मासूमों से हवस पूरी करने की घिनौनी प्रवृत्ति

उत्तर प्रदेश के उन्नाव में 62 साल के एक बुजुर्ग ने 7 साल की मासूम बच्ची को अपनी हवस की आग में झोंक दिया. यह बुजुर्ग अपनी वासना की पूर्ति के लिए उस बच्ची को अश्लील फिल्में दिखाता था. बच्ची के मना करने पर उसे जान से मारने की धमकी दे कर डराता रहता था. घटना 2 नवंबर, 2017 की है. इस से पहले भी वह इस बच्ची को बहलाफुसला कर अपने घर ले जा चुका था.

इस बार उस ने बच्ची के साथ दुष्कर्म किया तो मां को बच्ची की सहमी हालत देख कर शक हुआ. बहुत पूछने पर बच्ची ने मां को सच बताया तो उस के पैरों तले जमीन ही खिसक गई. जब मां ने पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई तब जा कर बुजुर्ग की असलियत खुली.

नवंबर माह में ही हाथरस के शिक्षक ने भी 7 साल की मासूम लड़की, जोकि उस के पास ट्यूशन पढ़ने आई, को अपनी हवस का शिकार बना डाला.

गुरुशिष्य के रिश्ते को तारतार करने वाली ऐसी घटना और पड़ोसी बुजुर्ग की हरकत बताती हैं कि मासूमों से हवस पूरी करने की घिनौनी प्रवृत्ति कम नहीं हो रही है. एक शिक्षक जब ऐसी करतूत करता है तो यह कहना गलत नहीं होगा कि ऐसे यौन अपराध सिर्फ अशिक्षित व निम्नवर्गीय तबकों में ही नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग में होते हैं. बच्चों को ऐसे हैवानों से बचाने के लिए कानूनी उपायों के अलावा आम लोगों को जागरूक होना पड़ेगा.

ये भी हैं शिकार

मशहूर सितारवादक अनुष्का शंकर भी बचपन में बाल यौनशोषण की शिकार हुई थीं. बकौल अनुष्का शंकर, ‘‘मैं बचपन में छेड़छाड़ व विभिन्न प्रकार के शारीरिक शोषण का शिकार हुई. मुझे नहीं पता था, इस से किस प्रकार निबटना है. मुझे नहीं पता था कि इसे कैसे रोका जा सकता था. बतौर महिला, मुझे लगता है कि मैं ज्यादातर समय भय के साए में रहती हूं, रात में अकेले बाहर निकलने में डरती हूं, घड़ी का समय पूछने वाले व्यक्ति को जवाब देने में डरती हूं. इसी प्रकार की तमाम अन्य बातें हैं जिन से मुझे डर लगता है.’’

महिला अधिकारों के लिए खुल कर बोलने वाली अभिनेत्री कल्कि कोचलिन ने भी अपने बचपन के दुखद हिस्से को बयान किया. एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि वे अपनी कहानी सुना कर सुर्खियां नहीं बटोरना चाहती थीं. यह तो उन के जीवन की सचाई है और उन्होंने इसे लंबे वक्त तक झेला है.

टैलीविजन की मशहूर हस्ती ओपरा विनफ्रे को भावुक इंटरव्यू लेने के लिए जाना जाता है. लेकिन डेविड लैटरमैन के शो में जब वे पहुंचीं तो उन की जिंदगी के बारे में जान कर लोगों की आंखें भर आईं. ओपरा का 9 साल की उम्र में एक रिश्तेदार ने बलात्कार किया. 10 से 14 वर्ष की उम्र तक उन का शोषण होता रहा.

ये मशहूर हस्तियां हैं जिन को हम सभी जानते हैं, ये गिनेचुने नाम ही हैं. कुछ ही लोग खुल कर कह पाते हैं लेकिन ज्यादातर लोग अपने इस दर्द को कह नहीं पाते. वे शर्मिंदगी के साथ जीवन जीते रहते हैं. हालांकि दोष उन का नहीं, फिर भी वे अपने साथ हुई घटना में खुद को अपराधियों की तरह महसूस करते हैं. दरअसल, हमारा समाज, हमारी मानसिकता ऐसी हो गई है कि हम उन्हें हेयदृष्टि से देखने लगते हैं, बातें बनाते हैं. हम ऐसे लोगों को समाज की मुख्यधारा से जुड़ने का अधिकार क्यों छीन लेते हैं.

स्कूल व परिवार

परिवार वाले अपने बच्चों के साथ घटने वाली यौनशोषण की घटनाओं को छिपा लेते हैं और बच्चों के ऊपर ही पहरा सा लगा देते हैं जिस कारण बच्चा उन चिंताओं से उबर ही नहीं पाता. सभ्य समाज का हिस्सा होते हुए भी हमारे नौनिहाल अपनों से ही सुरक्षित नहीं. जिन शिक्षण संस्थानों में बच्चों को भविष्य निर्माण के लिए भेजा जाता है उन शिक्षण संस्थानों में भी वे अब सुरक्षित नहीं हैं.

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के मुताबिक, बीते 3 सालों में स्कूलों के भीतर बच्चों के साथ होने वाली शारीरिक प्रताड़ना, यौनशोषण, दुर्व्यवहार और हत्या जैसी घटनाओं में तीनगुना बढ़ोतरी हुई है. शिक्षकों और स्कूल कर्मचारियों द्वारा ही बच्चों के उत्पीड़न की घटनाएं पिछले कुछ सालों में काफी बढ़ी हैं. बाल सुरक्षा एक्ट 2012 के अस्तित्व में आने के बाद ऐसे मामले ज्यादा सामने आए हैं.

एक सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, अमूमन बाल यौनशोषण व लड़कियों के साथ होने वाली यौनहिंसा में 90 प्रतिशत पहचान वालों के जरिए ही ये अपराध अंजाम पाए जाते हैं. यानी सब से ज्यादा अपने बच्चों को सुरक्षा अपनों से देनी है. कितनी अजीब बात है न कि जिन अपनों पर हम आंख मूंद कर विश्वास करते हैं वे ही इस तरह की चोट दे जाते जो जिंदगीभर सालती रहती है.

सवाल यह उठता है कि छोटे बच्चों को हम किस तरह से समझाएं कि उन के कोमल मन पर हमेशा दुश्चिंताएं न शामिल हों या कोमल मन में कोई ऐसा प्रभाव न पड़े कि वे डरेसहमे रहें और उन के नैसर्गिक विकास में कोई प्रभाव पड़े.

अपने बच्चों को एक मां बेहतर तरीके से समझा सकती है कि गुड टच और बैड टच क्या होता है. अगर कोई उन को छूता है, तो वह छुअन बुरी भी होती है. उस से कैसे बचें, छोटे बच्चों को उन के शारीरिक संरचना के जरिए समझाया जा सकता है कि मम्मी के अलावा कोई दूसरा उन के शरीर के कोमल अंगों को हाथ नहीं लगा सकता और न वे ही किसी दूसरे को गलती से या खेल में यहां छू सकते हैं.

अकसर घर के बड़े सदस्य बच्चों की बातें नहीं सुनते हैं. छोटे बच्चों से संवाद बेहद जरूरी है. वे स्कूल में क्या पढ़ते हैं? कौन सी टीचर या सर उन के साथ कैसा व्यवहार करते हैं? किस के साथ खेलतेकूदते हैं आदि ये सब बातें बच्चों से रोजाना पूछनी हैं. बच्चा चाव से अपनी बातें बताना चाहता है लेकिन अकसर पेरैंट्स उन्हें या तो खेलने के लिए कह देते हैं या चुप रहने को कह देते हैं. कहने का अर्थ सिर्फ इतना है कि अपने बच्चों से संवाद बनाए रखिए ताकि वे अपने साथ घटित सभी बातें बताएं.

खुद करें पहल

बच्चों से अपने उन रिश्तेदारों को दूर रखिए, बच्चे जिन्हें पसंद नहीं करते. अकसर हम देखते हैं कुछ परिचित बच्चों को चूमना, कस के पकड़ना या फिर उन के गालों को चिकोटी काटते हैं. हमारी नजर में वह उन के प्यार जताने का तरीका है लेकिन बच्चे अच्छी बुरी छुअन को महसूस कर लेते हैं. अगर बच्चा पसंद नहीं करता है ये सब, तो अपने परिचित को रोकिए. अपने बच्चे के दिल को पढ़ना सीखिए.

आप का बच्चा अगर दैनिक क्रियाकलाप से हट कर कोई व्यवहार करता है, ज्यादा चुप है, अपने किसी अंग में दर्द बता रहा है या रात में चौंक रहा है, किसी खास परिचित को देख के सहम रहा है तो तुरंत उस का मन टटोलिए. कहीं कुछ अनचाही घटना घटित न हुई हो. कुछ भी अप्रिय किसी परिचित या अनजाने से भी हुआ है तो पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराइए. लोकलाज का भय या बच्चे को गलत न समझिए. बच्चे को घर में बंद कर देना, उस को ही डांटना गलत होगा. कोमल मन ने वैसे ही बहुतकुछ सहा है, उस पर उसी को अपराधियों की तरह जिंदगी जीने के लिए मजबूर करना अन्यायपूर्ण होगा. साथ ही, बच्चे की काउंसलिंग भी कराइए. पारिवारिक प्यार के साथ उस के मन पर पड़े घाव को काउंसलर की भी जरूरत होती है जो उस के बालमन पर पड़ी चोट के दबाव को हटा कर जिंदगी की तरफ मोड़ सके.

अपनी सुरक्षा बच्चे स्वयं कर सकें, इस के लिए उन्हें मूलभूत बातों को बताएं, उन्हें समझाएं. हो सके तो सैल्फ डिफैंस के लिए मार्शल आर्ट भी सिखाएं. मजबूत मन के साथ एक मजबूत तन की भी जरूरत है. इसलिए, जरूरी है बच्चों को नैतिकता का पाठ पढ़ाया जाए. उन्हें वह शिक्षा दी जाए कि वे मजबूत किरदार व एक आदर्श इंसान बनें.

भाजपा की दुखती रग युवा दलित सावित्री बाई फूले

उत्तर प्रदेश की बहराइच लोकसभा सीट से 2014 में सांसद चुनी गईं सावित्री बाई फूले भाजपा की दुखती रग बन चुकी हैं. भाजपा को सावित्री बाई फूले पहले बहुत पसंद थीं. भाजपा के ही टिकट पर वे साल 2012 में विधायक चुनी गई थीं. सावित्री बाई फूले धर्म से तो प्रभावित थीं ही, उस के प्रभाव में वे भगवा कपड़े भी पहनने लगीं. उन का पूरा नाम साध्वी सावित्री बाई फूले है.

