शादी को बेचैन इन कुंआरों की कौन सुनेगा

यों तो लड़कियों की घटती तादाद और बढ़ता लिंगानुपात एक अलग मुद्दा है, लेकिन देश के करोड़ों युवाओं को शादी के लिए लड़कियां क्यों नहीं मिल रही हैं, जान कर हैरान रह जाएंगे आप…

23 दिसंबर, 2023 को देव उठानी के दिन विष्णु सहित दूसरे देवीदेवता पांवड़े चटकाना तो दूर की बात है ढंग से अंगड़ाई भी नहीं ले पाए थे कि नीचे धरती पर कुंआरों ने हल्ला मचाना शुरू कर दिया कि अब यदि सचमुच में उठ गए हो तो हमारी शादी कराओ. बस, यह उन्होंने नहीं कहा कि अगर नहीं करवा सकते तो नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से त्यागपत्र दे दो.

ताजा हल्ला भारत भूमि के राज्य महाराष्ट्र के सोलापुर से मचा जहां सुबहसुबह कोई 50 कुंआरे सजधज कर लकदक दूल्हा बने घोड़ी पर बैठे बैंडबाजा, बरात के साथ डीएम औफिस की तरफ कूच कर रहे थे.

आजकल ऊपर विष्णुजी के पास सृष्टि के दीगर कामकाज जिन में अधिकतर प्रोटोकाल वाले हैं, कुछ ज्यादा ही बढ़ गए हैं इसलिए वे शादी जैसे तुच्छ मसले पर कम ही ध्यान दे पाते हैं जबकि उन्हें भजन, आरती गागा कर उठाया इसी बाबत जाता है कि हे प्रभु, उठो और सृष्टि के शुभ कार्यों के साथसाथ विवाह भी संपन्न कराओ जो रोजगार के बाद हर कुंआरे का दूसरा बड़ा टास्क है. इन युवाओं ने समझदारी दिखाते हुए शादी कराने का अपना ज्ञापन कलैक्टर को दिया, जो सही मानों में विष्णु का सजीव प्रतिनिधि धरती पर कलयुग में होता है.

ज्ञापन के बजाय विज्ञापन जरूरी

उम्मीद कम ही है कि ऊपर वाले देवता तक इन कुंआरों की करुण पुकार और रोनाधोना पहुंचा होगा. रही बात नीचे के देवता कि तो वह बेचारा मन ही मन हंसते हुए ज्ञापन ही ले सकता है. अगर थोड़ा भी संवेदनशील हुआ तो इन्हें इशारा कर सकता है कि भाइयो, ज्ञापन के बजाय विज्ञापन का सहारा लो और मेरे या ऊपर वाले के भरोसे मत रहो नहीं तो जिंदगी एक अदद दुलहन ढूंढ़ने में जाया हो जाएगी और इस नश्वर संसार से तुम कुंआरे ही टैं बोल जाओगे.

यह मशवरा भी उन के मन में ही कहीं दब कर रह गया होगा कि मर्द हो तो पृथ्वीराज बनो और अपनी संयोगिता को उठा कर ले जाओ. तुम ने सुना नहीं कि वीर भोग्या वसुंधरा चर्चा में बैचलर मार्च सोलापुर के इन दूल्हों की फौज को राह चलते लोगों ने दिलचस्पी और हैरानी से देखा.

कुछ को इन कुंआरे दूल्हों से तात्कालिक सहानुभूति भी हुई लेकिन सब मनमसोस कर रह गए कि जब ऊपर वाला ही इन बदनसीबों की नहीं सुन रहा तो हमारी क्या बिसात. हम तो खुद की जैसेतैसे कर पाए थे और अभी तक उसी को झांक रहे हैं. यह बात इन दीवानों को कौन सम?ाए कि भैया, मत पड़ो घरगृहस्थी के झमेले में, पछताना ही है तो बिना लड्डू खाए पछता लो. न समझ सकते न बचा सकते मगर यह भी मनोवैज्ञानिक सिद्धांत है कि जो आदमी खुदकुशी और शादी पर उतारु हो ही आए उसे ब्रह्माजी भी नहीं समझ और बचा सकते क्योंकि यह भाग्य की बात है. रही बात इन दीवानों की तो इन के बारे में तो तुलसीदास बहुत पहले उजागर कर गए हैं कि जाको प्रभु दारुण दुख देई, ताकी मति पहले हर लेई.

राहगीरों ने दर्शनशास्त्र के ये कुछ चौराहे क्रौस किए और इन दूल्हों में दिलचस्पी ली तो पता चला कि इन बेचारों को लड़कियां ही नहीं मिल रहीं और जिन को जैसेतैसे मिल जाती हैं वे इन्हें सड़े आम जैसे बेरहमी से रिजैक्ट कर देती हैं क्योंकि इन के पास रोजगार नहीं है.

जागरूक होती लड़कियां मुमकिन है कि यह नजारा देख कर कुछकुछ लोगों को वह प्राचीन काल स्मरण हो आया हो जब लड़कियां चूं भी नहीं कर पाती थीं और मांबाप जिस के गले बांध देते थे वे सावित्री की तरह उस के साथ जिंदगी गुजार देती थीं. फिर बेरोजगार तो दूर की बात है लड़का लूला, लंगड़ा, अंधा, काना हो तो भी वे उसे ‘भला है बुरा है जैसा भी है मेरा पति मेरा देवता है…’ वाले गाने की तर्ज पर उसी के लिए तीज और करवाचौथ जैसे व्रत करती रहती थीं. और तो और अगले जन्म के लिए भी उसी लंगूर को बुक कर लेती थीं.

जमाना बदल गया मगर अब जमाना और लड़कियां दोनों बदल गए हैं. लड़कियां शिक्षित, सम?ादार और स्वाभिमानी तथा जागरूक हो चली हैं. लिहाजा, उन्हें किसी ऐरेगिरे, तिरछेआड़े के गले नही बांधा जा सकता. पहले की लड़कियों को गऊ कहा जाता था. वे जिंदगीभर उसी खूंटे से बंधी रहती थीं जिस से पेरैंट्स बांध देते थे. मगर अब लड़कियां खुद खूंटा ढूंढ़ने लगी हैं यानी अपने लिए सुयोग्य वर तलाशने लगी हैं क्योंकि वे किसी की मुहताज नहीं हैं. अपने पैरों पर खड़ी हैं.

बेरोजगार जीवनसाथी उन की आखिरी प्राथमिकता भी नहीं है इसलिए समझ यह जाना चाहिए कि सोलापुर जैसे बैचलर मार्च दरअसल, बेरोजगारी के खिलाफ एक मुहिम है जिस के तहत दुलहन की आड़ में सरकार से रोजगार या नौकरी मांगी जा रही होती है. ऐसे मार्च देश के हर इलाके में देखने को मिल जाते हैं जहां इन कुंआरों का दर्द फूटफूट कर रिस रहा होता है.

कोई सस्ता तमाशा नहीं कर्नाटक की ब्रह्मचारीगलु पद्यात्रा ऐसा ही दर्द मार्च के महीने में कर्नाटक के मांड्या जिले से एक लड़के का फूटा था. सोलापुर में जिसे बैचलर मार्च कहा गया वह वहां ब्रह्मचारीगलु पद्यात्रा के खिताब से नवाजा गया था. इस यात्रा में करीब 60 कुंआरे लड़के 120 किलोमीटर की पद्यात्रा कर चामराजनगर जिले में स्थित महादेश्वर मंदिर पहुंचे थे. तब मानने वालों ने मान लिया था कि यह कोई सस्ता तमाशा या पब्लिसिटी स्टंट नहीं है बल्कि हकीकत में इन लड़कों के पास कोई नौकरी नहीं है. कुछकुछ जानकारों ने इस पद्यात्रा का आर्थिक पहलू उजागर करते हुए यह निष्कर्ष दिया था कि शादी योग्य इन लड़कों के पास कोई सलीके की नौकरी नहीं है और मूलतया ये पद्यात्री किसान परिवारों से हैं.

समस्या का दूसरा पहलू यह समझ आया था कि नए दौर की युवतियां शादी के बाद गांवों में नहीं रहना चाहतीं और खेतीकिसानी अब घाटे का धंधा हो चला है जिस में आर्थिक निश्चिंतता नहीं है इसलिए लड़की तो लड़की उस के पेरैंट्स भी रिस्क नहीं उठाते.

कर्नाटक ही नहीं बल्कि हर इलाके के किसानपुत्र इस से परेशान हैं और खेतखलिहान छोड़ कर शहरों की तरफ भाग रहे हैं. जितना वे गांव में अपने नौकरों को देते हैं उस से भी कम पैसे में खुद शहर में छोटीमोटी नौकरी कर लेते हैं ताकि शादी में कोई अड़चन पेश न आए.

लड़कियों को नहीं भाते ये लड़के इस बात की पुष्टि करते मांड्या के एक किसानपुत्र कृष्णा ने मीडिया को बताया भी था कि मुझे अब तक लगभग 30 लड़कियां रिजैक्ट कर चुकी हैं. वजह मेरे पास खेती कम है जिस से कमाई भी ज्यादा नहीं होती. यह एक गंभीर समस्या है जिस के बारे में खुलासा करते सोलापुर के ज्योति क्रांति परिषद जिस के बैनर तले बैचलर मार्च निकाला गया था के मुखिया रमेश बरास्कार बताते हैं कि महाराष्ट्र के हर गांव में 25 से 30 साल की उम्र के 100 से 150 लड़के कुंआरे बैठे हैं.

संगठित हो रहे कुंआरे हरियाणा के कुंआरे भी यह और इस से मिलतीजुलती मांगें उठाते रहे हैं लेकिन कोई हल कहीं से निकलता नहीं दिख रहा और न आगे इस की संभावना दिख रही. अब अच्छी बात यह है कि जगहजगह कुंआरे इकट्ठा हो कर सड़कों पर आ रहे हैं. अपने कुंआरेपन को ले कर उन में कोई हीनभावना या शर्मिंदगी नहीं दिखती तो लगता है कि समस्या बहुत गंभीर होती जा रही है लेकिन उस के प्रति कोई गंभीरता नहीं दिखा रहा.

