आमिर खान : एक ही टाइम पर किया दो लोगों को डेट

बौलीवुड डंडस्ट्री के मिस्टर परफेक्शनिस्ट आमिर खान हाल ही में करण जौहर के शो कौफी विद करण में मेहमान बनकर पहुंचे. इस शो में उन्होंने अपनी जीवन से जुड़े कई राज खोले.

आमिर ने इस दौरान ये बताये कि वे पत्नी से अक्सर झूठ बोलते हैं. करण ने इस दौरान आमिर से यह भी पूछा कि क्या कभी ट्रिकी सिचुएशन से निकलने के लिए उन्होंने अपने स्टारडम का सहारा लिया है? इसपर आमिर का जवाब न था. जब आमिर से पूछा गया कि क्या कभी वे अपने समकालीन एक्टर्स की फिल्म देखते हुए सोए हैं तो आमिर का जवाब हां था.

फिर करण ने पूछा कि क्या कभी किसी को धोखा दिया है या एक ही टाइम पर दो लोगों को डेट किया है तो आमिर ने सहमति जताई. हालांकि, उन्होंने बताया नहीं कि किसे उन्होंने धोखा दिया या किसके साथ टू-टाइमिंग की है.

आमिर ने पहली पत्नी रीना दत्ता के बारे में भी बात की. उन्होंने बताया कि रीना के साथ उनकी शादी 16 साल चली थी. जब दोनों ने अलग होने के फैसला लिया तो यह उनके और रीना के लिए बहुत दर्दनाक था. हालांकि, उन्होंने चीजों को संभालने की कोशिश की. आमिर ने यह भी कहा कि रिश्ता भले ही टूट गया, लेकिन रीना के प्रति उनकी इज्जत और प्यार खत्म नहीं हुआ.

आमिर रीना को बेहतर इंसान बताते हुए कहते हैं कि उनके साथ 16 साल के रिश्ते को वे अपनी खुशकिस्मती मानते हैं. रीना और किरण के बीच की बौन्डिंग को लेकर आमिर ने कहा कि उन्हें दोनों के बीच रिश्ते सुधारने के लिए कभी कुछ नहीं करना पड़ा. आमिर के मुताबिक, दोनों ही मैच्योर हैं और उनके बीच जो अच्छी बौन्डिंग है, वह उन दोनों की वजह से है.

जिंदगी सैक्स वर्कर्स की

सांवली रंगत और औसत कदकाठी वाली नीलू (बदला हुआ नाम) का जन्म महाराष्ट्र के पुसद शहर में हुआ था. 8 भाईबहनों में एक नीलू का परिवार काफी गरीबी में गुजरबसर करता था. 13 साल की छोटी सी उम्र में उस की शादी कर दी गई. उस का पति शराबी निकला. रोज मारपीट करता.

नीलू ने 2-3 सालों तक सबकुछ सहा. इस बीच वह गर्भवती हो गई. मगर इस नाजुक स्थिति में भी किसी ने उस की सहायता नहीं की. उलटा, पति द्वारा मारपीट किया जाना जारी रहा. आजिज आ कर वह घर से भाग गई. इस दौरान उस की मुलाकात एक महिला से हुई जो उसे घरेलू काम दिलाने के बहाने नांदेड़ ले गई.

नीलू काम की चाह में नांदेड़ चली गई. बाद में उसे पता चला कि उस महिला ने उसे बेच दिया है. रोज उस के पास ग्राहक भेजे जाते. इस तरह, परिस्थितिवश, वह एक सैक्सवर्कर बना दी गई.

एक साल बाद वहां के दलाल ने उसे राजस्थान के बीकानेर शहर में ला कर बेच दिया. करीब 6 महीने तक बीकानेर में रहने के बाद वह वापस भाग कर पुसद आ गई.

फिलहाल नीलू पुसद में भाड़े के घर में अपने पार्टनर के साथ रह रही है. उस की उम्र अब 24 साल है और बेटा 8 साल का हो चुका है. वह अपने बच्चे को पढ़ा रही है, साथ ही सैक्सवर्कर का काम भी कर रही है. वह अब इस बात की परवा नहीं करती कि समाज क्या कहेगा.

कुछ ऐसी ही कहानी सविता की भी है. सविता की शादी कम उम्र में हो गई थी. जल्दी ही उस की 2 बेटियां भी पैदा हुईं मगर वैवाहिक जीवन ज्यादा चल नहीं सका. सविता का तलाक हो गया. वह अपनी दोनों बेटियों के साथ अलग रहने लगी. इस बीच, उस की छोटी बेटी ने गलती से चूहे मारने की दवा पी ली.

सविता तुरंत उसे अस्पताल ले कर गई. डाक्टरों ने कहा कि बच्ची को आईसीयू में रखना होगा और कुल खर्च 16 हजार रुपए से जयादा आएगा.

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यह बात करीब 14-15 वर्षों पहले की है. सविता के पास उस वक्त बिलकुल भी रुपए नहीं थे. वह बहुत परेशान हो गई कि इतने पैसे कहां से आएंगे. तब उस की एक सहेली उसे रुपए देने को तैयार हो गई. वह सहेली एक सैक्सवर्कर थी. उस ने शर्त रखी थी कि सविता को भी इस पेशे में आना होगा. सविता के पास कोई और चारा नहीं था. सहेली से रुपए ले कर उस ने बेटी का इलाज कराया. बाद में स्वयं एक सैक्सवर्कर बन गई. सहेली उस के पास ग्राहक भेजने लगी.

इन दोनों की तरह भारत में कितनी ही ऐसी महिलाएं हैं जो इस पेशे से जुड़ी हैं. आंकड़ों की मानें तो अकेले भारत में 1.2 करोड़ से ज्यादा सैक्सवर्कर हैं.

सैक्सवर्कर या वेश्या, यानी वह स्त्री जो अपने शरीर का सौदा करती है. सामान्यतया हम वेश्याओं को बहुत ही नीची नजरों से देखते हैं. इस पेशे को समाज के लिए कलंक और इस से जुड़ी महिलाओं को तुच्छ समझते हैं.

इतिहास पुराना है

देखा जाए तो भारत में वेश्यावृत्ति का इतिहास बहुत पुराना है. बहुत पहले भारत के कुछ हिस्सों में यह पेशा दरबारी नर्तकी कहलाता था. ये ऐसी महिलाएं होती थीं जो शिक्षित होने के साथसाथ नृत्य, संगीत, राजनीति, साहित्य जैसी विभिन्न विधाओं में भी पारंगत होती थीं. ये पुरुषों को रिझाने और उन का मन बहलाने का काम करती थीं. इस में सैक्स इन्वौल्व हो भी सकता था और नहीं भी. ये महिलाएं राजनीति, सेना, प्रशासन से जुड़े अहम फैसलों को भी प्रभावित करती थीं.

मुगलजान भी एक दरबार में थी जो गायिका और लेखिका भी थी. वह मिर्जा गालिब जैसे मशहूर कवि की कविताओं को संगीत देती थी. बेगम सामरा भी एक दरबारी नर्तकी थी, जिस ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश पर शासन भी किया. इसी तरह मारन सरकार, जो एक नर्तकी थी, 1802 में राजा रणजीत सिंह की रानी बनी. उसे लोगों ने बहुत इज्जत दी.

मुगल शासनकाल में भी ऐसी महिलाएं थीं. तब इन का नाम तवायफ होता था. तवायफें आमतौर पर नृत्य कर के पुरुषों का मनोरंजन करतीं. शारीरिक जुड़ाव जरूरी नहीं था. मुगल बादशाहों, जमींदारों, अमीरों और दरबारियों ने इन्हें संरक्षण दिया था. राजा जहांगीर के हरम में 6 हजार से ज्यादा तवायफें थीं जिन्हें धन, सत्ता और शक्ति सब हासिल थे. इस से पहले मंदिरों में देवदासी प्रथा थी. यह अभी भी चल रही है.

