इसलिए खत्म नहीं होती नक्सली हिंसा

अब कहां पहले सी सामाजिक असमानता और जमींदारी रही, अब तो आदिवासी मुख्यधारा से जुड़ कर सुविधाजनक जिंदगी जी रहे हैं, उनके बच्चे पढ़ने स्कूल जाने लगे हैं, आदिवासियों के हाथ में अब तीर कमान नहीं बल्कि सेलफोन हैं और तो और अब उनका पहले जैसा शोषण भी नहीं होता, जैसी बातें करने वाले लोग कभी बस्तर गए हों ऐसा लगता नहीं, इसलिए उन्हें अपनी यह गलतफहमी दूर करने एक दफा बस्तर जरूर जाना चाहिए, वहां के जंगलों में बसे इन आदिवासियों की जिंदगी को नजदीक से देखना चाहिए तब शायद उन्हें समझ आए कि सब कुछ ज्यों का त्यों है और जो बदलाव आए बताए जाते हैं उनकी छोटी सी झलक धमतरी नाम के कस्बे तक ही ढूंढने पर ही दिखती है.

बीती 24 अप्रेल को सुकमा के नक्सली हमले में फिर एक बार सीपीआरएफ के 25 जवान मारे गए तो एक बात और प्रमुखता से कही गई कि अब तो नक्सली वसूली करने लगे हैं और नक्सलवाद कोई मुहिम नहीं, बल्कि एक धंधा बन चुका है, इसलिए सरकार को देर न करते हुये तुरंत वैसी सर्जिकल स्ट्राइक करनी चाहिए जैसी 18 सितंबर 2016 को जम्मू कश्मीर के उरी में सैनिक कैंप पर हुये आतंकी हमले में 20 सैनिकों के शहीद होने के बाद की थी. इस मुहिम में आतंकी ठिकानों पर सैन्य हमला करके उन्हें धव्स्त कर दिया गया था.

यह सुझाव या आइडिया नहीं बल्कि माओवादियों के खिलाफ एक स्वभाविक आक्रोश भर है जिसे पेश करने वाले लोग न तो नक्सली इतिहास से वाकिफ लगते हैं और जैसा कि ऊपर बताया गया कि न ही आदिवासियों की शाश्वत बदहाली से परिचित हैं. इसमे उनकी कोई खास गलती भी नहीं क्योंकि यही लोग महसूसते भी हैं कि अगर माओवादियों को खत्म करना अगर इतना आसान काम होता तो वह  कभी का हो चुका होता. तो फिर दिक्कत क्या है और क्यों सरकार और उसका भीमकाय दिखने वाला तंत्र नक्सलियों के सामने कमजोर पड़ जाता है.

इस सवाल का जबाब बेहद साफ है कि नक्सली आंदोलन सिर्फ इसलिए वजूद में है कि उसकी जरूरत अभी खत्म नहीं हुई है. यहां मकसद नक्सली हिंसा का समर्थन करना नहीं, बल्कि बहुत साफ तौर पर यह बताना और जताना है कि छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाकों खासतौर से बस्तर में आदिवासी अब भी शोषण का शिकार हैं और सरकार या सेना पर कतई भरोसा नहीं करते, जो हर कभी उन्हें नक्सलियों के मुखबिर होने के इल्जाम में या फिर किसी भी आदिवासी को नक्सली करार देकर ऐसी यातना देती है कि उन्हें इस कहर से बचने नक्सलियों की शरण लेने में ही भलाई लगती है.

भोपाल और रायपुर के कुछ आदिवासी युवाओं से बात करने पर पता चलता है कि अब स्थानीय पुलिस वालों की भूमिका मूक दर्शक की सी रह गई है, जो नक्सलियों के बारे में काफी कुछ जानते हैं और मुमकिन है उनकी मदद भी करते हों, क्योंकि माओवादी उन्हें नहीं मारते, उनके निशाने पर सीपीआरएफ जैसी केंद्रीय एजेंसियां ही रहती हैं, जिन्हे हर आदिवासी नक्सली नजर आता है और वे हर कभी हर कहीं जमीदारों जैसा जुल्म उन पर करते हैं और आदिवासी औरतों को बेइज्जत करने से भी नहीं चूकते, उलट इसके अपनी रेड कारीडोर में समांतर सरकार चला रहे माओवादी घूसखोर मुलाजिमों से आदिवासियों को बचाते हैं, इसलिए वे आदिवासियों को ज्यादा विश्वसनीय लगते हैं, अगर न लगते होते तो उन्हे खत्म करने के लिए सरकार को न तो जगह जगह मिलिट्री केंप लगाना पड़ते और न ही खरबों रुपये नक्सली उन्मूलन अभियान पर फूंकना पड़ते, जिसका कोई सार्थक परिणाम आज तक नहीं निकला है.

बस्तर के गीदम कस्बे के  एक युवा की  माने तो यह भी सच है कि कई आदिवासी नक्सलियों की आर्थिक सहायता करते हैं, पर उसकी वजह डर नहीं बल्कि मिलिट्री सूदखोर बनियों  और घूसखोर सरकारी मुलाजिमों के कहर से बचाने का मेहनताना या नजराना जो भी समझ लें है. कई दफा ऐसा लगता भी है कि मेहनती और भोला भाला आदिवासी इन दो पाटों के बीच पिसता अपने आदिवासी होने की सजा भुगत रहा है, यह युवक मानता है कि कई बार नक्सली भी पुलिस का मुखबिर होने के शक में आदिवासियों पर कहर ढाते हैं, लेकिन  ऐसा अक्सर वे यकीन हो जाने के बाद करते हैं, इसलिए निर्दोष आदिवासी उनसे कोई डर या खतरा नहीं महसूसते यानि सीधी और स्पष्ट लड़ाई सरकारी एजेंसियों और माओवादियों के बीच है जिसमे घोषित तौर पर माओवादी आदिवासियों के हमदर्द हैं जबकि सीपीआरएफ जैसी एजेंसियों को आदिवासियों के भले बुरे से कोई सरोकार नहीं सिवाय इसके कि वे अपनी वे जरूरतें उनसे पूरी करें जिनका इंतजाम सरकार नहीं कर पाती.

साफ दिख रहा है यह लड़ाई अंतहीन है और सरकार अभी तक न तो कभी जीत पाई है न ही जीत पाएगी, इसकी वजह और भी साफ है कि वह आदिवासियों की समस्याएं हल नहीं कर पा रही और न ही उन्हे शोषण से मुक्ति दिला पा रही.

