इश्क में रुकावट बना देवर तो कर दिया Murder

Murder : मोबाइल की घंटी लगातार बज रही थी. नीरज सहरावत नहाने में इतना मस्त था कि उस ने मोबाइल की  घंटी की आवाज पर ध्यान ही नहीं दिया. नहाने के बाद तौलिया लपेट कर वह कमरे में आया तो जैसे ही वह शीशे के सामने खड़ा हुआ तो उस की नजर टेबल पर रखे मोबाइल फोन पर गई. उसे उठा कर उस ने देखा तब उसे स्क्रीन पर 4 मिस्ड काल नजर आईं. वह मिस काल्स सीमा उर्फ ङ्क्षरकू की थीं.

अरे बाप रे!नीरज अपनी जगह उछल पड़ा, ‘मैडम ने 4 बार मुझे काल की है, मैं ने इन्हें रिसीव नहीं किया. आज तो मैडम गुस्से से लाल हो जाएगी.

नीरज ने सीमा का नंबर मिला दिया. एकदो बार की घंटी बजी. दूसरी तरफ सीमा जैसे मोबाइल हाथ में ले कर ही बैठी थी. उस का तमतमाया स्वर उभरा, ”कहां थे जनाब..?’’

जानू… मैं किचन में खिचड़ी पका रहा था,’’ नीरज ने बहाना बनाया, ”खिचड़ी जल न जाए, इसलिए उस में कड़छी घुमा रहा था. मोबाइल कमरे में था, जिस की घंटी किचन में सुनाई नहीं दी मुझे.’’

मक्कार!’’ सीमा भुनभुनाई, ”तुम्हें खिचड़ी का ही बहाना मिला. मैं जानती हूं तुम्हें गैस तक ठीक से जलानी नहीं आती.’’ 

”तभी तो कहता हूं जानू, तुम मेरे घर हमेशा के लिए आ जाओ, मेरी गैस जलाने वाला यहां कोई नहीं है.’’ नीरज इतनी कातर आवाज में बोला कि दूसरी तरफ सीमा खिलखिला कर हंस पड़ी, ”बस, कुछ दिन और होटल की खा लो, फिर मैं परमानेंट तुम्हारी जिंदगी में आ जाऊंगी.’’

उस दिन मैं घी के दीए जलाऊंगा सीमा,’’ नीरज खुशी से चहका, ”बताओ, फोन किसलिए कर रही थी?’’

”आज दिल तुम्हारी बाहों में मचलने के लिए तड़प रहा है.’’

लेकिन तुम्हारे घर में तुम्हारा पति दीपक होगा.’’

वो काम पर ओवरटाइम कर रहा है.’’

हूं, फिर भी हम तुम्हारे घर में नहीं मिल सकते.’’ नीरज गंभीर हो गया, ”घर में तुम्हारा देवर रवि जोंक की तरह पलंग पर हर वक्त चिपका रहता है.’’

हां, रवि अभी भी अपने कमरे में पलंग पर पड़ा मोबाइल देख रहा है. घर में मिलना किसी भी तरह संभव नहीं है. कोई अन्य ठिकाना ढूंढो.’’

नीरज सहरावत कुछ देर के लिए मौन हो गया. वह सोच रहा था सीमा उर्फ रिंकू को मौजमस्ती के लिए कहां ले कर जाए. एकाएक उसे अपने दोस्त नीरज दहिया की याद आ गई. वह उसी कालोनी शिव एनक्लेव में अकेला रहता था, जहां सीमा उर्फ रिंकू रहती थी. 

नीरज सहरावत ने इस के लिए नीरज दहिया से पूछ लेना जरूरी समझा.

सीमा, तुम्हें मैं 10 मिनट बाद फोन करता हूं.’’ नीरज सहरावत ने कहा और फोन डिसकनेक्ट कर के उस ने नीरज दहिया को काल कर अपनी बात कहते हुए 2-3 घंटे के लिए अपना रूम देने को कहा.

नीरज दहिया ने उस से कह दिया कि वह आ जाए, वह 2-3 घंटे के लिए बाहर चला जाएगा. उस की बात सुन कर नीरज सहरावत खुश होते हुए बोला, ”धन्यवाद दोस्त.’’

मैं सीमा को साथ ले कर एक घंटा में तुम्हारे घर पहुंच रहा हूं.’’

नीरज सहरावत ने काल डिसकनेक्ट कर तुरंत सीमा को यह जानकारी दी और 15-20 मिनट में ही उसे पार्क के पास मिलने के लिए कह दिया. 5-7 मिनट में ही नीरज सहरावत अपना घर लौक कर के बाइक से ढिचाऊं के लिए निकल गया.

नजफगढ़ के ढिचाऊं रोड पर पहुंच कर उस ने शिव एनक्लेव का रुख किया. उसे पार्क के गेट से हट कर खड़ी सीमा नजर आ गई. उस के पास पहुंच कर नीरज ने बाइक रोक दी.

हाय जानू.’’ नीरज सहरावत के होंठ हिले, ”मुझे ज्यादा देर तो नहीं हुईï?’’

नहीं. मैं भी घर से अभीअभी आई हूं.’’ सीमा मुसकरा कर बोली, ”यहां क्यों बुलाया है तुम ने?’’

”बाइक पर बैठ जाओ, यहीं पास में मेरा दोस्त नीरज दहिया रहता है, हम उसी के घर चल रहे हैं.’’ सीमा उर्फ रिंकू उचक कर उस की बाइक पर बैठ गई. वह उसे ले कर नीरज दहिया के घर पहुंच गया.

अब तुम 2 घंटे के लिए मेरे घर मे कैद हो जाओ. मैं ताला बंद कर के 2 घंटा टहल आता हूं.’’ नीरज दहिया दोस्त की तरफ देख कर मुसकराते हुए बोला.

नीरज सहरावत सीमा उर्फ रिंकू के साथ कमरे में घुस गया. नीरज दहिया ने कमरे को बाहर से लौक कर दिया और चाबी जेब में डाल कर वह लापरवाही से एक तरफ बढ़ गया.

रवि कैसे हुआ अचानक गायब

24 मार्च, 2024 को सुबह दिल्ली के द्वारका जिले के थाना हरिदास नगर में एक महिला परेशान हालत में एसएचओ बलराम सिंह बेनीवाल के पास पहुंची. उस की परेशान सूरत देख कर बेनीवाल ने उसे बिठा कर बड़ी आत्मीयता से पूछा, ”क्या हुआ, तुम इतनी परेशान क्यों हो?’’

साहब मेरा नाम ज्योति है, मेरा भाई रवि कुमार 5-6 मार्च की रात से लापता है. उस की मैं ने अपने पति और बड़ी बहन के साथ हर मुमकिन जगह पर तलाश की है, वह कहीं भी नहीं मिल रहा है.’’

रवि की उम्र कितनी है?’’ बेनीवाल ने पूछा.

रवि 31 वर्ष के आसपास का है साहब. यहां ढिचाऊं रोड पर शिव एनक्लेव में अपने भाई और भाभी के साथ में रहता था. उसे आप तलाशने की कृपा करें.’’ ज्योति की आवाज में कंपन था.

तुम्हें किसी पर शक है, कोई ऐसा व्यक्ति जिस से तुम्हारे भाई की दुश्मनी रही हो या कोई लेनदेन का मामला हो.’’ 

मुझे किसी पर संदेह नहीं है साहब.’’ ज्योति ने कहा.

काम क्या करता था, तुम्हारा भाई?’’

साहब, वह अपने ही खेत में खेती करता था.’’

एसएचओ बेनीवाल ने एसआई के साथ ज्योति को भेज कर गुमशुदगी दर्ज करा दी. फिर ज्योति को आश्वासन दिया कि वह इस मामले को गंभीरता से हैंडिल करेंगे. जल्दी ही वह रवि को ढूंढ निकालेंगे. ज्योति आश्वासन पा कर वापस लौट गई. एसएचओ बलराम सिंह बेनीवाल ने डीसीपी (द्वारका) अंकित सिंह को रवि की गुमशुदगी के बारे में बता कर सलाह मांगी. डीसीपी अंकित सिंह ने गंभीरता से इस मामले में दिलचस्पी ली. उन्होंने लव अफेयर और लेनदेन वाले एंगल पर एसएचओ को जांच करने के निर्देश दिए.

पुलिस जुटी जांच में

इस के बाद एसएचओ 2 कांस्टेबल ले कर शिव एनक्लेव में स्थित रवि कुमार के घर की ओर रवाना हो गए. ज्योति ने गुमशुदगी की सूचना में अपने बड़े भाई दीपक के घर का एड्रैस लिखवाया था, वह उसी एड्रैस पर दीपक के घर पहुंचे तो घर में दीपक, उस की पत्नी सीमा उर्फ रिंकू मिल गए. पुलिस को देख कर दोनों सकते में आ गए. दीपक लपक कर दरवाजे पर आ गया. वैन से एसएचओ बेनीवाल कांस्टेबल के साथ उतरे.

मैं द्वारका थाने से आया हूं, ज्योति ने रिपोर्ट लिखवाई है कि रवि 5-6 मार्च से घर से लापता है.’’ दीपक के चेहरे पर नजरें गड़ा कर बेनीवाल ने बड़ी गंभीरता से कहा

ज्योति का दिमाग खराब हो गया है साहब.’’ दीपक के कुछ कहने से पहले ही सीमा उर्फ रिंकू जो अपने पति के पीछे ही दरवाजे पर आ गई थी. नाक सिकोड़ कर बोली, ”मुझ से वह इस बारे में ही पूछ रही थी, मैं ने उसे संतुष्ट कर दिया था, फिर भी वह रिपोर्ट लिखवाने थाने पहुंच गई.’’

कैसे संतुष्ट किया था तुम ने ज्योति को?’’ बेनीवाल सीमा को ऊपर से नीचे तक देख कर बोले, ”क्या रवि लापता नहीं हुआ है?’’ 

”यही तो कहा था साहब मैं ने. रवि बेशक 5-6 मार्च की रात को कहीं चला गया है, लेकिन उस के इंस्टाग्राम पर बराबर मैसेज आ रहे हैं. वह मैसेज कर रहा है, लेकिन कहां है, यह नहीं बता रहा है. ऐसे में कैसे कह दें कि वह गुम हो गया है.’’

उस के द्वारा किए गए मैसेज दिखाओगी मुझे?’’ बेनीवाल ने पूछा.

क्यों नहीं साहब.’’ वह बोली.

यह औरत जरूरत से ज्यादा तेज है,’ बेनीवाल सोचने लगे.

सीमा अंदर कमरे में चली गई. कुछ ही देर में अपना और अपने पति दीपक का मोबाइल ले कर बाहर आ गई. अपने वाट्सऐप ग्रुप खोल कर बेनीवाल को दिखाया, ”देख लीजिए, रवि ने अभी कुछ दिन पहले मैसेज किया है, भाईभाभी मैं जहां हूं ठीक हूं, मेरी चिंता न करना. मैं शीघ्र एक काम निपटा कर लौटूंगा.’’

यह भी देखिए,’’ सीमा ने कहा, ”रवि सोशल मीडिया पर भी ऐक्टिव है, उस ने अपनी पुरानी फोटो अपलोड की है.’’ 

बेनीवाल ने देखा तो उन्हें लगा, रवि के बारे में उस की भाभी झूठ नहीं बोल रही है. रवि जिंदा है और कहीं किसी जरूरी काम में फंसा हुआ है.’’ 

ठीक है, रवि का आप लोग इंतजार कीजिए, वह लौट कर आ जाए तो थाना हरिदास नगर में सूचित कर दें.’’

जी साहब.’’ इस बार दीपक ने होंठ खोले. बेनीवाल को स्टाफ के साथ वापस होना पड़ा. पुलिस यह मान कर कि रवि सहीसलामत है. कुछ समय के लिए पुलिस शांत बैठ गई. दिन निकलते गए. तारीखें बदलती रहीं, लेकिन रवि किसी के सामने नहीं आया. हां, उस के द्वारा भेजे जा रहे मैसेज और पुरानी फोटो सीमा और दीपक के मोबाइल पर आते रहे. इस से ही माना गया कि रवि जहां भी है, एकदम ठीक लेकिन ज्योति अपने भाई के लिए बहुत चिंतित थी. 

धीरेधीरे कर के रवि को घर से गए 2 माह के लगभग होने को आ गए थे. ज्योति के सब्र का बांध टूटने लगा था. उसे लगने लगा था रवि किसी साजिश का शिकार हो गया है. भैयाभाभी के भेजे जा रहे मैसेज फ्रौड हैं. यदि ऐसा नहीं है तो रवि को क्या डर है, वह सामने क्यों नहीं आ रहा है.

डीसीपी के आदेश पर जांच में कैसे आया नया मोड़

ज्योति एक बार फिर थाना हरिदास नगर पहुंच गई. पुलिस के द्वारा उसे समझाया गया कि रवि जीवित है. ज्योति यह मानने को तैयार नहीं थी. उस ने सीधे डीसीपी अंकित सिंह से संपर्क किया और कहा कि कोई हम सभी को गुमराह कर रहा है साहब. यदि मेरा भाई सहीसलामत होता तो क्यों मुंह छिपा कर बैठा रहता. उसे कभी का सामने आ जाना चाहिए था. 

बात ठीक ही थी. ज्योति को वापस भेज कर डीसीपी अंकित सिंह ने एसएचओ से संपर्क किया. डीसीपी ने इस जांच में अब एएटीएस इंचार्ज इंसपेक्टर कमलेश कुमार, एसआई दिनेश कुमार, एएसआई विद्यानंद, हैडकांस्टेबल जगत सिंह, संदीप आदि को भी लगा दिया. टीम का नेतृत्व एसीपी (औपरेशन) राम अवतार को सौंप दिया.’’ 

पुलिस टीमें गहनता से इस जांच में जुट गईं. सर्विलांस टीम की मदद ली गई. इस से पता चला कि रवि का मोबाइल नंबर 8 मार्च, 2024 तक उस के घर के आसपास ही मौजूद था. इस के बाद 19 मार्च को इस नंबर की लोकेशन जनकपुरी (दिल्ली) की शो हुई.

