हरिनारायण राय : हीरो से बन गए जीरो

साल 2005 से ले कर साल 2009 के बीच झारखंड के त्रिशंकु जनादेश के बीच सब से ज्यादा मलाई काटने वाले हरिनारायण राय को कानून ने 7 साल के लिए जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा दिया है. हरिनारायण राय देश के पहले ऐसे नेता हैं, जो प्रिवैंशन औफ मनी लाउंड्रिंग ऐक्ट के तहत कुसूरवार पाए गए हैं. उन पर साल 2007 से ले कर साल 2008 के बीच 4 करोड़, 83 लाख रुपए की मनी लाउंड्रिंग का आरोप है. उन के साथ उन की बीवी सुशीला देवी और भाई संजय राय भी जेल में ठूंस दिए गए हैं. राज्य की राजनीति में जीरो से हीरो तक की छलांग लगाने वाले हरिनारायण राय ने निर्दलीय विधायकों के साथ सियासत का खूब गेम खेला और करोड़ों रुपयों के वारेन्यारे किए. वे कई बार पाला बदल कर सरकार गिराने और बनाने का खेल खेलते रहे. एक के बाद एक 3 सरकारों को उन्होंने अपनी उंगलियों पर नचाया और जब चाहा सरकार बना दी, जब चाहा गिरा दी.

साल 2005 में अपनी सियासी पारी शुरू कर पहली बार विधायक बनने वाले हरिनारायण राय झारखंड के किंगमेकर बने और अब जेल की हवा खाने के लिए मजबूर हैं.

प्रवर्तन निदेशालय की विशेष अदालत ने हरिनारायण राय को प्रिवैंशन औफ मनी लाउंड्रिंग ऐक्ट के तहत कुसूरवार पाया और उन्हें 7 साल की कैद की सजा सुना दी. साथ ही, उन पर 50 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया गया है. 4 सितंबर, 2009 को ईडी ने उन के खिलाफ मनी लाउंड्रिंग मामले में केस दर्ज किया था. 27 नवंबर, 2011 को चार्ज फ्रेम हुआ था.

5 अक्तूबर, 1965 को देवघर में जनमे हरिनारायण राय पहली बार देवघर के जरमुंडी विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय चुनाव जीत कर साल 2005 में विधायक बने थे.

हरिनारायण राय के अलावा झारखंड के जिन नेताओं ने अपने इशारों पर कई सरकारों को बनाने और गिराने का खेल खेला, वे आज कानून के फंदे में फंस कर जेल और अदालत के बीच चक्कर लगा रहे हैं. करोड़ोंअरबों रुपयों की काली कमाई उन्हें जेल की काली कोठरी से नजात नहीं दिला पा रही है.

आदिवासियों के लिए बने अलग राज्य झारखंड को मधु कोड़ा, एनोस एक्का, भानुप्रताप शाही, हरिनारायण राय, कमलेश सिंह जैसे नेताओं ने लूट लिया. साल 2005 से ले कर साल 2009 तक कांग्रेस और भाजपा जैसे राष्ट्रीय दलों को बेवकूफ बना कर अपना उल्लू सीधा किया. आज पांचों नेता जेल की सलाखों के पीछे हैं.

मधु कोड़ा राजीव गांधी विद्युतीकरण योजना घोटाला, प्रदूषण नियंत्रण घोटाला, कमाई से ज्यादा संपत्ति और मनी लाउंड्रिंग के मामले के आरोप में 30 नवंबर, 2009 से जेल की हवा खा रहे हैं.

एनोस एक्का और हरिनारायण राय पर मनी लाउंड्रिंग व आमदनी से ज्यादा जायदाद रखने का आरोप साबित हो चुका है और दोनों सलाखों के पीछे पहुंचा दिए गए हैं. कमलेश सिंह भी इन्हीं आरोपों के पेंच में फंस कर सींखचों के पीछे दिनरात बिता रहे हैं.

कोड़ा मंत्रिमंडल में स्वास्थ्य मंत्री रहे भानुप्रताप शाही 130 करोड़ रुपए के दवा घोटाला, मनी लाउंड्रिंग और आमदनी से ज्यादा कमाई के आरोप में 5 अगस्त, 2011 को सीबीआई के हत्थे चढ़े थे.

रांची महानगर कांग्रेस के अध्यक्ष रहे विनय कुमार सिन्हा कहते हैं कि कानून से खेल करने वालों और जनता का भरोसा तोड़ने वालों को कानून ने सही जगह पहुंचा दिया है.

कोड़ा मंत्रिमंडल में रहे 14 में से 5 लोग जेल की हवा खा रहे हैं, जिस में मुख्यमंत्री रहे मधु कोड़ा भी शामिल हैं. झारखंड बनने के बाद साल 2005 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में मधु कोड़ा, कमलेश सिंह, भानुप्रताप शाही, एनोस एक्का और हरिनारायण राय को जीत मिली और तब से ये लोग झारखंड को लूटने और सत्ता का खेल खेलने में लगे रहे.

चुनाव के तुरंत बाद शिबू सोरेन की अगुआई वाली संप्रग सरकार में ये पांचों शामिल हुए और 7 दिनों के बाद ही पाला बदल कर अर्जुन मुंडा की अगुआई वाली राजग सरकार का झंडा उठा लिया.

साल 2006 आतेआते उन लोगों को दूसरे का झंडा उठाने में खास फायदा नहीं दिखा, तो निर्दलीय विधायक मधु कोड़ा को मुख्यमंत्री बनने के लिए राजी कर सत्ता की पूरी चाबी अपने हाथों में ले ली. उस के बाद खुल कर लूट का खेल खेला और सत्ता की मलाई खाई.

झारखंड में विधानसभा और अपने इलाके की जनता के बीच समय गुजारने के बजाय झारखंड के ज्यादातर विधायक और मंत्री जेल, अदालत, सीबीआई के दफ्तर और वकीलों के चक्कर लगा रहे हैं.

सरकार बनाने और गिराने के खेल में ‘मोटी कमाई’ करने वाले नेताओं ने अपनी सियासी जमीन तो कमजोर कर ही ली है, राज्य का भी कबाड़ा कर के रख दिया है.

राज्य के 15 विधायक पिछले साल हुए राज्यसभा चुनाव में उम्मीदवारों से पैसा ले कर वोट डालने के आरोप में सीबीआई के शिकंजे में फंसे हुए हैं. किसी का बंगला सील कर दिया गया है, तो किसी के बैंकों की पासबुक और जमीन के कागजात जब्त कर लिए गए. किसी के लैपटौप और मोबाइल फोन के डाटा को खंगालने के लिए सीबीआई अपने साथ ले गई.

झारखंड विधानसभा में कुल 81 सीटें हैं और किसी भी दल या गठबंधन को सरकार बनाने के लिए कम से कम 42 सीटों की दरकार होती है.

जानकारों का मानना है कि झारखंड में जबतब पैदा होने वाली सियासी उठापटक को दूर करने के लिए झारखंड विधानसभा में कम से कम 150 सीटें होनी चाहिए. विधानसभा सदस्यों की तादाद कम होने से ही अस्थिरता की हालत पैदा हो जाती है, जिस का खमियाजा झारखंड राज्य को भुगतना पड़ रहा है.

सीटें बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार समेत राज्य की सियासी पार्टियां पिछले कई सालों से बात कर रही हैं, पर कोई नतीजा नहीं निकल सका है.

जाति का जहर जिसने ले ली जान

बिहार के गया जिले के एक गांव में एक दलित बूढ़े जोड़े को पीटपीट कर मार डाला, क्योंकि उन का 20 साल का नाती एक पिछड़ी जाति की लड़की के साथ भाग गया था. जाहिर है कि मामला प्रेम का है, पर चूंकि पिछड़ी जाति की लड़की अछूत के लड़के के साथ भाग जाए, यह आज भी गांवों में ही नहीं, बल्कि शहरों में भी सहन नहीं होता. जाति का जहर इस कदर रगरग में भरा है कि चाहे दलित और पिछड़े दोनों ही जाति के कहर के शिकार क्यों न रहे हों, पिछड़ों को आज भी यह मंजूर नहीं कि कोई दलित उन की बराबरी करे या उन से रोटीबेटी का नाता जोड़े.

शहरों में यह बात गुपचुप होती है. यदि लड़की को दलित लड़के से प्यार हो जाए, तो उस के घर वाले मारने की नहीं तो मरने की धमकी दे कर लड़की को मजबूर कर देते हैं कि वह नाता तोड़ दे.

यह तो पक्का है कि जब दलित और उस से ऊंची जाति वालों में प्यार होता है, तो दोनों का रहनेखाने का तरीका एक सा होगा. कम ही मामलों में बहुत गरीब का बहुत अमीर से प्यार फलता है. अगर ऐसे में दोस्ती हो भी जाए, तो उसे टूटते देर नहीं लगती. लड़की और लड़के के दोस्त ही पहले दोनों को अपनीअपनी जातियां बता देते हैं और आमतौर पर ऊंची जाति वाले दोस्त नीची जाति वाले लड़के या लड़की से दोस्ती तोड़ लेते हैं.

अगर दोस्तों की अड़चन पार कर के प्यार करने वाले आगे बढ़ जाएं, तो भी मुसीबतें कम नहीं होतीं. अगर दोनों कमाऊ हों तो ही वे अपने फैसले पर टिक सकते हैं. मातापिता के बलबूते तो इस तरह का प्यार टिक ही नहीं पाता.

परिवार के लोग इस तरह के प्यार पर नाकभौं चढ़ाते हैं. अगर लड़की दलित हो तो लड़की के मातापिता को डर लगता है कि उसे प्यार करने वाला पेट से कर के छोड़ न जाए, क्योंकि इस तरह के सैकड़ों मामले हर दलित 40-50 साल का होतेहोते देख चुका होता है. वह जानता है कि ऊंची जाति के लड़के शादी का झांसा दे कर लड़की की इज्जत से खेलते हैं.

