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प्यार की चाहत में – भाग 1

सौजन्य- सत्यकथा

11सितंबर, 2020 की सुबह उत्तरी दिल्ली के वजीराबाद थाने में एक राहगीर से सूचना मिली कि अमीना मसजिद के पास एक लाश पड़ी है. इस सूचना पर थाने से एसआई अशोक कुमार मसजिद के पास पहुंचे तो वास्तव में सड़क के किनारे एक युवक की लाश पड़ी थी. उस युवक की उम्र 25 साल के करीब लग रही थी. उस के गले पर हलके खरोंच के निशान थे.

उस समय सुबह का वक्त था. कुछ लोग सड़क पर आजा रहे थे. उन्होंने कुछ लोगों को बुला कर लाश की शिनाख्त कराने की कोशिश की. चूंकि यह मामला हत्या का प्रतीत हो रहा था, इसलिए एसआई अशोक कुमार ने थानाप्रभारी पी.सी. यादव को घटना के बारे में सूचना दे दी.

थानाप्रभारी पी.सी. यादव थाने में मौजूद एएसआई प्रदीप, हैड कांस्टेबल कैलाश और कांस्टेबल अजय को साथ ले कर थोड़ी ही देर में घटनास्थल पर पहुंच गए.

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उन्होंने लाश का बारीकी से मुआयना किया. मृतक ने नारंगी रंग की टीशर्ट और स्लेटी रंग की पैंट पहन रखी थी. थानाप्रभारी ने क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम को भी घटनास्थल पर बुला लिया, जिस ने लाश की कई कोण से फोटो खींचीं. मृतक के गले पर खरोंच के निशान के अलावा शरीर पर जख्म के निशान दिखाई नहीं दे रहे थे.

2 घंटे तक वहां के लोगों से लाश की शिनाख्त कराने के प्रयास किए. इस के बावजूद भी जब मृतक की पहचान नहीं हो सकी तो उसे पोस्टमार्टम के लिए सब्जीमंडी मोर्चरी भेज दिया गया. मोर्चरी में लाश पर चोटों के निशान देखने के लिए उस के कपड़े उतारे गए तो पता चला कि मृतक युवक मुसलिम है. उसी दिन थानाप्रभारी पी.सी. यादव के निर्देश पर मृतक की फोटो वजीराबाद के कई वाट्सऐप ग्रुप में भेज कर उन से लाश की शिनाख्त करने की अपील की गई.

दोपहर में फोटो की पहचान वजीराबाद की गली नंबर 9 में रहने वाले साहिल उर्फ राजा के रूप में हो गई. उस के घर पहुंचने पर मृतक की मां मिली. उस ने मोबाइल पर लाश की फोटो देख कर उस की पुष्टि अपने बेटे साहिल के रूप के कर ली.

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पूछताछ के दौरान उन्होंने थानाप्रभारी पी.सी. यादव को बताया कि कल रात साहिल ने उसे फोन कर बताया था कि वह अभी वर्षा के घर जा रहा है, इसलिए उस का इंतजार न करें. मां ने साहिल की हत्या का शक वर्षा पर जताया.

13 सितंबर को पुलिस ने साहिल की मां की शिकायत पर वर्षा के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर लिया और इस केस की जांच अतिरिक्त थानाप्रभारी गुलशन गुप्ता को सौंप दी गई. अतिरिक्त थानाप्रभारी गुलशन गुप्ता ने साहिल की मां से वर्षा के बारे में पूछताछ की तो पता चला कि वर्षा अपने भाई आकाश के साथ दिल्ली के ही शास्त्रीनगर में रहती है.

वर्षा के ठिकाने का पता लगते ही वह पुलिस टीम के साथ शास्त्रीनगर स्थित वर्षा के मकान पर पहुंचे. लेकिन उस के मकान पर ताला लटका हुआ था. उस के मकान मालिक का पता लगा कर उस से वर्षा के बारे में पूछताछ की, लेकिन मकान मालिक को भी वर्षा के मूल निवास स्थान की जानकारी मालूम नहीं थी.

लेकिन उस ने पुलिस टीम को वर्षा के छोटे भाई आकाश का मोबाइल नंबर बता दिया, जिसे अतिरिक्त थानाप्रभारी गुलशन गुप्ता ने अपनी डायरी में नोट कर लिया. वर्षा के घर से गायब रहने के कारण जांच अधिकारी के मन में साहिल की हत्या में उस का हाथ होने का शक और पुख्ता हो गया.

इस के बाद उन्होंने साहिल के दोस्त साजिद से पूछताछ की तो साजिद ने बताया कि कल रात वह और साहिल औफिस से साथ निकले थे. बातचीत के दौरान साहिल ने उस से कहा भी था कि वह वर्षा के घर जा रहा है. उस ने भी वर्षा पर ही साहिल की हत्या का शक जाहिर किया.

वहां से लौट कर गुलशन गुप्ता घटनास्थल पर पहुंचे तो वहां से 50 मीटर की दूरी पर एक सीसीटीवी कैमरा लगा देखा, जिस का फोकस उसी तरफ था, जहां पर साहिल का शव मिला था. उन्होंने फौरन उस सीसीटीवी कैमरे की फुटेज निकलवा कर बीरीकी से इस की जांचपड़ताल करनी शुरू की तो देखा सुबह सवा 6 बजे के समय वहां पर एक आटो आ कर रुका, जिस से 3 औरतें बाहर निकलीं. उन्होंने एक बेहोश से आदमी को आटो से बाहर निकाला और इस के बाद आटो वहां से चला गया.

प्यार की चाहत में – भाग 2

सौजन्य- सत्यकथा

आटो के जाने के बाद तीनों उस आदमी को वहां से थोड़ी दूर घसीट कर ले गईं. फिर एक सुनसान सी जगह पर उसे लिटा कर फरार हो गईं. सीसीटीवी फुटेज को कई वार रिवर्स कर के देखने से आटो के पीछे लिखा ‘अंशुल दी गड्डी’ और आटो की नंबर प्लेट पढ़ कर उसे अपनी डायरी पर नोट कर लिया. करीब 200 आटो की खोजबीन करने के बाद वह आटो मिल गया, जिस के पीछे कवर पर अंशुल दी गड्डी लिखा था. आटो की नंबर प्लेट से उस के मालिक रविंद्र तथा ड्राइवर मुकेश का पता लगा लिया.

मुकेश से पूछताछ करने पर पता चला कि घटना वाली रात को तड़के 4 बजे वह अपने आटो के साथ कश्मीरी गेट बसअड्डे पर किसी सवारी का इंतजार कर रहा था. एक युवती उस के पास आई थी और अपने दोस्त के गहरे नशे में होने की बात कह कर उसे शास्त्री पार्क स्थित अपने कमरे पर ले गई. वहां से अपने बेहोश साथी को ले कर जगप्रवेश अस्पताल गई. उस के साथ 2 युवतियां और थीं. वहां किसी कारण इलाज नहीं होने पर उसे वजीराबाद ला कर वहां छोड़ दिया, जहां पर पुलिस ने सुबह लाश बरामद की थी.

मुकेश का बयान दर्ज करने के बाद पुलिस टीम जगप्रवेश अस्पताल पहुंची और वहां के सीसीटीवी फुटेज की जांचपड़ताल की. उस में आटो और तीनों औरतें साफ दिख गईं.

