आखिर पहलाज निहलानी ‘‘केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड’’ से क्यों डरे हुए हैं?

पूरे देश में सेंसर बोर्ड के रूप में मशहूर ‘‘केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड’’ के पूर्व चेयरमैन व फिल्म ‘‘रंगीला राजा’’ के निर्माता पहलाज निहलानी अपनी फिल्म को पूरे देश में 16 नवंबर को प्रदर्शित करना चाहते थे. लेकिन सेंसर बोर्ड से प्रमाणत्र न मिल पाने के चलते फिल्म प्रदर्शित नहीं हो पायी. पहलाज निहलानी ने मुंबई उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था, जिस पर आज मुंबई उच्च न्यायलय ने सवाल उठाया कि ‘रिवाइजिंग कमेटी’ और ट्रिब्यूनल की अनदेखी कर वह अदालत क्यों पहुंचे. माननीय जज ने कहा कि वह पहले ट्रिब्यूनल का निर्णय सुनें, फिर आगे बात करें. और अब अगली सुनवाई के लिए अदालत ने 28 नवबर की तारीख दी है.

वास्तव में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ’’यानी कि सेंसर बोर्ड के नियमों के अनुसार हर फिल्म को चार सदस्यीय परीक्षण समिति देखकर निर्णय देती है कि फिल्म में क्या नहीं होना चाहिए और उसे क्या प्रमाणत्र मिलेगा. यदि परीक्षण समिति के निर्णय से निर्माता असहमत हो तो उसके पास विकल्प होता है कि वह रिवाइजिंग कमेटी यानी कि पुर्नविचार परीक्षण समिति के पास जाएं, इसमें आठ सदस्यों के अलावा एक बोर्ड मेंबर फिल्म देखकर निर्णय सुनाते हैं. यदि निर्माता रिवाइजिंग कमेटी के निर्णय से भी सहमत न हो, तो उसके पास ‘फिल्म ट्रिब्यूनल’ में जाने का विकल्प होता है. फिल्म ट्रिब्यूनल में पूर्व जज के अलावा दो बोर्ड मेंबर फिल्म देखते हैं. फिल्म ट्रिब्यूनल के निर्णय से असहमत होने पर निर्माता अदालत का दरवाजा खटखटाता है.

मगर पहलाज निहलानी की फिल्म ‘‘रंगीला राजा’’ को परीक्षण समिति ने तेरह कट के बाद प्रमाणपत्र देने की बात की. उसके बाद पहलाज निहलानी रिवाइजिंग कमेटी और फिल्म के पास जाने की बजाय मीडिया में सेंसर बोर्ड के खिलाफ बातें करने के साथ-साथ मुंबई उच्च न्यायालय की वोकेशनल बेंच के सामने पहुंच गए, जिसने इस मामले में जल्द सुनवाई से इंकार कर दिया. अब 19 नवंबर को उन्होंने मुंबई उच्च न्यायालय की रेगुलर बेंच के सामने याचिका दी. जिस पर मुंबई हाई कोर्ट में 21 नवंबर को सुनवाई हुई. तो अदालत ने सवाल उठाया कि रिवाइजिंग कमेटी और फिल्म ट्रिब्यूनल के पास जाने की बजाय सीधे अदालत क्यों आए? अदालत ने उन्हे रिवाइजिंग कमेटी और फिल्म ट्रिब्यूनल की बात सुनने की सलाह दी. इस पर पहलाज निलानी ने अदालत को बताया कि वह पिछले सप्ताह फिल्म ट्रिब्यूनल जा चुके हैं और फिल्म ट्रिब्यूनल ने उन्हें शुक्रवार, 23 नवंबर की तारीख दी है. इस पर अदालत ने कहा कि वह ट्रिब्यूनल की सुनें, उसके बाद जरुरत हो तो अदालत आएं. लंबी सुनवाई के बाद अब अदालत ने अगली सुनवाई के लिए 28 नवंबर की तारीख तय की है.

पहलाज निहलानी कहते हैं – ‘‘मुझे उम्मीद है कि फिल्म ट्रिब्यूनल सही निर्णय देगा. अन्यथा मैं न्याय के लिए लड़ाई जारी रखूंगा.’’

नाजायज संबंधों पर भारी पड़ा प्रेम

22 नवंबर, 2016 की सुबह कानपुर (देहात) के थाना सजेती के गांव बसई के रहने वालों ने नहर किनारे बोरी में बंद पड़ी लाश देखी तो थाना सजेती पुलिस को सूचना दे दी. सूचना पाते ही थानाप्रभारी आर.के. सिंह पुलिस बल के साथ गांव बसई पहुंच गए. उन्होंने साथ आए सिपाहियों से बोरी खुलवाई तो उस में एक युवक की लाश निकली. लाश देख कर गांव वालों के बीच खड़ा रमेश फफक कर रो पड़ा. क्योंकि बोरी से निकली लाश उस के भाई राजेश की थी. हत्या की सूचना पा कर एसपी (ग्रामीण) सुरेंद्रनाथ तिवारी भी आ गए थे. उन्होंने भी घटनास्थल और लाश का निरीक्षण किया. इस के बाद मृतक के भाई रमेश से पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि राजेश के पड़ोस में ही रहने वाली साधना से नाजायज संबंध थे. उसे शक है कि उसी ने राजेश की हत्या कराई है. एसपी थानाप्रभारी को जल्दी से जल्दी हत्यारों को पकड़ने का आदेश दे कर चले गए. आर.के. सिंह ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा कर गांव वालों से पूछताछ की तो पता चला कि पहले राजेश और साधना के बीच प्रेमसंबंध थे. इधर साधना ने लालू से रिश्ते बना लिए थे. इस जानकारी से थानाप्रभारी को लगा कि राजेश का कत्ल नाजायज संबंधों की ही वजह से हुआ है.