दिल्ली में एक जानामाना रैडलाइट एरिया जीबी रोड है. सैक्सवर्कर महिलाओं के कारण यह इलाका सदैव ग्राहकों व दलालों से भरा होता है. मध्यवर्ग व उच्चवर्ग के अधेड़ और कमउम्र लड़के भी बड़ी संख्या में यहां पहुंचते हैं. दिल्ली के खास उच्चवर्ग के सदस्यों को यहां के मशहूर कोठा नंबर 64 के आसपास चक्कर लगाते हुए अकसर देखा जा सकता है.

मुंबई का कामाठीपुरा, कोलकाता का सोनागाछी, ग्वालियर का रेशमपुरा, पुणे का पैठ आदि भी बदनाम इलाके हैं. इन में ज्यादातर लड़कियां नेपाल और बंगलादेश से ट्रैफिकिंग द्वारा लाई जाती हैं. महज 10-12 साल की आयु में इन्हें मुंबई, कोलकाता आदि के वेश्यालयों में बेच दिया जाता है. ये बुरी तरह इस चंगुल में फंस जाती हैं. इन का निकलना कठिन हो जाता है.

भारत में वेश्यावृत्ति के कई रूप हैं जिन में प्रमुख हैं :

  • स्ट्रीट प्रौस्टिट्यूट
  • बार डांसर्स
  • कौल गर्ल्स
  • रिलीजियस प्रौस्टिट्यूट
  • एस्कौर्ट गर्ल्स
  • रोड साइड ब्रोथेल
  • चाइल्ड प्रौस्टिट्यूट

हमारे देश का कानून वेश्यावृत्ति पर शिकंजा कसता है. इस से जुड़े और इसे चलाने व संरक्षण देने वालों को सजा दिए जान का प्रावधान है. होटल, लौज के या दूसरे कमरों को खुलेआम वेश्यालय के रूप में प्रयोग करने वालों को कानूनी गिरफ्त में लिया जा सकता है.

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ऐसी महिलाओं का जीवन आसान नहीं होता. अपने पेशे की वजह से इन्हें कई तरह की बीमारियां होने का खतरा रहता है, जिन में सब से प्रमुख एचआईवी यानी एड्स है. सविता बताती है कि अकसर ग्राहक सुरक्षा का उपाय नहीं करते, जिस से इस तरह की बीमारियों के होने का खौफ बना रहता है. इस के अलावा सर्वाइकल कैंसर, साइकोलौजिकल डिस्और्डर्स आदि होने के खतरे बने रहते हैं.

नाइंसाफी

सैक्सवर्कर्स एक ऐसा शब्द है जिसे सुनते ही अकसर तथाकथित सभ्य घरानों के लोग अपनी भौंहें चढ़ा लेते हैं. इस काम से जुड़ी महिलाओं को लोग नीची नजरों से देखते हैं. वे इन का साया भी अपने घर क्या, महल्ले तक से दूर रखना चाहते हैं. पर अफसोस कि इन्हीं सभ्य घराने के पुरुष यदि इन महिलाओं के दर पर जाते हैं तो किसी को कोई आपत्ति नहीं होती.

स्वस्ति संस्था की रीजनल औफिसर गिरिजा ठाकुर कहती हैं, ‘‘पुरुष वही काम करे तो उस के चरित्र पर कलंक नहीं लगता मगर स्त्री करे तो उसे कुलटा करार दिया जाता है. धर्म भी उन की इस स्थिति का जिम्मेदार है. धर्मगुरु नहीं चाहते कि वे वापस समाज में स्थान पाएं. धर्म ने लोगों को गुलाम बनाया हुआ है ताकि लोग धर्मगुरुओं से डरें. स्त्री यदि मजबूरीवश इस काम को अपना व्यवसाय बनाती है तो इतनी हायतोबा क्यों?’’

सामाजिक कार्यकर्ता अनुजा कपूर कहती हैं, ‘‘वेश्याएं भी इंसान हैं, इन्हें भी जीने का हक है. मगर समाज इन पर ‘गंदी औरत’ का तमगा लगा देता है और इन्हें जलालतभरी नजरों से देखता है. कोई वेश्या अस्पताल जाती है तो इस के इलाज की सही व्यवस्था नहीं हो पाती. इन के साथ अन्याय होता है. कोई इन के पैसे छीनता है तो ये महिलाएं कहीं जा कर गुहार नहीं लगा सकतीं. सरकार द्वारा इन के पुनर्वास की व्यवस्था नहीं की जाती. इस वजह से इन्हें इसी व्यवसाय को करते रहना पड़ता है. यदि सनी लियोनी को समाज पलकों पर बिठा सकता है तो दूसरी महिलाओं ने क्या दोष किया है? सब को मौका मिलना चाहिए अपनी जिंदगी संवारने का. समाज को इन्हें सहजरूप से स्वीकार करना चाहिए.’’

वेश्यावृत्ति दुनिया के सब से पुराने पेशों में से एक है. बंगलादेश समेत ऐसी बहुत से देश हैं जहां इसे एक काम का दरजा दिया गया और इसे कानूनी माना गया है.

बंगलादेश की राजधानी ढाका में टैंजिल नामक इलाके में कांडापारे नामक बाजार है. यह वहां का सब से पुराना और बड़ा वेश्यालय है. पिछले 200 सालों से यहां इस तरह का काम होता रहा है. 2014 में इसे नष्ट कर दिया गया था, मगर स्थानीय एनजीओ की सहायता से इसे फिर से शुरू किया गया है.

हाल ही में एक फोटो जर्नलिस्ट वहां घूम कर आई और वहां की जिंदगी का आंखोंदेखा हाल बयान किया. अमूमन 12-14 वर्षों की उम्र की अवस्था में लड़कियां इस पेशे में आती हैं. उस वक्त वे बंधुआ होती हैं. उन्हें किसी तरह का अधिकार नहीं होता. उन बंधुआ लड़कियों की एक मालकिन होती है. वे अपनी मालकिन की गुलाम होती हैं. कम से कम 5 सालों तक उन्हें बाहर जाने की अनुमति नहीं होती, न ही उन्हें अपने काम का कोई पारिश्रमिक ही मिलता है.

जब वे अपना कर्ज चुका लेती हैं तो स्वतंत्ररूप से अपना काम कर पाती हैं. उन्हें हक मिल जाता है कि वे अपने रुपए अपने पास रख सकें या फिर किसी ग्राहक से न कह सकें.

ऐसा ही कुछ हाल भारत में भी है. शुरुआत के कई साल यहां भी सैक्सवर्कर का अपनी कमाई पर हक नहीं होता. वह एक गुलाम होती है.

मलाल क्यों

नीलू बताती है, ‘‘शुरुआत में एक ग्राहक से उसे 100 रुपए मिलते थे. इस में से 50 रुपए ही उस के होते. बाकी के 50 रुपए दलाल को देने पड़ते थे. अब उसे इस बात का डर नहीं लगता कि लोग क्या कहेंगे. जब वह मजबूर थी तो किसी ने उस का साथ नहीं दिया. सब ने अपना स्वार्थ देखा. अब भला

वह किसी की परवा क्यों करे? जिसे जो सोचना है, सोचे, वह अपना काम कर रही है, ताकि अपना व बच्चे का पेट पाल सके और बच्चे को शिक्षा दिला सके.’’

यह कहानी सिर्फ नीलू की नहीं, बल्कि ऐसी कितनी ही सैक्सवर्कर्स की है जो परिस्थितिवश आजीविका के लिए इस क्षेत्र में आई हैं. मगर इस बात का अब उन्हें मलाल नहीं. हां, वे जमाने के नजरिए और अपने साथ हो रही ज्यादतियों से परेशान जरूर रहती हैं.

सवाल यह भी उठता है कि इन महिलाओं को खुलेआम किसी को अपना पेशा बताने का हक क्यों नहीं? जिस तरह वकील और डाक्टर अपने नाम के साथ पेशा लिख सकते हैं, उसी तरह ये महिलाएं अपना पेशा बिना डरे, उजागर क्यों नहीं कर सकतीं?