अब तक की जांचपड़ताल से इतना पता चल गया था साहिल की हत्या में उन्हीं 3 औरतों का हाथ है. आकाश के मोबाइल नंबर की लोकेशन से पता चला कि वह इस समय उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में है.

13 सितंबर, 2020 को दिल्ली से एक पुलिस टीम वर्षा और उस के साथियों की तलाश में शाहजहांपुर पहुंची और वहां पर अपने एक रिश्तेदार के यहां छिपे वर्षा और उस के भाई आकाश को गिरफ्तार कर लिया.

उन से पूछताछ करने पर तीसरे साथी अलका उर्फ अली हसन को भी उस के रिश्तेदार के यहां से गिरफ्तार कर लिया. तीनोें को गिरफ्तार करने के बाद पुलिस टीम वजीराबाद थाने लौट आई.

वर्षा से पूछताछ की. पहले तो उस ने साहिल की हत्या करने से इनकार किया, लेकिन जब उसे सीसीटीवी फुटेज दिखाया गया तो वर्षा का चेहरा सफेद पड़ गया. उस ने साहिल की हत्या की बात स्वीकार करते हुए अपने इकबालिया बयान में जो बात बताई, वह हैरतअंगेज कर देने वाली थी. वर्षा से पूछताछ के बाद साहिल की हत्या की जो कहानी उभर कर सामने आई, वह कुछ इस प्रकार थी.

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23 वर्षीय साहिल उर्फ राजा अपनी अम्मी के साथ उत्तरी दिल्ली के वजीराबाद में रहता था. कई साल पहले उस के अब्बा का इंतकाल एक लंबी बीमारी के दौरान हो गया था.

कोई 4 साल पहले की बात है. तब साहिल ग्रैजुएशन की पढ़ाई कर चुका था. अब्बा की मौत के बाद से ही घर में मुश्किलों का दौर शुरू हो गया था, जो अब तक कम होने का नाम ही नहीं ले रहा था. अम्मी जैसेतैसे घर का गुजारा चला रही थी.

उस ने अपने लिए नौकरी की तलाश शुरू की. काफी भागदौड़ करने के बाद किसी तरह उसे शास्त्री पार्क स्थित एक स्थानीय अखबार के औफिस में नौकरी मिल गई. जहां वह रिपोर्टिंग के साथ अखबार के लिए विज्ञापन लाने का काम करता था. इस काम में उसे तनख्वाह और कमीशन मिलता था. उस से घर का गुजारा चलने लगा.

साहिल को अभी यह काम करते हुए कुछ महीने गुजरे थे कि एक दिन उस की मुलाकात वर्षा से हुई. 19 वर्षीय वर्षा देखने में काफी सुंदर होने के अलावा हंसमुख स्वभाव की थी. साहिल को वर्षा की बातें अच्छी लगीं.

वर्षा ने साहिल को बताया कि वह मूलरूप से उत्तर प्रदेश के गांव हसनपुर, हरदोई की रहने वाली है. गांव में उसे बहुत सी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा था, इसलिए वह नौकरी की तलाश में अपने भाई के साथ दिल्ली आ गई. इस समय वह अपने छोटे भाई आकाश के साथ शास्त्री पार्क में रहती है.

साहिल ने वर्षा से उस का मोबाइल नंबर ले लिया. वर्षा ने भी साहिल का मोबाइल नंबर सेव कर लिया. इस घटना के बाद साहिल और वर्षा हमेशा एकदूसरे के संपर्क में रहने लगे. जब भी साहिल को काम से फुरसत मिलती वह वर्षा को बुला क र उस के साथ कहीं घूमने निकल जाता था. वर्षा भी साहिल को प्यार करती थी, इसलिए वह हमेशा उसे खुश रखने की कोशिश करती थी.

चूंकि इश्क की आग दोनों तरफ बराबर लगी थी, सो जल्द ही उन के बीच शारीरिक संबंध भी बन गए. काफी दिनों तक ऐसा ही चलता रहा. बाद में वर्षा साहिल से शादी करने की जिद करने लगी तो पहले साहिल ने उस से शादी करने में कुछ आनाकानी की, लेकिन जब वर्षा ने साहिल से कहा कि बिना शादी के वह इस रिलेशन को नहीं रखना चाहती है तो साहिल ने वर्षा की जिद देखते हुए उस के साथ कोर्टमैरिज तो कर लिया, मगर उसे अपने घर नहीं ले गया.

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उस ने वर्षा को समझाते हुए कहा कि उस की अम्मी अभी इस कोर्टमैरिज को स्वीकार नहीं करेंगी. जब उस की अम्मी उसे अपनी बहू बनाने के लिए तैयार हो जाएंगी तो वह उसे अपनी बेगम बना कर घर ले जाएगा.

वर्षा ने साहिल की बात पर यकीन कर लिया. इस के बाद साहिल ने वर्षा के रहने के लिए शास्त्री पार्क में एक मकान किराए पर ले लिया, जिस में एक कमरा ग्राउंड फ्लोर पर और दूसरा कमरा ऊपरी मंजिल पर बना था.

प्यार की चाहत में – भाग 3

सौजन्य- सत्यकथा

साहिल दिन में औफिस में काम करता था और रात में वर्षा के पास रुक जाता था. रात के समय में दोनों ऊपरी कमरे में सोते थे, जबकि वर्षा का भाई आकाश नीचे ग्राउंड फ्लोर पर सोता था.

आकाश को वर्षा और साहिल के रिश्ते की शुरू से जानकारी थी. उसे इस पर कोई ऐतराज नहीं था. वर्षा और आकाश के साथ उस के ही गांव हसनपुर का एक लड़का अली हसन उर्फ अलका भी रहता था.

आकाश और अली हसन दिन के समय लड़कियों के कपड़े पहन कर हिजड़ों का रूप धारण कर लेते थे और शादीब्याह वाले घरों या जिस किसी के घर में बच्चे का जन्म होता, उस के घर जा कर बधाइयां गाने का काम करते थे. इस काम में उसे थोड़ी देर नाचनेगाने में ही अच्छीखासी रकम हाथ लग जाती थी. उन्हें मजदूरी करना काफी मेहनत का काम लगता था, इसलिए दोनों इसे नहीं करना चाहते थे. जबकि नकली हिजड़ा बन कर नाचगा कर मांगने का काम आकाश और अली हसन को आसान लगता था.

कुछ दिनों के बाद साहिल और वर्षा के रिश्ते की जानकारी साहिल की अम्मी को हो गई. दरअसल, साहिल अब रात में घर न पहुंच कर वर्षा के घर शास्त्री पार्क में अपनी रातें गुजारने लगा था. जब उस की अम्मी ने साहिल से इस का कारण पूछा तो उस ने अम्मी को वर्षा और अपने रिलेशनशिप के बारे में सब कुछ बता दिया.

इस के बाद अम्मी ने साहिल का विरोध नहीं किया. सालों पहले शौहर की मौत हो जाने के बाद से वह एक बेवा की जिंदगी गुजार रही थी. अब बेटे को नाराज कर वह उसे खोना नहीं चाहती थी.

इसी प्रकार साहिल और वर्षा के रिश्ते को 4 साल हो गए. वर्षा के रहनेखाने का सारा खर्च साहिल ही उठाता था, लेकिन वह उसे अपने घर ले जाने के लिए तैयार नहीं था. वर्षा जब भी साहिल को अपने घर ले चलने की बात कहती, साहिल कोई न कोई बहाना बना कर उस की बात को टाल जाता था.

