गोरखपुर मसले में घिरे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ

समाजवादी पार्टी सरकार में महिला अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल के अधिकारों की रक्षा करने का दावा करने वाली भाजपा अब अपनी सरकार में महिला अधिकारी चारू निगम के स्वभिमान की रक्षा को लेकर बैकफुट पर है. चारू निगम आईपीएस अधिकारी हैं. ट्रेनिंग के समय पर वह गोरखपुर जिले के गोरखनाथ सर्किल की पुलिस सर्किल आफिसर के रूप में काम कर रही हैं. उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद गोरखपुर चर्चा मे है. योगी आदित्यनाथ गोरखपुर से ही सांसद हैं. यहीं के गोरखनाथ मंदिर के महंत के रूप में रहते थे. गोरखनाथ मंदिर गोरखनाथ पुलिस सर्किल में ही आता है. योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद से यहां पर बहुत ही भरोसेमंद और तेजतर्रार अफसरों की नियुक्ति की गई थी.

चारू निगम ट्रेनी आईपीएस अधिकारी हैं. शराब बंदी को लेकर धरना प्रदर्शन कर रही महिलाओं पर पुलिस के द्वारा लाठी चार्ज के मसले पर चारू निगम और गोरखपुर के विधायक डाक्टर राधा मोहन दास अग्रवाल के बीच नोकझोंक ने बड़ा रूप ले लिया है. महिला आईपीएस अधिकारी के अपमान को लेकर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में आईपीएस एसोसिएशन ने अपना विरोध दर्ज कराया है. आईपीएस चारू निगम ने अपनी बात को खुलकर अपने फेसबुक पेज पर लिखा तो विधायक राधा मोहन अग्रवाल ने मीडिया से बात की और अपनी किसी भी तरह की गलती नहीं मानी.

राधा मोहन अग्रवाल-चारू निगम प्रकरण के 3 दिन बीत जाने के बाद भी न सरकार ने इस मसले पर अपना पक्ष रखा और ना ही भाजपा संगठन ने ही अपना पक्ष रखा है. सोशल मीडिया में चर्चा शुरू होने के बाद से यह मसला उलझता जा रहा है. इसे समाजवादी पार्टी के दुर्गा शक्ति नागपाल प्रकरण से जोड़ा जा रहा है. इससे भाजपा के सरकार और संगठन दोनों की छवि धूमिल हो रही है. उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बाद से अधिकारी और नेताओं के टकराव का यह पहला मुद्दा नहीं है. प्रदेश में कम समय में ही कई ऐसी घटनायें घट चुकी हैं जहां असफर और नेता आमनेसामने आ गये.

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की लगातार सीख के बाद भी भाजपा के नेता और कार्यकर्ता किसी भी तरह से अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे. विद्यार्थी परिषद जैसे भाजपा के संगठन स्कूलों में फीस मुद्दे को लेकर ऐसे व्यवहार कर रहे हैं जैसे वह सरकार का अंग हो. फर्जी मीट की दुकानों के संबंध में यह बात देखने में आई थी कि पुलिस से अधिक एक्शन में भगवा बिग्रेड थी. उस समय मसला हिन्दुत्व का था ऐसे में बात थम गई. अब भाजपा के नेताओं का कोई गलत सलूक कोई स्वीकार नहीं कर रहा. योगी सरकार की छवि कमजोर पड़ती जा रही है. हर घटना में त्वरित प्रतिक्रिया देने वाले भाजपा संगठन और सरकार की टीम के चुप रहने से विरोधियों को पौ बारह हो रही है. चारू निगम प्रकरण में सरकार फैसला लेने में जितना देर लगायेगी मसला उतना ही उलझता जायेगा.

अब मैं सोच कर काम करता हूं : गोविंदा

अभिनेता गोविंदा अपने कैरियर की ढलान पर हैं. सालों से कोई सफल फिल्म देने में असफल रहे गोविंदा ने अपने होम प्रोडक्शन में ‘आ गया हीरो’ फिल्म से बतौर सोलो हीरो वापसी की तो यह फिल्म भी बुरी तरह से पिट गई. अब उन्हें अपने कैरियर को ले कर नई रणनीति बनाने की जरूरत है. एक समय में वे भले ही स्टार थे, उन की तूती बोलती थी, पर अब समय पूरी तरह से बदल चुका है. अब उन का कड़ा मुकाबला ऊर्जावान कलाकारों से है. ऐसे में गोविंदा अपनी पुरानी अदाओं व घिसेपिटे फार्मूलों पर आधारित फिल्मों की बदौलत दोबारा स्टारडम हासिल कर पाएंगे, बहुत मुश्किल लगता है.

फिल्म इंडस्ट्री में प्रवेश पाना उन के लिए मुश्किल भले ही था, पर अपनी जिंदादिली और हंसमुख स्वभाव की वजह से वे बहुत कम समय में दर्शकों के चहेते बन गए थे. उन के जैसी कौमेडी करने वाला अभिनेता आज भी नहीं है. यही वजह थी कि उन्होंने एक समय में 3 हफ्तों में 49 फिल्में साइन की थीं. यह अलग बात है कि आज उन के पास एक भी ढंग की फिल्म नहीं है.

गोविंदा का असली नाम गोविंद अरुण कुमार आहूजा है. अपने 6 भाईबहनों में सब से छोटे होने की वजह से उन्हें चीची बुलाया जाता है, जिस का पंजाबी में शाब्दिक अर्थ छोटी उंगली होता है. गोविंदा को फिल्मों में आने की प्रेरणा फिल्म ‘डिस्को डांसर’ से मिली, जिस में मिथुन चक्रवर्ती के डांस से वे काफी प्रभावित हुए. अपने डांस की वीडियो कैसेट्स बना कर वे फिल्म निर्माताओं को भेजते रहते थे.

गोविंदा को फिल्मों में लीड रोल उन के मामा आनंद सिंह ने फिल्म ‘तनबदन’ में दिया, जो ऋषिकेश मुखर्जी के सहायक निर्देशक थे. उन की पहली फिल्म ‘लव 86’ थी. ‘स्ट्रीट डांसर’ फिल्म में उन का अभिनय उन के कैरियर का टर्निंगपौइंट था. इस के बाद उन्हें पीछे मुड़ कर देखना नहीं पड़ा. अपनी इस सफलता का श्रेय वे अपनी मां को देते हैं जिन्होंने हर समय उन्हें आगे बढ़ने का साहस दिया.

आज गोविंदा वैसे ही चुस्तदुरुस्त दिखते हैं. अपने फिल्मी सफर की शुरुआत व संघर्ष को ले कर वे कहते हैं, ‘‘पहले फिल्मों में आना आसान नहीं था. किसी भी प्रोडक्शन हाउस के बाहर घंटों बैठे इंतजार करते रहना पड़ता था. जब प्रोड्यूसर आता था तो मैं सर, सर करता हुआ आगे बढ़ता, लेकिन तब तक वे आगे निकल जाते. इस तरह इंतजार चलता रहता था. इस सिस्टम से बाहर आने के लिए मैं वहां की यूनिट के लोगों को वीडियो कैसेट्स बना कर उन के हाथ में दे दिया करता था और निर्मातानिर्देशक के फ्री होने पर उन्हें देने को कहता था. यह आसान तरीका था. उन्हें इस काम के लिए कभीकभी खाना खिला दिया करता था. इस तरह सही मैसेज मुझे उन लोगों से मिलता था.