एक अंदाजे के मुताबिक देश में करीब 5 करोड़, 63 लाख अविवाहित युवा हैं लेकिन उन पर युवतियों की संख्या महज 2 करोड़, 7 लाख है. लड़कियों की घटती तादाद और बढ़ता लिंगानुपात एक अलग बहस का मुद्दा है लेकिन महाराष्ट्र, कर्नाटक, हरियाणा और मध्य प्रदेश के जो युवा संगठित हो कर प्रदर्शन कर रहे हैं वे बेरोजगार, अर्धबेरोजगार और किसान परिवारों के हैं जिन का मानना है कि अगर अच्छी नौकरी या रोजगार हो तो छोकरी भी मिल जाएगी. ऊपर वाला तो सुनता नहीं इसलिए ये लोग नीचे वाले से आएदिन गुहार लगाते रहते हैं.

Crime: मुजीब ने उस लड़की के साथ रची खौफनाक साजिश

Crime : वह पहले लड़कियों से दोस्ती करता, फिर उन से लगातार फोन पर बातें करता. बाद में शादी की तैयारियों का ढोंग रचा कर उन्हें किसी एकांत जगह पर बुलाता और शादी की बात करता और एक कामयाब जिंदगी जीने की योजनाएं बनाता. इस के बाद वह ‘घर तलाश रहा हूं’ कह कर उन लड़कियों से कुछ रुपए मांगता और आखिर में उन के गहने वगैरह लूट कर वहां से रफूचक्कर हो जाता. इस तरह 7 से ज्यादा लड़कियों को धोखे में रख कर चंपत होने वाले शख्स का नाम मुजीब है.

38 साल का त्रिशूर नलिकुलम नंबानकड़व पुतियाविट्टील मुजीब कम उम्र से अपराध की राह पर चल पड़ा था. घर वालों से अलग होने के बाद वह जिंदगी गुजारने के लिए कई जगहों पर भटका. कई जगह पर उस ने दिहाड़ी पर काम किया था, पर इस से उस का गुजारा नहीं चलता था.

इसी बीच मुजीब कोच्चि पहुंचा. वहां उस ने एट्टुमानूर स्वदेशी मंजू नाम की एक लड़की से कलूर में दोस्ती की. वह अपनी दादी के साथ रह रही थी. उस के मांबाप अलग रह रहे थे.

रची खौफनाक साजिश

एक दिन मुजीब ने किसी इश्तिहार में ‘गुरदा चाहिए’ लिखा देखा. उस ने फोन नंबर मिला कर गुरदा देने की बात कही. इस के लिए कोल्लम स्वदेशी शिवकुमार को जरीया भी बनाया था.

दरअसल, मुजीब उस लड़की मंजू का गुरदा बेचने की चाल चल रहा था. दोनों को एकसाथ रहने के लिए घर व जमीन की जरूरत है, यह कह कर मुजीब ने मंजू को समझया कि अगर वह अपना एक गुरदा दे देगी, तो 10 लाख रुपए मिलेंगे, जिन से वे घर खरीद सकते?हैं.

एक अच्छी जिंदगी जीने का सपना बुनने वाली मंजू ने एतराज नहीं किया. शिवकुमार ने ही अस्पताल का जुगाड़ किया और तिरुअनंतपुरम के किम्स अस्पताल में मंजू का गुरदा निकाला गया.

रुपए मिलते ही मुजीब वहां से रफूचक्कर हो गया. ठगी गई मंजू ने उस के खिलाफ साल 2010 में पुलिस में केस दर्ज किया. इस बीच शिवकुमार भी वहां से फरार हो गया था.

पुलिस ने बहुत जांचपड़ताल की, पर दोनों का पता नहीं चला. इसी बीच परुंबावूर स्वदेशिनी बिंदु नाम की लड़की को भी मुजीब ने गुरदा देने के धंधे के जाल में फंसा लिया था.

और भी चालबाजियां

मुजीब उन लड़कियों के बारे में पहले ही सबकुछ पता कर लेता था, जो अच्छे जीवनसाथी और खुशहाल जिंदगी का सपना देखती थीं. वह अपनी मीठी बातों में उन्हें फंसा कर उन से रुपए व गहने ले कर रफूचक्कर हो जाता था.

एरुमेली स्वदेशी बैमा नाम की जवान लड़की के साथ भी उस ने कुछ दिन गुजारे थे. दोनों का एक बच्चा भी?है. बीच में मुजीब ने उस लड़की को एर्णाकुलम में एक काम भी दिला दिया था. इस के बाद उस लड़की ने मुजीब को दोबारा कभी नहीं देखा.

मुजीब कोषिकोड्ड के पास कुट्टीकाटूर के एक अरेबिक कालेज में रसोइए का काम करता था, तब उस के साथ एक लड़की भी थी. कालेज की कैंटीन के पास ही उन्हें ठहरने की सुविधा भी मिली थी. वे दोनों पिछले 2 महीने से आम जिंदगी बिता रहे थे.

रसोइए के रूप में काम करने के बीच भी मुजीब धोखेबाजी के बारे में ही सोचता रहा. जल्द ही पैसा पा कर अमीर बनने का लालच उस के मन में था.

तब उस ने अपने साथ रह रही उस लड़की को नशीली दवा दे कर बेहोश किया, फिर उस के साढ़े 3 लाख रुपए के कीमती गहने चुरा लिए.

वहां से रफूचक्कर होने के बाद मुजीब के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली. उस लड़की ने कोषिकोड्ड पुलिस थाने में शिकायत दर्ज करा दी.

इस के बाद मैडिकल कालेज सीआई प्रेमदास की अगुआई में मुजीब को पुलिस द्वारा पालकाड्ड बसअड्डे के पास से पकड़ लिया गया.

पुलिस कस्टडी में आने के बाद मुजीब द्वारा किए गए कई छलकपट सामने आए. लेकिन तब भी उस ने अपना सही नामपता नहीं बताया. उस के पास जितने भी आईकार्ड थे, सब नकली थे.

मुजीब के मांबाप बीमार थे और तमिलनाडु के एरवाडी इलाके में तकरीबन 10 साल पहले मर गए थे.

बाद में गुरदे बेचने के जुर्म में मुजीब का साथ देने वाला शख्स शिवकुमार भी पकड़ा गया.

सरकार मस्त, जनता त्रस्त

जब सरकार ही धर्म और हिंदुमुसलिम के नाम पर बनती हो, तो आम जनता की चिंता कोई क्यों करेगा…

अंबाला कैंट में जनरल अस्पताल के गेट के सामने अकसर ऐक्सीडैंट होते रहते हैं. एक गेट के बिलकुल सामने तिराहा है तो दूसरे गेट के सामने चौराहा है. वहां पर न तो सिगनल लाइट्स हैं, न ही स्पीड ब्रेकर और न ही ट्रैफिक पुलिस खड़ी रहती है.

बेशक अस्पताल के एक गेट के पास पुलिस का कैबिन है, लेकिन इस में पुलिस का कोई व्यक्ति नजर नहीं आता.

17 फरवरी, 2023 को रात के करीब 10 बज कर 50 मिनट क्योंकि पेशैंट से हम 11 बजे ही मिल सकते थे, इसलिए टाइम पास करने के लिए हम अस्पताल के गेट से बाहर निकलते हैं और बड़ी मुश्किल से सड़क पार कर के दूसरी ओर चाय पीने के लिए जाते हैं क्योंकि अस्पताल में कोई कैंटीन या चाय तक की एक छोटी सी रेहड़ी तक नहीं जबकि इतना बड़ा अस्पताल है जहां हजारों पेशैंट हैं. हर पेशैंट के साथ कम से कम 2 लोग तो आते ही होंगे. उन्हें बाहर सड़क पार जाना होता है, जिस में बहुत जोखिम है.

हम बैठे चाय पी रहे थे कि अचानक जोर की आवाज के साथ सामने आग के गोले से दिखे. हम ने देखा एक बुलेट को एक कार ने इतनी जोर से टक्कर मारी कि बुलेट बीच में 2 टुकड़े हो गई और कार का आगे का हिस्सा पूरी तरह डैमेज हो गया.

हादसों का शहर

बुलेट सवार दोनों लड़कों को उसी समय अस्पताल के अंदर ले जाया गया जहां उन्हें सीरियस बता कर चंडीगढ़ पीजीआई रैफर किया गया. उस से कुछ दिन पहले भी एक मोटरसाइकिल सवार को एक ट्रक काफी दूर तक घसीटता ले गया और उस की मौत हो गई.

उद्योगपति नवीन जिंदल ने इस अस्पताल का जीर्णोद्धार करवा कर दिल्ली से हार्ट स्पैशलिस्ट यहां बुलवाए ताकि मरीजों का इलाज अच्छे से अच्छा हो. मगर क्या महज सर्जरी ही पेशैंट्स के लिए काफी है? कभी पेशैंट का चायकौफी का मन करता है, कभी जो साथ में रहता है या कभी कोई मिलनेजुलने आता है तो उस के लिए चायपानी की आवश्यकता होती है. इन सब के लिए बड़ी न सही छोटी सी कैंटीन तो होनी ही चाहिए. हर समय हाईवे रोड को पार कर के दूसरी तरह चायपानी के लिए जाना कितना खतरनाक है यह वहां आए दिन होने वाली दुर्घटनाओं से समझ जा सकता है.

जिंदल साहब अकसर निगरानी रखते हुए वहां चक्कर भी लगाते रहते हैं तो क्या उन्हें ये सब दिखाई नहीं देता? क्या इन हादसों की खबर उन्हें नहीं होती? क्या उन्हें इतना भी ज्ञान नहीं कि चौक पर अर्थात् चौराहे पर ट्रैफिक लाइट्स और ट्रैफिक पुलिस का होना आवश्यक नहीं है?

जब रात को यह हादसा हुआ तो अगले दिन सुबह 11 बजे के बाद वहां पर 2 पुलिस वाले तैनात दिखे जोकि केवल चालान काट रहे थे या किसी को रोक कर अपनी जेबें भरने का जुगाड़ कर रहे थे. लेकिन 2 दिन बाद फिर पुलिस वहां से गायब नजर आई.

