खुफिया एजेंसियों ने सिर्फ अलर्ट किया, पुलिस ने पूरे शहर में चिपका दिए पोस्टर

खुफिया एजेंसियों ने दिल्ली पुलिस को जिन दो संदिग्धों की फोटो देकर ‘नजर’ रखने को कहा था, पुलिस ने जोश में आकर उसका सारा ‘नजारा’ दिखा दिया. क्योंकि खुफियां ऐजेंसियों ने इंटरनली अलर्ट के लिए कहा था. पुलिस ने सारी जगह पोस्टर चिपकवा दिए. जब खिंचाई हुई तो पुलिस ने सोमवार रात में चिपके हुए पोस्टर छुड़ाए, साफ कराए और उसकी लिखित रिपोर्ट बनाकर भेजी है.

पिछले हफ्ते दिल्ली पुलिस ने एक एडवाइजरी जारी कर अचानक ही शहर भर में पोस्टर चिपकवाए. खासकर पहाड़गंज के इलाके में चप्पे-चप्पे पर ये फोटो रातोंरात चिपकवा दिए. उसमें दिखाई दे रहे दो युवकों को पाकिस्तानी आतंकवादी बताया, लोगों से चौकन्ना रहने की अपील की, दिल्ली में घुस आने होने की आशंका जताई. साथ ही दोनों के देखे जाने पर तुरंत पुलिस को सूचना देने के लिए नंबर भी जारी कर दिया. मगर पोस्टर में दिख रहे दोनों युवकों के बारे में नया खुलासा होते ही दिल्ली पुलिस अब बैकफुट पर आ गई है. दिल्ली पुलिस की इस हड़बड़ी को लेकर खिचाईं भी हो रही है.

सूत्रों का कहना है कि दरअसल, इंडियन व इंटरनैशनल नंबरों से ऑपरेट हो रहे वॉट्सऐप ग्रुप, फेसबुक व अन्य सोशल साइट्स पर खुफिया एजेंसियां निगरानी रखती हैं. इस तस्वीर पर नजर पड़ी, जिसमें दोनों युवक उर्दू में लिखे एक माइलस्टोन पर खड़े दिखाई दे रहे हैं. इसमें दिल्ली 360 किलोमीटर और फिरोजपुर 9 किलोमीटर लिखा हुआ था.

दिल्ली का नाम लिखा होने की वजह से खुफियां एजेंसियों ने दिल्ली पुलिस को तस्वीर जारी करते हुए एहतियात बरतने के लिए कहा. साथ ही दिल्ली पुलिस में इंटरनली अलर्ट एडवाइजरी जारी करने को कहा गया था. इसी कड़ी में पीएचक्यू से सेंट्रल डिस्ट्रक्ट को इंटरनली मैसेज भेजा गया. \मगर आतंकवादियों के खिलाफ कुछ ज्यादा ही हाई अलर्ट मोड में आते हुए पुलिस ने जोश में पोस्टर बनवाकर होटलों, गेस्ट हाउसों व जगह जगह चिपकवा दिए. सावधान रहने की चेतावनी दी गई और किसी भी प्रकार की सूचना मिलने पर पहाड़गंज पुलिस से संपर्क करने की अपील भी की गई.

तस्वीर में नज़र आ रहे युवकों द्वारा सोमवार 26 नवंबर, को पाकिस्तान के फैसलाबाद में एक प्रेस वार्ता की गई. प्रेस वार्ता में युवकों ने दिल्ली पुलिस द्वारा किए जा रहे सभी दावों को खारिज़ कर कहा कि वह आतंकवादी नहीं बल्कि फैसलाबाद में तालीम-ए-इस्लामिया के छात्र हैं और कभी भारत नहीं गए. उन्होंने कहा कि वह किसी राजनीतिक दल और धार्मिक दल से जुड़े हुए नहीं हैं. वह पाकिस्तान में मौजूद हैं और सबके सामने उपस्थित हैं.

प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा कि 11 नवंबर को रायविंड इज्तिमा के दौरान वो लाहौर गए थे और ये तस्वीर उस समय ली गई थी जब वो गांदा सिंध बॉर्डर पर थे. उन्होंने कहा कि वो नहीं जानते कि उनकी यह तस्वीर कैसे दिल्ली पुलिस के पास पहुंची. दोनों छात्रों के नाम तय्यब और नदीम हैं. इस चूक से दिल्ली पुलिस की खिचाईं हुई.

वे दोनों स्टूडेंट नहीं, संदिग्ध आतंकवादी ही हैं

दो युवकों का फोटो जारी करके दिल्ली पुलिस ने आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद का आतंकी बताया था. उनके बारे में कहा जा रहा है कि वे पाकिस्तान के स्टूडेंट्स हैं. हालांकि, स्पेशल सेल के सूत्रों का कहना है कि वे मासूम स्टूडेंट्स नहीं हैं बल्कि दोनों का संबंध आतंकवादी संगठन जैश के साथ है.

सेल के सूत्रों के मुताबिक, उनके पास इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि वह दोनों जैश से जुड़े हुए हैं. कुछ कारणों से अभी पूरे मामले की जानकारी नहीं दी जा सकती. आने वाले दिनों में उनसे जुड़ी जानकारी सार्वजनिक की जाएगी.

सूत्रों का कहना है कि अगर दोनों मासूम थे तो पाकिस्तान की ओर से उन्हें मासूम बताने में 13 दिनों की देरी क्यों की गई. वहां की इंटेलिजेंस को तो इस बात की जानकारी थी. अब लगता है कि पाकिस्तान की ओर से एक नया खेल शुरू किया जा रहा है कि जिन युवाओं को भारतीय खुफिया एजेंसियां आतंकी होने के शक में पकड़े उन्हें मासूम बताकर स्टूडेंट बता दिया जाए.

फोटो में दिखाई दे रहे इन दोनों कथित स्टूडेंट की लोकेशन कुछ समय पहले फिरोजपुर के पास मिली थी. मगर, वहां से वे अचानक गायब हो गए.