दोगली सियासत

कोसने वाले बेवजह सरकार की कमजोर इच्छाशक्ति और नक्सली समस्या पर उसके दोहरेपन को नहीं कोसते, इसे समझने छत्तीसगढ़ के सी एम रमन सिंह का यह ताजा बयान, जो सुकमा हमले के ठीक पहले उन्होंने दिया था, पर्याप्त है कि अगर विधायक और निगमों के अध्यक्ष एक साल के लिए भी कमीशन खाना बंद कर दें तो राज्य तीस साल आगे का विकास कर जाएगा यानि विकास न होना एक तरह से आदिवासियों का शोषण ही है. कमीशनखोरी की यह बात सरकारी तंत्र में छोटे स्तर तक पसरे भ्रष्टाचार पर भी लागू होती है.

उधर केंद्र सरकार का ढुलमुल और टरकाऊ रवैया भी नक्सली समस्या का कम जिम्मेदार नहीं जो हर बड़े हमले के बाद शहीद हुये जवानों को कुछ लाख रुपये की इमदाद देता है, सख्ती का दम भरता है और फिर बात आई गई हो जाती है. सुकमा हमले के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जवानों की शहादत बेकार न जाने देने की बात कर उन पर गर्व किया, तो गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने इसे चुनौती के रूप में स्वीकारा, जबकि मोदी सरकार के कार्यकाल में माओवादियों द्वारा किया गया यह तीसरा बड़ा हमला है. जाने क्यों सरकार अपनी ये कमजोरियां मानने और दूर करने को तैयार नहीं कि उसका खुफिया तंत्र लापरवाह, भष्ट और अव्वल दर्जे का निकम्मा है.

सीपीआरएफ जैसी एजेंसियां चयनित स्थानों पर डेरा डाले वक्त गुजारती रहती हैं उन्हें नक्सली गतिविधियों के बारे में कोई जानकारी नहीं रहती ऐसे में क्या खाकर इस चुनौती से निबटा जाएगा यह राम जाने. सुकमा हमले के बारे में जवान कह रहे हैं कि कोई 300 माओवादियों ने आदिवासियों को आगे रखा, जिससे वे मुंह तोड़ जबाब नहीं दे पाये, इसके बाद भी कई नक्सलियों को उन्होंने मार गिराया. हास्यास्पद बात यह है कि छत्तीसगढ़ या बस्तर में कोई भी आदिवासियों और नक्सलियों में फर्क नहीं कर सकता, फिर कैसे यह मान लिया जाये कि आदिवासियों को ही ढाल बनाया गया था, मुमकिन है अपने अभियान के प्रति जी जान से जुटे और प्रतिबद्ध नक्सलियों ने अपने ही साथियों को आगे रखा हो.

सुकमा के बारे में हर कोई जानता है कि वहां नक्सली बेखौफ घूमते हैं, उन्हें किसी का डर नहीं पर अब सरकार क्या करेगी जो अभी भी बस्तर की दुरूह भौगोलिक स्थिति को ढाल बनाकर बात घुमा फिरा रही है. क्या वह बस्तर के जंगल उजडवा देगी या फिर हवाई हमला करेगी जबकि उसे माओवादियों के एक भी ठिकाने की जानकारी नहीं है. जाहिर है वह ऐसा कुछ नहीं करेगी और न ही अपने फैसलों से चौंका देने वाले नरेंद्र मोदी कोई करिश्मा दिखा पाएंगे और दिखाया भी तो वह सर्जिकल स्ट्राइक जैसा अस्थाई होगा. जरूरत आदिवासियों को उनके अधिकार देने की है शिक्षा और स्वास्थ सहूलियतें मुहैया कराने की  है पर हो उल्टा रहा है, वहां की भाजपा सरकार 20 हजार स्कूल बंद करने का एलान कर चुकी है, इससे लाखों आदिवासी बच्चे तालीम से महरूम हो जाएंगे.

बस्तर के दूरदराज के इलाकों में डाक्टर नहीं हैं,  बिजली नहीं है, शौचालय नहीं हैं, पीने का साफ पानी नहीं है, सड़कें नहीं हैं.  आदिवासियों को इन मूलभूत सुविधाओं से वंचित रखना शोषण और षड्यंत्र नहीं तो क्या है, इस पर भी तुर्रा यह कि अगर डाक्टर विनायक सेन जैसा कोई ईमानदार समाजसेवी आदिवासियों की सेवा करता है, तो सरकार उसे नक्सली करार देते जेल में ठूंसकर इतना प्रताड़ित कर मुकदमों से लाद देती है कि फिर कोई ऐसी जुर्रत नहीं करता जिससे आदिवासियों में जागरूकता और स्वाभिमान आए. नक्सली जो कर रहे हैं अगर वह हिंसा है तो उसके बंद या खत्म होने की उम्मीद एक तरह की नादानी ही है.

8 मई को राजनाथ सिंह नक्सल प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की मीटिंग में नया कुछ कर या कह पाएंगे ऐसा लग नहीं रहा मुमकिन है. ममता बनर्जी या नीतीश कुमार सरकार को ही कटघरे में खड़ा करते यह पूछ डालें कि नोटबंदी का असर नक्सलवादियों पर क्यों नहीं पड़ा जैसा कि इस फैसले के वक्त कहा गया था कि इससे आतंकवादियों के भी होसले पस्त पड़ेंगे.

नक्सलवाद की जड़ें आदिवासियों का उस पर भरोसा है, उन्हें अपना हिमायती समझना है जो एक हद तक सच भी है. अपने एक अहम फैसले में सुप्रीम कोर्ट भी कह चुका है कि नक्सलवाद से इत्तफाक रखना गुनाह के श्रेणी में नहीं आता, तो ऐसे में बेहतर होगा कि सरकार माओवादियों की मांगों पर गंभीरता पूर्वक विचार करे या फिर वैचारिक स्तर पर उन्हें आदिवासियों के सामने गलत ठहराए.

इस देश में होता है भ्रष्टाचार पर भ्रष्टाचार

रिश्वत लेते हुए सरकारी अफसर पकड़ा जाए तो इस देश में उस का क्या इलाज है? बड़ा आसान है, रिश्वत दे कर छूट जाओ. हजारों रिश्वतखोर अफसर यही करते हैं और रिश्वतों का बाजार ऐसा ही गरम है जैसा ‘जौली एलएलबी’ फिल्म में थानों में नियुक्ति की बोली के रूप में दर्शाया गया है. हमारे यहां रिश्वतखोर अफसर तब पकड़ा जाता है जब वह अपने ऊपर के अफसरों को उन का सही हिस्सा नहीं देता. अगर पकड़ा जाए तो रिश्वत दे कर छूटने का उदाहरण अफसर बी एल अग्रवाल का सामने आया है जो छत्तीसगढ़ सरकार में प्रमुख सचिव हैं. 2010 में अग्रवाल के खिलाफ 2 मुकदमे केंद्रीय जांच ब्यूरो ने दर्ज किए थे जब वे स्वास्थ्य सचिव थे. आयकर विभाग वालों ने जांच कर पता किया था कि अग्रवाल के पास 93 करोड़ रुपए की संपत्ति है.