वे आगे कहते हैं, ‘‘मुझे बाहर से अधिक संघर्ष नहीं करना पड़ा था. कई बार निर्देशक मुझे बुला कर बातचीत कर लेते थे. मेरे काम की तारीफें भी करते थे और चांस देने की बात भी करते थे. इस तरह कोई मुझे अंदर आने से रोकता नहीं था.

वे आगे कहते हैं, ‘‘फिर एक समय ऐसा भी आया जब मैं ने 3 हफ्तों में 49 फिल्में साइन की थीं. मुझे लगा कि यह थोड़ा अधिक हो रहा है, कैसे और कब करूंगा, समझ नहीं पा रहा था. मेरी सैक्रेटरी कीर्ति मुझे इतना काम करने से मना करती थी ताकि मैं बीमार न हो जाऊं. बीमारी की वजह से कई बार अस्पताल में भी रहा. उस समय लोग ऐसे ही काम करते थे. अब फिल्मलाइन अलग हो चुकी है, यह सही भी है, मैं उसे मिस नहीं करता.’’

अपनी कमजोरी और स्ट्रौंग पौइंट्स की उन्हें कब समझ आई, इस सवाल पर गोविंदा बताते हैं, ‘‘अभिनय के क्षेत्र में मुझे समझा दिया गया था कि जो लोग फिल्म देखने आ रहे है उन्हें आप की मेहनत के बारे में कुछ पता नहीं है. अगर फिल्म अच्छी नहीं बनी तो वे उसे नकार देंगे, इस का मुझे भय था. इसलिए ईमानदारी अधिक हुई और मेहनत दोगुनी हो गई. समय कम था, अधिक फिल्में साइन कर ली थीं. भाषा का ज्ञान अधिक नहीं था. सबकुछ सुधारने में बहुत मेहनत करनी पड़ी.

‘‘मैं जब कामयाबी के शिखर पर था तो मेरी मां बीमार पड़ गईं. मेरे पास उन से मिलने का समय नहीं था. उन्होंने कहा कि मेरा अंतिम समय आ गया है और उन्होंने 49 वर्ष की उम्र तक काम करने का आशीर्वाद दिया. मैं हंसने लगा और कहा कि आप के बिना जिंदगी नहीं. लेकिन वे अब नहीं रहीं. मैं ने कामयाबी पाई, दुनिया देखी और यहां तक पहुंचा हूं. पहले मैं काम कर के सोचता था, अब सोच कर काम करता हूं.’’

हिंदी सिनेमा इंडस्ट्री में आए बदलाव को ले कर गोविंदा का मानना है, ‘‘उस समय लोगों को अपने काम से बहुत लगाव था. सब लोग सच्चे दिल से काम करते थे. सही हो या गलत, लोग सामने कहने से घबराते नहीं थे. इस से काम में भी फर्क आता था. आज के कलाकारों में वह व्याकुलता दिखाई नहीं देती. सभी ने गैजेट्स के जरिए दुनिया को देख लिया है. वे काम से पहले उस की तकनीक को समझ लेते हैं. इसलिए इन के द्वारा किए गए काम से दर्शक भी कनैक्ट नहीं होते और एक फिल्म को एक बार देखने के बाद दोबारा देखना नहीं चाहते.

‘‘मुझे याद आता है जब मेरी मां बहुत बीमार थीं और उन का अंतिम समय आ चुका था तो मैं हर दिन उन से क्या पूछना है, उस की लिस्ट बनाता था. उन से मिल कर रोता था और सैट पर आ कर कौमेडी सींस करता था, डरता था कि कब वे मुझे छोड़ कर दुनिया से चली जाएं और मैं यहां काम ही करता रहूं.’’

गोविंदा ने ज्यादातर सकारात्मक भूमिकाएं निभाई हैं. ऐसे में कुछ फिल्मों में नकारात्मक भूमिका निभाने की वजह क्या रही, इस सवाल का जवाब वे यों देते हैं, ‘‘उस समय सही औफर नहीं मिल रहे थे. फिल्म ‘देवदास’ में मुझे चुन्नीलाल की भूमिका औफर की गई थी. मैं ने निर्देशक से कहा कि आप मुझ में चुन्नीलाल कहां से देखते हैं. मैं ने मना कर दिया था. फिर नकारात्मक भूमिकाएं मिलने लगी. फिर जो काम मिला, मैं ने उसी को करना बेहतर समझा. इस के अलावा कलाकार का संघर्ष हमेशा चलता रहता है.’’

अभिभावक के तौर पर गोविंदा किस तरह के हैं, इस पर वे बताते हैं, ‘‘मैं बचपन से ही अधिक कठोर स्वभाव का नहीं हूं, क्योंकि मैं ने बहुत कठिन समय देखा है. चाहता हूं कि बच्चे अपनी इस उम्र को एंजौय करें. राजनीति में आने के गलत निर्णय ने बच्चों की सहजता को खराब कर दिया था.

‘‘बुजुर्गों ने मुझे राजनीति में जाने की सलाह दी थी. मेरे पिता ने कहा था कि जिन की वजह से तुम यहां तक पहुंचे हो, उन की बात को कभी मत टालना. मुझे राजनीति की कोई जानकारी नहीं थी. मेरे राजनीति में आने की कोई वजह नहीं थी. मैं ने कोई गलत काम भी तो नहीं किया था, फिर क्यों आया? मैं अपनेआप से पूछता हूं. इस से मेरा पूरा परिवार डिस्टर्ब हो गया था.’’

और आखिर में कौमेडी फिल्मों को ले कर वे कहते हैं, ‘‘मेरी फिल्में कौमेडी नहीं होती थीं. फिल्मों में कौमेडी का पुट होता था. जो सब को पसंद आ गया और यह दौर 15 साल तक चला. आजकल तो कौमेडी लिखी जाती है. लोगों की व्याकुलता बढ़ गई है.’’

किसिंग सीन देने में बुराई नहीं : पिया बाजपेयी

बचपन से अभिनय का शौक रखने वाली अभिनेत्री पिया बाजपेयी ने तमिल, तेलुगू और मलयालम फिल्मों से अपने कैरियर की शुरुआत की. उन का जन्म उत्तर प्रदेश के इटावा में हुआ, लेकिन कैरियर की शुरुआत दिल्ली में हुई. बचपन से ही पिया अत्यंत चंचल स्वभाव की थीं. शुरूशुरू में उन के मातापिता नहीं चाहते थे कि वे फिल्मों में काम करें, पर उन के आत्मविश्वास को देख कर उन्होंने हां कही. आज उन के परिवार वाले उस की इस कामयाबी से खुश हैं. पिया की फिल्म ‘मिर्जा जूलिएट’ में उन की भूमिका उन के स्वभाव से काफी मिलतीजुलती है. उन से मिल कर बात करना रोचक था. पेश हैं, उन से हुई बातचीत के मुख्य अंश :

फिल्म ‘मिर्जा जूलिएट’ के लिए हां करने की वजह क्या थी?

