‘डबल इनकम नो सैक्स’ के चक्कर में आप भी तो नहीं

Sex New in Hindi: पति पत्नी का रिश्ता हर रिश्ते से खास होता है. वैसे तो हर रिश्ते में संवेदनाएं, इच्छाएं और अपेक्षाएं निहित हैं, पर इस रिश्ते का खास पहलू है सैक्स. इस के बिना यह रिश्ता दरकने लगता है. लेकिन आज के प्रतिस्पर्धा के युग में आगे बढ़ने की चाहत में युवा दंपतियों को अपने अंतरंग संबंधों की सुध नहीं रहती है. इसीलिए तो पहले ‘डबल इनकम नो किड्स’ का चलन शुरू हुआ और अब ‘डबल इनकम नो सैक्स’ का ट्रैंड बढ़ता जा रहा है.

मल्टीनैशनल कंपनी में कार्यरत शैलेश और शुचि सुबह 8 बजे घर से औफिस निकल जाते हैं, पर घर वापसी का समय तय नहीं है. घर लौटने में रात के 9 भी बज जाते हैं. शुचि कहती है कि काम के कारण इतना थक जाते हैं कि जब आपस में बातचीत करने का भी मन नहीं करता तो सैक्स करना तो दूर की बात है. विवाह को 2 वर्ष हो गए हैं. पहला काम तो अपनी जौब को सुरक्षित रखना है और इस के लिए अच्छा आउटपुट देना जरूरी है वरना पता नहीं कब नौकरी से निकाल दिया जाए. इसलिए हमेशा वर्कस्ट्रैस बना रहता है.

इसी तरह मेघा की बात करें तो उस के विवाह को मात्र 1 साल हुआ है. वह एक फाइनैंस कंपनी में काम करती है और पति एक अन्य प्राइवेट कंपनी में. मेघा का औफिस घर से दूर है. वहां पहुंचने में उसे 1 घंटा लग जाता है. वह कहती है कि 2 घंटे आनेजाने के और 8 घंटे की ड्यूटी यानी 10 घंटे घर से बाहर रहना, फिर घर आ कर तुरंत किचन में घुसना, क्योंकि वृद्ध ससुर साथ में हैं. उन के लिए खाना तैयार करना होता है. पति रात 11 बजे तक घर में घुसते हैं. हम इतना थक जाते हैं कि कई सप्ताह तक एकदूसरे से शारीरिक रूप से नहीं मिल पाते. कभी एक तैयार है तो दूसरा थका हुआ. अब तो मानो सैक्स में रुचि ही नहीं है.

सवाल यह है कि वर्किंग कपल्स के बढ़ते चलन का सीधा असर उन की सैक्स लाइफ पर पड़ रहा है. पोर्न साइटों और फेसबुक पर सैक्स तलाशा जाता है, पर बगल में लेटे साथी को देख ठंडे पड़ जाते हैं.

नोएडा के वरिष्ठ मनोचिकित्सक और सैक्सोलौजिस्ट डा. सुनील अवाना कहते हैं कि सैक्स तो पतिपत्नी के आपसी संबंधों की रीढ़ है. यह तो उन के रिश्ते को मजबूत बनाता है. मगर आजकल मेरे क्लीनिक में कई ऐसे दंपती आ रहे हैं जिन की सैक्स में रुचि समाप्त होती जा रही है. इस के कई कारण हैं. पर मुख्य रूप से देखा जाए तो काम के प्रति बढ़ता रुझान और उस से उत्पन्न स्ट्रैस इस का प्रमुख कारण है. आइए जानें कि सैक्स के प्रति घटती रुचि के क्याक्या कारण हैं:

ईगो: शादीशुदा जिंदगी में सैक्स गायब होने का मुख्य कारण है दोनों का ईगो. पहले पति जो भी कहता था पत्नी सिर झुका कर चुपचाप सुन लेती थी, पर अब वह भी कामकाजी हो गई है, इसलिए आरोपप्रत्यारोपों की झड़ी में उस का ईगो भी सामने आ जाता है. जब पतिपत्नी के रिश्तों में अहं की दीवार बढ़ती जाती है, तो हारजीत, आशानिराशा के बीच मन और शरीर की जरूरतें शिथिल पड़ने लगती हैं और फिर धीरेधीरे सैक्स गायब होने लगता है.

महत्त्वाकांक्षी होना: आज का युवावर्ग बहुत ज्यादा महत्त्वाकांक्षी हो गया है. शादी तो करते हैं पर कुछ महीनों बाद यह सोच कर कि अभी तो जवान हैं खूब पैसा कमा लें, खुद को काम में इतना डुबो लेते हैं कि बाकी सब कुछ भूल जाते हैं. पैसा कमाना गलत बात नहीं है, पर अपने स्वास्थ्य और शारीरिक जरूरतों को नजरअंदाज करना गलत है. आज के युवा दंपती चाहते हैं कि उन के पास सभी सुखसुविधाएं हों. महंगी गाड़ी, बड़ा सा फ्लैट आदि. यही महत्त्वाकांक्षा उन्हें काम में पूरी तरह डुबो देती है, जिस का नतीजा सैक्स में घटती रुचि के रूप में सामने आ रहा है.

तनाव: कई युवा दंपती जो ज्यादातर मल्टीनैशनल कंपनियों में कार्यरत हैं उन्हें अपनी जौब को सुरक्षित रखने के लिए काम का तनाव बना रहता है. जब सफलता नहीं मिलती तो परेशान हो जाते हैं. डा. अवाना कहते हैं कि स्ट्रैस का असर शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से युवा दंपती को शिथिल कर देता है. पति या पत्नी दोनों में से यदि एक भी तनाव में हो तो उस का सीधा असर सैक्स लाइफ पर पड़ता है. दोनों के बीच शारीरिक दूरी बढ़ जाती है, परिणामस्वरूप कामोत्तेजना कम होने लगती है.

स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं: पहले जो बीमारियां बढ़ती उम्र में होती थीं. वे अब भरी जवानी में होने लगी हैं जैसे उच्च रक्तचाप, डायबिटीज, वैस्क्यूलर रोग, डिप्रैशन, मोटापा, थायराइड, हारमोन में असंतुलन आदि. उच्च रक्तचाप हो जाए तो पुरुषों में कई बार इरैक्टाइल डिसफंक्शन की समस्या आ जाती है. ये सब बीमारियां सैक्स लाइफ को प्रभावित करती हैं.

खानपान: सैक्स लाइफ गलत खानपान की आदत से बहुत प्रभावित होती है. जंकफूड, असमय या जब भी भूख लगी कुछ खा लेना, थके होने पर खाना खा कर तुरंत सो जाने आदि से सैक्स लाइफ पर असर पड़ता है. अपच की समस्या भी सैक्स में रुचि घटा देती है.

डा. अवाना के अनुसार युवा दंपतियों को अपनी सैक्स लाइफ को रीचार्ज करने के लिए निम्न बातों को अपनाना चाहिए:

एकदूसरे को वक्त दें: दोनों लोग साथ बैठ कर शांत मन से सोचें कि कैसे एकदूसरे के लिए समय निकाला जा सकता है. हर समस्या का समाधान होता है. युवा दंपती प्रयास करें तो वे अपने व्यस्त जीवन में से सैक्स का पूर्ण आनंद लेने के लिए समझदारी से थोड़ा समय निकाल ही सकते हैं. जिस तरह जिंदा रहने के लिए खाना जरूरी है इसी तरह मैरिज लाइफ को सफल बनाने के लिए सैक्स भी जरूरी है.

विश्वास करना सीखें: विश्वास के बिना कोई रिश्ता नहीं टिक सकता. किसी भी नतीजे पर पहुंचने से पहले पार्टनर को एक मौका दें. उस से खुल कर बात करें.

रिस्पैक्ट करें: पतिपत्नी को हमेशा एकदूसरे की रिस्पैक्ट करनी चाहिए. जिस व्यक्ति का आप सम्मान ही नहीं करोगे उस से प्यार कैसे करोगे.

ईगो से बचें: अहंकार और स्वाभिमान में बहुत फर्क होता है. इस फर्क को समझ कर अपने रिश्ते को बचाएं. अहं की तुष्टि के लिए रिश्ते को खत्म करने की कोशिश न करें. आरोप लगाने से कभी किसी रिश्ते में मजबूती नहीं आती है. वह मात्र आप के ईगो को संतुष्ट कर सकता है. कोई एक झुक जाए या माफी मांग ले तो इस में बुराई नहीं है.

कम्यूनिकेट करें: आपस में संवाद बनाए रखें. चाहत की गरमी बरकरार रखना दोनों के हाथ में है. औफिस में 5 मिनट का समय निकाल कर एकदूसरे को कौल कर के प्यार भरी बातें करें. सैक्स की शुरुआत मस्तिष्क से होती है, इसलिए इस के बारे में सोचें, बातें करें. वीकैंड पर औफिस को भूल जाएं, मूवी देखें, रोमांटिक मूड में रहें. रात को रिलैक्स हो कर एकदूसरे को पूरा समय दें.

फिटनैस पर ध्यान दें: व्यायाम की मदद से मूड को फ्रैश बनाए रखने की कोशिश करें. भावनात्मक संतुलन के लिए भी फिजिकल फिटनैस जरूरी है. सिर्फ कैरियर ही नहीं निजी जीवन में भी फिटनैस का अहम रोल है. विशेषज्ञों का मानना है कि सुबह हलकीफुलकी ऐक्सरसाइज जरूर करें. यदि सुबह यह संभव न हो तो शाम को समय निकालें. ऐसा करने पर डिप्रैशन व स्ट्रैस से दूर रहा जा सकता है.

हर वीकैंड हनीमून: यदि दोनों का बिजी शैड्यूल रहता हो तो वीकैंड पर ऐसा कुछ करें कि हफ्ते भर का स्ट्रैस दूर हो जाए. एक रिसर्च से साबित हुआ है कि लंबे हनीमून के बजाय छोटेछोटे कई हनीमून आप की रिलेशनशिप के लिए बेहतर हैं. आसपास कहीं घूमने निकल जाएं. फिल्म और कैंडल लाइट डिनर का प्रोग्राम बना लें या फिर छुट्टी ले कर कहीं बाहर चले जाएं.