मामले को रफादफा करने के लिए बी एल अग्रवाल ने सोर्स ढूंढ़ने की कोशिश की और एक सय्यद बुड़हानुद्दीन ने उन्हें झांसा दिया कि वह प्रधानमंत्री कार्यालय में काम करता है और उस की फाइल नष्ट करा देगा. यह शख्स कभी ओ पी शर्मा, कभी ओ पी सिंह तो कभी इकबाल अहमद के नाम से कार्य करता है.

एक प्रमुख सचिव की हैसियत पर काम करने वाले भारतीय जनता पार्टी की सरकार वाले राज्य में इस तरह की चोरी व सीनाजोरी दर्शाती है कि नरेंद्र मोदी का भ्रष्टाचारमुक्त भारत सिर्फ हवा में है. सरकारी लोग आज भी पैसा बना रहे हैं और जम कर बना रहे हैं. मनमोहन सिंह की सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण गई पर इसलिए कि उस समय औडीटर जनरल ने भ्रष्टाचार के मामलों को बढ़ाचढ़ा कर प्रसारित करा दिए थे. मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी इन पर प्रतिवाद नहीं कर पाए. हालांकि, मौजूदा सरकार के 3 साल के कार्यकाल के बाद भी एक भी नेता या अफसर कोयला या 2 जी घोटाले में सजा नहीं पा पाया है. नरेंद्र मोदी के बारे में कहा जा रहा है कि उन का कार्यालय भ्रष्टाचारमुक्त है पर यह भी तो संभव है कि वहां कार्यरत कर्मचारी गद्दारमुक्त न हों. यानी हर बात गुप्त है, भ्रष्टाचारमुक्त नहीं.

छत्तीसगढ़ सरकार में ही नहीं, सभी राज्य सरकारों और केंद्रीय मंत्रालयों का यही हाल है. देश में पनप रहे धन्ना सेठों में अधिकांश के पीछे भ्रष्टाचार का ही प्रमुख हाथ है क्योंकि यहां के धन्ना सेठ न अच्छी सेवा दे रहे हैं, न अच्छा उत्पादन कर रहे हैं. वे केवल सरकारी ठेकों, सरकारी दान, सरकारी काम पर निर्भर हैं. बी एल अग्रवाल ने अगर करोड़ों रुपए नाजायज कमाए हैं तो उन के सहारे दूसरों ने अरबों रुपए कमाए होंगे. ये लोग आज भी सरकार में वैसे ही बने हुए हैं जैसे सोनिया, मनमोहन की पिछली सरकार में थे.

नरेंद्र मोदी ने हजारों की संख्या में सरकारी अफसरों पर कांग्रेसी राज में भ्रष्टाचार करने का आरोप नहीं लगाया है और न ही उन्हें निकाला. फिर देश भ्रष्टाचार मुक्त कैसे बन सकता है.

नक्सलवाद : राजनाथ सिंह पर सवालिया निशान

देश की सीमा पर कश्मीर में बढ़ती आतंकी घटनायें और देश के अंदर बढ़ती नक्सलवादी घटनाओं को लेकर अब विरोधी ही नहीं, भाजपा के समर्थक भी केन्द्र सरकार के गृह मंत्रालय और केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह से नाराज नजर आ रहे हैं. छत्तीसगढ में नक्सली हमले में 25 जवानों के शहीद होने और कश्मीर में स्कूली बच्चों के पत्थरबाजी में शामिल होने के कारण केन्द्र सरकार के असफल होने की बात सामने आ रही है. अब भाजपा के समर्थक भी सोशल मीडिया पर ऐसे संदेश देने लगे हैं कि गृह मंत्रालय आतंकवाद और नक्सलवाद को संभालने में असफल हो गया है. दबी जुबान में सोशल मीडिया में यह बात भी सामने आ रही है कि अगर गृह मंत्रालय इस तरह की घटनायें रोक नहीं सकता तो उसमें व्यापक फेरबदल की जरूरत है.

असल में भाजपा के समर्थक केन्द्र सरकार के असफल होने की बात को मानना नहीं चाहते, ऐसे में वह गृह मंत्रालय को निशाने पर ले रहे हैं. केवल छत्तीसगढ़ में ही फरवरी 2014 में 2 बार इस तरह की घटनायें घटी. दोनों घटनाओं में 22 से अधिक पुलिसकर्मियों की हत्या की गई थी. मार्च 2017 में 12 जवान मारे गये और 24 अप्रैल की घटना में 25 जवान शहीद हो गये. हर हमले के बाद गृहमंत्री राजनाथ सिंह हमले को चुनौती के रूप में देखते हैं. इसके बाद फिर हमला हो जाता है. कुछ इसी तरह से कश्मीर में भी हो रहा है. कश्मीर में बच्चों के स्कूल लबें समय तक बंद रहे. इसके बाद खुले तो एक सप्ताह में ही स्कूली बच्चे वापस पत्थरबाजी करने लगे. तब सरकार को स्कूल फिर बंद करने पड़ गये.

सरकार के तमाम दावों और प्रयासों के बाद भी कश्मीर में शांति बहाली नहीं हो पा रही है. कश्मीर में शांति बहाली के नाम पर ही भाजपा ने पीडीपी के साथ मिलकर सरकार बनाई. दावा यह किया गया कि इससे कश्मीर में शांति बहाली हो सकेगी. पीडीपी और भाजपा के बीच कभी अच्छे संबंध नहीं रहे. वैचारिक रूप से दोनों अलग विचारधारा को मानते हैं. इनके एक साथ होने से भी कश्मीर पर कोई सार्थक प्रभाव नहीं पड़ा है. नोटबंदी को लेकर सरकार ने कहा कि इससे कश्मीर में अमन कामय होगा. ऐसे में अब यह सवाल मुखर होने लगा है कि भाजपा सरकार आतंकवाद और नक्सलवाद दोनों को लेकर असफल हो चुकी है.

मोदी समर्थक इसे केन्द्र सरकार के असफल होने के जगह पर गृह मंत्रालय के असफल होने की बात मान रहे हैं. ऐसे में साफ है कि इसको लेकर निशाने पर गृहमंत्री राजनाथ सिंह हैं. ऐसे में यह संभव है कि आने वाले दिनों में केन्द्र सरकार इसको लेकर कोई बड़ा फैसला ले. उत्तर प्रदेश में चुनावी जीत के बाद भाजपा की जिम्मेदारियों में कई गुने की बढोत्तरी हो चुकी है. दूसरी तरफ खुफिया सूत्र यह मानते हैं कि उत्तर प्रदेश में भगवा वेश में आतंकवादी किसी घटना को अंजाम दे सकते हैं. ऐसे में गृहमंत्रालय के सामने नई चुनौतियों के ढेर लगे हैं. इनपर खरे उतराना सरल नहीं है. राजनीतिक जानकार यह मानते हैं कि गृह मंत्रालय को जिम्मेदार मानना भाजपा की अंदरूनी राजनीति का हिस्सा भी हो सकता है.