मुझे इस फिल्म की भूमिका बहुत अच्छी लगी. अधिकतर ऐसा होता है कि नरेशन कुछ होता है और ऐक्टिंग के बाद कुछ और हो जाता है, लेकिन इस में मैं ने जो सुना वही दिखाया जाएगा, ये अच्छी बात है.

इस फिल्म में आप की भूमिका क्या है. वह आप से कितना मेल खाती है?

मैं ने इस में एक छोटे शहर की दबंग लड़की की भूमिका निभाई है. जो मुझ से काफी मेल खाती है. मैं रियल में भी एक छोटे शहर इटावा से हूं, मुझे याद है कि बचपन में मैं टौमबौय जैसी थी. कोई लड़का अगर मुझे कुछ कह देता था, तो उसे पकड़ कर खूब मारती थी. मेरे पिताजी ने कहा था कि अगर लड़ाई हो तो मार के आना, खुद पिटाई खा कर नहीं.

पिताजी ने मुझे बेटे की तरह पाला है. मेरी बातचीत और चलनेफिरने का ढंग सब लड़कों की तरह था. मैं ने बाइक और जीप चलाई है. त्योहारों में मेरे लिए हमेशा पैंटशर्ट ही आते थे.

फिल्मों में आने के बाद मैं ने लड़कियों वाली ड्रैस पहननी शुरू की. इसलिए जब मुझे इस तरह की ही भूमिका का औफर मिला तो मैं ने तुरंत हां कर दी.

फिल्म में छोटे शहर के लोग जब बड़े शहरों में जाते हैं तो अपनेआप को वहां के माहौल में फिट बैठाने के लिए क्याक्या करते हैं, जिसे देख कर दूसरों को लगता है कि यह चालाक लड़की है, लेकिन ऐसा होता नहीं है, अपनेआप को स्मार्ट दिखाने के लिए वे ऐसा करती हैं.

इस फिल्म में भी मेरी भूमिका वैसी ही लड़की की है. इस की शूटिंग बनारस और धर्मशाला में हुई है.

क्या फिल्मों में आना इत्तफाक था?

मेरे जीवन में कुछ भी इत्तफाक नहीं था. मैं जब 7वीं कक्षा में थी, मुझे डांस का बहुत शौक था, पड़ोस में गाना बजता था और मैं डांस करना शुरू कर देती थी. इतना ही नहीं स्कूल, कालेज सभी जगह डांस कार्यक्रम में भाग लेती थी. मेरी इस रुचि को देख कर पापा ने एक दिन कहा था कि 12वीं पूरी होने के बाद वे मुझे ऐक्टिंग व डांसिंग का कोर्स करवा देंगे, लेकिन जब मैं 12वीं में आई तो उन्होंने साफ मना कर दिया, लेकिन चिनगारी तो उन्होंने लगा ही दी थी.

मुझे लगा कि इटावा से निकल कर ही मेरी लाइफ बन सकती है, क्योंकि यह एक छोटा शहर है, यहां लाइफ नहीं बन सकती. वहां से निकल कर मैं दिल्ली आई. कंप्यूटर कोर्स किया, रिसैप्शनिस्ट की जौब की, बच्चों को ट्यूशन पढ़ाई और इस तरह मैं धीरेधीरे मुंबई में सैट हो गई.

मुंबई में कितना संघर्ष किया?

मुंबई में मैं ने पहले डबिंग आर्टिस्ट के रूप में काम किया, क्योंकि मेरी हिंदी अच्छी है. इस के बाद प्रिंट ऐड में काम शुरू कर दिया, जिस से मुझे कमर्शियल ऐड मिलने लगे. ऐसा करते करते मुझे हिंदी फिल्म ‘खोसला का घोंसला’ की रीमेक तमिल फिल्म में काम करने का मौका मिला. मेरी वह फिल्म हिट हो गई, फिर फिल्मों का सिलसिला शुरू हो गया.

करीब 12-13 दक्षिण भारतीय फिल्में करने के बाद मुझ में हिंदी फिल्म करने की इच्छा पैदा हुई, क्योंकि मैं जितनी फिल्में कर रही थी, भाषा समझ में न आने की वजह से मेरे मातापिता उस में भाग नहीं ले पा रहे थे. मुझे सब आधाअधूरा लग रहा था.

मैं ने एक साल का ब्रेक लिया और मुंबई रुकी. उसी दौरान मुझे हिंदी फिल्म ‘लाल रंग’ मिली. उस के तुरंत बाद ‘मिर्जा जूलिएट’ मिल गई.

साउथ की और यहां की फिल्मों में क्या अंतर है?

सिर्फ भाषा का अंतर है. वहां भी लोग अच्छी और खराब फिल्में बनाते हैं.

आप के काम में परिवार ने किस तरह का सहयोग दिया?

परिवार वालों ने पहले कभी मुझे सहयोग नहीं दिया, क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि मैं हीरोइन बनूं. उन्हें लग रहा था कि मैं एक सीधीसादी और छोटे शहर की लड़की हूं. लोग यहां मुझे बेवकूफ बना देंगे. समय बरबाद हो जाएगा, लाइफ सैटल नहीं हो पाएगी आदि चिंता उन्हें सता रही थी.

मेरे परिवार में सभी बहुत पढ़ेलिखे हैं ऐसे में ऐसी सोच वाजिब थी. फिर मुंबई की कहानियां उन्होंने अखबारों में काफी पढ़ी थीं. उन्होंने मेरा साथ देने से साफ मना कर दिया था, पर मुझे विश्वास था कि मैं सफल हो जाऊंगी, अत: मैं दिल्ली गई. आज उन्हें मुझ पर गर्व है, वे मेरी उपलब्धि से खुश हैं.

किसी नए शहर में अकेले रहना कितना मुश्किल था?

अगर आप अपनी जिम्मेदारी खुद लेते हैं, तो जंगल में भी रह सकते हैं. आप कहीं भी रहें हमेशा सतर्क रहना चाहिए. मुझे दिल्ली या मुंबई कहीं भी रहने में कोई समस्या नहीं आई.

फिल्मों में अंतरंग दृश्य करने में कितनी सहज रहती हैं?

मुझे अभी तक कोई भी इंटीमेट सीन करने में मुश्किल नहीं आई. फिल्म ‘लाल रंग’ में भी कुछ किसिंग सीन थे, इस में भी हैं. दक्षिण की किसी भी फिल्म में मेरा कोईर् भी किसिंग सीन नहीं था, लेकिन मैं कैमरे पर अधिक फोकस्ड रहती हूं. अगर फिल्म की डिमांड है, तो उसे करने में मुझे कोई आपत्ति नहीं.

मेरे लिए निर्देशक, कोऐक्टर खास माने रखते हैं, इस के अलावा मैं जो भी दृश्य करूं, वह ओरिजनल लगे, इस बात पर अधिक ध्यान देती हूं.

फिल्मों की पाबंदी के बारे में क्या सोचती हैं?

