Crime: प्राइवेट पार्ट, एक गंभीर सवाल

एक गंभीर सवाल कि क्या ऐसे आदमी, आदमी क्या बल्कि हैवान कहना ही ज्यादा सटीक होगा, की कोई इज्जत हो सकती है और वह माफी का हकदार होना चाहिए, जिस ने शक की आग में जलते हुए बेरहमी से अपनी बीवी के प्राइवेट पार्ट को सूईधागे से सिल कर दिल दहला देने वाला काम कर दिया हो?

तय है कि हर किसी का जवाब यही होगा कि नहीं. न तो ऐसे आदमी की कोई इज्जत हो सकती है और न ही उसे किसी भी कीमत पर बख्शा जाना चाहिए. उसे तो कड़ी से कड़ी सजा मिलनी ही चाहिए, जिस से दूसरे शक्की शौहर सबक लें और बीवियों व उन के प्राइवेट पार्ट पर कहर ढाने से पहले कानून का खौफ खाते हुए हजार बार सोचें.

इस वारदात में वारदात से ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि खुद बीवी पुलिस से गुहार लगाती नजर आई कि साहब, मेरे शौहर को कड़ी सजा मत देना, मामूली डांट लगा कर छोड़ देना. और तो और उस का नाम भी उजागर मत करना, नहीं तो हमारी बदनामी होगी.

बेवकूफी की बात यह कि पुलिस वालों ने उस की बात मान भी ली और अभी तक मुजरिम का नाम उजागर नहीं किया. इस से पुलिस वाले तो कठघरे में हैं ही, लेकिन पीडि़ता भी कम जिम्मेदार नहीं है. वह उन औरतों में से है, जो लातघूंसे खा कर और पति की हैवानियत ?ोल ली है.

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सितम सिंगरौली का

मध्य प्रदेश के सिंगरौली की निशा बाई (बदला नाम) ने 28 अगस्त, 2021 को ससुराल में रह रही अपनी बेटी को आपबीती बताई, तो वह भागीभागी मायके आई और मां को सीधे पुलिस स्टेशन ले गई, जहां निशा बाई की बात सुन और हालत देख कर पुलिस वाले भी सकते में आ गए.

निशा बाई के मुताबिक, उस के शौहर को शक था कि उस के गांव के ही एक आदमी से नाजायज ताल्लुक हैं. इस बात पर आएदिन दोनों में ?ागड़ा हुआ करता था और शौहर उस की जम कर कुटाई करता था.

तकरीबन एक हफ्ता पहले भी ऐसा ही हुआ और पति ने गुस्से में आ कर उस का प्राइवेट पार्ट सूईधागे से सिल दिया था.

निशा बाई दर्द से कराहती और चिल्लाती रही, लेकिन उस राक्षस को रहम नहीं आया. पुख्ता सिलाई के लिए उस ने तांबे के तार का इस्तेमाल किया. चूंकि पति नीमहकीमी भी करता था, इसलिए उस ने दर्द की दवा भी उसे खिला दी.

इस के बाद भी निशा बाई 7 दिनों तक दर्द से छटपटाती रही, लेकिन शौहर के गुस्से का खौफ ऐसा था कि वह घर में पड़ीपड़ी अपनी किस्मत को कोसती रही, पर 8वें दिन जब दर्द बरदाश्त से बाहर हो गया तब कहीं जा कर उस ने बेटी को खबर दी.

पुलिसिया पूछताछ में हैरानी वाली बात यह भी उजागर हुई कि 52 साल की निशा बाई की शादी को तकरीबन  35 साल हो चुके हैं. उस के शौहर की उम्र 57 साल है.

यह जान कर तो लोगों के दिमाग का फ्यूज ही उड़ गया कि पति ने 3 साल में चौथी बार उस का प्राइवेट पार्ट सिला था. लोकलाज के डर से वह खामोशी से जुल्मोसितम सहती जा रही थी और इस बार भी पति के लिए माफी चाहती है, तो उस से हमदर्दी के साथसाथ उस की अक्ल पर तरस भी आता है कि अपने ऊपर हुए अत्याचारों के लिए वह भी कम जिम्मेदार नहीं है.

निशा बाई के बेटेबहुएं और बेटियां भी चाहते हैं कि पिता को कम से कम सजा हो यानी औरत पर अत्याचार के मामले में पूरे परिवार की राय एकसमान है, जो शह देने वाली ही मानी जाएगी.

रिपोर्ट दर्ज होने के बाद निशा को अस्पताल ले जाया गया, जहां डाक्टरों ने उस के प्राइवेट पार्ट के टांके काटते हुए उस का इलाज किया.

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रामपुर की रमा

इस तरह की दरिंदगी का एक और मामला 21 मार्च, 2021 को उत्तर प्रदेश के रामपुर से सामने आया था. जवान रमा (बदला नाम) की शादी 2 साल पहले ही हुई थी.

शादी के बाद से पति रमा पर वही शक करता रहा था, जो निशा पर उस के शौहर ने किया था कि उस के किसी गैरमर्द से नाजायज संबंध हैं. दोनों में रोज कलह इस बात को ले कर होती थी और रोज ही रमा की पिटाई उस का शौहर करता था.

वारदात के दिन तो हद हो गई, जब पति ने रमा की पिटाई के बाद उस का प्राइवेट पार्ट तांबे के तार से सिल दिया और उस में एक कील भी फंसा दी.

मिलक थाना इलाके के ठिरिया विष्णु गांव की रमा थाने पहुंची और पति के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई.

जब रमा को इलाज के लिए अस्पताल मे भरती किया गया, तो पता चला कि वह पेट से है. इस पर लोगों का गुस्सा और बढ़ गया. जिस ने भी सुना, उस ने वहशी पति के लिए कड़ी से कड़ी सजा की मांग की. खुद रमा भी बिफरी हुई थी और पति के लिए सख्त सजा की मांग करती नजर आई.

निशा बाई की तरह उस ने हैवान पति के लिए कोई रहम दिखाने की बात नहीं कही, बल्कि उस का हुक्कापानी भी बंद करने की ख्वाहिश जताई जिस से पति को सम?ा आए कि ऐसे दरिंदों को तो समाज में रहने का हक ही नहीं है.

इस ने तो ताला जड़ा

इन दोनों मामलों ने बरबस ही  10 साल पहले के एक और नृशंस मामले की याद दिला दी, जिस में एक और शौहर ने बीवी रोमा के प्राइवेट पार्ट पर ताला लगा कर रखा था. इंदौर के मुसाखेड़ी में जो हुआ था, उसे सुन कर रोंगटे आज भी खड़े हो जाते हैं.

एक आटो गैराज में काम करने वाला पति सोहनलाल सुबह जब गैराज जाता था, तो पत्नी के प्राइवेट पार्ट पर ताला लगा कर जाता था. ताकि उस की गैरमौजूदगी में बीवी किसी से सैक्स न कर ले. यह सिलसिला 2 साल चला. सिंगरौली और रामपुर के शौहरों ने तार कसा था, लेकिन सोहनलाल ने तो तार डाल कर ताला लगाया था, जिस की चाबी वह अपने साथ ले जाता था.

परेशान हो कर मरती क्या न करती की तर्ज पर रोमा ने एक दिन जहर खा लिया. थोड़ी देर में उसे बेहोश होते देख उस के पांचों बच्चों ने शोर मचा दिया तो पड़ोसी आए.

रोमा की हालत देख कर पड़ोसियों की रूह कांप उठी और तुरंत ही उसे अस्पताल ले जाया गया. पुलिस को भी खबर दी गई. होश में आने के बाद रोमा ने अपनी कहानी सुनाई तो सोहनलाल को गिरफ्तार कर लिया गया.

बीवियां भी ढा रही कहर

8 अगस्त, 2021 को बिहार के पटना के फुलवारीशरीफ में पत्नी वैशाली (बदला नाम) का विवाद आएदिन शौहर से होता रहता था. ये दोनों अलाव कालोनी में रहते हैं.

घटना की रात दोनों साथ सोए थे, लेकिन पति जल्द ही गहरी नींद में चला गया था, क्योंकि वैशाली ने उस के खाने में कुछ मिला दिया था. उस की असल मंशा शौहर का प्राइवेट पार्ट काट कर उसे सबक सिखाने की थी, जो उस ने सिखाया भी और सो रहे पति का अंग चाकू से काट डाला.

दर्द से छटपटाते शौहर की नींद खुली, तो माजरा सम?ा कर उस के होश उड़ गए, क्योंकि हाथ में चाकू लिए वैशाली नागिन सी फुफकार रही थी और इधर उस की लुंगी खून से सनी जा रही थी.

घबराया शौहर दौड़ता हुआ फुलवारीशरीफ थाने पहुंचा और सारा किस्सा बताया. तब तक उस के अंग से काफी खून बह चुका था. पुलिस ने तुरंत ही उसे नजदीकी अस्पताल में इलाज के लिए भेजा और वैशाली को गिरफ्तार कर लिया.

पहले अंग काटा, फिर मार डाला

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के शिकारपुर में 25 जून, 2021 को हाजरा नाम की बीवी ने तो क्रूरता के मामले में मर्दों को भी पछाड़ दिया. उस ने पेशे से वकील अपने शौहर रफीक अहमद का अंग बेरहमी दिखाते हुए चाकू से काट डाला और इस पर भी जी नहीं भरा  तो घायल शौहर को पीटपीट कर मार  ही डाला.

गिरफ्तार होने के बाद हाजरा ने बताया कि रफीक रंगीनमिजाज आदमी था, जिस से वह परेशान रहती थी. बकौल हाजरा, रफीक 2 शादियां कर चुका था और अब तीसरी शादी करने जा रहा था. इस बात से वह दुखी थी. सम?ाने पर रफीक उसे मारतापीटता था, इसलिए गुस्से में उस ने फसाद की जड़ ही खत्म कर दी.

निशाने पर प्राइवेट पार्ट ही क्यों

इन पांचों मामलों में निशाने पर प्राइवेट पार्ट रहा. चूंकि औरत का अंग शरीर के अंदर होता है, इसलिए उसे काटा नहीं जा सकता, तो शौहरों ने उसे सिल दिया या फिर ताला लगा दिया. इस के उलट बीवियों ने आसानी से शौहरों को प्राइवेट पार्ट गाजरमूली की तरह काट डाला, क्योंकि वह बाहर होता है. रोज सब्जीभाजी काटने वाली बीवियों को काटने की खासी प्रैक्टिस थी, इसलिए उन्हें यह रास्ता आसान लगा.

शक हो या गुस्सा ये दोनों ही शादीशुदा जिंदगी को नरक बना देते हैं. शौहर बीवी को अपनी जायदाद सम?ाता है, इसलिए वह शक ज्यादा करता है और बीवी उस की गैरमौजूदगी में किसी और से सैक्स न कर ले, इसलिए उस के प्राइवेट पार्ट को सिलता है और उस पर ताला भी लगाता है, लेकिन यह न केवल जुर्म है, बल्कि वहशीपन और दरिंदगी की हद है.

यही बात बीवियों पर लागू होती है, जो शौहर को सबक सिखाने के लिए उसे नामर्द बनाने की हद तक बेरहम  हो जाती हैं. मकसद उन का भी यही रहता है कि शौहर किसी दूसरी औरत से हमबिस्तरी करने लायक ही न रहे यानी शक्की शौहर और गुस्सैल बीवी प्यार करते हैं, तो केवल प्राइवेट पार्ट से और बदला लेने या सबक सिखाने के लिए उसी को निशाना बनाने लगे हैं, जबकि थोड़ी अक्ल और सब्र से काम लिया जाए तो वे जुर्म से खुद को बचा सकते हैं.

आमतौर पर शक तो फुजूल ही निकलता है, जो बीवी के चालचलन में नहीं, बल्कि शौहर के दिमाग में होता है. कई बार तो यह बचपन से ही दिमाग में पल रहा होता है कि औरत होती ही  चालू है.

कहते हैं कि शक का इलाज तो लुकमान हकीम के पास भी नहीं था, फिर आजकल के शौहरों की औकात क्या, जो शक के चलते बीवी का कत्ल तक आसानी से कर देते हैं.