पुलिस की ज्यादती

सैक्सवर्कर सविता कहती है, ‘‘हम मोबाइल के जरिए ग्राहकों से संपर्क करते हैं. कम उम्र में मैं 2-3 हजार रुपए तक कमा लेती थी. इन्हीं पैसों से मैं ने अपनी दोनों बेटियों की शादी अच्छे घरों में कर दी. मगर अब मेरा धंधा बहुत मंदा पड़ गया है. उम्र बढ़ने के साथसाथ काम घटता गया. उस पर ज्यादतियों का सामना भी करना पड़ता है. पुलिस अकसर हमारे अड्डों पर रेड डालती है. अक्तूबर 2016 में हमारे लौज पर पुलिस ने रेड डाली. मैं पकड़ी गई और करीब 22 दिनों तक पुलिस कस्टडी में रही. अब मुझे इस काम में डर लगने लगा है. ग्राहकों की संख्या भी घटने लगी है.’’

दरअसल, उम्र बढ़ने के साथ इन महिलाओं का शरीर गिरने लगता है और चेहरे पर भी पहली जैसी रौनक नहीं रह जाती. ऐसे में इन की कमाई कम हो जाती है. इन्हें कई बार साथ रहने के लिए

पार्टनर मिल जाता है मगर शादी नहीं होती. ऐसे में उम्र बढ़ने के बाद ये किसी पुरुष पर आश्रित रहना नहीं चाहतीं. इसलिए समय रहते ही वे अपना घर और बच्चों से जुड़े दायित्त्व पूरे कर लेना चाहती हैं.

जिंदगी बहुत छोटी है और यह अपने वश में भी नहीं. तो फिर जमाने की परवा क्यों की जाए. सभी को हक है कि वे अपने तरीके से जिएं. वक्त और परिस्थितियों ने जिन्हें जिस मुकाम पर खड़ा किया है, वहीं से उन्हें अपनी जिंदगी के रास्ते ढूंढ़ने होते हैं.

कोई भी पेशा गंदा नहीं होता और यदि होता है तो स्त्रीपुरुष दोनों के लिए उस के मापदंड एक होने चाहिए.

सुरक्षित भविष्य के लिए मार्गदर्शन जरूरी

कुछ संस्थाएं हैं जो जिस्मफरोशी करने वाली महिलाओं की सहायता करती हैं. स्वस्ति एक ऐसी ही संस्था है जो फैक्टरी वर्कर्स, सैक्सवर्कर्स और शहरी कमजोर तबके के लोगों के स्वास्थ्य व बेहतर जिंदगी के लिए काम करती है.

इस संस्था से जुड़े रोहन देशपांडे कहते हैं, ‘‘हम अपने प्रोग्राम के तहत सैक्सवर्कर्स को वित्तीय ज्ञान और सुरक्षा देते हैं. हम उन्हें पैसों को खर्च करने और उन्हें भविष्य को सुरक्षित रखने से जुड़ी वित्तीय योजनाओं की जानकारी देते हैं ताकि वे अपने पैसों का समुचित प्रयोग कर सकें. उन्हें अपने आईडैंटिटी कार्ड्स जैसे पैन कार्ड, आधार कार्ड आदि बनवाने में भी सहायता करते हैं.

‘‘यदि कोई सैक्सवर्कर उम्रदराज हो गई है या वह अब यह काम नहीं करना चाहती तो हम उसे वैकल्पिक आय के स्रोतों की जानकारी देते हैं. जरूरी हुआ तो ट्रेनिंग भी दी जाती है. हमारे पास सैल्फहैल्थ गु्रप हैं जिन के जरिए उन्हें आसानी से लोन मिल जाता है और सैक्सवर्कर्स छोटेछोटे बिजनैस की शुरुआत भी कर सकती हैं.’’

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भोजपुरी की सनी लियोनी का जलवा

भोजपुरी फिल्मों की सनी लियोनी कही जाने वाली सनी सिंह का असली नाम शायद ही कोई जानता हो, क्योंकि सनी लियोनी की तरह दिखने वाली पल्लवी सिंह ने अपना नाम बदल कर सनी सिंह जो रख लिया है. उन के चेहरे व बदन की बनावट हूबहू सनी लियोनी से मिलती है इसीलिए उन के फैन उन्हें सनी लियोनी ही कह कर बुलाते हैं.

सनी सिंह उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले की रहने वाली हैं. उन्होंने भोजपुरी फिल्मों में ऐक्टिंग की शुरुआत सुपरस्टार पवन सिंह के साथ फिल्म ‘लेके आजा बैंडबाजा ए पवन राजा’ में पवन सिंह की साली के रोल से की थी. वे भोजपुरी फिल्म ‘विधायकजी’, ‘भोजपुरिया राजा’, ‘तीन बुरबक’ समेत उडि़या फिल्म ‘टाइगर’ में अपनी अदाकारी का लोहा मनवा चुकी?हैं.

पेश हैं, सनी सिंह से हुई बातचीत के खास अंश:

भोजपुरी फिल्मों में कैसे आना हुआ?

मैं कालेज टाइम से ही थिएटर से जुड़ी रही हूं. स्टेज पर की गई ऐक्टिंग की तारीफ मेरे दोस्तों और रिश्तेदारों ने हमेशा ही की. उन लोगों का कहना था कि मैं एकदम हीरोइन लगती हूं.

इस दौरान एक दोस्त के जरीए मुझे भोजपुरी फिल्मों में ऐक्टिंग करने का औफर मिला. चूंकि मेरा पहले से ही ऐक्टिंग की तरफ रुझान था इसलिए मैं ने इस मौके को गंवाना ठीक नहीं समझा और तुरंत हां कर दी.

यह फिल्म ‘लेके आजा बैंडबाजा ए पवन राजा’ थी जिस में मुझे पहली बार में ही भोजपुरी के सुपरस्टार पवन सिंह के साथ काम करने का मौका मिला था.

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आप ने अपना असली नाम पल्लवी सिंह से बदल कर सनी सिंह क्यों रखा?

मैं सनी लियोनी से प्रभावित रही हूं लेकिन मैं ने अपना नाम सनी सिंह खुद ही नहीं रखा. यह नाम मुझे भोजपुरी इंडस्ट्री से ही मिला है क्योंकि भोजपुरी फिल्मों में काम करने के दौरान लोग मुझे असली नाम से न बुला कर सनी लियोनी के नाम से ही बुलाते थे. उन का कहना था कि मैं एकदम सनी लियोनी जैसी लगती हूं, इसलिए मुझे इसी नाम से भोजपुरी इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनानी चाहिए.

मैं ने लोगों की मांग पर अपना नाम पल्लवी सिंह से बदल कर सनी सिंह कर लिया और आज यही बदला हुआ नाम मेरी पहचान बन गया है.

आप फिल्मों में आइटम डांस में ज्यादा नजर आती हैं. क्या आप को दूसरी हीरोइनों की तरह लीड रोल वाली फिल्में नहीं मिल रही हैं?

ऐसा बिलकुल नहीं है. मैं ने अभी तक सिर्फ 2 फिल्मों में ही आइटम डांस किया है, जबकि 8 फिल्मों में मैं ने बतौर हीरोइन काम किया है.

पर आप ने सैकंड लीड वाली फिल्में ज्यादा की हैं. क्या वजह रही है कि आप को मेन लीड की फिल्में नहीं मिल रही हैं?

इस की वजह यह रही है कि मैं भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में किसी की मदद के बिना ही आई हूं. इस इंडस्ट्री में मैं ने जो भी मुकाम हासिल किया है वह खुद के हुनर की बदौलत हासिल किया है. ऐसे में खुद को साबित करने के लिए वक्त तो लगता ही है. वैसे, आने वाली कई फिल्मों में मैं लीड रोल में नजर आने वाली हूं.

मैं रितेश पांडेय के साथ फिल्म ‘किस में कितना है दम’ कर रही हूं. इस फिल्म में मैं लीड रोल में दिखूंगी.

अगर आप को भोजपुरी फिल्मों में सनी लियोनी की तरह बोल्ड सीन करने का औफर मिले तो खुद को तैयार कर पाएंगी?

सनी लियोनी की तरह तो नहीं लेकिन स्क्रिप्ट की मांग रही तो अभी तक जितना किया है उतना बोल्ड सीन करने में कोई गुरेज नहीं होगी.