यदि फिर भी कुछ ठीक न हो तो मैरिज काउंसलर की मदद लें. वे मैरिटल थेरैपी के द्वारा दोनों को आमनेसामने बैठा कर, समस्याओं को सुन कर समाधान दे कर पैचअप कराते हैं.

– वरिष्ठ मनोचिकित्सक और सैक्सोलौजिस्ट डा. सुनील अवाना से नीरा कुमार द्वारा बातचीत पर आधारित.

मजारों पर लुटते लोग, क्या है यह गोरखधंधा

Society News in Hindi: उत्तर प्रदेश के शहर रामपुर के पास 4 ऐसी कब्रों की निशानदेही की गई है, जिन के बारे में कहा जा रहा है कि वे कब्रें फर्जी हैं और इस के द्वारा लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ किया जा रहा है, इसलिए लोगों को जागरूक किया जाए और उन्हें इस की सचाई बताई जाए, ताकि वे धोखा न खाएं.

यह काम कोई और नहीं, खुद बरेलवी उलेमा कर रहे हैं, जबकि ‘फायदा’ होने की खबर ने इस पूरे इलाके को गुलजार कर दिया है.

रामपुर की मजलिस फिक्र इसलामी के मुताबिक, जिला रामपुर के मिलन बिचौला नामक गांव में तकरीबन 6 महीने पहले एक शख्स ने सपने के आधार पर 4 फर्जी कब्रें बना लीं और उन्हें मजारों के तौर पर प्रचारित कर फायदे की अफवाह उड़ा दी. इस के बाद मजारों पर आने वालों का तांता लग गया.

नैनीताल हाईवे इस गांव से गुजर रहा है, जिस पर हर गुरुवार और सोमवार को रोड जाम रहता है. इस हाईवे से डेढ़ किलोमीटर की दूरी है, जिस के बाद एक किलोमीटर जंगल की ओर पोपलर के खेत में कब्रें बनाई गई हैं.

गुरुवार और सोमवार को यह पूरा डेढ़ किलोमीटर का रास्ता पैदल और दोपहिया वाहनों के लिए रहता है, जबकि चारपहिया वाहनों को पहले ही रोक दिया जाता है.

इस पूरे रास्ते में अगरबत्ती, तेल और पानी की सैकड़ों दुकानें लगी रहती हैं. किराए पर मजारों के आसपास की दुकानें नियमित रूप से लगती हैं. 2 बीघा जमीन पर साइकिल स्टैंड बना है. यहां पर 10 से 25 रुपए तक का किराया वसूला जाता है.

एक अंदाज के मुताबिक, हर गुरुवार को अकेले साइकिल स्टैंड से 20 हजार रुपए की आमदनी होती है. ये कब्रें जिस खेत में बनी हैं, वह 60 बीघे का है. इस खेत का मालिक अख्तर खां है. इसी ने सपने के आधार पर इन मजारों को बनाया था. लेकिन इस शख्स ने इन चारों मजारों का इंतजाम अपने हाथ में न ले कर 20 हजार रुपए महीने पर गांव के 3 लोगों को ठेके पर उठा दिया. उन लोगों इन कब्रों से कारोबार करना शुरू कर दिया. कुछ लोगों को फायदे की   झूठी अफवाह फैलाने के लिए किराए पर रख लिया, जो दिनभर इधरउधर घूम कर यह प्रचार करते हैं कि वहां जाने वाले की सारी मुसीबतें दूर हो जाती हैं.

साथ ही, कुछ जवान लड़कियों को भूतप्रेत का ढोंग करने और कब्रों के करीब चीखपुकार मचाने के लिए किराए पर रख लिया गया.

4 अनपढ़ मजदूर अलगअलग चारों कब्रों पर फातिहा के लिए बैठे हैं, जो हर आने वाले से कब्र के पास रखी गोलक में ज्यादा से ज्यादा रुपए डलवाते हैं. वहां 5 गोलकें रखी हुई?हैं. ठेकेदारों की इन कोशिशों का नतीजा यह हुआ कि इन कब्रों से डेढ़ से 2 लाख रुपए की आमदनी हर महीने होने लगी.

मजलिस फिक्र इसलामी के मोहम्मद नासिर रामपुरी के मुताबिक, गोलक की निगरानी करने वाले ब्रजलाल ने बताया कि शाम को पैसे मेरे सामने ही गिने जाते हैं. गुरुवार और सोमवार को हर गोलक से 9 से 10 हजार रुपए और आम दिनों में डेढ़ से 2 हजार रुपए निकलते हैं.

उस ने आगे यह भी बताया कि एक दिन एक शख्स एक गोलक ले कर भाग गया, जिस के बाद 2 सौ रुपए रोजाना की दिहाड़ी पर मु  झे निगरानी के लिए रखा गया है.

इन मजारों के करीब ही गांव का श्मशान घाट है. वहां एक समाधि भी बनी है. गांव के लोगों ने बताया कि ठेकेदार की तरफ से इन कब्रों के करीब 5वीं कब्र बनाने का ढोंग रचा गया.

एक शख्स मोटरसाइकिल से उस जगह आया और कब्रों के पास 2-4 लंबीलंबी सांसें खींच कर बोला कि 5वीं मजार यहां है. योजना के तहत वहां पर कब्र बना दी गई.

कब्र के पास मौजूद मुजाविरों ने उस पर एक चादर डाल दी और चिराग व अगरबत्ती जला दी, फिर अचानक एक लड़की कब्र के पास आई और भूतप्रेत होने का नाटक करने लगी.

मजारों पर आए कुछ लोगों को शक हुआ और उन लोगों ने ढोंगी को पकड़ कर उस की पिटाई कर दी. ऐसा देख लड़की भी खेत की ओर भाग गई.

चारों कब्रों के पास हजारों कागज के पुरजे, जिन पर मन्नतें लिखी हैं, मजार पर बैठा शख्स एक पुरजा लिखने के 25 रुपए लेता है. इस शख्स की दिहाड़ी रोजाना 2 सौ रुपए है और मन्नतों के लालहरे कपड़े बंधे हुए हैं.

ठेकेदार ने अपनी चालाकी से मजारों से आमदनी में बहुत बढ़ोतरी कर ली है, जिस के चलते जमीन मालिक ने इस को दोबारा नीलामी पर देने की बात की और नहीं मानने पर पुलिस में शिकायत की, लेकिन कुछ नहीं हुआ.

जब जमीन के मालिक ने देखा कि हर महीने के 20 हजार रुपए गए और मजार के नाम पर जमीन भी गई, तो उस ने कब्रों को फर्जी कहना शुरू कर दिया, लेकिन अब न तो ठेकेदार सुनने को तैयार है और न ही इन मजारों पर आने वाली जनता.

मोहम्मद नासिर रामपुरी, जो इन फर्जी कब्रों के खिलाफ मुहिम छेड़े हुए हैं, ने शहर के एसडीएम को एक मांगपत्र दिया है कि फर्जी कब्रें बनाने वालों के खिलाफ सख्त कार्यवाही की जाए.

6 महीने से यह खुला खेल चल रहा था और इस में लोगों को भटका कर जो रकम वसूल की गई है, वह भी उन से वापस ली जाए.

मुनाफा बिचौलियों की जेब में

सरकार गरीबों की बहुत सी चीजों जैसे खाने, खाद, इलाज, गैस, पढ़ाई की कीमत कम रखती है और लागत और वसूले पैसे का फर्क टैक्स से जमा किए पैसे से पूरा करती है. लोग शिकायत करते हैं कि इस में बहुत धांधलियां हैं. सस्ता खाना गरीबों के नाम पर ले कर इकट्ठा किया जाता है और बेच दिया जाता है अमीरों को. मुनाफा बिचौलियों की जेब में. सस्ती गैस के सिलैंडर होटलों, कारखानों को दिए जाते हैं.

इलाज किया नहीं जाता पर दवाओं और वेतन का पैसा भारीभरकम डाक्टरों, नर्सों, अर्दलियों, बिचौलियों की जेब में जाता है. खाद के मामले में तो बड़ी कंपनियों को दोहरातिहरा मुनाफा कमाने का मौका मिलता है. कंपनियां जितना माल बनाया उस से ज्यादा बनाया दिखा कर सरकारी सहायता डकार जाती हैं और कागजों पर बाजार में खाद की बिक्री दिखा जाती हैं. हर सस्ती चीज के पीछे महंगे नेताओं, सरकारी बाबुओं, बिचौलियों और रातोंरात बने धन्ना सेठों की कतारें दिखती हैं.

सरकार अब कह रही है कि बजाय गरीबों को सस्ती चीज देने के, गरीबों को पैसे दे देगी ताकि वे अपने पैसे से जो चाहे बाजार से व लागत दाम पर खरीद सकें. चूंकि अब सरकार ने करोड़ों आधार कार्ड बना डाले हैं, सरकार का कहना है कि इस से बिचौलियों के बिना पैसा सीधे गरीब के बैंक अकाउंट में जा सकता है. किसी हेरफेर की गुंजाइश ही नहीं.

हेरफेर की गुंजाइश ही नहीं का असल मतलब आप समझिए कि अब प्राइवेट बिचौलियों की जरूरत नहीं होगी. अब सारा पैसा सरकारी बाबू बिना नेता, दलाल, उद्योगपति, व्यापारी के हजम कर सकता है. अब सरकार के आकाओं को अपना खजाना लूटने के लिए दूसरों का सहारा नहीं चाहिए. अब ऐसा सिस्टम बनाया गया है कि खरबों (यानी 1 के बाद 11 जीरो) डकारे जा सकें और किसी को कमीशन भी न देना पड़े.

अब तक सस्ती चीजों को बांटने में किसानों की यूनियनें, ट्रांसपोर्टरों की सभा, नेताओं की पार्टियां, बनाने वालों के चैंबर होते थे, जो गड़बड़ में बराबरी का हिस्सा मांगने के लिए एकजुट हो कर हल्ला मचा डालते थे. वे प्रैस में जाते. अदालतों में जाते. करोड़ों की हेराफेरी दिखती. आसानी से चोर माल ले जाते दिख जाते.