अगर उलट होता है तो लड़के के दलित मातापिता खौफ में जीते हैं कि ऊंची जाति वाले उन्हें जीने न देंगे. आज 2017 में भी भारत में कुछ ज्यादा नहीं बदला है और यह दलित अच्छी तरह जानते हैं. पिछड़े भी अगर दलितों पर जोरआजमाइश करते हैं, तो उन के मन में बैठा सवर्णों का खौफ बोल रहा होता है. वे सवर्णों को बताना चाहते हैं कि देखो, हम भी दलितों से कोई नाता नहीं रख रहे, जैसे आप नहीं रखते. सवर्ण उन से खुश हों या न हों, पिछड़ों को एहसास होता है कि उन का कद बढ़ गया है.

पूरे देश में यह बीमारी बराबर सी फैली हुई है. दलितों में आपस में भी ऊंचनीच की तेज सोच रहती है. सरकार की तो उसे सुधारने की जिम्मेदारी है ही नहीं, पर अब ऐसे सामाजिक नेता भी नहीं रह गए जो जाति के जहर की दवा बता सकें. टीवी, इंटरनैट, अखबार सब जातियों का गुणगान करते हैं. 80 साल के सुखदेव रविदास और उस की बूढ़ी पत्नी ने नाती भी खोया और अपनी जिंदगी भी, पर शायद ही कहीं किसी को अफसोस होगा.

ज्योतिष से रोजगार, है न वाकई मजेदार

अपनी चहेती पत्रिका ‘सरस सलिल’ के पिछले सैकड़ों अंकों में आप ‘रोजगार’ स्तंभ के जरीए कई तरह के सस्ते व आसान धंधों की जानकारी हासिल कर के उन से फायदा उठा चुके होंगे. आज हम आप को सब से हट कर एक ऐसे धंधे या पेशे के बारे में बताने जा रहे हैं, जो कि धर्मकर्म के नाम पर अपनी संतों की ‘पावन’ धरती पर सदियों से धड़ल्ले से चला आ रहा है. वह है, ज्योतिष का धंधा. कुछ संपादकीय नियमकायदों के तहत यह ‘रोजगार’ स्तंभ में न छप कर ‘मजाक’ स्तंभ में छापा जा रहा है. कृपया इस बात को अन्यथा न लें.

किसी भी धंधे को शुरू करने के लिए आप को एक मोटी रकम को धंधे में लगाने का जोखिम उठाना पड़ता है. सरकारी सेवा क्षेत्र में जाने से पहले तमाम तरह की प्रतियोगी परीक्षाओं को ‘झेलना’ पड़ता है. चार्टर्ड अकाउंटैंट, वकील, डाक्टर, इंजीनियर वगैरह बनने के लिए बरसों तक हजारोंलाखों रुपए बहा कर मोटीमोटी किताबों से दिनरात माथापच्ची कर के आप कोई डिगरी अगर हासिल कर भी लेते हैं, तो आप 15-20 हजार रुपए महीने ही कमा पाते हैं.

इस के उलट ‘ज्योतिषाचार्य’ बनने के लिए आप को न तो ज्यादा रुपएपैसे खर्च करने की जरूरत है और न ही दिमाग की. बस, आप में बात करने की चालाकी व अंदाजा लगाने की लियाकत होनी चाहिए.

अगर आप शर्मीले मिजाज के हैं, तो हम आप को पहले ही बता देना चाहेंगे कि इस कमी की वजह से आप कभी भी इस क्षेत्र में कामयाबी हासिल नहीं कर पाएंगे. ज्योतिषी बनने से पहले शर्म छोड़ना उसी तरह बहुत जरूरी है, जिस तरह बीवी बनने के लिए मायके को छोड़ना.

ज्योतिषाचार्य बनने के लिए सब से पहले तो आप को पैंटशर्ट छोड़ कर धोतीकुरते की ‘यूनीफार्म’ अपनानी पड़ेगी. शास्त्रों में लिखा है कि शिखा रखने से आदमी की बुद्धि तेज होती है. हर पंडित इस बात को ध्यान में रख कर ही औरतों की माफिक चोटी रखता है, इसलिए आप को भी रखनी पड़ेगी. इस के लिए आप को एक बार सिर मुंड़वाने की जरूरत भी पड़ सकती है.

अपने ललाट पर तिलक भी लगाना पड़ेगा. अगर आप का ललाट काफी चौड़ा है, तो हम आप को चंदन का बड़ा व गोल तिलक लगाने की सलाह देते हैं. अगर आप का मुंह पिचका हुआ है, तो आप अपनी धर्मपत्नी से सिंदूर ले कर, उस में थोड़ा पानी मिला कर, झाड़ू की तीली की मदद से लंबा सा तिलक, जिसे ‘श्री’ कहा जाता है, लगा सकते हैं.

आजकल बहुत तरह के तिलक चल निकले हैं. जिस तिलक को लगा कर आप की इमेज ‘ऐक्स्ट्रा और्डिनरी’ जैसी लगे, आप उसी को अपना सकते हैं. ऐसा इसलिए, क्योंकि इस पेशे में ऊटपटांग बोलचाल व हरकतों की बेहद अहमियत है. आप अपना ‘ज्योतिष दफ्तर’ अपने घर के ही किसी कमरे में आराम से खोल सकते हैं. आप के घर के बाहर इस बारे में एक बोर्ड जरूर लगा होना चाहिए, ताकि लोगों को इस बात की जानकारी आसानी से हो सके.

जिस तरह किसी दिल के माहिर डाक्टर के क्लिनिक में दिल का बड़ा सा फोटो व कान के माहिर डाक्टर के यहां कान के फोटो लगे रहते हैं, उसी तरह आप के ‘दफ्तर’ में भी ‘हाथ’ का एक बड़ा सा फोटो लगा होना चाहिए.

पूरे कमरे में जहांतहां संस्कृत भाषा में लिखी सूक्तियां, मंत्रों व श्लोकों के स्टीकर चिपके होने चाहिए. भले ही इस से कमरे की शोभा खराब हो, पर ये आप के पहुंचे हुए ज्योतिषी होने की शख्सीयत में चार चांद लगा जाएंगे. आप के दफ्तर में 4-5 तरह के पंचांग बेतरतीबी से बिखरे होने चाहिए. यह आप के बिजी होने का सुबूत होगा.

दफ्तर में सैकड़ों साल पहले लिखी हुई धर्म व कर्मकांडों की किताबों का भी अच्छाखासा संग्रह होना जरूरी है. ज्यादातर ज्योतिषियों की संतानें इतनी भ्रष्ट व कामचोर होती हैं कि वे अपने बाप का पेशा अपना नहीं पातीं. सो, अगर आप अपने शहर की किसी कबाड़ी की दुकान खंगालें, तो तमाम कीमती किताबें आप को रद्दी के भाव भी मिल सकती हैं.

इस से आप को एक फायदा और भी होगा. वह यह कि आप के ‘ग्राहकों’ की नजर जब इन पुरानी किताबों पर पड़ेगी, तो वे यही सोचेंगे कि आप ने इन किताबों का बड़ा गहरा अध्ययन किया है, तभी तो ये ग्रंथ इस हालत में हैं.

इस से आप के शहर में आप की इमेज शास्त्रों के ज्ञाता व महापंडित जैसी बनने लगेगी. भले ही आप को संस्कृत की एबीसीडी न आती हो, पर इस से आप के नाम के साथ ‘पुराणाचार्य’, ‘वेदाचार्य’ व ‘व्याकरणाचार्य’ जैसे शब्द लगने लगेंगे.

ये तो हुई बुनियादी बातें. अब जरा प्रैक्टिकल बातों को ध्यान से समझ लें. आप अपनी बातों में संस्कृत के कुछ शब्दों को रट कर जहांतहां ‘फिट’ करने की आदत डालें. किसी आदमी के चेहरे को पढ़ कर कुछ जानने की कोशिश करें. कुछ बातें ऐसी होती हैं कि उन्हें हर किसी पर आसानी से फिट किया जा सकता है.

मसलन, आप काफी प्रतिभावान हैं, मगर यह दुख की बात है कि आप की प्रतिभा का सही इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है. समाज में जो इज्जत आप को मिलनी चाहिए, वह नहीं मिल रही है. आप में काफी कुछ करगुजरने की क्षमता है, पर शनि की बुरी नजर की वजह से आप हर बार नाकाम हो रहे हैं. आप जिस क्षमता से काम कर रहे हैं, उस के मुताबिक आप को कामयाबी नहीं मिल रही है.

आप सभी से प्यार करने वाले जज्बाती इनसान हैं, पर इस के बदले आप को कभी किसी का प्यार नहीं मिल पा रहा है. उलटे आप अपनों द्वारा ही दुत्कारे जा रहे हैं. आप कला प्रेमी, संगीत प्रेमी व खास काबिलीयत रखने वाले हैं. आप अपने वजूद की वजह से सब से अलग जानेपहचाने जाते हैं, वगैरह.

लड़कियां कुंआरी हैं या शादीशुदा, यह उन के सुहागचिह्नों की मदद से आसानी से पहचाना जा सकता है. लड़कों के संबंध में देखिए कि उस की अनामिका उंगली में कोई सोने की अंगूठी है या गले में सोने का हार है या नहीं. जब आप के पास कोई कुंआरा लड़का आता है, तो वह यही जानना चाहेगा कि वह इम्तिहान में पास हो सकेगा या नहीं. या फिर उस के लिए कोई धंधा करना ठीक रहेगा या नौकरी.

अगर आप के पास कोई कुंआरी लड़की आती है, तो वह यकीनन अपनी शादी में आ रही अड़चनों को ले कर परेशान होगी और आप से यह जानना चाहेगी कि कौन सा ग्रह इस काम में रुकावट डाल रहा है. इस को शांत करने के लिए आप को कितना चढ़ावा देना पड़ेगा. गोया, आप ज्योतिषी न हो कर इस मृत्युलोक में सारे ग्रहों के प्रतिनिधि हो गए.

कोई शादीशुदा नौजवान यदि आए, तो वह अपनी बीवी से पीडि़त होता है. यदि कोई नवविवाहिता आए, तो वह बेचारी अपने पति के शराबी, दुर्व्यसनी व कामचोर होने की वजह से परेशान हो कर आप के पास पहुंचती है.