37 साल की सावित्री बाई फूले भगवा कपड़े भले ही पहनती हों पर वे दलित विचारधारा में पूरा यकीन रखती हैं. यही विचारधारा भाजपा और सावित्री बाई फूले के बीच टकराव का कारण बन रही है. भाजपा का एक वर्ग आरक्षण और दलित कानून को ले कर संविधान में बदलाव की बात कर रहा है वहीं दूसरी ओर सावित्री बाई फूले संविधान में इस संबंध में बदलाव को गैरजरूरी मानती हैं. वे इस के खिलाफ संसद से ले कर सड़क तक मुखर हैं.

सावित्री बाई फूले भारतीय संविधान और आरक्षण बचाओ महारैली कर के दलित मुद्दों पर अपनी आवाज मुखर कर रही हैं. दलित वर्ग से आने वाली सावित्री बाई फूले कहती हैं, ‘‘बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर और संविधान ने हमें राजनीति में आने व चुनाव लड़ने लायक माहौल और ताकत दी. हम सुरक्षित सीट से चुनाव इसलिए लड़ सकते हैं क्योंकि यह संविधान ने अधिकार दिया है. हम दलित समाज और बाबासाहेब की नीतियों से समझौता नहीं कर सकते. हम ने विधानसभा से ले कर संसद तक में अपनी बात रखी. आज सड़कों पर जनता के बीच भी अपनी बात रख रही हूं. हम किसी भी तरह के डर से चुप नहीं रह सकते. मेरी लड़ाई दलित, आरक्षण और संविधान को ले कर है. इस को मैं जारी रखूंगी.’’

रूढि़वादी सोच के खिलाफ

सावित्री बाई फूले का जन्म 1 जनवरी, 1981 को बहराइच जिले के नानपारा में हुआ था. दलित परिवार में जन्म लेने की वजह से बचपन से ही उन को कई तरह की कुरीतियों का सामना  करना पड़ा. जब वे 6 साल की थीं, उन का विवाह तय कर दिया गया. उन को बचपन में तो इस बात का पता ही नहीं चला. जब गौना और विदाई की बात आई तो उन्होंने इस का विरोध किया और अपनी बहन की शादी अपने पति से करा दी व खुद संन्यास ले कर समाज के काम में लग गईं.

10 साल की उम्र में ही सावित्री बाई फूले ने संन्यास ले लिया. वे भजन और धार्मिक गीत गाने लगीं तथा एक साध्वी की तरह रहने लगीं. सावित्री बाई फूले जो भगवा कपड़े पहनती हैं उन्हें वे अब हिंदू धर्म से न जोड़ कर, बौद्ध धर्म की विचारधारा से जोड़ती हैं.

सावित्री बाई फूले बसपा प्रमुख मायावती को अपना रोलमौडल मानती हैं. इस की एक प्रमुख वजह भी है. सावित्री बाई फूले बताती हैं, ‘‘उस समय मैं कक्षा 8 में पढ़ रही थी. अच्छे नंबरों से पास होने के चलते मुझे 480 रुपए की छात्रवृत्ति मिली थी. स्कूलटीचर ने मुझे छात्रवृत्ति न देने के लिए कक्षा 9 में प्रवेश नहीं लेने दिया. उस समय उत्तर प्रदेश में बसपा सरकार थी और मायावती मुख्यमंत्री थीं. मैं उन से एक सभा में मिली. अपनी परेशानी उन्हें बताई. मायावती ने शिक्षा विभाग के अधिकारी से कह कर न केवल मुझे पैसे दिलवाए, बल्कि स्कूल में प्रवेश भी दिलाया. इस के बाद मैं मायावती के कार्यक्रमों में आनेजाने लगी. यहीं से मेरी रुचि राजनीति में शुरू हो गई. मैं अपनी पढ़ाई के साथसाथ महिलाओं को साक्षर व मजबूत बनाने में लग गई.’’ सावित्री बाई फूले की राजनीति बहुजन समाज पार्टी के साथ शुरू हुई थी.

राजनीति के जरिए समाजसेवा

सावित्री बाई फूले गरीब औरतों की तरक्की के लिए बहराइच जिले के नानपारा में जनसेवा आश्रम चलाती हैं. इस के साथसाथ वे सखी समाज उत्थान सेवा समिति भी चलाती हैं. सावित्री बाई ने बलहा, नानपारा और बहराइच जैसे अभावग्रस्त और पिछड़े इलाकों में काम करना शुरू किया. औरतों को वहां किसी तरह का अधिकार प्राप्त नहीं था. महिलाओं के समूह को तैयार करने के बाद सावित्री बाई फूले को लगा कि उन को समाजसेवा के साथ राजनीति भी करनी चाहिए. इस की वजह बताते हुए वे कहती हैं, ‘‘महिलाओं की मदद के लिए जब मैं सरकारी अफसरों और अन्य लोगों से मिलती थी तो वे बात को गंभीरता से नहीं लेते थे. मैं ने साल 2000 में भाजपा जौइन कर ली. इस के बाद 2001 में मैं ने जिला पंचायत सदस्य का चुनाव लड़ा और जीती. मैं ने लगातार साल 2012 तक जिला पंचायत की सदस्या के रूप में काम किया.’’

अपने काम के बल पर सावित्री बाई फूले ने साल 2012 में बलहा विधानसभा क्षेत्र से विधायक का चुनाव लड़ा. पहली बार भाजपा के टिकट पर ही विधायक बनीं. वे अपने विधानसभा क्षेत्र की पहली महिला विधायक बनीं. साल 2014 में लोकसभा चुनाव के समय भाजपा ने जब जीतने वाले सदस्यों को लोकसभा चुनाव लड़ाने का फैसला किया तो सावित्री बाई फूले को बहराइच लोकसभा क्षेत्र से टिकट दिया गया. विधायक बनने के बाद भी सावित्री बाई फूले औरतों व लड़कियों की शिक्षा के लिए काम करती रही थीं.

वे कहती हैं, ‘‘मैं विधानसभा सदन के बाद अपना पूरा समय इन लोगों के बीच ही बिताती थी. कोई भी, कभी भी मुझ से संपर्क कर मिल सकता है. मैं गांव के विकास पर पूरा ध्यान देती रही. मेरा मानना था कि गांव, गरीब और किसान का भला जिस दिन हो जाएगा, उस दिन समाज खुशहाल हो जाएगा. यही वजह थी कि मैं सांसद का चुनाव भी जीत गई.’’

विचारों में द्वंद्व

सांसद बनने के बाद सावित्री बाई फूले संसद में सामाजिक न्याय और सशक्तीकरण कमेटी की सदस्य बनाई गईं. इस के साथ मानवाधिकार और महिला सशक्तीकरण की अलगअलग कमेटियों में भी वे सदस्य बनीं. सावित्री बाई फूले को सामाजिक कार्य और महिला सशक्तीकरण पर काम करना पसंद है.

अपने जनसेवा आश्रम के जरिए वे महिलाओं को अलगअलग तरह के रोजगार उपलब्ध कराने का काम करती हैं, जो हस्तशिल्प जैसे काम से जुड़ा होता है.

सावित्री बाई फूले कहती हैं, ‘‘मेरे लिए पार्टी के विचारों के साथ संविधान और आरक्षण को बचाए रखना भी जरूरी है.’’ यहीं से भाजपा और सावित्री बाई फूले के बीच विचारों का मतभेद खुल गया.

भाजपा डा. भीमराव अंबेडकर के भगवाकरण के प्रयास में है, जबकि उस की ही सांसद सावित्री बाई फूले इस के खिलाफ हैं. उन का कहना है कि डा. अंबेडकर सदा से ही मूर्तिपूजा और आडंबर के खिलाफ रहे हैं. ऐसे में उन की मूर्ति का रंग बदलना, नहलाना उन

के विचारों का अपमान करना है. अंबेडकर का सपना था कि दलित देश में अपने अधिकार और रोजगार के साथ सम्मानपूर्वक रहे. इस के लिए उसे आरक्षण का अधिकार दिया गया.

संविधान के तहत दलित और पिछड़ा समाज को जो अधिकार दिए गए, आजादी के बाद की सरकारों ने उन्हें यह हक

देने में न्याय नहीं किया. फलस्वरूप, यह समाज आज भी गरीब है. आज दलित के साथसाथ अंबेडकर को भी राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है. अंबेडकर के स्वाभिमान से किसी भी तरह की छेड़छाड़ समाज स्वीकार नहीं करेगा.

भाजपा के साथ अपने विचारों के मतभेद पर सावित्री बाई फूले कहती हैं, ‘‘मैं भाजपा के ही टिकट पर पहले विधायक बनी, फिर सांसद चुनी गई. हमारा पार्टी से कोई मतभेद नहीं है. हमें बाबासाहेब द्वारा संविधान में दिलाए गए अधिकार के तहत सुरक्षित सीट से चुनाव लड़ने का मौका मिला.

‘‘हम भाजपा के टिकट पर चुनाव जीत कर आए हैं और चुनाव जीतने वालों को अपनी बात रखने का पूरा हक होता है. पार्टी से कहीं अधिक हमारी जवाबदेही क्षेत्र की जनता के साथ है. हम सुरक्षित सीट से चुनाव जीते. वहां के लोगों की बात तो करेंगे ही. सरकार से हम उम्मीद करते हैं कि वह हमारी बात सुनेगी और न्याय करेगी.’’

नहीं बदला काम का तरीका

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में नमो बुद्धाय जन सेवा समिति के तत्त्वावधान में आयोजित भारतीय संविधान और आरक्षण बचाओ महारैली में सावित्री बाई फूले शामिल हुईं. उन्होंने साफ किया कि वे पार्टी से अधिक अपने मतदाताओं के प्रति जवाबदेह हैं. वे इस के पहले भी दलित और संविधान पर अपनी राय सब के सामने रखती रही हैं.

विधायक और फिर सांसद बनने के बाद भी सावित्री बाई फूले में कोई बदलाव नहीं आया है. वे अभी भी भगवा कपड़े पहनती हैं और बेबाकी से दलित व संविधान के मुद्दे पर बोलती हैं. आज भी वे सादा भोजन करती हैं. उन के आवास पर आज भी मसाला और चटनी पीसने के लिए सिल व बट्टे का प्रयोग होता है. अपने मिलने वालों को वे पूरा समय दे कर उन की बातें सुनती हैं जिस से लोग उन से जुड़ने का प्रयास करते हैं.

भाजपा में दलित नेताओं की संख्या कम नहीं है. सावित्री बाई फूले के अलावा दूसरा कोई दलित नेता खुल कर नहीं बोल रहा है. सावित्री बाई आरक्षण में भी आरक्षण के खिलाफ हैं. वे कहती हैं, ‘‘दूसरों की बातें वे जानें. जो आज दलित एक्ट और आरक्षण पर चुप हैं, उन को भी जनता देख रही है. हम अपनी बात कर सकते हैं. मेरा कहना है कि पहले आरक्षण को ठीक से लागू कर दो, फिर उस की समीक्षा करो या जातीय आधार पर जनगणना कर के कोई बदलाव करो. आजादी के इतने सालों बाद भी सही तौर पर आरक्षण लागू नहीं किया गया. इस की जिम्मेदारी दलित समाज की नहीं है. सरकार अपनी जिम्मेदारी पूरी करे, फिर आगे बदलाव की बात हो.