अब यह पैसा सरकारी खजाने से निकलेगा हर साल हर आदमी के लिए 1000-2000 या 3000 बस. 5 करोड़ को पहुंचा या 10 करोड़ को कौन कैसे गिनती करेगा? गांव वाले कहते रहेंगे कि पैसा नहीं पहुंचा, सरकार कहती रहेगी चला गया. गरीब बेचारा अब ज्यादा महंगी चीजें खरीदेगा, और भूखा रहेगा, और नंगा रहेगा पर उस की सुनेगा कौन? नेताओं को अपना हिस्सा मिल जाएगा जो गिनती में हजारपांच सौ होंगे, पर लाखों सरकारी बाबू, बैंकर, कंप्यूटर औपरेटर अरबों बना डालेंगे.

इसे कहते हैं कंप्यूटर के जरीए टैक्नो तानाशाही. यह रिश्वतखोरी पर मोनोपोली लाएगा. जिन कुछ लाखों को पैसा मिलेगा वे वाहवाही करेंगे. बाकी की जबान ही नहीं है. सभी पार्टियां मिल कर जनता को लूटेंगी. डायरैक्ट बैनिफिट या बैंक ट्रांसफर में शिकायतें होंगी तो कंप्यूटर साहब पर चांप दो जिसे न पुलिस छू सकती, न अदालत और न प्रैस उस का इंटरव्यू ले सकता है. गरीबों को लूटने का इस से अच्छा उपाय न होगा. वाहवाह, क्या सोच है?

फौजी रामबहादुर : क्या थी कैमरे की कहानी

‘‘मेरी रानी, यह रहा तुम्हारा कैमरा. ऐसा ही चाहिए था न?’’ फौजी रामबहादुर ने बैग से कैमरा निकाल कर माया को देते हुए कहा.

‘‘अरे, वाह. मुझे ऐसा ही कैमरा चाहिए था. फौज की कैंटीन का कैमरा. लो, तुम अभी मेरी तसवीर खींच लो,’’ माया खुशी से चहकते हुए बोली.

रामबहादुर ने माया को अपनी मदमस्त नजरों से देखा. उस दिन वह बेहद खूबसूरत दिख रही थी. वह सजधज कर बाजार जाने वाली थी, तभी रामबहादुर आ गया था. उस ने माया को भींच कर अपनी बांहों में भर लिया और चुंबनों की बरसात कर दी.

‘‘रुक जाओ, कोई आ जाएगा.  दरवाजा खुला है,’’ माया ने मस्तीभरे लहजे में कहा.

‘‘दरवाजा खुला है, तो बंद हो जाएगा,’’ यह कह कर रामबहादुर ने माया से अलग हो कर फौरन दरवाजा बंद कर लिया.

‘‘अरे, तुम्हारा क्या इरादा है? अभी मेरा मूड नहीं है. मैं बाजार जा रही हूं. मेरा मेकअप खराब हो जाएगा,’’ माया ने रामबहादुर को रोकते हुए कहा.

‘‘मेकअप फिर से कर लेना. तुम जितनी बार सजोगी, उतनी बार तुम्हारी छवि निखरेगी. अभी तो मुझे मत रोको,’’ यह कह कर रामबहादुर ने माया को कस कर अपनी बांहों में भींच लिया.

माया ने कोई विरोध नहीं किया.

प्यार का खेल खत्म होेने के बाद वह बोली, ‘‘रामबहादुर, मुझे छोड़ कर तुम कहीं मत जाना. तुम ने मेरी उजड़ी जिंदगी में रंग भर दिए हैं. विधवा होने के बाद मैं पूरी तरह टूट चुकी थी, लेकिन तुम ने दोबारा बहार ला दी.’’

रामबहादुर ठंडा पड़ चुका था. उस ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘मैं तुम्हें नहीं छोड़ सकता, भले ही मेरी नौकरी छूट जाए.’’

माया अपने पसंदीदा कैमरे पर हाथ फेरते हुए बोली, ‘‘मैं फिर से मेकअप कर लूं, तो तुम मेरी तसवीरें खींच देना.’’

‘‘ठीक है, तुम तैयार हो कर आओ,’’  कह कर रामबहादुर पलंग पर लेट गया.

रामबहादुर फौज में था. उस की ड्यूटी सेना की कैंटीन में थी. वह माया के घर में किराए पर रहता था. कुछ दिनों के लिए वह गांव से अपनी पत्नी को लाया था, लेकिन मां की तबीयत ठीक न रहने से वह पत्नी को गांव छोड़ आया था. इस के बाद वह माया की ओर खिंच गया था.

माया केवल फौजियों को ही मकान किराए पर देती थी. उस का कहना था कि फौजी कैंटीन से सस्ता सामान ला कर देते हैं और ज्यादा दिनों तक घर पर कब्जा भी नहीं जमाए रहते, क्योंकि उन का जल्दी ही तबादला हो जाता है. जाते समय वे काफी सामान आधे दाम पर बेच कर चले जाते हैं.

रामबहादुर ने कैंटीन का सामान दे कर माया से नजदीकी बढ़ाई. मुफ्त में सामान पा कर माया उस की तरफ खिंचती चली गई.

माया 30 साल की थी. 5 साल पहले अपने पति की एक सड़क हादसे में हुई मौत के बाद वह टूट चुकी थी. अपनी और अपने 7 साल के बेटे मुनमुन की चिंता उसे खाए जा रही थी.

माया का पति एक कंपनी में मैनेजर था. कंपनी के मालिक ने माया को क्लर्क की नौकरी दे दी थी, लेकिन उस का चालचलन ठीक न होने से बाद में उसे निकाल दिया गया.

नौकरी छूटने के बाद माया की रोजीरोटी का जरीया 10 कमरों का मकान ही था. 2 कमरों में वह खुद रहती थी और 8 कमरे किराए पर दिए हुए थे.

रामबहादुर के आने के बाद माया की सारी समस्याएं दूर हो गई थीं. वह उसे हर तरह का सुख दे रहा था.

माया अकसर उस से कैंटीन के किसी न किसी सामान की फरमाइश करती रहती थी.

बात तब की है, जब रामबहादुर माया के लिए कैमरा नहीं लाया था.

एक दिन माया ने पूछा था, ‘रामबहादुर, तुम्हारी कैंटीन में अटैची, कंबल, कैमरा भी तो मिलता होगा न?’

‘सबकुछ मिलता है. बोलो, क्या चाहिए तुम्हें?’ रामबहादुर ने कहा था.

‘फिलहाल तो कैमरा चाहिए,’ यह कह कर माया ने पूछा था, ‘ला दोगे न?’

‘हां, आज ही ला दूंगा कैमरा. ड्यूटी पर जा रहा हूं. लौटूंगा तो कैमरा साथ होगा,’ यह कह कर रामबहादुर ड्यूटी पर चला गया था.

फौजी रामबहादुर से कैमरा पा कर माया बेहद खुश थी. इस के बाद तो उस ने रामबहादुर से कंबल, अटैची और शराब भी मंगवाई.

रामबहादुर कुछ सामान खरीद कर लाता, तो कुछ चुरा कर. उस की चोरी इसलिए नहीं पकड़ी जा रही थी, क्योंकि उस ने अपनी मीठी जबान से अफसरों का दिल जीत रखा था.

उसी कैंटीन में रामबहादुर का दोस्त श्रवण भी काम करता था. उसे शक हो गया था कि रामबहादुर माया की दीवानगी में सैनिक का फर्ज भूल कर चोरी कर रहा है.

उस ने रामबहादुर को खूब समझाया कि वह माया का साथ छोड़ दे और ईमानदारी से ड्यूटी करते हुए अपने घरपरिवार की ओर ध्यान दे.

रामबहादुर उस की बातें सुन कर ‘हांहां’ करता और फिर शराब का नशा करते ही सबकुछ भूल जाता.

एक दिन श्रवण ने रामबहादुर को कैंटीन से सामान चुराते हुए पकड़ लिया.

‘‘देखो श्रवण, तुम मेरे काम में दखल न दो, वरना यह गुस्ताखी तुम्हें बहुत महंगी पड़ेगी,’’ रामबहादुर ने धमकाते हुए कहा.

‘‘नहीं रामबहादुर, नहीं. मैं एक सच्चा फौजी हूं. अपनी मौजूदगी में मैं तुम्हें गलत काम नहीं करने दूंगा. कैंटीन का सामान केवल फौजी भाइयों और उन के परिवार के लिए है. यहां का सामान चोरी करने के लिए नहीं है,’’ यह कह कर श्रवण ने रामबहादुर के हाथ से सामान से भरा बैग छीन लिया.

‘‘तू ने यह क्या किया बे? रुक, मैं अभी तेरी शिकायत अफसर से करता हूं,’’ रामबहादुर गरजा.

‘‘तू क्या शिकायत करेगा मेरी? मैं ने तुझे गलत काम करते हुए पकड़ा है. तेरी शिकायत तो मैं करूंगा,’’ श्रवण ने फटकार लगाई.

श्रवण ने रामबहादुर की शिकायत तमाम अफसरों से की, लेकिन उस की सुनवाई कहीं नहीं हुई. उलटे अफसरों ने श्रवण को ही डांट दिया.

अफसरों के रवैए से श्रवण बेहद दुखी हुआ. उस के मन में आया कि वह सेना की नौकरी छोड़ दे, लेकिन घर की माली हालत ठीक न होने के चलते वह मन मार कर रह गया.

इधर रामबहादुर के गलत काम पर रोक नहीं लगी. वह बदस्तूर कैंटीन का सामान चुरा कर ले जाता रहा. उस पर ईमानदारी का ठप्पा जो लगा हुआ था.

माया के प्रेमजाल में फंस कर वह सैनिक का फर्ज भूल गया था. क्या वह वही रामबहादुर था, जिस ने अपने स्टडीरूम में एक बड़े अफसर की तसवीर टांग रखी थी और उसे देख कर ही वह सेना में जाने का सपना देखा करता था?

जब उस का सपना पूरा हुआ था, तो उस के मातापिता, भाईबहन और गांव के लोग कितने खुश हुए थे. गांव में उस की कितनी जरूरत है. लेकिन अगर इस घिनौनी हरकत का पता चलेगा, तो लोग क्या कहेंगे?