जांच टीम हैरान थी. यदि रवि 5-6 मार्च की रात को घर से चला गया था तो फोन भी उसी के साथ रहा होगा. ऐसे में 8 मार्च तक उस के फोन की लोकेशन उस के घर के आसपास कैसे हो सकती है. क्या रवि 8 मार्च तक घर में ही छिप कर बैठा रहा था.

यह असंभव था. क्योंकि ऐसा होता तो वह अपनी भाभी और भाई को अवश्य दिखाई देता. जांच टीम उस लोकेशन पर गई, जो जनकपुरी का था. वहां कुछ खास हाथ नहीं लगा. यह अनुमान लगा लिया गया कि रवि 8 मार्च के बाद जनकपुरी आया होगा. यहां से उस के फोन की लोकेशन उत्तर प्रदेश की ओर शो हो रही थी.

जांच टीम ने रवि के मोबाइल नंबर की काल डिटेल 5-6 मार्च और बाद की निकाली तो मालूम हुआ कि रवि ने 5-6 मार्च की रात आखिरी काल एक नंबर पर की थी. वह नंबर नीरज सहरावत का था. पुलिस ने जांच की तो पता चला कि 5-6 मार्च को दीपक की पत्नी सीमा उर्फ ङ्क्षरकू की लोकेशन नीरज सहरावत और रवि के मोबाइल की लोकेशन उत्तर प्रदेश की मिली.

इस के अलावा पुलिस को दीपक के घर के बाहर लगे सीसीटीवी कैमरे की एक फुटेज में रवि नजर आया. यह फुटेज 5-6 मार्च की रात 8-9 बजे की थी. इस से यह मालूम हुआ कि 5-6 मार्च की रात 8-9 बजे के बीच रवि घर से निकल कर गया था. 5-6 मार्च की रात को रवि, नीरज और सीमा की लोकेशन उत्तर प्रदेश की है तो स्पष्ट है कि उस रात तीनों साथसाथ थे.’’

इस के बाद जांच टीम यूपी को जाने वाले हाइवे पर टोल प्लाजा की जांच के लिए रवाना हो गई.  गाजियाबाद, मेरठ वाले रास्ते में पडऩे वाले टोल प्लाजा पर ही उन्हें सफलता मिल गई. नीरज सहरावत रवि के साथ एक स्विफ्ट कार में सवार सीसीटीवी फुटेज में साफसाफ दिखाई दे गया था. यह फुटेज 5-6 मार्च की रात 10 बजे की थी. उन के पास जो कार थी, वह सीमा उर्फ ङ्क्षरकू की थी. इस से यह साबित हो गया कि रवि को लापता करने में नीरज सहरावत और सीमा का हाथ है.

सीमा की जुबानी निकली मौत की कहानी

उसी शाम नीरज सहरावत और सीमा को पूछताछ के लिए थाने में लाया गया. वहां उन से सख्ती से पूछताछ की गई तो पहले सीमा उर्फ रिंकू स्वीकार कर लिया, ”मैं ने ही अपने देवर रवि की अपने प्रेमी के द्वारा हत्या करवाई है. मैं अपना गुनाह कुबूल करती हूं.’’

उसी समय नीरज सहरावत ने भी कुबूल कर लिया कि उस ने सीमा के कहने पर रवि को हत्या की थी.’’

तुम ने रवि को क्यों मरवाया?’’ इंसपेक्टर ने पूछा.

”सर, मैं नीरज सहरावत से प्यार करती हूं. मैं पति दीपक को छोड़ कर इसी के साथ रहना चाहती थी, किंतु देवर रवि हमारे प्यार में बाधक बन रहा था. वह नीरज को मेरे साथ हंसतेबोलते देख कर चिढ़ता था.

दूसरी बात अभी कुछ दिनों पहले रवि ने पैतृक संपत्ति बेच कर 18 लाख रुपया पाया था, उस से मैं ने कुछ रुपए उधार लिए थे. वह उन पैसों को लौटाने की जिद कर रहा था. मैं रुपए वापस नहीं करना चाहती थी, इसलिए मैं ने अपनी राह से कांटा निकाल फेंकने के लिए प्रेमी नीरज से बात की. उस ने अपने एक दोस्त के साथ मिल कर प्लान बनाया. 

वह हरिद्वार नहाने के बहाने रवि को साथ ले कर मेरी स्विफ्ट कार से हरिद्वार रोड पर निकले. रास्ते में नीरज ने उस की गोली मार कर हत्या कर दी.’’ 

रवि की लाश कहां है?’’ एसएचओ बेनीवाल ने पूछा. 

वह मैं ने गंगनहर में फेंक दी थी, अब तक वो वह मिट्टी बन गई होगी.’’ नीरज सहरावत ने बताया.

इंसपेक्टर कमलेश कुमार अपनी टीम को साथ ले कर वैन द्वारा गंगनहर के लिए निकले. नीरज उन्हें गंगनहर (मोदी नगर) ले गया. जिस जगह उन्होंने रवि की लाश गंगनहर में फेंकी थी, वहां तेज पानी के बहाव से वह आगे निकल गई होगी. इसलिए पुलिस ने आसपास के थानों में संपर्क किया तो उन्हें बताया गया कि 2 महीने पहले एक लाश सरधना पुलिस को मिली थी.

सरधना पुलिस से संपर्क करने पर उस लाश के कपड़े, पर्स, जूते आदि मिल गए. सरधना पुलिस को लाश लावारिस मिली थी, उस की हर तरह से पहचान करने की कोशिश की गई थी, पता न चलने पर उस का पोस्टमार्टम करवा कर पुलिस ने लाश का अंतिम संस्कार कर दिया था.

आवश्यक लिखापढ़ी करने के बाद पुलिस टीम वापस दिल्ली आ गई. हत्या में प्रयुक्त सौफिस्टिकेटेड पिस्टल नौरज सहरावत को अभिनव मलिक ने उपलब्ध करवाई थी. नीरज दहिया शिव एनक्लेव में रहता था और नीरज सहरावत से उस की गहरी दोस्ती थी. 

रवि की हत्या में इस का भी हाथ था. इसी ने नीरज सहरावत को अभिनव मलिक से पिस्टल खरीदवाई थी. अभिनव मलिक उत्तर प्रदेश के गांव यूसुफपुर-ईसापुर (गाजियाबाद) का निवासी था.

पुलिस ने इन दोनों को भी गिरफ्तार कर लिया. इन की निशानदेही पर एक पिस्टल और एक जिंदा कारतूस, 3 मोबाइल फोन पुलिस ने बरामद किए. पुलिस सभी आरोपियों से पूछताछ करने के बाद उन्हें कोर्ट में पेश किया, जहां से सभी को जेल भेज दिया गया.

ये इतने शातिर थे कि रवि की हत्या हो जाने के बाद भी उसी के मोबाइल द्वारा सीमा और दीपक को वाट्सऐप पर मैसेज तथा फोटो भेज कर यह जाहिर करवा रहे थे कि रवि अभी जीवित है और मोबाइल द्वारा उन से जुड़ा हुआ है. लेकिन पुलिस के सामने उन की सारी चालें फेल हो गई थीं.

लेखक – उमेशचंद्र त्रिवेदी

Bollywood : हमले के बाद अब रौनित रौय करेंगे सैफ अली खान को प्रोटेक्ट

Bollywood : हाल ही में जाने माने एक्टर और पटौदी खानदान के नवाब ‘सैफ अली खान’ (Saif Ali Khan) पर हुए हमले ने सभी को हैरान कर दिया था. जैसा कि हम सब जानते हैं कि सैफ अली खान (Saif Ali Khan) के घर एक शख्स चोरी के इरादे से आया और इसी दौरान सैफ ने अपनी फैमिली को प्रोटेक्ट करने के लिए चोर से हाथापाई की जिसके चलते चोर ने सैफ पर चाकू से हमला कर दिया और सैफ गंभीर रूप से घायल हो गए. ऐसे में सभी के मन में सवाल आया कि इस सबके चलते सैफ के सिक्योरिटी गार्ड्स कहां थे और कोई उन्हें बचाने क्यों नहीं आया.

अस्पताल से डिस्चार्ज हुए सैफ अली खान

एक्टर सैफ अली खान (Saif Ali Khan) के फैंस के लिए एक राहत भरी खबर है कि अब उनकी हालत पहले से ठीक है और उन्हें लीलावती अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया है. आपको बता दें कि जिस चोर से सैफ पर हमला किया था वे पकड़ा जा चुका है लेकिन हैरानी की बात यह है कि वे चोर बांग्लादेशी है और अवैध रूप से हिंदुस्तान में रह रहा था.

रौनित रौय देंगे सैफ अली खान को प्रोटेक्शन

पौपुलर एक्टर रौनित रौय (Ronit Roy) को तो आप जानते ही होंगे लेकिन क्या आप यह बात जानते हैं कि रौनित रौय (Ronit Roy) एक्टर होने के साथ साथ एक सिक्योरिटी एक्सपर्ट भी हैं और खुद की सिक्योरिटी कंपनी भी चलाते हैं जिसका नाम है ‘ऐस सिक्योरिटी एंड प्रोटेक्शन’ (Ace Security and Protection). एक्टर सैफ अली खान (Saif Ali Khan) पर हुए हमले के बाद से अब सैफ ने रौनित रौय को अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपी है. ऐसे में अब से सैफ की सिक्योरिटी रौनित रौय (Ronit Roy) की कंपनी देखेगी और इस बात का पूरे तरीके से खयाल रखेगी कि सैफ पूरी तरह सुरक्षित रहें.

एक्टिंग से जीता रौनित रौय ने फैंस का दिल

एक्टर रौनित रौय (Ronit Roy) ने बतौर एक्टर कई सारे सीरियल्स और फिल्म्स की हैं और अपनी एक्टिंग से लोगों का दिल जीता है. रौनित रौय (Ronit Roy) ने ‘कसौटी जिंदगी की’ (Kasautii Zindagi Kay) और ‘जीवन साथी’ (Jeevan Saathi) जैसे पौपुलर सीरियल्स में अहम किरदार निभाया है और साथ ही ‘2 स्टेट्स’ (2 States), ‘कहानी 2’ (Kahaani 2), ‘उड़ान’ (Udaan), और ‘शूटआउट एट लोखंडवाला’ (Shootout at Lokhandwala) जैसी फिल्म्स में भी अपनी अदाकारी दिखाई है.

Social Story : मंदिर की चौखट

Social Story : यहां तक कि गणित का जो सवाल पूरी कक्षा से हल न होता उसे राहुल जरूर हल कर देता था. तभी तो मदर प्रिंसिपल गर्व से कहती थीं कि राहुल की प्रतिभा का कोई सानी नहीं है. और राहुल ने भी कभी उन को निराश नहीं किया. अंतरविद्यालयीन मुकाबलों में जीते पुरस्कार उस की प्रतिभा के प्रत्यक्ष प्रमाण थे. इतना मेधावी राहुल फिर आज बेचैन क्यों था? क्यों आज वह मानवीय आचरण की गुत्थी में उलझ कर रह गया था? क्यों वह नहीं समझ पा रहा था कि इनसान इतना संवेदनहीन भी हो सकता है? हुआ यह कि कल गणित का पेपर था और आज राहुल के पड़ोस में जागरण हो रहा था. कोई और दिन होता तो राहुल बढ़चढ़ कर जागरण मंडली के साथ मां की भेंटें गा रहा होता और ढोलमजीरे की लय पर आंखें बंद किए पुजारी को गरदन घुमाते हुए वह श्रद्धाभाव से देख रहा होता लेकिन आज बात कुछ और थी. उसे परीक्षा की तैयारी करनी थी. उसे पास होने की नहीं बल्कि प्रदेश में प्रथम स्थान पाने की चिंता थी. उसे अपने अध्यापकों, सहपाठियों तथा मातापिता, सब की आकांक्षाओं पर खरा उतरना था. यही कारण था कि मंदिर से लाउडस्पीकर की आ रही ध्वनि उसे बारबार परेशान कर रही थी.

भक्तजनों ने ‘जयजगदंबे’, ‘जय महाकाली’ के जयकारे लगाए तो लगा, उस के दिमाग पर वे लोग हथौड़ों की तरह वार कर रहे हैं. मृदंग और ढोलक की आवाज से राहुल का सिर फटा जा रहा था. जब उस की सहनशक्ति जवाब देने लगी तो वह उठा और पुजारीजी के पास जा कर हाथ जोड़ विनम्र शब्दों में प्रार्थना की, ‘पुजारीजी, कल मेरी 10वीं की वार्षिक परीक्षा है. कृपया लाउड- स्पीकर की आवाज थोड़ी हलकी करवा दें या उस का मुंह मेरे घर से दूसरी तरफ करवा दें तो आप की बड़ी कृपा होगी क्योंकि शोर के कारण मुझ से पढ़ा नहीं जा रहा है.’

पता नहीं पुजारी ने सुना नहीं या सुन कर भी अनसुना कर दिया. वह अपने चेले से बोले, ‘भई, जरा कलश तो पकड़ाना, पूजा में उस की जरूरत पड़ने वाली है.’

राहुल उन के और समीप पहुंचा और तनिक जोर से अपनी प्रार्थना फिर दोहराई. पर पुजारीजी के पास शायद राहुल की कोई बात सुनने का समय ही न था. 2 बार अपनी उपेक्षा देख कर वह तीसरी बार थोड़ा और साहस जुटा कर पुजारी के सामने जा कर खड़ा हो गया और फिर से नम्र निवेदन किया.

‘अरे, लड़के. क्यों हाथ धो कर मेरे पीछे पड़ा है?’ पुजारीजी ने आव देखा न ताव, कड़क कर बोले, ‘दिखाई नहीं देता कि पूजा में देर हो रही है. क्या कहा तू ने? जागरण से तेरी पढ़ाई में विघ्न पड़ रहा है? अरे, कौन सी बी.ए. की परीक्षा देनी है, और फिर पढ़लिख कर  करेगा भी क्या? काम तो तुझे कपड़े की दुकान पर ही करना है. चल, छोड़ पढ़ाईलिखाई और महामाई का गुणगान करने को आजा, वही तेरी नैया पार लगाएंगी.’