पुलिस के कारनामे

आएदिन इस तरह के पुलिस के कारनामे सुनने को मिलते हैं कि पुलिस ने रोका और चालान न काट कर क्व500 ले कर छोड़ दिया. इस का क्या अर्थ है? क्या वह दोषी व्यक्ति फिर से वही गलती नहीं करेगा? जरूर करेगा क्योंकि वह जानता है कि क्व200-400 दे कर मामला रफादफा हो जाएगा. इसी कारण देश की आधी आबादी हैलमेट नहीं पहनती, स्कूटर, मोटरसाइकिल के पूरे कागज नहीं रखते, लाइसैंस नहीं बनवाती इत्यादि. इस वजह से हमारे कुछ भ्रष्ट पुलिस वालों की जेबें भरी रहती हैं.

यह मामला केवल अंबाला के उस एरिया का ही नहीं उस से आगे आइए अंबाला सिविल अस्पताल से ले कर यमुनानगर की तरफ आते हुए थाना छप्पर तक हर चौराहे का यही हाल है और इसी तरह से ही कई जगह और भी देखा गया है. बाकी देश का भी यही हाल है. आधे से ज्यादा लोग इसे ऊपर वाले की कृपा मान लेते हैं और कुछ वहां भीड़ में चीखचिल्ला कर भड़ास निकाल लेते हैं पर कभी ही कोई संबंधित अफसर को एक पत्र जनता की असुविधा पर लिखता है.

वसूल सको तो वसूल लो

जहां भी टोल टैक्स बैनर बना है, वहां पूरा स्टाफ रहता है ताकि टोल पूरा वसूल हो. जनता से पूरा टैक्स वसूल करना सरकार का हक है तो उस जनता की सुरक्षा सरकार का क्या फर्ज नहीं है? सरकार को बख्शा नहीं जाना चाहिए.

अकसर सुनते हैं कि रोड ऐक्सीडैंट में कोई न कोई मारा गया, किसी को ट्रक कुचल गया, किसी को बस कुचल गई और कभी फुटपाथ पर कोई कार वाला कार चढ़ा गया. जब कोई गरीब या साधारण जना मरता है तो किसी को कानोंकान खबर नहीं होती. लेकिन अगर किसी ऐक्सीडैंट में किसी अमीर के कुत्ते को भी चोट आ जाए तो हरजाना भरना पड़ता है, विक्टिम पर केस भी दर्ज किया जा सकता है.

क्या कोई जानता है इन रोजमर्रा के ऐक्सीडैंट्स का जिम्मेदार कौन है? इन ऐक्सीडैंट्स का जिम्मेदार सरकार या अन्य लोग भी उस बाइक चालक या कार, बस वाले को या शराब पी कर गाड़ी चलाने वाले को ही जिम्मेदार ठहराते हैं. लेकिन हर ऐक्सीडैंट के पीछे यह सचाई नहीं होती.

सुरक्षित नहीं सड़कें

माना कि सरकार ने बहुत से ब्रिज बनवाए, अधिकतर शहरों से बाहर ही हाई वे बना कर शहर का क्राउड कम किया, सड़कें भी काफी हद तक चौड़ी और नई बनाई हैं. सड़कें बना तो दीं, लेकिन क्या सड़कें सुव्यवस्थित ढंग से हैं अर्थात् उन की सुव्यवस्था है?

कहने का तात्पर्य यह है कि क्या हर सड़क पर स्ट्रीट लाइट है? क्या सड़कों के किनारे बनती दुकानों को दुर्घटनाओं के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है? क्या हर चौराहे से पहले स्पीड ब्रेकर या रिफ्लैक्टर है? क्या हर चौराहे पर लाल, पीली और हरी बत्ती यानी ट्रैफिक सिगनल लाइट है? क्या हर चौराहे पर ट्रैफिक पुलिस तैनात है?

नहीं. तो फिर उन हाईवे और सड़कों को बड़ा बनाने का क्या फायदा क्योंकि जितनी सड़क स्मूद होंगी, चौड़ी होंगी व्हिकल उतना ही तेज रफ्तार से चलेंगे.

घटनाओं का जिम्मेदार कौन

अगर स्पीड ब्रेकर नहीं तो कम से कम रिफ्लैक्टर तो हों, जिन से आती हुई गाड़ी को दूर से अंदेशा हो जाए कि वहां कुछ अवरोधक हो सकता है, इसलिए स्पीड कम करनी चाहिए. लेकिन अधिकतर देखा गया है कि न स्पीड ब्रेकर, न ट्रैफिक सिगनल लाइट्स, न ही कोई ट्रैफिक वाला चोराहे पर होता है, जोकि हादसे का कारण बन जाता है.

केवल सड़कें चौड़ी कर देने से कुछ नहीं होगा, उन सड़कों पर सिगनल लाइट्स, स्पीड ब्रेकर भी अवश्य होने चाहिए.

इन सब ऐक्सीडैंट्स का जिम्मेदार कौन है? क्या सड़क पर स्पीड ब्रेकर न होने इन ऐक्सीडैंट्स के लिए जिम्मेदार नहीं? क्या उस चौराहे पर सिगनल लाइट नहीं होनी चाहिए थी?

हमारे देश का सिस्टम इतना ढीला क्यों है? इसलिए कि शासक अपनी कार्यशैली के कारण नहीं धर्म, पूजा, हिंदूमुसलिम के नाम पर बनती है. चुनाव आते ही मंदिरों की साजसज्जा चालू हो जाती है, सड़कों को दुरुस्त करने की फुरसत ही नहीं रहती क्योंकि वोट और सत्ता जब इन से नहीं मिलेगी तो कोई क्यों चिंता करेगा.

क्या जनता कभी अपनी जिम्मेदारी समझोगी?

कहीं आप भी अनचाहे सैक्स की शिकार तो नहीं

Sex News in Hindi: दिन ब दिन बलात्कार (Rape) की घटनाओं में बढ़ोतरी होती जा रही है. इस के कई कारण हैं, जिन में एक है मानसिक हिंसा (Mental Voilence) की प्रवृत्ति का बढ़ना. ‘बलात्कार’ शब्द से एक लड़की या युवती पर जबरदस्ती झपटने वाले लोगों के लिए हिंसात्मक छवि उभर कर सामने आती है. इस घृणित कार्य के लिए कड़े दंड का भी प्रावधान है. मगर बहुत कम लोग इस बात को जानते हैं कि वैवाहिक जिंदगी में भी बलात्कार वर्जित है और इस के लिए भी दंड दिया जाता है. मगर इसे बलात्कार की जगह एक नए शब्द से संबोधित किया जाता है और वह शब्द है अनचाहा सैक्स संबंध.

आज अनचाहे सैक्स संबंधों की संख्या बढ़ गई है. समाज जाग्रत हो चुका है और अपने शरीर या आत्मसम्मान पर किसी भी तरह का दबाव कोई बरदाश्त नहीं करना चाहता है. इस विषय पर हम ने समाज के विभिन्न वर्ग के लोगों से बातचीत भी की और जानने की कोशिश की कि आखिर क्या है यह अनचाहा सैक्स संबंध?

डा. अनुराधा परब, जो एक प्रसिद्ध समाजशास्त्री हैं, बताती हैं, ‘‘बलात्कार और अनचाहे सेक्स में बहुत महीन सा फर्क है. बलात्कार अनजाने लोगों के बीच हुआ करता है और एक पक्ष इस का सशरीर पूर्ण विरोध करता है. अनचाहा सैक्स परिचितों के बीच होता है और इस में एक पक्ष मानसिक रूप से न चाह कर भी शारीरिक रूप से पूर्णत: विरोध नहीं करता है. सामान्यत: यही फर्क होता है. मगर गहराई से जाना जाए तो बहुत ही सघन भेद होता है.

‘‘अनचाहा सैक्स ज्यादातर पतिपत्नी के बीच हुआ करता है और आजकल प्रेमीप्रेमिका भी इस संबंध की चपेट में आ गए हैं. आधुनिक युग में शारीरिक संबंध बनाना एक आम बात भले ही हो गई हो, फिर भी महिलाएं इस से अभी भी परहेज करती हैं. कारण चाहे गर्भवती हो जाने का डर हो या मानसिक रूप से समर्पण न कर पाने का स्वभाव, मगर अनचाहे सैक्स संबंध की प्रताड़नाएं सब से ज्यादा महिलाओं को ही झेलनी पड़ती हैं.’’

वजह वर्कलोड

एक एडवरटाइजिंग कंपनी में मार्केटिंग मैनेजर के पद पर कार्यरत पारुल श्रीनिवासन, जिन का विवाह 6 साल पहले हुआ था, एक चौंका देने वाला सत्य सामने लाती हैं.

पारुल बताती हैं, ‘‘मैं अपने पति को बेहद प्यार करती हूं. उन के साथ आउटिंग पर भी अकसर जाती रहती हूं, मगर सैक्स संबंधों में बहुत रैगुलर नहीं हूं. इस का कारण जो भी हो, मगर मुझे ऐसा लगता है कि इस का मुख्य कारण है, हम दोनों का वर्किंग होना. शुरूशुरू में 1 महीना हम दोनों छुट्टियां ले कर हनीमून के लिए हांगकांग और मलयेशिया गए थे. वहां से आने के बाद अपनेअपने कामों में व्यस्त हो गए. रात को बिस्तर पर जाने के बाद सैक्स संबंध बनाने की इच्छा न तो मुझे रहती है, न मेरे पति को. पति कभी आगे बढ़ते भी हैं तो मैं टालने की पूरी कोशिश करती हूं.’’

कारण की तह तक पहुंचने पर पता चला कि शुरूशुरू के दिनों में पति सैक्स संबंध बनाना चाहता था. मगर पारुल को अपनी मार्केटिंग का वर्कलोड इतना रहता था कि वह उसी में खोई रहती थी. पति के समक्ष अपना शरीर तो समर्पित कर देती थी, मगर मन कहीं और भटकता रहता था. पति को यह प्रक्रिया बलात्कार सी लगती. कई बार समझाने, मनाने की कोशिश भी उस ने की. मगर पारुल हमेशा यही कहती कि आज मूड नहीं बन रहा है.