वे कहती हैं, ‘‘संविधान ने दलित और पिछड़ों को अलगअलग अधिकार दे रखे हैं. ऐसे में आरक्षण के अंदर आरक्षण की बात उचित नहीं है. यह आपस में लड़ाने जैसी बात है. जब तक आरक्षण सही से लागू नहीं होता तब तक आरक्षण वैसे ही जारी रहना चाहिए जैसे संविधान ने अधिकार दिए हैं. इस में किसी भी तरह के बदलाव को हमारा समाज स्वीकार नहीं करेगा.’’

मंत्री पद की भूख नहीं

सावित्री बाई फूले के खिलाफ विरोधी पक्ष एक प्रचार अभियान चला रहा है. इस में उन की पार्टी के लोग भी शामिल हैं. ऐसे लोगों का आरोप है कि सावित्री बाई फूले केंद्र सरकार में मंत्री पद न मिलने से नाराज हैं.

वे कहती हैं, ‘‘ऐसा नहीं है. मैं साल 2012 से इन बातों को ले कर मुखर हूं. हर फोरम पर अपनी बात रखती हूं. विधानसभा और संसद में दिए गए मेरे भाषण इस के प्रमाण हैं. किसी भी तरह के पद का मुझे कभी कोई लोभ नहीं रहा. लोभ को छोड़ कर ही मैं ने समाज की सेवा करने का प्रण लिया. पद का लोभ करने वाले नेता अलग होते हैं. हम जनता के लिए काम करते हैं. यही हमारी सब से बड़ी पूंजी है.’’

सावित्री बाई फूले के मुखर विचारों से भाजपा में बेचैनी बढ़ गई है. वे भाजपा की ऐसी दुखती रग बन गई हैं कि जिसे भाजपा सहन नहीं कर पा रही है. भाजपा के लिए मुसीबत वाली बात यह है कि सावित्री बाई फूले की तरह दूसरे दलित नेता भी बगावत कर सकते हैं. ऐसे नेताओं में उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री ओमप्रकाश राजभर का नाम प्रमुख है. जिस तरह से भाजपा का उत्तर प्रदेश में जनाधार घट रहा है उस से भाजपा के नाराज नेताओं को अपनी राह तलाश करना सरल हो जाएगा. भाजपा में रहते हुए भी सावित्री बाई फूले ने जिस तरह से दलित, आरक्षण और संविधान को ले कर अपनी राय मुखर हो कर रखी है, उस से प्रदेश में वे एक अलग दलित नेता के रूप में स्थापित हो रही हैं.

धमाकों से जुड़े कुछ सवाल

शहर में रहरह कर सिलसिलेवार बम धमाके हो रहे थे. चारों तरफ अफरातफरी का माहौल था. मैं टेलीविजन पर नजरें गड़ाए बैठा था. मुन्ना भी वहीं बैठा अपना होमवर्क कर रहा था. अचानक उस ने पूछा, ‘‘पापा, बहुत देर से कोई ब्लास्ट नहीं हुआ है, अगला ब्लास्ट कब होगा?’’

‘‘मैं कैसे बता सकता हूं बेटा?’’

‘‘क्यों पापा, आप इतना टेलीविजन जो देखते हैं.’’

‘‘बेटा, टेलीविजन देखने से ब्लास्ट का पता नहीं चलता.’’

‘‘तो फिर टेलीविजन पर ब्लास्ट कैसे दिखाते हैं?’’

‘‘ब्लास्ट होने पर टेलीविजन वाले वहां पहुंच जाते हैं और उस का फोटो खींचते हैं.’’

‘‘क्या टेलीविजन वाले कहीं भी पहुंच सकते हैं?’’ मुन्ना ने पूछा.

‘‘हां.’’

‘‘नहीं, पापा.’’

‘‘क्यों नहीं, बेटा?’’

‘‘कल हम सुपरमार्केट गए थे न.’’

‘‘हां बेटा, गए तो थे.’’

‘‘वहां कोने में एक भिखारी मर गया था न.’’

‘‘हां, हां.’’

‘‘वहां टेलीविजन वाले क्यों नहीं थे?’’

‘‘बेटा, टीवी वाले तभी पहुंचते हैं जब कोई बड़ा आदमी मरता है या बहुत सारे लोग एकसाथ मरते हैं.’’

तभी टेलीविजन पर प्रधानमंत्री आ गए. वह बम धमाकों के बारे में अपनी प्रतिक्रिया दे रहे थे.

‘‘देखो, यह बहुत बडे़ आदमी हैं,’’ मैं ने टेलीविजन की तरफ इशारा किया.

‘‘यह कौन हैं, पापा?’’

‘‘यह हमारे पी.एम. यानी प्राइम मिनिस्टर हैं.’’

‘‘पर पापा, यह इतने दुबले हैं, बोलते भी इतना धीरेधीरे हैं, तो बड़े आदमी कैसे हुए?’’

‘‘देखो, मैं बताता हूं. तुम स्कूल में धीरे बोलते हो या जोर से?’’

‘‘धीरे से, पापा.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘जोर से बोलने पर मैडम बहुत डांटती हैं, पर पापा, पी.एम. को कौन मैडम डांटती है?’’

मैं कुछ बोलता तभी ब्रेकिंग न्यूज में एक और ब्लास्ट की खबर आई.‘‘पापा, पापा, देखो, एक और ब्लास्ट हो गया,’’ मुन्ना उछल कर ताली बजाते हुए बोला.

‘‘मुन्ना बेटा, ऐसा नहीं करते. देखो, कितने लोग मर रहे हैं, सब को कितनी चोटें आई हैं. देखो, सब अंकलआंटी कैसे रो रहे हैं.’’

इतने में टेलीविजन पर गृहमंत्री का इंटरव्यू आने लगा.

‘‘पापा, सब लोग रो रहे हैं पर ये क्यों नहीं रो रहे हैं?’’ मुन्ना ने गृहमंत्री के बारे में पूछा.

‘‘इन्हें शरम आती है, बेटे.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘बेटा, तुम्हें याद है. तुम ने एक बार स्कूल में पैंट में शूशू कर दिया था?’’

‘‘हां.’’

‘‘तुम ने यह बात किसी से बताई थी?’’

‘‘बहुत शरम लगी थी न पापा, इसलिए घर आ कर सिर्फ मम्मी को बताई थी.’’

‘‘देखो, मंत्रीजी भी शरम के मारे सब के सामने रो नहीं पा रहे हैं.’’

‘‘तो फिर यह किस के पास जा कर रोते हैं?’’

‘‘पी.एम. के पास, बेटे.’’

तभी एक और धमाके की खबर आई.

‘‘पापा, एक एपीसोड में कितने ब्लास्ट होते हैं?’’ मुन्ने ने पूछा.

‘‘बेटा, यह कोई सीरियल थोड़े ही न चल रहा है.’’

‘‘तो फिर टेलीविजन पर सीरियल ब्लास्ट क्यों लिखा है?’’

‘‘अपना होमवर्क मन लगा कर क्यों नहीं करता?’’ मैं ने मुन्ने को हलके से डांटा.

‘‘पापा, बताओ न…बम कौन फोड़ रहा है?’’

‘‘आतंकवादी अंकल, बेटा.’’

‘‘ये अंकल कहां रहते हैं?’’

‘‘क्यों?’’

‘‘दीवाली में उन्हीं से पटाखे खरीदने हैं.’’

‘‘बेटा, वह पटाखे नहीं, बम बनाते हैं.’’

‘‘वह इतना अच्छा बम बनाते हैं तो फिर पटाखा क्यों नहीं बनाते?’’

‘‘मुझे नहीं पता.’’

‘‘पापा, अंकल एक ही साथ इतने सारे बम क्यों फोड़ते हैं?’’

‘‘लोगों को डराने के लिए.’’

‘‘पापा, क्या उन से पुलिस अंकल भी डरते हैं?’’

‘‘बेटा, पुलिस तो बम से भी खतरनाक है.’’

‘‘कैसे, पापा?’’

‘‘बम तो एक ही बार फटता है पर पुलिस जिसे पकड़ती है उसे बारबार फोड़ती है.’’

‘‘क्या पुलिस अंकल भी बम फोड़ते हैं?’’

‘‘नहीं, अच्छा बताओ तुम्हें कौन सा चौकलेट पसंद है?’’

‘‘चुइंगम.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘चुइंगम बहुत बार चबाने से भी खत्म नहीं होता.’’

‘‘ठीक बताया तुम ने, पुलिस भी जिसे पकड़ती है उसे चुइंगम की तरह बहुत बार चबाती है.’’

मुन्ना ने अचानक मेरे हाथ से रिमोट छीन कर कार्टून चैनल लगा दिया. उस में टौम एंड जेरी के बीच निरंतर खींचतान जारी थी. टौम जेरी के पीछे भागता है पर जेरी बारबार चकमा दे कर निकल जाता.

‘‘वह देखो, पापा,’’ मुन्ना बोला, ‘‘बम वाले अंकल के पीछे पुलिस अंकल कैसे भाग रहे हैं,’’ इतना कह कर मुन्ना खिलखिला कर हंस रहा था.

दलित की घुड़चढ़ी पर हंगामा क्यों? 

उत्तर प्रदेश के कासगंज जिले के एक गांव निजामपुर में एक दलित की बरात की पूरे देश में चर्चा होगी, यह किस ने सोचा था? संगीनों के साए में होने वाली यह शादी उस सामाजिक बुराई के मुंह पर तमाचा बनी जहां दबंगों का कानून चलता है. पर संजय ने इस दबंगई को मानने से इनकार किया और तय किया कि वह घोड़ी भी चढ़ेगा और अपनी बरात पूरे गांव में घुमाएगा.

संजय की सगाई गांव निजामपुर के सत्यपाल सिंह की बेटी शीतल के साथ तय हुई थी. इसी के साथ होने वाले दामाद की जिद ने शीतल के परिवार वालों को सकते में डाल दिया.

संजय अपनी फरियाद ले कर जिलाधिकारी आरपी सिंह के पास पहुंचा और उस ने शादी के लिए बरात गांव में घुमा कर जनवासे तक ले जाने की इजाजत और सिक्योरिटी मांगी.

यह एक अजीबोगरीब मांग थी. जिलाधिकारी आरपी सिंह को पता चला कि निजामपुर में केवल ठाकुरोें की बरात ही घूम सकती है दलितों की नहीं, इसलिए उन्होंने संजय को शांति भंग न करने की सलाह दी.