लेकिन इलाज है. शौहर को शक हो, तो उसे बीवी को छोड़ देना चाहिए. उसे मारनेपीटने से समस्या हल नहीं होती.  उस के किसी से संबंध हैं, यह बात साबित होने पर ही सजा देनी चाहिए, लेकिन खुद हिंसक और हैवान जज बन कर नहीं, बल्कि अदालत का दरवाजा खटखटाना चाहिए. वहां थोड़ी देर जरूर लगती है, लेकिन शौहर एक गुनाह करने से बच जाता है.

वैसे भी औरत के प्राइवेट पार्ट को सिलना तालिबानियों जैसी क्रूरता है, फिर उन में और इन में में फर्क क्या. यही बात बीवियों की क्रूरता पर भी लागू होती है.

इंतजार- भाग 2: क्यों सोमा ने अकेलापन का सहारा लिया?

सुपरवाइजर बहुत कड़क था. वह एक मिनट भी चैन की सांस नहीं लेने देता. किसी को भी आपस में बात करते या हंसीमजाक करते देखता, तो उसे नौकरी से निकालने की धमकी दिया करता.

कारखाने का बड़ा उबाऊ वातावरण था. औसत दरजे का कमरा, उस में  10-12 औरतआदमी, चारों और कमीजों का ढेर और धीमाधीमा चलता पंखा. नए कपड़ों की गरमी में लगातार काम में जुटे रह कर वह थक जाती और ऊब भी जाती.

थकीमांदी जब वह घर लौटती तो एक कोठरी में बाबू की गालीगलौज और नशे में अम्मा के साथ लड़ाई व मारपीट से दोचार होना पड़ता. लड़ाई?ागड़े के बाद उसे सोता सम?ा दोनों अपने शरीर की भूख मिटाते. उसे घिन आती और वह आंखों में ही रात काट देती.

सवेरे पड़ोस का रमेश उसे लाइन मारते हुए कहता, ‘अरे सोमा, एक मौका तो दे मु?ो, तु?ो रानी बना कर रखूंगा.’

वह आंखें तरेर कर उस की ओर देखती और नाली पर थूक देती.

विमला काकी व्यंग्य से मुसकरा कर कहती, ‘कल तुम्हारे बाबू बहुत चिल्ला रहे थे, क्या अम्मा ने रोटी नहीं बनाईर् थी?’

वह इस नाटकीय जीवन से छुटकारा चाहती थी. उस ने नौकरी के साथसाथ बीए की प्राइवेट परीक्षा पास कर ली थी.

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जब वह बीए पास हो गई तो उस की तरक्की हो गई. आंखों ही आंखों में वहां काम करने वाले महेंद्र से उस की दोस्ती हो गई. वह अम्मा से छिपा कर उस के लिए टिफिन में रोटी ले आती. दोनों साथसाथ चाय पीते, लंच भी साथ खाते. कारखाने के सुपरवाइजर दिलीप ने बहुत हाथपैर पटके कि तुम्हें निकलवा दूंगा, यहां काम करने आती हो या इश्क फरमाने. लेकिन, जब आपस में मन मिल जाए तो फिर क्या?

‘महेंद्र एक बात सम?ा लो, तुम से दोस्ती जरूर की है लेकिन मु?ा से दूरी बना कर रहना. मु?ा पर अपना हक मत सम?ाना, नहीं तो एक पल में मेरीतेरी दोस्ती टूट जाएगी.’

‘देख सोमा, तेरी साफगोई ही तो मु?ो बहुत पसंद है. जरा देर नहीं लगी और सूरज को हमेशा के लिए छोड़ कर आ गई.’

इस तरह आपस में बातें करतेकरते दोनों अपने दुख बांटने लगे.

‘महेंद्र, तुम शादी क्यों नहीं कर लेते?’

‘जब से लक्ष्मी मु?ो छोड़ कर चली गई, मेरी बदनामी हो गई. मेरे जैसे आदमी को भला कौन अपनी लड़की देगा.’

‘वह छोड़ कर क्यों चली गई?’

‘उस का शादी से पहले किसी के साथ चक्कर था. अपनी अम्मा की जबरदस्ती के चलते उस ने मु?ा से शादी तो कर ली लेकिन महीनेभर में ही सबकुछ लेदे कर भाग गई. उस का अपना अतीत उस की आंखों के सामने घूम गया था.

अब महेंद्र के प्रति उस का लगाव अधिक हो गया था.

एक दिन उस को बुखार था, इसलिए वह काम पर नहीं गई थी. वह घर में अकेली थी. तभी गंगाराम (बाबू के दोस्त) ने कुंडी खटखटाई, ‘एक कटोरी चीनी दे दो बिटिया.’

वह चीनी लेने के लिए पीछे मुड़ी ही थी कि उस ने उस को अपनी बांहों में जकड़ लिया था. लेकिन वह घबराई नहीं, बल्कि उस की बांहों में अपने दांत गड़ा दिए. वह बिलबिला पड़ा था. उस ने जोर की लात मारी और पकड़ ढीली पड़ते ही वह बाहर निकल कर चिल्लाने लगी. शोर सुनते ही लोग इकट्ठे होने लगे.

लेकिन उस बेशर्म गंगाराम ने जब कहा कि तेरे बाबू ने मु?ा से पैसे ले कर तु?ो मेरे हाथ बेच दिया है. अब तु?ो मेरे साथ चलना होगा.

‘थू है ऐसे बाप पर, हट जा यहां से, नहीं तो इतना मारूंगी कि तेरा नशा काफूर हो जाएगा,’ वह क्रोध में तमतमा कर बोली, ‘मैं आज से यहां नहीं रहूंगी.’

आसपास जमा भीड़ बाबू के नाम पर थूक रही थी. लड़ाई की खबर मिलते ही अम्मा भी भागती हुई आ गई थी. वह उसे सम?ाने की कोशिश करती रही लेकिन उस ने तो कसम खा ली थी कि वह इस कोठरी के अंदर पैर कभी नहीं रखेगी.

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उसी समय महेंद्र उस का हालचाल पूछने आ गया था. सारी बातें सुन कर बोला, ‘तुम मेरी कोठरी में रहने लगो, मैं अपने दोस्त के साथ रहने लगूंगा.’

अम्मा की गालियों की बौछार के साथसाथ रोनाचिल्लाना, इन सब के बीच वह उस नर्क को छोड़ कर महेंद्र की कोठरी में आ कर रहने लगी थी. अम्मा ने चीखचीख कर उस दिन उस से रिश्ता तोड़ लिया था.

महेंद्र के साथ जाता देख अम्मा उग्र हो कर बोल रही थी, ‘जा रह, उस के साथ, देखना महीनापंद्रह दिन में तु?ा से मन भर जाएगा. बस, तु?ो घर से बाहर कर देगा.’

महेंद्र को सोमा काफी दिनों से जानती थी. उस ने उस की आंखों में अपने लिए सच्चा प्यार देखा था. उस की निगाहों में, बातों में वासना की ?ालक नहीं थी.

कारखाने में वह अब सुपरवाइजर बन गई थी. उस के मालिक उस के काम से बहुत खुश थे.

Manohar Kahaniya: सेक्स चेंज की जिद में परिवार हुआ स्वाहा- भाग 3

सौजन्य- मनोहर कहानियां

लेखक- शाहनवाज

अलग तरह की होती थी फीलिंग

कार्तिक उस के सब से अच्छे दोस्तों में से एक बन गया था. उसे उस के साथ वक्त गुजारना अच्छा लगने लगा. दोनों मिल कर क्लास के बाद दिल्ली के अलगअलग जगहों पर घूमने निकल जाते, अच्छे होटल में खाना खाते. कभी स्टारबक्स, कभी मैकडोनल्डस, कभी केएफसी, कभी बर्गर किंग तरह तरह की जगहों पर अकसर वक्त गुजारते.

वह जब कभी भी कार्तिक के साथ मिलता तो उस के शरीर में एक अलग तरह की सिहरन दौड़ जाती थी. उस का चेहरा और उस की बातें, उस की आंखों और दिल को सुकून देती थीं. कार्तिक के लिए उस के मन में एक अजीब तरह की फीलिंग महसूस होने लगी थी.

अभिषेक मन में कार्तिक को छूने की, उस के करीब रहने की बातें घूमती रहती थीं. वह भी उसे एक अच्छा दोस्त समझता था. लेकिन उसे यह नहीं पता था कि जो फीलिंग्स वह कार्तिक के लिए अपने मन में रखता है, क्या वह भी उसे उसी तरह से देखता है या नहीं.

2 सालों तक वह दिल्ली में कार्तिक के साथ इसी तरह से मिला करता था. लेकिन एक दिन अभिषेक ने कार्तिक को अपने घर पर आने का न्यौता दिया. वह उस के घर पर आया. उस के पूरे परिवार से मिला. उस के घर पर सभी को पता था कि वे दोनों बेहद अच्छे दोस्त हैं.

ऐसे ही एक दिन जब कार्तिक उस के घर पर आया तो वह दोनों लैपटोप पर फिल्म देख रहे थे. वह अभिषेक से चिपक कर बैठा था. उस का ध्यान फिल्म पर बिलकुल भी नहीं था. न जाने उसी वक्त उसे क्या हुआ कि उस ने कार्तिक को उस की गरदन पर चूम लिया.

खुद को लड़की मानता था अभिषेक

अभिषेक की इस हरकत का कार्तिक ने बुरा नहीं माना बल्कि उस ने उस का हाथ पकड़ लिया और उस ने भी अभिषेक की गरदन पर चूम लिया.

इस अहसास को अभिषेक ने इस से पहले कभी महसूस नहीं किया था. कुछ इस तरह से उस के और कार्तिक के बीच संबंध बनने शुरू हुए. जिस के बाद वे दोनों अकसर होटल में मिलते और अपनी जरूरतों को पूरा करते.

3 साल का उन का कैबिन क्रू का कोर्स खत्म हुआ तो अभिषेक अपने घर आ गया. तब उस का दिल्ली जा पाना और कार्तिक से मिलना मुश्किल हो गया. तब वह कार्तिक को मिलने के लिए अकसर रोहतक में बुला लिया करता था.

पहले के मुकाबले उन की मुलाकात अब ज्यादा दिनों में होती. बढ़ते गैप के साथसाथ उन दोनों के मन में एकदूसरे के लिए फीलिंग्स और भी ज्यादा बढ़ने लगीं. कार्तिक के बिना उस के लिए एक पल भी गुजारना मुश्किल होने लगा था. अगर वह नहीं मिल पाते तो घंटों फोन पर एकदूसरे से बातें करते.

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कार्तिक से मिलने के बाद अभिषेक ने खुद को अन्य लोगों से अलग महसूस किया. अकसर उस के मन में आता कि बेशक वह लड़का है, लेकिन अंदर से वह खुद को लड़की मानने लगा था.

घर में अकेले होता था तो वह अपनी बहन नेहा के कपड़े पहन कर और मेकअप कर के देखता कि कैसा दिखाई देता है. वह पूरी तरह से खूद को बदलाबदला सा महसूस करता. अभिषेक की अब हलके और चटक रंग के कपड़ों में दिलचस्पी बढ़ने लगी थी. उस की पसंद में पूरी तरह से बदलाव आ गया था.

ऐसे ही साल 2020 के अगस्त के महीने में अभिषेक ने यह तय कर लिया था कि वह खुद को अंदर से जैसा महसूस करता है, वैसा ही वह हकीकत में बनेगा. यानी वह लड़की बनना चाहता था. इस संबंध में उस ने इंटरनेट पर सर्च करना शुरू कर दिया. उसे पता चला कि औपरेशन के जरिए एक इंसान अपना लिंग बदल सकता है.

अभिषेक इस बारे में पूरी जानकारी हासिल करना चाहता था, इसीलिए वह घंटों इंटरनेट पर इसी के संबंध में सर्च करता रहता, पढ़ता रहता और वीडियोज देखता.

वह भारत में सैक्स चेंज का औपरेशन करने वाले क्लिनिक या हौस्पिटल के बारे में पता करने लगा. धीरेधीरे उस ने इस औपरेशन में आने वाला खर्चा, सारी सावधानियां, सभी ऐहतियात सब के बारे में पता कर लिया.

