‘मिर्जापुर’ के मस्टरबेशन सीन पर श्वेता त्रिपाठी ने क्या कहा

हाल ही में आई वेब सीरीज ‘मिर्जापुर’ ने सोशल मीडिया पर काफी सुर्खियां बटोरी है. उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले की स्टोरी आजकल लोगों के बीच काफी पौपुलर है. बाहुबलियों की लड़ाई, खून खराबा, खाटी यूपी टोन, परिवारों की कहानी, पंकज त्रिपाठी की जबरदस्त एक्टिंग के बदौलत इस सीरीज ने काफी सुर्खियां बटोरी है. हालांकि इस सीरीज को इसकी बोल्डनेस के कारण भी काफी पौपुलैरिटी मिली है. इसमें पहली बार श्वेता त्रिपाठी भी बोल्ड अवतार में दिखी हैं. एक खास सीन पर बात करते हुए श्वेता ने अपने अनुभवों को साझा किया है. उनकी बातें चौकाने वाली थी.

shweta tripathi on masturbation scene of mirzapur

मिर्जापुर में शुरुआती एक सीन में श्वेता लाइब्रेरी में मस्टरबेट करती नजर आ रही हैं. आप सीन में देखेंगे कि गोलू गुप्ता (श्वेता) लाइब्रेरी में बैठकर एक किताब पढ़ रही हैं. वहीं गोलू की बहन उन्हें ढूंढ रही है. वह गोलू को कमरे के एक कोने में पसीने में लथपथ पाती हैं तो पूछती हैं ‘मिल गई पूरी दुनिया की जानकारी.’ इस पर गोलू जवाब देती है ‘हां दीदी स्वर्ग की तो मिल ही गई.’ मस्टरबेशन के इस सीन पर श्वेता ने कहा कि इसको पर्फौरम करना कौफी पीने जैसा रेगुलर और नौर्मल था. श्वेता का ये सीन वेब सीरीज में उनका इंट्रोडक्शन सीन है.

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इस सीन पर श्वेता ने कहा, महिलाएं पुरुषों को पसंद करती हैं. उनकी सेक्सुअल डिजायर्स होती हैं. जब मैंने सीन पढ़ा और पूरा ग्राफ समझा तो मुझे ये सीन बिल्कुल भी बोल्ड नहीं लगा.

आम लोगों के लिए खतरा हैं ये

सिर्फ सांसदों और विधायकों के बेटों के पास बीएमडब्ल्यू जैसी महंगी गाडि़यां होना और चमचमाती लड़कियां साथ में होना यह साबित कर रहा है कि आज के चुने नेता अब राजाओं, जागीरदारों की तरह के हो गए हैं.

दिल्ली के हयात रिजैंसी होटल में हुए झगड़े में बहुजन समाज पार्टी के पूर्व सांसद राजेश पांडेय के बेटे आशीष पांडेय ने रिवाल्वर निकाल कर पूर्व एमएलए के बेटे गौरव सिन्हा को मारपीट की धमकी दे डाली और उन दोनों के साथ आईं चमचमाती लड़कियों ने जो वीडियो सोशल मीडिया पर डाला इस से साफ है कि ये नेताओं के बेटे खुद को कानून मानते हैं.

हर जगह इस तरह के कांड होते रहते हैं, जहां चुने हुए नेताओं के बच्चे अपने पिता या मां के कमाए पैसों को उड़ाते नजर आते ही हैं, आम लोगों के लिए खतरा भी बन जाते हैं.

देश की गरीब जनता इन लोगों को यह सोच कर चुनती है कि वे उन के हितों की लड़ाई लड़ेंगे और उन्हें परेशानियों से निकालेंगे पर सत्ता का नशा इन पर इस तरह चढ़ जाता है कि जहां होते हैं वहां दंगा करने लगते हैं.

नेताओं और उन के बेटों का हवाई अड्डों, रेस्तराओं, टोल टैक्स बूथों पर हंगामा अब अकसर देखने को मिलता है. वे अपनी धौंस जमाने से बाज नहीं आते जबकि कहने को सिर्फ जनप्रतिनिधि है, जनता के मालिक नहीं.

राजनीति में पुलिस का साथ मिलता है और जब थानेदार व पुलिसमैन एमएलए, एमपी को सलाम करने लगते हैं तो बच्चों के दिमाग आसमान पर चढ़ जाते हैं. चुने नेता को तो खैर ऊंचनीच का लिहाज होता है पर अकसर बच्चे इस शासन और सचाई को समझ नहीं पाते कि राजनीतिक सत्ता का इस्तेमाल कैसे करें.

हमारे देश की हालत यह है कि हम इस तरह के शक्ति पूजक बन गए हैं कि जिस के हाथ में जरा सी ताकत हो उसे भगवान मान लेते हैं और उसे ही पूजने लगते हैं. हर मंत्री, विधायक, सांसद के घर के आसपास बीसियों लोग मंडराते रहते हैं कि नेताजी से नजर मिल जाए और उन पर कृपा हो जाए.

एक पांच सितारा होटल में हंगामा खड़ा करने और खुलेआम रिवाल्वर निकाल कर दिखाने की हिम्मत करना आसान नहीं जबकि इलाका दूसरे राज्य का हो जहां की बागडोर किसी और पार्टी के हाथ में हो. लेकिन नशा इतना जोर से चढ़ता है कि आगापीछा सब भुला देता है और जैसे मनु शर्मा ने सिर्फ शराब न देने के कारण एक लड़की जेसिका लाल को भरे पब में सिर पर गोली मार दी थी वैसे कोई भी कांड कहीं भी हो सकता है.

गनीमत यही है कि पुलिस को छोड़ कर शासन के दूसरे रसूखदार ताकतवर ओहदेदारों के बच्चों में यह रोग अभी बुरी तरह नहीं फैला है. अभी यह केवल चुने नेताओं तक सीमित है पर यह महामारी की तरह कब और कहां फैल जाए कहा नहीं जा सकता.

शाहरुख ने दी सलमान को जान से मारने की धमकी, गिरफ्तार

हाल ही में एक मामला सामने आया है जिसमें शाहरुख ने सलमान को मारने की कथित धमकी दी है. खबरों की माने तो उत्तर प्रदेश निवासी शाहरूख गुलाब नबी उर्फ शेरा ने पुलिस को बताया कि वो बौलीवुड में काम करने का मौका चाहता था. वह चाहता था कि फिल्म इंडस्ट्री में सलमान उसके ‘गौडफादर’ बनें.