राखी सावंत ने इस भोजपुरी क्वीन संग लगाए ठुमके

सुभा क्रिएशन बैनर की फिल्‍म ‘रानी वेड्स राजा’ का भव्‍य म्‍यूजिक लौन्च मुंबई में  किया गया. इसका म्‍यूजिक मशूहर म्‍यूजिक कंपनी वेब लौन्च किया है. म्‍यूजिक लौन्च के दौरान चर्चित अदाकारा राखी सांवत भी मौजूद रहीं, जिनके साथ भोजपुरी की क्‍वीन रानी चटर्जी और रीतेश पांडेय ने जमकर ठुमके लगाए.

वे दोनों साथ में स्‍टेज पर खूब झूमे. बाद में राखी ने दर्शकों से फिल्‍म ‘रानी वेड्स राजा’ देखने की भी अपील की और रानी के गाए गाने को भी प्रमोट किया. राखी ने कहा कि रानी मेरी बेस्‍ट फ्रेंड हैं. इससे ज्‍यादा वे एक बेहतरीन कलाकार हैं. इनकी फिल्‍में देखकर मजा आता है. खास कर उनके डांस स्‍टेप और कुछ अदाएं मुझे पसंद आती हैं. रानी ने म्‍यूजिक लांच के दौरान रानी चटर्जी का एक गाना भी गाया और कहा कि सभी इस गाने को अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर शेयर करें. मैं भी करूंगी. रानी के गाने को मिलियन आने चाहें.

भोजपुरी सिनेमा में यह पहली बार था, जब किसी फिल्‍म के म्‍यूजिक लांच का इनविटेशन डिजिटली तैयार किया गया. इस फिल्‍म की निर्माता वंदना गिरी हैं और प्रशांत कुमार गिरी ने इसे निर्देशित किया है.  फिल्‍म में रानी चटर्जी के अपोजिट रीतेश पांडेय हैं. इसके अलावा अनूप अरोड़ा, दीपक सिन्हा, संजय वर्मा, नंदिता दुबे, दीपक तिवारी, प्रदीप जैसवार, श्रद्धा यादव मुख्य भूमिका में नज़र आएंगे.

सब जनता को ही लूटने में लगे हैं

आधुनिक इंटरनैट बेस्ड टैक्नोलौजी का गुणगान करने वालों को तब एक बड़ा झटका लगा जब कई शहरों में उबर व ओला की टैक्सियों की हड़ताल हो गई. दोनों कंपनियां इंटरनैट पर आधारित आप के फोन में डाउनलोड किए ऐप्स के सहारे एक पैरेलल पब्लिक ट्रांसपोर्ट मुहैया करा रही हैं और भारत ही नहीं कई और देशों में भी बेहद पौपुलर हैं. उन्होंने टैक्सी बिजनैस का स्वरूप ही बदल दिया, पर अब यही सेवा ग्राहकों के लिए जानलेवा बन रही है.

इस सेवा को देने वाली कंपनियों ने शुरू में ग्राहकों को भी खूब सस्ती सेवा दी और ड्राइवरों को भी भरपूर पैसा दिया. ड्राइवर 80 हजार रुपए मासिक तक कमाने लगे थे पर जैसेजैसे कंपनियों का नुकसान बढ़ने लगा, पैट्रोलडीजल के दाम बढ़े, ग्राहकों की निर्भरता बढ़ी, हरेक की जेब पर डाका डलने लगा. रात और भीड़ के समय ओला और उबर का सौफ्टवेयर अपनेआप फेयर बढ़ाने लगा. ड्राइवरों का कमीशन कम होने लगा. ज्यादा गाडि़यों की वजह से कंपीटिशन बढ़ने लगा.

नतीजा यह हुआ कि यह सेवा सरकारी सेवाओं की तरह होने लगी है. ड्राइवरों ने हड़ताल कर दी क्योंकि वे ज्यादा मुनाफा चाहते हैं, पर कंपनियां जो पहले ही बहुत मोटे नुकसान में चल रही हैं और छूट नहीं देना चाहतीं.

ग्राहकों को और ज्यादा निचोड़ना मुश्किल होने लगा है. लोग एअरकंडीशंड गाडि़यों के स्थान पर ठूसठूस कर भरी गई बसों और छोटी अनियमित टैक्सियों में चलने लगे चाहे रास्तेभर पसीने से तरबतर होना पड़े. जो फैशनेबल थे गाज उन पर भी गिरी क्योंकि वे यदि अतिरिक्त पैसे देने को राजी हों तो भी टैक्सी ऐप से बुलाने पर आती ही नहीं.

यह इंटरनैट निर्भरता का नतीजा है. लोग बहुत सी चीजें गारंटिड लेने लगे हैं. अब तक इंटरनैट का फार्मूला रहा है कि पहले सस्ती सेवा दो और लोग जब आदी हो जाएं तो दाम बढ़ा दो. अब वे मनमाने दाम लेने लगे हैं. टीवी पर टाटा स्काई भी ऐसा ही कर रहा है. क्रैडिट कार्ड कंपनियां भी यही कर रही हैं. एअरलाइनों ने टै्रवल एजेंटों को लगभग बंद करा दिया पर इंटरनैट सेवा के लिए मोटे पैसे वसूलने लगीं.

इन कंपनियों को दोष न दें क्योंकि यह कराधरा सरकार का है जो हर जने को तारों से जोड़ कर बांध रही है और हरेक को कंप्यूटर का गुलाम बना रही है जबकि इंटरनैट की मालिक कौन सी कंपनी है, आसानी से पता नहीं चलता. कंप्यूटर चोरों जिन्हें हैकर कहते हैं अब घर बैठे करोड़ों रुपए कमाने लगे हैं.

ओला और उबर ड्राइवर व उन की कंपनियां इन्हीं चोरों में शामिल हैं. भारत सरकार भी उन की साझीदार है. सब बेचारी जनता को लूटने में लगे हैं. पहले पंडेपादरीमुल्ला जो नियंत्रण रखते थे अब इंटरनैट रखने लगा है.