अब वह अपने जीवन में एक अहम पड़ाव पर आ कर फंस गया था, उसे एक ऐसा फैसला करना था जिस के बाद उस की पूरी जिंदगी बदल जाती. उस ने दिनरात इस के बारे में सोचा. उस ने इस की भनक कार्तिक को बिलकुल भी नहीं होने दी, क्योंकि वह उस के साथ रिश्ते में बंधने के लिए उसे सरप्राइज देना चाहता था.

अंत में उस ने फैसला कर ही लिया कि उसे क्या चाहिए. उस ने अपने लिए खुद को चुना, कार्तिक को चुना क्योंकि वही उस की खुशियां बनने वाला था. उस ने औपरेशन के लिए खुद को तैयार कर लिया, लेकिन उस के लिए उसे पैसों की जरुरत थी.

नए साल 2021 की शुरुआत में ही अभिषेक ने अपने पापा से 5 लाख रुपए मांगे. उसे लगा कि हर बार की तरह वह इस बार भी नहीं पूछेंगे कि उसे इतने पैसे किसलिए चाहिए. लेकिन इस बार इतनी बड़ी रकम मांगने पर उन्होंने उस से पूछ ही लिया कि उसे ये पैसे किसलिए चाहिए.

तब अभिषेक ने उन से झूठ बोला कि उसे किसी काम के लिए चाहिए तो उन्होंने साफ मना कर दिया. फिर अभिषेक ने पैसों के लिए अपनी मम्मी के पास जा कर एप्रोच किया. मम्मी उसे पैसों के लिए कभी भी मना नहीं करती थीं, लेकिन इतनी बड़ी रकम सुन कर उन्होंने भी मना कर दिया था.

बहन को बता दी मन की बात

वह पैसों का जुगाड़ नहीं कर पा रहा था. उसे इस औपरेशन के लिए जल्द से जल्द पैसे चाहिए थे. कार्तिक से दूरी वह अब बरदाश्त नहीं कर पा रहा था. हार मान कर उस ने यह बात अपनी बहन नेहा को बता दी कि उसे किसलिए पैसों की जरूरत है.

अभिषेक को लगा कि एक लड़की और मेरी बहन होने के नाते वह उस की फीलिंग्स की कदर करेगी और उस की बातों को समझेगी. लेकिन अफसोस ऐसा नहीं हुआ.

जिस रात उस ने नेहा को पैसे मांगने का कारण बताया उस के अगले दिन नेहा ने उस की गैरमौजूदगी में पापा और मम्मी को ये बात बता दी कि अभिषेक पैसे किसलिए मांग रहा है.

उस दिन अभिषेक बाहर किसी काम से निकला था, लेकिन जब वह घर लौटा तो पापा और मम्मी का चेहरा देख कर उसे अंदाजा हो गया था कि नेहा ने इन्हें सब कुछ बता दिया है. पापा और मम्मी ने उसे अपने कमरे में बुलाया और उन्होंने उसे यह खयाल अपने दिमाग से निकाल देने की नसीहत दी.

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लेकिन अभिषेक नहीं माना. उस ने उन के सामने ही उन की बातों को मानने से इंकार कर दिया. गुस्से में मम्मी तो कमरे से निकल गईं, लेकिन पापा ने उस दिन उसे बहुत मारा. इस के साथ ही उन्होंने अपनी सारी प्रौपर्टी नेहा के नाम कर देने की धमकी भी दे डाली.

पापा ने कभी भी अभिषेक पर हाथ नहीं उठाया था लेकिन जब उन्होंने उस दिन उसे पीटा तो उस ने उसी दिन यह तय कर लिया था कि उसे अब किसी भी हालत में अपना सैक्स बदलना है.

उस दिन के बाद अभिषेक पर घर में हर काम के लिए बंदिशें लगने लगीं. उसे अपने कमरे के दरवाजे को अंदर से बंद करने के लिए मना कर दिया गया. कुछ दिनों के लिए उस का फोन छीन लिया गया. घर में इंटरनेट कनेक्शन भी कटवा दिया गया. इतना ही नहीं, उस ने सारे दोस्तों को घर पर आनेजाने के लिए मना कर दिया गया. उसे घर पर हर कोई अजीब नजरों से देखने लगा. यहां तक कि नानी को भी इसलिए बुलाया गया था ताकि वह उसे इस के लिए समझाए कि सैक्स चेंज कराना अच्छी बात नहीं है.

अभिषेक को उस के ही घर में ऐसी पैनी और शक भरे अंदाज में देखा जाता था जैसे उस ने यह सोच कर ही कोई बहुत बड़ा गुनाह कर लिया हो. उसे अपने ही घर में घुटन होने लगी थी.

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ममता- भाग 3: क्या माधुरी को सासुमां का प्यार मिला

‘मैं अपनी पूरी जिंदगी घर में निठल्ले बैठे नहीं गुजार सकती. वैसे ही अपनी जिंदगी का अहम हिस्सा इस परिवार को भेंट कर ही चुकी हूं, लेकिन अब और नहीं कर सकती,’ आक्रोश में सास ने उत्तर दिया था.

‘मम्मीजी, घर में भी दूसरे सैकड़ों जरूरी काम हैं, यदि किए जाएं तो,’ कहना चाह कर भी माधुरी कह नहीं सकी थी. व्यर्थ ही उन का गुस्सा बढ़ जाता और हासिल कुछ भी न होता. हो सकता है वे अपनी जगह ठीक हों वरना कौन पढ़ीलिखी औरत फालतू के कामों में अपनी पूरी जिंदगी बिताना चाहेगी.

मम्मीजी का निर्णय अपना है. पर वह उस सचाई को कैसे भूल सकती है जिस के पीछे उस का भोगा हुआ अतीत छिपा है, तनहाइयां छिपी हैं, रुदन छिपा है, जिस को देखने का, पहचानने का उस के पालकों के पास समय ही नहीं था. उस समय उसे लगता था कि ऐसे दंपती संतान को जन्म ही क्यों देते हैं, जब उन के पास बच्चों के लिए समय ही नहीं है. वह बेचारा उन की प्यारभरी निगाह के लिए जीवनभर तड़पता ही रह जाता है लेकिन वह निगाह उसे नसीब नहीं होती. आज इंसान पैसों के पीछे भाग रहा है, लेकिन पैसों से मन की शांति, प्यार तो नहीं खरीदा जा सकता.

एक बच्चे को जब मां की कोख की गरमी चाहिए तब उसे बोतल और पालना मिलता है, जब वह मां का हाथ पकड़ कर चलना चाहता है, अपनी तोतली आवाज में दुनियाभर के प्रश्न पूछ कर अपनी जिज्ञासा शांत करना चाहता है, तब उसे आया के हाथों में सौंप दिया जाता है या महानगरों में खुले के्रचों में, जहां उस का बचपन, उस की भावनाएं, उमंगें कुचल कर रह जाती हैं. वह एकाकीपन से इतना घबरा उठता है कि अकेले रहने मात्र से सिहर उठता है.

उसे याद है कि वह 15 वर्ष तक अंगूठा पीती रही थी, अंगूठा चूसना उसे न केवल मानसिक तृप्ति देता था वरन आसपास किसी के रहने का एहसास भी कराता था. अचानक किसी को सामने पा कर चौंक उठना तथा ठीक से बातें न कर पाना भी उस की कमजोरी बन गई थी. इस कमजोरी के लिए भी सदा उसे ही दोषी ठहराया जाता रहा था.

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जब सब बच्चे स्कूल में छुट्टी होने पर खुश होते थे तब माधुरी चाहती थी कि कभी छुट्टी हो ही न, क्योंकि छुट्टी में वह और अकेली पड़ जाती थी. मातापिता के काम पर जाने के बाद घर खाने को दौड़ता था. घर में सुखसुविधा का ढेरों सामान मौजूद रहने के बावजूद उस का बचपन सिसकता ही रह गया था. वह नहीं चाहती थी कि उस की संतानें भी उसी की तरह घुटघुट कर जीते हुए किसी अनहोनी का शिकार हों या मानसिक रोगी बन जाएं.

बाद में पल्लव से ही पता चला था कि प्रारंभ में तो मम्मी पूरी तरह घरेलू ही थीं किंतु पापा के व्यापार में निरंतर मिलती सफलता के कारण वे अकेली होती गईं तथा समय गुजारने के लिए उन्होंने समाज सेवा प्रारंभ की. बढ़ती व्यस्तता के कारण घर को नौकरों पर छोड़ा जाने लगा और अब उन्होंने उस क्षेत्र में ऐसी जगह बना ली है कि जहां से लौटना उन के लिए न तो संभव है और शायद न ही उचित.

‘‘बेटी, नाश्ता कर ले,’’ मम्मी का स्नेहिल स्वर उसे चौंका गया और वह अतीत की यादों से निकल कर वर्तमान में आ गई.

‘‘न जाने तुम ने मम्मी पर क्या जादू कर दिया है कि सबकुछ छोड़ कर तुम्हारी तीमारदारी में लगी हैं,’’ मम्मीजी को आवश्यकता से अधिक उस की देखभाल करते देख पल्लव ने उसे चिढ़ाते हुए कहा था.

‘‘क्यों नहीं करूंगी उस की देखभाल? तू तो सिर्फ मेरा बेटा ही है किंतु यह तो बहू होने के साथसाथ मेरी बेटी भी है तथा मेरे होने वाले पाते की मां भी है,’’ मम्मीजी, जो पास में खड़े बेटे की बात सुन रही थीं, ने अपनी चिरपरिचित मुसकान के साथ कहा था.

मम्मीजी जहां पहले एक दिन घर में रुकने के नाम पर भड़क जाती थीं, वहीं वह सप्ताहभर से अपने सारे कार्यक्रम छोड़ कर उस की देखभाल में लगी हैं. आज माधुरी को खुद पर ग्लानि हो रही थी. उस के मन में उन के लिए कितने कलुषित विचार थे. वास्तव में उन्होंने सिद्ध कर दिया था कि स्त्री पहले मां है बाद में पत्नी या अन्य रूपों को जीती है. मां रूपी प्रेम का स्रोत कभी समाप्त नहीं होता. ममता कभी नहीं मरती.

मम्मीजी उन स्त्रियों में से नहीं थीं जो घरपरिवार के लिए अपना पूर्ण जीवन समर्पित करना अपना ध्येय समझती हैं, वे उन से कहीं परे थीं, अलग थीं. अपनी मेहनत और लगन से उन्होंने समाज में अपनी एक खास पहचान बनाई थी.

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अब उस की यह धारणा धूमिल होती जा रही थी कि समाज सेवा में लिप्त औरतें घर से बाहर रहने के लिए ही इस क्षेत्र में जाती हैं. कुछ अपवाद अवश्य हो सकते हैं.

उसे लग रहा था कि बच्चों की जिम्मेदारी से मुक्त होने के बाद यदि संभव हो सका तो वह भी देश के गरीब और पिछड़े वर्ग के उत्थान के लिए अपना योगदान अवश्य देगी. फिलहाल तो उसे अपनी कोख में पलने वाले बच्चे की ओर ध्यान देना है, जो उस की जरा सी असावधानी से मरतेरते बचा है. सोचतेसोचते उस ने करवट बदली और उसी के साथ ही उसे महसूस हुआ मानो वह कह रहा है, ‘ममा, जरा संभल कर, कहीं मुझे फिर से चोट न लग जाए.’

‘नहीं बेटा, अब तुझे कुछ नहीं होगा. मैं हूं न तेरी देखभाल के लिए,’ माधुरी ने दोनों हाथों से बढ़े पेट को ऐसे थाम लिया मानो वह गिरते हुए अपने कलेजे के टुकड़े को पकड़ रही है. उस के चेहरे पर मातृत्व की गरिमा, अजन्मे के लिए अनोखा, अटूट प्रेम दिखाई दे रहा था.  द्य

मां अत्यंत ही महत्त्वाकांक्षी थीं. यही कारण था कि दादी के बारबार यह कहने पर कि वंश चलाने के लिए बेटा होना ही चाहिए, उन्होंने ध्यान नहीं दिया था. उन का कहना था कि आज के युग में लड़का और लड़की में कोई अंतर नहीं रह गया है.

Crime Story: पत्नी ने घूंघट नहीं निकाला तो बेटी को मार डाला

बात साल 2019 की है. राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने जयपुर में हुए एक कार्यक्रम में लोगों से सवाल पूछा था कि समाज को किसी महिला को घूंघट में कैद करने का क्या अधिकार है? जब तक घूंघट नहीं हटेगा, महिलाएं कभी आगे नहीं बढ़ पाएंगी.

नारी अधिकारों के लिए काम कर रहे एक संगठन के उस कार्यक्रम में अशोक गहलोत ने आगे कहा था कि कुछ ग्रामीण इलाकों में महिलाएं अब भी घूंघट करती हैं. महिलाओं को हिम्मत और हौसले के साथ आगे बढ़ना पड़ेगा. सरकार आप के साथ खड़ी मिलेगी.

पर राजस्थान के अलवर जिले के गादोज गांव में दकियानूसी सोच वाले एक आदमी को शायद मुख्यमंत्री की ऐसी बातें पसंद नहीं थीं, तभी तो उस ने पत्नी के घूंघट नहीं निकालने की बात पर ?ागड़ा किया और अपनी 3 साल की मासूम बेटी को पीटने लगा.

मां उसे बचाने लगी तो उस दरिंदे ने मासूम बेटी को जमीन पर पटक कर उस की हत्या कर डाली.

इतना ही नहीं, आरोपी और उस के परिवार वालों ने तड़के सुबह बिना किसी को खबर हुए बच्ची का अंतिम संस्कार भी कर डाला.

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यह घटना मंगलवार, 17 अगस्त, 2021 की रात की थी. अगले दिन मायके वालों के आने पर बच्ची की मां मोनिका यादव बहरोड़ थाने पहुंची और अपने पति प्रदीप यादव के खिलाफ मामला दर्ज कराया.

मोनिका ने रिपोर्ट में बताया कि उस का पति प्रदीप यादव घर के भीतर हमेशा घूंघट निकालने की कहता है और वह घूंघट भी करती है. मगर कभी जरा घूंघट कम हो तो ?ागड़ा और मारपीट करने लगता है.

मंगलवार की रात को भी घूंघट निकालने को ले कर प्रदीप ने मोनिका से ?ागड़ा शुरू कर दिया और बाद में अपनी 3 साल की बेटी प्रियांशी को थप्पड़

मार दिया.

मोनिका ने विरोध किया, तो उस की गोद से बच्ची को खींच कर कमरे में ले गया. वहां पीटने के बाद उसे उछाल कर कमरे के आंगन में फेंक दिया.

बच्ची ने फर्श पर गिरते ही दम तोड़ दिया. इस के बाद पति और ससुराल वालों ने बुधवार तड़के सुबह उस का अंतिम संस्कार कर दिया. आरोपी वारदात के बाद फरार हो गया.

पीडि़ता मोनिका ने पुलिस को आगे बताया कि साल 2013 में उस की शादी प्रदीप यादव के साथ हुई थी. वह एक फैक्टरी में काम करता है और 12वीं जमात तक पढ़ा है. शादी में मोनिका के परिवार ने जरूरी सामान के साथ ही एक मोटरसाइकिल भी दी थी, लेकिन प्रदीप दहेज की मांग को ले कर अकसर ही उस से ?ागड़ा करता था.

मोनिका और प्रदीप यादव की  2 बेटियां थीं. जब साल 2018 में छोटी बेटी प्रियांशी का जन्म हुआ था, तब मोनिका के मायके वालों ने घर में कलह खत्म करने के लिए प्रदीप को कार दी थी. इस के बावजूद वह नहीं सुधरा, तो रेवाड़ी में 2 बार मामले दर्ज कराए गए. हालांकि बाद में इन में सम?ाता हो गया था.

राजस्थान में यह कोई एकलौता मामला नहीं है, जब किसी महिला, चाहे वह छोटी बच्ची हो या बड़ी औरत, के साथ किसी तरह का जुल्म न हुआ हो.

साल 2020 के पहले 8 महीनों में प्रदेश में महिलाओं से मारपीट, शोषण, बलात्कार और महिला संबंधी दूसरे अपराधों के 22,000 से भी ज्यादा मुकदमे दर्ज हुए थे. 339 दहेज हत्याएं भी हुई थीं, जो पिछले सालों की तुलना में कहीं ज्यादा थीं.

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दहेज के लिए परेशान करने पर खुदकुशी करने या खुदकुशी की कोशिश करने के 125 मुकदमे दर्ज हो चुके थे.

महिलाओं पर अत्याचार करने और उत्पीड़न के 8,500 मुकदमे दर्ज हुए थे. साल 2019 की तुलना में ये कम थे, लेकिन साल 2018 की तुलना में कहीं ज्यादा थे. बलात्कार के 3,500 और छेड़छाड़ और जबरदस्ती करने के 5,800 मुकदमे दर्ज हुए थे. अपहरण और दूसरी तरह के अपराधों की संख्या 3,800 से भी ज्यादा थी.

नैशनल क्राइम ब्यूरो रिपोर्ट के आंकड़ों का हवाला देते हुए भारतीय जनता पार्टी के नेता राज्यवर्धन सिंह राठौर ने राज्य सरकार पर हमला करते हुए कहा कि आज महिलाओं के ऊपर अत्याचार के मामलों में राजस्थान देश में पहले नंबर पर पहुंच गया है.

अब दोबारा घूंघट पर बात करें, तो राजस्थान सरकार ने इस सामाजिक बुराई को रोकने के लिए ‘अबै घूंघट नी’ नाम की एक मुहिम चलाई थी, पर करणी सेना ने इस का विरोध कर दिया.

करणी सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुखदेव सिंह गोगामड़ी ने इस मुद्दे पर अपनी राय रखते हुए कहा, ‘घूंघट एक प्रथा है. हम महिलाओं से जबरदस्ती नहीं करवाते हैं. वे सिर्फ आंखों की शर्म के लिए घूंघट लगाती हैं. जेठ, ससुर जहां होते हैं, वहां पर महिलाएं घूंघट करती हैं. इस घूंघट और हमारी संस्कृति को देखने के लिए विदेशी पर्यटक दूरदूर से आते हैं.’

इतना ही नहीं, सुखदेव सिंह गोगामड़ी ने आगे कहा, ‘अशोक गहलोत को परदा हटाना है, तो पहले मुसलिम महिलाओं का बुरका हटाओ. घूंघट लगा कर आज तक एक भी वारदात नहीं  हुई है, जबकि बुरका पहन कर तो आतंकवादी गतिविधियां हुई हैं.’

घूंघट मामले पर राजपूत सभा के अध्यक्ष गिर्राज सिंह लोटवाडा का कहना है कि यह निजी सोच का मसला है. घूंघट को ले कर समाज में किसी तरह की अनिवार्यता नहीं है. सरकार अगर इसे ले कर अभियान चलाती है तो चलाए, लेकिन अभी ऐसे अभियानों से ज्यादा जरूरत दूसरे कई विषयों की है, जिन पर सरकार को ध्यान देना चाहिए, जिन में से बड़ी बात शिक्षा और रोजगार की है.

जब प्रदेश के रसूखदार लोगों की घूंघट पर ऐसी राय है, तो गांवदेहात के उन लोगों का क्या कहा जाए, जो औरत को पैर की जूती सम?ाते हैं.

प्रदीप यादव ऐसे ही लोगों की भीड़ का हिस्सा हैं, जो पत्नी को अपने इशारों पर चलाने को ही मर्दानगी सम?ाते हैं. उस की पत्नी ने गलती से परदा नहीं किया तो उस ने घर में बवाल मचा दिया. यहां तक कि अपनी बेटी को ही मार डाला.

उस की कहीं यह सोच तो नहीं थी कि बेटी ही तो है, मामला गरम है तो इसे ही बलि का बकरा बना दो. पहले पढ़ाईलिखाई और बाद में शादी का खर्च कम हो जाएगा. 2 में से एक बेटी कम हो जाएगी. राजस्थान में बेटी पैदा होना भी मर्दानगी पर धब्बा माना जाता है. क्यों?

Manohar Kahaniya: खोखले निकले मोहब्बत के वादे- भाग 4

सौजन्य- मनोहर कहानियां

गीता के परिजनों ने पुलिस को बताया था कि उस का पति मनोरंजन तिवारी उस के साथ लड़ाईझगड़ा करता था, इसलिए उन की बेटी डेढ़ साल से उस से अलग रह रही थी और खुद कमा कर अपना पेट पालती थी.

परिवार वालों ने यह भी बताया था कि मनोरंजन ने गीता को कई बार धमकी दी थी. गीता की हत्या के बाद जिस तरह मनोरंजन अपना घर व दुकान छोड़ कर भाग गया था, उस से साफ था कि गीता की हत्या में उसी का हाथ है.

लिहाजा पुलिस ने उस के फोन को सर्विलांस पर लगा दिया. लेकिन उस का फोन स्विच्ड औफ हो चुका था.

काफी मशक्कत के बाद पुलिस को मनोरंजन तिवारी के ओडिशा स्थित घर का पता मिल गया. पुलिस की एक टीम वहां पहुंची तो पता चला कि वह अपने घर भी नहीं पहुंचा था. तब निराश हो कर पुलिस टीम ओडिशा से वापस लौट आई.

इस के बाद पुलिस ने काफी दिनों तक तिवारी को इधरउधर तलाश किया, लेकिन वह कहीं नहीं मिला. आखिर पुलिस ने उस के खिलाफ अदालत से कुर्की वारंट हासिल कर उस के ओडिशा स्थित घर की कुर्की कर ली.

बाद में पुलिस ने अदालत में प्रार्थना पत्र दे कर उसे भगौड़ा घोषित कर दिया. पुलिस ने पहले उस की गिरफ्तारी पर 25 हजार रुपए का ईनाम घोषित किया. बाद में 2 साल बाद ईनाम की धनराशि 50 हजार रुपए कर दी.

पुलिस दल ने 2-3 बार मनोरंजन की तलाश में ओडिशा में छापे मारे, लेकिन वह कभी भी पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ा. वक्त तेजी से गुजरता रहा.

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इंदिरापुरम थाने में एक के बाद एक कई थानाप्रभारी बदल गए. हर अधिकारी आने के बाद गीता हत्याकांड के फरार आरोपी

मनोरंजन की फाइल देखता, एक नई पुलिस टीम का गठन होता और फिर उस की फाइल धूल फांकने लगती. इसी तरह 9 साल बीत गए.

जुलाई 2021 में इंदिरापुरम सर्किल में सीओ अभय कुमार मिश्रा और इंदिरापुरम थानाप्रभारी के रूप में इंसपेक्टर संजय पांडे की नियुक्ति हुई. दोनों ही अधिकारियों को पुराने मामलों को सुलझाने में महारथ हासिल थी.

उन्होंने जब गीता हत्याकांड की फाइल देखी तो उन्होंने इस बार फाइल को अलमारी में रखने की जगह इस मामले को चुनौती के रूप में ले कर फरार मनोरंजन तिवारी को गिरफ्तार करने की रणनीति बनाई.

दरअसल, सीओ अभय कुमार मिश्रा के एक परिचित अधिकारी जगतसिंहपुर जिले में तैनात हैं, जहां का मनोरंजन तिवारी मूल निवासी है.

अभय मिश्रा को अपराधियों के मनोविज्ञान से इतना तो समझ में आ रहा था कि इतना लंबा वक्त बीत जाने के बाद हो न हो, मनोरंजन तिवारी को अपने परिवार के साथ जरूर कुछ संपर्क होगा.

भले ही वह उन के साथ नहीं रहता हो, मगर उन से संपर्क जरूर करता होगा. अगर थोड़ा सा प्रयास किया जाए तो वह पकड़ में जरूर आ सकता है. लिहाजा अभय कुमार मिश्रा ने ओडिशा के जगतसिंहपुर में तैनात अपने परिचित अधिकारी को गीता हत्याकांड की सारी जानकारी दे कर मनोरंजन को गिरफ्तार कराने में मदद मांगी.

संबधित अधिकारी ने स्थानीय स्तर पर अपनी पुलिस को मनोरंजन तिवारी के गांव अछिंदा में घर के आसपास सादे लिबास में तैनात कर दिया.

वहां तैनात पुलिस टीम को पता चला कि पास के गांव में एक मंदिर का पुरोहित, जिस का नाम मनोज है, वह अकसर मनोरंजन तिवारी के घर आताजाता रहता है. लेकिन चेहरे मोहरे व हुलिए से वह एकदम मनोरंजन तिवारी जैसा है. जगतसिंहपुर पुलिस ने जब यह बात इंदिरापुरम सीओ अभय कुमार मिश्रा को बताई तो वे समझ गए कि हो न हो मनोरंजन तिवारी अपने गांव के आसापास ही कहीं वेशभूषा बदलकर रह रहा है.

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पुलिस ने 9 साल बाद ढूंढ निकाला मनोरंजन को अभय मिश्रा ने इंदिरापुरम थानाप्रभारी संजय पांडे को तत्काल एक टीम गठित कर ओडिशा रवाना करने का आदेश दिया. आदेश मिलते ही इंसपेक्टर संजय पांडे ने अभयखंड चौकीप्रभारी एसआई भुवनचंद शर्मा, नरेश सिंह और कांस्टेबल अमित कुमार की टीम गठित की.

टीम को आवश्यक दिशानिर्देश दे कर ओडिशा रवाना कर दिया गया, जहां पुलिस टीम ने जगतसिंहपुर में स्थानीय बालिंदा थाने की पुलिस से संपर्क साधा. सीओ अभय मिश्रा के परिचित अधिकारी के निर्देश पर स्थानीय पुलिस पहले ही मनोज पुरोहित के बारे में तमाम जानकारी जुटा चुकी थी.

25 जुलाई, 2021 को इंदिरापुरम थाने से गई पुलिस टीम ने बालिंदा थाने की पुलिस टीम की मदद से मनोरंजन तिवारी को दबोच लिया. वह मनोज तिवारी के नाम से मंदिर का पुरोहित बन कर रह रहा था और वेषभूषा बदलने के लिए उस ने दाढ़ी तक बढ़ा ली थी.

लेकिन जब उस ने अपने मातापिता के घर आनाजाना शुरू कर दिया तो लोगों को उस पर शक हो गया. हालांकि जब पुलिस टीम ने उसे पकड़ा तो उस ने पुलिस को बरगलाने का प्रयास किया. लेकिन थोड़ी सी सख्ती के बाद ही उस ने कबूल कर लिया कि वही मनोरंजन तिवारी उर्फ मनोज तिवारी है. आवश्यक लिखापढ़ी व कानूनी काररवाई के बाद पुलिस टीम अगले दिन गीता हत्याकांड के 9 साल से फरार चल रहे आरोपी मनोरंजन को गिरफ्तार कर गाजियाबाद ले आई.

इंसपेक्टर संजय पांडे और सीओ अभय कुमार मिश्रा के अलावा एसपी (सिटी हिंडन पार) के सामने मनोरंजन तिवारी ने कबूल किया कि उसी ने सोचसमझ कर गीता की हत्या की थी.

तिवारी ने बताया कि 2011 में उस के साथ विवाद के बाद जब गीता अलग हो कर किराए का कमरा ले कर रहने लगी और कहीं नौकरी करने लगी तो उस के संबंध सचिन यादव नाम के एक ठेकेदार से हो गए थे. जब उसे इस बात की खबर लगी तो वह मन मसोस कर रह गया.

भले ही गीता से उस का झगड़ा हो गया था और वह अलग रहता था लेकिन इस के बावजूद भी वह उस से मोहब्बत करता था. यह बात उसे मंजूर नहीं थी कि बिना तलाक लिए गीता किसी गैरमर्द के बिस्तर की शोभा बने.

मनोरंजन अकसर गीता पर नजर रखने लगा. उस ने गीता को एकदो बार समझाया भी कि अगर वह किसी गैर के साथ संबध रखेगी तो वह उस की जान ले लेगा. लेकिन गीता ने उस की बात को हंसी में उड़ा दिया. उस ने उलटा मनोरंजन को धमकी दी कि अगर वह उस के रास्ते में आएगा तो सचिन उसी का काम तमाम कर देगा.

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मनोरंजन समझ गया कि गीता पर गैरमर्द से आशिकी का भूत सवार हो चुका है. वह जानता था कि यादव बिरादरी के जिस शख्स से इन दिनों गीता की आशिकी चल रही है, वह न सिर्फ स्थानीय है बल्कि ऐसे लोगों के लिए खून कराना कोई बड़ी बात नहीं.

मनोरंजन की सचिन यादव से तो कोई दुश्मनी नहीं थी. इसलिए मनोरंजन ने तय कर लिया कि इस से पहले कि गीता अपने आशिक से कह कर उस पर वार कराए, वह उसी का काम तमाम कर देगा. मनोरंजन ने साजिश रची. गीता की हत्या के बाद गाजियाबाद से फौरन भागने की उस ने पूरी प्लानिंग बना ली.

29 सितंबर, 2012 की शाम को गीता जब अपने काम से घर लौट रही थी. मनोरंजन ने उसे रोक लिया और गोली मार दी. गोली गीता को ऐसी जगह लगी थी कि उस की मौके पर ही मौत हो गई. इत्मीनान होने के बाद मनोरंजन मौके से फरार हो गया.

गीता की हत्या करने के फौरन बाद उस ने अपने परिवार वालों को इस बात की सूचना दे दी थी और उन्हें सतर्क कर दिया था कि पुलिस अगर उन तक पहुंचे तो वे उसके बारे में अंजान बने रहें.

कई महीनों तक इधरउधर रहने के बाद पुलिस की गतिविधियां जब शांत हो गईं तो वह एक रात अपने परिवार वालों से जा कर मिला. उस ने उन्हें बता दिया कि अब वह पड़ोस के ही गांव के मंदिर में नाम व वेशभूषा बदल कर पुरोहित के रूप में रहेगा और उन से अकसर मिलता रहेगा.

कहते हैं कि अपराधी कितना भी चालाक क्यों न हो, कानून व पुलिस के हाथ एक दिन उस की गरदन तक पहुंच ही जाते हैं चाहे वह सात समंदर पार जा कर छिप जाए.

मनोरंजन तिवारी को इस बात का भ्रम था कि ओडिशा गाजियाबाद से इतनी दूर है कि 9 साल बीत जाने पर पुलिस बारबार उस की तलाश में न तो उस के गांव आएगी और न ही इतनी बारीकी से तहकीकात करेगी.

लेकिन यह उस की भूल साबित हुई. क्योंकि पुलिस चाहे किसी भी प्रदेश की हो, लेकिन कानून के गुनहगार को पकड़ने के लिए प्रदेश की दूरियां मिनटों में खत्म हो जाती हैं.

—कथा पुलिस की जांच, अभियुक्त से पूछताछ व परिजनों से मिली जानकारी पर आधारित

Manohar Kahaniya: बच्चा चोर गैंग- भाग 2

सौजन्य- मनोहर कहानियां

रेखा ने घटना के बारे में आगे बताया,  ‘‘उन्होंने मेरी एक नहीं सुनी. तीनों मेरे पति को पकड़ कर ले जाने लगे. मैं रोती रही, विनती करती रही. नहीं माने, तब चीखपुकार करने लगी. राह चलते लोगों ने रुक कर मेरे पति को उन के चंगुल से छुड़ाया. फिर वे धमकी देते हुए अपनी कार से चले गए.’’

रेखा की बातों पर हुआ शक

इस के साथ ही रेखा ने थानाप्रभारी को बच्चे के गायब होने की भी कहानी सुनाई, ‘‘बाबूजी, इलाके में बच्चा चोरी की घटना पहले भी हुई है. इसलिए मैं वैसी ही अनहोनी की आशंका से डरी हुई थी. नींद आंखों से कोसों दूर थी. परिवार के सभी लोग सो गए थे. मुझे याद है कि अजान की आवाज आई. उस समय तक मैं जाग रही थी.

‘‘सुबह के 4 बजे होंगे. उस के कुछ देर बाद ही मेरी आंख लग गई. सुबह करीब 6 बजे आंख खुली तब मेरी बगल में सो रही 2 साल शिवानी गायब थी. यह देख कर मेरे होश उड़ गए.’’

‘‘फिर क्या हुआ?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘फिर क्या साहब, मैं ने झटपट पति को जगाया. वहीं जेठ लीलाधर और परिवार के दूसरे लोगों को आवाज दी. सभी बच्चे की खोज में जुट गए. घंटों तलाश करने के बाद भी बच्ची का कोई सुराग नहीं लगा. उसी दिन मैं अपने मरद के साथ आप के पास शिकायत लिखवाने आई थी. आप ने बच्चा खोजने का भरोसा दिया था और मैं अपने काम पर लग गई.’’ रेखा ने बताया.

साथ ही उस ने सवाल किया कि यदि मेरे लापता बच्चे के बारे में कोई जानकारी मिली हो तो बताइए साहब.

‘‘तुम्हारा चोरी बच्चा लड़का था या लड़की?’’ विनोद कुमार ने अचानक बात बदलते हुए पूछ दिया.

‘‘लड़का था साहब.’’ रेखा तपाक से बोल पड़ी.

यह सुन कर विनोद कुमार मुसकराते हुए बोले, ‘‘…लेकिन अभी थोड़ी देर पहले तुम ने बताया कि गायब बच्चा शिवानी है. वह लड़का है या लड़की?’’

यह सुनते ही रेखा सकपका गई. एकदम चुप हो गई. मुंह से कोई आवाज नहीं निकल रही थी.

‘‘अच्छा छोड़ो इस बात को, ये बताओ कि जिन से तुम्हारे पति का झगड़ा हुआ, उन्हें पहले से तुम जानती थी या राजा उसे जानता था?’’ थानाप्रभारी ने फिर बात बदल दी.

‘‘रेखा इस सवाल का भी कोई स्पष्ट जवाब नहीं दे पाई. कभी उस ने कहा कि उन्हें उस ने पहली बार देखा था. कभी उस ने कहा कि वे राजा के पास पहले भी कई बार आ चुके थे.’’

थानाप्रभारी के सवालों और बातों में उलझी रेखा ने जो भी बताया अकबकाहट में कहा. उस की बातों से साफ पता नहीं चल पाया कि उस रोज आखिर तीनों युवकों का राजा के साथ झगड़ा किस बात को ले कर हुआ था. वे सभी राजा पर इतने आक्रामक क्यों बन गए थे. थानाप्रभारी विनोद कुमार को इतना जरूर अंदाजा लग गया कि रेखा बहुत कुछ छिपा रही है या फिर उस की जानकारी आधीअधूरी है. उन्होंने सहज भाव से कहा, ‘‘रेखा, देखो, घबराने की कोई बात नहीं है. तुम्हारा बच्चा जल्द मिल जाएगा. उसे चुराने वाले का पता चल चुका है.  कल अपने पति राजा के साथ दिन में ठीक 11 बजे आ जाना.’’

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इसी के साथ थानाप्रभारी ने चेतावनी भी दी कि वह अपने घर से कहीं न जाए. अगर उस ने ऐसा किया तो उस की खैर नहीं है, क्योंकि उस पर पुलिस के आदमी सादे कपड़ों में नजर रखे हुए हैं.

अगले दिन 26 जुलाई, 2021 को पुलिस द्वारा तय समय पर रेखा और राजा थाने में आ गए. संयोग से तब तक थानाप्रभारी विनोद नहीं आए थे. दोनों को एक सिपाही ने वहीं इंतजार करने को कहा.

थानाप्रभारी विनोद कुमार के आने में डेढ़ घंटे की देरी हो गई थी. पुलिस पेट्रोलिंग गाड़ी से थानाप्रभारी विनोद उतरे. उन के साथ 2 कांस्टेबल 3 युवकों को पकड़े हुए थे. उन की कमर में रस्सियां एक साथ बंधी हुई थी.

दोनों कांस्टेबल रस्सी के दोनों छोर को मजबूती से हाथ में लपेटे हुए थे. युवकों के चेहरे गमछे से बंधे हुए थे. उन्हें खींच कर थाने के भीतर लाया गया. यह सब रेखा और राजा गौर से देख रहे थे.रेखा पर जैसे ही थानाप्रभारी की नजर पड़ी उस ने हाथ जोड़ कर नमस्ते किया. साथसाथ राजा ने भी वैसा ही किया. थानाप्रभारी कोई जवाब दिए बगैर अपने केबिन में चले गए. उन के पीछेपीछे कांस्टेबल रस्सी में बंधे तीनों युवकों को भी खींचते हुए ले गया.

एक थप्पड़ ने खोला राज थोड़ी देर में विनोद कुमार ने रेखा को बुलाया. राजा को बाहर ही रुकने को कहा. थानाप्रभारी ने रेखा की ओर गुस्से से देखते हुए कहा, ‘‘राजा तुम्हारा कौन है?’’

‘‘क्या पूछ रहे हैं साब, राजा मेरा मरद है.’’ रेखा का यह बोलना था कि वहीं पास खड़ी एक लेडी कांस्टेबल ने रेखा के गाल पर जोरदार थप्पड़ मारा. थप्पड़ खाते ही वह गिर पड़ी, उठते ही उस महिला सिपाही को गुर्रा कर देखा. तभी विनोद कुमार बोल पड़े, ‘‘उसे मत देखो, वह हमारी पुलिस है और मेडल जीतने वाली महिला पहलवान भी है. तुम सचसच बताती हो या और थप्पड़ खाने हैं.’’

‘‘क्या सच बताऊं साहब, राजा ही तो मेरा मरद है. मैं ने अपने बच्चा चोरी की शिकायत लिखाई है.’’ रेखा बिफरती हुई बोली.

इतना कहना था कि विनोद ने पास खड़े एक युवक के चेहरे पर लिपटा गमछा एक झटके में हटा दिया. चीखते हुए बोले, ‘‘तो फिर ये कौन है?’’

युवक का चेहरा देखते ही रेखा के चेहरे का रंग फीका पड़ गया. विनोद बोले, ‘‘बच्चा चोरी की घटना के दिन राजा के साथ झगड़ा इसी के साथ हुआ था न.’’

रेखा को काटो तो खून नहीं. वह हां…ना कुछ बोल नहीं पा रही थी. विनोद ने बाहर बैठे राजा को बुलवाया. उस से पूछा, ‘‘तुम्हारा चोरी हुआ बच्चा लड़का था या लड़की?’’

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‘‘लड़का, उस दिन शिकायत में लिखवाया तो था.’’ राजा बोला.

‘‘लेकिन, रेखा तो कहती है तुम्हारे घर से शिवानी गायब हुई थी,’’ विनोद बोले.

‘‘उसे क्या पता साहब,’’ राजा का यह कहना था कि थानाप्रभारी ने उसे भी एक थप्पड़ मारते हुए कहा, ‘‘उसे कैसे मालूम होगा, वह तुम्हारी बीवी जो नहीं है.’’

थानाप्रभारी विनोद कुमार राजा और रेखा से मुखातिब हुए. उन्होंने कहा, ‘‘तुम लोग अब आंखों में धूल झोंकना बंद करो. न तो तुम्हारा कोई बच्चा गायब हुआ है और न ही तुम दोनों पतिपत्नी हो. उलटे तुम लोगों ने बच्चा चुरा कर कहीं और बेचने की कोशिश की है.’’

अगले भाग में पढ़ें-  सभी आरोपी धर दबोचे

Crime: माशुका के खातिर!

अपराध का एक कारण प्रेम और प्रेमिका भी होता है. आमतौर पर देखा जाता है कि समाज में घटित होने वाले अनेक छोटे या फिर गंभीर अपराध तक आलम सिर्फ और सिर्फ माशुका ही होती है. इसके खातिर जाने कितने तरह के छोटे बड़े अपराध समाज में घटित होते रहते हैं, आज हम इस आलेख में आपको कुछ ऐसे अपराधों के संबंध में बताएंगे जो समाज को सचेत करते हैं ताकि ऐसे अपराधिक धुरी से बच सकें.
पहला मामला- माशुका ने बातों बातों में ज्वेलरी की भूमिका बांधी तो श्याम ने दूसरी रात को एक ज्वेलरी दुकान में घुसकर चोरी की और सोने के के बाद माशूका को ला कर दिए मगर दूसरे ही दिन पुलिस ने उसे धर दबोचा.
दूसरा मामला-प्रेमिका ने प्रेमी से रुपयों की मांग की तू प्रेमी अपने एक दोस्त के साथ एटीएम मशीन को तोड़ने पहुंच गया और रंगे हाथ पुलिस के द्वारा पकड़ लिया गया.
तीसरा मामला-फिल्मी गाने जब तेरी से दवाई स्कीम की क्या तुम्हारे पास कभी कोई चार पहिया वाहन होगा जिसमें हम घूमेंगे तो फिर मिलने चार पहिया वाहन पार कर दिया और पकड़ा गया.
ऐसे जाने कितने मामले हमारे आसपास घटित हो रहे हैं जो यह बताते हैं कि प्रेमी प्रेमिका के लिए या फिर प्रेमिका प्रेमी के लिए क्या कुछ कर  जाते हैं मगर अपराध तो अपराध होता है जिसका परिणाम होता है सजा ही होती है.
भूमिका के लिए कार पार कर दी!

इसे आप कोई फिल्मी कहानी समझें मगर यह सच है कि माशूका को लुभाने के लिए आशिक ने दुस्साहसिक कदम उठा लिया और यही कदम उसके जीवन की सबसे बड़ी भूल बन गया. दरअसल, माशुका‌ ने बातों बातों  में  प्रेमी से लांग ड्राइव पर चलने के लिए कहा तो फटे हाल प्रेमी ने एक अदद कार ही चुरा ली. और जब वह प्रेमिका को लेकर लांग ड्राइव पर निकला तो प्रेमी-प्रेमिका पुलिस द्वारा धर दबोचे गए . पुलिस ने प्रेमी के साथ उसके एक मददगार दोस्त को गिरफ्तार कर सलाखों के पीछे पहुंचा दिया है.
एक सच्ची कहानी है इसका नायक है राहुल नामक युवक जिसने अपनी माशूका को घुमाने के लिए फतेहपुर से कार चुराई थी. लेकिन उसने एक बेवकूफी कर दी की कार का नंबर नहीं बदला. उधर, फतेहपुर में कार मालिक ने पुलिस में शिकायत कर दी. इधर पुलिस सक्रिय हो गई. जब कार चुराने का आरोपी राहुल अपनी प्रेमिका और एक दोस्त के साथ चकेरी की तरफ घुमने जा रहा था‌ उन्हें हाईवे पर पुलिस ने कार का नंबर देखकर  रोका. चेकिंग के दौरान युवक पकड़ लिया गया. गिरफ्तारी के वक्त कार में प्रेमिका और उसका एक दोस्त भी मौजूद था.

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समझदारी के साथ सावधानी भी जरूरी

यह कहा जा सकता है कि आज पुलिस और न्यायालय में इस तरह के अनेक मुआमलें आ रहे हैं जो समाचार पत्रों में सुर्खियां भी बटोरते हैं  मगर इसका हल क्या हो इस दिशा में कोई प्रयास नहीं किया जाता.
इस रिपोर्ट के माध्यम से हम युवा पीढ़ी को यह संदेश दे रहे हैं की प्रेम में आप इतना मत डूब जाइए कि कानून को अपने हाथ में ले लें और अपने भविष्य को बर्बाद कर लें. क्योंकि यह उम्र कुछ ऐसी होती है जब आदमी को जीवन की सच्चाई का आभास नहीं होता कानून का ज्ञान नहीं होता और वह अपराध कर बैठता है.

मगर जब पुलिस द्वारा धर दबोचा जाता है तो आरोपी युवक की आंखें खुलती है और प्रेमिका भी पछताती है कि मैंने क्यों ऐसी चीज मांग ली जो उसके प्रिय के बस में नहीं थी. कुल मिलाकर  समझदारी दोनों पक्षों के लिए आवश्यक है.

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विधि विद्वान अधिवक्ता डॉ उत्पल अग्रवाल के मुताबिक हाल ही में एक प्रकरण मेरे पास भी ऐसा ही आया था जिसमें प्रेमी के लिए प्रेमिका ने अपने घर के जेवरात और रुपए चुरा लिए थे और मामला पुलिस से होते हुए न्यायालय पहुंचा था. दरअसल, ऐसे मामले युवावस्था में प्रेम की झोंके में घटित हो जाते हैं जो स्वयं को सिर्फ अपमानित कराते हैं. समझदारी का तकाजा यही है कि युवा प्रेम के भंवर में फंस करके कभी भी कानून को अपने हाथों में ना लें.

दूसरा विवाह- भाग 2: क्या सोनाक्षी से विशाल प्यार करता था?

अकसर औरतों को कपड़ेगहनों का शौक होता है. अलमारी अटी पड़ी होती है कपड़ों से उन की, लेकिन लीना की अलमारी किताबों से अटी पड़ी है. एक भूख है उसे पढ़ने की. एक दिन भी न पढे़, तो खालीखाली सा लगता है उसे, और विशाल के साथ भी ऐसा ही है. कितना भी बिजी क्यों न हो अपनी लाइफ में, रोज थोड़ाबहुत पढ़ना नहीं भूलता वह. रहा ही नहीं जाता बिना पढ़े उसे. जिंदगी सार्थक लगती है उसे पढ़ने से, वरना तो इंसान के जीवन में भागमभाग लगी ही रहती है.

लेकिन लीना दोनों के बीच कबाब में हड्डी नहीं बनना चाहती थी. इसलिए ‘घर में बहुत काम है,’ का बहाना कर जाने से मना कर दिया. लेकिन विशाल तो जिद पर अड़ गया कि उसे भी उन के साथ बुकफेयर चलना ही पड़ेगा. हार कर लीना को उन के साथ जाना पड़ा.

बुकफेयर में जहां लीना और विशाल किताबें देखने में व्यस्त थे, वहीं सोनाक्षी बस आतेजाते लोगों को निहारने और मोबाइल में व्यस्त दिख रही थी. उस के चेहरे से लग रहा था उसे यहां आ कर जरा भी अच्छा नहीं लगा. वह तो कहीं घूमने या फिल्म देखने की सोच रही थी, मगर विशाल उसे यहां खींच लाया.  इशारों से कहा भी उस ने कि चलो अब यहां से, बोर हो रही हूं, तो विशाल ने भी इशारों से कहा कि ‘अभी रुकेगा वह यहां, चाहे तो वह जा सकती है घर.

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क्या करती वह, एक तरफ बैठ गई और अपना मोबाइल चलाने लगी. गुस्सा भी आ रहा था उसे कि यहां आई ही क्यों? घर में ही रहती इस से अच्छा. भले ही सोनाक्षी और विशाल एकदूसरे को 2 सालों से जानते थे, पर उन की एक भी आदत ऐसी नहीं थी जो आपस में मेल खाती हो. इसलिए अकसर दोनों में अपनेअपने मत को ले कर टकराव होता. और फिर हारने को दोनों में से कोई तैयार नहीं होता.

वहीं, विशाल को लीना का साथ इसलिए भी अच्छा लगता था क्योंकि दोनों की बहुत सी आदतें मिलतीजुलती थीं. बातविचारों में भी वह बहुत शालीन थी. उस से बातें कर विशाल को मानसिक स्फूर्ति मिलती थी. जिस तरह से वह बोलती थी न, लगता जैसे उस की बातों से शहद टपक रहा हो. उस के रूप, रस और गंध में विशाल ऐसे खो जाता कि उसे कुछ होश ही नहीं रहता था. जब सोनाक्षी टोकती, उसे तब होश आता कि कहां है वह और किसी सोच मे डूबा था.

लीना को भी विशाल से बातें करना अच्छा लगता था. पता नहीं क्यों, पर उसे देखते ही लीना के चेहरे पर मुसकान तैर जाती. उन की दोस्ती तो किताबों से शुरू हुई थी. अकसर दोनों एकदूसरे को अपनीअपनी किताबें लेतेदेते रहते थे. पढ़ना दोनों को बहुत अच्छा लगता था. लेकिन वहीं सोनाक्षी किताबों से कोसों दूर भागती. जब विशाल कहता कि किताबें पढ़ कर देखो कभी, ज्ञान का खजाना छिपा है उन में. तब मुंह बनाती सोनाक्षी कहती कि नहीं, उसे इन किताबोंउताबों में कोई दिलचस्पी नहीं है.  उसे तो, बस, विशाल में दिलचस्पी है. और उस की बात पर विशाल मुसकरा पड़ता था.

सोनाक्षी का किताबों से दूरदूर तक कोई नातारिश्ता नहीं था. आश्चर्य होता उसे कि कैसे कोई इतनी मोटीमोटी किताबें हफ्तेदस  दिन में खत्म कर सकता है? वह तो सालों तक भी एक किताब खत्म नहीं कर पाएगी.

उसे तो फिल्में देखना, घूमना, होटलों में भोजन करना पसंद है. जिंदगी में मौजमस्ती होती रहे, बस, और कुछ नहीं चाहिए उसे. इसलिए तो कभीकभी विशाल के साथ भी वह बोर होने लगती थी क्योंकि उस के साथ होते हुए भी वह किताबों में खोया रहता था. गुस्से में कह भी देती, ‘किताबों से ही क्यों नहीं बातें करते? उसे ही अपना दोस्त बना लो न.’ तो हंसते हुए विशाल कहता कि वह तो अभी कुछ साल पहले उस की दोस्त बनी है. लेकिन ये किताबें तो बचपन से उस की साथी हैं, जो आजीवन उस की दोस्त रहेंगी.’

लेकिन, अब एक और दोस्त मिल गई है उसे लीना के रूप में. बिलकुल उस की तरह ही सोच रखने वाली. जब भी दोनों बातें करने लगते, सोनाक्षी तुनक कर वहां से उठ कर चल देती और कहती कि उन की बातों का मुद्दा सिर्फ किताबें और पढ़ाई ही क्यों होता है, कुछ और क्यों नहीं होता? और उस की बात पर दोनों हंस पड़ते.

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‘‘हंसो मत यार, सही कह रही हूं. और कोई बात नहीं सू झती क्या तुम दोनों को? जब देखो किताबें, देशदुनिया और राजनीति पर बातें करते रहते हो. अरे भई, कुछ इंट्रैस्ंिटग बातें भी कर लिया करो कभी. मैं तो स्कूलकालेज की ही किताबें पढ़पढ़ कर इतनी ऊब चुकी थी कि सोचती कब पीछा छूटे इन से और मैं चैन की सांस लूं,’’ हंसती हुई सोनाक्षी अपने बचपन की बातें याद कर कहती, ‘‘तुम्हें पता है विशाल, बचपन में मेरा स्कूल से भागने का रिकौर्ड था.

‘‘घर से मेरा स्कूल कुछ दूरी पर ही था. पापा मु झे स्कूल छोड़ कर जैसे ही जाते, मैं पीछेपीछे घर पहुंच जाती. यह रोज का किस्सा बन गया था. परेशान थे मांपापा मु झे ले कर. डर लगता उन्हें कि कहीं रास्ते में कोई गाड़ी ठोकर न मार दे मु झे या कोई उठा कर ही ले भागा, तो फिर क्या करेंगे वे. और स्कूल से भागना क्या अच्छी बात है? इसलिए एक बार पापा ने टीचर को ही डांट पिला दी कि बच्चा उन के स्कूल से भाग जाता है, क्या उन्हें पता नहीं चलता? अगर बच्चे को कुछ हो गया तो कौन जिम्मेदार होगा फिर?

‘‘फिर क्या था, टीचर ने उस रोज मु झे रस्सी से बांध दिया ताकि मैं स्कूल से भाग न सकूं. लेकिन मैं ने रोनाचिल्लाना इतना मचाया कि उन्हें मु झे खोलना ही पड़ा. लेकिन प्रिंसिपल ने भी कह दिया कि स्कूल में अब मेरे लिए कोई जगह नहीं है. ऐसे बच्चे को वह अपने स्कूल में नहीं पढ़ा सकते. बहुत खुश थी मैं कि स्कूल और किताबों से मेरा पाला छूटा. लेकिन पापा ने जो मार मारी न उस रोज, आह, आज भी कांप उठती हूं याद कर के.

‘‘उस दिन के बाद से मैं स्कूल से कभी नहीं भागी, लेकिन किताबों के प्रति मेरी नफरत बरकरार रही. वह तो पापा के डर के कारण इंजीनियरिंग की पढ़ाई करनी पड़ी, वरना तो पढ़ाई मु झे सजा से कोई कम नहीं लगती है आज भी,’’ सोनाक्षी बोली.

‘‘कैसी बातें कहती हो तुम सोनाक्षी?’’ पढ़ना क्या सजा होता है? अरे, किताबों में तो ज्ञान का भंडार छिपा है. मैं तो किताब पढ़ने के अलावा और कुछ सोच ही नहीं सकता. सोने से पहले रोज जब तक थोड़ा पढ़ न लूं, नींद नहीं आती’’ विशाल की बात पर लीना ने भी सहमति जताई और कहा कि उसे भी बिना पढे़ नींद नहीं आती. काम से फुरसत मिलते ही वह किताब ले कर बैठ जाती है. मजा आता है उसे पढ़ने में.

ए क सुर में दोनों को बोलते देख सोनाक्षी हंस पड़ी और एक लंबी

सांस छोड़ती हुई बोली, ‘‘हूं, मु झे लगता है तुम दोनों की जोड़ी खूब जमेगी, क्योंकि एकजैसे जो हो तुम दोनों.’’

उस की बातों पर दोनों एकदूसरे को देखने लगे और आंखों ही आंखों में जो बातें हुईं, ये तो उन्हें ही पता था. कहते हैं, आंखें दिल के  झरोखे सी होती हैं.  झरोखे बंद भी हो सकते हैं, पर होंठों की कोर एक ऐसा सूचक है जो कभी चुकता नहीं.

विशाल अपलक अब भी लीना को वैसे ही निहार रहा था. कुछ क्षणों की वह तंद्रा लीना को मानो उस कमरे से दूर अलग कहीं ले गई थी जहां होंठों के कोरों का कसाव, बिना तनिक कांपे भी, जैसे अनजाने कुछ नरम पड़ गया था. मुंह के आसपास की असंख्य शिराओं का अदृश्य तनाव कुछ ढीला हो गया था और जीवन का अदम्य लचीलापन जैसे फिर उभर कर एक स्निग्ध लहर बन गया था. ऐसा पहले भी कई बार हुआ जब किताबें लेतेदेते दोनों का हाथ आपस में स्पर्श कर जाता तो उन की आंखें बातें करने लगती थीं.

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सोनाक्षी ने उसे  झक झोरा तो पाया कि वह कहीं खो गया था. लेकिन लक्ष्य किया उस ने कि उस के चेहरे के हावभाव को कोई पढ़ नहीं पाया. नास्तिकों की भीड़ में जैसे कोई भक्त अनदेखे क्षणभर आंख बंद कर अपने आराध्य का ध्यान कर लेता है, वैसे ही विशाल कहीं पर भी हो या किसी के साथ हो, अपनी लीना को मन की आंखों से देख ही लेता था.

लेकिन फिर भी लीना विशाल को सिर्फ एक अच्छा दोस्त सम झती थी. उस के दिल में कुछ भी नहीं था उसे ले कर. वह तो आज भी अपने दिल में सूरज को बसाए हुए थी, जो अब इस दुनिया में नहीं है. 4 वर्षों पहले लीना और सूरज विवाह बंधन में बंधे थे. हंसतेमुसकराते शादी के 2 साल कैसे गुजर गए, उन्हें पता ही नहीं चला. लेकिन एक दिन सूरज की मौत की खबर ने लीना को तोड़ कर रख दिया. एक तसल्ली थी कि उस का सूरज देश के लिए शहीद हुआ है. गर्व था उसे अपने पति पर.

सूरज फौज में था. अपनी बेटी को विधवा के रूप में देख कर लीना की मां ने तो खटिया ही पकड़ ली और उस के पापा गुमसुम से हो गए. लेकिन वे चाहते थे कि उन के जीतेजी बेटी का घर फिर से बस जाए क्योंकि जिंदगी इतनी छोटी भी नहीं होती कि बगैर किसी सहारे के जिया जा सके और वे कब तक बेटी के साथ रह पाएंगे. आज न कल, वे भी अपनी आंखें मूंद ही लेंगे, फिर क्या होगा लीना का?

सूरज के मांपापा भी बहू को बंधन में बांध कर नहीं रखना चाहते थे और अब जब बेटा ही नहीं रहा उन का, फिर बहू को वे किस अधिकार से अपने पास रख सकते थे? लेकिन लीना दूसरे विवाह को हरगिज तैयार न थी क्योंकि सूरज अब भी उस का प्यार था, उस का पति था. लीना वह स्थान किसी और को नहीं देना चाहती थी. उस के लिए तो अब यही घर उस का अपना घर था और सूरज के मांपापा उस की जिम्मेदारी.

याद है उसे, जब भी सूरज का खत या फोन आता, एक बात तो वह जरूरत कहता था, ‘लीना, मेरे मांपापा अब तुम्हारी जिम्मेदारी हैं, उन का ध्यान रखना’ और लीना कहती, ‘हां, वह इस जिम्मेदारी को अच्छे से निभाएगी, चिंता न करें.’ ऐसे में कैसे वह अपने वचन से पलट सकती थी? इसलिए उस ने कभी फिर दूसरा विवाह न करने का फैसला कर लिया.

सूरज के जाने के बाद वह बखूबी  अपनी जिम्मेदारी निभा रही है.  लेकिन सूरज की कमी उसे खलती रहती है. इसलिए तो उस ने अपनेआप को किताबों में  झोंक दिया था. वैसे, सूरज के मांपापा भी यही चाहते थे कि लीना दूसरा विवाह कर ले अब. कई बार कहा भी उन्होंने. कई रिश्ते भी आए.  पर लीना का एक ही जवाब था कि वह दूसरा विवाह नहीं करेगी.

उस दिन सोनाक्षी को अच्छे से तैयार होते देख लीना कहने लगी, ‘‘कब तक यों ही सजसंवर कर विशाल को रि झाती रहोगी ननद रानी? क्यों नहीं कह देतीं उस से अपने मन की बात? एकदूसरे को अच्छी तरह सम झने लगे हो तुम दोनों, तो अब क्या सोचविचार करना? कहीं ऐसा न हो, मांपापा तुम्हारी शादी कहीं और तय कर दें और फिर तुम कुछ न कर पाओ.’’

भाभी की बात सोनाक्षी को भी सही लगी कि अगर विशाल आगे नहीं बढ़ रहा है, तो क्यों नहीं वही आगे बढ़ कर अपने प्यार का इजहार कर देती है. लेकिन कैसे वह अपने प्यार का इजहार करे, सम झ नहीं आ रहा था.

‘‘अब इस में सोचनासम झना क्या है सोनू? देखो, अगले हफ्ते ही विशाल का जन्मदिन है, तो इस से अच्छा मौका और क्या होगा.’’ लीना की यह बात सोनाक्षी को जंच गई और मन ही मन उस ने इजहारे प्यार का फैसला कर लिया. सोच लिया उस ने कि कैसे वह विशाल के सामने अपने प्यार कर इजहार करेगी.

सोनाक्षी ने तो पहली ही नजर में विशाल को अपना दिल दे दिया था. लेकिन विशाल ने आज तक नहीं जताया उसे कि वह उस से प्यार करता है. लेकिन उस की बातों, हावभाव और सोनाक्षी को ले कर उस की बेचैनी को देख, उसे यही लगता है कि वह भी उस से प्यार करता है. वैसे भी, जरूरी तो नहीं कि हर बात कह कर ही जताई जाए. मेरे लिए तो इतना ही काफी है कि मु झ से मिले बिना वह एक दिन भी नहीं रह पाता है. तभी तो कोई न कोई बहाना बना कर सीधे मेरे घर आ पहुंचता है. अपने मन में यह सोच सोनाक्षी मुसकरा पड़ी थी.

सोनाक्षी को यह नहीं पता कि विशाल उस से नहीं, बल्कि उस की विधवा भाभी लीना से प्यार करता है और उस की खातिर ही वह उस के घर बहाने बना कर आता रहता है. यह कब, कैसे और कहां हुआ. नहीं पता उसे. लेकिन जैसेजैसे उस ने लीना को जाना, उस के प्रति वह आकर्षित होता चला गया. इसलिए सोनाक्षी से मिलने के बहाने ही वह उस के घर चला आता था. भले ही वह सोनाक्षी से बातें करता था पर उस का दिल और दिमाग तो लीना के पास ही होता था.

लॉकडाउन: आखिर अर्जुन की बुआ अपनी बनावटी बातों से क्यों दिल दुखाती थी

‘‘दिनेश, तुम बिलकुल चिंता मत करो, अर्जुन मेरा भी तो बेटा है. पिंकी, बबलू तो उस के पीछे ही लगे रहते हैं. घर में ही तो रह रहा है. यह मत सोचो कि लौकडाउन में उस का यहां रहना मेरे लिए कोई परेशानी की बात होगी. मेरे लिए तो जैसे पिंकी, बबलू हैं वैसा अर्जुन. उस से बात करवाऊं?’’

किचन में बरतन धोते हुए अर्जुन के कानों में बुआ अंजू के शब्द पड़े तो उस का चेहरा गुस्से से लाल हो गया. अब बुआ पापा से बात कराने के लिए उसे फोन न दे दें. नहीं करनी है उसे अपने पापा से बात.

पर बुआ ने फोन होल्ड पर रखा था. उसे पकड़ाते हुए बोलीं, ‘‘लो बेटा, अपने पापा से बात कर लो. उस के बाद थोड़ा आराम कर लेना.’’

अर्जुन समझ गया कि यह सब पापा को सुनाने के लिए कहा गया है. उस ने हाथ पोंछ कर फोन बहुत बेदिली से पकड़ा. पापा उस का हालचाल ले रहे थे, उस ने बस हांहूं में जवाब दे कर फोन रख दिया. वह बरतन धो कर चुपचाप बालकनी में रखी कुरसी पर बैठ गया.

आज मुंबई में लौकडाउन की वजह से फंसे हुए उसे 2 महीने हो रहे थे. वह यहां वाशी में होस्टल में रह कर इंजीनियरिंग के बाद एक कोर्स कर रहा था. अचानक कोरोना के प्रकोप के चलते होस्टल बंद हो गया और सारे स्टूडैंट्स अपनेअपने घर जाने लगे.

वह सहारनपुर से आया हुआ था. उस ने अपने पिता दिनेश को कहा कि वह भी घर आ रहा है. ट्रेन या कोई भी फ्लाइट मिलने पर वह फौरन आना चाहता है.

दिनेश ने कहा, ‘नहींनहीं… आने की कोई जरूरत नहीं है. यह तो कुछ दिनों की ही बात है. क्यों आओगे फिर जाओगे? वहीं अंजू बुआ के यहां चले जाओ.’

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उस ने कहा था, ‘नहीं पापा, कुछ दिनों की बात नहीं है, मेरे सभी साथी फ्लाइट पकड़ कर घर चले गए हैं. मैं भी मुंबई से फौरन निकलना चाहता हूं.’

‘नहीं, बुआ के पास चले जाओ. क्यों आनेजाने में फालतू खर्च करना. वह भी तो अपना घर है.’

उस ने अपनी मम्मी रीना से बात की, ‘मम्मी, पापा मेरी बात क्यों नहीं समझ रहे? लौकडाउन लंबा चलेगा. यह 2 दिनों की बात नहीं है, मुझे घर आना है.’

‘हां, बेटा, मैं भी यही चाहती हूं कि तुम अपने घर ही आ जाओ. ऐसे समय मेरी आंखों के आगे रहो. पर तुम्हारे पापा बिलकुल सुन ही नहीं रहे.’

‘और आप भी जानती हैं बुआ को. बस मीठी बोली बोल कर सामने वाले को बेवकूफ बनाती हैं. जब भी उन से मिलने गया, इतना दिखावटी है उन के यहां सब. मुझे नहीं रहना उन के यहां. मम्मी, कुछ करो न.’

जिद्दी पति के सामने रीना की एक न चली. सब बंद होता गया और अर्जुन को अंजू के घर ही आना पड़ा. बात 1-2 दिनों की थी नहीं. यह किसी को भी नहीं पता था कि कब हालात सामान्य होंगे.

अंजू, उस के पति विनय और दोनों बच्चों ने उस का स्वागत दिल खोल कर किया. अर्जुन स्वभाव से सरल था इसलिए शांत सा रहता. कुछ दिन तो उसे कोई दिक्कत नहीं हुई, पर जब अंजू की कामवाली भी छुट्टी पर चली गई तो अब घर के कामधाम कौन संभाले, इस का बंटवारा होने लगा.

अंजू ने पूछा, ‘पहले यह बताओ कि बरतन कौन धोएगा?’

20 साल की पिंकी ने कहा, ‘मैं तो बिलकुल भी नहीं. मेरे हाथ खराब हो जाएंगे.’

15 साल के बबलू ने कहा, ‘मेरी तो औनलाइन क्लासेज हो सकती हैं और आप के सिंक भरभर के बरतन धोने में तो आप की कामवाली ही रो देती है. सौरी मम्मी, यह तो अपने बस का नहीं.’

विनय ने सफाई दी, ‘बरतन धोने में तो मेरी कमर भी चली जाएगी.’

अंजू ने सब को घूरते हुए कहा, ‘तुम सब रहने दो, बस बहाने बना रहे हो. मैं तुम लोगों से कहूंगी ही नहीं. मेरा अर्जुन धो लेगा. यही मेरा बेटा है. क्यों अर्जुन?’

अर्जुन ने इतना ही कहा, ‘ठीक है बुआ, धो लूंगा.’

अंजू ने फिर पूछा, ‘कुकिंग में हैल्प कौन करेगा?’

सब चुप रहे. तब अंजू ने कहा, ‘मुझे तो तुम लोगों से उम्मीद ही नहीं. तुम लोगों पर मुझे बहुत गुस्सा आ रहा है. ठीक है, मैं देख लूंगी. पिंकी तुम्हें साफसफाई करनी पड़ेगी और बबलू, सूखे कपड़े तुम ही तह करोगे. मेरा अर्जुन मेरी हैल्प करेगा. बस, मुझे तुम लोगों को कुछ कहना ही नहीं.’

लौकडाउन बढ़ता जा रहा था और इस के साथ ही अर्जुन मन ही मन टूटता भी जा रहा था. बुआ कहने को तो बहुत प्यार से पेश आतीं, पर वह उन की चालाकियों को समझ रहा था. पिंकी, बबलू उस के आगेपीछे घूमते. विनय उस के साथ बातें करते रहते. देखने में सब सामान्य लगता पर अर्जुन भी कोई बच्चा तो था नहीं, बुआ की मीठीमीठी बातों का मतलब इतने लंबे समय में अच्छी तरह समझ चुका था. उसे अपने पापा के लिए मन में बहुत नाराजगी थी. बेटे के आगे पिता ने पैसे को ज्यादा महत्त्व दिया था, बजाय इस के कि वह घर पहुंच जाए. उन्हें अपनी इस बहन का स्वभाव भी अच्छी तरह पता था.

पिता आर्थिक रूप से समृद्ध थे. ऐसा नहीं कि उस का इस समय जाने का खर्च वे सहन न कर पाते, पर बेकार की उन की सनक के कारण आज वह बुआ का एक ऐसा नौकर बन कर रह गया है, जो उन के किसी भी काम को मना नहीं कर पाता है. अब तो न कहीं जा ही सकता है.

घर से निकले लगभग 2 महीने हो गए थे. बाहर से आया सामान वही सैनिटाइज करता है. कोई उस सामान को तभी हाथ लगाता है जब वह साफ कर देता है. उस की लाइफ की ही कोई वैल्यू नहीं है.

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बुआ का कहना है कि वही अच्छी तरह से सैनिटाइज करता है बाकी सब तो लापरवाह हैं. बुआ के उस से काम करवाने के स्टाइल पर अब अर्जुन को मन ही मन हंसी भी आ जाती है.

अर्जुन को अपनी मम्मी पर भी बहुत गुस्सा आता है कि क्यों उन्होंने अपने मन की बात पापा के सामने नहीं रखी? क्यों वे अपनी बात पापा से मनवा नहीं पातीं?

मम्मी जब भी उस से फोन पर बात करती हैं,  बुआ आसपास ही रहती हैं, फिर वह व्हाट्सऐप पर उन्हें अपनी हालत बताता है और फिर बाद में चैट डिलीट कर देता है, क्योंकि पिंकी, बबलू, कभी भी उस का फोन छेड़ते रहते हैं.

कभीकभी उसे लगता है कि पिंकी, बबलू को भी कहीं उस का फोन चैक करते रहने की ट्रेनिंग तो नहीं दे डाली बुआ ने?

उस ने एक बार मना भी किया था कि मेरा फोन मत छेड़ो, पर उस के इतना कहते ही बच्चों ने शोर मचा दिया था कि भैया ने डांटा. उसे फौरन बात संभालनी पड़ी थी.

अर्जुन अपने से 3 साल छोटी बहन अंजलि के टच में लगातार रहता. वह एक बार मुंबई घूमने आई थी. उसे बुआ के घर 4-5 दिन रहना पड़ा था. वापस घर लौट कर उस ने सब के सामने कान पकड़े थे. कहा था, ‘मैं तो कभी बुआ के घर नहीं जाऊंगी. मीठा बोल कर काम में ही जोत कर रखती हैं. क्या बताऊं, बैठने ही नहीं देतीं. ‘‘मेरी बेटी, मेरी बेटी’’ कह कर कितना काम करवा लिया. पापा, आप की बहन है या कोई मीठी छुरी?’

इस नाम पर वह खूब हंसा था. जब से अर्जुन यहां फंसा है अंजलि उस से बुआ के हाल मीठी छुरी कह कर ही लेती है. वह उसे सब बताता है.

अंजलि भी भाई के लिए दुखी है. कहां उसे आदत है घर के काम करने की? कामचोर नहीं है अर्जुन, पर इतना भी समझ रहा है कि पिता और बुआ के बीच पिस गया है वह. पिता से तो वह अब कोई बात ही नहीं कर रहा है.

कभी वह भी देर से उठता है और इस बीच दिनेश का फोन आ जाए तो बुआ उन से ऐसे बात करती हैं कि जैसे वह इतना आराम कर रहा है और वे यही चाहती हैं कि बस वह यों ही उन के घर रहे. वह तो बाद में उसे अंजलि से पता चलता है जब पापा बताते हैं कि ‘देखो, क्या ठाठ से रख रही है मेरी बहन उसे. आजकल के बच्चे तो यों ही उस के पीछे पड़े रहते हैं,’ और वह यह सुन कर कुढ़ कर रह जाता है.

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एक दिन तो उसे शरारत सूझी. उस ने बबलू से कहा, ‘‘मेरा वीडियो बनाओगे जब मैं बरतन धोऊंगा?’’

बबलू ने पूछा, ‘‘क्यों भैया?’’

‘‘अपने दोस्तों को दिखाऊंगा. वे भी भेजते हैं मुझे ऐसे वीडियो.’’

बबलू ने यह बात मम्मी यानी उस की बुआ को बता दी, और फिर वीडियो तो बनना ही नहीं था.

यह लौकडाउन उसे बहुत भारी पड़ा है. उसे इस बात का हमेशा अफसोस रहेगा कि उस के पिता ने उस की बात नहीं मानी. उस की जमा हुई फीस खतरे में थी, इसलिए पापा ने उसे न बुला कर अपने कुछ पैसे बचा लिए. क्यों वे किसी की बात नहीं सुनते? कितना दर्द दिया है उन्होंने उसे. शरीर से भी थक चुका है वह और मन से भी. पता नहीं कितने दिन और ऐसे… अर्जुन की आंखों से आंसू बह कर गालों तक आ गए, मगर उस ने झट से आंसू पोंछ लिए क्योंकि बुआ आवाज जो लगा रही थीं.

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