पुलिस ने जानकारी दी कि शाहरुख, सलमान के करीबियों को फोन कर के सलमान का नंबर मांगता था. वो सलमान से मिलने उनके गैलेक्सी अपार्टमेंट आया करता था. वो वहां आ कर सलमान से मिलने की जिद्द करता था. पर उसे सलमान से मिलने नहीं दिया गया. जिसके बाद वो सलमान केनिजी सहायकों को फोन कर जान से मारने की धमकी देने लगा. पुलिस जांच में ये बात भी सामने आई कि आरोपी शाहरुख पर कई आपराधिक मामले पहले से दर्ज हैं.

अधिकारी के मुताबिक, ‘जब निजी सहायक ने नम्बर देने से इंकार कर दिया तो उसने अभिनेता को गाली देना शुरू कर दिया और उन्हें (सलमान) जान से मारने की धमकी दी.’ उन्होंने बताया कि इसके बाद शेरा ने 13 नवम्बर को सलमान के पिता सलीम खान को फोन किया और अभिनेता का नम्बर मांगा. उसने दावा किया कि वो छोटा शकील के लिए काम कर रहा है. इसके बाद सलीम खान ने सलमान का नम्बर देने से मना कर दिया तो शेरा ने उन्हें धमकी दी. वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक ने बताया कि पुलिस से संपर्क किये जाने के बाद हमने बांद्रा पुलिस स्टेशन में अज्ञात लोगों के खिलाफ एक मामला दर्ज किया.

आपको बता दें कि शेरा को प्रयागराज से गिरफ्तार किया गया है. उसे सोमवार को मुंबई लाया गया है. यहीं मामले की सुनवाई हो रही है. शाहरुख को 22 नवंबर तक के लिए पुलिस रिमांड पर भेज दिया गया है.

गरुड़ पुराण बनाम लूट पुराण

गरुड पुराण में 16 अध्याय हैं. इस में गरुड़ (एक खास पक्षी) और विष्णु का संवाद है. संवाद 2 विषयों को ले कर है. पहला यह कि नरक में कौन जाता है और वहां कैसी कैसी यातनाएं दी जाती हैं. दूसरा यह कि स्वर्ग में क्या सुख हैं और उन का अधिकारी कौन है. गरुड प्रश्न पूछता गया और विष्णु उत्तर देते गए. योजना यह है कि जब भगवान कहेगा तो अंधविश्वासी हिंदुओं को मानना ही पड़ेगा.

मरणासन्न व्यक्ति को नीचे लिटा देना चाहिए. दाह संस्कार के दूसरे या तीसरे दिन जिस स्थान से शव को उठाया गया है उस स्थान को प्रतिदिन लीपा जाए और दीपक जला कर मृतक के परिवार- जनों को 10 दिन तक ब्राह्मण के मुख से गरुड पुराण सुनना चाहिए. पुत्र या मृतक का सगासंबंधी हर रोज पिंडदान करे, जिसे दशगात्र कर्म कहा है. जो दशगात्र कर्म नहीं करता वह और मृतक दोनों नरक में जाते हैं.

मृतक यदि नारी हो तो 11वें दिन और पुरुष हो तो 12वें दिन पिंडदान के बाद ब्राह्मण की पूजा कर 7 प्रकार का अन्न, गौ, शैया, घर, जमीन, सोना, चांदी दान करे. साथ में पहनने के सब वस्त्र, छाता, जूते, ब्राह्मणी को कपड़े और शृंगार सामग्री, मीठा, फल दक्षिणा आदि भेट करे. तभी मृतक और पुत्र (मरने के बाद) को स्वर्ग की गारंटी है अन्यथा कल्पों (4 अरब 32 करोड़ वर्ष का होता है) तक दोनों को 84 लाख नरक की यातनाएं भोगनी पड़ेंगी.

इसे कहते हैं गहरी पैठ. ब्राह्मण लोभी कहलाने से साफ बच गए और विष्णु को अपना दलाल बना कर मृ्रतक परिवार को लूट लिया. कौन चाहेगा कि उस के मातापिता कल्पों तक नरक भोगें. गरुड पुराण लिखने वाले ने विष्णु से नरक की यातनाओं का वर्णन करा कर मृतक के परिवार वालों की भावनाओं के दोहन में भी कोई कसर नहीं रखी.

नरक का वर्णन

जिस तरह पुलिस सच उगलवाने के लिए शातिर चोरों को भयभीत करती है उसी तरह विष्णु ने नरक का हौवा दिखा कर हिंदुओं को भयभीत किया है. नरक कहां है विष्णु ने यह नहीं बताया है, केवल यातनाओं का वर्णन है. नरक का रास्ता 2 हजार योजन (8 हजार मील) लंबा है. रास्ता कांटों से भरा हुआ है, ऊंचे पहाड़ और गहरी खाइयां हैं, वहां छाया, अन्न जल नहीं मिलता और अंगारों की वर्षा होती है. पापी को रास्ते में कुत्ते, शेर व्याघ्र आदि हिंसक पशु नोचते हैं. अंत में यमदूत उसे पाश में बांध कर नरक में बहने वाली वैतरणी नदी में पटक देते हैं जो पापियों के लिए ही बनाई गई है.

वैतरणी नदी 100 योजन (400 मील) लंबीचौड़ी है. इस में पानी के बजाय हड्डियां, पीब  (मवाद), रक्त, मांस भरा हुआ है. नदी में बेशुमार जोंक, सर्प, बिच्छू, मगरमच्छ और जहरीले कीड़ेमकोड़ों की भरमार है जो पापी को डसते हैं. जोंक खून पीता है, चील, गिद्ध व कौए उस को नोचते हैं. यमदूत कुल्हाड़ी से काटते हैं, बारबार लोहे के डंडों, मुगदरों से मरने वाले को मारते हैं, उबलते हुए तेल की कड़ाही में डालते हैं. यातनाएं देते हुए यमदूत उस से कहते हैं :

‘‘हे पापी, तू ने केवल अपना और परिवार का पेट भरा है, ब्राह्मणों को गाय, सोना, चांदी, अन्न, भूमि, वस्त्र आदि का दान नहीं किया, अपने पितरों का श्राद्ध नहीं किया. अब तू उस की सजा भोग.’’