लेकिन संजय पहुंच गया योगी आदित्यनाथ के जनसुनवाई दरबार में जहां उस की अर्जी पर खाद्य एवं रसायन मंत्री अतुल गर्ग ने मार्क किया कि बरात गांव के बीच चढ़ने पर पाबंदी क्यों? मामले में न्यायपूर्ण कार्यवाही करें.

मामला मुख्यमंत्री के पोर्टल पर आ चुका था, इसलिए समाधान जरूरी हो गया और मामले में जांच का काम निजामपुर गांव की चौकी मोहनपुरा के इंचार्ज राजकुमार सिंह को सौंपा गया जो खुद ठाकुर थे.

दारोगा ने चौकी पर बैठेबैठे मामले का हल निकाल दिया और लिखा कि आवेदक पक्ष के लोगों की बरात गांव में कभी नहीं चढ़ी. बरात चढ़ाए जाने से कोई भी अप्रिय घटना हो सकती है. आवेदक नई परंपरा डालना चाहता है. सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन करते हुए बरात चढ़ाने की इजाजत नहीं दी जाती है.

दारोगा राजकुमार सिंह और जिलाधिकारी आरपी सिंह ने मान लिया कि अब संजय खामोश हो जाएगा और जिद छोड़ देगा, पर संजय को मालूम था कि संविधान में इस बात का कहीं जिक्र नहीं था कि सवर्ण अपनी बरात पूरे गांव में घुमाए और दलित चुपचाप आए और दुलहन को ब्याह कर ले जाए.

इसी बीच गांव के ठाकुरों को पता चल गया और तनाव फैलने लगा. संजय की ससुराल वालों को दिया जाने वाला पानी काट दिया गया. इस से फसलें सूख गईं पर संजय ने हार नहीं मानी.

संजय ने अपनी जाति के नेताओं से मदद मांगी लेकिन उन लोगों ने सलाह दी कि ऐसा करने में खतरा हो सकता है. उन की राजनीति पर गलत असर हो सकता है. संजय की समझ में आ गया था कि अब अदालत की शरण में जाना होगा.

संविधान का 17वां अनुच्छेद इसीलिए लिखा गया था. अस्पृश्यता अधिनियम की धारा (3) में हर किसी को बिना भेदभाव के सार्वजनिक कुओं, तालाबों, पार्कों, अस्पतालों और सड़कों का इस्तेमाल करने की आजादी है और इस के खिलाफ जाने वालों को

500 रुपए जुर्माना और 6 महीने की सजा का प्रावधान है. पर राज्य सरकारें क्या इस का अनुपालन कर पाई हैं? 29 अप्रैल को राजस्थान के भीलवाड़ा का उदय लाल घोड़ी चढ़ कर शादी करने निकला तो दबंगों ने खींच कर उसे घोड़ी से उतारा और खूब पीटा. मध्य प्रदेश में साल 2017 में 38 साला दूल्हे को घोड़ी से उतार कर पीटा गया.

गुजरात के 21 साला दलित प्रदीप राठौड़ की 31 मार्च को इसलिए हत्या कर दी गई क्योंकि उसे घोड़े की सवारी करने का शौक था और मेहसारांव के एक दलित को इसलिए पीटा गया क्योंकि वह गले में सोने की चेन पहन कर सवर्णों के सामने आ गया था.

तो फिर क्या संजय को अपनी जिद छोड़ देनी चाहिए थी? नहीं. उस ने प्रदेश की सब से बड़ी अदालत में अर्जी लगाई तो हाईकोर्ट ने यह कह कर उस की याचिका को खारिज कर दिया कि मामला जिला लैवल का है. जिला अदालत में अपना मामला ले जाओ.

हाईकोर्ट से निराश हो कर संजय ने ठान लिया कि वह अब पीछे नहीं मुड़ेगा, बल्कि देश की सब से बड़ी अदालत में अपनी फरियाद ले कर जाएगा.  जिला प्रशासन को इस की भनक लगी तो जिलाधिकारी ने दोनों पक्षों को बुलाया. निजामपुर के दामाद की फरियाद टैलीविजन चैनलों से पूरे देश तक पहुंच चुकी थी.

इधर शादी की तारीख भी पास आ रही थी और उधर संजय की जिद थी कि वह अपनी बरात निजामपुर में घुमाएगा. यह उस का हक है.

जिलाधिकारी ने अधिकारियों की बैठक की. एसपी शिवहरि मिश्रा भी इस बैठक में शामिल हुए और एक रोड मैप बनाया गया.

संजय की बरात चढ़ाने के संबंध में अब प्रशासन गंभीर था. दोनों पक्षों के लोगों को बुलवा कर रोड मैप उन्हें दिखाया गया और दोनों पक्षों के बीच एक समझौता पत्र रखा गया जिसे दोनों पक्षों ने स्वीकार किया और दस्तखत कर दिए. दोनों पक्षों को शांति व्यवस्था बनाए रखने की हिदायत दी गई.

अब पुलिस और प्रशासन के सामने यह सवाल था कि दलित की बरात को कैसे सिक्योरिटी दी जाए क्योंकि मामला काफी संगीन था.

निजामपुर गांव में खुफिया पुलिस तैनात की गई लेकिन इसी बीच जिलाधिकारी को एक शिकायत पत्र मिला कि स्कूल सर्टिफिकेट के मुताबिक संजय की होने वाली पत्नी शीतल नाबालिग है, तो संजय ने ऐलान किया कि वह शीतल के बालिग होने का इंतजार करेगा और उस की शादी अब 15 जुलाई को होगी.

15 जुलाई को होने वाली इस शादी को अपने कैमरों में कैद करने के लिए देश का मीडिया निजामपुर गांव पहुंच गया. गांव पुलिस छावनी बन चुका था. गांव तक पहुंचने के 5 किलोमीटर के रास्ते पर हर मोड़ पर पुलिस तैनात थी.

फिर एक पुलिस की जिप्सी और दर्जनभर गाडि़यों के साथ संजय की बरात आई. तब तक शाम के 6 बज चुके थे. बरात आते ही पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों ने मोरचा संभाल लिया. संजय को कार से निकाल कर घोड़ी पर बैठाया गया और उसे पुलिस ने घेर लिया. एंबुलैंस का भी इंतजाम था. बैंडबाजे बजने लगे. बराती खूब नाचे. एक पुरानी परंपरा ने दम तोड़ दिया.

दूसरी ओर गांव के ठाकुर सुबह से ही घरों में ताले लगा कर चले गए थे. उन की गलियों में सन्नाटा पसरा था. इक्कादुक्का औरतें या बुजुर्ग ही घर पर थे. संगीनों के साए में संजय और शीतल की शादी हुई. सुबह पुलिस सुरक्षा में उन की विदाई हुई और पुलिस प्रशासन ने राहत की सांस ली. पर क्या आने वाले दिनों में भी गांवों में दलितों की शादियां ऐसे ही धूमधाम से होंगी? यह एक बड़ा सवाल है.

बेवफा बीवी को करें बाय बाय

27 साला सतीश सोनी भोपाल के नजदीक मिसरोद इलाके के कौशल नगर में किराए के मकान में अपनी बीवी सरोज (बदला हुआ नाम) के साथ रहता था. एक प्राइवेट गैस एजेंसी में काम करने वाला सतीश 27 अगस्त, 2018 को ड्यूटी कर के घर लौटा था. चूंकि सरोज मायके गई थी इसलिए महज पेट भरने की गरज से उस ने थोड़ा सा खाना बनाया और खा कर सो गया.

सोतेसोते सतीश सोनी के जेहन में वही बात थी जो इन दिनों उसे दीमक की तरह चाटे जा रही थी कि उस में ऐसी क्या कमी है जो सरोज कभी भी उसे छोड़ कर अपने आशिक जितेंद्र मेहरा के घर जा कर रहने लगती है. यह जानने के बावजूद कि बीवी पूरी तरह से बेवफाई और बेहयाई पर उतर आई है, सतीश सोनी चाह कर भी उसे न तो भुला पा रहा था और न ही उस से पूरी तरह नफरत कर पा रहा था.

उस रात भी सतीश सोनी यही बात सोचतेसोचते काफी देर तक करवटें बदलता रहा, फिर जाने कब नींद ने उसे अपने आगोश में ले लिया इस का उसे पता ही नहीं चला.

और जब नींद टूटी तो…

रात के तकरीबन 3 बजे खटपट की आवाज सुन कर सतीश की नींद टूटी तो खुमारी में ही वह समझने की कोशिश करने लगा था कि आखिर हुआ क्या है. इसी दौरान उस ने जितेंद्र को अपने सामने खड़े पाया तो वह चौंक उठा. पहले तो उसे लगा कि वह ख्वाब देख रहा है लेकिन कुछ समझ पाता इस के पहले ही जितेंद्र ने उस के ऊपर कुछ फेंका.

यह कुछ गरम पानी जैसा था जिस से तड़पते हुए सतीश ने उठने की कोशिश की तो जितेंद्र ने गरम तवा उठा कर उस पर ताबड़तोड़ हमले कर दिए. इस पर सतीश मारे दर्द के चिल्लाया तो जितेंद्र भाग गया. पड़ोसियों ने उसे अस्पताल पहुंचाया और मिसरोद थाने में इस वारदात की खबर दी.

अस्पताल में इलाज से सतीश बच तो गया पर अब जीने का उस का जोश खत्म हो चला है. वह यह तय नहीं कर पा रहा कि आखिर क्यों सरोज उसे छोड़ कर जितेंद्र के पास चली गई और जितेंद्र ने जो जानलेवा हमला किया, कहीं उस में उस की रजामंदी और हाथ तो नहीं था.

इस के पहले कई मरतबा वह पुलिस स्टेशन में इस बात की रिपोर्ट दर्ज करा चुका था कि उस की बीवी उसे वापस दिलाई जाए लेकिन पुलिस वालों ने यह कहते हुए हाथ खड़े कर दिए थे कि सरोज बालिग है और अपनी मरजी से जितेंद्र के साथ रह रही है. लिहाजा, वे इस में कुछ नहीं कर सकते.

भगवान भी है नाकाम

सतीश सोनी जैसे लाखोंकरोड़ों शौहर इस परेशानी से जूझ रहे हैं लेकिन कोई हल उन्हें समझ नहीं आता तो इस में थोड़ी गलती उन की भी है. गलती यह है कि बीवी अगर अपने आशिक के साथ जा कर रहने लगे या नाजायज संबंध बनाए और शौहर के रोकनेटोकने, मारनेपीटने और समझानेबुझाने पर भी न माने, तो उन्हें बीवी के पल्लू से नहीं चिपके रहना चाहिए.

यह ठीक है कि वजह कुछ भी हो, पर बीवी का यों अपने आशिक के पास चले जाना कोई शौहर बरदाश्त नहीं कर पाता लेकिन आएदिन ऐसी वारदातें और हादसे अब आम हो चले हैं, जिन में बीवी का आशिक शौहर को या तो जान से मार देता है या फिर जानलेवा हमला कर देता है. कई मामलों में तो खुद बीवी आशिक का साथ देती है.