सुना है कि आप के परिवार वालों को आप के ऐक्टिंग करने पर एतराज है? ऐसे में फिल्मों में खुद को बनाए रखना कितना मुश्किल रहा?

मैं उत्तर प्रदेश के उस शहर से हूं, जहां तमाम तरह की बंदिशें लगाई जाती हैं. मुझे भी इन्हीं बंदिशों का सामना करना पड़ा. जब मैं ने अपने मातापिता और परिवार वालों को भोजपुरी फिल्मों में काम करने की बात बताई तो मातापिता का कहना था कि फिल्म में काम करने के बजाय नौकरी कर लो. लेकिन फिल्मों में ऐक्टिंग के मेरे रुझान और जुनून को देखते हुए बाद में वे बोले कि ठीक है, पर संभल कर काम करना.

आप की आने वाली फिल्में कौन कौन सी हैं? आप का इन फिल्मों में किस तरह का रोल है?

मेरी कई फिल्में आ रही हैं. इन में ‘गदर 2’, ‘तुम्हीं तो मेरी जान हो राधा’, ‘सुनो ससुरजी 2’, ‘चोर मचाए शोर’ और ‘किस में कितना है दम’ खास हैं.

‘गदर 2’ भारत पाकिस्तान के रिश्तों पर बनी फिल्म है. मैं ने फिल्म ‘चोर मचाए शोर’ में एक मजबूत लड़की का किरदार निभाया है. सुब्बा राव की फिल्म ‘सुनो ससुरजी’ में एक प्रमोशनल गाना किया है.

आप खुद को फिट व बोल्ड बनाए रखने के लिए क्या करती हैं?

अब वह जमाना गया, जब भोजपुरी हीरोइनों का फिगर भरापूरा हुआ करता था और लोग उस तरह की हीरोइनों को पसंद करते थे. अब भोजपुरी में फिट और स्लिम हीरोइनों को ही पसंद किया जाता है, इसलिए मैं अपनी फिटनैस को ले कर काफी सजग रहती हूं.

मैं खुद को फिट बनाए रखने के लिए रोजाना जिम जाती हूं और अपने खानपान का खासा खयाल रखती हूं.

आदिवासी वोट बैंक में सेंधमारी की तैयारियां शुरू

8 दिसंबर, 2003 को मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के बाद वोटों की गिनती के वक्त जब कांग्रेस बहुत पिछड़ने लगी थी तब भी तब के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह यह मानने को तैयार नहीं हो रहे थे कि वोटर ने उन्हें और कांग्रेस को खारिज कर दिया है. लेकिन जैसे ही आदिवासी बाहुल्य जिले झाबुआ से ऐसे रुझान आने शुरू हुए कि कांग्रेस यहां भी भाजपा से पिछड़ रही है तब एकाएक ही दिग्विजय सिंह मतगणना बीच में ही छोड़ कर चलते बने थे.

जाहिर है, उन्हें समझ आ गया था कि जब आदिवासी इलाकों में ही कांग्रेस पिछड़ रही है तो सत्ता की उम्मीद रखना मन बहलाने जैसी बात है.

ऐसा पहली दफा हुआ था कि आदिवासी बाहुल्य सीटों पर भाजपा ने बाजी मार ली थी. इस के बाद से हर चुनाव में आदिवासी भाजपा को जिताते रहे थे, तो इस की वजहें भी थीं. लेकिन क्या इस साल के विधानसभा चुनाव में यह चलन कायम होगा कि आदिवासी वोट भाजपा को जाएं?

इस बात में अब शक पैदा होने लगा है. आदिवासी बाहुल्य इलाकों में भाजपा ताबड़तोड़ तैयारियां कर रही है तो इस से उस की चिंता ही जाहिर होती है कि इस दफा जीत आसान नहीं है.

आजादी के बाद से ही आदिवासी कांग्रेस को वोट देते आए थे क्योंकि तब कोई दूसरी पार्टी आदिवासी इलाकों में प्रचार के लिए नहीं जाती थी और आदिवासी भी कांग्रेस को अपनी हमदर्द पार्टी मानते थे. धीरेधीरे उन की गलतफहमी दूर हुई और भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने आदिवासी इलाकों में जा कर प्रचारप्रसार शुरू किया तो आदिवासियों का झुकाव भाजपा की तरफ बढ़ने लगा.

एक तरफ आदिवासियों की अनदेखी की सजा भुगत रही कांग्रेस को अब अपने परंपरागत वोटों की याद आने लगी है तो दूसरी तरफ आदिवासियों को भी लगने लगा है कि वे पिछले सालों से भाजपा के हाथों वैसे ही ठगे जा रहे हैं जैसे पहले कांग्रेस के हाथों ठगे जाते थे.

ऐसे में यह अब बेहद दिलचस्प बात हो चली है कि इस बार आदिवासी किसे चुनेंगे? उन के पास 2 ही रास्ते हैं, भाजपा या कांग्रेस. कांग्रेस को राहत देने वाली एकलौती बात यह है कि आदिवासी भाजपा की भी हकीकत समझने लगे हैं इसलिए वे वापस उस की तरफ झुकेंगे. दूसरी तरफ भाजपा की कोशिश यह है कि जैसे भी हो, इन वोटों का बहाव कांग्रेस की तरफ जाने से रोका जाए.

कौन कितना भारी

मध्य प्रदेश की राजनीति में यह बात आईने की तरह साफ है कि आदिवासी जिस तरफ वोट कर देते हैं उस का पलड़ा भारी हो जाता है. 230 सीटों में से अनुसूचित जनजाति यानी आदिवासियों के लिए 47 सीटें रिजर्व हैं. इन में से साल 2013 के चुनाव में भाजपा ने 32 और कांग्रेस ने 15 सीटों पर बाजी मारी थी.

बात या लड़ाई अकेली 47 रिजर्व सीटों की न हो कर उन 60 सीटों की भी है जिन पर आदिवासी समुदाय के वोट खासी तादाद में हैं यानी 100 सीटों पर पार्टियों की किस्मत आदिवासी तय करेंगे, जो आज भी इन पार्टियों की निगाह में पकापकाया वोट बैंक है. इस वोट बैंक को लुभाने में दोनों पार्टियां कोई कसर नहीं छोड़ रही हैं.

9 अगस्त, 2018 को मध्य प्रदेश में सरकारी तौर पर ‘विश्व आदिवासी दिवस’ धूमधाम से मनाया गया. इस बाबत 20 जिलों में सरकार ने छुट्टी का ऐलान किया था.

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने धार में आदिवासी दिवस मनाया जहां 15 दिन पहले से तैयारियां शुरू हो गई थीं. इस दिन शिवराज सिंह चौहान और उन की पत्नी साधना सिंह आदिवासियों सरीखी ड्रैस में तकरीबन एक घंटा आदिवासियों के साथ नाचेगाए, उनके हाथ में तीरकमान थे जो निमाड़ इलाके के भील आदिवासियों की पहचान हैं.

भारीभरकम तैयारियों और इंतजाम के बावजूद धार में उतनी भीड़ जुटी नहीं जितनी भाजपा को उम्मीद थी. बात उस वक्त और बिगड़ गई जब कुछ आदिवासियों ने मीडिया को बताया कि उन्हें मुख्यमंत्री के लिए प्रोग्राम में शिरकत करने करने के लिए 300-300 रुपए दिए गए हैं.

कुछ आदिवासियों ने बताया कि वे तो नजदीक से हैलीकौप्टर देखने के लिए आए हैं. यानी आदिवासी अपनी मरजी से प्रोग्राम में नहीं आए थे, बल्कि कुछ को लालच दे कर लाया गया था तो कुछ की मंशा हैलीकौप्टर देखने की थी.

यही कांग्रेस के जमाने में होता था कि कांग्रेस कार्यकर्ता और सरकारी मुलाजिम आदिवासियों को घेर कर लाते थे, भीड़ दिखाते थे और जलसा खत्म होते ही छू हो जाते थे.