खाकी वरदी आखिर आ ही गई काम

उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का मजनुओं को पकड़ने का अभियान यों तो सही है पर यह समाज की दुर्दशा बयां करता है. इस अभियान में हर पुलिस चौकी में 3-4 सिपाहियों की टीम बनाई गई है जो सड़क पर जमा छोकरों को छेड़खानी करते पकड़े जाने पर हिरासत में ले लेगी. टीम के लोग अविवाहित लगने वाले जोड़ों को भी फटकार लगाएंगे ताकि देश का चारित्रिक स्तर सुधरे.

इस का अर्थ साफ है कि सदियों के धर्मप्रचार, प्रवचनों, मंत्रों, हवनों, पूजापाठों, मूर्तिपूजाओं, आश्रमों, मठों की मौजूदगी के बावजूद धर्म अपने ही भक्तों व श्रद्घालुओं को आज तक सभ्यता का पहला पाठ, दूसरों की इज्जत करो और औरतों की सुरक्षा करो, नहीं सिखा पाया है.

घंटों चलने वाले धार्मिक कार्यक्रमों में भगवानों व देवताओं के चमत्कारों का विस्तृत विवरण होता है और प्रवचन करने वाले बारबार संतों की सेवा करने का आदेश तो देते हैं पर क्या वे भक्तों को सही व्यवहार करने का आदेश नहीं दे सकते.

जो भगवान भक्तों के घर भर सकते हैं वे क्या भक्तों की औरतों को सुरक्षा नहीं दे सकते? क्या भगवान वाकई इतने कमजोर ही हैं कि वे सिर्फ महंतों, संतों, भगवाओं को सत्ता, धन, स्त्री, गौ सुख दे सकते हैं?

योगी आदित्यनाथ जिस धार्मिक जोश के सहारे मुख्यमंत्री बने हैं, उसे भगवा वरदी की जगह खाकी वरदी की जरूरत ही क्यों पड़ी?

असल में धर्म ने कहीं भी औरतों या कमजोरों को सुरक्षा नहीं दी. उस ने उन्हें हमेशा अपने सुखों के लिए इस्तेमाल किया. राजा धर्मों का इस्तेमाल एक हथियार के रूप में करते रहे हैं और बदले में धर्मगुरु उन्हें भगवान के रूप में जनता में प्रचारित करते रहे हैं. धर्म ने आम आदमी की न तो प्रकृति से रक्षा की है, न  बाहरी दुश्मनों से और न ही स्थानीय गुंडों से.

अब धार्मिक पुलिस बन रही है जो राजनीतिक दुश्मनी भी निकालेगी और दिखावे के लिए मजनुओं को ठीक करेगी. सड़कछाप लड़कों, लफंगों को ठीक करने के लिए पुलिस को तो हमेशा ही तैयार रहना चाहिए. जब इस आदेश पर धार्मिक मुलम्मा चढ़ा होगा तो इस का भरपूर दुरुपयोग होगा ही.

जैसे गौरक्षकों ने उत्पात मचाया है, वैसे ही अब चरित्ररक्षक बन जाएंगे और हर चौराहे पर भगवा अंगोछा पहने वसूली करने लगेंगे. यह लोकतंत्र के लिए कितना घातक है, आम आदमी समझ नहीं पाएगा. लोकतंत्र का शेर होता ही कागजी है क्योंकि वह कागजों पर लिखे आदेशों से चलता है. लठैतों की भीड़ उसे दबोच डाले तो आश्चर्य नहीं.

प्रभास ने इस तरह दिया कमाल आर खान को जवाब

दक्षिण भारत के सुपर स्टार माने जाने वाले अभिनेता मोहनलाल ने जब घोषणा की कि एम टी वासुदेवन नायक के उपन्यास ‘‘रंदामूजम’’ पर आधारित बनने जा रही फिल्म ‘‘महाभारत’’ में वह भीम का किरदार निभाने वाले हैं और इस फिल्म की कहानी भीम के नजरिए से कही जा जाएगी. तो मोहन लाल की इस घोषणा के बाद हर जगह अपनी टांग अड़ाने के लिए मशहूर कमाल आर खान ने ट्वीटर पर लिखा कि मोहन लाल तो ‘छोटा भीम’ हैं. ‘महाभारत’ में भीम का किरदार फिल्म ‘बाहुबली’ के अभिनेता प्रभास को निभाना चाहिए. उसके बाद मोहन लाल के प्रशंसकों ने ट्वीटर पर कमाल आर खान की जमकर छीछालेदर की. तब कमाल आर खान ने मोहनलाल से माफी मांगते हुए ट्वीटर पर लिखा-‘‘मुझे माफ करें. मुझे नहीं पता था कि आप सुपर स्टार हैं…..’’

पर मामला यहीं शांत नहीं हुआ. जब रविवार को बंगलोर में फिल्म ‘‘बाहुबली’’ के कुछ कलाकारों के साथ प्रभास भी पत्रकारों के सामने पहुंचे तो पत्रकारों ने प्रभास से सीधा सवाल कर दिया कि क्या वह फिल्म ‘महाभारत’ में भीम का किरदार निभाना चाहते हैं? क्या वह कमाल आर खान की इस बात से सहमत हैं कि भीम का किरदार मोहनलाल की बजाय उन्हे निभाना चाहिए? इस पर प्रभास ने बड़ी विनम्रता के साथ कहा-‘‘मोहनलाल सर भीम का किरदार निभा रहे हैं. यदि वह मेरे लिए कोई किरदार छोड़ते हैं, यदि उनकी तरफ से मुझे किसी किरदार को निभाने का प्रस्ताव मिलता है, तो मैं इंकार नहीं करुंगा. मुझे उनके साथ सिनेमा के परदे पर आने में खुशी होगी.’’

ज्ञातब्य है कि सितंबर 2018 में फिल्म ‘‘महाभारत’’ का निर्माण शुरू होगा. दो भागों में बनने वाली यह फिल्म अंग्रेजी, हिंदी, मलयालम, तेलगू, तमिल व कन्नड़ भाषा में बनेगी. उसके बाद इसे विश्व की अन्य भाषाओं में डब किया जाएगा. यह फिल्म 2020 की शुरुआत में पूरे विश्व में एक साथ प्रदर्शित होगी. पहले भाग के प्रदर्शन के नब्बे दिन बाद दूसरा भाग प्रदर्शित होगा.

जब सबके सामने सरक गया डिंपल का तौलिया

बॉलीवुड एक्ट्रेस अक्सर अपनी ड्रेस को लेकर सुर्खियों में रहती हैं, यहां तक कि कई एक्ट्रेस तो ऐसी ड्रेस भी पहन लेतीं हैं जिससे उन्हें शर्मसार होना पड़ता है. दरअसल बॉलीवुड की कई एक्ट्रेस हैं जो अपनी ड्रेस की वजह से वॉर्डरोब मार्लफंक्शन का शिकार भी हुईं है. तो आज हम आपको एक ऐसी एक्ट्रेस के बारे में बताने जा रहे हैं कि जिसके साथ फिल्म की शूटिंग के दौरान ऐसा कुछ हुआ था जिसके बाद लोगों की आंखे झुंक गईं थी.