कई मामलों में बदले की आग में जल रहा गुस्साया शौहर ही बीवी या उस के आशिक का कत्ल कर देता है और बाद में जेल की हवा खाते हुए जिंदगी गुजारने पर मजबूर हो जाता है.

यहां यह सोचना भी लाजिमी है कि इस से किसे क्या मिलता है. खरबूजा छुरी पर गिरे या छुरी खरबूजे पर कटना तो खरबूजे को ही है, जो दरअसल में शौहर होता है.

बीवी की बेवफाई की सजा अकसर शौहर को ही भुगतनी पड़ती है लेकिन इस से समस्या दूर नहीं हो जाती लेकिन  समझदारी से काम लिया जाए तो जिंदगी दोबारा खुशहाल हो सकती है.

क्या करें शौहर

मिसाल सतीश सोनी की लें. उसे जब यह बात समझ आ गई थी कि सरोज नहीं मानने वाली तो बात में कुछ दम नहीं बचा था. बीवी को तलाक दे कर वह दूसरी शादी कर खुशहाल जिंदगी जीने का मौका भुना सकता था और जानलेवा हमले से भी बच सकता था.

यह ठीक है कि कानूनी तौर पर तलाक लेने में वक्त लगता है और पैसा भी बरबाद होता है लेकिन इस के अलावा कोई और रास्ता उन शौहरों के पास बचता भी नहीं है जिन की बीवियां आशिक के साथ रहने चली जाती हैं. कुछ वक्त अगर परेशानी में गुजार कर बाकी जिंदगी सुकून से जीना हो तो सौदा घाटे का नहीं कि बेवफा बीवी को हमेशा के लिए बायबाय कर दिया जाए.

शौहरों को यह बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि जो बीवी नजदीक रहते हुए भी नजदीक नहीं है उसे जबरन साथ रखने से फायदा नहीं. दरअसल, यह एकतरफा प्यार है जो कुछ औरतों को शादी के बाद किसी दूसरे मर्द से हो जाता है. इस का यह मतलब नहीं कि शौहर में कोई कमी है. बात पूरी तरह से दिल की है जिस पर किसी का जोर नहीं चलता.

यह बात भी ठीक है कि कोई शादीशुदा औरत अगर अपने आशिक के साथ चली जाती है तो वह शौहर के साथ ज्यादती ही करती है लेकिन शौहर को बीवी की गलती की सजा खुद को, बच्चों को या अपने घर वालों को नहीं देनी चाहिए.

बेवफा बीवी की याद में देवदास बन कर आंसू बहाते रहना, नशे में डूब जाना या फिर ऊटपटांग हरकतें करने लगना परेशानी का हल नहीं है.

बेवफा बीवियां अकसर पछताती ही हैं. वजह, उन के आशिक का मकसद उन का प्यार नहीं, बल्कि जिस्म पाना होता है जिस से जी भर जाने के बाद वे उस से कन्नी काटने लगते हैं. कुछ ही मामलों में यह रिश्ता परवान चढ़ पाता है. लेकिन समझदार शौहर को इस से वास्ता नहीं रखना चाहिए और न ही मियांबीवी के रिश्ते को बनाए रखने के लिए जरूरत से ज्यादा जोरजबरदस्ती करनी चाहिए.

चूंकि बीवी के आशिक को मुफ्त की मलाई मिल रही होती है इसलिए उसे चाटते रहने के लिए वह शौहर को नुकसान भी पहुंचा सकता है जैसा कि सतीश सोनी के मामले में हुआ. वह तो उस गुनाह की सजा भुगत रहा है जो उस ने किया ही नहीं था. उस की तरह ज्यादातर शौहर यही गलती करते हैं कि महज नाक के चलते और मर्दानगी साबित करने के लिए बीवी को वापस लाने की जिद पर अड़े रहते हैं.

ऐसी बीवी जो शादीशुदा जिंदगी के माने न समझते हुए अपनी जिम्मेदारियों से भाग कर किसी दूसरे शख्स के साथ मौजमस्ती कर रही हो, उसे भूल जाना ही बेहतर है. लड़ाईझगड़े और मारपीट से कुछ हासिल होता है तो वह है जेल. इस से बाकी जिंदगी में दुश्वारियां ही मिलती हैं इसलिए शौहर को समझदारी से काम लेना चाहिए.

नहीं बनती बात तो होते हैं हादसे

पुणे के आनंद कांबले की शादी 18 मई, 2017 को सीमा से हुई थी. 2 जून, 2018 को आनंद सीमा के साथ महाबलेश्वर घूमने गया तो सीमा के आशिक निखिल ने आनंद की हत्या करवा दी. राज खुलने पर हालांकि सीमा और निखिल पकड़े गए.

उत्तर प्रदेश के रहने वाले नौजवान सरोज मंडल को दिल्ली की नीलू नाम की लड़की से मुहब्बत हो गई और दोनों ने शादी कर ली. दोनों के 3 बच्चे भी हुए. इसी दौरान सरोज मंडल के मांबाप गुजर गए तो वह अपने गांव बदलोदिया आ कर रहने लगा.

8 सितंबर, 2018 की रात सरेज की हत्या हो गई. पुलिसिया जांच में पता चला कि उस की हत्या नीलू ने ही अपने आशिक मुन्ना यादव से करवाई थी. नीलू मुन्ना यादव को नहीं छोड़ पा रही थी.

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जनपद के लालपुर गांव के 28 साला बाशिंदे अभिमन्यु की शादी तारापुर गांव की रूपा से हुई थी. शादी के बाद रूपा को अपने देवर मान सिंह से प्यार हो गया और वह उस के साथ गुजरात के बड़ौदा भाग कर 6 महीने तक रही.

इस के पहले रूपा और मान सिंह एक बार घर के बाथरूप में रंगे हाथों पकड़े गए गए थे. अभिमन्यु ने वही गलती की जो अकसर शौहर करते हैं. उस ने बेवफा बीवी और बेईमान भाई को समझाया तो उन दोनों ने मिल कर बीती 4 सितंबर, 2018 को अभिमन्यु को ही मौत के घाट उतार दिया.

मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के पोरसा कसबे के रहने वाले सैनिक कमलेश तोमर को मालूम था कि उस की बीवी के संजय सिंह नाम के फौजी से नाजायज संबंध हैं. इस मामले को ले कर इस साल गरमियों में दोनों में झगड़ा भी हुआ था.

3 जून को संजय ने कमलेश को उस के घर में घुस कर गोली मार दी. कमलेश की गलती यह थी कि वह भी बेवफा बीवी के साथ ही रहना चाह रहा था.

मुरैना की ही एक बीवी गीता बघेल अपने शौहर गब्बर सिंह बघेल को छोड़ कर अपने आशिक उदय सिंह के साथ रहने लगी थी. बीवी के आशिक के साथ रहने पर गब्बर सिंह ने पंचायत बुलाई, जिस में गीता ने शौहर के साथ रहने से साफ मना कर दिया.

इस पर भी गब्बर सिंह नहीं माना तो गीता और उदय सिंह ने मिल कर उस की धुनाई भी की और इसी साल अगस्त के महीने में खुद गीता ने शौहर को गोली मार दी.

1 करोड़ से ज्यादा बार देखा गया खेसारीलाल का ये वीडियो

भोजपुरी इंडस्ट्री के मशहूर सुपरस्टार खेसारीलाल यादव के गाने के वीडियो आए दिन इंटरनेट पर वायरल होते रहते हैं. इन दिनों खेसारीलाल का एक गाना इंटरनेट पर वायरल हो रहा है, जो ‘सोनू हमरा पे भरोसा काहे नइखे’ पर पिछले साल छठ पूजा के अवसर पर बनाया गया था. इस वीडियो को अब तक 18,236,901 बार देखा जा चुका है.

आपको बता दें, खेसारीलाल इन दिनों लालू बाबू पंडित के साथ अपनी तीसरी फिल्‍म ‘कुली नंबर 1’ के गानों की शूटिंग में व्‍यस्‍त हैं. इनकी फिल्‍मों का कब्‍जा तो भोज‍पुरिया बौक्‍स पर है ही, अब उनके गाने भी यू-ट्यूब पर दुनियाभर में धमाल मचा रही है.

इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि दुनियाभर में यू-ट्यूब पर सबसे अधिक समय तक सुने जाने वाले गानों की सूची में खेसारीलाल यादव के गानों का स्‍थान छठा है. खेसारीलाल यादव के लिए साल 2018 बेहद ही खास रहा है.

यही वज‍ह है कि वे इस साल में एक से बढ़कर एक रिकौर्ड बनाते जा रहे हैं. यह अपने आप में एक बड़ा रिकौर्ड है. खेसारीलाल यादव के गानों के साथ–साथ उनके एक से एक फिल्‍में 2018 में छाई रही है और कई तो रिलीज होने वाली हैं. खेसारीलाल यादव पहले ऐसे एक्‍टर बने, जिनकी फिल्‍म मल्‍टीप्‍लेक्‍स तक पहुंच पाई. अभी भी उनकी फिल्‍म ‘बलम जी लव यू’ सिनेमाघरों में धूम मचा रही है.

विधानसभा चुनाव पर क्या असर डालेगा मंदिर मुद्दा

ज्यादा नहीं अब से कोई तीन महीने पहले मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में जब विधानसभा चुनावों की सुगबुगाहट शुरू हुई थी तब अपने अंदरूनी और बाहरी सर्वेक्षणों के नतीजे देख भाजपा और आरएसएस दोनों सकते में आ गए थे क्योंकि तीनों राज्यों से सत्ता पलट के आंकड़े आ रहे थे. कमोबेश यही बात अधिकतर न्यूज चैनल्स और एजेंसियों के सर्वे भी कह रहे थे कि तीनों राज्यों का वोटर बदलाव चाहता है. भगवा खेमे का सरदर्द उस वक्त और बढ़ा जब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने मंदिरों में जाकर पूजा पाठ करना शुरू किया और वे भी धोती कुर्ता पहन, माथे पर त्रिपुंड लगाकर मंदिरों से बाहर आते दिखने लगे.

राहुल गांधी ने इतना पूजा पाठ और दूसरे धार्मिक ढकोसले किए कि भगवा खेमा उनकी हिंदूवादी इमेज देख चकरा उठा कि अब इसका जबाब कैसे दें. अक्सर राहुल गांधी को मुसलमान, ईसाई या पारसी प्रचारित करते रहने वाले हिंदूवादियों की बोलती तब और बंद होने लगी जब राहुल ने पहले खुद को हिन्दू और फिर जनेऊधारी ब्राह्मण कहना शुरू कर दिया. इस धार्मिक हमले से बौखलाए भाजपा के दूरदर्शनीय प्रवक्ता संबित पात्रा भोपाल में उनसे उनका गोत्र पूछते नजर आए लेकिन लोगों ने राजनीति का गोत्र के स्तर तक गिरना स्वीकार नहीं किया और मान लिया कि राहुल गांधी हिन्दू हैं. उन्हें भी मंदिरों में जाकर पूजा पाठ और अभिषेक करने का उतना ही हक है जितना कि नरेंद्र मोदी या दूसरे किसी नेता को है.इसके पहले खुद को हिन्दू साबित करने या जताने राहुल गांधी कैलाश मानसरोवर तक की यात्रा कर आए थे.