एक दिन पारुल ने खुल कर कह ही दिया कि वह यदि सैक्स संबंधों में रत होती भी है तो बिना मन और इच्छा के. वह अनचाहा सैक्स संबंध जी रही है. पति को यह बुरा लगा और धीरेधीरे सैक्स के प्रति उसे भी अरुचि होती चली गई.

भयमुक्त करना जरूरी

ऐसी कई पत्नियां हैं, जो अनचाहा सैक्स संबंध बनाने पर विवश हो जाती हैं. मगर तबस्सुम खानम की कहानी कुछ और ही है. 26 वर्षीय तबस्सुम एक टीचर हैं, उन के पति उन से 12 साल बड़े हैं. उन की एक दुकान है.

तबस्सुम खानम बताती हैं, ‘‘जब मैं किशोरी थी, तभी से मुझे सैक्स संबंधों के प्रति भय बना हुआ था. सहेलियों से इस को ले कर सैक्स अनुभव की बातें करती थीं और मुझे सुन कर डर सा लगता था. मैं सहेलियों से कहती थी कि मैं तो अपने शौहर से कहूंगी कि बस मेरे गले लग कर मेरे पहलू में सोए रहें. इस से आगे मैं उन्हें बढ़ने ही नहीं दूंगी. सभी सहेलियां खूब हंसती थीं. जब मेरी शादी हुई तो शौहर हालांकि बड़े समझदार हैं, मगर शारीरिक उत्तेजना की बात करें तो खुद पर संयम नहीं रख पाते हैं.’’

थोड़ा झिझकती हुई, थोड़ा शरमाती हुई तबस्सुम खानम आगे बताती हैं, ‘‘मेरे पति ने मेरे लाख समझाने पर भी सुहागरात के दिन ही मुझे अपनी मीठीमीठी बातों में बहला लिया. उन का यह सिलसिला महीनों चलता रहा, मुझे आनंद का अनुभव तो होता, मगर भय ज्यादा लगता था. मेरा भय बढ़ता गया. जब भी रात होती, मेरे पति बैडरूम में प्रवेश करते, मैं डर से कांप उठती थी. हालांकि मेरे पति के द्वारा कोई भी अमानवीय हरकत कभी नहीं होती. काफी प्यार और भावुकता से वे फोरप्ले करते हुए, आगे बढ़ते थे. मगर मेरे मन में जो डर समाया था, वह निकलता ही न था.

“3 महीनों के बाद जब मैं गर्भवती हो गई तो डाक्टर ने हम दोनों के अगले 2 महीनों तक शारीरिक संबंध बनाने पर प्रतिबंध लगा दिया था. मुझे तो ऐसा लगा जैसे एक नया जीवन मिल गया. मेरा बेटा हुआ. इस बीच मैं ने धीरेधीरे पति को अपने डर की बात बता दी और वे भी समझ गए.

“मेरे पति ने भी परिपक्वता दिखाई और मुझ से दूर रह कर मुझे धीरेधीरे समझाने लगे. वे सैक्स संबंधों को स्वाभाविक और जीवन का एक अंश बताते. अंतत: उन्होंने मेरे मन से भय निकाल ही दिया.’’

इच्छाअनिच्छा का खयाल

डाक्टर विनोद कामलानी, जो एक प्रसिद्ध मनोचिकित्सक हैं, अपना क्लीनिक चलाते हैं, बताते हैं, ‘‘तबस्सुम के मन में बैठा हुआ सैक्स का डर था. बहुत सी लड़कियां इस भय से भयातुर हुआ करती हैं. मगर बहुत कम पति ऐसे होते हैं, जो धीरेधीरे इस भय को निकालते हैं. ऐसे कई केस मेरे पास आते हैं. पुरुषों के भी होते हैं, मगर अनचाहे सेक्स की शिकार ज्यादातर महिलाएं ही हुआ करती हैं.’’

डाक्टर विनोद कामलानी के ही एक मरीज तरुण पटवर्धन ने बताया कि उन की शादी को 3 साल हो गए हैं, मगर आज तक उन्होंने अनचाहा सैक्स संबंध ही जीया है.

तरुण के अनुसार, विवाहपूर्व उन का प्रेम अपने पड़ोस की एक लड़की से था. किसी कारणवश शादी नहीं हो पाई, मगर प्रेम अभी भी बरकरार है. उस लड़की ने तरुण की याद में आजीवन कुंआरी रहने की शपथ भी ले रखी है. यही कारण है कि जब भी तरुण अपनी पत्नी से शारीरिक संबंध बनाने की पहल करते हैं, उन की प्रेमिका का चेहरा सामने आ जाता है. उन्हें एक ‘गिल्ट’ महसूस होता है और वे शांत हो कर लेट जाते हैं. वे अपनी पत्नी से यह सब कहना भी नहीं चाहते हैं वरना उस के आत्मसम्मान को चोट पहुंचेगी. चूंकि उन की पत्नी तरुण को। सैक्स प्रक्रिया बनाने में अयोग्य न समझे, उन्हें अपनी पत्नी के साथ सैक्स संबंध बनाना पड़ता है. वे सैक्स संबंध बिना मन, बिना रुचि के बनाते हैं और इस तरह वे अनचाहा सैक्स संबंध ही जी रहे हैं.

एक सर्वे के अनुसार, आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में काम की होड़ और आगे निकलने की चाह ने इनसान को मशीन बना दिया है. पैसा कमाना ही एक मात्र ध्येय बन चुका है. ऐसी भागदौड़ में इनसान सैक्स संबंधों के प्रति इंसाफ नहीं कर पाता है और बिना मन और बिना प्रोपर फोरप्ले के बने हुए सैक्स संबंध, मन में सैक्स के प्रति अरुचि पैदा कर देते हैं. यहीं से शुरुआत होती है अनचाहे सैक्स संबंधों की. अपने पार्टनर की खुशी के लिए संबंध बनाना कभीकभी विवशता भी होती है. अंतत: यही संबंध ऊब का रूप धारण कर लेते हैं या पार्टनर बदलने की चाह मन में उठती है. यद्यपि यह अनचाहा सैक्स पश्चिमी देशों में तेजी से बढ़ रहा है, भारत भी इस से अछूता नहीं है, परंतु यहां का अनुपात अन्य देशों के मुकाबले नगण्य है.

तलाकशुदा से मेरे जिस्मानी संबंध है,अब वो शादी करने पर जोर दे रही है मैं क्या करूं?

सवाल-

मैं 19 साल का एक लड़का हूं और शहर में किराए पर रहता हूं. मकान मालिक की बेटी शादी के बाद तलाक ले कर घर पर बैठी है. वह मुझे अच्छी लगती है और उसे मैं.

अकेलेपन का फायदा उठाते हुए मैं ने और उस ने जिस्मानी रिश्ता भी बना लिया है. उस की उम्र 24 साल है और वह एक बच्ची की मां भी है. बच्ची उसी के पास रहती है. पिछले कुछ दिनों से वह मुझ पर शादी करने का जोर दे रही है और आनाकानी करने पर मुझे पुलिस के हवाले करने की धमकी देती है. मैं क्या करूं?

जवाब-

मुफ्त के मजे लूटे हैं तो थोड़ी परेशानी भी उठाइए. उसे और आप दोनों को सैक्स की जरूरत थी, जो पूरी हो गई. अब लड़की आप में हिफाजत और सहारा ढूंढ़ने लगी है और पुलिस की धमकी दे कर बेजा दबाव बना रही है.

अगर वह अच्छे स्वभाव की है और आप को लगता है कि उस से शादी कर जिंदगी अच्छे से कट जाएगी, तो इस तरफ भी सोचें कि तलाकशुदा होना कोई गुनाह नहीं है. संबंध बनाने से पहले आप ने यह नहीं सोचा होगा कि ऐसी भी नौबत आ सकती है, इसलिए अब आप डर रहे हैं. बेहतर होगा कि आप उसे खुल कर दिल की बात बता दें.

पुलिस की धमकी में ज्यादा दम नहीं है, लेकिन याद रखें कि वह अगर हिम्मत करते सचमुच थाने चली गई तो आप बलात्कार के आरोप में नप जाएंगे, इसलिए प्यार से उसे बहलाफुसला कर किनारा कर लेने में ही आप की भलाई है.

अपनी ही दुश्मन : जिस्म और पैसे की भूखी कविता

Story in hindi

अधूरा सा इश्क: क्या था अमन का फैसला

यादों के झरोखे पर आज फिर किसी ने दस्तक दी थी. न चाहते हुए भी अमन का मन उस और खींचता चला गया. अपनी बेटी का आंसुओं से भीगा हुआ चेहरा उसे बारबार कचोट रहा था.

“विनय, मुझे माफ कर दो, मैं तुम से शादी नहीं कर सकती. मैं अपने पापा को धोखा नहीं दे सकती. मैं उन का गुरूर हूं…उन के भरोसे को मैं तोड़ नहीं सकती. हो सके तो मुझे माफ कर देना.”

देर रात श्रेया के कमरे की जलती हुई लाइट को देख अमन के कदम उस ओर बढ़ गए थे. श्रेया की हिचिकियों की आवाजें बाहर तक आ रही थीं. अमन दरवाजे पर कान लगाए खड़ा था. फोन पर उधर किसी ने क्या कहा अमन यह तो नहीं सुन पाया पर श्रेया के शब्द सुन कर उस के पैर कमरे के बाहर ही जम गए. कितना गुस्सा आया था उसे…पिताजी के खिलाफ जा कर उस ने श्रेया का कालेज में दाखिला कराया था और वह…

“आग और भूसे को एकसाथ नहीं रखा जाता. वैसे भी इसे दूसरे घर जाना है. कल कोई ऊंचनीच हो गई तो मुझ से मत कहना.”

अपने बाबा की बात सुन श्रेया संकोच और शर्म से गड़ गई थी. तब अमन ने कितने विश्वास के साथ कहा था,”पिताजी, मुझे श्रेया पर पूरा भरोसा है. वह मेरा सिर कभी झुकने नहीं देगी.”

श्रेया रोतेरोते सो गई. अमन उसे सोता हुआ देख रहा था. उस की छोटी सी गुड़िया कब इतनी बड़ी हो गई… तकिया आंसुओं से गीला हो गया था. बिस्तर के बगल में रखे लैंप की रौशनी में उस का मासूम चेहरा देख अमन का कलेजा मुंह को आ गया. कितना थका सा लग रहा था उस का चेहरा मानों वह मीलों का सफर तय कर के आई हो. कितनी मासूम लग रही थी वह.