25 नवंबर को वह लालू को पकड़ कर थाने ले आए और सख्ती से पूछताछ की तो उस ने राजेश की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. उस ने बताया कि साधना के साथ मिल कर उसी ने राजेश की हत्या की थी, क्योंकि वह साधना को ब्लैकमेल कर रहा था. इस के बाद साधना को भी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. दोनों ने पुलिस को राजेश की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी—

कानपुर (देहात) जनपद की तहसील घाटमपुर के थाना सजेती का एक गांव है बसई. इसी गांव में रामबाबू अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी शांति देवी के अलावा 2 बेटियां रमन, साधना और बेटा अजय था. साधना का विवाह उन्होंने गोविंद के साथ किया था. वह थाना सजेती के अंतर्गत आने वाले गांव रामपुर के रहने वाले रघुवर का बेटा था. वह गांव में ही रह कर पिता के साथ खेती करवाता था.

गोविंद साधना जैसी खूबसूरत पत्नी पा कर बहुत खुश था. साधना भी गोविंद को खूब चाहती थी. दोनों की जिंदगी हंसीखुशी से बीत रही थी. इसी तरह 3 साल कब बीत गए, पता ही नहीं चला. इस बीच साधना ने एक बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम उन्होंने अंकुर रखा. बेटे के जन्म के बाद उन का भरापूरा परिवार हो गया.

पर उन की यह खुशी ज्यादा दिनों तक टिकी नहीं रह सकी. होनी ने ऐसे पैर पसारे कि दोनों की जिंदगी में तबाही आ गई. गोविंद एक दिन खादबीज लेने घाटमपुर गया तो लौटते वक्त उस का बस से एक्सीडेंट हो गया, जिस में वह बुरी तरह से घायल हो गया. उस के सिर में गंभीर चोट आई थी.

साधना ने पति का काफी इलाज कराया. वह ठीक तो हो गया, लेकिन दिमाग में चोट लगने से वह अर्धविक्षिप्त हो गया. अब वह न काम करता था, न घरपरिवार की देखभाल करता था. वह पागलों की तरह गलीगली में घूमता रहता था. साधना खूबसूरत और जवान थी. पति की दूरी उसे खलने लगी. वह मर्द सुख के लिए बेचैन रहने लगी.

उस ने इस बात पर गहराई से विचार किया तो उस की नजरें पड़ोस में रहने वाले राजेश पर टिक गईं. वह उस के पड़ोस में ही बड़े भाई रमेश के साथ रहता था. उस के मातापिता की मौत हो चुकी थी. वह शरीर से भी हृष्टपुष्ट था. उस का दूध का कारोबार था. आसपास के गांवों से दूध इकट्ठा कर के वह मंडी में ले जा कर बेच आता था. इस से उसे अच्छी आमदनी हो रही थी.

राजेश और गोविंद हमउम्र थे. दोनों में दोस्ती भी थी. इसलिए राजेश का साधना के घर भी आनाजाना था. लेकिन गोविंद के पागल होने के बाद उस का साधना के घर आना काफी कम हो गया था. पर देवरभाभी का रिश्ता होने की वजह से दोनों जब भी मिलते, हंसीमजाक कर लेते थे. साधना के मन में उस के लिए चाहत पैदा हुई तो वह उस से खुल कर हंसीमजाक करने लगी.

राजेश को साधना के मन की बात का अंदाजा हुआ तो उस का उस के घर आनाजाना बढ़ गया. साधना को खुश करने के लिए वह खानेपीने की चीजें और उपहार भी लाने लगा. इन चीजों को पा कर साधना खूब खुश होती. अब हंसीमजाक के साथ छेड़छाड़ भी होने लगी. साधना अपनी मोहक अदाओं से राजेश को नजदीक आने का निमंत्रण देती, लेकिन राजेश आगे बढ़ने में हिचकता था.

परंतु साधना के खुले आमंत्रण पर हिचकिचाहट त्याग कर जल्दी ही राजेश ने साधना की मन की मुराद पूरी कर दी. मर्यादा की दीवार गिरी तो सिलसिला चल निकला. अब साधना के लिए राजेश ही सब कुछ हो गया. वह भी साधना की देह का ऐसा दीवाना हुआ कि अपनी सारी कमाई उसी पर लुटाने लगा.

घर में क्या हो रहा है, विक्षिप्त होने की वजह से गोविंद को कोई मतलब नहीं था. उस की मौजूदगी में भी कभीकभी साधना राजेश के साथ संबंध बना लेती थी. अगर वह कुछ कहता तो दोनों उसे मारपीट कर भगा देते थे. इस के बाद डर के मारे वह कई दिनों तक घर नहीं आता था.