राहुल गांधी का यह रूप जनमानस पर छाने लगा और किसी भी टोटके से तीनों राज्यों में भाजपा की स्थिति में सुधार होता नहीं दिखा तो एकाएक ही फिर से बिना किसी सम्मन या पूर्व सूचना के राम मंदिर निर्माण का जिन्न बोतल से बाहर आ गया और अब हालत यह है फिर से रामभक्त मंदिर के लिए जान देने की बात करने लगे हैं. एक नए आंदोलन की स्क्रिप्ट लिखी जा रही है. लग ऐसा रहा है कि अगर आजकल में मंदिर नहीं बना तो प्रलय आ जाएगी. राम भक्त मंदिर के लिए अध्यादेश और कानून की भी बात कर रहे हैं. देश भर के संत जानबूझकर बेचेनी दिखाते खुद पर और सरकार पर लानतें भेज रहे हैं कि बिना अयोध्या में राम मंदिर के जीवन व्यर्थ है.

मंदिर का विधानसभा चुनाव कनेक्शन

अभी तक तीन राज्यों में विधानसभा चुनाव में मंदिर निर्माण सीधे सीधे कोई मुद्दा नहीं है और भगवा खेमा इसे अभी चुनावी मुद्दा बनाएगा भी नहीं क्योंकि लोग खुद उसकी उम्मीद के मुताबिक पूछ रहे हैं कि अभी तक सो रहे थे क्या, साढ़े चार साल सत्ता में रहते क्यों मंदिर के बाबत होश नहीं आया, नरेन्द्र मोदी की सरकार अब तक क्या कर रही थी जबकि सब कुछ उसके हाथ में था और नोटबंदी की जगह अगर मंदिर के लिए कानून ले आए होते तो बात कुछ और होती. अब चुनाव सर आ गए और कुर्सी पर बने रहने के लिए गिनाने कुछ नहीं है तो तम्बू में पड़े राम जी याद आने लगे.

भगवा खेमा जानता है ये सवाल हर कोई पूछेगा लेकिन इन के जबाब नहीं देना है बल्कि मंदिर निर्माण मुहिम को सुलगते देना है, हां कानूनी मजबूरी की बात जरूर दोहराते रहना है जिससे आज सवाल कर रहे हिन्दू खुद कहने लगें कि बात तो ठीक है कि मंदिर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ही बने तो हिन्दू यानि सनातन धर्म की साख भी बनी रहेगी और बगैर किसी कलंक या हिंसा के मंदिर भी बन जाएगा. एक बार मंदिर का नशा हिंदुओं के सर चढ़ भर जाये फिर तो इन्हें यह ज्ञान भी मिल जाएगा कि आखिर मंदिर बनाएगा कौन, जाहिर है हम यानि भगवा खेमा.

बात बड़ी दिलचस्प है कि खुद आम हिन्दू समझ रहा है कि हमेशा की तरह मंदिर के ठेकेदारों की मंशा सचमुच में मंदिर बनाने की नहीं है. यह शुद्ध चुनावी चाल है जिससे हालफिलहाल तीन राज्यों में लोगों का ध्यान सरकार विरोधी मुद्दों से हट जाये और वे चुनाव तक इस बहस में उलझे रहें कि मंदिर किस विधि से बनना ठीक रहेगा. उन लोगों की विधि से जो यह कह रहे हैं कि हिंदुओं की सब्र जबाब दे चुकी है या उन लोगों की पद्धत्ति से जो दरियादिली दिखाते यह दलील दे रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट को एक मौका और दिया जाये फिर भले ही फैसला मंदिर के पक्ष में न आए वह चिंता की बात नहीं होगी, क्योंकि तब हम हिन्दू एकजुट होकर रामलला का भव्य मंदिर कैसे बनाएंगे इसका एहसास और अंदाजा सभी को है.

किसी ने गलत नहीं कहा कि नब्बे फीसदी भारतीय बेवकूफ हैं उन्हें आसानी से धर्म के नाम पर बहलाया फुसलाया जा सकता है. हो यही रहा है कि महज तीन चार दिन में ही तीन राज्यों में किसानों की खुदकुशियों और बेरोजगारों की बात कम हो चली हैं. सवर्ण अब एट्रोसिटी एक्ट को नहीं रो रहा और न ही आरक्षण पर हफ्ते भर पहले की तरह विलाप कर रहा है. उसे समझ आ रहा कई कि जमानत की जरूरत तो तब पड़ती है जब कोई रिपोर्ट लिखाने की जुर्रत करे. वह खुद को जज समझते कह रहा है कि अच्छा तो यह होगा कि हिंसा के जरिये मंदिर बनाने की नौबत न आए और अगर आ भी जाये तो फिर पीछे न हटा जाये. हिंदुओं के देश में ही उनके आराध्य मर्यादा पुरुषोत्तम राम का मंदिर बनाने अदालत का मुंह सालों साल ताकना पड़े यह तो सच में जिल्लत और जलालत की बात है. यही वर्ग बड़ी शिद्दत से यह भी कह रहा है कि अब अगर भाजपा मंदिर के नाम पर वोट मांगेगी तो उसे ठेंगा दिखा देंगे.

यही समाज की वह आत्मघाती मानसिकता और प्रतिक्रिया है जिसके लिए बड़े पैमाने पर मंदिर निर्माण की बात विरोधाभासी ढंग से भगवा खेमा कह रहा है. कोई यह नहीं कह रहा कि देश में लाखों राम मंदिर हैं फिर अयोध्या को लेकर ही जिद क्यों.

अब इसके आगे किसी के कुछ बोलने सुनने की जरूरत नहीं रह जाती क्योंकि मंदिर एक्सप्रेस अब आस्था नाम के जंक्शन पर खड़ी है जहां से हर लाइन अयोध्या जाती है. इसी ट्रेक पर आकर आस्था आसानी से हिंसा में तब्दील हो जाती है.

लोग हर कभी पंडों, संतों, महंतों, शंकराचार्यों सहित आरएसएस व विहिप और नेताओं के बिछाए संयुक्त जाल में फंसकर धर्म की अफीम खाकर बहकने लगते हैं जिससे उनका शरीर सुस्त और हाथ पैर ढीले पड़ जाते हैं. उनका दिमाग यानि बुद्धि काम करना बंद कर देती है तो हैरत किस बात की, धर्म के इन ठेकेदारों ने ऐसे ही कितने भीषण युद्ध कराये हैं, भाई के हाथों भाई को मरवाया है, औरतों की इज्जत से सरेआम खिलवाड़ किया और करवाया है, शूद्रों पर जानवरों की तरह जुल्म ढाये हैं, उनसे गुलामों की तरह काम कराया है यह बात कभी किसी सबूत की मोहताज नहीं रही. फिर तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव तो कुछ भी नहीं.

बहरहाल रही बात तीन राज्यों में मंदिर मुद्दे की तो लोग धीरे धीरे ही सही अफीम चखने के झांसे में आ रहे हैं और ऐसे आ रहे हैं कि खुद भी नहीं समझ पा रहे. तीन राज्यों मे भाजपा जीते या हारे यह भगवा खेमे की चिंता का विषय नहीं है उसे चिंता नरेंद्र मोदी और 2019 की है. तब तक हैरानी नहीं होनी चाहिए अगर कानून और संविधान की दुहाई देना भी बंद हो जाये. कम ही लोग दूर की सोच पा रहे हैं कि अगर हिंसा बड़े पैमाने पर मंदिर के नाम पर हुई तो एक विकल्प या रास्ता आपातकाल का भी सरकार के पास बचता है बशर्ते लोग 1992 की तरह मंदिर निर्माण के बाबत तैयार या इकट्ठा नहीं हुये तो. कोशिश यह जताने की भी है कि अगर नरेंद्र मोदी कानून नहीं लाये तो उन्हें चलता कर कोई दूसरा चेहरा पेश कर दिया जाएगा और इस बाबत योगी आदित्यनाथ सबसे मुफीद हैं.

दरअसल में साजिश अब राम मंदिर के नाम पर हिंदुओं को उकसाने की नहीं बल्कि धार्मिक ग्लानि से भर देने की है कि अगर मंदिर के लिए आगे नहीं आए तो तुम से बड़ा कायर कोई नहीं होगा और आने वाली पीढ़ियां तुम्हारी उदासीनता और खामोशी का फल भुगतेंगी और फिर से गुलाम हो जाएंगी जिसके लक्षण नई नस्ल में दिख भी रहे हैं जो पूजा पाठ यज्ञ हवन बगैरह से कतराने लगी है.

बातें बातें बातें : क्या आप भी…

बहुत पहले कहीं पढ़ा था, ‘हाथ नचावे, गाल बजावे सो कलियुग में नाम कमावे.’ इस कथन की सार्थकता आज समझ में आती है. सिनेमा को लीजिए, मोबाइल को लीजिए, टीवी को लीजिए : बातें, बातें और बातें. टाक, टाक एंड टाक.

बात को तूल देने में मोबाइल का बहुत बड़ा हाथ है. मोबाइल दरें कम हो रही हैं और प्रति व्यक्ति टाक टाइम बढ़ रहा है. प्रत्येक व्यक्ति अपने कार्यकलाप की वी.आई.पी. अंदाज में जानकारी दे रहा है.

‘‘टे्रन प्लेटफार्म पर आ रही है, प्लेटफार्म नंबर 3 पर कुली आ गया है, लगेज उठा रहा है, बबली शूशू कर के टायलेट से निकल रही है, अच्छा, रखता हूं, टैक्सी में बैठते ही फिर फोन करूंगा.’’

पहले जब लिफाफे और पोस्टकार्ड का समय था, यह सब जानकारी नहीं दी जाती थी. इसे देना जरूरी नहीं समझा जाता था. किंतु अब यह सब जानकारी आवश्यक हो गई है.

‘‘मम्मी चाय ला रही हैं, कल बिस्कुट लाना भूल गया था, आज बिना बिस्कुट की चाय का लुत्फ लिया जा रहा है, रखता हूं, अगला फोन टायलेट से करूंगा.’’

पहले लोग टायलेट में चुप रहते थे, कार या स्कूटर चलाते चुप रहते थे. अब चुप रहने की यह घडि़यां भी लुप्त हो रही हैं… इन घडि़यों में भी अब भाई लोग मोबाइल से बात करते हैं. सीधी गरदन को टेढ़ी कर के बात करते हैं.