रिश्ता (अंतिम भाग): कैसे बिखर गई श्रावणी

पूर्व कथा

आकाश के बीमार होने की खबर अन्नू श्रावणी को देती है. वह नहीं चाहती कि उस के मायके में किसी को इस बात का पता चले. इसलिए वह कालिज के काम से लखनऊ जाने की बात अपने पापा से कहती है. ट्रेन में बैठते ही वह अतीत की यादों में खो जाती है.

कालिज के वार्षिक समारोह में अन्नू श्रावणी का परिचय अपने भैया आकाश से करवाती है. पहली ही मुलाकात में आकाश और श्रावणी एकदूसरे की ओर आकर्षित होने लगते हैं. दोनों शादी करने का फैसला करते हैं तो श्रावणी के पिता शादी में जल्दबाजी न करने की सलाह देते हैं पर वह नहीं मानती.

शादी की पहली रात को वह आकाश का बदला रूप देख कर चौंक जाती है. एक दिन पिक्चर हाल में आकाश छोटी सी बात पर हंगामा खड़ा कर देता है और घर आ कर सब के सामने उसे अपमानित करता है और अंतरंग क्षणों में उस से माफी मांगने लगता है. श्रावणी आकाश के इस दोहरे व्यवहार को समझ नहीं पाती. शादी के बाद वह आकाश के साथ पहली बार मायके जाती है तो घर के बाहर एक कार चालक से वह लड़ने लगता है.

समय बीतने लगता है. अन्नू की शादी तय हो जाती है और श्रावणी भी गर्भवती हो जाती है. आकाश उस पर गर्भपात कराने का दबाव बनाने लगता है. उस के इस व्यवहार से घर के सभी लोग दुखी हो जाते हैं. श्रावणी एक बेटे को जन्म देती है. उधर अन्नू की शादी की तारीख करीब आने लगती है लेकिन आकाश का तटस्थ व्यवहार देख सब परेशान होते हैं और शादी की सारी जिम्मेदारी श्रावणी को निभानी पड़ती है,

और अब आगे…

अम्मां के आग्रह पर अब सुबहशाम पापा आ जाते थे. पापा के साथ उन की कार में बैठ कर मैं बाहर के काम निबटा लिया करती थी. मां घर और चौके की देखभाल कर लिया करती थीं. बहू के अति विनम्र स्वभाव को देख कर अम्मां आशीर्वादों की झड़ी लगा कर मुक्तकंठ से मेरी मां से सराहना करतीं, ‘बहनजी, जितना सुंदर श्रावणी का तन है, उतना ही सुंदर मन भी है. श्रावणी जैसी बहू तो सब को नसीब हो.’

अन्नू का ब्याह हो गया. मां और पापा घर लौट रहे थे. अम्मां ने एक बार फिर मेरी प्रशंसा मां से की तो मां के जाते ही आकाश के अंत:स्थल में दबा विद्रोह का लावा फूट पड़ा था :

‘वाहवाही बटोरने का बहुत शौक है न तुम्हें? अपने जेवरात क्यों दे दिए तुम ने अन्नू को?’

मैं ने आकाश के साथ उस के परिवार को भी अपनाया था. फिर इस परिवार में मां और बहन के अलावा था भी कौन? दोनों से दुराव की वजह भी क्या थी? मैं ने सफाई देते हुए कहा, ‘जेवर किसी पराए को नहीं अपनी ननद को दिए हैं. अन्नू तुम्हारी बहन है, आकाश. जेवरों का क्या, दोबारा बन जाएंगे.’

‘पैसे पेड़ पर नहीं उगते, श्रावणी, मेहनत करनी पड़ती है.’

मैं अब भी उन के मन में उठते उद्गारों से अनजान थी. चेहरे पर मायूसी के भाव तिर आए थे. रुंधे गले से बोले, ‘इन लोगों ने मुझे कब अपना समझा. हमेशा गैर ही तो समझा…जैसे मैं कोई पैसा कमाने की मशीन हूं. उन दिनों 7 बजे दुकानें खुलती थीं. सुबह जा कर मामा की आढ़त की दुकान पर बैठता. वहां से सीधे दोपहर को स्कूल जाता. तब तक घर का कामकाज निबटा कर मां दुकान संभालती थीं. शाम को स्कूल से लौट कर पुन: दुकान पर बैठता, क्योंकि मामा शाम को किसी दूसरी दुकान पर लेखागीरी का काम संभालते थे. इन लोगों ने मेरा बचपन छीना है. खेल के मैदान में बच्चों को क्रिकेट खेलते देखता तो मां की गोद में सिर रख कर कई बार रोया था मैं, लेकिन मां हर समय चुप्पी ही साधे रहती थीं.’

मनुष्य कभी आत्मविश्लेषण नहीं करता और अगर करता भी है तो हमेशा दूसरे को ही दोषी समझता है. आकाश इन सब बातों का रोना मुझ से कई बार रो चुके थे. अपनी सकारात्मक सोच और आत्मबल की वजह से मैं, अलग होने में नहीं, हालात से सामंजस्य बनाने की नीति में विश्वास करती थी. हमेशा की तरह मैं ने उन्हें एक बार फिर समझाया :

‘अम्मां की विवशता परिस्थितिजन्य थी, आकाश. असमय वैधव्य के बोझ तले दबी अम्मां को समझौतावादी दृष्टिकोण, मजबूरी से अपनाना पड़ा होगा. जिस के सिर पर छत नहीं, पांव तले जमीन नहीं थी, देवर, जेठ, ननदों…सभी ने संबंध विच्छेद कर लिया था तो भाई से क्या उम्मीद करतीं? अम्मां को सहारा दे कर, उन के बच्चों की बुनियादी जरूरतें पूरी कीं, उन्हें आर्थिक और मानसिक संबल प्रदान किया. ऐसे में यदि अम्मां ने बेटे से थोड़े योगदान की उम्मीद की तो गलत क्या किया?