अब रामबहादुर को इस बात की परवाह नहीं थी. वह तो माया का दीवाना था. लेकिन कुछ दिनों बाद माया उस से तनख्वाह के पैसे भी मांगने लगी. यह भी कहने लगी कि वह अपने घर पर पैसे न भेजा करे.

रामबहादुर ने उसे काफी समझाने की कोशिश की, पर उस पर कोई असर नहीं पड़ा. उस ने कहा, ‘‘पत्नी जैसा सुख मैं तुम्हें देती हूं और तुम हो कि सारा पैसा घर भेज देते हो. आखिर तुम्हारी कमाई पर मेरा भी तो हक है.’’

रामबहादुर को यह सब पसंद नहीं था. उसे माया में दिलचस्पी कम होने लगी. उन दोनों के बीच अकसर झगड़ा होने लगा.

रामबहादुर जिस माया पर मरमिटा था, अब उस से वह अपना पिंड छुड़ाना चाहता था.

एक रात को माया ने रामबहादुर को गुंडों से पिटवा दिया.

रामबहादुर को गहरी चोट लगी थी, लेकिन बदनामी के डर से उस ने किसी को कुछ नहीं बताया.

श्रवण को जब यह मालूम हुआ, तो उस से रहा न गया. वह उस के पास गया. उस ने रामबहादुर के घर वालों को बुलाया और बराबर उस की देखरेख करता रहा.

अब रामबहादुर को अपनी करनी पर पछतावा हो रहा था. उस ने श्रवण से माफी मांगते हुए कहा, ‘‘श्रवण, मुझे माफ कर दे भाई.

‘‘मैं अपना फर्ज भूल गया था. उस सैनिक का फर्ज, जो देश की आन, बान और शान के लिए खुशीखुशी अपनी जान न्योछावर कर देता है. मैं अपने साथियों का हिस्सा बेच रहा था. मेरी अक्ल मारी गई थी.

‘‘जिस माया के लिए मैं चोरी करता था, उसी ने मेरे साथ मारपीट कराई. लेकिन भाई, यह बात किसी से मत कहना. अब मैं कोई गलत काम नहीं करूंगा,’’ कहते हुए रामबहादुर की आंखों में आंसू थे.

श्रवण को असलीनकली आंसुओं की पहचान थी. उसे यकीन हो गया कि रामबहादुर को अपनी करनी पर पछतावा है. वह उसे गले लगा कर बोला, ‘‘मुझे खुशी है कि तुम देर से ही सही, पर संभल गए. चलो, मैं ने तुम्हें माफ किया.

‘‘बेहतर होगा कि तुम माया का घर छोड़ दो और पुरानी बातों को भूल कर एक सच्चे सैनिक का फर्ज निभाओ.

‘‘और हां, गांव तुम्हारे चलते ही बिगड़ा है. आइंदा कभी वहां शराब मत ले जाना.’’

‘‘ठीक है भाई. मैं माया का घर छोड़ दूंगा. मुझे नहीं मालूम था कि वह इतना नीचे गिर सकती है.

‘‘हां, मैं मानता हूं कि गांव के लड़के मेरे चलते ही शराब के आदी हुए हैं. अब मैं कभी वहां शराब नहीं ले जाऊंगा और उन्हें समझाऊंगा कि वे शराब कभी न पीएं,’’ रामबहादुर ने कहा.

ठीक होने के बाद रामबहादुर ने माया का घर छोड़ दिया. माया ने कोई विरोध नहीं किया, क्योंकि वह किसी और को अपने जाल में फंसा चुकी थी.

रामबहादुर का माया से पिंड छूटा. वह दूर किराए का मकान ले कर अपनी पत्नी के साथ सुख से रहने लगा. जब कभी उसे माया की याद आती, तो उस का मन नफरत से भर उठता.

वह सोचता, ‘कहां पत्नी का प्यार और कहां माया का मायाजाल.’

थोड़ी सी बेवफाई : प्रिया के घर सरोज ने ऐसा क्या देख लिया

कपड़े सुखातेसुखाते सरोज ने एक नजर सामने वाले घर की छत पर भी डाली. उस घर में भी अकसर उसी वक्त कपड़े सुखाए जाते थे. हालांकि उस घर में रहने वाली महिला से सरोज की अधिक जानपहचान नहीं थी, फिर भी कपड़े सुखातेसुखाते रोजाना होने वाले वार्त्तालाप से ही आपसी दुखसुख की बातें हो जाती थीं.

बातों ही बातों में सरोज को पता चला कि उस महिला का नाम प्रिया है और उस के पति का नाम प्रकाश. प्रकाशजी एक बैंक औफिसर थे तथा घर के पास ही एक बैंक में कार्यरत थे. प्रकाश एवं प्रिया की एक छोटी बेटी थी- पाखी. छोटा सा खुशहाल परिवार था. छुट्टी के दिन वे अकसर घूमने जाते थे.

प्रकाशजी बहुत ही सुंदर एवं हंसमुख स्वभाव के थे, यह सरोज को भी नजर आता था पर प्रिया स्वयं भी सदा उन की तारीफों के पुल बांधा करती थी.

‘‘देखिए न भाभीजी, आज ये फिर मेरे लिए नई साड़ी ले आए. मैं ने तो मना किया था, पर माने ही नहीं. मेरा बहुत खयाल रखते हैं ये,’’ एक दिन प्रिया ने बड़े ही गर्व से बताया.

‘‘अच्छी बात है… सच में तुम्हें इतना हैंडसम, काबिल और प्यार करने वाला पति मिला है,’’ कह सरोज ने मन ही मन सोचा, काश दुनिया में सभी विवाहित जोड़े इसी प्रकार खुश रहते तो कितना अच्छा होता. एक आदर्श पतिपत्नी हैं दोनों.

सरोज और प्रिया की बातचीत का मुद्दा अकसर उन का घरपरिवार ही हुआ करता था, जिस में भी प्रिया की 80 फीसदी बातें प्रकाशजी की प्रशंसा और प्यार से जुड़ी होती थीं.

एक दिन प्रिया ने सरोज से कहा, ‘‘भाभीजी, मेरे पापा की तबीयत बहुत खराब है. अब मुझे कुछ दिन उन के पास जाना होगा. मन तो नहीं मानता कि प्रकाश को अकेले छोड़ कर जाऊं, पर क्या करूं मजबूरी है. प्लीज, आप थोड़ा इन का ध्यान रखिएगा. खानेपीने की व्यवस्था तो बैंक में ही हो जाएगी… उस की मुझे कोई चिंता नहीं है, पर हमारा घर सारा दिन सूना रहेगा… आप आतेजाते एक नजर इधर भी डाल लिया करना.’’

‘‘ठीक है, तुम बेफिक्र हो कर जाओ,’’ सरोज ने कहा और फिर प्रिया के जाने के बाद वह एक पड़ोसिन की जिम्मेदारी निभाते हुए आतेजाते एक नजर उन के घर पर भी डाल लेती थी.

इन दिनों प्रकाशजी को बैंक में वर्कलोड ज्यादा था, इसलिए वे काम में काफी व्यस्त रहते थे. सरोज से उन की मुलाकात नहीं हो पाती थी.

प्रिया को गए 15 दिन से ऊपर हो गए थे, परंतु वह अभी तक लौटी नहीं थी. प्रकाशजी भी दिखाई नहीं देते थे. सरोज को चिंता होने लगी थी कि कहीं उस के पिताजी की तबीयत ज्यादा खराब तो नहीं हो गई… पूछे तो किस से…

रात के 11 बजे थे. सरोज अपने घर के मेन गेट पर ताला लगाने के लिए बाहर आई तो सामने वाले घर के आगे प्रकाशजी की गाड़ी रुकती दिखी. गाड़ी का दरवाजा खुला और उस में से एक महिला भी प्रकाशजी के साथ उतरी.

‘‘अरे लगता है प्रिया आ गई,’’ सरोज चहकी और आवाज देने ही वाली थी कि उस महिला की वेशभूषा और शारीरिक गठन देख कर रुक गई.

‘नहींनहीं यह प्रिया नहीं लगती. प्रिया कभी जींसटौप नहीं पहनती और न ही वह इतनी दुबलीपतली है. बालों का स्टाइल भी प्रिया से बिलकुल अलग है.

यह प्रिया नहीं कोई और है,’ सोच कर सरोज दरवाजे की ओट में छिप कर खड़ी हो गई. उस ने देखा कि प्रकाशजी ने उस महिला को घर के अंदर चलने का इशारा किया और फिर दोनों घर के अंदर चले गए.

हो सकता है यह प्रकाशजी के बैंक की सहकर्मचारी हो. किसी काम की वजह से आई हो, सरोज ने सोचा, ‘पर रात के 11 बजे ऐसा क्या काम है. कहीं कोई गड़बड़ तो नहीं,’ सरोज को बड़ा अटपटा सा लग रहा था. इसी सोच में उसे सारी रात नींद नहीं आई. सिर भारी होने के कारण वह अगले दिन सुबह जल्दी उठ गई ताकि चाय बना कर पी सके.

‘बाहर से अखबार ले आती हूं. 6 बजे तक आ ही जाता है,’ सोच कर सरोज बाहर बरामदे में निकली तो प्रकाशजी को उसी महिला के साथ घर से बाहर निकल गाड़ी की ओर बढ़ते देखा.

अचानक प्रकाशजी की नजरें सरोज की नजरों से मिली और तत्क्षण ही झुक भी गईं मानो उन की कोई चोरी पकड़ी गई हो. वे चुपचाप गाड़ी में बैठ गए, साथ में वह महिला भी. शायद वे उसे छोड़ने जा रहे थे. सरोज का भ्रम सही था.

‘बाप रे, कितना बहुरुपिया है यह आदमी… दिखाने को तो अपनी पत्नी से इतना प्रेम करता है और उस के पीछे से यह गुल खिला रहा है,’ सरोज मन ही मन बुदबुदाई.

सरोज मन ही मन सोचने लगी कि पूरी रात यह औरत प्रकाशजी के साथ घर में अकेली थी… सच इस दुनिया में किसी पर भरोसा नहीं किया जा सकता. अरे, इस से अच्छे तो वे पति हैं, जो भले ही अपनी बीवियों से रातदिन लड़ते रहते हों, पर दिल से प्रेम करते हैं.