साधना पूरी तरह स्वच्छंद थी. सास की मौत हो चुकी थी. ससुर साधु बन कर गांव छोड़ कर तीर्थों में भटक रहा था. साधना को कोई रोकनेटोकने वाला नहीं था, इसलिए वह खुल कर राजेश के साथ रंगरलियां मना रही थी. राजेश रात में घर से निकलता और साधना के घर पहुंच जाता. सुबह होने से पहले वह अपने घर आ जाता.

लेकिन एक रात भेद खुल गया. आधी रात को रमेश की आंख खुली तो उस ने भाई को गायब पाया. मुख्य दरवाजा बाहर से बंद था, इस से वह समझ गया कि राजेश घर से बाहर गया है. वह उस के लौटने का इंतजार करने लगा. राजेश लगभग 2 घंटे बाद घर लौटा तो रमेश उस पर बरस पड़ा. भाई की डांट से राजेश डर गया. उस ने बता दिया कि वह साधना के घर गया था और उस से उस के नाजायज संबंध हैं.

रमेश समझ गया कि राजेश अपनी सारी कमाई साधना के साथ अय्याशी में खर्च कर रहा है, इसीलिए कारोबार में घाटा बता रहा है. रमेश ने भाई को डांटफटकार कर साधना के घर जाने पर रोक लगा दी. यही नहीं, राजेश से सख्ती से हिसाब लेने लगा. इस का नतीजा यह निकला कि राजेश के पास अब पैसे नहीं बचते थे, जिस से वह साधना की फरमाइशें पूरी नहीं कर पाता था.

राजेश ने पैसे देने बंद किए तो साधना ने भी उसे लिफ्ट देना बंद कर दिया. कभी चोरीछिपे राजेश साधना के घर पहुंचता तो वह उसे दुत्कार कर भगा देती. वह अपमानित हो कर लौट आता. उसी बीच साधना के 3 साल के बेटे अंकुर को डेंगू बुखार हो गया. उस के इलाज के लिए उस ने राजेश से 10 हजार रुपए उधार मांगे.

लेकिन राजेश ने पैसे देने से मना कर दिया. रुपयों को ले कर साधना और राजेश में जम कर झगड़ा हुआ. साधना ने साफ कह दिया कि अगर अब वह उस के घर आया तो वह उसे धक्के मार कर भगा देगी. इस के बाद राजेश का साधना के घर आनाजाना बिलकुल बंद हो गया. साधना को बेटे के इलाज के लिए रुपयों की सख्त जरूरत थी, इसलिए उस ने गांव के ही लालू यादव से 10 हजार रुपए ब्याज पर उधार ले लिए.

इन रुपयों से साधना ने बेटे का इलाज कराया. उचित इलाज होने से अंकुर पूरी तरह स्वस्थ हो गया. बेटा तो स्वस्थ हो गया, लेकिन अब उसे रुपए वापस करने की चिंता सताने लगी. साधना के पास खेती की कमाई के अलावा आमदनी का कोई दूसरा जरिया नहीं था. खेती की कमाई से वह किसी तरह घर का खर्च चला पाती थी. लालू के रुपए लौटाने के लिए उस के पास पैसे नहीं थे.

लालू महीने के अंत में ब्याज के रुपए लेने आता था. साधना उसे किसी न किसी बहाने टरका देती थी. जब कई महीने तक साधना ब्याज का पैसा नहीं दे पाई तो लालू का माथा ठनका. वह अपने रुपए कैसे वसूले, इस बात पर विचार करने लगा. उस ने सोचा कि अगर साधना रुपए नहीं देती तो क्यों न वह उस के शरीर से रुपए वसूल ले.

यह विचार आते ही लालू साधना से हंसीमजाक करने लगा. लालू हृष्टपुष्ट युवक था, जिस से साधना को उस के हंसीमजाक में आनंद आने लगा. उस ने सोचा कि अगर लालू उस के रूपजाल में फंस जाता है तो उस की शारीरिक जरूरत तो पूरी होगी ही, उसे उस के पैसे भी नहीं देने होंगे. इस के बाद उस ने लालू को पूरी छूट दे दी. फिर तो जल्दी ही दोनों के बीच संबंध बन गए.

लालू से उस के संबंध क्या बने, वह उस की दीवानी हो गई. लालू भी उस के लिए पागल हो चुका था, इसलिए दिल खोल कर उस पर पैसे खर्च करने लगा. यही नहीं, उस ने अपने पैसे भी मांगने बंद कर दिए.

लालू और साधना के अवैध संबंध बिना किसी रोकटोक के चल रहे थे. लेकिन अचानक राजेश बीच में कूद पड़ा. जब उसे पता चला कि साधना ने लालू से संबंध बना लिए हैं तो वह साधना को ब्लैकमेल करने की कोशिश करने लगा. उस ने साधना से कहा कि वह उस से भी संबंध बनाए वरना वह गांव में सभी से उस के और लालू के संबंधों के बारे में बता देगा.

राजेश की इस धमकी से साधना डर गई. उस ने कहा, ‘‘मैं तुम्हारी बात मानने को तैयार हूं, लेकिन इस के लिए मुझे थोड़ा वक्त दो.’’ इस के बाद जब लालू आया तो साधना ने रोते हुए उस से कहा, ‘‘मेरे और तुम्हारे संबंधों की जानकारी राजेश को हो गई है. अब वह भी मुझ से संबंध बनाने को कह रहा है. संबंध न बनाने पर गांव में सब को बताने की धमकी दे रहा है.’’