‘आखिर मामा का अपना भी तो परिवार था और फिर अम्मां भी तो हाथ पर हाथ धर कर नहीं बैठी थीं. यही क्या कम बात है कि अपने सीमित साधनों और विषम परिस्थितियों के बावजूद, अम्मां ने तुम्हें और अन्नू को पढ़ालिखा कर इस योग्य बनाया कि आज तुम दोनों समाज में मानसम्मान के साथ जीवन जी रहे हो.’

सुनते ही आकाश आपे से बाहर हो गए, ‘गलती की, जो तुम से अपने मन की बात कह दी…और एक बात ध्यान से सुन लो. मुझे मां ने नहीं पढ़ाया. जो कुछ बना हूं, अपने बलबूते और मेहनत से बना हूं.’

उस दिन आकाश की बातों से उबकाई सी आने लगी थी मुझे. पानी के बहाव को देख कर  बात करने वाले आकाश में आत्मबल तो था ही नहीं, सोच भी नकारात्मक थी. इसीलिए आत्महीनता का केंचुल ओढ़, दूसरों में मीनमेख निकालना, चिड़चिड़ाना उन्हें अच्छा लगता था. खुद मित्रता करते नहीं थे, दूसरों को हंसतेबोलते देखते तो उन्हें कुढ़न होती थी.

अन्नू अकसर घर आती थी. कभी अकेले, कभी प्रमोदजी के साथ. नहीं आती तो मैं बुलवा भेजती थी. उस के आते ही चारों ओर प्रसन्नता पसर जाती थी. अम्मां का झुर्रीदार बेरौनक चेहरा खिल उठता. लेकिन बहन के आते ही भाई के चेहरे पर सलवटें और माथे पर बल उभर आते थे. जब तक वह घर रहती, आकाश यों ही तनावग्रस्त रहते थे.

अन्नू के ब्याह के कुछ समय बाद ही अम्मां ने बिस्तर पकड़ लिया था. मेरा प्रसवकाल भी निकट आता जा रहा था. अम्मां को बिस्तर से उठाना, बिठाना काफी मुश्किल लगता था. मैं ने आकाश से अम्मां के लिए एक नर्स नियुक्त करने के लिए कहा तो उबल पडे़, ‘जानती हो कितना खर्चा होगा? अगले महीने तुम्हारी डिलीवरी होगी. मेरे पास तो पैसे नहीं हैं. तुम जो चाहो, कर लो.’

घरखर्च मेरी पगार से चलता था. मैं ने कभी भी खुद को इस घर से अलग नहीं समझा, न ही कभी आकाश से हिसाब मांगा. अन्नू के ब्याह पर भी अपने प्राविडेंट फंड में से पैसा निकाला था. फिर इस संकीर्ण मानसिकता की वजह क्या थी? किसी से कुछ भी पूछने की जरूरत नहीं पड़ी. मां के इलाज के लिए पैसेपैसे को रोने वाले बेटे को चमचमाती हुई कार दरवाजे के बाहर पार्क करते देख कर कोई पूछ भी क्या सकता था? डा. प्रमोद ही अम्मां की देखभाल करते रहे थे.

कुछ ही दिनों बाद अम्मां ने दम तोड़ दिया. मैं फूटफूट कर रो रही थी. एकमात्र संबल, जिस के कंधे पर सिर रख कर मैं अपना सुखदुख बांट सकती थी, वह भी छिन गया था. मां ढाढ़स बंधा रही थीं. पापा, अन्नू और प्रमोदजी मित्रोंपरिजनों की सहानुभूतियां बटोर रहे थे. दुनिया ने चाहे कितनी भी तरक्की कर ली हो पर जातियों में बंटा हमारा समाज आज भी 18वीं सदी में जी रहा है. ब्याहशादियों में कोई आए न आए, मृत्यु के अवसर पर जरूर पहुंचते हैं.

धीरेधीरे यहां भी लोगों की भीड़ जमा होनी शुरू हो गई. मांपापा, अन्नू, प्रमोद, यहीं हमारे घर पर ठहरे हुए थे. आकाश घर में रह कर भी घर पर नहीं थे. एक बार वही तटस्थता उन पर फिर हावी हो चुकी थी. जब मौका मिलता, घर से बाहर निकल जाते और जब वापस लौटते तो उन की सांसों से आती शराब की दुर्गंध, पूरे वातावरण को दूषित कर देती. प्रबंध से ले कर पूरी सामाजिकता प्रमोदजी ही निभा रहे थे और यह सब मुझे अच्छा नहीं लग रहा था. यह सोच कर कि अम्मां बेटे की मां थीं. आकाश को उन्होंने जन्म दिया था, पालपोस कर बड़ा किया था तो अम्मां के प्रति उन की जिम्मेदारी बनती है.

एक दिन पंडितों के लिए वस्त्र, खाद्यान्न, हवन के लिए नैवेद्य आदि लाते हुए प्रमोदजी को देखा तो बरसों का उबाल, हांडी में बंद दूध की तरह उबाल खाने लगा, ‘ये सब काम आप को करने चाहिए आकाश. प्रमोदजी इस घर के दामाद हैं. फिर भी कितनी शांति से दौड़भाग में लगे हुए हैं.’

‘मैं शुरू से ही जानता था. तुम्हें ऐसे ही लोग पसंद हैं जो औरतों के इर्दगिर्द चक्कर लगाते हैं और खासकर के तुम्हारी जीहुजूरी करते हैं,’ फिर मां और पापा को संबोधित कर के बोले, ‘प्रमोद जैसा लड़का ढूंढ़ दीजिए अपनी बेटी को,’ और धड़धड़ाते हुए वह कमरे से बाहर निकल गए.