ये सब सोचतेसोचते सरोज अंदर आ गई. अखबार ला कर मेज पर पटक दिया. अब न तो उस की रुचि अखबार पढ़ने में रही थी और न ही चाय पीने की इच्छा रही थी. वह चादर ओढ़ कर पलंग पर लेट गई और फिर प्रिया के बारे में सोचने लगी…

कितनी मासूम है प्रिया. बेचारी जातेजाते भी अपने पति की चिंता कर रही थी कि इतने दिन अकेले कैसे रहेंगे… पर यहां तो अलग ही मंजर है. लगता है प्रकाशजी तो इसी दिन का इंतजार कर रहे थे. आने दो प्रिया को… यदि इन बाबूजी की पोल न खोली तो मेरा नाम भी सरोज नहीं. जब प्रिया इन्हें आड़े हाथों लेगी तब पता चलेगा बच्चू को. सारी मौजमस्ती भूल जाएंगे जनाब.

ऐसे पतियों को तो सबक सिखाना ही चाहिए. पत्नियों की तो जरा सी भी गलती इन्हें बरदाश्त नहीं होती. स्वयं चाहे कुछ भी करें… अरे वाह, यह भी कोई बात हुई मर्द जात की… यह तो सरासर अन्याय है पत्नियों के साथ. यह विश्वासघात है. उन्हें इस का फल मिलना ही चाहिए, सोचतेसोचते सरोज को फिर नींद आ गई.

रविवार का दिन था. सरोज ने बालों में शैंपू किया था तथा साथ ही कुछ कपड़े भी धो लिए थे. वह बाल खुले छोड़ कर छत पर गई ताकि धूप में बाल भी सूख जाएं तथा कपड़े भी.

आदतन उस की नजर फिर सामने वाली छत पर पड़ी. आज वहां भी कपड़े सूख रहे थे, ‘यानी प्रिया आ गई है. मुझे उस से मिल कर आना चाहिए. जा कर उस के पिताजी का हालचाल भी पूछ लूं तथा उस के पीछे से उस के पति ने जो कारनामा किया है उस की भी जानकारी बातों ही बातों में उसे दे दूं ताकि वह आगे से सतर्क रहे,’ यह सोच कर सरोज प्रिया के घर चल दी.

सरोज को प्रिया बाहर ही मिल गई. नया सलवारकुरता पहन रखा था तथा हाथ में हैंडबैग था. लगता था कहीं जाने की तैयारी है.

‘‘प्रिया कब आई तुम?

कैसे हैं तुम्हारे पापा?’’ सरोज ने पूछा.

‘‘आज सुबह ही. पापा की तबीयत ठीक है, इसलिए चली आई. स्कूल भी तो मिस हो रहा था पाखी का. इधर इन के फोन पर फोन आ रहे थे कि जल्दी आओ… जल्दी आओ… तुम्हारे बिना मन नहीं लग रहा. सच भाभीजी, ये तो मेरे बिना रह ही नहीं सकते. इसीलिए तो cचली आई वरना कुछ दिन और रह लेती.’’

तभी प्रकाशजी भी आ गए. पाखी उन की गोद में थी और प्रकाशजी उसे बारबार चूम रहे थे. पाखी भी पापापापा कह कर उन से लिपट रही थी.

‘‘हैलो पाखी, कैसी हो? जानती हो मैं ने तुम्हें बहुत मिस किया,’’ सरोज ने प्रकाशजी की ओर देखते हुए पाखी से कहा तो प्रकाशजी ने नजरें झुका लीं और फिर संकोचवश नजरें उठा कर सरोज की ओर देखा मानो अपना अपराध स्वीकार कर रहे हों.

‘‘अरे प्रिया, तुम्हारे प्रकाशजी तो तुम्हारे दीवाने हैं… तुम्हारे बिना ऐसे हो गए थे जैसे प्राण बिना तन. एक दिन तो मुझ से कहने लगे ‘‘भाभीजी, जब बैंक से घर आता हूं तो सूनासूना घर काटने को दौड़ता है. सच, पत्नी, बच्चों के बिना घर घर नहीं लगता.’’

प्रिया के चेहरे पर मुसकराहट दौड़ गई. उस ने शरमा कर प्रकाशजी की ओर देखा.

सरोज फिर बोली, ‘‘अरे, मैं ने भी बेवक्त तुम लोगों को किन बातों में उलझा दिया… शायद तुम लोग कहीं जा रहे हो… बहुत दिन हो गए प्रकाशजी को अकेले बोर होते हुए.’’

‘‘हां मूवी देखने जा रहे हैं… लौटते समय किसी रैस्टोरैंट में पिज्जा खाएंगे. प्रिया और पाखी को बहुत पसंद है,’’ प्रकाशजी ने गाड़ी का दरवाजा खोलते हुए कहा. उन की आंखों में सरोज के प्रति कृतज्ञता झलक रही थी. प्रिया और पाखी गाड़ी में बैठ गईं तथा प्रकाशजी ने गाड़ी स्टार्ट कर दी.

आज तो सरोज प्रिया को बिना कुछ कहे घर लौट आई थी, पर अब उस ने यह निर्णय भी ले लिया था कि वह प्रिया को उस दिन के बारे में कभी कुछ नहीं बताएगी, क्योंकि उस ने महसूस किया कि यदि वह ऐसा करेगी तो यह प्रकाशजी के लिए तो अपमानजनक होगा ही, प्रिया को भी उस से आघात ही पहुंचेगा.

सरोज को लगा कि यदि प्रकाशजी की इस तनिक सी बेवफाई पर परदा ही पड़ा रहने दिया जाए तो उचित होगा. इस तरह कम से कम पतिपत्नी में प्यार का भ्रम बना रहने से एक खुशहाल परिवार तो आबाद रहेगा और शायद भविष्य में प्रकाशजी को भी अपनी भूल व नादानी समझ आ जाए और वे फिर कभी ऐसा न करें, क्योंकि कई बार अपराधी को दंड देने के बजाय माफ करना ज्यादा लाभकारी सिद्ध होता है.

भूल जाना अब : क्या कभी पूरा होता है कॉलेज का प्यार

‘‘अनु, अब तुम उन दोनों के साथ मिलनाजुलना और हंसहंस कर बातें करना छोड़ दो.’’

‘‘क्यों, तुम्हें जलन हो रही है? मैं प्यार तुम्हीं से करती हूं, इस का मतलब यह तो नहीं कि मैं बाकी लोगों से बात न करूं. इतने नैरो माइंडेड न बनो, जीत.’’

‘‘अनु, तुम खूब समझ रही हो मैं किन दोनों की बात कर रहा हूं. वे अच्छे लड़के नहीं हैं. उन की हिस्ट्री तुम्हें भी पता है न. दोनों ने मिल कर श्यामली को कैसे धोखा दिया है.’’

‘‘हां जीत, सब जानती हूं, पर मैं धोखा खाने वाली नहीं हूं. मुझे भी दूसरों को उल्लू बनाना खूब आता है.’’

‘‘मुझे भी?’’

‘‘तुम बात कहां से कहां ले आए, छोड़ो इन बातों को. अब बताओ अमेरिका जाने के बारे में क्या सोचा है तुम ने?’’

‘‘मैं चाह कर भी अभी नहीं जा सकता हूं, तुम मां की हालत देख तो रही हो.’’

विश्वजीत को अनुभा जीत कहती थी और जीत उसे अनु कहता था. जीत के पिता का देहांत कुछ वर्ष पहले हो गया था. इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान ही जीत की मां भी गंभीर रूप से बीमार पड़ीं. लकवे से आंशिक रूप से ठीक तो हो गईं, पर उन की बोली में लड़खड़ाहट आ गई थी और चलने में काफी दिक्कत होती थी. जीत और अनुभा दोनों ही अमेरिका जाने की सोच रहे थे पर अब मां की बीमारी के चलते जीत ने अपना इरादा छोड़ दिया था. अनुभा अमेरिका जा कर वहीं सैटल होने पर दृढ़ थी. अनुभा के पापा कामता बाबू भी यही चाहते थे. उन की इच्छा थी कि बेटी के अमेरिका जाने के पहले उस की शादी कर दें या कम से कम सगाई तो जरूर कर दें. उन्हें अनुभा और जीत के बारे में पता था.

कामता बाबू ने कहा, ‘‘मैं जीत की मां से बात करता हूं तुम दोनों की शादी जल्द करने के लिए.’’

‘‘मुझे यूएस जाना है और उसे मां की देखभाल करनी है. मैं उस के लिए अपने कैरियर से समझौता नहीं कर सकती हूं,’’ अनु पिता से बोली.‘‘ठीक है, तब मैं ही कुछ रास्ता निकालता हूं,’’ कामता बाबू गंभीर हो कर बोले.

‘‘वह कैसे?’’

‘‘वह सब तुम मुझ पर छोड़ दो,’’ कामता बाबू गहरी सोच में डूब गए.

कामता बाबू ने अपने फैमिली पुरोहित को बुला कर सारी बात बताई, तब उस ने कहा, ‘‘आप लड़के की कुंडली मंगवाएं. मैं अनुभा की ऐसी कुंडली बनाऊंगा और मिलान में ऐसा दोष निकालूंगा जिस का कोई काट न होगा.’’

हुआ भी वही. जीत की कुंडली मंगवाई गई. पुरोहित ने अनुभा की झूठी कुंडली बनाई, जिस में मंगल का दोष था और कहा कि यह घोर अपशकुन है. विवाहोपरांत लड़की के विधवा होने का पूरा संयोग है.

कामता बाबू ने जीत को यह बात बताई तो जीत ने कहा, ‘‘अंकल, हम चांद और मंगल पर पहुंच रहे हैं और आप इन पुरानी दकियानूसी बातों के चक्कर में पड़े हैं.’’

‘‘फिर भी मैं किसी कीमत पर बेटी के लिए रिस्क नहीं ले सकता हूं.’’

अनुभा को भी विश्वजीत से ज्यादा अपने कैरियर की चिंता थी. इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद अनुभा कैलिफोर्निया, अमेरिका चली गई. कुछ दिन तक दोनों संपर्क में रहे थे. जीत ने उस से कहा था कि मास्टर्स के बाद इंडिया लौट आए. यहां भी उसे अच्छे जौब मिल सकते हैं. अब तो अमेरिका में ट्रंप प्रशासन है. जौब मिलना अब आसान नहीं होगा.