साधना की इस बात पर लालू का खून खौल उठा. उस ने कहा, ‘‘तुम किसी भी कीमत पर राजेश से संबंध मत बनाना. मैं उसे ऐसा सबक सिखाऊंगा कि वह जिंदगी में कभी भूल नहीं पाएगा. लेकिन इस के लिए मुझे तुम्हारी मदद चाहिए.’’

साधना लालू की मदद करने के लिए राजी हो गई तो लालू ने राजेश को ठिकाने लगाने की योजना बना डाली और मौके का इंतजार करने लगा.

21 नवंबर, 2016 की रात 10 बजे राजेश के मोबाइल फोन की घंटी बजी तो उस ने देखा, साधना का फोन था. फोन रिसीव कर के वह खुश हो कर बोला, ‘‘कहो, कैसे फोन किया?’’

‘‘राजेश, मैं ने तुम्हारी बात मान ली है. तुम अभी आ जाओ.’’ साधना ने कहा.

राजेश तुरंत साधना के घर जा पहुंचा और उसे बांहों में भर लिया. तभी कमरे में छिप कर बैठा लालू निकला और राजेश को पकड़ कर पीटने लगा. राजेश कुछ कर पाता, उस के पहले ही लालू ने उस के गले में अंगौछा लपेट कर कस दिया. राजेश छटपटाने लगा तो साधना ने उस की छाती पर सवार हो कर उसे काबू में कर लिया.

राजेश की मौत हो गई तो दोनों ने उस की लाश को एक बोरी में भरा और रात में ही साइकिल से ले जा कर गांव के बाहर नहर के किनारे फेंक आए. पूछताछ के बाद आर.के. सिंह ने साधना और लालू के खिलाफ राजेश की हत्या का मुकदमा दर्ज कर 26 नवंबर, 2016 को कानपुर (देहात) की माती अदालत में रिमांड मजिस्ट्रैट के सामने पेश किया, जहां से उन्हें जिला कारागार भेज दिया गया.

 – कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

पूजा द्वारा इच्छाओं की पूर्ति कैसे संभव

मेरे एक गुरु हैं. उन से मैं विद्यालय में कई वर्ष पढ़ा. बहुत ही शांत स्वभाव के. गुस्सा कभी पास न फटका होगा. हर एक विद्यार्थी पर ध्यान दिया करते थे. विद्यालय के बाद भी घर बुला कर निशुल्क पढ़ाया करते थे. अन्य अध्यापकों की तरह ट्यूशन का लालच उन्हें न था. गरीब विद्यार्थी की आर्थिक सहायता भी वह कर दिया करते थे. मुझे कुछ कुछ याद है, उन के मातापिता भी उन के आज्ञाकारी होने की बहुत प्रशंसा किया करते थे. अन्याय भी न सहते थे. बलशाली भी थे. मैं आज उन्हीं की बदौलत चिकित्सक हूं. जब भी मिलते बहुत ही प्यार से मिलते. मैं उन का बहुत आदर करता था, परंतु अब उन का देहांत हो गया है. मेरे पास उन का चित्र है, सोचता हूं, उस को बड़ा करवा कर अपने घर में लगा लूं ताकि उन की विशेषताएं मुझे याद रहें और मैं उन को अपने जीवन में अभ्यास में लाऊं तभी उन का चित्र लगाने का लाभ है वरना खाली चित्र टांगने से उन की विशेषताएं मेरे में नहीं आएंगी. इसलिए मैं अभी उन का चित्र टांगने के बारे में असमंजस में हूं.

परंतु मैं समाज में तो  कुछ और ही देखता हूं. लोगों ने अपने घरों में कुछ महान लोगों के चित्र टांग रखे हैं तथा उन की पूजा करते हैं. यहां तक तो ठीक है कि वे महान पुरुष आदरणीय तथा पूजनीय हो सकते हैं. उन का चित्र टांग कर उन की पूजा का तभी लाभ है जब वे उन के अच्छे कर्मों का अनुसरण करें. परंतु मैं तो यह देखता हूं कि कोई भी पूजक उन का अनुसरण नहीं करता और उन की पूजा उस महान व्यक्ति के आगे कुछ मांगने, अपनी समस्याओं का समाधान करने, अपनी तरक्की, अपना प्रमोशन, गलतियों के लिए माफी, ब्याह, बीमारी के लिए प्रार्थना और आरती के रूप में उस व्यक्ति की चापलूसी बारबार माला फेर कर उस का नाम ले कर उस की प्रशंसा करना है.

जिन को हम मर्यादा पुरुषोत्तम मानते हैं, जिन की हम पूजा करते हैं, उन के बारे में धार्मिक ग्रंथों में बहुत कुछ लिखा है, जो जानना जरूरी है. आंख मूंद कर किसी को पूजना, उस का अनुसरण करना मूर्खता ही है. क्या किसी मर्यादा पुरुषोत्तम की पूजा करने से मेरी इच्छाएं (पैसा, विवाह, बीमारी, तरक्की, बेईमानी से कमाए पैसे का किसी को पता न चले) पूरी हो सकती हैं? क्या एक राजा द्वारा अपना सिंहासन छोड़ कर गरीबों की सेवा करने वाले व्यक्ति की पूजा करने से मेरी इच्छाएं पूरी हो सकती हैं? क्या किसी त्यागी, जिस ने अपने कपड़े भी त्याग दिए हों, उस के आदर्शों का अनुसरण न कर के मात्र उस की पूजा करने से इच्छाएं पूरी हो सकती हैं?