अगर आप के पास 25-30 साल के मियांबीवी आते हैं, तो आप सीधे ही इस नतीजे पर पहुंच जाइए कि उन को संतानसुख की प्राप्ति नहीं हो पा रही है.

इस के लिए पहले तो आप उन दोनों की कुंडली मिलाने के बहाने ‘मोटी फीस’ झटक सकते हैं. बाद में उन्हें बता सकते हैं कि क्या करने से संतान योग बनता दिख रहा है. इस के लिए ऐसा अनुष्ठान आदि का काम चुनें, जिस से कि आप को लंबा फायदा हो.

आप अपने पास पहुंचे ग्राहक की आंखों को ध्यान से देखिए, अगर वे गहरी लाल हैं और उन के नीचे गहरे काले गड्ढे भी हैं, तो वह आदमी बीमार ही नहीं, बल्कि अनिद्रा का भी शिकार होता है. ऐसे आदमी शारीरिक रूप से कम व दिमागी रूप से ज्यादा बीमार होते हैं. ऐसे लोगों के घर जा कर आप कोई जाप कर के कमाई कर सकते हैं.

पीडि़त आदमी आप को अपने घर से भोजन करा कर ही जाने देगा. ऐसे में आप अपना मनचाहा भोजन यह कह कर उस से बनवा सकते हैं कि अमुक भोजन ऊपर वाले को बहुत प्रिय है और इस का भोग लगाने से वे शीघ्र ही प्रसन्न होते हैं. एक कहावत है कि सेठ, जेठ और ब्राह्मण का पेट बड़ा ही होता है. ब्राह्मणों को खुद का कमाया भोजन रास नहीं आता है और यह भोजन उन के शरीर को भी नहीं लग पाता है. ऐसे में मजबूत बदन बनाने के लिए यजमान के भोजन पर निर्भर रहना बहुत जरूरी होता है. इसलिए यजमान को उपाय बताते समय ‘ब्राह्मण भोज’ की बात जरूर बतानी चाहिए.

आप के पास रिटायर होने की उम्र में कोई आदमी पहुंचता है, तो वह निश्चित रूप से अपने बेटेबहुओं की अनदेखी का शिकार होता है. सावधान रहें, ऐसा भी हो सकता है कि वह कोई सरकारी मुलाजिम रहा हो या उस की पेंशन अटकी पड़ी हो.

शुरूशुरू में आप को थोड़ी दिक्कत जरूर आ सकती है, पर 2-4 साल बाद आप अंदाजा लगाने में इतने माहिर हो जाएंगे कि आप का अंधेरे में छोड़ा गया तीर भी निशाने पर जा लगेगा. आप की आंखों की काबिलीयत किसी ‘ऐक्सरे मशीन’ जैसी बन जाएगी. कामयाबी आप के कदम चूमेगी.

आप के द्वारा यजमानों का सही भविष्यफल बता देने से वे आप के परमभक्त बन जाएंगे. वे आप के चलतेफिरते इश्तिहार भी साबित होंगे. इस से आप के दफ्तर में यजमानों की भीड़ लग जाएगी और आप डाक्टरों, वकीलों आदि की जलन की वजह बन जाएंगे.

इस धंधे का सब से बड़ा फायदा तो यह है कि यह तेजी व मंदी से बेअसर रहता है. उलटे ऐसे समय में जो लोग इस से पीडि़त होंगे, वे सभी आप की ही ‘शरण’ में आएंगे. सो, ऐसे उलट समय में भी आप का कारोबार अच्छाखासा चलता रहेगा. तो जनाब, देरी किस बात की है? आज ही अपना कोई अच्छा सा नामकरण कर लीजिए और आज के जमाने में सब से ज्यादा मुनाफा देने वाला ज्योतिष का ‘धंधा’ शुरू कर दीजिए.

ऐक्टिंग की राह में बड़े धोखे हैं : प्रियंका महाराज

फिल्मों में काम कर के बड़ा कलाकार बनने का सपना तमाम लड़के लड़कियां देखते हैं. कई कलाकारों का शुरुआती सफर बहुत ही मुश्किल भरा होता है, जिस से आने वाले लोगों को सीख भी मिल सकती है. इस के जरीए वे तमाम तरह की परेशानियों से बच सकते हैं. बिहार की राजधानी पटना की रहने वाली प्रियंका महाराज के फिल्मी सफर की कहानी काफी मुश्किलों भरी रही, पर अब वे कामयाबी की राह पर हैं. जद्दोजेहद के उस दौर में वे काफी परेशान थीं. उन्हें लग ही नहीं रहा था कि कामयाबी मिलेगी.

प्रियंका महाराज की मां टीचर थीं. अब वे नौकरी छोड़ कर बेटी के साथ रहती हैं. प्रियंका के पिता इंस्पैक्टर हैं. पहले वे बेटी को फिल्म लाइन में नहीं भेजना चाहते थे, पर जब बेटी की जद्दोजेहद को देखा, तो मदद के लिए आगे बढ़े. आज वे भी खुश हैं.

अपने मुश्किल दिनों की यादें प्रियंका महाराज ने बातचीत में बताईं. पेश हैं, उस के खास अंश:

पटना से मुंबई का सफर कैसा रहा?

पटना से मैं सब से पहले दिल्ली पहुंची थी. मुझे ‘मिस इंडिया’ बनना था. डांस और मौडलिंग मेरी हौबी थी. घर में किसी का कोई सहयोग नहीं था. पापा तो कतई नहीं चाहते थे कि मैं फिल्म या मौडलिंग लाइन में काम करूं. ऐसे में मैं पापा से छिप कर डांस सीखती थी.

मैं ने कभी हार नहीं मानी. मैं अपनी कोशिश में लगी रही. ऐक्टिंग सीखने के लिए मैं ने थिएटर किया, फिर टैलीविजन पर ‘बिग मैजिक’ पर ‘पुलिस फाइल’ सीरियल में काम करने का औफर मिल गया. इस के बाद ‘दूरदर्शन’ पर भी एक सीरियल किया. मौडलिंग भी शुरू कर दी. सब ठीकठाक चल रहा था. थोड़ा सा मम्मी का सहयोग मिलने लगा. बाद में पापा ने भी विरोध करना बंद कर दिया.

जद्दोजेहद का दौर कब आया?

शुरुआती कामयाबी के बाद ऐसा लगा कि सब ठीक है. बिहार में भोजपुरी फिल्में बहुत चलती हैं. ‘निरहुआ’ का हीरो के रूप में बड़ा नाम है. फेसबुक पर एक लड़के से संपर्क हुआ. उस ने खुद को ‘निरहुआ’ का भांजा बताया और मुझ से बोला कि वह सीरियल और फिल्म दोनों में काम दिला देगा. उस ने मुझे दिल्ली बुलाया.

मैं अपनी मां के साथ उस की बात को सच मान कर दिल्ली चली आई. इस के पहले मुझे बिराज भट्ट के साथ फिल्म ‘जिद्दी’ का औफर मिला था. शूटिंग शुरू नहीं हो रही थी. पूरा एक महीना मैं अपनी मां के साथ दिल्ली में ही रही.

वह लड़का आया और बोला कि दिनेशजी ने मुझे भेजा है. उन के पास समय नहीं है. उस ने आर्टिस्ट कार्ड बनाने के लिए 60 हजार रुपए मांगे. हम लोगों ने दे दिए. हमें लगा कि जब सीरियल में काम मिल जाएगा, तो यह पैसा वापस आ जाएगा.

फिर सच कैसे सामने आया?

हम लोग एक महीने तक वहां रहे, पर कोई सीरियल नहीं मिला. तब हम ने सच पता करने की कोशिश शुरू की, तो पता चला कि वह लड़का दिनेशजी का भांजा नहीं है. मैं झांसे में आ गई थी.

मेरी मां की तबीयत खराब हो गई. मैं बहुत डर गई. फिर मुंबई में फिल्म करने का एक औफर मिला. हम लोग वहां से मुंबई चले आए, जोगेश्वरी इलाके में होटल में रहने लगे.

वहां भोजपुरी के कुछ कलाकारों, प्रोड्यूसरों व डायरैक्टरों से मिली. ऐसे में 20 दिन बीत गए. हमारे पास पैसे खत्म हो गए थे. होटल वाले ने हमें निकाल दिया. वहां रहनेखाने को पैसा नहीं था.

हम स्टेशन पर निराश बैठे थे. वहां पर कुछ लोगों से बात हुई. बड़ी मुश्किल से रहने के लिए होटल मिला. वहां रहते हुए मैं छोटे काम कर के पैसा कमाने लगी. इस बीच फिल्म ‘जिद्दी’ की शूटिंग शुरू हो गई. तब पैसा मिला.

यह सब पापा को कब पता चला?

फिल्म ‘जिद्दी’ की शूटिंग के बाद पापा को सबकुछ बताया. तब से वे हमारा सहयोग करने लगे. फिर मुझे कई फिल्में मिलने लगीं. मैं फिल्मों के साथ डांस शो भी करने लगी

मेरी आने वाली फिल्मों में ‘नसीब’, ‘जान तोह पे लुटाइब’, ‘बनारसी बबुआ’, ‘इश्कवाले’ और ‘घूंघट में के बा’ खास हैं.

भोजपुरी फिल्में खुलेपन के लिए मशहूर हैं. आप पर किसी तरह के समझौते का दबाव तो नहीं पड़ा?

मैं पैसे के लिए नहीं अच्छे काम के लिए फिल्में करती हूं. अपनी पसंद की फिल्में करती हूं. इसी वजह से फिल्म ‘जिद्दी’ के बाद दूसरी फिल्मों के बीच समय भी लिया.

मेरा मानना है कि हम लोग जो दिखाएंगे, वही लोग देखेंगे. ज्यादा गंदा दिखाने से कामयाबी नहीं मिलती. थोड़ीबहुत तड़कभड़क तो ठीक है, पर फूहड़ता ठीक नहीं.