(गरुड पुराण अध्याय-3)

पुनर्जन्म, नरक व स्वर्ग काल्पनिक शब्द हैं. यहां नरक का वीभत्स वर्णन कर हिंदुओं को भयभीत किया है ताकि वे ब्राह्मणों को दान देते रहें व मालपुआ खिलाते रहें. प्रश्न यह उठता है कि हिंदू मृतक के शरीर को जला देते हैं. पुराणकार के अनुसार आत्मा दिखती नहीं है. फिर यमदूत पाश में किसे बांधते हैं? हिंसक जीवजंतु किस का खून पीते हैं व नोचते हैं? गरम तेल की कड़ाही में किस को तलते हैं?

विष्णुजी अगर नरक का पता बता देते तो आज के वैज्ञानिक उस की खोज करते और यमदूतों को भी पकड़ने का प्रयास करते.

नरक में कौन जाता है

ब्राह्मण को दान न देने वाले, गौ व ब्राह्मण की हत्या करने वाले, उन का धन अपहरण करने वाले, यज्ञहवन, श्राद्धतीर्थ न करने वाले, जो वेदपुराण, देव, वर्णव्यवस्था की निंदा करते हैं, ब्राह्मण को भोजन नहीं कराते, गायत्री मंत्र व भगवान के नाम का जाप नहीं करते वे सब नरक में जाते हैं. जो शूद्र कपिला गाय का दूध पीते हैं, वेद पढ़ते हैं व यज्ञोपवीत धारण करते हैं वे भी नरक में जाते हैं. जो राजा ब्राह्मण से कर लेता है व दंड देता है वह भी नरक में जाता है.

ब्राह्मण और गौ की हत्या करने वाले की सजा देखिए :

‘‘ब्रह्महा क्षयरोगी स्याद् गोहन: स्यात्कुब्जको जड:’’ (ग.पु.-5-3)
(अर्थात ब्राह्मण का हत्यारा क्षय रोगी, गाय का हत्यारा मूर्ख व कुबड़ा होता है.)

ब्राह्मणों का अपमान करने वाला, दान न देने वाला, बहस करने वाला, राक्षस बनता है तथा सात पीढि़यों तक अपने कुल का नाश करता है.

यहां पुराणकार को वर्ण व्यवस्था, कल्पित व पक्षपातपूर्ण धर्मग्रंथ श्राद्धतीर्थों की चिंता सब से अधिक है ताकि ब्राह्मणों को दान और मुफ्त का भोजन मिलता रहे. इसीलिए विष्णु के माध्यम से वीभत्स नरक का भय दिखाया गया है. तभी तो लोग विश्वास करेंगे. विष्णु ने यह तो बता दिया कि किस पाप से पुनर्जन्म में कौन क्या बनता है पर यह नहीं बताया कि शूद्र के लिए कपिला गाय का दूध पीना और वेद पढ़ना पाप कर्म कैसे हुए?

विष्णु का सेनापति इंद्र तो 15-20 बैलों का मांस एक बार में ही खा जाता था फिर उस को नरक में क्यों नहीं भेजा, उसे देवों का राजा क्यों बनाया? वैदिक काल में ब्राह्मण (आर्य) यज्ञ के नाम पर गाय का मांस खाते थे उन को वैतरणी नदी में क्यों नहीं डाला? कुल मिला कर जो अपने दिमाग का उपयोग करता है और लुटता नहीं है वही नरक को जाता है.

स्वर्ग कौन जाता है

स्वर्ग एक काल्पनिक शब्द है. इसे हिंदू धर्मग्रंथों में विष्णुलोक, इंद्रलोक, देवलोक और बैकुंठ आदि भी कहा गया है. यहां सब प्रकार के सुख मौजूद हैं इसलिए पंडेपुजारी, साधुसंत और कर्मकांडी ब्राह्मण स्वर्ग के नाम पर हिंदुओं को सदियों से ठगते आ रहे हैं. तारीफ यह है कि इस कल्पित नाम के मोह में पड़ कर शिक्षित हिंदू तक लुटता चला आ रहा है.

गरुड पुराण में ब्राह्मणों को पूजने, भोजन कराने, गाय, बैल, घर, जमीन, सोना, चांदी, अनाज और वस्त्र आदि दान की बात बारबार कही गई है. अगर इस को हटा दिया जाए तो 265 पृष्ठों का यह पुराण केवल 10 पृष्ठों का रह जाएगा. लोगों को स्वर्ग भेजने के लिए मैं भी दोहराव के दोष से नहीं बच सकता हूं.

स्वर्ग के दरवाजे की चाबी कर्मकांडी ब्राह्मणों के हाथों में रहती है. मरणासन्न अवस्था में और श्राद्ध के समय जो ब्राह्मण को सब प्रकार का दान देता है और मालपुआ खिलाता है उसे ही स्वर्ग का दरवाजा खुला मिलता है. स्वर्ण दान करने से धर्मराज का चार्टर्ड अकाउंटेंट चित्रगुप्त मृतक के समस्त पापों को खारिज कर देता है.

मरणासन्न अवस्था में गोदान करने से मृतक धर्मराज की सभा का कल्पों तक सदस्य बनता है. परंतु जो गाय हट्टीकट्टी, रोग रहित, जवान, सीधी (सुपाच्य) दुधारू, हाल की ब्याई हो उसे अलंकृत कर बछड़ा दान करने से ही स्वर्ग मिलता है.

दानदाता ‘‘सोने से गाय के दोनों सींग, चांदी से चारों खुर मढ़े, कांसे के पात्र की दोहनी  (दूध दुहने, चलाने का पात्र), लोहदंड (खूंटा), सोने की यममूर्ति, घी से भरा कांसे का पात्र, इन सब को ताम्रपत्र के ऊपर रख कर रेशम के धागे से गाय बांध कर दान करे.’’