दरअसल डिंपल कपाड़िया के साथ एक फिल्म की शूटिंग के दौरान ऐसा कुछ हुआ कि जिसके बाद वह लोगों के सामने नजर नहीं मिला पाईं. फिल्म की शूटिंग के सेट पर डिंपल वार्डरोब मार्लफंक्शन का शिकार हुईं थीं. 80 के दशक की मशहूर एक्ट्रेस को एक फिल्म के सेट पर वार्डरोब मार्लफंक्शन का शिकार होना पड़ा था. जिसे आज भी याद किया जाता है. डिंपल कपाड़िया फिल्म सागर में वार्डरोब मार्लफंक्शन का शिकार हुईं थीं.

फिल्म सागर में डिंपल ने ऋषि कपूर के साथ काम किया है इसमें उन्होंने कई हॉट सीन भी दिए हैं, लेकिन नहाते समय डिंपल से साथ एक अलग ही हादसा हुआ था.

दरअसल हुआ ये था कि फिल्म सागर की शूटिंग में नहाते समय का सीन शूट हो रहा था, तभी नहाते समय डिंपल की टॉवेल नीचे खिसक गई. इस दौरान फिल्म के सेट पर मौजूद लोगों की शर्म के मारे आंखें नीचें झुक गईं थीं. इसका वीडियो भी इंटरनेट पर जमकर वायरल हुआ था. इस फिल्म में डिंपल ने ऋषि कपूर के साथ कई सीन दिए थे.

आपको बता दें कि डिंपल ने साल 1973 में राजेश खन्ना के साथ शादी कर ली थी. उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री को भी अलविदा कह दिया था. लेकिन, उन्होंने साल 1985 में फिर से फिल्मों में वापसी की. फिल्म ‘सागर’ की उनकी कम बैक फिल्म थी.

ये विघ्नकर्ता : शादी और रिश्तेदारों की आपत्तियां

जो संबंध संसद का वाकआउट से है, वह देव उठने का शादियों से है. देव उठे नहीं कि बैंड बजे नहीं. खबर सुन कर घोडि़यां हिनहिनाने लगती हैं, उस से ज्यादा भाईबंधु हिनहिनाने लगते हैं. शहनाई क्या बजती है, वरवधू के मांबाप के दिलों की धड़कनें बजने लगती हैं. और जब तक सारा जमाना उन धड़कनों को सुन न ले, किसी को चैन नहीं पड़ता.

शादी में वास्तविक समस्याएं कम होती हैं. जो होती हैं, उन का वास्तविकता से कोई संबंध नहीं होता. शादी में समस्याएं उत्पन्न की जाती हैं. विघ्न पड़ने के बाद ही कोई शादी निर्विघ्न संपन्न होती हैं. शादी वाले घरों में हर चेहरा तनाव से ढोलक की तरह तना हुआ होना चाहिए, वरना कई संशय खड़े हो जाते हैं. खासकर लड़की वालों के चेहरे जरा भी ढीले नहीं पड़ने चाहिए, ताकि लड़के वाले जब चाहे उन्हें बजा सकें और उस से उत्पन्न होने वाली गूंज से अपना उठा हुआ ईगो शांत कर सकें.

वैसे, समस्या की शुरुआत तभी हो जाती है जब पहली बार लड़के या लड़की वाले देखने आते हैं. आसपड़ोस, निकटस्थ लोगों के कान एंटीना की तरह 4 इंच लंबे हो कर घर की तरफ मुड़ जाते हैं, यह संकेत पकड़ने के लिए कि रिश्ता पक्का हुआ या नहीं. बिना सैटेलाइट ही ये सूक्ष्म संकेत सूत्र पकड़ लेते हैं कि क्याक्या खामियां निकाल गए हैं, डिमांड क्या रखी है. अलबत्ता तो इन की कृपा से रिश्ता पक्का होता नहीं, क्योंकि विवाह योग्य लड़केलड़की के घरों के पड़ोसियों के यहां पत्थर बहुतायात में पाए जाते हैं, जिन के निशाने अचूक होते हैं. होता हुआ रिश्ता पड़ोसियों के सीने पर सांप लोटने की तरह होता है.

अगर रिश्ता पक्का हो जाए, तो ये उसी दिन से कमर कस लेते हैं. कमर भी किस कदर कसते हैं, इस का राज तब खुलता है जब शादी की तारीख के लिए हलदी की गांठ खुलती है.

भाईबंधु हैं, तो यह उन का जन्मसिद्घ अधिकार है कि वे शादी को निर्विघ्न संपन्न न होने दें. विवाह की जो वेदी सजी है, उस में वे अपनी ओर से परेशानियों का घी डालते रहें ताकि उस से उठने वाला धुआं लड़केलड़की के मांबाप की आंखों में पानी ला दे.

यह पानी भाईबंधुओं के मन की शांति का तरल स्रोत है, जो उन के कलेजों पर ठंडे छीटों के रूप में पड़ता है. विघ्नहर्त्ता भले ही गणेश होंगे, लेकिन इन विघ्नकर्ताओं की मानमनुहार के बिना गणेशजी भी शादी संपन्न नहीं करवा सकते. अब तो इन के नखरे देख कर गणेशजी भी इन्हीं से आग्रह करते होंगे.

खैर, ज्योंज्यों शादी का दिन नजदीक आता है, इन भाईबंधुओं की एकाएक चालढाल बदल जाती है. रूठेरूठे से सरकार नजर आने लगते हैं. उन की उत्सुकता, जिज्ञासा इस बात को ले कर रहती है कि शादी में मनाने के लिए कब, कौन तशरीफ ला रहा है. उसे वहीं धोबीपछाड़ देने की पूरी तैयारी रहती है. जब शादी वाला इन्हें शादी की तारीख की खबर देता है, तो ये इस मुद्रा में आ जाते हैं जैसे संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत व पाक के प्रधानमंत्री आमनेसामने पड़ गए हों.

इन की पहले से ऐंठी हुई गरदनें और ऐंठ जाती हैं, चेहरे पर न के दृढ़भाव उभर आते हैं, मुंह से बोल नहीं फूटते, गोया एकाएक भारत-पाक वार्त्ता अकारण बंद हो गईर् हो. समझदारों को दरअसल संकेत होते हैं कि ये अब शादी में बिना नाजनखरे उठाए, शादी वाले को बिना झुकाए, पगड़ी कदमों में रखवाए बिना आने से रहे. फिर न्योते के बदले में शादी में न आने की शिकायतों का लंबाचौड़ा डौजियर सौंप देते हैं, जिसे देख हतप्रभ शादी वाला सोचता है, न्योता दे कर गलती कर दी या शादी कर के.