मेहनत छोड़ धर्म की ओर ओबीसी जातियां

उत्तर प्रदेश में कुर्मी, हरियाणा व राजस्थान में गुर्जर, जाट और गुजरात में पटेल जाति मेहनती खेतिहर जातियां मानी जाती हैं. ओबीसी से जुड़ी दूसरी जातियां भी खेतीकिसानी में मेहनत करने वाली होती हैं. पर अब ये भी दूसरी जातियों की तरह अपनी मेहनत का काम छोड़ कर आरक्षण के पीछे भागने लगी हैं. सोचने वाली बात यह है कि देश में सरकारी नौकरियां कितनी हैं? क्या सभी को सरकारी नौकरियां मिल सकती हैं? शायद नहीं. इस के बाद भी सरकारी नौकरियों के लिए आरक्षण की मांग बराबर उठ रही है. राजनीतिक दल सरकारी नौकरियों का लालच दे कर इन जातियों को अपने पीछे चलने को मजबूर कर रहे हैं. वे आरक्षण के जरीए वोट हासिल करना चाहते हैं. दरअसल, धर्म और राजनीति का सहारा ले कर समाज में अपना दबदबा बना चुकी ऊंची जातियां इन को धर्म की पालकी ढोने के लिए अपने साथ रखना चाहती हैं. इस का फायदा उठा कर पिछड़ी जातियों को भी पिछड़ी और बहुत पिछड़ी जातियों के खेमे में बांध दिया है.

पहले जहां पर ये जातियां एकजुट हो कर अपने में सुधार का काम करती थीं, वहीं ये अब यह बंटवारे का शिकार हो गई हैं. इन को लगता है कि आरक्षण के जरीए ही इन का भला हो सकता है. आरक्षण के जरीए अब तक दलित जातियों का भला नहीं हुआ, यह समझने के बाद भी आरक्षण की मांग लगातार बढ़ रही है.

लोकसभा और उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में जिस तरह से पिछड़ी जातियों में गाय और राम मंदिर के नाम पर वोट डाले गए हैं, वह बताता है कि अब पिछड़ी जातियां भी धर्म का सहारा ले कर आगे बढ़ना चाहती हैं. काम कर मेहनत के बल पर अपनी पहचान बनाने वाली ये जातियां अब दूसरों के बल पर आगे बढ़ना चाहती हैं.

केंद्र सरकार ने हरियाणा में जाट, गुजरात में पटेल, राजस्थान में गुर्जर समाज के आरक्षण आंदोलन को शांत करने के लिए ओबीसी आरक्षण को ले कर नया आयोग बनाने का फैसला लिया है. इस के बाद यह आंदोलन अब कुछ समय के लिए स्थगित हो गया है.

केंद्र सरकार ने कहा है कि आरक्षण की बढ़ती मांग को देखते हुए सामाजिक और पढ़ाईलिखाई के तौर पर पिछड़े वर्ग के लिए नया आयोग बनाने का यह फैसला लिया गया है. नए आयोग को संवैधानिक दर्जा दिया गया है. इस आयोग में 5 सदस्य, एक अध्यक्ष, एक उपाध्यक्ष होंगे.

अभी जो पिछड़ा वर्ग आयोग काम कर रहा था, उस को 14 अगस्त, 1993 को बनाया गया था. एक बार फिर सरकार ने नया आयोग बना कर पिछड़ी जातियों के दर्द पर मरहम लगाने का कदम उठाया है.

आजादी के बाद से ही आरक्षण को ले कर हर जाति में मांग बढ़ने लगी थी. नेताओं ने इस को वोट बैंक में बदलने के लिए नएनए तरह के आरक्षण को घोषित करने की शुरुआत कर दी, जिस के चलते अदालतों को भी दखलअंदाजी करने का मौका मिलने लगा. कई बार सरकार द्वारा दिए गए आरक्षण को अदालत ने रद्द भी कर दिया. इस के बाद भी आरक्षण को ले कर राजनीति का खेल चलता रहता है.

साल 1980 में मंडल कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि भारत में 52 फीसदी पिछड़ी जातियां हैं. साल 2006 के नैशनल सैंपल सर्वे संगठन ने माना कि भारत की आबादी में पिछड़ों की 41 फीसदी हिस्सेदारी है.

इस सर्वे से यह भी पता चला कि पिछड़ी जातियों की 78 फीसदी आबादी गांवों में और 22 फीसदी आबादी शहरों में रहतीहै. देशभर में तकरीबन 2494 जातियां केंद्र सरकार की अन्य पिछड़ी जातियों की लिस्ट में शामिल हैं.

पिछड़ी जातियों में 2 तरह के लोग हैं. इस के लिए ही अन्य पिछड़ा वर्ग बना है. इस वर्ग की हालत काफी खराब है. इस वर्ग के 12 फीसदी से भी कम लोग सरकारी महकमों में तैनात हैं. शहरों में इस वर्ग के लोग 870 रुपए और गांवों में 556 रुपए हर महीने खर्च करते हैं. ऐसे में इस वर्ग के लोग यह मांग बराबर कर रहे हैं कि उन को दिया जाने वाला आरक्षण बढ़ाया जाए.

केंद्र सरकार द्वारा नया पिछड़ा वर्ग आयोग बनाने के बाद भी पिछड़े वर्ग के नेता खुश नहीं हैं. समाजवादी पार्टी के नेता प्रोफैसर रामगोपाल यादव ने कहा, ‘‘केंद्र सरकार पिछड़ा वर्ग आयोग बना कर ओबीसी जातियों को बरगलाने का काम कर रही है. यह बहुत ही घातक कदम साबित होगा.’’

दूसरी तरफ मायावती कहती हैं, ‘‘केंद्र सरकार बहुत पहले से आरक्षण का विरोध करती रही है. वह अब इस की समीक्षा कर इसे खत्म करने

की पहल करने जा रही है.’’

मायावती को लगता है कि केंद्र सरकार दलित कोटे से ही कटौतीकर के आरक्षण में पिछड़ी जातियों को हिस्सा देने वाली है.

मायावती और प्रोफैसर रामगोपाल यादव दोनों को ही यह पता है कि इन विधानसभा चुनावों में भाजपा ने दलित और पिछड़े दोनों को ही हिंदुत्व की तरफ मोड़ लिया है, तभी उत्तर प्रदेश में भाजपा गठबंधन 325 विधानसभा सीटें जीत कर अपनी सरकार बनाने में कामयाब हुआ.

भगवा में रंगी सरकार

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बना कर भाजपा ने पूरी सरकार को भगवा रंग में रंग दिया है. साथ ही, पिछड़ों को भी सत्ता में ज्यादा हक देने के लिए पिछड़ा वर्ग के केशव प्रसाद मौर्य को उपमुख्यमत्री का दर्जा दिया. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री डाक्टर दिनेश शर्मा के साथ केशव प्रसाद मौर्य को उपमुख्यमंत्री जातीय संतुलन को साधने के लिए बनाया गया है.

जिस तरह से पिछड़ों का सब से ज्यादा साथ हासिल होने के बाद सरकार को भगवा रंग में रंग दिया गया है, उस से साफ है कि समाज सुधार में लगी पिछड़ी जातियां भी अब समाज सुधार को भूल कर धर्म की पालकी ढोने में जुट गई हैं.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने सरकारी आवास को पवित्र करने के लिए पूजापाठ कराई. वहां पर ‘ओम’ और ‘स्वास्तिक’ के चिह्न बनवाए. आवास के आसपास सड़क तक को गंगाजल छिड़क कर पवित्र करने की मुहिम चलाई. प्रदेश सरकार के हर मंत्री ने अपने दफ्तर के बाहर ऐसी ही पूजापाठ कराई. इस से साफ हो गया कि सरकार हर जाति और धर्म की सरकार के बजाय भगवा सरकार के अपने नाम को ही मजबूत कर रही है.

यही नहीं, गाय के नाम पर मांस के कारोबार को बंद करने की कोशिश भी शुरू हो गई. प्रदेश में पशुओं को काटने के लिए बने बूचड़खानों को नए लाइसैंस नहीं दिए जा रहे हैं. जो बिना लाइसैंस के चल रहे हैं, उन को बंद कर दिया गया है. कुछ महीनों में ही बहुत से बूचड़खानों के लाइसैंस खत्म होने वाले हैं. ऐसे में सरकार इन को नए लाइसैंस नहीं देगी, तो परेशानी खड़ी हो जाएगी.

यह सच है कि बहुत सी दलित और पिछड़ी जातियां भी मांस के कारोबार से जुड़ी हैं. अब धर्म के पाले में खड़े होने के चलते कोई इन का विरोध नहीं कर पा रहा है. कुछ यही हालत राम मंदिर मसले पर भी है.

केंद्र और प्रदेश में सरकार चला रही भाजपा को पता है कि केवल अगड़ी जातियों के भरोसे न तो सरकार बनाई जा सकती है और न ही अपना दबदबा बनाया जा सकता है. ऐसे में जरूरी है कि धर्म के नाम पर पिछड़ी और दलित जातियों को अपने पाले में रखा जाए.

दायरा बढ़ाने की कोशिश

दरअसल, केंद्र सरकार पिछड़ी जातियों को खुश रखने के लिए इन के आरक्षण का दायरा बढ़ाने की कोशिश में है. इस के लिए सरकार ओबीसी की परिभाषा को नए सिरे से तय करने की कवायद कर रही है, जिस से ओबीसी का दायरा बढ़ सके.

संविधान में सामाजिक और पढ़ाईलिखाई के मामले में पिछड़े वर्ग को ओबीसी का दर्जा देने का प्रावधान है.

धारा 340 के तहत ओबीसी की भलाई करना सरकार का फर्ज है. सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय जातियों को सामाजिक व माली आधार पर उन्हें लिस्ट में शामिल करने या बाहर निकालने का काम करता है. समयसमय पर सरकार इस तरह के फैसले पहले भी करती रही है.

साल 1990 में भारत सरकार ने अन्य पिछड़ी जातियों के लिए शिक्षा और रोजगार के बराबर के मौके मुहैया कराने के लिए सरकारी शिक्षण संस्थानों और नौकरियों में 27 फीसदी आरक्षण की घोषणा की थी.