पिछले 2 सालों से साहिल द्वारा लगातार टाले जाने से परेशान वर्षा के सब्र का बांध अब टूटने के कगार पर था. उस ने गंभीर हो कर यह बात अपने छोटे भाई आकाश को बताई तो वह भी बहन की परेशानी को समझ कर सोच में डूब गया.

काफी सोचविचार के बाद यह तय हुआ कि आज वह साहिल से दोटूक बात करेगी. साहिल को हर हाल में उसे अपनाना ही पड़ेगा. आकाश और अली हसन दोनों ने वर्षा की बात का समर्थन करते हुए कहा, ‘‘ठीक है, आज इस बात का फैसला हो कर ही रहेगा.’’

10 सितंबर, 2020 की रात लगभग 10 बजे साहिल जब वर्षा के घर पहुंचा तो वहां सब उस के आने का इंतजार कर रहे थे. किसी ने खाना नहीं खाया था. साहिल मार्केट जा कर सब के लिए खाना और शराब की बोतल ले आया.

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सब ने एक साथ मिल कर शराब पी और खाना भी खाया. इस के बाद साहिल रोमांटिक मूड में वर्षा को अपनी तरफ खींचते हुए ऊपर वाले कमरे में चलने के लिए कहने लगा तो वह उस की बांहों से छिटक कर अलग हो गई और बोली, ‘‘तुम रोज मेरे जिस्म से खेलते हो और जब मैं तुम्हारे साथ तुम्हारे घर जा कर बीवी बन कर रहने की बात करती हूं तो बहाना बना कर टाल जाते हो. आज तुम साफसाफ बताओ कि तुम्हारे मन में क्या है?’’

वर्षा के इस बदले हुए तेवर को देख कर भी साहिल पर इस का जरा भी असर नहीं हुआ. उस ने समझा कि वर्षा थोड़ी नानुकुर करने के बाद उस की बात मान कर ऊपर के कमरे में चली जाएगी. लेकिन वह नहीं गई. वर्षा साहिल के बारबार टालने से काफी तंग आ चुकी थी, इसलिए वह साहिल के साथ शारीरिक संबंध बनाने के लिए तैयार नहीं हुई.

वर्षा ने साहिल की इच्छा का विरोध करना शुरू कर दिया. इसी बात पर उन के बीच हाथापाई शुरू हो गई, जिस पर साहिल ने गुस्से में वर्षा के ऊपर हाथ उठा दिया. इस पर वर्षा ने अपने भाई आकाश और अली हसन के साथ मिल कर साहिल को फर्श पर पटक कर उस का गला घोंट दिया.

जब साहिल का बेजान जिस्म एक ओर लुढ़क गया तो उस की लाश देख कर उन तीनों के हाथपांव फूल गए. काफी देर तक आपस में विचार करने के बाद उन्हें लगा कि अगर साहिल को अस्पताल ले जाया जाए तो शायद उस की जान बच सकती है.

ऐसा सोच कर उन्होंने कश्मीरी गेट बसअड्डे से आटो बुलाया और उसे आटो में ले कर जगप्रवेश अस्पताल पहुंचे, जहां डाक्टरों ने उसे देखते ही मृत घोषित कर दिया. डाक्टर की बात सुन कर तीनों एकदम बदहवास हो गए. साहिल के बेजान जिस्म को उसी आटो में लाद कर वे वजीराबाद पहुंचे और उस की लाश वहां उतार कर आटो वाले को वापस भेज दिया. आटो के नजर से ओझल होते ही उन तीनों ने लाश थोड़ी दूर खींच कर एक साइड में डाल दी और वहां से फरार हो गए. सुबह पुलिस द्वारा पकड़े जाने से बचने के लिए तीनों शास्त्री पार्क स्थित मकान पर ताला लगा कर वहां से फरार हो गए.

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इसी दौरान उन्होंने यमुना नदी में साहिल का पर्स और मोबाइल फोन फेंक दिया. इस के बाद वे आनंद विहार पहुंचे और वहां से बस पकड़ कर हरदोई पहुंच गए. वहां भी जब उन्हें लगा कि पुलिस उन की तलाश में यहां भी पहुंच सकती है तो वे शाहजहांपुर स्थित अपने रिश्तेदार के यहां जा कर छिप गए.

लेकिन उन की चालाकी काम नहीं आई और दिल्ली पुलिस ने 13 सितंबर, 2020 को उन्हें दबोच लिया. 14 सितंबर को साहिल उर्फ राजा की हत्या के आरोप में उस की प्रेमिका वर्षा उस के भाई आकाश और अली हसन को तीसहजारी कोर्ट में पेश किया गया, जहां से तीनों को जेल भेज दिया गया.

क्या फर्क पड़ता है

क्या फर्क पड़ता है- भाग 2

पलक झपकते ही मैं सड़क पर था. सोम मेरे पीछे लपका था और मौसी आवाजें देती रही थीं पर मैं पीछे पलटा ही नहीं. किसी तरह अपने कमरे में पहुंचा. न जाने कितनी बार मोबाइल पर सोम की कौल आई लेकिन बात नहीं की मैं ने. मैं क्या इतना कंगाल हूं जो किसी की भीख पर जीने लगूं. ऐसी भी क्या कमी है मुझे जो सोम की मां में अपनी ही मां की सूरत तलाशती रहें मेरी आंखें. मां का प्यार तो अथाह सागर होता है जिस में समूल संसार को समेट ले जाने की शक्ति होती है. चाची हैं न मेरे पास जो मुझे इतना प्यार करती हैं. क्यों चला गया मैं सोम के घर पर? क्या जरूरत थी मुझे? 2 दिन की छुट्टी थी. अपना घर संवारने में ही मैं व्यस्त रहा. सोमवार सुबह आफिस जाते ही सोम सामने पड़ गया. ‘‘अजय, उस दिन तुम्हें क्या हो गया था. मां कितनी परेशान हैं तुम्हें ले कर. मोबाइल भी नहीं उठा रहे हो तुम.’’

‘‘वे तुम्हारी मां हैं. उन की परेशानी तुम समझो. भला मैं उन का क्या लगता हूं जो…’’ ‘‘ऐसा मत कहो, अजय,’’ बीच में बात काटते हुए सोम बोला, ‘‘तुम्हारा ही खून तो बहता है उन के शरीर में. उस दिन तुम न होते तो क्या होता.’’ ‘‘मैं न होता तो कोई और होता. सोम, इनसानियत के नाते मैं ने खून दिया. इस से कोई रिश्ता थोड़े न बन जाता है.’’ ‘‘बन जाता है कभीकभी. खून से भी रिश्ता बनता है. अब देखोे न मेरा खून उन से नहीं मिला. रिश्ता नहीं है तभी तो खून नहीं मिला. मैं उन का अपना होता तो क्या खून न मिलता.’’

‘‘तुम्हारा खून उन से नहीं मिला उस से क्या फर्क पड़ता है. कभीकभी मांबच्चे का खून नहीं भी मिलता. मेरा खून उन से मिल गया इस से वे मेरी मां तो नहीं न हो जातीं. अरे, भाई, वे तुम्हारी मां हैं और तुम्हारी ही रहेंगी. तुम्हारा खून उन से नहीं मिला उस की खीज तुम मुझ पर तो मत उतारो. जा कर किसी डाक्टर से पूछो… वह तुम्हें बेहतर समझा पाएगा.’’ लंच बे्रक में भी मैं सोम को टाल गया और शाम को घर आते समय भी उस से किनारा कर लिया. मुझे क्या जरूरत है किसी के घर में अशांति, खलबली पैदा करने की. मैं अपने को भावनात्मक रूप से इतना अतृप्त मानूं ही क्यों कि किसी की थाली में परोसा भोजन देख मेरी भूख जाग जाए जबकि सोचूं तो मेरा मन गले तक भरा होना चाहिए.