कांग्रेसी नेता भी शिवराज सिंह चौहान की तरह आदिवासियों जैसे कपड़े पहन कर हाथ में तीरकमान वगैरह ले कर आदिवासियों को रिझाने की कोशिश करते थे. इस लिहाज से भाजपा को खुश होने के बजाय चिंता और सोचने की जरूरत है कि आखिर क्यों आदिवासी उस से छिटकने लगे हैं और मुख्यमंत्री के ऐलानों पर कान नहीं दे रहे हैं?

भाजपा की एक बड़ी दिक्कत बड़े आदिवासी चेहरे का न होना भी है. कहने को तो उस के पास विजय शाह, ओमप्रकाश धुर्वे, अंतर सिंह आर्य और ज्ञान सिंह जैसे नेता हैं लेकिन इन की हालत इन्हीं के इलाकों में कमजोर आंकी जा रही है. केंद्रीय मंत्रिमंडल के पिछले फेरबदल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फग्गन सिंह कुलस्ते को बाहर का रास्ता दिखा दिया था. इस से भी आदिवासी समुदाय में भाजपा की इमेज बिगड़ी है.

इस के उलट कांग्रेस में रतलाम के सांसद कांतिलाल भूरिया कद्दावर आदिवासी नेता हैं जिन्होंने साल 2015 के लोकसभा उपचुनाव में भाजपा उम्मीदवार निर्मला भूरिया को हराते हुए कांग्रेस में उम्मीद जगाई थी कि अगर कोशिश की जाए तो अभी भी यह वोट बैंक अपने खाते में वापस लाया जा सकता है.

गौरतलब है कि यह सीट साल 2014 में भाजपा के दिलीप सिंह भूरिया ने जीती थी. दिलचस्प बात यह है कि भाजपा ने यह उपचुनाव जीतने के लिए एड़ीचोटी का जोर लगा दिया था, तब उन पर चूडि़यां, साडि़यां, शराब और मुरगे तक बांटने के आरोप लगे थे.

साल 2008 में रिजर्व 47 सीटों में से कांग्रेस को 17 सीटें मिली थीं जो साल 2013 में घट कर 15 रह गई थीं. साल 2003 में जब दिग्विजय सिंह वाली कांग्रेस सत्ता से गई थी तब आदिवासी सीटों ने पहली दफा चौंका देने वाले नतीजे दिए थे. तब 44 रिजर्व सीटों में से उसे महज 2 सीटों से तसल्ली करनी पड़ी थी और भाजपा 41 रिकौर्ड सीटें ले गई थी.

इस बार इन सीटों को ले कर कोई पार्टी बेफिक्र नहीं है तो इस की नई वजह पढ़ेलिखे आदिवासी नौजवानों का बनाया गया संगठन जयस यानी जय आदिवासी युवा संगठन भी है जो तेजी से आदिवासियों में पैठ बना रहा है.

भाजपा को जयस से खतरा

जयस का गठन तकरीबन 6 साल पहले एक नौजवान डाक्टर हीरालाल अलावा ने किया था जो दिल्ली के एम्स जैसे नामी अस्पताल की नौकरी छोड़ कर एक मिशन में लग गए हैं. इस संगठन का मकसद वही है जो आमतौर पर आदिवासियों के हितों के लिए हर नए संगठन का होता है. मसलन, आदिवासियों को शोषण से आजादी दिलाना, उन के संवैधानिक हक दिलाना और नौजवानों के लिए रोजगार दिलाना.

जयस के मुखिया के मुताबिक, अब तक इस संगठन से 10 राज्यों के कोई 10 लाख आदिवासी नौजवान जुड़ चुके हैं.

साल 2017 में जब निमाड़ इलाके के कालेजों में छात्र संघों के चुनाव नतीजे आए थे तो सभी चौंके थे. वजह, धार, बड़वानी अलीराजपुर, कुक्षी और झाबुआ सहित अधिकतर जिलों में जयस समर्थित आदिवासी छात्र संगठन ने भारी जीत दर्ज की थी.

इस जीत के अपने अलग माने थे जिस के तहत आदिवासी नौजवानों ने यह कहा था कि उन्होंने मनुवादी ताकतों को हरा दिया. निमाड़ इलाके के कालेजों के छात्रसंघों पर अभी तक भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समर्थित अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) का कब्जा था जिसे आदिवासी छात्र संगठन ने एक झटके में ढहा कर भाजपा को चिंता में डाल दिया था. जयस को आदिवासियों को हिंदू कहे जाने और मनवाए जाने पर भी एतराज है.

जैसेतैसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा आदिवासियों को धर्म के नाम पर बहलाफुसला कर अपने पाले में लाए थे लेकिन आदिवासियों की नई पीढ़ी जैसे ही जयस की तरफ जाती दिखी तो भाजपा ने अपनी चालें चलनी शुरू कर दी हैं.

धार जिले के अरविंद मुझालदा जयस से जुड़े हैं. उन के मुताबिक, छात्र संघोें के नतीजों ने साबित कर दिया है कि आदिवासी समुदाय अभी जिंदा है और सियासी पार्टियों के खेल को समझ गया है.

गौरतलब है कि धार के सरकारी कालेज की जनभागीदारी समिति की अध्यक्ष वहां की विधायक नीना वर्मा हैं जिन के पति विक्रम वर्मा दिग्गज भाजपाई नेता हैं. इस के बाद भी एबीवीपी नहीं जीत पाई तो तय है कि विधानसभा चुनाव भाजपा को भारी पड़ेंगे क्योंकि जयस मनुवाद और हिंदूवाद का खुला विरोधी है.

विधानसभा चुनावों में जयस के रोल के बारे में पूछे जाने पर उस के मुखिया हीरालाल अलावा ने बताया कि जयस 47 रिजर्व सीटों समेत तकरीबन 60 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ेगा.

उन के मुताबिक, भाजपा अब बौखला कर आदिवासियों के बीच फूट डालने की कोशिश कर रही है जिसे कामयाब नहीं होने दिया जाएगा.

बकौल हीरालाल, आदिवासी समाज अब अपनी ताकत और हक समझने लगा है जो उसे राजनीति से ही मिलना मुमकिन है. जयस का नारा ‘अब की बार आदिवासी सरकार’ है. उन्होंने बताया कि वे कम से कम 20 सीटें ले कर सरकार में भागीदारी करेंगे जिस से कि सरकार पर दबाव बना रहे.

इस में कोई शक नहीं कि निमाड़ अंचल के पढ़ेलिखे आदिवासी नौजवानों का झुकाव तेजी से जयस की तरफ बढ़ रहा है लेकिन ग्वालियर, चंबल, महाकौशल और बुंदेलखंड इलाकों में उस का असर न के बराबर है. ऐसे में निमाड़ इलाके की लगभग 20 सीटों पर भी जयस भाजपा को नुकसान पहुंचाने में कामयाब रही तो इस का सीधा फायदा कांग्रेस को मिलना तय है.

कांग्रेस बेफिक्र क्यों

शिवराज सिंह चौहान, भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तीनों ने अपनी ताकत निमाड़ इलाके में झोंक रखी है. इस से कांग्रेस को दोहरा फायदा हो रहा है. महाकौशल इलाके में कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ की पैठ किसी सुबूत की मुहताज नहीं है तो ग्वालियर चंबल इलाकों में चुनाव प्रभारी ज्योतिरादित्य सिंधिया की इमेज काफी अच्छी है जो अटेर, कोलारस और अशोकनगर विधानसभा उपचुनावों में जीत की शक्ल में दिख भी चुकी है.

इन इलाकों की आदिवासी सीटों पर कांग्रेस को बैठेबिठाए फायदा मिलना तय दिख रहा है. वजह, 15 सालों में आदिवासियों के भले के लिए उतने काम हुए नहीं हैं जितने कि गिनाए जा रहे हैं.

इंदौर के एक इंजीनियरिंग कालेज में पढ़ रहे भील समुदाय के एक छात्र जेएस मुबेल की मानें तो मुमकिन है कि निमाड़ इलाके में कांग्रेस जयस के साथ कोई समझौता कर ले. इस से उसे इन इलाकों में भी सहूलियत होगी.