साल 1992 में इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार मामले में कोर्ट ने सामाजिक पिछड़ेपन की विचारधारा पर जोर देते हुए या क्रीमीलेयर यानी माली रूप से मजबूत जातियों को आरक्षण से बाहर रखने को कहा.

साल 1993 में एक लाख रुपए से ज्यादा सालाना आमदनी वाले ओबीसी परिवारों को क्रीमीलेयर के दायरे में रखा गया. साल 2004 में यह रकम बढ़ा कर ढाई लाख और साल 2006 में साढ़े 4 लाख, और साल 2008 में 6 लाख सालाना कर दी गई.

पिछड़ी जातियों को ले कर सब से पहले साल 1953 में कालेलकर कमीशन बनाया गया. आयोग ने 2399 जातियों को पिछड़ी जातियों में शामिल करने की सिफारिश की. इस आयोग ने तकनीकी संस्थानों में पिछड़ों को 70 फीसदी आरक्षण दिए जाने की बात कही, पर सरकार ने इसे माना नहीं.

साल 1979 में प्रधानमंत्री वीपी सिंह की अगुआई में नया मंडल कमीशन बनाया गया. इस कमीशन ने 3743 जातियों को पिछड़ी जातियों में शामिल करने की सिफारिश की गई. सरकारी शिक्षण संस्थाओं और नौकरियों में इस आयोग ने ही 27 फीसदी आरक्षण की बात कही.

अब मोदी सरकार द्वारा केंद्र ने जिस तरह से नए आयोग को बनाने की बात कही है, उस से लग रहा है कि अगर ओबीसी लिस्ट में कोई वर्ग ऐसा शामिल है, जो सामाजिक और पढ़ाईलिखाई के रूप से पिछड़ा नहीं है, तो उस को ओबीसी की लिस्ट से बाहर किया जा सकता है. साथ ही, ऐसे मौके भी बन सकते हैं कि नई जातियों को इस में शामिल किया जाए.

हर धर्म में हैं पिछड़े

ओबीसी जातियां हर धर्म में हैं. हिंदू में इन की आबादी 42 फीसदी, मुसलिम में 39 फीसदी, ईसाई में 41 फीसदी, सिखों में 2 फीसदी, जैनों में 3 फीसदी, बौद्धों में 0.4 फीसदी, पारसी में 13 फीसदी, अन्य में तकरीबन 6 फीसदी ओबीसी जातियां हैं.

केंद्र में हर राज्य के लिए पिछड़ा वर्ग की अलग लिस्ट है. इस में शामिल जातियों को संबंधित राज्यों के केंद्रीय शिक्षण संस्थानों और केंद्र सरकार की नौकरियों में आरक्षण मिलता है.

अगर राज्यवार पिछड़ी जातियों की जनसंख्या को देखें, तो सब से ज्यादा 255 जातियां महाराष्ट्र में हैं. इस के बाद ओडिशा में 198, झारखंड में 134, बिहार में 132, उत्तराखंड में 79, उत्तर प्रदेश में 77, दिल्ली में 58 और मध्य प्रदेश में 55 हैं.

अभी ओबीसी की जो परिभाषा तय है, वह मंडल आयोग के हिसाब से तय है. अंगरेजों ने अपने समय में जो लिस्ट बनाई थी, उस के आधार पर चल रही है. अब हर तरफ से यह मांग हो रही है कि ओबीसी की परिभाषा नए सिरे से तय की जाए.

केंद्र की भाजपा सरकार ने नए ओबीसी आयोग के ऐलान के बाद यह तय किया है कि नए सिरे से इस को परिभाषित किए जाने की जरूरत है. भाजपा इसे समय की जरूरत मानती है, तो विरोधी दल इसे आरक्षण खत्म करने की चाल मान रहे हैं.

देखने वाली बात यह है कि इस तरह के नए आयोग से ओबीसी जातियों को क्या फायदा मिलता है?

भाजपा सरकार पर विरोधी दलों का भरोसा इसलिए भी नहीं है, क्योंकि साल 1990 में जब मंडल कमीशन की सिफारिशें केंद्र की वीपी सिंह सरकार ने लागू की थीं, तो बड़े पैमाने पर उस का विरोध शुरू हो गया था.

भाजपा ने अयोध्या के राम मंदिर मुद्दे को उठा कर मंडल आयोग का जवाब देने के लिए कमंडल की राजनीति शुरू कर दी है. ऐसे में लग रहा है कि भाजपा केवल पिछड़ों को ही नहीं, बल्कि दलित जातियों को भी पार्टी से जोड़ने के लिए धर्म का पाठ पढ़ा रही है.

भाजपा ने इन जातियों में भी पूजापाठ को बढ़ा कर नवहिंदुत्व का संचार करने में कामयाबी हासिल की है. इस से ये जातियां अपनेअपने खेमे से दूर हो कर धर्म की पालकी को उठाने को बेचैन दिख रही हैं.

अब देखना यह है कि इस से इन को हासिल क्या होता है? क्या सच में समाज में छुआछूत और गैरबराबरी का भाव खत्म हो जाएगा? या फिर एक बार फिर से इन का फायदा उठा कर हाशिए पर धकेल दिया जाएगा?

भाजपा कार्यसमिति पर छाया रहा ‘भगवा रंग’

भाजपा का झंडा भले ही हरा, सफेद और केसरिया रंग से मिल कर तैयार हुआ हो पर अब भाजपा के हर कार्यक्रम में केसरिया रंग सब पर भारी पड़ गया है. कार्यकर्ता से लेकर नेता तक इस रंग में रंगे नजर आने लगे हैं. केसरिया रंग अब भाजपा की नजर में ‘भगवा रंग’ कहा जाने लगा है. भगवा रंग के बढ़ते चलन का सबसे बड़ा कारण प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का भगवा रंग के कपड़े पहनना है. उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में भाजपा की 2 दिन की प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में साइंटिफिक कंन्वेशन सेंटर में पूरा भगवा रंग दिखाई दिया. भाजपा के अपने झंडे से अधिक पूरा केसरिया रंग ही छाया हुआ था.

पार्टी के प्रमुख नेता और कार्यकर्ता भगवा रंग की ड्रेस में थे. जो भगवा ड्रेस में नहीं थे वह भगवा गमछा या भाजपा के कमल फूल वाला गले में डाला जाने वाला गमछा पहने हुये थे. भाजपा ने सभा में आने जाने के लिये एंट्री पास बनाया था उसको पहनने के लिये भी भगवा रंग का पट्टा रखा गया था. स्टेज को सजाने में भगवा रंग का कपड़ा कई बार कम पड़ गया. नेताओं के स्वागत के लिये बुके तैयार हुआ तो उसमें भी भगवा रंग की छाप दिख रही थी.

देश के 14 राज्यों में भाजपा की अपनी और 3 राज्यों में सहयोगी दलों के साथ सरकार है. पार्टी इस ताकत को और बढ़ाने की दिशा में काम करने को तैयार है. केन्द्र सरकार ने 3 साल में क्या किया और योगी सरकार ने अपने कम समय में क्या किया इसकी चर्चा खूब हुई. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शाकाहार को बढ़ावा देते हुए कहा कि हमारे मंत्रिमंडल में आधे से ज्यादा शाकाहारी हैं. मै खुद प्याज लहसुन नहीं खाता, हमारा स्वास्थ्य तो अच्छा है. हम किसी से कमजोर नहीं. हमारे उम्रदराज मंत्री तक सुबह 9 बजे से लेकर रात का 1-1 बजे तक काम करते हैं.

बड़े नेताओं का इस बात पर जोर रहा कि कार्यकर्ता अनुशासन में रह कर काम करे. कार्यसमिति को सरकारी छाया से दूर रखने की कोशिश की गई. कार्यकर्ताओं के रहने लिये नेताओं के आवास का प्रयोग किया गया. किसी सरकारी गेस्ट हाउस में कार्यकर्ता नहीं रोके गये. होटल के बजाय अमित शाह ने भी मुख्यमंत्री आवास में मंत्रियों के साथ भेाजन किया. भाजपा का अब पूरा ध्यान निकाय चुनावों को लेकर है. 2017 के लोकसभा में जीत के लिये यह बड़ी कवायद है. इसके लिये भाजपा ने ‘मेरा घर भाजपा का घर’ नामक स्टीकर तैयार कराया है. इसके जरीये ही भाजपा अपना प्रचार करेगी.

मुख्यमंत्री योगी ने कार्यकर्ताओं में उत्साह भरने के लिये अपनी सरकार का बखान किया. अपनी आत्मप्रशंसा में कार्यसमिति डूबी रही. विधानसभा जीत का उत्साह बना हुआ है. सरकार इसे अभी पूरी तरह से हिन्दुत्व के रंग में रंग देना चाहती है. जिससे प्रदेश के लोग दूसरी ओर सोच न पाये. भाजपा निकाय और उसके बाद आने वाले लोकसभा चुनावों को भगवा रंग के सहारे ही जीतना चाहती है. ऐसे में पूरी तरह से भगवा प्रचार प्रसार का ध्यान रखा जा रहा है. हिन्दू वोट बैंक के धुव्रीकरण को तोड़ना विरोधी पार्टियों के लिये चुनौती भरा काम है. भाजपा इसका पूरा लाभ उठाना चाहती है.

सावधान : गायब हो रहे हैं असली मुद्दे

सरकारें अब एक नया रास्ता अपना रही हैं, दिल्ली की केंद्र सरकार भी और राज्यों की सरकारें भी. अब गरीबों की कोई बात नहीं हो रही है. अब नौकरियों की बात नहीं हो रही है. अब ऊंचनीच के भेदभाव को खत्म करने की बात परदों के पीछे चली गई है. किसानों के लिए नहरों को बनवाने की योजनाओं को शुरू करने के पत्थर नहीं रखे जा रहे हैं. औरतों को मर्दों के जुल्मों से बचाने की बातें सरकारें नहीं कर रही हैं, महिला आयोग की 5-10 औरतों पर यह जिम्मेदारी छोड़ दी गई है.