चाची के रूप में ऐसी मां मिली हैं जो मुझे मेरी खुशी में ही अपने बच्चों की भी खुशी मानती हैं. चाची न पालतीं तो मेरा क्या होता. सोचा जाए तो बड़े होतेहोते किसे याद रहता है अपना बचपन. जिसे मां के रूप में देखता रहा वही मां हैं और अगर मां को देखा भी था तो कहां वह सूरत आज मुझे याद है. होश संभाला तो चाची को देखा और चाची ही याद हैं मुझे. तो मेरी मां कौन हुईं? चाची ही न? पागल और नाशुक्रा तो मैं हूं न, जिस ने आज तक चाची को चाची ही कह कर पुकारा. चाची कबकब मेरी मां नहीं थीं जो मैं अपने मन में उम्र भर एक शूल सा चुभोता रहा कि बिन मां का हूं.

शाम को घर पहुंचा और अभी खाने की तैयारी कर रहा था कि दरवाजे पर सोम और उस की मां को खड़े पाया. मेरी दी हुई शाल ओढ़ रखी थी उन्होंने. ‘‘क्या बात है बेटा, मां से नाराज है. सोम तो नादान है. उस की वजह से अपना मन मैला मत कर.’’ ‘‘नहीं तो, मौसी…’’ क्या कहता मैं. मौसी मुझे गले लगा कर रोने लगी थीं और अपराधी सा सोम सामने खड़ा था. ‘‘जन्म दे देने से ही कोई मां नहीं बन जाती बेटे, इस सोम को ही देख. मैं ने इसे जन्म नहीं दिया… मैं ने कभी किसी संतान को जन्म नहीं दिया, तो क्या मैं इस की मां नहीं हूं. क्या बांझ हूं मैं?’’

यह सुन कर मेरा सर्वांग कांपने लगा. यह क्या कह रही हैं मौसी. उन का चेहरा सामने किया. कितनी प्यारी कितनी पवित्र हैं मौसी. पुन: वही इच्छा सिर उठाने लगी… मेरी भी मां होतीं तो कैसी होतीं. ‘‘सोम हमारा गोद लिया बच्चा है. उसी तरह प्रकृति ने तुम्हें मुझ से मिला दिया. मेरे मन ने तुम्हें अपना बेटा माना है बेटे. मैं 2-2 बेटों की मां हूं. क्या तुम्हें लगता है मेरी गोद इतनी छोटी है जिस में तुम दोनों नहीं समा सकते. क्या सचमुच मैं बांझ ही हूं जिसे अपनी ममता पर सदा एक प्रश्नचिह्न ही सहना पड़े.’’

क्या फर्क पड़ता है- भाग 1

‘‘आज मेरे दोनों बेटे साथसाथ आ गए. बड़ी खुशी हो रही है मुझे तुम दोनों को एकसाथ देख कर. बैठो, मैं सूजी का हलवा बना कर लाती हूं. अजय, बैठो बेटा… और सोम, तुम भी बैठो,’’ सोम की मां ने उसे मित्र के साथ आया देख कर कहा. ‘‘नहीं, मां. अजय है न. तुम इसी को खिलाओ. मुझे भूख नहीं है.’’

मैं क्षण भर को चौंका. सोम की बात करने का ढंग मुझे बड़ा अजीब सा लगा. मैं सोम के घर में मेहमान हूं और जब कभी आता हूं उस की मां मेरे आगेपीछे घूमती हैं. कभी कुछ परोसती हैं मेरे सामने और कभी कुछ. यह उन का सुलभ ममत्व है, जिसे वे मुझ पर बरसाने लगती हैं. उन की ममता पर मेरा भी मन भीगभीग जाता है, यही कारण है कि मैं भी किसी न किसी बहाने उन से मिलना चाहता हूं. इस बार घर गया तो उन के लिए कुछ लाना नहीं भूला. कश्मीरी शाल पसंद आ गई थी. सोचा, उन पर खूब खिलेगी. चाहता तो सोम के हाथ भी भेज सकता था पर भेज देता तो उन के चेहरे के भाव कैसे पढ़ पाता. सो सोम के साथ ही चला आया.

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मां ने सूजी का हलवा बनाने की चाह व्यक्त की तो सोम ने इस तरह क्यों कह दिया कि अजय है न. तुम इसी को खिलाओ. मैं क्या हलवा खाने का भूखा था जो इतनी दूर यहां उस के घर पर चला आया था. कोई घर आए मेहमान से इस तरह बात करता है क्या? अनमना सा लगने लगा मुझे सोम. मुझे सहसा याद आया कि वह मुझे साथ लाना भी नहीं चाह रहा था. उस ने बहाना बनाया था कि किसी जरूरी काम से कहीं और जाना है. मैं ने तब भी साथ जाने की चाह व्यक्त की तो क्या करता वह.

‘तुम्हें जहां जाना है बेशक होते चलो, बाद में तो घर ही जाना है न. मैं बस मौसीजी से मिल कर वापस आ जाऊंगा. आज मैं ने अपना स्कूटर सर्विस के लिए दिया है इसलिए तुम से लिफ्ट मांग रहा हूं.’ ‘वापस कैसे आओगे. स्कूटर नहीं है तो रहने दो न.’ ‘मैं बस से आ जाऊंगा न यार… तुम इतनी दलीलों में क्यों पड़ रहे हो?’

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‘‘घर में सब कैसे हैं, बेटा? अपनी चाची को मेरी याद दिलाई थी कि नहीं,’’ मौसी ने रसोई से ही आवाज दे कर पूछा तो मेरी तंद्रा टूटी. सोम अपने कमरे में जा चुका था और मैं वहीं रसोई के बाहर खड़ा था. कुछ चुभने सा लगा मेरे मन में. क्या सोम नहीं चाहता कि मैं उस के घर आऊं? क्यों इस तरह का व्यवहार कर रहा है सोम?

मुझे याद है जब मैं पहली बार मौसी से मिला था तो उन का आपरेशन हुआ था और हम कुछ सहयोगी उन्हें देखने अस्पताल गए थे. मौसी का खून आम खून नहीं है. उन के ग्रुप का खून बड़ी मुश्किल से मिलता है. सहसा मेरा खून उन के काम आ गया था और संयोग से सोम की और हमारी जात भी एक ही है. ‘ऐसा लगता है, तुम मेरे खोए हुए बच्चे हो जो कभी किसी कुंभ के मेले में छूट गए थे,’

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मौसी बीमारी की हालत में भी मजाक करने से नहीं चूकी थीं. खुश रहना मौसी की आदत है. एक हाथ से उन के शरीर में मेरा दिया खून जा रहा था और दूसरे हाथ से वे अपना ममत्व मेरे मन मेें उतार रही थीं. उसी पल से सोम की मां मुझे अपनी मां जैसी लगने लगी थीं. बिन मां का हूं न मैं. चाचाचाची ने पाला है. चाची ने प्यार देने में कभी कोई कंजूसी नहीं बरती फिर भी मन के किसी कोने में यह चुभन जरूर रहती है कि अगर मेरी मां होतीं तो कैसी होतीं. अतीत में गोते लगाता मैं सोचने लगा.