पुजारी की बात राहुल को गाली से भी बुरी लगी. वह क्या करना चाहता है, क्या बनना चाहता है, यह तो वही जानता था. कपड़े की दुकान पर काम वाली बात राहुल कड़वे घूंट की तरह पी गया और मौके की नजाकत को देखते हुए पुजारी के सामने गिड़गिड़ा कर बोला, ‘पुजारीजी, परीक्षा छोटी हो या बड़ी, परीक्षा परीक्षा ही होती है. मैं आप से यह तो नहीं कहता कि जागरण बंद कर दें या लाउडस्पीकर बंद कर दें. हां, कुछ ऐसा कीजिए कि जागरण भी चलता रहे और मुझे पढ़ने में असुविधा भी न हो.’

राहुल का इतना कहना था कि पुजारी गुस्से में लालपीले हो गए. एकदम भड़क उठे और बोले, ‘मां जगदंबा के जगराते में विघ्न डालता है? निकृष्ट बालक, मां की अनुकंपा के बिना तू अच्छे नंबरों से तो क्या पास भी नहीं हो सकता,’ क्रोध से तमतमाए पुजारी ने अपने चेलों को आदेश दे कर लाउडस्पीकर की आवाज और भी ऊंची करवा दी.

निराश राहुल को मदन ताऊजी की याद आई जो महल्ले में किसी की कैसी भी समस्या हो धैर्य से सुनते थे और प्राय: समस्या का उचित समाधान भी ढूंढ़ते थे. वह अपनी व्यथा ले कर ताऊजी के पास जा पहुंचा. ताऊजी ने उस की सारी बातें ध्यान से सुनीं. उन्हें राहुल की बातों में सचाई और तर्क दोनों की झलक दिखाई दी. वह राहुल को ढांढ़स बंधाते हुए बोले, ‘बेटा, मैं तुम्हारे साथ चलता हूं, मुझे भरोसा है कि पुजारीजी मेरी बात जरूर सुनेंगे. उन का मूड किसी वजह से खराब होगा अन्यथा तुम्हारी इतनी छोटी सी बात मानने में भला उन का क्या जाता है.’

जागरण के पंडाल में पहुंच कर मदन ताऊजी ने पुजारी को नमस्कार किया और विनम्रतापूर्वक बोले, ‘पुजारीजी, इस लड़के की कल परीक्षा है. यदि लाउडस्पीकर जरा धीमा कर दें तो…’ ताऊजी की बात बीच में काटते हुए पुजारीजी उसी गुस्से भरी मुद्रा में बोले, ‘पंडितजी, तो ले आया आप को भी अपने साथ यह लड़का और आप भी इस की बातों में आ गए. यह लड़का पढ़ने का नाटक करता है. कल सारा दिन तो मैं ने इसे महल्ले में घूमते देखा और अब ठीक जागरण के समय इसे पढ़ाई की सूझ रही है.’

पुजारी द्वारा मंदिर के अहाते में देवी मां के सामने बोले गए सफेद झूठ ने राहुल की आत्मा को झकझोर दिया. वह भौचक हो कर पुजारी और ताऊ की बातों को सुनता रहा. आखिर जब बात किसी तरह नहीं बनी तो ताऊजी ने भी पुजारी के हठी आचरण के सामने हथियार डाल दिए और मुड़ कर राहुल से बोले, ‘बेटा राहुल, लगता है पुजारीजी मानने वाले नहीं हैं, तुम ही कहीं और जा कर पढ़ लो.’

राहुल खिन्न हो गया. उस की आंखों में आंसू आ गए. वह वापस घर आया तो चौखट पर खड़ी मां ने प्यार से उस के सिर पर हाथ फेरा और पुचकारते हुए बोलीं, ‘बेटा, अगर पुजारीजी ने तुम्हारे ताऊजी की बात नहीं मानी तो अब किसी और की बात मानने की संभावना शून्य है. अच्छा है कि तुम अब सो जाओ, और सुबह जल्दी उठ जाना और तब पढ़ाई कर लेना.’

मां की बात मान राहुल सोने की कोशिश करने लगा लेकिन इतने शोर में नींद भी कहां आती? वह इसी उधेड़बुन में था कि कैसे इस विपदा से पार पाया जाए. तरहतरह के विचार उस के मन में आने लगे कि क्या करूं, कहां जाऊं? हताश मन में एक विचार आया कि स्कूल में जा कर पढ़ लेता हूं. तभी अंदर से उत्तर मिला, वहां तो सारे कमरे बंद होंगे और फिर इतनी रात में कमरा कौन खोलेगा. मदर प्रिंसिपल से टेलीफोन कर के पूछूं? पर कहीं मना कर दिया तो? लेकिन मन ने आवाज दी, नहीं…नहीं…मना नहीं करेंगी क्योंकि वह बहुत प्यार करती हैं मुझ से. शायद मां से भी ज्यादा. इतनी रात गए क्या कहूंगा उन्हें कि मदरजी, हमारे धर्म में गौड की प्रेयर धूमधड़ाके वाली, शोरगुल से भरपूर होती है. भांग पी कर नाचते पुजारी और जोरजोर से मृदंग और करताल पीटते उन के चेले गौड्स को मनाने के अनिवार्य अंग होते हैं.

राहुल ने हृदय में मची उथलपुथल को अपनी बाल बुद्धि से तर्क दे कर शांत करने का प्रयास किया. सोचा, नींद तो आ नहीं रही, इधरउधर मन भटकाने से अच्छा है कि यहीं पढ़ने की कोशिश की जाए. सवाल ही तो हल करने हैं. एक बार एकाग्रता बन गई तो शोर सुनाई देना स्वत: ही बंद हो जाएगा.

बहुत चाहने के बावजूद भी राहुल की एकाग्रता बन नहीं पा रही थी. अनमना सा वह उठा और पड़ोस में जा कर स्कूल में टेलीफोन कर ही दिया.

‘गुड इवनिंग मदर, मैं राहुल बोल रहा हूं.’

‘वैल सन, कैसे याद किया? सब ठीक तो है न?’

‘मैम, मैं पढ़ नहीं पा रहा हूं क्योंकि मेरे घर के पास लाउडस्पीकर का बहुत शोर हो रहा है.’

‘राहुल, तुम शोर करने वालों से प्रार्थना करो कि वे शोर न करें. उन को बताओ कि कल तुम्हारा मैथ का पेपर है. वे तुम्हारी बात जरूर मान लेंगे,’ मदर ने राहुल को समझाया.

‘मैम, सब तरीके अपनाने के बाद ही आप को इतनी रात में फोन किया है. आई एम सौरी, मैम.’

मदर प्रिंसिपल भांप गईं कि सचमुच राहुल के सामने भारी समस्या है वरना वह कभी फोन न करता. इसलिए जरूरी है कि इस समय उस की मदद की जाए.

‘सन, तुम होस्टल आ जाओ. यहां मैं तुम्हारी पढ़ाई का पूरा इंतजाम कर दूंगी,’ मदर प्रिंसिपल की आवाज में सहानुभूति और वात्सल्य का मेल था.

राहुल होस्टल पहुंच गया. मदर प्रिंसिपल ने उस का बेड डोरमेटरी में लगवा दिया था. पढ़ाई पूरी कर के वह सोने का प्रयत्न करने लगा.

बचपन से ले कर किशोर होने तक का सफर सिनेमा की तरह उस की आंखों के सामने घूम गया. राहुल के घर और मंदिर की दीवार साझी थी. जब से उस ने होश संभाला था, अपनेआप को मंदिर से किसी न किसी तरह जुड़ा पाया था. पूरे महल्ले के बच्चे खेलने के लिए मंदिर में जमा होते थे. वह भी वहीं खेलता था. सर्दियों में मंदिर के विशाल मैदान में खिली धूप का आनंद मिलता था तो गरमियों में नीम, पीपल तथा बरगद की ठंडी छांव सुख पहुंचाती थी.

मंदिर में कोई न कोई कथावार्ता हमेशा चलती रहती थी. संतमहात्मा आते रहते थे और अपने प्रवचनों से लोगों को ज्ञान प्रदान करते थे. ताऊजी भी अधिकांश समय मंदिर में बिताते थे. रोज सुबह खुद भी और बच्चों से भी हनुमान चालीसा का पाठ करवाते थे, जो उन्हें मुंहजबानी याद था. अनेक भक्तों की कहानियां ताऊजी को याद थीं. पुंडरीक, प्रह्लाद व ध्रुव आदि की कहानियां न जाने कितनी बार उन्होेंने राहुल को सुनाई थीं.

ताऊजी अपने ढंग से बच्चों को कहानियों के माध्यम से अनेक शिक्षाएं देते थे, ‘सदा सच बोलो’, ‘अन्याय मत करो’, ‘अन्याय मत सहो’, ‘अत्याचार मत करो’, ‘अत्याचारी से बड़ा पापी अत्याचार सहने वाला होता है’ आदि. बच्चों को भी उन की कहानियां सुनने में बड़ा आनंद आता था.

राहुल को वह दिन याद आया जिस दिन ताऊजी ने धन्ना जाट की कहानी उसे सुनाई थी. कहानी कुछ ऐसी थी कि राहुल के मन में कौतूहल जाग उठा. उस ने सोचा कि यदि धन्ना जाट अपने हठ से कृष्ण को पा सकता है तो वह क्यों नहीं? एक पत्थर उठाया और बैठ गया राहुल भी उस के सामने यह हठ कर के कि ‘तब तक न खाऊंगा, न पीऊंगा जब तक प्रभु दर्शन नहीं देते. ताऊजी की शैली में धन्ना जाट का डायलाग राहुल ने पत्थर के सामने दोहराया.

3-4 घंटे बीत जाने पर मां ने राहुल को ढूंढ़ना शुरू किया और जब वह कमरे में गईं तो देखा, पत्थर के सामने दीपक और अगरबत्ती जला कर राहुल बैठा है. मां को जब सारी बात का पता चला तो उन्होंने अपना माथा पकड़ लिया. हंसी भी आई और दुलार भी आया बेटे के भोलेपन पर.

होस्टल के बिस्तर पर पड़े राहुल को अतीत की वह हर घटना याद आ रही थी जिस ने बालक राहुल को सनातन कर्मकांड का भक्त बना दिया था. प्राय: उस का दिन मंदिर में जा कर पूजा से शुरू होता था. परीक्षा देने जाते समय भगवान को टीका अवश्य लगाता था. पूजापाठ या मंदिर का कोई भी काम होता तो राहुल सब से आगे होता था. राहुल के विवेक पर आस्था का साम्राज्य हो गया था.

छठी कक्षा की वह घटना भी उसे याद आई जब सिस्टर फ्लोरेंस स्कूल में हनुमानजी के बारे में पढ़ा रही थीं, ‘हनुमान वाज ए मंकी’ (हनुमान एक बंदर था).

राहुल का दिमाग भन्ना गया. वह बिफर कर बोला, ‘सिस्टर, हनुमान वाज नाट ए मंकी. ही वाज ए सर्वेंट आफ गौड.’ (अर्थात हनुमान बंदर नहीं भगवान के सेवक थे)

‘परंतु था तो बंदर ही,’ सिस्टर ने तर्क दिया.

‘नहीं, यह मेरे आराध्य देव का अपमान है. वे केवल रामभक्त थे, यही उन का परिचय है,’ ताऊजी के दिए संस्कार राहुल के सिर चढ़ कर बोल रहे थे.

राहुल के साहस और उग्रता के सामने सिस्टर फ्लोरेंस धीमी पड़ गई. वह खुद कोई दंड न दे कर राहुल को मदर प्रिंसिपल के पास ले गईं.

मदर प्रिंसिपल ने गंभीरतापूर्वक कहा था, ‘फ्लौरेंस, अगर हनुमान को बंदर कहने से राहुल की भावनाओं को ठेस पहुंचती है तो जो वह कहना चाहता है उसे वही कहने दो. दूसरों की भावनाओं का आदर करना ही मानव जाति का सब से बड़ा धर्म है और उन्हें कुचलना सब से बड़ा अधर्म.’

गांठ की तरह बांध ली थी राहुल ने अपने पल्ले से प्रिंसिपल मैम की यह बात.

राहुल को पुजारी के व्यवहार ने तोड़ दिया था. उस का संवेदनशील मन, सच और सही रास्ते की तलाश में भटक रहा था. वह भगवान के अस्तित्व को खोज रहा था. उसे फैसला करना था कि भगवान है कहां? मन में या मंदिर में, मानवता की सेवा में या मृदंग की थाप में? किसी का दिल दुखाने में या किसी की सहायता करने में? राहुल के मन

में मंथन जारी था. पता नहीं कब मन

में यह कशमकश लिए राहुल को नींद आ गई.

इस घटना को 30 साल बीत चुके हैं. पुजारीजी अभी जिंदा हैं. उन को पक्षाघात हो गया है जिस के कारण उन्होंने खटिया पकड़ ली है. उन के चेलों में सब से उद्दंड चेला अब पुजारी बन चुका है. उस ने उन की खाट मंदिर से निकाल, पिछवाड़े में भैंसों के तबेले के साथ वाले कमरे में डाल दी है.

जब राहुल ताऊजी के संस्कार पर गया था तो वह पुजारीजी से भी मिल कर आया था.

राहुल ने अपने साथ चलने के लिए पुजारीजी से आग्रह किया था ताकि वह अपने हस्पताल में उन का इलाज करवा सके. लेकिन वह नहीं माने तो उन की खटिया वापस मंदिर के आंगन में डलवा दी थी और नए पुजारी से उन के इलाज के लिए हर माह कुछ रकम भेजने का वादा भी किया था.

मदर प्रिंसिपल से राहुल की मुलाकात लगभग 12 बरस पहले स्कूल के रजत जयंती समारोह में हुई थी. उन के सीने में दर्द रहने लगा था और उन्होंने अपनी बीमारी की फाइल राहुल को दिखाई थी. राहुल जब उन के लिए दवाइयां लिख रहा था तो उन की आंखों की चमक बता रही थी कि वह खुशी से अधिक गर्व महसूस कर रही हैं. उन का नन्हा राहुल उन की हर आकांक्षाओं पर खरा जो उतरा.