जेएस मुबेल मानते हैं कि कांग्रेसी राज में भी आदिवासियों के लिए कुछ नहीं हुआ था लेकिन अब जयस के बैनर तले पढ़ेलिखे आदिवासी हालफिलहाल कम ही सही मैदान में हैं और वे कांग्रेस पर दबाव बना कर रखेंगे.

आदिवासी बाहुल्य सीटों पर दिनोंदिन दिलचस्प होती जा रही यह लड़ाई अब शबाब पर है और इस में कुछ और नए पहाड़े जुड़ेंगे, लेकिन फिलहाल भाजपा की हवा खिसकी हुई है जिस के हाथ से जीती बाजी फिसल रही है क्योंकि यही 70-80 सीटें सरकार बनाने में अहम रोल निभाती हैं.

मीडिया की जरूरत पाठक दर्शक

देश का मीडिया आजकल कई तरह की चुनौतियों से जूझ रहा है. सब से बड़ी बात यह है कि पाठकों और दर्शकों की मुफ्त में बिना पैसे दिए जानकारी पाने की भूख मीडिया की जड़ों में तेजाब डाल रही है. एक आइसक्रीम, पिज्जा या डोसे के लिए लोग दोगुने तीनगुने पैसे देने को तैयार हैं पर पढ़ या देख कर जानकारी हासिल करने के लिए वे पैसे देने में आनाकानी कर रहे हैं.

सिनेमा जगत ने तो अमीरों को मल्टीप्लैक्सों से आकर्षित कर लिया है जहां मनोरंजन और कोरा मनोरंजन, खानेपीने की सुविधा के साथ परोसा जा रहा है, लेकिन सोचविचार व सूचना वाला मीडिया, जो पहले पाठकों के बल पर स्टीलफ्रेम की तरह मानवाधिकारों, समाज सुधारों, राजनीतिबाजों को नियंत्रित करने के लिए खड़ा रहता था, आज पाठकोंदर्शकों की उदासीनता का शिकार हो रहा है. ऐसा खासतौर पर हो रहा है पर भारत में, लेकिन दूसरे देश भी इस से अछूते नहीं हैं.

मीडिया की इस कमजोरी के लिए आम नागरिक जिम्मेदार हैं. विडंबना यह है कि वे बिना पैसे खर्च किए मीडिया से जिम्मेदारी और जवाबतलबी की उम्मीद करते हैं. आज मीडिया का एक हिस्सा सरकार का गुणगान कर रहा है तो इसलिए कि वह मजबूर है, क्योंकि मीडिया को पैसा वही सरकार दे रही है.

जो वैचारिक, कानूनी व तकनीकी सुधार आज हम देख रहे हैं उस के जनकों में 500 साल पहले के मार्टिन लूथर,  जिन्होंने जरमनी के विटेनबर्ग के एक चर्च के बाहर 95 थीसीम कील से ठोक कर इटली के पोप की पोल ही नहीं खोल दी, बल्कि पूरी सोच को बदल डाला था, जैसी हस्तियां शामिल हैं. मार्टिन लूथर ने तब ईजाद हुए पिं्रटिंग प्रैस का इस्तेमाल किया. उन्होंने धार्मिक आलोचना पंडों की भाषा लेटिन में न कर के जरमन में की और उसे छपवा कर बंटवाया. तब का वह छपवाना, आज की कंप्यूटर क्रांति की तरह है पर तब पैसा छापने वालों को ही मिला.

आज का पाठक मुफ्त में ही सही वह विश्वसनीय खोजी पत्रकारिता चाहता है. वह महंगी गाड़ी खरीदता है पर सस्ते या मुफ्त के ऐप से मोबाइल को भरे रखता है. वह फेसबुक और व्हाट्सऐप का आदी है क्योंकि ये दोनों मुफ्त हैं. मीडिया न केवल ध्यान मांगता है बल्कि पैसा भी मांगता है. आजकल उसे या तो धन्ना सेठों की ओर झुकना पड़ता है या सरकारों की ओर जो उसे चलाने के लिए भरपूर सहयोग दे रहे हैं.

मीडिया पर बिक जाने के आरोप लगाना आसान है पर जो जनता मंदिरमठ के नाम पर पैसे देने को तैयार हो और बहकने को भी तैयार हो, उसे मीडिया पर उंगली उठाने का हक नहीं है. मीडिया, लेखन, लेखक को जिंदा तभी रखा जा सकता है जब लोग उस के लिए जेब ढीली करें. मुफ्त में लंगर का बदस्वाद खाना ही मिलेगा जिस के ऊपर भगवा रंग छिटका होगा.

कौमेडी फिल्में भी करूंगी: अक्षरा सिंह

भोजपुरी फिल्मों में बहुत ही कम समय में अपनी पहचान बनाने वाली अक्षरा सिंह आज भोजपुरी की टौप की फिल्म अदाकारा के रूप में जानी जाती हैं. अक्षरा सिंह भोजपुरी फिल्मों के अलावा छोटे परदे पर भी अपनी अदाकारी का जलवा बिखेरती रही हैं. वे अभिनय के साथ-साथ गायन में भी दिलचस्पी रखती हैं. उन्हें अभिनय विरासत में मिला है. उनके पिता विपिन सिंह भोजपुरी फिल्मों के कलाकार हैं, तो उन की माता नीलिमा सिंह भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में कलाकार के साथसाथ थिएटर आर्टिस्ट भी हैं.

आज के दौर में अक्षरा सिंह भोजपुरी की सब से महंगी हीरोइनों में गिनी जाती हैं. पेश हैं, उन से हुई बातचीत के खास अंश:

आप का ऐक्टिंग के क्षेत्र में आना कैसे हुआ?

मैं ऐसे माहौल में पलीबढ़ी हूं जहां लाइट, कैमरा, ऐक्शन मेरे लिए आम बात है, क्योंकि मेरे मम्मीपापा दोनों ही फिल्म जगत में काफी अरसे से हैं और काफी जानेमाने फिल्म कलाकार हैं.पापा विपिन सिंह और मम्मी नीलिमा सिंह के साथ मेरा बचपन बीता जिस के चलते धीरेधीरे मेरी दिलचस्पी ऐक्टिंग की तरफ बढ़ती गई. मम्मीपापा से प्रभावित हो कर मैं ने कालेज के दौरान थिएटर में काम करना शुरू किया और उन से ही ऐक्टिंग की बारीकियों को सीखते हुए फिल्म जगत में कदम रखा. वैसे तो मैं बचपन में डांसर और गायिका के तौर पर अपनी पहचान बनाना चाहती थी, लेकिन भोजपुरी फिल्मों में मेरा आना अचानक ही हुआ क्योंकि फिल्म जगत से जुड़े तमाम लोगों का मेरे घर आनाजाना रहता था. एक दिन हीरो रविकिशन मेरे घर आए और उन्होंने मेरे मम्मीपापा से मेरे लिए फिल्मों में ऐक्टिंग करने का औफर रखा. मेरे मम्मी-पापा ने मुझे फिल्म में काम करने के लिए हां कर दिया. उस समय मैंने रविकिशन जैसे सुपरस्टार के साथ पहली फिल्म ‘प्राण जाई पर वचन ना जाई’ और ‘सत्यमेव जयते’ जैसी फिल्में की थीं.

क्या आप के मम्मीपापा का भोजपुरी फिल्मों में होने का आप को फायदा मिला?

जी हां, मेरी कामयाबी का सारा क्रेडिट मेरे मम्मीपापा को ही जाता है. मैं ने अपने मम्मीपापा से न केवल ऐक्टिंग की बारीकियों को सीखा है बल्कि उन्होंने कदमकदम पर मेरा उत्साह भी बढ़ाया है. यही वजह थी कि मेरे कैरियर की शुरुआत ही रविकिशन, पवन सिंह, दिनेशलाल यादव, खेसारीलाल यादव, हैदर काजमी, विनय आनंद सरीखे बड़े कलाकारों के साथ हुई.

हमेशा से यह आरोप लगता रहा है कि भोजपुरी की हीरोइनें काफी बोल्ड सीन दे रही हैं. इस बारे में आप का क्या कहना है?