क्या किसी मर्यादा पुरुषोत्तम के सेवक रहे वानर सेनाध्यक्ष की पूजा करने से मुझे कार, बंगला, एमबीबीएस, आईपीएस, आईएएस में उत्तीर्णता मिल सकती है? यही नहीं, हम ऐसी हस्तियों की भी पूजा करते हैं जिन की 108 रानियां थीं. हम यौन (लिंग) पूजक हैं. उस लिंग को देखने जम्मूकश्मीर पहुंच जाते हैं. 151 कि.ग्रा. का पारे का लिंग बना कर पूजा जाता है. हम ऐसे लोगों को पूजते हैं.

जो भांग तथा अन्य नशा करता था. हम ऐेसे लोगों की पूजा करते हैं जो किसी ऋषि का भेष बदल कर उस की पत्नी का बलात्कार कर आता है. हम ऐसे लोगों के पूजक हैं जो स्वर्ग में अर्धनग्न लड़कियों से शराब का सेवन करते हैं. हम ऐसे लोगों की पूजा कर के उन से उन की  इन आदतों को अपने में लाना चाहते हैं जो गैर कानूनी हैं.

यदि पूजा करने से मनुष्य की इच्छाएं पूरी होती हों तो मैं मास्टरजी की फोटो टांग कर पूजा आरंभ कर देता हूं, परंतु मेरा खयाल है कि शायद हमारी इच्छा तो वह पूरी नहीं करता. हां, उस की अवश्य करता होगा जो उन की दुकान खोल कर बैठते हैं तथा लोगों को मूर्ख बनाते हैं. उन्होंने ही ये बातें गढ़ी हैं कि इन की पूजा से इच्छा की पूर्ति होती है. हमारे बिजली, पानी, रेलवे, खाद्य पदार्थ, मौसम विभाग को भी इन की फोटो लगा कर पूजा करनी चाहिए ताकि आपूर्ति होती रहे.

जानिए, क्या कहा अर्जुन कपूर ने जाह्नवी के अफेयर पर

‘कौफी विद करण’ के आने वाले एपिसोड में अर्जुन कपूर और जाह्नवी कपूर पहली बार दर्शकों के सामने एक साथ नजर आने वाले हैं. हाल में ही स्टार वर्ल्ड ने इस एपिसोड का प्रोमो जारी किया है. इस प्रोमो को देखकर ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि भाई-बहन की यह जोड़ी दर्शकों के सामने एक दूसरी की कैसी टांग खीचने वाले हैं.

दरअसल, करण यहां जाह्नवी से पूछते हैं कि आपको और ईशान खट्टर को लेकर काफी चर्चाएं होती रहती हैं क्या आप एक-दूसरे को डेट कर रहे हैं? इसके जवाब में जाह्नवी तुरंत ही ना कह देती हैं. लेकिन इस बात के निकलते ही अर्जुन अपनी बहन की खिंचाई शुरु कर देते हैं. वह कहते हैं, ‘ईशान पूरे समय और हर जगह इनके साथ होते हैं… लेकिन इनके बीच कुछ नहीं…’ बड़े भाई के मुंह से यह बात सुनते ही जाह्नवी हैरान हो जाती है और उन्हें समझ नहीं आता है कि वो क्या कहें?

इस बात के बाद तो जैसे अर्जुन कपूर ने अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी पटक ली. जैसे ही मौका मिला जाह्नवी ने भी अपने भाई की टांग खींचने का मौका नहीं छोड़ा. लगे हाथ उन्होंने भी पूछ ही डाला कि क्या वह सिंगल हैं? जिसके जवाब में अर्जुन ने कुछ कहा नहीं बस ब्लश करने लगे. बता दें कि इन दिनों लगातार अर्जुन अपनी गर्लफ्रेंड मलाइका अरोड़ा के साथ सुर्खियों में छाए हुए हैं. दोनों की शादी की खबरें भी आ रही हैं.

धर्मिक यात्राओं के प्रबंधन में जुटी पुलिस

उत्तर प्रदेश पुलिस का पहला काम नेताओं की सुरक्षा और दूसरा का धर्मिक यात्राओें का प्रबंधन इसके बाद बचे समय में कानून व्यवस्था और अपराध प्रबंधन का काम. उत्तर प्रदेश में पुलिस कुछ इस तरह से अपने काम की प्राथमिकता रखती है. हर दिन किसी न किसी महापुरूष का जन्मदिन उसकी मूर्ति और जुलूस की सुरक्षा करनी होती है. हर त्यौहार पर तमाम धर्मिक संगठन धर्मिक यात्रायें निकालते है इनमें कोई झगड़ा न हो इसकी जिम्मेदारी पुलिस की प्राथमिकता में है. जिन जिन त्यौहारो में जुलूस नहीं निकलते थे उनमें भी जुलूस निकलने लगे. ऐसे धर्मिक जूलूसों को निकालने से पहले ना तो किसी तरह की अनुमति ली जाती है और ना ही कोई सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम किया जाता है. जुलूस में पैदल और मोटर साइकिलों का प्रयोग किया जाता है और वाहन सुरक्षा का कोई नियम पालन नहीं होता. बेबस पुलिस एक भी मोटर वाहन एक्ट में चालान नहीं कर पाती है.