(ग.पु.-8,-70,71,72)

ब्राह्मण को आभूषण, वस्त्र व दक्षिणा देते हुए इस प्रकार कहे :
‘‘हे ब्राह्मण श्रेष्ठ, विष्णु रूप, भूमिदेव, आप मेरा उद्धार कीजिए. मैं ने दक्षिणा सहित यह वैतरणी-रूपिणी गाय आप को दी है. आप को नमस्कार है
(ग.पु.-8, 78-79)

तारीफ यह है कि गाय ब्राह्मण को नहीं दी जाती बल्कि उस के माध्यम से देवों को दी जाती है.

‘‘गोदानं च ततो दद्यात् पितृणां तारणाय वै
गोरेषा हि मया दत्ता प्रीतये तेऽस्तु माधव.’’
(ग.पु. अध्याय 11, श्लोक 13)

(अर्थात हे माधव, यह गौ मेरे द्वारा आप की प्रसन्नता के लिए दी जा रही है. इस गोदान से आप प्रसन्न होवें.)

पुराणकार का दिमाग कितना चालाकी भरा है. उस ने स्वर्ग के बहाने मरणासन्न अवस्था में मृतक के परिवार से अपनी जीविका की पुख्ता व्यवस्था करा ली, क्योंकि भावनाओं के दोहन का सही समय यही होता है. जिस प्रकार भ्रष्ट मंत्रों और अधिकारी रिश्वत के बल पर अनियमित काम कर देते हैं उसी प्रकार धर्मराज और चित्रगुप्त दोनों रिश्वतखोर हुए. तभी दान करने वालों के समस्त पापों को खारिज कर देते हैं. ब्राह्मण स्वयं बच गया और देवों के नाम से मृतक परिवार स्वयं लुट गया अर्थात मियां का सिर और मियां की ही जूती वाली कहावत चरितार्थ कर दी. इसी को कहते हैं चतुराई. इसीलिए कहा जाता है कि जब तक मूर्ख हैं तब तक चतुर भूखे नहीं मर सकते हैं.

लेकिन केवल गोदान से स्वर्ग नहीं मिलने वाला. पिंडदान (श्राद्ध) करते समय पुत्र का कर्तव्य है कि वह ब्राह्मण को 7 प्रकार का अनाज, पुरुषोचित पहनने के सब वस्त्र, छाता, जूते, आसनी, 5 प्रकार के बरतन और इतनी जमीन दान करे जिस पर 101 गाएं बैठ सकें. ब्राह्मणी को पहनने के सब वस्त्र, बिछिया, चूडि़यां व समस्त शृंगार सामग्री दान करे.

शैया दान करने से मृतक अगले जन्म में पलंग पाता है. शैया मोटी, मजबूत और अच्छी बुनी हुई हो. दरी, गद्दा, चादर, रजाई व तकिया भी दिए जाएं. सोने से बनी विष्णु की मूर्ति, चांदी की बनी ब्रह्मा, शिव व धर्मराज की मूर्तियां ब्राह्मण के चरणों में दान करें. तभी पुत्र सुपुत्र कहलाएगा अन्यथा मल के समान है.

ब्राह्मण को दान देने व भोजन कराने से मृतक धर्मराज की सभा का कल्पों तक सदस्य बनता है. अलंकृत जवान अप्सराएं सदस्यों का सदैव मनोरंजन करती हैं. वहां किसी को कोई काम नहीं करना पड़ता, न कभी बूढ़े होते और न भूखप्यास लगती है.

अब बताइए स्वर्ग का टिकट कितना महंगा है. उस में केवल मालदार ही जा सकता है, भले ही वह कितना ही बेईमान और कुकर्मी हो. गरीब नहीं जा सकता, चाहे वह कितना ही ईमानदार और सदाचारी क्यों न हो.

एक बात विचारणीय है. पुराणकार के अनुसार मृतक 84 लाख योनियों को भोग कर मनुष्य बनता है. जिस प्रकार लेटर बाक्स में पता सहित पत्र डाला जाता है और वह पते वाले को प्राप्त हो जाता है. उसी प्रकार ब्राह्मण को जो खिलाया जाता है वह सूर्य की किरणों द्वारा पुरखों को खाने को मिल जाता है. ब्राह्मण को तो मालपुआ व मिठाई खिलाई जाती है. यदि आप का पुरखा शेर बना तो क्या मिठाई आदि मांस बनता होगा, क्योंकि शेर का भोजन तो मांस है. अगर गोबर का कीड़ा बना तो क्या ब्राह्मण का खाया पदार्थ गोबर बनता होगा? क्योंकि गोबर का कीड़ा मीठा नहीं खाता, अगर खाएगा तो डायबिटीज हो जाएगी, अगर सर्प बना तो क्या ब्राह्मण को खिलाया माल मेढक व कीड़ों में बदल जाएगा जो सर्प का भोजन है.

गरुड पुराण लिखने वाले ने नरक की यातनाओं और स्वर्ग के सुखों का वर्णन विष्णु के कहे अनुसार किया है. यहां प्रश्न उठता है कि विष्णु स्वयं पुराण लिखने वाले के पास आए थे या पुराण लिखने वाला विष्णु के पास गया था, अगर गया था तो कब, कहां और कैसे? क्योंकि विष्णु तो क्षीर सागर में सर्प पर विराजते हैं और क्षीर सागर का कहीं अस्तित्व नहीं है.

गरुड पुराण लिखने वाले ने विष्णु को पक्षपाती और ब्राह्मणों का दलाल बना दिया. तभी उन से कहलाया है कि ब्राह्मण पूजा ही मेरी पूजा है और ब्राह्मणों को दान देने से मैं प्रसन्न होता हूं. सोचना यह है कि ऐसे विष्णु की क्या औकात रही?

कुल मिला कर गरुड पुराण लूट पुराण है जो गपों से भरा हुआ है. फिर (अंधविश्वासी) हिंदू कल्पित नरक, स्वर्ग और पुनर्जन्म के चक्कर में पड़ कर क्यों लुटते हैं?

दो लाख की डकैती : शर्माजी को नहीं हुआ विश्वास

जैसे ही घर पहुंचा, पत्नी ने बताया कि अपनी कालोनी में मिस्टर गुलाटी के यहां चोरी हो गई है. मैं ने पूछा, ‘‘चोरों का कोई पता चला?’’

‘‘अभी तक तो मुझे कोई जानकारी नहीं मिली है,’’ पत्नी बोली, ‘‘आप आ गए हो तो सारी जानकारी मिल जाएगी. कोई कह रहा था कि चोरी हो गई और कोई बता रहा था डकैती पड़ी है. मुझे तो दोनों में अंतर ही पता नहीं चलता.’’