राहुल की शादी हुए लगभग 10 साल हो चुके हैं. उस के 2 होनहार बच्चे हैं. राहुल कभी मंदिर नहीं जाता. पूरे परिवार को राहुल का यह व्यवहार बड़ा अटपटा लगता है. पत्नी कई बार सोचती है कि हर बात में बुद्धिसंगत व्यवहार करने वाले राहुल मंदिर का नाम आते ही इतना असंगत क्यों हो जाते हैं? ऐसी क्या गांठ राहुल के मन में है कि वह किसी भी तरह मंदिर जाने के लिए तैयार नहीं होते.

आज 30 साल बाद राहुल दक्षिण भारत के मदुरई नगर में स्थित मीनाक्षी मंदिर की दहलीज पर खड़ा है. राहुल ने अपना कदम आगे बढ़ाया और मंदिर की चौखट लांघी पर लांघने वाले कदम भगत राहुल के नहीं अपितु पर्यटक राहुल के थे.

लेखक – डा. सुभाष चंद्र गर्ग

Short Story : अपनापन : लव मैरिज के बावजूद किस बात से डर रही थी चैताली

Short Story : करण और चैताली ने प्रेम विवाह किया था. दोनों साथसाथ एमबीए कर रहे थे. करण मार्केटिंग में था और चैताली एचआर में, कैंपस में दोस्ती हुई और धीरेधीरे दोनों एकदूसरे को चाहने लगे और पढ़ाई पूरी होने तक उन्होंने एकदूसरे के साथ रहने का फैसला कर लिया. दोनों को अच्छी प्लेसमैंट मिली, पर करण को पुणे और चैताली को मुंबई औफिस मे रिपोर्ट करना था. यह बात दोनों को ही नागवार गुजरी. पर चूंकि पैकेज अच्छा था, इसलिए दोनों ने स्वीकार कर लिया.

करण पंजाबी परिवार से ताल्लुक रखता था और चैताली बंगाल से थी. जब दोनों ने इस का जिक्र अपनेअपने घरों मे किया तो जैसा कि डर था, पहले तो दोनों ही परिवारों ने अपनीअपनी असहमति दिखाई. करण के परिवार वाले शुद्ध शाकाहारी थे और चैताली का परिवार बिलकुल इस के विपरीत था. इस के अलावा भी बहुत सारे मुद्दे थे जिन पर सहमति के आसार दूरदूर तक नजर नहीं आते थे. पर करण और चैताली भी अपनी जिद पर अड़े थे. दोनों ने तय कर लिया था कि शादी तो करनी है, चाहे देर में ही सही, पर दोनों परिवारों की रजामंदी से ही.

लंबे समय तक चले मानमनुहार के बाद आखिर दोनों के परिवार वाले शादी के लिए मान गए और अगले महीने में शादी की तारीख भी तय कर दी गई. दोनों की मनचाही मुराद पूरी हो रही थी, इसलिए दोनों ही बहुत खुश थे. पर करण की मां की एक शर्त चैताली को बहुत परेशान कर रही थी. मां यह चाहती थीं कि शादी के बाद चैताली छुट्टी ले कर कम से कम एक महीने उन के परिवार के साथ रहे, करण बेशक चाहे तो पुणे जौइन कर ले या साथ रहे. चैताली को यह शर्त ही अजीब सी लगी. पर करण ने इस पर ज्यादा तवज्जुह नहीं दी. उस ने चैताली को बड़े ही सहज तरीके से सम झाया था.

‘‘देखो चैताली, अगर मां ऐसा चाहती हैं तो इस में बुराई क्या है. उन का भी तो मन करता होगा कि उन की बहू कुछ दिन उन के साथ रहे. रह लो न. कौन सा तुम वहां हमेशा के लिए रहने वाली हो.’’

चैताली कोई भी दलील देती तो करण उसे मानने से इनकार कर देता था. उसे कई बार महसूस होता था कि कहीं उस ने गलत निर्णय तो नहीं ले लिया. क्या शादी के बाद भी करण पहले जैसा ही रहेगा या बदल जाएगा? जबकि करण उसे हमेशा ही बड़े प्यार से समझाया करता था और फिर उस का विश्वास लौट आता था.

इसी ऊहापोह में शादी की तारीख कब करीब आ गई, पता ही न चला. शादी दिल्ली में होनी थी जहां करण का घर था, क्योंकि उस के दादाजी लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे. चैताली के घर से सभी लोग 2 दिन पहले ही दिल्ली आ चुके थे और सभी खुशीखुशी शादी की तैयारियों में व्यस्त थे.

पर, चैताली एक अनजाने डर से परेशान थी. कैसे रहेगी वह इतने दिन बिना करण के? करण की मां और बाकी लोगों का व्यवहार कैसा होगा? उस के घर के तौरतरीके कैसे होंगे? करण की मां बहुत सख्त मिजाज और उसूलों वाली हैं, ऐसा करण ने खुद बताया था. चैताली की मां शायद यह सब सम झ रही थीं, इसीलिए उन्होंने भी उसे सम झाया था. पर फिर भी, उस अज्ञात भय का डर उसे बारबार सता रहा था.

आज वह घड़ी भी आ ही गई जब उस ने करण के संग 7 फेरे ले ही लिए. सभी लोग उसे बधाई दे रहे थे. दोस्त, यार, रिश्तेदार, पूरा माहौल खुशियों से भरा हुआ था. करण भी अपने प्यार को शादी में बदलते देख बेहद खुश नजर आ रहा था.

अब विदाई का वक्त था, चैताली की मां और पापा दोनों के चेहरे गमगीन दिख रहे थे. कुछ औपचारिकताओं के बाद उसे करण के साथ गाड़ी में बैठा दिया गया. उस की आंखें भर आई थीं. करण ने उस के हाथों को अपने हाथ में ले लिया. उस की आंखों से टपके आंसू करण के हाथों को भिगो रहे थे.

करण के घर पहुंचते ही सब ने उस का खूब स्वागत किया. वह एक पल के लिए भी अकेली नहीं रही. घर के सभी लोग उस की खूबसूरती, उस की पढ़ाई और उस की नौकरी की खूब तारीफ कर रहे थे. करण अपने रिश्तेदारों के साथ बातें कर रहा था और बीचबीच में आ कर उस से मिल कर चला जाता था. उस के दोस्तयार उस का मजाक भी उड़ाते थे. उसे यहां पलभर के लिए भी नहीं लगा कि वह किसी नई जगह आ गई है. पर जैसे ही उसे करण की मां की बात याद आती कि वह फिर उसी अज्ञात भय की गिरफ्त में आ जाती. वह कुछ क्षणों के लिए ही अकेली रही होगी कि करण की मां कमरे में आती हुई दिखीं. वह उन्हें देख कर खड़ी हो गई. उन्होंने उसे इशारे से बैठने के लिए कहा और खुद उस की बगल में बैठ गईं.

‘‘यहां अच्छा लग रहा है बेटा?’’ उन की आवाज में स्नेह और दुलार दोनों ही था.

‘‘हां, मम्मी,’’ उस ने धीरे से कहा.

‘‘बेटे, यह तुम्हारा ही घर है. इसे तुम्हें ही संभालना है. तुम करण की पसंद जरूर थीं पर अब तुम हम सब की पसंद हो. अगर तुम यहां खुश रहोगी तो हम सभी खुश रहेंगे. मु झे करण ने बताया था कि तुम एक महीने रहने वाली बात से काफी डरी हुई हो. पगली, इस में डरने जैसा क्या है.

‘‘मैं भी तुम्हारी मां ही हूं. जब साथ रहोगी, तभी तो मु झे, हम सभी को सम झ पाओगी. मु झे भी तो चाहिए जिस से मैं अपना दुखसुख शेयर कर सकूं. उस से अपने मन की बात कह सकूं.

‘‘मेरी कोई बेटी तो है नहीं, बस, यही सोच कर मैं ने कहा था. बेटे, अपनापन अपना समझने से ही बढ़ सकता है. अब यह तुम पर है, तुम अगर करण के साथ जाना चाहती हो तो मु झे कोई प्रौब्लम नहीं है.’’

चैताली सास का दूसरा रूप ही देख रही थी. उन की बातों से उसे बहुत सुकून मिला. उस ने सास का हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा, ‘‘मम्मी, आप जब कहेंगी तभी जाऊंगी. आप की बातों ने मु झे बहुतकुछ समझा दिया है. प्लीज, मुझे माफ कर दें.’’ उस की आंखें भर आईं.

‘‘मेरे बच्चे, रोते नहीं,’  यह कहते हुए सास ने उसे गले से लगा लिया.

लेखक- राजेश कुमार सिन्हा

Short Story : निम्मो

Short Story : नैशनल हाईवे की उस सुनसान सड़क पर ट्रक ड्राइवर ने जब विजय को उस के गांव से 8 किलोमीटर पहले उतारा, तो विजय को इस बात की तसल्ली थी कि गांव न सही, लेकिन गांव के करीब तो पहुंच ही गया. लेकिन इस बात का मलाल भी था कि जहां किराएभाड़े के तौर पर पहले 400-500 रुपए लगा करते थे, वहीं आज उसे 4,000 रुपए देने पर भी अपने गांव पहुंचने के लिए 8 किलोमीटर पैदल चल कर जाना पड़ेगा.

अब विजय सुनसान दोपहर में गरम हवाओं के थपेड़े सहता हुआ नैशनल हाईवे से तेजी से अपने गांव की तरफ बढ़ रहा था. चारों तरफ सन्नाटा पसरा था. सामान के नाम पर साथ में बस एक बैग था, जिसे अपने कंधे पर लटकाए पसीने से तरबतर वह लगातार चल रहा था.

अभी गांव कुछ ही दूरी पर था कि एक ठंडी हवा के झोंके से उस का धूप से झुलस कर मुरझाया चेहरा खिल उठा.

गांव से पहले पड़ने वाले अपने खेत में लहलहाती फसल देख कर विजय के तेजी से चल रहे कदमों ने दौड़ना शुरू कर दिया. वह दौड़ते हुए ही अपने खेत में दाखिल हुआ और वहां काम कर रहे अपने बाबा से लिपट गया.

‘‘अरे, देखो तो कौन आया है…’’ विजय के बाबा ने खेत में बनी झोपड़ी में काम कर रही उस की मां को आवाज लगाई.

‘‘अरे विजय बेटा, कैसा है तू? और यह क्या हालत बना ली… देख, कितना दुबलापतला हो गया है,’’ कहते हुए विजय की मां झोपड़ी से भाग कर के पास आई.

‘‘इतने दिनों के बाद देखा है न मां, इसीलिए ऐसा लग रहा है तुम्हें. और वैसे भी अब तो गांव में तुम्हारे हाथों का ही बना खाना मिलेगा, खिलापिला कर कर मुझे कर देना मोटाताजा,’’ कहते हुए विजय ने मां को गले से लगा लिया.

‘‘धूप में चल कर आया है, देख कितना गरम हो गया है. यहां ज्यादा मत रुक, घर जा कर आराम कर ले… और हां, निम्मो को भी लेता जा साथ में, वह तुझे खाना बना कर खिला देगी.’’

‘‘निम्मो.. निम्मो यहां क्या कर रही है?’’ विजय ने चौंकते हुए पूछा.

‘‘अरे, तुझे तो मालूम है कि निम्मो के मांबाबा हमारे गांव में बाहर से आ कर बसे हैं. उन का खुद का खेत तो है नहीं, इसलिए वे लोग काम करने किसी दूसरे के खेत में जाते हैं. निम्मो उन के साथ नहीं जाती.

‘‘निम्मो का भाई अपने मामा के यहां बिजली का काम सीखने शहर चला गया. यह बेचारी घर में बैठी बोर हो जाती है…’’

मां ने आगे कहा, ‘‘एक दिन मैं और तेरे बाबा खेत के लिए निकल रहे थे तो यह मुझ से बोली, ‘काकी, आते वक्त अपने खेत से बेर लेती आना, मुझे बेरी के बेर बहुत भाते हैं…’

‘‘तो मैं बोली, ‘खुद ही आ कर तोड़ ले और जितने मरजी ले जा…’

‘‘तब से जब भी मन करता है, यह हमारे खेत चली आती है,’’ कह कर मां ने निम्मो को आवाज लगाई.

बेर की गुठली थूकते हुए जैसे ही निम्मो झोपड़ी से बाहर आई, विजय हैरान रह गया. गांव के सरकारी स्कूल में उसी की क्लास में पढ़ने वाली निम्मो अब काफी बदल चुकी थी. पहले तो न कपड़ों का कोई अतापता था, न बालों की कोई सुधबुध होती थी.

लेकिन आज निम्मो की खूबसूरती देख कर विजय को यकीन नहीं हुआ. खुले बाल, गोरा रंग, भरापूरा बदन और बिना किसी मेकअप के चेहरे पर लाली दमक रही थी.

विजय भी यह सोच कर हैरान था कि इतने कम समय में इतना बदलाव कैसे आ सकता है. हालांकि पिछले 3 सालों में वह 2 बार गांव आया था, लेकिन दोनों बार ही निम्मो अपने मामा के यहां गई हुई थी.

‘‘हां काकी…’’ पास आ कर निम्मो विजय की मां से बोली.

‘‘तू विजय के साथ घर जा और इसे खाना बना कर खिला देना, फिर भले ही अपने घर चली जाना. हम लोग भी थोड़ा जल्दी आने की कोशिश करेंगे,’’ मां ने निम्मो से कहा, तो निम्मो ने हां में सिर हिलाया और इकट्ठा किए हुए बेरों से भरी अपनी थैली लेने झोपड़ी की ओर चली गई.

जब वह वापस आई तो विजय की ओर देख कर बोली, ‘‘चलिए.’’

मांबाबा को जल्दी घर आने की कह कर विजय निम्मो के साथ घर के लिए निकल पड़ा.

रास्ते में निम्मो बेर निकाल कर विजय की तरफ बढ़ाते हुए बोली, ‘‘ये लो बेर खाओ, रास्ते में अच्छा टाइमपास हो जाएगा.’’

विजय ने उस के हाथों से बेर ले लिए और चलते हुए उस की नजरों से बच कर उसे देखने लगा.

निम्मो थैली से बेर निकालती और उसे तब तक चूसती, जब तक उस का सारा रस न निकल जाता और फिर फीका पड़ने पर थूक देती.