सामाजिक मुद्दों के जानकार मानते है कि अब धर्मिक जुलूस धर्म से अधिक राजनीति और समाज पर दबाव दिखाने के लिये आयोजित होते है. धर्म के नाम पर प्रशासन इनके खिलाफ कोई कदम नहीं उठा पाता है. ऐसे में यह निरकुंश होकर सड़को को जाम करते हैं. कई जुलूसों में अस्त्राशस्त्रा का भी खुलकर प्रयोग होता है जो एक तरह से आतंक फैलाता है. ऐसे धर्मिक जुलूस बहुतायत में तनाव और झगड़ों की वजह बनता है. दलित चिंतक राम चन्द्र कटियार कहते है जिस प्रदेश का मुखिया संत महंत हो वहां धर्मिक जुलसों पर पांबदी कैसे लग सकता है?’

पुलिस विभाग के एक अधिकारी कहते हैं हमारें लिए सबसे पहली प्राथमिकता धर्म के नाम पर निकलने के नियंत्रण की होती है. पुलिस विभाग के पास लोगों की संख्या कम है. ऐसे में पुलिस विभाग अपनी प्राथमिकता के अनुसार काम करती है. नेताओं की सुरक्षा के बाद धर्मिक जुलूस और कानून व्यवस्था मुद्दे पर काम करती है. यह सच है कि पुलिस पर काम का इतना दबाव है कि वह अपराध की विवेचना में समय नहीं दे पाती. ऐसे में छोटेछोटे अपराधों पर पुलिस का ध्यान नहीं जा पाता. यह जरूरी है कि ऐसे धर्मिक जुलूसों में कमी लाई जाए.

बरातियों के झगड़े में दूल्हे को लग गई गोली

हाथी, घोड़े और ऊंटों के साथ बग्गी पर बैठकर दुल्हन लेने जा रहे दूल्हे को गोली मार दी गई. उसे अस्पताल ले जाया गया. उसके कंधे से गोली निकाली भी नहीं गई थी कि वह अस्पताल से शादी के मंडप में पहुंच गया. सात फेरे लिए. मंगलवार सुबह दुल्हन को घर तक लेकर आया. इसके बाद फिर से अस्पताल में जाकर भर्ती हो गया.

वाकया साउथ दिल्ली के आंबेडकर नगर इलाके में हुआ. पुलिस के मुताबिक, खानपुर इलाके में रहने वाले 25 वर्षीय बादल की सोमवार रात मदनगीर में बारात आ रही थी. बारात में करीब 125 बाराती थे. हाथी, घोड़े और ऊंट भी लाए गए थे. एक संकरी गली से जिस समय बारात निकल रही थी, दूसरी साइड से बाइक पर दो लड़के आ रहे थे. रास्ता छोड़ने को लेकर युवकों का बरातियों से झगड़ा हो गया. बाइक सवार युवकों में से एक ने पिस्टल निकाल ली और दूल्हे की बग्गी के पास पहुंच गया. उसी दौरान उसने गोली चला दी, जो दूल्हे के कंधे में जाकर लगी.

खून से लथपथ दूल्हा गोली लगते ही बग्गी से कूद पड़ा. बारातियों ने रास्ते से गुजर रहे एक युवक नवीन की बाइक छीन ली और दूल्हे को बतरा हॉस्पिटल ले गए. उसका इलाज चल ही रहा था कि बुधवार सुबह करीब 4:30 बजे दूल्हे ने जर्बदस्ती छुट्टी ले ली और फेरे लेने मदनगीर जा पहुंचा. शादी करके वह दुल्हन को घर ले गया, उसके बाद वह एम्स ट्रोमा सेंटर में भर्ती हुआ. पुलिस विडियोग्राफी के आधार पर आरोपियों की तलाश कर रही है.

बुझ गई दूसरों की उम्मीदें जगाने वाली ‘ज्योति’

दिल्ली महिला आयोग की काउंसलर रहीं ज्योति की साजिशन हत्या हुई या उन्होंने आत्महत्या की/ रविवार रात आखिरी साढ़े चार घंटे में छिपी है मौत की ये मिस्ट्री. बवाना पुलिस हर पहलू से तफ्तीश कर रही है. 304बी के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया है. ज्योति का सोमवार को पोस्टमौर्टम नहीं हो सका. परिजनों ने आशंका जताई है कि ज्योति का पति संजू खुद बाड़ा हिंदूराव अस्पताल में कार्यरत है, इसलिए मेडिकल बोर्ड की निगरानी में पोस्टमौर्टम की मांग की है. परिवार व जानकार ज्योति की खुदकुशी पर यकीन करने को तैयार नहीं.

जानकारों का कहना है कि औरों के जीवन में उम्मीद की रोशनी बिखरने वाली आखिर खुदकशी कैसे कर सकती है. पुलिस का कहना है कि शादी के बाद से ही पति उसपर शक करता था. मौत के बाद पति अस्पताल लेकर नहीं गया था, बल्कि शव घर पर ही पुलिस को मिला.