जितने भी लोगों ने नंगापन दिखा कर ऐक्टिंग में अपना कैरियर बनाने की कोशिश की है, वे आज गुमनाम हैं.

आप के कैरियर की अब तक की सब से अच्छी फिल्म कौन सी रही?

मैं ने पवन सिंह के साथ फिल्म ‘सत्या’ की थी जिसे मैं अपने कैरियर की अब तक की सब से अच्छी फिल्म मानती हूं. यह फिल्म इमोशंस और रोमांस से भरपूर थी. इस में काम कर के मुझे सब से ज्यादा मजा आया.

इन दिनों आप गायन में काफी सक्रिय दिख रही हैं. कहीं आप का मन ऐक्टिंग से ऊब तो नहीं चुका है?

नहीं, ऐक्टिंग तो अब मेरी रगरग में बसी है. यह बात सही है कि मैं इन दिनों ऐक्टिंग के साथसाथ गायन में भी काफी सक्रिय हूं. इस की वजह मेरी गायन में दिलचस्पी और मेरी आवाज को जाता है. मेरे कुछ अलबम बाजार में आए हैं जिन्हें लोग काफी पसंद कर रहे हैं. अगर श्रोताओं और दर्शकों का प्यार इसी तरह बना रहा तो मैं और अच्छा करने की कोशिश जारी रखूंगी.

क्या वजह है कि भोजपुरी फिल्में कौमेडी में पिछड़ जाती हैं?

भोजपुरी में कई अच्छी कौमेडी फिल्में बनी हैं. मैं ने फिल्म ‘मां तुझे सलाम’ में काम किया है जो कौमेडी के साथ प्रेमकथा पर बनी फिल्म है. अगर मेरे पास किसी अच्छी कौमेडी फिल्म का औफर आया तो मुझे कौमेडी करने में कोई गुरेज नहीं होगा.

बहुत ही कम समय व कम उम्र में आपने अपनेआप को पापा विपिन सिंह व मां नीलिमा सिंह से खुद को कहीं ज्यादा बुलंदियों पर पहुंचा लिया है. आप कैसा महसूस करती हैं?

हर मम्मीपापा की यह ख्वाहिश होती है कि उन के बच्चे बुलंदियों को छुएं. मुझे इस बात की खुशी है कि मैं अपने मम्मीपापा की उम्मीदों पर खरी उतरी हूं. मैं आज जो कुछ भी हूं, अपने मम्मीपापा की बदौलत हूं.

सुना है कि आप छोटे परदे पर भी ऐक्टिंग कर रही हैं?

बिलकुल सही सुना है. मैं भोजपुरी फिल्मों के साथ ही साथ छोटे परदे पर भी ऐक्टिंग कर रही हूं. मैं ने जी टीवी के सीरियल ‘सर्विस वाली बहू’ और ‘काला टीका’ में भी काम किया है और अच्छे रोल मिलने पर आगे भी करती रहूंगी. इसके अलावा मैं ने महुआ टीवी चैनल के रिएलिटी शो ‘जिला टौप’ की मेजबानी भी की है.

सपना चौधरी का शानदार डांस, यहां देखें वीडियो

हरियाणा की मशहूर डांसर सपना चौधरी की लोकप्रियता किसी बौलीवुड स्टार से कम नहीं है. सपना चौधरी किसी भी गाने पर डांस कर दें तो फैंस का दिल धड़का ही देती हैं. सोशल मीडिया पर अपने फौलोअर्स के लिए वे कुछ न कुछ नया करने की कोशिश करती रहती हैं. हाल ही में एक वायरल वीडियो में यह हरियाणवी डांसर ‘नयकी दुल्हनिया’ के साथ मस्ती करते नजर आ रही हैं.

 

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सोशल मीडिया के दौर में सपना हरियाणा के साथ-साथ देशभर में प्रसिद्ध हो चुकी हैं. फेसबुक, वाट्सऐप और ट्विटर समेत सोशल मीडिया की कई मंचों पर सपना के डांस वीडियो खूब वायरल होते रहते हैं.

सोशल मीडिया पर छा चुकीं सपना चौधरी अब भोजपुरी, हरियाणवी, पंजाबी, बौलीवुड सभी जगह अपनी अदाकारी का परचम लहरा रही हैं. आपको बता दें कि सपना चौधरी अपनी अपकमिंग फिल्म ‘दोस्ती के साइड इफेक्ट’ से बौलीवुड में डेब्यू करने जा रही हैं. इस फिल्म का पोस्टर भी रिलीज कर दिया गया है. सपना चौधरी के साथ इस फिल्म में विक्रांत आनंद, टीवी एक्टर जुबैर खान और टीवी शो ‘कसौटी जिंदगी की’ से मशहूर हुई एक्ट्रेस अंजू जाधव भी अहम भूमिका में नजर आएंगी. इस फिल्म के डायरेक्टर हादी अली हैं.

सपना ने अपने बेहद कम उम्र में डांस को अपना करियर बना लिया था. उनको बचपन के समय से ही डांस करना बेहद पसंद था. हरियाणा के रोहतक में जन्मी सपना को आए दिन अलग-अलग शहरों में लाइव शो करती हैं. सपना का ‘सौलिड बौडी’ और ‘तेरी आंख्या का यो काजल’ गाना लोगों के बीच काफी काफी पसंद किया जाता है. बिग बौस के 11वें सीजन में आने के बाद सपना सफलता के शिखर पर पहुंच चुकी हैं.

दरअसल, सपना चौधरी एक कार्यक्रम के सिलसिले में पटना पहुंची थीं, जहां उनको एक रेडियो शो में बुलाया गया था. उनके मस्ती-मजाक भरे इंटरव्यू के दौरान आरजे ने नयकी दुल्हनिया बनकर सपना चौधरी के साथ हरियाणवी गाने पर खूब ठुमके लगाए.

कैथोलिक चर्चों में पनपते सेक्स स्कैंडल

विश्व भर में धर्म और सेक्स का चोलीदामन का साथ रहा है. धर्म की आड़ में देह की भूख मिटाने का खेल बड़ी खूबसूरती से खेला जाता रहा है. कहने को सेक्स के रिश्ते धर्म और ईश्वर के काम में बाधक बताए गए हैं. इबादतगाहों, ईश्वर के घरों में बैठे लोग शारीरिक वासना को पाप बताते हैं, ईश्वर प्राप्ति की राह में बाधा मानते हैं लेकिन ये पवित्र स्थल यौन शोषण के अड्डे बने दिखते हैं और यहां रहने वाले खुद इस खेल में लिप्त पाए जाते हैं.

दुनिया भर के कैथोलिक चर्च सेक्स स्कैंडलों को ले कर सब से अधिक बदनाम हैं. चर्च की दीवारों के अंधेरे में बच्चों, ननों और आम युवतियों की चीत्कारें, सिसकियां पादरियों की यौन संतुष्टि के आगे पहले पस्त और खामोश हो कर रह जाती हैं फिर बाद में अकसर उजागर भी हो जाती हैं. चर्च पर यौन शोषण के सांगठनिक अपराध के आरोप लगते रहे हैं. अमेरिका, फ्रांस, आस्ट्रेलिया, कनाडा, पोलैंड आदि में पादरियों के हजारों सेक्स स्कैंडल सामने आ चुके हैं. वेटिकन अरसे से इस समस्या का सामना कर रहा है.

यौन शोषण के बहुत सारे मामले चर्च के बड़े पादरियों द्वारा पुलिस में जाने से पहले ही संभाल लिए जाते हैं. 1992 में बिशपों की एक मीटिंग में स्वीकार किया गया था कि बहुत से मामले छिपे रह जाते हैं. 1985 में तो अमेरिका में पहली बार पादरियों का सेक्स स्कैंडल राष्ट्रीय मुद्दा बन कर उभरा था. उस समय लुसियाना का एक पादरी 11 बच्चों के यौन उत्पीड़न का दोषी पाया गया था. 1960 और 1970 के दशक में भी मेसाचुसेट्स के पादरी 41 मामलों में कसूरवार मिले थे.