विजय भी निम्मो के अंदाज में बेर खाते हुए उस के साथ चल रहा था. चलते वक्त निम्मो के सीने पर होने वाली हलचल बारबार उस का ध्यान खींच रही थी.

निम्मो की जब इस पर नजर पड़ी तो उस ने दुपट्टे से ढक लिया. लेकिन दुपट्टा भी विजय की नीयत की तरह बारबार फिसल रहा था.

‘‘लौकडाउन हुआ तो गांव की याद आ गई, वरना तुम्हारे तो दर्शन ही दुर्लभ थे,’’ बेर की गुठली थूकते हुए निम्मो बोली.

‘‘इस से पहले भी 2 बार आया था, लेकिन तू नहीं मिली. काकी से पूछा तो बोली मामा के यहां गई हुई है,’’ विजय ने भी शिकायती लहजे में कहा.

‘‘और जिस दिन मैं आई तो काकी बोली कि विजय आज सुबह ही शहर के लिए निकला है. मतलब, इस थोड़े से फासले की वजह से तुम्हारे दर्शन नहीं हो पाए,’’ निम्मो ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘हां, ऐसा ही समझ,’’ विजय ने कहा.

पूरे रास्ते निम्मो तीखे सवाल करती तो विजय उन का मीठा सा जवाब दे देता और विजय कोई मीठा सवाल करता तो निम्मो उस का खट्टामीठा जवाब दे देती.

बातों का यही स्वाद चलतेचलते एकदूसरे के दिलों में झांकने का जरीया बना और इसी की बदौलत दोनों एकदूसरे के दिल का हाल जान पाए.

बेरों से भरी थैली भी तकरीबन आधी हो चुकी थी और अब घर भी आ गया था.

घर पहुंच कर विजय नहाने चला गया और निम्मो रसोई में खाने की तैयारी करने लगी.

विजय नहाधो कर आया, तब तक खाना भी तैयार था. निम्मो ने उसे खाना खिलाया, फिर विजय ने उसे चाय बनाने को कह दिया और खुद कमरे में अपना बैग खोल कर उस में नीचे दबा कर लाए हुए कुछ रुपए अलमारी में रख कर निढाल हो कर बिस्तर पर गिर पड़ा. थकावट की वजह से कब उस की आंख लग गई और उसे पता ही नहीं चला.

निम्मो जब तक चाय ले कर आई, तब तक विजय को नींद आ चुकी थी. निम्मो ने उसे उठाना मुनासिब नहीं समझ और वापस रसोई की ओर मुड़ी. तभी उस की नजर विजय के बैग के पास बिखरे सामान पर पड़ी तो वह हैरान रह गई. उस के सामान के साथ कुछ गरमागरम पत्रिकाएं भी पड़ी थीं.

यह देख एक बार तो निम्मो को बहुत गुस्सा आया, लेकिन बाद में उस ने धीरे से चाय की ट्रे नीचे रखी और उन पत्रिकाओं को उठा कर देखने लगी.

उस ने बैग के अंदर हाथ डाला तो 2-4 पत्रिकाएं और निकलीं, जो कुछ हिंदी में तो कुछ इंगलिश में थीं.

निम्मो ने एक के बाद एक उन के पन्ने पलटने शुरू किए. हर पलटते पन्ने के साथ उस के सांसों की रफ्तार भी बढ़ने लगी. सांसों में गरमाहट महसूस करते हुए वह कभी बिस्तर पर लेटे विजय की ओर देखती, तो कभी मैगजीन में छपी बोल्ड तसवीरें.

कुछ तसवीरें देख कर तो वह ऐसे ठहर जाती मानो यह सब उसी के साथ हो रहा हो, जबकि कुछ तसवीरों ने तो उस के दिलोदिमाग में घर कर लिया था.

तभी अचानक विजय ने करवट बदली तो वह सहम गई, जिस से उस के हाथ से मैगजीन छूट कर चाय की ट्रे पर जा गिरी.

इस आवाज से विजय की आंख खुली और निम्मो के हाथ में मैगजीन देख वह चौंक कर खड़ा हो गया.

एक बार तो निम्मो भी शर्म से पानीपानी हो गई थी. विजय अपनी सफाई में कुछ कहता, उस से पहले निम्मो ने आगे बढ़ कर उसे अपनी बांहों में भर लिया.

‘‘कमबख्त शहर में यही सब करते हो क्या तुम?’’ निम्मो ने पूछा.

खुद को निम्मो की बांहों में पा कर विजय हैरान तो था, साथ ही वह उस की मंशा जान चुका था.

विजय ने अपनी सफाई में कहा, ‘‘ये सब मेरी नहीं हैं, उस ट्रक ड्राइवर की हैं, जिस ने मुझे सड़क तक छोड़ा था. ट्रक में रखी इन पत्रिकाओं को देख कर मैं ने लौकडाउन में टाइमपास के लिए पढ़ने के लिए मांगी तो उस ने दे दीं.’’

‘‘जरा भी शर्म है तुम में? मेरे होते हुए इन से टाइमपास करोगे तुम? पता है, कितनी तरसी हूं मैं तुम्हारे लिए… हर दूसरे दिन काकी से तुम्हारे बारे में पूछती रहती थी. यह तो अच्छा हुआ कि मुझे मांबाबा ने फोन नहीं दिलाया वरना मैं फोन कर के रोज तुम्हें परेशान करती,’’ विजय को अपनी बांहों में जकड़ते हुए निम्मो ने कहा, तो विजय ने उसे बिस्तर पर धकेल दिया.

निम्मो के अंगों को प्यार से सहलाते हुए विजय ने कहा, ‘‘मैं भी तुझे बहुत चाहता हूं पगली, पर अब तक यह सोच कर चुप रहा कि न जाने तेरे मन में क्या होगा.’’

‘‘अब तो पता चल गया न कि मेरे मन में क्या है?’’ निम्मो ने पूछा, तो विजय पागलों की तरह उसे चूमने लगा और इस प्यार की सारी हदें पार करने के बाद विजय के साथ चादर में लिपटी निम्मो बोली, ‘‘विजय… आज तुम्हारा प्यार पा कर निम्मो विजयी हुई.’’

विजय ने निम्मो के माथे को चूमते हुए फिर से उसे अपनी बांहों में भर लिया.

लेखक – पुखराज सोलंकी

Family Story : सांझा दुख

Family Story : कोरोनाकाल चल रहा है. हम सब अपनेअपने घरों में लौकडाउन का पालन करते हुए भी डरे हुए हैं. पता नहीं कब किस को क्या हो जाए. एक ही तरह की दिनचर्या निभाते हुए मन की उलझन और बढ़ती ही जा रही है. कब, कहां, और कैसे? हर मौत पर दिमाग में ये सवाल कौंध रहे हैं.

अरे, अभी उन से 10 दिनों पहले ही तो बात हुई थी और आज… विवशता, हताशा और पीड़ा का मिलाजुला रूप हम सब पर भारी है. कैसी महामारी है कि हम अपनों तक पहुंच नहीं पा रहे हैं जब उन को हमारी सब से ज्यादा जरूरत है.

स्पर्श, प्यार के दो बोल और सेवा के लिए तड़पते हमारे अपने, अकेले में किस से गुहार कर रहे होंगे? तकलीफ को सांझ कर मन शांत हो जाता है. हम ऐसी डरावनी बीमारी के खौफ से घिरे हैं कि उस के पास हम बैठ भी नहीं सकते जिस से हमारा जीवनभर का नाता है.

दूर से अपनों की परेशानी देख मन तड़प जाता है और एक टीस कि काश.. ऐसा नहीं होता. हमारे अपने बिछुड़ रहे हैं और ऐसी बिछुड़न, कि हम फिर से मिलने की आस भी नहीं संजो पा रहे हैं.

मेरे दिल में यही सब बातें चल रही थीं कि मां आ कर मेरे पास खड़ी हो गईं. नम आंखें बहुतकुछ कह रही थीं. मुझे सीने से लगाते हुए बोलीं, ‘‘शरद नहीं रहा, बिट्टू. कोरोना के काल ने उस को अपनी चपेट में ले लिया.’’

मैं स्तब्ध मां का चेहरा देखती रही. खामोशी के बीच हमारे अंदर दिल चीर डालने वाला दुख सांझ हो रहा था. आंखें उमड़ रही थीं.

मां के जाते ही औंधेमुंह बिस्तर पर कटे पेड़ की तरह ढह गई मैं. आंसू हमारे सुखदुख की साथी तकिया को भिगोते रहे.

शरद भैया से मेरा खून का रिश्ता नहीं था, पर खून के रिश्तों पर हमेशा भारी रहा है यह आत्मिक रिश्ता. बचपन से ही वे हमारे लिए रोलमौडल रहे. भैया के कंधे पर बैठ हम कहांकहां की सैर कर आते थे. मैं छोटीछोटी समस्याओं पर उन के पास पहुंच, रोते हुए और अपनी फ्रौक से आंसू पोंछते हुए उन की गोद में सिर रख कर शिकायतों का पुलिंदा खोल दिया करती थी. कभी मां सा, कभी भाई सा, तो कभी सहेलियों सा बरताव करते.

वे हंसते हुऐ कहते, ‘थोड़ा रूक जा बिट्टू. जब मैं डाक्टर बन जाऊंगा, तब इन सब को इंजैक्शन लगा कर दर्द का एहसास करवाऊंगा.’

खूब हंसती मैं, और तरहतरह की ऐक्टिंग कर के बताती कि दर्द के कारण वे सब कैसे बिलबिलाएंगे. थोड़ी बड़ी हुई. उन के आने पर चाय मैं ही बनाती थी, क्योंकि उन को मेरे हाथ की बनी चाय पसंद थी.

चाय पीते हुए वे कहते, ‘चाची, बिट्टू की शादी हम इसी शहर में कराएंगे, ताकि हम सब को उस के हाथ की बनी चाय हमेशा मिलती रहे.’

बनावटी गुस्सा दिखाती हुई मैं भैया को मारने लगती. वे मुझे सीने से लगाते हुए कहते, ‘इस को कभी भी अपनेआप से दूर नहीं जाने दूंगा.’

मेरी हर समस्या का समाधान था भैया के पास. मेरे स्कूल से ले कर कालेज तक के सफर में भैया हमेशा मार्गदर्शक रहे मेरे.

एक दिन हंसते हुए मैं उन से बोली, ‘आप की अपनी कोई बहन नहीं है न, इसीलिए आप मु?ा से बहुत प्यार करते हैं.’

मु?ो आज भी याद है वह दिन. उन्हें बिलकुल भी बुरी नहीं लगी मेरी बात. उलटे, उन्होंने मेरी नाक पकड़ कर बोला था, ‘बिट्टू, तुम हर जन्म में मेरी बहन हो, और रहोगी. अपना और पराया क्या होता है? जहां प्रेम की लौ जगी, वही अपना है.’

कुछ वर्षों बाद भैया मैडिकल की पढ़ाई के लिए दूसरे शहर चले गए. मैं बहुत रोई थी. जैसे, मेरी दुनिया बेरंग हो गई हो. सुबह के उजाले से ले कर देररात तक उन के साथ की यादें मु?ो और उदास कर जातीं.

फोन पर जब मैं अपनी समस्याएं बताने लगती तो वे कहते, ‘इतनी समस्याओं का, बस, एक समाधान है तेरी शादी. दूल्हा आ जाएगा तेरी जिंदगी में, तब जा कर इस निरीह भाई को राहत मिलेगी.’

गुस्से से कहती मैं, ‘अच्छा, तो आप मुझ से छुटकारा चाहते हैं. इतनी जल्दी नहीं छोड़ने वाली मैं आप को. और वैसे भी, पहले आप की शादी होगी, तब मेरी.’

भैया के डाक्टर बनते ही उन की शादी हो गई. खूब नाची थी मैं. खुशी मेरे दामन में नहीं समा रही थी.

बाद के दिनों में वे मुझे चिढ़ाते, ‘चाची, मेरी शादी में नागिन डांस के लिए तो इस को पद्मश्री अवार्ड मिलना चाहिए था.’

वक्त के साथ हम सब बदलते गए. मेरी भी शादी हो गई. जिम्मेदारियों ने पैरों में बेडि़यां डाल दीं. मां की आवाज सुन कर मैं आंसू पोंछते हुए बैठ गई.

अपनी गोद में मेरा सिर रख कर प्यार से हाथ फेरते हुए मां बोलीं, ‘‘बिट्टू, तुम्हारे अंदर एक जीव पल रहा है, वह भी तो तुम्हारे खाने का इंतजार कर रहा है.’’

पेट पर हाथ रख कर सोचने लगी मैं, ‘काश, भैया मेरी कोख में आ जाते. मैं मां बन कर उन का खूब खयाल रखती और अपने से कभी भी दूर न जाने देती.’

बहुत प्रयास करने के बाद मैं ने खुद को संयत कर भाभी को कौल किया. उन के रोने की आवाज मेरे कानों में पिघले सीसे की तरह आहत कर रही थी.

‘‘शरद बगैर मुझ से कुछ बोले चले गए, बिट्टू. मैं अब किस को प्यार करूंगी? किस के सहारे रहूंगी? चारों तरफ अंधेरा दिख रहा है? मेरे तो सिर का ताज ही बिखर गया, बिट्टू.’’

‘‘समय के सामने हम सब विवश हैं, भाभी. धैर्य रखिए. अमन का खयाल रखिए. उस पर इन दुखों का असर नहीं होना चाहिए. टूट जाएगा तो बिखरे को समेटना बहुत मुश्किल होगा, भाभी.’’

तभी अमन की आवाज ने मेरी बची हुई हिम्मत को भी तोड़ कर रख दिया, ‘‘मैं पापा के साथ खेलना चाहता हूं. पापा से मिले हम को एक महीना हो गया है बूआ. सब के पापा हैं, तो मेरे पापा हमें छोड़ कर क्यों चले गए? बताओ बूआ?’’

सांत्वना के शब्द यहीं पर खत्म हो गए थे मेरे. मैं शून्य में निहारते हुए बोली, ‘‘इस का जवाब किसी के पास भी नहीं होगा, अमन बेटा.’’

मां के हाथों में खाने की थाली दिखी, तो आंखों ने सवाल किया और जबान पूछ बैठी, ‘‘मां, पीर पराई है या अपनी है?’’