आकाश का ऐसा व्यवहार मैं कई बार देख चुकी थी. बरदाश्त भी कर चुकी थी. कई बार दिल में अलग होने का खयाल भी आया था लेकिन कर्तव्य व प्रेम के दो पाटों में पिस कर वह चूरचूर हो गया. आकाश के झूठ, दंभ और पशुता को मैं इसीलिए अपनी पीठ पर लादे रही कि समाज में मेरी इमेज, एक सुखी पत्नी की बनी रहे. लेकिन आकाश ने इन बातों को कभी नहीं समझा. वहां आए रिश्तेदारों के सामने, मां की मृत्यु के मौके पर वह मुझे इस तरह जलील करेंगे, ऐसी उम्मीद नहीं थी मुझे.

तेरहवीं के दिन, शाम के समय मां और पापा ने मुझे साथ चलने के लिए कहा तो, सभ्य रहने की दीवार जो मैं ने आज तक खींच रखी थी, धीरे से ढह गई. पूरी तरह प्रतिक्रियाविहीन हो कर, जड़ संबंधों को कोई कब तक ढो सकता था? चुपचाप चली आई थी मां के साथ.

इसे औरत की मजबूरी कहें या मोह- जाल में फंसने की आदत. बरसों तक त्रासदी और अवहेलना के दौर से गुजरने के बाद भी, उसी चिरपरिचित चेहरे को देखने का खयाल बारबार आता था. क्रोध से पागल हुआ आकाश, नफरत भरी दृष्टि से मुझे देखता आकाश, अम्मां को खरीखोटी सुनाता आकाश, अन्नू को दुत्कारता, प्रमोदजी का अनादर करता आकाश.

मां और पापा, सुबहशाम की सैर को निकल जाते तो मुझे तिनकेतिनके जोड़ कर बनाया अपना घरौंदा याद आता, एकांत और अकेलापन जब असहनीय हो उठता तो दौड़ कर अन्नू को फोन मिला देती. अन्नू एक ही उत्तर देती कि सागर में से मोती ढूंढ़ने की कोशिश मत करो श्रावणी. आकाश भैया अपनी एक सहकर्मी मालती के साथ रह कर, मुक्ति- पर्व मना रहे हैं. हर रात शराब  के गिलास खनकते हैं और वह दिल खोल कर तुम्हें बदनाम करते हैं.

बिट्टू के जन्म के समय भी आकाश की प्रतीक्षा करती रही थी. पदचाप और दरवाजे के हर खटके पर मेरी आंखों में चमक लौट आती. लेकिन आकाश नहीं आए. अन्नू प्रमोदजी के साथ आई थी. मेरी पसीने से भीगी हथेली को अपनी मजबूत हथेली के शिकंजे से, धीरेधीरे खिसकते देख बोली, ‘मृगतृष्णा में जी रही हो तुम श्रावणी. आकाश भैया नहीं आएंगे. न ही किसी प्रकार का संपर्क ही स्थापित करेंगे तुम से. जब तक तुम थीं तब तक कालिज तो जाते थे. परिवार के दायित्व चाहे न निभाए, अपनी देखभाल तो करते ही थे. आजकल तो नशे की लत लग गई है उन्हें.’

अन्नू चली गई. मां मेरी देखभाल करती रहीं. लोग मुबारक देते, साथ ही आकाश के बारे में प्रश्न करते तो मैं बुझ जाती. मां के कंधे पर सिर रख कर रोती, ‘बिट्टू के सिर से उस के पिता का साया छीन कर मैं ने बहुत बड़ा अपराध किया है, मां.’

‘जिस के पास संतुलित आचरण का अपार संग्रह न हो, जो झूठ और सच, न्यायअन्याय में अंतर न कर सके, वह समाज में रह कर भी समाज का अंग नहीं बन सकता, न ही किसी दृष्टि में सम्मानित बन सकता है,’ पापा की चिढ़, उन के शब्दों में मुखर हो उठती थी.

मां, पुराने विचारों की थीं, मुझे समझातीं, ‘बेटी, यह बात तो नहीं कि तू ने प्रयास नहीं किए, लेकिन जब इतने प्रयासों के बाद भी तुझे तेरे पति से मंजूरी नहीं मिली तो क्या करती? साए की ओट में दम घुटने लगे तो ऐसे साए को छोड़ खुली हवा में सांस लेने में ही समझदारी है.’

‘लेकिन जगहजगह उसे पिता के नाम की जरूरत पड़ेगी तब?’

‘अब वह जमाना नहीं रहा, जब जन्म देने वाली मां का नाम सिर्फ अस्पताल के रजिस्टर तक सीमित रहता था और स्कूल, नौकरी, विवाह के समय बच्चे की पहचान पिता के नाम से होती थी. आज कानूनन इन सभी जगहों पर मां का नाम ही पर्याप्त है.’

मां की मृत्यु पर भी आकाश नहीं दिखाई दिए थे. अन्नू और प्रमोदजी ही आए थे. मैं समझ गई, जिस व्यक्ति ने मुझ से संबंध विच्छेद कर लिया वह मेरी मां की मृत्यु पर क्यों आने लगा. जाते समय अन्नू ने धीरे से बतला दिया था, ‘आजकल आकाश भैया सुबह से ही बोतल खोल कर बैठ जाते हैं. मैं ने सौ बार समझाया और उन्होंने न पीने का वादा भी किया, लेकिन फिर शुरू हो जाते हैं,’ फिर एक सर्द आह  भर कर बोली, ‘लिवर खराब हो गया है पूरी तरह. प्रमोदजी काफी ध्यान रखते हैं उन का लेकिन कुछ परहेज तो भैया को भी रखना चाहिए.’

सोच के अपने बयावान में भटकती कब मैं झांसी पहुंची पता ही नहीं चला. तंद्रा तो मेरी तब टूटी जब किसी ने मुझे स्टेशन आने की सूचना दी. लोगों के साथ टे्रन से उतर कर मैं स्टेशन से सीधे अस्पताल पहुंच गई. अन्नू पहले से ही मौजूद थी. प्रमोद डाक्टरों के साथ बातचीत में उलझे थे. मैं ने आकाश के पलंग के पास पड़े स्टूल पर ही रात काट दी. सच कहूं तो नींद आंखों से कोसों दूर थी. मेरा मन सारी रात न जाने कहांकहां भटकता रहा.