पत्नी के साथ यही दिक्कत है. अंतर करने से चूक जाती है. मुझे सीआईडी का आदमी समझती है. अखबारों में पढ़े समाचारों को कभी मनोरंजक और कभी खौफनाक ढंग से मिर्चमसाला लगा कर बता देता हूं. इसलिए पत्नी को ऐसा भ्रम हो जाता है कि मैं जासूसी भी करने लगा हूं.

मैं ने तुरंत पूछा, ‘‘तुम हालचाल जानने के लिए उन के घर गई थीं?’’ उस ने वर्षों पुराना घिसापिटा रिकार्ड दोहरा दिया, ‘‘घर के काम से फुर्सत नहीं मिली. बच्चे धींगामस्ती कर रहे थे. पड़ोसिन बैठने आ गई थीं.’’

मैं ने कहा, ‘‘क्या पड़ोसिन सुबह से शाम तक बैठी रही थीं. रही बात बच्चों की तो तुम्हीं बताओ, किस के घर के बच्चे धींगामस्ती नहीं करते. यह तो गनीमत है कि अपने बच्चे बाहर लड़तेझगड़ते नहीं. वरना दिनभर शिकायतों का ही तांता लगा रहता. तुम जानती नहीं, अपने पड़ोसी वर्माजी कितने परेशान रहते हैं बच्चों की कंपलेंट से.’’

चोरी और किसी के घर होती तो जाने, न जाने की बात अलग थी. गुलाटी का पारा तो इसी बात को ले कर 108 डिगरी तक पहुंच गया होगा कि न शर्माजी आए न उन की श्रीमतीजी. पिछली बार गुलाटी को फ्लू हो गया था. समाचार कुछ देर से मिला. हम दोनोें घर गए तो ठीक हो चुका था. देखते ही बरस पड़ा, ‘‘अब फुर्सत मिली है. अच्छा होने के बाद देखने आए हो. आधी कालोनी आ कर चली गई. अब कोई बहाना मत बनाना और मेरी अगली बीमारी का ध्यान रखना.’’

चोरी तो हो चुकी थी लेकिन चोरों की तरह डरतेसहमते गुलाटी के घर पहुंचा. वह 4-5 अतिथियों से घिरे बैठे थे. उन के सामने की मेज पर अखबारों का ढेर पड़ा था. रसोईघर से कुछ बनने की महक कमरे में आ रही थी. मेरी ओर देख कर भी वह बिलकुल चुप थे. नाराज हो जाने  पर यह गुलाटी की खास किस्म की आदत थी यानी जिस से नाराज हो जाओ, उस की ओर देखो जरूर लेकिन बातों का सिलसिला शुरू न करो.

गुलाटी ने पड़ोसियों को विस्तार से डकैती का हाल बताया कि किधर से डकैत आए, किधर गए होंगे, संख्या कितनी रही होगी. डकैती के अभिनय से ले कर पुलिस की भूमिका तक सरगर्म चर्चा हो गई. इतने में नाश्ता आ गया. उस का तामझाम देख कर मुझे तो ऐसा लगा नहीं कि गुलाटी के यहां चोरी हुई है. नाश्ते की सजी हुई प्लेटों और उस के चेहरे के हावभाव से लग रहा था डैकती का माल बरामद हो चुका है. उसी के उपलक्ष्य में स्वल्पाहार का आयोजन है.

पड़ोसियों ने वही किया जो ऐसे मौके पर किया जाता है. नाश्ता ठूंसते हुए प्रशासन की जम कर आलोचना हुई. गुलाटी को सांत्वना और डकैतों के पकड़े जाने का आश्वासन देते हुए वे एकएक कर विदा हो गए. हालांकि उन्हें इशारा मिल जाता तो इसी विषय पर बहस करते हुए कम से कम 1 घंटा और जम सकते थे. पड़ोसियों के जाते ही गुलाटी ने खबरों का ढेर मेरी ओर पटक दिया और कहा, ‘‘कल चोरी हुई है और आज दर्शन दे रहे हो. अच्छी दोस्ती निभाते हो.’’

अखबार पलटते हुए मैं ने कहा, ‘‘भाई, शहर के बाहर था. पहुंचते ही पत्नी ने डकैती का समाचार बताया और तुरंत यहां आया हूं. पूरा समाचार तो अभी अखबार पढ़ कर ही जान पाया.’’

‘‘देख लिया न तुम ने अखबार वालों का हाल. पूरे 2 लाख की डकैती हुई है. पूरी कालोनी में सनसनी है. आनेजाने वालों का तांता लगा है और समाचार इतना छोटा. न्यूज देख कर तो ऐसा लगता है कि जैसे 100-50 मुरगियों की चोरी का हलकाफुलका समाचार हो.’’

मैं ने कहा, ‘‘ठीक कह रहे हो यार. सारा अखबार तो पी.एम. के समाचारों और तसवीरों से भरा है. कहीं उद्घाटन है, कहीं शिलान्यास. पूरे फ्रंट पेज पर उन के भाषण, स्वागत और झलकियों की झलक है. इसी वजह से डकैती के समाचार को स्थान ठीक से नहीं मिल सका.’’

मेरी बातें सुन कर गुलाटी हां में हां मिलाते हुए बोला, ‘‘मेरे साथ यही दिक्कत है. अखबारों ने कभी मेरे साथ न्याय नहीं किया. पिछली बार जब मैं मेयर पद का उम्मीदवार बना था तो अखबारों ने सतही ढंग से लिया. मेरी उम्मीदवारी का समाचार भी नहीं बना और जब 15 पार्षदों ने मेरे पक्ष में वातावरण बनाया, हस्ताक्षर अभियान चलाया तो अखबारों में भी हरकत बढ़ी तब कहीं फोटो सहित समाचार आया,’’ इतना कह कर उस ने राहत की सांस ली और 2 लाख की डकैती के दुख को कुछ कम किया.

मैं ने झिड़कते हुए कहा, ‘‘गड़े मुर्दे उखाड़ने से क्या फायदा, अतीत को छोड़ कर अपने वर्तमान में आजा और डकैती का सार संक्षेप में बता.’’