‘‘वैष्णव जन तो तेने कहिए जो पीर पराई जाने रे,’’ गाती हुई मां वहां से चली गईं.

लेखिका – कात्यायनी दीप

Social Story : पाखंडी तांत्रिक

Social Story : अचानक रिम्मी को पैरानौइड पर्सनालिटी डिसऔर्डर नाम की बीमारी के कुछ दौरे ही पड़े होंगे कि मां झट से गईं और चप्पल से रिम्मी पर अनगिनत वार करती चली गईं.

हालांकि उन्हें यह बहुत बाद में पता चला कि यह कोई बीमारी है, जिसे मैडिकल साइंस में पैरानौइड पर्सनालिटी डिसऔर्डर कहा जाता है. वरना उस दिन रिम्मी की मां ने तो किसी ऊपरी साए का चक्कर समझ कर उस साए पर चप्पलों की बरसात कर दी थी, जबकि दर्द रिम्मी को सहना पड़ रहा था.

रिम्मी की मां ने रिम्मी को दौरे पड़ने वाली बात को समाज से छिपाए रखी, शायद इसलिए क्योेंकि रिम्मी की शादी एक साल पहले ही विजय से तय हो चुकी थी.

विजय एक अच्छे परिवार और पढ़ेलिखे घर का सुशील और गुणवान लड़का था और पेशे से सीबीआई अफसर भी. रिम्मी और विजय दोनों ही एकदूसरे को कालेज से पसंद भी करते आए थे. ऐसे में मां नहीं चाहती थीं कि महल्ले वालों को रिम्मी की इस बीमारी के बारे में पता चले और इतनी अच्छी ससुराल हाथ से निकल जाए.

रिम्मी को जब कभी भी ऐसे दौरे पड़ते, उस के थोड़ी देर बाद ही वह अपनेआप शांत हो जाती. उसे बिलकुल भी याद नहीं रहता कि उस के साथ क्या हुआ और उस ने कैसीकैसी हरकतें कीं.

पर हुआ वही, जो रिम्मी की मां नहीं चाहती थीं. अब भला रिम्मी के घर से उस के चिल्लाने की अजीबोगरीब आवाज आना, रोनाबिलखना भला कोई कैसे अनसुना कर सकता था.

एक दिन ठेले पर सब्जी लेते समय सुनीता आंटी ने पूछ ही लिया, ‘‘अरे रिम्मी की मां, सुनो तो जरा. यह रिम्मी को क्या हो गया है? अगर कोई बात है तो बताओ?’’

सुनीता आंटी पड़ोस में ही रहती थीं और इसीलिए बाकियों से ज्यादा उन के साथ रिम्मी की मां के अच्छे संबंध थे.

मां ने अभी तक अपना यह दुख किसी के साथ नहीं बांटा था, शायद इसी वजह से सुनीता आंटी के जरा से पूछ लेने पर उन से रहा नहीं गया और दिल खोल कर सारी बात बता दी. उन्हें लगा कि शायद इन के पास इस मुसीबत का कोई हल हो.

‘‘अरे इतनी सी बात के लिए इतना घबरा रही थीं आप. एक बार मुझे पहले ही बता तो दिया होता, अब भला रिम्मी हमारी बेटी नहीं है क्या,’’ सुनीता आंटी के इतना कहने पर रिम्मी की मां को आशा की एक किरण दिखने लगी. मां को लगा कि शायद सुनीता आंटी के पास इस समस्या का कोई समाधान जरूर है.

‘‘अरे, मैं ने ऐसी कई लड़कियों को देखा है, जिन पर ऊपरी चक्कर या अन्य कोई दोष होता है और उस के चलते वे अजीबअजीब सी हरकतें करने लगती हैं.

‘‘डरो मत, मैं एक ऐसे तांत्रिक बाबा को जानती हूं, जो सिर्फ माथा छू कर सारी समस्याओं की जड़ बता देते हैं,’’ सुनीता आंटी ने रिम्मी की मां से कहा.

मां ने बिना कुछ सोचेसमझे सुनीता आंटी से तांत्रिक के यहां चलने की बात पक्की भी कर ली.

‘‘चलो रिम्मी उठो, जल्दी उठो और तैयार हो जाओ. हमें कहीं जाना है,’’ मां ने सुबहसुबह ही रिम्मी को नींद से जबरदस्ती उठा लिया.

‘‘क्या हुआ मां, कहां जाना है? बताओ पहले…’’ रिम्मी ने लेटेलेटे ही मां से पूछा.

‘‘वे सुनीता आंटी एक तांत्रिक बाबा को जानती हैं. वे बड़े ही पहुंचे हुए बाबा हैं. वे तुझे देखते ही बता देंगे कि क्या परेशानी है और फिर तेरा इलाज भी कर देंगे,’’ मां ने रिम्मी को समझाया.

‘‘मां, आप भी कैसेकैसे लोगों की बातों में आ जाती?हैं और वह भी आज के जमाने में. आप ने यह कैसे सोच लिया कि मैं आप के साथ चलने को तैयार हो जाऊंगी.’’

‘‘बेटी, एक बार चल कर देखने में क्या हर्ज है. और क्या पता, किस का तुक्का ठीक बैठ जाए. हमें तो बस तेरे ठीक होने से मतलब है. अभी तेरी शादी होने में सिर्फ 6 महीने ही बचे हैं न? उस से पहले ही ठीक होना है न तुझे?’’ पिताजी ने भी मां की तुक में तुक मिला कर रिम्मी को समझाया.

रिम्मी भी न नानुकुर करतेकरते मान ही गई और तांत्रिक के पास चलने के लिए राजी हो गई.

तांत्रिक का ठिकाना बड़ा ही घनचक्कर कर देने वाला था. पता नहीं कितनी पतलीपतली संकरी गलियों के अंदर उस ने अपना घर बना रखा था. सुनीता आंटी ने मां और रिम्मी को दरवाजे पर ही समझा दिया था कि जाते ही उन बाबा के पैर पकड़ कर आशीर्वाद ले लेना.

तांत्रिक के घर पर पहले से ही 4-5 लोग बैठे हुए थे. रिम्मी को बड़ी हैरत हुई कि आज भी इतने लोग डाक्टरों को छोड़ कर इन पाखंडियों के पास आते हैं. फिर सोचा कि अगर इतने लोग अपना इलाज कराने आए हैं, तो जरूर इस तांत्रिक में कोई तो बात होगी.

तकरीबन 2 घंटे के इंतजार के बाद रिम्मी का नंबर भी आ ही गया. रिम्मी ने इस से पहले कभी किसी तांत्रिक को रूबरू नहीं देखा था, सिर्फ टैलीविजन पर ही देखा था. उस को लगा था कि कोई काला कुरतापाजामा पहने खोपडि़यों की माला और ढेर सारी अंगूठियां पहने, काला टीका लगाए, आग जलाए बैठा होगा, पर अंदर जाते ही उस ने देखा कि तकरीबन 40-45 साल का एक आदमी फौर्मल कपड़ों में अपने सोफे पर बैठा हुआ था. हां, अंगूठियां तो उस ने भी पहनी थीं, पर इतनी नहीं. और माथे पर काला टीका भी लगाया हुआ था.

तांत्रिक सुनीता आंटी को जानता था, शायद इसलिए उस ने सब लोगों के लिए चाय और बिसकुट का भी इंतजाम किया.

रिम्मी से तांत्रिक ने उस की बीमारी के बारे में पूछा और अंदर बने एक कमरे में ले जा कर कुछ जादूटोना कर के कई तरह के प्रपंच करने लगा, जिन का रिम्मी पर कोई असर नहीं पड़ रहा था.

फिर रिम्मी को बाहर ले जा कर उस ढोंगी तांत्रिक ने मां को भरोसा दिलाते हुए कहा, ‘‘देखो, किसी भटकती आत्मा ने रिम्मी के शरीर को अपना वास बना लिया है, पर घबराने वाली कोई बात नहीं है…

‘‘ऐसे केस मेरे पास आएदिन आते रहते हैं. मेरे लिए कोई बड़ी बात नहीं,’’ तांत्रिक अपनी बड़ाई करते थक नहीं रहा था कि अगले ही पल असली मुद्दे पर आ गया.

‘‘देखिए, इस तरह की आत्माओं से निबटने के लिए अकसर खास तरह की पूजा कराने की जरूरत पड़ती है और एक बकरे की बलि भी देनी ही पड़ती है.

‘‘इस सब पर कम से कम 40,000 से 50,000 रुपए का खर्चा तो मान कर ही चलिए, लेकिन आप लोग चिंता मत कीजिए, सारी सामग्री का इंतजाम हम खुद ही कर लेंगे. अगर आप को ठीक लगे तो बताना. आगे की विधि मैं आप को उस के बाद ही बताऊंगा.’’

रिम्मी चालाकी दिखाते हुए बोली, ‘‘बाबाजी, आप बस अपना खर्च बता दीजिए, सामग्री का इंतजाम हम खुद कर लेंगे.’’

‘‘नहीं बेटी, यह कोई ऐसीवैसी सामग्री नहीं है, जो कहीं पर भी मिल जाए. यह सारी सामग्री हमारे सिद्ध गुरुजी की आज्ञा से विशेष विधि से लाई जाती है, इसलिए यह काम तुम हम पर ही छोड़ दो.’’

तांत्रिक अपना उल्लू सीधा करने के मकसद से बोल रहा था. सब ने तांत्रिक से अलविदा ली और जैसे ही जाने के लिए मुड़े, वैसे ही तांत्रिक ने टोकते हुए फीस के नाम पर पहली ही मुलाकात में रिम्मी की मां से 5,000 रुपए ऐंठ लिए.

रिम्मी को तांत्रिक द्वारा 5,000 रुपए मांगने वाली बात पर कुछ शक हुआ. वे समझ चुकी थीं कि यह तांत्रिक के नाम पर पाखंडी है, पर उस की मां तांत्रिक की बातें आंख बंद कर मानने लगी थीं.

घर पहुंचते ही रिम्मी के फोन पर विजय का फोन आया, तो वह चुपचाप अपने कमरे की ओर निकल गई और तांत्रिक की बात बताने लगी.

मां और पिताजी ने रिम्मी से कहा कि वे तांत्रिक बाबा से विशेष क्रियाकर्म करवाएंगे.

रिम्मी ने भी इस बात का कोई विरोध नहीं किया और बड़ी आसानी से मान गई.

मां ने तुरंत तांत्रिक को फोन लगाया और आगे की सारी विधि समझ ली.

तांत्रिक ने उन्हें बताया, ‘अमावस्या की रात को मैं जो पता बताने जा रहा हूं, वहां पहुंच जाना. हम रिम्मी के अंदर बैठी उस दुष्ट आत्मा को बोतल में कैद कर अपने साथ ले जाएंगे और रिम्मी को उस दुष्ट आत्मा से हमेशा के लिए मुक्त कर देंगे.’

अमावस्या की रात भी आ चुकी थी और रिम्मी की मां और पिताजी उसे ले कर तांत्रिक के बताए उस पते पर पहुंच गए थे.

तांत्रिक पहले ही रिम्मी के पिताजी से पूरे 50,000 रुपए की दक्षिणा मांग लेता है और रिम्मी को अपने साथ खुफिया कमरे में ले जा कर उस से कहता है, ‘‘रिम्मी, अब अपने सारे कपड़े उतार कर इस आसन पर बैठ जाओ. इस विशेष पूजा में तन पर कोई कपड़ा नहीं होना चाहिए, वरना वह आत्मा कभी तुम्हारे अंदर से नहीं निकल पाएगी.’’

इतना कहते ही रिम्मी ने एक जोरदार तमाचा तांत्रिक के गाल पर जड़ दिया, उतने में ही विजय अपने कई साथियों के साथ दौड़ता हुआ उस कमरे का गेट तोड़ कर अंदर जा घुसा.

रिम्मी के मां और पिताजी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि यह हो क्या रहा है और जमाई राजा यहां कैसे आ गए, वह भी इतने आदमी ले कर.

विजय ने अंदर पहुंचते ही उस तांत्रिक के हाथों में हथकड़ी डाली, तो पिताजी ने विजय से पूछा, ‘‘बेटा, यह सब क्या है?’’

‘‘पापाजी, शायद आप लोगों को यह नहीं मालूम कि यह तांत्रिक नहीं, बल्कि डकैत?है. इस ने लोगों को ठगने का नया तरीका ढूंढ़ लिया है. पिछले कई महीनों से हमारे डिपार्टमैंट को इस की तलाश थी. यह अब लोगों को लूटने उन के घर नहीं जाता, बल्कि लोग इस के पास खुद आते हैं अपनेआप को लुटवाने के लिए.

‘‘यह पाखंडी लोगों को ठीक करने का झूठा वादा कर के उन से हजारोंलाखों रुपए तक वसूल लेता है और फिर किसी दूसरे शहर में अपना शिकार ढूंढ़ने के लिए निकल जाता है.’’

विजय ने उस पाखंडी बाबा की सचाई रिम्मी के पिताजी को बताई, जिसे रिम्मी की मां भी सुन रही थीं.

‘‘पर बेटा, तुम्हें कैसे पता चला कि हम लोग रिम्मी को ले कर इस तांत्रिक के पास आए हुए हैं?’’ मां ने हैरान होते हुए विजय से पूछा.

‘‘मांजी, जिस दिन आप रिम्मी को पहली बार इस डकैत के पास ले कर गई थीं, उस दिन मैं ने रिम्मी से बात करने के लिए उसे फोन लगाया था. तब रिम्मी ने मुझ सारी बात बताई.

‘‘रिम्मी ने मुझे इस के बारे में जोकुछ बताया और वह फीस के 5,000 रुपए के बारे में बताया, तो मेरे दिमाग की बत्ती जली. मुझे याद आया कि कहीं यह वही तांत्रिक तो नहीं जिस की तलाश मैं और मेरे साथी कई महीनों से कर रहे हैं.

‘‘मैं ने तुरंत इस तांत्रिक का स्टिंग आपरेशन करने का प्लान बनाया और फोन पर ही सारी योजना रिम्मी को समझा दी.