चाची के बच्चों के साथ ही मेरा लालनपालन हुआ था. शायद अपनी मां भी उतना न कर पाती जितना चाची ने किया है. 2-3 महीने के बाद ही दिल्ली जा पाता हूं और जब जाता हूं चाची के हावभाव भी वैसी ही ममता और उदासी लिए होते हैं, जैसे मेरी मां के होते. गले लगा कर रो पड़ती हैं चाची. चचेरे भाईबहन मजाक करने लगते हैं. ‘अजय भैया, इस बार आप मां को अपने साथ लेते ही जाना. आप के बिना इन का दिल नहीं लगता. जोजो खाना आप को पसंद है मां पकाती ही नहीं हैं. परसों गाजर का हलवा बनाया, हमें खिला दिया और खुद नहीं खाया.’

‘क्यों?’ ‘बस, लगीं रोने. आप ने नहीं खाया था न. ये कैसे खा लेतीं. अब आप आ गए हैं तो देखना आप के साथ ही खाएंगी.’ ‘चुप कर निशा,’ विजय ने बहन को टोका, ‘मां आ रही हैं. सुन लेंगी तो उन का पारा चढ़ जाएगा.’ सचमुच ट्रे में गाजर का हलवा सजाए चाची चली आ रही थीं. चाची के मन के उद्गार पहली बार जान पाया था. कहते हैं न पासपास रह कर कभीकभी भाव सोए ही रहते हैं क्योंकि भावों को उन का खादपानी सामीप्य के रूप में मिलता जो रहता है. प्यार का एहसास दूर जा कर बड़ी गहराई से होता है.

‘आज तो राजमाचावल बना लो मां, भैया आ गए हैं. भैया, जल्दीजल्दी आया करो. हमें तो मनपसंद खाना ही नहीं मिलता.’ ‘क्या नहीं मिलता तुम्हें? बिना वजह बकबक मत किया करो… ले बेटा, हलवा ले. पूरीआलू बनाऊं, खाएगा न? वहां बाजार का खाना खातेखाते चेहरा कैसा उतर गया है. लड़की देख रही हूं मैं तेरे लिए. 1-2 पसंद भी कर ली हैं. पढ़ीलिखी हैं, खाना भी अच्छा बनाती हैं…लड़की को खाना बनाना तो आना ही चाहिए न.’ ‘2 का भैया क्या करेंगे. 1 ही काफी है न, मां,’ विजय और निशा ने चाची को चिढ़ाया था. क्याक्या संजो रही हैं चाची मेरे लिए. बिन मां का हूं ऐसा तो नहीं है न जो स्वयं के लिए बेचारगी का भाव रखूं. जब वापस आने लगा तब चाची से गले मिल कर मैं भी रो पड़ा था. ‘अपना खयाल रखना मेरे बच्चे. किसी से कुछ ले कर मत खाना.’

‘इतनी बड़ी कंपनी में भैया क्याक्या संभालते हैं मां, तो क्या अपनेआप को नहीं संभाल पाएंगे?’ ‘तू नहीं जानती, सफर में कैसेकैसे लोग मिलते हैं. आजकल किसी पर भरोसा करने लायक समय नहीं है.’ मेरे बिना चाची को घर काटने को आता है. क्या इस में वे अपने को लावारिस महसूस करने लगी हैं? कहीं चाची मुझे बिन मां का समझ कर अपने बच्चों का हिस्सा तो मुझे नहीं देती रहीं?

आज 27 साल का हो गया हूं. 4 साल का था जब एक रेल हादसे ने मेरे मांबाप को छीन लिया था. मैं पता नहीं कैसे बच गया था. चाचाचाची न पालते तो कौन जाने क्या होता. कहीं कोई कमी नहीं है मुझे. मेरे पिता द्वारा छोड़ा रुपया मेरे चाचाचाची ने मुझ पर ही खर्च किया है. जमीन- जायदाद पर भी मेरा पूरापूरा अधिकार है. मेरा अधिकार सदा मेरा ही रहा है पर कहीं ऐसा तो नहीं किसी और का अधिकार भी मैं ही समेटता जा रहा हूं.’

‘‘क्या सोच रहे हो, अजय?’’ मौसी ने पूछा तो मैं अतीत से वर्तमान में आ गया, ‘‘क्या अपनी चाची से कहा था मेरे बारे में. उन्हें बताना था न कि यहां तुम ने अपने लिए एक मां पसंद कर ली है.’’ ‘‘मां भी कभी पसंद की जाती है मौसीजी, यह तो प्रकृति की नेमत है जो किस्मत वालों को नसीब होती है. मां इतनी आसानी से मिल जाती है क्या जिसे कोई कहीं भी…’’ ‘‘अजय, क्या बात है बच्चे?’’ मौसी मेरे पास खड़ी थीं फिर मेरा हाथ पकड़ कर मुझे सोफे तक ले आईं और अपने पास ही बैठा लिया. बोलीं, ‘‘क्या हुआ है तुम्हें, बेटा? कब से बुलाए जा रही हूं… मेरी किसी भी बात का तू जवाब क्यों नहीं देता. परेशानी है क्या कोई.’’

‘‘जी, नहीं तो. चाची ने यह शाल आप के लिए भेजी है. बस, मैं यही देने आया था.’’ कभी मेरा चेहरा और कभी शाल को देखने लगीं सोम की मां. सोम की मां ही तो हैं ये…मैं इन का क्या चुरा ले जाता हूं, अगर कुछ पल इन से मिल लेता हूं? जिस के पास समूल होता है उस का दिल इतना छोटा तो नहीं होना चाहिए न. मां तो सोम की ही हैं, वे मेरी थोड़े न हो जाएंगी.

‘‘आज इतने दिनों बाद आया है, बात भी नहीं कर रहा. क्या हुआ है तुझे? बात तो कर बच्चे.’’ सोम सामने चला आया. उस के चेहरे पर विचित्र भाव है. ‘‘बस, मौसीजी…आप को यह शाल देने आया था. अब चलता हूं नहीं तो 7 वाली बस निकल जाएगी.’’ ‘‘बैठ, बैठ…हलवा तो खा कर जा. मां ने खास तेरे लिए बनाया है. दिनरात मां तेरे ही नाम की माला जपती हैं. अब आया है तो बैठ जा न,’’ सोम ने कहा, ‘‘इतनी ही देर हो रही है तो आए ही क्यों. मेरे हाथ ही शाल भेज देते न.’’ विचित्र सा अवसाद होने लगा मुझे. जी चाहा, कमरे की छत ही फाड़ कर बाहर निकल जाऊं. और वास्तव में ऐसा ही हुआ.

क्या फर्क पड़ता है- भाग 3

गूंगा सा हो गया मैं. क्या सच में मौसी ऐसा सोच रही हैं? ‘‘ऐसा नहीं है मां. मैं मानता हूं कि मुझ से गलती हुई है, लेकिन मैं ने ऐसा तो कभी नहीं कहा कि तुम मुझ से प्यार नहीं करती हो,’’ सोम रोंआसा हो गया था. ‘‘यही सच है सोम. जब से तुम्हें पता चला है कि मैं तुम्हारी जन्मदात्री मां नहीं हूं तभी से तुम्हारा रवैया मेरे प्रति बदल गया है. जरा सी बात पर भी तुम्हारा व्यवहार इतना पराया हो जाता है मानो कोई रिश्ता ही न हो हम में. न तुम स्वयं जीते हो न ही मुझे जीने देते होे, क्या अब मेरी बाकी की उम्र यही प्रमाणित करने में बीत जाएगी कि मेरी ममता में खोट नहीं है. मैं तो भूल ही गई थी कि तुम्हें गोद लिया था.’’