‘‘देख लो दुर्भाग्य, डकैतों ने भी कैसा दिन चुना. दिन भर पी.एम. नगर में रहे, रात में डकैत आए. 1-2 दिन आगेपीछे आ जाते तो अपने को इतना अफसोस नहीं होता,’’ इतना कह कर उस ने आज का अखबार दिखाया.

अखबार में पुलिस दल के निरीक्षण और डाकुआें का कोई सुराग न मिलने का समाचार छपा था. मैं ने कहा, ‘‘आज के अखबार में भी डकैती को विशेष स्थान नहीं मिला. सी.एम. की खबर से अखबार भरा पड़ा है.’’

अपने घर की डकैती का समाचार तो पी.एम. और सी.एम. के दौरे के बीच दब कर दम तोड़ चुका है. पुलिस वाले भी देर से आए. 2 दिन के थकेहारे खानापूर्ति कर के चले गए. 2 पुलिस के नौसिखिए भी आए. एक तो पूछ रहा था कि डकैती का सही समय बताइए. उस की बात सुन किसी को भी गुस्सा आ सकता है. फिर भी अपने को संयत कर मैं ने कहा, ‘‘ठीक समय मालूम होता तो जान पर खेल कर पकड़ नहीं लेता डकैत को, डाकुओं के आने के लिए अलार्म लगा कर तो सोए नहीं थे. ठीक समय क्या बताएंगे. सो कर उठे तो मालूम हुआ, सुबह के 5 बज चुके थे.’’

दूसरे ने पूछा, ‘‘सुना है, कालोनी के कुछ लोगों ने डकैतों को भागते भी देखा है. क्या डकैत सशस्त्र थे?’’ मैं ने कह दिया, ‘‘यह आप उन्हीं से पूछ लीजिए, जिन्होंने देखा है. अब भला यह भी कोई पूछने की बात है कि डकैत सशस्त्र थे? सशस्त्र नहीं होंगे तो क्या चकलाबेलन ले कर रोटी बेलने आएंगे. यह हाल है अपने नए अफसरों का. फिल्मों में कामेडियन कम हो गए हैं पुलिस विभाग में ज्यादा.’’

पत्नी और बच्चे भी पहुंच चुके थे. वे लोग अंदर मिसेज गुलाटी के साथ नाश्ता करते हुए डकैतों के जाने के बाद का आंखोंदेखा हाल सुन रहे थे. बच्चों को मिस्टर गुलाटी का लड़का वह खिड़की दिखा रहा था जिधर से डकैत आए थे. मैं मिस्टर गुलाटी का साथ दे रहा था. कालोनी के अनेक परिचित अभी तक नहीं आ पाए थे. गुलाटी को इसी बात की चिंता सता रही थी. बारबार उस की नजर दरवाजे की ओर उठ जाती थी. वह स्वागत के लिए कमर कस कर बैठा था. तभी अचानक कुत्ते के भौंकने की आवाज आई. मैं ने कहा, ‘‘यार गुलाटी, तुम्हारी पामेरियन नस्ल का कुत्ता क्या कर रहा था. तेज कुत्ता है जरूर भौंका होगा डकैतों की आहट सुन कर.’’

खीजते हुए गुलाटी बोला, ‘‘पामेरियन और अल्सेशियन बस, नाम के रह गए हैं. हमारा जानी तो दिन में आनेजाने वालों को भौंकता है और रात को खर्राटे भरता है. दरअसल, विदेशी नस्ल का भी भारतीयकरण हो गया है. रात को बिलकुल ही नहीं भौंकता. मुझे तो लगता है कि यह कुत्ता डकैतों से मिला हुआ है.’’

मैं ने अपनी हंसी दबाते हुए कहा, ‘‘पुलिस के कुत्ते तो आए होंगे. उन्होंने क्या डिटेक्ट किया?’’

‘‘अरे, यार, पी.एम. और सी.एम. के दौरे में कुत्ता ज्यादा व्यस्त और सक्रिय रहा. सुना है 2-3 दिन से बीमार चल रहा है. एक पशु चिकित्सक की सतत निगरानी मेें है. उस के लिए राजधानी से इंजेक्शन आ रहे हैं.’’

मैं ने कहा, ‘‘तुम्हारी तो तकदीर ही खराब है. 2 लाख की डकैती हो गई, अभी तक पुलिस के जासूसी कुत्ते भी नहीं पहुंचे.’’

गुलाटी ने तैश में आ कर कहा, ‘‘शर्माजी, पैसा तो अपने हाथ में नाचता है. गहने और नकदी मिला कर 2 लाख के करीब गए हैं. ये तो ट्रांसफर के सीजन में फिर कमा लेंगे. मानसून के आनेजाने से मामले में धोखा हो सकता है. गरज के साथ सिर्फ छींटे पड़ सकते हैं लेकिन अपना सीजन ठीक समय में आता है. आंगन में अच्छी बारिश हो जाती है. इसलिए सवाल 2 लाख की डकैती का नहीं है. अपन तो अखबारों में ठीक कवरेज न आने से दुखी हैं.’’

अपराधों को बढ़ावा देते पर्व त्योहार

पर्व, तीज, त्योहार इनसान के जीवन में खुशी लाते हैं. शुष्क जीवन में सरसता का संचार करते ये त्योहार इतने व्यर्थ हो गए हैं कि इन के लिए ‘व्यर्थ’ शब्द भी व्यर्थ हो गया है. जीवन में सरसता का संचार करने के बजाय कटुता का संचार करते हैं, तनाव पैदा करते हैं.

सब से पहली बात कि इन सारे पर्व त्योहारों को मनाने के लिए जबरन चंदा वसूली होती है. लोग अपने कलेजे पर पत्थर रख कर, मजबूरी में या डर कर, चंदा वसूलने वालों को उन की मुंहमांगी मोटी रकम देते हैं. जो जरा भी आनाकानी करता है, चंदा वसूलने वालों द्वारा मारापीटा जाता है. यदि दुकानदार मिल कर विरोध करते हैं तो उन की दुकानें लूट ली जाती हैं. ये पूजापर्व मनाने वाले लोग सार्वजनिक, सरकारी, गैरसरकारी मकानों का अतिक्रमण करते हुए बांसबल्ली के टैंट गाड़ते हैं, बिजली के खंभे से सीधी बिजली चुरा कर साजसजावट करते हैं.