खैर, ये बिना जैड प्लस के ही अतिविशिष्ठ की श्रेणी में आ जाते हैं. फिर अगले कुछ रोज तक शादी वाले घर के लोग मिल्खा बने सुबहशाम इन के यहां दौड़ लगाते रहते हैं. आज यह रस्म है, कल तिलक ले कर जाना है, परसों तिलक आएगा, शाम को तेलबान है, आज मेहंदी है, रात को लेडीज संगीत है, रसोई का सामान लाना है. उफ , बहुत काम बाकी हैं, कड़ाही चढ़नी है, टैंट तनना है, कार्ड बंटने हैं.

ज्योंज्यों रस्में निकट आती हैं, इन की मूंछें बढ़ते सैंसेक्स की तरह ऊपर खड़ी होने लगती हैं. वरवधू के मांबाप रुपए की तरह कमजोर और ये महाशय डौलर की तरह मजबूत हो लेते हैं. जरा सा झुकने को तैयार नहीं होते. इन के यहां इतनी हाजिरी देनी पड़ती हैं, जितनी तो सरकारी बाबू एक लाइसैंस के लिए भी नहीं लगवाते. गोया, उन से कोई संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थायी परिषद की सदस्यता पर मुहर लगाने का अनुरोध किया जा रहा हो.

अंत में वरवधू के मांबाप की घोर पराजय घोषणा के बाद ये शादी में तशरीफ ले भी आते हैं, मगर पूरी शादी के दौरान मुंह, पूरियों से ज्यादा, फूले रहते हैं. चाल में एहसान करने के भाव होते हैं, मानो नहीं आते तो लड़की कुंआरी बैठी रहती, इन्हें उपस्थित न पा कर बरात दरवाजे से लौट जाती, लड़के की ताउम्र शादी नहीं होती. बिना वजह की कटुता इतनी ज्यादा होती है कि शादी की रसदार मिठाइयां भी इन के मिजाज में मिठास नहीं घोल पातीं.

भाईबंधु, चाचाताऊ, देवरजेठ, देवरानीजेठानी इत्यादि यों तो निकटतम रिश्ते के नाम हैं, मगर शादीब्याह में इन से अधिकतम दूर भी कोई नहीं होता. गणेश विघ्नहर्ता हैं, तो ये विघ्नकर्ता हैं. इन का एकमात्र उद्देश्य शादी निर्विघ्न, निरापद, आराम से निबटवाने में मदद करने के बजाय अड़चनें पैदा करना होता है.

जिस दिन शादी निबटती है, लड़की के मांबाप का तो कारगिल फतह हो जाता है. इधर, ये सफलता के टाइगर हिल पर अपनी मूंछों का झंडा इस सार्वजनिक घोषणा के साथ गाड़ देते हैं कि गणेश विघ्नहर्ता हैं, तो हम विघ्नकर्ता हैं.

लाल बत्ती उतरने से कम न होगा वीआईपी कल्चर

फौरीतौर पर देखें तो लगता है कि लालबत्ती उतर जाने से वीआईपी कल्चर खत्म हो जायेगा. थोड़ा गहराई में जाये तो दिखता है कि लालबत्ती वीआईपी कल्चर को हाशिये पर ले जाने की पहली सीढ़ी है. हवाई जहाज के सफर से लेकर ट्रेन के सफर तक इसकी छाया का प्रभाव दिखता है. बड़े अफसर और नेता ही नहीं सत्ता पक्ष के पार्टी कार्यकर्ता तक प्रभावी होते हैं. वह भी वीआईपी कल्चर का एक हिस्सा होते हैं. बुंदेलखंड में पार्टी को संबोधित करते खुद सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा कि ‘विकास कामों में हड़बड़ी होने से बीजेपी कार्यकर्ता कानून हाथ में न ले. वे गलत काम की शिकायत अपने जनप्रतिनिधि और पदाधिकारियों से करें. विपक्ष में थे तो धरना प्रदर्शन सब चलता था. अब धरना प्रदर्शन पार्टी कार्यकर्ताओं का काम नहीं है.’

असल में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बहुत ही सरल तरह से बात को समझाने का प्रयास किया है. बहुमत की सरकार बनने के बाद भाजपा के नेताओं से अधिक भाजपा के साथ शामिल किये गये नेता और कार्यकर्ता सत्ता की हनक दिखा कर ठेका, रिश्वत, जमीनों मकानों के कब्जे के लिये झगड़ों को सुलझाने की आड़ में अफसरों से साठगांठ करने लगे हैं. यह दुखद हालात बन रहे हैं. जिस तरह का आरोप समाजवादी पाटी के कार्यकर्ताओं पर लग रहा था अब भाजपा में शामिल हुये कार्यकर्ता करने लगे हैं. भाजपा विधायक महेन्द्र सिंह यादव का टोल कर्मचारियों से मारपीट करना छोटा उदाहरण भर है. सरकार बनने के बाद कुछ लोग सरकार की छवि को दागदार बना रहे हैं. असल में इस वीवीआईपी कल्चर पर रोक जरूरी है.

केन्द्र सरकार ने वीआईपी कल्चर को कम करने के लिये लाल बत्ती लगी गाडियों से लालबत्ती उतराने का काम किया है. केन्द्र सरकार ने अमल के लिये 1 मई का समय दिया था. उसके पहले ही तमाम लोगों ने अपनी गाड़ियों से लालबत्ती उतारने का काम शुरू किया. लाल बत्ती कल्चर तभी खत्म होगा जब सत्तापक्ष के नेता, उनके समर्थक और अवसरवादी नेता तो भाजपा में सरकार बनने के समय शामिल हुये वह सयंम के साथ काम करे. अस्पताल जैसी जगहों पर जहां लोग लाइन में लगे हो संयम से काम ले. सड़क पर अपने वाहन से चलते समय दूसरी गाड़ियों को ठीक से पास दे.

केवल कानून बना देने या लालबत्ती उतारने से यह काम नहीं होने वाला. इसके लिये व्यवहार में बदलाव लाना होगा. खासकर सत्ता पक्ष और उससे जुड़े लोग सहनशीलता का प्रदर्शन करे और न्याय का साथ दे. लालबत्ती और हूटर का विरोध नया नहीं है. समय समय पर कई बार इसको रोकने और कम करने के प्रयास हुये हैं. इस प्रयास का सार्थक प्रभाव तभी दिखेगा, जब सत्ता पक्ष के लोग संयम से रहेंगे और अपने बीच में छिपे ऐसे लोगों को पहचान कर बाहर करेंगे जो पार्टी में घुसपैठ कर पार्टी की छवि को प्रभावित कर रहे हैं.

यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ का मिशन

उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गृहप्रवेश करते समय उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री निवास में शुद्धिकरण हवन कराया और वास्तुदोष निकलवाए. देश की जनता के बड़े हिस्से को, पिछले 50 सालों में, जम कर वास्तुशास्त्र बेचा गया है और इस में वैज्ञानिकों, विचारकों, बुद्धिजीवियों तक को नहीं छोड़ा गया, आम धार्मिक कर्मकांडों के बीच पलेबड़े लोगों का तो कहना ही क्या. धर्म का धंधा अब जम कर फूलेफलेगा, इस में संदेह नहीं है.

लेकिन, इस बारे में शिकायत करने की बड़ी गुंजाइश नहीं है. धर्मों ने दुनियाभर में एक बार फिर मानसिक लड़ाई जीत ली है. मुसलिम देश तो ‘घर फूंक तमाशा देख’ कर खुश हो रहे हैं. उन के लिए धर्म बंदूकों की गोलियों और बमों के धमाकों से ही स्थापित होता है. मुसलिम अरब देशों के लाखों घरों में मुसलमान ही मौत का संदेश पहुंचा चुके हैं. और साथसाथ वे यूरोप व अमेरिका में घुसपैठ भी कर रहे हैं.

अमेरिका और यूरोप में धर्म की फौज का मुकाबला करने के लिए जो जनमत तैयार हो रहा है, उस का नेतृत्व ईसाई चर्च कर रहा है. तार्किकता, व्यावहारिकता, दूरगामी सोच छोड़ कर धर्म की सत्ता को नमन पूरे यूरोप और अमेरिका में किया जा रहा है तो भारत कैसे पीछे रह सकता है जहां धर्मजनित वर्र्णव्यवस्था, जातिव्यवस्था, रीतिरिवाज, अनुष्ठान, हवन, पूजापाठ, उत्सव, आयुर्वेद आदि जिंदगी का हिस्सा हमेशा ही बने रहे हैं. भारत के जिन राज्यों में कम्युनिस्टों ने लंबे समय तक सरकारें चलाईं वहां भी धर्म का प्रचारप्रसार कम नहीं हुआ, बल्कि बढ़ा ही है.

उत्तर प्रदेश में पहले मुख्यमंत्री भी ऐसा कर चुके हैं. फर्क इतना है कि वे सफेद खादी पहनते थे. धर्म के बारे में उन की भी मानसिक गुलामी इसी तरह की थी. विकास की बातें तो हमेशा ही दूसरे दरजे पर रही हैं. लोगों को सुख न राम या शिव मंदिर बनाने से मिलता है, न अंबेडकर स्मारक. लोगों को जिस से सुख मिलता है वह कुछ और ही है और चाहे सरकारें वैज्ञानिक अधार्मिक सोच से पैदा हुई तकनीक के कारण उस को उपलब्ध करा भी देती हों, लेकिन फिर भी वे ढिंढोरा अपने धार्मिक क्रियाकलापों का करती रही हैं.

योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने पर जो लोग आश्चर्य प्रकट कर रहे हैं उन्हें समझना चाहिए कि इस देश के अधिकांश मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री इसी मिट्टी के बने हैं.

उत्तर प्रदेश का कुछ बनेगा या बिगड़ेगा, तो यहां के लोगों की मेहनत से ही. इस का तो पहले के मुख्यमंत्री भी कोई रास्ता तैयार नहीं कर रहे थे. नए करें या नहीं, कोई फर्क नहीं पड़ता.

देश की जनता को अपने लिखे भाग्य पर इतना अंधा भरोसा है कि वह किसी भी नेता को दोष देने को तैयार ही नहीं हैं. तभी तो हारे हुए नेता पार्टियों पर कब्जा जमाए रखते हैं और जिन की उम्मीद नहीं होती, वे मंत्री, मुख्यमंत्री बन जाते हैं.

भोजपुरी सिनेमा : न भोजपुर का, न मुंबई का

भोजपुरी सिनेमा ने भले ही 5 दशक से ज्यादा का सफर पूरा कर लिया है लेकिन उसके खाते में 10-12 बेहतरीन फिल्में भी नहीं है. हर साल 50 से ज्यादा भोजपुरी फिल्में बन रही हैं लेकिन हिन्दी फिल्मों की अंधी नकल की वजह से वह न तो प्योर भोजपुरी रह पाती है और न ही पूरी तरह से मुंबईया फिल्में ही बन पाती हैं. हिंदी फिल्मों की घटिया नकल कर भोजपुरी फिल्मकारों ने भोजपुरी फिल्मों का यह हाल कर दिया है कि उसमें भोजपुरी बोली के अलावा कुछ भी भोजपुरी नहीं रह गया है. इसे भोजपुरी फिल्मकारों का दिमागी दिवालियापन ही कहा जाएगा कि वे भोजपुरी फिल्मों का नाम तक हिंदी में ही रखने लगे हैं.

पहली भोजपुरी फिल्म ‘गंगा मइया तोहरे पियरी चढ़इबो’ थी, जो 5 फरवरी 1962 में रीलीज हुई थी. 5 लाख रूपए में बनी उस फिल्म ने 75 लाख रूपए की कमाई की थी. विश्वनाथ प्रसाद शहाबादी की बनाई उस फिल्म को मिली भारी कामयाबी के बाद तो भोजपुरी सिनेमा का रास्ता ही खुल गया और धड़ाधड़ एक के बाद एक भोजपुरी फिल्में बनने लगीं. “संईया से भइल मिलनवा”, “तुलसी सोहे तोहार अंगना”, “सोलहो सिंगार करे दुलहनिया”, “बिदेसिया”, “पान खाए सैंया हमार”, “लागी नहीं छूटे राम” जैसी कई फिल्में सामने आई और भोजपुरी सिनेमा को नई ताकत मिली. बाद में यह हाल हुआ कि भोजपुरी सिनेमा माई, गंगा, भौजी, संईया, देवर आदि के नामों और किरदारों में उलझ कर रह गई. इससे आगे की सोच न होने की वजह से 1970 के आते-आते भोजपुरी सिनेमा की गाड़ी पूरी तरह से लड़खड़ा गई.

साल 1977 में हिन्दी सिनेमा के खलनायक रहे सुजीत कुमार और वैंप एवं छोटे-मोटे रोल करने वाली प्रेमा नारायण भोजपुरी फिल्म “दंगल” में हीरो-हीरोइन बन कर आए. ‘दंगल’ भोजपुरी की पहली रंगीन फिल्म थी. ‘दंगल’ के गाना ‘गोरकी पतरकी रे मारे गुलेलवा जियरा हिल हिल जाए..’ ने तो धमाल ही मचा दिया. उस गाने को मोहम्मद रफी और आशा भोंसले ने आवाज दी थी.