फिल्मों का सर्टिफिकेशन जरूरी है, फिल्म को देख कर उस के हिसाब से उसे सर्टिफाई कर देना चाहिए, न कि उस पर पाबंदी लगाई जाए. इस के बाद दर्शक हैं, जो फिल्म के  भविष्य को तय करते हैं. वैसे तो लोग यूट्यूब पर हर तरह की फिल्में देख लेते हैं. मेरे हिसाब से फिल्म जैसे बनी है, उस के हिसाब से सर्टिफिकेट दें. किसी की पसंद या नापसंद को आप डिक्टेट नहीं कर सकते.

समय मिले तो क्या करना पसंद करती हैं?

मैं बहुत बड़ी फिटनैस फ्रीक हूं. समय मिलने पर जिम जाती हूं जिस में मैं मार्शल आर्ट की एक कठिन विधा परकौर करती हूं. खानेपीने पर ध्यान देती हूं, किताबें पढ़ती हूं, फिल्में देखती हूं. मेरे फ्रैंड्स नहीं हैं. फिल्म की यूनिट के लोग ही मेरे फ्रैंड्स हैं. मुझे खाना बनाने का शौक है. सबकुछ बना लेती हूं. नौनवैज नहीं बनाती, क्योंकि मैं खाती नहीं हूं. मैं ने खाना बनाना घर से बाहर निकल कर ही सीखा है. मैं चाय अच्छी बनाती हूं.

आप को कभी ‘कास्टिंग काउच’ का सामना करना पड़ा?

किसी भी क्षेत्र में चाहे वह हिंदी सिनेमा जगत हो या कोई कौरपोरेट वर्ल्ड हर जगह महिलाओं को किसी न किसी रूप में प्रताडि़त होना पड़ता है. इस के लिए वे खुद जिम्मेदार होती हैं.

जिस के पास पावर है वह उस का प्रयोग किसी न किसी रूप में करता है, लेकिन आप अगर खुद उन्हें बता देते हैं कि आप को अपनेआप पर भरोसा नहीं, आप एक रात में ऐक्ट्रैस बनना चाहती हैं, कुछ भी करने के लिए तैयार हैं, तो आप का यूज कौन नहीं करेगा? इस तरह की घटनाओं में दोनों का योगदान होता है. एक अकेला व्यक्ति कुछ भी नहीं कर सकता.

कोई ड्रीम प्रोजैक्ट है?

मैं हमेशा एक अच्छी फिल्म करना चाहती हूं. अभी मैं अपनेआप को प्रूव कर रही हूं.

कुछ और दूसरी रीजनल फिल्में करने का शौक है?

मैं कोई भी अच्छी फिल्म, किसी भी भाषा में हो, करना पसंद करूंगी.

रिलेशनशिप पर आप की सोच क्या है? क्या आप को कभी किसी से प्यार हुआ?

रिलेशनशिप जल्दी टूटती है क्योंकि वह बनती भी जल्दी है. आजकल बनावटी चीजें बहुत हो रही हैं. ऐसे में मैं अपने काम पर अधिक ध्यान देती हूं. मेरा काम ही मेरा प्यार है.

कितनी फैशनेबल हैं?

मैं फैशनेबल बिलकुल नही हूं, जो मिले उसी को पहन लेती हूं.

तनाव होने पर क्या करती हैं?

तनाव होने पर दौड़ने चली जाती हूं.

शौपिंग मेनिया है?

मुझे जो पसंद आए उसे अवश्य खरीद लेती हूं, नहीं तो रात में उस के सपने आते हैं. वे कपड़े, जूते कुछ भी हो सकते हैं.

आप अपना आदर्श किसे मानती हैं?

मैं अपनी मां कांति बाजपेयी को अपना आदर्श मानती हूं.

यूथ जो इस क्षेत्र में आना चाहे उन्हें क्या मैसेज देना चाहेंगी?

यूथ के लिए मेरा मैसेज यही है कि आप जो भी सपने देखें, उन्हें ईमानदारी से फौलो करने की हिम्मत रखें. सभी स्टार बनने के लिए मुंबई आते हैं, पर वे सही ढंग से मेहनत नहीं करते और जब फेल हो जाते हैं, तो रोते हैं और सब को दोषी ठहराते हैं. मेरे हिसाब से सपने जितने अधिक बड़े होते हैं, मेहनत उतनी ही अधिक होती है. उस के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए.

मैं अपने हिसाब से फिल्में चुनती हूं : काजल अग्रवाल

फिल्म ‘क्यों, हो गया ना…’ से कैरियर की शुरुआत करने वाली अभिनेत्री काजल अग्रवाल मुंबई के एक व्यवसायी परिवार से है. काजल ने कभी सोचा भी नहीं था कि वह अभिनेत्री बनेगी. जब वह 10वीं कक्षा में थी तो उसे ‘क्यों, हो गया ना…’ फिल्म में अभिनय का मौका मिला. फिल्म में उस की भूमिका छोटी थी. औफर मिलने की वजह यह थी कि वह उस फिल्म के कास्टिंग डायरैक्टर को जानती थी. उसे लास्ट मिनट में शूटिंग हेतु बुलाया गया था, क्योंकि और कोई उस भूमिका के लिए उन्हें नहीं मिल रहा था. वहां गई तो वह अमिताभ बच्चन से मिली और अपना अभिनय पूरा कर फिर पढ़ाई पर ध्यान देने लगी.

उस ने पत्रकारिता में स्नातक की डिग्री प्राप्त की और एमबीए करना चाहती थी. पढ़ाई के दौरान उस ने एक कंपनी में इंटर्नशिप की, जहां एक फोटोग्राफर ने उस का फोटो खींचा और कई जगह भेज दिया. इस के बाद उसे औफर्स मिलने लगे और वह फिल्मों की ओर मुड़ी. उस ने हिंदी में कम तमिल और तेलुगू में करीब 46 फिल्में कीं. अत्यंत स्पष्टभाषी और सौम्य चेहरे की धनी काजल अग्रवाल ने अपनी हिंदी फिल्म ‘दो लफ्जों की कहानी’ के बारे में बताया.

पेश हैं, उन से हुई बातचीत के खास अंश :

इस फिल्म में आप ने एक दृष्टिहीन युवती की भूमिका निभाई कितना मुश्किल था इसे निभाना?

मेरी आंखें इतनी बड़ी हैं कि इन में मेरा दृष्टिहीन युवती की भूमिका निभाना मुश्किल था, क्योंकि सबकुछ मुझे दिखता है. ऐसे में न देखने का अभिनय करना बहुत ही मुश्किल था, लेकिन मैं ने इसे निभाने के लिए काफी वर्कशौप किए, कई किताबें पढ़ीं, फिल्में देखीं. विजुअली इंपेयर्ड स्कूल में गई, वहां मैं ने देखा कि बच्चे दृष्टिहीन थे, पर वे लाचार नहीं थे. वे अपनी जिंदगी से खुश थे. यही भाव मुझे फिल्म में भी लाना था. ऐसे में मेरे लिए उन के अंदर की भावना को समझना आवश्यक था.

फिल्म में आप की क्या भूमिका है?

मैं ने इस फिल्म में एक चुलबुली और मासूम युवती का किरदार निभाया जो किसी वजह से अकेली रह जाती है. फिर उस की लाइफ में एक व्यक्ति आता है जिस से उसे प्यार हो जाता है. यह एक अत्यंत भावुक प्रेम कहानी है.