सुबह अन्नू ने चाय पी कर मुझे जबर्दस्ती घर के लिए ठेल दिया. आकाश तब भी दवाओं के नशे में सोए हुए थे.

घर आ कर मुझे जरा भी अच्छा नहीं लग रहा था. पराएपन की गंध हर ओर से आ रही थी. नहाधो कर आराम करने का मन बना ही रही थी, पर अकेलापन मुझे काटने को दौड़ रहा था. घर से निकल कर अस्पताल पहुंची तो आकाश, नींद से जाग चुके थे. अन्नू के साथ बैठे चाय पी रहे थे. मुझे देख कर भी कुछ नहीं बोले. मैं ने धीरे से पूछा, ‘‘तबीयत कैसी है?’’

‘‘ठीक है,’’ उन का जवाब ठंडे लोहे की तरह लगा. किसी के बारे में कुछ पूछताछ नहीं की. यहां तक कि बिट्टू के बारे में भी कुछ नहीं पूछा. अन्नू ही कमरे में मौन तोड़ती रही. हम दोनों के बीच पुल बनाने का प्रयास करती रही. डाक्टरों की आवाजाही जारी थी. सारे दिन लोग, आकाश से मिलने आते रहे. मुझे देख कर हर आने वाला कहता, ‘अच्छा हुआ आप आ गईं,’ पर 3 दिन में, एक बार भी मेरे पति ने यह नहीं कहा, ‘अच्छा हुआ जो तुम आ गईं. तुम्हें बहुत मिस कर रहा था मैं.’

आकाश की हालत काबू में नहीं आ रही थी. प्रमोदजी ने मुझ से धीरे से कहा, ‘‘भाभीजी, आकाश भैया की हालत अच्छी नहीं लग रही है. आप जिसे चाहें खबर कर दें.’’

मैं जब तक कुछ कहती या करती, आकाश ने दम तोड़ दिया. अन्नू फूटफूट कर रो रही थी. प्रमोदजी उसे ढाढ़स बंधा रहे थे. मेरे तो जैसे आंसू ही सूख गए थे. इस पर क्या आंसू बहाऊं? जिस आदमी ने मुझे कभी अपना नहीं समझा…मेरे बेटे को अपना समझना तो दूर उस का चेहरा तक नहीं देखा, मैं कैसे उस आदमी के लिए रोऊं? यह बात मेरी समझ से बाहर थी.

जाने कितने लोग, शोक प्रकट करने आ रहे थे. हर आदमी, इतनी कम उम्र में इन के चले जाने से दुखी था, पर मैं जैसे जड़ हो गई थी. इतने लोगों को रोते देख कर भी मैं पत्थर की हो गई थी. मेरे आंसू न जाने क्यों मौन हो गए थे? सब कह रहे थे, मुझे गहरा शौक लगा है. इन दिनों आकाश की सारी बुराइयां खत्म हो गई थीं. हर व्यक्ति को उन की अच्छाइयां याद आ रही थीं. मैं खामोश थी.

पापा का फोन मेरे मोबाइल पर कई बार आ चुका था. मैं उन्हें 1-2 दिन का काम और है बता कर फोन काट देती थी.

तेरहवीं के बाद सब ने अपनाअपना सामान बांध लिया. मेरी उत्सुक निगाहें मालती को ढूंढ़ रही थीं. अन्नू से ही पूछताछ की तो बोली, ‘‘आकाश भैया का सारा पैसा अपने नाम करवा कर वह तो कभी की चली गई झांसी छोड़ कर. कहां है, कैसी है हम नहीं जानते. भला ऐसी औरतें रिश्ता निभाती हैं?’’

झांसी से टे्रन के चलते ही मैं ने राहत की सांस ली. ऐसा लगा, जैसे मैं किसी कैद से बाहर आ गई हूं. झांसी की सीमा पार करते ही मुझे पहली बार एहसास हुआ कि झांसी से मेरा रिश्ता सचमुच टूट गया है. अब मैं यहां क्यों आऊंगी? रिश्तों के दरकने का मुझे पहली बार एहसास हुआ. मैं फूटफूट कर रो पड़ी.

#MeToo: नाना-तनुश्री मामले में आया नया मोड़, ये एक्ट्रेस देगी गवाही

मीटू मामले में नाना पाटेकर की मुश्किलें बढ़ सकती हैं. दरअसल तनुश्री और नाना पाटेकर के मामले में मुंबई पुलिस ने नोटिस भेजकर बौलीवुड एक्ट्रेस डेजी शाह को बुलाया है. डेजी का बयान दर्ज करने के लिए उन्हें बुलाया गया है. ओशिवार थाने की ओर से कहा गया है कि जब ये घटना घटी उस वक्त सेट पर डेजी शाह भी मौजूद थी. डेजी उस गाने की असिस्टेंट कोरियोग्राफर थी. वो गणेश आचार्य के साथ गाने में काम कर रही थी.

daisy shah to testimony

सदमे में थी तनुश्री

इस मामले में मीडिया से बात करते हुए डेजी ने बताया था कि, ‘मैंने तनुश्री के साथ 3 दिन तक गाने की प्रैक्टिस की थी. शुरुआती दो दिन बहुत अच्छे बीते किसी को कोई दिक्कत नहीं हुई. तीसरे दिन कुछ हुआ था, लेकिन क्या ये मुझे ठीक से नहीं पता और न ही मैं इसके बारे में कुछ भी जानती हूं.’ उन्होंने आगे कहा कि ‘इसके बाद तनुश्री ने 4 घंटे तक खुद को वैनिटी में बंद कर लिया था. उन्हें सेट से निकालने में भी दिक्कत हुई.’