पर एमएस के बाद अनुभा को ओपीटी यानी औप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग वीजा मिल जाने से कुछ राहत मिली. अनुभा अमेरिका में एक ज्योतिष के संपर्क में थी. उस ने उसी ज्योतिष से पूछा कि उस का भविष्य क्या होगा. उस की कुंडली देख कर ज्योतिष ने कहा, ‘‘तुम्हारी कुंडली तो अच्छी है, मांगलिक भी नहीं हो. जल्द ही तुम्हें नौकरी मिलेगी और तुम किसी के साथ रिलेशनशिप में आओगी.’’

इत्तफाक से ज्योतिष की बात सच निकली और एक छोटी कंपनी में नौकरी भी मिली. थोड़े ही दिनों बाद उस कंपनी के कोफाउंडर से उस की नजदीकियां बढ़ीं. वह भारतीय मूल का व्यक्ति राजन था. अनुभा उस के साथ लिवइन रिलेशन में आ गई.

इस के बाद जीत और अनुभा में संपर्क महज औपचारिकता मात्र रहा था. अनुभा को अमेरिका की लाइफस्टाइल, चकाचौंध और भौतिकता रास आ गई थी, कभी खास मौकों, जन्मदिन आदि पर दोनों एकदूसरे को विश कर दिया करते थे. इधर जीत ने पुणे की एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी जौइन कर ली.

जीत की मां की सहेली की एक लड़की थी लता. वह उन के घर से थोड़ी दूर रहती थी और बीएससी फाइनल ईयर में थी. कभीकभी अपनी मां के साथ जीत के घर आती थी. उस की जीत के साथ कुछ बातें भी होतीं, पर जीत को उस में कोई दिलचस्पी नहीं थी. हालांकि, लता की मां जीत को मन ही मन दामाद बनाने की सोच रही थीं.

जीत को अपनी कंपनी की तरफ से 2 सप्ताह के लिए न्यूयौर्क, अमेरिका जाना था. पर वह मां की खराब तबीयत को ले कर  दुविधा में था. उन्हें छोड़ कर जाना नहीं चाहता था और कंपनी थी कि उसी को भेजना चाहती थी. लता की मां ने जीत को भरोसा दिलाया कि उस की मां की देखरेख में मांबेटी दोनों कोई कमी नहीं होने देंगी.

जीत न्यूयौर्क चला गया. उस ने अनुभा से भी बात की. उस का हालचाल जानना चाहा तो वह बोली, ‘‘मस्त लाइफ जी रही हूं. मैं तो तुम से शादी करना चाहती थी पर यह मंगल और शनि ने बीच में आ कर सारा खेल बिगाड़ दिया. मेरा बौयफ्रैंड अभी टूर पर ईस्ट कोस्ट गया है, वरना तुम से बात करवाती?’’ जीत बोला, ‘‘मंगलशनि में ज्यादा तो तुम्हारे अमेरिका में सैटल होने की जिद थी. तुम जानती थीं कि मैं आने की स्थिति में नहीं था. खैर, अब इन सब बातों से क्या फायदा, तुम्हें अपनी मंजिल मिल गई है.’’

अनुभा ने उसे कैलिफोर्निया आ कर मिलने को कहा पर न्यूयौर्क और कैलिफोर्निया दोनों अमेरिका के 2 छोर पर हैं. जीत वहां नहीं जा सका, उस ने कहा, ‘‘अगली बार अगर वैस्ट कोस्ट की तरफ आना हुआ तो तुम से जरूर मिलूंगा.’’

जीत 2 सप्ताह में अमेरिका का काम समाप्त कर भारत वापस आ गया. लता और उस की मां दोनों ने मिल कर उस की अनुपस्थिति में जीत की मां को किसी तरह की दिक्कत नहीं होने दी थी. यह देख कर उसे खुशी हुई. उस की मां ने लता की काफी तारीफ की. उन्होंने जीत से कहा, ‘‘अगर तुम्हें लता पसंद हो तो बोलो, मैं तुम्हारी शादी की बात करूंगी.’’

‘‘नहीं, मां, अभी मैं कंपनी के एक बड़े प्रोजैक्ट में लगा हूं. एक साल की डैडलाइन है. इस बीच मुझे डिस्टर्ब न करो. और लता भी कंपीटिशन एग्जाम की तैयारी कर रही है.’’

करीब एक साल बाद फिर अमेरिका जाने के लिए जीत मुंबई एयरपोर्ट गया. सिक्योरिटी चैक के बाद वह बोर्डिंग के लिए प्रतीक्षा कर रहा था. उस की बगल की कुरसी पर एक आदमी आ कर बैठा. फ्लाइट में अभी एक घंटा बाकी था, रात में एक बज रहा था.

जीत ने उस से पूछा, ‘‘आप भी अमेरिका जा रहे हैं?’’

‘‘हां, मैं भी अमेरिका जा रहा हूं.’’

‘‘मैं विश्वजीत हूं. मैं सैन फ्रांसिस्को जा रहा हूं.’’

‘‘मैं कमल सिंह, मैं बिजनैस के सिलसिले में यहां आया था. मैं सैन फ्रांसिस्को लौट रहा हूं, फिर वहां से लिवरमूर जाऊंगा.’’

‘‘वैरी गुड, लंबी यात्रा में साथ रहेगा.’’

इत्तफाक से दोनों को सीट भी अगलबगल मिली थी. इस बीच कमल ने अमेरिका में फोन किया. जीत ने भी बगल में बैठेबैठे फोन की स्क्रीन पर वह फोटो देखी जिसे कमल ने कौल किया था. फोटो पहचानने में उसे कोई दिक्कत नहीं हुई, वह अनुभा थी, उस का पहला प्यार. फोन आंसरिंग में चला गया, कमल ने कहा, ‘‘हाय अनुभा, मैं थोड़ी देर में बोर्ड करने जा रहा हूं. अब यूएस लैंड कर के ही कौल करूंगा. हैव ए गुड डे.’’

‘‘आप ने अपने घर कौल किया था?’’ जीत पूछ बैठा.

‘‘मैं ने अपनी वाइफ को कौल किया था. अभी तो औफिस में होगी, शायद किसी मीटिंग में होगी, इसीलिए फोन रिसीव नहीं कर सकी.’’

अनुभा का फोटो देख कर जीत को फिर अनुभा की याद आई. हालांकि, अब उसे अनुभा में कोई दिलचस्पी नहीं थी. वह सोचने लगा कि इस के पहले तो उस के जीवन में राजन था. अब यह नया आदमी कमल कैसे आ गया.

जीत इसी उधेड़बुन में खोया था, तब कमल ने पूछा, ‘‘क्या सोचने लगे विश्वजीत?’’

‘‘नहींनहीं, कुछ भी नहीं. यों ही घर की याद आ गई थी. वैसे आप मुझे जीत बुला सकते हैं.’’

‘‘चलिए, आप को मैं अपने घर की सैर करा देता हूं,’’ कह कर कमल ने अपना सैलफोन औन कर ‘स्मार्ट थिंग ऐप’ औन किया और मुंबई एयरपोर्ट पर बैठेबैठे अपने घर की सैर करा दी. यहीं बैठे हुए वह घर की लाइट औनऔफ या डिम कर देता, कभी घर का तापमान अपनी मरजी से सैट करता तो कभी स्विमिंग पूल की लाइट या फौआरे औन कर देता. उस के घर में एक मिनी सिनेमा थिएटर भी था. वैसे जीत को भी थोड़ीबहुत इस ऐप की जानकारी थी पर आज उस ने अपनी आंखों से देखा था. सचमुच अनुभा का घर काफी बड़ा था और किसी महल से कम नहीं था.

बातचीत के दौरान कमल को जब पता चला कि जीत और अनुभा कुछ दिन पटना में साथ पढ़े थे तो जीत और कमल दोनों में दोस्ती हो गई. अमेरिका लैंड करने के बाद कमल ने जीत को अपना कार्ड दिया और कहा, ‘‘आप हमारे घर जरूर आइएगा.’’

‘‘हां, प्रयास करूंगा,’’ बोल कर जीत ने भी अपना कार्ड उसे दिया.

‘‘प्रयास क्या करना, आप औकलैंड जा रहे हैं, वहां से लिवरमूर बस 30-35 मिनट की ड्राइव है. आप फोन करेंगे तो अगर मैं फ्री हुआ तो आप को पिक कर लूंगा.’’

‘‘थैक्स, मैं खुद आने की कोशिश करूंगा.’’

एक वीकैंड जीत ने अनुभा को फोन किया, उस की आवाज सुन कर बोला, ‘‘हाय अनुभा, जीत हियर. मैं आज तुम्हारे घर आने की सोच रहा हूं, फ्री हो?’’

‘‘मैं तो तुम्हारे लिए सदा फ्री हूं या यों भी कह सकते हो फ्रीली अवेलेबल हूं. कमल कहीं बाहर गया है, लेट नाइट में लौटेगा, पर मैं फिलहाल घर पर नहीं हूं, तुम किधर हो? मैं ही आ जाती हूं.’’

जीत ने अपने होटल का पता दिया तो वह बोली, ‘‘बस, आधे घंटे में आ रही हूं डियर.’’

ठीक आधे घंटे बाद अनुभा जीत के कमरे में थी. वह आते ही उस के गले से लिपट गई. जीत को बहुत आश्चर्य हुआ क्योंकि पहले वह उस से इस तरह कभी नहीं मिली थी. अलग होते हुए उस ने पूछा, ‘‘और कैसी हो? कामधाम कैसा चल रहा है?’’

‘‘बिलकुल मस्त हूं, देख ही रहे हो. यह अमेरिका भी बड़े काम की जगह है, लाइफ इज वैरी कूल.’’

‘‘अच्छा, यह कमल कब से आया तुम्हारी जिंदगी में?’’

‘‘मेरा ज्योतिष पंडित कम शातिर नहीं है. उस ने कहा कि अगर मैं उसे एक बार खुश कर दूं तो मैं एक बड़े बिजनैसमैन की जीवनसंगिनी बन सकती हूं.’’

‘‘और तुम ने उस की बात मान ली?’’