उस की श्रेया किसी लड़के के चक्कर में…अभी उस ने दुनिया ही कहां देखी है? आजकल के ये लड़के बाप के पैसों से घुमाएंगेफिराएंगे और फिर छोड़ देंगे. श्रेया के मासूम चेहरे को देख अमन को किसी की याद आ गई. सच मानों तो इतने सालों के बाद भी वह उस चेहरे को भूल नहीं पाया था.

उसे लगा आज किसी ने उसे 25 साल पीछे ला कर खड़ा कर दिया हो. न जाने कितनी ही रातें उस ने उस के खयालों में बिता दी थीं. उस के जाने से कुछ नहीं बदला था, रात भी आई थी…चांद भी आया था पर बस नींद नहीं आई थी.

कितनी बार…हां, न जाने कितनी ही बार वह नींद से जाग कर उठ जाता.तब एक बात दिमाग में आती, जब खयाल और मन में घुमड़ते अनगिनत सवाल और बवाल करने लगे तब तुम आ जाओ. तुम्हारा वह सवाल जनून बन जाएगा और बवाल जीवन का सुकून…आज सोचता हूं तो हंसी आती है. बावरा ही तो था वह…बावरे से मन की यह न जानें कितनी बावरी सी बातें थीं. कोई रात ऐसी नहीं थी जब वह साथ नहीं होती. हां, यह बात अलग थी कि वह साथ हो कर भी साथ नहीं होती. अमन को कभीकभी लगता था कि उस के बिना तो रात में भी रात न होती. शायद इसी को तो इश्क कहते हैं… इतने साल बीत जाने पर भी वह उस को माफ नहीं कर पाया था.

सच कहा है किसी ने मन से ज्यादा उपजाऊ जगह कोई नहीं होती क्योंकि वहां जो कुछ भी बोया जाए उगता जरूर है चाहे वह विचार हो, नफरत हो या प्यार. कुछ ख्वाहिशें बारिश की बूंदों की तरह होती हैं जिन्हें पाने की जीवनभर चाहत होती है. उस चाहत को पाने में हथेलियां तो भीग जाती हैं पर हाथ हमेशा खाली रहता है. उस का प्यार इतना कमजोर था कि वह हिम्मत नहीं कर पाई. बस, कुछ सालों की ही तो बात थी…

“कैसी लग रही हूं मैं..?” खुशी ने मुसकराते हुए अमन से पूछा था. अमन उस के चेहरे में खो सा गया था. लाल सुर्ख जोड़े और मेहंदी लगे हाथों में वस और भी खूबसूरत लग रही थी. वह उसे एकटक देखता रहा और सोचता रहा कि मेरा चांद किसी और की छत पर चमकने को तैयार था.

“तुम हमेशा की तरह खूबसूरत…बहुत खूबसूरत लग रही हो.”

“सच में…”

“क्या तुम्हें मेरी बात पर भरोसा नहीं, कोई गवाह चाहिए तुम्हें…”

अमन की आंखों में न जाने कितने सवाल तैर रहे थे. ऐसे सवाल जिन का जवाब उस के पास नहीं था. खुशी ने अचकचा कर अपनी आंखें फेर लीं और भरसक हंसने का प्रयास करने लगी. अमन उस मासूम हंसी को कभी नहीं भूल सकता था. न जाने क्या सोच कर वह एकदम से चुप हो गया. उस समय वे दोनों कमरे में अकेले थे. बारात आने वाली थी.सब तैयारी में इधरउधर दौड़भाग रहे थे. कमरे में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था.

शायद बारात आ गई थी. भीड़ का शोर बढ़ता जा रहा और खुशी के चेहरे पर बेचैनी भी…वह तेजी से अपनी उंगलियों में दुपट्टे को लपेटती और फिर ढीला छोड़ देती. कुछ था जो उस के हाथों से छूटने जा रहा था पर….खुशी सोच रही थी कि माथे का सिंदूर रिश्ते की निशानी हो सकती है पर क्या प्यार की भी? तब खुशी ने ही बोलना शुरू किया, “अमन, शायद तुम्हें मुझ से, अपने जीवन से शिकायत हो. शायद तुम्हें लगे कुदरत ने हमारा साथ नहीं दिया पर एक बार खिड़की से बाहर उन चेहरों को देखो जो मेरी खुशी के लिए कितने दिनों से दौड़भाग रहे हैं. मेरे पापा से मिल कर देखो, खुशी उन की आंखों से बारबार छलक रही है और मेरी मां… वह भी कितनी खुश है.

“क्या अगर आज हम ने उन की मरजी के खिलाफ जा कर चुपचाप शादी कर ली होती, इतने लोगों को दुख पहुंचा कर हम नए जीवन की शुरुआत कर पाते? तुम्हें शायद मेरी बातें आज न समझ में आए पर एक न एक दिन तुम्हें लगेगा कि मैं गलत नहीं थी. हो सके तो मुझे भूल जाना…”

“भूल जाना…” आसानी से कह दिया था खुशी ने यह सब पर क्या यह इतना आसान था? अमन मुसकरा कर रह गया. उस की मुसकराहट में खुशी को न पा पाने का गम, अपने बेरोजगार होने की मजबूरी बारबार साल रही थी. आज खुशी जिन लोगों का दिल रखने की कोशिश कर रही थी, क्या किसी ने उस का दिल रखने की कोशिश की? खुशी की बहनें जयमाल के लिए खुशी को ले कर चली गईं. अमन काफी देर तक उस स्थान को देखता रहा जहां खुशी बैठी थी. उस के वजूद की खुशबू वह अभी तक महसूस कर रहा था.

खुशी सिर्फ उस के जीवन से नहीं जा रही थी, उस के साथ उस की खुशियां, उस के होने का मकसद को भी ले कर चली गई थी. वह तेजी से उठा और भीड़ में गुम हो गया.

“अरे अमन, वहां क्यों खड़े हो? यहां आओ न… फोटो तो खिंचवाओ,” खुशी की मां ने हुलस कर कहा और वह झट से दोस्तों के साथ मंच पर चढ़ गया. न जाने क्यों खुशी का चेहरा उतर गया था. एक अजीब सा तनाव और गुस्सा अमन के चेहरे पर था, जैसे किसी बच्चे से उस का पसंदीदा खिलौना छीन लिया गया हो. अमन खुशी के पति के पीछे जा कर खड़ा हो गया, जैसे वह खुद को बहला रहा था. जिस जगह पर आज खुशी का पति बैठा है इस जगह पर तो उसे होना चाहिए था.

आज उस का मन यादों के भंवर में घूम रहा था. याद है, आज भी उसे खुशी से वह पहली मुलाकात… फरवरी की गुलाबी ठंड शीतल हवा के झोंके चेहरे से टकरा कर एक अजीब सी मदहोशी में डुबो रहे थे. बादलों से झांकता सूरज बारबार आंखमिचौली कर रहा था.

तभी सामने से आती एक सुंदर सी लड़की जिस ने पीले सलवारकमीज पर चांदी की चूड़ियां डाल रखी थीं, उस पर नजरें टिक गईं. हाथ की कलाई में बंधी घड़ी को उस ने बेचैनी से देखा. शायद उसे क्लास के लिए आज देर हो गई थी. उस के चेहरे पर बिखरी हुई लटें किसी का भी मन मोह लेने में सक्षम थी, हर पल उस के कदम अमन की ओर बढ़ते जा रहे थे और उस के हर बढ़ते हुए कदम के साथ अमन का दिल जोरजोर से धङकने लगा था. सांसें थम सी गई थीं, चेहरा घबराहट से लाल हो गया था. शायद यह उम्र का असर था या फिर कुछ और, उस की निगाहों की कशिश उसे अपनी ओर खींचने को मजबूर करती थीं. उसे रोज देखने की आदत न जाने कब मुहब्बत में बदल गई.

वे घंटों एकदूसरे के साथ सीढ़ियों पर बैठे रहते थे, उन के मौन के बीच भी कोई था जो बोलता था. एकदूसरे का साथ उन्हें अच्छा लगता था. आज भी उस रास्ते से जब वह गुजरता तो लगता वह उन सीढ़ियों पर बैठा उस का इंतजार कर रहा है और वह अपनी सहेलियों के बीच घिरी कनखियों से उस के चेहरे को पढ़ने की कोशिश कर रही है.

यहीं…हां, यहीं तो उस ने अपनी शादी का कार्ड पकड़ाया था. न जाने क्यों उस की बोलती और चमकती आंखों में लाल डोरे उभर आए थे. कुछ खोईखोई सी लग रही थी वह… उस दिन भी तो उस ने उस का पसंदीदा रंग पहन रखा था. यह इत्तिफाक था या फिर कुछ और वह आज तक समझ नहीं पाया…

हाथों में वही चांदी की चूड़ियां… लाल सुर्ख कार्ड को उस ने अपनी झुकी पलकों और कंपकंपाते हाथों के साथ अमन को पकड़ाया. पता नहीं वह भ्रम था या फिर कुछ और… उस के गुलाबी होंठ कुछ कहने के लिए फड़फड़ाए थे पर…हिरनी सी चंचल आंखों से में एक अजीब सा सूनापन था. खालीपन तो उस की आंखों में भी था…

“आओगे न…” इन 2 शब्दों ने उस के कानों तक आतेआते न जाने कितने मीलों का सफर तय किया था. सच ही तो है, हम सब एक सफर में ही तो हैं.

“तुम…तुम सचमुच चाहती हो मैं आऊं?”