दर्ज है नाना के खिलाफ मामला

आपको बता दें कि मीटू अभियान के तहत तनुश्री दत्ता ने नाना पाटेकर पर सेक्शुअल हैरेसमेंट के आरोप लगाए थे. इस मामले में मुंबई ओशिवारा थाने में FIR दर्ज कराई गई थी. अपनी शिकायत में तनुश्री ने नाना के अलावा कोरियोग्राफर गणेश आचार्य और प्रोड्यूसर सामी सिद्दीकी, डायरेक्टर राकेश सारंग और महाराष्ट्र नव निर्माण सेना (एमएनएस) के कुछ कार्यकर्ताओं के भी नाम लिए हैं. तनुश्री ने आईपीसी की धारा 354A और 509 के तहत केस दर्ज किया है.

‘मेरा नाम चन्द्रशेखर है और मैं रावण नहीं हूं’

भीम आर्मी को मायावती दलितों का विरोधी मानते अपने वोटबैंक को समझाती हैं कि वह इनसे दूर रहे. इसके जवाब में भीम आर्मी के संस्थापक चन्द्रशेखर मायावती को अपना नेता मानते है. चन्द्रशेखर का मानना है कि बहन जी किसी बात से हमसे नाराज हैं. लेकिन यह हमारे परिवार का मसला है. हम केवल कांशीराम के मूवमेंट को आगे बढ़ा रहे हैं. हमें ना तो राजनीति करनी है और ना ही चुनाव लड़ना है. हम चाहते हैं कि 2019 में भाजपा सत्ता में ना आये. मायावती का पक्ष लेते चन्द्रशेखर कहते हैं कि ‘कांग्रेस दलितों का हित चाहती है तो मायावती का साथ दे.’

भीम आर्मी के संस्थापक चन्द्रशेखर का पूरा नाम चन्द्रशेखर आजाद है. कुछ समय से उनके नाम के आगे चन्द्रशेखर रावण लिखा जाने लगा था. इस पर चन्द्रशेखर ने कहा कि मेरा असल नाम चन्द्रशेखर ही दर्ज है. बाकी जिसको जो अच्छा लगता है वह जोड़ लेता है, किसी ने आजाद जोड़ा तो कोई रावण भी जोड़ लेता है. चन्द्रशेखर पर जातीय राजनीति ठप्पा लगता है. चन्द्रशेखर कहते हैं कि मेरे साथ बड़ी संख्या में मुसलिम भी हैं.

चन्द्रशेखर पर एक युवती के यौन शोषण का भी आरोप है. वह सफाई देते हुए कहते हैं कि जो लोग मुझे खरीद नहीं सके, वह इस तरह के आरोप लगाकर तोड़ना चाहते हैं. इसमें हमारे ही समाज के कुछ लोग जुड़े हैं. चन्द्रशेखर का मीडिया में एक आकर्षण है. युवाओं में वह लोकप्रिय हो रहे हैं. यही वजह है कि बसपा नेता मायावती को उनसे परहेज होता है.

असल में चन्द्रशेखर को सपोर्ट करने वाले नेताओं में बड़ी संख्या ऐसे नेताओं की है जो बसपा से जुड़े रहे और अब बसपा से अलग हो गये हैं. मायावती की ही तरह चन्द्रशेखर भी कांशीराम की नीतियों पर चलने की बात करते हैं. मायावती यह नहीं चाहती कि कांशीराम के नाम पर कोई दूसरा राजनीति करे. मायावती को यह डर भी है कि अगर दलितों में कोई दूसरा नेता उभरा तो दलित मायावती का साथ छोड़कर उसके साथ चले जायेंगे.

चन्द्रशेखर ने अयोध्या मसले पर कहा कि ‘अयोध्या देश के प्रमुख बौद्व स्थलों में से एक है. इसका नाम साकेत था. इसे वापस साकेत होना चाहिये. इसके लिये हम संघर्ष करेंगे. राममंदिर विवाद कोर्ट में है, कोर्ट जो फैसला करे हमें मानना चाहिये.’

बलात्कारी बहादुर नहीं बल्कि डरपोक है

हाल ही में दिल्ली पुलिस की वार्षिक रिपोर्ट में एक बड़ा खुलासा हुआ है, जिस के अनुसार हर घंटे एक महिला अपराध का शिकार हो रही है. चाहे वह दुष्कर्म की घटना हो या फिर छेड़छाड़ का मामला. साथ ही यह भी खुलासा किया गया है कि महिलाओं से दुष्कर्म की करीब 97त्न घटनाओं में उन के जानकारों का ही हाथ होता है. वहीं ऐसी वारदातों में 3त्न अपरिचित आरोपी निकले. हकीकत यह है कि दुष्कर्म या बलात्कार के ज्यादातर मामले लोकलाज के भय से या तो दबा दिए जाते हैं या उन की रिपोर्ट दर्ज नहीं होती, लेकिन दुष्कर्म के बाद जो मानसिक पीड़ा या त्रासदी महिला को झेलनी पड़ती है वह अकल्पनीय है.

सब से बड़ा सवाल यह है कि एक बलात्कारी किन मानसिक परिस्थितियों में इस तरह के कुकृत्य को अंजाम देता है? क्या वह उस के बाद होने वाले परिणामों को भूल जाता है या फिर उन के बारे में सोचता ही नहीं.

दुष्कर्म या बलात्कार सब से घृणास्पद कुकृत्यों में शामिल है. ऐसे कुकृत्यों को अंजाम देने के बाद कोई बहादुर नहीं बन जाता या फिर समाज उसे कोई बड़ा तमगा नहीं दे देता. इस के उलट सचाईर् सामने आने पर वह घृणा या दुराव का ही शिकार होता है. उस की सोशल आईडैंटिटी खतरे में पड़ जाती है और उसे सजा के साथसाथ रिजैक्शन भी भोगना पड़ता है.