सारी की सारी कथा का सार पानी जैसा साफ हो गया मेरे सामने. रिश्तों के दांवपेच कितने मुश्किल होते हैं न जिन्हें समझने का दावा नहीं किया जा सकता. सोम रो पड़ा था अपनी मां को मनातेमनाते. किसी भी औरत के लिए ‘बांझ’ शब्द कितनी तकलीफ देने वाला है. मेरी तरफ अपनी मां का झुकाव सहा नहीं गया होगा सोम से क्योंकि रिश्ते की कमजोर नस यही है कि मौसी ने उसे जन्म नहीं दिया. ‘‘ऐसा मत सोचिए मौसी. कौन आप से आप की ममता का प्रमाण मांग सकता है. 2-2 बच्चों की मां हैं न आप. आप की गोद में तो हजारों बच्चों के लिए जगह है. हमारी तो कोई बिसात ही नहीं जो…’’

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मौसी का चेहरा अपने सामने किया मैं ने. सोम के प्यार की गहराई समझ सकता हूं मैं. बहुत प्यार करता है वह अपनी मां से, तभी तो मेरे साथ बांट नहीं पाया. पहली बार सोम का मन समझा मैं ने, क्योंकि इस से पहले मुझे यथार्थ का पता नहीं था. संतान की चाह में मौसी ने सोम को गोद लिया था, अधूरेअधूरे आपस में मिल जाएं तो संपूर्ण होने का सुख पा सकते हैं, यही समझ पा रहा हूं मैं. इन 2 अधूरों में एक अधूरा मैं भी आ मिला था जिस की वजह से जरा सी हलचल हो गई थी.

‘‘अपनापराया वास्तव में हमारे मन की ही समझ और नासमझ होती है अजय. मन जिसे अपना माने वही अपना. अपना होने के लिए खून के रिश्ते की जरूरत नहीं होती. सोम अनाथ था, मेरी गोद खाली थी… मिल कर पूरे हो गए न दोनों. मेरा जीना, मेरा मरना, मेरी विरासत… आज मेरा जो भी है सोम का ही है न. हर जगह सोम का नाम है, लेकिन इस के बावजूद मैं सोम की कैदी तो नहीं हूं न. मुझे जो प्यारा लगेगा, जो मेरे मन को छू लेगा, वह मेरा होगा. मुझे किसी सीमा में बांधना सोम को शोभा नहीं देता.’’

‘‘मां, सच तो यह है कि मैं तो यह सचाई ही नहीं सहन कर पा रहा हूं कि तुम ने मुझे जन्म नहीं दिया. तुम ने भी कभी नहीं बताया था न.’’ ‘‘उस से क्या फर्क पड़ गया, जरा सोच ठंडे दिमाग से. अजय का खून मेरे खून से मिल गया. इस की जात भी हमारी जात से मिल गई, तो तुम्हें लगा अब यह तुम्हारी जगह ले लेगा? इतनी असुरक्षा भर गई तुम्हारे मन में. ‘‘अरे, यह बच्चा क्या छीनेगा तेरा. यह भूखानंगा है क्या. इसे पालने वाले हैं इस के पास. भाईबहन हैं इस के. इसे कोई कमी नहीं है, जो यह तेरा सब छीन ले जाएगा, लावारिस नहीं है तुम्हारी तरह.’’

‘‘मैं ने ऐसा नहीं सोचा था, मां.’’ ‘‘अगर नहीं सोचा था तो भविष्य में सोचना भी मत. इतनी ही तकलीफ हो रही है तो बेशक चले जाओ अपने घर. शराबी पिता और सौतेली मां हैं वहां. अनपढ़गंवार भाईबहन हैं. तुम भी वैसे ही होते अगर मैं न उठा लाती, आज इतनी बड़ी कंपनी में अधिकारी नहीं होते. सच पता चल गया तो मेरे शुक्रगुजार नहीं हुए तुम, उलटा मुझ पर पहरे बिठाने शुरू कर दिए. बातबात पर ताना देते हो. क्या पाप कर दिया मैं ने? तुम को जमीन से उठा कर गोद में पालापोसा, क्या यही मेरा दोष है?’’

‘‘मौसी, ऐसा क्यों कह रही हैं आप? आप का बेटा है सोम.’’ ‘‘मेरा बेटा है तो मेरे मरने का इंतजार तो करे न मेरा बेटा. यह तो चाहता है कि आज ही अपना सब इस के नाम कर दूं. अगर यह मेरी कोख का जाया होता तो क्या तब भी ऐसा ही करता? जानते हो, तुम्हारे घर किस शर्त पर लाया है मुझे कि भविष्य में मैं तुम से कभी नहीं मिलूंगी. घर के कागज भी तैयार करवा रखे हैं. अगर सचमुच इस से प्यार करती हूं तो सब इस के नाम कर दूं, वरना मुझे छोड़ कर ही चला जाएगा…तुम्हारे मौसा ने समझाया भी था कि किसी रिश्तेदार का ही बच्चा गोद लेना चाहिए. तब भी अपनी गरीब बाई का नवजात बच्चा उठा लिया था मैं ने. सोचा था, गीली मिट्टी को जैसा ढालूंगी, ढल जाएगी. नहीं सोचा था, मेरी शिक्षा-दीक्षा का यह इनाम मिलेगा मुझे.’’ सोम चुप था और उस की गरदन झुकी थी. मैं भी स्तब्ध था. यह क्याक्या भेद खोलती जा रही हैं मौसी.

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‘‘अब मैं इस के साथ घर नहीं जाऊंगी, अजय. आज रात अपने घर रहने दो. सुबह 10 बजे की गाड़ी से मैं इलाहाबाद चली जाऊंगी. यह क्या छोड़ेगा मुझे, मैं ही इसे छोड़ कर जाना चाहती हूं.’’ सोम मौसी के पैर पकड़ कर रोने लगा था. ‘‘मुझे अब तुम पर भरोसा नहीं रहा. रात में गला दबा कर मार डालो तो किसे पता चलेगा कि तुम ने क्या किया. जब से अजय हम से मिलनेजुलने लगा है, तुम्हारे चरित्र का पलपल बदलता नया ही रूप मैं हर रोज देखती हूं…इस बच्चे को मुझ से क्या लालच है. जब भी मिलता है मुझे कुछ दे कर ही जाता है. कभी अपना खून देता है और कभी यह कीमती शाल. बदले में क्या ले जाता है, जरा सा प्यार.’’ नहीं मानी थीं मौसी. सोम चला गया वापस. रात भर मौसी मेरे घर पर रहीं.

‘‘मेरी वजह से आप दोनों में इतनी दूरी चली आई.’’ ‘‘सोम ने अपना रंग दिखाया है, अजय. तुम नहीं आते तो कोई और वजह होती लेकिन ऐसा होता जरूर. तुम्हारे मौसाजी कहते थे, ‘मांबाप के खून का असर बच्चे में आता है. मनुष्य के चरित्र की कुछकुछ बुराइयां या अच्छाइयां पीढ़ी दर पीढ़ी सफर करती हैं. सोम के पिता ने शराब पी कर जिस तरह इस की मां को मार डाला था, ऐसा लगता है उसी चरित्र ने सोम में भी अपना अधिकार जमा लिया है. कल इस लड़के ने जिस बदतमीजी से मुझ से बात की, बरसों पुराना इस के पिता का वह रूप मुझे इस में नजर आ रहा था.’’ भर्रा गया था मौसी का स्वर.