‘‘और आज जब आप लोग अपने घर से निकले, तब हम ने आप लोगों का पीछा किया था, क्योंकि इस के अड्डे तक हमें सिर्फ आप ही पहुंचा सकते थे.

‘‘अपनी योजना के मुताबिक हम सारे अफसर अपना हुलिया बदल कर गाड़ी में बैठेबैठे रिम्मी की माला पर लगे स्पाई कैमरे से सबकुछ लाइव देख रहे थे और जैसे ही रिम्मी ने इसे तमाचा मारा, हम समझ गए कि कोई बात जरूर है और अंदर इसे दबोचने चले आए.’’

इतना कह कर रिम्मी की ओर देखते हुए विजय ने बताया, ‘‘मांजी, मैं ने रिम्मी की बीमारी के बारे में कुछ दिनों पहले ही अपने दोस्त से फोन पर पूछा था, जो लंदन में एक मनोचिकित्सक है.

‘‘उस ने बताया कि रिम्मी के अंदर किसी आत्मा का वास नहीं, बल्कि पैरानौइड पर्सनालिटी डिसऔर्डर की बीमारी है. इस की वजह से अकसर मरीज अजीबअजीब सी हरकतें करने लगता है, जैसे बहुत गुस्सा आने के चलते अपना आपा खो देना, किसी पर विश्वास न करना, अकेले रहना, पर यह बीमारी डाक्टर के इलाज से जल्दी ठीक भी हो जाती है.’’

विजय यह सब बातें बताते समय तांत्रिक को गुस्से भरी आंखों से घूरे जा रहा था.

इस के बाद विजय ने उस तांत्रिक से रिम्मी के 50,000 और उस दिन की फीस के 5,000 रुपए भी वसूल कर रिम्मी के पिताजी को दे दिए.

लेखक – हेमंत कुमार

Family Story : न्याय अन्याय

Family Story : कुंडी खड़कने की आवाज सुन कर निम्मी ने दरवाजा खोला, ‘‘जी कहिए…’’ निम्मी ने बाहर खड़े 2 लड़कों को नमस्ते करते हुए कहा.

‘‘जी, हम आप के महल्ले से ही हैं. आप को राशन की जरूरत तो नहीं…’’ उन में से एक ने निम्मी से कहा.

‘‘जी शुक्रिया, अभी घर में राशन है…’’ निम्मी ने जवाब दिया.

‘‘ठीक है… जब भी जरूरत होगी, तो इस मोबाइल नंबर पर फोन करना…’’ उन में से एक बड़ी मूंछों वाले लड़के ने निम्मी को एक कागज पर मोबाइल नंबर लिख कर देते हुए कहा.

लौकडाउन का तीसरा दिन था. पूरा शहर एक उदासी और सन्नाटे की ओर बढ़ रहा था. किसी को नहीं पता था कि कब बाजार खुलेगा, कब घर से बाहर निकल सकेंगे और कब हालात सही होंगे.

निम्मी का पति अमर किसी काम से दूसरे शहर गया हुआ था कि अचानक से ये कर्फ्यू से हालात हो गए.

निम्मी की शादी को अभी सालभर भी नहीं हुआ था. निम्मी बहुत खूबसूरत थी. न जाने कितने नौजवान निम्मी को किसी न किसी तरह पाना चाहते थे.

यह तालाबंदी भी निम्मी की जिंदगी में घोर अंधेरा ले कर आई थी. उसे अमर से मिलने की उम्मीद दिखने लगी थी कि लौकडाउन को आगे बढ़ा दिया गया. एक ओर राशन खत्म हो रहा था, तो वहीं दूसरी ओर अमर के खेत में गेहूं की खड़ी फसल. अब कौन फसल को काटे और कौन मंडी ले जाए.

निम्मी सोच ही रही थी कि अमर का फोन आया, ‘निम्मी, मु झे तो अभी वहां आना मुमकिन नहीं जान पड़ता… खेत का क्या हाल है… तुम गई क्या किसी दिन?’

‘‘बस एक दिन गई थी… फसल पक चुकी है, पर अमर अब यह कटेगी कैसे… मजदूर भी नहीं मिल रहे इस वक्त यहां,’’ निम्मी ने बताया.

कुछ देर इधरउधर की बात कर के निम्मी ने फोन रख दिया.

तभी उस के दरवाजे पर किसी ने आवाज दी, ‘‘अमर… बाहर आना.’’

महल्ले के धनी सेठ की आवाज सुन कर निम्मी बाहर आई.

‘‘अमर को बुलाओ तो बाहर. उस से कहो, अगर गेहूं की फसल जल्दी नहीं काटी तो सारी खराब हो जाएगी.’’

‘‘जी, वे तो शहर से बाहर गए थे किसी काम से और तालाबंदी के चलते वहीं फंस गए,’’ निम्मी ने बताया.

हालांकि धनी सेठ अच्छी तरह से जानता था कि अमर घर पर नहीं है, फिर भी अनजान बनने की अदाकारी बखूबी कर रहा था, ‘‘ओह, लेकिन अगर फसल नहीं कटेगी, तो भारी नुकसान उठाना पड़ेगा…’’

‘‘जी जरूर… जरूरत हुई तो आप के पास आ कर कह दूंगी. वैसे, इतनी खेती तो है नहीं कि मंडी तक पहुंचाई जाए. हमारा ही गुजर होने लायक अनाज होता है,’’ निम्मी ने हाथ जोड़ कर कहा.

धनी सेठ कई सवाल ले कर जा रहा था कि निम्मी मु झे बुलाएगी या नहीं, क्या कभी निम्मी के साथ गुफ्तगू मुमकिन है. वह खुद से ही बोलते जा रहा था कि पुजारी से सामना हो गया.

‘‘प्रणाम पुजारीजी… कैसे हैं आप?’’ धनी सेठ पुजारी से बोला.

‘‘चिरंजीवी रहो धनी सेठ… तरक्की तुम्हारे कदम चूमे,’’ दोनों हाथों से आशीष देते हुए पुजारी ने कहा.

‘‘इस दोपहरी में कहां से आ रहे हैं और कहां जा रहे हैं?’’ धनी सेठ ने पुजारी से पूछा.

पुजारी ने सकपकाते हुए जवाब दिया, ‘‘बस, एक यजमान के घर से आ रहा हूं… तो सोचा, थोड़ा नदी किनारे टहल आऊं.’’

‘‘अच्छा… नमस्ते,’’ कह कर धनी सेठ आगे बढ़ गया. इधर निम्मी ने अमर को फोन पर धनी सेठ के प्रस्ताव के बारे में बताया, तो अमर ने साफ इनकार करने को कहा, क्योंकि वह उसे अच्छी तरह जानता था और इस सहयोग के पीछे की मंशा पर भी उसे शक था.

निम्मी ने फोन रखा ही था कि किसी ने घर का दरवाजा खटखटाया. निम्मी ने दरवाजा खोल कर सामने खड़े पुजारी को प्रणाम किया.

पुजारी ने भी धनी सेठ की तरह हमदर्दी और सहयोग का प्रस्ताव दिया. इसी तरह हैडमास्टर किशोर कश्यप ने भी सहयोग का प्रस्ताव निम्मी के सामने रखा.

निम्मी असमंजस में थी. एक ओर उस की शुगर की दवा खत्म हो रही थी, वहीं दूसरी ओर राशन भी खत्म होने को था.

अगले दिन मुंह पर चुन्नी लपेटे निम्मी महल्ले की दुकान तक गई. वहां से जरूरी सामान ले कर वह वापस आ रही थी कि सामने से उसी मूंछ वाले लड़के ने उसे पहचान लिया. उस का नाम अनूप शुक्ला था. उस ने निम्मी से कहा, ‘‘अरे निम्मीजी, आप को किसी चीज की जरूरत थी, तो मु झ से कहती… आप क्यों इस धूप में बाहर निकलीं…’’

‘‘जी, इस में परेशानी की कोई बात नहीं… बस टहल भी ली और सामान भी ले लिया,’’ इतना कह कर निम्मी तेजी से घर की ओर बढ़ गई. पर एक परेशानी उस के सामने खड़ी हो गई कि उस की शुगर की दवा खत्म हो गई और मैडिकल स्टोर बहुत दूर था.

तभी निम्मी को अनूप के मोबाइल नंबर वाला कागज भी दिख गया, तो उस ने उसे फोन कर ही दिया. अनूप ने भी उसे दवा ला कर दे दी.

इसी तरह कुछ दिन बीत गए, पर गेहूं की फसल का कुछ तो करना था, निम्मी यह सोच ही रही थी कि धनी सेठ और पुजारी कुछ मजदूरों के साथ उस के घर पर आ गए.

‘‘आप तो संकोच करेंगी निम्मीजी, पर हमारा भी तो फर्ज बनता है कि नहीं?’’

‘‘मैं कुछ सम झी नहीं,’’ निम्मी बोली.

‘‘इस में न सम झने जैसा क्या है. बस तुम हां कह दो, तो खेत से गेहूं ले आएं.’’

निम्मी कुछ सम झती, इस से पहले ही उन दोनों ने मजदूरों को खेत में जाने का आदेश दे दिया. निम्मी ने उन को चाय पीने को कह दिया.

दोनों चाय पी कर चले गए. उसी शाम धनी सेठ फिर निम्मी के घर आया.

‘‘तुम ठीक हो न निम्मी… मेरा मतलब, खुश तो हो न?’’

‘‘जी, मैं ठीक हूं.’’

धीरेधीरे सेठ निम्मी की ओर बढ़ने लगा और पास आ कर बोला, ‘‘तुम इतनी खूबसूरत और कमसिन हो…’’ इतना कह कर उस ने निम्मी की कमर को अपने आगोश में ले लिया.

निम्मी कुछ रोकती या कहती, उस ने उस के मुंह पर हाथ रख दिया और उसे बेहिसाब चूमने लगा.

निम्मी रोती, कभी मिन्नत करती, पर जिस्म के भूखे सेठ को कुछ दिखाई नहीं दे रहा था. उस ने उसे हर तरीके से भोगा और वहां से चला गया.

निम्मी जोरजोर से रो रही थी, पर उस की चीख सुनने वाला कोई न था. अचानक उसे याद आया कि उस के महल्ले का देवेंद्र सिंह पुलिस में नौकरी करता है. किसी तरह निम्मी ने उस का पता लगाया और फोन किया.

‘हैलो, कौन बोल रहा है?’ देवेंद्र सिंह ने फोन रिसीव कर के पूछा.

‘‘जी, मैं आप के ही महल्ले से बोल रही हूं… मु झे आप की मदद चाहिए,’’ निम्मी ने जवाब दिया.

‘आप को अगर कोई भी परेशानी है, तो आप थाने में आ कर रिपोर्ट लिखा सकती हैं,’ देवेंद्र सिंह ने यह कह कर फोन रख दिया.

निम्मी ने फिर से फोन किया, ‘‘हैलो… प्लीज, फोन मत काटना… मैं निम्मी बोल रही हूं. आप के ही महल्ले में रहती हूं. मेरे पति अमर इस वक्त यहां नहीं हैं और मैं मुसीबत में हूं.’’

अमर का नाम सुनते ही वह निम्मी को पहचान गया, ‘अच्छाअच्छा, मैं सम झ गया. आप चिंता न करें. मैं शाम को आप के पास आता हूं.’

निम्मी अब निश्चिंत थी कि उसे मदद मिल जाएगी और वह धनी सेठ की रिपोर्ट लिखा सकेगी.

शाम को देवेंद्र सिंह उस के पास आया. निम्मी ने सारी बात बताई और मदद मांगी.

‘‘तुम घबराओ मत, मैं तुम्हारी पूरी मदद करूंगा,’’ देवेंद्र सिंह ने कहा.

चाय पी कर जब वह जाने लगा, तो अचानक तेज आंधी और बारिश होने लगी. अब तो देवेंद्र को वहीं रुकना पड़ा.

छत पर सूख रहे कपड़े उतारने के लिए निम्मी भागी, तो उस की साड़ी ही उड़ने लगी.
देवेंद्र सिंह ने उस से कहा, ‘‘मैं ले आता हूं कपड़े. आप बैठ जाइए.’’

बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी, इधर देवेंद्र सिंह अपने पर काबू नहीं कर पाया और जो उस की शिकायत सुनने आया था, उसी निम्मी को दबोच बैठा और एक लाचार को अपनी जिस्म की भूख मिटाने को मसलता रहा.

उस के जाने के बाद निम्मी मर जाना चाहती थी, पर जहर भी कहां से लाए इस तालाबंदी में.

थोड़ी देर में निम्मी को याद आया कि बीती सुबह एक ट्रेन यहां से गुजरी थी और उस ने सुना था कि श्रमिक ट्रेन इन दिनों चल रही है. उसे अब यही एक रास्ता दिखा.

निम्मी ने किसी तरह वह रात काटी और तड़के उठ कर घर से चल दी, पास ही पटरियों की ओर.
पौ फटने का समय था और निम्मी बदहवास जा रही थी. सामने से आते पुजारी ने उसे देख लिया. निम्मी पटरी पर लेट गई और ट्रेन की आवाज सुनाई दी. पुजारी ने भाग कर उसे पटरी से खींच लिया और सम झाबु झा कर घर ले आया. उस ने निम्मी की मजबूरी और अकेलेपन का फायदा उठाया और दबोच लिया.

निम्मी कुछ समझ पाती. इस से पहले ही उसे लूट लिया गया था. तालाबंदी खत्म होने का आदेश भी जारी हो गया. अब अमर के आने की भी उम्मीद होने लगी.

इधर निम्मी अमर की राह देख रही थी, उधर निम्मी के दीवाने दुखी हो रहे थे. निम्मी की मजबूरी का खूब फायदा उठा चुके ये लोग अभी संतुष्ट नहीं हुए थे. अनूप तो सोचने लगा कि अमर घर आता ही नहीं तो अच्छा था, क्योंकि उसे निम्मी के शरीर की मादक खुशबू से अभी तक मन नहीं भरा था. उस के साथ बिताया हर पल उसे याद आ रहा था.

एक शाम जब निम्मी चीनी लेने घर से बाहर निकली, तो वह जबरन उस के साथ अंदर आ गया. निम्मी ने उस से घर से बाहर जाने को कहा, तो उस ने मना कर दिया.