अब तो हल्ला मच रहा है देशभक्ति का. वंदेमातरम गाओ, शायद पेट भर जाए. योग करो, ताकि टूटी झुग्गी बन जाए. तिरंगा लहराओगे तो नहर में पानी आ जाएगा. गंगा में डुबकी लगाओगे, तो नौकरी लग जाएगी. गाय को लाने व ले जाने वालों की जीभर के पिटाई कर दो, तो भूखे नहीं रहना पड़ेगा.

अब बड़ेबड़े इश्तिहार छप रहे हैं कि देखो धर्म की जगह को पांचसितारा होटल की तरह का बना दिया गया है. अब गरीब बीमार ही नहीं पड़ेंगे. अब मंचों से पिछली सरकारों को कोसा जाता है कि शायद इस से चमत्कार हो जाएगा और बस्ती की बदबू भी विरोधी दलों की तरह गायब हो जाएगी.

इस बदलती तसवीर से देश की 49 फीसदी भूखी जनता के पेट भरेंगे. दुनिया के सब से ज्यादा गरीब यहीं हैं और इसी देश में आजादी के 70 साल बाद भी वैसे से ही हालात हैं और बातें हो रही हैं देशभक्ति की, मंदिर की, मसजिद की. विकास की बातें हो रही हैं, पर उस में बड़े हवाईअड्डों की बातें होती हैं. रेल में भी ह्वाट्सऐप से खाना बुक करने की बात करते हैं. गंगा मंत्री नदियों के घाटों को बनवाने की बातें करती हैं. वित्त मंत्री टैक्स का फंदा हर गले में डालने के नए कानून की बात करते हैं.

हल्ला मचाया जा रहा है कि काला धन हटाएंगे मानो गरीबों के पास, जो 2-4 हजार रुपए पड़े हैं, वे काले हैं. सरकारों को फिक्र पड़ी है कि कोई भी टैक्स देने से छूट न जाए. वह यह नहीं बता सकती कि आए टैक्स का होता क्या है?

हां, पिछले 70 सालों में बहुत बदलाव आया है. पर यह बदलाव तो उस से पहले के 70 सालों में भी आया था, जब अंगरेजों के राज में रेलें चलीं, डाक सेवा चली, सड़कें बनीं, बसें चलीं, स्कूल खुले, अस्पताल खुले, कारखाने खुले. इन 70 सालों में और पहले के 70 सालों में जो हुआ, वह सरकार की मेहरबानी से नहीं, तकनीकी ईजाद से हुआ.

आज हर घर में टैलीविजन है और हर हाथ में मोबाइल है तो इसलिए कि यह तकनीक बनी, पर यह इस देश की सरकारों की उपज नहीं है. हमारी सरकारें तो कभी समाजवाद लाओ, गरीबी हटाओ की बातें करती रहीं, तो कभी मंदिर बनाओ, गौ बचाओ की. देश बनाना है तो मेहनत करनी होगी और मेहनती को मौका देना होगा. पर सरकारों को नारों से फुरसत हो तो न.

सनी के साथ बॉलीवुड कर रहा है जबरदस्ती..!

सनी लियोन भले ही अपनी एक्टिंग से लोगों का दिल उतना नहीं जीत पा रही हों, लेकिन वो मेहनत कर रही हैं और इस इंडस्ट्री में बहुत ऐसे स्टार्स हैं जिन्हें पहले एक्टिंग नहीं आती थी पर अब आती है. सनी लियोन भी शायद उस लिस्ट में जल्द शुमार हो जाएं, क्योंकि वो मेहनती हैं और अपने काम की कद्र करती हैं. लेकिन हाल ही में एक चर्चित वेबसाइट को दिए एक इंटरव्यू में सनी लियोन ने कहा कि बॉलीवुड उनके साथ जबरदस्ती किए जा रहा है. देखिए उनके सबसे बोल्ड और सच्चे स्टेटमेंट.

बॉलीवुड ने डाला प्रेशर

बॉलीवुड उन पर प्रेशर डाल रहा है कि वो अपने एडल्ट इंडस्ट्री और उससे जुड़ी बातों के बारे में बिल्कुल बात ना करें. ये उस बॉलीवुड के मुंह पर तमाचा है जो एडल्ट कन्टेन्ट परोसता जरूर है पर उसके बारे में बात नहीं करना चाहता!

बॉलीवुड ने किया है अलग

मुझे अभी भी बॉलीवुड में ऐसे ट्रीट किया जाता है जैसे मैं कोई अजनबी दुनिया से आई हूं. खुद के दोस्त परिवार ने भी एक समय पर साथ छोड़ दिया.

लोग एक पॉर्न स्टार को जानते हैं

लोग मुझे जानते ही नहीं है. वो केवल पॉर्न स्टार सनी लियोन या फिर एक्टर सनी लियोन को जानना चाहते हैं.

मैं बिल्कुल अलग हूं

कोई ये मानने को तैयार ही नहीं कि एडल्ट इंडस्ट्री में काम करने वाली लड़की को किताबें पढ़ना या मज़ाकिया और बचकाना होना अच्छा लग सकता है.

मुझे किसी से कोई फर्क नहीं पड़ता

अगर मैं हर बात जो लोग मेरे बारे में बोल रहे हैं उस पर ध्यान देने लगती तो आज यहां नहीं होती…जहां हूं.

मेरे पास बिज़नेस प्लान था और दिमाग भी

मेरे पास एक बिज़नेस प्लान था और एक दिमाग था पैसे कमाने का, शोहरत पाने का. मैंने वो प्लान पर अमल किया. इसमें गलत क्या है.

मीडिया मुझे गिरा देता है

जब भी मैं कुछ अच्छा करती हूं और सोचती हूं कि दो कदम आगे बढ़ गई…कोई ना कोई कुछ ना कुछ ऐसा लिख देता  है कि मैं फिर गिर जाती हूं.

मुझे मेरे काम से कोई शर्म नहीं

जिस काम ने मुझे यहां तक पहुंचाया है उस काम को उसकी पहचान देने में मुझे कोई शर्म नहीं है.

एडल्ट इंडस्ट्री हर जगह होती है

अगर कोई पॉर्न स्टार है तो एक एडल्ट इंडस्ट्री भी हो गई. और कोई भी इंडस्ट्री बिना खरीदार के तो नहीं चल सकती….तो कैसी शर्म. मैं बता के करती हूं कोई बिना बताए!

हर किसी का वन नाईट स्टैंड है

हर किसी का वन नाइट स्टैंड होता है और अगर इस नाम की फिल्म बन रही है तो इतना हंगामा क्यों है.

करारा जवाब सारी औरतों को

सनी लियोन ने कहा था – लेडीज़ मैं आपके हसबैंड को नहीं पाना चाहती हूं, मेरे पास खुद का हसबैंड है.

काम करने में शर्म

मैं जानती हूं कि इंडस्ट्री में कई ऐसे मेल एक्टर हैं जो मेरे साथ स्क्रीन शेयर करने में झिझकते हैं.

मैं भूत और भविष्य में विश्वास नहीं करती : दिशा परमार

छोटी सी उम्र में दिल्ली से मुंबई जैसे महानगर में कदम रखने वाली दिशा को बंधीबंधाई परिपाटी पर चलना पसंद नहीं. उन्हें बचपन से ही सजनेसंवरने का शौक था. इसीलिए उन्होंने ऐक्टिंग को अपना कैरियर बनाया. स्लिमट्रिम दिशा की सादगी उन के कपड़ों और मेकअप से साफ झलकती है. हैवी मेकअप से परहेज करने वाली दिल्ली की दिशा पर ऐक्टिंग का ऐसा जनून सवार हुआ कि 16 साल में ही पढ़ाई को अलविदा कह ऐक्टिंग से नाता जोड़ लिया. दिल्ली की गलियों में शौपिंग करने और दहीभल्ले खाने के मजे को दिशा मुंबई आने पर बहुत मिस करती हैं. शो ‘प्यार का दर्द है मीठामीठा, प्याराप्यारा’ से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाली दिशा से उन के नए शो ‘कोई अपना सा’ के इवैंट पर मुलाकात के दौरान कुछ सवाल जवाब हुए:

कम उम्र में ऐक्टिंग की शुरुआत से बीच में पढ़ाई छोड़ने का कोई असर पड़ा?

मैं जब 12वीं कक्षा में थी तभी मुझे पहला शो मिल गया. तब मुझे पढ़ाई और ऐक्टिंग में से एक को चुनना पड़ा, क्योंकि दोनों एकसाथ नहीं हो सकते थे. लेकिन मैं मानती हूं कि ऐक्टिंग के लिए पढ़ाई जरूरी नहीं है. हमारी इंडस्ट्री में कई ऐसे सितारे हैं, जो कम पढ़ेलिखे होने के बावजूद आज बुलंदियों पर हैं. आमिर खान को ही देख लीजिए. वे 12वीं कक्षा पास हैं पर फिल्म इंडस्ट्री में टौप पर हैं. ऐक्टिंग पढ़ाने वाली चीज नहीं है और न ही इसे कोई सिखा सकता है. यह तो सैल्फ ग्रूमिंग से ही आती है.

तो जो एनएसडी और एफटीआईआई से आते हैं वे कौन होते हैं?

मैं आप की बात मानती हूं कि एनएसडी में अभिनय की बारीकियों को सिखाया जाता होगा, लेकिन आप ही बताएं कि कितने लोग हैं, जो एनएसडी और एफटीआईआई से निकल कर फिल्मों में हैं. इन की संख्या बहुत कम है. ज्यादातर को मौका नहीं मिलता. हालांकि मैं उन्हें अपने से बहुत अच्छा कलाकार मानती हूं. लेकिन उस कला का क्या फायदा जिसे दिखाने का मौका ही आप को न मिले.

थिएटर के मुकाबले टीवी में काम करना कितना आसान है?