उसके बाद राकेश पांडे और पदमा खन्ना की जोड़ी ‘बलम परदेसिया’ लेकर आई, जिसने कामयाबी के झंडे गाड़ डाले. उसके बाद “धरती मैया”, “दूल्हा गंगा पार के”, “दगाबाज बलमा”, “संईया मगन पहलवानी में”, “हमार दूल्हा” जैसी बीसियों भोजपुरी फिल्में बनीं पर कोई खास धमाल नहीं पैदा कर सकीं. उसके बाद एक बार फिर भोजपुरी फिल्म इंडस्ड्री ‘कोमा’ में चली गई.

‘ससुरा बड़ा पइसावाला’ साल 2003 में आई और उसने भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में एक बार फिर जान डाल दी. बिहार के भोजपुरी गायक मनोज तिवारी और रानी चटर्जी की इस फिल्म को मिली कामयाबी ने भोजपुरी सिनेमा के पर्दे को फिर से चमकदार बना दिया. उसके बाद तो एक बार फिर भोजपुरी फिल्मों की झड़ी लग गई. फिल्म वितरक विनोद पांडे कहते हैं कि भोजुपरी सिनेमा की बढ़ती लोकप्रियता का ही नतीजा था कि अमिताभ बच्चन, अजय देवगन, जैकी श्रापफ, शत्रुघ्न सिन्हा, जितेंद्र, रति अग्निहोत्री, नगमा, भाग्यश्री, भूमिका चावला जैसे बॉलीवुड के कलाकारों ने इसमें काम किया. इतना ही नहीं भोजपुरी सिनेमा ने कुणाल सिंह, राकेश पांडे, मनोज तिवारी, रवि किशन, दिनेशलाल यादव ‘निरहुआ’, सुदीप पांडे, पवन सिंह, राकेश मिश्रा, खेसारीलाल, पाखी हेगड़े, रानी चटर्जी, मोनालिसा, श्वेता तिवारी, दिव्या देसाई, रिंकू घोष जैसे कई कलाकारों ने खूब दौलत और शोहरत कमाई.

भोजपुरी फिल्मों के वितरक विनोद पांडे कहते हैं कि हिंदी सिनेमा की कोरी नकल, फूहड़ डायलॉग और गीतों ने भोजपुरी सिनेमा का बहुत कबाड़ा किया है. इस वजह से ज्यादातर लोग परिवार के साथ फिल्म देखने से कतराते हैं. भोजपुरी फिल्में बनाने और उससे जुड़े लोगों का वहीं घिसा-पिटा तर्क है कि जो दर्शक देखना चाहता है, वही वे परोसते हैं. हीरो रवि किशन कहते हैं कि भोजपुरी सिनेमा के पॉजिटिव चीजों को देखा जाना चाहिए.

लोग अपनी सोच और बाजार के हिसाब से फिल्में बनाते हैं. एक बार जो चीज चल गई उसे ही कामयाबी की गारंटी मान लेना फिल्मकारों की बहुत पुरानी बीमारी है. जो करोड़ों रूपए खर्च कर फिल्म बनाएगा वह कमाई का ख्याल तो रखेगा ही. पब्लिक की पसंद के हिसाब से फिल्में बनती है. भोजपुरी फिल्मों की वजह से ही बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश के सैंकड़ों सिनेमा हॉल बंद होने से बच गए.

भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोग भले ही कुछ भी दावे कर लें पर यह सच है कि भोजपुरी सिनेमा को वह दर्जा नहीं मिल सका है, जो तमिल, तेलगू, मलयाली, बंगला, कन्नड़, मराठी फिल्मों को हासिल हो चुका है.

भोजपुरी फिल्मों के नामी विलेन उदय श्रीवास्तव कहते हैं कि इस इंडस्ट्री में बाहरी लोगों के घुसने से भोजपुरी फिल्मों की पहचान खत्म हो गई है. साउथ के लोग इसलिए भोजपुरी फिल्म बनाने लगे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे काफी ज्यादा कमाई है. वैसे लोगों को भोजपुरी की माटी की खूबी, उसकी संस्कृति और पहचान आदि से कोई लेना देना नहीं होता है. वह यही समझते हैं कि केवल भोजपुरी बोली में फिल्म बना देने से वह भोजपुरी फिल्म हो जाती है. आज के भोजपुरी फिल्मों में हिंसा और खून-खराबा की भरमार होने से औरतें ऐसी फिल्मों से कट चुकी हैं, जिससे फिल्में चल नहीं पाती हैं.

भारत समेत मॉरीसश, फिजी, सूरीनाम, त्रिनिनाड आदि देशों में करीब 25 करोड़ लोग भोजपुरी बोलने-समझने वाले हैं. देश में बिहार और उत्तर प्रदेश में भोजपुरी बोलने वाले सबसे ज्यादा है. महाराष्ट्र, पंजाब, चंडीगढ़, गुजरात आदि राज्य भी भोजपुरी सिनेमा के बड़े बाजार हैं क्योंकि बिहार और उत्तरप्रदेश के हजारो-लाखों लोग वहां के कल-कारखानों में काम करते हैं. भोजपुरी सिनेमा के हीरो राजीव मिश्रा कहते हैं कि परदेश में अपनी बोली की फिल्म देख कर लोग अपने गांव की मिट्टी की खूबी जैसा आनंद लेते हैं. इसी वजह से दूसरे राज्यों में भी भोजपुरी फिल्में काफी चलती हैं. वहीं मिटटी की खूबी आज की भोजपुरी फिल्मों से पूरी तरह से गायब हो चुकी है और उसकी जगह पूरी तरह से मुंबईया फिल्मों के स्टाइल ने ले ली है.

हिंदी वाले भी अंग्रेजी टाइटल क्यों रखते हैं : राकेश मिश्रा

भोजपुरी फिल्मों के सुपर स्टार राकेश मिश्रा भोजपुरी फिल्मों के हिन्दी टाइटल रखने के चलन के बारे में कहते हैं कि इसमें कोई खराबी नहीं है. साउथ के कई हिट फिल्में हिन्दी में बन रही है और ढेरों मुंबईया फिल्मों के नाम अंग्रजी में रखे जाते हैं. फिल्म बनाने वाला और फायनेंसर यही चाहता है कि किसी भी तरह से उसकी फिल्में हिट हो और उन्हें मुनाफा मिल सके. इसके लिए वह हर हथकंडा अपनाता है. राकेश का दावा है कि भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री ने खूब तरक्की की है और आज भी उसकी कामयाबी का सफर जारी है. कई फिल्मों के ओवर बजट होने की वजह से इंडस्ट्री को थोड़ा झटका लगा था पर अब सब कुछ पटरी पर लौट आया है. हर इंडस्ट्री में कामयाबी के बाद उठा-पटक और बदलाव का दौर आता है. भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री नई तकनीक और पुरानी परंपरा के बीच छटपटा रही है और जल्द ही इसमें भी बदलाव दिखाई देगा.

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