‘‘हां. वह शख्स है कमल, और उसे अपनी जिंदगी में मेरे जैसे शोपीस की जरूरत थी. सच, अब मैं कमल के साथ बहुत खुश हूं. महलों की रानी बन कर राज कर रही हूं.’’

‘‘और कल कोई कमल से बड़ा बिजनैसमैन मिल जाए तो क्या तुम उसे भी…’’

अनुभा ने उस की बात पूरी होने से पहले ही कहा, ‘‘हां, उसे भी. अमेरिका इज ए लैंड औफ अपौरचुनिटीज. हर कोई अपनी प्राइवेटलाइफ अपनी मरजी से जीने को आजाद है. ऐंड सैक्स इज नो टैबू हियर.’’

‘‘तुम इतनी बदल जाओगी, मुझे विश्वास नहीं होता.’’

‘‘लाइफ में चेंज होना चाहिए, मोनोटोनस लाइफ कोई लाइफ है. यह कमल तो महीने में 20 दिन बाहर ही रहता है. तुम क्या सोचते हो, वह सिर्फ मेरे इंतजार में बैठा रहता होगा? नो जीत, नो. वह मुझ से उम्र में 10 साल बड़ा है, मैच्योर्ड है. उस से शादी करने के बाद मैं यहां के ग्रीन कार्ड की हकदार बन गई हूं.’’

‘‘अनु, तुम पूरी तरह मैटीरिअलिस्टिक हो गई हो.’’

‘‘तुम ने सही कहा है जीत, वैसे बहुत दिनों के बाद किसी ने अनु नाम से मुझे पुकारा है,’’ बोल कर एक बार फिर वह जीत से गले लग कर अपने होंठों को उस के करीब ले आई.

तब तक दरवाजे की घंटी बजी. रूम सर्विस की आवाज थी, ‘‘योर लंच, सर’’

जीत ने जा कर दरवाजा खोला. लंच के कुछ देर बाद अनु चली गई.

इस के बाद कुछ दिनों तक जीत अपने काम में काफी व्यस्त रहा. लगभग 10 दिनों बाद उस का प्रोजैक्ट अमेरिका के क्लाइंट ने स्वीकार किया था. जीत की कंपनी की ओर से उसे तत्काल प्रमोशन की गारंटी मिली. वह बहुत खुश था. उस ने अनुभा को फोन कर यह बात बताई तो अनुभा बोली, ‘‘आज मैं भी बहुत खुश हूं. मेरे लिए भी खुशी की बात है.’’

‘‘क्या बात है, मुझे भी बता सकती हो?’’

‘‘श्योर, मैं प्रैग्नैंट हूं. आज ही खुद प्रैग्नैंसी टैस्ट किया है?’’

‘‘बधाई हो, कमल हो तो उसे भी बधाई दे दूं. आखिर उस का भी तो बच्चा है.’’

‘‘पता नहीं.’’

‘‘क्या पागलों जैसी बात करती हो?’’

‘‘खैर, वह सब छोड़ो, मैं अकेली हूं. आ जाओ तो मिल कर ड्रिंक लेंगे और अपने घर के मिनी थिएटर में एडल्ट मूवी एंजौय करेंगे.’’

‘‘नो अनु, थैंक्स. 4 घंटे बाद मेरी फ्लाइट है. अब तुम वह अनु नहीं रहीं, अनुभा सिंह बन गई हो.’’

जीत मन ही मन खुश हुआ कि अच्छा हुआ ऐसी लड़की से वह बच गया. वह इंडिया लौट आया. लता और उस की मां ने एक बार फिर जीत की मां की देखभाल की थी.

लता जीत की मां के पास ही बैठी थी, जब उन्होंने जीत से कहा, ‘‘लता बैंक की नौकरी के लिए सेलैक्ट हो गई है.’’

‘‘बधाई हो लता,’’ जीत ने कहा.

‘‘थैंक्स,’’ बोल कर वह कुछ शरमा सी गई.

लता के जाने के बाद मां ने कहा, ‘‘बेटे, अब तो तेरा प्रोजैक्ट भी पूरा हो गया. मुझे लता सब तरह से अच्छी लड़की लगती है, तेरे लिए ठीक रहेगी. अब तू कहे तो बात करूं उस की मां से.’’

‘‘जैसा तुम ठीक समझो, मां, मुझे कोई एतराज नहीं है.’’

लता और जीत की शादी हो गई. आज दोनों की सुहागरात थी. अगले दिन सुबहसुबह जीत को बारबार हिचकी आ रही थी.

‘‘क्या हुआ जीत? अनुभा याद कर रही है क्या? शायद इसीलिए बारबार तुम्हें हिचकियां आ रही हैं?’’

लता ने जब अचानक अनुभा की बात की तो जीत हैरान रह गया, ‘‘तुम अनुभा को कैसे जानती हो और यह क्या बेकार की बात कर रही हो. जरा एक गिलास पानी दो.’’ लता ने पानी दिया और पानी पीते ही उस की हिचकी बंद हो गई. अब जीत ने लता को अपने पास बिठाया और आंखों में आंखें डाल कर पूछा, ‘‘अब बताओ, तुम अनुभा को कैसे जानती हो?’’

‘‘अरे वाह, वह तो स्कूल में मुझ से 2 साल सीनियर थी तो क्या मैं उसे नहीं जान सकती हूं? तुम दोनों के इश्क के चर्चे मैं ने भी सुने हैं, इंजीनियरिंग कालेज में मेरी कजिन उस की क्लासफैलो थी.’’

‘‘अच्छा, सुना होगा. तब तुम्हें यह भी पता होना चाहिए कि कालेज के बाद हमारे बीच वैसी कोई बात नहीं रही. सिवा यदाकदा फोन के, बाद में वह भी लगभग नहीं रहा. हम लोग शुरू में एकदूसरे को चाहते जरूर थे पर हमारी शादी नहीं होनी थी. वह बहुत महत्वाकांक्षी थी. उसे अमेरिका जाने की जिद थी और मैं अपनी बीमार मां को इंडिया में अकेला छोड़ कर जा नहीं सकता था. वह मेरे लिए बनी ही नहीं थी.’’

‘‘हां, मुझे सब पता है, तभी तो सब जानते हुए मैं ने तुम से शादी के लिए हामी भरी थी.’’

‘‘अच्छा, अब सुबहसुबह ज्यादा बोर न करो, डार्लिंग. एक प्याली चाय अपने होंठों से सटा कर पिला दो. मिठास दोगुनी हो जाएगी.’’मैं अभी चाय बना कर लाती हूं.’’ और वह उठ कर किचन में चली गई.

इसी को कहते हैं जीना : कैसा था नेहा का तरीका

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कुणाल सिंह : ‘भोजपुरी सिनेमा के अमिताभ बच्चन’ को मिला सरस सलिल का लाइफटाइम अचीवमैंट अवार्ड

भोजपुरी सिनेमा के लिए दिया जाने वाला ‘5वां सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड’ हाल ही में अयोध्या में शानदार तरीके से हुआ था, जिस में भोजपुरी सिनेमा के दिग्गज कलाकारों ने शिरकत की थी. इस अवार्ड शो में दर्शक भोजपुरी के तमाम कलाकारों को अपने सामने पा कर दंग थे. वे कड़ाके की ठंड में भी भोजपुरी कलाकारों का दीदार कर रहे थे.

वैसे तो इस अवार्ड शो में दिनेशलाल यादव ‘निरहुआ’, आम्रपाली दुबे, अंजना सिंह, अनारा गुप्ता, पाखी हेगड़े, संजय पांडेय, देव सिंह सरीखे कई दिग्गज कलाकार मौजूद थे, लेकिन इन सब के बीच भोजपुरी सिनेमा के एक खास कलाकार की मौजूदगी ने दर्शकों का हौसला बढ़ा दिया था. वह नाम है भोजपुरी सिनेमा में तकरीबन 43 सालों से अपनी ऐक्टिंग का सिक्का जमाए कुणाल सिंह का.

कुणाल सिंह भोजपुरी सिनेमा के शुरुआती दौर के उन गिनेचुने कलाकारों में शामिल हैं, जिन्होंने भोजपुरी सिनेमा को बुलंदियों पर पहुंचाया और भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री को आगे बढ़ाया.

विधायक का बेटा मुंबई में हीरो बनने आया

साल 1977 में कुणाल सिंह जब मुंबई में फिल्मों में काम करने आए, तब उन के पिता बुद्धदेव सिंह एक चर्चित नेता के साथसाथ विधायक भी थे. वे काफी दिनों तक मंत्री भी रहे थे.

कुणाल सिंह ने बताया, “जब मैं मुंबई आया, तब पिताजी खर्च भेजते रहे. मैं ने हीरो बनने के लिए काफी हाथपैर मारे, लेकिन कामयाबी नहीं मिल पा रही थी. पर मैं ने तय कर लिया था कि हीरो ही बनना है. उधर, पिताजी ने उम्मीद के मुताबिक कामयाबी न मिलने पर कुछ दिन बाद पैसा भेजना बंद कर दिया. ऐसा नहीं था कि वे मुझे पसंद नहीं करते थे, बल्कि वे मुझ से बहुत ज्यादा प्यार करते थे. फिर भी उन्हें मेरे भविष्य की चिंता थी, लेकिन मैं कुछ और ही समझ बैठा. मुझे लगा कि मैं उन पर बोझ बन गया हूं, इसीलिए मैं ने भी कह दिया कि अब मैं नौकरी कर रहा हूं और अपना खर्च खुद चला लूंगा.”

हिंदी फिल्म से हुई शुरुआत

कुणाल सिंह ने बताया कि जब वे मुंबई में संघर्ष कर रहे थे, तभी उन्हें एक हिंदी फिल्म औफर हुई थी, जिस का नाम था ‘कल हमारा है’. इस फिल्म की कहानी बिहार के माहौल पर थी और इसीलिए उस में एक भोजपुरी बोलने वाले कलाकार की जरूरत थी. यह फिल्म जब रिलीज हुई, तो पटना में तकरीबन 37 हफ्ते तक चली थी.