मुझे थिएटर का ज्यादा ऐक्सपीरिएंस नहीं है, क्योंकि मैं ने बचपन में ही स्कूल थिएटर में भाग लिया था. मुझे नौनस्टौप बोलने से बड़ा डर लगता है. सैकड़ों की भीड़ में बिना कट के बोलना बहुत ही कठिन काम है. लेकिन टीवी में भी काम करना उतना आसान नहीं है. हफ्ते में रोज 12 से 14 घंटे बिना रुके शूटिंग करना कोई आसान काम नहीं. हम लोग एक दिन में 12 सीन तक शूट करते हैं, क्योंकि डेली सोप की शूटिंग रोज होती है. इस में तो हमें यह भी मालूम नहीं होता कि अगले दिन कहानी में क्या बदलाव आने वाला है. डेली सोप में किसी तरह की तैयारी करने का या रोल पर खास वर्क करने का समय नहीं मिलता है, क्योंकि शौट से 15 मिनट पहले ही स्क्रिप्ट हाथ में दी जाती है. तभी पता चल पाता है कि क्या करना है. लेकिन फिल्मों में ऐसी मारामारी नहीं है. वहां एक दिन में एक ही सीन शूट हो पाता है.

रिश्तों में कितना विश्वास रखती हैं?

हर शख्स का किसी न किसी से रिश्ता जरूर है. मैं व्यक्तिगत जीवन में रिश्तों को बहुत महत्त्व देती हूं. मैं आज भी अपना कोई भी काम मम्मीपापा से पूछे बिना नहीं करती. फिर हमारा शो भी रिश्तों के तानेबाने पर आधारित है, जिस में मेरा जाह्नवी का कैरेक्टर भी बहुत कुछ मेरी निजी जिंदगी के करीब है. मैं भी जाह्नवी की तरह भूत, भविष्य में विश्वास नहीं करती. बिंदास हूं, कमजोर नहीं और न ही जीवन की कठिनाइयों में आंसू बहाती हूं.

पंखुड़ी से जाह्नवी किस तरह अलग है?

दोनों में जमीनआसमान का अंतर है. ‘प्यार का दर्द है’ की पंखुड़ी तो बिलकुल ही बात नहीं करती थी. हमेशा गुमसुम सी खयालों में खोई रहती थी पर जाह्नवी ठीक इस के विपरीत है. वह कभी चुप नहीं बैठती. हमेशा फिल्मों का कोई न कोई डायलौग सुनाती रहती है. हां, जो दोनों में समानता है वह है फैमिली को प्यार करना. मैं निजी जिंदगी में पंखुड़ी के ज्यादा करीब हूं, क्योंकि मैं बहुत सीधीसादी सिंपल गर्ल हूं. मुझे ज्यादा शो औफ करना और बोलना पसंद नहीं है. शुरू में तो बहुत ही कम बात करती थी. अब जब सैट पर जाने लगी हूं, तो बोलने भी लगी हूं.

पहले शो के बाद 3 साल तक कहां गायब रहीं?

यह 3 साल का ब्रेक मैं ने कुछ प्लान करने के लिए ही लिया था पर वह प्लानिंग फेल हो गई, इसलिए वापस टीवी में आ गई. इस के पहले मेरे पास ‘गुलाम’ और ‘एक था राजा एक थी रानी’ के भी प्रस्ताव आए थे, लेकिन फाइनली मैं उन का हिस्सा न बन सकी. लेकिन मैं जैसी कहानी चाहती थी वैसी जब मुझे इस शो की लगी, तो मैं ने तुरंत हां कर दी.

आप अपने होने वाले जीवनसाथी में क्या देखेंगी?

अभी तो ऐसा कुछ नहीं सोचा है. हां, अगर कोई मिलता है तो मैं चाहूंगी कि वह तमीज वाला जरूर हो. वह सच्चा हो, दूसरों की इज्जत करने वाला हो, क्योंकि मुझे घर में बचपन से यही सिखाया गया है कि अगर इज्जत दोगे तो इज्जत मिलेगी और यही मैं अपने पार्टनर में चाहती हूं.

कोई फिल्म मिलती है तो किस तरह का रोल करने की तमन्ना है?

मैं फिल्म ‘दिलवाले दुलहनिया ले जाएंगे’ में सिमरन वाला रोल करना चाहती हूं. जब यह फिल्म आई थी तब मैं बहुत छोटी थी, लेकिन तब से ले कर अब तक मैं इसे कई बार देख चुकी हूं. काजोल और शाहरुख की मैं बहुत बड़ी फैन हूं.

खाली समय में क्या करती हैं?

मुझे शौपिंग करना बहुत पसंद है. जब भी मौका मिलता है, तो शौपिंग करने निकल जाती हूं. मैं फैशन ट्रैंड पर नजर रखती हूं और अपडेट रहती हूं. ट्रैंड में रहना ही मेरा स्टाइल मंत्र है. कुछ भी मैं नहीं पहन सकती. मैं ऐसे कपड़े पहनती हूं जिन में सहज महसूस कर सकूं. हैवी मेकअप मुझे बिलकुल पसंद नहीं है. अपना ज्यादा समय अपने साथी कलाकारों के साथ बिताती हूं, इसलिए कि वे सभी मेरे दोस्त हैं.

यहां वही हिट है जो फिल्मी गाने गाता है : रीवा राठौड़

महज 21 वर्ष की उम्र में रीवा राठौड़ ने जो मुकाम हासिल किया उसे हासिल करने में लोगों की पूरी उम्र बीत जाती है. रीवा स्वयं अपने गाने लिखती हैं, स्वयं उन्हें संगीत से संवारती हैं और स्वयं गाती हैं. रीवा राठौड़ को संगीत विरासत में मिला है. उन के पिता मशहूर तबला वादक, संगीतकार व गायक तथा गत वर्ष अपने गजल अलबम ‘जिक्र तेरा’ के लिए ‘जीमा’ अवार्ड हासिल कर चुके रूप कुमार राठौड़ हैं, जबकि मां सोनाली राठौड़ शास्त्रीय गायिका हैं.

आप ने किस उम्र में संगीत सीखना शुरू किया था?

बचपन में संगीत में रुचि थी. जब मैं 6 साल की थी तब मेरे पिता ने पियानो ला कर दिया. मैं ने शांति शेंडल से पियानो बजाना सीखना शुरू किया. पियानो से शुरुआत करने की वजह से मुझे कौर्ड, हारमोनी, रिदम आदि की समझ आई. इस के बाद दक्षिण का संगीत शंकर महादेवन से सीखा. मैं तो आज भी कर्नाटक संगीत सीख रही हूं. उस के बाद मैं ने अपने पिता के मित्र व संगीतकार पं. राजन साजन से हिंदुस्तानी क्लासिकल संगीत सीखना शुरू किया. इस तरह मेरे संगीत में बनारस घराना भी जुड़ा. बनारस घराने के संगीत की मुझे अच्छी समझ हो गई है. मेरे मातापिता ने मुझे संगीत के क्षेत्र में हर तरह से परिपक्व करने के लिए हर संभव ट्रेनिंग दिलाई.

आप ने विविध प्रकार के संगीत की जो ट्रेनिंग ली है, उस से आप के अंदर क्या बदलाव आया?

आप मेरे गाने सुन कर दिग्भ्रमित होते रहेंगे. दक्षिण के गाने सुन कर आप को लगेगा कि मैं दक्षिण भारतीय हूं. अंगरेजी भाषा के गाने सुन कर आप को लगेगा कि मेरी परवरिश विदेश में हुई है. हिंदी गाने सुन कर लगेगा कि मैं वाराणसी में ज्यादा रही हूं. मैं पहली लड़की हूं जिस ने दक्षिण भारतीय ‘कचरी’ की है. मैं ने मुंबई के मैसूर ऐसोसिएशन हाल में 2 घंटे तक दक्षिण भारतीय गीत गाए हैं. जो 2 घंटे की बैठक होती है उसे कचरी कहते हैं. पर मैं बचपन से ही अंतर्राष्ट्रीय संगीत जगत में अपनी पहचान बनाना चाहती थी.

आप की शिक्षा अंगरेजी माध्यम से हुई है. इसी के चलते आप अंगरेजी भाषा में गाने लिखती हैं और इंटरनैशनल संगीत में नाम कमाना चाहती हैं?

मेरे सपने को आप इस तरह से न देखें. मैं तो बचपन से ही अंतर्राष्ट्रीय संगीत जगत में अपना नाम बनाना चाहती थी. मेरी शिक्षा अंगरेजी माध्यम से हुई है, मगर मैं पढ़ाई में बहुत कमजोर थी. मेरी रुचि हमेशा संगीत में रही है. हकीकत में मैं जिस तरह के गाने सुनना पसंद करती हूं, मैं जिस तरह के गाने संगीतबद्ध करती हूं, जिस तरह के गाने लिखती हूं, उस तरह के गाने अंतर्राष्ट्रीय संगीत बाजार के लिए ज्यादा उपयुक्त हैं. मुझे अंतर्राष्ट्रीय गायकों में शीन, नोरा, जोंस, यन्नी व ब्रिटनी को सुनना बहुत पसंद है. इन गायकों ने मुझे बचपन से बहुत प्रभावित किया है. इस वजह से भी इंटरनैशनल संगीत में मेरी ज्यादा रुचि है.

पर आप के पिता बता रहे थे कि आप किशोर कुमार की प्रशंसक रही हैं?

आप को जान कर आश्चर्य होगा, पर मेरी जिंदगी का सब से बड़ा सच यह है कि 18 वर्ष की उम्र तक मैं किशोर कुमार की बहुत बड़ी प्रशंसक रही हूं. मेरे पास उन के गाए कम से कम 5 हजार गाने हैं. किशोर कुमार के हजारों गाने मुझे याद हैं. मेरे कमरे में 18 वर्ष की उम्र तक सिर्फ किशोर कुमार के ही फोटो व पोस्टर लगे होते थे. जब मेरा 18वां जन्मदिन मनाया गया, तो मैं ने पूरे घर में गुब्बारे नहीं, बल्कि किशोर कुमार के बड़ेबड़े कटआउट लगाए थे.