आई.पी.सी. हो या सी.आर.पी.सी. हो, उन पर लागू नहीं होता और पुलिस किसी भी भारतीय कानून के तहत काररवाई कहां करती है? जो कानून पसंद, शांतिप्रिय नागरिक यदि थोड़ा सा भी विरोध करते हैं तो  इनके द्वारा प्रताडि़त होते हैं, घायल किए जाते हैं…और कई बार मौत के घाट तक उतार दिए जाते हैं. थाने में उन की रिपोर्ट तक दर्ज करने से पुलिस अधिकारी टालमटोल कर जाते हैं. थाना पुलिस एवं प्रशासन उलटा शिकायतकर्ता को ही अपमानित करते हुए भगा देता है.

जहां तहां सड़कों, नुक्कड़ों, चौराहों, आम रास्तों का अतिक्रमण कर के मिट्टी की मूर्तियां बैठाई जाती हैं. बांसबल्ली लगा कर रास्ता जाम कर दिया जाता है. आम नागरिक परेशान हो तो हो. उन्हें इस की चिंता नहीं होती.

एक ओर सरस्वती की पूजा होती है दूसरी ओर सजीव सरस्वतियों, यानी लड़कियों और युवतियों के साथ छेड़छाड़. सरस्वती को तथाकथित भक्त (जो हकीकत में ‘भक्त’ नहीं गुंडेबदमाश हुआ करते हैं) स्त्रियों, खासकर लड़कियों, किशोरियों के गालों पर गुलाल लगाने के बहाने छेड़छाड़ करते हैं. यही बात दुर्गापूजा और छठपर्व में भी देखने में आती है.

अखबारों में छपी खबरें सुबूत हैं. हाल में राजधानी दिल्ली में ठीक दशहरे के दिन अपने घर लौटती लड़की का उस के मातापिता के सामने ही अपहरण कर लिया गया. उस के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ. ऐसी घटनाओं की सूची काफी लंबी है. पिछली दीवाली के दिन दिल्ली में एक 7 वर्षीय बच्ची का अपहरण कर के बलात्कार किया गया और हत्या कर के उस की लाश रिज एरिया में फेंक दी गई. पूजा व पर्व के दिनों में गुंडे जश्न मनाने के लिए जैसे मीट, मछली, शराब का जुगाड़ किया करते हैं वैसे ही अपनी मौजमस्ती के लिए मासूम लड़कियों का अपहरण, बलात्कार और हत्या भी कर देते हैं.

त्योहारों को तत्काल बंद कर देना चाहिए जो नाना अनाचारों, व्यभिचारों, आपराधिक कृत्यों के जनक हैं. यह कहना अतिशयोक्ति न होगा कि इन पर्वों, त्योहारों की आड़ में घोर अपराध पनप रहे हैं. समाज गर्त में जा रहा है. लड़कियों की इज्जत लूटी जा रही है. व्यभिचार बढ़ रहा है.

अब तो ‘धर्म निरपेक्षता’ भी दांव पर लग गई है. देश की सरकार सचमुच धर्मनिरपेक्ष रहती तो हिंदुओं के पर्वत्योहारों की इतनी सरकारी छुट्टियां क्यों? यह ‘विधान’ ही गलत है. यह भारतीय संविधान के विरुद्ध है. किसी भी धर्म की कोई भी छुट्टी नहीं होनी चाहिए. जिसे जो भी पर्वत्योहार मनाना हो वह अपना आकस्मिक अवकाश (सी.एल.) का प्रयोग करे.

इस देश में बहुत से सरकारी व गैरसरकारी संस्थान ऐसे हैं जहां चौबीसों घंटे काम चलता रहता है. किसी भी पर्व व त्योहार पर वहां छुट्टी नहीं होती और लोग भय या किसी लालच में नहीं बल्कि काम के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझ कर ड्यूटी पर आते हैं. यदि सरकार के एक उपक्रम में ऐसा हो सकता है तो दूसरे विभागों में क्यों नहीं.

दिमाग में ठुंसा हुआ है जाति का सवाल

जाति का सवाल किस तरह गहराई तक लोगों के दिमाग में ठुंसा हुआ है उस का एक नमूना दिखा जबलपुर, मध्य प्रदेश में जहां दुर्घटना में घायल 2 औरतों को इलाज कराने के लिए अस्पताल लाया गया तो मरीजों के रिश्तेदारों ने डाक्टर की पिटाई कर डाली क्योंकि वह शैड्यूल कास्ट था और मरीज ऊंची जाति का. मरीज ने कुछ कहा या नहीं, पर रिश्तेदारों को मरीजों की तकलीफ मंजूर है, नीची जाति का छुआ जाना मंजूर नहीं है.

जो लोग कहते हैं कि देश में जाति सिर्फ आरक्षण की वजह से बची है वे या तो अनजान हैं या जानबूझ कर अनजान बने रहना चाहते हैं. जाति का जहर इस तरह लोगों के दिमाग में भर दिया जा रहा है कि वे इसे जिंदगी से ज्यादा बड़ा मानने लगे हैं. यह पहले कम दिखता था क्योंकि तब ऊंची और नीची हर जाति के रास्ते ही अलग थे. समाज बुरी तरह बंटा हुआ था.

आज नीची जातियों को ऊंची जातियों के रास्तों पर चलने का हक है, बसों में बैठने का हक है, रेल, हवाईजहाज में बैठ सकते हैं, हाकिम की कुरसी पर भी बैठ सकते हैं. हजारों डाक्टर अपना तनमन लगा कर लोगों को ठीक कर रहे हैं.

लेकिन इस के बावजूद एक बड़ा तबका लगातार लगा हुआ है कि जाति को भुलाया न जाए. अमेरिका में गोरोंकालों को अलग से पहचाना जा सकता है. यहां शक्लसूरत से ऊंचेनीचे को पहचानना मुश्किल है और इसलिए तरहतरह के टोटके अपनाए जा रहे हैं कि जाति का पता चलना लगता रहे.