इस फिल्म की कामयाबी ने न केवल कुणाल सिंह के लिए दूसरी फिल्मों में आने का रास्ता खोला, बल्कि इस फिल्म के जरीए मिले भोजपुरी किरदार ने उन्हें भोजपुरी फिल्मों का स्टार बना दिया.

फिल्मों की लगी लाइन

कुणाल सिंह ने बताया, “जब मेरी यह फिल्म हिट हुई, तो फिल्म निर्माताओं ने मुझ से फिल्मों में काम करने के औफर देने शुरू किए, जिन में से ज्यादातर फिल्म निर्माता भोजपुरी सिनेमा बनाने की इच्छा ले कर आ रहे थे. चूंकि मेरे पास उस समय काम नहीं था, इसलिए मैं ने भी फिल्में साइन करनी शुरू कर दीं. लेकिन यह जरूर खयाल रखा कि कभी ऐसी फिल्म न करूं, जिस से खुद की नजरों में ही गिर जाऊं. आज फिल्म इंडस्ट्री में मुझे काम करते हुए तकरीबन 43  साल हो गए हैं, लेकिन कोई मुझ पर सवाल नहीं उठा सकता. मुझे इस बात का गर्व भी है.”

इन फिल्मों ने मचाया धमाल

कुणाल सिंह बताते हैं, “जब मैं बतौर हीरो फिल्मों में काम कर रहा था, तब टीवी और यूट्यूब का जमाना नहीं था, इसलिए सभी फिल्में सिनेमाघरों में ही रिलीज होती थीं. ऐसे में जब मेरी फिल्में सिनेमाघरों में लगती थीं, तो हफ्तों तक सिनेमाघरों के आगे दर्शकों की लाइन लगी रहती थी.”

कुणाल सिंह ने बताया कि उन की फिल्में ‘धरती मईया’, ‘हमार भौजी’, ‘चुटकी भर सिंदूर’, ‘गंगा किनारे मोरा गांव’, ‘दूल्हा गंगा पार के’, ‘दगाबाज बलमा’, ‘हमार बेटवा’, ‘राम जइसन भइया हमार’, ‘बैरी कंगना’, ‘छोटकी बहू’, ‘घरअंगना’, ‘साथ हमारतोहार’ आज भी सब से हिट और ज्यादा चलने वाली फिल्मों में शामिल हैं.

इस फिल्म ने तोड़ा था रिकौर्ड

कुणाल सिंह ने साल 1983 में भोजपुरी फिल्म ‘गंगा किनारे मोरा गांव’ में बतौर लीड हीरो काम किया था. जब यह फिल्म सिनेमाघरों में रिलीज हुई, तो इस ने इतिहास ही रच दिया, क्योंकि यह फिल्म वाराणसी के एक थिएटर में लगातार 1 साल 4 महीने तक चली थी.

अमिताभ बच्चन से तुलना

कुणाल सिंह को भोजपुरिया बैल्ट में सदी के महानायक अमिताभ बच्चन की तरह भोजपुरी का महानायक कहा जाता है. कई लोग तो उन्हें ‘भोजपुरी का अमिताभ बच्चन’ कहते हैं. भोजपुरी और बौलीवुड के इन दोनों महानायकों ने भोजपुरी फिल्म ‘गंगोत्री’ में एकसाथ काम भी किया है.

Kunal Singh

चुनाव में भी आजमा चुके हैं हाथ

एक समय ऐसा भी आया था, जब कुणाल सिंह ने राजनीति में भी हाथ अजमाने का फैसला किया था और अपने पिता के नक्शेकदम पर चलते हुए राजनीति में भी कदम रखा था. उन्होंने कांग्रेस से टिकट ले कर पटना साहिब से शत्रुघ्न सिन्हा के खिलाफ चुनाव लड़ा था और दूसरे नंबर पर रहे थे.

कभी रेप सीन नहीं किया

कुणाल सिंह जब पौजिटिव रोल करतेकरते ऊब गए थे, तब उन्होंने कुछ फिल्में बतौर विलेन भी करने का फैसला किया, लेकिन उन्होंने फिल्म निर्माताओं के सामने एक शर्त रखी थी कि वे विलेन के रूप में कभी भी फिल्मों में रेप सीन नहीं करेंगे.

कुणाल सिंह ने बताया, “मैं ने भोजपुरी में बतौर विलेन महज 2-3 ऐसी फिल्में ही की हैं, लेकिन इस शर्त के साथ कि इस फिल्म में न तो मैं किसी औरत के साथ रेप करूंगा, न उसे टच करूंगा.”

लाइफटाइम अचीवमैंट अवार्ड

हाल ही में अयोध्या में हुए ‘सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड’ शो में कुणाल सिंह को भोजपुरी सिनेमा में योगदान के लिए लाइफटाइम अचीवमैंट अवार्ड से नवाजा गया. इस मौके पर उन्होंने कहा कि इस लाइफटाइम अवार्ड ने ऐक्टिंग के प्रति उन की जवाबदेही और भी बढ़ा दी है. इस दौरान उन्होंने अपनी दमदार संवाद अदायगी से दर्शकों का मनोरंजन भी किया.

सारा तेंदुलकर और जाह्नवी कपूर के बीच छिड़ी जंग, एक्ट्रेस ने उठाया ये कदम

Bollywood News in Hindi: बौलीवुड में कई एक्ट्रेसेस में कोल्ड वॉर या कैट वाइट होते देखा गया है. ऐसी ही एक वॉर इन दिनों सारा तेंदुलकर और जाह्नवी कपूर के बीच देखने को मिल रही है और ये लड़ाई जाह्नवी के बॉयफ्रेंड शिखर पहारिया को लेकर चल रही है.

 

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आपको बता दें कि बौलीवुड एक्ट्रेस जाह्नवी कपूर पिछले लंबे समय से शिखर पहारिया संग अपने रिश्ते को लेकर चर्चा में हैं. वहीं एक्ट्रेस ने कॉफी विद करण में ईशारों-ईशारों में ही अपने रिलेशनशिप पर मुहर लगा दी है. दरअसल, हुआ यूं कि कुछ दिन पहले सारा तेंदुल्कर को जाह्नवी कपूर के बॉयफ्रेंड के साथ पार्टी करके गाड़ी में जाते हुए स्पॉट किया गया था. वहीं दोनों को एक साथ देख लोगों के मन में कई तरह के सवाल खड़े हो रहे थे. जिन खबरों को सुन जाह्नवी कपूर काफी नराज होती नजर आई और उन्होंने ऐसा कमद उठा लिया जो अब चर्चा का विषय बन गया है.

जी हां, खबरे आ रही है कि जाहन्वी कपूर ने सारा को सोशल मीडिया पर अनफ्रेंड कर दिया गया है. इस बात का दावा किया जा रहा है कि इंस्टाग्राम पर दोनों ने एक दूसरे को अनफॉलो कर दिया है. कुछ समय पहले तक एक्ट्रेस सारा को फॉलो करती थीं और उनकी तस्वीरें भी लाइक किया करती थीं. लेकिन अब लग रहा है कि जाह्नवी ने सारा से दूरी बना ली है. हांलाकि, इसके पीछे की असली वजह तो अब वहीं बता सकती हैं.

 

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बता दें कि हाल ही में जाह्नवी कपूर अपनी छोटी बहन खुशी कपूर के साथ कॉफी विद करण में नजर आई थीं. इस दौरान जब करण जौहार ने सवाल पूछे तो उन्होंने कहा कि वो जब किसी और को डेट कर रही थीं, तो शिखर उनके लिए ‘नादान परिंदे घर आजा’ गाया करते थे. उन्होंने शिखर की जमकर तारीफ भी की. एक्ट्रेस कहती हैं कि शिखर शुरुआत से ही मेरे और मेरी फैमिली के साथ खड़े रहे हैं. वो हमारे लिए एक मजबूत सपोर्ट हैं. शिखर को कभी मुझसे कुछ नहीं चाहिए था. वो बस मेरे साथ थे. उन्होंने मेरे ऊपर कभी कोई दबाव नहीं डाला.

नहीं देखा होगा पवन सिंह और मोनालिसा का ऐसा रोमांस, देखें ये Video

Bhojpuri News in Hindi: इन दिनों पवन सिंह,सनी लियोनी के साथ आए नए गाने को लेकर काफी चर्चा में चल रहे है कि इसी बीच उनका एक वीडियो खूब वायरल होता नजर आ रहा है जिसमें वो भोजपुरी एक्ट्रेस मोनालिसा के साथ ऐसा रोमांस करते दिख रहे है जैसे पहले कभी न किया हो. जी हां, पवन सिंह और मोनालिसा ने इंटरनेट का पारा बढ़ा दिया है.

 

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आपको बता दें कि इन दिनों पवन सिंह और मोनालिसा का पुराना सॉन्ग इंटरनेट वायरल हो रहा है. इस वीडियो में दोनों कलाकार ऐसा रोमांस करते दिख रहे है. जिसे देख सभी लोग पानी-पानी हो गए हैं. भोजपुरी स्टार पवन सिंह और मोनालिसा का ये गाना है ‘मुआई दिहला राजाजी’. इस सॉन्ग में पवन सिंह दिल खोलकर मोनालिसा को प्यार करते नजर आ रहे हैं. बता दें कि यह गाना पवन सिंह और मोनालिसा की भोजपुरी फिल्म ‘संईया जी दिलवा मांगेले’ का है. इसमें कल्पना ने अपनी आवाज दी है. पवन सिंह और मोनालिसा की केमिस्ट्री पर लोग अपनी जान छिड़क रहे हैं. अबतक इस बोल्ड एंड हॉट गाने को यूट्यूब पर 50 मिलियन से ज्यादा व्यूज मिल चुके हैं.

बताते चले कि भोजपुरी के सलमान खान यानी पवन सिंह का हाल ही में जन्मदिन था. इस खास मौके पर फैंस समेत कई बड़े सितारों ने पवन सिंह को विश किया. पवन सिंह के बर्थडे पार्टी में कई भोजपुरी स्टार्स नजर आए. खास बात तो यह है कि खेसारी लाल यादव भी पवन सिंह की पार्टी में पहुंचे और उन्हें गले लगाकर विश किया है. वही, काफी दिनों से पवन और खेसारी के बीच विवाद चल रहा था लेकिन अब दोनों के बीच सबकुछ ठीक हो गया है.

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