, इसी राशि का एक चैकआर.एस.पी.सी.ए. को अपनी इच्छानुसार देना अधिक सुगम होगा.’’

अंत में औपचारिक शब्दों के साथ मार्टिन ने वसीयत बंद कर बैग में रख ली. बिल्ली, जो अभी भी सारी काररवाई से अनजान सोई हुई थी, आर.एस.पी.सी.ए. के प्रतिनिधि को सौंप दी गई. इस प्रकार वकील का भी प्रतिदिन ‘विलमा’ की देखरेख का भार समाप्त हो गया. सब मकान से बाहर आ गए.

मैं ने सीमा से कहा कि मैं तुम्हें उस मकान पर ले चलता हूं जहां लंदन में विवाह से पहले मैं रहता था. कार 10 मिनट में 23 रैले ड्राइव के सामने पहुंच गई. कार एक ओर खड़ी की और न जाने क्यों बिना सोचेसमझे ही उंगली उस मकान की घंटी के बटन पर दबा दी.

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एक अंगरेज वृद्ध ने छोटे से कुत्ते के साथ दरवाजा खोला. कुत्ते ने भौंकना शुरू कर दिया. मैं ने उस वृद्ध को बताया कि लगभग 30 वर्ष पहले मैं इस मकान में किराएदार था. बस, इधर से गुजर रहा था तो पुरानी याद आ गई…इस से पहले कि मैं आगे कुछ कहता, बूढ़े ने बड़े रूखेपन से कहना शुरू कर दिया.

‘‘यदि तुम इस मकान को खरीदने के विचार से आए हो तो वापस चले जाओ. इन दीवारों में केरी और चार्ल्स की यादें बसी हुई हैं. चार्ल्स की मां, मेरी पत्नी तो मुझे कब की छोड़ गई…चार्ल्स अमेरिका से एक दिन अवश्य आएगा… हां, कहीं उस का फोन न आ जाए?’’

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इतना कहतेकहते उस ने दरवाजा बंद कर लिया. अंदर से कुत्ता अभी भी भौंक रहा था. सीमा की नजर दरवाजे पर अटकी हुई थी. कह रही थी.

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