आंसू की 2 बूंदें उस कार्ड पर टप से टपक पङे और वह मेरे बिना कोई जवाब दिए दूर बहुत दूर चली गई. कितना गुस्सा आया था उस दिन… एक बार… हां, एक बार भी नहीं सोचा उस ने मेरे बारे में…क्या वह मेरा इंतजार नहीं कर सकती थीं? कितनी शामें मैं ने उस की उस पसंदीदा जगह पर इंतजार किया था पर वह नहीं आई. शायद उसे आना भी नहीं था. खिड़की से झांकता पेड़ मुझ से बारबार पूछता कि क्या वह आएगी? पर नहीं, पार्क में पड़ी लकड़ी की वह बैंच…

आज भी उस बैंच पर गुलमोहर के फूल गिरते हैं, जिन्हें वह अपने नाजुक हाथों में घुमाघुमा अठखेलियां करती थी. बारिश की बूंदें जब उस के चेहरे को छू कर मिट्टी में लोट जाती तब वह उस की सोंधी खुशबू से पागल सी हो जाती. बरगद का वह विशाल पेङ जहां वह अमन के साथ घंटों बैठ कर भविष्य के सपने बुनती, आज भी उस का इंतजार कर रहा था. अपनी नाजुक कलाइयों से वह उस विशाल पेङ को बांधने का निर्रथक प्रयास करती, उस का वह बचपना आज भी अमन को गुदगुदा देता.

अमन सोच रहा था कि शब्द और सोच इंसान की दूरियां बढ़ा देते हैं और कभी हम समझ नहीं पाते और कभी समझा नहीं पाते. कल वह खुशी को समझ नहीं पाया था और आज वह श्रेया को नहीं समझ पा रहा. उस ने तो सिर्फ उतना ही देखा और समझा जितना वह देखना और समझना चाहता था. जिंदगीभर उसे खुशी से शिकायतें रहीं पर एक बार भी उस ने यह सोचा कि खुशी को भी तो उस से शिकायतें हो सकती हैं? वह भी तो उस के पिता से मिल कर उन्हें समझा सकता था? खुशी का दिया जख्म उसे आज तक टीस देता था पर आज श्रेया के प्यार के बारे में जान कर भी वह कुछ नहीं करेगा?

क्या उस नए जख्म को बरदाश्त कर पाएगा? खुशी और श्रेया न जाने क्यों उसे आज एक ही नाव पर सवार लग रहे थे, जो दूसरों का दिल रखने के चक्कर में अपना दिल रखना कब का भूल चुके थे.

सच कहा था उस दिन खुशी ने कि एक दिन मुझे उस की बातें समझ में आएंगी. अमन की आंखें बोझिल हो रही थीं, वह थक गया था अपने विचारों से लड़तेलड़ते…उस की पत्नी नींद के आगोश में थी. अमन खिड़की के पास आ कर खड़ा हो गया. बाहर तेज बारिश हो रही थी. हवा के झोंके ने अमन के तन को भिगो दिया. पानी की तेज धार में पत्ते धूल गए थे और कहीं न कहीं अमन की गलतफहमियां भी… वह निश्चय कर चुका था कि बेशक उस की जिंदगी में खुशी नहीं आ पाई थी मगर मेरी श्रेया किसी की नफरत का शिकार नहीं बनेगी…वह कल ही उस से बात करेगा.

चालान : लहना सिंह पर क्यों गिरी गाज

‘‘आजकल काम मंदा चल रहा है. 2-4 दिन ठहर कर आना,’’ लहना सिंह ने सादा वरदी में महीना लेने आए ट्रैफिक पुलिस के एक सिपाही से कहा.

‘‘यह नहीं हो सकता. थानेदार साहब ने बोला है कि पैसे ले कर ही आना. आज बड़े साहब के यहां पार्टी है,’’ सिपाही ने कोल्डड्रिंक की बोतल खाली कर उसे थमाते हुए कहा.

‘‘अरे भाई, 4 दिन से गाड़ी खाली खड़ी है. जेब बिलकुल खाली है,’’ लहना सिंह ने मजबूरी जताई.

‘‘जब थानेदार साहब यहां आएं, तब उन से यह सब कहना. कैसे भी हो, मु झे तो 3 सौ रुपए थमाओ. मु झे औरों से महीना भी इकट्ठा करना है,’’ सिपाही पुलिसिया रोब के साथ बोला.

लहना सिंह ने जेब में हाथ डाला. महज 60-70 रुपए थे. अब वह बाकी रकम कहां से पूरी करे? वह उठा और अड्डे पर मौजूद दूसरे साथियों से खुसुरफुसुर की.

किसी ने 20 रुपए, किसी ने 50 रुपए, तो किसी ने सौ रुपए थमा दिए.

लहना सिंह सिपाही के पास पहुंचा और गिन कर उसे ‘महीने’ के 3 सौ रुपए थमा दिए.

सिपाही रुपए ले कर चलता बना.

लहना सिंह भाड़े का छोटा ट्रक चलाता था. पहले वह एक ट्रक मालिक के यहां ड्राइवर था, जिस के कई ट्रक थे. फिर उस ने अपने मालिक से ही यह छोटा ट्रक कबाड़ी के दाम पर खरीद लिया था.

लहना सिंह ने कुछ हजार रुपए ऊपर खर्च कर के ट्रक को काम करने लायक बना लिया था.

ट्रक काफी पुराना था. उस के सारे कागजात पुराने थे. कई साल से उस का रोड टैक्स नहीं भरा गया था.

ऐसे ट्रक को बेचने वाला मालिक काफी तेजतर्रार था. उस ने पुलिस से ‘महीना’ बांधा हुआ था. अब यही ‘महीना’ लहना सिंह को देना पड़ता था.

पिछले कई दिनों से लगातार बारिश हो रही थी. जहांतहां कीचड़ और पानी भरा था. धंधा काफी मंदा था. उसे कभी काम मिल जाता था, कभी कई तक दिन खाली बैठना पड़ता था. पहले लहना सिंह खुद दूसरों का ट्रक चलाता रहा था, लेकिन अब मालिक बन कर अड्डे के तख्त पर दूसरे ट्रक मालिकों के साथ वह ताश खेलता था.

आज घर राशन ले जाना था. बीमार मां और पत्नी को भी अस्पताल दवा लेने जाना था. खर्च बहुत थे, मगर कमाई नहीं हुई थी.

तभी लाला मिट्ठल लाल अड्डे पर आ गया.

‘‘आओ लालाजी,’’ लहना सिंह ने बडे़ प्यार से कहा.

‘‘अरे लहना सिंह, किस की गाड़ी का नंबर है?’’

‘‘अपना है जी. कहां जाना है?’’

‘‘जमालपुर.’’

‘‘चलेंगे जी. क्या माल है?’’

‘‘अनाज की बोरियां हैं. तकरीबन 20 क्विंटल माल है.’’

‘‘कोई बात नहीं जी. ले जाएंगे.’’

‘‘गाड़ी ठीक है न?’’

‘‘अरे लालाजी, आप ने कई बार बरत रखी है. क्या कभी आप का काम रुका है?’’

‘‘कितना भाड़ा लोगे?’’

‘‘2 हजार रुपए.’’

‘‘बहुत ज्यादा है.’’

‘‘नहीं लालाजी, आज के महंगाई के जमाने में ज्यादा नहीं है.’’

‘‘5 सौ रुपए दूंगा.’’

‘‘नहीं जी, आप 2 सौ रुपए कम

कर लो.’’

‘‘चलो, 17 सौ दे देंगे.’’

‘‘ठीक है जी. आप मालिक हो. कब गाड़ी लगाऊं?’’

‘‘अभी ले चलो. मेरा गोदाम तो देखा हुआ है तुम ने.’’

‘‘लालाजी 5 सौ रुपए पेशगी दे दो. डीजल डलवाना है.’’

लालाजी ने 5 सौ रुपए दे दिए.

लालाजी के साथसाथ लहना सिंह, ड्राइवर और क्लीनर चारों ट्रक में सवार हो गए.

पैट्रोल पंप रास्ते में ही था. 4 सौ रुपए का डीजल डलवा कर सौ रुपए ड्राइवर को रास्ते के खर्च के लिए थमा कर लहना सिंह अड्डे पर लौट आया.

लालाजी ने गोदाम से 50-50 किलो वाले 40 कट्टे ट्रक में रखवा दिए. ट्रक जमालपुर की तरफ चल पड़ा.

जमालपुर जाने के लिए 2 रास्ते थे. पहला रास्ता थोड़ा लंबा था, मगर कच्चा था. लेकिन इस रास्ते पर चैकिंग न के बराबर होती थी. नंबर दो का काम करने वालों के लिए और लहना सिंह जैसे गाड़ी वालों के लिए जिन के कागजात पूरे नहीं थे, महफूज रास्ता था.

दूसरा रास्ता पक्का था. साफसपाट, सीधा था. मगर इस रास्ते पर ट्रैफिक पुलिस, टैक्स वालों और दूसरे महकमों की चैकिंग बहुत होती रहती थी. ऊपर से यह रास्ता रेलवे लाइन के साथसाथ रेलवे स्टेशन को पार करता आगे बढ़ता था.

यहां पर रेलवे पुलिस का अधिकार क्षेत्र था. किसी भी लिहाज से यह नंबर दो वालों के लिए और बिना पूरे कागजात वाली गाड़ी वालों के लिए महफूज नहीं था.

लालाजी लंबे और महफूज रास्ते से जा रहे थे. ट्रक आगे बढ़ रहा था कि तभी ड्राइवर ने ब्रेक लगा दिया.

‘‘क्या हुआ?’’  झपकी ले रहे लालाजी ने आंखें खोल कर पूछा.

‘‘आगे सड़क टूटी हुई है जी.’’

लालाजी ने उचक कर देखा. सड़क का एक लंबा हिस्सा टूट कर बिखर गया था. घुटनों तक पानी था. अब क्या करें?

ड्राइवर ने लहना सिंह को मोबाइल से फोन किया और सारी बात बताई.

‘‘लालाजी से पूछ ले कि क्या करना है?’’ लहना सिंह ने कहा.

लालाजी सोच में डूबे थे. उन के पास नंबर दो का माल था. दूसरा रास्ता चैकिंग करने वालों से भरा रहता था. माल पकड़ा जा सकता था.

अभी तक लालाजी को यह पता नहीं था कि लहना सिंह के ट्रक के कागजात पूरे नहीं थे. क्या गाड़ी वापस ले चलें? मगर माल आज ही पहुंचाना था. पार्टी सारा पैसा पेशगी दे गई थी.

‘‘दूसरे रास्ते से ले चलो.’’

‘‘ठीक है जी,’’ कह कर ड्राइवर ने गाड़ी मोड़ ली.