निर्देशक दीपक तिजोरी के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा?

दीपक तिजोरी निर्देशक के साथसाथ एक अभिनेता भी हैं, इसलिए किसी भी कठिन दृश्य को वे आसान बना देते हैं. उन के छोटेछोटे टिप्स अभिनय करने में मुझे मदद कर रहे थे.

फिल्म में कठिन दृश्य क्या था? आप को कितनी बार रीटेक देना पड़ा?

मैं दृष्टिहीन युवती हूं, लेकिन एक बार मुझ पर हमला होता है, उस समय मेरा लवर मुझे बचाता है. मेरी नौकरी चली जाती है. ऐसे में मेरा टूट जाना, तनाव, रोना आदि सब को एकसाथ दिखाना बहुत कठिन था. 2-3 टेक के बाद दृश्य ओके हो गए.

यह फिल्म आप को कैसे मिली?

मैं निर्देशक की पहली चौइस थी. उन्होंने शायद मुझे दक्षिण की फिल्मों में काम करते हुए देखा है. मैं ने तमिल व तेलुगू भाषा में 46 फिल्में की हैं. इस फिल्म के लिए निर्देशक को एक नाजुक और कमजोर दिखने वाली हीरोइन चाहिए थी. इसलिए उन्होंने मुझे औफर दिया. मुझे फिल्म की कहानी बहुत पसंद आई थी.

आप को हिंदी फिल्मों में काम कम मिला, इस की वजह क्या रही?

मैं ने हिंदी फिल्मों से कैरियर की शुरुआत की थी, पर दक्षिण में अच्छा औफर मिला और मैं वहां चली गई. वहां जाने के बाद यहां काम करना मुश्किल हो रहा था, क्योंकि हर फिल्म की कमिटमैंट होती है और हर फिल्म के निर्माण में 2-3 महीने लगते हैं. दोनों में बैलेंस बनाना मुश्किल होता है. तमिलतेलुगू हो या हिंदी, मैं अपने हिसाब से फिल्में चुनती हूं.

फिल्म में अंतरंग सीन हैं इन्हें करने में कितना सहज होती हैं?

अंतरंग सीन इस फिल्म में जरूरी हैं. एक ब्लाइंड लड़की किसी को छू कर ही अपने इमोशंस बता सकती है. यह दृश्य फिल्म को हौट या व्यवसाय की दृष्टि से नहीं फिल्माया गया है. इसलिए मैं ने उसे किया.

किसी फिल्म को चुनते वक्त किन बातों का खास ध्यान रखती हैं?

मैं स्टोरी और स्क्रिप्ट को ज्यादा महत्त्व देती हूं.

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री और साउथ की फिल्म इंडस्ट्री में क्या अंतर पाती हैं?

मुझे दोनों ही इंडस्ट्री अच्छी लगती हैं, क्योंकि मुझे हमेशा अच्छे लोगों का साथ मिला. आज हिंदी फिल्म इंडस्ट्री भी काफी अनुशासित हो चुकी है. नई जनरेशन काम कर रही है साथ ही प्रोडक्शन वैल्यू को आज महत्त्व दिया जाने लगा है, ताकि समय पर फिल्में पूरी हों और प्रोडक्शन मूल्य न बढ़े. सब लोग आजकल प्रोफैशनल हो चुके हैं. निश्चित समय के बाद आज हर कोई फ्री हो कर घर जाना चाहता है.

आप का ‘ब्यूटी सीक्रेट’ क्या है?

मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई, दिल्ली जैसे बड़े शहरों में त्वचा का खास ध्यान रखना पड़ता है. धूप, धूल, और प्रदूषण से त्वचा बेजान हो जाती है. ऐसे में अधिक तरल पदार्थों का सेवन करना, हैल्दी डाइट लेना, त्वचा को हमेशा साफ रखना जरूरी है.

इस के अलावा मैं नियमित वर्कआउट करती हूं. मैं बैलेंस रख कर खाना खाती हूं और कोशिश करती हूं कि मेरी नींद कंप्लीट हो. साथ ही किसी बात को ज्यादा नहीं सोचती.

उपचुनाव नतीजे और उनसे मिलता सबक

10 विधानसभा सीटों के उपचुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने 5 सीटें जीत कर एक बार फिर साबित कर दिया कि मेहनत तो राजनीति में भी करनी होती है चाहे आप के पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसा संगठन क्यों न हो जो लगातार काम कर रहा है वरना जीत संभव नहीं है. कांग्रेस ने बुरा प्रदर्शन नहीं किया पर आम आदमी पार्टी ने तो दिल्ली में अपने ढोल की पोल खोल दी. जहां अमित शाह और नरेंद्र मोदी रातदिन मतदाताओं को लुभाने के लिए दौड़भाग करते रहे, वहीं अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की बागडोर मनीष सिसोदिया पर छोड़ कर एक तरह से राजनीतिक मौजमस्ती का रास्ता अपना लिया.

राजनीति में रातदिन मेहनत करना जरूरी है. पर कुछ को लगता है कि यह तो मुफ्त की रोटी दिलाने वाला धंधा है. सत्ता पाना एक टेढ़ा और मेहनती काम है जिस में जूते घिसने भी पड़ते हैं, खाने भी पड़ते हैं. जहां भाजपा 2014 में दिल्ली विधानसभा चुनावों में 70 में से केवल 3 सीटें पा कर भी सक्रिय बनी रही, वहीं आम आदमी पार्टी 67 सीटें पा कर भी निष्क्रिय हो कर बैठेबिठाए पंजाब व गोवा में पके फल टपकने का इंतजार करने लगी.

राजनीति में सही बात कहने से ज्यादा सफलता का राज हरदम कुछ करते रहना दिखना है. 2004 से पहले 5 साल सोनिया गांधी ने देशभर में तूफानी दौरे किए थे. वे पार्टी में सक्रिय थीं, लोकसभा में सक्रिय थीं, जमीन पर सक्रिय थीं. 2010-11 से, बीमारी के बाद, उन की गति धीमी हो गई और राहुल गांधी राजनीति को पिकनिक समझ कर कभी आते, कभी सो जाते.

इन उपचुनावों में यह भी दिख रहा है कि यदि नेता काम करें तो नीतियां गलत हों या सही, फल निकलता ही है. कर्नाटक के सिद्धारमैया ने दोनों सीटे जीत लीं क्योंकि वे लगातार अखबारों में छाए रहे और सही छवि के कारण विवादों में नहीं आए. इधर, अरविंद केजरीवाल सिर्फ उपराज्यपाल से झगड़ने के मौके ढूंढ़ते रहे.

देश में अब भाजपा के नेताओं के अलावा बाकी सब ने, ममता बनर्जी अपवाद हैं, एक तरह से अपनी जैसी भी हालत है, का मजा लेना शुरू कर दिया है और उन्हें दरबारियों, चाटुकारों, हुक्मबरदारों के बीच घिरा रहना ही पसंद आ रहा है.