यह बात करने का दौर चल रहा है.

सुबह टेलीविजन आन करते ही रामदेव आन हो जाएंगे और आप को लौकी के जूस से अधिक अपनी बातों का जूस पिलाएंगे. चैनल बदलिए तो सुधांशुजी का प्रवचन चल रहा है. लच्छेदार बातों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया जा रहा है. फिर चैनल बदलिए तो एक और स्वामीजी…समझ में नहीं आता कि इतने स्वामीप्रवचनों के बाद, इतने आध्यात्मिक  विकास के बाद अपराधों की संख्या में, आत्महत्याओं की संख्या में, मंदिरों और प्लेटफार्मों पर आएदिन होने वाले विस्फोटों की संख्या में वृद्धि क्यों हो रही है.

कहीं ऐसा तो नहीं हो रहा कि सब बात कर रहे हैं और सुन कोई नहीं रहा. राशन पर भाषण है किंतु भाषण पर कोई राशन नहीं, और टेलीविजन ने भाषण को एक और मंच दिया है.

यथार्थ तो यह है कि इन दिनों भाषण देना, बात करना एक व्यवसाय का रूप लेता जा रहा है. कमाई का एक जरिया बनता जा रहा है.

दीपक चोपड़ा हों, रविशंकर हों, रामदेव हों…बातें बिक रही हैं, बात करने से धन आ रहा है, लोग धनी बन रहे हैं. तीसरी श्रेणी में यात्रा करने वाले लोग इन दिनों हवाई यात्रा कर रहे हैं. यह बात करने की ही महिमा है.

पिछले दिनों एक समाचारपत्र ने 17 से 28 साल के आयु वर्ग के लोगों का सर्वेक्षण किया. यह सर्वेक्षण दिल्ली, कोलकाता, मुंबई जैसे महानगरों में रहने वालों पर किया गया. इन में से 75 प्रतिशत युवक पढ़ने, संगीत सुनने, फिल्म देखने से अधिक बात करना पसंद करते हैं. बात करना उन का शौक है, बात करना उन की जिंदगी है.

पहले घर में पत्नी बात करती थी और पति सुनता था. घर की गाड़ी सुचारु रूप से चलती थी. किंतु जब से पतियों ने भी बोलना शुरू कर दिया है, कोई सुनने वाला नहीं रह गया और तलाकों की संख्या में वृद्धि हो रही है.

अब सिनेमा की बात की जाए.

एक जमाना दिलीप कुमार का, राजकुमार का था. दोनों शब्दों से अधिक भाव का सहारा लेते थे. उन का मौन, शब्दों से अधिक मुखर था, शब्दों से बढ़ कर बोलता था.

आज की पीढ़ी कहती है, ‘‘यार, दिलीप कुमार को देख कर मैं डिप्रैशन, अवसाद का शिकार होने लगता हूं. मैं बेहद बोर होने लगता हूं. यह युग ‘शोले’ की हेमा मालिनी उर्फ बसंती का है.’’

आज का जमाना चटरपटर करने वाली रानी मुखर्जी का है, शाहरुख खान का है. आज चुप रह कर जनता को सिनेमा हाल में 3 घंटे तक बांध कर नहीं रखा जा सकता. जनता को 3 घंटे तक मंत्रमुग्ध नहीं किया जा सकता.

‘कल हो न हो’ में शाहरुख खान हो, ‘दिल चाहता है’ में आमिर खान हो, ‘सलाम नमस्ते’ में सैफ अली खान हो या ‘फिर हेराफेरी’ में अक्षय कुमार हो, सब बातों का जादू बिखेरते नजर आते हैं, बातों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध करते दिखाई पड़ते हैं, अनवरत बातों का सम्मोहन बिखेरते दिखाई देते हैं.

‘कुछकुछ होता है’, ‘कल हो न हो’ जैसी सुपर हिट फिल्में देने वाली शख्सियत, करण जौहर से बात कीजिए तो उन का उत्तर होता है, ‘‘मौन, शब्दों से अधिक प्रभावशाली हो सकता है, किंतु अभी तक मैं इस कला में यानी मौन का जादू बिखेरने की कला में, अपने को पारंगत नहीं कर सका…मैं अपने नायकों से पूरी तरह संतुष्ट हूं…उन की बातों से, अपने को अभिव्यक्त करने की कला से पूर्णतया संतुष्ट हूं.’’

करण जौहर स्वयं पिछले साल एक ‘चैट’ प्रोग्राम को, बातें करने के एक कार्यक्रम को टीवी पर पेश कर चुके हैं.

बातें करने के कार्यक्रमों में छोटा परदा भी पीछे नहीं. उस पर फारुख शेख का ‘जीना इसी का नाम है’, ‘जानी आला रे’ जैसे कार्यक्रम काफी लोकप्रिय हुए थे. जाहिर है आजकल लोगों को चुप रहने से अधिक चटरपटर करना भाता है.

बातचीत की इस वर्तमान अहमियत के पीछे हमारी बदलती मान्यताएं भी हैं. पहले लोग अपने बारे में कुछ कहने में, अपने मुंह मियांमिट्ठू बनने में संकोच करते थे. अपनी सफलताओं का बखान करने में हिचकते थे. आज हम अपनी तारीफ के पुल बांधते नहीं थकते. अपनी छोटी सी उपलब्धि के तिल को ताड़ बनाने से हिचकते नहीं. पत्नी अपने बच्चे की योग्यता की, पति की आफिस के प्रति लगन की तारीफ करते नहीं अघाती. बच्चा चौथी क्लास में चौथी बार फेल होता है पर ‘खोती दा प्यो’ (गधी का बाप) सारा दोष ‘पावर कट’ पर मढ़ता है, बच्चे पर नहीं. ‘खोती दा प्यो’ भूल जाता है कि उस ने स्वयं लालटेन की रोशनी में पढ़ कर, बिना पंखे की फरफराती हवा वाले वातावरण में परीक्षाएं दी हैं, उपलब्धियां प्राप्त की हैं किंतु उन का उल्लेख कम ही किया है.

यदि हम उल्लेखनीय हैं, हमारी पत्नी उल्लेखनीय है, हमारे बच्चे उल्लेखनीय हैं, हमारा पालतू कुत्ता भी उल्लेखनीय है तब हम सर्वश्रेष्ठ राष्ट्र क्यों नहीं? हमारी रेलें समय से नहीं चलतीं,  हमें 24 घंटे बिजली नहीं मिलती, हमें पीने का शुद्ध पानी नहीं मिलता, थोड़ी सी वर्षा हमारे जीवन को, हमारे महानगरों को अस्तव्यस्त कर देती है.

क्या यह सही नहीं कि कभी हम से पिछड़े राष्ट्र चीन, सिंगापुर, मलयेशिया आदि अब हम से आगे निकल गए हैं, क्या खोखली बातों के आधार पर? बातें हमें कैरियर दे सकती हैं, हमें टीवी का एंकर बना सकती हैं, हमें स्टार बना सकती हैं, हमें आकर्षण का केंद्र बना सकती हैं किंतु हमें, हमारे राष्ट्र को एक ठोस आधार नहीं दे सकतीं.

बात हमें पैसा दे सकती हैं किंतु स्थान नहीं, ठोस आधार नहीं. कभी इंदिरा गांधी ने कहा था, ‘बातें कम, काम ज्यादा.’ किंतु शायद वह बीते युग की बात है. शायद गड़े मुरदे उखाड़ना ठीक नहीं. प्लीज, मुझे गलत मत समझिए.

मैं बात विरोधी नहीं. चटपटी बातें मुझे भी आकर्षित करती हैं. किंतु यदि सब बातें करेंगे तो सुनेगा कौन? यदि सब कंपनियां चाहेंगी कि लोग उन के विज्ञापन को ही देखें, उन के दावों को ही सुनें तो क्या लोग सुनेंगे?

उन्हें ही सुना जाएगा जिन की बात में दम होगा, जिन की बात में लोगों को विश्वास होगा. क्या यह दम केवल बातों से आ पाएगा?

फाल के बाद (भाग-1)

स्कूल बस से उतरते ही नेहल की नजर आसपास खड़े पेड़ों पर गई. पतझड़ का मौसम आ चुका है. पत्तों के बिना पेड़ कितने उदास और अकेले लगते हैं. ठीक वैसे ही जैसे मम्मी के मरने के बाद नई जूलियन मौम, पापा और छोटी बहन स्नेहा के होने के बावजूद, घर बेहद सूना और उदास लगता है.

जूलियन मौम के आते ही 8 वर्ष की नेहल, अचानक बड़ी बना दी गई. हर बात में उसे जताया जाता कि वह बड़ी हो गई है. शी इज नो मोर ए बेबी. 4 साल की स्नेहा की तो वह मां ही बन गई है. पहली बार स्नेहा को शावर देती नेहल के आंसू शावर के पानी के साथ बह रहे थे. मम्मी जब दोनों बहनों को टब में बबल बाथ देती थीं तो कितना मजा आता था. पूरी तरह से भीगी नेहल को देख, जूलियन मौम ने डांट लगाई, ‘‘सिली गर्ल, इतनी बड़ी हो गई, छोटी बहन को ढंग से शावर भी नहीं दे सकती. तुम्हारी मम्मी ने तुम्हें कुछ नहीं सिखाया है. इन फैक्ट, स्नेहा को भी खुद बाथ लेना चाहिए.’’

मम्मी के नाम पर नेहल की आंखें फिर बरसने लगीं.

‘‘डोंट बिहेव लाइक ए चाइल्ड. गो टु योर रूम एंड क्राई देयर,’’ जूलियन मौम ने झिड़का था.

नियमानुसार 12 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को घर में अकेले नहीं छोड़ा जा सकता. जूलियन मौम से उन की बार की नौकरी छोड़ने के लिए पापा ने रिक्वेस्ट की थी. पापा को अच्छा वेतन मिलता था. नौकरी छोड़ कर जूलियन ने पापा पर एहसान किया था. फें्रड््स के साथ दिन बिता कर घर जरूर आ जातीं, पर नेहल के स्कूल से लौटने का वक्त, उन के आराम का होता. उन के आराम में खलल न पड़े, इसलिए नेहल को घर की चाबी थमा दी गई. उसे सख्त हिदायत थी कि वह बिना शोर किए घर में आए और जूलियन मौम को परेशान न करे.

अकसर नेहल को रोता देख कर स्नेहा भी रो पड़ती थी. अचानक नेहल चैतन्य हो जाती… सोचती, प्यार करने वाली मम्मी अब नहीं हैं तो क्या वह तो स्नेहा को मां जैसा प्यार दे सकती है. आंसू पोंछ नेहल जबरन हंस देती.