सुबह मैं मौसी को इलाहाबाद की गाड़ी में चढ़ा आया. वहां मौसी का मायका है और मौसाजी की विरासत भी. आफिस में सोम से मिला. क्या कहतासुनता मैं उस से. वह घर की बाई का बच्चा है, इसी शर्म में वह डूबा जा रहा था. कल को सब को पता चला तो आफिस के लोग क्या कहेंगे. ‘‘शर्म ही करनी है तो उस व्यवहार पर करो जो तुम ने अपनी मां के साथ किया. इस सत्य पर कैसी शर्म कि तुम बाई के बच्चे हो.’’ मैं ने समझाना चाहा सोम को. मांबेटा मिल जाएं, ऐसा प्रयास भी किया लेकिन ममता का धागा तो सोम ने खुद ही जला डाला था. मौसी ने सोम से हमेशा के लिए अपना रिश्ता ही तोड़ लिया था.

वास्तव में नाशुक्रा है सोम, जिसे ममता का उपकार ही मानना नहीं आया. धीरेधीरे हमारी दोस्ती बस सिर हिला देने भर तक ही सीमित हो गई. बहुत कम बात होती है अब हम दोनों में. होली की छुट्टियों में घर गया तो मौसी का रंगरूप चाची में घुलामिला नजर आया मुझे. अगर मेरी भी मां होतीं तो चाची से हट कर क्या होतीं. ‘‘कैसी हो, मां? अब चाची नहीं कहूंगा तुम्हें. मां कहूं न?’’

सदा की तरह चाची मेरे बिना उदास थीं. क्याक्या बना रखा था मेरे लिए. नमकीन मठरी, गुझिया और शक्करपारे. मेरा चेहरा चूम कर रो पड़ीं चाची. ‘‘क्या फर्क पड़ता है. कुछ भी कह ले. हूं तो मैं तेरी मां ही. इतना सा था जब गोद में आया था.’’ सच कहा चाची ने. क्या फर्क पड़ता है. हम मांबेटा गले मिल कर रो रहे थे और शिखा मां की टांग खींच रही थी. ‘‘मां, कल गाजर का हलवा बनाओगी न. अब तो भैया आ गए हैं.’’

मायके की यारी, ससुराल पर भारी

मायके की यारी, ससुराल पर भारी- भाग 1

सौजन्य- सत्यकथा

20वर्षीया सरोज दिखने में जितनी खूबसूरत थी, उतनी ही चंचल व महत्त्वाकांक्षी भी थी. जो उसे देखता था, अपने आप उस की तरफ खिंचा चला जाता था. गांव के कई युवक उस का सामीप्य पाने को लालायित रहते थे. लेकिन सरोज किसी को भाव नहीं देती थी. वह जिस युवक की ओर आकर्षित थी, वह उस के बचपन का दोस्त दिनेश था.

सरोज के पिता रामनाथ उत्तर प्रदेश के जिला उन्नाव के गांव संभरखेड़ा के रहने वाले थे. उन की गिनती गांव के संपन्न किसानों में होती थी. उन का गांव उन्नाव शहर की सीमा पर स्थित था, सो वह अपने खेतों में सब्जियां उगा कर शहर में बेचते थे. इस काम में उन्हें अच्छी कमाई होती थी.

रामनाथ के घर के पास शिवबालक रहता था. वह दूध का धंधा करता था. दोनों एक ही जाति के थे. दोनों के बीच गहरी दोस्ती थी. दोनों के परिवार के हर सदस्य का एकदूसरे के घर आनाजाना बना रहता था.

शिवबालक की माली हालत रामनाथ की अपेक्षा कमजोर थी. उसे जब कभी रुपयों की जरूरत होती, वह रामनाथ से मांग लेता था. शिवबालक का बेटा दिनेश था. वह ज्यादा पढ़ालिखा नहीं था. पर उस ने ड्राइविंग सीख ली थी और ट्रैक्टर चलाता था.

शिवबालक का बेटा दिनेश और रामनाथ की बेटी सरोज हमउम्र थे. दोनों का एकदूसरे के घर आनाजाना बेरोकटोक था. दोनों बचपन के दोस्त थे, सो उन की खूब पटती थी. दोनों घंटों बतियाते थे और खूब हंसीठिठोली करते थे. उन की बातचीत और हंसीठिठोली पर घर वालों को भी ऐतराज नहीं था, क्योंकि पड़ोसी होने के नाते उन दोनों का रिश्ता भाईबहन का था. लेकिन उन दोनों की बचपन की दोस्ती कब प्यार में बदल गई, उन्हें पता ही नहीं चला.

जैसेजैसे समय बीत रहा था, वैसेवैसे उन के प्यार का रंग भी गहराता जा रहा था. सरोज स्कूल जाने के बहाने घर से निकलती और तय स्थान पर पहुंच जाती दिनेश के पास. फिर दिनेश उसे ले कर घुमाने के लिए निकल जाता था. दोनों के बीच चाहत बढ़ी तो उन के मन में शारीरिक मिलन की इच्छा भी होने लगी.

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आखिर एक दिन ऐसा भी आया जब दोनों मर्यादा भुला बैठे और उन्होंने अपनी हसरतें पूरी कर लीं. इस के बाद उन्हें घरबाहर जहां भी मौका मिलता, मिलन कर लेते.

इश्क में दोनों इतने अंधे हो गए थे कि उन्हें घरपरिवार की इज्जत का खयाल ही नहीं रहा. लेकिन एक दिन उन के इश्क का भांडा उस समय फूट गया, जब सरोज की मां पुष्पा ने उन्हें रंगेहाथों पकड़ लिया.

पुष्पा ने सरोज और दिनेश के नाजायज रिश्तों की जानकारी पति को दी, तो रामनाथ का खून खौल उठा. गुस्से में उस ने सरोज को पीटा तथा दिनेश को भी फटकार लगाई.

चूंकि मामला काफी नाजुक था, अत: पतिपत्नी ने सरोज को काफी समझाया. उन्होंने उसे अपनी मानमर्यादा के बारे में सचेत किया. लेकिन दिनेश के प्यार में आकंठ डूबी सरोज पर उन की किसी बात का असर नहीं हुआ.

बेटी पर समझाने का असर न होता देख रामनाथ और पुष्पा परेशान हो गए. तब उन्होंने अपने घर दिनेश के आने की पाबंदी लगा दी. सरोज का भी घर से बाहर जाना बंद करा दिया.

अब रामनाथ और पड़ोसी शिवबालक की दोस्ती में भी दरार आ गई थी. रामनाथ ने शिवबालक को धमकी दी कि वह अपने बेटे दिनेश को समझा दे कि वह उस की बेटी सरोज से दूर रहे. अगर उस ने उस की इज्जत से खेलने की कोेशिश की तो अच्छा नहीं होगा. अपनी इज्जत की खातिर वह किसी भी हद तक जा सकता है.

कहते हैं, इश्क अंधा होता है. दिनेश और सरोज भी इश्क में अंधे थे. यही कारण था कि परिवार की सख्तियों के बावजूद उन के प्यार में कोई कमी नहीं आई थी. हालांकि उन की मुश्किलें अब पहले से ज्यादा बढ़ गई थीं और उन के मिलने में बाधा भी पड़ने लगी थी. लेकिन वे सावधानीपूर्वक किसी न किसी बहाने मिल ही लेते थे.