हद तो तब होती है जब ये दुष्कर्मी सरेआम सीना ठोक कर ऐसे घूमते हैं मानो उन्होंने कोई बड़ा तीर मारा हो. देश के सुदूर ग्रामीण आदिवासी इलाकों में उच्चजाति के लोगों द्वारा दलित आदिवासी महिलाओं की अस्मत लूटने और उन्हें जिंदा जलाए जाने की खबरें सुर्खियां बनती रहती हैं पर पीड़ाजनक स्थिति तब होती है जब ऐसे लोग अपने कुकृत्यों का सरेआम ढिंढोरा पीटते हैं. पुलिस और कानून को धताबता कर ये अपनी जांबाजी में एक तमगा और जोड़ लेते हैं, पर यह विडंबना है कि हम आंख मूंदे इन बलात्कारियों का साथ देते हैं.

दुष्कर्मियों का कोई नैतिक बल नहीं होता. न ही कोई चारित्रिक संबल. असंतुलित भावनाओं के उन्माद में वे दुष्कर्म के दलदल में जा गिरते हैं पर एक सच यह भी है कि इस क्षणिक ज्वार के ठंडा पड़ते ही वे अपने पुराने स्वरूप में लौट आते हैं और ताउम्र पश्चात्ताप व ग्लानि की पीड़ा में अपनी बची जिंदगी गुजार देते हैं.

इस की सब से बड़ी बानगी दिल्ली में घटा निर्भया कांड है. बलात्कारियों ने क्षणिक आवेश में वह कर डाला जो उन्हें नहीं करना चाहिए था. इस के बदले उन आरोपियों को मिला क्या? केवल सामाजिक बहिष्कार, अलगाव, घृणा और सजा.

सामाजिक बहिष्कार इन आरोपियों पर इस कदर हावी हुआ कि उन में से एक ने तो खुदखुशी कर ली. बाकी या तो सजा भुगत रहे हैं या अदालती ट्रायल के चक्कर काटते हुए भारी मानसिक तनाव व कुंठा से गुजर रहे हैं.

अपराध छोटा हो या बड़ा उसे कभी सामाजिक स्वीकृति नहीं मिलती. दुष्कर्मियों के लिए तो समाज में कोई स्थान है ही नहीं. अपराध हमेशा कुंठा, पीड़ा व सजा ही दिलवाता है, सम्मान नहीं.

हमें चाहिए कि इन दुराचारियों को किसी भी स्तर पर बिलकुल न सराहें और न सहें. इन्हें बढ़ावा तभी मिलता है जब हम मौन साध लेते हैं. हमारी दहाड़ इन के हौसले पस्त करेगी. सामाजिक और पारिवारिक बहिष्कार से ये अलगथलग पडे़ंगे और इन का वहशीपन कमजोर पड़ेगा.

ऐसे प्रयास सिर्फ अपराधियों की तरफ से ही नहीं करने होंगे बल्कि हमें महिलाओं का पक्ष भी मजबूत करना होगा. दुष्कर्म की शिकार पीडि़ताओं के लिए स्वाभिमान कार्यक्रम चलाने होंगे. उन के भीतर के ग्लानि और कुंठा के भाव को स्नेह व प्रेम से निकालना होगा. उन्हें समाज व परिवार में दोबारा उचित स्थान दिलाने के लिए उन का मनोबल बढ़ाना होगा. तभी हम इन बलात्कारियों को मजबूत इरादों वाली महिलाओं से टक्कर दे सकेंगे.

बलात्कारियों का बहिष्कार और पीडि़ताओं की सम्मानजनक वापसी उन के होश ठिकाने लगाने का सब से बड़ा मूलमंत्र है.

जानिए कब शुरू होगी ‘गो गोवा गौन 2’ की शूटिंग

स्टैंडअप कौमेडियन के रूप में मशहूर लेखक, निर्देशक व अभिनेता वीर दास को बौलीवुड में 2013 में प्रदर्शित सैफ अली खान निर्मित और राज डी के निर्देशित भारत की पहली जौंबी हास्य फिल्म ‘गो गोवा गौन’ से शोहरत मिली थी.

इस सफलतम फिल्म में वीर दास के अलावा सैफ अली खान, कुणाल खेमू और आनंद तिवारी की मुख्य भूमिकाएं थीं. अब पूरे पांच वर्ष बाद सैफ अली खान ने इसका सिक्वअल ‘गो गोवा गौन 2’ बनाने का निर्णय लिया है. जिसमें मूल फिल्म के सभी कलाकारों को ही दोहराया जा रहा है.

कहने का अर्थ यह कि पिछली फिल्म की ही तरह इस सिक्वअल फिल्म ‘गो गोवा गौन 2’ में वीर दास अपने उसी पुराने ‘लव’ के किरदार में नजर आएंगे.

go goa gone shooting date

सूत्रों का दावा है कि सैफ अली खान तुरंत अपनी इसफिल्म का फिल्मांकन करना चाहते हैं. मगर वीर दास इन दिनों 11 दिसंबर को नेटफ्लिक्स पर अपने प्रसारित होने वाले अपने खास शो ‘वीर दास लूजिंग इट’ में व्यस्त हैं, इसलिए अब ‘गो गोवा गौन 2’ की शूटिंग 11 दिसंबर के बाद शुरू होगी.

फिल्म ‘गो गोवा गौन 2’ को लेकर उत्साहित वीर दास कहते हैं, ‘इन दिनों मेरा सारा ध्यान 11 दिसंबर को ‘नेटफ्लिक्स’ पर प्रदर्शित होने वाले शो ‘वीर दास लूजिंग इट’ पर है. इसके बाद मैं ‘गो गोवा गौन 2’ की शूटिंग शुरू करुंगा. इसकी शूटिंग एक ही शेड्यूल में पूरी होगी.

पिछली बार हमारा किरदार लव जहां छूटा था, वहीं से आगे बढे़गा. मुझे लगता है कि अब जिस तरह से सिनेमा बदला है, उससे इस तरह की फिल्मों के दर्शक भी काफी बढ़े हैं.’

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