घर का बंद दरवाजा खोलती नेहल को याद आता, मम्मी उसे लेने बस स्टैंड आती थीं. कई कोशिशों के बावजूद मम्मी कार ड्राइव नहीं कर पाईं. मजबूरी में नेहल को स्कूल बस से आना पड़ता. मम्मी अपनी इस कमी के लिए दुखी होतीं. काश, वह अपनी बेटियों को खुद कार से ला पातीं. ड्राइविंग के प्रति उन के मन का भय कभी नहीं छूट पाया.

स्कूल से लौटी नेहल को मम्मी हमेशा उस का मनपसंद स्नैक कितने प्यार से खिलाती थीं. स्नेहा तो उन की गोद में बैठ कर ही खाना खाती. पनीली आंखों से ब्रेड और जैम गले से उतारती नेहल को याद आया कि आज स्नेहा की छुट्टी जल्दी होती है. अधखाई ब्रेड किचन ट्रैश में डाल, नेहल बस स्टैंड तक दौड़ती गई. अगर वह वक्त पर नहीं पहुंची तो बस से उतरी स्नेहा कितनी डर जाएगी. मम्मी कहा करती थीं, ‘यह अजनबी देश है. यहां कभी भी कोई हादसा हो सकता है. बस स्टैंड से घर के सूने रास्ते में भी कोई दुर्घटना हो सकती है.’

पहली बार अकेले घर तक आनेजाने में नेहल को सचमुच डर लगा था, पर छोटी बहन को बस स्टैंड तक पहुंचाने और लाने के दायित्व ने उस का डर दूर कर दिया.

पापा के साथ भारत से आते समय मम्मी कितनी उत्साहित थीं. नए घर को सजाती, गुनगुनाती मम्मी के साथ घर में खुशी का संगीत बिखर जाता. नन्हेनन्हे हाथों से मम्मी की मदद करती 4 वर्ष की नेहल का मुंह चूमते मम्मी थकती नहीं थीं. एक दिन पापा ने मम्मी को समझाया, ‘कभी भी कोई जरूरत हो, खतरा हो, फोन पर 911 डायल कर देना. तुरंत पुलिस मदद को आ जाएगी.’

पापामम्मी के साथ नेहल और स्नेहा डिजनीलैंड गई थीं. डिजनीलैंड की सैर करतीं राजकुमारियों के परिधान में सजीं नेहल और स्नेहा की सिंडरेला, एरियल और बेल के साथ पापा ने ढेर सारी फोटो ली थीं. उन चित्रों में नेहल और स्नेहा राजकुमारी जैसी दिखतीं. मम्मी गर्व से कहतीं, ‘मेरी दोनों बेटियां सच में राजकुमारी ही लगती हैं. इन के लिए राजकुमार खोजने होंगे.’

‘अरे, देखना, हमारी राजकुमारियों को लेने खुद राजकुमार दौड़े आएंगे.’

सबकुछ कितना अच्छा था, पर अब तो वह सब सपना ही लगता है.

पापा के प्रमोशन के साथ आफिस की पार्टियां बढ़ गई थीं. कभीकभी पापा बार भी जाने लगे थे. मम्मी देर रात तक उन के इंतजार में जागती रहतीं. इस के बाद ही मम्मी बेहद उदास रहने लगी थीं. मां को रोते देख, नेहल मां से चिपट जाती.

‘मम्मी, तुम रो क्यों रही हो?’

‘कुछ नहीं, आंखों में कुछ चला गया था, बेटी.’

‘तुम्हारी आंखों में हमेशा कुछ क्यों चला जाता है, मम्मी?’

‘अब नहीं जाएगा. आदत पड़ जाएगी.’

मां के इस जवाब से संतुष्ट नेहल, उन के आंसू पोंछ देती.

अब पापा के पास घर के लिए जैसे समय ही नहीं था. नेहल और स्नेहा घर के बाहर जाने को तरस जातीं. अकसर रात में मम्मीपापा की बातें नेहल को जगा देतीं. ऐसी ही एक रात नेहल ने मम्मी को कहते सुना था :

‘मेरा नहीं तो इन बच्चियों का तो खयाल कीजिए. नेहल बड़ी हो रही है. अगर उसे सचाई का पता लगा तो सोचिए, उस पर क्या बीतेगी?’

‘वह आसानी से सचाई स्वीकार कर लेगी. यह अमेरिका है. यहां तलाक बहुत कामन बात है. उस के कई साथियों की सौतेली मां या पिता होंगे.’

‘पर हम तो अमेरिकी नहीं हैं. जरा सोचो, तुम इतने ऊंचे ओहदे पर हो, एक बार में काम करने वाली औरत के साथ संबंध जोड़ना क्या ठीक है?’

‘जूलियन बहुत अच्छी है. हालात की वजह से उसे बार में काम करना पड़ रहा है. उस का पति उसे पैसा कमाने के लिए मजबूर करता है. उस ने वादा किया है कि शादी के बाद वह काम छोड़ देगी.’

‘उस का वादा आप को याद है पर अपना वादा आप भूल गए? हमेशा मेरा साथ निभाने का वादा किया था. इन्हीं बच्चियों पर आप जान देते थे,’ मम्मी का गला रुंध गया.

‘तुम जो चाहो, करने को आजाद हो. मैं अब और साथ नहीं निभा सकता,’ रुखाई से पापा ने कहा.

‘तुम्हारे विश्वास पर ही मैं अपने पापा से रिश्ता तोड़ कर तुम्हारे साथ आई थी. मां तो पहले ही नहीं थीं. अब पापा भी साथ नहीं देंगे,’ बात पूरी करतीकरती मम्मी रो पड़ी थीं.

‘अपना रोनाधोना छोड़ो. तुम्हें हर महीने तुम्हारे खर्च के पैसे मिलते रहेंगे. जूलियन के बिना मैं नहीं जी सकता. उसे अपने पति से तलाक लेने में कुछ समय लगेगा. इस बीच तुम्हारे लिए अपार्टमेंट का इंतजाम कर दूंगा.’

‘नहींनहीं, आप ऐसा मत कहो. इन छोटी बच्चियों के साथ अकेली इस अनजाने देश में जिंदगी कैसे काटूंगी.’

‘वक्त पड़ने पर इनसान और उस की आदतें बदल जाती हैं. तुम भी हालात से एडजस्ट कर लोगी. मुझे और परेशान मत करो. अगर ज्यादा तंग किया तो कल से होटल में शिफ्ट कर जाऊंगा. मुझे नींद आ रही है.’

उस के बाद मम्मी की सिसकियां धीमी पड़ गई थीं.

सुबह मम्मी का उदास चेहरा देख, नेहल जैसे सब जान गई कि मम्मी की आंखों में अकसर कुछ क्यों पड़ जाता है. शंका मिटाने के लिए पूछ बैठी :

‘मम्मी, जूलियन कौन है?’

‘तुझे जूलियन का नाम किस ने बताया, नेहल?’

‘रात को सुना था…’

‘देख नेहल, अगर कभी तेरी मम्मी न रहे तो स्नेहा के साथ अपने नाना के पास भारत चली जाना.’

‘तुम क्यों नहीं रहोगी, मम्मी? हम ने तो नाना को कभी देखा भी नहीं है. हम तुम्हारे साथ रहेंगे,’ नेहल डर गई थी.

‘डर मत, बेटी. मैं कहीं नहीं जाऊंगी,’ डरी हुई नेहल को मां ने सीने से चिपटा लिया.

मम्मी अब अकसर बीमार रहने लगीं. असल में उन के अंदर जीने की इच्छा ही खत्म हो गई थी. डाक्टर को कहते सुना था कि बीमारी से लड़ने के लिए विल पावर का मजबूत होना जरूरी है. आप की पत्नी कोआपरेट नहीं करतीं. उन्होंने तो पहले ही हार मान ली है.

बीमारी की वजह से मम्मी और बच्चियों की मदद के लिए जरीना को बुलाया गया था. विधवा जरीना पाकिस्तान से अपने इकलौते बेटे और बहू के पास हमेशा के लिए रहने आई थीं. बहू जूलियन को सास का हमेशा के लिए आना कतई बरदाश्त नहीं था. बहू की हर बेजा बात जरीना सह जातीं. बहू के साथ बेटा भी पराया हो चुका था, यह बात जल्दी ही उन की समझ में आ गई थी. एक दिन बहू ने साफसाफ कहा, ‘इस देश में कोई मुफ्त की रोटियां नहीं तोड़ता. आप दिन भर बेकार बैठी रहती हैं. किसी के घर खाना पकाने का काम शुरू कर दें तो दिल लग जाएगा. हाथ में चार पैसे भी आ जाएंगे.’

‘क्या मैं मिसरानी का काम करूं? तुम्हारी इज्जत को बट्टा नहीं लग जाएगा?’

‘किसी भी काम को नीची नजर से नहीं देखा जाता. आप के बेटे के बौस की बीवी बीमार हैं. घर में 2 छोटी लड़कियां हैं. आप उन की मदद कर देंगी तो उन पर हमारा एहसान होगा. शायद आप के बेटे को जल्दी प्रमोशन भी मिल जाए.’

जरीना बहू को फटीफटी आंखों से देखती रह गईं. इंजीनियर बेटे की मां दूसरे के घर खाना पकाने का काम करेगी. मां के आंसुओं को नकार, एक सुबह बेटा उन्हें नेहल के घर पहुंचा आया.

संकुचित जरीना को मम्मी ने अपने प्यार और आदर से ऐसा अपनाया कि जरीना को मम्मी के रूप में एक बेहद प्यार करने वाली बेटी मिल गई. मम्मी उन्हें अम्मां पुकारतीं और बेटियों से उन का परिचय नानी कह कर कराया था. जरीना नानी का प्यार पा कर नेहल और स्नेहा खुश रहने लगीं. अच्छीअच्छी कहानियां सुना कर नानी उन का मन बहलातीं. उन की हर फरमाइश पूरी करतीं. मम्मी कहतीं, ‘आप इन्हें बिगाड़ रही हैं, अम्मां. आने वाले समय में जाने इन्हें क्या दिन देखने पड़ें.’

‘ऐसा क्यों कहती हो, बेटी. यह तो मेरी खुशकिस्मती है, जो इन की फरमाइशें पूरी कर पाती हूं. अपने पोते के लिए तो मैं….’ गहरी सांस लेती नानी आंचल से आंसू पोंछ लेतीं.

शायद मम्मी की बीमारी की वजह से पापा ने जूलियन का नाम लेना बंद कर दिया था. नेहल सोचती अगर मम्मी बीमार ही रहें तो शायद पापा जूलियन को भूल जाएं. मम्मी का उदास चेहरा देख, उसे अपने सोच पर गुस्सा आता. काश, मम्मी अच्छी हो जातीं.

अचानक एक रात पापा ने उसे यह कहते हुए उठाया था, ‘तुम्हारी मम्मी को अस्पताल ले जाना है. स्नेहा को भी उठा दो.’

– क्रमश:

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