इधर बेटी के कदम बहके तो रामनाथ को उस के ब्याह की चिंता सताने लगी. उस ने सोचा, सरोज अगर उस की पीठ में इज्जत का छुरा घोंप कर दिनेश के साथ भाग गई तो बड़ी बदनामी होगी. वह कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं बचेगा. इसलिए बेहतर होगा कि वह सरोज के हाथ जल्द से जल्द पीले कर दे.

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रामनाथ ने बेटी के लिए रिश्ता खोजना शुरू किया तो उसे अजय कुमार पसंद आ गया. अजय कुमार के पिता रामऔतार उन्नाव जिले के महनोरा गांव में रहते थे. अजय कुमार उन का एकलौता बेटा था. वह सोहरामऊ में एक कपड़े की दुकान पर काम करता था, इसलिए रामनाथ ने अपनी बेटी सरोज के लिए उसे पसंद कर लिया था.

सारी औपचारिकताएं पूरी कर सरोज और अजय कुमार के विवाह की तारीख तय कर दी थी.

दिनेश को जब सरोज का विवाह तय होने की बात का पता चली तो वह बेचैन हो उठा. सरोज ने प्यार उस से किया था और अब विवाह किसी और से करने जा रही थी. एक दिन सरोज उसे एकांत में मिली तो वह बोला, ‘‘सरोज, जब तुम्हें किसी और से विवाह रचाना था, तो तुम ने मुझ से प्यार का नाटक क्यों किया?’’

मायके की यारी, ससुराल पर भारी- भाग 2

सौजन्य- सत्यकथा

इस के बाद तो यह सिलसिला ही शुरू हो गया. सरोज मायके में होती तो उस का मिलन दिनेश से होता रहता, ससुराल चली जाती तो मिलन बंद हो जाता. ससुराल में रहते वह मोबाइल फोन पर दिनेश से चोरीछिपे बात करती थी.

यह मोबाइल फोन दिनेश ने ही उस के जन्मदिन पर उपहार में दिया था. उस ने पति से झूठ बोला था कि फोन मायके वालों ने दिया है. जब मोबाइल फोन का बैलेंस खत्म हो जाता तो दिनेश ही उसे रिचार्ज कराता था.

एक दिन मोबाइल फोन पर बतियाते दिनेश ने कहा, ‘‘सरोज, जब तुम ससुराल चली जाती हो तो यहां मेरा मन नहीं लगता. रात में नींद भी नहीं आती और तुम्हारे बारे में ही सोचता रहता हूं. मिलन का कोई ऐसा रास्ता निकालो कि तुम्हारी ससुराल आ सकूं.’’

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‘‘तुम किसी रोज मेरी ससुराल आओ. मैं कोई रास्ता निकालती हूं.’’ सरोज ने उसे भरोसा दिया.

सरोज से बात किए दिनेश को अभी हफ्ता भी नहीं बीता था कि एक रोज वह उस की ससुराल संभरखेड़ा जा पहुंचा. सरोज ने सब से पहले दिनेश का परिचय अपनी सास लक्ष्मी देवी से कराया, ‘‘मम्मी, यह दिनेश है. मेरा पड़ोसी है. रिश्ते में मेरा भाई लगता है. किसी काम से सोहरामऊ आया था, सो हालचाल लेने घर आ गया.’’

‘‘अच्छा किया बेटा, जो तुम हालचाल लेने आ गए.’’ फिर वह सरोज की तरफ मुखातिब हुई, ‘‘बहू, भाई आया है तो उस की खातिरदारी करो. मेरी बदनामी न होने पाए.’’

‘‘ठीक है, मम्मी.’’ कह कर सरोज दिनेश को कमरे में ले गई. इस के बाद दोनों कमरे में कैद हो गए. कुछ देर बाद वे कमरे से बाहर आए तो दोनों खुश थे. शाम को सरोज का पति अजय कुमार घर आया तो सरोज ने पति से भी उस का परिचय करा दिया. अजय ने भी उस की खूब खातिरदारी की.

सरोज की ससुराल जाने का रास्ता खुला, तो दिनेश अकसर उस की ससुराल जाने लगा. लक्ष्मी देवी टोकाटाकी न करें, इस के लिए वह उन की मनपसंद चीजें ले आता. घर वापसी के समय वह उन के पैर छू कर 100-50 रुपए भी हाथ पर रख देता. जिसे वह नानुकुर के बाद रख लेती.

शाम को वह सरोज के पति अजय के साथ भी पार्टी करता और खर्च स्वयं उठाता. इस तरह उस के आने से मांबेटे दोनों खुश होते. लेकिन दिनेश घर क्यों आता है, वह घर में क्या गुल खिला रहा है, इस ओर उन का ध्यान नहीं गया.

‘‘दिनेश, यह शादी मैं अपनी मरजी से नहीं कर रही हूं. घर वालों ने शादी तय कर दी है, तो करनी ही पड़ेगी. उन का विरोध तो मैं कर नहीं सकती. लेकिन मैं आज भी तुम्हारी हूं और कल भी रहूंगी. तुम से अब मुझे कोई भी अलग नहीं कर सकता, यह विवाह भी नहीं.’’ सरोज ने उदास हो कर कहा.

3 फरवरी, 2017 को अजय कुमार के साथ सरोज का विवाह धूमधाम से हो गया. सरोज विदा हो कर ससुराल आ गई. सरोज जैसी खूबसूरत पत्नी पा कर अजय खुद को खुशनसीब समझ रहा था.

उस के लिए सरोज वह सब कुछ थी, जिस की कामना हर युवा करता है. लेकिन सरोज के दिल में उस के लिए कोई जगह नहीं थी. उस के दिल में तो कोई और ही बसा था. सरोज का तन भले ही अजय कुमार को मिल गया था, पर मन तो दिनेश का ही था.

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अजय कुमार कैसा भी था, इस से सरोज को कोई मतलब नहीं था. शादी के बाद लड़कियां ससुराल आ क र एकदो दिन भले ही उदास रहें, लेकिन यदि उन्हें ससुराल वालों और पति का प्यार मिले तो वे खुश रहने लगती हैं. लेकिन सरोज के चेहरे पर मुसकराहट 2 सप्ताह बीत जाने के बाद भी नहीं आई थी. इस का कारण यह था कि वह पल भर के लिए भी दिनेश को नहीं भुला सकी थी.

सरोज ससुराल में महीने भर रही. लेकिन उस के चेहरे पर कभी मुसकराहट नहीं आई. ससुराल वालों ने तो सोचा कि पहली बार मांबाप को छोड़ कर आई है, इसलिए उदास रहती होगी. पर अजय कुमार पत्नी की उदासी से बेचैन और परेशान था. वह उसे खुश रखने, उस के चेहरे पर मुसकान लाने की हरसंभव कोशिश करता रहा, लेकिन सरोज के चेहरे पर मुसकान नहीं आई.

होली के 8 दिन पहले सरोज ससुराल से मायके आ गई. जिस दिन वह मायके आई, उसी शाम वह दिनेश से मिली. सरोज के मांबाप बेटी का विवाह कर के निश्चिंत हो चुके थे, इसलिए उन्होंने सरोज पर रोकटोक नहीं लगाई थी. लिहाजा सरोज का मिलन दिनेश से पुन: शुरू हो गया.

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