रेलवे स्टेशन से थोड़ा पहले ट्रक रोक कर उस ने क्लीनर को ‘जरा नजर डाल आ’ का इशारा किया.

क्लीनर स्टेशन के पास पहुंचा. चौक सुनसान था. रेलवे स्टेशन खाली था. रेलवे लाइन के साथ लगती सड़क भी खाली थी.

क्लीनर के इशारा करते ही ड्राइवर ने ट्रक स्टार्ट कर आगे बढ़ा दिया.

रेलवे पुलिस की चौकी का इंचार्ज अचानक चौकी से बाहर चला आया.

उसी वक्त ड्राइवर ट्रक को चलाता हुआ चौक पर पहुंचा. ट्रक को देखते ही चौकी इंचार्ज ने रुकने का इशारा किया.

ट्रक रुक गया. पुलिस वाला पास आते हुए बोला, ‘‘ट्रक कहां जा रहा है?’’

‘‘जमालपुर.’’

‘‘इधर से क्यों जा रहे हो?’’

‘‘उधर का रास्ता खराब है जी.’’

‘‘गाड़ी में क्या है?’’

‘‘अनाज है जी.’’

‘‘माल का बिल है?’’

‘‘माल मेरा अपना है जी. अपने घर ही ले जा रहा हूं. किसी को बेचा नहीं है, इसलिए बिल किस बात का?’’ लालाजी ने दिलेरी दिखाते हुए कहा.

‘‘गाड़ी के कागजात दिखाओ.’’

इस पर ड्राइवर सकपका गया. उस ने एक कटीफटी कौपी थमा दी.

‘‘यह क्या है?’’

‘‘आरसी है जी.’’

‘‘अबे, यह आरसी है?’’ पुलिस वाले ने कौपी के पन्ने पलटते हुए कहा.

‘‘और कोई कागजात है?’’

‘‘नहीं जी.’’

‘‘रोड टैक्स की रसीद? बीमा की रसीद या प्रदूषण की रसीद? कुछ है?’’

‘‘नहीं जी.’’

‘‘नीचे उतर.’’

ड्राइवर के साथसाथ लालाजी भी नीचे उतर आए.

‘‘साहबजी, मु झे नहीं पता था कि इस गाड़ी के कागजात पूरे नहीं हैं, वरना मैं माल नहीं लाता,’’ लालाजी ने हाथ जोड़ते हुए कहा.

‘‘हमें माल से कोई मतलब नहीं है. आप अपना माल उतरवा लें. गाड़ी के कागजात नहीं हैं और यह रेलवे पुलिस के इलाके में आ गई है. इसलिए इसे बंद करना पड़ेगा.’’

ड्राइवर ने मोबाइल निकाल कर लहना सिंह को फोन कर दिया.

‘हौसला रख. मैं आ रहा हूं,’ लहना सिंह ने कहा.

तब तक गाड़ी थाने में बंद हो गई.

लहना सिंह की मिन्नतों का कोई असर न हुआ. चालान पर ड्राइवर के बाएं हाथ के अंगूठे की छाप लगवा कर चौकी इंचार्ज ने मुख्य कौपी उसे थमा दी.

‘‘इस चालान का फैसला कौन करेगा साहब?’’ लहना सिंह ने पूछा.

‘‘जिला अदालत में चले जाना. वहां पर मजिस्ट्रेट इस के लिए नियुक्त है, वह जुर्माना लगा कर गाड़ी छोड़ देगा.’’

लहना सिंह जिला अदालत पहुंचा. पता चला कि इन दिनों अदालतें बंद थीं. ड्यूटी मजिस्टे्रट को जुर्माना लगाने का अधिकार नहीं था. गाड़ी कानूनी तौर पर लहना सिंह के नाम नहीं थी, इसलिए सुपुर्दगी के आधार पर भी ट्रक नहीं छूट सकता था. लहना सिंह के पास 3 हफ्ते तक इंतजार करने के सिवा और कोई चारा न था.

3 हफ्ते बाद अदालतें खुलीं. भुक्तभोगियों ने लहना सिंह को बता दिया था कि उस को ज्यादा से ज्यादा 5 हजार रुपए तक का जुर्माना भरना पड़ सकता है.

जेब में 6 हजार रुपए रख लहना सिंह ड्राइवर के साथ अदालत पहुंचा. चालान ड्राइवर के नाम काटा गया था. मजिस्ट्रेट अभी चैंबर में ही बैठे थे. लहना सिंह रीडर के पास पहुंचा. सौ रुपए का एक नोट उस की मुट्ठी में दबा कर फुसफुसाया, ‘‘ठीक है.’’

‘‘मैं 12 बजे आवाज दिलवाऊंगा और साहब को सिफारिश लगा दूंगा,’’ रीडर भी फुसफुसाया.

12 बजे आवाज पड़ी. ड्राइवर के साथ लहना सिंह अंदर पहुंचा. साहब ने उस की तरफ फिर ड्राइवर की तरफ गौर से देखा.

‘‘गाड़ी का मालिक कौन है?’’

‘‘मैं हूं जी,’’ लहना सिंह बोला.

‘‘गाड़ी के कागजात कहां हैं?’’

लहना सिंह ने कटीफटी कौपी सामने रख दी. साहब ने सारे पन्ने देखे, फिर चालान नियमों पर नजर डाली.

ऐसी गाड़ी को तो जब्त कर ‘डिस्सपोज औफ’ कर देना चाहिए, मगर ऐसा अधिकार प्रशासन को था, पर उन्हें नहीं.

चैंबर में बैठे साहब ने ढाई हजार रुपए का जुर्माना लगाने का आदेश दे कर फाइल रीडर को थमा दी. रसीद में जरूरी बातें दर्ज कर लहना सिंह को रसीद वापस थमा दी गई.

साहब ने ‘गाड़ी तुरंत छोड़ दो’ लिख कर रसीद लौटा दी. घूस के कुल 28 सौ रुपए और 3 हफ्ते तक बेरोजगारी  झेल कर लहना सिंह ने गाड़ी छुड़ा ली.

ड्राइवर के साथ उस ने कसम खाई कि रेलवे स्टेशन और किसी भी उस इलाके में जहां ‘महीना’ नहीं बंधा, गाड़ी नहीं ले जाना है.

रश्मि : बलविंदर के लालच ने ली रश्मि की जान

सुबह के 7 बजे थे. गाड़ियां सड़क पर सरपट दौड़ रही थीं. ट्रैफिक इंस्पैक्टर बलविंदर सिंह सड़क के किनारे एक फुटओवर ब्रिज के नीचे अपने साथी हवलदार मनीष के साथ कुरसी पर बैठा हुआ था. उस की नाइट ड्यूटी खत्म होने वाली थी और वह अपनी जगह नए इंस्पैक्टर के आने का इंतजार कर रहा था.

बलविंदर सिंह ने हाथमुंह धोया और मनीष से बोला, ‘‘भाई, चाय पिलवा दो.’’

मनीष उठा और सड़क किनारे एक रेहड़ी वाले को चाय की बोल कर वापस आ गया. तुरंत ही चाय भी आ गई. दोनों चाय पीते हुए बातें करने लगे.

बलविंदर सिंह ने कहा, ‘‘अरे भाई, रातभर गाडि़यों के जितने चालान हुए हैं, जरा उस का हिसाब मिला लेते.’’

मनीष बोला, ‘‘जनाब, मैं ने पूरा हिसाब पहले ही मिला लिया है.’’

इसी बीच बलविंदर सिंह के मोबाइल फोन की घंटी बजी. वह बड़े मजाकिया अंदाज में फोन उठा कर बोला, ‘‘बस, निकल रहा हूं. मैडम, सुबहसुबह बड़ी फिक्र हो रही है…’’

अचानक बलविंदर सिंह के चेहरे का रंग उड़ गया. वह हकलाते हुए बोला, ‘‘मनीष… जल्दी चल. रश्मि का ऐक्सिडैंट हो गया है.’’

दोनों अपनाअपना हैलमैट पहन तेजी से मोटरसाइकिल से चल दिए.

दरअसल, रश्मि बलविंदर सिंह की 6 साल की एकलौती बेटी थी. उस के ऐक्सिडैंट की बात सुन कर वह परेशान हो गया था. उस के दिमाग में बुरे खयाल आ रहे थे और सामने रश्मि की तसवीर घूम रही थी.

बीच रास्ते में एक ट्रक खराब हो गया था, जिस के पीछे काफी लंबा ट्रैफिक जाम लगा हुआ था. बलविंदर सिंह में इतना सब्र कहां… मोटरसाइकिल का सायरन चालू किया, फुटपाथ पर मोटरसाइकिल चढ़ाई और तेजी से जाम से आगे निकल गया.

अगले 5 मिनट में वे दोनों उस जगह पर पहुंच गए, जहां ऐक्सिडैंट हुआ था.

बलविंदर सिंह ने जब वहां का सीन देखा, तो वह किसी अनजान डर से कांप उठा. एक सफेद रंग की गाड़ी आधी फुटपाथ पर चढ़ी हुई थी. गाड़ी के आगे के शीशे टूटे हुए थे. एक पैर का छोटा सा जूता और पानी की लाल रंग की बोतल नीचे पड़ी थी. बोतल पिचक गई थी. ऐसा लग रहा था कि कुछ लोगों के पैरों से कुचल गई हो. वहां जमीन पर खून की कुछ बूंदें गिरी हुई थीं. कुछ राहगीरों ने उसे घेरा हुआ था.

बलविंदर सिंह भीड़ को चीरता हुआ अंदर पहुंचा और वहां के हालात देख सन्न रह गया. रश्मि जमीन पर खून से लथपथ बेसुध पड़ी हुई थी. उस की पत्नी नम्रता चुपचाप रश्मि को देख रही थी. नम्रता की आंखों में आंसू की एक बूंद नहीं थी.

बलविंदर सिंह के पैर नहीं संभले और वह वहीं रश्मि के पास लड़खड़ा कर घुटने के बल गिर गया. उस ने रश्मि को गोद में उठाने की कोशिश की, लेकिन रश्मि का शरीर तो बिलकुल ढीला पड़ चुका था.