जब में 7वीं कक्षा में थी, तो बीमारी की वजह से कुछ दिनों तक स्कूल नहीं जा पाई. जब स्वस्थ हुई, तो रविवार के दिन मैं ने अपनी दोस्त को फोन कर स्कूल में सोमवार को क्या होने वाला है, इस की जानकारी मांगी. उस ने बताया कि सोमवार को हिंदी की परीक्षा है. मैं ने उस से चैप्टर पूछ कर अपने पिता के साथ बैठ कर तैयारी कर ली. जब स्कूल गई तो 5 सवाल तो उन्हीं चैप्टर्स में से थे. मगर 10 सवाल दूसरे चैप्टरों से आए थे. जिन सवालों के जवाब मुझे नहीं आ रहे थे, उन की जगह मैं ने किशोर कुमार के गाने लिख दिए जैसे ‘पलपल दिल के पास’, ‘हम बेवफा क्यों हुए…’ आदि जितने गाने याद आए, सब लिख दिए. फिर घर आ कर मैं ने रोते हुए पिता को सब कुछ बता दिया. पिताजी ने टीचर को फोन कर के बात की. टीचर ने पापा से कहा कि उस ने गाने लिखने के बजाय मुझे सुना दिए होते, तो भी मैं उसे पास कर देती. मेरी स्कूल की टीचर व प्रिंसिपल ने मुझे बहुत सपोर्ट किया.

18 साल की उम्र के बाद ऐसा क्या हो गया कि  आप का किशोर कुमार से मोहभंग हो गया?

मैं ने पहले भी कहा कि बचपन से ही मुझे इंटरनैशनल संगीत में जाना था. विदेशों में फिल्म कलाकारों की बनिस्बत गायकों की अहमियत बहुत ज्यादा है. वहां एक गायक का एक गाना हिट होते ही उस की पूरी जिंदगी बन जाती है. उसे बारबार अपनेआप को साबित करने की जरूरत नहीं पड़ती. भारत में तो हर बार खुद को साबित करना पड़ता है. भारत में संघर्ष कभी खत्म नहीं होता.

ऐसा फर्क क्यों है?

इस की सब से बड़ी वजह यह है कि यहां सब कुछ बौलीवुड है. यहां का गायक बौलीवुड फिल्मों में गाने और इस बात पर ध्यान देता है कि उस की आवाज किस कलाकार पर फिट बैठेगी? यहां संगीत के क्षेत्र में बैंड कल्चर का अभाव है. यहां सिर्फ संगीत से जुड़ें और फिल्मों से न जुड़ें, ऐसा नहीं है. यहां जो लोग खुद गाना लिख कर उसे संगीतबद्ध कर अपनी ही आवाज में रिकौर्ड करते हैं, उन की हमारे देश में कद्र नहीं होती. यहां गायक की पहचान इस बात से होती है कि उस ने किस सफल फिल्म में गाना गाया या किस फिल्म का उस का गाना हिट हुआ, जबकि विदेशी फिल्मों में गाने नहीं होते हैं. वहां के संगीतकार या गायक स्वतंत्र रूप से गाना गाते हैं. वहां के गायक स्टार कलाकारों से काफी बड़े हैं. वहां संगीतकार व संगीत से जुड़ी हस्तियों का रुतबा अभिनेता के मुकाबले कई गुना बड़ा है. वहां के श्रोता म्यूजिकल कंसर्ट में बहुत ध्यान से संगीत को सुनते हैं. उन के लिए संगीत, संगीत की धुन, आवाज बहुत माने रखती है. जबकि हमारे यहां संगीत के शो में गायक गाता रहता है और उस के सामने पहली कतार में बैठा इनसान मोबाइल पर बातें करता रहता है. यह देख कर एक गायक को अंदर से बहुत अजीब सा लगता है. यहां संगीत को बौलीवुड से इतर कुछ समझा ही नहीं जाता.

अंतर्राष्ट्रीय संगीत जगत में पहला कदम कब रखा?

मुझे पहली बार 2011 में पुणे में अंतर्राष्ट्रीय गायक ब्रायन एडम के म्यूजिकल शो की शुरुआत करने का अवसर मिला था. इस शो में मैं ने अपना लिखा, अपने द्वारा संगीतबद्ध गीत गा कर श्रोताओं का दिल जीत लिया था. उस के बाद स्पैनिश फिल्म निर्देशक मारिया रिपोल की स्पैनिश व अंगरेजी भाषा की नवंबर 2014 में पूरे विश्व में प्रदर्शित फिल्म ‘ट्रेसेस औफ सैंडलवुड’ में संगीत देने के साथ ही ‘तनदाना’ नृत्यप्रधान गीत गाने का अवसर मिला. इस फिल्म में स्पैनिश कलाकार ऐना क्लोटेट के साथ भारतीय अभिनेत्री नंदिता दास ने अभिनय किया है. इस फिल्म का मेरा यह गाना काफी लोकप्रिय है. यह गाना इतना लोकप्रिय है कि वहां की छोटी लड़कियां नृत्य सीखने के लिए इसी गाने का उपयोग करती हैं. कई लड़कियों ने तो इस के वीडियो भी यूट्यूब पर डाले हैं. स्पैनिश फिल्म में गीत गाने व संगीत देने के बाद मेरा उत्साह बढ़ गया. मेरे दिमाग में यह बात घर कर गई कि अब मुझे अंतर्राष्ट्रीय संगीत जगत में कुछ कर गुजरने से कोई नहीं रोक सकता. फिर मैं ने विश्व प्रसिद्ध ‘बुद्धा बार लाउंज’ के लिए अलबम बनाया, जो दिसंबर माह से हर जगह बज रहा है.

पर बुद्धा लाउंज बार के लिए अलबम करने का मौका कैसे मिला?

मैं ने गणेश के एक संस्कृत के श्लोक को आधुनिक पश्चिमी संगीत के फ्यूजन के साथ नया रंग देते हुए अपनी ही आवाज में उस का एक वीडियो बना कर यूट्यूब पर डाल दिया, जिस की वजह से बुद्धा बार लाउंज के मालिकों से मेरा परिचय हुआ. उन के कहने पर मैं ने गणेश के श्लोकों पर ही ‘इन राउट गणेशा’ नामक अलबम तैयार कर के दिया. पिछले 20 वर्षों से यह बुद्धा बार लाउंज हर साल विश्व के सर्वश्रेष्ठ संगीत को चुन कर एक अलबम ले कर आता है. फिर यह अलबम का गाना बुद्धा बार लाउंज की हर चेन बार में बजता है. यह गाना गणपति के संस्कृत के श्लोक पर है, जिसे मैं ने थोड़ा मौडर्न टच दे कर गया है. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह मेरी बहुत बड़ी उपलब्धि है. मैं पहली भारतीय संगीतकार हूं जिस के संगीतबद्ध व स्वरबद्ध गीत को बुद्धा बार लाउंज ने पिछले 20 वर्षों में पहली बार चुना.

अपनी बहुमुखी प्रतिभा पर रोशनी डालें?

मुझे घुड़सवारी का भी शुरू से शौक था. इसीलिए मैं ने 10 साल की उम्र में घुड़सवारी सीखना शुरू किया. मैं रोज सुबह अपने पिता के साथ मुंबई के रेसकोर्स पहुंच कर घुड़सवारी सीखती थी. मेरा अपना एक घोड़ा था. मैं बाद में राष्ट्रीय स्तर की घुड़सवार बनी. कई अवार्ड मिले. मुझे पेंटिंग का भी बहुत शौक है. मैं अकसर अपने पिता के साथ गुलजारजी के घर जाती थी. वे मुझे 5-6 सादे कागज दे दिया करते थे और फिर वे और मेरे पिता काम में मगन हो जाते थे. मैं उन के कमरे में टंगी तसवीरों को कागज पर उतारती थी. कई बार गुलजार साहब ने मेरे बनाए चित्रों पर सर्वश्रेष्ठ लिख कर औटोग्राफ दिए. यह सब मेरी शिक्षा का ही हिस्सा रहा है.

आप ने पेंटिंग करनी छोड़ दी?

नहीं. मैं आज भी कम से कम 4 पेंटिंग्स जरूर बनाती हूं. पर ज्यादातर वाइल्ड लाइफ पर ही बनाती हूं. घोड़े, हाथी, शेर आदि की पेंटिंग्स बहुत बनाई हैं.

आप ने लिखना कहां से सीखा?

जब मैं किसी बात को महसूस करती हूं तो उस पर सोचना शुरू करती हूं. फिर उसे शब्दों में बयां करती हूं. मैं ने सब से पहले ‘आशिया’ नामक गीत लिखा था. मैं ने जो गाने लिखे हैं, उन्हें स्टेज शो में सुनाती रहती हूं.

आप पर आप के मातापिता का किस तरह का प्रभाव है?

मेरे मातापिता ने बचपन से मेरी पूरी मदद की. हमेशा मेरा हौसला बढ़ाया. उन्होंने मुझ से यह नहीं कहा कि इस तरह का संगीत मत सुनो. संगीत को ले कर मेरे नजरिए को मेरे मातापिता ने हमेशा सम्मान दिया.

आप के लिए प्यार क्या है?

प्यार किसी से भी हो सकता है. प्रकृति से हो सकता है, मातापिता से हो सकता है. जानवरों से हो सकता है. यह तो इनसानी भावना है.

किसी नए अलबम की तैयारी हो रही है?

जी, हां. मैं एक 8 गानों के अलबम पर काम कर रही हूं. इस अलबम के सभी गीत मैं ने लिखे हैं. इन्हें संगीतबद्ध भी मैं ने ही किया है. इन्हें मैं ने अपनी आवाज में रिकौर्ड किया है. यह ऐसा अलबम होगा, जिस पर लोग फिल्म बनाना चाहेंगे. इस के अलावा संगीतकार रंजीत बारौट के संग एक ‘इंडीपौप’ अलबम पर काम कर रही हूं.

अब तक आप के बौलीवुड फिल्मों में गाने आ जाने चाहिए थे?

मैंने अपनेआप को रोक रखा था. मैं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी शुरुआत करना चाहती थी.

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