जब लड़ाई के मैदान में एक राजा औरतों का नाच देख रहा हो तो दूसरा जीतेगा ही, चाहे उस के पास फौज कम ही हो. यहां तो भाजपा की फौज अब कहीं अधिक पावरफुल, रिसोर्सफुल और एनर्जीफुल है. उस की जीत पर क्या आश्चर्य.

‘ऐंटी रोमियो स्क्वाड’ अब विधानमंडल में भी

भारतीय जनता पार्टी के विधानपार्षद लालबाबू प्रसाद अपने ही सहयोगी दल लोक जनशक्ति पार्टी की महिला विधानपार्षद से छेड़खानी करने के आरोप में फंस गए, तो बिहार की राजनीति में भूचाल आ गया. बिहार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव इस मामले पर चुटकी लेते हुए कहते हैं कि क्या विधानमंडल में भी ‘ऐंटी रोमियो स्क्वाड’ तैनात करना जरूरी हो गया है? 29 मार्च, 2017 को महिला विधानपार्षद नूतन सिंह ने भाजपा के विधानपार्षद लालबाबू प्रसाद पर गलत तरीके से छूने और बेहूदा हरकत करने का आरोप लगाया था.

उस के बाद महिला पार्षद के पति और भाजपा के विधायक नीरज कुमार बबलू (सुपौल विधानसभा सीट) ने लालबाबू प्रसाद पर अपना गुस्सा भी निकाला. उन्होंने विधानपरिषद के कैंपस में ही लालबाबू प्रसाद को जोरदार तमाचा जड़ दिया. उस के बाद जब लालबाबू प्रसाद तैश में आए, तो बबलू ने उन की जम कर धुनाई कर डाली.

उस के बाद ही मामले ने इस कदर तूल पकड़ लिया कि विधानसभा और विधानपरिषद में 2 दिनों तक हंगामा होता रहा. इस मसले को ले कर 30 मार्च, 2017 को विधानपरिषद में जम कर हंगामा हुआ. महागठबंधन में शामिल जद (यू), राजद और कांग्रेस की मांग पर सभापति अवधेश नारायण सिंह ने लालबाबू प्रसाद के खिलाफ कड़ी कार्यवाही करने का भरोसा दिया. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी इस मसले को ले कर सभापति से बात की.

बिहार की मुख्यमंत्री रह चुकी राबड़ी देवी कहती हैं कि महिला सदस्य के साथ छेड़खानी करने वाले सदस्य पर ऐसी कार्यवाही होनी चाहिए कि देशभर में उस का कड़ा संदेश जाए.

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष नित्यानंद राय ने बताया के पार्टी के सीनियर नेताओं की बैठक में लालबाबू प्रसाद के मामले पर फैसला लेने की बात कही और उस के बाद 31 मार्च, 2017 को उन्हें पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निलंबित कर दिया गया.

लालबाबू प्रसाद इस मामले पर सफाई देते हुए कहते हैं कि उन्होंने किसी के साथ कोई गलत हरकत नहीं की है. वे पिछले 35 सालों से राजनीति में हैं. उन्हें बदनाम करने की साजिश रची गई है.

भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी ने  कहा कि छेड़खानी के मामले में दोनों पक्षों ने ऐसी किसी वारदात के होने से इनकार किया है. वैसे, विधानपरिषद के सभापति को इस मामले की जांच का अधिकार है.

आखिरकार काफी छीछालेदर होने के बाद 31 मार्च, 2017 की शाम को भाजपा ने लालबाबू प्रसाद को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से हटा दिया. वहीं विधानपरिषद के सभापति ने खुद ही संज्ञान लेते हुए मामले को परिषद की आचार संहिता समिति को सौंप दिया है.

लालबाबू प्रसाद को प्रदूषण और पर्यावरण कमेटी के अध्यक्ष पद से भी बरखास्त कर दिया गया है.

विधानपरिषद के कुछ मुलाजिमों ने बताया कि लालबाबू प्रसाद ने काली करतूत की और उस के बाद महिला एमएलसी के विधायक पति से पिटाई भी खाई और उस के बाद विधानपरिषद में पहुंच कर ऐसे बैठे रहे, जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो. विधायक नीरज कुमार बबलू ने उन्हें सब के सामने पीटा और परिषद के मुलाजिमों ने बीचबचाव कर छुड़ाया था.

54 साल के लालबाबू प्रसाद बिहार के बेतिया के रहने वाले हैं और साल 1978 में वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के नगर मंत्री बने थे.

साल 1990 में वे भाजपा के टिकट पर चनपटिया से विधानसभा के उम्मीदवार बनाए गए, पर जीत नहीं सके. साल 2004 से पिछली 31 मार्च तक वे प्रदेश भाजपा के उपाध्यक्ष रहे.

राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने इस मामले पर ट्वीट करते हुए कहा कि भाजपाई इतने मवाली हैं कि सदन में भी महिला जनप्रतिनिधियों को छेड़ने से बाज नहीं आते हैं.

हिंसा से भरे वीडियो गेम्स और दुनिया

मोबाइल और आईपैड, व्हाट्सऐप और इंस्टाग्राम, कपिल शर्मा का कौमेडी शो और डीजे के म्यूजिक के परे की दुनिया को आज जिस तरह से इग्नोर किया जा रहा है, यह अगले 5-7 साल में अपना असर दिखाने लगेगा. आज के किशोरों को इन खिलौनों के वीडियो गेम्स में मजा तो आता है पर ये सब बदन पर जंग लगाने वाले हैं, माइंड को रस्टी करने वाले हैं.

मानव की मूलभूत जरूरतों से इन का सीधा संबंध नहीं है. ये किसी को तेज नहीं बनाते, नई जानकारी नहीं देते, कुछ करने की प्रेरणा नहीं देते. टैकी होने से कोई नया कुछ ईजाद कर ले जरूरी नहीं. हो सकता है वे इन बेहद उलझी तकनीकों का पूरा लाभ उठा पा रहे हों पर वे सुख को पास ले आएं जरूरी नहीं.

इतिहास के पन्ने खोल कर देखेंगे तो पता चलेगा कि आदमी तब खुश हुआ जब उस ने उत्पादन के और तरीके ढूंढ़े. आज भी बहुतकुछ नया बन रहा है पर लग रहा है कि जनता का बड़ा हिस्सा जो नया बन रहा है उस का गलत इस्तेमाल कर रहा है.

हिंसा से भरे वीडियो गेम्स रोमांच पैदा करते हैं और किशोरों को शैतानियों से रोकते हैं, पर वे ही उन आत्मघाती हमलों के लिए तो जिम्मेदार नहीं जिन से आज दुनिया भर में खौफ है. इन खेलों में खिलाड़ी एक नहीं कईकई को मारता है और जितनों को मारता है, उतने ज्यादा अंक मिलते हैं. यही गुस्सा फेसबुक और व्हाट्सऐप पर अनर्गल गालियों में दिखता है जो दूसरे देश, धर्म, रंग वाले के लिए कही जाती हैं. यही गुस्सा अब वोटरों की पसंद में बदल रहा है. हर देश में गुस्सैलों का राज होने लगा है. जिस ने जितने मारे वह उतना ही मजबूत.