परिवार के मुताबिक, रविवार रात ज्योति से वौट्सऐप चैट हुई थी. आखिरी मेसेज 7:09 बजे आया था. आरोप है कि ज्योति ने चैट में बताया था कि अब ये लोग कैश की डिमांड भी कर रहे हैं. उसके बाद अचानक क्या हुआ कि उसने चैट में लिखा ‘प्लीज डोंट रिप्लाई नाउ’. उसके करीब साढ़े तीन घंटे बाद 11:36 पर पति ने ज्योति के परिवार को कौल करके बताया कि वह स्यूसाइड की कोशिश कर रही हैं. फिर 11:46 की कौल में पति ने बताया कि ज्योति ने स्यूसाइड कर लिया है और वो मर गई है. उसके बाद ज्योति के परिवारवालों ने पीसीआर कौल की.

पीसीआर के साथ मायके वाले घर पहुंचे. पुलिस के साथ देखा कि ज्योति का शव बेड पर था. उसका शरीर अकड़ चुका था. आरोप है कि उसके गले पर चोट के निशान थे. जबकि पति व ससुराल वाले पास ही थे. आंबेडकर में मोर्चरी में शव को रखवाया. ज्योति का मोबाइल व मौके से मिले कुछ सामान क्राइम टीम ने जांच के लिए सील कर लिए. गौरतलब है कि ज्योति की मौत पर मायकेवालों ने हत्या का आरोप लगाया है. जबकि पति व ससुराल वालों ने खुदकुशी का दावा किया.

वौट्सऐप पर आखिरी चैट ‘प्लीज डोंट रिप्लाई

एमएसडब्ल्यू (मास्टर इन सोशल वर्क) की डिग्री हासिल कर चुकीं 27 साल की ज्योति सहरावत तीन बहनों में सबसे छोटी थीं. बवाना के दरियापुर में ज्योति का परिवार रहता है. पिता रोहताश एयरफोर्स में औफिसर रैंक से रिटायर्ड हैं, फिलहाल इलेक्ट्रौनिक्स शोरूम है. शुरू से ही यह लोग ओम शांति मिशन से जुड़े हुए हैं.

ज्योति की मां का साढ़े चार साल पहले बीमारी की वजह से निधन हो चुका है. बड़ी बहन आकाश पीएचडी कर रही हैं, छोटी बहन रंजू बैंक में जॉब करती हैं. दोनों बड़ी बहनों ने शादी नहीं की. क्योंकि बड़ी बहन ने पीएचडी की वजह से शादी नहीं की. रंजू भी ओम शांति से जुड़ी हुई हैं. घर में ज्योति और छोटा भाई शक्ति सहरावत की ही शादी हुई है.

बहन रंजू ने बताया कि इसी साल 25 जून को मुंगेशपुर निवासी संजू राणा से शादी हुई थी. मायके और ससुराल में 15 मिनट का फासला है. ज्योति के परिवारवालों ने पुलिस को बताया कि शादी में 50 लाख के आसपास खर्च किया था. ज्योति पिछले पांच साल से आउटर जिले में दिल्ली महिला आयोग में रेप विक्टिम काउंसलर थीं.

जानें काले गेहूं पर सफेद झूठ

मध्यप्रदेश की औद्योगिक राजधानी इंदौर से 40 किलोमीटर दूर बसे कस्बे देपालपुर के गांव शाहपुरा के एक किसान सीताराम गेहलोत इन दिनो बेहद खुश हैं. जो भी सुनता है उनके गांव की तरफ भागता है. सीताराम ने काला गेंहू बोया है जिसके बारे में कम ही लोग जानते हैं और जो जानते हैं वह बड़ा दिलचस्प और हैरतअंगेज है कि इस गेंहू की बनी रोटी खाने से न केवल कैंसर जैसी लाइलाज बीमारी ठीक होती है बल्कि दूसरी कई डायबिटीज़, मोटापा और हाइ ब्लडप्रेशर सरीखी बीमारियाँ भी दूर होती हैं. कहा तो यह भी जा रहा है कि काला गेंहू खाने से तनाव भी दूर होता है और दिल की बीमारी यानि हार्ट अटैक भी नहीं होता.

सीताराम गेंहू की यह अनूठी किस्म पंजाब के नेशनल एग्री फूड बायोटेक्नालाजी इंस्टीट्यूट यानि एनएबीआई से लाये हैं. जिसे नाबी भी कहा जाता है. गेहूं का रंग हरे और पकने के बाद पीले के अलावा भी कुछ और खासतौर से काला हो सकता है इस बात पर भरोसा करना मुश्किल काम है. लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि काले रंग का गेहूं होता है पर क्या वह वाकई उतना चमत्कारी होता है जितना बताया जाता है, यह जरूर शक वाली बात है.

lie on black wheat

सीताराम गेहलोत काले गेंहू के बीज के लिए 2 साल से नाबी के चक्कर काट रहे थे, तब कहीं जाकर इस साल उन्हें 5 किलो बीज मिला जिसे वे श्री विधि से उगा रहे हैं इस विधि में फसलों की पैदावार ज्यादा होती है और फसल पर तेज हवा और पानी का असर नहीं होता.