बलविंदर सिंह को यह बात समझ में आ गई कि उस की लाड़ली इस दुनिया को छोड़ कर जा चुकी है. उसे ऐसा लगा, जैसे किसी ने उस का कलेजा निकाल लिया हो.

बलविंदर सिंह की आंखों के सामने रश्मि की पुरानी यादें घूमने लगीं. अगर वह रात के 2 बजे भी घर आता, तो रश्मि उठ बैठती, पापा के साथ उसे रोटी के दो निवाले जो खाने होते थे. वह तोतली जबान में कविताएं सुनाती, दिनभर की धमाचौकड़ी और मम्मी के साथ झगड़ों की बातें बताती, लेकिन अब वह शायद कभी नहीं बोलेगी. वह किस के साथ खेलेगा? किस को छेड़ेगा?

बलविंदर सिंह बच्चों की तरह फूटफूट कर रोने लगा. कोई है भी तो नहीं, जो उसे चुप करा सके. नम्रता वैसे ही पत्थर की तरह बुत बनी बैठी हुई थी.

हलवदार मनीष ने डरते हुए बलविंदर सिंह को आवाज लगाई, ‘‘सरजी, गाड़ी के ड्राइवर को लोगों ने पकड़ रखा है… वह उधर सामने है.’’

बलविंदर सिंह पागलों की तरह उस की तरफ झपटा, ‘‘कहां है?’’

बलविंदर सिंह की आंखों में खून उतर आया था. ऐसा लगा, जैसे वह ड्राइवर का खून कर देगा. ड्राइवर एक कोने में दुबका बैठा हुआ था. लोगों ने शायद उसे बुरी तरह से पीटा था. उस के चेहरे पर कई जगह चोट के निशान थे.

बलविंदर सिंह तकरीबन भागते हुए ड्राइवर की तरफ बढ़ा, लेकिन जैसेजैसे वह ड्राइवर के पास आया, उस की चाल और त्योरियां धीमी होती गईं. हवलदार मनीष वहीं पास खड़ा था, लेकिन वह ड्राइवर को कुछ नहीं बोला.

बलविंदर सिंह ने बेदम हाथों से ड्राइवर का कौलर पकड़ा, ऐसा लग रहा था, जैसे वह चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रहा हो.

दरअसल, कुछ समय पहले ही बलविंदर सिंह का सामना इस शराबी ड्राइवर से हुआ था.

सुबह के 6 बजे थे. बलविंदर सिंह सड़क के किनारे उसी फुटओवर ब्रिज के नीचे कुरसी पर बैठा हुआ था. थोड़ी देर में मनीष एक ड्राइवर का हाथ पकड़ कर ले आया. ड्राइवर ने शराब पी रखी थी और अभी एक मोटरसाइकिल वाले को टक्कर मार दी थी.

मोटरसाइकिल वाले की पैंट घुटने के पास फटी हुई थी और वहां से थोड़ा खून भी निकल रहा था.

बलविंदर सिंह ने ड्राइवर को एक जोरदार थप्पड़ मारा था और चिल्लाया, ‘सुबहसुबह चढ़ा ली तू ने… दूर से ही बदबू मार रहा है.’

ड्राइवर गिड़गिड़ाते हुए बोला, ‘साहब, गलती हो गई. कल इतवार था. रात को दोस्तों के साथ थोड़ी पार्टी कर ली. ड्यूटी पर जाना है, घर जा रहा हूं. मेरी गलती नहीं है. यह एकाएक सामने आ गया.’

बलविंदर सिंह ने फिर थप्पड़ उठाया था, लेकिन मारा नहीं और जोर से चिल्लाया, ‘क्यों अभी इस की जान चली जाती और तू कहता है कि यह खुद से सामने आ गया. दारू तू ने पी रखी है, लेकिन गलती इस की है… सही है…मनीष, इस की गाड़ी जब्त करो और थाने ले चलो.’

ड्राइवर हाथ जोड़ते हुए बोला था, ‘साहब, मैं मानता हूं कि मेरी गलती है. मैं इस के इलाज का खर्चा देता हूं.’

ड्राइवर ने 5 सौ रुपए निकाल कर उस आदमी को दे दिए. बलविंदर सिंह ने फिर से उसे घमकाया भी, ‘बेटा, चालान तो तेरा होगा ही और लाइसैंस कैंसिल होगा… चल, लाइसैंस और गाड़ी के कागज दे.’

ड्राइवर फिर गिड़गिड़ाया था, ‘साहब, गरीब आदमी हूं. जाने दो,’ कहते हुए ड्राइवर ने 5 सौ के 2 नोट मोड़ कर धीरे से बलविंदर सिंह के हाथ पर रख दिए.

बलविंदर सिंह ने उस के हाथ में ही नोट गिन लिए और उस की त्योरियां थोड़ी कम हो गईं.

वह झूठमूठ का गुस्सा करते हुए बोला था, ‘इस बार तो छोड़ रहा हूं, लेकिन अगली बार ऐसे मिला, तो तेरा पक्का चालान होगा.’

ड्राइवर और मोटरसाइकिल सवार दोनों चले गए. बलविंदर सिंह और मनीष एकदूसरे को देख कर हंसने लगे. बलविंदर बोला, ‘सुबहसुबह चढ़ा कर आ गया.’

मनीष ने कहा, ‘जनाब, कोई बात नहीं. वह कुछ दे कर ही गया है.’

वे दोनों जोरजोर से हंसे थे.

अब बलविंदर सिंह को अपनी ही हंसी अपने कानों में गूंजती हुई सुनाई दे रही थी और उस ने ड्राइवर का कौलर छोड़ दिया. उस का सिर शर्म से झुका हुआ था.

बलविंदर और मनीष एकदूसरे की तरफ नहीं देख पा रहे थे. वहां खड़े लोगों को कुछ समझ नहीं आया कि क्या हुआ है, क्यों इन्होंने ड्राइवर को छोड़ दिया.

मनीष ने पुलिस कंट्रोल रूम में एंबुलैंस को फोन कर दिया. थोड़ी देर में पीसीआर वैन और एंबुलैंस आ कर वहां खड़ी हो गई.

पुलिस वालों ने ड्राइवर को पकड़ कर पीसीआर वैन में बिठाया. ड्राइवर एकटक बलविंदर सिंह की तरफ देख रहा था, पर बलविंदर सिंह चुपचाप गरदन नीचे किए रश्मि की लाश के पास आ कर बैठ गया. उस के चेहरे से गुस्से का भाव गायब था और आत्मग्लानि से भरे हुए मन में तरहतरह के विचारों का बवंडर उठा, ‘काश, मैं ने ड्राइवर को रिश्वत ले कर छोड़ने के बजाय तत्काल जेल भेजा होता, तो इतना बड़ा नुकसान नहीं होता.’

 

BB17: वायरल हुआ बिग बौस का प्रोमो वीडियो, कभी अकिंता तो कभी आयशा खान हुई हाईलाइट

सलमान खान का रियलिटी शो बिग बौस (Bigg Boss 17) हर तरफ चर्चा में बना हुआ है. सोशल मीडिया पर इसका बज बना हुआ है. इतना ही नहीं, सोशल मीडिया यूजर्स ही नहीं बल्कि सेलेब्स भी इस सीजन पर अपनी राय खूब दे रहे हैं. बिग बॉस में ग्रैंड फिनाले से पहले फैमिली वीक शुरू हो गया है, जिस वजह से घर का माहौल काफी ज्यादा बदल गया है, लेकिन इसी बीच शो में अंकिता अपनी मां से विक्की की बुराई करती नजर आई तो, दूसरी तरफ आयशा खान, मुनव्वर की धज्जियां उड़ाती दिखीं.

 

View this post on Instagram

 

A post shared by ColorsTV (@colorstv)


आपको बता दें कि सलमान खान के शो बिग बॉस17 का नया प्रोमो वीडियो सामने आया है, जो काफी ज्यादा भयंकर है. इस प्रोमो में आयशा-मुनव्वर की बहस, मुनव्वर फारूकी (Munawar Faruqui) की बहन की एंट्री से लेकर अंकिता लोखंडे संग उनकी मां की बातचीत दिखाई गई है. इस प्रोमो की शुरुआत में देखने के लिए मिल रहा है कि आयशा खान (Ayesha Khan) घर में चिल्ला-चिल्लाकर बताती हैं, ‘मुनव्वर फारूकी घर से बाहर एक और लड़की के साथ रिश्ता बनाकर आया था. मैं अब यहां पर सब कुछ बोलकर जाऊंगी. अब तक तो मैं शांत थी, लेकिन अब नहीं.’ इस दौरान वह मुनव्वर फारूकी पर भी खूब चिल्लाती है. आयशा की ये बात सुनकर मुनव्वर फारूकी को जोरदार झटका लगता है और वह गार्डन एरिया में चले जाते हैं. यहां पर वह बार-बार बिग बॉस से बात करने के लिए कहते हैं कि अब चीजें काफी ज्यादा पर्सनल जा रही है. इसके बाद प्रोमो में मुनव्वर फारूकी की बहन की एंट्री दिखाई गई है, जिसे देखकर वह काफी ज्यादा इमोशनल हो जाते हैं.


बिग बौस 17 के इस प्रोमो में ये भी दिखाया गया कि अंकिता लोखंडे (Ankita Lokhande) और उनकी सासू मां की बातचीत दिखाई गई, जिसमें विक्की जैन की मां अंकिता को बताती हैं कि उन्होंने एक्ट्रेस की मां को फोन करके शिकायत की थी, जिस वजह से अंकिता थोड़ा नाराज हो जाती हैं. इसके बाद अंकिता लोखंडे अपनी मां के साथ बैठी नजर आती हैं. वीडियो में देखा जा सकता है कि अंकिता अपनी मां से पूछते हुए बोलती हैं, ‘मेरी ऐसी क्या गलती हो गई कि मेरे लिए घर में इतने सारे सवाल उठाए जा रहे हैं. विक्की ने भी मुझे बहुत कुछ बोला है.’ इसके बाद अंकिता लोखंडे मां के गले लगकर फूट-फूटकर रोने लगती हैं. तब अंकिता लोखंडे की मां बोलती हैं, ‘तू अभी उसे छोड़ दे.’ अंकिता की मां के इन शब्दों ने फैंस को हैरान कर दिया है.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें