आमतौर पर हमारे यहां रेप का कुसूर पिछड़ी जातियों के उद्दंड बेरोजगार और कट्टर बन रहे नौजवानों पर डाला जाता है, जो दलित लड़कियों को रेप कर के जला तक डालते हैं. पर समस्याएं ऊंची जातियों में भी हैं और ओबीसी जातियों की लड़कियों में भी, जो पैसे और पढ़ाईलिखाई के चलते अब मेनस्ट्रीम में आने लगी हैं. इन में एक समस्या डेट रेप की है.
एक मल्टीनैशनल कंपनी में काम करने वाली अनामिका मुंबई के अंधेरी इलाके के एक पेइंग गैस्टहाउस में रहती थी. वह एक पिछड़े समाज की खातेपीते घर की लड़की थी, जो शहर में पढ़ने व काम करने आई थी. उस ने पंखे से लटक कर खुदकुशी कर ली.
सुसाइड नोट में उस ने लिखा, ‘एक दिन जब मैं औफिस में थी, तब मेरे ह्वाट्सएप में वीडियो मैसेज आया. वह जिस नंबर से आया था, वह भारत का नहीं था. मेरे मन में उत्सुकता पैदा हुई कि आखिर यह किस बारे में है और किस ने भेजा है. मैं ने इंटरनैट से मालूम किया तो पता चला कि नंबर सिंगापुर से आपरेट किया जा रहा था.
‘मैं स्टाफरूम में गई और चुपचाप मैसेज देखा. देख कर मेरे पैरों तले से जमीन खिसक गई, क्योंकि वह मु?ा से ही संबंधित था. वह एक पोर्न फिल्म थी. मैं डर के मारे सिहर उठी.
‘घर आ कर मैं ने कई बार वीडियो मैसेज देखा. मैं हैरान थी कि उस में कई लड़कों को मेरे साथ जिस्मानी संबंध बनाते हुए दिखाया गया था. मु?ो यह तक याद न था कि यह कब व कैसे हुआ. उस में न मेरी तरफ से विरोध था और न ही मैं नशे की हालत में थी. बिना हीलहुज्जत, पूरी सहमति से दिखाए गए इतने सारे सैक्स संबंध मु?ो डरा रहे थे. हर दृश्य में मैं तो साफतौर पर दिख रही थी, पर सैक्स करने वालों के चेहरे छिपे हुए थे. अंत में धमकी भरी सूचना थी कि अमुक जगह व समय पर मिलो, नहीं तो इसे सार्वजनिक कर दिया जाएगा.
‘मु?ो सम?ा नहीं आ रहा था कि यह हादसा कब व कैसे घटित हुआ, जबकि मैसेज तनिक भी फर्जी नहीं लग रहा था.
‘मैं ने दिमाग पर बहुत जोर डाला, तब याद आया कि पिछली बार जब बौयफ्रैंड ‘डेट’ पर ले गया था, तब कान व गले में यही तो पहने थे, जो उस वीडियो में नजर आ रहे हैं. ड्रिंक्स के बाद मैं असामान्य हो गई थी. इस वजह से रात वहीं गुजारनी पड़ी. मगर वहां रहते हुए ऐसा हुआ, यह सोच कर मैं हैरान थी.
‘ऐसा एमएमएस कब, कहां व कैसे बना और बनाने व भेजने वाला कौन है का जवाब नहीं मिल रहा था. सब से बड़ी उल?ान यह थी कि वीडियो में मैं पूरे होशोहवास में सहयोग करती नजर आ रही थी. अगर बौयफ्रैंड को बताती या पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवाने जाती, तो कैसे साबित करती कि जो हुआ, वह मेरी इच्छा के खिलाफ था.
‘इस के बाद मैं हथियार डालने को मजबूर हो गई. मेरी बोल्डनैस पलभर में छूमंतर हो गई. निश्चित समय व तय जगह पर पहुंचना मेरी मजबूरी थी. फिर तो मैं पतन के गर्त में समाती चली गई. मैं उन लोगों के हाथों की कठपुतली बन गई और ‘गैंग रेप’ की शिकार होने लगी. बाद में पता चला कि मेरा बौयफ्रैंड फ्रौड था. वह उसी गैंग के लिए काम करता था. मेरी जैसी अनेक लड़कियां वहां ‘पोर्न फिल्मों’ की हीरोइनें बनी हुई थीं. इस दलदल से निकलने के लिए खुदकुशी करने के अलावा मेरे पास और कोई रास्ता न था.
‘अफसोस तो मु?ो इस बात का है कि मैं ने बिना परखे बौयफ्रैंड बनाया और बाद में समय रहते पुलिस के पास नहीं जा पाई, वरना मु?ो यह जलालत तो नहीं सहनी पड़ती.’
रोहित शेट्टी की फिल्म ‘संडे’ में सेहर नाम की लड़की लाख कोशिश करने पर भी एक संडे को याद नहीं कर पाती, जबकि उस के लिए वह संडे खास था, क्योंकि जांच एजेंसियां उस संडे के बारे में उस से जानना चाहती थीं.
देखा जाए, तो सेहर के गुम संडे और अनामिका के साथ घटे हादसे का राज समान ही नजर आता है और वह यह कि वे दोनों अनजाने में किसी की साजिश का शिकार बन गई थीं.
आमतौर पर ऐसे मामलों में लड़कियां ऐसी दवा की शिकार बन जाती हैं, जिस के सेवन से शारीरिक व मानसिक रूप से वे इतनी कमजोर हो जाती हैं कि ठीक तरह से विरोध भी नहीं कर पातीं. इन दवाओं में ऐसी चीजें मिली होती हैं, जिन से यौन उत्तेजना बढ़ जाती है.
जाहिर है, ऐसी हालत में पीडि़ता खिलाफत के बजाय सहयोगी बन कर सैक्स की भूख शांत करती नजर आती है, क्योंकि बढ़ी हुई यौन उत्तेजना के चलते जाहिर होने वाला विरोध भी दब कर रह जाता है और यही उस के पक्ष को कमजोर बना देता है. नतीजतन, ऐसे रेप या साजिश साबित नहीं हो पाती और वह ‘ब्लैकमेल’ होने को मजबूर हो जाती है.
यह उन लड़कियों के लिए गंभीर चेतावनी है, जो पार्टियों, क्लबों या पबों में जाती हैं व खुद को ‘बोल्ड’ साबित करने की धुन में नशे की आदी हो गई हैं.
ऐसी लड़कियां मर्द साथियों के साथ ड्रिंक्स से परहेज नहीं करतीं, किंतु बोल्डनैस के चलते सैक्स के लिए समर्पित भी नहीं होतीं. ऐसी लड़कियों से निबटने के लिए गलत मर्द साथी ड्रिंक्स में यह दवा मिला देते हैं, जिन्हें ‘डेट रेप ड्रग्स’ के नाम से जाना जाता है. इस के बाद वे बेखौफ उन्हें जिस्मानी शोषण का शिकार बना लेते हैं और ‘ब्लैकमेल’ करते रहने के लिए पुख्ता सुबूत भी जुटा लेते हैं. गामा हाईड्रौक्सीब्यूट्रिक एसिड के नाम से जानी जाने वाली एक ड्रग्स इन्हीं में से है.
जयपुर के जगतपुरा क्षेत्र में ‘डेट रेप ड्रग्स’ की खेपें जाती रहती हैं, क्योंकि इस का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने लगा है. इन में से एक केटामाइन प्रतिबंधित दवा भी है, जो मानसिक मरीजों के लिए इस्तेमाल होती है, पर इस का सब से ज्यादा इस्तेमाल नाइट क्लबों, रेव पार्टियों में होने लगा है. इन्हें लेने वाला तकरीबन होश खो देता है और होश में आने पर अपराध में शरीक रहे अपराधियों तक को नहीं पहचान पाता.
फोरैंसिक माहिरों का कहना है कि आमतौर पर पार्टी के दौरान लड़कियों को कैटामाइन इंजैक्शन या ड्रिंक्स के रूप में दिया जाता है. इस के बाद वे सपने जैसी हालत में पहुंच जाती हैं. होश में आने पर उन्हें कुछ भी याद नहीं रहता. इस तरह वे बेहोश तो नहीं होतीं, पर सोचनेसम?ाने व पहचानने तक की ताकत खो बैठती हैं.
यहां तक कि वे बौयफ्रैंड और दूसरे में फर्क नहीं कर पातीं. तभी तो ऐसी क्लब पार्टियों में पार्टनरों के बदलते रहने के चलते वे ‘गैंग रेप’ की शिकार बन जाती हैं और होश में आने के बाद न अपने बरताव को याद कर पाती हैं और न ही बलात्कारी पार्टनरों को पहचान पाती हैं.
गांवों व छोटे कसबों से आने वाली लड़कियां आमतौर पर शहरी बनने के चक्कर में बहुत से जोखिम भी लेती हैं, इसलिए वे हर न्योते को स्वीकार कर लेती हैं. उन्हें अपने शारीरिक दम पर भरोसा होता है, पर ये ड्रग्स दिमाग पर काम करती हैं, शरीर के मसल्स पर नहीं.
जहां तक इन दवाओं से सावधान रहने की बात है, यह भी तकरीबन नामुमकिन सा ही है, क्योंकि ऐसी दवाएं रंग, गंध व स्वादहीन होती हैं, इसीलिए इन्हें आसानी से बिना जानकारी के किसी भी पेय पदार्थ में मिला कर पिलाया जा सकता है. इसे पानी के साथ भी दिया जा सकता है. पीने वालों को तनिक भी पता नहीं चलता और वे सहज विश्वास से उसे पी जाते हैं.
इस के कुछ समय बाद ही दवा अपना असर दिखाने लगती है. साजिश रचने वाला इंतजार में रहता है. उस का तनिक सा आमंत्रण सभी दूरियां मिटा देता है और वह हालात का फायदा उठाने से नहीं चूकता.
डाक्टरों का कहना है कि ऐसी
ड्रग्स का बेसिक कंपोनैंट है ‘हाईड्रौक्सीब्यूट्रिक एसिड’. इस का असर तकरीबन 6 से 8 घंटे तक बना रहता है. यह दवा शरीर में तकरीबन
12 घंटे तक रहती है. 8 से 12 घंटे की अवधि तक उसे लेने वाली लड़की ढुलमुल व मतिभ्रम की शिकार बनी रहती है. अगर 12 घंटे में उस की पैथोलौजिकल जांच हो जाए, तब तो दवा दिए जाने के सुबूत मिल सकते हैं, वरना वे पता नहीं चल पाते. जाहिर है कि इतने समय में पीडि़त के सामान्य न होने से मामले का पता नहीं चल पाता और अपराधी के कांड पर परदा पड़ा रह जाता है.
पश्चिमी देशों में इस तरह की घटनाएं घटित होना आम बात है. अकेले ब्रिटेन में हर हफ्ते तकरीबन 30 से ज्यादा महिलाएं ऐसे हादसों की शिकार बनती हैं.
ये आंकड़े उन महिलाओं के हैं, जो पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवा पाती हैं. जाहिर है, अनेक महिलाएं ऐसी भी होंगी, जिन्हें अपराधियों द्वारा समयसमय पर उपयोग तो किया जाता है, किंतु उन्हें उस का ज्ञान तक नहीं होता. यह भी मुमकिन है कि उन्हें पता तो चल गया, पर उलट हालात को देखते हुए ब्लैकमेल होना नियति मान बैठी हों और पुलिस के पास जाना उन्हें फुजूल लग रहा हो.
जरूरी है कि लड़कियां ऐसे मामलों से बच कर रहें, खासकर वे जो पार्टियों, क्लबों, पबों या बार में जाती हैं और मर्द साथियों के साथ ड्रिंक्स लेने की आदी हैं. न जाने कौन, कब उन के ड्रिंक्स में कुछ मिला दे और अपना शिकार बना ले. इसी तरह जो लड़कियां दोस्त या मंगेतर के साथ ‘डेट’ पर जाती हैं, वे भी आसानी से विश्वासघात की शिकार बन सकती हैं.
दिल्ली में द्वारका में एक लड़की, जो 12वीं क्लास की छात्रा थी, महीनों तक इसी तरह की डेट रेप ड्रग्स की शिकार रही. उसे बारबार पेटीएम से पैसे भेजने को कहा जाता रहा. आखिर में उसे मातापिता को विश्वास में ले कर पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज करानी पड़ी.
चाहे अपराधी पकड़ में आ जाए, पर करीब के सब लोग लड़की के कारनामोें को जान जाते हैं और नाम बताए जाने के बाद वह बदनाम हो जाती है.
आस्ट्रेलिया में 6 सप्ताह बिताने के बाद जया और राहुल जब वापस आए तो घर खोलते ही उन्हें हलकी सी गंध महसूस हुई. यह गंध इतने दिनों तक घर बंद होने के कारण थी. सफर की थकान के कारण राहुल और जया का मन चाय पीने को कर रहा था, जया बोली, ‘‘जानकी कल शाम पूजा के फ्रिज में दूध रख गई होगी, तुम खिड़कियां व दरवाजे खोलो राहुल, मैं तब तक दूध ले कर आती हूं.’’
‘‘दूध ले कर या चाय का और्डर कर के?’’ राहुल हंसा.
‘‘आस तो नाश्ते की भी है,’’ कह कर जया बाहर निकल गई. बराबर के फ्लैट में रहने वाले कपिल और पूजा से उन की अच्छी दोस्ती थी. कुछ देर बाद जया सकपकाई सी वापस आई और बोली, ‘‘कपिल और पूजा ने यह फ्लैट किसी और को बेच दिया है. मैं ने घंटी बजाई तो दरवाजा एक नेपाली लड़के ने खोला और पूजा के बारे में पूछा तो बोला कि वे तो अब यहां नहीं रहतीं, यह फ्लैट हमारे साहब ने खरीद लिया है.’’
जया अभी राहुल को नए पड़ोसी के बारे में बता ही रही थी कि तभी दरवाजे की घंटी बजी. जया ने जैसे ही दरवाजा खोला तो देखा कि जानकी दूध के पैकेट लिए खड़ी थी.
‘‘माफ करना मैडम, आने में थोड़ी देर हो गई, पूजा मैडम का नया फ्लैट…’’
‘‘कोई बात नहीं,’’ जया ने बात काटी, ‘‘यह बता, पूजा मैडम कहां गईं?’’
‘‘7वें माले पर, मगर क्यों, यह नहीं मालूम,’’ जानकी ने रसोई में जाते हुए कहा.
‘‘चलो, है तो सोसायटी में ही, मिलने पर पूछेंगे कि तीसरे माले से 7वें माले पर क्यों चढ़ गई? चाय तो जानकी पिला देगी मगर नाश्ता तो खुद ही बनाना पड़ेगा,’’ जया ने राहुल से कहा.
‘‘नाश्ते के लिए इडलीसांभर और फल ला दूंगा.’’
राहुल के बाजार जाने के बाद दरवाजा बंद कर के जया मुड़ी ही थी कि फिर घंटी बजी. जया ने दरवाजा खोला. बराबर वाले फ्लैट का वही नेपाली लड़का एक ढकी हुई टे्र लिए खड़ा था. ‘‘साहब ने नाश्ता भिजवाया है,’’ कह कर उस ने बराबर वाले फ्लैट की ओर इशारा किया जहां एक संभ्रांत प्रौढ़ सज्जन दरवाजे पर ताला लगा रहे थे. ताला लगा कर वे जया की ओर मुड़े और मुसकरा कर बोले, ‘‘मैं आप का नया पड़ोसी आनंद हूं. मुझे पूजा और कपिल से आप के बारे में सब मालूम हो चुका है. आस्टे्रलिया की लंबी यात्रा के बाद आप थकी हुई होंगी इसलिए पूजा की जगह मैं ने आप के लिए नाश्ता बनवा दिया है.’’
‘‘आप ने तकलीफ क्यों की? राहुल गए हैं न नाश्ता लाने…’’
‘‘तो यह आप लंच में खा लेना,’’ आनंद नौकर की ओर मुड़े. ‘‘मुरली, टे्र अंदर टेबल पर रख दो.’’
मुरली ने लपक कर टे्र अंदर टेबल पर रख दी और फिर आनंद का ब्रीफकेस उठा कर लिफ्ट की ओर चला गया. ‘‘इतना संकोच करने की जरूरत नहीं है, बेटी,’’ आनंद ने प्यारभरे स्वर में कहा, ‘‘अब हम पड़ोसी हैं, एकदूसरे का सुखदुख बांटने वाले.’’
जया भावविह्वल हो गई, ‘‘थैंक यू, अंकल…’’
‘‘साहब, लिफ्ट आ गई,’’ मुरली ने पुकारा.
‘‘शाम को मिलते हैं, टेक केयर,’’ आनंद ने लिफ्ट की ओर जाते हुए कहा.
तभी राहुल आ गया और खुशबू सूंघते हुए बोला, ‘‘मैं गया तो था न नाश्ता लाने फिर तुम ने क्यों बना लिया?’’ ‘‘मैं ने नहीं बनाया, हमारे नए पड़ोस से आया है,’’ जया ने राहुल के मुंह में परांठे का टुकड़ा रखते हुए कहा, ‘‘खा कर देखो, क्या लाजवाब स्वाद है.’’
‘‘सच में मजा आ गया,’’ राहुल बैठते हुए बोला, ‘‘अब तो यही खाएंगे. परांठे तो बढि़या हैं, आनंद साहब कैसे हैं?’’
‘‘तुम्हें उन का नाम कैसे मालूम?’’ जया ने चौंक कर पूछा.
‘‘नीचे सोसायटी का सेके्रटरी श्रीनिवास मिल गया था. उसी ने बताया कि अमेरिकन बैंक के उच्चाधिकारी आनंद विधुर हैं, बच्चे भी कहीं और हैं. बस एक नौकर है जो उन की गाड़ी भी चलाता है इसलिए अकेलापन काटने के लिए ऐसा फ्लैट चाहते थे जिस की बालकनी से वे मेन रोड की रौनक देख सकें. अपनी बिल्ंिडग में जो फ्लैट बिकाऊ हैं उन से मेन रोड नजर नहीं आती. श्रीनिवास के कहने पर उन्होंने 7वें माले का फ्लैट ले तो लिया पर उस में रहने नहीं आए. बाद में श्रीनिवास को बगैर बताए उन्होंने कपिल से अपना फ्लैट बदल लिया. इस अदलाबदली का कमीशन न मिलने से श्रीनिवास बहुत चिढ़ा हुआ है.’’
जया हंसने लगी, ‘‘कपिल से या आनंद अंकल से?’’
‘‘अरे वाह, तुम ने उन्हें अंकल भी बना लिया?’’
‘‘जब उन्होंने मुझे बेटी कहा तो मुझे भी उन्हें अंकल कहना पड़ा. वैसे भी उन की उम्र के व्यक्ति को तो अंकल ही कहना चाहिए.’’ पेट भर नाश्ता करने के बाद दोनों आराम करने लगे. अगले रोज से काम पर जाना था इसलिए दोनों कुछ देर बाद उठे और घर का सामान लाने बाजार चले गए. लौटते समय लिफ्ट में आनंद मिल गए. अपने फ्लैट का ताला खोलने से पहले राहुल ने कहा, ‘‘अंकल, आज हमारे साथ चाय पीजिए.’’
‘‘जरूर पीऊंगा बेटा, मगर फिर कभी.’’
‘‘वह फिर कभी न जाने कब आए, अंकल,’’ जया बोली, ‘‘कल से काम पर जाने के बाद घर लौटने का कोई सही वक्त नहीं रहेगा.’’ आनंद अपने फ्लैट की चाबी मुरली को पकड़ा कर राहुल और जया के साथ अंदर आ गए. उन के चेहरे से लगा कि वे घर की सजावट से बहुत प्रभावित लग रहे हैं.
‘‘आस्ट्रेलिया का ट्रिप कैसा रहा?’’ आनंद ने बातचीत के दौरान पूछा.
‘‘बहुत बढि़या. मेरे छोटे भाई साहिल ने हमें खूब घुमाया. बहुत मजा आया. वैसे भी आस्टे्रलिया बहुत सुंदर है,’’ राहुल ने कहा.
‘‘वहां जा कर बसने का इरादा तो नहीं है?’’
‘‘अरे नहीं अंकल, रहने के लिए अपना देश ही सब से बढि़या है.’’
‘‘यह बात छोटे भाई को नहीं समझाई?’’
‘‘ऐसी बातें किसी के समझाने से नहीं, अपनेआप ही समझ आती हैं, अंकल.’’
‘‘यह बात तो है. मुझे भी औरों की बात समझ नहीं आई थी और जब आई तो बहुत देर हो चुकी थी,’’ आनंद ने लंबी सांस ले कर कहा.
‘‘कौन सी बात, अंकल?’’ जया ने पूछा.
‘‘यही कि अपना देश विदेशों से अच्छा है,’’ आनंद ने सफाई से बात बदली, ‘‘लंबे औफिस आवर्स हैं आप दोनों के?’’
‘‘मेरे तो फिर भी ठीक हैं लेकिन जया रायजादा गु्रप के चेयरमैन की पर्सनल सेके्रटरी है इसलिए यह अकसर देर से आती है,’’ राहुल ने बताया.
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वैसे तो रणबीर ग्रुप ने शहर में कई दर्शनीय इमारतें बनाई थीं, लेकिन उन के द्वारा नवनिर्मित ‘स्वप्नलोक’ वास्तुशिल्प में उन का अद्वितीय योगदान था. उद्घाटन समारोह में मुख्यमंत्री एवं अन्य विशिष्ट व्यक्तियों की प्रशंसा के उत्तर में ग्रुप के चेयरमैन रणबीर ने बड़ी विनम्रता से कहा, ‘‘किसी भी प्रोजैक्ट की कामयाबी का श्रेय उस से जुड़े प्रत्येक छोटेबड़े व्यक्ति को मिलना चाहिए, इसीलिए मैं अपने सभी सहकर्मियों का बहुत आभारी हूं, खासतौर से अपने आर्किटैक्ट विभोर का जिन के बगैर मैं आज जहां खड़ा हूं वहां तक कभी नहीं पहुंचता.’’
समारोह के बाद जब विभोर ने रणबीर को धन्यवाद दिया तो उस ने सरलता से कहा, ‘‘किसी को भी उस के योगदान का समुचित श्रेय न देने को मैं गलत समझता हूं विभोर.’’
‘‘ऐसा है तो फिर मेरी सफलता का श्रेय तो मेरी सासससुर खासकर मेरी सास को मिलना चाहिए सर,’’ विभोर बोला, ‘‘यदि आप का इस सप्ताहांत कोई और कार्यक्रम न हो तो आप सपरिवार हमारे साथ डिनर लीजिए, मैं आप को अपने सासससुर से मिलवाना चाहता हूं.’’
‘‘मैं गरिमा और बच्चों के साथ जरूर आऊंगा विभोर. तुम्हारे सासससुर इसी शहर में रहते हैं?’’
‘‘जी हां, मैं उन के साथ यानी उन के ही घर में रहता हूं सर वरना मेरी इतनी बड़ी कोठी लेने की हैसियत कहां है…’’
‘‘कमाल है, अभी कुछ रोज पहले तो हम तुम्हारी प्रमोशन की पार्टी में तुम्हारे घर आए थे और उस से पहले भी आ चुके हैं, लेकिन उन से मुलाकात नहीं हुई कभी.’’
‘‘वे लोग मेरी पार्टियों में शरीक नहीं होते सर, न ही मेरी निजी जिंदगी में दखलंदाजी करते हैं. लेकिन मेरे बीवीबच्चों का पूरा खयाल रखते हैं. इसीलिए तो मैं इतनी एकाग्रता से अपना काम कर रहा हूं, क्योंकि न तो मुझे बीमार बच्चे को डाक्टर के पास ले जाना पड़ता है और न ही बीवी के अकेलेपन को दूर करने या गृहस्थी के दूसरे झमेलों के लिए समय निकालने की मजबूरी है. जब भी फुरसत मिलती है बेफिक्री से बीवीबच्चों के साथ मौजमस्ती कर के तरोताजा हो जाता हूं,’’ विभोर बोला.
‘‘ऋतिका इकलौती बेटी है?’’
‘‘नहीं सर, उस के 2 भाई अमेरिका में रहते हैं. पहले तो उन का वापस आने का इरादा था, मगर मेरे यहां आने के बाद दोनों लौटना जरूरी नहीं समझते. मिलने के लिए आते रहते हैं. कोठी इतनी बड़ी है कि किसी के आनेजाने से किसी को कोई दिक्कत नहीं होती.’’
रणबीर को ऋतिका के मातापिता बहुत ही सुलझे हुए, संभ्रांत और सौम्य
लगे. खासकर ऋतिका की मां मृणालिनी. न जाने क्यों उन्हें देख कर रणबीर को ऐसा लगा कि उस ने उन्हें पहले भी कहीं देखा है.
उस के यह कहने पर मृणालिनी ने बड़ी सादगी से कहा, ‘‘जरूर देखा होगा ‘दीपशिखा’ महिला क्लब के किसी समारोह या फिर अपनी शादी में,’’ मां की मृत्यु में कहना मृणालिनी ने मुनासिब नहीं समझा.
‘‘ठीक कहा आप ने,’’ रणबीर चहका, ‘‘किसी समारोह की तो याद नहीं, लेकिन बहुत सी तसवीरों में आप हैं मां के साथ.’’
‘‘मां की शादी से पहले की तसवीरों में भी देखा होगा, क्योंकि मैं और रुक्की शादी के पहले एक बार एनसीसी कैंप में मिली थीं और वहीं हमारी दोस्ती हुई थी.’’
रणबीर भावुक हो उठा. उस की मां रुक्मिणी को रुक्की उन के बहुत ही करीबी लोग कह सकते थे. रूप और धन के दंभ में अपने को विशिष्ट समझने वाली मां यह हक किसीकिसी को ही देती थीं यानी मृणालिनी उस की मां की अभिन्न सखी थीं.
‘‘विभोर को मालूम है कि मां आप की सहेली थीं?’’ रणबीर ने पूछा.
‘‘नहीं, क्योंकि उस का हमारे परिवार से जुड़ने से पहले ही रुक्की का देहांत हो गया था. विभोर बहुत मेहनती और लायक लड़का है,’’ मृणालिनी ने दर्प से कहा.
‘‘सही कह रही हैं आप. विभोर के बगैर तो मैं 1 कदम भी नहीं चल सकता. और अब तो मुझे आप का सहारा भी चाहिए मांजी. मां के देहांत के बाद आज आप से मिल कर पहली बार लगा जैसे मैं फिर से सिर्फ रणबीर बन कर जी सकता हूं.’’
‘‘गाहेबगाहे ही क्यों जब जी करे,’’ मृणालिनी ने स्नेह से उस का सिर सहलाते
हुए कहा.
‘‘रणबीर सर से क्या बातें हुईं मां?’’ अगली सुबह विभोर ने पूछा.
‘‘कुछ खास नहीं, बस उस की मां के बारे में,’’ मृणालिनी ने अनमने भाव से कहा.
‘‘पूरी शाम?’’ विभोर ने हैरानी से पूछा.
‘‘रुक्की थी ही ऐसी विभोर, उस के बारे में जितनी भी बातें की जाएं कम हैं, अमीर बाप की बेटी होने के बावजूद उस में रत्ती भर घमंड नहीं था. वह एनसीसी की अच्छी कैडेट थी. उस के बाप ने उसे रिवौल्वर इनाम में दिया था. मेरी निशानेबाजी से प्रभावित हो कर रुक्की ने अपने रिवौल्वर से मुझे प्रैक्टिस करवाई थी. तभी तो मुझे निशानेबाजी की प्रतियोगिता में इनाम मिला था.’’
‘‘लगता है मां अपनी सहेली की याद आने की वजह से विचलित हैं,’’ ऋतिका बोली.
‘‘और अब विचलित होने की बारी मेरी है, क्योंकि हम व्हिस्पर वैली में जो अरेबियन विलाज बना रहे हैं न उस बारे में मुझे आज रणबीर सर से विस्तृत विचारविमर्श करना है और अगर मां की याद में व्यथित होने के कारण उन्होंने मीटिंग टाल दी या दिलचस्पी नहीं ली तो बहुत गड़बड़ हो जाएगी,’’ विभोर ने कहा.
लेकिन उस का खयाल गलत था. रणबीर ने बड़े उत्साह और दिलचस्पी से विभोर की प्रस्तावना पर विचार किया और सुझाव दिया, ‘‘अपने पास जमीन की कमी नहीं है विभोर. क्यों न तुम 2 को जोड़ कर पहले 1 बड़ा भव्य विला बनाओ. अगर लोगों को पसंद आया तो और वैसे बना देंगे.’’
‘‘लेकिन कीमत बहुत ज्यादा हो जाएगी सर और फिर कोई ग्राहक न मिला तो?’’
‘‘परवाह नहीं,’’ रणबीर ने उत्साह से कहा, ‘‘खुद के काम आ जाएगा. यही सोच कर बनाओ कि यह बेचने के लिए नहीं अपने लिए है. विभोर, तुम दूसरे काम उमेश और दिनेश को देखने दो. तुम इसी प्रोजैक्ट के निर्माण पर ध्यान दो और जल्दी यह काम पूरा करो. मैं सतबीर से कह दूंगा कि तुम्हें पैसे की दिक्कत न हो.’’
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इस मुलाकात में दोनों के जवानी में तपते हुए तन एकदूसरे के नजदीक आए तो फिर एकदूसरे में समा कर ही अलग हुए. जवानी के पहले पायदान पर पे्रमी के संग सैक्स सुख के अनुभव ने नीलम को पागल कर कर दिया था.
इस के बाद वह खुल कर रोहित से मिलने लगी. छोटे से कस्बे में 2 प्रेमियों की यह नजदीकी जल्द ही लोगों में चर्चा का विषय बन गई.
बात रोहित के अलावा नीलम के घर पर भी पहुंच गई थी. लेकिन अब तक रोहित और नीलम एकदूसरे के साथ जिंदगी बिताने की कसमें खा चुके थे.
बात रोहित के घर वालों के अलावा नीलम के घर तक पहुंच गई थी. रोहित ने देखा कि पारिवारिक दबाव के बाद भी नीलम पीछे नहीं हट रही है तो रोहित भी जिद पर अड़ गया.
स्कूल के बाद रोहित राजपूत डीजे का काम करने लगा. जबकि नीलम के दिल में रोहित के प्यार की गूंज उस के डीजे की आवाज से कहीं ज्यादा ऊंची आवाज में गूंजती थी. वक्त के साथ नीलम के घर वालों ने झाबुआ निवासी लकी पांचाल के साथ उस का रिश्ता पक्का कर दिया.
नीलम नहीं चाहती थी कि वह रोहित के अलावा किसी और की दुलहन बने. इसलिए यह देख कर नीलम ने रोहित को संदेश पहुंचा दिया कि वह जल्द से जल्द घर आ कर उस के घर वालों से शादी की बात करे. लेकिन शायद रोहित हिम्मत नहीं जुटा सका.
इस के बाद इसी साल जनवरी महीने में नीलम की लकी के साथ शादी हो गई तो वह झाबुआ आ गई.
नीलम ने मजबूरी में लकी के साथ शादी तो कर ली, लेकिन वह अपने मन से अपने प्यार रोहित को नहीं भुला पा रही थी. इसलिए जैसे ही वह शादी के बाद पहली बार मायके गई, वह कटला पहुंच कर अपने पे्रमी रोहित से मिली.
वास्तव में नीलम मिली तो थी रोहित से उस की बुजदिली की शिकायत करने, लेकिन नीलम को देखते ही रोहित ने उसे अपनी बांहों में भर लिया तो नीलम सारी शिकायतें भूल कर प्रेमी के संग एक बार फिर प्यार के सागर में डूब गई.
पुराने प्यार की कहानी एक बार फिर नए जोश के साथ शुरू हो जाने के चलते नीलम जितने दिन भी मायके में रही, लगभग रोज किसी न किसी तरह रोहित से मिलती थी.
रोहित की मोहब्बत में डूबी नीलम वापस ससुराल नहीं जाना चाहती थी, इसलिए एकदो बार लकी ने उसे लिवाने के लिए कटला आने का प्लान बनाया तो नीलम ने बहाना बना कर उसे टाल दिया.
जांच में सामने आया कि लकी के साथ नीलम की शादी को केवल 5 महीने ही हुए थे. इस दरमियान नीलम 20 दिन भी अपनी ससुराल नहीं रही थी. इतना ही नहीं, वह जितने दिन भी ससुराल में रही, खुद को अपने कमरे में बंद कर दिन भर रोहित से फोन पर बातें किया करती थी.
इस बात की गवाही नीलम के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स ने दी. एक दिन में 9 घंटे बात होने की जानकारी काल डिटेल्स से पुलिस को मिली.
कुछ दिन पहले जब नीलम झाबुआ से वापस मायके गई तो उस ने उसी दिन रोहित से साफ कह दिया था कि लकी की बांहों में उसे कांटे चुभते हैं. इसलिए अब वह कभी झाबुआ नहीं जाएगी.
ऐसे में रोहित ने नीलम को लकी से तलाक लेने को कहा तो उस का कहना था कि वह इतना इंतजार नहीं कर सकती. इसलिए उस ने रोहित को ही लकी को हमेशा के लिए रास्ते से हटाने की चुनौती दी ताकि दोनों साथ रह सकें.
इस के बाद मार्च महीने में ही दोनों ने लकी को खत्म करने की ठान ली थी. चूंकि इस काम में रिस्क बहुत था, इसलिए लकी की हत्या उस ने सुपारी किलर से कराने की योजना बनाई.
डीजे का काम करते हुए लकी ब्याज पर भी पैसे बांटता था. इसलिए काम का फायदा उठाने की योजना बना कर 3 कर्जदार बच्चू उर्फ बस्सू, मांगू उर्फ मग्गू, रंजीत और पप्पू से बात की.
दरअसल, रोहित ने इन सभी आरोपियों को लगभग 3 लाख रुपए उधार दिए हुए थे. इसलिए रोहित ने इन पर उधार दिया पैसा वापस मांग कर दबाव बनाया, जिस के बाद उन्हें लालच दिया कि अगर वे मिल कर लकी की हत्या कर दें तो वह न केवल उन का यह कर्ज माफ कर देगा, बल्कि उन्हें 60 हजार रुपए और भी देगा.
इस तरह कुल 3 लाख 60 हजार रुपए की सुपारी दे कर रोहित ने उक्त आरोपियों को लकी की हत्या के लिए राजी कर लिया और इस बात की खबर अपनी पे्रमिका नीलम को दी और उस के संग योजना बना कर मौके की तलाश करने लगे.
लेकिन धीरेधीरे 2 महीने बीत गए, रोहित लकी की हत्या के लिए मौका नहीं तलाश पाया. दूसरी तरफ लकी बारबार नीलम को फोन कर झाबुआ आने को कह रहा था. इस पर वह रोहित को जल्दी से जल्दी रास्ते से हटाने को बोलने लगी.
संयोग से 2 जून को रोहित की मां की मृत्यु हो गई तो रोहित ने अपनी मां की मृत्यु का उपयोग अपनी मोहब्बत को हासिल करने में किया. उस का कहना था कि मां की मौत के कारण पुलिस उस पर शक नहीं करेगी.
जब यह बात उस ने नीलम को बताई तो उस ने कहा कि ऐसा है तो ठीक है. तुम आदमी तैयार कर लो मैं लकी को जाल में फंसा कर मौत के पास ला कर खड़ा कर देती हूं.
इस के बाद नीलम ने लकी को फोन कर मीठीमीठी बातें कर उसे कटला बुला लिया. चूंकि इस से पहले नीलम ने कभी लकी को कटला आने को नहीं कहा था, इसलिए जब उस ने लकी को अपनी बातों मे फांस कर कटला आ कर अपने साथ लिवा जाने को कहा तो पत्नी की बात सुन कर लकी दूसरे दिन ही नीलम को लिवाने कटला के लिए निकल पड़ा.
जिस के बाद रास्ते में घात लगा कर बैठे सुपारी किलर लकी की हत्या कर पिपलौदा बड़ा के जंगल में लाश फेंक कर वापस गुजरात चले गए. लकी की हत्या की बात सुन कर नीलम बहुत खुश हुई, लेकिन पति की हत्या पर दुखी होने का नाटक कर तेरहवीं का इंतजार करने लगी.
दरअसल, उस की योजना लकी की तेरहवीं होने के बाद हमेशा के लिए मायके चली जाने की थी. लेकिन लकी ही हत्या के 7 दिन के बाद ही एसपी अरविंद तिवारी के निर्देशन में गठित टीम ने दोनों मुख्य आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया.
इन दोनों की गिरफ्तारी की खबर लगते ही सुपारी किलर भूमिगत हो गए थे. कथा लिखे जाने तक वे गिरफ्तार नहीं हुए थे.
पुलिस ने लकी पांचाल की हत्या की आरोपी उस की पत्नी नीलम और उस के प्रेमी रोहित राजपूत को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया.
—कथा पुलिस सूत्
पिछले दिनों मैं दीदी के बेटे नीरज के मुंडन पर मुंबई गई थी. एक दोपहर दीदी मुझे बाजार ले गईं. वे मेरे लिए मेरी पसंद का तोहफा खरीदना चाहती थीं. कपड़ों के एक बड़े शोरूम से जैसे ही हम दोनों बाहर निकलीं, एक गाड़ी हमारे सामने आ कर रुकी. उस से उतरने वाला युवक कोई और नहीं, विजय ही था. मैं उसे देख कर पल भर को ठिठक गई. वह भी मुझे देख कर एकाएक चौंक गया. इस से पहले कि मैं उस के पास जाती या कुछ पूछती वह तुरंत गाड़ी में बैठा और मेरी आंखों से ओझल हो गया. वह पक्का विजय ही था, लेकिन मेरी जानकारी के हिसाब से तो वह इन दिनों अमेरिका में है. मुंबई आने से 2 दिन पहले ही तो मैं मीनाक्षी से मिली थी.
उस दिन मीनाक्षी का जन्मदिन था. हम दोनों दिन भर साथ रही थीं. उस ने हमेशा की तरह अपने पति विजय के बारे में ढेर सारी बातें भी की थीं. उस ने ही तो बताया था कि उसी सुबह विजय का अमेरिका से जन्मदिन की मुबारकबाद का फोन आया था. विजय के वापस आने या अचानक मुंबई जाने के बारे में तो कोई बात ही नहीं हुई थी.
लेकिन विजय जिस तरह से मुझे देख कर चौंका था उस के चेहरे के भाव बता रहे थे कि उस ने भी मुझे पहचान लिया था. आज भी उस की गाड़ी का नंबर मुझे याद है. मैं उस के बारे में और जानकारी प्राप्त करना चाहती थी. लेकिन उसी शाम मुझे वापस दिल्ली आना था, टिकट जो बुक था. दीदी से इस बारे में कहती तो वे इन झमेलों में पड़ने वाले स्वभाव की नहीं हैं. तुरंत कह देतीं कि तुम अखबार वालों की यही तो खराबी है कि हर जगह खबर की तलाश में रहते हो.
दिल्ली आ कर मैं अगले ही दिन मीनाक्षी के घर गई. मन में उस घटना को ले कर जो संशय था मैं उसे दूर करना चाहती थी. मीनाक्षी से मिल कर ढेरों बातें हुईं. बातों ही बातों में प्राप्त जानकारी ने मेरे मन में छाए संशय को और गहरा दिया. मीनाक्षी ने बताया कि लगभग 6 महीनों से जब से विजय काम के सिलसिले में अमेरिका गया है उस ने कभी कोई पत्र तो नहीं लिखा हां दूसरे, चौथे दिन फोन पर बातें जरूर होती रहती हैं. विजय का कोई फोन नंबर मीनाक्षी के पास नहीं है, फोन हमेशा विजय ही करता है. विजय वहां रह कर ग्रीन कार्ड प्राप्त करने के जुगाड़ में है, जिस के मिलते ही वह मीनाक्षी और अपने बेटे विशु को भी वहीं बुला लेगा. अब पता नहीं इस के लिए कितने वर्ष लग जाएंगे.
मैं ने बातों ही बातों में मीनाक्षी को बहुत कुरेदा, लेकिन उसे अपने पति पर, उस के प्यार पर, उस की वफा पर पूरा भरोसा है. उस का मानना है कि वह वहां से दिनरात मेहनत कर के इतना पैसा भेज रहा है कि यदि ग्रीन कार्ड न भी मिले तो यहां वापस आने पर वे अच्छा जीवन बिता सकते हैं. कितन भोली है मीनाक्षी जो कहती है कि जीवन में आगे बढ़ने के लिए ऐसी चुनौतियों को स्वीकार करना ही पड़ता है.
मीनाक्षी की बातें सुन कर, उस का विश्वास देख कर मैं उसे अभी कुछ बताना नहीं चाह रही थी, लेकिन मेरी रातों की नींद उड़ गई थी. मैं ने दोबारा मुंबई जाने का विचार बनाया, लेकिन दीदी को क्या कहूंगी? नीरज के मुंडन पर दीदी के कितने आग्रह पर तो मैं वहां गई थी और अब 1 सप्ताह बाद यों ही पहुंच गई. मेरी चाह को राह मिल ही गई. अगले ही सप्ताह मुंबई में होने वाले फिल्मी सितारों के एक बड़े कार्यक्रम को कवर करने का काम अखबार ने मुझे सौंप दिया और मैं मुंबई पहुंच गई.
वहां पहुंचते ही सब से पहले अथौरिटी से कार का नंबर बता कर गाड़ी वाले का नामपता मालूम किया. वह गाड़ी किसी अमृतलाल के नाम पर थी, जो बहुत बड़ी कपड़ा मिल का मालिक है. इस जानकारी से मेरी जांच को झटका अवश्य लगा, लेकिन मैं ने चैन की सांस ली. मुझे यकीन होने लगा कि मैं ने जो आंखों से देखा था वह गलत था. चलो, मीनाक्षी का जीवन बरबाद होने से बच गया. मैं फिल्मी सितारों के कार्यक्रम की रिपोर्टिंग में व्यस्त हो गई.
एक सुबह जैसे ही मेरा औटो लालबत्ती पर रुका, बगल में वही गाड़ी आ कर खड़ी हो गई. गाड़ी के अंदर नजर पड़ी तो देखा गाड़ी विजय ही चला रहा था. लेकिन जब तक मैं कुछ करती हरीबत्ती हो गई और वाहन अपने गंतव्य की ओर दौड़ने लगे. मैं ने तुरंत औटो वाले को उस सफेद गाड़ी का पीछा करने के लिए कहा. लेकिन जब तक आटो वाला कुछ समझता वह गाड़ी काफी आगे निकल गई थी. फिर भी उस अनजान शहर के उन अनजान रास्तों पर मैं उस कार का पीछा कर रही थी. तभी मैं ने देखा वह गाड़ी आगे जा कर एक बिल्डिंग में दाखिल हो गई. कुछ पलों के बाद मैं भी उस बिल्डिंग के गेट पर थी. गार्ड जो अभी उस गाड़ी के अंदर जाने के बाद गेट बंद ही कर रहा था मुझे देख कर पूछने लगा, ‘‘मेमसाहब, किस से मिलना है? क्या काम है?’’
‘‘यह अभी जो गाड़ी अंदर गई है वह?’’
‘‘वे बड़े साहब के दामाद हैं, मेमसाहब.’’
‘‘वे विजय साहब थे न?’’
‘‘हां, मेमसाहब. आप क्या उन्हें जानती हैं?’’
गार्ड के मुंह से हां सुनते ही मुझे लगा भूचाल आ गया है. मैं अंदर तक हिल गई. विजय, मिल मालिक अमृत लाल का दामाद? लेकिन यह कैसे हो सकता है? बड़ी मुश्किल से हिम्मत बटोर कर मैं ने कहा, ‘‘देखो, मैं जर्नलिस्ट हूं, अखबार के दफ्तर से आई हूं, तुम्हारे विजय साहब का इंटरव्यू लेना चाहती हूं. क्या मैं अंदर जा सकती हूं?’’
‘‘मेमसाहब, इस वक्त तो अंदर एक जरूरी मीटिंग हो रही है, उसी के लिए विजय साहब भी आए हैं. अंदर और भी बहुत बड़ेबड़े साहब लोग जमा हैं. आप शाम को उन के घर में उन से मिल लेना.’’
‘‘घर में?’’ मैं सोच में पड़ गई. अब भला घर का पता कहां से मिलेगा?
लगता था गार्ड मेरी दुविधा समझ गया. अत: तुरंत बोला, ‘‘अब तो घर भी पास ही है. इस हाईवे के उस तरफ नई बसी कालोनी में सब से बड़ी और आलीशान कोठी साहब की ही है.’’
मेरे लिए इतनी जानकारी काफी थी. मैं ने तुरंत औटो वाले को हाईवे के उस पार चलने के लिए कहा. विजय और उस का सेठ इस समय मीटिंग में हैं. यह अच्छा अवसर था विजय के बारे में जानकारी हासिल करने का. विजय से बात करने पर हो सकता है वह पहचानने से ही इनकार कर दे.
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गार्ड का कहना ठीक था. उस नई बसी कालोनी में जहां इक्कादुक्का कोठियां ही खड़ी थीं, हलके गुलाबी रंग की टाइलों वाली एक ही कोठी ऐसी थी जिस पर नजर नहीं टिकती थी. कोठी के गेट पर पहुंचते ही नजर नेम प्लेट पर पड़ी. सुनहरे अक्षरों में लिखा था ‘विजय’ हालांकि अब विजय का व्यक्तित्व मेरी नजर में इतना सुनहरा नहीं रह गया था.
औटो वाले को रुकने के लिए कह कर जैसे ही मैं आगे बढ़ी, गेट पर खड़े गार्ड ने पहले तो मुझे सलाम किया, फिर पूछा कि किस से मिलना है और मेरा नामपता क्या है?
‘‘मैं एक अखबार के दफ्तर से आई हूं.
मुझे तुम्हारे विजय साहब का इंटरव्यू लेना है,’’ कहते हुए मैं ने अपना पहचानपत्र उस के सामने रख दिया.
‘‘साहब तो इस समय औफिस में हैं.’’
‘‘घर में कोई तो होगा जिस से मैं बात कर सकूं?’’
‘‘मैडम हैं. पर आप रुकिए मैं उन से पूछता हूं,’’ कह उस ने इंटरकौम द्वारा विजय की पत्नी से बात की. फिर उस से मेरी भी बात करवाई. मेरे बताने पर मुझे अंदर जाने की इजाजत मिल गई.
अंदर पहुंचते ही मेरा स्वागत एक 25-26 वर्ष की बहुत ही सुंदर युवती ने किया. दूध जैसा सफेद रंग, लाललाल गाल, ऊंचा कद, तन पर कीमती गहने, कीमती साड़ी. गुलाबी होंठों पर मधुर मुसकान बिखेरते हुए वह बोली, ‘‘नमस्ते, मैं स्मृति हूं. विजय की पत्नी.’’
‘‘आप से मिल कर बहुत खुशी हुई. विजय साहब तो हैं नहीं. मैं आप से ही बातचीत कर के उन के बारे में कुछ जानकारी हासिल कर लेती हूं,’’ मैं ने कहा.
‘‘जी जरूर,’’ कहते हुए उस ने मुझे सोफे पर बैठने का इशारा किया. मेरे बैठते ही वह भी मेरे पास ही सोफे पर बैठ गई.
इतने में नौकर टे्र में कोल्डड्रिंक ले आया. मुझे वास्तव में इस की जरूरत थी. बिना कुछ कहे मैं ने हाथ बढ़ा कर एक गिलास उठा लिया. फिर जैसेजैसे स्मृति से बातों का सिलसिला आगे बढ़ता गया, वैसेवैसे विजय की कहानी पर पड़ी धूल की परतें साफ होती गईं.
स्मृति विजय को कालेज के समय से जानती है. कालेज में ही दोनों ने शादी करना तय कर लिया था. विजय का तो अपना कोई है नहीं, लेकिन स्मृति के पिता, सेठ अमृतलाल को यह रिश्ता स्वीकार नहीं था. उन का कहना था कि विजय मात्र उन के पैसों की लालच में स्मृति से प्रेम का नाटक करता है. कितनी पारखी है सेठ की नजर, काश स्मृति ने उन की बात मान ली होती. वे स्मृति की शादी अपने दोस्त के बेटे से करना चाहते थे, जो अमेरिका में रहता था. लेकिन स्मृति तो विजय की दीवानी थी.
वाह विजय वाह, इधर स्मृति, उधर मीनाक्षी. 2-2 आदर्श, पतिव्रता पत्नियों का एकमात्र पति विजय, जिस के अभिनयकौशल की जितनी भी तारीफ की जाए कम है. स्मृति से थोड़ी देर की बातचीत में ही मेरे समक्ष पूरा घटनाक्रम स्पष्ट हो गया. हुआ यों कि जिन दिनों स्मृति को उस के पिता जबरदस्ती अमेरिका ले गए थे, विजय घबरा कर मुंबई की नौकरी छोड़ दिल्ली आ गया था और दिल्ली में उस ने मीनाक्षी से शादी कर ली. उधर अमेरिका पहुंचते ही सेठ ने स्मृति की सगाई कर दी, लेकिन स्मृति विजय को भुला नहीं पा रही थी. उस ने अपने मंगेतर को सब कुछ साफसाफ बता दिया. पता नहीं उस के मंगेतर की अपने जीवन की कहानी इस से मिलतीजुलती थी या उसे स्मृति की स्पष्टवादिता भा गई थी, उस ने स्मृति से शादी करने से इनकार कर दिया.
स्मृति की शादी की बात तो बनी नहीं थी. अत: वे दोनों यूरोप घूमने निकल गए. उस दौरान स्मृति ने विजय से कई बार संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी, क्योंकि विजय मुंबई छोड़ चुका था. 6 महीनों बाद जब वे मुंबई लौटे तो विजय को बहुत ढूंढ़ा गया, लेकिन सब बेकार रहा. स्मृति विजय के लिए परेशान रहती थी और उस के पिता उस की शादी को ले कर परेशान रहते थे.
एक दिन अचानक विजय से उस की मुलाकात हो गई. स्मृति बिना शादी किए लौट आई है, यह जान कर विजय हैरानपरेशान हो गया. उस की आंखों में स्मृति से शादी कर के करोड़पति बनने का सपना फिर से तैरने लगा.
मेरे पूछने पर स्मृति ने शरमाते हुए बताया कि उन की शादी को मात्र 5 महीने हुए हैं. मन में आया कि इसी पल उसे सब कुछ बता दूं. धोखेबाज विजय की कलई खोल कर रख दूं. स्मृति को बता दूं कि उस के साथ कितना बड़ा धोखा हुआ है. लेकिन मैं ऐसा न कर सकी. उस के मधुर व्यवहार, उस के चेहरे की मुसकान, उस की मांग में भरे सिंदूर ने मुझे ऐसा करने से रोक दिया.
मेरे एक वाक्य से यह बहार, पतझड़ में बदल जाती. अत: मैं अपने को इस के लिए तैयार नहीं कर पाई. यह जानते हुए भी कि यह सब गलत है, धोखा है मेरी जबान मेरा साथ नहीं दे रही थी. एक तरफ पलदोपल की पहचान वाली स्मृति थी तो दूसरी तरफ मेरे बचपन की सहेली मीनाक्षी. मेरे लिए किसी एक का साथ देना कठिन हो गया. मैं तुरंत वहां से चल दी. स्मृति पूछती ही रह गई कि विजय के बारे में यह सब किस अखबार में, किस दिन छपेगा? खबर तो छपने लायक ही हाथ लगी थी, लेकिन इतनी गरम थी कि इस से स्मृति का घरसंसार जल जाता. उस की आंच से मीनाक्षी भी कहां बच पाती. ‘बाद में बताऊंगी’ कह कर मैं तेज कदमों से बाहर आ गई.
मैं दिल्ली लौट आई. मन में तूफान समाया था. बेचैनी जब असहनीय हो गई तो मुझे लगा कि मीनाक्षी को सब कुछ बता देना चाहिए. वह मेरे बचपन की सहेली है, उसे अंधेरे में रखना ठीक नहीं. उस के साथ हो रहे धोखे से उसे बचाना मेरा फर्ज है.
मैं अनमनी सी मीनाक्षी के घर जा पहुंची. मुझे देखते ही वह हमेशा की भांति खिल उठी. उस की वही बातें फिर शुरू हो गईं. कल ही विजय का फोन आया था. उस के भेजे क्व50 हजार अभी थोड़ी देर पहले ही मिले हैं. विजय अपने अकेलेपन से बहुत परेशान है. हम दोनों को बहुत याद करता है. दोनों की पलपल चिंता करता है वगैरहवगैरह. एक पतिव्रता पत्नी की भांति उस की दुनिया विजय से शुरू हो कर विजय पर ही खत्म हो जाती है.
मेरे दिमाग पर जैसे कोई हथौड़े चला रहा था. विजय की सफल अदाकारी से मन परेशान हो रहा था. लेकिन जबान तालू से चिपक गई. मुझे लगा मेरे मुंह खोलते ही सामने का दृश्य बदल जाएगा. क्या मीनाक्षी, विजय के बिना जी पाएगी? क्या होगा उस के बेटे विशु का?
मैं चुपचाप यहां से भी चली आई ताकि मीनाक्षी का भ्रम बना रहे. उस की मांग में सिंदूर सजा रहे. उस का घरसंसार बसा रहे. लेकिन कब तक?
‘सदा सच का साथ दो’, ‘सदा सच बोलो’, और न जाने कितने ही ऐसे आदर्श वाक्य दिनरात मेरे कानों में गूंजने लगे हैं, लेकिन मैं उन्हें अनसुना कर रही हूं. मैं उन के अर्थ समझना ही नहीं चाहती, क्योंकि कभी मीनाक्षी और कभी स्मृति का चेहरा मेरी आंखों के आगे घूमता रहता है. मैं उन के खिले चेहरों पर मातम की काली छाया नहीं देख पाऊंगी.
पता नहीं मैं सही हूं या गलत? हो सकता है कल दोनों ही मुझे गलत समझें. लेकिन मुझ से नहीं हो पाएगा. मैं तब तक चुप रहूंगी जब तक विजय का नाटक सफलतापूर्वक चलता रहेगा. परदा उठने के बाद तो आंसू ही आंसू रह जाने हैं, मीनाक्षी की आंखों में, स्मृति की आंखों में, सेठ अमृतलाल की आंखों में और स्वयं मेरी भी आंखों में. फिर भला विजय भी कहां बच पाएगा? डूब जाएगा आंसुओं के उस सागर में.
लेखक- कमल कपूर
भोर हुई तो चिरैया का मीठासुरीला स्वर सुन कर पूर्वा की नींद उचट गई. उस की रिस्टवाच पर नजर गई तो उस ने देखा अभी तो 6 भी नहीं बजे हैं. ‘छुट्टी का दिन है. न अरुण को दफ्तर जाना है और न सूर्य को स्कूल. फिर क्या करूंगी इतनी जल्दी उठ कर? क्यों न कुछ देर और सो लिया जाए,’ सोच कर उस ने चादर तान ली और करवट बदल कर फिर से सोने की कोशिश करने लगी. लेकिन फोन की बजती घंटी ने उस के छुट्टी के मूड की मिठास में कुनैन घोल दी. सुस्त मन के साथ वह फोन की ओर बढ़ी. इंदु भाभी का फोन था.
‘‘इंदु भाभी आप? इतनी सुबह?’’ वह बोली.
‘‘अब इतनी सुबह भी नहीं है पुरवैया रानी, तनिक परदा हटा कर खिड़की से झांक कर तो देख, खासा दिन चढ़ गया है. अच्छा बता, कल शाम सैर पर क्यों नहीं आई?’’
‘‘यों ही इंदु भाभी, जी नहीं किया.’’
‘‘अरी, आती तो वे सब देखती, जो इन आंखों ने देखा. जानती है, तेरे वे संदीप भाई हैं न, उन्होंने…’’
और आगे जो कुछ इंदु भाभी ने बताया उसे सुन कर तो जैसे पूर्वा के पैरों तले की जमीन ही निकल गई. रिसीवर हाथ से छूटतेछूटते बचा. अपनेआप को संभाल कर वह बोली, ‘‘नहीं इंदु भाभी, ऐसा हो ही नहीं सकता. मैं संदीप भाई को अच्छी तरह जानती हूं, वे ऐसा कर ही नहीं सकते. आप से जरूर देखने में गलती हुई होगी.’’
‘‘पूर्वा, मैं ने 2 फुट की दूरी से उस मोटी खड़ूस को देखा है. बस, लड़की कौन है, यह देख न पाई. उस की पीठ थी मेरी तरफ.’’
इंदु भाभी अपने खास अक्खड़ अंदाज में आगे क्या बोल रही थीं, कुछ सुनाई नहीं दे रहा था पूर्वा को. रिसीवर रख कर जैसेतैसे खुद को घसीटते हुए पास ही रखे सोफे तक लाई और बुत की तरह बैठ गई उस पर. सुबहसुबह यह क्या सुन लिया उस ने? साक्षी के साथ इतनी बड़ी बेवफाई कैसे कर सकते हैं संदीप भाई और वह भी इतनी जल्दी? अभी वक्त ही कितना हुआ है उस हादसे को हुए. बमुश्किल 8 महीने ही तो. हां, 8 महीने पहले की ही तो बात है, जब भोर होते ही इसी तरह फोन की घंटी बजी थी. वह दिन आज भी ज्यों का त्यों उस की यादों में बसा है…
उस रात पूर्वा बड़ी देर से अरुण और सूर्य के साथ भाई की शादी से लौटी थी. थकान और नींद से बुरा हाल था, इसलिए आते ही बिस्तर पर लेट गई थी. आंख लगी ही थी कि रात के सन्नाटे को चीरती फोन की घंटी ने उसे जगा दिया. घड़ी पर नजर गई तो देखा 4 बजे थे. ‘जरूर मां का फोन होगा… जब तक बेटी के सकुशल पहुंचने की खबर नहीं पा लेंगी उन्हें चैन थोड़े ही आएगा,’ सोचते हुए वह नींद में भी मुसकरा दी, लेकिन आशा के एकदम विपरीत संदीप का फोन था.
‘पूर्वा भाभी, मैं संदीप बोल रहा हूं,’ संदीप बोला.
वह चौंकी, ‘संदीप भाई आप? इतनी सुबह? सब ठीक तो है न?’
‘कुछ ठीक नहीं है पूर्वा भाभी, साक्षी चली गई,’ भीगे स्वर में वह बोला था.
‘साक्षी चली गई? कहां चली गई संदीप भाई? कोई झगड़ा हुआ क्या आप लोगों में? आप ने उसे रोका क्यों नहीं?’
‘भाभी… वह चली गई हमेशा के लिए…’
‘क्या? संदीप भाई, यह क्या कह रहे हैं आप? होश में तो हैं? कहां है मेरी साक्षी?’ पागलों की तरह चिल्लाई पूर्वा.
‘पूर्वा, वह मार्चुरी में है… हम अस्पताल में हैं… अभी 2-3 घंटे और लगेंगे उसे घर लाने में, फिर जल्दी ही ले जाएंगे उसे… तुम समझ रही हो न पूर्वा? आखिरी बार अपनी सहेली से मिल लेना…’ यह सुनंदा दीदी थीं. संदीप भाई की बड़ी बहन.
फोन कट चुका था, लेकिन पूर्वा रिसीवर थामे जस की तस खड़ी थी. तभी अपने कंधे पर किसी हाथ का स्पर्श पा कर डर कर चीख उठी वह.
‘अरेअरे, यह मैं हूं पूर्वा,’ अरुण ने सामने आ कर उसे बांहों में भर लिया, ‘बहुत बुरा हुआ पूर्वा… मैं ने सब सुन लिया है. अब संभालो खुद को,’ उसे सहारा दे कर अरुण पलंग तक ले गए और तकिए के सहारे बैठा कर कंबल ओढ़ा दिया, ‘सब्र के सिवा और कुछ नहीं किया जा सकता है पूर्वा. मुझे संदीप के पास जाना चाहिए,’ कोट पहनते हुए अरुण ने कहा तो पूर्वा बोली, ‘मैं भी चलूंगी अरुण.’
‘तुम अस्पताल जा कर क्या करोगी? साक्षी तो…’ कहतेकहते बात बदल दी अरुण ने, ‘सूर्य जाग गया तो रोएगा.’
अरुण दरवाजे को बाहर से लौक कर के चले गए. कैसे न जाते? उन के बचपन के दोस्त थे संदीप भाई. उन की दोस्ती में कभी बाल बराबर भी दरार नहीं आई, यह पूर्वा पिछले 9 साल से देख रही थी. पिछली गली में ही तो रहते हैं, जब जी चाहता चले आते. यों तो संदीप अरुण के हमउम्र थे, लेकिन विवाह पहले अरुण का हुआ था. संदीप भाई को तो कोई लड़की पसंद ही नहीं आती थी. खुद तो देखने में ठीकठाक ही थे, लेकिन अरमान पाले बैठे थे स्वप्नसुंदरी का, जो उन्हें सुनंदा दीदी के देवर की शादी में कन्या पक्ष वालों के घर अचानक मिल गई. बस, संदीप भाई हठ ठान बैठे और हठ कैसे न पूरा होता? आखिर मांबाप के इकलौते बेटे और 2 बहनों के लाड़ले छोटे भाई जो थे. लड़की खूबसूरत, गुणवान और पढ़ीलिखी थी, फिर भी मां बहुत खुश नहीं थीं, क्योंकि उन की तुलना में लड़की वालों का आर्थिक स्तर बहुत कम था. लड़की के पिता भी नहीं थे. बस मां और एक छोटी बहन थी.
बिना मंगनीटीका या सगाई के सीधे विवाह कर दुलहन को घर ले आए थे संदीप भाई के घर वाले. साक्षी सुंदर और सादगी की मूरत थी. पूर्वा ने जब पहली बार उसे देखा था, तो संगमरमर सी गुडि़या को देखती ही रह गई थी.
संदीप भाई के विवाह के 18वें दिन बाद सूर्य का पहला जन्मदिन था और साक्षी ने पार्टी का सारा इंतजाम अपने हाथों में ले लिया था.
संदीप भाई बहुत खुश और संतुष्ट थे अपनी पत्नी से, लेकिन घोर अभावों में पली साक्षी को काफी वक्त लगा था उन के घर के साथ सामंजस्य बैठाने में. फिर 5 महीने बाद जब साक्षी ने बताया कि वह मां बनने वाली है तो संदीप भाई खुशी से नाच उठे थे. पलकों पर सहेज कर रखते थे उसे.
डाक्टर ने सुबहशाम की सैर बताई थी साक्षी को और यह जिम्मेदारी संदीप भाई ने पूर्वा को सौंप दी थी यह कहते हुए कि पूर्वा भाभी, आप तो सुबहशाम सैर पर जाती हैं न, मेरी इस बावली को भी ले जाया करें. मेरी तो ज्यादा चलने की आदत नहीं.
और सुबहशाम की सुहानी सैर ने पूर्वा और साक्षी के दिलों के तारों को जैसे जोड़ दिया था. साक्षी चलतेचलते थक जाती तो पार्क की बेंच पर बैठ जाती और छोटी से छोटी बात भी उसे बताती, ‘पूर्वा भाभी, बाकी सब तो ठीक है. संदीप तो जान छिड़कते हैं मुझ पर, लेकिन मम्मीजी मुझे ज्यादा पसंद नहीं करतीं. गाहेबगाहे सीधे ही ताना देती हैं कि मैं खाली हाथ ससुराल आई हूं, एक से एक धन्नासेठ उन के घर संदीप के लिए रिश्ता ले कर आते रहे पर… और दुनिया में गोरी चमड़ी ही सब कुछ नहीं होती वगैरहवगैरह.’
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