निम्मी मदद के लिए चिल्लाने लगी, तो उस ने उस का मुंह बंद कर दरवाजे की अंदर से कुंडी लगा दी.

निम्मी रोती रही, पर उस की मदद को भला कौन आता. पुलिस पर भरोसा भी कैसे करे. अनूप उसे अपनी हवस की आग में जला रहा था और वह रोए जा रही थी.

तभी वहां से कश्यप मास्टर गुजर रहे थे, तो उन्होंने उस की चीख सुनी तो फौरन घर की ओर मुड़े.

‘क्या हुआ बेटी… क्यों चीख रही हो. दरवाजा खोलो बेटी,’ बेटी सुनते ही निम्मी को न जाने कैसी ताकत आ गई और उस ने अनूप के बालों को खींच कर उस के अंग पर वार कर दिया.

अनूप दर्द से चीखने लगा और मौका पा कर निम्मी ने दरवाजा खोल दिया.

सामने कश्यप मास्टर खड़े थे. उन्होंने अपना अंगोछा निम्मी को ओढ़ा दिया. इस बीच अनूप भाग गया.

‘‘रो मत बेटी,’’ मास्टर साहब उसे दिलासा दे रहे थे. निम्मी रोतेरोते मास्टर साहब की गोद में ही सो गई.

मास्टर साहब ने अपनी बेटी को बुला कर निम्मी की देखभाल करने को कहा और चले गए.

अगले दिन अमर घर आ गया, तो वह बहुत खुश थी. अमर ने देखा कि गेहूं गोदाम में भरे हुए हैं, तो उस ने पूछा, ‘‘निम्मी, ये गेहूं किस ने काटे?’’

निम्मी ने उत्तर देते हुए कहा, ‘‘पुजारी और धनी सेठ ने.’’

अमर सम झ रहा था कि निम्मी कुछ कहने की कोशिश कर रही है, पर कुछ कह नहीं पा रही.

कुछ दिन बीते ही थे कि अमर की तबीयत खराब हो गई. उसे लोगों की मदद से अस्पताल ले जाया गया, जहां उस के टैस्ट चल रहे थे…

इधर निम्मी भी एक रोज चक्कर खा कर गिर पड़ी. पड़ोस की सुधा उसे अस्पताल ले गई. डाक्टर ने तुरंत उसे दवा दे कर कहा कि घबराने की बात नहीं है… कुछ कमजोरी है.

उधर, अमर के टैस्ट की रिपोर्ट आ चुकी थी. उसे डाक्टर ने एचआईवी पौजिटिव की पुष्टि की, तो उस के पैरों के तले से जमीन ही निकल गई. उसे याद नहीं आ रहा था कि उस ने ऐसा क्या किया. वह सोचसोच कर परेशान था.

वह जैसेतैसे घर आया, तो निम्मी की तबीयत और ज्यादा खराब हो रही थी. उस की शुगर भी बढ़ रही थी.

अमर ने उसे तुरंत दवा दी, तो थोड़ा आराम हुआ. इस तरह दिन बीत रहे थे. अमर निम्मी को कैसे बताए, यह सोच रहा था. उधर निम्मी परेशान थी कि कैसे बताए कि कैसे उस के जिस्म के टुकड़ेटुकड़े हुए.

अमर ने चुप्पी तोड़ी, ‘‘निम्मी, तुम मु झ पर भरोसा करती हो न?’’

‘‘यह पूछने की जरूरत है अमर?’’

‘‘तो सुनो… मेरी एचआईवी पौजिटिव की रिपोर्ट आई है,’’ अमर ने एक ही सांस में कह दिया, ‘‘पर, यकीन मानो कि मेरा किसी से कोई संबंध नहीं है. मु झे याद आ रहा है, जब पिछली बार मैं शहर काम से गया था, तो एक सैलून में मैं ने अपनी दाढ़ी बनवाई थी, क्योंकि मु झे मीटिंग के लिए देर हो रही थी, इसलिए मैं ने ही नाई को जल्दी शेव करने को कहा था… शायद उस ने ब्लेड बदला नहीं था,’’ गहरी सांस लेते हुए अमर ने कहा.

निम्मी चुप थी, बस आंखों से आंसू बहाए जा रही थी. कुछ देर बाद अचानक उस के चेहरे पर एक जीत की जैसी मुसकान दौड़ गई.

अमर अपनी बीमारी के चलते ही अधमरा हुआ जा रहा था और निम्मी मुसकरा रही थी.

निम्मी बोली, ‘‘अभी चलो, मु झे भी यह टैस्ट करवाना है.’’

‘‘कल बुलाया है तुम को डाक्टर ने,’’ अमर ने कहा. दोनों के लिए पूरी रात काटनी मुश्किल हो रही थी. निम्मी ने अमर को सब बता दिया था. दोनों बस रोए जा रहे थे.

अगले दिन निम्मी का भी टैस्ट किया गया, तो वह भी एचआईवी पौजिटिव निकली.

निम्मी दुखी होने के बजाय खुश थी. पर दोनों के लिए जीना आसान न था. दोनों अपनी मजबूरियों पर रो रहे थे. जैसेतैसे संभलते हुए दोनों घर आए और एकदूसरे को दिलासा दे ही रहे थे कि अनूप, धनी सेठ, पुजारी सब निम्मी के घर आए और अमर का हालचाल पूछने लगे. इन सब को निम्मी ने ही फोन कर के बुलाया था.

पहले तो अमर को बहुत गुस्सा आ रहा था, पर जैसेतैसे संभल कर उस ने सब को निम्मी का साथ देने के लिए धन्यवाद दिया और निम्मी से चाय बनाने को कहा.

अमर और निम्मी को गुस्सा तो बहुत आ रहा था, पर दोनों ने खुद को संभाल लिया.

‘‘आप लोगों का मैं जितना भी धन्यवाद करूं कम ही होगा,’’ अमर ने कहा, तो धनी सेठ ने कहा, ‘‘इस में धन्यवाद कैसा अमर साहब… हम अगर एकदूसरे के काम नहीं आएंगे तो और कौन आएगा.’’

‘‘जी, कह तो आप सही रहे हैं… पर आप तो हमारे दुखसुख के सचमुच भागीदार हैं और इतना ही नहीं हमारी बीमारी के भी…’’ एक कुटिल हंसी के साथ अमर ने कहा.

‘‘हम कुछ सम झे नहीं… बीमारी के भागीदार कैसे?’’ पुजारी ने चौंकते हुए पूछा. वह घबरा गया था.

अमर ने राज खोला, तो सब के सब सकपका कर रह गए और एकदूसरे का मुंह ताकने लगे.

उधर निम्मी और अमर चैन की सांस ले रहे थे, एकदूसरे को हिम्मत दे रहे थे और कुदरत के इस न्यायअन्याय को सम झने की कोशिश कर रहे थे.

लेखिका – आरती लोहनी

लोगों में बढ़ रही Porn Videos देखने की लत

Porn Videos : किसी भी चीज की लत लग जाना हमारे शरीर के लिए बेहद हानिकारक होती है फिर चाहे शराब हो, सिगरेट, बीड़ी हो, सैक्स हो या फिर पोर्न वीडियोज देखना.

शराब और सिगरेट की लत के बारे में तो हम सब ने सुना और देखा ही है पर इन दिनों लोगों के अंदर पोर्न वीडियोज देखने की लत भी लग चुकी है, जिस का पता उन्हें खुद भी नहीं लग पाता.

यों पोर्न वीडियोज देखना कोई बुरी बात नहीं है और न ही इस में कोई बुराई है. सैक्स करने की इच्छा हम सब के अंदर होती है और सैक्स न मिलने पर कुछ लोग पोर्न वाीडियोज का सहारा ले कर खुद को संतुष्ट करते हैं. मतलब यह कि यह देख कर हस्तमैथुन करना.

पोर्न वीडियोज देखने के कई फायदे भी हैं और इस फायदों के साथ इस के कुछ नुकसान भी हैं। तो चलिए, पहले बात करते हैं पोर्न वीडियोज देखने के फायदों के बारे में.

फायदे

पोर्न वीडियोज देखने से हम खुद को संतुष्ट कर पाते हैं। अगर सैक्स न मिलने पर लोग इस तरीके को नहीं अपनाएंगे तो उन के अंदर सैक्स की प्यास बढ़ती चली जाएगी और उन के मन में किसी न किसी के लिए लिए गलत विचार आने शुरू हो जाएंगे.

ऐसे में ऐक्सपर्ट्स का भी यही कहना है कि हस्तमैथुन करना हमारे शरीर के लिए कुछ मायने तक हैल्दी भी है.

नुकसान

अगर बात करें पोर्न वीडियोज देखने के नुकसान की तो जरूरत से अधिक पोर्न वीडियोज देख कर बारबार हस्तमैथुन करना भी उचित नहीं है.

ज्यादा पोर्न वीडियोज देखने से ध्यान किसी और चीज में नहीं लग पाता बल्कि हर समय सिर्फ सैक्स के बारे में ही सोचने लग जाते हैं जोकि बिलकुल गलत है.

अगर आप को भी लगता है कि आप को पोर्न वीडियोज देखने की लत लग चुकी है तो ऐसे में आप को तुरंत यह सब देखना बंद कर देना चाहिए और अपना ध्यान किसी और चीज में लगाना चाहिए जिस से कि आप का बारबार पोर्न देखने का मन ही न करे. साथ ही आप किसी अच्छे और अनुभवी सैक्स स्पैशलिस्ट से मिल सकते हैं जोकि आप को देख आप की स्थिति अच्छी तरह समझ जाएंगे.

Relationship Tips : गर्लफ्रेंड को सैक्स के लिए कैसे मनाऊं ?

Relationship Tips : अगर आप भी अपनी समस्या भेजना चाहते हैं, तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें..

सवाल –

मेरी उम्र 19 साल है और मैं ने हाल ही में स्कूल पास करके कालेज में ऐडमिशन लिया है. शुरुआत से ही मुझे कालेज जाने का बहुत शौक था क्योंकि कालेज नाम सुनते ही मेरे मन में बहुत सी हसीन चीजें आती थीं जैसेकि कालेज में लोग खुलेआम अपनी गर्लफ्रैंड्स के साथ घूमते हैं, साथ में ट्रिप्स पर जाते हैं, रोमांस करते हैं और अपनी जिंदगी के हसीन पल जीते हैं. कालेज के पहले दिन से ही मेरे कई सारे दोस्त बने और जैसा मैं ने सोचा था वैसा ही हुआ. हम सब पूरा दिन साथ रहते और खूब घूमते. इसी दौरान मेरी एक गर्लफ्रैंड भी बनीं जोकि मेरी लाइफ की पहली गर्लफ्रैंड है. मैं उसे बहुत प्यार करता हूं और वह भी मेरा बहुत खयाल रखती है. हम दोनों में कई बार रोमांस भी हुआ है लेकिन वह कभी मुझे किसिंग से आगे बढ़ने ही नहीं देती. मैं ने उसे कई बार समझाया है कि रिलेशनशिप में यह सब चलता है पर वह नहीं मानती. मुझे उस के साथ सैक्स करने का बहुत मन करता है और ऐसे में मैं ने उसे कई बार अपने साथ होटल जाने को भी कहा पर वह तैयार नहीं होती. मैं क्या करूं ?

जवाब –

इस उम्र में ऐसे खयाल आना स्वभाविक हैं. बौलीवुड फिल्म्स और आजकल की वैब सीरिज ने लोगों के मन में कालेज की एक अलग ही इमेज सैट की हुई है जो कि बिलकुल गलत है. कालेज में मौजमस्ती करना अच्छी बात होती है लेकिन मौजमस्ती और ऐयाशी में काफी अंतर होता है जोकि हमें समझना चाहिए. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हम कालेज में सिर्फ मौजमस्ती या ऐयाशी करने नहीं, बल्कि पढ़ने भी गए हैं.

आप ने कालेज में अपनी लाइफ में पहली गर्लफ्रैंड बनाई है तो जाहिर है कि आप को इस से पहले रिलेशनशिप का ज्यादा अनुभव नहीं है, तभी आप इतनी जल्दबाजी कर रहे हैं.

सैक्स लड़कियों के लिए कोई छोटी चीज नहीं होती और सैक्स करने के लिए दोनों की ही रजामंदी जरूरी है.

आप को पहले उस लड़की का विश्वास जीतना चाहिए. उस के साथ अच्छे पल बिताने चाहिए. अगर सच में आप उस लड़की से प्यार करते हैं तो उस की फीलिंग्स की रिस्पैक्ट करें.

अगर आप उस ल़ड़की को दिल से रिस्पैक्ट करेंगे और उन्हें प्यार करेंगे तो हो सकता है वस आप के साथ सैक्स करने को मान जाए पर याद रहे कि आप को अपनी गर्लफ्रैंड के साथ किसी तरह की कोई जबरदस्ती नहीं करनी है.

सैक्स हमेशा दोनों की रजामंदी से किया जाता है. अगर आप अपनी गर्लफ्रैंड से शादी करना चाहते हैं तो उस के बारे में अपने घर वालों को भी बताएं ताकि आप की गर्लफ्रैंड को आप के ऊपर विश्वास होने लगे.

जैसाकि आपने बताया कि आप के मन में कालेज को ले कर एक अलग ही खुमार था तो ऐसे में यह खुमार पढ़ाई के लिए को बिलकुल नहीं था. आप शुरुआत से ही कालेज में मौजमस्ती करने गए हैं जोकि गलत है. आप को कालेज में मौजमस्ती के साथसाथ पढ़ाई पर भी ध्यान देना चाहिए.

यह समय आप की पढ़ाई का है और फिर लौट कर नहीं आएगा. बाद में पछताने से अच्छा है आप साथसाथ पढ़ाई पर भी उतना ही ध्यान दें.

अलबत्ता, पहले कैरियर बना लें और फिर सैक्स और शादी के बारे में सोचें. हां, सैक्स कुदरत का दिया एक अनमोल तोहफा है. अगर आप की गर्लफ्रैंड इस के लिए तैयार है तो सैक्स करने में बुराई नहीं, मगर फिलहाल आप दोनों ही अपनी पढ़ाई और कैरियर पर फोकस करें.

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