पश्चिम एशिया की स्प्रिंग रैवोल्यूशन ने ट्यूनीशिया मिस्र व लीबिया में सरकारें बदल दीं क्योंकि मोबाइल और आईपैड से लाखों को घरों से बाहर निकालना आसान था पर उन से कुछ करवाना असंभव, क्योंकि सोशल मीडिया एकदूसरे से जोड़ तो सकता है पर उन्हें जुड़वा कर उन

से कुछ बनवा नहीं सकता. सोशल मीडिया हाथ की उंगलियों की देन है, गंभीरता से विषय पर सोचनेविचारने का प्लेटफौर्म नहीं है.

अगर किशोरों को कुछ नया न करने की आदत पड़ गई तो जो कुछ पिछली 4-5 सदियों में बना है वह हाथ से फिसल जाएगा. एक बार फिसला तो फिर आएगा या नहीं, पता नहीं. टैपटैप करते मोबाइल और आईपैड जरूरी हैं पर इतने नहीं कि ताउम्र इन्हीं को सहारा बना लो. ये सिर्फ जूते हो सकते हैं जो लंबी यात्रा में साथ दें पर ये अपनेआप लंबी यात्रा पर नहीं जा सकते. इन्हें पहना और फेंक दिया वाला स्थान मिलना चाहिए, बस.

नीतीश कुमार के एजेंडे पर लालू प्रसाद यादव

राजद सुप्रीमो लालू यादव ने गैर भाजपाई दलों को एक झंडे तले लाने के लिए कमर कस ली है. राजगीर में राजद के 3 दिन के प्रशिक्षण शिविर सह राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में लालू ने हुंकार भरी कि अगले अगस्त महीने में पटना के गांधी मैदान में महारैली करेंगे. महारैली में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, ओडिसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक और सपा नेता अखिलेश यादव समेत गैर भजपाई दलों के सभी नेताओं को न्यौता देंगे. इससे यह साफ हो जाता है कि नीतीश के द्वारा शुरू किए गए गैर भाजपाई दलों को एकजुट करने की मुहिम का झंडा अब लालू यादव ने थाम लिया है.

अपने पिता के सुर में सुर मिलाते हुए उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने समाजवादी दलों को चेताया कि अगर वे अब भी नहीं चेते तो देश उन्हें कभी माफ नहीं करेगा. उन्होंने अपने पिता लालू यादव और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का नाम लिए बगैर कहा कि बिहार के 2 बड़े नेताओं ने अपने ईगो को छोड़ कर राज्यहित और देशहित में महागठबंधन बना कर देश को नई राह दिखाई है. अब देश भर के सभी क्षेत्रीय दलों और समाजवादियों को अपना ईगो छोड़ कर एकजुट होने की दरकार है. उन्होंने दावा किया कि बसपा सुप्रीमो मायावती ने साथ आने का भरोसा दिया है. नेशनल लेवल पर बने महागठबंधन का नेता कौन होगा, इसके जबाब में तेजस्वी ने कहा कि इस पर बाद में फैसला होगा, पहले सभी दल एक मंच पर आ जाएं.

लालू ने अपने कार्यकर्ताओं को सचेत करते हुए कहा कि अगर अब भी चुप रहे तो भाजपा साजिश के तहत संविधान तक बदल सकती है. सभी धर्मनिरपेक्ष दलों को एकसाथ मिल कर 2019 के आम चुनाव में भाजपा को धूल चटानी है. लालू ने इस बात को बेहद खतरनाक बताया कि नीति आयोग लोकसभा और विधान सभा का चुनाव एक साथ कराने पर जोर दे रही है.

साल 2015 के बिहार विधान सभा चुनाव जीतने के बाद तीसरी बार बिहार के मुख्यमंत्री बनने के बाद नीतीश अपने शपथ ग्रहण समारोह में देश भर के मोदी विरोधी नेताओं और पार्टियों को इकट्ठा करने में भी कामयाब रहे थे. बिहार के बाद नेशनल लेवल पर नरेंद्र मोदी को पटखनी देने के लिए उन्होंने  देश की राजनीति का नया चेहरा बनने के संकेत दे दिया था.

आप के अरविंद केजरीवाल, कांग्रेस की शीला दीक्षित, तरूण गोगई, सिद्धारमैया, शिवसेना के रामदास कदम, रांकपा के शरद पवार, तृणमूल की ममता बनर्जी, वामपंथी सीताराम येचुरी, जनता दल (एस) के एचडी देवेगौड़ा, इनेलो के अभय चौटाला, झारखंड विकास मोर्चा के बाबूलाल मरांडी, झामुमो के हेमंत सोरेन, अगप के प्रफुल्ल कुमार महंत एक मंच पर जमा हुए थे. शपथ ग्रहण समारोह की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि 9 राज्यों के मुख्यमंत्रियों सहित 15 दलों के नेता मौजूद थे. सपा प्रमुख मुलायम सिंह और बसपा सुप्रीमो मायावती ने नीतीश के न्यौते को ठुकरा दिया था.

गौरतलब है कि हर आम चुनाव से पहले क्षेत्रीय दलों को एकजुट कर नया मोर्चा बनाने की कसरत शुरू हो जाती है. साल 2014 के आम चुनाव से पहले भी ऐसी कोशिशें की गई थी, जो परवान नहीं चढ़ सकी. साल 2019 में होने वाले आम चुनाव में नरेंद्र मोदी को टक्कर देने के लिए अभी से ही पहल शुरू हो चुकी है. नया विकल्प बनाने का दावा करने वालों में ज्यादातर वहीं लोग शामिल हैं, जो पिछले कई सालों से प्रधानमंत्री बनने का सपना पाले बैठे हुए हैं.

11 क्षेत्रीय दलों के मुखिया पिछले कई सालों से अपनी-अपनी महत्वाकांक्षओं को दबा-छुपा कर बैठे हुए हैं. नया फ्रंट बनने की बात पर वह एकजुटता का दिखावा भर करते रहे हैं. इस मोर्चे में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव, जनता दल एस के नेता एचडी देवेगौड़ा, बीजू जनता दल के सुप्रीमो नवीन पटनायक और माकपा नेता प्रकाश करात जैसे क्षेत्रीय दबंग शामिल हैं, जो पिछले कई सालों से खुद के प्रधनमंत्री बनने की हवा उड़वाते रहे हैं. मुलायम कई दफे प्रधनमंत्री बनते बनते रह गए.

दिलचस्प बात यह है कि 11 दलों को मिला कर देश को नया विकल्प देने का दावा करने वाले खुद ही असमंजस की हालत में हैं. इसके सभी नेता हमेशा से ही इसकी कामयाबी को लेकर संशय में रहते हैं, इसलिए चुनाव के पहले वह कोई भी रणनीति नहीं बनाते हैं. सारे के सारे यही कह कर मामले को टरका देते हैं कि चुनाव के बाद ही आगे की रणनीति तय की जाएगी. नीतीश, मुलायम, नवीन, प्रकाश सभी तीसरे मोर्चे की घोड़ी पर चढ़ कर प्रधनमंत्री पद तक पहुंचने की जीतोड़ कोशिश में हैं. चुनाव के बाद ही रणनीति बनाने की बात यही साबित करती है कि जिस दल को ज्यादा सीट मिलेगी, उसके प्रधानमंत्री बनने का दावा और उम्मीद ज्यादा पक्की हो सकेगी.

भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी तीसरे मोर्चे की खिल्ली उड़ाते हुए कहते हैं कि यह हताश और हारे हुए घोड़ों का जमावड़ा भर है. यह कोई नई बात नहीं है, हर आम चुनाव से पहले थर्ड फ्रंट बनाने की कोशिश चालू की जाती है, पर जनता देख चुकी है कि यह प्रयोग हमेशा ही नाकाम रहा है. नेशनल या थर्ड फ्रंट हवाबाजी ही साबित हुई है.

देश में तीसरा मोर्चा या नेशनल फ्रंट बनाने वालों सारे दलों की परेशानी यह है कि पूरे 5 सालों तक वह अपनी डफली अपना राग अलापते रहते हैं और चुनाव आते ही साथ मिल कर सियासी खिचड़ी पकाने लगते हैं. चुनाव की हवा शुरू होते ही तीसरे मोर्चा की हवा भी बननी शुरू हो जाती है, जो आखिरकार हवाबाजी ही बन कर रह जाती है. इसके पहले 4 बार तीसरा मोर्चा बनाने की नाकाम कोशिशें हो चुकी है. अब देखना यह है कि लालू और नीतीश की अगुवाई में यह नया मोर्चा कुछ नया और सियासी रंग जमाता है यह पिछले मोर्चो की तरह चुनाव के बाद तिनका-तिनका बिखर कर अपने-अपने इलाके की सियासत में मसरूफ हो जाता है.

‘कटप्पा’ और बाहुबली की ‘मां’ कर रहे हैं रोमांस

इस साल की मोस्ट अवेटेड फिल्म बाहुबली-2 रिलीज हो गई है. रिलीज के साथ ही फिल्म कमाई के नए रिकॉर्ड कायम कर रही है. फिल्म देखने के लिए लोग इतने क्रेजी हैं कि सिर्फ पांच दिनों में ही इस फिल्म ने आमिर खान की दंगल और पीके को पीछे छोड़ दिया है.

लोग बाहुबली -2  का दो सालों से सिर्फ इसलिए इंतजार कर रहे थे क्योंकि वो जानना चाहते थे कि कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा. फिल्म का पहला पार्ट अगर आप ने देखा होगा तो, आपको बाहुबली और भल्लादेव के अलावा कटप्पा और शिवगामी का किरदार जरूर पसंद आया होगा.

फिल्म में जहां शिवगामी की करेक्टर में राम्या कृष्णन एक महारानी की भूमिका निभा रही हैं, वहीं कटप्पा बने एक्टर सत्यराज एक ऐसे गुलाम सेवक के रोल में हैं, जो राजघराने के आदेश के साथ बंधा हुआ है. दोनों ही करेक्टर अपने आप में दमदार हैं, जिनके बिना फिल्म की कल्पना नहीं की जा सकती है.

बाहुबली-2 फिल्म में जहां बाहुबली कटप्पा को मामा पुकारता नजर आता है, वहीं कटप्पा शिवगामी को मां कह कर संबोधित करता है. दोनों एक्टर्स ने अपनी भूमिका पूरे दमखम से निभायी है.

शिवगामी और कटप्पा के करेक्टर ऑडियंस के मन में ऐसे रच-बस गये हैं कि दोनों को एक साथ किसी और रोल में देखना अचरजभरा हो सकता है. इसी बीच इन दोनों का एक वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रहा है. एक ऐडफिल्म के इस वीडियो में दोनों को शाही पति-पत्नी के किरदार में देखना काफी दिलचस्प है. बताते चलें कि तमिल भाषा में बना यह ऐड एक टेक्सटाइल ब्रांड का है. इसमें ‘शिवगामी’ और ‘कटप्पा’ की केमिस्ट्री को काफी पसंद किया जा रहा है.

आपको बता दें कि कि ‘कटप्पा’ यानी सत्यराज कुछ साल पहले से इस टेक्सटाइल ब्रांड से जुड़े हुए हैं और समय-समय पर इसके ऐड में नजर आ चुके हैं. लेकिन ‘बाहुबली’ की सफलता को कैश करने के इरादे से टेक्सटाइल ब्रांड कंपनी ने ने ‘कटप्पा’ के साथ ‘शिवगामी’ की जोड़ी बनायी है.

ज्यादा सेक्सी थी हीरोइन, सरकार ने लगाया बैन

कंबोडिया की एक मॉडल को वहां की सरकार ने कुछ ज्यादा ही सेक्सी बताते हुए एक साल के लिए बैन कर दिया है. उन पर संस्कृति मंत्रालय के नियम ना मानने के आरोप हैं. ये मॉडल 24 साल की डेनी नॉन हैं. सरकार द्वारा उठाए गए इस कदम के चलते नॉन अब अगले 1 साल तक कैमरा के सामने नहीं आ सकेंगी. एक साल तक वो कोई फिल्म नहीं कर सकती हैं. नॉन ने इस बैन को गलत कहा है.

24 साल की डेनी नॉन को कंबोडिया की संस्कृति और आर्ट मिनिस्ट्री ने आचार संहिता का उल्लंघन के लिए बैन किया है. मंत्रालय के मुताबिक वो कुछ ज्यादा ही सेक्सी हैं और अंग प्रदर्शन करती हैं, जो कि देश के लिए ठीक नहीं है.

अभिनेत्री डेनी नॉन ने इस पर कहा है कि मुझे क्या पहनना है और क्या नहीं इसका फैसला करना आता है. उन्होंने कहा कि कुछ लोग उनकी आजादी को स्वीकार नहीं करते. नॉन ने कहा कि इस मामले को लेकर संस्कृति मंत्रालय के लोगों ने उन्हें बुलाया था और क्या पहनना है ये भी बताया था लेकिन मेरा मानना है कि कपड़े पहनने किसी का निजी मामला है.

नॉन का कहना है कि मैं फिल्में तो छोड़िए फेसबुक पर तस्वीरें पोस्ट करते हुए भी ध्यान रखूंगी कि मैं ज्यादा सेक्सी नहीं दिखूं लेकिन मैं अगर मैं हूं ही सेक्सी तो फिर क्या करूं. डेली मेल के मुताबिक, मंत्रालय की ओर से कहा गया है कि नॉन को यह सजा दी गई है क्योंकि मिनिस्ट्री के साथ लिखित में उन्होंने कपड़ों और अंग प्रदर्शन को लेकर वादा किया था, जो उन्होंने तोड़ दिया.

नॉन का कहना है कि सरकार ने उनके साथ ज्यादती की है क्योंकि कंबोडिया में वो कोई अकेली अभिनेत्री नहीं हैं. उन्होंने कहा कि कुछ अभिनेत्री तो बेडरूम सीन भी खूब देती हैं लेकिन संस्कृति मंत्रालय ने उन पर ही बैन लगाया. नॉन बैन को औरतों की आजादी में तो दखल मानता ही हैं, इसे अपने करियर के लिए भी बुरा कह रही हैं. वो कहती हैं कि सालभर तक कैमरे से दूर रहना करियर को नुकसान कर सकता है.

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