काला गेहूं हर किसी की जिज्ञासा और उत्सुकता का विषय है, वजह केवल इसका रंग ही नहीं बल्कि वे गिनाई जा रही खूबियां भी हैं जिनसे कई बीमारियां न होने या उनके दूर होने की भी चर्चा जमकर होती रहती है. फसल की पैदावार और बढ़वार के वक्त इस गेहूं की  वालियों का रंग हरा ही होता है. लेकिन जैसे जैसे फसल बढ़ती जाती है वैसे वैसे उनका रंग बदलकर काला होने लगता है. यह कोई कुदरत का करिश्मा नहीं है, बल्कि जानकारों की मानें तो एंथोसायनिन नाम का रसायन इसका जिम्मेदार है, जिसकी अधिकता से फसलें नीली बैंगनी या फिर काले रंग की होती हैं. अनाज, सब्जी या फलों का रंग उनमें मौजूद प्लांट पिगमेंट की तादाद पर निर्भर रहता है. अधिकतर पेड़ पौधे हरे क्लोरोफिल की वजह से होते हैं.

दरअसल, एंथोसायनिन एक अच्छा एंटीऔक्सीडेंट होता है, जो हरे रंग के गेहूं के मुकाबले काले गेहूं में 40 गुना ज्यादा तक होता है. काले गेहूं में आयरन भी 60 फीसदी से ज्यादा पाया जाता है.

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अगर ये खूबियां कुदरत ने काले गेहूं को बख्शी हैं तो कुछ कमियां भी उसमें हैं. मसलन इसमें स्टार्च और प्रोटीन के अलावा दूसरे पोषक तत्व कम मात्रा में होते हैं. फिर क्यों और कौन काले गेहूं को अमृत सरीखा बताकर बेच रहा है, इसकी जांच होनी चाहिए. जानकार हैरानी होती है कि कुछ वेबसाइट्स पर काले गेहूं का आटा 2 से लेकर 4 हजार रु प्रतिकिलों तक बिक रहा है.

इस बारे में मध्य प्रदेश कृषि विभाग में कार्यरत स्वदेश विजय कहते हैं कि यह हम भारतीयों के चमत्कारों के आदी हो जाने की वजह से है. जबकि हकीकत में काले गेहूं के बाबत ऐसा कोई दावा जानकारों ने नहीं किया है. हां, काले गेंहू पर काम कर रही नाबी की वैज्ञानिक मोनिका गर्ग ने यह जरूर माना है कि अभी इसका प्रयोग चूहों पर किया गया है जिसके नतीजे उत्साहवर्धक आए हैं. जिन चूहों पर काले गेंहू का प्रयोग किया गया उनका वजन कम हुआ है और उनका कोल्स्ट्रोल और शुगर भी कम हुआ लेकिन इन्सानों के मामले में भी ऐसा हुआ है या होगा इसका दावा नहीं किया जा सकता. लेकिन यह भी सच है कि एंथोसायनिन आक्सीडेंट की वजह से इंसानों को भी फायदा होगा पर वह ठीक वैसा ही जैसा दूसरे एंटऔक्सीडेंट्स से होता है.

तो फिर काले गेंहू के नाम पर हल्ला क्यों इस सवाल का जबाब साफ है कि इसे बढ़ा चढ़ा कर पेश करने वाले जरूर तबियत से चांदी काट रहे हैं. बात ठीक वैसी ही है कि दो सर, चार सींग और छह पैरों वाले पैदा हुये बछड़े को लोग भगवान का अवतार या लीला मानते उसका पूजा पाठ शुरू कर देते हैं, दक्षिणा भी चढ़ाने लगते हैं. फसलों के मामले में भी बगैर सोचे समझे और जाने अगर लोग महज रंग की बिना पर अंधविश्वासी होकर पैसा लुटा रहे हैं तो वे खुद का ही नुकसान कर रहे हैं.

काले गेंहू से अगर कैंसर ठीक होता है तो कोई वजह नहीं कि इस जानलेवा और लाइलाज बीमारी से एक भी मौत हो और शुगर के मरीजों जिनकी तादाद देश में 6 करोड़ का आंकड़ा पार कर रही है को तो रोज सुबह शाम गुलाबजामुन की दावत उड़ाना चाहिए क्योंकि काला गेंहू जो है. हकीकत में एक साजिश के तहत सफेद झूठ फैलाकर काले गेंहू का काला कारोबार कुछ लोग कर रहे हैं जैसे चमत्कारी विज्ञापन वाले किया करते हैं कि हमारी दवाई की एक खुराक लो और सालों पुराना बावसीर जड़ से मिटाओ. बावसीर के मरीज ठीक हो जाने के लालच के चलते एक नहीं बल्कि हजारों खुराक फांक जाते हैं, लेकिन उनकी सुबह की तकलीफ दूर नहीं होती.

यह तय है कि काले गेंहू में कुछ ऐसे गुण हैं जो हर फसल में नहीं होते और होते भी हैं तो  अलग अलग तरीके से होते हैं, इसमें कुछ तत्व ज्यादा हैं जो हैरानी की बात नहीं पर सनसनी और हैरानी गेंहू के काले होने के नाम पर फैलाई जा रही है तो लोगों को इससे सावधान भी रहना चाहिए.

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