यौन शोषण के मामलों में दोषी पाए गए कई पादरी सजा भुगत रहे हैं, जेलों में हैं या इस्तीफा दे कर चले गए. कई मामलों में पीडि़तों को कुछ मुआवजा दे कर बात दबा दी गई. 2002 में बोस्टन में सेक्स स्कैंडल मामलों में 177 पादरियों को हटा दिया गया था.

अमेरिकी कानफ्रेंस आफ कैथोलिक बिशप्स द्वारा कराए गए एक आधिकारिक अध्ययन रिपोर्ट में 1950 से ले कर 2002 के दौरान कुल पादरियों में 4 प्रतिशत पादरी सेक्स मामलों में आरोपी पाए गए. इन्होंने 10 हजार से अधिक बच्चों को अपना शिकार बनाया था. आपसी यौन सहमति के मामले अलग हैं. मिशनरी स्कूलों के अधिकारी और टीचर भी संलिप्त रहते हैं, उन की संख्या अलग है. ऐसे पादरियों, स्कूल टीचरों की मनो- चिकित्सकों द्वारा काउंसलिंग कराई जाती है. फिर भी चर्चों को ऐसे मामलों में बड़ी आलोचना झेलनी पड़ रही है.

कई चर्च तो पीडि़तों को मुआवजा देने के कारण दिवालिएपन के कगार पर जा पहुंचे. कइयों को अपनी जमीनें, भवन आदि संपत्तियां बेचनी पड़ीं. सेक्रमेंटो, कैलिफोर्निया के रोमन कैथोलिक डाइसीज को 33 पीडि़तों को 35 मिलियन डालर देना पड़ा था. आकलैंड डाइसीज 56 लोगों को 56 मिलियन डालर दे कर बरी हुआ. लौस एंजिल्स आर्कडाइसीज 45 यौन पीडि़तों को 60 मिलियन डालर हर्जाना देने पर सहमत हुआ था. स्पोकन डाइसीज, वाशिंगटन को अपने पादरियों की यौन आग के बदले 46 मिलियन डालर चुकाने पडे़ थे. जुलाई, 2007 में लौस एंजिल्स आर्कडाइसीज ने 508 मामलों में 660 मिलियन डालर की रिकार्ड भरपाई की. सितंबर, 2007 में सैन डियागो के कैथोलिक डाइसीज ने 144 पीडि़तों को 198 मिलियन डालर का भुगतान किया.

अमेरिकी बिशपों ने यौन उत्पीड़न पर ‘जीरो टालरेंस’ नेशनल पालिसी स्वीकृत की थी पर वेटिकन ने उस में पादरियों के अधिकारों के लिए परिवर्तन की मांग कर दी. जनवरी, 2002 में यौन शोषण करने वाले पादरियों से बरताव संबंधित एक दिशानिर्देशिका प्रकाशित की गई थी, जिस में कहा गया था कि इस तरह के सभी मामलों की रिपोर्ट रोम को करनी चाहिए. लिहाजा वेटिकन पर भी उंगलियां उठती रही हैं.

समयसमय पर पादरियों को गाइड लाइन दी जाती रही है फिर भी चर्चों पर लगातार आरोप लग रहे हैं. पिछले जुलाई माह में पोप बेनेडिक्ट 16वें द्वारा सिडनी में पादरियों के यौन उत्पीड़न के शिकार लोगों और उन के परिजनों से सार्वजनिक तौर पर माफी मांगी गई. ऐसी ही माफी 2002 में भी मांगी गई थी और पोप द्वारा कई बार माफी मांगी जाती रही है. दोषी पादरियों के खिलाफ काररवाई कर पीडि़तों को न्याय का भरोसा दिलाया जाता है.

पोप जान पाल द्वितीय ने तो यहां तक कहा था कि धर्म और पादरीवाद जीवन में युवाओं के यौन शोषण की कोई जगह नहीं होनी चाहिए.

अपने हाल के अमेरिकी दौरे के समय पोप बेनेडिक्ट ने पादरियों के सेक्स स्कैंडलों पर गहरी श?र्मिंदगी स्वीकार की थी. उन्होंने प्रार्थना की कि कैथोलिक चर्च में बाल यौन शोषक पादरी नहीं होने चाहिए. दुनिया भर के करीब 4 लाख पादरियों में से यह शर्मनाक स्थिति 4 हजार हवस के भूखे पादरियों की वजह से है.

रेव पाल शानले ने सार्वजनिक तौर पर आदमी और बच्चों के बीच सेक्स की वकालत की थी. बाद में उसे कैलिफोर्निया में 3 बच्चों के शारीरिक शोषण के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया था. 1999 में मेसाचुसेट्स के पादरी जौन ज्योगन पर बच्चों के साथ बलात्कार का अभियोग लगा और उसे 10 साल की सजा सुनाई गई थी.

नवंबर, 2002 में अमेरिका में 573 दोषी पादरियों की आनलाइन डाटाबेस लिस्ट जारी की गई थी. इसी वर्ष करीब 8 पादरियों द्वारा लड़कियों और औरतों के साथ सेक्स और बदले में ड्रग सेवन व सप्लाई का परदाफाश हुआ था. बोस्टन चर्च को 500 से ज्यादा यौन मामलों में पीडि़तों के साथ सेटलमेंट के तहत अपनी जमीन व भवन बेचने पर सहमत होना पड़ा था.

अमेरिकी कैथोलिक चर्च ने 2007 में 615 मिलियन डालर मुआवजे के तौर पर खर्च किए हैं. वह 1950 से अब तक 2 बिलियन डालर मुआवजा दे चुका है.

आस्ट्रेलिया में कैथोलिक चर्चों के पादरियों की हवस के हजारों मामले हैं पर दोषी 107 लोग ही हैं. पीडि़त पक्षों का कहना है कि हजारों मामलों में कुछ ही मामले अदालत में जा पाते हैं.

आयरलैंड में यौन शोषण और बलात्कार के लिए कुख्यात फादर ब्रेंडन स्मिथ के मामले सब से चर्चित रहे. उस ने 1945 और 1989 के दौरान सैकड़ों बच्चों को हवस और बलात्कार का शिकार बनाया था. यौन शोषण के आरोपों के बाद यहां कई पादरियों को हटा दिया गया था. फादर सीन फारच्यून ने तो ट्रायल से पहले आत्महत्या कर ली थी. कुछ आरोपी पादरियों ने इस्तीफे दे दिए थे.

कनाडा में माउंट कशेल ओरफनेज के सेक्स मामलों ने क्षेत्र के लोगों में जबरदस्त हलचल पैदा कर दी थी. 1980 के दशक में यहां क्रिश्चियन ब्रदर्स ने सैकड़ों लड़कों का शारीरिक व यौन उत्पीड़न किया था. जनवरी, 1993 में क्रिश्चियन ब्रदर्स अपने 700 पूर्व छात्रों को 23 मिलियन डालर का आर्थिक मुआवजा देने की सहमति पर पहुंचे.

वेटिकन के तमाम प्रयासों के बावजूद चर्च के सेक्स स्कैंडलों पर काबू नहीं पाया जा सका है. दरअसल, सेक्स इनसान की प्राकृतिक जरूरत है पर इस पर काबू पाने के लिए धर्म के ठेकेदारों ने अपनी सुखसुविधा के लिए तरहतरह के भय, लोभलालच पैदा कर दिए हैं. इस प्राकृतिक चीज के आगे तमाम नैतिकताएं, मर्यादाएं टूटती दिख रही हैं.

इस सचाई को स्वीकार करना होगा कि व्यक्ति चाहे मंदिरमठ में बैठा साधुसंन्यासी हो, मसजिद का मुल्ला- मौलवी हो या चर्च का पादरी, अगर वह नैतिकता की बात करता है तो झूठा ढोंग करता है जिस तरह हिंदू धर्म में ब्रह्मचर्य का ढोंग व्याप्त है.

धर्म सेक्स को रोक नहीं सकता. ऊपरी नैतिकता की बातें भी नहीं, इस उद्वेग को तो व्यक्ति के भीतर का दृढ़ निश्चय ही रोक सकता है जो वास्तव में नैतिक, संकल्पवान होता है.

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