ऊंची जाति वालों को खास देवीदेवता दे दिए गए हैं और नीची जातियों के लोगों ने हंसहंस कर बेवकूफ बन कर उन्हीं देवताओं के दासों, बिगड़ैलों, पालतू पशुओं, नाजायज संतानों की पूजा करनी शुरू कर दी?है. कहीं उन ऊंचेनीचे देवताओं की गढ़ी हुई कहानियां सुनासुना कर जाति का जहर और ज्यादा गहरा कर दिया कि लोग अपनों को मरने देने को या मारने को तैयार हैं पर जाति पर धब्बा लगे, इस के लिए तैयार नहीं हैं.

असल में यह पंडेपुजारियों की रातदिन की मेहनत का नतीजा है. लाखों लोग मंदिरों के धंधों में लगे हैं और ऊंचीनीची जातियों के अलगअलग मंदिर, देवता, बाबा, पूजा के तौरतरीके बनवा कर इस के रंग को हर रोज गहराया जा रहा है. देश के हर कोने में मंदिर, जिन की मूर्ति का पौराणिक ग्रंथों में कहीं कोई जिक्र नहीं, खड़े हो रहे हैं और हरेक में एक पुजारी जम गया जो जाति को भुना कर अपने देवीदेवता को पुजवा रहा है.

यही लोग गलीगली में बिखरे इस अलगाव के लिए जिम्मेदार हैं. शहरी जिंदगी और नई तकनीक ने मजबूर कर दिया है कि ऊंचीनीची जातियों के रास्ते एक हों पर हर कोई बच कर निकले यह हुक्म मंदिर का पंडा दे देता है. जबलपुर के डाक्टर के खिलाफ यह गुस्सा नहीं था कि वह गलत इलाज कर रहा था, गुस्सा यह था कि वह था ही नीची जाति का. इस साल आल इंडिया मैडिकल साइंस के दाखिलों में 4,000 में से 5वां रैंक पाने वाली एक लड़की शैड्यूल कास्ट की है. पढ़ाई में किसी से कम नहीं पर जाति का बिल्ला लगा रहेगा.

अब सिंधिया ने बताया नरेंद्र मोदी को नाना

जैसे जैसे मध्यप्रदेश मे चुनाव प्रचार शबाब पर आता जा रहा है वैसे वैसे नेताओं के तेवर भी तीखे होते जा रहे हैं. बड़े नेता विपक्षी नेताओं का सीधे नाम लेने के बजाय उन्हें उनके प्रचिलित नामों से संबोधित कर तंज कस रहे हैं. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने राहुल गांधी को राहुल बाबा कहना शुरू कर दिया है जो लगभग पप्पू का पर्याय ही है. वैसे तो छोटे बच्चे को बाबा प्यार से कहा जाता है लेकिन शिव भक्तों को भी बाबा कहने का चलन है. अब अमित शाह राहुल को कौन सा वाला बाबा कह रहे हैं इसे समझने के लिए दिमाग पर ज्यादा जोर देने की जरूरत नही.

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान घोषित तौर पर मामा हैं वे खुद को मामा कहलवाने में फख्र भी महसूस करते हैं लेकिन एक मीटिंग मे कांग्रेसी नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया ने मामा के साथ साथ नाना संबोधन का भी जिक्र किया तो जनता बिना समझाए समझ गई कि इशारा नरेंद्र मोदी की तरफ है. अशोकनगर जिले की मुंगावली विधानसभा सीट पर कांग्रेस उम्मीदवार बृजेन्द्र सिंह यादव का प्रचार करते उन्होंने कहा कि जनता इस बार मामा और नाना दोनो को बोरिया बिस्तर बांध कर भगा देगी .

नाना के खिताब पर भाजपा खेमे की प्रतिक्रिया जब आएगी तब आएगी पर राहुल गांधी अक्सर राफेल मुद्दे को हवा देते चोर चौकीदार कहते रहते हैं. यह संबोधन अगर ज्यादा चलन में आ गया तो तय है भाजपा को कड़ा कदम उठाना पड़ेगा सवाल आखिर उसके मुखिया की साख का जो है राजनीति मे ऐसे प्रिय अप्रिय संबोधन वाले नेताओं की भरमार है कुछ संबोधनों से इमेज चमकती है तो कुछ से बिगड़ती भी है. कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह दिग्गी राजा के संबोधन से भले ही नवाजे जाते हों पर साल 2003 के चुनाव प्रचार मे उमा भारती ने उन्हें मिस्टर बंटाढार कहते चुनाव प्रचार अभियान चलाया था तो कांग्रेस की लुटिया ही डूब गई थी. इस तरह के रखे हुए नाम क्या सच में वोटर की मानसिकता पर फर्क डालते हैं इस पर कोई मान्य शोध भले ही न हुआ हो लेकिन सामान्य अनुभव बताता है कि इससे फर्क तो पड़ता है मसलन राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया को महारानी कहने से जनता में नकारात्मक संदेश जाता है पर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह की चाउर ( चावल ) वाले बाबा की छवि और संबोधन ने उन्हें 2013 के चुनाव मे काफी फायदा पहुंचाया था. धान के बोनस को लेकर किसान उनसे इस बार खफा हैं इसलिए भाजपा इस बार इस संबोधन से बच रही है.

मध्यप्रदेश मे ज्योतिरादित्य सिंधिया को भी महाराज बनाने पर शिवराज सिंह ने एतराज जताया था जिसकी गंभीरता समझते सिंधिया ने खुद को आम आदमी कहा था और अपने संसदीय क्षेत्र मे दलितों आदिवासियों के घर जाना शुरू कर दिया था जिससे यह मुद्दा तूल नही पकड़ पाया था हालांकि अपने चुनावी विज्ञापनों में भाजपा कह यही रही है कि माफ करो महाराज हमारा नेता शिवराज. बड़े ही नही कई छोटे मोटे नेता भी इसी तरह के नामों और संबोधनों से जाने जाते हैं जो अक्सर किसी न किसी रिश्ते को प्रदर्शित करते हुए होते हैं मसलन मामा, चाचा, कक्का, दाउ, दीदी और भाभी वगेरह. आत्मीयता भी इन संबोधनों से जाहिर होती है अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नाना बनाने पर भाजपा खुश ही होगी क्योंकि बतौर मामा शिवराज सिंह ने खूब लोकप्रियता बटोरी है पर अब ज्योतिरादित्य उन्हें कंस और शकुनि के बाद तीसरा मामा भी कहने लगे हैं तो लोगों का खूब मनोरंजन भी हो रहा है.

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